Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

साहित्य

हिंदी संस्थान ने लखकों को झूठा-फ्रॉड साबित कर अपनी फोरेंसिक लैबोरोट्री भी खोल ली है…

Dayanand Pandey : उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान में इस बार पुरस्कार वितरण में धांधली भी खूब हुई है। इस धांधलेबाजी खातिर पहली बार उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान ने एक फर्जी फोरेंसिक लैब्रोटरी भी खोल ली है। तुर्रा यह कि बीते साल किसी ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में किसी ने याचिका दायर कर दी थी सो इस याचिका कर्ता के भय में लेब्रोटरी में खुद जांच लिया कि कौन सी किताब किस प्रेस से कैसे छपी है और इस बिना पर कई सारी किताबों को समीक्षा खातिर ही नहीं भेजा समीक्षकों को। और इस तरह उन्हें पुरस्कार दौड़ से बाहर कर दिया। क्या तो वर्ष 2014 की छपाई है कि पहले की है कि बाद की है। खुद जांच लिया, खुद तय कर लिया। ज़िक्र ज़रूरी है कि इस बाबत लेखक की घोषणा भी हिंदी संस्थान लेता ही है हर बार।

Dayanand Pandey : उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान में इस बार पुरस्कार वितरण में धांधली भी खूब हुई है। इस धांधलेबाजी खातिर पहली बार उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान ने एक फर्जी फोरेंसिक लैब्रोटरी भी खोल ली है। तुर्रा यह कि बीते साल किसी ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में किसी ने याचिका दायर कर दी थी सो इस याचिका कर्ता के भय में लेब्रोटरी में खुद जांच लिया कि कौन सी किताब किस प्रेस से कैसे छपी है और इस बिना पर कई सारी किताबों को समीक्षा खातिर ही नहीं भेजा समीक्षकों को। और इस तरह उन्हें पुरस्कार दौड़ से बाहर कर दिया। क्या तो वर्ष 2014 की छपाई है कि पहले की है कि बाद की है। खुद जांच लिया, खुद तय कर लिया। ज़िक्र ज़रूरी है कि इस बाबत लेखक की घोषणा भी हिंदी संस्थान लेता ही है हर बार।

पर इस बार लखकों को झूठा और फ्रॉड साबित कर अपनी फोरेंसिक लैबोरोट्री भी खोल ली है हिंदी संस्थान ने। किताब पर छपे वर्ष और लेखक कि घोषणा पर यकीन नहीं किया। अंधेरगर्दी कि यह हद है। कि इस बिना पर जिस को चाहो पुरस्कार दो, जिस को चाहो पुरस्कार न दो। जनता के टैक्स का पैसा अपनी चेले चपाटों और चाटुकारों को बांट देने कि तरकीब है यह तो। निश्चित ही हिंदी संस्थान के इस पुरस्कार वितरण में धांधलेबाजी की सी बी आई जांच भी ज़रूर होनी चाहिए क्योंकि हिंदी संस्थान भ्रष्टाचार का बड़ा गढ़ बन गया है। और इस के कारिंदे अंधेर नगरी, चौपट राजा की व्यवस्था के पोषक! तो फिर ऐसे में कैसे कैसे लेखकों को हिंदी संस्थान ने इस बार पुरस्कार दिए हैं यह बहुत तफ़सील का विषय है।

लेकिन एक नमूना बलिया के कवि रामजी तिवारी ने अपनी फेसबुक वाल पर लिख कर परोस दिया है। आप भी इसे पढ़िए और गौर कीजिए और कि जानिए कि अपना उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान पुस्कार किन कूड़ा लेखकों को किस आधार पर दे रहा है। कहते हैं न कि हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े लिखे को फारसी क्या ! तो राम जी तिवारी का लिखा यहां गौर करें :

इस बार उत्तर प्रदेश सरकार ने जिन साहित्यकारों को सम्मानित किया है, उनमें हमारे शहर के एक मूर्धन्य साहित्यकार भी शामिल हैं । प्रस्तुत है उनकी प्रांजल भाषा और समुन्नत सोच की एक बानगी ……।

“एक गणमान्य नैष्ठिक व्यक्तित्व के धनी मान्यवदान्य गुरुदेव संत श्री ………. ऎसी ही विभूतियों में से एक हैं । सनातन धर्म से समन्वित रोम-रोम में भारतीय संस्कृति के सौष्ठव रूप को समाविष्ट कर अद्यावधि कीर्ति-कौमुदी से प्रद्योदित है । आपका जीवन मानवीय संवेदनाओं से संपृक्त विनीत वर्चस्वी कायस्थ कुलावन्तश्भूत प्रोज्ज्वल है । समस्त नैतिक गुणों का सामंजस्य आपके सहज स्वभाव और चरित्र के असीमित और अतुलित आयाम में सन्निविष्ट है।”

वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार दयानंद पांडेय के फेसबुक वॉल से.

इसको भी पढ़ें….

हिंदी संस्थान के पुरस्कार पाने वालों में 80 प्रतिशत से ज्यादा पोंगापंथी और सांप्रदायिक मानसिकता के लोग हैं

Local News Community
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन