जानिए, दीपक चौरसिया समेत कई पत्रकारों के खिलाफ सीबीआई ने क्यों दर्ज की एफआईआर

Vishwanath Chaturvedi : धरा बेच देगे, गगन बेंच देगे, कलम बिक चुकी है, वतन बेच देगे! पैसे खाकर फर्जी खबर चलाने के आरोपी दीपक चौरसिया, भूपेंद्र चौबे, मनोज मित्ता सहित अन्य के खिलाफ सीबीआई ने दर्ज की एफ़आईआर… मुलायम के आय से अधिक संपत्ति मामले में सुप्रीम कोर्ट में 10 फ़रवरी 2009 को सुनवाई से पहले फर्जी दस्तावेजों के आधार पर मुलायम कुनबे को क्लीन चिट दिए जाने की खबर प्राइम टाइम में प्रमुखता से चलाकर सुप्रीम कोर्ट को गुमराह करने और सीबीआई की इमेज को नुकसान पहुंचाने के आरोप में सीबीआई की डीआईजी रहीं तिलोतिमा वर्मा ने लिखाई एफआईआर.

मीडिया द्वारा बिना सबूतों के अमर सिंह के टुकड़ों पर पलने वाले कथित अधिवक्ता प्रदीप कुमार राय जो कि फोन टेपिंग और ब्लैक मेलिंग, फर्जी रिपोर्ट तैयार करने के मास्टर हैं, 2005 में भारत के मुख्य न्यायाधीश रहे एसबी सिन्हा का बेटा बताकर गोवा राज भवन में गोवा के राज्यपाल की सीडी बनाने की नीयत से रुके. असलियत खुलने पर पणजी थाने में राज भवन द्वारा एफआईआर दर्ज कराकर प्रदीप राय को पुलिस को सौंप दिया गया. उक्त प्रकरण आज भी विचाराधीन है.

सीबीआई की डीआईजी रहीं तिलोतिमा वर्मा के फर्जी हस्ताक्षर से पैसे के साथ प्रदीप राय द्वारा बांटी गई रिपोर्ट को बिना कनफर्म किये, चैनलों द्वारा मनमाने तरीके से चलाई गई ख़बर के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में हमने 20 फरवरी 2009 को अप्लीकेशन फ़ाइल कर एसआईटी गठित कर फर्जी रिपोर्ट चलाने वालों की जाँच कराने की मांग कर दी. घबराई सीबीआई ने आनन फानन में प्रेस कौंसिल ऑफ़ इंडिया, सचिव सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, सचिव डीओपीटी को शिकायती पत्र लिखकर उक्त पत्रकारों के खिलाफ कार्यवाही की मांग की. सुप्रीम कोर्ट में 30 मार्च की डेट फिक्स थी, सीबीआई ने 16 मार्च 2009 को एफआईआर दर्ज करा दी. इसे District new Delhi ps Cbi/stf year 2009 FirNo rc/Dst/2009/s/0001 date: 16.3.2009… act Ipc section 120b/r/w 465,469/500&471 and the subatantive offences thereof other acts& sections. suspected offences: criminal conspiracy forgery, forgery for the purpose of harming reputation use ing as genuine a fored document and printing or engrabing matter know to be defamatory के जरिए खोजा देखा पढ़ा जा सकता है.

जाने-माने वकील विश्वनाथ चतुर्वेदी के एफबी वॉल से.

इस प्रकरण से संबंधित सीबीआई के कई पन्नों के दस्तावेजों को पढ़ने के लिए अगले पेज पर जाने हेतु नीचे क्लिक करें…

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‘देशद्रोही’ खोजते दीपक चौरसिया!

मीडिया मंडी पर मीडिया ‘ट्रायल’ के संगीन आरोप लगते रहे हैं। समाज व देशहितकारी मुद्दों पर सकारात्मक दिशा दे अगर ‘ट्रायल’ होते हैं तो उनका स्वागत है किंतु जब मीडिया मंडी के न्यायाधीश सकारात्मक दिशा की जगह नापाक विचारधारा थोप नकारात्मक दिशा देने लगें, मामला अदालत में लंबित होने के बावजूद आरोपियों को  सिर्फ अपराधी नहीं देशद्रोही तक घोषित करने लगे, कानून और सबूतों को ठेंगे पर रख फैसले सुनाने लगे तब, मंडी के दलालों को कटघरे में खड़ा किया जाएगा ही।

अभी-अभी पिछले मंगलवार को टीआरपी के दौर में तेजी से आगे बढ़ते हुए इंडिया न्यूज चैनल के ‘एडिटर इन चीफ’ दीपक चौरसिया ने ऐसे ही आरोपों से स्वयं को कटघरे में खड़ा कर लिया। जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के कथित देशद्रोह प्रकरण की जांच अभी जारी है, पुलिस गवाह-सबूतों की तलाश कर रही है। मीडिया कर्मियों से भी पूछताछ जारी है। फर्जी वीडियो के रहस्य उजागर होने लगे हैं, आरोप पत्र दाखिल होना अभी शेष है, लेकिन चौरसिया ने अपने बहस के कार्यक्रम का शीर्षक दे डाला ‘देशद्रोही कौन?। परदे पर तीनों आरोपी कन्हैया, अनिर्बान और उमर खालिद की तस्वीर के साथ बड़े-बड़े अक्षरों में ‘देशद्रोही कौन?’ का ‘ग्राफिक प्लेट’। कार्यक्रम में वामपंथी छात्र संगठनों और एबीवीपी के सदस्यों के बीच जेएनयू प्रकरण पर खुली बहस कराई गई। मजे की बात यह कि बहस के दौरान चौरसिया ने इनके देशद्रोह पर सवाल नहीं पूछा। फिर शीर्षक और ग्राफिक? जाहिर है कि उत्तेजक, सनसनीखेज शीर्षक केवल दर्शकों को कार्यक्रम के प्रति आकर्षित करने के लिए दिया गया था।

जांच-प्रक्रिया से गुजर रहे देशद्रोह जैसे गंभीर मामले के साथ चौरसिया का ‘बहस उपक्रम’ अपराध की श्रेणी का है। बहस के दौरान भी  चौरसिया का पक्षपात साफ-साफ दिख रहा था। सभी वक्ताओं के लिए दो-दो मिनट का पूर्व निर्धारित समय एबीवीपी के सदस्यों के लिए बढ़ा दिया गया। जबकि वामपंथी संगठनों के छात्रों को यह सुविधा नहीं दी गई। कुछ छात्रों की आपत्ति को भी चौरसिया ने खारिज कर दिया कि जब मामले की जांच चल रही हो तो ऐसा मीडिया ट्रायल क्यों? चौरसिया का हास्यास्पद जवाब था कि हम बहस करवा रहे हैं फैसला नहीं दे रहे हैं। कार्यक्रम खत्म हो गया किंतु दर्शकों को इस सवाल का जवाब नहीं मिला कि देशद्रोही कौन है?

विद्वान संपादक का विद्वतापूर्ण करिश्मा?
अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व में बल्कि यूं कहें कि लालकृष्ण आडवाणी के सूचना प्रशासन मंत्रितत्व काल में भारत सरकार के दूरदर्शन के लिए काम कर चुके दीपक चौरसिया के ‘साम्राज्य’ पर सवाल उठते रहे हैं। राजनाथ सिंह के उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहते हुए अनेक ‘सुविधाओं से उपकृत’ चौरसिया के इंडिया न्यूज में प्रवेश की गाथा भी उतनी ही दिलचस्प है। सन 2008 की बात है तब इंडिया न्यूज को कुछ परिचित चेहरों की तलाश थी।  चौरसिया तब स्टार में थे। इंडिया न्यूज के एक वरिष्ठ संपादकीय सहयोगी के साथ दीपक संस्थान के प्रबंक निदेशक से मिलने आये।

ध्यान रहे दीपक मिलने आये थे। बातचीत चली, अचानक बातचीत के दौरान ही दीपक ने प्रबंध निदेशक से सवाल दाग डाला कि आपने यह कैसे समझ लिया कि मैं आपके साथ ज्वाइन करूंगा। प्रबंध निदेशक भौचक। बेचारा वरिष्ठ संपादकीय सहयोगी हतप्रभ की फिर दीपक बात करने इंडिया न्यूज में आए ही क्यों? बातचीत तो खत्म हो गई किंतु उस दिन संस्थान के युवा प्रबंध निदेशक ने कुछ ठान लिया था। 2012 में जब दीपक को जब एबीपी (स्टार) छोडऩा पड़ा, तब उन्होंने अपनी ओर से इंडिया न्यूज का दरवाजा खटखटाया। ज्वाइन कर लिया। युवा प्रबंध निदेशक का संकल्प भी पूरा हुआ।

इस पर विस्तार फिर कभी अन्य अवसर पर। लबोलुआब यह कि घोर अवसरवादी दीपक चौरसिया अपने ‘लाभ’ के लिए पत्रकारीय मूल्य और नैतिकता तो बहुत बड़ी बात है, व्यक्तिगत नैतिकता को भी जमींदोज करने में शर्माते नहीं। टीवी चैनल पर पत्रकारिता और स्तर की चिंता फिर क्यों? हां, चौरसिया टीवी दुनिया के एक स्थापित परिचित चेहरा हैं। अब यह चौरसिया पर निर्भर करता है कि दर्शकों के बीच उनकी यह पहचान सिर्फ ‘परिचित’ के रुप में रहे या ‘सुपरिचित’ के रूप में! या फिर, ‘कुपरिचित’ का तमगा?

…और यह भी
कश्मीर से प्रकाशित ‘स्टेट टाइम्स’ में विगत 16 फरवरी को ही एक खबर छपी थी कि जेएनयू में कथित देशविरोधी नारा लगाने वाले कश्मीरी छात्रों को दिल्ली पुलिस ने इसलिए गिरफ्तार नहीं किया कि उन्हें ऊपर से ‘मौखिक’ आदेश था। कारण कि यदि उनकी गिरफ्तारी हो जाती तो जम्मू-कश्मीर में पीडीपी के साथ भाजपा को सरकार बनाने में फजीहत का सामना करना पड़ता। चूंकि खबर एक छोटे अखबार में छपी तब किसी ने संज्ञान नहीं लिया। अगर उसी समय खबर दिल्ली के बड़े अखबार में छप जाती तब जेएनयू को लेकर ‘मीडिया प्रोपगंडा’ का उसी दिन भांडा फोड़ हो जाता।

लेखक एसएन विनोद देश के वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं. उनका यह लिखा उनके ब्लाग चीरफाड़ से साभार लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है.

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विनोद शर्मा मय परिवार चुनाव हार चुके हैं, इसलिए दीपक तले अंधेरा छा रहा है…

Abhishek Srivastava : दिवाली पर अखबारों और चैनलों में पत्रकारों को मिलने वाली बख्‍शीश को लेकर कई दिलचस्‍प किस्‍से बनते हैं। मसलन, इस बार इंडिया न्‍यूज़ में जबरदस्‍त आक्रोश देखा जा रहा है। विनोद शर्मा मय परिवार चुनाव हार चुके हैं, लिहाजा 2 नवंबर बीतने के बाद भी यहां अब तक किसी को वेतन नहीं मिला है। दीपक तले अंधेरा छा रहा है और विनोद शर्मा का चुनाव चिन्ह ‘सिलेंडर’ ब्‍लास्‍ट करने वाला है क्‍योंकि दिवाली पर जो कथित इलेक्ट्रिक केतली सबको बख्‍शीश में दी गई है, उसमें पानी के अलावा कुछ नहीं बनाया जा सकता।

दरअसल, इंडिया न्‍यूज़ की केतली पर स्‍पष्‍ट दिशानिर्देश लिखे हैं कि इसमें चाय समेत कोई भी खाद्य या पेय पदार्थ तैयार नहीं किया जा सकता। सुनने में आ रहा है कि छोटे कद के कुछ प्रशिक्षु पत्रकार सवेरे दफ्तर जाने से पहले जल्‍दी में इससे गीज़र का काम ले रहे हैं और केतली भर-भर के नहा रहे हैं।

युवा पत्रकार और एक्टिविस्ट अभिषेक श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से.

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ब्रेकिंग न्यूज… सुधीर चौधरी की सेल्फी… ब्रेकिंग न्यूज… दीपक चौरसिया का हालचाल …

मैं आज के दिन को मीडिया के लिहाज से शर्मनाक दिन कहूंगा. पत्रकारिता के छात्रों को कभी पढ़ाया जाएगा कि 25 अक्टूबर 2014 के दिन एक बार फिर भारतीय राजनीति के आगे पत्रकारिता चरणों में लोट गई. धनिकों की सत्ता भारी पड़ गई जनता की आवाज पर. कभी इंदिरा ने भय और आतंक के बल पर मीडिया को रेंगने को मजबूर कर दिया था. आज मोदी ने अपनी ‘रणनीति’ के दम पर मीडिया को छिछोरा साबित कर दिया. दिवाली मिलन के बहाने मीडिया के मालिकों, संपादकों और रिपोर्टरों के एक आयोजन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आए. देश, विदेश, समाज और नीतियों पर कोई बातचीत नहीं हुई. सिर्फ मोदी बोले. कलम को झाड़ू में तब्दील हो जाने की बात कही. और, फिर सबसे मिलने लगे. जिन मसलों, मुद्दों, नारों, आश्वासनों, बातों, घोषणापत्रों, दावों के नाम पर सत्ता में आए उसमें से किसी एक पर भी कोई बात नहीं की.

सुधीर चौधरी सेल्फी बनाने लगे. दीपक चौरसिया हालचाल बतियाने लगे. रिपोर्टरों में तो जैसे होड़ मच गई सेल्फी बनाने और फोटो खिंचाने की. इस पूरी कवायद के दौरान कोई पत्रकार ऐसा नहीं निकला जिसने मोदी से जनता का पत्रकार बनकर जनहित-देशहित के मुद्दों पर सवाल कर सके. सब गदगद थे. सब पीएम के बगल में होने की तस्वीर के लिए मचल रहे थे. जिनकी सेल्फी बन गई, उन्होंने शायद पत्रकारिता का आठवां द्वार भेद लिया था. जिनकी नहीं बन पाई, वो थोड़े फ्रस्ट्रेट से दिखे. जबसे नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने हैं, एक बार भी पूरी मीडिया के सामने नहीं आए और न ही सवाल जवाब का दौर किया. शायद इससे पोल खुलने, ब्रांडिंग खराब होने का डर था. इसीलिए नया तरीका निकाला गया. ओबलाइज करने का. पीएम के साथ फोटो खिंचाने भर से ओबलाइज हो जाने वाली भारतीय मीडिया और भारतीय पत्रकार शायद यह आज न सोच पाएं कि उन्होंने कितना बड़ा पाप कर डाला लेकिन उन्हें इतिहास माफ नहीं करेगा.

जी न्यूज पर ब्रेकिंग न्यूज चलने लगी. एडिटर इन चीफ सुधीर चौधरी ने पीएम के साथ सेल्फी बनाई. इंडिया न्यूज पर ब्रेकिंग न्यूज चलने लगी. एडिटर इन चीफ दीपक चौरसिया का प्रधानमंत्री ने हालचाल पूछा. महंगाई, बेरोजगारी और बदहाली से कराह रही देश की जनता का हालचाल यहां से गायब था. दिवाली की पूर्व संध्या पर सुसाइड करने वाले विदर्भ के छह किसानों की भयानक ‘सेल्फी’ किसी के सामने नहीं थी. सबके सब प्रधानमंत्री से मिलने मात्र से ही मुस्करा-इतरा रहे थे, खुद को धन्य समझ रहे थे.

रजत शर्माओं और संजय गुप्ताओं जैसे मीडिया मालिकों के लिए पत्रकारिता पहले से ही मोदी परस्ती रही है, आज भी है, कल भी रहेगी. इनके यहां काम करने वालों से हम उम्मीद नहीं कर सकते थे कि वो कोई सवाल करेंगे. खासकर तब जब ये और इन जैसे मीडिया मालिक खुद उपस्थित रहे हों आयोजन में. सुभाष चंद्राओं ने तो पहले ही भाजपा का दामन थाम रखा है और अपने चैनल को मोदी मय बनाकर पार्टी परस्त राष्ट्रीय पत्रकारिता का नया माडल पेश किया है. अंबानियों के आईबीएन7 और ईटीवी जैसे न्यूज चैनलों के संपादकों से सत्ता से इतर की पत्रकारिता की हम उम्मीद ही नहीं कर सकते हैं. कुल मिलाकर पहले से ही कारपोरेट, सत्ता, पावर ब्रोकरों और राजनेताओं की गोद में जा बैठी बड़ी पूंजी की पत्रकारिता ने आज के दिन पूरी तरह से खुद को नंगा करके दिखा दिया कि पत्रकारिता मतलब सालाना टर्नओवर को बढ़ाना है और इसके लिए बेहद जरूरी है कि सत्ता और सिस्टम को पटाना है. होड़ इस बात में थी कि मोदी ने किसको कितना वक्त दिया. मोदी ने कहा कि हम आगे भी इसी तरह मिलते जुलते रहेंगे. तस्वीर साफ है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कभी कोई कड़ा बड़ा सवाल नहीं पूछा जा सकेगा. वो जो तय करेंगे, वही हर जगह दिखेगा, हर जगह छपेगा. वो जो इवेंट प्लान करेंगे, वही देश का मेगा इवेंट होगा, बाकी कुछ नहीं.

ब्लैकमेलिंग में फंसे सुधीर चौधरियों और फिक्सर पत्रकार दीपक चौरसियाओं से हमें आपको पहले भी उम्मीद न थी कि ये जन हित के लिए पत्रकारिता करेंगे. दुखद ये है कि पत्रकारिता की पूरी की पूरी नई पीढ़ी ने इन्हीं निगेटिव ट्रेंड्स को अपना सुपर आदर्श मान लिया है और ऐसा करने बनने की ओर तेजी से अग्रसर हैं. यह खतरनाक ट्रेंड बता रहा है कि अब मीडिया में भी दो तरह की मीडिया है. एक दलाल उर्फ पेड उर्फ कार्पोरेट उर्फ करप्ट मीडिया और दूसरा गरीब उर्फ जनता का मीडिया. ये जनता का मीडिया ही न्यू मीडिया और असली मीडिया है. जैसे सिनेमा के बड़े परदे के जरिए आप देश से महंगाई भ्रष्टाचार खत्म नहीं कर सकते, उसी तरह टीवी के छोटे परदे के जरिए अब आप किसी बदलाव या खुलासे या जन पत्रकारिता का स्वाद नहीं चख सकते. दैत्याकार अखबारों जो देश के सैकड़ों जगहों से एक साथ छपते हैं, उनसे भी आप पूंजी परस्ती से इतर किसी रीयल जर्नलिज्म की उम्मीद नहीं कर सकते क्योंकि इनके बड़े हित बड़े नेताओं और बड़े सत्ताधारियों से बंधे-बिंधे हैं. दैनिक जागरण वाले अपने मालिकों को राज्यसभा में भेजने के लिए अखबार गिरवी रख देते हैं तो दैनिक भास्कर वाले कोल ब्लाक व पावर प्रोजेक्ट पाने के लिए सत्ताओं से डील कर अखबार उनके हवाले कर देते हैं.

