बिहार के एक पत्रकार को दैनिक जागरण देगा साठ लाख बयालीस हजार रुपये, आरसी जारी

बिहार के गया जिले के पत्रकार पंकज कुमारका सपना सच हो गया. वे सुप्रीम कोर्ट से लेकर बिहार हाईकोर्ट और गया जिले की अदालतों के चक्कर काटने के बाद अंतत: दैनिक जागरण को मात देने में कामयाब हो गए. इस सफलता में उनके साथ कदम से कदम मिला कर खड़े रहे जाने माने वकील मदन तिवारी.

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मजीठिया मामले में सुप्रीम कोर्ट का आज आया पूरा फैसला इस प्रकार है…

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‘हिंदुस्तान’ अखबार से 6 करोड़ वसूलने के लखनऊ के अतिरिक्त श्रमायुक्त के आदेश की कापी को पढ़िए

लखनऊ के श्रम विभाग ने हिंदुस्तान के 16 पत्रकारों व कर्मचारियों को क़रीब 6 करोड़ रुपए का भुगतान करने का आदेश दिया है. लखनऊ के एडिशनल कमिशनर बी.जे. सिंह व सक्षम अधिकारी डॉ. एमके पाण्डेय ने 6 मार्च को हिंदुस्तान के ख़िलाफ़ आरसी जारी कर दी और पैसा वसूलने के लिए ज़िलाधिकारी को अधिकृत कर दिया है. इस बाबत खबर तो भड़ास4मीडिया पर पहले ही प्रकाशित हो चुकी है लेकिन आज हम यहां आदेश की पूरी कापी दे रहे हैं… नीचे आर्डर कापी का पहला पेज है….

पेज वन..

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ये क्या, सुप्रीम कोर्ट के लिखित आदेश में जागरण के मालिकों को तलब करने का जिक्र ही नहीं!

सुप्रीमकोर्ट के लिखित आदेश से समाचारपत्र कर्मियों में निराशा : माननीय सुप्रीमकोर्ट में 4 अक्टूबर को हुयी मजीठिया वेज बोर्ड मामले की सुनवाई के बाद लिखित आदेश कल 6 अक्टूबर को आया। लेकिन इस आदेश में दैनिक जागरण के मालिकों संजय गुप्ता और महेंद्र मोहन गुप्ता को तलब किए जाने का जिक्र ही नहीं है। न ही इन दोनों का नाम किसी भी संदर्भ में लिया गया है। यानि संजय गुप्ता और महेंद्र मोहन गुप्ता को अगली सुनवाई के दौरान सुप्रीमकोर्ट में उपस्थित नहीं रहना पड़ेगा।

4 अक्टूबर को हुयी सुनवाई में दैनिक जागरण के मालिकों का नाम सामने आया था। इन्हें तलब किए जाने की पुष्टि सुप्रीम कोर्ट के वकीलों ने कोर्ट से बाहर की थी। इसी तरह माननीय सुप्रीमकोर्ट में मजीठिया मामले के पत्रकारों के पक्ष में लड़ाई लड़ रहे एडवोकेट उमेश शर्मा ने 17 (1) के मुद्दे को उठाया लेकिन आर्डर में 17(2) के बारे में लिखा है। सुप्रीमकोर्ट के एडवोकेट ने सुनवाई के बाद बाहर निकलकर पत्रकारों को बताया कि अगली डेट 25 अक्टूबर को रखी गयी है लेकिन आर्डर में अगली डेट के बारे में बताया गया है कि यह 8 नवंबर 2016 को दोपहर 2 बजे से सुनवाई है।

इसी तरह सुप्रीमकोर्ट में अगले पांच राज्यों के श्रमायुक्त को तलब करने में राजस्थान का भी नाम था लेकिन आर्डर में राजस्थान का नाम नहीं है। इस बार की सुनवाई में 20जे का भी मुद्दा था लेकिन उस पर भी बहस नहीं हो सकी जिसको लेकर देश भर के मीडिया कर्मी निराश हैं। फिर भी, मीडियाकर्मियों को माननीय सुप्रीमकोर्ट पर पूरा भरोसा है। इनका मानना है कि देश के इस सबसे बड़े न्याय के मंदिर में देर तो है लेकिन अंधेर नहीं है, उन्हें न्याय जरूर मिलेगा। आप भी पढ़िए माननीय सुप्रीमकोर्ट का ताज़ा आदेश….

सुप्रीमकोर्ट में मजीठिया मामले की सुनवाई के बाद जारी लिखित आदेश…

UPON hearing the counsel the Court made the following

O R D E R

We have heard the learned counsels for the
parties. We have considered the status reports
filed by the Labour Commissioners of the concerned
States.

The monitoring in respect of State of
Nagaland is closed. So far as the State of
Maharashtra is concerned, the State is granted
further two weeks’ time to file its response.
Insofar as the States of Uttar Pradesh,
Himachal Pradesh, Uttarakhand, Manipur, Madhya
Pradesh, Chhattisgarh, Delhi and Jharkhand are
concerned, we direct that all revenue recovery
proceedings which are pending shall be
completed at the earliest.

In respect of such of the defaulting units
against whom recovery proceedings have not been
initiated, the same shall be initiated and
completed at the earliest.

In all cases where there is a dispute with
regard to the amount payable, we direct the State
Governments to act under the provisions of Section
17(2) of the Working Journalists and Other ewspaper Employees (Conditions of Service) and
Miscellaneous Provisions Act, 1955. The concerned
Labour Court will finalize its award expeditiously
and send the same to the State Government for due
execution.

Insofar as the legal issues that have to be
heard and decided are concerned, Shri Colin
Gonsalves, learned senior counsel, who had agreed
to identify and carve out the principles that would
be required to be decided in these cases, is
granted two weeks further time to formulate the
said questions and file appropriate written notes.
We make it clear on the next date fixed, the
Court will hear the aforesaid legal questions and
pass necessary orders thereon.

List these matters on 8th November, 2016 at
2.00 p.m.

On the said date i.e. 8th November, 2016,
status report with regard to the implementation of
the Majithia Wage Board recommendations in respect
of the following five States shall be placed before the Court for consideration:

(1) Tamil Nadu
(2) Kerala
(3) Andhra Pradesh
(4) Karnataka
(5) Telangana

We also direct that copies of the status
reports filed by all the States till date be
circulated to the learned counsels appearing for
the contesting establishments.

Contempt Petition(C)No.570/2014 In W.P.(C) No. 246/2011
Leave sought for withdrawal of the
contempt petition is allowed. This contempt
petition is accordingly closed.

All pending applications shall also stand
disposed of.

(Neetu Khajuria)
Court Master
(Asha Soni)
Court Master

(Signed order in Contempt Petition(C) No.570/2014
in W.P.(C) No.246/2011 is placed on the file.)
IN THE SUPREME COURT OF INDIA
CIVIL ORIGINAL JURISDICTION
CONTEMPT PETITION(C) NO. 570 OF 2014
IN
WRIT PETITION (C) NO.246 OF 2011
BENNET COLEMAN & CO. EMPLOYEES UNION PETITIONER(S)
VERSUS
INDU JAIN & ORS. RESPONDENT(S)
O R D E R
Leave sought for withdrawal of the
contempt petition is allowed. This contempt
petition is accordingly closed.
All pending applications shall also stand
disposed of.
……………..J.
(RANJAN GOGOI)
……………..J.
PRAFULLA C. PANT)
NEW DELHI
OCTOBER 04, 2016

पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट शशिकान्त सिंह की रिपोर्ट. संपर्क : 9322411335

पढ़िए मूल खबर जिसकी अब कोई प्रासंगिकता नहीं रह गई है…

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सुप्रीम कोर्ट ने जागरण के मालिकों महेंद्र मोहन और संजय गुप्ता को तलब किया

मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को लागू न करने और सुप्रीम कोर्ट से लेकर कानून, न्याय, संविधान तक की भावनाओं की अनदेखी करने से नाराज सुप्रीम कोर्ट ने आज दैनिक जागरण के मालिकों महेंद्र मोहन गुप्ता और संजय गुप्ता को अगली सुनवाई पर, जो कि 25 अक्टूबर को होगी, कोर्ट में तलब किया है. आज सुप्रीम कोर्ट में मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को लागू न किए जाने को लेकर सैकड़ों मीडियाकर्मियों द्वारा दायर मानहानि याचिका पर सुनवाई हुई.

कोर्ट ने आज के दिन कई प्रदेशों के लेबर कमिश्नरों को बुला रखा था. कोर्ट ने सभी लेबर कमिश्नरों से कहा कि जिन जिन मीडियाकर्मी ने क्लेम लगाया है, उसमें वे लोग रिकवरी लगाएं और संबंधित व्यक्ति को न्याय दिलाएं. कोर्ट के इस आदेश के बाद अब श्रम विभाग का रुख बेहद सख्त होने वाला है क्योंकि पिछली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने लापरवाही बरतने पर उत्तराखंड के श्रमायुक्त के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया था.

सैकड़ों मीडियाकर्मियों की याचिका का प्रतिनिधित्व करते हुए एडवोकेट उमेश शर्मा ने आज सुप्रीम कोर्ट को बताया कि दैनिक जागरण की किसी भी यूनिट में किसी भी व्यक्ति को मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से न तो एरियर दिया गया है और न ही सेलरी दी जा रही है.

साथ ही दैनिक भास्कर समूह के बारे में भी विस्तार से बताया गया. आज सुप्रीम कोर्ट ने जागरण के मालिकों को कोर्ट में आने के लिए आदेश कर दिया है ताकि उनसे पूछा जा सके कि आखिर वो लोग क्यों नहीं कानून को मानते हैं. चर्चा है कि अगली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट भास्कर के मालिकों को तलब कर सकता है. फिलहाल इस सख्त आदेश से मीडियाकर्मियों में खुशी की लहर है.

कोर्ट में सुनवाई के दौरान मुंबई के पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट शशिकांत सिंह भी मौजूद थे. उन्होंने फोन करके बताया कि आज सुप्रीम कोर्ट ने जो सख्ती दिखाई है उससे वे लोग बहुत प्रसन्न है और उम्मीद करते हैं कि मालिकों की मोटी चर्बी अब पिघलेगी. सैकड़ों मीडियाकर्मियों को मजीठिया वेज बोर्ड से संबंधित अपने हक के लिए गाइड करने वाले पत्रकार शशिकांत सुप्रीम कोर्ट में हुई आज की सुनवाई की विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर रहे हैं जिसे जल्द भड़ास पर प्रकाशित किया जाएगा.

अपडेटेड न्यूज (7-10-2016 को दिन में डेढ़ बजे प्रकाशित) ये है….

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मजीठिया पर आज के फैसले का निहितार्थ : सुप्रीम कोर्ट आरपार वाले एक्शन के मूड में, जो मीडियाकर्मी सोए हैं वो अब भी जग सकते हैं

देश भर के पत्रकारों और गैर पत्रकारों के वेतन प्रमोशन से जुड़े मजीठिया वेज बोर्ड मामले में आज माननीय सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अख्तियार करते हुए उन श्रम सचिवों / श्रम आयुक्तों को तलब करना शुरू किया है जिन्होंने मजीठिया वेज बोर्ड मामले में या तो सुप्रीम कोर्ट की अवमानना करते हुए अपनी स्टेटस रिपोर्ट नहीं भेजी या जिन्होंने मजीठिया वेज बोर्ड लागू कराने के आदेश को गंभीरता से नहीं लिया।

शुरुआत पांच राज्यों से होगी। नार्थ इस्ट के चार राज्यों के अलावा एक राज्य उत्तर प्रदेश भी है। इन राज्यों के श्रम सचिव / श्रमायुक्त 23 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट में तलब किए गए हैं। इस तरह सुप्रीम कोर्ट ने अब मीडिया मालिकों, राज्य सरकारों और अफसरों की मनमानी को संज्ञान लेकर उन्हें दंडित करने का सीधा रुख अख्तियार कर लिया है। साथ ही इससे मीडियाकर्मियों को उनका हक भी मिल सकेगा।

खचाखच भरे सुप्रीमकोर्ट के कोर्ट नंबर 7 में इस फैसले को सुनने के लिए देश भर के पत्रकारों का जमावड़ा लगा। हालत ये थी कि कई पत्रकारों को कोर्ट रूम के अंदर जाने का पास भी नहीं मिला। इस दौरान सुप्रीमकोर्ट में पत्रकारों की तरफ से केस लड़ रहे एडवोकेट उमेश शर्मा ने जमकर पत्रकारों का पक्ष रखा और कहा कि आज समाचार पत्र कर्मियों का अखबार मालिक अत्यधिक शोषण कर रहे हैं। इस दौरान माननीय सुप्रीमकोर्ट के न्यायमूर्ति रंजन गोगोई जी ने सभी राज्यों के श्रम आयुक्तों को सुप्रीम कोर्ट में तलब किया। फिलहाल पांच-पांच राज्यों के श्रम आयुक्तों को सुप्रीमकोर्ट ने तलब करने का निर्णय लिया।

इस दौरान अधिवक्ता कोलिन गोंजाल्विस और परमानन्द पांडे ने 20जे का मुद्दा उठाया। इस मुद्दे पर भी बहस होगी। उधर आज के फैसले को उमेश शर्मा ने निर्णायक बताते हुए कहा कि जो भी समाचार कर्मी अब तक क्लेम नहीं कर सके हैं, अब वे भी क्लेम कर सकते हैं। सरकार और अफसर सुप्रीम कोर्ट के डंडे के बाद अब थक हार कर अपनी नौकरी बचाने के लिए शिकायतकर्ताओं की शिकायतों को गंभीरता से लेंगे और मीडियाकर्मियों को उनका हक मिल जाएगा।

मुंबई से दिल्ली आए पत्रकार और आरटीआई कार्यकर्त शशिकांत सिंह ने यह रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट से बाहर निकलते हुए तैयार करके भड़ास के पास भेजी है. शशिकांत से संपर्क 9322411335 के जरिए किया जा सकता है.

