इन्टरनेट के इस दौर में कलमकार भूखा नहीं मरेगा

Naved Shikoh : अब कलम बिकेगा, अखबार नहीं… RNI और DAVP में दर्ज यूपी के 97% पत्र-पत्रिकाओं का वास्तविक सर्कुलेशन 0 से 1000 तक ही है। सोशल मीडिया पर कोई भी अपनी बात या अपना विज्ञापन फ्री में हजारों-लाखों लोगों तक पहुंचा सकता है। ऐसे में बड़े अखबारों को छोड़कर किसी अन्य को चुनावी विज्ञापन क्या खाक मिलेगा! यही कारण है कि सोशल मीडिया पर लिखने की कला का बाजार सजने लगा है। सुना है यूपी के निकाय चुनाव के चुनावी दावेदार सोशल मीडिया को प्रचार का सबसे बड़ा-आसान और सस्ता माध्यम बनाने जा रहे हैं।

जुमलेबाजी की जादूगरी से सच को झूठ और झूठ को सच साबित करने का हुनर रखने वाले कलमकारों की मांग बढ़ गयी है। प्रत्याशियों को प्रचारित करते हुए कलमकारों का हुनर मुफ्त के प्लेटफार्म सोशल मीडिया पर मुखरित होगा। पत्रकार खबर इन्टरव्यू/फर्जी सर्वै/फीचर का हुनर दिखायेगा। कवि-शायर तुकबंदी के जादू से पैसा कमा सकेगा। लेकिन पत्रकारों के लिए सोशल मीडिया पर कैम्पेन मृत्यु शय्या पर पड़े इनके रोजगार की संजीवनी साबित होगा।

देशभर के ज्यादातर अखबारों के बंद हो जाने के पूरे आसार है। बेरोजगारी के खतरों के बीच पत्रकार सोशल मीडिया पर पेड न्यूज में अपनी रोजी-रोटी तलाशने लगा है। इन्टरनेट का जदीद दौर पुराने दौर में भी लिए जा रहा है जहां कलमकार का दर्जा किसी अखबार के मालिक से ऊंचा होता था। लेकिन आज लाइजनिंग, सियासत और मीडिया संचालकों के मोहताज होते जा रहे थे कलमकार। वक्त ने करवट ले ली है। इन्टरनेट (सोशल मीडिया /वेबसाइट) के जरिए कलमकार अब किसी बिचौलिए का मोहताज नहीं रहेगा। जिसमें लिखने की कला है वो बेरोजगारी की इस आंधी में भी भूखा नहीं रहेगा। एक हाथ से लिखेगा और दूसरे हाथ से पैसा लेगा।

-नवेद शिकोह
पत्रकार, लखनऊ
9918223245

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क्या ‘न्यूज़ वेब पोर्टल’ विश्वसनीयता हासिल नहीं कर पा रहे हैं?

Abhishek Ranjan Singh :  न्यूज़ चैनल ‘लाइव प्रसारण’ की क्षमता से ज़िंदा हैं। बाकी मौजूदा ‘न्यूज़ वेब पोर्टल’ भ्रामक, अधूरी और एकपक्षीय ख़बरों की वजह से देश की जनता के बीच अपनी पकड़ नहीं बना पा रहे हैं। इसकी वजह विश्वसनीयता हासिल न कर पाना है। न्यूज़ चैनलों और डिजीटल मीडिया की मेहरबानी से भारत में अख़बारों और पत्रिकाओं का भविष्य पहले अधिक उज्जवल हो गया है।

एक महत्वपूर्ण बात और.. बड़े-बड़े अख़बारों के वेबसाइट्स हिट्स बढ़ाने के लिए अनाप-शनाप ख़बरें लगाते हैं। यहां अख़बारों की तरह स्वतंत्र लेखन का कोई अवसर नहीं है। वैसे अख़बारों में भी हालत कौन सी अच्छी है? हिंदी में एक आलेख का भाव आज भी 1000-1500 से अधिक नहीं है। वह भी दो-तीन महीने या उससे भी अधिक समय बाद मिलते हैं। जब ज़्यादा अख़बार, न्यूज़ चैनल और ‘मोथा घास’ की तरह उग आए ‘डिजीटल मीडिया’ नहीं था. उस वक़्त कई लेखक-पत्रकार स्वतंत्र लेखन कर अपनी जीविका चला लेते थे। मौजूदा समय में ऐसा करना संभव नहीं रह गया है।

आईआईएमसी के छात्र रहे युवा पत्रकार अभिषेक रंजन सिंह की एफबी वॉल से.

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वेबसाइट और एप्प की तकनीकी दुनिया : बहुत कठिन है डगर पनघट की…

आजकल इन्टरनेट का ज़माना है. जिसे देखो वो वेबसाइट खोल रहा है. एप्प लांच कर रहा है. बड़ी और कारपोरेट कंपनियों की बात अलग रखिए जिनके पास खूब पैसा है और वो मार्केट के ब्रेस्ट ब्रेन और बेस्ट टेक कंपनी को अपने पोर्टल व एप्प के लिए हायर करते हैं. मैं बात कर रहा हूं उन साथियों की जो कम पूंजी में वेबसाइट, एप्प आदि लांच तो कर देते हैं लेकिन उनके टेक्निकल सपोर्टर ऐसे नहीं होते जो एक लेवल के बाद वेंचर को नई उंचाई पर ले जा सकें. वेबसाइट बना देना, चला देना बिलकुल अलग बात है. इसे मेनटेन रखना, इसे हैक से बचाना, इसे ज्यादा ट्रैफिक के दौरान संयत रखना, इसे लगातार सर्च इंजन फ्रेंडली बनाए रखना, इसे मजबूत सर्वर से जोड़े रखना दूसरी बात होती है.

