रंडियों के गांव वाली चित्रलेखा

कुमार सौवीर

नटपुरवा, हरदोई : गर्म-गोश्‍त की दूकानों वाले गांव से पहले करीब डेढ़ दर्जन अधेड़ और युवक मेरी कार को घेर लेते हैं और फिर शुरू हो जाती है इन दुकानदारों के बीच ग्राहकों को अपनी तरफ खींचने की आपाधापी। कोई गेट खोलने में जुटा है तो कोई रास्‍ता रोक रहा है। ग्राहक को लुभाने और खींचने के लिए मानो गदर-सी मच गयी है।

एक बोला: एक से बढिया बिटियन हौ हमरे लगे। पहिले दीखि ल्‍यौ। बिटियन के दिखावै के कउनौ पइसा नाय हौ। परसंद लगै तब पइसा दीह्यौ। कउनौ जबरजस्‍ती तौ ह्यौ ना।

दूसरा: ( एक-दूसरे को मोटी गाली देते हुए ) हटौ ना। हमका बात करै द्यौ। साहब, पहिले देख्‍य ल्‍यौ। माल त अइसन ह्यौ—

फिर शुरू हो जाता है दुकानदारों के बीच झगड़ा और आपसी नंगी गालियों का तूफान। कान की लवें गरम हो गयीं। लकीर की तरह गहरे गड्ढों के बीच पसरी सड़क पर अपनी कार आगे बढ़ा लेता हूं। कुछ दूर एक दूकान के सामने रूक कर जैसे ही चंद्रलेखा का पता पूछने की कोशिश करता हूं तो दुकानदार हम लोगों के हाथ पकड़ कर भीतर खींचना चाहता है: एइसन ब्‍यवस्‍था पूरी ह्यौ इहां। आवौ ना साहब। इहां सबै बिटियन तइयार हैं।

एक किशोर तो पूरी दीनता के साथ बोल पड़ा : हमार बहिन के द्यौ खिल्‍यौ ना साहब।

ऐसे ही अनुनय-विनय और अपने पीछे छोड़ी गयीं अरदासों के छींटों से बचने के लिए हम फिर आगे बढ़े। साथ में दो तेज-तर्रार पत्रकार। चंदौली वाले अनिल सिंह और हरदोई के आदर्श त्रिपाठी। संडीला में मिल गये थे आदर्श। अगला करीब 20 मील का रास्‍ता और वापसी उनके साथ रही। दलालों की बातचीत वाले माहौल की ही तरह सड़क के नाम पर शर्मनाक रास्‍ता, धंसी पुलिया, खतरनाक गड्ढे और धूल के बगूले। संडीला के बाद से ही बिजली तो दूर, खंभे तक का नाम-निशान नहीं। हम आये हैं यहां चंद्रलेखा से मिलने। 55 बरस वाली चंद्रलेखा यहां गोदौरा के पास नटपुरवा में रहती है। एक बेटी और 3 बेटे। बेटी की शादी कर दी है, जबकि बेटे मजदूरी करते हैं। चंद्रलेखा ने दूसरों के कुछ खेत बटाई पर हासिल कर लिए हैं।दरअसल, नटपुरवा और सिकरोरी गांव बिलकुल सटे हुए हैं। बीच में एक नहर है, लेकिन इन दोनों की संस्‍कृति बिलकुल अलग। व्‍यवसाय तो दूर, इन दोनों के बीच बात-बोली तक कत्‍तई नहीं। पूछने पर सिकरोरी वाले अपना नाक-भौं सिकोड़ते हुए सपाट जवाब देते हैं : अरे साहब, यह रंडियों का गांव है। चाहे वो मौलवी साहब रहे हों या पंडित जी, संडीला से आगे बढ़ने पर जितने भी लोगों से नटपुरवा का पता पूछा, जवाब शरारती मुस्‍कान के साथ ही मिला।

करीब साढ़े 3 सौ साल पहले शुरू हुई थी नटपुरवा की मौजूदा हालत। 7 बेटियों के बाप जब्‍बर बाबा जब घर चलाने में असमर्थ हो गये तो पास के मंडोली गांव के जमीनदार के खेतों में बेटियों ने मजदूरी शुरू कर दी। जमींदार की नीयत बदली और बच्चियों को मजूरी में अनाज ज्‍यादा मिलने लगा। नीयत और लालच की डगर में जब्‍बर की गृहस्‍थी के चूल्‍हे भड़कने लगे और उसी रफ्तार से सातों लड़कियों का यौवन भी जमींदार की हवास में स्‍वाहा हो गया। और नट, बंजारा जैसी कुशल जातियों की युवतियों की ऐसी कमाई पर नटपुरवा में फलता-फूलना शुरू हो गया। आज करीब 5 हजार आबादी वाली में यहां की करीब एक दर्जन युवतियां मुम्‍बई में हैं। 7 तो दुबई में कमा रही हैं। लेकिन कई लड़कियां ऐसी तो रहीं जो गांव की दहलीज से निकल कर कमाई के लिए बाहर गयीं, लेकिन कभी लौटी ही नहीं।लेकिन चंद्रलेखा ऐसी नहीं थीं। एक वेश्‍या श्‍याहन के पुत्र थे महादेव। पास वाले सिकंदरपुर वाली पार्वती से शादी हो गयी महादेव की। चंद्रलेखा उन्‍हीं की बेटी है। तीन और भाई हैं। लेकिन महादेव और पार्वती ने बेटी चंद्रलेखा को गांव की तर्ज पर जिन्‍दगी के बजाय उसे पढ़ाने-लिखाने का रास्‍ता दिखाया। लेकिन ऐसा हो नहीं पाया।