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मजीठिया : बेहद सख्त सुप्रीम कोर्ट ने यूपी समेत पांच राज्यों के सचिवों को नए एक्शन रिपोर्ट के साथ 23 अगस्त को तलब किया

मीडिया मालिकों के कदाचार और सरकारी अफसरों की नपुंसकता से नाराज सुप्रीम कोर्ट ने मजीठिया वेज बोर्ड मामले में अब एक एक को देख लेने का इरादा बना लिया है. अपना रुख बहुत सख्त करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि राज्यों से आई रिपोर्ट को एक साथ एक बार में नहीं देखा जा सकता और इसमें बहुत सारी बातें स्पष्ट भी नहीं है इसलिए अब यूपी समेत पांच राज्यों की समीक्षा होगी और समीक्षा के दौरान संबंधित राज्यों के सचिव सुप्रीम कोर्ट में मौजूद रहेंगे. शुरुआत में नार्थ इस्ट के पांच राज्य हैं जिनके सचिवों को अपनी नवीनतम एक्शन रिपोर्ट तैयार करके 23 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष हाजिर रहने को कहा है.

बताया जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद अब उन राज्यों के श्रम विभागों में हलचल शुरू हो जाएगी जहां क्लेम फाइल करने वालों को उनका वाजिब हक दिलाने की बजाय श्रम विभाग के अधिकारी मीडिया मालिकों की चमचागिरी करते हुए पूरे प्रकरण को लीपपोत कर अनिर्णय की स्थिति में डाले हुए हैं. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि संबंधित पांच राज्यों के सचिव अपने यहां के सारे क्लेम और सारे दावों के निपटान की स्थिति लेकर 23 अगस्त को कोर्ट आएं. 23 अगस्त की सुनवाई के बाद ऐसे ही फिर अन्य पांच राज्यों के सचिवों को नवीनतम एक्शन रिपोर्ट के साथ सुप्रीम कोर्ट बुलाया जाएगा. तो, इस पूरे घटनाक्रम और सुप्रीम कोर्ट के रुख से जाहिर है कि मामला मीडियाकर्मियों के पक्ष में है और मीडिया मालिकों व उनके चाटुकार अफसरों की चालबाजी सफल नहीं होने वाली है.

भड़ास4मीडिया की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में दायर किए गए सैकड़ों अवमानना मामलों के वकील उमेश शर्मा ने भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह को फोन पर बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने बिलकुल सही रास्ता अख्तियार किया है. अब यूपी समेत जिन पांच राज्यों के सचिवों को 23 अगस्त को बुलाया गया है वो न सिर्फ वहां सारे मामले निपटा कर और सही रिपोर्ट लेकर पहुंचेंगे बल्कि इसका असर उन दूसरे राज्यों में होगा जहां मीडिया मालिकों और सरकारी अफसरों का गठजोड़ आम मीडियाकर्मियों के क्लेम को लटकाने में जुटे हुए हैं और गोलमोल रिपोर्ट बनाकर सुप्रीम कोर्ट को बरगलाने की कुत्सित मंशा रखते हैं. आने वाले दिनों में हर राज्य के श्रम अफसरों को पूरी सख्ती दिखाते हुए मीडियाकर्मियों को उनका हक दिलाना पड़ेगा वरना संभव है सुप्रीम कोर्ट में पेशी के दौरान खड़े खड़े उन्हें जेल भेजे जाने का आदेश उच्चतम न्यायालय दे दे. एडवोकेट उमेश शर्मा ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट के आज के आदेश की लिखित कॉपी का इंतजार किया जा रहा है. उसके बाद आगे की रणनीति तय की जाएगी.

भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह का कहना है कि संविधान, सुप्रीम कोर्ट और कानून को ठेंगे पर रखने वाले देश द्रोही मीडिया मालिकों और चोरकट धूर्त अफसरों से निपट पाना कोई मामूली बात नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने पूरा मौका देने के बाद अब इन्हें सही से घेरना शुरू कर दिया है. मजीठिया वेज बोर्ड मामले की आज हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने पांच-पांच राज्यों के सचिवों को नवीनतम एक्शन रिपोर्ट के साथ जो तलब करना शुरू किया है और कहा है कि अपने साथ नवीनतम एक्शन रिपोर्ट लाकर बताओ कि कितनों को न्याय मिला और कितनों को नहीं मिला तो जाहिर है कि संबंधित राज्यों के सचिव खुद सुप्रीम कोर्ट में खड़े रहेंगे और इसका मतलब हुआ कि अगर अफसरों ने तनिक भी चालाकी दिखाई और मीडियाकर्मियों को उनका हक नहीं दिला पाए तो सुप्रीम कोर्ट में खड़े खड़े ही अफसरों को कोर्ट की अवमानना में गिरफ्तार कर के जेल भेजने की आदेश सुप्रीम कोर्ट दे सकती है. इसके ठीक बाद उस मीडिया मालिक को भी अरेस्ट करने का आदेश दे सकती है जिसने अपने कर्मी को उसका हक नहीं दिया. यानि अब मीडिया मालिकों और अफसरों के जेल जाने के दिन आने वाले हैं. तो हम लोग कह सकते हैं- ”अब भी तो सुधर जाओ हरामखोरों!”

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Samruddha Jeevan Fraud : महेश किशन मोटेवार समेत तीन डायरेक्टरों की संपत्ति कुर्क करने के आदेश

लाइव इंडिया न्यूज चैनल संचालित करने वाली चिटफंड कंपनी समृद्धि जीवन के डायरेक्टरों महेश किशन मोटेवार, संतोष पायगोडे और राजेंद्र भंडारे की संपत्ति कुर्क करने के आदेश ग्वालियर की एक अदालत ने दिए हैं. इन तीनों डायरेक्टरों की संपत्ति कुर्क करने के आदेश रोकने को लेकर दाखिल याचिका को अदालत ने खारिज कर दिया है. तीनों के खिलाफ मजिस्ट्रेट कोर्ट से स्थायी गिरफ्तारी वारंट जारी हो चुके हैं.

शासकीय अधिवक्ता जगदीश प्रसाद शर्मा ने बताया कि समृद्धि जीवन चिटफंड कंपनी के डायरेक्टरों महेश मोटेवार, संतोष पायगोडे और राजेंद्र भंडारे के खिलाफ थाटीपुर थाने में जनता के साथ धोखाधड़ी किए जाने के आरोप में भारतीय दंड संहिता की धारा 420, 467, 468 और 3/4 के तहत प्रकरण पंजीकृत किया गया है. लोगों को उनका धन कम समय में दुगना करने का लालच देकर पैसे वसूलने वाली इस कंपनी के तीनों डायरेक्टर एफआईआर दर्ज होने के बाद से ही फरार हैं. इन पर न्यायिक मजिस्ट्रेट कोर्ट द्वारा स्थायी गिरफ्तारी वारंट जारी करते हुए धारा 82/83 की कार्यवाही प्रारंभ कर दी गई है.

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Sebi orders Samruddha Jeevan Foods India to repay investors money in 3 months

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Sebi orders Samruddha Jeevan Foods India to repay investors money in 3 months

NEW DELHI: Markets regulator Sebi today asked Samruddha Jeevan Foods India and its directors to refund in three months money collected from investors through unauthorised cattle and goat farm schemes. The company and its directors — Mahesh Kisan Motewar, Vaishali Mahesh Motewar, Ghanshyam Jashbhai Patel and Rajendra Pandurang Bhandar — have also been barred from the capital market for four years. The Securities and Exchange Board of India (Sebi) has begun the probe after receiving complaints about the company agents promising “more than 12 per cent fixed returns and other unusual returns on investments in cattle and goat farms”.

The company was running Collective Investment Scheme (CIS) without obtaining regulatory approvals. A Sebi probe found that the firm was collecting money from the public in order to carry out business of “purchase and rearing of goats/buffaloes’ and also of sheep farming. Under its various schemes, the company was offering to double the money in five and half years, while also promising an amount equivalent to 1.5 times of the contract value as ‘accidental death help’.

The company’s financial statements showed that ‘advance from customers’ in fiscal year 2011-12 stood at over Rs 331 crore, at over Rs 163 crore in 2010-11 and Rs 36 crore in 2009-10. It spent over Rs 56 crore towards ‘advertisement and sales promotion (including commission)’ in 2011-12, Rs 39.5 crore in 2010-11 and Rs 22 crore in 2009-10. In an order passed today, Sebi has the company and its directors to “wind up the existing CIS and refund the money collected by the said company under the schemes with returns which are due to its investors…within a period of three months.”

Thereafter, the firm has to submit a winding up and repayment report within 15 days, including the trail of funds claimed to be refunded, bank account statements indicating repayment to investors among others. In addition, they have been barred from selling any assets of the company, except for the purpose of making refunds to its investors. In case, they fail to comply with the order, Sebi said Samruddha Jeevan and its directors will continue to be barred from the securities market, even after the completion of four years of restrictions imposed on them “till all the CIS are wound up and all the money mobilised through such schemes are refunded to its investors with returns which are due to them.”

Besides, it would make a reference to State Government/ Local Police and register a civil/criminal case against Samruddha Jeevan and would make a reference to the Ministry of Corporate Affairs to initiate the process of winding up of the firm.

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चिटफंड कंपनी ‘समृद्ध जीवन’ से सावधान, इसका भी हाल पीएसीएल और शारधा घोटाले वाला होने वाला है!

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‘प्रजातंत्र लाइव’ के मीडियाकर्मियों ने कैंडल मार्च निकाल कर अपने चिटफंडिये मालिक को ललकारा

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चिटफंड के समारोह का ‘लाइव इंडिया’ करता रहा लाइव प्रसारण, सतीश के सिंह भी मंच पर मौजूद

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चिटफंडिया ‘समृद्ध जीवन फाउंडेशन’ की मददगार बनी अखिलेश सरकार, निष्कासित मीडियाकर्मी संघर्ष की राह पर

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विवादित चिटफंड कंपनी समृद्ध जीवन के अखबार ‘प्रजातंत्र लाइव’ में बवाल, पुलिस पहुंची, मालिक से शिकायत

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अपने मालिक की बर्थडे पार्टी को सबसे बड़ी ख़बर बताकर पूरे दिन प्रसारित करता रहा लाइव इंडिया

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ये लाइव इंडिया नहीं ये है चिट फंड इंडिया

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पीएसीएल को निवेशकों का 49100 करोड़ रुपया लौटाने का आदेश बरकरार

मुंबई। भारतीय प्रतिभूति अपीलीय ट्राइब्यूनल (सैट) ने बाजार नियामक सेबी के उस आदेश पर रोक लगाने से इन्कार कर दिया जिसमें प्रॉपर्टी डेवलपर पीएसीएल को निवेशकों का 49,100 करोड़ रुपया लौटाने का आदेश जारी किया गया था। सेबी ने अवैध सामूहिक निवेश योजना को लेकर पीएसीएल के खिलाफ कार्रवाई की थी। इसके बाद पिछले साल सेबी के आदेश के खिलाफ पीएसीएल ने ट्रिब्यूनल में अपील किया था। लेकिन ट्रिव्यूनल ने पीएसीएल की अपील खारिज करते हुए उसे सेबी के निर्देशों पर तीन महीने में अमल करने को कहा।

सेबी ने अवैध योजनाओं के जरिये निवेशकों से धन जमा करने के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करते हुए पीएसीएल लिमिटेड (पहले पर्ल्स एग्रोटेक कॉर्पोरेशन) को तीन महीने के भीतर 49 हजार 100 करोड़ रुपये निवेशकों को लौटाने का आदेश दिया था। सेबी ने कंपनी से अवैध सामूहिक निवेश योजना (सीआईएस) को बंद करने को भी कहा है।  सेबी के आदेश के बाद पीएसीएल ने इसे प्रतिभूति अपीलीय ट्राइब्यूनल (सैट) में चुनौती दी। वहीं, पीएसीएल के बयान में कहा गया कि दुर्भाग्य से सेबी इस बात पर ध्यान नहीं दे सका कि कंपनी ने कहा था कि उसे सीआईएस नहीं माना जाए। कंपनी ने कहा है, ‘पीएसीएल ने सेबी की बेंच के सामने कहा था कि वह सीआईएस नहीं चला रही है। कंपनी ने अपने रीयल एस्टेट कारोबार के लिए जो धन जुटाया है, उसके पास उचित मात्रा में परिसंपत्तियां हैं।’

सेबी ने कहा है कि वह उच्चतम न्यायालय के एक दिशानिर्देश के अनुसार कंपनी तथा निदेशकों के खिलाफ धोखाधड़ी तथा व्यापार में अनुचित व्यवहार करने वह सामूहिक निवेश योजनाओं (सीआइएस) के बारे में सेबी के नियमों के उल्लंघन के आरोप में पीएसीएल के खिलाफ कार्रवाई की है।  भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने इस संबंध में 92 पृष्ठ का आदेश जारी किया था। इसके अनुसार कंपनी ने खुद स्वीकार किया है कि उसने 49,100 करोड़ रुपये जुटाये है और अगर पीएसीएल एक अप्रैल 2012 से 25 फरवरी 2013 के बीच जुटाये गये कोष का पूरा ब्योरा दे तो यह राशि और भी अधिक हो सकती है। जिन निवेशकों से यह राशि जुटायी गयी, उनकी संख्या करीब 5.85 करोड़ है। इनमें वे ग्राहक भी शामिल है। जिन्हें जमीन आवंटित करने की बात कही गयी थी और उन्हें अभी तक जमीन नहीं दी गयी। अवैध तरीके से धन जुटाने के मामलों में यह न केवल राशि के लिहाज से बल्कि निवेशकों की संख्या को लेकर भी सबसे बड़ा मामला है।

वही, पीएसीएल तथा निर्मल सिंह भांगू समेत उसके शीर्ष कार्यकारियों के खिलाफ सीबीआई भी जांच कर रही है। साथ ही यह सेबी की जांच के घेरे में पुराने मामलों में से एक है। नियामक ने 16 साल पहले फरवरी 1998 में पीएसीएल को कहा था कि वह न तो कोई योजना शुरू कर सकती है और न ही अपनी मौजूदा योजनाओं के तहत कोष जुटा सकती है। कंपनी ने अपनी दलील में कहा कि वह कोई अवैध योजना नहीं चला रही है और जमीन की खरीद-बिक्री में शामिल है। सेबी ने अवैध तरीके से धन जुटाने की योजना चलाने को लेकर 1999 में पीएसीएल को नोटिस जारी किया था। बाद में मामला अदालतों में गया। उच्चतम न्यायालय ने पिछले साल फरवरी में आदेश जारी कर सेबी को यह पता लगाने को कहा कि क्या पीएसीएल का कारोबार सामूहिक निवेश योजना के दायरे में आता है या नहीं और कानून के मुताबिक कार्रवाई करने को कहा।

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पीएसीएल पर सेबी ने अब तक का सबसे बड़ा जुर्माना लगाया, देने होंगे 7269 करोड़ रुपये

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चिटफंड कंपनी ‘समृद्ध जीवन’ से सावधान, इसका भी हाल पीएसीएल और शारधा घोटाले वाला होने वाला है!

