हरिद्वार का सच : इतने सारे बड़े बड़े अरबपति खरबपति बाबा और ठोस काम एक भी नहीं… भगवा पहन कर बस हवा हवाई!

(सुशील उपाध्याय)

Sushil Upadhyay : मेरे ऐबी-मन की बेचैनी सुनिए…. मैं धर्मनगरी हरिद्वार में रहता हूं, लेकिन मेरे विचार इस शहर के चरित्र से भिन्न हैं। कोशिश करके देख ली, कोई जुड़ाव नहीं बन पाता। ये आचार्यों, धर्माचार्यों, शंकराचार्यों, परमाध्यक्षों, महंतों, श्रीमहंतों, मंडलेश्वरों, महामंडलेश्वरों, आचार्य महामंडलेश्वरों, मठाचार्यों, स्वामियों, महाराजों, संतों, श्रीसंतों, बाबाओं, नागाओं, उदासीनों, विरक्तों, साधुओं की नगरी है। आप चाहें तो इस सूची में भिखारियों को भी जोड़ सकते हैं। हर आठवें-पंद्रहवें दिन यह शहर किसी न किसी धार्मिक मेले, ठेले, सत्संग, धर्मोत्सव, जन्मोत्सव, वार्षिकोत्सव, अवतरण-दिवस और संत-महाप्रयाण का साक्षी बनता रहता है। सुबह-सवेरे शंख-ध्वनि, घंटे-घडि़यालों और यज्ञ-हवियों की धूम से एक ऐसा माहौल बनता है कि मेरे जैसा सांसारी अपनी अपात्रता पर जार-जार रोता है।

मन को खूब रोकता-टोकता और बरजता हूं कि धर्म के मामलों से अपने ऐबी-चरित्र को अलग रखना चाहिए, पर जेहन में कोई न कोई सवाल उठता रहा है और बेचैनी बढ़ती जाती है। ताजा सवाल ये है कि जिस शहर में पद्मभूषण स्वामी सत्यमित्रानंद, पूर्व केंद्रीय मंत्री स्वामी चिन्मयानंद, एक और पूर्व केंद्रीय मंत्री सतपाल महाराज, आचार्य महामंडलेश्वर अवधेशानंद गिरि, शंकराचार्य राजराजेश्वराश्रम जैसे संत रहते हों, पायलट बाबा जैसे प्रभावशाली लोगों का ठिकाना यहां हो, वो शहर जौलीग्रांट और एसजीआरआर जैसे एक अदद मेडिकल काॅलेज के लिए तरस रहा है। इन दोनों संस्थाओं का नाम इसलिए लिया, क्योंकि इन मेडिकल कालेजों की स्थापना संतों द्वारा की गई है।

मेरे खुराफाती दिगाम में लगातार यह बात बनी हुई है कि तमाम दिग्गज संतों ने हरिद्वार के शैक्षिक-बौद्धिक, सामाजिक-आर्थिक जीवन में क्या योगदान किया है ? लोग कह सकते हैं कि संतों का काम तो धार्मिक-आध्यात्मिक है! मैं, इस तर्क को स्वीकार करते खुद से पूछता हूं कि क्या करोड़ों रुपये का आश्रम खड़ा करना और लाखों रुपये कीमत की गाड़ी का इस्तेमाल करना भी धार्मिक-आध्यामिक गतिविधि है ? मेरे पास यह अधिकार नहीं कि मैं सतों के निजी जीवन और ऐश्वर्य पर कोई टिप्पणी करूं, लेकिन शहर का बाशिंदा होने के नाते ये जानने का हक तो है कि वे स्वामी श्रद्धानंद और श्रीराम शर्मा आचार्य-प्रणव पंडया की तरह कोई बड़ी शैक्षिक संस्था ही इस शहर को क्यों नहीं दे जाते! कोई मेडिकल यूनिसर्सिटी, कोई टेक्नीकल यूनिवर्सिटी, कोई इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी या कोई वैदिक यूनिवर्सिटी ही खड़ी करके दिखा देते। साहित्य, संस्कृति के क्षेत्र में कोई अंतरराष्ट्रीय स्तर का पुरस्कार-सम्मान आरंभ कर देते या किसी विदेशी भक्त को प्रेरित कर देते कि हरिद्वार में कुछ अनूठा काम कर दे ताकि लोगों की जिंदगी कुछ बेहतर हो सके।

