संजय सिंह की पुस्तक ‘राज-रंग’ का मुम्बई प्रेस क्लब में हुआ विमोचन

दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार एवं राष्ट्रीय सहारा, दिल्ली के नेशनल ब्यूरो में कार्यरत रक्षा एवं राजनीतिक संवाददाता संजय सिंह की हालिया प्रकाशित पुस्तक राज-रंग (राजनेताओं से अंतरंग बातचीत) का विमोचन मुम्बई प्रेस क्लब के सभागार में समारोहपूर्वक 3 अक्टूबर को सम्पन्न हुआ। पुस्तक का विमोचन देश के ख्यातिलब्ध काटूर्निस्ट और कहानीकार आबिद सुरती, मुम्बई विविद्यालय में हिन्दी विभाग के पूर्व अध्यक्ष एवं साहित्यकार करुणा शंकर उपाध्याय, कवि एवं शायर उदय भानु सिंह तथा मुम्बई प्रेस क्लब के कोषाध्यक्ष एवं दैनिक जागरण के ब्यूरो प्रमुख ओम प्रकाश तिवारी के करकमलों से सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर भारी संख्या में पत्रकार, साहित्यकार, साहित्यप्रेमी एवं मित्रगण उपस्थित थे।

समारोह में बतौर मुख्य अतिथि आबिद सुरती ने अपने उद्बोधन में कहा कि मेरे मित्र संजय सिंह की पुस्तक राज-रंग का विमोचन मुम्बई प्रेस क्लब में बहुत ही शार्ट नोटिस पर ऐसे आड टाइम (लंच के वक्त) में हो रहा है, और बहुत सारे लोग यहां पहुंचने के लिए भयानक जाम में जूझ रहे हैं, फिर भी यहां के सभागार में इतनी भारी उपस्थिति संजय सिंह के मित्रों के प्रति प्यार और उनके केयरिंग नेचर का ही परिणाम है। उन्होंने कहा कि किताब उन्हें पहले नहीं मिल पायी, लेकिन अभी-अभी कुछ पन्ने हमनें पलटे हैं तो उससे आभास होता है कि जिन नेताओं के साक्षात्कार इन्होंने लिए हैं वे काफी महत्वपूर्ण है और उनसे बातचीत का जो मुद्दा है वह काफी अहम् है। उन्होंने कहा कि राज-रंग को अपने समय की राजनीति का दस्तावेज कहने में कोई गुरेज नहीं होना चाहिए।

कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि कवि एवं शायर उदय भानु सिंह ने कहा कि राज-रंग को पढ़ने का सुख उन्हें प्राप्त हुआ है। संजय सिंह ने इस पुस्तक में बहुत ही बेबाकी से उन राजनेताओं का साक्षात्कार लेने और उनसे उन बातों को निकलवा पाने में सफलता पायी है, जिससे वे कतराने की कोशिश करते हैं। राज-रंग में साक्षात्कारों को लेने और उनसे प्राप्त जवाबों को ज्यों का त्यों लिखने का साहस और ईमानदारी संजय सिंह ने इस पुस्तक में दिखायी है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुये करुणा शंकर उपाध्याय ने कहा कि हिन्दी में राजनेताओं के साक्षात्कारों पर आधारित पुस्तक नहीं है और इस कमी को पूरा करने का काम संजय सिंह ने किया है और वह बधाई के पात्र हैं। कार्यक्रम का कुशल संचालन ओम प्रकाश तिवारी ने किया। उन्होंने कहा कि राज-रंग अपने आपमें एक अनूठा प्रयास है। मैं राज-रंग के लिए संजय सिंह को बधाई देता हूं। संजय सिंह ने अपने लेखकीय वक्तव्य में आगन्तुकों का स्वागत किया और पुस्तक के बारे में विस्तार से प्रकाश डाला। धन्यवाद ज्ञापन डेक्कन हेराल्ड के पत्रकार मृत्युंजय बोस ने किया। उन्होंने कहा कि संजय सिंह की यह पुस्तक पत्रकारिता के विद्यार्थियों और मीडिया इंस्टीट्यूट्स के लिए बहुत ही उपयोगी साबित हो सकती है, बशत्रे पुस्तक उन तक पहुंचे।

इसी किताब के गोरखपुर में हुए विमोचन समारोह की रिपोर्ट पढ़ें…

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मृणाल पाण्डे की कथाकृति ‘हिमुली हीरामणि कथा’ का लोकार्पण

नई दिल्ली। हिमुली हीरामणि कथा की रचना युवाओं के लिए हुई है यदि इसे हज़ारी प्रसाद द्विवेदी की परंपरा को आगे ले जाने वाली कृति समझा जाता है तो यह मेरे लेखन का सम्मान है। सुप्रसिद्ध कथाकार और पत्रकार मृणाल पाण्डे ने मिरांडा हाऊस में अपनी सद्य प्रकाशित कथा कृति ‘हिमुली हीरामणि कथा’ के लोकार्पण एवं परिचर्चा के अवसर पर कहा कि यह नानी के घर और छठी के दूध के बीच की कथा है। पाण्डे ने परिहास भाव के लगातार विरल होते जाने को चिन्ताजनक बताते हुए कहा कि ऐसे दौर में मैंने बोलियों के बाल्यावस्था के साहित्य को पढ़ा और उस विरल होते परिहास भाव को इस कृति में समेटा है। उन्होंने कहा यह कहानी यथार्थ की कहानी है जिसकी भाषा दादी- नी की कहानियों वाली है।

इससे पहले पुस्तक के लोकार्पण के बाद परिचर्चा प्रारम्भ करते हुए आलोचक वैभव सिंह ने कहा कि इस उपन्यास की संरचना में लोक कथा को पुनः गढ़ा गया है जिसमें लोककथा का मनोविज्ञान है तो वर्तमान राजनीति और विडम्बनाओं की गूँज भी। उन्होंने कहा आज के समय के सत्य को लोककथाओं के माध्यम से सुनाया गया है जिससे आस्थाओं का पुनर्स्थापना भी होती है। सुखांत की अनिवार्यता इस आस्था को जीवित बनाए रखती है। डॉ वैभव ने कहा कि इस देश में आधुनिकता की ब्लैक मार्केटिंग की गयी है और ग्रामीण अनपढ़ लोगों से उनकी परंपरा को छीना गया है। उन्होंने कहा कि हिमुली की कहानी को जेंडर डिस्कोर्स की कहानी के रूप में भी देखा जा सकता है वहीं कथा में राजसत्ता से मिले हुए नगर सेठों की खबर लेने को रोचक प्रसंग बताया।

परिचर्चा में चर्चित कवि कथाकार प्रियदर्शन ने कहा कि शब्द की सत्ता पिछले दशकों में टूटी है और तकनीक के दौर में साहित्यिक चुनौती से संघर्ष का लेखन हुआ है। उन्होंने कहा आधुनिकता के पार जाने के क्रम में हम पीछे जाते हैं तो ‌इस किताब को पढ़ते हुए यथार्थ की परिधि को तोड़ने वाले मनोहर श्याम जोशी, विजयदान देथा, की याद आ जाती है। प्रियदर्शन ने कहा यह लोककथा नहीं है, बल्कि उसके विन्यास में वर्तमान दीखता है। यहां नीरा राडिया, अम्बानी, रतन टाटा सब दिख जायेंगे। कृति की प्रशंसा में उन्होंने कहा कि हिंदी का रस ठेठ भाव में यहां मौजूद है। उन्होंने कहा कि कृति में सत्ता के गलियारों के प्रपंच फूटता है और यह स्त्री के दुखों और प्रतिरोध की कथा भी बन जाती है।

बाद में छात्राओं से हुए संवाद में यथार्थवाद पर सार्थक और लंबी बहस भी चली। बहस में मृणाल जी ने एक उत्तर में कहा बहुधा लेखन खेल की तरह लगता है, जिसमें उत्सुकता और भावुकता भरी होती है। उन्होंने इस कृति के लिए कहा कि ‌मैंने व्यंजनों की थाली पड़ोसी है, जो मन आये आप आस्वादन कर सकते हैं। आयोजन में राजपाल एंड संज़ की मीरा जौहरी ने इस कृति के प्रकाशन को अपने लिए गौरव की बात कहा। अंत में मिरांडा हाउस के हिंदी विभाग की रजनी सिसोदिया ने आभार व्यक्त किया।

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पत्रकारिता फील्ड में आने वालों, इस किताब को पढ़ लो… फिर न कहना- ‘ये कहां फंस गए हम!’

