वर्दी में गुंडई (10) : जेल जाने पर पता चला- थाने में होता है चालीस हजार रुपये में धारा 376 हटाने का खेल!

आरटीआई एक्टिविस्ट सिंहासन चौहान

बलिया के भीमपुरा थाने की कार्यशैली व मेरी गिरफ्तारी

जेल में रहते हुए कुछ दिन बीते थे कि हमारे बैरक 3A में एक लड़का आया. मुझसे दूसरे लड़के शैलेश यादव ने उसका परिचय कराया. मैंने उससे बात की तो उसने बताया कि वह हमारे गाँव के नजदीक खूंटा बहोरवा का रहने वाला है. उसका नाम विपिन शर्मा है. मैंने उससे जब पूछा कि वो किस केस में आया है तो उसने बताया की 354 छेड़खानी में आया हूँ. विरोधियों ने पुलिस में पैसे देकर झूठी शिकायत दर्ज करवाई है. वो मुझे पुलिस से पिटवाना चाहते थे, इसलिए मैंने कोर्ट में आत्मसमर्पण कर दिया. बाद में उसने बताया कि बयान बदलवा कर धारा 376 बढ़ा दी गई है.

बाद में एक रोज जेल में एक दरोगा उसका बयान लेने आया. दरोगा ने उससे कहा कि आप तो जेल में आकर चुप बैठ गए, घर वालों को थाने में भेजिए. जब उसने अपने रिश्तेदार को थाने में भेजा तो उन लोगों ने चालीस हजार रुपये की डिमांड की. चालीस हजार रुपये देने पर धारा 376 हटा दिए जाने की बात कही गई. ये बात उसने मुझे बतायी कि अंकल जी, बात चल रही है, शायद पैसे देकर धारा 376 हट जाएगी और मेरी जमानत यहीं जिला न्यायालय से हो जाएगी.

बाद में उसने बताया की घरवालों ने थाने में 35000/ रूपये दिए हैं. अब जमानत हो जाएगी. उसकी बलिया जिला न्यायालय से ही जमानत हो गयी.

इसी बीच हमारे बैरक में एक लड़का सूरज मिला जो कि हम लोगों के बाद आया था. जब मैंने उससे उसके बारे में पूछा तो वो रूवाँसा हो गया. बोला- अंकल जी, हमारे ऊपर पास्को और छेड़ाखानी का मुकदमा लगा है. जबकि मेरा इस घटना से कोई सम्बन्ध नहीं है. आगे उसने बताया कि हमारी गाँव में एक लड़का और लड़की का अफेयर था. वो कहीं पर बात कर रहे थे. मुझे एक लड़के ने फोन करके बुलाया, आजा एक चीज दिखाता हूं.

मैं वहाँ पर गया तो और भी बहुत से लोग इकठ्ठे हो गए थे. मैं भी उन्ही लोगों में भीड़ का हिस्सा था. लोगों ने लड़की को उसकी माँ के हवाले किया. बाद में पता चला कि मेरे व कुछ अन्य लड़कों के खिलाफ छेड़खानी का मुक़दमा दर्ज करा दिया गया है. हम दो भाइयों ने थाने में जाकर आत्मसमर्पण किया. थाने में 50-60 लोग गए थे ये कहने कि ये लड़के निर्दोष हैं.

बाद में उसने बताया कि उनके ऊपर धारा 376 बढ़ा दी गई है. वो बहुत परेशान था. उसने बताया कि वह आजमगढ़ से पॉलिटेक्निक कर रहा है. IT में उसका इस साल तीसरा साल है. बाद में उसकी जमानत जिला न्यायालय से रद्द हो गयी. उन्होंने हाई कोर्ट में जमानत की अर्जी दाखिल की. उच्च न्यायालय ने जब पुलिस से केस डायरी मांगी तो उसने मुझसे पूछा कि अंकल क्या केस डायरी के लिए पुलिस पैसे लेती है? मैंने बताया नहीं, तो वो बोला की हमारे घर वालों से पुलिस ने 3000/ रूपये मांगे हैं. बाद में उसने बताया कि घर वालों ने पुलिस को 1000/ रूपये दिए हैं.

