इस वक़्त चिकित्सा विज्ञान कोरोना वायरस के सामने हतप्रभ और निरुपाय-सा है!

पंकज चतुर्वेदी-

लक्षण हैं, तो कोरोना हो सकता है। नहीं हैं, तो भी। तब आप वायरस के ‘साइलेंट कैरियर’ हो सकते हैं।

आर टी पी सी आर टेस्ट रिपोर्ट निगेटिव है, तो भी कोरोना हो सकता है। तब उसे ‘फ़ाल्स निगेटिव’ कहेंगे। पॉजिटिव है, तो भी ज़रूरी नहीं कि कोरोना हो। तब उसे ‘फ़ाल्स पॉजिटिव’ कहेंगे।

बुख़ार और खाँसी जैसे लक्षण हैं, तो उनके सातवें-आठवें दिन से साँस लेने में तकलीफ़ हो सकती है और ऑक्सीजन लेवल गिर सकता है। नहीं हैं, तो भी गिर सकता है। तब उसे ‘Happy’ Hypoxia या Silent Hypoxemia कहेंगे। आज एक डॉक्टर ने बताया कि कुछ मरीज़ों में अस्पताल में भर्ती होने के समय ऑक्सीजन सैचुरेशन 90 और HRCT 2 था, लेकिन अगले ही दिन HRCT 12 हो गया।

पहली लहर में कहा जा रहा था कि उम्र ज़्यादा है या पहले से गंभीर बीमारियाँ हैं, तो कोरोना जानलेवा हो सकता है। अब तो सर्वथा नीरोग युवाओं के फेफड़े भी संक्रमित हो जा रहे हैं और उनमें-से कुछ की जान भी चली जा रही है।

इन सब परस्पर-विरोधी निष्कर्षों के जमावड़े को क्या ज्ञान माना जा सकता है ? क्या यह सही नहीं है कि इस वक़्त चिकित्सा विज्ञान कोरोना वायरस के सामने हतप्रभ और निरुपाय-सा है और उसके हर नये हमले के बरअक्स वह सिर्फ़ प्रतिक्रिया कर पा रहा है ? न पूरा सच उसकी समझ में आ रहा है और न उसमें यह विनम्र साहस ही है कि फ़िलहाल वह अपनी इस असमर्थता को स्वीकार करे।

ग़नीमत है कि इस तरह के विज्ञान के बजाय साहित्य में यह विवेक, हिम्मत और विनयशीलता होती है कि इतिहास के नाज़ुक मौक़ों पर अपनी अदम्य संघर्षशीलता के बावजूद वह स्वीकार करे कि कहीं वह अधूरा और असहाय भी है। जैसे कि निराला ने अपने प्रसिद्ध गीत में लिखा है :

‘कल्पना का ही अपार समुद्र यह,
गरजता है घेरकर तनु, रुद्र यह,
कुछ नहीं आता समझ में
कहाँ है श्यामल किनारा।…

गहन है यह अंध कारा।’



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