आजमगढ़ । समृद्ध जीवन मल्टी स्टेट मल्टी पर्पज को0आपरेटिव सोसायटी के मेरठ ब्रांच के पूर्व शाखा प्रबंधक संदीप राय ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर समृद्ध जीवन मल्टी स्टेट मल्टी पर्पज कोआपरेटिव सोसायटी के उपर कई गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि ये सोसायटी देश में चल रही चिटफंड कंपनियों में अग्रणी है और इसका भी हाल पीएसीएल और शारधा चिट फंड घोटाले जैसी कंपनियों वाला होने वाला है। पीएसीएल और शारधा चिटफंड कंपनियों ने आम नागरिकों की 60 हजार करोड रुपये से भी ज्यादा की खून पसीने की कमाई को जी भर कर लूटा था। इसी कडी में अगला एपिसोड समृद्ध जीवन मल्टी स्टेट मल्टी पर्पज कोआपरेटिव सोसायटी का होने वाला है। राय ने कंपनी पर आरोप लगाते हुये प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से सोसायटी प्रबंधन से कई बिंदुओं पर जवाब मांगा है।

1-वर्ष 2002 सें अब तक कंपनी को अपने नाम क्रमशः गुरूकृपा डेयरीज, समृद्ध जीवन फूडस इंडिया लि0, प्रोस्पेरिटी एग्रो इंडिया लिमिटेड, समृद्ध जीवन मल्टी स्टेट मल्टी पर्पज को0आपरेटिव सोसायटी एवं गोल्डन पेटल नाम क्यों रखने पड़े। क्या ये किसी संदिग्धता की भावना के चलते तो नहीं किया गया।

2-जब सेबी ने दिनांक 2013 ने समृद्ध जीवन फूडस इंडिया लिमिटेड एवं प्रोस्पेरिटी एग्रो इंडिया लिमिटेड पर बैन लगाया एवं किसी भी प्रकार की नयी कंपनी अथवा लुभावनी स्कीम्स के संचालन से रोक लगाई तो समृद्ध जीवन मल्टी स्टेट मल्टी पर्पज को0आपरेटिव सोसायटी का गठन किस आधार पर किया गया क्योंकि दोनों के संचालक मंडल एवं कार्य करने का प्रकार क्रमशः एक जैसा ही है।

3-समृद्ध जीवन मल्टी स्टेट मल्टी पर्पज कोआपरेटिव सोसायटी के बॉयलाज में यह उल्लेखित होने पर कि मांग पर भुगतान किया जायेगा, आय0 पी एवं एस0 आय0 पी प्लान के तहत अनुबंध कराया जा रहा हैं, जिसमें मात्र परिपक्वता पर भुगतान दिये जाने का उल्लेख किया गया। इस प्रकार समृद्ध जीवन मल्टी स्टेट मल्टी पर्पज को0आपरेटिव सोसायटी द्वारा अपने बॉयलाज की मंशा के विपरीत कार्य किया जा रहा है, क्यों।

4-सेबी द्वारा 26 नवंबर 2013 को जारी अपनी जांच रिपोर्ट में समृद्ध जीवन फूडस इंडिया लिमिटेड द्वारा करायी गयी पालिसी मुख्यतः आय0 पी एवं एस0 आय0 पी प्लान पर तत्काल से कस्टमर से धनराशि ना लिये जाने के आदेश जारी किये गये थें। जबकि समृद्ध जीवन फूडस इंडिया लिमिटेड द्वारा आय0 पी एवं एस0 आय0 पी प्लान के अंतर्गत करवायी गयी पालिसी को देश भर में समृद्ध जीवन मल्टी स्टेट मल्टी पर्पज कोआपरेटिव सोसायटी के नाम के तहत जारी रखा गया, जोकि सेबी के आदेशों का पूर्णतः उल्लंघन है।

5-समृद्ध जीवन मल्टी स्टेट मल्टी पर्पज को0आपरेटिव सोसायटी द्वारा बॉयलाज की मंशा के विपरीत आय0 पी एवं एस0 आय0 पी प्लान के अंतर्गत जो योजना चलाई जा रही हैं बांड के अनुसार उसमें लाइव स्टाक देने की बात लिखी जाती हैं, जबकि कस्टमर को किसी भी प्रकार का लाइव स्टाक नही दिया जाता हैं बदलें में धनराशि ही दी जाती हैं, इसका उल्लेख सेबी द्वारा अपनी जांच रिपोर्ट में भी किया गया हैं। इस प्रकार बिजनेस प्लान के नाम पर सोसायटी द्वारा एक प्रकार से टर्म डिपाजिट लेकर बैंकिग का ही कार्य किया जा रहा हैं जोकि कृषि मंत्रालय एवं सहकारिता के नाम पर धोखा हैं।

6-समृद्ध जीवन मल्टी स्टेट मल्टी पर्पज को0आपरेटिव सोसायटी द्वारा समृद्ध जीवन फूडस इंडिया लिमिटेड एवं प्रोस्पेरिटी एग्रो इंडिया लिमिटेड द्वारा कस्टमर के नाम जारी चेक को भुगतान किया गया हैं एवं इस प्रकार बैंकिग रेग्यूलेशन एक्ट 1949 के पैरा-49-ए का पूर्णरूप से उल्लंघन किया गया हैं।

7-समृद्ध जीवन मल्टी स्टेट मल्टी पर्पज को0आपरेटिव सोसायटी के लखनउ एवं हल्द्वानी स्थित शाखायें जोकि प्रोस्पेरिटी एग्रो इंडिया के नाम से खरीदी गयी थी एवं जिसमें आज दिनांक तक समृद्ध जीवन मल्टी स्टेट मल्टी पर्पज को0आपरेटिव सोसायटी का कार्य चल रहा हैं इस तथ्य से साबित होता हैं कि नाम बदले हैं काम नही ।

8-मध्य प्रदेश हाइकोर्ट के आदेश दिनांक 13 जुलाई 2012 के संदर्भ में राय ने सोसायटी प्रबंधन से जवाब मांगा हैं कि क्यों आपकों माननीय मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच ने भगोडा घोषित किया था।

9-उडीसा राज्य के तलचर, जाचपुर एवं बाडगाह जिलों में दर्ज सोसायटी प्रमुख श्री महेश किसन मोतेवार के खिलाफ दर्ज 420 के मुकदमों के बारे में सोसायटी प्रबंधन का क्या जवाब है।

10-समृद्ध जीवन मल्टी स्टेट मल्टी पर्पज को0आपरेटिव सोसायटी किस आधार पर ऐजेंटों की नियुक्ति करती हैं एवं किस आधार पर उनकों ओ0आर0सी0 ;ओवर रायडिंग कमीशनद्ध एवं एम0एफ0ए ;मंथली फिल्ड ऐलाउंस का वितरण करती हैं जबकि उसको कृषि मंत्रालय एवं सहकारिता की मूल भावना के अंतर्गत केवल सदस्यों के माध्यम से ही व्यवहार करना था।

11-समृद्ध जीवन मल्टी स्टेट मल्टी पर्पज कोआपरेटिव सोसायटी के कर्मचारी का पी0एफ जोकि उनका मूलभूत अधिकार हैं उसमें अपना अंशदान क्यों नहीं जमा करती।

12-समृद्ध जीवन मल्टी स्टेट मल्टी पर्पज कोआपरेटिव सोसायटी अपने कर्मचारियों को राष्ट्रीय एवं राज्य स्तरीय अवकाश क्यों नही प्रदान करती।

13-अभी हाल ही में पंजाब सरकार के कापरेटिव सोसायटी के रजिस्ट्रार ने आपको चिन्हित किया था कि आपके पास पंजाब राज्य में कार्य करने हेतु आवश्यक अनापत्ति प्रमाण पत्र नही था फिर भी आपने संपूर्ण राज्य में अनाधिकृत रूप अपनी अनेक शाखाओं के माध्यम से करोडों का हेरफेर किया, आखिर क्यों ।

14-उत्तराखंड राज्य में आपकी समृद्ध जीवन मल्टी स्टेट मल्टी पर्पज को0आपरेटिव सोसायटी की निबंधन तिथि 8 जून 2012 थी एवं उत्तराखण्ड राज्य में कार्य करने की अनुमति 28 मार्च 2013 को प्राप्त हुई, जबकि समृद्ध जीवन मल्टी स्टेट मल्टी पर्पज को0आपरेटिव सोसायटी द्वारा निबंधन तिथि से पूर्व ही समृद्ध जीवन मल्टी स्टेट मल्टी पर्पज को0आपरेटिव सोसायटी के नाम की जमा रसीद कस्टमर को दी गई, इस प्रकार से यह स्पष्ट हैं कि आपके द्वारा अपने निबंधन से पूर्व ही उत्तराखण्ड राज्य में कार्य करना आरंभ कर दिया गया था जोकि अवैध है।

15-निबंधक सहकारी समितियां उत्तराखण्ड के कार्यालय पत्रांक 27107/अधि0-सं-का/मल्टी स्टेट को0 आप/निरीक्षण-जांच 2014-15 दिनांक 4 जुलाई 2014 में मुख्य जांच अधिकारी श्री नीरज बेलवाल की जांच रिपोर्ट में जिसमें की आपके ध्वस्त होने एवं कानून व्यवस्था बिगडने तक की बात कही गयी हैं उसके बार में सोसायटी प्रबंधन का क्या कहना है।

16-आपके द्वारा चार बार नाम बदलने के पीछे कही किसी प्रकार की घृणित मानसिकता तो नही हैं।

17-आपने अफ्रीकी गणराज्य लिथुआनिया की नागरिकता लेने के पीछे जो आपने वहा 10 लाख डालर का निवेश किया हैं कही वो आपका पलायन तो नही दर्शाता है।

18-प्रोस्पेरिटी एग्रो इंडिया पर रोक के बावजूद आपके द्वारा संचालित लाइव इंडिया न्यूज चैनल एवं मी मराठी नाम के चैनल को चलाने का आखिर क्या उद्वेश्य है, कहीं ऐसा तो नही कि आप अपने कारनामों से खुद को बचने बचाने के लिये ऐसा करते हों।

19-समृद्ध जीवन मल्टी स्टेट मल्टी पर्पज को0आपरेटिव सोसायटी के पास केवल सावधि जमा एवं पिग्मी डिपाजिट का ही लायसेंस हैं वो भी केवल सदस्यों के मध्य में फिर भी आप आय0 पी0 एवं एस0 आय0 पी0 प्लानों का संचालन धडल्ले से कर रहें हैं और वो भी सेबी के प्रतिबंध के बावजूद।

20-समृद्ध जीवन मल्टी स्टेट मल्टी पर्पज को0आपरेटिव सोसायटी के द्वारा सर्कुलरों अथवा विशेष लुभावनी स्कीमों का संचालन जो आपके द्वारा समय समय पर बिजनेस को बढाने के लिये किया जाता हैं  वो आप किस आधार पर करते हैं क्योंकी सहाकारिता आपकों इस बात की इजाजत नही देती हैं।

21-किस प्रकार से आप अपने ऐजेंटो के मध्य 12 साल का कैरियर एवं 12 रैंक देते हैं, इस तरह का कार्य तो केवल मल्टी लेवल मार्केंटिग एवं चिट फंडी करते हैं। आप क्लब मेंबरशिप भी प्रदान करते हैं।

22-अपने भांजे श्री प्रसाद परसवार की शाही शादी जो कि आपने पुणे के बालेवाडी स्टेडियम में की थी वो एवं उसमें तकरीबन 3 लाख लोगों की आमद हुई थी एवं इस शादी के लिये आपने पुणे शहर के तमाम मैरिज हाल, बैंक्वेट हाल एव पंडाल बुक किये थे, साथ ही चार विशेष रेलगाडिया एवं तकरीबन पूरे भारत की 80 प्रतिशत वायु सेवा को आपने बुक किया था। उस शाही शादी में आपने सेलो कंपनी से 80 हजार कुर्सियां खरीदी एवं इस पूरे तामझाम को पूरा करने के लिये आम जनता की गाढी कमाई के 90 करोड़ रुपये आपने खर्च कर दिये, आखिर किस हैसियत से।

23-आपके पास राल्य रायस एवं लुब्रगिनी जैसी गाडियों का काफिला हैं जोकि भारत जैसे देश में भी अल्प मात्रा में उपलब्ध हैं आखिर अपनी शाही जिंदगी के लिये कब तक आप जनता का खून चूसते रहेंगे।

24- 13 साल के आपकी कंपनी के इतिहास में आपने अभी तक 14 हजार करोड रूप्ये की धनराशि आपने 21 राज्यों की जनता से बटोरी हैं उसकों लोटाने के लिये आपके पास पर्याप्त बैलेंस है कि वो आपने लिथुआनिया देश में अपने बुढापें के लिये बचा कर रखा हैं।

मेरा माननीय प्रधानमंत्री जी एवं पाठकों से अनुरोघ हैं कि वो अपने विवके का प्रयोग करें साथ ही इस प्रकार की चिट फंडी कंपनी के खिलाफ एकजुट होकर अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का प्रयोग कर, इस कंपनी के भागने के मार्ग को अवरूद्ध करनें में अपना योगदान दें जिससे की जनता की गाढी कमाई का बचाया जा सकें।

सधन्यवाद,

आपका

संदीप राय

आजमगढ

संपर्क: 07895998665, sandyazam7@gmail.com

प्रेस विज्ञप्ति


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यादव सिंह पीआईएल आदेश : आईटी छापा ‘मेकॉन-यादवसिंह’ ग्रुप पर था – हाईकोर्ट

लखनऊ : इलाहाबाद हाईकोर्ट के लखनऊ बेंच में चीफ जस्टिस डॉ डी वाई चंद्रचूड और जस्टिस एस एन शुक्ला की बेंच द्वारा एक्टिविस्ट डॉ नूतन ठाकुर की यादव सिंह के खिलाफ दायर पीआईएल के पारित आदेश से स्पष्ट होता है कि यादव सिंह के घर पर 27 और 28 नवम्बर 2014 का आयकर छापा मेकॉन-यादव सिंह ग्रुप पर हो रहे ओपरेशन का हिस्सा था.

 

आदेश में छापे में 25 प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के बैलेंस शीट में लीजहोल्ड प्लाट की भारी संख्या की बात भी सामने आई तथा यादव सिंह, उनके परिवार और निकटवर्ती लोगों के नाम पर किये गए कई सारे आवासीय और कमर्शियल प्लाट के अभिलेख कोर्ट के सामने रखे गए.

हाई कोर्ट ने कहा कि 24 फ़रवरी 2015 को भारत सरकार के वित्त मंत्रालय द्वारा यूपी के मुख्य सचिव को भेजे पत्र में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा काले धन के लिए बनाए एसआईटी के आदेशों के क्रम में इस मामले की जांच सीबीआई द्वारा की जायेगी. कोर्ट ने डॉ ठाकुर द्वारा यादव सिंह को मायावती, मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव द्वारा कथित रूप से गलत फायदा पहुँचाने के आरोपों का भी उल्लेख किया.

कोर्ट ने राज्य सरकार के महाधिवक्ता तथा नॉएडा प्राधिकरण के अधिवक्ता द्वारा याचिका का भरपूर विरोध करने की बात भी बतायी और कहा कि जब एसआईटी ने सीबीआई जाँच की बात कह दी थी तो संविधान के अनुच्छेद 142 तथा 144 के अनुसार उसका पालन अनिवार्य था.

कोर्ट ने कहा कि यादव सिंह के खिलाफ मात्र व्यक्तिगत भ्रष्टाचार या धन संचय का आरोप नहीं है बल्कि आरोप यह है कि उन्होंने पूरी व्यवस्था को अपना दास बना कर लगातार सभी सरकारों में गलत लाभ पाए और बड़े-बड़े बिज़नस घरानों को लाभ पहुँचाया. साथ ही उत्तर प्रदेश के पिछले और वर्तमान सरकार में राजनैतिक शह पर खुद को बचाते हुए अपने गलत उद्देश्यों को पूरा किया..

कोर्ट ने यूपी सरकार द्वारा स्थापित जांच समिति को अपर्याप्त पाया और 24 फ़रवरी 2015 के केंद्र सरकार के आदेश के क्रम में यादव सिंह और उनसे जुड़े सभी प्रकरणों में सीबीआई जांच के आदेश पारित कर दिए.

समाचार सविस्तार संलग्न तथ्यों सहित अंग्रेजी में पढ़ें –

Yadav Singh PIL Order: IT raid was for Maconn Yadav Singh Group

The Allahabad High Court, Lucknow bench order passed by the bench consisting of Chief Justice Dr D Y Chandrachud and Justice S N Shukla in the PIL filed by activist Dr Nutan Thakur for CBI enquiry in Yadav Singh case reveals that the income tax raids on Yadav Singh’s residences on 27 and 28 November 2014 was part of operation of the ‘Maccon Infra/Yadav Singh group’

It said that during raids huge assets in the form of leasehold land appeared in the balance sheet of as many as 25 private limited companies and that a very large number of properties in Noida, including residential and commercial plots, were allotted to persons and companies related Yadav Singh. 

The High Court said that the letter by the Union Government in the Ministry of Finance (Department of Revenue) dated 24 February 2015 to the Chief Secretary of the State Government for CBI enquiry was mandatory for State government because it was written as per directions of the SIT for Black money constituted by the Supreme Court.

The Court order also mentioned about Dr Thakur alleging favouritism to Yadav Singh by Mayawati,  Mulayam Singh Yadav and Akhilesh Yadav.

The order mentioned that the petition was hugely resisted by the Advocate General appearing on behalf of the State and counsel appearing on behalf of NOIDA

The Court said that once instructions have been issued by the SIT for CBI enquiry, the State Government had no option but to comply with the direction under Article 142 and 144 of the Constitution

The Court said that the allegations against Yadav Singh are not just allegations of personal corruption or of personal aggrandizement. The essence of the allegation is that Yadav Singh has been able to use his personal proximity in the corridors of power with successive governments in State by indulging in corruption, amassing wealth for conferring favours on himself, the members of his family and business associates and has been able to shield himself due to his proximity with the corridors of power both in the previous government and the present government in the State of Uttar Pradesh.

The Court did not find constitution of a Commission of Inquiry sufficient and adversely commented on the effort to protract and stall a credible criminal investigation even after the receipt of the letter of the Union Government on 24 February 2015 and directed CBI investigation into all allegations of corruption and amassing of uncounted money by Sri Singh and in regard to all transactions, persons and entities connected thereto. 

संलग्न तथ्य –

Copy of HC order in Yadav Singh PIL

HIGH COURT OF JUDICATURE AT ALLAHABAD, LUCKNOW BENCH ?

Chief Justice’s Court 

Case :- MISC. BENCH No. – 12396 of 2014 

Petitioner :- Dr. Nutan Thakur [ P.I.L.] (At :- 10:15 A.M.) 

Respondent :- State Of U.P.Thoru.Prin.Secy.Home Deptt.Lko.And Ors. 

Counsel for Petitioner :- Asok Pande,In Person 

Counsel for Respondent :- C.S.C,A.S.G.,Bireshwar Nath,Dr.L.P.Misra,Raj Kumar Singh,Rajnish Kumar,Vinod Kumar Shahi 

Hon’ble Dr. Dhananjaya Yeshwant Chandrachud,Chief Justice 

Hon’ble Shri Narayan Shukla,J. 

Put up tomorrow, i.e. 16 July 2015 at 10.15 a.m. for dictation of judgment. 

Order Date :- 15.7.2015 

AHA 

(Dr D Y Chandrachud, CJ) 

AFR 

Chief Justice’s Court 

Misc Bench No 12396 of 2014 

Dr Nutan Thakur 

Vs 

State of U P through Principal Secretary, Home Department, 

Government of U P, Lucknow & Ors 

Appearance : 

For the petitioner : 

Dr Nutan Thakur, in person 

Shri Asok Pande, Advocate 

For the respondents : 

Shri Vijay Bahadur Singh, Advocate General 

Smt Bulbul Godiyal, Addl Advocate General 

Dr L P Mishra, Sr Advocate (for the ninth respondent) 

Shri P Tripathi, Sr Advocate 

Shri Uday Pratap Singh, Advocate 

Shri Keshav Mohan, Advocate 

Ms Anasuya Choudhary, Advocate 

Hon’ble Dr Dhananjaya Yeshwant Chandrachud, Chief Justice 

Hon’ble Shri Narayan Shukla, J 

(Per Hon’ble Dr D Y Chandrachud, CJ) 

These proceedings have been instituted in public interest by a social activist, who seeks a reference to the Central Bureau of Investigation1 to take up, enquire and register First Information Reports and investigate into the dealings of the ninth respondent, Yadav Singh who was, prior to his suspension, Chief Engineer in New Okhla Industrial Development Authority2, Greater Noida Industrial Development Authority3 and Yamuna Expressway Authority. 

The ninth respondent joined the service of NOIDA as a Junior Engineer on 17 March 1980 and was promoted as Assistant Project Engineer in 1989. After holding officiating charge as Project Engineer, he was promoted on 28 August 1997 as Senior Project Engineer, following which on 20 September 2002 he was promoted as Chief Maintenance Engineer. Ultimately, he was promoted as Chief Engineer. A First Information Report4 was registered as Case Crime No 371 of 2012 under Sections 409, 420, 466, 467, 469, 471 and 120-B of the Indian Penal Code, 18605 and under Section 13(1)(d) read with Section 13(2) of the Prevention of Corruption Act, 1988 on 13 January 2012 at Police Station Sector 39, Noida, Gautam Budh Nagar, against the ninth respondent, one Ramendra, the then Project Engineer and two construction companies by the name of Tirupati Constructions Private Limited and JSP Constructions. It was alleged that within a brief period between 14 December 2011 and 23 December 2011, agreement bonds for the release of moneys were executed in favour of contractors in the amount of Rs 954.38 crores by the Engineering Department of NOIDA. Besides this allegation, it was also alleged that the work of underground wiring in respect of certain projects had been commenced by the contractor before the finalization of the tender document. The FIR alleged a huge revenue loss to NOIDA. The basis of the FIR was a preliminary enquiry report of three officers submitted on 9 June 2012. During the course of the investigation, an application was submitted on 22 October 2012 to the State Government by one Sanjay Jain, a partner of JSP Constructions seeking a transfer of the investigation. Acting on the request, a Government Order was issued on 3 November 2012 by which the investigation was transferred to the Crime Branch of the Criminal Investigation Department6. The Investigating Officer of CBCID submitted a final report on 3 January 2014 to the court of the District and Sessions Judge, Gautam Budh Nagar. A notice was issued by the court to the informant, R P Singh. The informant stated that he had no objection to the final report being accepted. The District and Sessions Judge, Gautam Budh Nagar accepted the final report by an order dated 27 November 2014. 

At or about the time when the final report was being accepted by the District and Sessions Judge, Gautam Budh Nagar, income tax raids were carried out on 27 November 2014 at the premises of the ninth respondent, following which on 28 November 2014 a team of nearly 100 officials conducted search operations at 20 premises situated in Noida, Ghaziabad and Delhi. There was a seizure of documents, jewellery and cash. On 8 December 2014, a communication was addressed by the Assistant Director of Income Tax (Inv))-II, Noida to the Chairperson of NOIDA stating that during the course of a search and seizure operation of the ‘Maccon Infra Group of cases’, it was found that huge assets in the form of leasehold land appeared in the balance sheet of as many as 25 private limited companies. The names of the companies in respect of which a disclosure was sought are as follows: 

1 Prajyoti Impex Pvt Ltd 

2 Chahat Exim Pvt Ltd 

3 Merit Exim Pvt Ltd 

4 New Era e-Solutions Pvt Ltd 

5 Affe Technologies Pvt Ltd 

6 A K D Steels Pvt Ltd 

7 Quick Infotech Solutions Pvt Ltd 

8 Kinzo Exports Pvt Ltd 

9 N M Buildwell Pvt Ltd 

10 Business Bay Corporate Parts Pvt Ltd 

11 R N Creations Pvt Ltd 

12 Sigma Management System Pvt Ltd 

13 Ris Fashions Pvt Ltd 

14 Power Mech Industries Pvt Ltd 

15 Nitya Tradex Pvt Ltd 

16 K Biological Pvt Ltd 

17 Daffodil Infra-Agro Projects Pvt Ltd 

18 Kinzo Infosoft Pvt Ltd 

19 Kinzo IT Solutions Pvt Ltd 

20 Chahat Technology Pvt Ltd 

21 K S Ultratech Pvt Ltd 

22 Kusum Garments Pvt Ltd 

23 Hitchki Creations Pvt Ltd 

24 Norvic Design Pvt Ltd 

25 Maconns Infra Pvt Ltd 

The income tax authorities sought documents, inter alia, in regard to the date of allotment of land to those companies together with underlying documents and other details. Details were also sought in regard to the allotment of any other land in the name of the ninth respondent, his wife Kusum Lata, son Sunny Yadav and other persons or entities including Rajinder Manocha, Rajesh Manocha, Namrata Manocha, Anil Peshwari and Meenakshi Peshwari either in their names or in the names of companies or firms in which they were associated. 

During the course of these proceedings, a compilation of documents has been placed on the record, indicating that in response to the letter of the income tax authorities, the authorities at NOIDA collated and forwarded information pertaining to properties, including residential plots in Noida, allotted to persons and companies allegedly related to the ninth respondent. The compilation which has been placed before the Court includes lists of (i) industrial plots which were allotted directly to the companies or individuals concerned; (ii) industrial plots which were not allotted directly to the companies or individuals but whose names were added on subsequent dates; (iii) industrial plots allotted to the ninth respondent, his wife and son and other persons whose names were added at a subsequent date; (iv) residential plots allotted in the name of the ninth respondent and other persons; and (v) a list of residential plots which, though not allotted originally in the name of the ninth respondent and other persons, came to be allotted subsequently. On 6 January 2015, the Deputy Director of Income Tax (Inv)-II, Noida addressed a communication to the Chief Executive Officer of NOIDA seeking details of contracts awarded to 75 companies, copies of accounts and details of works contracts awarded to them in 2014-15. This information was sought in regard to the income tax investigation going on in the case of ‘Maconn Infra/Yadav Singh Group’. 

Following the raid of the income tax authorities on 27 and 28 November 2014, an investigation was being carried out by three instrumentalities of the Union Government, namely (i) the Income Tax Department; (ii) the Directorate of Enforcement; and (iii) the Special Investigation Team7 on black money constituted by the Supreme Court, consisting of Hon’ble Mr Justice M B Shah and Hon’ble Mr Justice Arijit Pasayat, former Judges of the Supreme Court. A communication was addressed by the Union Government in the Ministry of Finance (Department of Revenue) on 24 February 2015 to the Chief Secretary of the State Government. The subject of the letter was the ‘investigation against irregularities by Shri Yadav Singh, ex Engineer-in-Chief, NOIDA, Greater NOIDA and Yamuna Expressway Authority’. The letter stated as follows: 

“In pursuance of the instructions by the Special Investigation Team (SIT) on black money, Director, CBI (through Deptt of Personnel, Govt. of India) is to take up investigation of instances of fraud/corruption and other malpractices leading to amassing of large amounts of unaccounted money by Shri Yadav Singh, Ex Engineer-in-Chief of NOIDA, Greater NOIDA and Yamuna Express Way Authority. 

