काला धन और टैक्स चोरी का प्रकरण जब-जब उठेगा, अमिताभ बच्चन का नाम जरूर आएगा!

पनामा पेपर्स के बाद अब पैराडाइज़ पेपर्स में भी अमिताभ बच्चन का नाम! जहां कहीं टैक्स चोरी और काला धन का नाम आता है तो उसमें अमिताभ बच्चन जरूर होता है. कौन बनेगा करोड़पति के पहले सीजन के बाद अमिताभ ने एक विदेशी कंपनी में पैसा लगाया था. इंडियन एक्सप्रेस में Paradise Papers Leak के भारत के मामले की खबर आज छपी है. इंडियन एक्सप्रेस इंटरनेशनल कॉन्सार्शियम ऑफ इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट यानि आईसीआईजे का सदस्य है.

आईसीआईजे ने कर चोरों के स्वर्ग माने जाने वाले देशों की कंपनियों से मिले एक करोड़ 34 लाख दस्तावेज में भारत से संबंधित दस्तावेज की पड़ताल इंडियन एक्सप्रेस को सौंपी. इस खुलासे से पता चलता है कि अमिताभ बच्चन ने केबीसी 2000-02 में प्रसारित पहले सीजन के बाद बरमूडा की एक डिजिटल मीडिया कंपनी में हिस्सेधार बना. साल 2004 में भारतीय रिजर्व बैंक के नियमानुसार सभी भारतीयों को विदेश में निवेश की जानकारी आरबीआई को देनी होती थी.  अमिताभ बच्चन और सिलिकॉन वैली के वेंचर इन्वेस्टर नवीन चड्ढा ‘जलवा मीडिया लिमिटेड’ के 19 जून 2002 को शेयरधारक बने. यह जानकारी बरमूडा की कंपनी एप्पलबी के दस्तावेज से मिली है. ये कंपनी बरमूडा में 20 जुलाई 2002 को बनी. साल 2005 में इसे खत्म कर दिया गया.

जलवा मीडिया की स्थापना चार भारतीय एंटरप्रेन्योर ने कैलिफोर्निया में की थी. इसकी भारतीय इकाई जलवा डॉट कॉम इंडिया प्राइवेट लिमिटेड जो बाद में जलवा मीडिया इंडिया प्राइवेट लिमिटेड में कनवर्ट हो गई, फरवरी में बनी. बाद में जुलाई में बरमूडा में एक तीसरी कंपनी बनी. जर्मन अखबार Süddeutsche Zeitung को बरमूडा की कंपनी एप्पलबी, सिंगापुर की कंपनी एसियासिटी ट्रस्ट और कर चोरों के स्वर्ग समझे जाने वाले 19 देशों में कराई गई कार्पोरेट रजिस्ट्रियों से जुड़े करीब एक करोड़ 34 लाख दस्तावेज मिले. जर्मन अखबार ने ये आईसीआईजे के साथ साझा किया. इंडियन एक्सप्रेस ने आईसीआईजे का सदस्य होने के नाते भारत से जुड़े दस्तावेजों की पड़ताल की.

जुलाई 2000 में जलवा-इंडिया ने कंपनी में करीब 32 लाख डॉलर का निजी निवेश हासिल करने की घोषणा की थी. निवेशकों में कैलिफोर्निया के बिजट्रो चेयरमैन नवीन चड्ढा भी शामिल थे. जलवा मीडिया ने 1.5 करोड़ डॉलर वेंचर इन्वेस्टमेंट हासिल करने को अपना लक्ष्य बताया. जलवा मीडिया को इस निवेश से पहले ही लंदन के मिलेनियम डोम से इंटरनेशनल इंडियन फिल्म एकैडमी के लाइव वेबकास्ट का अधिकार मिल चुका था. कंपनी ने अक्टूबर 2000 में ‘देखो फिल्म डॉ़ट कॉम’ नामक वेबसाइट लॉन्च की. इसने अमेरिकी कंपनी आईबीएम से जून 2001 में मीडिया एंड एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री की वेबसाइट के लिए एक कंटेट मैनेजमेंट सोल्यूशन देने का समझौता किया. जलवा ने मुंबई में अपना डिजिटल मीडिया इन्नोवेशंस लैब्रोटरी की भी शुरुआत की. आईबीएम से समझौते के साल भर बाद अमिताभ बच्चन और चडढा को एप्पलबी के जलवा-बरमूडा दस्तावेज में निवेशक बताया गया.