ऐसे खतरनाक और मुश्किल दौर में न्यू मीडिया की जिम्मेदारी बढ़ जाती है. न्यू वेब में वेब मीडिया शामिल है. सोशल मीडिया समाहित है. न्यूज पोर्टल और ब्लाग भी हैं. मोबाइल भी इसी का हिस्सा है. इन्हें दोहरी जिम्मेदारी निभानी पड़ेगी. कार्पोरेट मीडिया, जिसका दूसरा नाम अब करप्ट मीडिया या पेड मीडिया हो गया है, इसको एक्सपोज करते रहना होगा. साथ ही, देश के सामने खड़े असल मुद्दों पर जनता की तरफ से बोलना लिखना पड़ेगा. अब पत्रकारिता को तथाकथित महान पत्रकारों-संपादकों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता. ये सब बिक चुके हैं. ये सब चारण हो गए हैं. ये सब कंपनी की लायजनिंग फिट रखने और बिजनेस बढ़ाने के प्रतिनिधि हो गए हैं. इतिहास बताता है कि इंदिरा ने मीडिया से झुकने को कहा था तो मीडिया वाले रेंगेने लगे थे. अब कहा जाएगा कि मोदी ने मीडिया को मिलन के बहाने संवाद के लिए कहा तो मीडिया वाले सेल्फी बनाने में जुट गए.

फेसबुक पर वरिष्ठ और युवा कई जनपक्षधर पत्रकार साथियों ने मीडिया की इस घिनौनी और चीप हरकत का तीखा विरोध किया है. वरिष्ठ पत्रकार और जनसत्ता अखबार के संपादक Om Thanvi लिखते हैं :  ”जियो मेरे पत्रकार शेरो! क्या इज्जत कमाई है, क्या सेल्फियाँ चटकाई हैं!

फेसबुक पर एक्टिव जन पत्रकार Dhananjay Singh बताते हैं एक किस्सा : ”एस.सहाय जी स्टेट्समैन के संपादक हुआ करते थे,उनके पास इंदिरा जी के यहाँ से कोई आया सूट का कपड़ा लेकर की खास आपके लिए प्रधानमंत्री ने भेजा है,साथ में टेलर का पता भी था.उन्होंने धन्यवाद के साथ उसे लौटा दिया.कुछ समय बाद प्रधानमंत्री ने बंगले पर संपादकों को डिनर दिया.सहाय जी के अलावा बाकी सभी क्रांतिकारी संपादक एक जैसे सूट में थे…सब एक दूसरे की तरफ फटी आँखों से देखने लगे … इंदिरा जी का अलग ही स्टाइल था……. समय बदला है अब तो खुद ही सब दंडवत हुए जा रहे हैं….. हाँ सहाय जी के घर रघु राय की उतारी एक तस्वीर दिखती थी की संसद की सीढ़ियों के पास एक भिखारी कटोरा लेकर खड़ा है (शायद तब सिक्योरिटी इतनी नहीं रही होगी)………… सहाय जी के पास अंतिम समय में खटारा फिएट थी और वो अपने बच्चों के लिए भी ‘कुछ भी’ छोड़ कर नहीं गए.

कई मीडिया हाउसों में काम कर चुके आध्यात्मिक पत्रकार Mukesh Yadav लिखते हैं: ”सवाल पूछने की बजाय पीएम साब के साथ सेल्फी लेने के लिए पत्रकारों, संपादकों में होड़ मची है!! शर्मनाक! धिक्कार! निराशा हुई! सवाल के लिए किसकी आज्ञा चाहिए जनाब?

सोशल एक्टिविस्ट और युवा पत्रकार Mohammad Anas कहते हैं: ”लोकतंत्र में संवाद कभी एक तरफा नहीं होता। एक ही आदमी बोले बाकि सब सुने। साफ दिख गया लोकशाही का तानाशाही में कन्वर्जन। मनमोहन ने एक बार संपादकों को बुलाया था, सवाल जवाब हुए थे। कुछ चटुकारों और दलालों ने पत्रकारिता को भक्तिकाल की कविता बना डाला है। वरना करप्टों, झूठों और जनविरोधियों के लिए पत्रकार आज भी खौफ़ का दूसरा नाम है।

कई अखबारों में काम कर चुके जोशीले पत्रकार Rahul Pandey सोशल मीडिया पर लिखते हैं :

आज पत्रकारों के सेल्‍फी समारोह के बाद पि‍छले साल का कहा मौजूं है… आप भी गौर फरमाएं

पत्रकार नहीं बनि‍या हैं
चार आने की धनि‍या हैं।
खबर लाएं बाजार से
करैं वसूली प्‍यार से
लौंडा नाच नचनि‍या हैं
पत्रकार नहीं, ये बनि‍या हैं।
चार आने की धनि‍या हैं।

करैं दलाली भरकर जेब
जेब में इनकी सारे ऐब
दफ्तर पहुंचके पकड़ैं पैर
जय हो सुनके होवैं शेर
नेता की रखैल रनि‍या हैं,
पत्रकार नहीं ये बनि‍या हैं,
चार आने की धनि‍या हैं।

वरिष्ठ अंग्रेजी पत्रकार Vinod Sharma लिखते हैं : ”Facebook flooded with selfies of media persons with our PM. A day to rejoice? Or reflect?

कई अखबारों में काम कर चुके पत्रकार Ashish Maharishi लिखते हैं :  ”हे मेरे देश के महान न्‍यूज चैनलों और उसके कथित संपादकों, प्रधानमंत्री ने आपको झुकने के लिए कहा तो आप रेंगने लगे। क्‍या देश में मोदी के अलावा कोई न्‍यूज नहीं है। ये पब्‍लिक है, सब जानती है…हमें पता है कि मोदी की न्‍यूज के बदले आपको क्‍या मिला है….

वरिष्ठ पत्रकार Arun Khare लिखते हैं :  ”मीडिया ने कलम को झाड़ू में बदल दिया –मोदी । मोदी जी आपने इस सच से इतनी जल्दी परदा क्यों उठा दिया । कुछ दिन तो मुगालते में रहने देते देश को।

फेसबुक पर एक्टिव जन पत्रकार Dharmendra Gupta लिखते हैं : ”जिस तरह से मीडिया के चम्पादक आज मोदी के साथ सेल्फी खिंचवा कर के उस को ब्रेकिंग न्यूज बना रहे है उस से लगता है की अब लड़ाई भ्रष्ट राजनीतिको के साथ भ्रस्ट मीडिया के खिलाफ भी लड़नी होगी.

संपादक और साहित्यकार गिरीश पंकज इन हालात पर एक कविता कुछ यूं लिखते हैं :

पत्रकारिता का सेल्फ़ीकरण
———–
कई बार सोचता हूँ
बिलकुल सही समय पर
मर गए पत्रकारिता के पुरोधा,
नहीं रहे तिलक और गांधी,
नहीं रहे बाबूराव विष्णु पराड़कर
गणेश शंकर विद्यार्थी भी
हो गए शहीद
राजेंद्र माथुर और प्रभाष जोशी
का भी हो गया अवसान।
आज ये ज़िंदा होते तो
खुद पर ही शर्मिन्दा होते
पत्रकारिता की झुकी कमर
और लिजलिजी काया देख कर
शोक मनाते
शायद जीते जी मर जाते
सुना है कि दिल्ली में
‘सेल्फिश’ पत्रकारिता अब
‘सेल्फ़ी ‘ तक आ गयी है
हमारी खुदगर्ज़ी
हमको ही खा गयी है

जो भक्त लोग हैं, उन्हें मोदी की हर स्टाइल पसंद है. वे मोदी की कभी बुराई नहीं करते और मीडिया की कभी तारीफ नहीं करते. इन्हें ऐसी ही चारण मीडिया चाहिए, जिसे गरिया सकें, दुत्कार सकें और लालच का टुकड़ा फेंक कर अपने अनुकूल बना सकें. सवाल उन लोगों का है जो आम जन के प्रतिनिधि के बतौर मीडिया में आए हैं. जिन्होंने पत्रकारिता के नियम-कानून पढ़े हैं और मीडिया की गरिमा को पूरे जीवन ध्यान में रखकर पत्रकारिता की. क्या ये लोग इस हालात पर बोलेंगे या मीडिया बाजार के खरबों के मार्केट में अपना निजी शेयर तलाशने के वास्ते रणनीतिक चुप्पी साधे रहेंगे. दोस्तों, जब-जब सत्ता सिस्टम के लालचों या भयों के कारण मीडिया मौन हुई या पथ से विचलित हुई, तब तब देश में हाहाकार मचा और जनता बेहाल हुई. आज फिर वही दौर दिख रहा है. ऐसे में बहुत जरूरी है कि हम सब वह कहें, वह बोलें जो अपनी आत्मा कहती है. अन्यथा रामनामी बेचने और रंडियों की दलाली करने में कोई फर्क नहीं क्योंकि पैसा तो दोनों से ही मिलता है और दोनों ही धंधा है. असल बात विचार, सरोकार, तेवर, नजरिया, आत्मसम्मान और आत्मस्वाभिमान है. जिस दिन आपने खुद को बाजार और पूंजी के हवाले कर दिया, उस दिन आत्मा तो मर ही गई. फिर आप खुद की लाश ढोकर भले इनसे उनसे मिलते रहें, यहां वहां टहलते रहें, पर कहा यही जाएगा कि ”मिस्टर एक्स, आप बेसिकली हरामजादे किस्म के दलाल हैं, पत्रकारिता में तो आप सिर्फ इसलिए हैं ताकि आप अपनी हरमजदई और दलाली को धार दे सकें”.

