मजीठिया वेज बोर्ड पर सुप्रीम कोर्ट का आज का आदेश मीडिया मालिकों के पक्ष में है या मीडियाकर्मियों के? …एक विश्लेषण

: अब जो-जो मीडियाकर्मी राज्य सरकारों द्वारा नियुक्त विशेष श्रम अधिकारी के यहां लिखकर दे देगा कि उसे मजीठिया वेज बोर्ड का फायदा नहीं दिया गया है, उसे लाभ मिलने का रास्ता खुल जाएगा… एक तरह से देखा जाए तो अब उन मीडियाकर्मियों को भी मजीठिया वेज बोर्ड मिलने का रास्ता खुल गया है जिनसे मालिकों ने जबरन किन्हीं कागजों पर साइन करवा लिया है : मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई. देश भर से आए सैकड़ों मीडियाकर्मियों और दर्जनों वकीलों के कारण खचाखच भरे कोर्ट रूम में जजों ने आदेश दिया कि प्रत्येक राज्य सरकारें हर मीडिया हाउस में लेबर इंस्पेक्टर भेजें और पता कराएं कि वहां मजीठिया वेज बोर्ड की रिपोर्ट लागू हुई या नहीं. पूरी रिपोर्ट तैयार करके तीन महीने के भीतर सुप्रीम कोर्ट में जमा करें. इस आदेश के बाद कुछ मीडियाकर्मी प्रसन्न नजर आए तो कुछ निराश.

निराश खेमे के मीडियाकर्मियों का कहना है कि यह तो फिर से इंस्पेक्टरों पर भरोसा करने जैसी बात हुई. लेबर इंस्पेक्टर और राज्य सरकारें हमेशा से मीडिया मालिकों की पक्षधर रही हैं और उन्हीं के अनुकूल रिपोर्ट बनाती हैं. ऐसा आदेश देकर सुप्रीम कोर्ट ने मीडिया मालिकों को बच निकलने का मौका दिया है. वहीं जो खेमा सुप्रीम कोर्ट के आदेश से प्रसन्न है, उसका कहना है कि कोर्ट ने सब कुछ अब भी अपने हाथ में रखा है. यानि लेबर इंस्पेक्टर जो भी रिपोर्ट राज्य सरकार को देगा और राज्य सरकार उसे सुप्रीम कोर्ट के हवाले करेगी, उस रिपोर्ट को सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज करना का विकल्प बचा हुआ है. अगर रिपोर्ट गलत हुई और केवल खानापूरी की गई वाली रिपोर्ट भेजी गई तो सारे पत्रकार और उनके वकील सुप्रीम कोर्ट में तीन महीने बाद रिपोर्ट को चैलेंज कर पाएंगे. इसलिए अभी निराश होने जैसी कोई स्थिति नहीं है.

सुप्रीम कोर्ट के पास किसी आदेश को खुद इंप्लीमेंट करने का अधिकार तो है नहीं. इंप्लीमेंटेशन तो इन्हीं राज्य सरकारों और संबंधित विभागों को कराना है. ऐसे में अगर सुप्रीम कोर्ट अपने नियंत्रण में मामले को रखकर इंप्लीमेंटेशन के बारे में रिपोर्ट देने के लिए राज्य सरकारों से कहा है तो यह पत्रकारों के हित में ही है. मीडियाकर्मी अब श्रम विभाग और राज्य सरकारों को घेर सकने की स्थिति में है कि वह सही तरीके से रिपोर्ट बनवाएं और जिन्हें अब तक मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से पैसा नहीं मिला है, उन्हें पैसा दिलवाएं.

उधर, सुप्रीम कोर्ट में मीडियाकर्मियों की तरफ से दायिर याचिका को रिप्रजेंट करने वाले वरिष्ठ वकीलों ने अपनी अलग बैठक की. इन लोगों ने मीडिया मालिकों की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में पेश किए जा रहे दावों और वेज बोर्ड के आधे-अधूरे अनुपालन के संबंध में अपनी रणनीति बनाई. सुप्रीम कोर्ट पहुंचे मीडियाकर्मियों ने भी कोर्ट के आदेश के बाद सुप्रीम कोर्ट के लॉन में बैठक की और कोर्ट के फैसले के सभी पहलुओं पर चर्चा की. उधर, कानाफूसी ये भी है कि सुप्रीम कोर्ट के जजों पर मीडिया मालिकों की तरफ से भारी दबाव है. ये दबाव मामले को रफा-दफा करने और मीडिया मालिकों को जेल न भेजने की है. लोगों के बीच चर्चा है कि अगर सुप्रीम कोर्ट अवमानना के मामले में सुब्रत राय को इतने लंबे समय तक जेल में बंद रख सकता है तो मीडिया मालिकों के अवमानना करने पर उन्हें दंडित करने के बजाय गेंद इधर-उधर दूसरे पाले में क्यों डाल रहा. फिलहाल मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर जितने मुंह उतनी बातें हैं. सुप्रीम कोर्ट के ताजे फैसले से कुछ राहत मीडिया मालिकों को मिली है तो कुछ निराशा मीडियाकर्मियों को हुई है.

भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट का ताजा आदेश अंतत: मीडियाकर्मियों की एकजुटता बढ़ाएगा और मीडिया मालिकों के खिलाफ आक्रोश को जगह-जगह स्वर देगा. अब हर प्रदेश की सरकारों और हर प्रदेश में श्रम विभाग के अफसरों को घेरा जाएगा, दबाव बनाया जाएगा, उनकी कार्यप्रणाली पर नजर रखा जाएगा ताकि कोई भी असत्य और गलत रिपोर्ट न तैयार कर सके. इसके लिए आरटीआई से लेकर लोअर कोर्टों तक का सहारा लिया जाएगा. साथ ही हर प्रदेश मुख्यालय पर पत्रकारों के बड़े आंदोलन का आयोजन किया जाएगा जिससे पूरा मसला सत्ता तंत्र तक प्रमुखता से पहुंचे और मीडियाकर्मियों को न्याय मिले.

यशवंत का कहना है कि तीन महीने के बाद सब कुछ फिर सुप्रीम कोर्ट में जाना है इसलिए निराश होने की कतई जरूरत नहीं है. इन तीन महीने में राज्य सरकारों और श्रम विभाग के चरित्र की भी पहचान हो जाएगी. इसलिए सभी पत्रकार साथी अब अपने अपने राज्य में जाकर वहां के मजीठिया के लिए लड़ने वाले पत्रकारों को एकजुट करें और श्रम विभाग के दफ्तरों के सामने धरना प्रदर्शन की तैयारी शुरू करें. साथ ही प्रदेश सरकार के मंत्रियों व मुख्यमंत्री तक अपनी आवाज पहुंचाने की व्यवस्था करें. इसके लिए सभी मीडिया संगठनों को भी सक्रिय हो जाना चाहिए. यशवंत के मुताबिक श्रम विभाग को सीधे सुप्रीम कोर्ट को रिपोर्ट करना है, इसलिए मामला अब भी पूरी तरह हम मीडियाकर्मियों के पक्ष में है. श्रम विभाग के अफसरों को अपनी नौकरी की चिंता ज्यादा है, इसलिए वे मालिकों या सरकारों के दबाव में कतई नहीं आएंगे. वे हर हाल में सही रिपोर्ट बनाने के लिए मजबूर होंगे क्योंकि रिपोर्ट पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होनी है और रिपोर्ट के प्वाइंट्स पर सुप्रीम कोर्ट में चर्चा होगी. अगर रिपोर्ट गलत साबित हुई तो संबंधित अफसर की छुट्टी तय है. इसलिए सुप्रीम कोर्ट का ताजा आदेश आम मीडियाकर्मियों के हित में ही है.

भड़ास के एडिटर के मुताबिक विशेष श्रम अधिकारी नियुक्त कर तीन महीने में स्टेटस रिपोर्ट देने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अब राज्य सरकारों और श्रम विभाग को फूंक-फूंक कर कदम रखना पड़ेगा क्योंकि श्रम अधिकारी की रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट के हवाले की जानी है जिस पर चर्चा होनी है. रिपोर्ट में अगर थोड़ा भी मेनुपुलेशन दिखा तो विशेष श्रम अधिकारी को लेने के देने पड़ सकते हैं. इसलिए माना जा रहा है कि अब जो-जो मीडियाकर्मी विशेष श्रम अधिकारी के यहां लिखकर दे देगा कि उसे मजीठिया वेज बोर्ड का फायदा नहीं मिला है, उसे फायदा मिलने का रास्ता खुल जाएगा. एक तरह से देखा जाए तो अब उन मीडियाकर्मियों को भी मजीठिया वेज बोर्ड मिलने का रास्ता खुल गया है जिनसे मालिकों ने जबरन किन्हीं कागजों पर साइन करवा लिया है. 

मूल खबर:

मजीठिया पर सुप्रीम कोर्ट का ताजा आदेश- राज्य सरकारें तैनात करें विशेष श्रम अधिकारी, तीन माह में स्टेटस रिपोर्ट दें

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Comments on “मजीठिया वेज बोर्ड पर सुप्रीम कोर्ट का आज का आदेश मीडिया मालिकों के पक्ष में है या मीडियाकर्मियों के? …एक विश्लेषण

  • सुप्रीम कोर्ट का निर्णय कहीं अखबार मालिकों के हित के लिए तो नहीं
    सुप्रीम कोर्ट मामले को लंबा तो नहीं खींच रही
    सही कहा है कि पैसे के आगे न्याय की उम्मीद रखना बेकार है

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  • सुप्रिम के इस फैसले के बाद हमारे लिए हाथ पर हाथ रखकर बैठने का समय नहीं है। हमें श्रम मंत्रालय ,सरकार,तथा कंपनीओं पर दबाव की निती अपनानी होगी। इन सभी पर ध्यान रखना होगा और उन्हें सही और योग्य काम करने के लिए मजबुर करना पडेगा और इस लिए हमें कुछ नये नुसखे ढुंढने होंगे।

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  • इसके लिए मीडियाकर्मियों को अपनी सरकारों और मंत्रियों को अवगत कराते हुए बताना चाहिए कि सरकार के समाचारों की कवरेज मीडिया के मालिक नहीं बल्कि दबे कुचले पत्रकार ही करते हैं। इसलिए उन्हें सरकार के हर प्यादे को इस बात से पूरी तरह अवगत करा देना चाहिए। इसके बाद ही हमारा संघर्ष आगे का रास्ता तय करेगा।

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  • राजेश अग्रवाल says:

    मुझे नहीं लगता कि यह आदेश मीडिया कर्मियों के पक्ष में है. इस आदेश ने एक बार फिर अखबारमालिकों लम्बे समय तक बचे रहने का मौका दे दिया है. ऐसा कई बार हुआ है जब राज्य सरकारों को तय समय सीमा में स्टेटस रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश कोर्ट ने दिया है, पर सरकारों ने बार-बार समय ले लिया. अखबार मालिकों का दबाव पड़ेगा तो ये राज्य सरकारें बार-बार स्टेटस रिपोर्ट प्रस्तुत करने का समय ले लेंगी. फिर जब कोर्ट में साल डेढ़ साल तक खींचकर यह रिपोर्ट रखी जाएगी तो उस रिपोर्ट को अखबार मालिक चुनौती देंगे, यदि रिपोर्ट उनके हित में नहीं होगी. राज्य सरकारों ने मालिकों के पक्ष में अस्पष्ट रिपोर्ट दी तो मीडिया कर्मियों को उसे चुनौती देनी होगी. कुल मिलाकर संघर्ष लम्बा चल सकता है. इस अवधि में उन पत्रकार साथियों का क्या होगा जिन्हें केस दायर करने के कारण प्रबंधन प्रताड़ित कर रहा है?

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  • mujhe to laga tha is sunwai me koi na koi media maalik tihaaar jaega but humare supreme forse jinhone yeh faisla diya diya wahi ab is faisle ko lekar dhili padti nazar aa rahi hai.! how long will they wait for their contempt of order.

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  • Hariom shivhare says:

    सुप्रीम कोट द्वारा जो फैसला आज दिया गया वो पुरी तरह से अखबार मालिको के पक्ष मे है इन चार माह में वो लोग हमारे कमजोर साथियों को तोड देगे और जिन साथियों का टानसफर किया उनको बाहर कर दिया जायगा

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  • Kashinath Matale says:

    Supreme Court ka order kya hai maine padha nahi, partnu news item aur comment padhakar lagata hai ki SC ne gend phirse state govt ke pale me dali hai.

    Centre govt. ne pahale hi ek order se State Government aur Union Territories ko order diya hai ki Majithia Wage Board ka implementation karaya jaye. Matlab jis kisene MWB ka implementation kiya nahi hai, unhone SC ka Govt. Order ka contempt kiya hai.

    Contemet ki case ka kya huya hai.

    Thanks!

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