इस प्रसंग में बाबा रामदेव का नाम लेना कई लोगों को नहीं रुचेगा, उन पर तमाम सवाल खड़े किए जा सकते हैं, लेकिन एक बात के लिए तो उनकी तारीफ की जानी चाहिए कि उन्होंने योग और आयुर्वेद को इंडस्ट्री में बदल कर दिखा दिया। वे महज प्रवचनों तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने करके दिखाया, कोई और करके दिखाएगा! बीते दिन स्वामी सत्यमित्रानंद ने अपनी विरासत स्वामी अवधेशानंद गिरि को सौंप दी और इस विरासत को संभालने के साथ ही स्वामी अवधेशानंद गिरि ने देश भर में 300 भारत माता मंदिर खोलने का ऐलान कर दिया। कितना अच्छा होता ये वे पिछड़े इलाकों में भारत माता के नाम पर 300 विद्या मंदिर खोलते, 300 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र खोलते। इन स्कूलों और अस्पतालों से भारत माता को ज्यादा राहत मिलती, क्योंकि भारत माता पत्थर की मूर्तियों में नहीं, उन लोगों में है जिन्हें इस वक्त शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की सबसे अधिक जरूरत है।

और ये असंभव काम नहीं है, देहरादून के श्री गुरु राम राय दरबार ने पिछली आधी सदी में देश भर में कई सौ इंटर काॅलेज खोले और इन्हें संचालित करके भी दिखाया। भक्त लोग गुस्ताखी माफ करें, हरिद्वार में अक्सर भक्तों का मेला लगाने वाले सतपाल महाराज ने हरिद्वार को क्या दिया है ? इससे बेहतर तो उनके भाई भोले महाराज है जो एक बड़े आई-हास्पिटल की शुरुआत कर चुके हैं। संत और समर्थक अक्सर गिनाते हैं-संस्कृत पाठशाला शुरू की, धर्मार्थ डिस्पैंसरी आरंभ की, पुस्तकालय आरंभ किया, गरीबों की मदद की, कन्याओं का विवाह कराया और बहुत कुछ! माफ कीजिएगा, इनमें कोई भी ठोस काम नहीं है ये हवा-हवाई हैं! जिन्होंने भगवा पहन लिया है, उन्हें ऊपर वाले को कोई हिसाब नहीं देना होगा या नहीं?

लेखक सुशील उपाध्याय पत्रकार रहे हैं और इन दिनों हरिद्वार में रहते हुए अध्यापन के कार्य से जुड़े हैं. उन्होंने उपरोक्त बातें फेसबुक पर प्रकाशित की हैं.


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: इसीलिए संघ और सरकार ने मिलजुल कर खेला है आक्रामक धर्म और कड़े आर्थिक सुधार का खेल : जनविरोधी और पूंजीपतियों की पक्षधर आर्थिक नीतियों को तेजी से लागू कराने के लिए धर्म पर बहस को केंद्रित कराने की रणनीति ताकि जनता इसी में उलझ कर रह जाए : सुधार की रफ्तार मनमोहन सरकार से कही ज्यादा तेज है। संघ के तेवर वाजपेयी सरकार के दौर से कहीं ज्यादा तीखे है । तो क्या मोदी सरकार के दौर में दोनों रास्ते एक दूसरे को साध रहे हैं या फिर पूर्ण सत्ता का सुख एक दूसरे को इसका एहसास करा रहा है कि पहले उसका विस्तार हो जाये फिर एक दूसरे को देख लेंगे।

यानी एक तरफ संघ परिवार ललचा रहा है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का विस्तार वह मोदी सरकार के दौर में खासी तेजी से कर सकता है तो उसे अभी विकास की जनविरोधी नीतियों की तरफ देखने की जरूरत नहीं है। तो दूसरी तरफ मोदी सरकार को भी इसका एहसास है कि संघ के बगैर मौजूदा वक्त में दूसरी कोई राजनीतिक ताकत नहीं है जो उसे विश्व बैंक और आईएमएफ की सोच को आर्थिक विकास तले लागू करने से रोक सके।