गांव की दस्‍तूर के मुताबिक गांव की बहुओं को तो पूरा सम्‍मान मिलता है, लेकिन बेटियों का बिकना अनिवार्य। उनके दुकानदार होते हैं पिता और भाई। रास्‍ता बताती हैं वे महिलाएं जो उम्र चुक जाती हैं और इस तरह वे भूख और अपनी बाकी उम्र काटने की जुगत लगाती हैं। चंद्रलेखा  के साथ भी यही हुआ। श्‍याहन ने अपनी पोती को उस धंधे में लगा ही दिया। दादी की साजिश के चलते बुआ राजेश्‍वरी ने एक ग्राहक खोजा था। तब चंद्रलेखा की उम्र थी महज 15 साल। अचानक एक शाम उसके घर एक आदमी आया तो घरवाले घर के बाहर चले गये। वह कयामत की रात थी चंद्रलेखा के लिए जब उसे किसी शेर ने बकरी की तरह बेतरह नोचा-खसोटा। बाद में पता चला कि उसकी अस्‍मत 200 रूपये की कीमत पर अदा की गयी है। घर में शराब और गोश्‍त का जश्‍न मनाया गया कि लड़की अब कमाने लगी है। और उसके बाद तो यह नीयत ही बन गयी। रोज ब रोज, यही सब। हर रात मौत, जीवन नर्क। बेटियों और बहनों की देह से बरसते नोटों पर जी रहे लोगों कोई दिक्‍कत नहीं। कौन बोले। विरोध की तो कोई गुंजाइश ही नहीं थी। हम लोगों को खुद को भड़वा और दलाल कहलाने में कोई गुरेज नहीं होता। खैर, चंद्रलेखा सुंदरता की कसौटी पर नहीं थी, सो, उसे नाचना पड़ा। शादी-मुंडन में। नाचना क्‍या, बस कुछ भोंडा सा कमरमटक्‍का और बेहूदा और अश्‍लील फिकरे। हर नोट दिखाने वालों का भद्दा अंदाज। भड़वे और दलाल बढ़ते रहे और देह-व्‍यापार भी। 30 साल की उम्र तक यही तक तो चलता ही रहा।
ढलती उम्र पर उसने अपनी देह बेचने का धंधा खत्‍म करना पड़ा। मजबूर भी थी मैं। एक सवाल पर चंद्रलेखा बताती है कि बदन बेचने की उम्र होती ही कितनी है। सिर्फ तब तक, जब तक उसे बच्‍चे न पैदा हो जाएं। उसके बाद उसकी तरफ कोई झांकता भी नहीं। हां-हां, पति तो खूब होते हैं हम लोगों के। हर रोज एक नया मर्द, हर रात सुहागरात और हर रात एक नया पति। सवालों के जवाब पर चंद्रलेखा साफ अल्‍फाजों में बोलती हैं कि किसी रंडी के बच्‍चों के बाप का नाम कौन जानता है। चंद्रलेखा के सबसे बेटे नीरज उर्फ टीटू ने अपने पिता का नाम पूछने पर बताया कि इस गांव में ज्‍यादातर लोगों को अपने पिता का पता ही नहीं। ऐसी कोई परम्‍परा यहां ही नहीं। शादी का मतलब यह नहीं होता है कि उसके पैदा होने वाले बच्‍चे के बाप का नाम पहचाना जाए।

चंद्रलेखा को खूब याद है वह दिन, जब लखनऊ के बख्‍शी तालाब इलाके के कठवारी गांव में राम औतार सिंह मास्‍टर के बेटे की शादी पर उसे नाच के लिए बुलाया गया था। जून की गर्मी सिर नचा रही थी। चंद्रलेखा की टीम थोड़ी देर से पहुंची तो अपने मेहमानों के सामने शेखी बखारने के लिए रामऔतार ने गुस्‍से में उसे रंडी की औलाद कहते हुए बंदूक दिखा कर डराया। रूंआसी चंद्रलेखा ने गुस्‍से में बोल दिया कि मैं रंडी जरूर में मेरी मां रंडी नहीं थी। चंद्रलेखा भी भिड़ गयी और साफ कह दिया कि अब वे नाच नहीं करेगी। चंद्रलेखा बताती है कि उसने नाच-गाना उसी समय बंद कर दिया और चंद्रिका माई मंदिर की सीढि़यों पर अपने घुंघरू को माथे लगाते हुए कसम खा ली कि चाहे कुछ भी हो जाए, मगर अब यह धंधा हमेशा के लिए बंद। मगर कुछ ही दिनों में आटा-दाल का दाम दिखने लगा, मगर वह संकल्‍प से हटी नहीं। कलपते बच्‍चों के लिए उसने गुड़ की कच्‍ची शराब बनाने की कोशिश की। महुआ वहां होता ही नहीं है। तैयारी के लिए अपनी चांदी के गहने बेचे। बच्‍चों की मदद से शराब बनायी और उसी दिन शाम को उसे बोतल भरने चली। उत्‍साह में छोटे बेटे मोनू ने मां की मदद के लिए माचिस जलाकर रोशनी करने की कोशिश की, लेकिन अचानक शराब भक्‍क्‍क्‍क्‍स से जल गयी। उसी समय से यह काम भी खत्‍म। अगले दिन से दूर के गांव में मजदूरी करने लगी। बड़ा बेटा नीरज उर्फ टीटू लखनऊ के नक्‍खास में एक ढाबे पर बर्तन धोने में लग गया।

कुछ दिनों तक यही चला कि इसी बीच एक सामाजिक कार्यकर्ता संदीप ने उसकी मदद की। शुरूआत हुई नटपुरवा की गंदगी दूर करने से। जबर्दस्‍त मेहनत हुई और जल्‍दी ही बदहाली के खिलाफ उसकी पहचान केवल हरदोई में ही नहीं, बल्कि देश भर में हो गयी। देह-व्‍यापार के खिलाफ उसका आंदोलन इतना मजबूत हुआ कि नटपुरवा में यह धंधा एक चौथाई ही सिमट गया। गांव के बच्‍चों के लिए उसने स्‍कूल खुलवाया। जनसमस्‍याओं के खिलाफ आंदोलन में चंद्रलेखा अब जनजागरण की प्रतीक हो गयी। मेधा पाटकर के साथ दिल्‍ली का प्रदर्शन हो या पेप्‍सी के खिलाफ बनारस में पुलिस की लाठियां, चंद्रलेखा का नाम हो गया। मुम्‍बई में नीता अम्‍बानी ने अपनी हीरोज अवार्ड के लिए उसे पांच लाख का पुरस्‍कार दिया। उसी रकम से उन्‍होंने अपना मकान बनवाया और कुछ सामान खरीदा। जमीन खरीदने की हैसियत ही नहीं।

चंद्रलेखा साफ कहती हैं कि इस गांव में अवैध शराब तो अभी तो बनायी-बेची जाती है। पुलिसवालों के तर्क अलग हैं। वे कहते हैं कि उन्‍हें रोक दिया तो ये डकैती शुरू करेंगे। तो इससे बेहतर है शराब का धंधा ही करते रहें। वेश्‍यावृत्ति की दिक्‍कत पर उन्‍होंने एक बार यहां के एक एसपी ओपी सागर से शिकायत की। जानते हैं कि क्‍या जवाब मिला। बोले कि अगर वहां धंधा होता है तुमको क्‍या ऐतराज। पैसा तो यहां आता ही है। बेशुमार। लेकिन पूरा गांव मौज करता है। रोज पार्टियां। बाहर से आने वाले लोगों की तादात बहुत है। लखनऊ से आईएएस, आईपीएस, इंजीनियर, ठेकेदार। धुंधलाते ही यहां उन लोगों की बाढ़ आ जाती है जो यहां अपना चेहरा काला करते हैं। कई लोग तो ऐसे हैं जो यहां की लड़कियों को बाहर बुलाने के लिए बड़ी रकम अदा करते हैं। लेकिन इसमें खतरे खूब हैं।

इसी बीच अपनी बेटी पूनम की शादी की। शाहजहांपुर के एक यादव परिवार में। लेकिन चंद्रलेखा ने कभी कुछ छुपाया नहीं। अब वह गांव की दूसरी लड़कियों की शादी में जुटी है और इसके लिए वह रकम जुटा रही है ताकि गांव की दूसरी लड़कियों को उन माहौल न मिले जिसे उसने कभी भोगा है या दूसरी लड़कियां कर रही हैं। अब भी चंद्रलेखा रामचरित मानस, भागवत, पूजा, व्रत करती है ताकि आत्‍मबल बढ़ता रहे। गरीबों के लिए सरकारी मकान के बारे में कोई खबर ही नहीं। गिने-चुने इंडियामार्क-2 ही लगे हैं। शहर इतनी दूर है कि बीमारी पर ईलाज पहुंचने से मौत आ जाती है। च्ंद्रलेखा को एक जुझारू नेता महावीर सिंह दिखा जो हर आवाज पर मदद करने पहुंचा। आज वे विधायक हैं। वरना पुराने विधायक मन्‍नान तो मंत्री होने के बावजूद हमें नटपुरवा में कभी झांकने तक नहीं आये। यहां झांकने तो नरेश अग्रवाल भी कभी नहीं आये। नरेश अग्रवाल  को इस इलाके से कभी कोई मतलब ही नहीं। उनका यह इलाका हरदोई शहर तक ही सिमटा है ना, और वोट के अलावा वे कुछ सोचते तक नहीं। इसीलिए।

