संजय गुप्ता समेत पूरी जागरण टीम गिरफ्तार न होने का मतलब चुनाव आयोग भी किसी दबाव में है!

Ram Janm Pathak : हेकड़ी, एक्जिट पोल और खानापूरी… चुनाव आयोग के स्पष्ट मनाही की जानकारी होने के बावजूद अगर दैनिक जागरण की आनलाइन साइट ने एक्जिट पोल छापने की हिमाकत की है तो यह सब अचानक या गलती से नहीं हुआ है, जैसा कि उसके स्वामी-संपादक संजय गुप्ता ने सफाई दी है। गुप्ता ने कहा कि यह ब्योरा विज्ञापन विभाग ने साइट पर डाल दिया। अपने बचाव में इससे ज्यादा कमजोर कोई दलील नहीं हो सकती। अखबार के बारे में थोड़ा -बहुत भी जानकारी रखने वाले जानते हैं कि समाचार संबंधी कोई भी सामग्री बिना संपादक की इजाजत के बगैर नहीं छप सकती।

जागरण ने जो किया, सो किया। चुनाव आयोग भी केवल प्रभारी संपादक को गिरफ्तार करके अपनी खानापूरी कर रहा है। इसमें जब तक स्वामी-संपादक संजय गुप्ता समेत पूरी टीम को गिरफ्तार नहीं किया जाता, तब यही समझा जाएगा कि चुनाव आयोग भी किसी दबाव में है और बस ऊपरी तौर पर निष्पक्ष दिखने की कोशिश कर रहा है। वैसे भी चुनाव आयोग इस बार अपनी कोई छाप नहीं छोड़ पा रहा है।

दैनिक जागरण का कारनामा पेड न्यूज जैसा भी लगता है, वर्ना विज्ञापन विभाग की इतनी मजाल नहीं है कि वह संपादकीय स्पेस पर कोई एकतरफा एक्जिट पोल छाप दे। असल में, जागरण की कार्य-संस्कृति ही न्यारी है। लंबे समय तक तो उसमें मालिक ही हर जगह संपादक होता था। मुख्य संपादक के तौर पर तो अब भी उसी का नाम जाता है। लेकिन, जब संस्करणों की संख्या बढ़ गई तो कुछ वैधानिक मजबूरियों की वजह से स्थानीय संपादकों के नाम दिए जाने लगे। उसमें भी संपादकीय विभाग के व्यक्ति का नाम कम ही दिया जाता था, तमाम जगहों पर मैनेजर टाइप के लोग ही संपादक भी होते रहे। बरेली-मुरादाबाद में तो चंद्रकांत त्रिपाठी नामक कथितरूप से एक अयोग्य और भ्रष्ट व्यक्ति लंबे समय तक संपादक बना रहा, जबकि उसी का नाम प्रबंधक के रूप में भी छपता था। उसकी कुल योग्यता मालिक को चिट्ठियां लिखने तक सीमित थीं।

हो सकता है कि गिरफ्तार शेखर त्रिपाठी, भी उसी कुल-परंपरा के हों। जागरण में समस्या यह है कि कोई स्वतंत्रचेता व्यक्ति संपादक हो ही नहीं सकता। मालिकों को गुलाम, झुका हुआ और जी-हजूर चाहिए। लेकिन, एक मरा हुआ, मतिमंद और चाटुकार संपादक किसी न किसी दिन नैया डुबाता ही है। अगर आज दैनिक जागरण ने पूरे देश में हिंदी पत्रकारिता की नाक कटाई है और दुनिया-जहान के सामने हिंदी पत्रकारों को अपमानित किया है तो इसके बीज इस संस्थान की कार्य-संस्कृति में पहले से मौजूद थे।

दुर्भाग्य यह है कि राजनीतिक दल भी ऐेसे लोगों को पोसते हैं। दैनिक जागरण के स्वामी-संपादक (स्वर्गीय) नरेंद्र मोहन को भाजपा ने राज्यसभा में भेजा तो उनके छोटे भाई महेंद्र मोहन को समाजवादी पार्टी ने। राजनीतिक दल अखबारों के मालिकों को अपने पोंछने की तरह इस्तेमाल करते हैं तो अखबार मालिक भी इससे कुछ फायदा चाहते हैं। जागरण पहला अखबार है, जिसने अभी मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिशें लागू नहीं की हैं तो सिर्फ इसलिए की भाजपा से उसकी सांठगांठ है और वह जानता है कि प्रधानमंत्रीजी अंत में उसकी मदद करेंगे। भले ही वह कर्मचारियों का खून ही क्यों न चूसता हो? पूरी पत्रकारिता में दैनिक जागरण अकेला ऐसा अखबार है जो आज भी नियम-कायदों की सबसे कम परवाह करता है, लेकिन किसी सरकार ने आज तक उस पर कोई कारर्वाई नहीं की।

लेकिन, इस बार तो जागरण ने जो किया है, वह हद ही है। कानून का डंडा मालिक-मुख्तार से लेकर सब पर चलना चाहिए। जागरण की हेकड़ी को तोड़ा जाना जरूरी है। गिरावट की सीमा यह भी रही कि इंडियन एक्सप्रेस समूह को छोड़कर इक्का-दुक्का अखबारों ने ही शेखर त्रिपाठी की गिरफ्तारी की खबर छापी, बाकी तमाम अखबार बिरादाराना हक ही निभाते रहे। सोचिए, हम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के कितने विराट स्वर्णिम युग में रह रहे हैं, जहां सबसे बड़ी पाबंदी अखबारवाले खुद ही अपने मुंह पर लगा कर बैठे हुए हैं। हद है। हर चीज की हद है।

कई अखबारों में वरिष्ठ पद पर काम कर चुके पत्रकार राम जन्म पाठक की एफबी वॉल से.