इस कंपनी से जुड़े तीन लोगों उर्शित पारिख, गौतम आनंद और शैलेंद्र पी सिंह ने साल 2004 तक कंपनी छोड़ दी. 28 अक्टूबर 2005 को द बरमूडा सन अखबार में नोटिस प्रकाशित हुई कि जलवा बरमूडा कर्जदार है और उसे भंग किया जाता है. एप्पलबी ने भी जलवा बरमूडा को 14 जनवरी 2004 से सेवाएं देना बंद कर दिया. जलवा इंडिया कॉर्पोरेट अफेयर्स मंत्रालय की “ईजी एग्जिट स्कीम 2011” के आने तक कागज पर मौजूद रही. कंपनी ने इस योजना का लाभ उठाते हुए बताया कि कंपनी कारोबार सफल न होने से छह सालों से निष्क्रिय है.

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पैराडाइज पेपर्स में फंसा भाजपा सांसद आरके सिन्हा ने लिख कर कहा- ‘सात दिन के भागवत यज्ञ में मौन व्रत हूं’

Shahnawaz Malik : साल 2017 की‌ सबसे बड़ी ख़बर पैराडाइज़ पेपर्स के मार्फ़त कर चोरी और काले धन पर हुआ ख़ुलासा है। और, किसी रिपोर्टर को साल 2017 में दिया गया सबसे शानदार जवाब आरके सिन्हा का है। सवाल पूछने पर रिपोर्टर से कलम मांग कर सिन्हा ने काग़ज़ पर लिख दिया, ‘सात दिन के भागवत यज्ञ में मौन व्रत हूं’…

Syed Mazhar Husain : बीजेपी सांसद आरके सिन्हा ने #paradisepapers में नाम आने के बारे में पूछे गए सवाल पर लिखकर बताया, ‘7 दिन के भागवत यज्ञ में मौनव्रत है। “न खाऊँगा और न खाने दूंगा”… इन सबको पकिस्तान कब भेजा जायेगा?

Vijender Masijeevi : किसी किसी को अब भी उम्मीद है कि पैराडाइज पेपर्स से हमारे देश में कोई कार्रवाई होगी। सच में। दुनिया भोलेपन से खाली नहीं हुई है अभी।

पत्रकार शाहनवाज मलिक, सैय्यद मजहर हुसैन और विजेंद्र मसिजीवी की एफबी वॉल से.

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पैराडाइज पेपर्स में अमिताभ बच्चन, आरके सिन्हा, जयंत सिन्हा समेत 714 भारतीयों के नाम

Priyabhanshu Ranjan : दि इंडियन एक्‍सप्रेस ने रविवार रात 12.30 बजे से पैराडाइज़ पेपर्स पर 40 किस्‍तों पर अपनी स्‍टोरी की श्रृंखला शुरू की है लेकिन इंटरनेशनल कंसोर्शियम ऑफ इनवेस्टिगेटिव जर्नलिस्‍ट्स की वेबसाइट से पता चलता है कि ऑफशोर कंपनियों में पैसा लगाने वाले दो बड़े नेताओं का नाम कुल 714 लोगों की सूची में शामिल है। ये दोनों नेता सत्‍ताधारी पार्टी बीजेपी से हैं- सांसद आरके सिन्‍हा और नागरिक उड्डयन मंत्री जयन्‍त सिन्‍हा।

आप तो जानते ही हैं कि मोदी जी भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए ही धरती पर अवतरित हुए हैं। तभी #PanamaPapers का मामला उन्होंने जादू से छू मंतर कर दिया। कुछ याद है आपको? अब #ParadisePapers के मामले को भी अपने प्रभावी सड़क छाप भाषणों से फ़ना कर देंगे। ये भ्रष्टाचार से लड़ने का Gujarat Model है! वैसे, पैराडाइज पेपर्स में जयंत सिन्हा… रवीन्द्र किशोर सिन्हा… अमिताभ बच्चन… के नाम हैं… हां, मैंने इनकी जाति ढूंढ ली है 😉 ये कहीं कायस्थों को बदनाम करने की साज़िश तो नहीं 🙂

