2017 का विधानसभा चुनाव जातिवादी राजनीति के सहारे नहीं जीता जा सकेगा, अखिलेश यादव को अहसास हो गया

अजय कुमार, लखनऊ

एक वर्ष और बीत गया। समाजवादी सरकार ने करीब पौने तीन वर्ष का कार्यकाल पूरा कर लिया है। 2014 सपा को काफी गहरे जख्म दे गया। लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार ने धरती पुत्र मुलायम को हिला कर रख दिया। पार्टी पर अस्तित्व का संकट मंडराने लगा है। अगर जल्द अखिलेश सरकार ने अपना खोया हुआ विश्वास हासिल नहीं किया तो 2017 की लड़ाई उसके लिये मुश्किल हो सकती है। अखिलेश के पास समय काफी कम है। भले ही लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के पश्चात समाजवादी सरकार ने अपनी नीति बदली ली है, लेकिन संगठन वाले उन्हें अभी भी पूरी आजादी के साथ काम नहीं करने दे रहे हैं। सीएम अखिलेश यादव अब मोदी की तरह विकास की बात करने लगे हैं लेकिन पार्टी में यह बदलाव देखने को नहीं मिल रहा है। मुलायम अभी भी पुराने ढर्रे पर ही चल रहे हैं। निश्चित ही 2015 खत्म होते ही तमाम दलों के नेता चुनावी मोड में आ जायेंगे। भाजपा तो वैसे ही 2017 के विधान सभा चुनावों को लेकर काफी अधीर है, बसपा और कांग्रेस भी उम्मीद है कि समय के साफ रफ्तार पकड़ लेगी। फिलहाल तो यही कहा जा सकता है कि कांग्रेस ही नहीं सपा-बसपा भी 2014 में अर्श से फर्श पर आ गये।

बात सपा के संकट की कि जाये तो चाहें सपा हो या अन्य कोई दल उसे कमोवेश सत्ता विरोधी लहर का खामियाजा भुगतना ही पड़ता है, अखिलेश सरकार भी इससे अछूती नहीं रह पायेगी। बदले राजनैतिक परिदृश्य में सपा के लिये भाजपा और मोदी से निपटना टेड़ी खीर लग रहा है। मोदी ने यूपी के तमाम गैर भाजपाई नेताओं की नींद उड़ा दी है। कांग्रेस पर इसका सीधा प्रभाव पड़ा है। वहीं मुलायम-माया जैसे क्षेत्रीय क्षत्रपों को भी अपनी सियासत बचाने का कोई उपाय नहीं सूझ रहा है। सपा का ग्राफ गिर रहा है वहीं केन्द्र में सत्ता हासिल करने के बाद आत्म विश्वास से लबरेज ‘भाजपा ब्रिगेड’ एक के बाद एक राज्य में भी जीत का परचम लहराती जा रही है। उत्तर प्रदेश भी इससे अछूता नहीं रहा है। लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार ने सपा-बसपा के सूरमाओ को मुंह दिखाने लायक नहीं रखा। भला हो उप-चुनावों का जो सपा की थोड़ी-बहुत साख लौट आई। परंतु इस हकीकत से इंकार नहीं किया जा सकता है कि बीजेपी से भयभीत सपा-बसपा को भाजपा और मोदी का कोई तोड़ नहीं समझ आ रहा है। लोकसभा चुनाव में खत्म हो गई बसपा फिर से खड़ी होने की जददोजहद में लगी है तो समाजवादी सरकार और संगठन वैचारिक रूप से दो धड़ों में बंटा नजर आ रहा है। यह कहने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि भले ही सपा सरकार और संगठन का एकमात्र लक्ष्य 2017 के विधान सभा चुनाव जीतना है,लेकिन जीत हासिल करने के लिये दोनों अलग-अलग रास्ते पर आगे बढ़ रहे हैं।समाजवादी सरकार के मुखिया अखिलेश यादव राज्य में विकास की गंगा बहा कर 2017 का लक्ष्य हासिल करना चाहते हैं। औद्योगिक घरानो को यूपी में लाने का प्रयास,लखनऊ में आईटी हब बनाने या मेट्रो लाने का काम।सरकारी मशीनरी में तेजी लाने की कोशिश के साथ अखिलेश अपनी सरकार की छवि सुधारने की कोशिश में भी लगे हुए जिस पर उन्होंने लोकसभा चुनाव होने तक ध्यान नहीं दिया था। छवि सुधारने के लिये सीएम ने दागी छवि वाले दर्जा प्राप्त दर्जनों मंत्रियों को एक ही झटके में चलता कर दिया। अभी भी सरकारी स्तर पर उन नेताओं की तलाश जारी रखे हैं जिनके कारण सरकार की छवि कानून व्यवस्था सहित तमाम मोर्चो पर धूमिल हो रही है।

दूसरी तरफ लोकसभा चुनाव में मोदी के हाथों पिटे और मात्र 05 सीटों पर सिमट गये सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव परम्परागत रूप से जातीय गणित की राजनीति में उलझे हुए हैं। इस बात का अहसास उप-चुनावों और उसके बाद राज्यसभा के लिये प्रत्याशी तय करते समय नेताजी करा भी चुके हैं। सपा यादवों और मुस्लिमों को अपना वोट बैंक मानती है,इसी लिये पार्टी में उन्हे तरजीह मिलती है। इसी को ध्यान में रखते हुए मुलायम ने राज्यसभा चुनाव में भी छहः में से चार सीटें यादवों-मुसलमान(दो-दो) प्रत्याशियों के नाम कर दी। वहीं कुर्मी वोटों को सहेजने के चक्कर में मुलायम ने लखीमपुर खीरी की राजनीति में वजनदार माने जाने वाले रवि प्रकाश वर्मा को राज्यसभा भेजनेे का मन बनाया। सपा ने जिस एक मात्र राजपूत नीरज शेखर को राज्यसभा भेजा उसकी पहचान राजपूत से अधिक पूर्व सांसद और पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय चन्द्रशेखर के बेटे के रूप में अधिक होती है। नीरज को राज्यसभा भेजकर मुलायम ने चन्द्रशेखर जी से अपने रिश्तो का सम्मान रखा। प्रत्याशी तय करते समय मुलायम ने साफ संकेत दिया कि उनकी नजर 2017 के विधान सभा चुनाव पर लगी है।

खासकर,मुस्लिम वोटों पर पकड़ बनाये रखने के लिये मुलायम सिंह यादव ने लम्बे समय से नाराज चल रहे सपा के कद्दावर नेता और अखिलेश कैबिनेट में मंत्री आजम खॉ की पत्नी को राज्यसभा का टिकट देकर यह पूरी तरह से साबित कर दिया कि उनकी राजनीति अभी भी जातिवाद पर ही टिकी हुई है। उन्हें इस बात की चिंता नहीं है कि आजम खॉ अपनी राजनीति चमकाने के लिये कभी अमर सिंह पर तो कभी जामा मस्जिद के शाही इमाम अहमद बुखारी के नाम पर भड़क जाते हैं तो कभी जावेद अली खान को राज्यसभा का टिकट मिलने से उनका पारा चढ़ जाता हैं। शिया धर्मगुरू मौलान कल्बे जव्वाद से तो आजम का विवाद इतना बढ़ा की सड़क तक पर आ गया।मुलायम ने भले ही आजम को अपनी आंख का तारा बना रखा हो, लेकिन अखिलेश के साथ ऐसा नहीं है। सपा सरकार चला रहे अखिलेश यादव का भरोसा आजम खॉ से अधिक अपने मंत्री अहमद हसन जैसे मुस्लिम नेताओं पर है जो सीएम के विकास के एजेंडे को सलीके से आगे बढ़ा रहे हैं, जबकि आजम खॉ साहब अपना महकमा कायदे से संभालने की बजाये विभागीय अधिकारियों/कर्मचारियों में उलझे रहते हैं। आजम के विभाग में विकास के कौन से काम हो रहे हैं, इसके बारे में भले ही किसी को न पता हों, हां कहीं नफरत फैलाने का मौका मिल जाये तो इस मौके का फायदा उठाने से आजम खॉ जरा भी नहीं चूकते हैं। आजम के विवादास्पद बयानों के चलते चुनाव आयोग ने लोकसभा चुनाव के समय उनके प्रचार पर रोक तक लगा दी थी।