विपिन और सूरज की बातों से मुझे सहज ही अंदाजा हो गया कि ये SO भीमपुरा सत्येंद्र राय सिर्फ पैसे के लिए फर्जी केस लिख रहा है. काफी सोच विचार करने के बाद मैंने ये सोचा कि कहीं भी लेटर डालने से कोई फायदा नहीं है. अधिकारियों का इस केस की ओर कैसे ध्यान आकर्षित होगा, इस पर विचार करना शुरू किया तो मन में यही विचार आया कि जेल में अनशन किया जाए. इस संबंध में मैंने विपिन व सूरज से बात की. उनको बोला कि कल मेरी पत्नी आएगी मुलाकात के लिए, उसको एक बलिया डीएम के नाम से लेटर बनाकर दे दूंगा, वो रजिस्ट्री करवा देगी. लेटर में लिखा होगा कि हमारे ऊपर पैसे खाकर फर्जी मुकदमा लिखा गया है, भ्रष्ट प्रशासन की कार्यवाही से क्षुब्ध होकर हम अनशन कर रहे हैं.

उसी दिन शाम को अदालत में पेशी थी. जब शाम को अदालत से वापस आये तो विपिन ने ये बताया कि अंकल जी थाने में बातचीत चल रही है, 40000/ रुपये मांग रहे हैं, पैसे देने के बाद धारा 376 पुलिस हटा देगी और यहां बलिया कोर्ट से ही जमानत हो जाएगी. उसकी बात सुनकार मैंने अनशन का प्रोग्रामिंग कैंसल कर दिया. सोचा कहीं अनशन करने से उसकी (विपिन) जमानत में रोड़ा ना अटक जाए, इसलिए अनशन का प्रोग्राम कैंसल कर दिया.

अगले दिन विपिन ने बताया कि थाने में 35000/ रुपये में बात पक्की हो गई है और घर वालों ने थाने में 35000/ रुपये दे भी दिये हैं. अगली तारीख में उसकी जमानत हो गई.

मेरी जमानत बलिया लोवर और सेसन दोनों कोर्ट से खारिज हो गई. वैसे मुझे पूरा भरोसा था कि हाइकोर्ट से पहली या दूसरी तारीख में जमानत हो जाएगी. जेल में जाने के दूसरे दिन ही मैंने एक सिपाही से पूछा कि जेलर से कोई बात कैसे कही जाए. उसने बोला आप किसी पेपर पर लिखकर 14 नंबर कंट्रोल रूम पर दे दीजिए. आपकी एप्लीकेशन जेलर को पहुंच जाएगी. मगर जेल की कोई शिकायत नहीं होनी चाहिए. वही सिपाही 3 पन्ने लाकर मुझे दिया. एप्लीकेशन में मैंने अपनी बीमारी का जिक्र किया और ये लिखा कि मुझे मेरी बीमारी के हिसाब से दूध और अंडा मिलना चाहिए. दूसरी बात मैंने ये लिखी कि मैं इलेक्ट्रिकल इंजीनियर हूँ, अगर कोई स्टूडेंट इलेक्ट्रिकल काम की ट्रेनिंग चाहता है तो मैं उसे ट्रेनिंग दे सकता हूँ. तीसरी चीज स्टडी वगैरह के लिए लाइब्रेरी की क्या व्यस्था है, यह पूछा?

में एप्लीकेशन लेकर 14 नंबर कंट्रोल रूम पर गया तो एक सिपाही मुझे लेकर डिप्टी जेलर के पास गया. उन्होंने मेरी एप्लीकेशन पढ़ी और बोले- ठीक है, आप जाइये, आपको इन्फॉर्म किया जाएगा. 8/06/19 को जेलर बंदियों की समस्या सुन रहे थे तो मैंने भी अपनी बीमारी के बारे में बताया और डेली सुबह दूध और अंडे की मांग रखी. उन्होंने मेरा नाम अपने असिस्टेंट को नोट करने के लिए बोला. उसके बाद भी दूध और अंडा नहीं दिया.

मेरी पत्नी हफ्ते में दो दिन तो मिलने आती ही थी. मैंने अपनी पत्नी के नाम से एक लेटर बनाया जो कि डायरेक्टर NACO (नेशनल एड्स कंट्रोल आर्गेनाइजेशन) को संदर्भित था. उसमें ये लिखा कि मेरे पति HIV+ के मरीज हैं, जेल प्रशासन को कई बार सूचना देने के बाद भी NACO की गाइडलाइन के अनुसार उन्हें दूध और अंडे नहीं दिया जा रहा है. इसकी कॉपी DM बलिया को भी रजिस्ट्री करवा दी है. 3-4 दिन DM बलिया का लेटर जेल में आया और 17/6/19 से जेल अस्पताल मुझे आधा लीटर दूध देने लग गया.

लोअर और सेशन कोर्ट से जमानत खारिज होने के बाद फ़ाइल हाई कोर्ट में लगाई गई. मुलाकात के दौरान एक दिन मेरी पत्नी ने ये बताया कि गाँव में ये खबर फैली हुई है कि पंकज सिंह कह रहे हैं कि मेरे ट्रक बिक जाएंगे मगर जमानत नहीं होने दूंगा. मैंने कहा तुम इसकी फिक्र छोड़ो. हाई कोर्ट के जज नहीं बिकते. वकील के बिकने का सवाल ही नहीं पैदा होता क्योंकि वकील मेरे लड़के अभिषेक के दोस्त के पिता जी जो वकील हैं, उन्होंने ही करवाया है.

25/07/2019 को हाई कोर्ट से जमानत मंजूर हो गयी. 01 अगस्त 2019 को बलिया से जमानत हो गई. वेरिफिकेशन के पेपर्स थाने और तहसील पर आ गए. अगले दिन तहसील से पेपर वेरीफाई करा लिए मगर SO भीमपुरा सतेंद्र कुमार राय ने मेरे पेपर वेरीफाई नहीं किये. 3 अगस्त को कोर्ट पेशकार ने पूछा कि सिंहासन चौहान के पेपर का क्या हुआ. SO बोले- तुम जाओ, मैं करूँगा ना.

मेरा भाई और ग्राम प्रधान आधे घंटे तक SO के आगे पीछे घूमते रहे मगर उसने पेपर वेरीफाई नहीं किये. शाम को मैंने एक लड़के के मोबाइल से घर पर फ़ोन किया और जमानत के बारे में पूछा. मेरी पत्नी बोली SO ने पेपर साइन नहीं किये हैं. मैं पूरा मामला समझ गया. कोर्ट के पेपर को वो ज्यादा दिन तक रोक नहीं सकता. उस दिन शनिवार था. उसने सोचा कि आज साइन नहीं करूँगा तो कल रविवार है और कोर्ट बंद रहेगा, जमानत हो नहीं पाएगी. उसका मेन मकसद मुझे दो दिन और जेल में रखने का था. मैं उसकी मंशा भांप गया. मैंने रविवार को अपनी पत्नी को जेल में मुलाकात के लिए बुलाया और बोला मैं एक लेटर बना दूंगा. यहाँ जेल के नजदीक ही SP ऑफिस है. वो लेटर ले जाकर SP बलिया को दे देना.

मैंने जेल में अपनी पत्नी के नाम से एक लेटर बनाया और SO भीमपुरा की करतूत लिख दी कि SO पेपर वेरीफाई करने में नखरे दिखा रहा है. अगले दिन मेरी पत्नी जेल में आयी. मैंने उसे लेटर दिया तो वो बोली- एसओ ने पेपर शनिवार की शाम को साइन कर दिए हैं. कल आपकी जमानत हो जाएगी.

अगले दिन 5 अगस्त को शाम सात बजे के लगभग जेल से मेरी रिहाई हो गई. जेल से निकलते ही मैंने खुली हवा में सांस ली. जेल के अंदर सिर्फ मुझे अपनी माँ की ही चिंता रहती थी. जेल के बाहर मेरा भाई सत्यवान, मेरा छोटा लड़का अखिलेश, दोस्त भानु प्रताप, गाँव के ही एक चाचा व एक चचेरे भाई खड़े थे. लगभग डेढ़ दो घंटे बाद हम घर पहुंचे. जैसे ही घर पहुंचे माँ मुझे पकड़ कर रोने लग गयी. मेरे भी आंसू निकल गए. ये अपनों से मिलने के आंसू थे.

….जारी….

लेखक सिंहासन चौहान बलिया के आरटीआई एक्टिविस्ट हैं. भीमपुरा थाने के थानेदार सतेंद्र कुमार राय ने विरोधियों से मिलकर इन्हें फर्जी केस में जेल भेज दिया था.

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दल्ला थानेदार

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