कोरोना पर यशवंत की एक जरूरी टिप्पणी : हर कोई विजय विनीत जैसा भाग्यशाली नहीं!

यशवंत

ये खबर मेरे जैसों के लिए है जो कोरोना को हलके में लेते हैं. इधर उधर फुदकते रहते हैं. विजय विनीत जी बनारस के दबंग और मुखर पत्रकारों में से एक हैं. आम जन के दुखों, जनता से जुड़ी खबरों को लेकर शासन प्रशासन से टकराना इनकी फितरत है. इन्हें जब कोरोना का संक्रमण हुआ तो तनिक भी अंदाजा न था कि मरते मरते बचेंगे.

यूं कहें कि ये मर ही गए थे, बस अपनी जीवटता और कुछ डाक्टरों की जिद के चलते जी गए. कृपया सावधान रहें. घर में रहें. बहुत जरूरी हो तो ही निकलें. कोरोना का कोई इमान धर्म नहीं है. कब किसे कहां पकड़ ले और मार डाले, कुछ कहा नहीं जा सकता. विजय विनीत जी ने अपनी स्टोरी विस्तार से लिखी है, पढ़िए पढ़ाइए और बहुत जरूरी न हो तो चुपचाप घर में बैठे रहिए.

मुझे भी कुछ फीडबैक हैं. गर्दन, कंधे व हाथ के दर्द के कारण मैं फिजियोथिरेपी कराने जिस डाक्टर के पास जाता था, उनकी पत्नी एक सरकारी अस्पताल (ईपीएफ वाले) में हेड नर्स हैं. उनके फिजियोथिरेपिस्ट पति बता रहे थे कि वाइफ जहां काम करती हैं वहां के अस्पताल में तैनात मेडिकल स्टाफ में अघोषित तौर पर ये सहमति है कि जिन कोरोना मरीजों की हालत बिगड़ गई हो उसे छूना-छेड़ना नहीं है. उसे मरने के लिए छोड़ देना है क्योंकि उन्हें ठीक करने की लंबी कवायद में मेडिकल स्टाफ संक्रमित हो सकता है. उनने बताया कि कोरोना संक्रमित कई मरीजों को बचाया जा सकता था लेकिन मेडिकल स्टाफ के बीच एक मूक सहमति के चलते कोई मरीज के पास जाकर उसे बचाने की कवायद में खुद संक्रमित होने का जोखिम उठाने के लिए तैयार नहीं हुआ.

मैं तो सुनकर दंग रह गया. मतलब जब हालत खराब हो और मदद की जरूरत हो तब मरने के लिए छोड़ दीजिए. जब माइल्ड लक्षण हों तो बस खाना वगैरह भिजवा कर अकेले पड़े पड़े डिप्रेशन में जाने के लिए छोड़ दीजिए. आप ठीक हो जाएं या मर जाएं, ये आपका भाग्य है. वैसे भी कोरोना पेशेंट के लिए आजकल अस्पतालों में न बेड है, न गंभीर रूप से बीमार मरीजों के लिए आक्सीजन सिलेंडर. जो कुछ हैं भी तो वो बड़े व वीवीआईपी के लिए आरक्षित-सुरक्षित हैं. ज्यादा बड़े वीवीआईपी तो मैक्स व मेदांता जैसे प्राइवेट अस्पतालों में इलाज करा रहे हैं.

ग़ज़ब है ये देश. ग़ज़ब है इस देश के हुक्मरां जिन्होंने अपनों की जेबें तो खूब भरी-भरवाईं लेकिन देश की जनता के इलाज के लिए बुनियादी सुविधाएं मुहैया न करा सके. हर कोई विजय विनीत जी जैसा भाग्यशाली नहीं है कि उन्हें मुश्किल वक्त में कुछ जिद्दी डाक्टर मिल जाएं. हर कोई विजय विनीत जैसा इच्छा शक्ति रखने वाला भी नहीं है. विजय विनीत की कहानी हमें डराती है. विजय विनीत की कहानी हमें बताती है फिलहाल तो सारी सत्ताओं से बड़ी मौत की सत्ता है जो अदृश्य होकर यहां वहां जहां तहां विराजमान है. कौन इसकी गिरफ्त चपेट में आएगा, न मालूम.

ऐसे में जरूरी है कि हम आप यथासंभव प्रीकाशन रखें. जीवन-मृत्यु को उदात्तता से समझने-बूझने की प्रक्रिया शुरू कर दें ताकि मौत आए भी तो उसके साथ जाने में कोई मलाल शेष न रहे. हालांकि ये भी जान लीजिए कि मरता वही है जो दिमागी से रूप से मरने के लिए तैयार हो जाए. विजय विनीत जैसी कहानियां बताती हैं कि जिनमें जिजीविषा है, वो मौत को मात देकर उठ खड़े होते हैं.

तो, समझिए बूझिए सब कुछ, पर जिजीविषा तगड़ी वाली बनाकर रखिए.

जैजै

भड़ास एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

मूल खबर ये है-

कोरोना संक्रमित वरिष्ठ पत्रकार पहुंचे कोमा में, किसी तरह बची जान (पढ़ें संस्मरण)

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