सामाजिक कार्यकर्ता सुश्री ऊषा ने इस गांव को करीब से महसूस किया है। वे बताती हैं कि तब यहां आने वाला ग्राहक यहां लुट-पिट कर ही लौटता था। गनीमत कि अब तो हालात फिर बहुत ठीक हैं। चंद्रलेखा ने वाकई बेमिसाल काम किया है यहां। ऊषा बताती हैं कि अभी यहां बहुत कुछ किया जा सकता है, बशर्ते सरकारी अमला सक्रिय हो। मुख्‍य विकास अधिकारी आनन्‍द द्विवेदी इस इलाके को लेकर चिंतित हैं। वे कहते हैं कि अब इस क्षेत्र पर ध्‍यान दिया ही जाएगा। एडीएम राकेश मिश्र का मानना है कि ऐसे

विकास कार्यों के बल पर हालातों को काबू किया जा सकता है और महिला सशक्तिकरण की योजनाएं इसमें प्रभावी कारगर होंगी। मगर जिलाधिकारी अनिल कुमार को पता ही नहीं है कि हरदोई में क्‍या हो रहा है। वे नहीं जानते हैं कि इस जिले में कुछ ऐसा भी होता है। बहरहाल, वे पता करेंगे कि ऐसे गांव हमारे जिले में हैं भी या नहीं। लेकिन पुलिस अधीक्षक आरके श्रीवास्‍तव मानते हैं कि कानून को सख्‍ती से लागू करके अपराध को खत्‍म किया जाएगा। वे मानते हैं कि इस बारे में जल्‍दी ही काम किया जाएगा।

लेखक कुमार सौवीर यूपी के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क kumarsauvir@yahoo.com या 09415302520 के जरिए किया जा सकता है. यह लेख डीएनए में प्रकाशित हो चुका है.

राजस्थान की भाजपा सरकार मीडिया पर बैन लगाने की तैयारी में..  इस वीडियो को ध्यान से जरूर सुनें और पूरा सुनें…

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

यौन शोषण मामले में दैनिक जागरण के चार वरिष्ठ पदाधिकारी 13 नवंबर को कोर्ट में तलब

दैनिक जागरण कानपुर में कार्यरत रहे चार वरिष्ठ पदाधिकारी दैनिक जागरण की ही एक महिला कर्मी के यौन शोषण के मामले में तेरह नवंबर को कोर्ट में तलब किए गए हैं. इसके पहले 10 अक्टूबर को कोर्ट में डेट लगी हुई थी लेकिन चारों कर्मी हाजिर नहीं हुए. इसके बाद जज ने अगली तारीख 13 नवंबर दी है. अगर ये लगातार गैर-हाजिर रहते हैं तो इनके खिलाफ गैर जमानती वारंट भी जारी हो सकता है. अगर तब भी पुलिस के हत्थे न चढे़ तो कुर्की की कार्रवाई की जा सकती है.

इन चारों आरोपियों के नाम हैं- नितिन, प्रदीप, दिनेश और सन्तोष मिश्रा. माना जा रहा है कि अगर इन लोगों को जमानत नहीं मिली तो ये जेल की हवा भी खा सकते हैं. सूत्रों का कहना है कि यौन शोषण के आरोप में फंसे अपने चारों वरिष्ठ कर्मियों को बचाने के लिए जागरण प्रबंधन भी लगा हुआ है. इन आरोपियों में से एक नितिन श्रीवास्तव खुद जनरल मैनेजर की हैसियत में इन दिनों दैनिक जागरण नोएडा में कार्यरत है.

दूसरा आरोपी प्रदीप अवस्थी घटना के वक्त प्रोडक्शन इंचार्ज थे कानपुर में. अब ये भी नोएडा में पदस्थ है. दिनेश दीक्षित कानपुर में फीचर विभाग में कार्यरत है. सन्तोष मिश्रा कानपुर में फोरमैन है. उधर, पीड़िता ने भड़ास4मीडिया से बात करते हुए कहा कि ये लोग कब तक बचेंगे. जब आसाराम और राम रहीम न बचे तो ये किस खेत की मूली हैं. पीड़िता का कहना है कि जागरण प्रबंधन ने केस को प्रभावित करने की खूब कोशिश की. अब भी उन लोगों का हर तरह से दबाव डालना जारी है.

पूरे प्रकरण को समझने के लिए इस खबर को पढ़ें…

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

अब यह जैन मुनि निकला रेपिस्ट, हुआ अंदर!

Shishir Soni : बहुरूपिये समाज के तेजी से स्खलित होने का परिणाम है जैन मुनि का कुकृत्य और उनकी गिरफ्तारी. इन्हे जूते की माला पहना कर सार्वजनिक अभिनन्दन करना चाहिए. आये दिन ये खबरें आती हैं की फलां करोड़पति सांसारिक वैभव को छोड़ जैन मुनि बन गया. लेकिन उन तपस्वी मुनियों के बीच से ऐसी बजबजाती दुर्गन्ध आये तो समाज का स्वरुप क्या होगा? मन सिहरता है ये सोच कर.