पत्रकारिता की दुनिया को ‘संजय’ की नजर से देखने-समझने के लिए ‘पत्रकारिता – जो मैंने देखा, जाना, समझा’ को पढें…

वरिष्ठ पत्रकार और उद्यमी संजय कुमार सिंह की पुस्तक “पत्रकारिता – जो मैंने देखा, जाना, समझा“ उन तमाम लोगों के लिए आंख खोलने वाली है, जो आज भी पत्रकारों में बाबूराव विष्णु पड़ारकर या गणेश शंकर विद्यार्थी देखते हैं और जो ग्लैमर से प्रभावित होकर पत्रकारिता को पेशा बनाना चाहते हैं। यह सच है कि चीजें जैसी दिखाई पड़ती हैं, उनको वैसी ही वही मान ले सकता है जिसके पास अंतर्दृष्टि नहीं होगी। पर जिसके पास अंतर्दृष्टि है वह चीजों को उसके अंतिम छोर तक देखता है। चीजें जैसी दिखती हैं, वह उसे उसी रूप में कदापि स्वीकार नहीं करता। चिंतन-मनन करता है और अपनी अंतर्दृष्टि से सत्य की तलाश करता है।

(पुस्तक लेखक संजय कुमार सिंह. उपर है संजय की किताब का कवर पेज)


इस पुस्तक के लेखक ने भी अपनी इसी अंतर्दृष्टि से तस्वीर के दूसरे पहलू को सामने लाने का प्रयास किया है और मैं कह सकता हूं कि लेखक इसमें कामयाब है। वह इस पुस्तक के माध्यम से अपने तीन दशकों से ज्यादा के पत्रकारीय अनुभवों के आधार पर नई पीढ़ी के पत्रकारों या पत्रकारिता को पेशा बनाने की इच्छा रखने वाले युवाओं को इस पेशे की हकीकत से रू-ब-रू कराकर यह समझाने में सफल हैं कि करियर के लिहाज से यह पेशा कैसे ठीक नहीं है।

अस्सी के दशक में हिंदी पत्रकारिता को नया आयाम देने वाले “जनसत्ता” के संपादक प्रभाष जोशी ने इस पुस्तक के लेखक संजय कुमार सिंह के साथ हुई एक घटना का हवाला देते हुए संपादकीय लिखा था – “तेजाब से बची आंखें।”…और कहा था कि ये आंखें राह दिखाएंगी। उनकी यह टिप्पणी भले किसी और संदर्भ में थी। पर मैं आज देख रहा हूं कि संजय कुमार सिंह की अंतर्दृष्टि वाकई नई पीढ़ी को राह दिखा रही है।

यह आदर्श स्थिति है कि पत्रकारिता ऐसी हो जो मनुष्य के पूरे व्यक्तित्व का पोषण करे। यानी उसके शरीर, मन और आत्मा को पुष्ट करे। दूसरे शब्दों में पत्रकारिता ऐसी हो जो बेहतर मनुष्यता को निर्मित करने में संलग्न हो, सिर्फ घटनाओं के वृतांत इकट्ठे न करे। पर यह पुस्तक इस सत्य से बखूबी पर्दा हटाती है कि बदलते परिवेश में पत्रकारिता जैसी वीभत्स दिखती है, उससे भी गई-बीती है। पत्रकारों को इस स्थिति में ला खड़ा किया गया है कि उसे कुछ नकारात्मक नहीं मिलता है तो वह उसे पैदा करने की कोशिश में रहता है। कह सकते हैं कि उनके सामने हर प्रकार के झूठ निर्मित करने की मजबूरी है।

मुझे उम्मीद है कि यह पुस्तक पत्रकारिता के बाहरी स्वरूप को देखकर उसे अपना कैरियर बनाने का सपना देखने वाले युवाओं को नई दृष्टि प्रदान करेगी। इसके बावजूद जो युवा पत्रकारिता को पेशा बनाएंगे तो उन्हें इस बात का मलाल नहीं होगा कि क्या सोचा था और क्या हो गया। अच्छी बात है कि यह पुस्तक Amazon पर भी उपलब्ध है। सुविधा के लिए उसका लिंक नीचे दिया जा रहा है। लेकिन उसके पहले, description पर इस किताब के बारे में जो description दिया गया है, उसे पढ़ें…

‘स्वतंत्रता मिलने के बाद देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थापित हुई। प्रकारांतर में अखबारों की भूमिका लोकतंत्र के प्रहरी की हो गई और इसे कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका के बाद लोकतंत्र का ‘चौथा स्तंभ’ कहा जाने लगा। कालांतर में ऐसी स्थितियाँ बनीं कि खोजी खबरें अब होती नहीं हैं; मालिकान सिर्फ पैसे कमा रहे हैं। पत्रकारिता के उसूलों-सिद्धांतों का पालन अब कोई जरूरी नहीं रहा। फिर भी नए संस्करण निकल रहे हैं और इन सारी स्थितियों में कुल मिलाकर मीडिया की नौकरी में जोखिम कम हो गया है और यह एक प्रोफेशन यानी पेशा बन गया है। और शायद इसीलिए पत्रकारिता की पढ़ाई की लोकप्रियता बढ़ रही है, जबकि पहले माना जाता था कि यह सब सिखाया नहीं जा सकता है। अब जब छात्र भारी फीस चुकाकर इस पेशे को अपना रहे हैं तो उनकी अपेक्षा और उनका आउटपुट कुछ और होगा। दूसरी ओर मीडिया संस्थान पेशेवर होने की बजाय विज्ञापनों और खबरों के घोषित-अघोषित घाल-मेल में लगे हैं। ऐसे में इस पुस्तक का उद्देश्य पाठकों को यह बताना है कि कैसे यह पेशा तो है, पर अच्छा कॅरियर नहीं है और तमाम लोग आजीवन बगैर पूर्णकालिक नौकरी के खबरें भेजने का काम करते हैं और जिन संस्थानों के लिए काम करते हैं, वह उनसे लिखवाकर ले लेता है कि खबरें भेजना उनका व्यवसाय नहीं है।

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लेखक किशोर कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क +919811147422 या kk2801@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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वरिष्ठ पत्रकार संजय सिंह की किताब ‘राजरंग’ का गोरखपुर में विमोचन 24 सितंबर को

सहारा मीडिया के लिए दिल्ली में लंबे समय से वरिष्ठ पद पर तैनात और प्रेस क्लब आफ इंडिया के कई वर्षों से निदेशक संजय सिंह की नई किताब ‘राज-रंग’ का आगमन हो गया है. इसका विधिवत विमोचन उनके गृह जनपद गोरखपुर में होगा. इसके लिए 24 सितंबर की तारीख तय की गई है. समारोह अपराह्न तीन बजे से गोरखपुर क्लब के सभागार में होगा. इस आयोजन के मुख्य अतिथि हैं साहित्य अकादमी नई दिल्ली के अध्यक्ष विश्वनाथ त्रिपाठी.