ऐसा लगता है कि मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव को तो इस बात का अहसास हो गया है कि 2017 का विधान सभा चुनाव जातिवादी राजनीति के सहारे नहीं जीता जा सकेगा। इसकी वजह भी है भाजपा अपनी छवि तेजी से बदल रही है।मुसलमानों के बीच मोदी और भाजपा को लेकर गैर भाजपाई नेताओं ने जो हौवा खड़ा किया था,वह अब धीरे-धीरे बदलने लगा है। मुसलमान भी तरक्की पंसद हो गया है।अगर ऐसा न होता तो दिल्ली की जामा मस्जिद के शाही इमाम सैय्यद अहमद बुखारी द्वारा अपने बेटे शाबान बुखारी के इमाम के पद पर दस्तारबंदी के कार्यक्रम के समय पाक के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को बुलाये जाने और मोदी को न्योता नहीं देने की घटना पर मुस्लिम समाज में मोदी के पक्ष में इतनी तीखी प्रतिक्रिया नहीं होती। यहॉ तक की मुस्लिम की सबसे बड़ी धार्मिक और सामाजिक संस्था दारूल उलूम तक ने इस मसले पर बुखारी का पक्ष लेने की बजाये चुप्पी साधे रखना ही बेहतर समझा। दारूल उलूम के मोहमिम मुफ्ती अबुल कासिम नौमानी ने इस मुद्दे पर कोई टिप्पणी भले नहीं की लेकिन इशारों-इशारों में मोदी का पक्ष जरूर लिया। नौमानी ने मोदी के आमंत्रित नहीं किये जाने को सियासी स्टंट करार देते कहा कि हमने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कई कदमों की खुल कर सराहना की है। आखिर वे भारत के चुने हुए प्रधानमंत्री हैं और भारत एक लोकतांत्रिक देश है।उनका कहना था दारूल उलूम शाही इमाम की ओर से पैदा किये गये विवाद से खुद को नही जोड़ना चाहता है।

बहरहाल,तमाम किन्तु-परंतुओ के बीच सच्चाई यह भी है कि तमाम कोशिशों के बाद भी समाजवादी सरकार जनता के बीच  अपनी विश्सनीयता को बरकरार नहीं रख पा रही है।मोदी मैजिक के चलते सपा सरकार और संगठन पर अस्तित्व का खतरा मंडराने लगा हैं।हालात यह हैं कि लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद उप-चुनावों में उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन करने के बावजूद सपाई सहमे हुए हैं।सपा के भीतर उप-चुनाव की सफलता से जो उत्साह का माहौल बना था उसेे महाराष्ट्र-हरियाणा में भाजपा के शानदार प्रदर्शन और समाजवादी प्रत्याशियों की दुर्दशा ने महीने भर के अंदर ही फीका कर दिया।महाराष्ट्र और हरियाणा में सपा की दुर्दशा तब देखने को मिली जबकि कुछ दिनों पूर्व लखनऊ में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अधिवेशन में पार्टी को राष्ट्रीय स्तर की पार्टी का दर्जा दिलाने की चाहत कई नेता मंच पर उजागर कर चुके थे।