अपने एक जैन मित्र के साथ कई जैन मुनियों से मिला. यकीन मानिये किसी से प्रभावित नहीं हुआ. बातों में कोई गहराई नहीं. वाणी में माधुर्यता का रसखान नहीं. बेहद सतही प्रवचन. कई तो स्वनामधन्य महा-मूर्ख भी मिले. हो सकता है ऐसे मुनि हों जिन्हें सुनने का अवसर नहीं मिला हो और वो अच्छा ज्ञान रखते हों. अच्छा कनेक्ट करने की विधा में पारंगत हों. लेकिन ज़्यदातर मुनियों की एक ही लालसा होती है कि हमारे चातुर्मास या अन्य धार्मिक समागम में बड़े-बड़े राजनेता आएं.

क्यों भाई! ये नेताओं की लालसा क्यों? क्यूंकि मुनियों में आपसी प्रतिद्वंता जबरदस्त है. खुद को दूसरे मुनियों से श्रेष्ठ दिखाने के लिए वीवीआईपी आमद कैसे बैढे इसकी खुशामद में वे कुछ जैन धन्ना सेठों का बगलबच्चा बने रहते हैं. उसके ऐवज में, धर्म की आड़ में वो धन्ना सेठ अपना उल्लू सीधा करने में लगा रहता है. ऐसा कमोबेश हर धर्म में प्रचलित रहा है. सादगी की प्रतिमूर्ती माने जाने वाले जैन धर्म गुरुओं और जैन धर्मावलम्बियों में ऐसी गंदगी तेजी से घर कर रही है. जो सर्वथा शर्मनाक है. वृहत समाज के लिए घातक भी.

दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार शिशिर सोनी की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

महिला पत्रकार के शोषण मामले में आरोपी बनाए गए पत्रकार कृष्ण कांत ने तोड़ी अपनी चुप्पी

Krishna Kant : मुझ पर बहुत संगीन आरोप लगाए गए हैं. सोचा था कि हमारा अपना प्रेम संबंध था, इस पर कुछ नहीं कहना. लेकिन मामला अब हाथ से निकल गया है. अब फेसबुक ही सर्वोच्च अदालत है, और हर व्यक्ति मुख्य न्यायाधीश. शर्मिंदगी के साथ इस कीचड़ में उतरने को मजबूर हूं. कहा जा रहा है कि अलग होना बड़ी बात नहीं है, लेकिन धोखा दिया गया. इस ‘धोखे’ में उसका जिक्र कहां है कि हमारे आसपास के लोग पिछले डेढ़ साल से मध्यस्थता कर रहे थे. वे लोग कहां हैं इस पूरी बहस में जो बार बार समझा रहे थे कि तुम दोनों साथ नहीं रह सकते? यह जिक्र कहां हैं कि हमें जब कहा गया कि हम साथ नहीं सकते तो तीन बार आत्महत्या करने कोशिश/धमकी दी गई? यह जिक्र कहां है कि आत्महत्या की धमकी पर दो बार ऐसा हुआ कि दोस्तों को दौड़कर आना पड़ा? यह जिक्र कहां है कि आप आत्महत्या की धमकी देकर दरवाजा बंद करके सीपी घूम रही थीं और हम दोस्तों के साथ तुमको ढूंढ रहे थे?

इस बात का जिक्र कहां है कि किसी 45 या 50 साल की महिला से भी बात करने या हालचाल लेने पर आपको परेशानी होती रही है? इस बात का जिक्र कहां है कि मुझे लोगों के बीच में ही काम करना है और आपको लोगों से उबकाई आती है? इस बात का जिक्र कहां है कि जिन लोगों के पास आपको फोर्स करके भेजा गया कि तुम अकेलेपन से निकलो, उन्हीं के पास जाकर आपने हमको गालियां दीं? वे दोस्त, वे वरिष्ठ महिलाएं कहां हैं जो आपको समझाती रहीं कि कोई अलग होना चाहता है तो उसे जाने देना चाहिए? वे पुरुष दोस्त कहां हैं जिनके मेरे घर आने भर से आप हफ्ते भर लड़ाई करती थीं? आपको न्याय दिलाने के लिए वही लोग क्यों और किस मकसद से जुटाए गए जो हमसे कभी नहीं मिले या जो हमको नहीं जानते?

इस बात का जिक्र कहां है कि आपको हमारे दफ्तर जाने, रिपोर्टिंग पर जाने, दोस्तों के साथ बैठने पर भी आपको दिक्कत थी जिसपर लगातार समझाइश की कोशिश होती रही और आपने हर बार समझने से इनकार किया? बार बार यह कहने के बाद कि हम साथ नहीं रह सकते, धोखा कैसे होता है? मैं अलग होना चाहता हूं, यह लगातार कहते रहना किस कानून के तहत धोखा या अपराध है? जिस जगह पर मैं हूं वहां पर कोई स्त्री होगी तो क्या करेगी? हमारी पूरी सर्किल के लोग, दोस्त सब हमारे संबंध को जानते हैं तो किसी के साथ भी धोखा कैसे हो गया? इतनी किचकिच के बाद अगर मैं अलग होना चाहता रहा तो कौन सा कानून या लोग मुझे फांसी देंगे, मैं तैयार हूं.