कार्यक्रम की अध्यक्षता करेंगे प्रो. रामदेव शुक्ल. मुख्य वक्ता जाने-माने साहित्यकार और आलोचक डा. ज्योतिष जोशी होंगे. संचालन की जिम्मेदारी निभाएंगे आकाशवाणी के उद्घोषक सर्वेश दुबे. इस आयोजन की जिम्मेदारी ली है गोरखपुर जर्नलिस्ट प्रेस क्लब ने. ‘राज-रंग’ किताब के बारे में इसके लेखक संजय सिंह ने बताया कि राजनेताओं से अंतरंग बातचीत पर आधारित इस पुस्तक में ढेर सारे इंटरव्यूज है जो आज के हालात में काफी प्रासंगिक हैं.

किताब का प्रकाशन दिल्ली के लोकमित्र प्रकाशन ने किया है. इस किताब के कई अन्य पार्ट भी भविष्य में आएंगे. साथ ही किताब का विमोचन दिल्ली में भी जल्द किया जाएगा. गोरखपुर जर्नलिस्ट प्रेस क्लब के अध्यक्ष मार्कंडेय मणि त्रिपाठी ने सभी मीडियाकर्मियों, लेखकों, प्रकाशकों, सुधी पाठकों, नागरिकों से आयोजन में शिरकत कर इसे सफल बनाने की अपील की.

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प्रियंका की किताब का खुलासा, बाबा रामदेव इन तीन हत्याओं के कारण बन पाए टाइकून!

Surya Pratap Singh :  एक बाबा के ‘फ़र्श से अर्श’ तक की कहानी के पीछे तीन हत्याओं / मौत के हादसे क्या कहते हैं? अमेरिका में पढ़ी-लिखी प्रसिद्ध लेखिका प्रियंका पाठक-नारायण ने आज देश के प्रसिद्ध योगगुरु व अत्यंत प्रभावशाली व्यक्ति, बाबा रामदेव की साइकिल से चवनप्रास बेचने से आज के एक व्यावसायिक योगगुरु बनने तक की कथा अपनी किताब में Crisp facts / प्रमाणों सहित लिखी है। इस पुस्तक में बाबा की आलोचना ही नहीं लिखी अपितु सभी उपलब्धियों के पहलुओं को भी Investigative Biography के रूप में लिखा है।

इस पुस्तक में सभी तथ्य बड़े सशक्त ढंग से लिखे है , कुछ भी ऐसा नहीं लगता जिसे बकवास कहकर दरकिनार कर दिया जाए, प्रथम धृष्टता ऐसा भी नहीं लगता कि यह किसी मल्टीनैशनल द्वारा प्रायोजित किताब है। वैसे बाबा रामदेव ने कोर्ट के injunction order से प्रकाशक को यह स्थगन दिलवाया हुआ है कि अब इस पुस्तक की कोई नई कॉपी न छापी जाए। ज़रूरी नहीं कि इस पुस्तक में सभी बातों पर विश्वास किया जाए, लेकिन सार्वजनिक जीवन में बाबा रामदेव का क़द बहुत बड़ा है और राजनीतिक/ सामाजिक रसूक़ भी बहुत बड़ा है, अतः जनमानस को उनके बारे में जानने की उत्सुकता होना स्वाभाविक है। प्रियंका पाठक नारायण की किताब का नाम है- “Godman to Tycoon : The Untold Story of Baba Ramdev”

इस किताब में तीन हत्याओँ/ मौतों का विस्तार से परिस्थितियों व शंकाओं का प्रमाण सहित ज़िक्र किया है:

१- बाबा रामदेव के ७७ वर्षीय गुरु शंकरदेव का ग़ायब होने से पूर्व बाबा रामदेव का एक माह तक विदेश में चले जाना। दिव्य योगपीठ ट्रस्ट की सभी सम्पत्ति शंकरदेव के नाम थी, जी अब बाबा रामदेव के पास है। (CBI की जाँच अत्यंत मद्धम गति से जारी है)

२- बाबा रामदेव को आयुर्वेद दवाओं का लाइसेंस देने वाले स्वामी योगानंद की वर्ष २००५ में रहस्मयी हत्या।

३- बाबा रामदेव के स्वदेशी आंदोलन के पथ प्रदर्शक राजीव दीक्षित की वर्ष २०१० में संदिग्ध मौत।

मैं इस किताब का प्रचार नहीं कर रहा… लेकिन इसको पढ़कर आपको कुछ शंकाओं का निराकरण तो अवश्य होगा कि कैसे योग ने राम कृष्ण यादव को बना दिया बाबा रामदेव… धर्म के नाम पर तेज़ी बढ़े बाबा के व्यापार पर ED/IMCOME TAX की भी नज़र है।

गुरु शंकरदेव की रहस्यमयी गुमशुदी के साथ-अन्य दो हत्याओं/मौतों को भी CBI के दायरे में लाना उपयुक्त होगा ….. राम रहीम पर आए कोर्ट के निर्णय से आम लोगों को अन्य ढोंगी बाबाओं पर भी सिकंजा कसने का विश्वास जगा है। CBI को उक्त जाँच में भी शीघ्रता कर दूध का दूध व पानी का पानी अवश्य करना चाहिए … वैसे उ.प्र. मी भी नॉएडा/यमुना इक्स्प्रेस्वे में बाबा को 455 एकड़ भूमि अखिलेश यादव ने दी थी, उसकी जाँच भी ज़रूरी है।

नोट: कुछ लोगों ने मुझे फ़ोन कर यह आगाह किया है / चेतावनी दी है कि बाबा रामदेव के बारे में और न लिखें, क्यों कि इनके पास धनबल के साथ अन्य सभी बल हैं। सभी बड़ी मीडिया कम्पनीओँ को इतने विज्ञापन/ धन बाबा रामदेव से मिलते हैं कि कोई उनके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने की हिम्मत नहीं करता।

यूपी के चर्चित आईएएस अधिकारी रहे सूर्य प्रताप सिंह की एफबी वॉल से.

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अनिल यादव की किताब ‘यह भी कोई देस है महराज’ का अंग्रेजी संस्करण छपा

Dinesh Shrinet : “पुरानी दिल्ली के भयानक गंदगी, बदबू और भीड़ से भरे प्लेटफार्म नंबर नौ पर खड़ी मटमैली ब्रह्मपुत्र मेल को देखकर एकबारगी लगा कि यह ट्रेन एक जमाने से इसी तरह खड़ी है। अब यह कभी नहीं चलेगी। अंधेरे डिब्बों की टूटी खिड़कियों पर पर उल्टी से बनी धारियां झिलमिला रही थीं जो सूखकर पपड़ी हो गई थीं। रेलवे ट्रैक पर नेवले और बिल्ली के बीच के आकार के चूहे बेख़ौफ घूम रहे थे। 29 नवंबर, 2000 की उस रात भी शरीर के खुले हिस्से मच्छरों के डंक से चुनचुना रहे थे। इस ट्रेन को देखकर सहज निष्कर्ष चला आता था – चुंकि वह देश के सबसे रहस्यमय और उपेक्षित हिस्से की ओर जा रही थी इसलिए अंधेरे में उदास खड़ी थी।”