सरकार और संघ ने उस रास्ते को धुआंधार तरीके से पकड़ लिया है जो दोनों को विस्तार दे और टकराव के हालात आने तक दोनों ही मान कर चलें कि सत्ता हाथ में रहेगी तो रोक लेगें या सत्ता की डोर खींच लेंगे। आने वाले वक्त में होगा क्या, इसे ताड़ना तो दूर की गोटी होगी लेकिन इस दौर के दो संकेत साफ हैं। पहला, आरएसएस धर्म को धारण करने की सोच से कही आगे ले जाना चाहती है। दूसरा सरकार खेती और खनिज संपदा को राष्ट्रीय धरोहर से आगे बाजार की धरोहर बनाने-मानने को तैयार है। इस रास्ते में धर्म आक्रामक होगा, इससे इंकार नहीं किया जा सकता है। इस रास्ते जनता संसदीय राजनीति करने वाले राजनेताओं के खिलाफ खड़ी हो सकती है, इंकार इससे भी नहीं किया जा सकता।

पहली बार कोयला खादान के मजदूरों ने हड़ताल इसलिये की है क्योकि उन्हे निजी हाथो में बेचा जा रहा है। बैंक के कर्मचारी हडताल इसलिये करना चाह रहे हैं क्योंकि वेतन में इजाफा किये बगैर सरकार के सारे घतकर्म को बैंक के जरीये ही पूरा करने की नीति अपनायी जा रही है। बड़े बड़े हाथों से एनपीए की वसूली कैसे हो कोई नहीं जानता। जनधन के हर खाते को कोई बैंक कैसे कोई संभाले इसकी कोई नीति नहीं है। महंगाई को साधने का कोई उपाय सरकार के पास नहीं है। विपन्न तबके की तादाद लगातार बढ़ रही है क्योंकि विकास का मॉडल रोजगार देते हुये चकाचौंध लाने के खिलाफ है। वहीं विपन्न तबके में धर्म और आस्था के जरीये ही अपने होने का एहसास तेजी से जाग रहा है।

राजनीतिक तौर पर सत्ता के लिये सियासी ककहरा भी इस दौर में विपन्न तबके की ताकत बनी है। देश में विपन्न तबके की ताकत सत्ता से इसलिये टकराने से कतराती रही है क्योंकि सत्ता की नीतियो से इतर खेती एक सामानांतर अर्थव्यवस्था के तहत पेट भरती रही है और धर्म की आस्था का पाठ संयम से जुडा रहा है। लेकिन यह दोनों हालात सत्ता की निगाहों में चढ़ जाये या सत्ता ही दोनो को प्रबावित करने लगे तो रास्ता क्या निकलेगा। इसकी संवेदनशीलता कौन कितना समढ रही है यह अपने आप में सवाल है। मौजूदा वक्त में धर्म राष्ट्रवाद से जुड़ रहा है, जो आक्रमक हो चला है। दूसरी तरफ विकास की थ्योरी भी आक्रामक है। राष्ट्र विकास की थ्योरी तले पूंजी को ज्यादा महत्व दे रहा है। जिस खेती पर टिका देश का साठ फिसदी दुनिया की मंदी से प्रभावित हुये बगैर भी बाकी चालीस फिसदी को भी संकट से उबार लेता है और मनमोहन सिंह सरीखे सुधारवादी अर्थशास्त्री भी यह कहने से नहीं चुकते कि भारत की इकनॉमी दुनिया की मंदी से प्रभावित नहीं हुई। उसी खेती की जमीन को अगर विकास की चकाचौंध तले मुआवजे के नाम पर हथियारे का जमीन सुधार शुरू होगा तो फिर रास्ता जाता किधर है।

ना तो बहुफसली जमीन मायने रखती है और ना ही छत्तीसगढ या बंगाल सरीखे राज्यो की खेती अर्थव्यवस्था। औघोगिक गलियारों के नाम पर रक्षा के लिये हथियारो के उद्योग लगाने के नाम पर या फिर ग्रामिण क्षेत्रो में बिजली पहुंचाने के नाम पर सरकार कोई भी जमीन ले सकती है। सिर्फ मुआवजा पहले की तुलना में ज्यादा मिल जायेगा। लेकिन इसकी एवज में सरकार के पास ऐसी कोई योजना भी नहीं है कि रोजगार बढे या विपन्न लोगों को रोजगार मिले। ध्यान दें तो मनमोहन सिंह के दौर में भी कई तरीकों से उदारीकरण के नाम पर उपजाऊ भूसंपदा कारपोरेट घरानो को सौपी गयी। जो रियल इस्टेट में खपा। अकूत मुनाफाखोरी हुई। आवारा पूंजी का खुला खेल नजर आया। कालाधन की उपज भी तो इसी खुली व्यापार योजना के दायरे में होती रही। तो यह खेल अब अलग कैसे होगा।
योजना आयोग की घिसी पिटी लकीरों को मिटाकर नयी लकीर खिंचने के लिये बने नीति आयोग की नयी भर्ती से भी समझा जा सकता है। याद कीजिये तो मनमोहन सिंह के दौर में योजना आयोग के उपाध्यक्ष की कुर्सी पर मोंटेक सिंह अहलूवालिया बैठा करते थे और अब नीति आयोग के उपाध्यक्ष की कुर्सी पर अरविन्द पानागढिया बैठेंगे। दोनों विश्व बैंक की नीतियों तले बने अर्थशास्त्री हैं। दोनों के लिये खुला बाजार खासा मायने रखता है। वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ में काम करते हुये दोनों ने ही आर्थिक सुधार को ना सिर्फ खासा महत्वपूर्ण माना बल्कि भारत सरीखे तीसरी दुनिया के देशों के लिये दोनो के लिये विकास की रेखा कंजूमर की बढती तादाद से तय होती है। दोनों ही डब्ल्यूटीओ की उन नीतियों का विरोध कभी ना कर सके जो भारत के किसान और मजदूरों के खिलाफ रही। दोनों ही खनिज संपदा को मुक्त बाजार या कहे मुक्त व्यापार से जोड़ने में खासे आगे रहे। फिर योजना आयोग से बदले नीति आयोग में अंतर होगा क्या। महत्वपूर्ण यह भी है कि भारत में जितनी असमानता है और बिहार, यूपी, झारखंड सरीखे बीमारु राज्य की तुलना में महाराष्ट्र, कर्नाटक जैसे विकसित राज्य के बीच कभी मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने भी विकास को हर तबके तक पहुंचाने के लिये री-डिस्ट्रीब्यूशन आफ डेवलपमेंट की थ्योरी रखी। जिस वक्त नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री पद के लिये लोकसभा के चुनावी प्रचार में जुटे थे उस वक्त अरविन्द पनगारिया ने भी बकायदा भारत में विकास की असमानता को लकेर कई लेखों में कई सवाल उठाये।

फिर विश्व बैंक और आईएमएफ का नजरिया भारत को लेकर इन दोनो अर्थशास्त्रियों के काम करने के दौरान ही कितना जन विरोधी रहा है, यह मनमोहन सिंह के दौर में बीजेपी ने ही कई मौको पर उठाये। और तो और, संघ परिवार का मजदूर संघटन बीएमएस हो या स्वदेशी जागरण मंच दोनो ने ही हमेशा विश्व बैंक और आईएमएफ की नीतियों को लेकर वाजपेयी सरकार से लेकर मनमोहन सरकार तक पर सीधी चोट की है । अब यहा नया सवाल है कि एक तरफ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना और दूसरी तरफ भारत को विकसित देश बनाने के लिये सरकार की नीतियां। एक तरफ संघ के तीन दर्जन संगठन जो आदिवासी से लेकर किसान और मजदूर से लेकर देशी उत्पादन पर टिके स्वावलंबन के लिये बीते चालीस बरस से काम कर रहे हैं और उन्हें बीच से निकले राजनीतिक कार्यकर्ता जो संघ परिवार की राष्ट्रीय सोच को ही धर्म की चादर में ही लपेटा हुआ दिखा रहे है। तो यह आपसी सहमति से है या आपसी अंतर्विरोध। या फिर सहमति और अंतर्विरोध के बीच की लकीर ही मौजूदा दौर में एक हो चली है। क्योंकि कल तक संघ परिवार के बीच काम करने वाले मुरलीधरराव हों या संघ के पांच सौ से ज्यादा प्रचारक। जो वाजपेयी सरकार से लेकर मनमोहन सरकर के दौर में उसी विदेसी निवेश और पूंजी पर टिके उसी विकास के खिलाफ थे जो रोजगार दे नहीं पा रही थी और पूंजीवालों को हर सुविधाओं से लैस कर रही थी।