क्या मेरे मुताबिक, आप मेरे साथ नहीं रहना चाहें तो मुझे आपके चरित्रहनन का अभियान चला देना चाहिए? मुंह पर तेजाब डाल देना चाहिए? कहा गया है कि हमने कई लड़कियों को बरगलाया, मौत के मुंह में पहुंचाया और छोड़ दिया. तमाम लड़कियां आत्महत्या कर रही हैं. एक जिस रिश्ते में हम रहे, उसके अलावा वे कौन लड़कियां हैं? सब लड़कियां आत्महत्याएं कर रही हैं और अस्पताल से घर लौट जा रही हैं, लेकिन न कोई केस दर्ज हो रहा है, न अस्पताल रिपोर्ट कर रहा है. इतनी लड़कियों को बचा लेने वाले लोग भी कोई रिपोर्ट नहीं कर रहे हैं. ताजा आत्महत्या प्रकरण हुआ. किसी ने न देखा, न बात की, न अस्पताल ने पुलिस बुलाई, न मेरे पास पुलिस आई, न कोई केस हुआ, यह किस दुनिया में, कैसे संभव हुआ?

कहा गया है कि मैं तमाम लड़कियों को बरगला कर मौत के मुंह में डालता गया. यह सब देखते हुए आपको मुझसे शादी करनी थी? सारे आरोप अलग होने के बाद ही सामने आए? उसके पहले आपको उन लड़कियों की और हमारे ‘आपराधिक चरित्र’ पर चिंता नहीं हुई? एक महीने पहले तक हम आपसे शादी कर ​लेते तो यह सारे खून माफ थे? आरोप है कि हमने हैरेस किया, पैसा खाया. मैं सात साल से नौकरी कर रहा हूं. आप कितना पैसा कमाती थीं जो हम आपसे पैसे खाते थे और आप खिलाती थीं? बिना किसी पढ़ाई लिखाई के, बिना किसी अनुभव के आपको दोनों नौकरियां कैसे मिलीं? आपका परिवार आपको सपोर्ट नहीं कर रहा था, आप दिल्ली आ गईं, आपको यहां रहने के लिए आर्थिक मदद किसकी थी? अभियान चलाने के ठीक पहले आपका अकाउंट फ्रीज हुआ, आपने पैसा किससे लिया? आपके यहां आने से लेकर एक महीने पहले तक आपका रोना था कि मेरे कोई दोस्त नहीं हैं, कभी भी किसी भी परिस्थिति में आपकी किसी भी तरह की मदद, संबंध खराब होने के बावजूद, मेरे अलावा किसने की? (यह सब आरोप लगाया जाना और यह जवाब देना बेहद घिनौना है.)

जिस दिन मेरे घर बाबा की तेरहवीं थी, उस दिन भी मुझसे बहस करने की कोशिश की जा रही थी. 99 साल के मरे हुए व्यक्ति की भी फोटो लगाकर गालियां दी गईं? पिछले छह महीने में पिता और बाबा की मौत हुई, उसका यहां फेसबुक पर पोस्ट लिखकर मजाक उड़ाया गया. यह कौन सा न्याय मांगा जा रहा है? जितने आरोप लगाए जा रहे हैं वे सब पहले फर्जी अकाउंट से क्यों सामने आ रहे हैं? यदि मैं अपराधी हूं, तो उसका फैसला कौन करेगा? मुझे सजा कौन देगा? कहा गया कि फ्रिज में गोमांस है तो भीड़ जुट गई और पिटाई शुरू हो गई? इस संभ्रांत और ​वर्चुअल मॉब लिंचिंग के लिए आप सब बधाई के पात्र हैं.

तमाम लोगों का कहना है कि हमें हमारे संस्थान से निकाला जाए. हमारे किसी के साथ संबंध में मेरे संस्थान का क्या रोल है? किसी विचारधारा, जाति, वर्ग, समुदाय आदि का क्या रोल है? मेरे उन मित्रों, जिनका कहीं कोई रोल नहीं है, उनको भी इसमें घसीटा जा रहा है. प्रियंका से मेरी एक महीने से बात नहीं हुई है, उन्होंने जो किया, वह ठीक ही है. वे क्या क्या कहेंगी, क्या करेंगी, यह छोड़िए, बाकी जितने न्यायाधीश हैं, जिन्होंने भी नाम लेकर बिना मुझसे कुछ पूछे, बिना पक्ष लिए पोस्ट डाली है, वे सारे प्रोफेसर, पत्रकार और समाज बचाने के ठेकेदार अब अपने पक्ष और सबूत लेकर कोर्ट आएंगे, एफआईआर करवाकर सबको नोटिस भेज रहा हूं. मैं अपराधी हूं तो मेरी अपील है कि मुझे सजा मिले. एक महीने से फेसबुक ट्रायल किस मकसद से है? बार बार कहने के बाद भी कोई कोर्ट या पुलिस नहीं गया, तो मैं जाता हूं. जिस जिस का अपराधी हूं, सब लोग आएं.