जब मैंने लखनऊ से निकलने वाली किसी छोटी सी पत्रिका में संभवतः उसके संपादक के अनुरोध पर लिखे जा रहे अनिल यादव के यात्रा संस्मरण की ये शुरुआती पंक्तियां पढ़ीं तो हतप्रभ सा हो गया। ऐसी तटस्थ मगर भीतर तक बेध जाने वाली भाषा, ऐसा गद्य हिन्दी में दुर्लभ था। यह 2007 की बात रही होगी। उन दिनों मैं लखनऊ में ही था। मैंने पढ़कर जब अनिल को फोन किया तो उन्होंने चिरपरिचित अलसाये अंदाज में पूछा- क्या तुम्हें वो अच्छा लगा? मैं कहा- हां, और ये तो यात्रा संस्मरण की पूरी एक किताब बन सकती है! यह सुझाव देने की वजह यह थी कि मैंने उनके और अनेहस शाश्वत की नार्थ ईस्ट की यायावरी के किस्से सुन रखे थे। दरअसल, लखनऊ में मेरे आने के पांच-छह साल पहले वे मेरे मित्र न थे न ही लेखक अऩिल यादव थे। वे अमर उजाला में मुझसे सीनियर थे। वे लखनऊ ब्यूरो में रहे लंबे समय तक। उनकी शार्प आब्जर्वेशन और तटस्थ मगर परतदार भाषा वाली रिपोर्ट्स अक्सर पहले पेज का एंकर बनती थीं। इनमें से ज्यादातर रिपोर्ट्स न सिर्फ पत्रकारिता के लिए बल्कि हमारी हिन्दी के लिए भी लाजवाब उदाहरण हैं, मगर अधिकतर को अनिल अपनी बेपरवाही के चलते गुम कर चुके हैं।

कुछ रिपोर्ट्स आज भी याद हैं। ‘भागवत के मौत के दिन की राजधानी’- जिसमें अनशन पर बैठे एक किसान की मौत के दिन का ब्योरा है। ‘कंपनी बाग में देसी फूल’- जिसमेंं छोटे शहरों से इलाहाबाद आए युवाओं की बेचैन करने वाली तस्वीर है (जिसे बाद में मैंने इग्नू के पाठ्यक्रम में बतौर कोर्स कोआर्टिनेटर काम करने के दौरान शामिल कर लिया)। या फिर सड़क किनारे पसीने में डूबे जल्दी-जल्दी कुछ खाकर अपना टारगेट पूरा करने निकल पड़ने वाले युवा सेल्स रिप्रेंजेंटेटिव्स की रिपोर्ट। अनिल ने धीरे-धीरे एक ऐसी भाषा को साधा जो हिन्दी का स्वभाव तो है मगर हिन्दी के लेखकों का नहीं। एक ऐसी निर्मम तटस्थता जिसमें अभिव्यंजना है और भाषा की कई लेयर्स हैं और उससे बढ़कर वह निगाह, जो अपने आसपास के यथार्थ उस तरह देख पाती है, जिस तरह हम कभी नहीं देख पाते। निःसंदेह उनका लेखन हमारी दृष्टि-संपन्नता को बढ़ाता है। अनुराग कश्यप अपनी समग्रता में मुझे पसंद नहीं आते मगर उनके काम के सर्वश्रेष्ठ हिस्से मुझे अऩिल के लेखन की याद दिला देते हैं।

तो अनिल का यात्रा संस्मरण बमुश्किल दो-तीन अंकों में छपा। उसके बाद या तो पत्रिका ही बंद हो गई या अनिल ने अपनी उकताहट में लिखना छोड़ दिया। तब तक मैं और अनिल सहज रूप से मित्र हो चुके थे। मेरी अब तक प्रकाशित दो कहानियों का स्वरूप तय करने में उनसे हुई लंबी बातचीत का बड़ा योगदान रहा है। मैं बैंगलोर और कानपुर से उन्हें नार्थ ईस्ट का यात्रा वृतांत पूरा करने के लिए खटखटाता रहा है। मेरे अलावा बहुत से लोग रहे होंगे जिन्हो्ंने अनिल को प्रेरित किया होगा, और उसी का नतीजा था जब 2012 में ‘यह भी कोई देस है महराज’ सामने आया। मैंने यात्रा वृतांत बहुत कम पढ़े हैं, बिना अतिशियोक्ति के यह कहना चाहूंगा कि ‘चीड़ों पर चांदनी’ के बाद यह दूसरा यात्रा संस्मरण है जो आपको पहले वाक्य से ग्रिप में ले लेता है। इसका कुछ कुछ अंदाजा तो शुरुआती पंक्तियों को पढ़कर ही लग गया होगा।

बहरहाल; स्पीकिंग टाइगर बुक्स से इसका अंग्रेजी संस्करण ‘Is That Even a Country, Sir!’ के नाम से आ गया है। यह एक उम्मीद जताता है कि हिन्दी में परिश्रम, शोध और जिद से भरा एक ऐसा मौलिक लेखन संभव है जो उसे भाषाओं की सरहदों के पार ले जा सके। अनिल को बधाई। स्क्रॉल ने इसका एक अंश प्रकाशित किया है। उसका लिंक यूं है :

www.scroll.in/anilYadavBook

पत्रकार दिनेश श्रीनेत की एफबी वॉल से.

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दीपक द्विवेदी की किताब ‘इम्पावरिंग द मार्जिन्लाइज्ड’ का उपराष्ट्रपति ने किया विमोचन

नई दिल्ली। दैनिक भास्कर उत्तर प्रदेश के चीफ एडीटर एवं नागरिक फाउन्डेशन के फाउन्डर प्रेसीडेन्ट दीपक द्विवेदी की पुस्तक इम्पावरिंग द मार्जिन्लाइज्ड का विमोचन उपराष्ट्रपति डा. हामिद अंसारी के आवास पर आयोजित एक समारोह में किया गया श्री द्विवेदी द्वारा लिखित इस पुस्तक में यूनाईटेड नेशन्स् समेत कई राष्टीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय संस्थानों द्वारा देश के ग्रामीण क्षे़त्रों को विकसित करने के लिए किये जा रहे विभिन्न प्रयासों को रेखांकित किया गया हैं।

उपराष्ट्रपति डा.हामिद अंसारी ने अपने आवास पर आयोजित समारोह में पुस्तक का विमोचन करते हुए कहा कि एक पत्रकार की दृष्टि से ग्रामीण क्षेत्रों को विकसित करने के लिए किये जा रहे प्रयासों के क्रियान्वयन के बारे में एक नई सोच का संदेश दिया गया है। जो कि भविष्य में इन संस्थाओं के लिए  कार्यक्रम क्रियान्वयन की दिशा में प्रभावी बनाने  में एक कारगर प्रयोग साबित हो सकता है। उन्होंने का कि काफी समय के बाद पत्रकारों द्वारा राष्टीय विकास के प्रति नजरिया बदलने एवं सक्रिय भूमिका निभाने की जो दिलचस्प पहल सामने आई है वह बहुत ही प्रशंसनीय  एवं सराहनीय है। उन्होने आश्वस्त किया कि इस पुस्तक का वह खण्ड़ सबसे महत्वपूर्ण दिखता है जिसमें स्थानीय पत्रकारों की भूमिका को अहम बताया गया है और उनका उपयोग राष्ट्र निर्माण की दिशा में वालन्टियर के रूप में किये जाने के लिए उठाया गया एक ठोस कदम है।

पुस्तक के परिचय आलेख के लेखक पदमश्री जे एस राजपूत ने पुस्तक को राष्ट्र के विकास में  अत्यन्त उपयोगी बताते हुए कहा कि राष्ट के विकास में यह पुस्तक मील का पत्थर साबित होगी। उन्होंने कहा कि पत्रकारों की भूमिका सिर्फ खबरों तक ही सीमित नही होनी चाहिए। उन्होंने पत्रकारों के रचनात्मक सहयोग और उनके व्यवहारिक स्वरूप पर भी प्रकाश डाला और श्री द्विवेदी की मेहनत और उनकी सोंच की भी सराहना की।

