जब नीतीश कुमार के कंधे पर हाथ रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार की कलाई को सेक्युरिटी वाले ने जमकर मरोड़ दिया था…

Gunjan Sinha : मोदी जी को बहुत धन्यवाद, उन्होंने धीरुभाई अम्बानी, जिनकी जीवन-गाथा और चालाकियों पर ‘गुरु’ जैसी फिल्म बनी, अभिषेक बच्चन की, जिसके बाद शायद अरविन्द अदिगे को बलराम हलवाई को भी भारत का हीरो बनाने में कोई नैतिक दिक्कत नहीं हुई, उन धीरुभाई को भी मरणोपरांत पद्म विभूषण देकर अपना कर्ज एक पुश्त ऊपर तक उतार दिया है. अब भले बेवकूफ कहते रहें कि रतन टाटा को क्यों नही? बीडी शर्मा साहब को क्यों नही? उस भले अनजान बूढ़े को क्यों नही जो तीस वर्षों अपनी पूरी तनखाह गरीब बच्चों की स्कूल फी के लिए देता रहा? उस सब्जी बेचनेवाली को क्यों नहीं जिसने कोलकता में अस्पताल बना दिया? गधो बकते रहो.

उन्होंने दे दिया और मैंने धीरू भाई को बधाई भी दे दी. औकात है तो वापस लेकर दिखाओ.. और जलनेवालो एक बात बताओ, इधर मुंबई में एक अस्पताल का उदघाटन खुद मोदी ने किया था, उसमे किसी ने खुद प्रधानमंत्री की पीठ पर हाथ रख कर पूरे देश और सरकार को एक सन्देश दिया था, (ये प्रोटोकाल क्या होता है?, चुप रहो) – तो जी. जो आदमी पीएम की पीठ पर हाथ रखता है, क्या उसके पूज्य पिता जी, जिन्हें देश का बच्चा बच्चा पहचानता है, क्या वे एक अदद पदम विभूषण के लायक भी नही हैं? और अगर ये इतना ही महान कोई तमगा है, तो ऐसे किन्ही तीन लोगों के नाम याद से बता दो, जिन्हें पिछले साल मिला था? – नही न याद है? कौन याद रखता है यार! दे लेने दो जिसे उनका मन करे. क्या फर्क पड़ता है? दे ले भाई, कांग्रेसियों ने भी ऐसे ही दिए थे, आप भी दे लें..

देश का पीएम, देश का पीएम होता है. सिवाय उसकी माँ के किसी को हक नही, औकात नही, कि इस महान देश के पीएम की पीठ पर हाथ रख सके. कैसे रख दिया? और किसी ने रोका नही/ एक बार, पटना में सीएम नीतीश कुमार के साथ बात करते एक बड़े पटनहिया पत्रकार चल रहे थे. सीएम से करीबपना दिखाने के लिए उन्होंने नीतीश जी के कंधे पर हाथ रख दिया. ठीक पीछे चल रहे सुरक्षा गार्ड ने, कहा कुछ नही, चुपचाप उनका कोमल हाथ अपने सिपहिया हाथ से पकड़ा और कंधे से हटाते हुए ऐंठ कर अपने सामने दबा लिया. सभी यूँ चलते रहे जैसे कुछ हुआ ही नहीं.

पत्रकार साहब अंह-उन्ह करते रहे. लाजे कुछ बोले नहीं, इसलिए कि तेज-निगह नीतीश माजरा समझ रहे थे. वे गार्ड की तरफ एक बार देख भी लेते तो वह पत्रकार साहब का कसमसाता हाथ छोड़ देता. लेकिन उन्होंने महटिया दिया. साथ चल रहे पत्रकारों, अफसरों के झुण्ड – सब ने अपने कारणों से न देखने का नाटक किया. हाथ उस गार्ड ने तभी छोड़ा जब सभी लोग अलग होने लगे और अब दिख जाता. एक सीएम का गार्ड जब इतने बढ़िया तरीके से रोक सकता है, तो पीएम के प्रोटोकाल/सेक्युरिटी अफसर क्या कोदो देके भर्ती हुए हैं? उन्ही के भरोसे पीएम की सुरक्षा और प्रोटोकाल? और प्रोटोकाल पीएम का नही देश का होता है. उसे तोड़ने का हक पीएम प्रेसिडेंट को भी नही है.

वरिष्ठ पत्रकार गुंजन सिन्हा के फेसबुक वॉल से.

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