मनमोहन सिंह के दौर में पूंजी पर टिके विकास ने 40 फिसदी मजदूरों के रोजगार छीने और 70 फीसदी स्वरोजगार में सेंध लगायी। २००५-२०१० के दौर में देश में कुल २७० लाख रोजगार हुये। लेकिन इसी दौर में करीब ढाई लाख स्वरोजगार बेरोजगार हो गये। इसी दौर में उद्योगों को टैक्स सब्सिडी हर बरस पांच लाख करोड़ तक दी गयी। और इस सब की हिमायत विश्व बैक और आईएसएफ से लेकर डब्लूटीओ तक ने की, जहां से निकले अर्थशास्त्री अब नीति आयोग को संभाल रहे हैं बल्कि मनमोहन सरकार के दौर में आर्थिक सलाह देने वाले डा विवेक देवराय भी नीति आयोग के स्थायी सदस्य नियुक्त हो चुके हैं। यानी सिर्फ अरविन्द पानागढ़िया का ही नहीं बल्कि मुक्त व्यापार के समर्थक रहे अर्थशास्त्री डॉक्टर बिबेक देवराय का भी सवाल है जो आर्थिक मुद्दों पर मनमोहन सिंह के दौर में सुझाव देते आये है और इन अहम सुझावों को कभी बीजेपी ने सही नहीं माना। या कहें कई मौकों पर खुलेआम विरोध किया। डा देवराय इससे पहले की सरकार में विदेशी व्यापार, आर्थिक मसले और कानून सुधार के मुद्दों पर सलाहकार रह चुके हैं। यानी मनमोहन सरकार के दौर की नीतियों का चलन यहां भी जारी रहेगा। तो सवाल है बदलेगा क्या। वैसे भी जमीन अधिग्रहण से लेकर मजदूरों के लिये केन्द्र सरकार की नीतियों से संघ परिवार में भी कुलबुलाहट है। जिस तरह मुआवजे के दायरे में जमीन अधिग्रहण को महत्व दिया जा रहा है और मजदूरों को मालिकों के हवाले कर हक के सवाल को हाशिये पर ढकेला जा रहा है उससे संघ का ही भारतीय मजदूर संघ सवाल उठा रहा है।

सवाल यह भी है कि खुद नरेन्द्र मोदी ने पीएम बनने के बाद संसद के सेंट्रल हाल में अपने पहले भाषण में ही जिन सवालों को उठाया और उसके बाद जिस तरह हाशिये पर पड़े तबको का जिक्र बार बार यह कहकर किया कि वह तो छोटे छोटे लोगों के लिये बड़े बड़े काम करेंगे तो क्या नयी आर्थिक नीतियां वाकई बड़े बड़े काम छोटे छोटे लोगों के लिये कर रही है या फिर बड़े बड़े लोगों के लिये। क्योंकि देश की एक तिहाई आबादी गरीबी रेखा के नीचे है, जो कम होगी कैसे, इसकी कोई योजना नीतिगत तौर पर किसी के पास नहीं है। बड़़े पैमाने पर रोजगार के साधनों को उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी राज्य पर है, लेकिन रोजगार कारपोरेट और कारोबारियों के हाथ में सिमट रहा है और पहले ना मनमोहन सिंह कुछ बोले और ना ही अब कोई बोल रहा है। गरीबों के लिए समाज कल्याण की योजनाएं सरकार को बनानी हैं। लेकिन मनमोहन सिंह के दौर में सारी योजना तो अब सारी नीतियां कल्याणकारी पैकेज में सिमट रही है। ऐसे में नीति आयोग क्या अपने उद्देश्यों पर खरा उतरेगा-ये किसके लिये कितना बड़ा, यह तो वक्त बतायेगा लेकिन असल मुश्किल है कि एक तरफ धर्म के नाम पर घर वापसी का सवाल आक्रामक हो चला है और देश को इसमें उलझाया जा रहा है मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक में धर्म के नाम पर कही औवेसी तो कही आरएसएस का नाम लेकर राष्ट्रवाद को परिभाषित करने का खुला खेल चल रहा है तो दूसरी तरफ आर्थिक सुधार की नीतियो की रफ्तार मनमोहन सिंह के दौर से कई गुणा तेज है और यह लगने लगा है कि निजी सेक्टर चुनी हुई सरकार से भी ताकतवर हो चले हैं।

लेखक पुण्य प्रसून बाजपेयी वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं. उनका यह लिखा उनके ब्लाग से साभार लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है.