इस मौके पर पुस्तक के लेखक वरिष्ठ पत्रकार दीपक द्विवेदी ने कहा कि निकट भविष्य में स्थानीय एवं जिला स्तरीय पत्रकारों को संगठित कर उन्हें राष्ट्रीय विकास की धुरी से जोडा जायेगा। इसके लिए ग्राम्य विकास के प्रत्येक कार्यक्रमों से पत्रकारों को जोडनें के लिए राष्ट्रीय मुहिम चलाई जायेगी ताकि पत्रकारों को राष्टनिर्माण में राष्टनायक के रूप में विशेष पहचान दिलाई जा सके। श्री द्विवेदी ने कहा कि उपराष्ट्रपति ने आज यहां पर जो दीप जलाया है उसका अन्तिम पडा़व गांव की पंचायतें होंगी ताकि हर गरीब को योजनाओं का वास्तविक लाभ मिल सकें। उन्होंने घोषणा की शीघ्र ही कई भाषाओं में यह पुस्तक और नागरिक डायलाग मैग्जीन प्रकाशित की जायेगी। इस मौके पर जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूख अब्दुल्ला, प्रतिष्ठित उद्योगपति अशोक चतुर्वेदी, सांसद नरेश अग्रवाल, राजीव शुक्ला सहित बड़ी संख्या में गणमान्य अतिथि उपस्थित रहे।

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माखनलाल पत्रकारिता विवि के प्रोफेसर संजय द्विवेदी ने भी लिख दी मोदी पर किताब

पुस्तक ‘मोदी युग’ का शीर्षक देखकर प्रथम दृष्टया लगा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की स्तुति में धड़ाधड़ प्रकाशित हो रही पुस्तकों में एक कड़ी और जुड़ गई। अल्पजीवी पत्र-पत्रिकाओं के लेखों के साथ ही एक के बाद एक सामने आ रही पुस्तकों में मोदी सरकार की जो अखंड वंदना चल रही है, वो अब उबाऊ लगने लगी है। परंतु पुस्तक को जब ध्यान से पढ़ना शुरू किया तो मेरा भ्रम बिखरता गया कि ये पुस्तक भी मोदी वंदना में एक और पुष्प का अर्पण है। वैसे भी संजय द्विवेदी की पत्रकारिता की तासीर से परिचित होने के कारण मेरे सामने यह तथ्य खुलने में ज्यादा देर नहीं लगी कि पुस्तक में यथार्थ का यथासंभव तटस्थ मूल्यांकन किया गया है। वरिष्ठ पत्रकार संपादक और विचारक प्रोफेसर कमल दीक्षित का आमुख पढ़कर स्थिति और भी स्पष्ट हो गई। वस्तुत: प्रोफेसर कमल दीक्षित द्वारा लिखा गया आमुख पुस्तक की निष्पक्ष, दो टूक और सांगोपांग समीक्षा है। उसके बाद किसी के भी लिए संजय द्विवेदी की इस कृति की सामालोचना की गुंजाइश बचती नहीं है। यह स्वयं में सम्यक नीर-क्षीर विवेचन है।

भाजपा विरोधी समझे जाते रहे उर्दू के अखबारों और रिसालों को भी यह खुली आंखों से देखना पड़ रहा है कि बीते-तीन सालों की सियासत में दबदबा नरेंद्र मोदी का ही है। जिस तरह से बिखरे हुए प्रतिपक्ष के एकजुट होने की किसी भी कोशिश के पहले श्री मोदी के नेतृत्व में भाजपा अचानक तुरूप का कोई पत्ता चल देती है, उससे सारी तस्वीर बदल जाती है। ताजा उदाहरण है राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी के रूप में प्रतिपक्ष द्वारा किसी नाम पर एकजुटता से विचार करने से पहले ही भाजपा द्वारा दलित वर्ग के प्रबुध्द और बेदाग छवि वाले रामनाथ कोविंद के नाम की घोषणा करके चमत्कृत कर देना। मै मौजूदा सियासी परिदृश्य को जांचने की कोशिश कर ही रहा था कि नजर हैदराबाद से प्रकाशित उर्दू डेली, ’’मुंसिफ’’ की इस आशय की खबर पर पड़ गई कि आज पूरे मुल्क में मोदी और भाजपा का ही दबदबा है। जैसे किसी जमाने मे पं. जवाहर लाल नेहरू और श्रीमती इंदिरा गांधी की कांग्रेस देश की राजनीति की नियंता रहा करती थी, वैसे ही आज श्री मोदी की टक्कर का कोई नेता नजर नहीं आता।

श्री मोदी के जो आलोचक उन पर अहंकारी होने का आरोप लगाते हैं उनको वर्तमान सरकार के नीतिगत फैसलों की श्रृंखला एक कोने में धकेल देती है। वस्तुतः श्री मोदी की राजनीति की शैली ही ऐसी है कि जिसमें किसी प्रकार के दैन्य-प्रदर्शन की कोई गुंजाईश ही नहीं है। संजय द्विवेदी की पुस्तक में ठीक ही लिखा है कि “नई राजनीति ने मान लिया है कि सत्ता का विनीत होना जरूरी नहीं है। अहंकार उसका एक अनिवार्य गुण है। भारत की प्रकृति और उसके परिवेश को समझे बिना किए जा रहे फैसले इसकी बानगी देते हैं। कैशलेश का हौवा ऐसा ही एक कदम है। यह हमारी परम्परा से बनी प्रकृति और अभ्यास को नष्ट कर टेक्नोलाजी के आगे आत्मसमर्पण कर देने की कार्रवाई है। एक जागृत और जीवंत समाज बनने के बजाय हमें उपभोक्ता समाज बनने से अब कोई रोक नहीं सकता।’’ इसी में आगे कहा गया है, “इस फैसले की जो ध्वनि और संदेश है वह खतरनाक है। यह फैसला इस बुनियाद पर लिया गया है कि औसत हिन्दुस्तानी चोर और बेईमान है। क्या नरेन्द्र मोदी ने भारत के विकास महामार्ग को पहचान लिया है या वे उन्हीं राजनीतिक नारों में उलझ रहे हैं, जिनमें भारत की राजनीति अरसे से उलझी हुई है? कर्ज माफी से लेकर अनेक उपाय किए गए किन्तु हालात यह है कि किसानों की आत्महत्याएं एक कड़वे सच की तरह सामने आती रहती है। भारतीय जनता पार्टी और उसकी सरकार इन दिनों इस बात के लिए काफी दबाव में हैं कि उनके अच्छे कामों के बावजूद उसकी आलोचना और विरोध ज्यादा हो रहा है। उन्हें लगता है कि मीडिया उनके प्रतिपक्ष की भूमिका में खडे़ हैं। ’’मोदी सरकार’’  मीडिया से कुछ ज्यादा उदारता की उम्मीद कर रही है। यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि आपके राजनीतिक-वैचारिक विरोधी भी देश की बेहतरी के लिए मोदी-मोदी करने लगेंगे।”

प्रो. कमल दीक्षित जी के ही शब्दों में “मोदी युग ग्रंथ में संकलित लेखों में जहां श्री द्विवेदी, श्री मोदी की संगठन क्षमता, संकल्प निष्ठता और प्रशासनिक उत्कृष्टता को रेखांकित करते हैं, सत्ता को जनधर्मी बचाने के प्रयासों को उभारते हैं और संसदीय लोकतंत्र को सफल बनाने के उपायों को स्वर देते हैं, वहीं आत्मदैन्य से मुक्त हो रहे भारत की उजली छवि प्रस्तुत करते हैं, और राष्ट्रवाद की नई परिभाषा को रूपायित करते हैं। देश में क्षेत्रीय दलों के घटते जनाधार, लगातार सत्ता में बने रहने से आई नीति, निष्क्रियता, संसदीय लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की मर्यादा का उल्लंघन, राजनीतिक अवसरवाद जैसे सामरिक विषयों पर श्री द्विवेदी की टिप्पणियां विषयपरक तो हैं ही, वे प्रकारान्तर से हमारे लोकतंत्र की कमजोरियां को उभारने वाली हैं।’’