बात निकले और सपा के साथ बसपा की न हो, ऐसा नहीं हो सकता है।दोनों की राजनीति करीब-करीब एक की दिशा पर चलती है,लेकिन आश्चर्य तब होता है जब यह देखने में आता है कि अपने ओजस्वी भाषणों से मुलायम और मायावती जैसे नेता यूपी की राजनीति में तो धूमकेतु की तरह चमकते रहते हैं,लेकिन यूपी से बाहर के मतदाताओं द्वारा सिरे से उनकी अहमियत को बार-बार नकार दिया जाता है।यूपी के बाहर न तो मुलायम का मुस्लिम और पिछड़ा कार्ड काम आता है और न ही बसपा सुप्रीमों मायावती दलित वोटरों को लुभा पाती हैं जिनके सहारे वह यूपी में वर्षाे तक राज कर चुकी हैं।ताज्जुब तो इस बात का है कि उत्तर प्रदेश और दिल्ली में कांग्रेस के दिग्गज नेता सपा-बसपा का सहारा ले लेते हैं,लेकिन उत्तर प्रदेश से बाहर कांग्रेस सहित कोई भी दल मुलायम-माया के साथ गठबंधन या साथ चलने को तैयार नहीं होता है।महाराष्ट्र विधान सभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने कांग्रेस से हाथ मिलाकर चुनाव लड़ने की काफी कोशिश की लेकिन उसे सफलता हाथ नहीं लगी।शुरू-शुरू में जरूर इस बात की चर्चा हुई थी कि कांग्रेस-सपा के बीच गठबंधन हो गया है,परंतु बाद में कांग्रेस इस गठबंधन से मुकर गई।यह सब तब हुआ जबकि कांग्रेस की महाराष्ट्र में हालत पतली थी और शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस से उसका 15 वर्ष पुराना नाता टूट चुका था।हॉ,वोट प्रतिशत के मामले मंे जरूर बसपा की स्थिति सपा से बेहतर रहती हैै।महाराष्ट्र और हरियाणा की नाकामयाबी के बाद सपा ने झारखंड और जम्मू-कश्मीर विधान सभा चुनाव में भी अपने प्रत्याशी उतारने की घोषणा कर दी है।देखना होगा कि आगे चलकर हालात कुछ बदलते हैं या फिर एक बार फिर महाराष्ट्र-हरियाणा दोहराया जायेगा।

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी को कई बार झूल चटा चुके यह दल अगर अन्य राज्यों में सफल नहीं होते हैं तो इसकी प्रमुख वजह है,इन दलों की सोच का दायरा काफी तंग होना।सपा-बसपा नेता चुनाव तो लड़ते हैं लेकिन उनके पास वीजन का अभाव रहता है।यूपी की तरह अन्य राज्य शैक्षिक,सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े हुए नहीं हैं जो आंख मूंद कर नेताओं पर भरोसा कर लें।समाजवादी पार्टी के महाराष्ट्र प्रदेश अध्यक्ष अबू आजमी ने महाराष्ट्र की राजनीति को साम्प्रदायिक रंग देने की कोशिश तो बहुत की लेकिन वह सफल नहीं हो पाये।इसे इतिफाक ही कहा जायेगा कि यूपी में तो सपा-बसपा अपनी प्रतिद्वंदी भाजपा को साम्प्रदायिकता और जातिवाद के मोर्चे पर घेर लेते हैं,लेकिन महाराष्ट्र और हरियाणा पहुंच कर उसकी यह कोशिशें नाकामयाब हो जाती हैं।यूपी में मायावती अपनी राजनैतिक चालों से  बाबा साहब अंबेडकर के नाम पर दलित वोटरों को लामबंद कर ेलेती हैं,परंतु जब महाराष्ट्र में वह जाती हैं तो उनकी यह कोशिशें वहां परवान नहीं चढ़ पाती हैं,जबकि बाबा साहब की पहचान महाराष्ट्र से सबसे अधिक ही होती है।

