मोदी और नीतीश जैसों ने हर स्तर पर लोकतंत्र का बैंड बजा रखा है…

Pushya Mitra : मनोहर पर्रिकर और राजनाथ सिंह जैसे ताकतवर मंत्रियों का राज्य में मुख्यमंत्री की कुर्सी थामने के लिये उतावलापन बता रहा है कि हाल के दिनों में किस तरह बहुत तेजी से सत्ता का केंद्रीकरण हो रहा है। PMO और CMO जैसी संस्थाओं में आजकल पूरी सरकार केंद्रित हो जा रही है। सारा काम वहीँ से निर्देशित हो रहा है। मंत्रियों के पास अब कोई काम नहीं रहा है, फाइलों पर दस्तखवत करने के सिवा। उनके पास अब इतना ही पॉवर रहा है कि अपने कुछ लोगों को लाभ दिला सकें। कुछ टेंडर वगैरह पास करवा सकें।

जानिए पटना का एक बेबाक पत्रकार क्यों है नीतीश कुमार का मुरीद

Pushya Mitra : नीतीश कुमार की एक बात मुझे पसंद है. वे कल्चर ऑफ डिनायल से काफी हद तक उबर चुके हैं. पहले तो बड़ी घटनाओं के बाद हफ्तों मौन रह जाते थे, (जैसे आजकल मोदी करते हैं) मगर अब वे फेस करते हैं और कार्रवाई करते हैं चाहे दूसरी तरफ अपनी ही साख दाव पर क्यों न लगी हो. गोपालगंज वाले कांड में प्रशासन ने लीपापोती की पूरी तैयारी कर ली थी, फरजी पोस्ट मार्टम रिपोर्ट भी बन गये थे. मगर यह नीतीश का ही स्टैंड था कि अधिकारियों को यू-टर्न लेना पड़ा और आज पूरा थाना सस्पेंड हो गया है.

सियासत के मामले में मोदी की स्टाइल को कॉपी कर रहे हैं नीतीश कुमार!

अजय कुमार, लखनऊ

2014 के लोकसभा चुनाव के समय गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने के लिये जो रास्ता चुना था, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव में जीत हासिल करने के लिये उसी राह पर थोड़े से फेरबदल के बाद आगे बढ़ते दिख रहे हैं। मोदी ने जहां गुजरात मॉडल को आगे बढ़ाते हुए कांग्रेस मुक्त भारत का नारा दिया था, वहीं नीतीश कुमार संघ मुक्त भारत, शराब मुक्त समाज की बात कर रहे हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव के समय पूरे देश में मोदी और उनके गुजरात मॉडल की चर्चा छिड़ी थी, जिसका मोदी को खूब फायदा मिला था।

जब नीतीश कुमार के कंधे पर हाथ रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार की कलाई को सेक्युरिटी वाले ने जमकर मरोड़ दिया था…

Gunjan Sinha : मोदी जी को बहुत धन्यवाद, उन्होंने धीरुभाई अम्बानी, जिनकी जीवन-गाथा और चालाकियों पर ‘गुरु’ जैसी फिल्म बनी, अभिषेक बच्चन की, जिसके बाद शायद अरविन्द अदिगे को बलराम हलवाई को भी भारत का हीरो बनाने में कोई नैतिक दिक्कत नहीं हुई, उन धीरुभाई को भी मरणोपरांत पद्म विभूषण देकर अपना कर्ज एक पुश्त ऊपर तक उतार दिया है. अब भले बेवकूफ कहते रहें कि रतन टाटा को क्यों नही? बीडी शर्मा साहब को क्यों नही? उस भले अनजान बूढ़े को क्यों नही जो तीस वर्षों अपनी पूरी तनखाह गरीब बच्चों की स्कूल फी के लिए देता रहा? उस सब्जी बेचनेवाली को क्यों नहीं जिसने कोलकता में अस्पताल बना दिया? गधो बकते रहो.

इंटरव्यू के लिए ‘पहले मैं पहले मैं’ के चक्कर में नीतीश कुमार के सामने आपस में ही भिड़ गए न्यूज चैनल वाले

मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार के आवास सात सर्कुलर रोड इलेक्‍ट्रानिक मीडिया के लिए आपसी युद्ध का अखाड़ा बन गया। मीडिया वालों की आपसी तू-तू मैं-मैं इतनी तेज थी कि दर्शकों की भीड़ जमा हो गयी। यह सब हंगामा प्रदेश अध्‍यक्ष वशिष्‍ठ नारायण सिंह और नीतीश के पिछले कार्यकाल के सुपर सीएम माने जाने वाले सांसद आरसीपी सिंह के समक्ष हो रहा था। शपथ ग्रहण के बाद नीतीश कुमार का पहला प्रेस कॉन्‍फ्रेंस करीब सात बजे आयोजित था।