‘भारतीय मन और प्रकृति के खिलाफ है कैशलेस’ शीर्षक लेख में संजय द्विवेदी ने एक निष्पक्ष पत्रकार की छवि को सुरक्षित रखते हुए कड़वे-मीठे सच को दो टूक लिख दिया है कि “इस मामले में सरकार के प्रबंधकों की तारीफ करनी पडे़गी कि  वे हार को भी जीत में बदलने की क्षमता रखते हैं और विफलताओं का रूख मोड़कर तुरंत नया मुद्दा सामने ला सकते हैं। हमारा मीडिया, सरकार पर बलिहारी है ही।” दूसरा तथ्य यह, “हमारी जनता और हम जैसे तमाम आम लोग अर्थशास्त्री नहीं हैं। मीडिया और विज्ञापनों द्वारा लगातार हमें यह बताया जा रहा है कि नोटबंदी से कालेधन और आतंकवाद से लड़ाईमें जीत मिलेगी, तो हम सब यही मानने के लिए विवश हैं। नोटबंदी के प्रभाव के आंकलन करने की क्षमता और अधिकार दोनों हमारे पास नहीं हैं।’’ सवाल पूछा जा सकता है, नोटबंदी से क्या हासिल हुआ?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अनेक क्षेत्रों में गतिशील हुआ है। भारत-पाकिस्तान संबंधों में नीतिगत स्पष्टता का आभास हुआ है। विदेश नीति के माध्यम से आतंकवाद के विरूध्द वैश्विक एकजुटता विकसित करने में भारत ने तीन वर्षों में जो बहुआयामी प्रयास किए उनके सकारात्मक परिणाम मिलेंगे। इस कारण भी देश के आम लोगों की उम्मीदें अभी टूटी नहीं है और वे मोदी को परिणाम देने वाला राष्ट्र नायक मानते हैं। उससे साफ है कि सरकार ने उच्च स्तर पर भ्रष्टाचार को रोकने और कोयले, स्पेक्ट्रम जैसे संसाधनों की पारदर्शी नीलामी से जैसे साहसी फैसलों से भरोसा कायम किया है। देश की समस्याओं को पहचानने और अपनी दृष्टि को लोगों के सामने रखने का काम भी बखूबी इस सरकार ने किया है।

मन के तंतुओं में प्रतिबद्धता की सीमा तक रची वैचारिक आसक्ति को संजय द्विवेदी छुपाते भी नहीं है और ‘आजकल’ के दुनियादार लोगों की तरह सत्ता से काम निकालने के लिए उसका ढिंढ़ोरा भी नहीं पीटते। संजय की लोकप्रियता और सभी वर्गों में स्वीकृति का एक बड़ा कारण उनकी व्यवहार कुशलता भी है। अपनी बात पर दृढ़ रहते हुए भी वे दूसरों की सुनने का धैर्य रखते हैं और कभी-कभी इस अंदाज से असहमति भी व्यक्त करते हैं कि सामने वाला कहीं उलझ जाता है और उस उलझन के बावजूद उसका मर्म अमूर्त ही रह जाता है। संजय द्विवेदी की इस अदा पर मुझे उर्दू का एक शेर याद आता है “ न है इकरार का पहलू, न इनकार का पहलू, तेरा अंदाज मुझे नेहरू का बयां मालूम होता है।’’

परंतु यह संजय द्विवेदी की प्रकृति का मात्र संचारी भाव है। स्थायी भाव है व्यक्ति संस्था और शासन-प्रशासन तंत्र की गहरी पड़ताल करना। अपनी बात को दृढ़ता से कहना। हां, इतना अवश्य है कि इनका सौंदर्यबोध कई कुरूपताओं और अभद्रताओं पर झीनी-बीनी रेशमी चदरिया डाल देता है। सामने वाले को रेशमी चदरिया के स्पर्श की पुलक और लिखने वाले को यह प्रतीति की अप्रिय छवि से आंखें नहीं मूंदी। अपने अनुराग को किस हद तक छलकाना है और क्षोम को किस सीमा तक व्यक्त कर देना है, इस लेखन कला में संजय ने कुछ दशकों की साधना से सिद्धि प्राप्त कर ली है।

जहां बात सांस्कृतिक संस्कारों और सरोकारों की आती है, वहां संजय द्विवेदी शब्द जाल में पाठक को उलझाने और मूल मुददे से कतराने की बजाय स्पष्ट तथा सीधी धारणा व्यक्त करते हैं। उदाहरण के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पक्ष में वह लिखते हैं, “आरएसएस को उसके आलोचक कुछ भी कहें पर उसका सबसे बड़ा जोर सामाजिक और सामुदायिक एकता पर है। आदिवासी, दलित और पिछड़े वर्गों को जोड़ने और वृहत्तर हिंदू समाज की एकता और शक्ति के उसके प्रयास किसी से छिपे नहीं है। वनवासी कल्याण आश्रम, सेवा भारती जैसे संगठन संघ की प्रेरणा से ही सेवा के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इसलिए ईसाई मिशनरियों के साथ उसका संघर्ष देखने को मिलता है। आरएसएस के कार्यकर्ताओं के लिए सेवा का क्षेत्र बेहद महत्व का है।”

संजय द्विवेदी के जन्म से पूर्व के एक तथ्य को मैं अपनी तरफ से जोड़ना चाहता हूं, जब भारत विभाजन के पश्चात पश्चिमी पंजाब से लाखों की संख्या में हिंदू पूर्वी पंजाब पहुंचे तो संघ के स्वयंसेवकों ने बड़ी संख्या में उनके आतिथ्य, त्वरित पुर्नवास और उनके संबंधियों तक उन्हें पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उस समय बड़ी तादाद में अनेक व्यक्ति घायल और अंग-भंग के शिकार होकर विभाजित भारत में पहुंचे थे। उन्हें यथा संभव उपचार उपलब्ध कराने में संघ के स्वयंसेवकों ने शासन-प्रशासन तंत्र को मुक्त सहयोग दिया था। उसके साथ ही स्वतंत्र भारत ने अनेक प्राकृतिक आपदाओं के दौरान भी संघ के अनुषांगिक संगठनों से जुडे़ समाज सेवियों को स्वतःस्फूर्त सक्रिय पाया जाता रहा।

संजय लिखते हैं “1950 में संघ के तत्कालीन संघ चालक श्रीगुरू जी ने पूर्वी पाकिस्तान से आने वाले शरणार्थियों की मदद के लिए आह्वान किया। 1965 में पाक आक्रमण के पीड़ितों की सहायता का काम किया। 1967 में अकाल पीड़ितों की मदद के लिए संघ आगे आया। 1978 के नवंबर माह में दक्षिण के प्रांतों में आए चक्रवाती तूफान में संघ आगे आया। इसी तरह 1983 में बाढ़ पीड़ितों की सहायता, 1997 में काश्मीरी विस्थापितों की मदद के अलावा तमाम ऐसे उदाहरण है जहां पीड़ित मानवता की मदद के लिए संघ खड़ा दिखा। इस तरह आरएसएस का चेहरा वही नहीं है जो दिखाया जाता है। संकट यह है कि आरएसएस का मार्ग ऐसा है कि आज की राजनीतिक शैली और राजनीतिक दलों को वह नहीं सुहाता। वह देशप्रेम, व्यक्ति निर्माण के फलसफे पर काम काम करता है। वह सार्वजनिक जीवन में शुचिता का पक्षधर है। वह देश में सभी नागरिकों के समान अधिकारों और कर्तव्यों की बात करता है। उसे पीड़ा है अपने ही देश में कोई शरणार्थी क्यों है। आज की राजनीति चुभते हुए सवालों से मुंह चुराती है। संघ उससे टकराता है और उनके समाधान के रास्ते भी बताता है। संकट यह भी है कि आज की राजनीति के पास न तो देश की चुनौतियों से लडने का माद्दा है न ही समाधान निकालने की इच्छाशक्ति। आरएसएस से इसलिए इस देश की राजनीति डरती है। वे लोग डरते हैं जिनकी निष्ठाएं और सोच कहीं और गिरवी पड़ी हैं। संघ अपने साधनों से, स्वदेशी संकल्पों से, स्वदेशी सपनों से खड़ा होता स्वालंबी देश चाहता है, जबकि हमारी राजनीति विदेशी पैसे और विदेशी राष्ट्रों की गुलामी में ही अपनी मुक्ति खोज रही है।ऐसे मिजाज से आरएसएस को समझा नहीं जा सकता। आरएसएस को समझने के लिए दिमाग से ज्यादा दिल की जरूरत है। क्या वो आपके पास है? ’’

पुस्तक के आवरण के मुखडे़ से उसकी पीठ सत्ता प्रतिष्ठानों के प्रति असहमति में हाथ उठाने वाले प्रखर लेखक-समालोचक विजय बहादुर सिंह, कुछ ख्यातिनाम पत्रकारों के साथ ही छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह की टिप्पणियां संजय द्विवेदी की लोकप्रियता के जीवंत साक्ष्य उपस्थित करती हैं। तीन दशकों से अधिक समय के मेरे आत्मीय परिचय संजय द्विवेदी को मैंने एक आत्मीय ओजस्वी पत्रकार, प्रबुध्द अध्यापक और मनमोहिनी शक्ति से संपन्न मित्र के रूप में पाया है। अभी तो इन्होंने यशयात्रा का एक ही पड़ाव पार किया है। मंजिलें अभी और भी हैं। अनेक सुनहरी संभावनाओं का अनंत आकाश उड़ान भरने के लिए उनके सामने खुला पड़ा है।

पुस्तक: मोदी युग, लेखक: संजय द्विवेदी
प्रकाशकः पहले पहल प्रकाशन , 25 ए, प्रेस काम्पलेक्स, एम.पी. नगर,
भोपाल (म.प्र.) 462011,  मूल्य: 200 रूपए, पृष्ठ-250

पुस्तक के समीक्षक रमेश नैयर वरिष्ठ पत्रकार हैं. वे दैनिक भास्कर, रायपुर के संपादक रहे हैं.

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जस्टिस कर्णन की जीवनी लिखने के लिए दिलीप मंडल को मिले पचास लाख रुपये!

चर्चित पत्रकार दिलीप मंडल के बारे में खबर आ रही है कि वे जस्टिस कर्णन पर किताब लिखेंगे जिसके लिए प्रकाशक ने उन्हें पचास लाख रुपये दिए हैं. दलित समुदाय से आने वाले जस्टिस कर्णन की जीवनी लिखने को लेकर प्रकाशक से डील पक्की होने के बाद दिलीप मंडल अपने मित्रों को लेकर जस्टिस कर्णन से मिलने कलकत्ता गए. आने-जाने, खिलाने-पिलाने का खर्च प्रकाशक ने उठाया. किताब हिदी, अंग्रेजी, तमिल और कन्नड़ में छपेगी. ज्ञात हो कि दिलीप मंडल ने अब अपना जीवन दलित उत्थान के लिए समर्पित कर दिया है और फेसबुक पर हर वक्त वह दलित दलित लिखते रहते हैं जिसेक कारण उनके प्रशंसक और विरोधी भारी मात्रा में पैदा हो गए हैं.

पिछले दिनों जेएनयू के कन्हैया की आत्मकथा के लिए जॉगरनॉट प्रकाशन ने 30 लाख रूपए दिए थे. कन्हैया की किताब छप चुकी है, और खूब बिक रही है. एक प्रकाशन ने हार्दिक पटेल की आत्मकथा के लिए भी एक बड़ा अमांउट ऑफर किया है. वह किताब शायद अभी प्रेस में है. बताया जा रहा है कि दिलीप मंडल को 50 लाख में से 30 लाख की पेमेंट हो चुकी है. बाकी 20 लाख किताब की पांडुलिपि सौंपने पर मिलेंगे. दिलीप ने वादा किया है कि वह दो महीने में आत्मकथा लिखकर प्रकाशक को सौंप देंगे. इसके लिए उन्हें कई बार जस्टिस कर्णन से मिलना होगा. सारा टीए-डीए प्रकाशक उठाएगा और एक लिपिक (नोट्स लेने के लिए) का पारिश्रमिक भी प्रकाशक ही देगा. एक महीने के काम का लगभग 40 हजार.

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अखिलेश यादव सरकार के भ्रष्टाचार की पोल खोलती विष्णु गुप्त की नई किताब बाजार में आई

उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में वरिष्ठ पत्रकार और कॉलमनिष्ट विष्णुगुप्त की पुस्तक धमाल मचा रही है। विष्णुगुप्त की पुस्तक का नाम ‘अखिलेश की गुंडा समाजवादी सरकार’ है। इस पुस्तक में अखिलेश यादव की सरकार के पांच वर्ष का लेखा-जोखा है वह भी भ्रष्टाचार की कहानी और वंशवाद के विस्तृत विवरण के साथ में है। पुस्तक लखनउ के साथ ही साथ वाराणसी, इलाहाबाद, झांसी, कानपुर, मेरठ सहित सभी जगहों पर उपलब्ध है और तेजी से आम जन तक पहुंच रही है।

अखिलेश यादव और सपा विरोधी राजनीतिक कार्यकर्ता पुस्तक के प्रति काफी सक्रियता दिखा रहे हैं और पुस्तक की उपलब्धता आम जनता तक सुनिश्चित कर रहे हैं, ताकि आम जनता यह जान सके कि अखिलेश यादव की सरकार किस तरह जन विरोधी थी। एक पर एक भ्रष्टाचार की कहानियां किस प्रकार से लिखी गयी थी। भ्रष्टाचार से आम जनता के हितों को किस प्रकार से नुकसान पहुंचाया गया। अराजकता और अपराध का बोल बाला किस प्रकार से रहा है। ईमानदार अधिकारियों का किस प्रकार से उत्पीड़न हुआ। ईमानदार अधिकारियों को किस प्रकार से इस्तीफा देने के लिए बाध्य किया गया। बेईमान अधिकारियों को प्रोन्नति पर प्रोन्नति मिलती चली गयी। वंशवाद ने लोकतंत्र को जख्मी किस प्रकार से किया है।

लेखक विष्णुगुप्त का मत है कि उत्तर प्रदेश में भ्रष्ट, अराजक, जातिवादी और वंशवादी राजनीति की विदाई होनी चाहिए और ऐसी राजनीतिक धारा बहनी चाहिए जिसमे वंशवाद की कोई उम्मीद नहीं होनी चाहिए ताकि भ्रष्टचार और प्रशासनिक अराजकता दूर किया जा सके। साथ ही अपराध पर नियंत्रण रहे और विकास की राशि आम जन तक पहुंच सके।

अब यहां यह प्रश्न उठता है कि विष्णुगुप्त की पुस्तक अखिलेश यादव की राजनीतिक छवि को कितना दागदार कर पायेगी और समाजवादी पार्टी को कितना नुकसान पहुंचा पायेगी? क्या विष्णुगुप्त की पुस्तक का कोई राजनीतिक उदे्दश्य है? कोई निजी विचार-महत्वाकांक्षा भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है? एक ऐसा लेखक जो हमेशा आर्थिक फटेहाली में न सिर्फ सकिय रहता है, आर्थिक फटेहाली में भी अपने विचारों से समझौता नहीं करता बल्कि देशद्रोहियों के खिलाफ अभियान चलाता है। साथ ही कारपोरेट लुटेरों पर अपनी स्याही सुखाता है। ऐसा लेखक अगर पिछड़ी जाति के पुनर्जागरण के नाम पर सत्ता में आयी अखिलेश सरकार को चाकचौबंद ढंग से घेरे में लेता है तो फिर पुस्तक की बातों और तथ्यों पर गौर करना ही पडेगा।

लेखक यह भी जानते-समझते हैं कि वे किस छत्ते में हाथ डाले हैं, किस राजनीतिक घराने की अपसंस्कृति के खिलाफ लिख रहे हैं, किस राजनीतिक घराने के अपराध और कुनबेबाजी के खिलाफ लिख रहे हैं और इसके खतरे क्या है? ऐसे भी विष्णु गुप्त, खतरों के खिलाडी हैं, खतरे ये मोल लेते रहे हैं, अपनी जान जोखिम में डालकर पत्रकारिता और लेखन कार्य करते रहे हैं, इस सच्चाई को हर विचारवान पत्रकार और आम जन समझते हैं।

अब थोडी चर्चा विषय वस्तु और तथ्यों के चाकचौबंद पर। विष्णुगुप्त ने पुस्तक के विषय वस्तु निर्धारण करने में राजनीतिक दूरदर्शिता दिखायी है। पुस्तक का पहला चैप्टर वंशवाद को लेकर है। पहले चैप्टर का शीर्षक है ‘वंशवाद का नंग्न तांडव, अखिलेश का पत्नी प्रेम’। इस शीर्षक से लेखक ने न केवल मुलायम की बल्कि अखिलेश की वंशवादी राजनीति पर गंभीर चोट की है। लेखक ने साफ तौर पर कहा है कि राम मनोहर लोहिया के सिद्धांत का अनुयायी कहने वाले मुलायम सिंह यादव और उनके पुत्र अखिलेश यादव ने वंशवाद की राजनीति में जवाहर लाल नेहरू को भी मात दी दी है।

जवाहर लाल नेहरू ने सिर्फ अपनी बेटी इन्दिरा गांधी को ही राजनीति में स्थापित किया था जबकि मुलायम सिंह यादव ने अपने पूरे परिवार को राजनीति में स्थापित कर दिया। मुलायम सिंह यादव ने वंशवाद स्थापित कर राममनोहर लोहिया की कब्र खोदी है। लेखक ने उन लोगों को आईना दिखाया है जो अखिलेश यादव को वंशवाद प्रेमी नहीं कहते है। लेखक ने बुलंदी के साथ अखिलेश को मुलायम से बड़ा वंशवादी कहा। मुलायम ने अपनी पत्नी को राजनीति में स्थापित नहीं किया था पर अखिलेश ने अपनी पत्नी को राजनीति में स्थापित कर दिया।

सबसे बड़ी बात यादव सिंह के भ्रष्टाचार की कहानी का है। ‘यादव सिंह का संरक्षणकर्ता अखिलेश’ शीर्षक से प्रश्न किया है कि जो लोग अखिलेश को ईमानदार मानते हैं, स्वच्छ मानते हैं, सत्य हरिशचन्द्र का प्रतीक मानते हैं वे सभी यादव सिंह के भ्रष्टचार से जुडे तथ्य देख लें, समझ लें। यादव सिंह के खिलाफ सीबीआई जांच को रोकवाने के लिए कई संवैधानिक और गैर संवैधानिक हथकंडे अपनाये थे। अखिलेश सरकार की जांच में यादव सिंह को क्लीन चिट क्यों और किस मकसद से दिया गया था। कोर्ट अगर बहादुरी नहीं दिखायी होती तो फिर यादव सिंह को जेल जाना और यादव सिंह का भ्रष्टचार सामने आना मुश्किल होता। अगर जांच संपूर्णता में हो तो फिर यादव सिंह को संरक्षण देने के आरोप में अखिलेश यादव भी जेल के अंदर जा सकते हैं।

अखिलेश यादव का सबसे ड्रीम प्रोजेक्ट लखनउ-आगरा एक्सप्रेसवे की भी पुस्तक में पोल खोली गयी है। लेखक ने दावा किया है कि लखनउ-आगरा एक्सप्रेसवे अभी बन कर पूरी तरह से तैयार नहीं हुआ है, अधूरा है फिर भी उस एक्सप्रेस वे का  लोकार्पण कर दिया गया। यह एक्सप्रेसवे अनुपयोगी है और किसानों की आजीविका को कब्र बना कर बनाया गया है। किसानों से जबरदस्ती जमीन छीनी गयी है। अभी तक किसानों को पूरा मुआवजा भी नहीं मिला है। इस प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए यूपी के सबसे बदनाम और भ्रष्ट अधिकारी नवनीत सहगल को जिम्मेदारी दी गयी। नवनीत सहगल ने इस योजना को पूरी करने में करोड़ों का घोटाला किया है।

सैफई महोत्सव को लेकर भी इस किताब में काफी कुछ है। लेखक ने ‘मौज-मस्ती का सैफई महोत्सव’ शीर्षक से दावा किया है कि हर साल तीन सौ करोउ रूपये सैफई महोत्सव पर फूके जाते हैं। अमर सिंह के एक बयान को आधार बना कर यह दावा किया गया है। लेखक ने प्रश्न खडा किया है कि अखिलेश और मुलायम राज में कभी काशी, अयोध्या और प्रयाग महोत्सव का आयोजन नहीं किया गया पर सैफई महोत्सव का आयोजन हर साल सिर्फ मौज मस्ती के लिए किया जाता है और अपसंस्कृति फैलायी जाती है।

पुस्तक में कई अन्य रोचक और तथ्यपूर्ण विषय है जैसे अमर सिंह से क्यों डरते हैं अखिलेश-मुलायम, ईमानदार अधिकारियों जैसे अमिताभ ठाकुर, दुर्गा शक्ति नागपाल आदि का उत्पीडन और बेईमान अधिकारियों को संरक्षण, अखिलेश-मुलायम का विक्टोरिया बग्धी प्रेम, समाजवादी दंगों मे अखिलेश, मूलायम आजम खान का हाथ और अखलाक कांड आदि पर भी विचारोतेक पठनीय सामग्री है।

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हिन्दी के चर्चित और चहेते गद्यकार अनिल यादव की नई किताब ‘सोनम गुप्ता बेवफा नहीं है’ बाजार में आई

Siddharth Kalhans : पहली बार किसी ने दस रुपये के नोट पर लिखा होगा, सोनम गुप्ता बेवफा है, तब क्या घटित हुआ होगा? क्या नियति से आशिक, मिज़ाज से अविष्कारक कोई लड़का ठुकराया गया होगा, उसने डंक से तिलमिलाते हुए सोनम गुप्ता को बदनाम करने की गरज से उसे सरेबाजार ला दिया होगा? या वह सिर्फ फरियाद करना चाहता था, किसी और से कर लेना लेकिन सोनम से दिल न लागाना।

अनिल यादव

क्या पता सोनम को कुछ खबर ही न हो, वह सड़क की पटरी पर मुंह फाड़कर गोलगप्पे खा रही हो, जिंदगी में तीसरी बार लिपिस्टिक लगाकर होठों को किसी गाने में सुने जैसा महसूस कर रही हो। यह भी तो हो सकता है कि किसी चिबिल्ली लड़की ने ही अपनी सहेली सोनम से कट्टी करने के बाद उसे नोट पर उतार कर राहत पाई हो…

(अंतिका प्रकाशन से बस अभी-अभी छपी हिन्दी के सबसे चहेते गद्यकार अनिल यादव की नई किताब ‘सोनम गुप्ता बेवफा नहीं है’ से)

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ कलहंस की एफबी वॉल से.

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