Narendra Nath : आज हुए खुलासे के अनुसार पूरे विश्व में भारत “Ease Of Hiding Tax and Making Black Money” में 19 वें नंबर पर हैं। जिस तरह के नाम इसमें हैं, उससे मेरा दावा है कि सरकार और विपक्ष “सब मिले हुए हैं जी” के फार्मूले के साथ चुप ही रहेंगे। और, हर खुलासे के बाद अमिताभ बच्चन के प्रति धारणा और मजबूत होती है। मंगल ग्रह पर भी ब्लैक मनी की बात होगी तो अगर एक शख्स का नाम आएगा तो शायद इनका आए। वही बच्चन जी जो आजकल लोगों को टैक्स देने और बेहतर नागरिक बनने के सरकार से फीस लेकर विज्ञापन कर रहे हैं।

Anil Jain : अमिताभ बच्चन ने अपनी कामयाबी के झंडे अभिनय और विज्ञापन के क्षेत्र में ही नहीं गाडे हैं, बल्कि एक निवेशक के तौर पर भी वे लगातार अपने कौशल का प्रदर्शन कर रहे हैं। पनामा पेपर्स के बाद पैराडाइज पेपर्स में भी उनका नाम अपनी जगह बनाने में कामयाब रहा है।

Satyendra PS : एक साल पहले जब पनामा पेपर्स में टैक्स हैवन्स देशों में कंपनियां बना कर टैक्स चोरी करने वालों नाम आया तो बड़ी उम्मीद जगी थी कि काला धन खत्म करने के नाम पर बड़ी-बड़ी बातें करने वाली मोदी सरकार अब इन्हें धर दबोचेगी। जिस सरकार के मंत्री पाकिस्तान को नरक कहते थे वहां पनामा पेपर्स के नाम पर पीएम नवाज शरीफ की गद्दी चली गई। लेकिन खोजी पत्रकारों की स्टोरी में बॉलीवुड से लेकर बिजनेस वर्ल्ड के नामी-गिरामी लोगों के नाम आने के बाद भी अपने यहां किसी का भी बाल बांका नहीं हुआ।

पत्रकार प्रियभांशु रंजन, नरेंद्र नाथ, अनिल जैन और सत्येंद्र पी सिंह की एफबी वॉल से.

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साल 2017 की‌ सबसे बड़ी ख़बर… पैराडाइज़ पेपर्स के मार्फ़त कर चोरी और काले धन पर ख़ुलासा…

Dilip Khan : पनामा पेपर्स में जिनके नाम थे उनमें से कुछ को मोदी जी ने ब्रैंड एंबैसेडर बना लिया, कुछ ज़ुबां केसरी बोलने लगे, कुछ समय-समय पर सरकार को “नीतिगत” समर्थन जताने लगे। एक को ये सब करने की ज़रूरत नहीं पड़ी क्योंकि वो ख़ुद बीजेपी में थे और एक के छोटे भाई का नाम गौतम अडानी है, तो उन्हें किसी चीज़ का डर क्यों हो! अब पैराडाइज़ पेपर्स वालों के लिए पहले से एक मॉडल तैयार है। वो चाहे तो पनामा वालों की कॉपी कर सकते हैं। इनमें तो केंद्रीय मंत्री तक के नाम शामिल है। वे कोई न कोई व्यवस्था कर ही देंगे। दो दिन बाद सरकार काला धन विरोधी दिवस मना कर इन्हें भी ब्रैंड एंबैसेडर बना सकती है।

Shahnawaz Malik : साल 2017 की‌ सबसे बड़ी ख़बर पैराडाइज़ पेपर्स के मार्फ़त कर चोरी और काले धन पर हुआ ख़ुलासा है। और, किसी रिपोर्टर को साल 2017 में दिया गया सबसे शानदार जवाब आरके सिन्हा का है। सवाल पूछने पर रिपोर्टर से कलम मांग कर सिन्हा ने काग़ज़ पर लिख दिया, ‘सात दिन के भागवत यज्ञ में मौन व्रत हैं.’

पत्रकार दिलीप खान और शाहनवाज मलिक की एफबी वॉल से.