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दैनिक जागरण के मामले में जल्‍दबाज़ी के चलते कहीं गलत कंपनी तो फंस नहीं रही?

Abhishek Srivastava : हर जगह सर्वेक्षण करने वाली कंपनी का नाम RDI (Resource Development International) चल रहा है, चुनाव आयोग ने भी इसी के खिलाफ़ एफआइआर करने का निर्देश दे डाला है जबकि कंपनी के मालिकान सिर पकड़ कर बैठे हैं कि ये क्‍या हो गया। बहुत संभव है कि सर्वेक्षण करने वाली कंपनी का नाम RDI (Research and Developmenr Initiative) है जिसने 2015 के दिल्‍ली विधानसभ चुनाव में भाजपा को 45 सीटें दी थीं। कहीं ऐसा तो नहीं कि दैनिक जागरण के मामले में जल्‍दबाज़ी के चलते गलत कंपनी फंस रही है?

Nityanand Gayen : अब चूंकि आरडीआइ यानी रिसोर्स डेवलपमेंट इंटरनेशनल के प्रबंध निदेशक राजीव गुप्‍ता ने भी इस घटना से अज्ञानता जताते हुए अपना पल्‍ला झाड़ लिया है, तो सवाल उठता है कि क्‍या दि वायर ने तो जल्‍दबाज़ी में कहीं किसी गलत कंपनी को इस मामले में नहीं फंसा दिया।

Atul Chaurasia : जागरण डॉट कॉम के संपादक शेखर त्रिपाठी ने अपनी धक्कमपेल पत्रकारिता से जेल जाकर अपना इहलोक और परलोक दोनों सुधार लिया है. अब वो बाकी जिंदगी आराम से भगवा खेमें को अपनी इस उपलब्धि के सहारे जोतते रहेंगे. जागरण और भगवा के इस पावन प्रेम संबंध को अपना भी हैपी वैलेंटाइन है

पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव, नित्यानंद और अतुल चौरसिया की एफबी वॉल से.

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संजय गुप्त अखबार मालिक नहीं बल्कि एक पार्टी का प्रवक्ता है!

Praveen Malhotra जागरण और नई दुनिया (इंदौर) के मालिक और प्रधान संपादक संजय गुप्त एक पार्टी के प्रवक्ता की तरह काम कर रहे हैं। इस परिवार की यह खूबी है कि सत्ता के साथ निकटता स्थापित कर फायदा उठाया जाए और राज्यसभा की सीट भी प्राप्त कर ली जाये। पेड़ न्यूज़ छापने में भी इन्हें महारत हांसिल है। पत्रकारिता इनके लिए एक व्यवसाय से अधिक कुछ नहीं है।

Ajay Kumar ये पूंजीवाद की बाजारू मीडिया को अब बाजार, पैसा और सत्ता में भागीदारी मिलने के अलावा और कुछ क्यों नहीं दिखायी देता है? खैर इस हरकत से इनका विपक्ष वोट और संगठित हो रहा है.

Mohammad Hasan जागरण अपने संप्रदायिक और बायस के लिये बदनाम है. जब प्रसिद्ध लेखक प्रो. आशुतोश वारषनेय अपनी Ethnic Conflict in India के लिये अलीगढ़ के लिये research कर रहे थे तो जागरण ने खबर छापी कि “लेखक ये जान रहे हैं कि अलीगढ़ में दंगे कैसे कारवाये जा सकते हैं?” ये बात खुद लेखक ने किताब में लिखी है. किताब मेरे पास है.

Mahendra K. Singh इस फ़र्ज़ी पोल के बारे में दूर गॉंवों में लोग अभी तक नहीं जानते हैं। सभी लोग फेसबुक पर नहीं हैं। अतः इस पर आप लोग खबरें लिखिए और खंडन करिये कि यह सर्वे फ़र्ज़ी था और बीजेपी के पक्ष में कोई हवा नहीं बह रही है और उसे अखबारों में छापिये ताकि बीजेपी का एक कुत्सित चेहरा जनता के सामने आये।

Mahesh Saraswat जब बकौल मोदी और भक्तगण यूपीए-2 में मन्त्रियों और सहयोगी दलों के मंत्रियों द्वारा हुए भ्रष्टाचार के लिए मनमोहन सिंह दोषी होते हैं तो एक अखबार में हो रहे भ्रष्टाचार के लिए उसका मालिक कैसे दोषी नहीं है? सरासर दोषी है और बलि का बकरा सपादक को बनाया गया है! शर्मनाक पत्रकारिता

Rajeev Chaturvedi राम ने भरत को राज्य मिले इसके लिये सहर्ष वनवास स्वीकार किया था.. Zee TV वाले सुभाष चंद्रा को राज्य सभा में स्थान मिले इसके लिये सुधीर चौधरी ने तिहाड़ को स्वीकार किया था… दैनिक जागरण के मालिक को राज्य सभा में स्थान मिले इसके लिये इस “लोकतंत्र के चौथे स्तंभ” के संपादक ने जेल को स्वीकार किया है…

Dileep Yadav जागरण एक तरह से बीजेपी के मुखपत्र का काम करता आ रहा है,खबर के शीर्षक कुछ ऐसे गढ़ेजाते हैंकि बस बीजेपी हीरो लगे!

Amar Sharma गुप्ता और उसके वरिष्ठ managers को अविलंब जेल में बंद करने की ज़रूरत है.

Deepak Kumar Yadav बिक गया दैनिक जागरण

Manzar Khan जागरण न्यूज पेपर पूरा पूरी संघियों का दलाल है, सब जानते हैं।

उपरोक्त कमेट्स जिस एफबी पोस्ट पर आए हैं, उसे पढ़ने के लिए नीचे दिए शीर्षकों पर क्लिक करें :

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भोंपू को अख़बार न कहो प्रियदर्शन… जागरण कोई अख़बार है! : विमल कुमार

Vimal Kumar : दो साल की सज़ा या जुर्माना या दोनों एक साथ का प्रावधान है। ये लोग अदालत को मैनेज कर केवल जुर्माना देकर बच जाएंगे। जिसने विज्ञापन दिया उसे भी जेल की सजा हो। जागरण कोई अख़बार है, भोंपू को अख़बार न कहो प्रियदर्शन!

Maheruddin Khan : नेता तो किसी न किसी मामले में गिरफ्तार होते ही रहते हैं… एकाध सम्पादक को भी गिरफ्तार होने दो भाई। और एक पाले खड़े हो जाओ। यह नहीं चलेगा कि सम्पादक ने जो किया उसका समर्थन नहीं करते और गिरफ्तारी का विरोध करते हैं।

Dilip Khan : रत्ती भर भी असहमत नहीं हूं चुनाव आयोग के रुख से। क्राइम किया है। सज़ा मिलनी चाहिए। इसमें भागीदार बिग प्लेयर्स को भी सज़ा होनी चाहिए। क़ानून तोड़ने का ये हल्का मामला नहीं है बल्कि डेमोक्रेटिक तरीके से हो रहे चुनाव को प्रभावित करने का मामला है। उमलेश यादव केस में भी ये अख़बार बच गया था। अगर 2011 में ही इस पर कार्रवाई हो जाती तो फिर से ग़लती रिपीट नहीं करता। लेकिन प्रेस काउंसिल के पास नोटिस देने के अलावा और कोई पावर ही नहीं है। इस बार आचार संहिता के दौरान क्राइम किया है इसलिए सज़ा होनी चाहिए। पत्रकारिता के वृहत्तर लाभ के लिए मैं इस कार्रवाई के साथ हूं।

वरिष्ठ पत्रकार विमल कुमार, मेहरुद्दीन खान और दिलीप खान ने उपरोक्त टिप्पणियां एनडीटीवी के वरिष्ठ पत्रकार प्रिय दर्शन की जिस पोस्ट पर की है, वह इस प्रकार है :

Priya Darshan : मीडिया संपादक पवित्र गाय या कानून से ऊपर नहीं हो सकते। जो जुर्म जैसा है, उसकी वैसी ही सज़ा होनी चाहिए। एक साथी ने इस तथ्य की ओर ध्यान खींचा है कि जागरण ने अपने सैकड़ों कर्मचारियों को मजीठिया के लाभ नहीं दिए और उनको बाहर का रास्ता दिखा दिया। एक अन्य साथी ने बाबरी मस्जिद के दिनों में अखबार की तथ्यहीन रिपोर्टिंग की याद दिलाई। बेशक, इन सबकी लड़ाई लड़ी जानी चाहिए। इसलिए यह कहना जरूरी है कि यह पोस्ट जागरण के पक्ष में नहीं है। चुनाव आयोग के निर्देश के विरुद्ध एग्जिट पोल छापना अनुचित था- इस लिहाज से और ज़्यादा कि वह संस्थान के मुताबिक विज्ञापन यानी ‘पेड न्यूज’ था। लेकिन यह पूरा मामला मीडिया के और भी संकटों को उजागर करता है। १५ एफआइआर कराने और संपादक को गिरफ्तार करने का फ़ैसला कुछ ज़्यादा सख्त है- याद दिलाता हुआ कि व्यवस्थाएं जब चाहती हैं, मीडिया को उसकी हैसियत बता देती हैं। जो लोग शिकायत या गुमान करते हैं कि मीडिया बहुत ताकतवर है, वे देख सकते हैं कि एक गलती पर किस तरह उसकी बांहें मरोड़ी जा सकती हैं। जो लोग मीडिया पर नियंत्रण के लिए और कानूनों की ज़रूरत बताते हैं, उनको समझना चाहिए कि इस देश में मीडिया के खिलाफ कई कानून हैं, मगर मीडिया के लिए अलग से एक भी नहीं। जिस आजादी का मीडिया इस्तेमाल करता है, वह उसे कानूनों से नहीं, इस देश की उदार परंपरा से और विभिन्न मोर्चों पर अपने विश्वसनीय संघर्षों से मिली है। चिंता की बात बस यह है कि आज इस परंपरा पर भी चोट की जा रही है और मीडिया की विश्वसनीयता पर भी खरोंच पड़ी है।

प्रिय दर्शन की उपरोक्त पोस्ट पर आईं कुछ अन्य टिप्पणियां इस प्रकार हैं :

Mangalesh Dabral यह फैसला कोई सख्त नहीं है. अखबार और हिंदी का तथाकथित सबसे बड़ा अखबार होने के नाते उतनी ही बड़ी ज़िम्मेदारी का बोध अनिवार्य होना होता है. क्या वे नादान, अनपढ़ गरीब थे जिन्हें नियमों के बारे में नहीं भी मालूम हो सकता है. या जानबूझकर नियमों को धता बताने वाले राजनीतिक माफिया? आपको याद होगा, अयोध्या में बाबरी विध्वंस से कुछ दिन पहले हुई परिक्रमा और कार सेवा के दौरान गोली चली जिसमें चार-पाच लोगों के मारे जाने की अपुष्ट खबर आयी. हिंदी के एक अखबार के डाक संस्करण में यह संख्या छपी, फिर दूसरा ‘कारसेवक’ प्रभारी आया तो उसका यह संख्या देखकर मन नहीं भरा और उसने एक शून्य बढ़ा कर पचास मृतक बता दिए, फिर जब नगर संस्करण आया तो उसमें प्रभारी महोदय ने इसमें एक शून्य और जोड़कर मृतकों की संख्या पांच सौ कर दी.मकसद था तनाव, वैमनस्य और अंततः दंगा भड़काना. क्या यह पत्रकारिता है? यह विवरण महान कवी रघुवीर सही की उस रपट में दर्ज है जो उन्होंने प्रेस कौंसिल के निवेदन पर फैक्ट फाइंडिंग ईम के रूप- में लिखी थी.

Abhiranjan Kumar सर, बात आपकी भी सही है। लेकिन समस्या यह है कि चुनाव में हर रोज़ बड़े नेता जाति और धर्म के नाम पर वोट मांग रहे हैं, जो सुप्रीम कोर्ट के हालिया फ़ैसले के मुताबिक भी अनुचित है, लेकिन चुनाव आयोग उन नेताओं को जेल में नहीं डाल रहा। आचार संहिता उल्लंघन में फंस गया एक संपादक, जिससे ग़लती तो ज़रूर हुई, लेकिन मेरी राय में उसका सिर्फ़ कंधा रहा होगा, बंदूक किसी और की रही होगी, जिसे दुनिया “मालिक” कहती है।

एक लक्ष्मण-रेखा तो सबके लिए होनी ही चाहिए। नेता, अभिनेता, ब्यूरोक्रैट, बिजनेसमैन… इन सबसे ज़रा-सी चूक हुई नहीं कि हम लोग उन्हें फ़ौरन कानून के चंगुल में देखना चाहते हैं, लेकिन अपनी ग़लतियों पर हम आज़ादी की दुहाई देने लगते हैं। इस मामले में संबंधित संपादक पर अधिक सख्ती हो गई, यह मानने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन फिर यह सवाल भी उठेगा कि क्या एक टीवी चैनल के संपादक पर भी अधिक सख्ती हो गई थी, जिन्हें शायद महीना भर या उससे भी अधिक समय तक जेल में रहना पड़ा था? अनजाने में या अनभिज्ञता में किसी से भी ग़लती हो सकती है… हमसे भी और आपसे भी… पर जो ग़लतियां मीडिया के द्वारा इन दिनों जान-बूझकर की जाती हैं, क्या उनके प्रति भी हमें उतना ही सहिष्णु रहना चाहिए? ये कुछ सवाल उठाते हुए भी मोटे तौर पर मैं आपकी मूल भावना के साथ हूं। अगर पेड न्यूज़ का मामला है तो संपादक को नहीं, मालिक को जेल होनी चाहिए। कोई संपादक अपनी मर्ज़ी से पेड न्यूज़ छाप ही नहीं सकता। उस पर मालिकों का दबाव रहता है, इसलिए उसे ऐसे अनैतिक काम करने पड़ते हैं। अक्सर हमारी व्यवस्था गोली चलाने वालों को फांसी दे देती है, लेकिन गोली चलवाने वाले को सबूतों के अभाव में बरी कर देते हैं। कई बार बरी कर देना तो दूर, उनके गिरेबान तक हाथ तक नहीं पहुंच पाते और आप जो “पवित्र गाय” शब्द का इस्तेमाल कर रहे हैं, वह वही “पवित्र गाय” बने रहते हैं।

Ajeet Singh जहां कहीं भी सांप्रदायिक तनाव या विवाद होता है, वहां दैनिक जागरण की रिपोर्टिंग देखिए। ये एग्जिट पोल वाली ग़लती छोटी लगने लगेगी। केस स्टडी के तौर पर मुज़फ्फरनगर दंगों को ले सकते हैं। बहरहाल, इस मामले में अकेले संपादक को दोषी मानना सही नहीं है। किसी पार्टी या विचारधारा का मुखपत्र होना अपराध नहीं है। लेकिन जागरण या कई अन्य मीडिया समूह विश्वास और उदारता की परंपरा के साथ जो खिलवाड़ कर रहे हैं, वह कहीं ज्यादा खतरनाक है।