आप लोग, जो भी मुझे जानते हैं, मुझ पर भरोसा करते रहे हैं, वे मेरे काम के कारण करते रहे हैं. संबंध में रहकर आप कहती रहीं कि ‘तुमको अपने काम के अलावा बाकी दुनिया नहीं दिखती.’ अब सारा हमला उसी काम पर है कि कैसे नौकरी छुड़वाई जाए. हां, मैं अपने काम को लेकर पागल हूं. तमाम लेखकों और पत्रकारों की हत्या के बावजूद मैं क्रूर भीड़ से नहीं डरता तो टुच्चे आरोपों से नहीं डरता. आप में से जिसे लगता हो कि मैं अपराधी हूं, वे छोड़कर जा सकते हैं. जो मुझे जानते हैं, वे जानते हैं कि मैं क्या कर सकता हूं. जो नहीं जानते उन्हें कोई सफाई देने की जरूरत नहीं है. जिसके साथ था, उसके बारे में भी दुनिया जानती थी. अब जिसके साथ हूं उसके बारे में भी दुनिया जानती है. अब जिन जिन के साथ धोखा हुआ हो, वे सब आएं और इस मॉब लिंचिंग में शामिल हों.

बाकी जिस पर इलाहाबाद से लेकर जेएनयू तक 50 लड़कियों के यौन शोषण का आरोप है, जो इलाहाबाद से भागा इसीलिए कि कुटाई होनी थी, उस महान स्त्रीवादी न्यायविद के आरोपों पर कुछ नहीं कहना. जबसे यह प्रकरण शुरू हुआ, सिर्फ तीन चार लोगों से बात की, इस उम्मीद से कि शायद यह सब शांत होगा. लेकिन जो जो लोग ​इस घृणा अभियान में बिना मेरा कोई पक्ष जाने शामिल हुए, उन सबको सलाम पेश करता हूं. बिना अपराधी का पक्ष लिए न्याय कर देने की आपकी यह नायाब क्षमता देश के काम आएगी.

पत्रकार कृष्ण कांत की एफबी वॉल से.

पूरे मामले को समझने के लिए नीचे दिए शीर्षक पर क्लिक करें…

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

सच्चे ब्लैकमेलर पत्रकार ऐसे होते हैं… पढ़ लीजिए और पहचान लीजिए…

सोनभद्र में साधना न्यूज के पत्रकार विष्णु गुप्त के खिलाफ ब्लैकमेलिंग और बलात्कार का मुकदमा दर्ज

यूपी के सोनभद्र जिले के दुद्धी से खबर है कि प्राईवेट अस्पताल में कार्यरत एक महिला ने पत्रकार विष्णु गुप्त के खिलाफ स्थानीय थाना में कई धाराओं में मुकदमा दर्ज कराया है. महिला ने अस्पताल में अनियमितता का भय दिखाकर सत्तर हजार रुपये ब्लैकमेल करने और भयाक्रांत कर मर्जी के खिलाफ शारीरिक सम्बन्ध बनाने का आरोप लगाया. पत्रकार विष्णु के खिलाफ स्थानीय थाना में 376, 385, 228, 504, 506 आदि धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया जा चुका है. पत्रकार विष्णु खुद को साधना न्यूज चैनल समेत कई न्यूज चैनलों और अखबारों का संपादक बताता है. वह अश्लील वीडियो क्लिप भी लोगों को दिखा कर महिला को बदनाम कर रहा है.

कथित पत्रकार विष्णु गुप्ता (पुत्र मोती लाल गुप्ता, शक्ति कम्पलेक्स, पुलिस चौकी रेनुकूट, थाना पिपरी, जिला सोनभद्र) पर आरोप है कि वह समाचार संकलन करने के बहाने प्राईवेट अस्पताल पर गया और अनियमितता का विडियो क्लिप बनाकर ब्लैकमेलिंग करने लगा. बाद में वह उसने महिला का शारीरिक शोषण / दुष्कर्म किया. उसने करीब 70,000 रूपये ठग लिया. वह महिला को अपने पति से तलाक लेकर अपने साथ रहने को दबाव बनाने लगा. राजी नहीं होने पर पति को जान से मारने व मरवाने की धमकी देने लगा.

पीड़िता ने अपनी शिकायत स्थानीय थाना पर लिखित रूप से की. लेकिन पुलिस ने कुछ नहीं किया. बाद में पुलिस अधिक्षक ने महिला के सम्मान को तार-तार होते देख एक जांच कमेटी बैठाई और उसके आधार पर दिनांक 18/8/17 को थाना कोतवाली दुद्धी सोनभद्र में कई धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया गया. पीड़िता ने उम्मीद जाहीर की है कि आगे भी उसे न्याय मिलेगा और मीडिया के नाम से तथाकथित कुछेक व्यक्ति जो मीडिया को बदनाम कर रहे हैं, उसे चिन्हित कर अलग-थलग किया जायेगा.