उधर,तेजी से अपनी लोकप्रियता का ग्राफ बढ़ाती जा रही भाजपा ने दोनों ही राज्यों(महाराष्ट्र-हरियाणा) में विरोधी दलों के बिखराव का फायदा उठाया।झारखं डमें भी उसकी सरकार बन गई है,उम्मीद तो यह भी की जा रही है कि जम्मू-कश्मीर में भी सत्ता उसके इर्दगिर्द ही रहेगी।सभी जगह भाजपा को विरोधियों के बिखराव का फायदा मिला।ठीक ऐसे ही राजनैतिक हालात उत्तर प्रदेश के भी हैं।यहां चार बड़े दलों के अलावा राष्ट्रीय लोकदल भी पश्चिमी यूपी में अपनी जड़े मजबूत किये हुए है।सपा को चिंता यह सता रही है कि अगर यूपी में मोदी विरोधी एकजुट नहीं हुए तो 2017 की लड़ाई आसान नहीं होगी।क्षेत्रीय दलों को लेकर भाजपा-आरएसएस के साथ-साथ मोदी की तल्खी और सोच भी किसी से छिपी नहीं है।विरोधी तो विरोधी अपने साथ खड़े क्षेत्रीय क्षत्रपों को भी नरेन्द्र मोदी-अमित शाह की जोड़ीं सबक सिखाये जा रही है।बिहार में जदयू नेता नीतिश कुमार से दूरी बनाने के साथ यह सिलसिला शुरू हुआ था,जिसके कारण बिहार में 17 वर्ष पुराना भाजपा-जदयू गठबंधन ही नहीं टूटा भाजपा को बिहार सरकार से अलग भी होना पड़ गया,लेकिन लोकसभा चुनाव में इसका भाजपा को फायदा भी खूब मिला था।लोकसभा चुनाव आते-आते कई भाजपा के कई सहयोगी उससे दूर हो चुके थे,लेकिन भाजपा की सेहत पर इसका फर्क नहीं पड़ा।वह इन दलों की हैसियत को कम करके आगे बढ़ती ही गई। महाराष्ट्र और हरियाणा विधान सभा चुनाव में भाजपा ने जब अपने पुराने सहयोगियों शिवसेना और इंडियन नेशनल लोकदल को अपने से दूर किया तो यह समझते देर नहीं लगी कि भाजपा अब विस्तार में लग गई है।वह पूरे देश में बिना बैसाखी के चलना चाहती है।जल्द ही अकाली दल से भी भाजपा के रिश्ते खत्म हो जायें तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।भाजपा का जब अपने सहयोगियों के साथ यह रवैया है तो विरोधी दलों के क्षत्रपों की तो बात ही दूसरी है।पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को भी लगातार मोदी से खतरा बना रहता है।इसी लिये वह मोदी सरकार पर हमला करने का कोई भी मौका छोड़ती नहीं हैं।

बात उत्तर प्रदेश की कि जाये तो लोकसभा चुनाव के समय दोनों दलों(सपा-बसपा) के क्षत्रपों को इस बात का अहसास अच्छी तरह से हो भी चुका है।चुनाव प्रचार के दौरान मोदी ने चुन-चुन कर उन्हें (मुलायम-माया) निशाना बनाया था।इसी लिये समाजवादी सरकार के मुखिया अखिलेश यादव जातिवाद राजनीति को पीछे छोड़कर विकासवादी राजनीति की ओर तेजी से आगे बढ़ रही है।मुलायम को भी यह बात जितनी जल्दी समझ में आ जायेगी उतना अच्छा होगा।बहरहाल,सपा प्रमुख ने लालू यादव,शरद यादव,देवगौड़ा को साथ लेकर दिल्ली में धरना देकर अपनी ताकत का अहसास कराने की कोशिश तो जरूर की लेकिन वह इसमें ज्यादा सफल होते नीं दिखे।
 
लेखक अजय कुमार यूपी के वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं.

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