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हिन्दी के पाठकों को आज का अंग्रेज़ी वाला इंडियन एक्सप्रेस ख़रीद कर रख लेना चाहिए

Ravish Kumar : इंडियन एक्सप्रेस में छपे पैराडाइस पेपर्स और द वायर की रिपोर्ट pando.com के बिना अधूरा है… हिन्दी के पाठकों को आज का अंग्रेज़ी वाला इंडियन एक्सप्रेस ख़रीद कर रख लेना चाहिए। एक पाठक के रूप में आप बेहतर होंगे। हिन्दी में तो यह सब मिलेगा नहीं क्योंकि ज्यादातर हिन्दी अख़बार के संपादक अपने दौर की सरकार के किरानी होते हैं। कारपोरेट के दस्तावेज़ों को समझना और उसमें कमियां पकड़ना ये बहुत ही कौशल का काम है। इसके भीतर के राज़ को समझने की योग्यता हर किसी में नहीं होती है। मैं तो कई बार इस कारण से भी हाथ खड़े कर देता हूं। न्यूज़ रूम में ऐसी दक्षता के लोग भी नहीं होते हैं जिनसे आप पूछकर आगे बढ़ सकें वर्ना कोई आसानी से आपको मैनुपुलेट कर सकता है।

इसका हल निकाला है INTERNATIONAL CONSORTIUM OF INVESTIGATIVE JOURNALISTS ने। दुनिया भर के 96 समाचार संगठनों को मिलाकर एक समूह बना दिया है। इसमें कारपोरेट खातों को समझने वाले वकील चार्टर्ड अकाउंटेंट भी हैं। एक्सप्रेस इसका हिस्सा है। आपको कोई हिन्दी का अख़बार इसका हिस्सेदार नहीं मिलेगा। बिना पत्रकारों के ग्लोबल नेटवर्क के आप अब कोरपोरेट की रिपोर्टिंग ही नहीं कर सकते हैं।

1 करोड़ 30 लाख कारपोरेट दस्तावेज़ों को पढ़ने समझने के बाद दुनिया भर के अख़बारों में छपना शुरू हुआ है। इंडियन एक्सप्रेस में आज इसे कई पन्नों पर छापा है। आगे भी छापेगा। पनामा पेपर्स और पैराडाइस पेपर्स को मिलाकर देखेंगे तो पांच सौ हज़ार लोगों का पैसे के तंत्र पर कब्ज़ा है। आप खुद ही अपनी नैतिकता का कुर्ता फाड़ते रह जाएंगे मगर ये क्रूर कुलीन तंत्र सत्ता का दामन थामे रहेगा। उसे कोई फर्क नहीं पड़ता है। उसके यहां कोई नैतिकता नहीं है। वो नैतिकता का फ्रंट भर है।

राज्य सभा में सबसे अमीर और बीजेपी के सांसद आर के सिन्हा का भी नाम है। जयंत सिन्हा का भी नाम है। दोनों ने जवाब भी दिया है। नोटबंदी की बरसी पर काला धन मिटने का जश्न मनाया जाने वाला है। ऐसे मौके पर पैराडाइस पेपर्स का यह ख़ुलासा हमें भावुकता में बहने से रोकेगा। अमिताभ बच्चन, अशोक गहलोत, डॉ अशोक सेठ, कोचिंग कंपनी फिट्जी, नीरा राडिया का भी नाम है। आने वाले दिनों में पता नहीं किस किस का नाम आएगा, मीडिया कंपनी से लेकर दवा कंपनी तक मालूम नहीं।

एक्सप्रेस की रिपोर्ट में जयंत सिन्हा की सफाई पढ़ेंगे तो लगेगा कि कोई ख़ास मामला नहीं है। जब आप इसी ख़बर को PANDO.COM पर 26 मई 2014 को MARKS AMES के विश्लेषण को पढ़ेंगे तो लगेगा कि आपके साथ तो खेल हो चुका है। अब न ताली पीटने लायक बचे हैं न गाली देने लायक। जो आज छपा है उसे तो MARK AMES ने 26 मई 2014 को ही लिख दिया था कि ओमेदियार नेटवर्क मोदी की जीत के लिए काम कर रहा था। यही कि 2009 में ओमेदियार नेटवर्क ने भारत में सबसे अधिक निवेश किया, इस निवेश में इसके निदेशक जयंत सिन्हा की बड़ी भूमिका थी।