सोनभद्र से पीयूएचआर (मानवाधिकार) अध्यक्ष प्रभूसिंह एडवोकेट की रिपोर्ट.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

इंटरनेशनल मीडिया फाउंडेशन की आड़ में चल रहा वेश्यावृत्ति का धंधा!

पत्रकार और पत्रकारिता दोनों ही शब्द विश्वसनीयता का प्रतीक हैं मगर कुछ फर्जी संस्थान इसकी आड़ में गन्दा खेल चला रहे हैं। सोशल नेटवर्किंग साइट में इंटरनेशनल मीडिया फाउंडेशन नामक संगठन की आड़ लेकर कुछ लोग लड़कियों-महिलाओं को फंसाने का कुकृत्य कर रहे हैं। एक युवती ने इस बाबत शिकायत की है और सबूत सहित बताया है कि इंटरनेशन मीडिया फाउंडेशन नामक संस्था, जो कि शायद ग्रेटर नोएडा से संचालित होता है, की आड़ लेकर उसे एक शख्स ने प्ले ब्वॉय से दोस्ती कराने का आफर दिया। उस संवाद के सभी सबूत नीचे दिए जा रहे हैं। संवाद के कुछ अंश इस देखिए…

युवती ..hi

इंटरनेशन मीडिया फाउंडेशन :हेल्लो कैसे हो

युवती.. हम अच्छे हैं और आप?

इंटरनेशन मीडिया फाउंडेशन.. क्या नाम है आपका।

युवती …(नाम गुप्त रखा गया हैं।)

इंटरनेशन मीडिया फाउंडेशन: क्या करते हो आप और कहा रहते हो?

युवती …थोड़ी बहुत समाज सेवा और दिल्ली रहती हूँ।

इंटरनेशन मीडिया फाउंडेशन:गुड वर्क. हम प्लेब्वाय सर्विस चलाते हैं महिलाओं के लिए।

युवती …क्या.. समझी नहीं मैं?

इंटरनेशन मीडिया फाउंडेशन.. हमारा नाम केशव है, ग्रेटर नोएडा से हूँ. हम लोग तलाकशुदा और विधवाओं की मदद करते हैं।

युवती ..क्या आप शादी कराते हैं उनकी?

इंटरनेशन मीडिया फाउंडेशन…नहीं महिलाओं की पुरुषों से दोस्ती कराते हैं फिर उनकी डेटिंग का भी जुगाड़ करते हैं।

ये था बातचीत के कुछ अंश. पत्रकारिता और मीडिया जैसे पवित्र शब्द को गन्दा कर रहे इंटरनेशनल मीडिया फाउंडेशन जैसे संगठनों का समाज से बहिष्कार करना पड़ेगा वरना यह पूरे देश में पत्रकारिता शब्द को गन्दा कर देंगे।

लेखक नवीन द्विवेदी शिप्रा दर्पण अखबार के संपादक हैं. उनसे संपर्क naveendwivedi.pimr@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

महिला पत्रकार और उनकी बहन से बनारस में खुलेआम पांच लफंगों ने की छेड़छाड़, 100 नंबर काम न आया

Arundhati Pal : वाह रे बनारस की व्यवस्था.. वाह रे बनारस के लोग… शर्म आ गयी आज बनारसी होने पर. बड़े गर्व के साथ बनारस का नाम लेती थी लेकिन आज जब होली के मौके पर बनारस आई तो शर्म आ गयी। आज करीब 8.30 बजे लंका के पास मेरे और मेरी बहन के साथ कुछ 5 लड़कों ने मिल कर सरेआम छेड़खानी शुरू कर दी.. वहाँ मौजूद मेरे पुरुष मित्र के मना करने पर उन्होंने मारपीट गालीगलौज शुरू कर दी..

इमरजेंसी नंबर 100 न जाने कितनी बार डायल किया नबंर कनेक्ट नही हुआ और कनेक्ट हुआ भी तो किसी ने रिसीव नही किया और जब रिसीव किया भी तो उधर से हेल्लो की आवाज़ आते ही कॉल डिसकनेक्ट हो गयी..इसके बाद वहां से कॉल बैक का तो चांस ही नही.. करीब 9 बार कॉल किया मैंने..

क्या यही व्यवस्था है आप लोगो की Varanasi police ?

क्या घर की बेटीयों को भी ऐसी ही सुरक्षा देते हैं आप लोग?

और हां, वारदात के दौरान पब्लिक में खड़े 50-60 लड़कों में से सिर्फ एक लड़का हमारी मदद करने की लिए निकला उसको भी उन 5 लड़को ने पीटना शुरू कर दिया.. बाकि खुद को खांटी बनारसी कहने वाले कायर तमाशा देख रहे थे।

Narendra Modi सर, सत्ता बदलने के बाद अब व्यवस्था बदलने की उम्मीद रखते हैं.

दैनिक भास्कर समूह से जुड़ी और हरियाणा के करनाल में कार्यरत महिला पत्रकार अरुंधती पाल की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें: