मुझे भी यही लगता है कि भड़ास एक स्तरहीन पोर्टल है!

भड़ास के खिलाफ भड़ास निकालने वाले अभय को दिवाकर और अवनिन्द्र ने भी दिया जवाब, पढ़िए

भड़ास4मीडिया को शुरू से ही एक खुला, पारदर्शी और लोकतांत्रिक मंच बनाकर रखने की कोशिश की गई. यही कारण है कि जब जब भड़ास या इसके फाउंडर यशवंत के खिलाफ कुछ भी किसी ने लिखकर भेजा तो उसे पूरे सम्मान के साथ छापा गया. इसी क्रम में कल भड़ास के एक पाठक अभय सिंह का पत्र भड़ास पर प्रकाशित किया गया, साथ ही संपादक यशवंत द्वारा दिया गया क्रमवार जवाब भी… इसके पब्लिश होते ही दो प्रतिक्रियाएं भड़ास के पास मेल से आई हैं. बनारस से युवा पत्रकार अवनिंद्र और नोएडा से आईटी कंपनी के संचालक दिवाकर ने जो कुछ भेजा है, उसे नीचे प्रकाशित किया जा रहा है.

नोएडा से आईटी कंपनी के हेड दिवाकर प्रताप की चिट्ठी…

कल भड़ास के एक पाठक द्वारा यशवंत जी को भेजा गया एक पत्र पढ़ा जो भड़ास पर प्रकाशित हुआ. पाठक ने सवाल किया था कि ऐसा स्तरहीन पोर्टल चलाकर यशवंत क्या हासिल कर लेंगे.  मैं भी बहुत दिनों से यही सोच रहा था, बस यशवंत जी को बता नहीं पा रहा था. मुझे भी यही लगता है कि भड़ास एक स्तरहीन पोर्टल है. असल में यशवंत जी का काम ही सिरे से स्तरहीन है.

आज जब मीडिया में तमाम स्तर बन गए हैं, यशवंत उनसे कोसों दूर हैं. क्या हैं वो स्तर, बताता हूँ. पहली स्तरहीनता है चाटुकारिता की. अक्सर मीडिया संस्थान राजनीति के एक धड़े से सम्बद्ध होते हैं. जो नहीं होते वो चल नहीं पाते, या फिर अंततोगत्वा वो चाटुकारिता के स्तर पर आ ही जाते हैं.

मुझे लगता है यशवंत का काम चाटुकारिता वाले इस स्तर पर बिलकुल खरा नहीं उतरता. वो अक्सर चाटुकारों को गरियाते पाए जाते हैं. सच को सच की तरह प्रस्तुत करके उन्होंने स्थापित स्तरों के परे जाने की ही कोशिश हमेशा की है. इसलिए उनका काम बिलकुल भी स्तरीय नहीं है.

दूसरी स्तरहीनता है धन कमाने की. हमारे यहाँ मीडिया संस्थानों को उनकी पैसे कमाने की कुव्वत के हिसाब से रैंक किया जाता है. अब ये पैसा कल्पवृक्ष से तो आता नहीं, जाहिर है मीडिया संस्थानों के निहित स्वार्थों को पूरा करने के लिए गलत तरीके से कमाए गए पैसे ही होते हैं. भले ही बाद में उनको विज्ञापन की आय बताया जाए.

तो वो जो पैसा कामने का स्तर है, यशवंत उससे भी कोसों दूर हैं. कह सकते हैं कि एक बहुत बड़ी स्तरहीनता है.

तीसरा स्तर है समझौता करने वाला स्तर. अधिकतर पत्रकार और उनके संस्थान समझौता करके ही चलते हैं. किसी का स्टिंग विडियो आया तो उससे पैसा लेकर उसको दबा दिया जाता है. किसी की अन्दर की खबर प्रकाशित होती है तो कुछ समय बाद हटा दी जाती है. ये जो स्तर कायम हो गया है, उसकी आवश्यकता को यशवंत नहीं समझ पा रहे हैं. तो यहाँ भी वो स्तर वाली पत्रकारिता से बहुत दूर हैं.

चौथा स्तर है भीरूपन का स्तर. आज तमाम अपराधी हर तरह से मीडिया को दबाने का काम कर रहे हैं. ऐसे में अपनी मीडिया की दूकान को चलाने के लिए ये संस्थान पूँछ दबाकर अक्सर दुबके हुए पाए जाते हैं. यशवंत यहाँ भी दुबकने को राजी नहीं. जेल जा चुके हैं, हमला भी झेल चुके हैं. पर भीरु बनने को राजी नहीं. ये भी निरी स्तरहीनता ही है. शायद इन भीरूओं की तरह रहे तो अवश्य स्तरीय कहलायेंगे.

ऐसे और भी तमाम स्तर हैं जहाँ यशवंत फिट नहीं बैठते. उनको चाहिए कि वो इन स्थापित स्तरों के अनुसार जल्द से जल्द स्तरीय पत्रकारिता की शुरुआत करें. तब हम जैसे तमाम पाठक उनके काम को सराहेंगे. उम्मीद है जल्द ही वो इन सारे स्तरों पर पहले से अधिक फिट होंगे और अपने पाठकों का अधिक से अधिक प्यार हासिल करेंगे.

दिवाकर प्रताप सिंह
dsingh@qtriangle.in


बनारस से अवनिन्द्र कुमार सिंह का जवाब…

डियर यशवंत जी (जेल जिसकी जानेमन है), अभी-अभी व्हाट्सअप पर आप द्वारा भड़ास की खबरों को प्राप्त किया। रोजाना की तरह पहले सभी खबरों की हेडलाइन देखा। पहले मेरी नजर ‘जी न्यूज से रोहित सरदाना गए’ खबर पर टिकी, जिसके बाद अंत में ‘भड़ास के खिलाफ एक पाठक ने यूं निकाली अपनी भड़ास, ‘यशवंत जी, भड़ास का अंत आवश्यक हो गया है!’ नामक शीर्षक पर गई तो गाड़ी चलाते समय भी खुद को रोक नहीं पाया और लिंक पर क्लिक करके खबर खोला। पहले तो प्रिय अभय जी के पत्र को पढ़ा तो अचंभित रह गया फिर सोचा शायद अभय जी को यह मालूम न होगा कि किन परिस्थियों में भड़ास की शुरुआत हुई थी। मित्र आपके प्रश्नों के कुछ उत्तर आपको देने का प्रयास करता हूँ बाकी के खुद भड़ासी (यशवंत जी) ने दे दी है।

यशवंत जी जो अमर-उजाला और जागरण जैसे संस्थानों में नौकरी करने वाले वह पत्रकार थे जिसकी कलम जब सच्चाई न लिख पाती थी तो वह अपने अंदर का आक्रोश शांत नहीं कर पाते होंगे, शायद इसलिए भड़ास की शुरुआत हुई, जहा तक मैं जानता हूँ जीवन में प्रयोग करना यशवंत जी का रूटीन है। जहा तक बात मीडियाकर्मियों द्वारा यशवंत जी पर लात-घूसों से मारने का है आप उतने में ही घबरा गए मित्र। भड़ास के शुरु होने के बाद कई बड़े संस्थानों को पशीने छुटे थे अलबत्ता यशवंत जी को षड्यंत्र रचकर प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने जेल तक भेजा था, वहा भी यशवंत जी अल्हड़पन और मस्तमौला जीवन यापन करके जेल को ही ‘जानेमन’ बना लिए। जेल से छूटने के बाद जेलयात्रा का जो वृतांत ‘जानेमन जेल’ पुस्तक में लिखी उसे पढ़कर जेल नाम से भय समाप्त हो जाता है। भ्रष्ट और कारपोरेट मीडियाघराना कभी नहीं चाहता कि भड़ास सुचारु रुप से चले क्योंकि मिडियाघरानों के तहखाने की खबर, भ्रष्टाचार, यौनशोषण की बातें जनता तक पहुंचाने का कोई माध्यम न बचे।

मित्र अभय जी जिस भड़ास को आप स्तरहीन कह रहे है वह वास्तव में बाप है मीडिया का।कार्पोरेट और करप्ट मीडिया घरानों का। बात यादि अर्जित करने की है तो यशवंत जी को आर्थिक लाभ हुआ हो या नहीं मगर आत्मसंतुष्टि और लाखों पीड़ित मीडियाकर्मियों की दुआ अवश्य अर्जित हुई है।

रही बात ईमानदार और निष्पक्ष पत्रकारिता की मिसाल पेश करने की तोदिल्ली में बैठकर अकेले यशवंत जी यह काम नहीं कर सकते कारण स्पष्ट है मित्र जिस साथियों को वह जोड़ेंगे उन ईमानदार और निष्पक्ष पत्रकारों को अगले ही पल संस्थान बाहर का रास्ता दिखा देगा शायद आपको मालूम न हो कि कई मीडिया संस्थानों ने दफ्तर में भड़ास वेबसाइट को खोलने पर प्रतिबंध लगा रखा है।

मित्र आपने जो यशवंत जी से आशा कि है कि मीडिया में उनके जैसे साहसी, निडर पत्रकार की जरुरत है इसलिए भड़ास की जरुरत है। कारपोरेट मीडिया को आईना दिखाने चौथे स्तम्भ को उसकी अहमियत लगातार भड़ास बताता आया है और जो आपने भड़ास के शीघ्र त्याग की बात कही है वह होने से रहा क्योंकि जब-जब भड़ास से मदद की अपील की है तो चोरी-छिपे हजारों मीडियाकर्मियों ने देशभर से सहायता राशि भेजते होंगे क्योंकि उनका दर्द, अखबार मैनेजमेंट की तानाशाही और संपादक का तुगलकी फरमान का विरोध केवल भड़ास ही कर सकता है।

आप सबका बनारस का साथी

अवनिन्द्र कुमार सिंह
avanindrreporter@gmail.com


जिन सज्जन अभय सिंह ने भड़ास पर कल भड़ास निकाली थी, उनका एक और मेल आया है, वो इस प्रकार है…

यशवंत भैया
सादर प्रणाम

बेहद खुशी हुई कि आपने मेरी भड़ास का बड़ी बेबाकी से उत्तर दिया।पर हर प्रतिक्रिया पर तिलमिलाने की आदत से आज हर नेता,एंकर, पत्रकार पीड़ित है शायद सब्र का बांध अब टूट चुका है । मीडिया भी बिगबॉस का नकारात्मक शो बनकर रह गया है जहाँ प्रतिभागियों को लड़ा भिड़ाकर trp बटोरी जाती है। शायद स्वयं में बदलाव का ये सबसे सही समय है। मेरी आपसे बड़ी उम्मीद है और मेरा विश्वास है कि आप मेरा भरोसा नही तोड़ेंगे भड़ास से भी दूरगामी पहल करेंगे।

मैं आपके पोर्टल का अदना सा पाठक हूं ।न्यूज़,डिबेट देखने सुनने में मेरी गहरी रुचि है ।पत्रकारिता से मेरा दूर तक कोई वास्ता नहीं है ।बस दिल किया और आपको अपनी बात बता दी। पत्र में वर्तनी, वाक्यांश का दोष जरूर होगा क्योंकि अगर अंग्रेजी में टाइप करता तो शायद संवाद में कमी होती इसलिए मोबाइल पर जल्दी में हिंदी टाइप करना उचित समझा लेकिन मोबाइल पर हिंदी टाइप करना कितना कठिन है कि मेरी उंगलिया जवाब दे गई बेहतर होता कि मैं आपको हस्तलिखित पत्र स्कैन करके मेल कर देता।

मेरा आपसे यही सवाल था कि मीडिया के गुण दोषों में अपना समय बर्बाद करने की बजाय खुद एक बेहतर विकल्प बनने का प्रयास किया जाय। हम दूसरों को बदलने की कोशिश करने की बजाय खुद को ऐसा बनाये की लोग हमें देखकर अपनी गलतियों का आभास करें और उन्हें दूर करें।अगर आप किसी की भयंकर आलोचना करते है तो दो संभावनाये बनती हैं या तो आप सच्चे आलोचक हैं या ब्लैकमेलर।आज मीडिया ब्लैकमेलर की भूमिका में है जब उसके हित पूरे हो जाते है तो वे आलोचना बंद कर देते है।उदाहरण के तौर पर यूपी चुनाव में अखिलेश यादव ने लंबे समय तक ऐसा मीडिया मैनेज किया की जमीनी सच्चाई से दूर सारे पत्रकार लगातार गलत विश्लेषण कर रहे थे । चुनाव परिणाम के बाद अधिकांश पत्रकारों की राजनीतिक समझ पर खूब छीछालेदर हुई।आखिर क्या पत्रकारिता पर पेट भारी है।

मीडिया को ब्लैकमेलिंग का धंधा बनाकर अपना उल्लू सीधा करना आज आम है इसे बदलने की जरूरत है । ऐसा देखा जाता है कि जहाँ मीडिया के आर्थिक हित होते है वहाँ सही गलत का फर्क खत्म हो जाता है।

जब आप पर हमला हुआ तब मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि आपके भड़ास4मीडिया के अलावा कहीं भी इस बात की चर्चा तक नहीं हुई आप खुद ही अकेले लड़ते रहे।आखिर क्यों आप अकेले पड़ गए इसका आत्ममंथन आपको करना जरूरी है।

मुझे लगता है कि भविष्य में मीडिया में बड़ा बदलाव अत्यावश्यक है जिसकी आप एक बड़ी उम्मीद बन सकते है ।मैं एक पाठक हूँ अपनी राय रख सकता हूँ बाकी फैसला आपका है। भाषण में मेरा यकीन नही है हां पत्रकारिता के उभरते हनुमान को उनके बल, सामर्थ्य की की याद जरूर दिला सकता हूं।

शुरू से ही मीडिया के बदलते रंग रूप को देखकर गहरा संदेह होता है इसी को जानने के लिए भड़ास4मीडिया की मदद लेता रहा हूं।एक उम्मीद दिखती है लेकिन क्या ये सब पर्याप्त है। मेरी एक उम्मीद है कि भविष्य में ऐसा मीडिया हो जिसमे निष्पक्ष, ईमानदार लोग हो जो trp की होड़ से कोसो दूर हो। दिल्ली और हनीप्रीत के ड्रामे केअलावा देश के और भी हिस्सों की समस्याओं को सामने रखें।डिबेट में शांत संतुलित बहस हो। सत्ता के आगे रेंगने की बजाय उनसे सवाल पूछने का माद्दा हो।चैनल की विश्वसनीयता इतनी हो कि देश उस पर भरोसा करे लेकिन आज स्थिति बिल्कुल उलट है।इसमे बदलाव के वाहक आप बने यही ईश्वर से मेरी कामना है। बस एक उम्मीद से आपसे अपनी हाँफती उंगलियों को विराम देना चाहूंगा।

धन्यवाद

एक पाठक

अभय सिंह

abhays170@gmail.com


मूल मसला इसमें है…

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रवीश जी, अगर Yashwant Singh से कुछ पर्सनल खुन्नस है तो कम से कम उनके काम की तो तारीफ कर दीजिये!