Aflatoon Afloo CrPC की धारा 144 का उल्लंघन करने पर IPC की धारा 188 के अन्तर्गत सजा होती है। अधिकतर उसी दिन कोर्ट उठने तक की और अधिकतम हफ्ता भर की।मेरी स्पष्ट मान्यता है कि उन्हें झूठ बोलने की भी आजादी है।उसके साथ यदि उससे देश का कोई कानून टूटता हो तो उसे कबूलना भी चाहिए। अधिकतम दो साल की सजा के प्रावधान की पूरी सजा कितनो को मिली है यह जानने लायक है।

Mahesh Punetha मेरा मानना है कि संपादक से पहले अखबार पर कार्यवाही होनी चाहिए. संपादक तो बेचारा है, मालिक जैसा कहे उसे वैसा करना है.

Ramesh Parashar ये व्यापारियों और चाटुकारों का दौर है! मीडिया इस गंदगी मे निर्लज्जता की हद तक लोट लगा रहा है! सामाजिक ज़िम्मेदारी या राष्ट्रीय हित जैसी बातें उसके लिये बेमानी हैं? चारण भांड की भूमिका से भी उसे परहेज़ नहीं? सियासत ने अपनी गंदगी से उसे भी नहला दिया! लोगों का भरोसा भी अब उस पर नहीं! वैसे ‘ जागरण ‘ पर पार्टी विशेष का ठप्पा तो वर्षों से है, निष्पक्ष तो रह नहीं गया?

Jeevesh Prabhakar चुनाव संपन्न होने यानि 11 मार्च तक अखबार के प्रकाशन पर रोक लगा दो…चूलें हिल जायेंगी ….विज्ञापन विभाग तो बहाना है….. बिना मालिक की अनुमति के ऐसा कर पाना संभव ही नहीं है…. मालिक को भी जेल होनी चाहिए…

पूरे मामले को जानने-समझने के लिए नीचे दिए शीर्षकों पर क्लिक करें :

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यशवंत की जागरण कर्मियों को सलाह- संजय गुप्ता की गिरफ्तारी के लिए चुनाव आयुक्त को पत्र भेजो

Yashwant Singh : दैनिक जागरण का संपादक संजय गुप्ता है. यह मालिक भी है. यह सीईओ भी है. एग्जिट पोल वाली गलती में यह मुख्य अभियुक्त है. इस मामले में हर हाल में गिरफ्तारी होनी होती है और कोई लोअर कोर्ट भी इसमें कुछ नहीं कर सकता क्योंकि यह मसला सुप्रीम कोर्ट से एप्रूव्ड है, यानि एग्जिट पोल मध्य चुनाव में छापने की कोई गलती करता है तो उसे फौरन दौड़ा कर पकड़ लेना चाहिए. पर पेड न्यूज और दलाली का शहंशाह संजय गुप्ता अभी तक नहीं पकड़ा गया है.

संजय गुप्ता ने पिछले कुछ वर्षों में मजीठिया वेज बोर्ड के तहत सेलरी और बकाया मांगने वाले सैकड़ों लोगों को संस्थान से बाहर कर दिया. इन्हें और इनके परिजनों को भूखों मरने को मजबूर कर दिया. लगता है ईश्वर ने बदला लेने का मौका जागरण के उन पूर्व कर्मियों को दे दिया है जिनके पेट पर संजय गुप्ता ने लात मारा था. इन सभी साथियों को चुनाव आयोग को लेटर लिख कर एग्जिट पोल छापने के मुख्य अभियुक्त संजय गुप्ता को फौरन अरेस्ट करने की मांग करनी चाहिए.

लगातार चिट्ठी मेल भेजे जाने से चुनाव आयोग पर असर पड़ेगा. संजय गुप्ता बाहर क्यों? संजय गुप्ता को तो जेल में होना चाहिए. संजय गुप्ता दिखा रहा चुनाव आयोग को ठेंगा. गिरफ्तारी से बचने के लिए संजय गुप्ता ने पुलिस प्रशासन और सिस्टम को अपने अनुकूल किया. ऐसे वाक्य लिख लिख कर चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त को मेल करिए. लोहा गरम है. एक हथौड़ा भी काम कर सकता है. तो देर न करिए दोस्तों. चूकिए नहीं. फौरन आगे बढ़िए और शाम तक सौ पचास मेल तो करा ही दीजिए.

