भास्कर के दो प्रतिनिधियों ने अपने ही प्रिंसिपल करेस्पांडेंट को डराया-धमकाया

डी. बी. कॉर्प लिमिटेड में मजीठिया वेज बोर्ड मामले को लेकर हताशा साफ देखी जा सकती है। यह वह मीडिया समूह है, जो हिंदी में ‘दैनिक भास्कर’ सहित गुजराती में ‘दिव्य भास्कर’ और मराठी में ‘दिव्य मराठी’ नामक अखबारों का प्रकाशन करता है।  पता चला है कि मुंबई स्थित बांद्रा कुर्ला कॉम्प्लेक्स (बीकेसी) में ‘दैनिक भास्कर’ के दो प्रतिनिधियों द्वारा अपने ही संस्थान के एक प्रिंसिपल संवाददाता को डराने-धमकाने का बेहूदा प्रयास किया गया। इसके उपरांत कंपनी के प्रतिनिधियों ने प्रताड़ित करने के वास्ते संवाददाता के खिलाफ शिकायत दर्ज करवा दी है। कहते हैं न, जबरा मारे और रोवे भी न दे। प्रिंसिपल संवाददाता ने कंपनी के इन प्रतिनिधियों की हरकत के खिलाफ स्थानीय पुलिस स्टेशन में लिखित शिकायत दी है।

प्रिंसिपल करेस्पॉन्डेंट धर्मेन्द्र प्रताप सिंह इस संस्थान में 22 वर्षों से कार्यरत हैं। सन् 2016 के जून महीने में जब इन्होंने  प्रबंधन से मजीठिया वेज बोर्ड के तहत अपने वेतन व बकाए की मांग की तो कंपनी ने पहले इनका मुंबई से सीकर (राजस्थान) ट्रांसफर कर दिया। धर्मेन्द्र प्रताप सिंह द्वारा इंडस्ट्रियल कोर्ट से स्टे हासिल कर लेने के बाद कंपनी ने इन्हें माहिम वाले पुराने कार्यालय में प्रवेश नहीं दिया। फिर श्री सिंह ने प्रबंधन के खिलाफ लेबर कोर्ट में कंटेम्प्ट का मुकदमा दायर करवा दिया। अपनी हर चाल में घिरते देख प्रबंधन ने 10-11 महीने बाद इन्हें बीकेसी ऑफिस में बुलाकर काम पर तो रख लिया, मगर मजीठिया मामले में महाराष्ट्र राज्य में श्री सिंह का जब पहला आरआरसी  (रेवेन्यू रिकवरी सर्टीफिकेट) जारी हो गया तो कंपनी सन्न रह गई!

भास्कर समूह के दुर्व्यवहार से पीड़ित प्रिंसिपल करेस्पांडेंट धर्मेंद्र प्रताप सिंह

कंपनी ने आरआरसी पर स्टे लेने के लिए मुंबई हाई कोर्ट का रुख किया, पर श्री सिंह द्वारा वहां पहले से कैविएट लगा रखने के कारण प्रबंधन को जबर्दस्त झटका लगा। माननीय हाई कोर्ट ने जब सबसे पहले मूल धन की 50 फीसदी राशि कोर्ट में जमा करने का आदेश सुना दिया, तब उसे रुकवाने की खातिर प्रबंधन के लोग देश के सर्वोच्च न्यायालय में जा पहुंचे। यह बात महत्वपूर्ण है कि माननीय सुप्रीम कोर्ट ने भी इनकी एक न सुनी और डी. बी. कॉर्प लिमिटेड के पिटीशन को खारिज करते हुए प्रबंधन को मुंबई हाई कोर्ट में उक्त धनराशि जमा करने के लिए मजबूर कर दिया।

आखिर इस संस्थान को ऐसा ही करना पड़ा। किंतु अपने वकील एस. पी. पांडे के जरिए श्री सिंह ने जैसे ही इस राशि को प्राप्त करने के लिए कोर्ट में आवेदन दिया, प्रबंधन की त्यौरियां चढ़ गईं। इसी के परिणाम स्वरूप अक्षता करंगुटकर (एजीएम- एचआर एंड एडमिन) कल दोपहर में श्री सिंह को लेकर बोर्ड रूम में गईं, जहां दिल्ली से आए सचिन गुप्ता (लीगल डिपार्टमेंट) द्वारा श्री सिंह पर न केवल तमाम तरह के अनाप-शनाप आरोप लगाए गए, अपितु उन्हें डराने-धमकाने का असफल प्रयास भी किया गया। आखिर श्री सिंह उस मीटिंग को बीच में छोड़ कर बाहर निकल गए। मगर कंपनी के इन प्रतिनिधियों ने जाकर बीकेसी पुलिस थाने में एनसी करवा दी। अपनी ड्यूटी खत्म होने के बाद लिखित शिकायत लेकर श्री सिंह जब थाने में पहुंचे, तब उन्हें अपने विरुद्ध हुई एनसी के बार में पता चला।

अब समझ में नहीं आता कि दुनिया को आदर्शवाद का पाठ पढ़ाने वाला यह अखबार (प्रबंधन) क्या सिद्ध करना चाहता है? श्री सिंह का मामला जब देश की विभिन्न अदालतों में अलग-अलग स्टेज पर चल रहा है, तब क्या उसके बीच में इन प्रतिनिधियों द्वारा अपने बरसों पुराने कर्मचारी को इस तरह प्रताड़ित करना उचित है? फिलहाल धर्मेंद्र प्रताप सिंह द्वारा भी बीकेसी पुलिस स्टेशन में इस मामले की लिखित शिकायत की गई है।

शशिकांत सिंह
पत्रकार, आरटीआई एक्टिविस्ट व महाराष्ट्र समन्वयक (नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट)
9322411335

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