Divakar Singh : रवीश जी, आपने सही लिखा हमारी मीडिया रीढविहीन है. साथ ही नेता भी चाहते हैं मीडिया उनकी चाटुकारिता करती रहे. आप बधाई के पात्र हैं यह मुद्दे उठाने के लिए. पर क्या बस इतना बोलने से डबल स्टैंडर्ड्स को स्वीकार कर लिया जाए? आप कहते हैं कि ED या CBI की जांच नहीं हुई तो कोई मानहानि नहीं हुई. आप स्वयं जानते होंगे कितनी हलकी बात कह दी है आपने. दूसरा लॉजिक ये कि अमित शाह स्वयं क्यों नहीं आये बोलने. अगर वो आते तो आप कहते वो पिता हैं मुजरिम के, इसलिए उनकी बात का कोई महत्त्व नहीं. तीसरी बात आप इतने उत्तेजित रोबर्ट वाड्रा वगैरह के मामले में नहीं हुए. यहाँ आप तुरंत अत्यधिक सक्रिय हो गए और अतार्किक बातें करने लगे. ठीक है नेता भ्रष्ट होते हैं, मानते हैं, पर कम से कम तार्किक तो रहिये, अगर निष्पक्ष नहीं रह सकते.

हालांकि हम जैसे लोग जो आपका शो पसंद करते हैं, चाहते हैं कि आप निष्पक्ष भी रहें. किसी ईमानदार पत्रकार का एक गुट के विरोध में और दूसरे के समर्थन में हर समय बोलते रहना एक गंभीर समस्या है, जिसमें आप जैसे आदरणीय (मेरी निगाह में) पत्रकार हठधर्मिता के साथ शामिल हैं. मोदी सरकार के कट्टर समर्थक मीडिया को आप बुरा मानते हैं, तो कट्टर विरोधी जोकि तर्कहीन होकर आलोचना करने लग जाते हैं, उतने ही बुरे हैं. एक और बात भी आपसे कहना चाह रहा था. आप को शायद बुरा लगा कि भारत की मीडिया कुछ कर नहीं पा रही है और ऑस्ट्रेलिया की मीडिया बहुत बढ़िया है.

क्या आप जानते हैं कि आप जिस इंडस्ट्री में है, उसके लिए भारत में सबसे धाकड़ मीडिया स्तम्भ कौन सा है? कुछ महीने पहले आपने हिंदी मीडिया के कुछ पोर्टल गिनाये थे, कल फिर कुछ गिनाये थे. Yashwant Singh से कुछ पर्सनल खुन्नस है तो कम से कम उनके काम की तो तारीफ कर दीजिये, जो वो तमाम पत्रकारों के हित में करते हैं. उनको भी थोडा महत्त्व दें जब आप हिंदी मीडिया की बात करते हैं. नहीं तो आप भी मोदी और शाह के लीक में शामिल नहीं हैं जो अपने आलोचक को तवज्जो नहीं देते? तो सर मुख्य समस्या डबल स्टैंडर्ड्स की है. सोचियेगा जरूर. न सोचेंगे तो भी ठीक. जो है सो हईये है.

एक आईटी कंपनी के मालिक दिवाकर सिंह ने उपरोक्त कमेंट एनडीटीवी के एंकर रवीश कुमार के जिस एफबी पोस्ट पर किया है, वह इस प्रकार है—

Ravish Kumar : मानहानि- मानहानि: घोघो रानी, कितना पानी… आस्ट्रेलिया के जिन शहरों का नाम हम लोग क्रिकेट मैच के कारण जानते थे, वहां पर एक भारतीय कंपनी के ख़िलाफ़ लोग प्रदर्शन कर रहे हैं। शनिवार को एडिलेड, कैनबरा, सिडनी, ब्रिसबेन, मेलबर्न, गोल्ड कोस्ट, पोर्ट डगलस में प्रदर्शन हुए हैं। शनिवार को आस्ट्रेलिया भर में 45 प्रदर्शन हुए हैं। अदानी वापस जाओ और अदानी को रोको टाइप के नारे लग रहे हैं। वहां के करदाता नहीं चाहते हैं कि इस प्रोजेक्ट की सब्सिडी उनके पैसे से दी जाए।

अदानी ग्रुप के सीईओ का बयान छपा है कि प्रदर्शन सही तस्वीर नहीं है। स्तानीय लोग महारा समर्थन कर रहे हैं। जेयाकुरा जनकराज का कहना है कि जल्दी ही काम शुरू होगा और नौकरियां मिलने लगेंगी। यहां का कोयला भारत जाकर वहां के गांवों को बिजली से रौशन करेगा। पिछले हफ्ते आस्ट्रेलिया के चैनल एबीसी ने अदानी ग्रुप पर एक लंबी डाक्यूमेंट्री बना कर दिखाई। इसका लिंक आपको शेयर किया था। युवा पत्रकार उस लिंक को ज़रूर देखें, भारत में अब ऐसी रिपोर्टिंग बंद ही हो चुकी है। इसलिए देख कर आहें भर सकते हैं। अच्छी बात है कि उस डाक्यूमेंट्री में प्रशांत भूषण हैं, प्रांजॉय गुहा ठाकुरता हैं।

प्रांजॉय गुहा ठाकुरता ने जब EPW में अदानी ग्रुप के बारे में ख़बर छापी तो उन पर कंपनी ने मानहानि कर दिया और नौकरी भी चली गई। अभी तक ऐसी कोई ख़बर निगाह से नहीं गुज़री है कि अदानी ग्रुप ने एबीसी चैनल पर मानहानि का दावा किया हो। स्वदेशी पत्रकारों पर मानहानि। विदेशी पत्रकारों पर मानहानि नहीं। अगर वायर की ख़बर एबीसी चैनल दिखाता तो शायद अमित शाह के बेटे जय शाह मानहानि भी नहीं करते। क्या हमारे वकील, कंपनी वाले विदेशी संपादकों या चैनलों पर मानहानि करने से डरते हैं?