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कबीर साहेब क्यों हैं आज भी स्वीकृत और गौतम बुद्ध हो गए खारिज?

Sumant Bhattacharya : इस धरती पर “कबीर साहेब” एकमात्र ऐसे संत हुए जिन्होंने लाठी लेकर “हिंदू और मुसलमानों” के आडंबर पर बरसाया। जितना उन्होंने गरिआया, और वो भी देसी भाषा में, उतना तो किसी और ने नहीं। बावजूद आज भी भारत में कबीर साहेब के 21 करोड़ से ज्यादा अनुयायी है। वहीं “गौतम बुद्ध” हुए। जिन्होंने एक संगठित धर्म की स्थापना की. “ब्राह्मण आडंबरों” की पुरजोर मुखालफत की, समृद्ध दर्शन भी दिया। फिर क्यों गौतम बुद्ध अपनी ही जमीन से खारिज हो गए और कबीर साहेब आज भी पूजे जाते हैं?

गौर करता हूं तो पाता हूं, कबीर साहेब ने इस जमीन के उच्च नैतिक आदर्शों पर जीवन को जिया। ना तो उन्होंने गौतम की तरह रात को सोती अपनी पत्नी और पुत्र को छोड़ पलायन किया और ना ही ब्राह्मण संस्कारों को कोसने के बाद हाथ में भिक्षा पात्र लेकर जीवन को जिया। कबीर साहेब ने परिवार के उत्तरदायित्वों का पूरी तरह निर्वहन किया और टिकटी पर कपड़ा बिन एक मानव के आत्मसम्मान को बनाए रखते हुए उच्च नैतिक जीवन को जीकर दिखाया। ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलता कि संगठित धर्म खड़ा करने के नाम पर कबीर साहेब ने किसी से कोई अनुदान या फिर भक्तों से कोई चढ़ावा लिया हो। लेकिन गौतम तो इससे भी ना बचे। साफ है, ताकत संगठन में नहीं, नैतिक मानकों में हैं। शायद इसे कोई कूढ़मगज कभी समझें? कुछ चिंतक कहते हैं कि कबीर साहेब ने विकल्प नहीं दिया। तो मैं पूछता हूं कि क्या खारिज करने से बड़ा कोई विकल्प है? नहीं ना? लेकिन खारिज करने का मतलब “नया गिरोह” बनाना नहीं होता भाई?

शायद यही एक ऐसी धरती है, जहां रहने वाले, कोई किसी भी धर्म का क्यों ना हो., किसी भी विचार से क्यों ना जीवन जीता हो, लेकिन यदि उसने उच्च नैतिक मानकों को स्थापित किया तो इस देश के निवासी उसे स्वीकार कर पूजागृह में स्थान देने में तनिक कोताही ना करेंगे। मिसाल हैं, शिरडी के साई बाबा, जो मुसलमान फकीर थे, और इस जमीन के लोगों ने उन्हें अपने तमाम देवी-देवताओं के साथ पूजाघर में विराज दिया। शंकराचार्य की आवाज भी अनसुनी कर दी। है क्या दुनिया के किसी और धर्म या संप्रदाय है यह जिगर….? अफसोस, विनम्रता और स्वीकार करने के मानकों को कहीं बड़ी बेशर्मी के साथ कमजोरी करार दी जाती है। अपन कोई हिंदूवादी नहीं है, गाली भी देते हैं, कोसते भी हैं, लेकिन खूबियों को अंध बुद्धि से नकारने के भी पक्षधर नहीं हैं मित्रों।

वरिष्ठ पत्रकार सुमंत भट्टाचार्या के फेसबुक वॉल से.

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