In this regard, it is requested that all the relevant material/documents may be handed over to CBI for carrying the necessary investigation. It is reiterated that notification constituting the Special Investigation Team (SIT) issued in light of directions by Hon’ble Supreme Court in Writ Petition (Civil No.176 of 2009 provides as follows: 

“All organs, agencies, departments and agents of the State whether at the level of Union of India, or the State Government, including but not limited to all statutorily formed individual bodies, and other constitutional bodies, extend all the cooperation necessary for the functioning of Special Investigation Team. 

The Union of India and where needed the State Governments will facilitate the conduct of the investigations, in their fullest measure, by the Special Investigation Team and functioning, by extending all the necessary financial material, legal diplomatic and intelligence resources, whether such investigations or portions of such investigations occur inside the country or abroad. 

This issues with the approval of the competent authority.” 

Prior to the receipt of the letter dated 24 February 2015, the State Government had issued a notification on 10 February 2015 under Section 3 of the Commissions of Inquiry Act, 1952 by which a former Judge of this Court Shri Justice Amar Nath Verma was appointed as a one-member Commission of Inquiry to investigate into the allegations against the ninth respondent. The terms of reference of the Commission of Inquiry are as follows: 

(i) Whether the promotions which were granted to the ninth respondent at various levels were in accordance with the procedures and criteria prescribed; 

(ii) Whether in the grant of contracts for development to various firms and individuals by the ninth respondent as Chief Engineer, the prescribed procedure and criteria had been observed; 

(iii) Inquiry into the allegations of corruption and misconduct on the part of the ninth respondent; and 

(iv) Apart from the above, any other matter which may be required to be investigated by the Commission either on the directions of the High Court or on a reference being made by an authority of the Central Government. 

The writ petition seeking the intervention of this Court for transferring the investigation to CBI had already been instituted on 10 December 2014 and was entertained by the Division Bench while passing a preliminary order dated 16 December 2014. While issuing directions for the impleadment of the ninth respondent and calling for counters, this Court, inter alia, took note of the pleadings contained in paragraphs 53 and 54 of the writ petition on the basis of which the writ jurisdiction under Article 226 of the Constitution was invoked. Paragraphs 53 and 54 of the writ petition read as follows: 

“53. That again the petitioner prays for this investigation to be undertaken only by the CBI because the facts as narrated above prove it beyond all doubts that the State government is completely biased to Sri Yadav Singh. There are many facts which can easily substantiate this statement of the petitioner regarding complete apathy of the State government- (a) the continuous rise of Sri Singh against all prevailing services rules and regulations; (b) the clear favouritism granted to Sri Yadav during various political governments, including the Bahujan Samaj Party government under Ms Mayawati, the Samajwadi Party under Sri Mulayam Singh Yadav and now under Sri Akhilesh Yadav where he has given plum postings, out of way promotions, key positions and large number of lucrative assignments as explained above; (c) the way initially an FIR was registered against Sri Singh, it was handed over to the State investigation agency CB-CID, he was placed under suspension and the investigation agency went all after him as to get red corner notice issued against him by the Interpol but after some months everything changed quite dramatically after his alleged compromise made with certain top political persons playing key and extremely influential role in the present regime; (d) the way the CB-CID closed the criminal case against Sri Singh in an extremely hush-hush and hurried manner; (e) the way the entire State bureaucracy’s eyes changed towards Sri Yadav Singh after his alleged compromise with the top political leaders of the current political government (f) the way he was reinstated in a surreptitious manner (g) the way he was made the Engineer-in-chief not only of Noida but of Greater Noida and Yamuna expressway also in a very surprising and eye-raising manner (h) the way the State government has so far reacted to this episode (i) the way it took about 12 days for the State government to suspend him while it is seen suspending every other officer on all kind of trifle charges (j) the way the news of top political leaders of SP and BSP being in very close contact with Sri Yadav Singh is coming in news all too loudly and boldly. 

54. There are certain other facts which seem to warrant CBI enquiry; (a) the magnitude of the corruption having emerged so far (b) the great spread of the corruption (c) the international/global spread of crime (d) the super-specialization that seems to be need in this particular case (e) the reputation and consistency of the investigation agency needed for this particular scam (f) the huge reputation and faith enjoyed by CBI.” 

During the pendency of the writ proceedings, the attention of the Division Bench was drawn on 23 March 2015 by the petitioner to the communication received from the Union Government in the Ministry of Finance by the Chief Secretary. The Court was informed by the learned Advocate General that the State Government was in the process of sending a reply to the communication which would be placed on the record before the Court. The State Government eventually addressed a communication to the Union Government in the Ministry of Finance on 6 April 2015 stating that a Commission of Inquiry headed by a former Judge of this Court has been appointed on 10 February 2015 and that a public interest petition seeking an investigation by CBI was pending before this Court. The State Government informed the Union Government that an appropriate decision would be taken in accordance with the directions that may be issued by this Court in the pending proceedings and as recommended by the one member Commission of Inquiry appointed to enquire into the matter. 

After the present proceedings were entertained by the Division Bench of this Court at Lucknow by passing an initial order on 16 December 2014, another PIL on the same subject was instituted at Allahabad in Jitendra Kumar Goel Vs State of U P8. While entertaining the petition on 15 June 2015, a Division Bench of this Court directed that the State must disclose why an FIR had not been registered in respect of the recovery of Rs 10 crores and was directed to respond to the allegations contained in the writ petition by 19 June 2015 when it was placed for further hearing. A Special Leave Petition was filed before the Supreme Court in which by an order dated 18 June 2015, the Supreme Court noted, inter alia, the submission of the State that during the pendency of the present proceedings at Lucknow, the High Court was not justified in entertaining another writ petition at Allahabad. The Supreme Court stayed further proceedings in the second writ petition at Allahabad. During the course of the hearing, the learned Advocate General has fairly stated before the Court that since the pleadings in the second writ petition were virtually lifted from the present proceedings, and since these proceedings had already been entertained at Lucknow in the earlier PIL, the State was constrained to move the Supreme Court against a second PIL being entertained. We have mentioned this fact for the completeness of the record though, as we shall now proceed to narrate, the proceedings have been argued fully on all sides to their fullest on merits. 

The jurisdiction of this Court in a public interest petition has been invoked by the petitioner on two counts. The first submission which has been urged is that in pursuance of the judgment and order of the Supreme Court in Ram Jethmalani Vs Union of India9, an SIT has been constituted and has been charged with the responsibility and duty to investigate and initiate proceedings, criminal as well as civil, in respect of all matters relating to unaccounted moneys held in foreign banks by Indians or other entities operating in India. The mandate of the order of the Supreme Court is that both the Union Government as well as the State Governments have to facilitate the conduct of the investigation by the SIT. The Department of Revenue of the Union Ministry of Finance addressed a communication to the Chief Secretary of the State Government on 24 February 2015, that pursuant to the instructions of the SIT, the Director of CBI is to take up investigation of the instances of fraud/corruption and other malpractices leading to the amassing of a large amount of unaccounted money by the ninth respondent. The State Government was requested to hand over to the CBI all relevant material and documents to facilitate the investigation. The attention of the State Government was drawn to the judgment and order of the Supreme Court. The submission is that the State Government was duty bound to effectuate the object and purpose of the order of the Supreme Court by producing all relevant material and documents for investigation by CBI. Instead, the State Government by its letter dated 6 April 2015 took refuge under its notification constituting a Commission of Inquiry presided over by a former Judge of this Court and attempted to obviate its obligation to comply with the order of the Supreme Court on the basis of the pending enquiry and the pendency of the present proceedings. The first submission is that since the State Government has failed in the obligation which was cast upon it by the judgment and order of the Supreme Court to cooperate in all respects with the SIT and since the SIT has instructed the Director of CBI to take up and investigate into the alleged acts of corruption on the part of the ninth respondent, the jurisdiction of this Court can be validly invoked. Reliance has been placed on the provisions of Article 256 of the Constitution under which the executive power of every State is required to be so exercised as to ensure compliance with the laws made by Parliament and the executive power of the Union extends to giving a direction to a State as would appear to the Government of India to be necessary for that purpose. 

The second basis for the invocation of the jurisdiction of this Court under Article 226 is that, consistent with the law laid down by the Supreme Court, the present case is a fit and proper case for a reference being made to the CBI to investigate all aspects pertaining to the alleged acts of corruption of the ninth respondent having due regard to (i) the huge corruption involved; (ii) the political support and patronage extended to the ninth respondent cutting across the political spectrum; (iii) the high level at which bureaucratic irregularities have taken place; (iv) the national and global spread of the crime; (v) the need for a specialized investigation by an agency; and (vi) the avowed need to preserve public confidence in the administration of criminal justice. In this regard, the petitioner has averred that initially an FIR was registered against the ninth respondent and he was suspended from service. According to the petitioner, the investigation was abruptly transferred to the CBCID at the behest of a co-accused and a final closure report was submitted to the Court for acceptance. The ninth respondent was reinstated in service and was restored to his position not only as Engineer-in-Chief of NOIDA but he was given additional charge both of the Greater NOIDA and Yamuna Expressway Authorities. The allegations against the ninth respondent which have been set out in great detail in the writ petition are that a raid was conducted on 27 and 28 November 2014 by a team of nearly 100 officials at Noida, Ghaziabad and Delhi. The allegation against the ninth respondent is that he, his spouse, members of his family and his associates have been involved in setting up shell companies for investing the commission received in respect of the award of every contract. The income tax authorities are also in the process of examining documents pertaining to the associates of the ninth respondent including one Rajinder Manocha from whose Audi vehicle an amount of Rs 10 crores was recovered. The ninth respondent is stated to have been involved in allotting to himself and to the members of his family and his associates, plots of land of a high value. The ninth respondent, it has been stated, has wielded power and enjoyed close proximity with politicians of all hues in the present and previous governments in the State of Uttar Pradesh. The ninth respondent was involved in high value infrastructure projects including Ganga water supply, sewage pipelines, drainage, hospitals, parks and metro. Between 2002 and 2014, he is stated to have headed the engineering, water, health and horticulture and other wings and to have executed projects worth nearly Rs 4200 crores. The ninth respondent and his syndicate are alleged to have grabbed over 320 plots during the course of four years of a value of Rs 750 crores. These plots were stated to have been sold to business and construction firms. In the present case, it has been stated that the activities of the ninth respondent during the course of the previous regime in the State have continued under the present government and the ninth respondent continues to enjoy close proximity to the corridors of power. In a supplementary affidavit which has been filed in these proceedings on 20 January 2015, the petitioner has specifically made allegations in regard to the close proximity of the ninth respondent with politicians in the State and their close relatives who are stated to be business associates. The names of the companies through which his unlawful activities are stated to have taken place have been set out. On this basis, it has been submitted that the manner in which the State Government closed the earlier proceedings through its investigative arm is indicative of the fact that there is no serious effort to investigate the allegations against the ninth respondent. After facts came to light following the raid by the income tax authorities, all that the State Government has done – it is submitted – is to constitute a Commission of Inquiry. No FIR was registered and no effort has been made by the State to investigate into the allegations against the ninth respondent. The State Government has, in the submission of the petitioner, acknowledged the volume and complexity of the case in its official notifications as well as in its counter affidavits filed in these proceedings. In this background, having also regard to the nature and complexity of the case, it has been submitted that a reference to the CBI for carrying out the investigation is necessary to ensure that the administration of criminal law is not derailed by the proximity of the ninth respondent to the corridors of power. 

The petition has been resisted by the Advocate General appearing on behalf of the State, counsel appearing on behalf of NOIDA as well as by learned counsel appearing on behalf of the ninth respondent. The Advocate General has submitted that: 

(i) The jurisdiction of the Court under Article 226 of the Constitution to refer a case for investigation by CBI must be exercised sparingly and with circumspection having due regard to the parameters set out in the judgments of the Supreme Court; 

(ii) The State Government has set up a Commission of Inquiry under the Commissions of Inquiry Act, 1952 headed by a former Judge of this Court and it would be appropriate to await the report of the Commission before initiating any action; 

(iii) By a supplementary notification of 11 July 2015, the Economic Offences Wing has been directed to cooperate with and act in coordination with the Commission of Inquiry; and 

(iv) The State Government addressed a communication to the Union Government stating that further action on the request to furnish material and documents to CBI would be taken subject to the report of the Commission of Inquiry and the orders that may be passed by this Court in the pending PIL. The allegations against the ninth respondent are based on what was reported in the news media and there is no reasonable basis for making a reference to the CBI. 

Counsel appearing on behalf of the ninth respondent submitted that: 

(i) The writ petition which is based on newspaper reports ought not to be entertained since it is not a bona fide recourse to the jurisdiction under Article 226 of the Constitution; 

(ii) The case of the petitioner is based on (a) undue promotions granted to the ninth respondent allegedly as a result of bureaucratic favour; (b) the allegation that the ninth respondent has amassed wealth by exploiting his office. In his counter affidavit, the ninth respondent has explained that the promotions which were granted to him were on the recommendations of duly constituted Departmental Promotion Committees and all the allegations have been denied; 

(iii) The Union Government had no jurisdiction to entrust the investigation to the CBI since under the judgment of the Supreme Court, the investigation is to be conducted by the SIT; 

(iv) In order to enable the SIT to investigate a case, the condition precedent is that there must be stashing of money abroad in an unaccounted form which is absent in the present case; and 

(v) Under Section 6 of the Delhi Special Police Establishment Act, it is not open to the Union Government to direct the State to hand over the papers to CBI without the consent of the State Government. 

Counsel appearing on behalf of NOIDA has supported these submissions and urged that NOIDA has cooperated with the income tax authorities upon receipt of the letter dated 8 December 2014 by making available necessary documents and material pertaining to the ninth respondent and the dealings in property by his alleged associates and companies. The submissions which have been made by the other learned counsel were adopted. 

These submissions fall for consideration. 

In Ram Jethmalani (supra), the Supreme Court constituted an SIT headed by two former Judges of the Supreme Court to investigate into and initiate proceedings including prosecutions in relation to all matters regarding unaccounted moneys held in foreign banks by Indians or other entities operating in India. Paragraph 57 of the judgment and order of the Supreme Court reads as follows: 

“In light of the above we herewith order: 

(i) That the High-Level Committee constituted by the Union of India, comprising of (i) Secretary, Department of Revenue; (ii) Deputy Governor, Reserve Bank of India; (iii) Director (IB); (iv) Director, Enforcement; (v) Director, CBI; (vi) Chairman, CBDT; (vii) DG, Narcotics Control Bureau; (vii) DG, Revenue Intelligence; (viii) Director, Financial Intelligence Unit; and (ix) JS (FT & TR-I), CBDT be forthwith appointed with immediate effect as a Special Investigation Team; 

(ii) That the Special Investigation Team, so constituted, also include Director, Research and Analysis Wing; 

(iii) That the above Special Investigation Team, so constituted, be headed by and include the following former eminent judges of this Court: 

(a) Hon’ble Mr Justice B P Jeevan Reddy as Chairman; and 

(b) Hon’ble Mr Justice M B Shah as Vice-Chairman; and that the Special Investigation Team function under their guidance and direction; 

(iv) That the Special Investigation Team, so constituted, shall be charged with the responsibilities and duties of investigation, initiation of proceedings, and prosecution, whether in the context of appropriate criminal or civil proceedings of: 

(a) all issues relating to the matters concerning and arising from unaccounted for monies of Hassan Ali Khan and the Tapurias; 

(b) all other investigations already commenced and are pending, or awaiting to be initiated, with respect to any other known instances of the stashing of unaccounted for monies in foreign bank accounts by Indians or other entities operating in India; and 

(c) all other matters with respect to unaccounted for monies being stashed in foreign banks by Indians or other entities operating in India that may arise in the course of such investigations and proceedings. 

It is clarified here that within the ambit of responsibilities described above, also lie the responsibilities to ensure that the matters are also investigated, proceedings initiated and prosecutions conducted with regard to criminality and/or unlawfulness of activities that may have been the source for such monies, as well as the criminal and/or unlawful means that are used to take such unaccounted for monies out of and/or bring such monies back into the country, and use of such monies in India or abroad. The Special Investigation Team shall also be charged with the responsibility of preparing a comprehensive action plan, including the creation of necessary institutional structures that can enable and strengthen the country’s battle against generation of unaccounted for monies, and their stashing away in foreign banks or in various forms domestically; 

(v) That the Special Investigation Team so constituted report and be responsible to this Court, and that it shall be charged with the duty to keep this Court informed of all major developments by the filing of periodic status reports, and following of any special orders that this Court may issue from time to time; 

(vi) That all organs, agencies, departments and agents of the State, whether at the level of the Union of India, or the State Government, including but not limited to all statutorily formed individual bodies, and other constitutional bodies, extend all the cooperation necessary for the Special Investigation Team so constituted and functioning; 

(vii) That the Union of India, and where needed even the State Governments, are directed to facilitate the conduct of the investigations, in their fullest measure, by the Special Investigation Team so constituted and functioning, by extending all the necessary financial, material, legal, diplomatic and intelligence resources, whether such investigations or portions of such investigations occur inside the country or abroad; 

(viii)That the Special Investigation Team also be empowered to further investigate even where charge-sheets have been previously filed; and that the Special Investigation Team may register further cases, and conduct appropriate investigations and initiate proceedings, for the purpose of bringing back unaccounted for monies unlawfully kept in bank accounts abroad.” 

The SIT, inter alia, consists of the Director CBI, Director Enforcement, Director General, Revenue Intelligence and the Director, Financial Intelligence Unit. The judgment of the Supreme Court mandates that all organs, agencies, departments and agents of the State, whether in the Union Government or in the State Governments, shall extend all cooperation necessary to the SIT. Both the Union and the State Governments were directed to facilitate the conduct of the investigations in their fullest measure by extending necessary financial, material, legal and intelligence resources, whether the investigation takes place in India or overseas. The SIT has been duly empowered to investigate even those cases where charge sheets were filed and to register further cases, conduct appropriate investigations and initiate proceedings for bringing back unaccounted money unlawfully kept in bank accounts abroad. 

The income tax raids in respect of the ninth respondent and his alleged associates took place on 27 and 28 November 2014. The public interest petition was filed in this Court on 10 December 2014. On 24 February 2014, the Union Government in the Department of Revenue of the Ministry of Finance called upon the Chief Secretary of the State Government to make available all relevant material and documents that would be necessary for the CBI to carry out an investigation. The letter specifically drew attention to the investigation which was to be conducted in respect of the instances of fraud/corruption and other malpractices alleged against the ninth respondent as Engineer-in-Chief of NOIDA, Greater NOIDA and Yamuna Expressway Authority leading to the amassing of large amounts of unaccounted money. The letter of 24 February 2015 was addressed by the Union Government on the instructions of the SIT on black money which had directed the Director of CBI to take up the investigation in respect of the ninth respondent. The Union Government in addressing the communication was discharging its solemn obligation in terms of the judgment and order of the Supreme Court which required all governmental authorities both at the Central and the State level to cooperate with the SIT. Once instructions have been issued by the SIT in pursuance of which the Director CBI, who is a member of the SIT, is to take up the investigation, the State Government had no option but to comply with the direction. Under Article 142 of the Constitution, the Supreme Court in the exercise of its jurisdiction is empowered to pass such decree or to make such orders as are necessary for doing complete justice in any cause or matter pending before it. Article 144 requires all authorities, civil and judicial in the territory of India to act in aid of the Supreme Court. Under Article 256 of the Constitution, the executive power of every State has to be exercised to ensure compliance with the laws made by Parliament and the executive power of the Union extends to giving such directions as may appear to the Government of India to be necessary for that purpose. The Union Government is enforcing an order of the Supreme Court which casts an obligation both on the Union Government and upon all State Governments to extend their fullest cooperation to secure compliance with the directions of the SIT. The State Government cannot stultify the investigation. 

Faced with a request from the Union Government in the Ministry of Finance, the State Government responded on 6 April 2015. The State Government has evidently elected not to comply with the letter of request made by the Union Government. The matter, in our view, does not rest on a dispute over the powers of the Centre and those of the State. Plainly, that is not the issue here since the only issue is of compliance with the terms of a judgment of the Supreme Court. The State Government sought to justify its stand by adverting to two circumstances, the first being the constitution of a Commission of Inquiry presided over by a former Judge of this Court on 10 February 2015 and the second the pendency of these proceedings. The pendency of these proceedings invoking the jurisdiction in public interest could provide absolutely no basis for declining to comply with the request which was made in terms of the judgment of the Supreme Court. Nor was it open to the State Government to sit in judgment over a request which was made by the SIT in terms whereof the Director CBI was to take over investigation into the allegations of corruption and the amassing of unaccounted money by the ninth respondent. The setting up of a Commission of Inquiry can be no answer for non-compliance with the mandate of the order of the Supreme Court. The pendency of a public interest petition, similarly, could not stand in the way. Admittedly, no interim order was passed by this Court preventing the State Government from discharging its obligations as, indeed, there could have been none, once the Supreme Court had laid down the law on the subject. Hence, we find merit in the submission which was urged on behalf of the petitioner that both the grounds which have weighed with the State Government in addressing its communication on 6 April 2015 are specious and without any legal basis. 

Independent of our conclusion on the first aspect above, the next aspect of the matter is whether the circumstances of the present case require an investigation by the CBI. As we approach this aspect of the matter, we must, at the outset, be conscious of the law on the subject which has been laid down in several judgments of the Supreme Court. Section 3 of the Delhi Special Police Establishment Act, 1946 provides that the Central Government may, by a notification in the official gazette, specify the offences or class of offences which are to be investigated by the Delhi Special Police Establishment. Under Section 5, the Central Government is empowered by order to extend to any area in a State, not being a Union Territory, the powers and jurisdiction of the Delhi Special Police Establishment for the investigation of any offences or classes of offences specified in a notification under Section 3. Section 6, however, provides that nothing contained in Section 5 would be deemed to enable any member of the establishment of the Delhi Special Police Establishment to exercise powers and jurisdiction in any area in a State without the consent of the government of that State. 

A Constitution Bench of the Supreme Court in State of West Bengal Vs Committee for Protection of Democratic Rights, West Bengal10, has held that the power of the High Court under Article 226 is not curtailed or diluted by Section 6: 

“(vii) When the Special Police Act itself provides that subject to the consent by the State, CBI can take up investigation in relation to the crime which was otherwise within the jurisdiction of the State Police, the court can also exercise its constitutional power of judicial review and direct CBI to take up the investigation within the jurisdiction of the State. The power of the High Court under Article 226 of the Constitution cannot be taken away, curtailed or diluted by Section 6 of the Special Police Act. Irrespective of there being any statutory provision acting as a restriction on the powers of the Courts, the restriction imposed by Section 6 of the Special Police Act on the powers of the Union, cannot be read as restriction on the powers of the constitutional courts. Therefore, exercise of power of judicial review by the High Court, in our opinion, would not amount to infringement of either the doctrine of separation of power or the federal structure.” 

At the same time, the Supreme Court has emphasised that the plenitude of the power requires that it should be exercised with caution and circumspection. The circumstances in which the power could be exercised have been held to be exceptional situations where (i) it becomes necessary to provide credibility and instill confidence in investigation; (ii) where an incident may have national and international ramifications or (iii) where an order may be necessary for doing complete justice in enforcing the fundamental rights. The purpose of these restrictions is to ensure that the CBI is not flooded with a large number of cases which, with limited resources, it may find difficult to handle. The observations of the Supreme Court are as follows: 

“Before parting with the case, we deem it necessary to emphasise that despite wide powers conferred by Articles 32 and 226 of the Constitution, while passing any order, the Courts must bear in mind certain self-imposed limitations on the exercise of these Constitutional powers. The very plenitude of the power under the said Articles requires great caution in its exercise. In so far as the question of issuing a direction to CBI to conduct investigation in a case is concerned, although no inflexible guidelines can be laid down to decide whether or not such power should be exercised but time and again it has been reiterated that such an order is not to be passed as a matter of routine or merely because a party has levelled some allegations against the local police. This extraordinary power must be exercised sparingly, cautiously and in exceptional situations where it becomes necessary to provide credibility and instil confidence in investigations or where the incident may have national and international ramifications or where such an order may be necessary for doing complete justice and enforcing the fundamental rights. Otherwise CBI would be flooded with a large number of cases and with limited resources, may find it difficult to properly investigate even serious cases and in the process lose its credibility and purpose with unsatisfactory investigations.” 

In Secretary, Minor Irrigation & Rural Engineering Services, U P Vs Sahngoo Ram Arya11, the Supreme Court observed as follows: 

“…Therefore, it is clear that a decision to direct an inquiry by CBI against a person can only be done if the High Court after considering the material on record comes to a conclusion that such material does disclose a prima facie case calling for an investigation by CBI or any other similar agency, and the same cannot be done as a matter of routine or merely because a party makes some such allegations.” 

These principles have been reiterated in a more recent decision of the Supreme Court in Mohd Haroon Vs Union of India12. In that case, the Supreme Court held that a case for the transfer of investigation to CBI or to an SIT in regard to the riots which took place at Muzaffarnagar was not warranted since the State itself had constituted a Special Investigation Cell. 566 cases were being investigated by the Special Investigation Cell and the Supreme Court was apprised of the fact that 48 registered cases were found to be false. The State apprised the Supreme Court of the measures which were taken. Having due regard to the steps which were taken by the State, facts and figures and statistics supported by material coupled with the principles laid down, the Supreme Court held that there was no need to constitute a SIT or to entrust the investigation to CBI at that juncture. 

In the present case, an important aspect of the matter which merits emphasis is that initially on 13 June 2012, an FIR was lodged in Case Crime No 371 of 2012 under Sections 409, 420, 466, 467, 469, 471 and 120-B of the Penal Code and under Section 13(1)(d) read with Section 13(2) of the Prevention of Corruption Act, 1988 against the ninth respondent and one Ramendra, the then Project Engineer and two construction companies. The allegation in the FIR related to the disbursement of an amount of Rs 954 crores of various departments of Noida in respect of which agreement bonds were executed within a span of eight days. There were various other allegations in regard to the carrying out of work even before the finalization of tenders resulting in a loss to NOIDA. The investigation was transferred by the State Government to the CBCID at the behest of a partner of a construction company which was one of the co-accused on 3 November 2012, following the receipt of a request on 22 October 2012. The Investigating Officer submitted a final closure report on 3 January 2014. The informant R P Singh, who is an Assistant Engineer in NOIDA informed the Court that he had no objection to the acceptance of the closure report and on 27 November 2014 the matter was closed. Incidentally, the income tax raid took place on the same day. The matter has been under investigation by various authorities including the income tax department, the Directorate of Enforcement and the SIT. The allegations against the ninth respondent are not just allegations of personal corruption or of personal aggrandizement. The essence of the allegation is that the ninth respondent has been able to use his personal proximity in the corridors of power with successive governments in State by indulging in corruption, amassing wealth for conferring favours on himself, the members of his family and business associates. The ninth respondent has, it is alleged, been able to shield himself due to his proximity with the corridors of power both in the previous government and the present government in the State of Uttar Pradesh. At this stage, we desist from making a specific mention of the names of political personalities but it would suffice to note that there are serious allegations that the business associates of the ninth respondent and the members of his family are related to persons in the political establishment. The State Government has constituted a Commission of Inquiry on 10 February 2015 following the institution of the PIL on 10 December 2014. The terms of reference of the Commission of Inquiry constituted by the State are (i) whether the promotions which were granted to the ninth respondent at various levels were in accordance with the procedures and criteria prescribed; (ii) whether in the grant of contracts for development to various firms and individuals by the ninth respondent as Chief Engineer, the prescribed procedure and criteria had been observed; (iii) inquiry into the allegations of corruption and misconduct on the part of the ninth respondent; and (iv) apart from the above, any other matter which may be required to be investigated by the Commission either on the directions of the High Court or on reference being made by an authority of the Central Government. 