एक सवाल मेरा भी है। क्या अंग्रेज़ी अख़बारों में छपी ख़बरों का हिन्दी में अनुवाद करने पर भी मानहानि हो जाती है? अनुवाद की ख़बरों या पोस्ट से मानहानि का रेट कैसे तय होता है, शेयर करने वालों या शेयर किए गए पोस्ट पर लाइक करने वालों पर मानहानि का रेट कैसे तय होता है? चार आना, पांच आना के हिसाब से या एक एक रुपया प्रति लाइक के हिसाब से?

पीयूष गोयल को प्रेस कांफ्रेंस कर इसका भी रेट बता देना चाहिए कि ताकि हम लोग न तो अनुवाद करें, न शेयर करें न लाइक करें। सरकार जिसके साथ रहे, उसका मान ही मान करें। सम्मान ही सम्मान करें। न सवाल करें न सर उठाएं। हम बच्चे भी खेलते हुए गाएं- मानहानि मानहानि, घोघो रानी कितना पानी। पांच लाख, दस लाख, एक करोड़, सौ करोड़।
यह सब इसलिए किया जा रहा है कि भीतरखाने की ख़बरों को छापने का जोखिम कोई नहीं उठा सके। इससे सभी को संकेत चला जाता है कि दंडवत हो, दंडवत ही रहो। विज्ञापन रूकवा कर धनहानि करवा देंगे और दूसरा कोर्ट में लेकर मानहानि करवा देंगे। अब यह सब होगा तो पत्रकार तो किसी बड़े शख्स पर हाथ ही नहीं डालेगा। ये नेता लोग जो दिन भर झूठ बोलते रहते हैं,

क्या इनके ख़िलाफ़ मानहानि होती रहे?

अमित शाह एक राजनीतिक शख्स हैं। तमाम आरोप लगते रहे हैं। वे उसका सामना भी करते हैं, जवाब भी देते हैं और नज़रअंदाज़ भी करते हैं। वायर की ख़बर में आरोप तो हैं नहीं। जो कंपनी ने रिकार्ड जमा किए हैं उसी का विश्लेषण है। फिर कंपनी रजिस्ट्रार को दस्तावेज़ जमा कराने और उस आधार पर लिखने या बोलने से समस्या है तो ये भी बंद करवा दीजिए।

अमित शाह के बेटे के बारे में ख़बर छपी। पिता पर तो फेक एनकाउंटर मामलों में आरोप लगे और बरी भी हुए। सोहराबुद्दीन मामले में तो सीबीआई ट्रायल कोर्ट के फैसले पर अपील ही नहीं कर रही है। उन पर करप्शन के आरोप नहीं लगे हैं। इसके बाद भी अमित शाह आए दिन राजनीतिक आरोपों का सामना करते रहते हैं। जवाब भी देते हैं और नज़रअंदाज़ भी करते हैं। कायदे से उन्हें ही आकर बोलना चाहिए था कि पुत्र ने मेरी हैसियत का कोई लाभ नहीं लिया है। मगर रेल मंत्री बोलने आ गए। मानहानि का फैसला अगर पुत्र का था तो रेल मंत्री क्यों एलान कर रहे थे?

इस ख़बर से ऐसी क्या मानहानि हो गई? किसी टीवी चैनल ने इस पर चर्चा कर दी? नहीं न। सब तो चुप ही थे। चुप रहते भी। रहेंगे भी। कई बार ख़बरें समझ नहीं आती, दूसरे के दस्तावेज़ पर कोई तीसरा जिम्मा नहीं उठाता, कई बार चैनल या अखबार रूक कर देखना चाहते हैं कि यह ख़बर कैसे आकार ले रही है? राजनीति में किस तरह से और तथ्यात्मक रूप से किस तरह से। यह ज़रूरी नहीं कि टीवी दूसरे संस्थान की ख़बर को करे ही। वैसे टीवी कई बार करता है। कई बार नहीं करता है। हमीं एक हफ्ते से उच्च शिक्षा की हालत पर प्राइम टाइम कर रहे हैं, किसी ने नोटिस नहीं लिया।

लेकिन, जब चैनलों ने कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल की प्रेस कांफ्रेंस का बहिष्कार किया तो उन्हें पीयूष गोयल की प्रेस कांफ्रेंस का भी बहिष्कार करना चाहिए था। जब सिब्बल का नहीं दिखाए तो गोयल का क्यों दिखा रहे थे? अव्वल तो दोनों को ही दिखाना चाहिए था। लाइव या बाद में उसका कुछ हिस्सा दिखा सकते थे या दोनों का लाइव दिखा कर बाद में नहीं दिखाते। यह मामला तो सीधे सीधे विपक्ष को जनता तक पहुंचने से रोकने का है। सिब्बल वकील हैं। उन्हें भी अदालत में विपक्ष के स्पेस के लिए जाना चाहिए। बहस छेड़नी चाहिए।
इस तरह से दो काम हो रहे हैं। मीडिया में विपक्ष को दिखाया नहीं जा रहा है और फिर पूछा जा रहा है कि विपक्ष है कहां। वो तो दिखाई ही नहीं देता है। दूसरा, प्रेस को डराया जा रहा है कि ऐसी ख़बरों पर हाथ मत डालो, ताकि हम कह सके कि हमारे ख़िलाफ़ एक भी करप्शन का आरोप नहीं है। ये सब होने के बाद भी चुनाव में पैसा उसी तरह बह रहा है। उससे ज़्यादा बहने वाला है। देख लीजिएगा और हो सके तो गिन लीजिए।

