अवधेश कुमार जी, खुद के घर जब शीशे के हों तो दूसरों पर पत्थर नहीं मारते

अवधेश कुमार जी आजकल एक दुविधा में पड़े हैं। प्रतिष्ठत अखबार दैनिक जागरण से संबद्ध नई दुनिया को लेकर। उनकी परेशानी यह है कि जागरण में छपे संपादकीय लेख नई दुनिया में भी छापे जा रहे हैं। पर इसमें कोई गलती इसलिए नहीं कही जा सकती है क्योंकि दोनों ग्रुप एक ही हैं। इसलिए आपस में खबरों आलेखों का आदान प्रदान कर सकते हैं। जैसे आजतक न्यूज चैनल अपने रीजनल चैनल दिल्ली आजतक पर कई बार वही स्टोरी चलाता है जो पहले आजतक पर चल चुकी होती हैं।

यह बात कोई अवधेश जी से पूछे कि आप तो ऐसा सालों से करते आ रहे हो। एक लेख को कई अखबारों में छपवा रहे हो। यह बात अवधेश जी आपको नहीं भूलनी चाहिए कि आपकी जितनी भी पहचान है, इन्हीं अखबारों से है। अगर अखबार आपके लेख प्रकाशित न करें तो आप समाज से खत्म हो जाओगे। इसलिए किसी को नसीहत देने से पहले खुद अपने गिरेबां में झांक कर देख लेना चाहिए। अवधेश जी किसी मुददे पर एक लेख लिखते हैं, पहले दैनिक जागरण राष्ट्रीय संस्करण में छपवाते हैं, फिर जनसंदेश टाइम्स, बाद में हरीभूमि, फिर लोकमत, फिर दबंग दुनिया आदि में छपवाने के लिए भेज देते हैं। किसी ने आपसे आजतक यह सवाल नहीं किया है कि रिपीट हुए लेखों का आप पारिश्रमिक क्यों लेते हो। हालांकि कुछ संपादकों को इनकी असलियत पता है, वह इनके लेख नहीं छापते। आदमी अपनी इज्जत खुद धूमिल करता है।

मिलन कुरकुर

पूर्व बीबीसी पत्रकार


भड़ास के पास उपरोक्त टिप्पणी milansingh055@gmail.com मेल आईडी से आई है.


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