There are several reasons why the submission of the State, that based on the constitution of a Commission of Inquiry further action be deferred or held in abeyance, cannot be accepted. Firstly, the terms of reference of the Commission of Inquiry are evidently confined to the ninth respondent and ninth respondent alone. The Commission of Inquiry would have no jurisdiction to enquire into wider allegations of the misuse of power or to investigate into the interrelationship of the ninth respondent with other persons in respect of whom there is no reference to the Commission. Secondly, the report of the Commission may or may not be accepted or acted upon by the State Government. A non-binding report of a Commission of Inquiry is no substitute for a proper, fair and objective investigation into alleged criminal offences. The State Government would be under no compulsion of law to accept the report of a Commission of Inquiry. Prosecution for criminal offences cannot be made to depend upon an unbridled exercise of discretion of the executive. Thirdly, by a supplementary notification issued by the State Government on 11 July 2015, the State Government has taken due note of the complexity and scale of the matter by providing that the Economic Offences Wing shall work in coordination with the Chairperson of the Commission of Inquiry. Significantly, even after the State Government had knowledge of the sequence of events commencing from the income tax raids which took place on 27 and 28 November 2014, no serious effort has been made to entrust the investigation to the investigative arm of the State. Even the investigative arm of the State has been subordinated to the Commission of Inquiry. This Court must take note of the effort to protract and stall a credible criminal investigation even after the receipt of the letter of the Union Government on 24 February 2015 drawing attention to serious allegations of corruption and amassing of unaccounted wealth by the ninth respondent. The Court has been informed on affidavit that even the departmental enquiries initiated against the ninth respondent have been deferred and held in abeyance following the constitution of a Commission of Inquiry. Fourthly, the corruption alleged is on a gigantic scale. A complex web of shell companies has been adopted to evade law and to launder the allegedly ill gotten gains. There is a serious case to be probed on whether as alleged the activities of the ninth respondent have benefactors in high places in the State who have been associated through their close relatives and associates with the business dealings of the ninth respondent and his family. In our view, having due regard to the admittedly complex nature of the case, the wide ramifications involving corruption by persons in public offices and the gravity of the allegations required to be probed, a fit and proper case has been made out for investigation by the CBI. 

We have carefully considered the submission that the petition which is based on newspaper reports should not be entertained by the Court. This is not a case where the Court has acted on the basis of newspaper reports. In exercising its jurisdiction under Article 226 of the Constitution, this Court is conscious of the judicious restraints on its power particularly to hand over an investigation to CBI. The material which has come before the Court, including the request which was made by the Union Government in the Ministry of Finance in terms of a request made by the SIT constituted by the Supreme Court, would indicate the gravity and seriousness of the matter and the need to ensure that the investigation is promptly initiated and carried out by an independent agency. The faith in the administration of criminal justice will be shattered if a fair and objective investigation by the CBI is allowed to be thwarted by the kind of ruses adopted in this case. 

Before we conclude, we may advert to a subsidiary aspect of the matter which has been raised in the counter affidavit filed by the ninth respondent. The ninth respondent has drawn the attention of the Court to a public interest petition in Jagdish Narain Shukla Vs State through Principal Secretary Home, Government of U P13 which was disposed of by this Court. The petition as this Court observed in its order raised certain service related issues in respect of the ninth respondent (who was impleaded as the fifth respondent to the earlier proceedings). The principal grievance related to the reinstatement of the ninth respondent and the posting issued to him after the institution of a departmental enquiry and an order of suspension. The Division Bench relied upon the decisions of the Supreme Court in Hari Bansh Lal Vs Sahodar Prasad Mahto14 and in Ashok Kumar Pandey Vs State of West Bengal15 to hold that a public interest petition seeking to raise service related matters is not maintainable. Following these judgments, the writ petition was dismissed on the ground that a PIL in respect of a service matter could not be entertained. The earlier judgment was, therefore, on a clearly different issue. The issue as to whether an investigation by the CBI is warranted, was neither raised nor decided in the earlier decision. 

For these reasons, we allow the petition and direct that the Central Bureau of Investigation shall conduct an investigation into all allegations of corruption and amassing of uncounted money by the ninth respondent and in regard to all transactions, persons and entities connected thereto. 

The petition is accordingly stand disposed of. There shall be no order as to costs. 

16.07.2015 

AHA 

(Dr D Y Chandrachud, CJ) 

(S N Shukla, J) 

सामाजिक कार्यकर्ता डॉ.नूतन ठाकुर से संपर्क : nutanthakurlko@gmail.com rtiforumlucknow1@gmail.com

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मजीठिया वेज बोर्ड पर सुप्रीम कोर्ट का आज का आदेश मीडिया मालिकों के पक्ष में है या मीडियाकर्मियों के? …एक विश्लेषण

: अब जो-जो मीडियाकर्मी राज्य सरकारों द्वारा नियुक्त विशेष श्रम अधिकारी के यहां लिखकर दे देगा कि उसे मजीठिया वेज बोर्ड का फायदा नहीं दिया गया है, उसे लाभ मिलने का रास्ता खुल जाएगा… एक तरह से देखा जाए तो अब उन मीडियाकर्मियों को भी मजीठिया वेज बोर्ड मिलने का रास्ता खुल गया है जिनसे मालिकों ने जबरन किन्हीं कागजों पर साइन करवा लिया है : मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई. देश भर से आए सैकड़ों मीडियाकर्मियों और दर्जनों वकीलों के कारण खचाखच भरे कोर्ट रूम में जजों ने आदेश दिया कि प्रत्येक राज्य सरकारें हर मीडिया हाउस में लेबर इंस्पेक्टर भेजें और पता कराएं कि वहां मजीठिया वेज बोर्ड की रिपोर्ट लागू हुई या नहीं. पूरी रिपोर्ट तैयार करके तीन महीने के भीतर सुप्रीम कोर्ट में जमा करें. इस आदेश के बाद कुछ मीडियाकर्मी प्रसन्न नजर आए तो कुछ निराश.

निराश खेमे के मीडियाकर्मियों का कहना है कि यह तो फिर से इंस्पेक्टरों पर भरोसा करने जैसी बात हुई. लेबर इंस्पेक्टर और राज्य सरकारें हमेशा से मीडिया मालिकों की पक्षधर रही हैं और उन्हीं के अनुकूल रिपोर्ट बनाती हैं. ऐसा आदेश देकर सुप्रीम कोर्ट ने मीडिया मालिकों को बच निकलने का मौका दिया है. वहीं जो खेमा सुप्रीम कोर्ट के आदेश से प्रसन्न है, उसका कहना है कि कोर्ट ने सब कुछ अब भी अपने हाथ में रखा है. यानि लेबर इंस्पेक्टर जो भी रिपोर्ट राज्य सरकार को देगा और राज्य सरकार उसे सुप्रीम कोर्ट के हवाले करेगी, उस रिपोर्ट को सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज करना का विकल्प बचा हुआ है. अगर रिपोर्ट गलत हुई और केवल खानापूरी की गई वाली रिपोर्ट भेजी गई तो सारे पत्रकार और उनके वकील सुप्रीम कोर्ट में तीन महीने बाद रिपोर्ट को चैलेंज कर पाएंगे. इसलिए अभी निराश होने जैसी कोई स्थिति नहीं है.

सुप्रीम कोर्ट के पास किसी आदेश को खुद इंप्लीमेंट करने का अधिकार तो है नहीं. इंप्लीमेंटेशन तो इन्हीं राज्य सरकारों और संबंधित विभागों को कराना है. ऐसे में अगर सुप्रीम कोर्ट अपने नियंत्रण में मामले को रखकर इंप्लीमेंटेशन के बारे में रिपोर्ट देने के लिए राज्य सरकारों से कहा है तो यह पत्रकारों के हित में ही है. मीडियाकर्मी अब श्रम विभाग और राज्य सरकारों को घेर सकने की स्थिति में है कि वह सही तरीके से रिपोर्ट बनवाएं और जिन्हें अब तक मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से पैसा नहीं मिला है, उन्हें पैसा दिलवाएं.

उधर, सुप्रीम कोर्ट में मीडियाकर्मियों की तरफ से दायिर याचिका को रिप्रजेंट करने वाले वरिष्ठ वकीलों ने अपनी अलग बैठक की. इन लोगों ने मीडिया मालिकों की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में पेश किए जा रहे दावों और वेज बोर्ड के आधे-अधूरे अनुपालन के संबंध में अपनी रणनीति बनाई. सुप्रीम कोर्ट पहुंचे मीडियाकर्मियों ने भी कोर्ट के आदेश के बाद सुप्रीम कोर्ट के लॉन में बैठक की और कोर्ट के फैसले के सभी पहलुओं पर चर्चा की. उधर, कानाफूसी ये भी है कि सुप्रीम कोर्ट के जजों पर मीडिया मालिकों की तरफ से भारी दबाव है. ये दबाव मामले को रफा-दफा करने और मीडिया मालिकों को जेल न भेजने की है. लोगों के बीच चर्चा है कि अगर सुप्रीम कोर्ट अवमानना के मामले में सुब्रत राय को इतने लंबे समय तक जेल में बंद रख सकता है तो मीडिया मालिकों के अवमानना करने पर उन्हें दंडित करने के बजाय गेंद इधर-उधर दूसरे पाले में क्यों डाल रहा. फिलहाल मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर जितने मुंह उतनी बातें हैं. सुप्रीम कोर्ट के ताजे फैसले से कुछ राहत मीडिया मालिकों को मिली है तो कुछ निराशा मीडियाकर्मियों को हुई है.

भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट का ताजा आदेश अंतत: मीडियाकर्मियों की एकजुटता बढ़ाएगा और मीडिया मालिकों के खिलाफ आक्रोश को जगह-जगह स्वर देगा. अब हर प्रदेश की सरकारों और हर प्रदेश में श्रम विभाग के अफसरों को घेरा जाएगा, दबाव बनाया जाएगा, उनकी कार्यप्रणाली पर नजर रखा जाएगा ताकि कोई भी असत्य और गलत रिपोर्ट न तैयार कर सके. इसके लिए आरटीआई से लेकर लोअर कोर्टों तक का सहारा लिया जाएगा. साथ ही हर प्रदेश मुख्यालय पर पत्रकारों के बड़े आंदोलन का आयोजन किया जाएगा जिससे पूरा मसला सत्ता तंत्र तक प्रमुखता से पहुंचे और मीडियाकर्मियों को न्याय मिले.

यशवंत का कहना है कि तीन महीने के बाद सब कुछ फिर सुप्रीम कोर्ट में जाना है इसलिए निराश होने की कतई जरूरत नहीं है. इन तीन महीने में राज्य सरकारों और श्रम विभाग के चरित्र की भी पहचान हो जाएगी. इसलिए सभी पत्रकार साथी अब अपने अपने राज्य में जाकर वहां के मजीठिया के लिए लड़ने वाले पत्रकारों को एकजुट करें और श्रम विभाग के दफ्तरों के सामने धरना प्रदर्शन की तैयारी शुरू करें. साथ ही प्रदेश सरकार के मंत्रियों व मुख्यमंत्री तक अपनी आवाज पहुंचाने की व्यवस्था करें. इसके लिए सभी मीडिया संगठनों को भी सक्रिय हो जाना चाहिए. यशवंत के मुताबिक श्रम विभाग को सीधे सुप्रीम कोर्ट को रिपोर्ट करना है, इसलिए मामला अब भी पूरी तरह हम मीडियाकर्मियों के पक्ष में है. श्रम विभाग के अफसरों को अपनी नौकरी की चिंता ज्यादा है, इसलिए वे मालिकों या सरकारों के दबाव में कतई नहीं आएंगे. वे हर हाल में सही रिपोर्ट बनाने के लिए मजबूर होंगे क्योंकि रिपोर्ट पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होनी है और रिपोर्ट के प्वाइंट्स पर सुप्रीम कोर्ट में चर्चा होगी. अगर रिपोर्ट गलत साबित हुई तो संबंधित अफसर की छुट्टी तय है. इसलिए सुप्रीम कोर्ट का ताजा आदेश आम मीडियाकर्मियों के हित में ही है.

भड़ास के एडिटर के मुताबिक विशेष श्रम अधिकारी नियुक्त कर तीन महीने में स्टेटस रिपोर्ट देने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अब राज्य सरकारों और श्रम विभाग को फूंक-फूंक कर कदम रखना पड़ेगा क्योंकि श्रम अधिकारी की रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट के हवाले की जानी है जिस पर चर्चा होनी है. रिपोर्ट में अगर थोड़ा भी मेनुपुलेशन दिखा तो विशेष श्रम अधिकारी को लेने के देने पड़ सकते हैं. इसलिए माना जा रहा है कि अब जो-जो मीडियाकर्मी विशेष श्रम अधिकारी के यहां लिखकर दे देगा कि उसे मजीठिया वेज बोर्ड का फायदा नहीं मिला है, उसे फायदा मिलने का रास्ता खुल जाएगा. एक तरह से देखा जाए तो अब उन मीडियाकर्मियों को भी मजीठिया वेज बोर्ड मिलने का रास्ता खुल गया है जिनसे मालिकों ने जबरन किन्हीं कागजों पर साइन करवा लिया है. 

मूल खबर:

मजीठिया पर सुप्रीम कोर्ट का ताजा आदेश- राज्य सरकारें तैनात करें विशेष श्रम अधिकारी, तीन माह में स्टेटस रिपोर्ट दें

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मजीठिया पर सुप्रीम कोर्ट का ताजा आदेश- राज्य सरकारें तैनात करें विशेष श्रम अधिकारी, तीन माह में स्टेटस रिपोर्ट दें

SC orders state labour commissioners to submit Majithia wage boards implementation report in 3 months

नई दिल्ली : मंगलवार 28 अप्रैल को मजीठिया वेतनमान से संबंधित मामलों में सुप्रीम कोर्ट में आज बहस हुई। वरिष्ठ वकील कोलिन गोंजाल्विज, परमानंद पांडे, उमेश शर्मा ने जबर्दस्त दलीलें पेश कीं। करीब 45 मिनट की बहस के बाद न्यायाधीश रंजन गोगोई की खंडपीठ ने राज्य सरकारों को आदेश दिया कि वे एक महीने में एक विशेष श्रम अधिकारी की नियुक्ति करें। यह विशेष अधिकारी नियुक्ति के तीन महीने के भीतर मजीठिया वेज क्रियान्वयन की रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को देगा। सुप्रीम कोर्ट में अगली सुनवाई राज्यों के विशेष श्रम अधिकारियों की रिपोर्ट मिलने के बाद ही होगी। 

उल्लेखनीय है कि मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को लागू कराने और सुप्रीम कोर्ट की अवमानना की तीस याचिकाओं पर पिछले माह मार्च में सुनवाई हुई थी। वे सभी नए मामले थे। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट को आभास हो गया था कि मालिक असंगठित कर्मचारियों का हक मारने के लिए रोज अब नए हथकंडे अपना रहे हैं। अखबार मालिक केस को लंबा खींचना चाहते हैं। गौरतलब है कि 13 मई से 28 जून तक सुप्रीम कोर्ट में अवकाश रहेगा।

मंगलवार को आज आठ नंबर अदालत में आइटम नंबर 2 के तहत सूचीबद्ध मजीठिया से संबंधित मामलों में सबसे अधिक दैनिक भास्‍कर के रमेश चंद्र अग्रवाल के खिलाफ 18 मामले, दैनिक जागरण के संजय गुप्‍ता और महेंद्र मोहन गुप्‍ता के खिलाफ 11 मामले, प्रभात खबर के खिलाफ एक मामला, इंडियन एक्‍सप्रेस के खिलाफ तीन मामले, राजस्‍थान पत्रिका के खिलाफ छह मामले और हिंदुस्तान के खिलाफ तीन मामले हैं। दायर मामलों में एक केस नंबर 570 ऑफ 2014 टाइम्‍स ऑफ इंडिया के प्रबंधन के खिलाफ है। इस पर भी आज सुनवाई हुई। 

आज के फैसले पर यह विश्लेषण भी पढ़ें:

मजीठिया वेज बोर्ड पर सुप्रीम कोर्ट का आज का आदेश मालिकों के पक्ष में है या मीडियाकर्मियों के? …एक विश्लेषण

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भास्कर ने शोलापुर से रांची तबादला किया तो हेमंत कोर्ट से स्टे ले आए

भास्कर समूह डीबी कार्प को उसके इंप्लाई हेमंत चौधरी ने तगड़ा सबक सिखाया है. मजीठिया वेज बोर्ड के लिए सुप्रीम कोर्ट जाने वाले भास्कर के मीडियाकर्मी हेमंत चौधरी को प्रबंधन ने प्रताड़ित करना शुरू कर दिया था. सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट उमेश शर्मा के माध्यम से मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर अवमानना याचिका लगाने वाले हेमंत चौधरी का पिछले दिनों भास्कर प्रबंधन ने शोलापुर से रांची तबादला कर दिया.

यह तबादला परेशान करने की नीयत से किया गया था ताकि वह मजबूरन दूर जाकर नौकरी करने की जगह नौकरी से इस्तीफा दे दें या फिर प्रबंधन के कदमों में झुक जाएं और याचिका वापस ले लें. पर हेमंत चौधरी ने झुकने की जगह लड़ना पसंद किया. उन्होंने एडवोकेट उमेश शर्मा की सलाह के बाद एक स्थानीय वकील से स्टे के लिए याचिका तैयार कराई व कोर्ट में लगा दिया. उन्होंने याचिका में सुप्रीम कोर्ट में केस लगाए जाने और केस लगाने पर प्रताड़ित करने के मकसद से तबादला किए जाने का उल्लेख किया. हेमंत ने महाराष्ट्र के इंडस्ट्रियल कोर्ट में याचिका दायर कराई. कोर्ट ने पूरे मामले का गहराई से अध्ययन करने के बाद उनके ट्रांसफर पर स्टे आर्डर दे दिया यानि उनके तबादले पर रोक लग गई है.

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मजीठिया वेज बोर्ड संघर्ष : सुप्रीम कोर्ट के सख्त रुख से जागरण के वकील कपिल सिब्बल कुछ न बोल पाए

नई दिल्‍ली । सुप्रीम कोर्ट नंबर आठ। केस नंबर 411 ऑफ 2014 एवं अन्‍य। पहले लगा कि इस बार भी दैनिक जागरण की ओर से वरिष्‍ठ वकील पीपी राव पैरवी के लिए आएंगे। लेकिन हैरानी हुई कि इस बार पीपी राव की जगह कपिल सिब्‍बल 411 की पैरवी के लिए प्रबंधन की ओर से हाजिर हुए। लेकिन अफसोस इस बार भी अदालत का रुख पहले ही जैसा था।

अदालत में समय पर जवाब न दे पाने पर कपिल सिब्‍बल बोल रहे थे और समय की मांग कर रहे थे. इसी बीच न्‍यायमूर्ति रंजन गोगोई ने उन्‍हें साफ कर दिया कि इस बार वे प्रबंधन को समय दे रहे हैं और आप सब मिलकर एक तारीख तय कर लीजिए, और उस दिन मामले की सुनवाई होगी। इसके बाद सुनवाई की तारीख में कोई बदलाव नहीं होगा और अगर उस दिन भी प्रबंधन की ओर से जवाब दाखिल नहीं किया गया या कोई ना नुकुर किया गया तो उन पर भारी कॉस्‍ट आयद की जाएगी।

इसके बाद दोनों तरफ के वकीलों में बातचीत शुरू हुई। कई तारीख पर बातचीत हुई लेकिन अंत में 28 अप्रैल की तारीख तय हो गई। आज की सुनवाई की सबसे खास बात यह रही कि सभी मालिक अपनी ओर से भरी भरकम वकीलों को ले आए। जागरण की तरह ही सभी को लग रहा है कि उन्‍हें यह केस उनका फैक्‍ट नहीं बल्कि ”फेस और फीस” जिता देगा।

एक बानगी देखिए। दैनिक जागरण के वकील श्री कपिल सिब्‍ब्‍ल। पता नहीं पीपी राव को प्रबंधन इस बार क्‍यों नहीं लाया। लगता है राव केस देखते ही प्रबंधन के कारनामों के बारे में समझ गए। अब अगर आज के हालात को देखा जाए तो सिब्‍ब्‍ल पिछली सुनवाई की तरह बस एक तारीख ही ले पाए और वह भी अदालत की चेतावनी के साथ। अब कपिल सिब्‍ब्‍ल के बाद अपने पाप छिपाने के लिए किसको लाएगा प्रबंधन, यह देखना है।

इसी तरह एचटी की ओर से अभिषेक मनु सिंघवी थे। इसके अलावा दूसरे मालिकों की ओर से गोपाल आनंद और अनिल दीवान जैसे दिग्‍ग्‍ज वकील खड़े थे। लेकिन ये सारे वकील दिग्‍ग्‍ज जरूर हैं पर प्रबंधन और मालिकों ने जो किया है, वह अदालत से छिप नहीं सकता। कानून के घर में देर है, अंधेर नहीं। आज तक के अदालत के आदेश इसकी पुष्टि हो रही है। बस हमें अपने दीपक को जलाए रखना है, उनका सूरज डूबने वाला है। फिर तो उनके लिए अंधेरा ही अंधेरा है।

फेसबुक पर सक्रिय ‘मजीठिया मंच’ नामक पेज से साभार.

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इंदौर प्रेस क्लब के खिलाफ कुर्की के आदेश जारी

इंदौर के अष्टम अपर जिला न्यायाधीश ने इंदौर प्रेस क्लब के खिलाफ 16 लाख 37000 हज़ार रुपए की डिक्री के आदेश दिए हैं। कोर्ट ने ये आदेश शरदचंद जैन की और से दायर मामले पर दिए हैं। मामले के मुताबिक शरदचंद जैन ने अपनी फर्म ‘सुदर्शन टीवी चैनल’ के ऑफिस के लिए इंदौर प्रेस क्लब के प्रस्तावित बहुमंजिला भवन में तीन प्रकोष्ठों के लिए 13 नवंबर 2010 से मई 2011 के बीच 12 लाख रुपए का भुगतान किया था। बाद में शरदचंद जैन को पता चला कि इंदौर प्रेस क्लब ने उक्त भवन का निर्माण अवैध रूप से किया है। जमीन प्रेस क्लब की नहीं है। भवन निर्माण के नक़्शे को भी इंदौर नगर निगम ने अनुमति नहीं दी है और प्रेस क्लब ने अन्य जरूरी अनुमतियाँ भी विभिन्न विभागों से प्राप्त नहीं की है। 

ये जानकारी मिलने के बाद शरदचंद जैन ने इंदौर प्रेस क्लब को सूचना पत्र भेजकर अदा किए गए रुपयों की वापसी की मांग की! इस बारे में प्रेस क्लब को कई बार सूचित भी किया गया, लेकिन रुपए नहीं लौटाए गए। 16 अप्रैल 2014 अंतिम नोटिस देकर 5 दिन में 12 लाख रुपए ब्याज सहित लौटने के लिए कहा गया! इसके बाद शरदचंद जैन ने इंदौर प्रेस क्लब के अध्यक्ष (प्रवीण खारीवाल) के खिलाफ मुकदमा दायर कर दिया। अष्टम अपर जिला न्यायाधीश ने 22 नवंबर 2014 को पारित आदेश में इंदौर प्रेस क्लब (तर्फे प्रवीण पिता दौलत सिंह खारीवाल) के खिलाफ ब्याज समेत 16 लाख 37,000 रुपए अदा करने का आदेश दिया है। उल्लेखनीय है कि शरदचंद जैन के मुताबिक उनके द्वारा दिए गए चेक से धनराशि प्रेस क्लब के तत्कालीन कोषाध्यक्ष आलोक ठक्कर और अध्यक्ष प्रवीण खारीवाल के दस्तखत से आहरित की गई थी। इंदौर प्रेस क्लब के इस विवादास्पद और कथित अवैध भवन से संबंधित एक मामला मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ में भी विचाराधीन है। उल्लेखनीय है कि इस कथित प्रेस क्लब भवन के निर्माण के लिए कई मंत्रियों, सांसदों और विधायकों ने अपनी निधि से हिस्सा दिया है।

कोर्ट के आदेश को आप इस लिंक पर क्लिक करके डाउनलोड कर सकते हैं / पढ़ सकते हैं : https://bhadas4media.com/pdf/SJain.pdf

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एचटी मैनेजमेंट के खिलाफ ऐतिहासिक जीत, हाईकोर्ट ने 272 एचटी कर्मचारियों को काम पर रखने का आदेश दिया

एक ऐतिहासिक फैसला आया है. हिंदुस्तान टाइम्स प्रबंधन की मनमानी के खिलाफ लड़ रहे 272 मीडियाकर्मियों को न्याय मिल गया है. दिल्ली हाईकोर्ट ने इन 272 कर्मियों को फिर से काम पर रखने का आदेश हिंदुस्तान टाइम्स प्रबंधन को दिया है. कोर्ट के पूरे आदेश को इस लिंक पर क्लिक करके पढ़ा जा सकता है: goo.gl/b2KE9i

दिल्ली यूनियन आफ जर्नलिस्ट्स ने इस ऐतिहासिक जीत पर कर्मियों को बधाई दी है. डीयूजे की तरफ से जारी प्रेस रिलीज इस प्रकार है….

DUJ welcomes historic Delhi High Court judgement on Hindustan Times Workers Case

The Delhi Union of Journalists welcomes the judgement of the Delhi High Court reinstating the 272 workers of the Hindustan Times. The DUJ congratulates the 272 brave workers of the Hindustan Times Ltd for their historic victory against the management. Justice Suresh Kait has termed their retrenchment arbitrary, upheld the earlier judgement of the Industrial Tribunal and granted them reinstatement in service with back wages for the past nine years.

The Tribunal had on January 23, 2012 ordered reinstatement of the workers but the Hindustan Times management chose to drag its feet on the issue, seeking to divide the workers and evade the order. The High Court order of Nov. 17, 2014 not only upholds the Industrial Tribunal order but in addition clarifies that full back wages must be paid.

The order says, “reinstatement with full back wages is the proper relief to which the workmen are entitled, especially when their termination from services nine years back was based on a fictitious/sham transaction.”

It also says, “In case the relief of back wages is denied to the workmen, it would tantamount to placing a premium on the fraudulent conduct of the management which by its order of dismissal has virtually deprived hundreds of workmen of right to life and livelihood.”

Further the order states, “It is pertinent to point out here that 13 workmen have already died while fighting for their rights. Some of them if reinstated today had substantial remaining period of service. Several workmen had lost their family members as they did not have the necessary financial assistance or support to seek medical remedies.”

While hailing the verdict the Delhi Union of Journalists demands that the Hindustan Times management provide immediate relief to the workers by reinstating them and paying them their back wages. The DUJ thanks senior advocate Colin Gonsalves for his stellar role in fighting for the workers’ rights. 

The judgement, the DUJ believes, will strengthen the workers’ resolve to struggle for implementation of their rights. It will also provide hope to the retrenched journalists and other workers who are fighting several court battles against the Hindustan Times management.

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महिला मेकअप आर्टिस्ट पर प्रतिबंध गैरकानूनी : कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने देश की फिल्म इंडस्ट्री में महिला मेकअप आर्टिस्ट पर 59 साल से जारी प्रतिबंध को गैरकानूनी बताया है। जस्टिस दीपक मिश्र और यू.यू. ललित ने भारतीय फिल्म उद्योग में लैंगिक असमानता को असंवैधानिक करार दिया। अदालत ने कहा, ‘हम 2014 में हैं, न कि 1935 में। इस भेदभाव को एक दिन के लिए भी नहीं चलने दिया जा सकता।’

भारतीय फिल्म उद्योग दुनिया के सबसे बड़े फिल्म और टीवी उद्योगों में से एक है। जनवरी 2013 में नौ महिलाओं ने सर्वोच्च अदालत में इस संबंध याचिका दायर की थी। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, ‘इस तरह का भेदभाव कैसे किया जा सकता है। हम इसकी इजाजत नहीं दे सकते हैं। हमें ऐसा कोई कारण नजर नहीं आता जिसके आधार पर प्रशिक्षित महिला मेकअप आर्टिस्ट को प्रतिबंधित किया जाए।’

अदालत ने सिने कॉस्टय़ूम मेकअप आर्टिस्ट एंड हेयर ड्रेसर एसोसिएशन से कहा कि या तो वे महिला मेकअप आर्टिस्ट पर से इस प्रतिबंध को हटाए अन्यथा अदालत इस संबंध में आदेश जारी करेगी। अदालत ने यूनियन को इस मामले में प्रतिक्रिया देने के लिए एक हफ्ते का समय दिया। मामले की अंतिम सुनवाई 17 नवंबर को होगी।

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