भड़ास के एडिटर यशवंत की एफबी वॉल से. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com

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संपादक तो फ़िज़ूल में गिरफ़्तार हो गया, गिरफ़्तारी गुप्ता बंधुओं की होनी चाहिये : देवेंद्र सुरजन

Devendra Surjan : एक्ज़िट पोल छापने वाले जागरण परिवार की पूर्व पीढ़ी के दो और सदस्य सांसद रह चुके हैं. गुरुदेव गुप्ता और नरेन्द्र मोहन. यह परिवार सत्ता की दलाली हमेशा से करता आ रहा है. वर्तमान में जागरण भाजपा का मुखपत्र बना हुआ है. सत्ताधीशों का धन इसमें लगा होने की पूरी सम्भावना है. हर राज्य में किसी न किसी नाम से और किसी न किसी रूप में संस्करण निकाल कर सरकार के क़रीबी बना रहना इस परिवार को ख़ूब आता है. एक्ज़िट पोल छाप कर सम्पादक तो फ़िज़ूल में गिरफ़्तार हो गया जबकि गिरफ़्तारी गुप्ता बंधुओं की होनी चाहिये थी.

Arun Maheshwari : यह भारतीय पत्रकारिता का संभवत: सबसे काला दौर है। अख़बारों और मीडिया की मिल्कियत का संकेंद्रण, हर पत्रकार पर छटनी की लटकती तलवार और ट्रौल का तांडव – इसने डर और आतंक के एक ऐसे साये में पत्रकारिता को ले लिया है, जिसके तले इसके स्वस्थ आचरण की सारी संभावनाएँ ख़त्म हो रही हैं। सोशल मीडिया तक को नहीं बख़्शा जा रहा है। हमारे देश का संभवत: अब तक का सबसे जघन्य घोटाला व्यापमं, जिसमें सत्ता के घिनौने चरित्र का हर पहलू अपने चरम रूप में उजागर हुआ है, उस पर न सिर्फ सरकारी जाँच एजेंसियाँ कुंडली मार कर बैठी हुई है, बल्कि अबखबारों में भी इसकी कोई चर्चा नहीं है। बीच-बीच में सुप्रीम कोर्ट की तरह की संस्थाओं के फैसले भी इसको चर्चा में लाने में असमर्थ रह रहे हैं। चारों और एक अजीब सा संतुलन करके चलने का भाव पसरा हुआ है। इसमें जो लोग मोदी जी को अपने को सौंप दे रहे हैं, उनके सिवाय बाक़ी सभी तनाव में रह रहे हैं । ऐसा तो शायद आंतरिक आपातकाल के दौरान भी इतने लंबे काल तक नहीं हुआ था। यह भारतीय पत्रकारिता को पूरी तरह से विकलांग बना देने का दौर चल रहा है।

Urmilesh इस परिवार के एक सेठ को मुलायम सिंह यादव ने राज्य सभा में भेजा था।

Indra Mani Upadhyay ‘महेंद्र मोहन गुप्त’ को सपा ने राज्यसभा में भेजा था।

Om Thanvi इस बार इनकार कर दिया।

Situ Sharma आपने तो पोस्ट में बीजेपी का जिक्र किया है! फिर इनकार से सपा का क्या ताल्लुक..? सर

Om Thanvi ताल्लुक़ बहुत साफ़ है। सपा ने मना किया तो उन्हें फ़र्ज़ी पोल से सबक़ दिया जाएगा, भाजपा ख़ुश होगी, आगे भला करेगी जैसे अतीत में किया था।

Aneesh Rai दोबारा नहीं भेजा, इसीलिए तो नाराज हैं ।

Atul Tiwari अवसरवादी बिजनेसमैन हैं।

वरिष्ठ पत्रकार देवेंद्र सुरजन, अरुण माहेश्वरी, उर्मिलेश आदि के ये कमेंट जिस फेसबुक पोस्ट पर आए हैं, उसे पढ़ने के लिए नीचे दिए शीर्षक पर क्लिक करें :

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जागरण का मालिक और सीईओ संजय गुप्ता ने पेड न्यूज करने के धंधे को कुबूल कर लिया

Om Thanvi : इंडियन एक्सप्रेस में जागरण के सम्पादक-मालिक और सीईओ संजय गुप्ता ने कहा है कि उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव में दूसरे चरण के मतदान से पहले जागरण द्वारा शाया किया गया एग्ज़िट पोल उनके विज्ञापन विभाग का काम था, जो वेबसाइट पर शाया हुआ। (“Carried by the advertising department on our website”) माने साफ़-साफ़ पेड सर्वे!

दूसरे शब्दों में जागरण ने पैसा लिया (अगर लिया; किससे, यह बस समझने की बात है) और कथित मत-संग्रह किसी अज्ञातकुलशील संस्था से करवा कर शाया कर दिया कि चुनाव में भाजपा की हवा चल रही है। जैसा कि स्वाभाविक था, इस फ़र्ज़ी एग्ज़िट पोल को भाजपा समर्थकों-प्रचारकों ने सोशल मीडिया पर हाथों-हाथ लिया और अगले चरण के चुनाव क्षेत्रों में दूर-दूर तक पहुँचा दिया। सोशल मीडिया पर ही इसकी निंदा और चुनाव आयोग की हेठी न हुई होती तो कौन जाने कल के मतदान से पहले यह बनावटी हवा का हल्ला अख़बार में भी छपा मिलता!