इन्टरनेट की सबसे बड़ी खूबी ये है कि कोई भी फेसबुकिया अपने आप को इन्टरनेट का एक्सपर्ट मानता है. ठीक वैसे ही जैसे कि इंडिया का मैच होने पर वे खुद सबसे बड़े क्रिकेट एक्सपर्ट बन जाते हैं. आज मैं इस मुद्दे पर प्रकाश डालना चाहता हूँ कि कैसे आजकल लोग ऑनलाइन और इन्टरनेट के नाम पर ठग लिए जाते हैं. हरेक सर्विस की तरह इन्टरनेट की सर्विस के भी दो पहलू हैं. एक है सर्विस देने वाला और दूसरा सर्विस लेने वाला. दोनों मिलकर कैसी खीचम-खांच मचाते हैं और अपने आप को सर्वज्ञानी मानते हुए खुद बेवकूफ बन जाते हैं वो बता रहा हूँ.  अपन इसी धंधे में हैं तो थोडा बहुत जानते हैं. इसलिए पढ़ते चले जाइये, मज़ा आएगा.

सेवा प्रदाता द्वारा बेवकूफ बनाना

कोई भी बिज़नस अच्छे से करने के लिए आपको कुशलता और बुद्धि की आवश्यकता होती है. आजकल इन्टरनेट और ऑनलाइन सर्विस देने वाले एक-दो लडकों को भर्ती करके धंधा शुरू कर देते हैं. ठीक भी है, इस धंधे में कोई दुकान नहीं चाहिए, कोई कच्चा माल नहीं चाहिए. बस अपना कंप्यूटर लेकर बैठ जाइये. दुकान चालू. पर ये इतना आसान नहीं. इन्टरनेट के व्यवसाय में तमाम तरह की समस्याओं को रोजाना सुलझाना होता है. आप लम्बी रेस के घोड़े तभी बनेंगे जब आपके पास थोडा ज्ञान भी हो.

ग्राहकों को लूटना

ज्ञान न होने पर भी आप ग्राहक को भारी भरकम बिल तो थमा ही सकते है. एक उदाहरण से समझाता हूँ कि कैसे. चाय बेचने वाला दो तरह का होता है. एक स्टेशन पर चाय बेचने वाला और दूसरा आपके पड़ोस में चाय बेचने वाला. स्टेशन वाला आपको रेगुलर कस्टमर नहीं मानता. आपने उससे आज चाय ली है तो ज़रूरी नहीं कल भी लें. पर पड़ोस वाला आपको एक ग्राहक के रूप में अधिक सम्मान देता है. वो इसलिए कि कल को आप फिर से उसके पास आयेंगे. वो आपको बेवकूफ नहीं बनाएगा. यही सब हमारी इंडस्ट्री में भी है. अधिकतर वेबसाइट डेवलपर स्टेशन के चाय वाले हैं. पैसा लूटा और फिर राम राम. उनको आपसे दोबारा पैसा लेने की जरूरत नहीं क्योंकि उनका काम है रोज नए शिकार फंसाना. विडम्बना ये की आप ऐसे सेवा प्रदाता को तभी पहचानते हैं जब वो आपको चूना लगा चुका होता है.

अनुभवी स्टाफ की कमी

इन्टरनेट के व्यवसाय में तमाम तरह के अनुभव की आवश्यकता होती है. ग्राहक की ज़रूरत को टेक्नोलॉजी में ढालना आसान नहीं है. हाथी बनाते-बनाते भैंस बन जाती है, अगर अनुभव न हो. सर्वर को संभालना आसान नहीं. हज़ारों अलग-अलग किस्म की समस्याएं आती हैं, जिनका समाधान अनुभव से ही आता है. अधिकतर वेबसाइट सर्विस प्रदाता अनुभवी स्टाफ के बिना ही धकापेल ग्राहकों की सेवा में जुटे हुए हैं. राम बचाएं इनसे.

ग्राहकों द्वारा खुद का बेवकूफ बनाना

सेवा देने वाले ही गलत काम करते हैं, ऐसा भी नहीं. सेवा लेने वाले भी खुद का बेवकूफ बनाते रहते हैं. कैसे ये देखिये: अपने आप को सर्वज्ञानी मानना… जब सेवा देने वाला सर्वज्ञानी नहीं तो आप एक ग्राहक होते हुए सर्वज्ञानी नहीं हो सकते, अगर आप खुद इस टेक्नोलॉजी पर काम न कर चुके हों. पर मित्रों यही तो समस्या है. हमारे यहाँ हम अलिफ़ बे पे ते सीखकर अपने आपको अरबी घोडा समझने लगते हैं. मेरे अनुभव से लगभग 30 प्रतिशत ग्राहक इस बीमारी से ग्रसित हैं. वो ये नहीं जानते कि अगर आप सेवा प्रदाता पर भरोसा करके उसका काम उसको शांति से करने दें, और अपनी विद्वता की बत्ती बनाकर अपने पास रखे रहें, तो आप कहीं बेहतर सेवा पा सकते हैं बशर्ते सेवा देने वाला इस फील्ड का हो व थोड़ा बहुत ज्ञान रखता हो.

