वेबसाइट और एप्प की तकनीकी दुनिया : बहुत कठिन है डगर पनघट की…

आजकल इन्टरनेट का ज़माना है. जिसे देखो वो वेबसाइट खोल रहा है. एप्प लांच कर रहा है. बड़ी और कारपोरेट कंपनियों की बात अलग रखिए जिनके पास खूब पैसा है और वो मार्केट के ब्रेस्ट ब्रेन और बेस्ट टेक कंपनी को अपने पोर्टल व एप्प के लिए हायर करते हैं. मैं बात कर रहा हूं उन साथियों की जो कम पूंजी में वेबसाइट, एप्प आदि लांच तो कर देते हैं लेकिन उनके टेक्निकल सपोर्टर ऐसे नहीं होते जो एक लेवल के बाद वेंचर को नई उंचाई पर ले जा सकें. वेबसाइट बना देना, चला देना बिलकुल अलग बात है. इसे मेनटेन रखना, इसे हैक से बचाना, इसे ज्यादा ट्रैफिक के दौरान संयत रखना, इसे लगातार सर्च इंजन फ्रेंडली बनाए रखना, इसे मजबूत सर्वर से जोड़े रखना दूसरी बात होती है.

इन्टरनेट की सबसे बड़ी खूबी ये है कि कोई भी फेसबुकिया अपने आप को इन्टरनेट का एक्सपर्ट मानता है. ठीक वैसे ही जैसे कि इंडिया का मैच होने पर वे खुद सबसे बड़े क्रिकेट एक्सपर्ट बन जाते हैं. आज मैं इस मुद्दे पर प्रकाश डालना चाहता हूँ कि कैसे आजकल लोग ऑनलाइन और इन्टरनेट के नाम पर ठग लिए जाते हैं. हरेक सर्विस की तरह इन्टरनेट की सर्विस के भी दो पहलू हैं. एक है सर्विस देने वाला और दूसरा सर्विस लेने वाला. दोनों मिलकर कैसी खीचम-खांच मचाते हैं और अपने आप को सर्वज्ञानी मानते हुए खुद बेवकूफ बन जाते हैं वो बता रहा हूँ.  अपन इसी धंधे में हैं तो थोडा बहुत जानते हैं. इसलिए पढ़ते चले जाइये, मज़ा आएगा.

सेवा प्रदाता द्वारा बेवकूफ बनाना

कोई भी बिज़नस अच्छे से करने के लिए आपको कुशलता और बुद्धि की आवश्यकता होती है. आजकल इन्टरनेट और ऑनलाइन सर्विस देने वाले एक-दो लडकों को भर्ती करके धंधा शुरू कर देते हैं. ठीक भी है, इस धंधे में कोई दुकान नहीं चाहिए, कोई कच्चा माल नहीं चाहिए. बस अपना कंप्यूटर लेकर बैठ जाइये. दुकान चालू. पर ये इतना आसान नहीं. इन्टरनेट के व्यवसाय में तमाम तरह की समस्याओं को रोजाना सुलझाना होता है. आप लम्बी रेस के घोड़े तभी बनेंगे जब आपके पास थोडा ज्ञान भी हो.

ग्राहकों को लूटना

ज्ञान न होने पर भी आप ग्राहक को भारी भरकम बिल तो थमा ही सकते है. एक उदाहरण से समझाता हूँ कि कैसे. चाय बेचने वाला दो तरह का होता है. एक स्टेशन पर चाय बेचने वाला और दूसरा आपके पड़ोस में चाय बेचने वाला. स्टेशन वाला आपको रेगुलर कस्टमर नहीं मानता. आपने उससे आज चाय ली है तो ज़रूरी नहीं कल भी लें. पर पड़ोस वाला आपको एक ग्राहक के रूप में अधिक सम्मान देता है. वो इसलिए कि कल को आप फिर से उसके पास आयेंगे. वो आपको बेवकूफ नहीं बनाएगा. यही सब हमारी इंडस्ट्री में भी है. अधिकतर वेबसाइट डेवलपर स्टेशन के चाय वाले हैं. पैसा लूटा और फिर राम राम. उनको आपसे दोबारा पैसा लेने की जरूरत नहीं क्योंकि उनका काम है रोज नए शिकार फंसाना. विडम्बना ये की आप ऐसे सेवा प्रदाता को तभी पहचानते हैं जब वो आपको चूना लगा चुका होता है.

अनुभवी स्टाफ की कमी

इन्टरनेट के व्यवसाय में तमाम तरह के अनुभव की आवश्यकता होती है. ग्राहक की ज़रूरत को टेक्नोलॉजी में ढालना आसान नहीं है. हाथी बनाते-बनाते भैंस बन जाती है, अगर अनुभव न हो. सर्वर को संभालना आसान नहीं. हज़ारों अलग-अलग किस्म की समस्याएं आती हैं, जिनका समाधान अनुभव से ही आता है. अधिकतर वेबसाइट सर्विस प्रदाता अनुभवी स्टाफ के बिना ही धकापेल ग्राहकों की सेवा में जुटे हुए हैं. राम बचाएं इनसे.

ग्राहकों द्वारा खुद का बेवकूफ बनाना

सेवा देने वाले ही गलत काम करते हैं, ऐसा भी नहीं. सेवा लेने वाले भी खुद का बेवकूफ बनाते रहते हैं. कैसे ये देखिये: अपने आप को सर्वज्ञानी मानना… जब सेवा देने वाला सर्वज्ञानी नहीं तो आप एक ग्राहक होते हुए सर्वज्ञानी नहीं हो सकते, अगर आप खुद इस टेक्नोलॉजी पर काम न कर चुके हों. पर मित्रों यही तो समस्या है. हमारे यहाँ हम अलिफ़ बे पे ते सीखकर अपने आपको अरबी घोडा समझने लगते हैं. मेरे अनुभव से लगभग 30 प्रतिशत ग्राहक इस बीमारी से ग्रसित हैं. वो ये नहीं जानते कि अगर आप सेवा प्रदाता पर भरोसा करके उसका काम उसको शांति से करने दें, और अपनी विद्वता की बत्ती बनाकर अपने पास रखे रहें, तो आप कहीं बेहतर सेवा पा सकते हैं बशर्ते सेवा देने वाला इस फील्ड का हो व थोड़ा बहुत ज्ञान रखता हो.

ज़रूरत से ज्यादा मोलभाव करना

आजकल एक नया चलन चल गया है. एक ग्राहक वेबसाइट या मोबाइल एप्प बनाने के लिए २० कम्पनीज से कोटेशन मांगेगा. रद्दी कंपनी ५ रुपये, ठीक ठाक कंपनी २० रुपये और धांसू लगने वाली कंपनी ५० रुपये का कोटेशन देगी. अब भाई साहब ५० वाली कंपनी के पास जायेंगे और बोलेंगे कि हमारे पास सारे कोटेशन २ रुपये से ४ रुपये के बीच में है. आप इत्ता पैसे काहे मांग रहे हो? अब बेचारा ५० रुपये वाला रो पीटकर ३०-३५ तक आता है, पर अंत में ग्राहक ५ वाले से १ रुपये में काम करवाता है और बेवकूफश्री बनता है, क्योंकि १ रुपये में वो काम हो ही नहीं सकता था.

कम पैसे में और ज्यादा, और ज्यादा की चाहत

जब वेबसाइट या एप्प का प्रोजेक्ट शुरू होता है तो सेवा लेने वाला और देना वाला दोनो मिलकर जो भी काम होता है उसकी डिटेलिंग करते हैं. पर कुछ अति उत्साही और अत्यंत स्मार्ट ग्राहक तय किये हुए काम से १० गुना काम चाहते हैं. आपको कुछ न कुछ नया बताते रहेंगे, बिना ये सोचे कि पैसा उस काम का लिया गया है जो पहले फाइनल हुआ था. सो काम करते करते बेचारा डेवलपर फ्रस्टिया जाता है और ग्राहक श्री फिर भी संतुष्ट नहीं हो पाते.

सम्मान नहीं देना

मेरे कुछ ग्राहक हैं जो बहुत ऊंची पढाई करके आये हैं, बड़े बिजनेसमैन भी हैं. लन्दन में होते हैं तो सड़क पर थूकते भी नहीं, पर यहाँ केले का छिलका फेंकने के लिए उनको सड़क ही सबसे मुफीद जगह नज़र आती है. उसी तरह से, वहां एक बढई को ४ घंटे के १०० यूरो दे देंगे, पर भारतीय इंजीनियर को ८ घंटे के हजार रुपये भी देने को तैयार नहीं. ऊपर से उनको जी साहब जी साहब करके न चाटो तो बहुत दुखी होंगे. ऐसे लोगों को ये नहीं पता कि भारतीय टैलेंट का थोड़ा सम्मान करेंगे तो बंदा उन्हें क्या क्या काम करके नहीं दे सकता.

…जारी…

लेखक दिवाकर सिंह नोएडा की कंपनी Qtriangle Infotech Pvt Ltd के मैनेजिंग डायरेक्टर हैं. वेबसाइट डेवलपमेंट, मोबाइल एप्लीकेशन डेवलपमेंट और ई-कॉमर्स पोर्टल डेवलपमेंट का काम करते कराते हैं. साथ ही साथ भड़ास4मीडिया डाट काम के तकनीकी सलाहकार भी हैं. अगर आपको इनसे कुछ जानना-समझना, पूछना-जांचना या सलाह लेना-देना हो तो इनसे संपर्क dsingh@qtriangle.in के जरिए किया जा सकता है.

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Comments on “वेबसाइट और एप्प की तकनीकी दुनिया : बहुत कठिन है डगर पनघट की…

  • mamta yadav says:

    सही आलेख सही बात। अगली किश्त का इंतजार रहेगा।

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