एक सवाल और है। क्या वायर की ख़बर पढ़ने के बाद सीबीआई अमित शाह के बेटे के घर पहुंच गई, आयकर अधिकारी पहुंच गए? जब ऐसा हुआ नहीं और जब ऐसा होगा भी नहीं तो फिर क्या डरना। फिर मानहानि कैसे हो गई? फर्ज़ी मुकदमा होने का भी चांस नहीं है। असली तो दूर की बात है। एबीसी चैनल ने अदानी ग्रुप की ख़बर दिखाई तो

ENFORCEMENT DEPARTMENT यानी ED अदानी के यहां छापे मारने लगा क्या? नहीं न। तो फिर मानहानि क्या हुई?

अदालत को भी आदेश देना चाहिए कि ख़बर सही है या ग़लत, इसकी जांच सीबीआई करे, ईडी करे, आयकर विभाग करे फिर सबूत लेकर आए, उन सबूतों पर फैसला हो। ख़बर सही थी या नहीं। ख़बर ग़लत इरादे से छापी गई या यह एक विशुद्ध पत्रकारीय कर्म था।

एक तरीका यह भी हो सकता था। इस ख़बर का बदला लेने के लिए किसी विपक्ष के नेता के यहां लाइव रेड करवा दिया जाता। जैसा कि हो रहा है और जैसा कि होता रहेगा। सीबीआई, आयकर विभाग, ईडी इनके अधिकारी तो पान खाने के नाम पर भी विपक्ष के नेता के यहां रेड मार आते हैं। किसी विपक्ष के नेता की सीडी तो बनी ही होगी, गुजरात में चुनाव होने वाले हैं, किसी न किसी को बन ही गई होगी। बिहार चुनाव में भी सीडी बनी थी। जिनकी बनी थी पता नहीं क्या हुआ उन मामलों में। ये सब आज से ही शुरू कर दिया जाए और आई टी सेल लगाकर काउंटर कर दिया जाए।

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मोदी को मैदान में उतार बीजेपी ने जो रामबाण चलाया वह कितना कारगर साबित होगा

पिछले कुछ हफ़्तों में केंद्र सरकार की कई मोर्चों पर किरकिरी हुई है. पहला मामला बीजेपी की आतंरिक कलह से जुड़ा है. सुब्रमण्यम स्वामी ने अरुण जेटली पर अप्रत्यक्ष रूप से हमले किये हैं. रघुराम राजन से लेकर वित्त मंत्रालय से जुड़े अन्य अधिकारियों तक उनके लगातार हमले बीजेपी को परेशान किये हुए हैं. मीडिया में इस मामले को जोरशोर से उछाला गया है. बीजेपी बैकफुट पर है.  दूसरा मामला है भारत की अंतर्राष्ट्रीय नीति से संबंधित. भारत को NSG की सदस्यता की कितनी आवश्यकता थी, थी भी कि नहीं, ये शायद हम अच्छे से नहीं जानते, पर ये अवश्य जानते हैं कि चीन ने हमारा खेल बिगाड़ दिया. यहाँ भी भारत सरकार की किरकिरी हुई. नरेन्द्र मोदी की एग्रेसिव अंतर्राष्ट्रीय छवि को धक्का पहुंचा है.

तीसरा मामला भी सरकार के लिए बड़ा झटका है. ये मामला आंतरिक सुरक्षा और पाकिस्तानी मामलों से जुड़ा हुआ है. कश्मीर में पिछले एक महीने में सुरक्षा बलों पर अनेकों भीषण हमले हुए हैं. कहा जा रहा है कि पिछले कई वर्षों में कश्मीर में हालात कभी इतने बुरे नहीं रहे. यहाँ बीजेपी न केवल केंद्र सरकार में होने की वजह से बल्कि राज्य में भी सत्ता में होने की वजह से मुसीबत के केंद्र में है. आज के समय में किसी सरकार के विरोध में माहौल बनाने के लिए विपक्ष को ज्यादा कुछ नहीं करना पड़ता, बशर्ते मीडिया ख़बरों को अच्छे से पेश कर रहा हो. भारत का मीडिया जैसा भी हो, पर अलग अलग धड़ों में बंटे होने के कारण जब विरोधी खेमा ज्यादा मुखर होता है, तो सरकार के हाथ पाँव फूलना लाजमी है.

