मीडिया को गरियाने से पहले मोदी के उपासक पढ़ लें ताजे और पुराने घपलों-घोटालों की यह लिस्ट

जिन मई ’14 से पहले अखबार नईं वेख्या…

सबसे पहले प्रतिष्ठित रचनाकार असगर वज़ाहत Asghar Wajahat साहब से माफ़ी कि उनके कालजयी नाटक “जिन लाहौर नहीं वेख्या” से मिलता जुलता शीर्षक रख रहा हूँ। बात दरअसल ये है कि इस वक्त एक पूरी जमात उठ खड़ी हुयी है जिसने 16 मई 2014 से पहले न अखबार देखे हैं न टीवी का रिमोट हाथ में उठाया था। और इसीलिए यह जमात देश के प्रधानमंत्री और सत्ताधारी पार्टी की आलोचना पर छाती कूटने लगती है। भाई लोग ऐसे कलपते, किकियाते, बिलबिलाते हैं मानो इससे पहले कभी किसी प्रधानमंत्री के खिलाफ एक शब्द भी न लिखा गया हो न बोला गया हो।

इन लोगों को लगता है कि उनके देवतुल्य शिखर पुरुष को “पवित्र” महामानव माना जाये और एक भी सवाल न पूछा जाये। अरे भाइयो भैनो… देश ने खुद अपनी ख़ुशी से प्रधानमंत्री और सरकार को चुना है, कोई देवलोक से अवतार प्रकट नहीं हुआ है। इसलिए जब जब ज़रूरी होगा सवाल भी पूछे जायेंगे , उंगली भी उठेगी। इस कलपती हुयी जमात की जानकारी के लिए बता दिया जाये कि नेहरू से लेकर मनमोहन तक कलमकारों ने कभी किसी को नहीं छोड़ा। ये पत्रकार ही हैं जो सन् 47 से आज तक सब से सवाल करते रहे हैं।पत्रकारिता हमेशा सत्ता का प्रतिपक्ष और जनता के हक़ में रही है। तमाम खामियों के बावज़ूद ऐसी ही रहेगी।यही उसका ईमान है। हां ये हमारा फ़र्ज़ है, जिम्मा है और पेशा भी। “कोऊ नृप होये, हमें तौ सवालयि पूछनें…”

आइये जान लीजिये कुछ बड़े मामले जो पत्रकारिता ही देश दुनिया के सामने लेकर आई~~

नेहरू युग
कृष्ण मेनन का जीप घोटाला
टी टी कृष्णमचारि कांड
सिराजुद्दीन काण्ड
चीन युद्ध में विफलता

शास्त्री युग
प्रताप सिंह कैरों का मामला

इंदिरा युग
अंतुले का प्रतिभा प्रतिष्ठान काण्ड
तानाशाही तौर तरीकों का खुलासा
आपातकाल का घनघोर विरोध

जनता पार्टी युग
मोरारजी को सी आई ए एजेंट बताने वाला कांड
जनता पार्टी की कलह

राजीव युग
बोफोर्स तोप घोटाला
प्रशासनिक नाकामी का खुलासा

नरसिंह राव युग
झामुमो रिश्वत काण्ड

अटल युग
एनरॉन समझौता कांड
रिलायंस प्रमोद महाजन कांड

मनमोहन युग
टू जी घोटाला
कोयला घोटाला
कॉमन वेल्थ घोटाला

ये सब उन लोगों को नहीं मालूम जिन्होंने 16 मई 2014 से पहले न अखबार पढ़े न टीवी देखा। तभी तो आज वे इसलिए बिलख रहे हैं कि नरेंद्र मोदी के खिलाफ लिखा जा रहा है। सन् 47 से अब तक पत्रकारिता ने हमेशा सत्ता की विसंगतियों पर कलम चलायी लेकिन तब कभी किसी ने पत्रकारिता को देशद्रोही नहीं कहा। तब सरकार का विरोध देश का विरोध नहीं कहलाता था। सिर्फ दो साल में ललितगेट, डीडीसीए, व्यापम, चिक्की घोटालों आदि आदि और विश्वविद्यालयों में असंतोष की खबरों से तिलमिलाए लोग अपने नेता और सत्ता की आलोचना को देशद्रोह बताने पर आमादा हैं। इन लोगों को लगता है कि मीडिया (पहले सिर्फ प्रिंट था अब इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल भी है) उनके महानायक के कामकाज की मीमांसा करके कोई अक्षम्य पाप कर रहा है। वे दिन रात मीडिया को बिकाऊ, देशद्रोही आदि बता कर “कुम्भीपाक नर्क” का श्राप दे रहे हैं।

…तो हे उपासकों, हमारे लिए न पहले कोई प्रधानमंत्री पवित्र गाय था, न आज है और न कल होगा। मोदी से पहले वालों के धत करम भी आपको नानी- दादी ने कहानियों में नहीं सुनाये थे। वो भी हम और हम जैसे कलमघसीट लोग ही खोज कर आपके लिए लाये थे। अगर अपने दिव्य पुरुष की आराधना और फोटो वीडियो मॉर्फिंग से फुरसत मिले तो किसी लायब्रेरी में मई 2014 से पहले का कोई भी अखबार पलट कर देख लेना। पता चल जायेगा कि इस तारीख़ से पहले भी देश में प्रधानमंत्री होता था और कलम उस पर भी ऐसे ही चलती थी जैसी आज चल रही है।

लेखक डॉ राकेश पाठक डेटलाइन इंडिया के प्रधान संपादक हैं. उनसे संपर्क rakeshpathak0077@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.


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