उस सम्पादक से सहानुभूति होती है, जिसे बलि का बकरा बनाया गया है। व्यवहार में विज्ञापन विभाग मालिक/प्रबंधन के मातहत काम करता है। वैसे भी ऐसे सर्वे, एग्ज़िट पोल आदि पर बहुत धन व्यय होता है, “कमाई” भी होती है – इस सबसे सम्पादकीय विभाग का क्या वास्ता? यह वास्तव मालिकों-प्रबंधकों का गोरखधंधा है, जो बचे ही नहीं रहेंगे संसद में भी पहुँच जाएँगे (क्योंकि सच्चरित्र लोगों को संसद में भरने का मोदीजी का वादा है!)। वैसे भी जागरण के प्रधान सम्पादक संजय गुप्ता ख़ुद हैं। उनके पिता मेरे परिचित थे और पड़ोसी भी। उन्हें भाजपा ने राज्यसभा में भेजा था। पर असल सवाल यह है कि इस पोल की पोल खुल जाने के बाद भाजपा की “हवा” का क्या होगा? रही-सही हवा भी निकल नहीं जाएगी?

जनसत्ता अखबार के संपादक रहे जाने माने पत्रकार ओम थानवी की एफबी वॉल से.

पूरे मामले को जानने-समझने के लिए इन्हें भी पढ़ें…

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दैनिक जागरण प्रबंधन ने अपने सभी संपादको को भूमिगत होने का निर्देश दिया!

खोज खोज कर जागरण सम्पादकों को पकड़ रही है पुलिस… चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन के मामले में देश की सर्वोच्च चुनावी अथॉरिटी चुनाव आयोग द्वारा दैनिक जागरण के 15 जिलों के संपादकों सहित प्रधान संपादक और प्रबंध निदेशक के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के निर्देश का अनुपालन करते हुए यूपी पुलिस संपादकों को गिरफ्तार करने में जुट गई है. शेखर त्रिपाठी को गिरफ्तार कर लिया गया और बाद में उन्हें जमानत मिल गई.

दैनिक जागरण में आज इस बात की भी चर्चा रही कि शेखर त्रिपाठी सिर्फ एक मोहरा मात्र हैं जिन्हें गाजियाबाद स्थित उनके घर से गिरफ्तार कराकर दैनिक जागरण के प्रबंध निदेशक संजय गुप्ता अपने बचने का एक रास्ता खोज रहे हैं. सूत्रों का तो यहाँ तक कहना है कि सोमवार की रात जागरण कार्यालय में वकीलों की भारी भरकम एक टीम भी पहुंची थी तथा प्रबंधन द्वारा दैनिक जागरण के सभी संपादकों को भूमिगत होने का निर्देश दिया गया है.

पुलिस अब 15 जिलों के संपादकों / ब्यूरो चीफों को गिरफ्तार करने की तैयारी में है. चुनाव आयोग के आदेश के बाद दैनिक जागरण के संपादकों और प्रबंध निदेशक की अकल ठिकाने आ गयी है. पुलिस ने लखनऊ और दिल्‍ली में दैनिक जागरण के कई संपादकों के ठिकानों पर छापेमारी की. पुलिस ने जागरण न्‍यू मीडिया की सीईओ सुकीर्ति गुप्‍ता, जागरण इंग्लिश ऑनलाइन के डिप्‍टी एडिटर वरुण शर्मा और डिजीटल हैड पूजा सेठी के घरों पर भी छापे मारे.

इससे पहले चुनाव आयोग के आदेश पर पुलिस ने शेखर त्रिपाठी, दैनिक जागरण के कार्यालय और सर्वे करने वाली संस्‍था आरडीआई के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी. इनके खिलाफ उत्‍तर प्रदेश के पहले चरण के चुनाव के बाद एग्जिट पोल प्रकाशित करने का आरोप है. बताते हैं कि चुनाव आयोग ने पहले चरण के 15 जिला निर्वाचन अधिकारियों को सर्वे करने वाली संस्‍था ‘रिसोर्स डेवलपमेंट इंटरनेशनल प्राइवेट लिमिटेड और दैनिक जागरण के प्रबंध सम्पादक, संपादक या मुख्य संपादक  के खिलाफ तत्‍काल एफआईआर दर्ज कराने का आदेश दिया था.

शशिकान्त सिंह

पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट

मुंबई

9322411335

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दैनिक जागरण के सम्पादक शेखर त्रिपाठी को मिली जमानत

चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन के मामले में देश की सर्वोच्च चुनावी अथॉरिटी चुनाव आयोग द्वारा दैनिक जागरण के 15 जिलों के संपादकों सहित प्रधान संपादक और प्रबंध निदेशक के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया गया था। इस आदेश के बाद दैनिक जागरण के संपादकों और प्रबंध निदेशक की अकल ठिकाने आ गयी है। खबर है कि दैनिक जागरण अखबार के ऑनलाइन सम्पादक शेखर त्रिपाठी को आचार संहिता का उल्‍लंघन करने पर गिरफ्तार किया गया। बाद में गाजियाबाद की जिला अदालत ने शेखर त्रिपाठी को जमानत दे दिया।

गाजियाबाद पुलिस ने सोमवार की रात उन्‍हें गिरफ्तार किया था। साथ ही लखनऊ और दिल्‍ली में भी दैनिक जागरण के कई संपादकों के ठिकानों पर छापेमारी भी की गयी। पुलिस ने जागरण न्‍यू मीडिया की सीईओ सुकीर्ति गुप्‍ता, जागरण इंग्लिश ऑनलाइन के डिप्‍टी एडिटर वरुण शर्मा और डिजीटल हैड पूजा सेठी के घरों पर भी छापे मारे। इससे पहले चुनाव आयोग के आदेश पर पुलिस ने शेखर त्रिपाठी, दैनिक जागरण के कार्यालय और सर्वे करने वाली संस्‍था आरडीआई के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी। इनके खिलाफ उत्‍तर प्रदेश के पहले चरण के चुनाव के बाद एग्जिट पोल प्रकाशित करने का आरोप है।

बताते हैं कि चुनाव आयोग ने पहले चरण के 15 जिला निर्वाचन अधिकारियों को सर्वे करने वाली संस्‍था ‘रिसोर्स डेवलपमेंट इंटरनेशनल प्राइवेट लिमिटेड’ और दैनिक जागरण के प्रबंध सम्पादक, संपादक के खिलाफ तत्‍काल एफआईआर दर्ज कराने का आदेश दिया था। आयोग के प्रवक्ता ने कहा कि रिसोर्स डेवलपमेंट इंटरनेशनल के मतदान बाद किये गये सर्वेक्षण के नतीजे का एक हिंदी दैनिक द्वारा प्रकाशन करना ”जन प्रतिनिधित्व कानून” की धारा अनुच्छेद 126ए और बी का स्पष्ट उल्लंघन है और भारतीय दंड संहिता की धारा 188 के तहत चुनाव आयोग के कानून संबंधी निर्देशों का जानबूझकर पालन नहीं करना है।

उधर दैनिक जागरण में आज इस बात की भी चर्चा रही कि शेखर त्रिपाठी सिर्फ एक मोहरा मात्र हैं जिन्हें गाजियाबाद स्थित उनके घर से गिरफ्तार कराकर दैनिक जागरण के प्रबंध निदेशक संजय गुप्ता ने अपने बचने का एक रास्ता खोज लिया है। सूत्रों का तो यहाँ तक कहना है कि सोमवार की रात जागरण कार्यालय में वकीलों की भारी भरकम एक टीम भी पहुंची थी। शेखर त्रिपाठी की कभी उत्तर प्रदेश में तूती बोलती थी मगर कुछ बड़े आरोप लगने के बाद उन्हें जागरण ने डिजिटल से जोड़ दिया और इनके पावर को कम कर दिया गया था।

शशिकान्त सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
मुंबई
9322411335

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एग्जिट पोल छापने वाले जागरण के संपादक शेखर त्रिपाठी गिरफ्तार

दैनिक जागरण डॉट कॉम के संपादक शेखर त्रिपाठी को गाजियाबाद की कविनगर पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है. दैनिक जागरण की वेबसाइट पर यूपी चुनाव के पहले चरण के बाद ही एग्जिट पोल दे दिया गया. इस पर चुनाव आयोग ने दैनिक जागरण के  प्रबंध संपादक, संपादक और एग्जिट पोल कराने वाली संस्था रिसोर्स डेवलपमेंट इंटरनेशनल प्राइवेट लिमिटेड यानि आरडीआई के खिलाफ केस दर्ज करने के आदेश दिए थे. इसी के बाद पहली गिरफ्तारी जागरण डॉट कॉम के संपादक शेखर त्रिपाठी के रूप में हुई है. कुछ लोगों का कहना है कि संभव है बीजेपी से खबर चलने के लिए पैसा लिया होगा मालिक ने, लेकिन जेल गए शेखर त्रिपाठी.

यूपी में 11 फरवरी को पहले चरण के चुनाव हुए थे. इनमें पश्चिमी यूपी की 73 सीटों पर वोट डाले गए थे.  इन्हीं सीटों के एग्जिट पोल जागरण ने अपनी वेबसाइट पर डाले थे. दैनिक जागरण की ओर से सफाई भी दी गई है. जागरण की ओर से कहा गया है- ‘’डिजिटल इंग्लिश प्लेटफॉर्म के अलावा एग्जिट पोल से संबंधित खबर दैनिक जागरण अखबार में नहीं छापी गयी. इंग्लिश वेबसाइट पर एग्जिट पोल से जुड़ी एक खबर अनजाने में डाली गयी थी, इस भूल को फौरन सुधार लिया गया और संज्ञान में आते ही वरिष्ठ अधिकारियों की तरफ से संबंधित न्यूज रिपोर्ट को तुरंत हटा दिया गया था.’’

लेकिन चुनाव आयोग अपने आदेश पर कायम रहा. जिसके बाद 15 जिलों में जागरण और आरडीआई के खिलाफ केस दर्ज किए गए. चुनाव के सभी चरणों का मतदान पूरा होने से पहले एग्जिट पोल छापना आयोग के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन है. जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 126 ए के मुताबिक यूपी चुनाव पर कोई भी व्यक्ति, 4 फरवरी की सुबह 7 बजे से लेकर 8 मार्च के शाम साढ़े 5 बजे तक कोई एग्जिट पोल नहीं कर सकता या इनके नतीजों को प्रिंट या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर प्रकाशित नहीं कर सकता. दोषी पाए जाने पर दो साल की कैद या जुर्माना या दोनों ही सजा का प्रावधान है.

पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट शशिकांत सिंह की रिपोर्ट.

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