ये वो समय है, जहाँ बीजेपी और नरेन्द्र मोदी की नीतियों पर मीडिया और कुछ हद तक आम जनता भी सवाल उठा रही है, भले ही दबे स्वरों में. बीजेपी को कुछ ऐसा करना ही था जिससे वो लोगों तक अपनी बात पहुंचाए. तो कौन बने बिल्ली और कौन बांधे घंटी? बीजेपी ने यहाँ अपने जांचे परखे ट्रम्प कार्ड को फिर से खेला है. संकटमोचन नरेन्द्र मोदी जी को उतारा गया है. ऐसा पहली बार हुआ है कि एक भारतीय प्रधानमन्त्री ने अपने कार्यकाल के दौरान किसी न्यूज़ चैनल को विस्तारपूर्वक इंटरव्यू दिया है. इस इंटरव्यू में नरेन्द्र मोदी ने इन सारे मुद्दों पर सकारात्मक तरीके से अपना पक्ष रखा है. कोशिश है भारतीय जनता और भारतीय जनता पार्टी को ढाढ़स बंधाने की, ये देखने योग्य होगा कि प्रधानमन्त्री की ये कोशिश इस नकारात्मक माहौल को सकारात्मक बनाने में कितने काम आती है.  

लेखक दिवाकर सिंह आईटी फील्ड से जुड़े हुए हैं और नोएडा में रहते हुए खुद की कंपनी संचालित करते हैं. उनसे संपर्क dsingh@qtriangle.in के जरिए किया जा सकता है.


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अरुण धुरी ने मीटिंग बुलाकर कहा- ”यार इस मोदी की कैसे बैंड बजाएं…. कुछ मसाला दो….”

अरुण धुरी जी ‘टीवी टुंडे कबाब’ ग्रुप के सारे एडिटर्स को बुलाकर गहन मंत्रणा कर रहे हैं. देखिए मीटिंग का दृश्य…

अरुण धुरी: “यार कैसे बैंड बजाएं इस मोदी की.. कुछ मसाला दो ताकि इस हेलीकाप्टर घोटाले को दबाया जाए.”

करन कापर: “अरे हमारे पास बीजेपी के एक ऐसे नेता का नंबर है जो मोदी से जला भुना रहता है.”

अरुण धुरी: “भाई तुम अरुण शौरी की बात तो नहीं कर रहे हो, एक साल पहले उसका इंटरव्यू लिया था, साला किसी ने भाव नहीं दिया. बीजेपी संसदीय दल ने मीटिंग भी नहीं की शौरी को निकालने के लिए. आज भी बीजेपी का सदस्य है. ये फ्लॉप शो नहीं चलेगा.”

‘आजकल तक’ के हुन्न रंगून हाजपेयी जी बोले: “सर इनसे अच्छा तो हमने कर डाला. कल परिकर और स्वामी ने संसद में जोरदार स्पीच दी थी. क्रांतिकारी. पर हमने उसको लील लिया. मिशेल ने मोदी को फ़िक्सर बोला था कुछ महीने पहले उसको ख़ास खबर बनाकर दिखाया.”

इस बीच राजकाजदीप बरबराई अचानक जागे, सवाल दागते हुए: “और सर सुना है वो हेलीकाप्टर का पैसा कुछ पत्रकारों को दिया गया था. हेलीकाप्टर मामले से ज्यादा जरूरी देश के बाकी मुद्दों को न्यूज़ पर दिखाते रहने के लिए. वो पैसा आखिर…”

अरुण धुरी (बीच में काटते हुए): “यार तुम मुद्दे से भटक रहे हो. हम पैसा कमाने नहीं देश की सेवा करने के लिए अपने चैनल चलाते हैं. समझे आप लोग.”

राजकाजदीप ने शांति के साथ ऐसा मुँह बना लिया जैसा मेडिसन गार्डन स्क्वायर पर थप्पड़ खाने के बाद बनाया था. बाकी एडिटर्स मंद मंद मुस्कराने लगे थे. पर अपनी मुस्कराहट को धुरी जी की तारीफ की तरह चेहरे पर प्रकट कर रहे थे.

हाजपेयी जी: “सर इनसे कुछ नहीं होगा. आप बताइए क्या करना है.”

अरुण धुरी: “अब साला ये भी हम ही बताएं. तुम हिंदी वाले हो भाई. फिर भी कापर जी से अच्छा  काम कर रहे हो. पर इन्टेलेकचुअल लोगो को साधने के लिए अंग्रेजी में बात करना होता है. इतना बड़ा हंडिया टुडे न्यूज़ चैनल लांच कर दिया है, लानत है कोई ढंग का स्कैंडल नहीं ला पा रहे हो.”

करन कापर: “सर अरुण में कुछ बात है. अरुण में वो दम है कि बीजेपी की खटिया खड़ी कर देगा.”

अरुण धुरी (गला साफ़ करते हुए, और अपनी टाई को कसते हुए): “हाँ हाँ ठीक है, बुला लो शौरी जी को. ये देख लेना इस बार कुछ विस्फोटक होना चाहिए. टीआरपी और समाज सेवा एक साथ होनी चाहिए.”

हाजपेयी: “बहुत ही क्रन्तिकारी हो जायेगा.”

अरुण धुरी: “हाजपेयी जी ये क्रांति की बातें करना छोडिये. देखो कापर टीआरपी लाने जा रहा है. तुम भी कुछ बढ़िया माल लाओ फिर अगली मीटिंग में बात करेंगे.”

धुरी जी और सारे चेले अपना अपना कॉफ़ी मग उठाकर मीटिंग से बाहर निकल जाते हैं.

इस व्यंग्य कथा के लेखक दिवाकर सिंह आईटी फील्ड से जुड़े हुए हैं और नोएडा से खुद की कंपनी संचालित करते हैं. उनसे संपर्क dsingh@qtriangle.in के जरिए किया जा सकता है.

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पनामा पेपर्स की तरह कहीं आपके कारोबार का भी आनलाइन कच्चा चिट्ठा लीक न हो जाए, जानें सुरक्षा के उपाय

पनामा पेपर्स के लीक को लेकर बवाल मचा हुआ है. छोटे बड़े देशों के वीआईपी लपेटे में आ चुके हैं. दरअसल ये मोजाक फोंसेका कंपनी के कारोबार से जुड़े दस्तावेजों का लीक है. इन दस्तावेजों में कंपनी के पिछले 30+ सालों के कारोबार का कच्चा चिठ्ठा मौजूद है. कंपनी के मैनेजमेंट का कहना है कि उसके डाटा को बाहर के व्यक्तियों द्वारा चुराया गया है. उनका मानना है कि संभवतः किसी ने उनके सर्वर्स पर मौजूद जानकारी को चुराया है. तो हम कह सकते हैं कि ये मामला हैकिंग से जुड़ा हो सकता है. सालों पहले विकीलीक्स में भी कुछ ऐसा ही हुआ था. उन्होंने किस किस देश से कितना डाटा चुराया या प्राप्त किया, ये आज तक पता लगाया जा रहा है.

कुल मिलाकर यदि आप कोई ऐसा व्यवसाय करते हैं जिसमें गोपनीय जानकारी को संजोया जाता है, तो आपको चिंतित होने की जरूरत है. आपको अपने कंप्यूटर की सुरक्षा की चिंता अवश्य करनी चाहिए, पर अपने व्यावसायिक डाटा जो कि सर्वर्स पर सेव होता है, उसके लिए अधिक चिंतित होने की आवश्यकता है. आइये जानते हैं कुछ ऐसे उपायों के बारे में जिससे आपको अपने व्यावसायिक डाटा को सुरक्षित रखने में मदद मिलेगी.

भरोसेमंद आईटी सेटअप
जो भी व्यक्ति या कंपनी आपके सर्वर्स और आईटी सेटअप को मैनेज करता है, उसको अच्छे से जांचें. उन्होंने आपके डाटा की सुरक्षा के लिए क्या उपाय किये हैं? हैकिंग से बचने के लिए क्या किया है? कुछ गड़बड़ होने पर फटाफट उसको ठीक करने की काबिलियत उनके पास है या नहीं?

सुरक्षित सॉफ्टवेयर का प्रयोग
इन्टरनेट पर प्रतिदिन सैकड़ों वायरस अवतरित होते हैं, और लगभग सभी का उपचार भी ढूंढ लिया जाता है. ये उपचार आपके पास सॉफ्टवेर अपडेट के रूप में आता है. जब भी आप कोई सॉफ्टवेर अपडेट करते हैं, उसमें कई अपडेट सुरक्षा को बढ़ाने के लिए भी होते हैं. तो अपने सर्वर का सॉफ्टवेर अपडेटेड रखिये, आपको हैकिंग या लीक से बचने में मदद मिलेगी.

डाटा रिकवरी प्रणाली का प्रयोग
आपके पोर्टल या कॉर्पोरेट इंट्रानेट पर जब कोई हैकर हमला करता है तो कई बार आपके डाटा के साथ छेड़छाड़ भी हो सकती है. इसलिए आपके कॉर्पोरेट सर्वर्स का डिजास्टर रिकवरी सेटअप अत्यंत आवश्यक है. यदि आपके पास रिकवरी सिस्टम है तो बहुत जल्दी किसी भी ऑनलाइन हमले से निपटने में मदद मिलेगी.

डाटा एन्क्रिप्शन का प्रयोग
कॉर्पोरेट सर्वर्स से डाटा का आदान-प्रदान करते समय अत्यंत आवश्यक है कि आपका डाटा सुरक्षित रूप से तारों में (over the network) प्रवाहित हो. नेटवर्क में प्लग इन करके डाटा की चोरी सरलता से संभव है. इससे बचने के लिए मुख्य रूप से VPN (वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क) और SSL सर्टिफिकेट को अवश्य अपनाएं.

कुल मिलाकर आपकी कंपनी का डाटा आपकी जिम्मेदारी है. आपके ग्राहकों ने आप पर भरोसा करके आपको जानकारी दी है, अब ये आपका कर्त्तव्य है सारी आवश्यक सावधानियां अपनाएं और अपना कॉर्पोरेट डाटा सुरक्षित रखें.

लेखक दिवाकर सिंह नोएडा की कंपनी Qtriangle Infotech Pvt Ltd के मैनेजिंग डायरेक्टर हैं. वेबसाइट डेवलपमेंट, मोबाइल एप्लीकेशन डेवलपमेंट और ई-कॉमर्स पोर्टल डेवलपमेंट का काम करते कराते हैं. साथ ही साथ भड़ास4मीडिया डाट काम के तकनीकी सलाहकार भी हैं. अगर आपको इनसे कुछ जानना-समझना, पूछना-जांचना या सलाह लेना-देना हो तो इनसे संपर्क dsingh@qtriangle.in के जरिए किया जा सकता है.

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