ज़रूरत से ज्यादा मोलभाव करना

आजकल एक नया चलन चल गया है. एक ग्राहक वेबसाइट या मोबाइल एप्प बनाने के लिए २० कम्पनीज से कोटेशन मांगेगा. रद्दी कंपनी ५ रुपये, ठीक ठाक कंपनी २० रुपये और धांसू लगने वाली कंपनी ५० रुपये का कोटेशन देगी. अब भाई साहब ५० वाली कंपनी के पास जायेंगे और बोलेंगे कि हमारे पास सारे कोटेशन २ रुपये से ४ रुपये के बीच में है. आप इत्ता पैसे काहे मांग रहे हो? अब बेचारा ५० रुपये वाला रो पीटकर ३०-३५ तक आता है, पर अंत में ग्राहक ५ वाले से १ रुपये में काम करवाता है और बेवकूफश्री बनता है, क्योंकि १ रुपये में वो काम हो ही नहीं सकता था.

कम पैसे में और ज्यादा, और ज्यादा की चाहत

जब वेबसाइट या एप्प का प्रोजेक्ट शुरू होता है तो सेवा लेने वाला और देना वाला दोनो मिलकर जो भी काम होता है उसकी डिटेलिंग करते हैं. पर कुछ अति उत्साही और अत्यंत स्मार्ट ग्राहक तय किये हुए काम से १० गुना काम चाहते हैं. आपको कुछ न कुछ नया बताते रहेंगे, बिना ये सोचे कि पैसा उस काम का लिया गया है जो पहले फाइनल हुआ था. सो काम करते करते बेचारा डेवलपर फ्रस्टिया जाता है और ग्राहक श्री फिर भी संतुष्ट नहीं हो पाते.

सम्मान नहीं देना

मेरे कुछ ग्राहक हैं जो बहुत ऊंची पढाई करके आये हैं, बड़े बिजनेसमैन भी हैं. लन्दन में होते हैं तो सड़क पर थूकते भी नहीं, पर यहाँ केले का छिलका फेंकने के लिए उनको सड़क ही सबसे मुफीद जगह नज़र आती है. उसी तरह से, वहां एक बढई को ४ घंटे के १०० यूरो दे देंगे, पर भारतीय इंजीनियर को ८ घंटे के हजार रुपये भी देने को तैयार नहीं. ऊपर से उनको जी साहब जी साहब करके न चाटो तो बहुत दुखी होंगे. ऐसे लोगों को ये नहीं पता कि भारतीय टैलेंट का थोड़ा सम्मान करेंगे तो बंदा उन्हें क्या क्या काम करके नहीं दे सकता.

…जारी…

लेखक दिवाकर सिंह नोएडा की कंपनी Qtriangle Infotech Pvt Ltd के मैनेजिंग डायरेक्टर हैं. वेबसाइट डेवलपमेंट, मोबाइल एप्लीकेशन डेवलपमेंट और ई-कॉमर्स पोर्टल डेवलपमेंट का काम करते कराते हैं. साथ ही साथ भड़ास4मीडिया डाट काम के तकनीकी सलाहकार भी हैं. अगर आपको इनसे कुछ जानना-समझना, पूछना-जांचना या सलाह लेना-देना हो तो इनसे संपर्क dsingh@qtriangle.in के जरिए किया जा सकता है.

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आज तक की वेब टीम ने क्रिकेटर मोहम्मद शमी को करा दिया गिरफ्तार, विरोध में सोशल मीडिया पर चला अभियान

Mohammad Anas : ये देखिए आज तक की वेब टीम का कमाल। आज तक की वेब टीम में काम कर रही मोनिका शर्मा, ने अमरोहा की एक ख़बर लगाई है जिसमें उसने मोहम्मद शमी की फ़ोटो लगाते हुए लिखा है कि पशु तस्करी में भारतीय क्रिकेटर शमी पकड़े गए। लेकिन जब आप लिंक पर चटका लगा कर ख़बर पढ़ेंगे तो पता चलेगा कि शमी नहीं बल्कि उनका भाई पकड़ा गया है। वैसे भी वेब वाले हिट्स पाने के लिए साथ काम कर रही महिलाओं का ही फ़ोटो और वीडियो डालते रहे हैं लेकिन यह पहली बार हुआ है कि मोनिका शर्मा ख़ुद ही इस नीच हरकत में कूद पड़ीं। मोनिका शर्मा कौन है यह मुझे नहीं पता। आज तक की वेब टीम की नीचता को मुँह तोड़ जवाब देने के लिए ज़्यादा से ज़्यादा संख्या में इसे शेयर करें।

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थोड़ी देर पहले मेरी मोहम्मद शमी के घरवालों से बात हुई। उनका कहना है कि गोकशी के एक साल पुराने मामले में गाँव के एक व्यक्ति को पुलिस ले जा रही थी। कुछ मिसअंडर्सटैंडिग की वजह से शमी के भाई और पुलिस से तकरार हो गई इस वजह से उनको थाने पर बैठा लिया गया। मैंने उन्हें आजतक वेब पोर्टल पर आई मोहम्मद शमी से जुड़ी ख़बर के बारे में बताया तो उन्होंने कहा हम आजतक के वेब हेड कमलेश सिंह, मोनिका शर्मा आदि के नाम मानहानि के तहत मामला दर्ज करवाएँगे। मीडिया का एक वर्ग ख़ासकर वेब माध्यम जिस तरह से ख़बर लिखता और उसे प्रचारित करता है वह निंदनीय है। ग़ैरज़िम्मेदारी और जानबूझकर भारतीय क्रिकेटर मोहम्मद शमी को लेकर आजतक वेब डेस्क ने जो ख़बर लगाई वह घोर आपत्तिजनक है।

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आजतक की वेब डेस्क टीम ने भारतीय क्रिकेटर मोहम्मद शमी को लेकर अफ़वाह उड़ाई की उनको पुलिस ने पशु तस्कर की मदद के आरोप में गिरफ़्तार कर लिया है। मुझे एक साथी ने ख़बर की लिंक भेजी तो देखा उस ख़बर पर सैकड़ों की तादाद में आम जनता ने विरोध दर्ज कराते हुए ख़बर हटाने का आवेदन कर रखा था। लेकिन दो घंटे से वेब टीम हिट्स के चक्कर में भारतीय टीम के शानदार गेंदबाज़ के चरित्र और कैरियर से खेल रही थी। मुद्दा मेरा नहीं था। आम लोगों का था। पत्रकारिता के नाम पर गुंडई और फूहड़ता, दंगाई भाषा और झूठी रिपोर्टिंग का था। मैंने अफ़वाह फैलाने वालों को छिछोरा कहा और ये भी लिखा की किसी दिन हिट्स के लालच में कहीं ख़ुद की न्यूड तस्वीर न वॉयरल कर दें। और ऐसा हुआ भी है। पंजाब केसरी ने तहलका की मशहूर पत्रकार और माखनलाल में मेरी सीनियर रही प्रियंका दुबे की फ़ोटो उनके वॉल से उठाकर लिखा था, पत्नी पीट रही पति को, आगे देखिए।’ मेरा पोस्ट लिखना भर था कि वेब डेस्क तुरंत हरकत में आया और ख़बर को हटा कर फिर से लगाया। ऐसे गंदी हरकत करने वाले लोगों के साथ कुछ लोग खड़े हैं। वे इसलिए खड़े हैं क्योंकि उन्हें मुझसे व्यक्तिगत खुन्नस है। वे नहीं चाहते की मैं या कोई और उन्हें सही रास्ता दिखाए। बहुत से लोगों का ईगो हर्ट हुआ है। बहुतों को लगता है मैंने उन पर हमला कर दिया है। जबकि यह साफ़ और सीधा टीआरपी और कॉरपोरेट गुंडों के बीच फँस चुकी मीडिया को बचाने का मुद्दा है। जनपक्षधरिता रहित पत्रकारिता किसे कहते हैं। महिला विरोधी, महिलाओं को सेक्स ऑब्जेक्ट कैसे बनाया जाता है वह सब देखना हो तो आज तक की वेब टीम से संपर्क साधा जा सकता है। मेरे लिए आज तक वाले हैशटैग चला रहे हैं ‘मुँह में ले लो।’ जी सर, दे दीजिए। जो दे रहे हैं।

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कुछ साथी मोहम्मद शमी की फ़र्ज़ी गिरफ़्तारी वाली अफ़वाह आजतक वेबसाइट के माध्यम से उड़ाने वाली वेब टीम के साथ खड़े हैं। उनका कहना है कि मैंने अफ़वाह उड़ाने वाली मोनिका शर्मा को ‘छिछोरी’ कहा। यदि इस भाषा से किसी को आपत्ति है तो होती रहे। दूसरी, कुछ लोग आरोप लगा रहे हैं कि मैंने मोनिका शर्मा की न्यूड फ़ोटो वॉयरल करने की धमकी दी। जबकि मैंने लिखा था जिस तरह से मोनिका शर्मा और वेब के ग़ैर ज़िम्मेदार पत्रकार ख़बर लिख कर हिट्स की लालच करते हैं वैसे में किसी रोज़ ख़ुद की न्यूड फ़ोटो लगा कर कहीं कोई ख़बर न वॉयरल कर दें ख़ुद से। शमी को लेकर लिखी गई अफ़वाह यदि ग़लती होती तो तुरंत हटा दी जाती लेकिन ऐसा नहीं हुआ। मैंने पोस्ट लिखी उसके दस मिनट बाद ख़बर बदली गई। जबकि आजतक के फ़ेसबुक पेज पर लोग फ़र्ज़ी ख़बर को लेकर विरोध जता रहे थे पर उनका लोड नहीं लिया गया। जो लोग मेरी भाषा को लेकर पोस्ट से नाइत्तेफाकी ज़ाहिर कर रहे हैं वे इस बात का ख़्याल रखे की ऐसा करने से वे वेब के ग़ैरज़िम्मेदार और मीडिया के कारपोरेट गुंडों को शह दे रहे हैं। मुझे बेहद अफ़सोस है कि कुछ बेहद प्रिय साथी आजतक की ग़लती पर माफ़ीनामा लेने के बजाए मेरी भाषा की कथित ग़लती पर पूरे मुद्दे को दबा देना चाहते हैं। लेकिन ऐसा होगा नहीं क्योंकि भाषा का स्तर यदि मेरा गिरा हुआ था तो मुझे लेकर लिखी जा रही हर किसी की पोस्ट में भाषागत गुंडई और हरामीपना दिख रहा है। चूँकि यह लड़ाई मेरी अकेली की नहीं है। न तो मैं इसे अपनी व्यक्तिगत लड़ाई बनने दूँगा इसलिए जिन दोस्तों में मुझे लेकर पोस्ट लिखा है या लिखेंगे उन्हें जवाब भर नहीं दूँगा। मैं चाहता हूँ की आपमें से कोई भी मुझे लेकर कहीं गाली गलौज करे तो मेरे पक्ष में कुछ न लिखें क्योंकि मैं लोड नहीं लेता। बाकि तो लड़ाई जारी रहेगी। उन दोस्तों से भी जो आजतक के वेब डेस्क को बचा रहे हैं। क्योंकि मैं अकेला बहुत हूँ सैकड़ों के लिए।

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आजतक वेब डेस्क द्वारा मोहम्मद शमी को लेकर फैलाई गई अफ़वाह पर मेरे द्वारा लिखीं गई अधिकतर पोस्ट को हमारे समय के सबसे बड़े मीडिया आलोचक, चिंतक, इंडिया टुडे मैगज़ीन के पूर्व संपादक, दिलीप मंडल ने लाइक किया है। इस मुद्दे पर उनकी सहमति है मेरे साथ तो आजतक वेब टीम वालों और उनके समर्थकों से बस इतना कहना है कि आप लोग रांग साइड ड्राइविंग कर रहे हैं। एक बैलेंसवादी ब्राह्मण ने लिखा है कि वो लड़की बेचारी जूनियर है। ग़रीब है। शिफ़्ट के घंटों से परेशान थी। मतलब आप मीडिया के एक बड़े प्लेटफ़ॉर्म पर हैं या फिर घर के किचेन में। जहाँ दाल में नमक ही तो ज़्यादा हुई है टाइप के कुतर्क रख रहे हैं। दिलीप मंडल की मेरी इस पोस्ट पर उपस्थिति यह बताती है कि मीडिया में बैठे ब्राह्मणवादी और बाहर से उनको सपोर्ट कर रहे घोर जातिवादी ब्राह्मणों ने किस क़दर उत्पात मचा रखा है। आजतक वेब टीम में अस्सी फ़ीसदी ब्राह्मण कार्यरत हैं। मज़े की बात ये कि मुझे लेकर लिखे गए पाँच छह पोस्ट भी ब्राह्मणों ने लिखे। कुछ भोले और मासूम लोग फ़ोन करके कह रहे हैं कि वे लोग बच्चे हैं, उनकी कोई पॉलिटिक्ल ऑइडियोलॉजी नहीं है। मुझे ऐसा बिल्कुल नहीं लगता। मेरे ख़िलाफ़ जिस बेहुदगी से कुछ बैलेंसवादी ब्राह्मणों ने स्टैंड लिया वह बहुत कुछ साफ़ कर देता है। इस मामले में कुछ ब्राह्मण दोस्तों ने साथ भी दिया। उनका शुक्रगुज़ार हूँ कि उन्होंने शोषित, पीड़ित और दमित का पक्ष समझा और साथ खड़े हुए। गंभीर सवाल यहाँ उभरता है कि मीडिया हमेशा अल्पसंख्यक,दलित और स्त्रियों को लेकर ही ग़लती क्यों करता है किसी ब्राह्मण को लेकर उससे हेडिंग में भूलचूक क्यों नहीं होती? मोहम्मद शमी की गिरफ़्तारी की फ़र्ज़ी अफ़वाह फ़ेसबुक ने वॉयरल करने के लिए अपने फ़ेसबुक पेज पर पोस्ट किया था। जो कि पूरे दो घंटे तक वहाँ रही। सैकड़ों लोगों ने हटाने को निवेदन किया लेकिन नहीं हटाया गया। यह सब जानबूझ कर किया जा रहा था और डेस्क को इसकी पूरी जानकारी थी। ग़लती होती तो एक बार पीछे हट भी जाता मैं लेकिन जानबूझ कर बदनाम करने वालों को कैसी छूट?

सोशल और मीडिया एक्टिविस्ट मोहम्मद अनस के फेसबुक वॉल से.

Ankur Tiwary : आजतक की एक गलत स्टोरी पर Mohammad Anas जी ने एक पोस्ट लिखकर माफ़ी नामा छापने की बात कही। पोस्ट में चूंकि यह हैडलाइन दी गयी थी कि क्रिकेटर मोहम्मद शमी गिरफ्तार लेकिन वास्तविकता यह है कि मोहम्मद शमी नहीं उसका भाई गिरफ्तार हुआ है। आज तक के इस पोस्ट का स्क्रीन शॉट अनस जी ने फेसबुक पर अपलोड किया तो तमाम आज तक के कर्मचारी शिफ्ट, ज्यादा घंटे केकाम की वजह से होने वाली गलती को कारण बता उल्टा मोहम्मद अनस जी पर ही निशाना साधने लगे हैं। वो भी इतनी खूबसूरत भाषा शैली के साथ कि उसे पढ़ा नहीं जा सकता है। आजतक के तमाम कर्मचारियों को समझना चाहिए कि गलती किससे नहीं होती है। सभी से होती है लेकिन उसपर माफ़ी मांग लेनी चाहिए, एक माफ़ी मांगने से आपकी क्रेडिबिल्टी पूरी तरह से समाप्त तो होगी नहीं जनाब। चलिए मान लिया कि मोनिका जूनियर साथी होगी या काम के ज्यादा दबाव के चलते गलती हो गयी होगी। लेकिन आप दूसरा पक्ष भी तो सोचिये आज तक के साथियों।

यह सोचिए कि आपके फेसबुक पर एक करोड़ से ज्यादा लाइक्स हैं, ट्विटर पर भी लाखों हैं। टीआरपी में नम्बर एक पायदान पर हैं ही और दर्शक भी दस करोड़ हैं। इतनी बड़ी संख्या में आपकी पोस्ट पहुँचती है तो हो सकता है कि मोहम्मद शमी के घरवालों तक या उनके चाहने वालों तक भी पहुंची ही होगी। क्या कभी सोचा है कि एक दम से यह पोस्ट देखकर क्या बीती होगी उनपर? आपने तो एक गलती कर दी लेकिन उसकी वजह से दूसरे को दिक्कत हुई उसका क्या? उसकी भरपाई कौन करेगा साहेब? इसलिए कह रहा हूँ फेसबुक पर मोहम्मद अनस जी के खिलाफ पोस्ट लिखने में समय न खर्च कीजिये, सभी जानते हैं कि गलती होती है ठीक है लेकिन माफ़ी भी तो मांगिये न। मैंने तो आपके कई कार्यक्रमों में यह उपदेश देते हुए सुना है कि माफ़ी मांगने में कोई दिक्कत और देरी नहीं की जानी चाहिए। किसी एक व्यक्ति से लड़ाई करने के बजाये खुद सोचिये कि मोहम्मद शमी के बजाये आपके बड़े भाई, पिता, बहन आदि में किसी का नाम होता तो क्या करते? आपका लाख विरोध अनस जी के साथ हो सकता है लेकिन सवाल तो जायज है न? उम्मीद है कि जिम्मेदार चैनल होने के नाते माफ़ी मानेंगे।

युवा पत्रकार अंकुर तिवारी के फेसबुक वॉल से

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वो चार कारण जिसके चलते हिंदी वेब मीडिया अपनी चमक खो रहा है…

हिंदी न्यूज वेब मीडिया का बिजनेस जिस एनर्जी के साथ आगे बढ़ रहा था, वह फिलहाल मुझे कम होता दिख रहा है। इस इंडस्ट्री में मेरी शुरुआत 2012 के जनवरी में हुई थी और 2015 के मार्च में मैंने इंडस्ट्री छोड़ दी। इन तीन सालों में कभी ऐसा नहीं लगा कि हिंदी न्यूज वेब का बिजनेस मंदा होगा। ऐसा लग रहा था कि इसमें ही पत्रकारिता और पत्रकारों का भविष्य है। लेकिन 2015 के आखिरी महीनों में मामला उल्टा नजर आ रहा है। मैंने यह जानने की कोशिश की आखिर क्यों मुझे लग रहा है कि हिंदी वेब मीडिया अपनी चमक खो रहा है। कुछ वजह नजर आए –

1. इंटरनेट डेटा महंगा होने की वजह से लोग हिंदी न्यूज वेबसाइट पर जा ही नहीं रहे हैं। फेसबुक पर ही लोग समाचार, विचार, इंटरेक्शन और एंगेजमेंट पा ले रहे हैं। हिंदी न्यूज साइट्स पर टेक्स्ट और वीडियो ऐड की वजह से उनका काफी डेटा खर्च होता है। इससे कम पैसे में वो न्यूज चैनल या अखबार से समाचार पा सकते हैं। और फिर सोशल मीडिया तो है ही।

2. पिछले चार सालों से हिंदी न्यूज वाले एक लकीर के फकीर बने हुए हैं। घटिया कंटेंट का बढ़िया हेडलाइन लगाकर यूजर्स का बेवकूफ बनाने का धंधा आखिर कब तक चलेगा। पिछले चार पांच सालों में वे विश्वसनीयता बना नहीं पाए। वे यूजर्स को कुछ नया नहीं दे पा रहे हैं, उनको बोर करते हैं। मुझसे कोई कह रहा था कि सेक्स आधारित कंटेंट में भी लोगों की दिलचस्पी कम हुई है।

3. हिंदी न्यूज के कई सारे वेबसाइट्स आ चुके हैं जिनपर एक ही तरह के कंटेंट देखे जा सकते हैं। आखिर यूजर्स क्या क्या और किसको किसको कंज्यूम करेंगे। इससे बेहतर है कि सबकी हेडलाइन सोशल मीडिया पर देखते रहो।

3. मोबाइल पर लोगों के पास अब पचास तरह के काम हैं। बिल पेमेंट से लेकर जिंदगी के कई काम अब मोबाइल से होने लगे हैं। मतलब यूजर्स के पास अब समय का भी अभाव है।

4. हिंदी न्यूज वेबसाइट्स चलाने वालों को यह गलतफहमी है कि वह चार लोगों को बिठाकर, चोरी चकारी से न्यूज अपेडट करवाकर बैठे ठाले लाखों कमाने लगेंगे। उनको इंवेस्ट करना पड़ेगा नहीं तो जो बचा खुचा है वह भी डूब जाएगा।

इंटरनेट का मिजाज ही पल में तोला पल में माशा वाला है। यहां आज जो बादशाह है, कब उसका नामोनिशान मिट जाएगा, यह कोई नहीं बता सकता। जो यूजर्स को खुश करने के नए नए तरीके निकालेगा, वही टिका रहेगा। वरना कितने आए और कितने चले गए। ऑरकुट, रेडिफ याहू चैट अब बीते जमाने की चीज है। गूगल जी प्लस को इस्टेबलिश नहीं कर पाया। फेसबुक के जुकरबर्ग को भी डर लगा रहता है कि न जाने कब उनका भट्ठा बैठ जाएगा। ऐसे वोलेटाइल मीडियम में हिंदी वेब मीडिया आगे क्या कर पाएगी, इसमें मेरी खासी दिलचस्पी है।

मुझे अहसास हो रहा है कि मंदी की वजह से हिंदी वेब मीडिया इंडस्ट्री में फिलहाल टेंशन भरा माहौल है। अगर यह बिजनेस और मंदा हुआ तो इसका सीधा असर वेब पत्रकारों पर पड़ेगा। नए जॉब क्रिएट नहीं होंगे। नए पत्रकारों की एंट्री मुश्किल हो जाएगी। पुराने पत्रकारों की सैलरी नहीं बढ़ेगी, प्रमोशन नहीं होगा। वह जॉब चेंज नहीं कर पाएंगे। खुदा करे ऐसा कुछ न हो और ये सब महज मेरी कल्पना हो, वहम हो।

यह मेरा अपना आकलन है, हो सकता है आपकी राय कुछ और हो।

लेखक राजीव सिंह युवा पत्रकार हैं. इनसे संपर्क newrajeevsingh@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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नोएडा से संचालित हो रहे न्यूजलोक पोर्टल ने युवा पत्रकार मनोज जोशी के साथ ठीक नहीं किया… पढ़ें पूरी दास्तान

Sir, My name is Manoj Joshi, I spoke to you yesterday about how my boss sacked me within five days of hiring. I’ve shared my problem in the letter enclosed with this mail.  Suggest me how can I be paid my dues.

Though, I am going to police for help, I seek your advise, to resolve this matter ASAP. Also suggest if there is anything I can do more about it, so that people like Sitesh Kashyap, sitting everywhere in the media can be deterred.

Pls find inside.

Thank You

Manoj Joshi

manoj.joshi.89@gmail.com


Sir, my name is Manoj Joshi. Five days ago, I started working for a news portal called Newslok, in Noida. The man who hired me, is Sitesh Kashyap. The office of Newslok is based in Noida, Sector 7, D-16. I have a friend who told me about Newslok, his name is Aditya. He and I went there together for the interview 10-12 days ago and both of us got selected. Since Aditya is more experienced than I am, he was offered with a monthly salary of Rs. 51,000. On the other hand, I was hired for a monthly salary of Rs. 18,000. As my friend had not resigned from his previous company and he needed some time to put down his papers, Sitesh Kashyap allowed him to join after being relieved. While for me, he said that I join by 29 December. Now what is important to understand here is that the day we went to him for the interview, there was a girl, we saw working in a cubical.

Interestingly, from the day of my joining to till the day I worked last I never saw her again in Newslok. I suppose she was also fired just like I am today. Here I would like to draw that Sitesh Kashyap choose to fire me on a day when another candidate joined him. As far as reason for firing is concerned, he said that he doesn’t see the “Desire” in me for work.  Here I want to clarify that what he calls “Desire” is nothing but a vague accusation used against me for going on a break. Now as far as I know, all the companies where I have worked by far, give their employees some time in between the work hours to loosen up or to get fresh. Which is also because no man can work for 10 hours continuously.

However, I replied to him if you don’t want me, just pay me my dues and I will leave. He said, he will pay me wages for three and a half days. This was something, I did not agreed upon; because I worked for him for five days, for which he should have paid Rs. 3000, but he offered me Rs. 2100. It wasn’t acceptable to me so to be at par I asked him Rs. 2500. He refused that too and so we argued. He threw me out of the office and try to manhandle me in public with the help of the security guard and his peon or assistant. Fortunately, I was saved by some people in the public.

At last, I went to the close by police chowki but as the cops were away for another case, I was told to come again in the next morning. One more fact, I would like to bring to your attention is after all this happened, I spoke to a friend of mine. His name is Anish. Presently, Anish is working with UNI, but a year ago, he faced the same problem with this man. At that time, he was working with Newslok in its Ashok Nagar office. And he faced the same trouble with this man in getting his pay. I suspect, the man is doing it from a long time that he hires a candidate for a week and then sack them without paying their dues. In the end, I am sharing contact details of those I have used in this letter, including myself. You may use them to get the get confirmation, if like.

युवा पत्रकार मनोज जोशी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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लुटेरी मोबाइल कंपनियों को सबक सिखाएं, 31 अक्टूबर को मोबाइल पर इंटरनेट का इस्तेमाल न करें

सोशल मीडिया पर इन दिनों के शानदार काम किया जा रहा है. एक कंपेन चलाया जा रहा है मोबाइल कंपनियों की मनमानी के खिलाफ. डाटा पैक यानि मोबाइल इंटरनेट पैक के रेट बढ़ाने के खिलाफ 31 अक्टूबर के दिन मोबाइल पर इंटरनेट न यूज करने का आह्वान किया जा रहा है. कहा जा रहा है कि अगर हम सब एक दिन भी मोबाइल पर इंटरनेट का इस्तेमाल करना बंद कर देते हैं तो मोबाइल कंपनियों दो अरब रुपये से ज्यादा का नुकसान होगा.

इससे संभव है कंपनियां रेट घटाने को मजबूर हो जाएं. अगर वे रेट न घटाती हैं तो आगे फिर किसी एक दिन मोबाइल पर इंटरनेट यूज न करने का आह्वान किया जा सकता है. यह कारपोरेट लूट के खिलाफ आम जन की गांधीगिरी है. इसमें आप सभी हिस्सा लें और अपने परिचितों को शरीक होने को प्रेरित करें. करना बस यही है कि 31 अक्टूबर के दिन मोबाइल पर इंटरनेट का इस्तेमाल किसी हालत में न करें.

मोबाइल कंपनियों ने नेट पैक के दर में 33 से 100 फीसदी तक की वृद्धि कुछ ही माह में कर दी है. कुछ ने सीधे रेट बढ़ाया है तो कुछ ने प्लान की समयसीमा घटाई है. इसी से खफा कई मोबाइल यूजर्स ने इन लुटेरी कंपनियों का विरोध नए तरीके से करने का प्लान किया. इसके तहत तय किया गया कि 31 अक्टूबर के दिन मोबाइल पर इंटरनेट यूज न करने का अभियान चलाया जाएगा. इस बात को, इस मुहिम को, इस अभियान को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाने के लिए फेसबुक, वॉट्सएप, ट्विटर, वेब, ब्लाग आदि  का इस्तेमाल किया जा रहा है.

ज्ञात हो कि मोबाइल इंटरनेट की दर में 33 से लेकर 100 फीसदी तक वृद्धि को लेकर मोबाइल कंपनियां अधिकृत रूप से कुछ भी कहने से बच रही हैं. मोबाइल पर इंटरनेट यूज करने वालों का कहना है कि पहले 98 रुपए के रिचार्ज पर कंपनी 30 दिनों के लिए 1 जीबी इंटरनेट सुविधा देती थी. कंपनी ने धीरे से इसकी वैधता 28 दिन कर दी और अब इसी 1जीबी नेट पैक को 30 दिन इस्तेमाल करने के लिए उन्हें 198 रुपए का भुगतान करना पड़ रहा है. ऐसी लूट के खिलाफ बोलना जरूरी है. मोबाइल पर इंटरनेट यूज करने वालों की संख्या 20 करोड़ के लगभग है. हर व्यक्ति प्रतिदिन अगर 10 रुपया का भी इंटरनेट यूज करता है तो यह रकम दो अरब रुपए हो जाती है. एक दिन हम मोबाइल पर नेट यूज नहीं करेंगे तो इन कंपनियों को दो अरब रुपये का नुकसान होगा, जिससे इनको सोचना पड़ सकता है.

गाजीपुर से सुजीत कुमार सिंह ‘प्रिंस’ की रिपोर्ट. प्रिंस आजाद पत्रकार हैं. पूर्वी यूपी के खोजी पत्रकार के बतौर जन सरोकार से जुड़े कई मसलों को वह कैमरा, कलम और न्यू मीडिया के जरिए सामने ला चुके हैं. एनएचआरएम घोटाले की जांच के दौरान इसी कड़ी में उनके द्वारा उजागर किए गए एक नए प्रदेशव्यापी घोटाले को सीबीआई ने अपने जांच का विषय बनाया. इसी उल्लेखनीय खुलासे के कारण उन्हें भड़ास विशिष्ट सम्मान से भी नवाजा जा चुका है.

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एबीपी न्यूज का घटियापना… एक अच्छे कैंपेन की घटिया हेडिंग….

Abhishek Mehrotra : कब तक हम पत्रकार इस तरह की बिकाऊ हेडिंग लगा लगा कर एक अच्छे कैंपेन को चीप बनाने की कोशिश करते रहेंगे। एक तर्क ये भी है कि चीप हेडिंग की वजह से ये खबर पढ़ी जाएगी, पर आज मुझे याद आ रही है नरेंद्र पाल सिंह NP Sir की वो बात कि ‘मर्डर’ जैसी फिल्में भी लोकप्रिय होती है और ‘तारे जमीं पर’ भी। पर ‘तारें जमीं पर’ कभी-कभी बनती है और ‘मर्डर’ जैसी कई फिल्में बन जाती हैं। इसलिए कम से कम सकारात्मक खबरों को हमें ‘मर्डर’ स्टाइल में नहीं बल्कि ‘तारे जमीं पर’ के स्टाइल में पेश करना चाहिए। साथीगण चाहे तो इस खबर के लिए अच्छी हेडलाइन उपलब्ध करा सकते हैं…

Ram Lakhan Rajput : ये लड़की ब्रेस्‍ट कैंसर को लेकर जागरूकता फैला रही है, एबीपी न्‍यूज से ऐसी उम्‍मीद नहीं की जा सकती… राष्‍ट्रीय स्‍तर के चैनल की वेबसाइट खबरों को गलत तरह से प्रचारित कर रही है.. निवेदन है ऐसी पोस्‍ट न भेजें… मैं बहुत परेशान हूं एबीपी की वाहियात और दस दिन पुरानी खबरों की पोस्‍ट से… मुझे समझ नहीं आता कि आपकी खबरें मेरे पास क्‍यों और आती कैंसे हैं…

अभिषेक मेहरोत्रा और राम लखन राजपूत के फेसबुक वॉल से.

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