शायद मैं कुछ ज्यादा भावुक और आवेश में हो रहा हूं. लेकिन यह भावुकता और आवेश ही तो अपन लोगों को पत्रकारिता में ले आई. ये भावुकता और आवेश ही तो अपन लोगों को कारपोरेट और करप्ट मीडिया में देर तक टिका नहीं पाई. यह भावुकता और आवेश ही तो http://Bhadas4Media.com जैसा बेबाक पोर्टल शुरू करने को मजबूर कर गया और इस न्यू मीडिया के मंच के जरिए सच को पूरे ताकत और पूरे जोर के साथ सच कहने को बाध्य करता रहा जिसके नतीजतन अपन को और अपन जैसों को जेल थाना पुलिस कोर्ट कचहरी तक के चक्कर लगाने पड़े और अब भी यह सब क्रम जारी है. शरीर एक बार ही ठंढा होता है. जब सांसें थम जाती हैं. उसके पहले अगर न भावुकता है और न ही आवेश तो समझो जीते जी शरीर ठंढा हो गया और मर गए. मुझे याद आ रहे हैं पत्रकार जरनैल सिंह. सिख हत्याकांड को लेकर सवाल-जवाब के क्रम में जब तत्कालीन गृहमंत्री चिदंबरम ने लीपापोती भरा बयान दिया तो तुरंत जूता उछाल कर अपना प्रतिरोध दर्ज कराया. जरनैल सिंह अब किसी दैनिक जागरण जैसे धंधेबाज अखबार के मोहताज नहीं हैं. उनकी अपनी एक शख्सियत है. उन्होंने किताब लिखी, चुनाव लड़े, दुनिया भर में घूमे और सम्मान पाया. मतलब साफ है कि जब हम अपने दिल की बात सुनते हैं और उसके हिसाब से करते हैं तो भले तात्कालिक हालात मुश्किल नजर आए, पर आगे आपकी अपनी एक दुनिया, अपना व्यक्तित्व और अपनी विचारधारा होती है.

करप्ट और कार्पोरेट पत्रकारिता के इस दौर में पत्रकार की लंबाई चौड़ाई सिर्फ टीवी स्क्रीन तक पर ही दिखती है. उसके बाहर वह लोगों के दिलों में बौना है. लोगों के दिलों से गायब है. उनका कोई नामलेवा नहीं है. अरबों खरबों कमा चुके पत्रकारों से हम पत्रकारिता की उम्मीद नहीं कर सकते और यह नाउम्मीदी आज पूरी तरह दिखी मोदी के मीडिया से दिवाली मिलन समारोह में. बड़ी पूंजी वाली करप्ट और कार्पोरेट पत्रकारिता के बैनर तले कलम-मुंह चला रहे पत्रकारों से हम उम्मीद नहीं कर सकते कि वह अपनी लंबी-चौड़ी सेलरी को त्यागने का मोह खत्म कर सके. इसी कारण इनकी ‘सेल्फी पत्रकारिता’ आज दिखी मोदी के मीडिया मिलन समारोह में.

आज राजनीति जीत गई और मीडिया हार गया. आज पीआर एजेंसीज का दिमाग सफल रहा और पत्रकारिता के धुरंधर बौने नजर आए. आइए, मीडिया के आज के काले दिन पर हम सब शोक मनाएं और कुछ मिनट का मौन रखकर दलाल, धंधेबाज और सत्ता परस्त पत्रकारों की मर चुकी आत्मा को श्रद्धांजलि दे दें.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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बेल न मिली तो दीपक चौरसिया जा सकते हैं जेल (देखें कोर्ट आदेश)

लगता है आसाराम के खिलाफ पीछे पड़े रहने का ‘पाप’ दीपक चौरसिया को लगने लगा है. ऐसा आसाराम के भक्त सोशल मीडिया पर कह रहे हैं. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दीपक चौरसिया को गिरफ्तारी से मिले स्टे को खत्म कर दिया है और उनकी प्रार्थना को निरस्त कर दिया है. दीपक चौरसिया को महीने भर के भीतर कोर्ट जाकर बेल के लिए अप्लाई करना होगा और अगर कोर्ट ने बेल नहीं दी तो उन्हें जेल जाना पड़ सकता है.

‘इंडिया न्यूज’ के दीपक चौरसिया ने अपने चैनल पर आसाराम के खिलाफ लगातार खबरें दिखाने और टीआरपी पाने के क्रम में कुछ ऐसी झूठी खबरें भी दिखा दी हैं जो उनके गले की फांस बन गई है. आरोप है कि दीपक चौरसिया ने गुड़गांव के निवासी और आसाराम के एक भक्त की पारिवारिक प्राइवेट वीडिओ से छेड़छाड़ कर निहित स्वार्थ वश चैनल पर दिखाया. खबर के जरिए दीपक चौरसिया ने गुड़गांव के एक परिवार की 10 वर्षीय नन्ही स्कूली बच्ची और उसकी ताई के चरित्र को कलंकित कर दिया. इनकी शिकायत पर गुडगाँव पुलिस ने बड़ी मुश्किल से 15 दिसंबर 2013 को जीरो FIR करके जांच-पड़ताल नोएडा ट्रांसफर कर दी. इतने बड़े चैनल और इतने बड़े पत्रकार के मामले से बचने के उद्देश्य से नोएडा पुलिस ने केस को फिर गुड़गाँव वापस भेज दिया. कार्रवाई के लिए पुनः प्रार्थना दिए जाने दोनों जगहों की पुलिस एक दूसरे के सिर मामले को टालती रही.

पीड़ित परिवार की ओर से प्रार्थना पत्र आने पर कुछ समाजसेवी संस्थाओं (NGO)ने इसमें हस्तक्षेप कर व्यापक धरना-प्रदर्शन किया. इसके बाद दीपक चौरसिया ने इलाहबाद उच्च न्यायालय के तीन बड़े वकीलों द्वारा अरेस्ट स्टे (बेल) की अर्जी लगा दी. चूँकि पक्की FIR दर्ज नही हुई थी, फिर भी न्यायालय को गुमराह करते हुए, सेटिंग से 18 अप्रैल 2014 को अरेस्ट स्टे ले लिया. इस स्टे को पीड़ित परिवार ने चैलेन्ज किया. 8 अक्टूम्बर 2014 को दीपक चौरसिया का अरेस्ट स्टे इलाहाबाद उच्च न्यायलय ने खारिज कर दिया. अपने आर्डर में कोर्ट ने कहा है कि जब जीरो FIR के आधार पर अभी तक कोई केस दर्ज ही नहीं हुआ है तो बेल का कोई औचित्य नहीं बनता है. 

पीड़ित परिवार ने सुप्रीम कोर्ट में आरोपियों पर पुलिस कार्यवाही की मांग को लेकर अर्जी लगाई थी जिस पर 17 फरवरी 2014 को सुप्रीमकोर्ट ने गुड़गांव और नोएडा दोनों जगहों की पुलिस को जवाब देने का नोटिस दे दिया. सुप्रीम कोर्ट की नोटिस को कोई महत्व ना देते हुए दोनों जगहों की पुलिस इसे आठ महीने तक टालती रही. अंत में सुप्रीम कोर्ट ने 8 अक्तूबर, 2014 को 7 दिन में जवाब देने और 27 अक्तूबर तक केस फाइल करने की म्याद देकर दोनों पुलिस को आर्डर पकड़ा दिया है. इस तरह दीपक चौरसिया के जेल जाने की स्थितियां तैयार होती दिख रही हैं.

मूल खबर…

आसाराम मामले में हाई कोर्ट ने दीपक चौरसिया की ज़मानत अर्जी खारिज की

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इस प्रकरण से जुड़े कुछ वीडियो लिंक….

https://bhadas4media.com/old1/video/viewvideo/775/media-world/noidafinalwithdc.html

https://bhadas4media.com/old1/video/viewvideo/776/media-world/noidadharna03012014.html

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आसाराम मामले में हाई कोर्ट ने दीपक चौरसिया की ज़मानत अर्जी खारिज की

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एक आपराधिक मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इंडिया न्यूज टीवी चैनल के एडिटर-इन-चीफ दीपक चौरसिया की ज़मानत अर्ज़ी खारिज कर दी है। चौरसिया व अन्य पर आसाराम बापू के विषय में आपत्तिजनक कार्यक्रम प्रसारित करने का आरोप है।

इस संबंध में चौरसिया तथा अन्य के विरुद्ध आईपीसी की धारा 469, 471, 120B, आईटी एक्ट की धारा 67B और पाक्सो एक्ट की धारा 13C के अंतर्गत मुक़दमा दर्ज किया गया था। चौरसिया पर आरोप है कि उन्होने आसाराम बापू से संबंधित कुछ दस्तावेजों के साथ छेड़छाड़ की और उन्हे अपने चैनल के शो ‘सलाखें’ में दिखाया।

चौरसिया तथा अन्य पर आसाराम से संबंधित कुछ आपत्तिजनक क्लिपिंग भी दिखाने का आरोप है जो कि आईपीसी के साथ ही आईटी एक्ट और पाक्सो के अंतर्गत अपराध है।

हाई कोर्ट ने ज़मानत अर्जी खारिज करते हुए पुलिस को मामले की जांच आगे बढ़ाने का निर्देश दिया है। पुलिस चौरसिया को इस मामले में गिरफ्तार भी कर सकती है।

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