2013 में जयंत सिन्हा ने इस्तीफा देकर मोदी के विजय अभियान में शामिल होने का एलान कर दिया। उसी साल नरेंद्र मोदी ने व्यापारियों की एक सभा मे भाषण दिया कि ई-कामर्स को खोलने की ज़रूरत है। यह भाजपा की नीति से ठीक उलट था। उस वक्त भाजपा संसद में रिटेल सेक्टर में विदेश निवेश का ज़ोरदार विरोध कर रही थी। भाजपा समर्थक व्यापारी वर्ग पार्टी के साथ दमदार तरीके से खड़ा था कि उसके हितों की रक्षा भाजपा ही कर रही है मगर उसे भी नहीं पता था कि इस पार्टी में एक ऐसे नेटवर्क का प्रभाव हो चुका है जिसका मकसद सिर्फ एख ही है। ई कामर्स में विदेश निवेश के मौके को बढ़ाना।

मुझे PANDO.COM के बारे में आज ही पता चला। मैं नहीं जानता हूं क्या है लेकिन आप भी सोचिए कि 26 मई 2014 को ही पर्दे के पीछे हो रहे इस खेल को समझ रहा था। हम और आप इस तरह के खेल को कभी समझ ही नहीं पाएंगे और न समझने योग्य हैं। तभी नेता हमारे सामने हिन्दू मुस्लिम की बासी रोटी फेंकर हमारा तमाशा देखता है। जब मोदी जीते थे तब ओमेदियार नेटवर्क ने ट्वीट कर बधाई दी थी। टेलिग्राफ में हज़ारीबाग में हे एक प्रेस कांफ्रेंस की रिपोर्ट का हवाला दिया गया है। जिसमें स्थानीय बीजेपी नेता शिव शंकर प्रसाद गुप्त कहते हैं कि जयंत सिन्हा 2012-13 में दो साल मोदी की टीम के साथ काम कर चुके हैं। इस दौरान जयंत सिन्हा ओमिदियार नेटवर्क में भी काम कर रहे थे। उन्होंने अपने जवाब में कहा है कि 2013 में इस्तीफा दिया।

इसमें मार्क ने लिखा है कि जयंत सिन्हा ओमेदियार नेटवर्क के अधिकारी होते हुए भी बीजेपी से जुड़े थिंक टैंक इंडिया फाउंडेशन में निदेशक हैं। इसी फाउंडेशन के बारे में इन दिनों वायर में ख़बर छपी है। शौर्य डोवल जो राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवल के बेटे हैं, वो इस फाउंडेशन के सर्वेसर्वा हैं। जयंत सिन्हा ई कामर्स में विदेशी निवेश की छूट की वकालत करते रहते थे जबकि उनकी पार्टी रिटेल सेक्टर में विदेशी निवेश को लेकर ज़ोरदार विरोध करने का नाटक करती थी। जनता इस खेल को कैसे देखे। क्या समझे। बहुत मुश्किल है। एक्सप्रेस की रिपोर्ट को the wire.in और PANDO.COM के साथ पढ़ा जाना चाहिए।

क्या सही में आप इस तरह के खेल को समझने योग्य हैं? मेरा तो दिल बैठ गया है। जब हम वायर की रिपोर्ट पढ़ रहे थे तब हमारे सामने PANDO.COM की तीन साल पुरानी रिपोर्ट नहीं थी। तब हमारे सामने पैराडाइस पेपर्स नहीं थे। क्या हम वाकई जानते हैं कि ये जो नेता दिन रात हमारे सामने दिखते हैं वे किसी कंपनी या नेटवर्क के फ्रंट नहीं हैं? क्या हम जानते हैं कि 2014 की जीत के पीछे लगे इस प्रकार के नेटवर्क के क्या हित रहे होंगे? वो इतिहास का सबसे महंगा चुनाव था।

क्या कोई इन नेटवर्कों को एजेंट बनकर हमारे सामने दावे कर रहा था? जिसे हम अपना बना रहे थे क्या वो पहले ही किसी और का हो चुका था? इसलिए जानते रहिए। किसी हिन्दी अख़बार में ये सब नहीं मिलने वाला है। इसलिए गाली देने से पहले पढ़िए। अब मैं इस पर नहीं लिखूंगा। यह बहुत डरावना है। हमें हमारी व्यक्तिगत नैतिकता से ही कुचल कर मार दिया जाएगा मगर इन कुलीनों और नेटवर्कों का कुछ नहीं होगा। इनका मुलुक एक ही है। पैसा। मौन रहकर तमाशा देखिए।

वरिष्ठ पत्रकार और एनडीटीवी के चर्चित एंकर रवीश कुमार की एफबी वॉल से.

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