सेना को राजनीति में खींचने के ख़तरे… सर्जिकल स्ट्राइक्स को पब्लिक करने के खतरे…

Mahendra Mishra : सेना को लेकर मोदी सरकार बहुत खतरनाक खेल खेल रही है। यह कितना खतरनाक हो सकता है। शायद उसके नेताओं को भी इसका अहसास नहीं है। सेना सरहद के लिए बनी है। और उसका वहीं रहना उचित है। सेना एक पवित्र गाय है उसको उसी रूप में रखना ठीक होगा। घर के आंगन में लाकर बांधने से उसके उल्टे नतीजे निकल सकते हैं। क्योंकि आप अगर सेना का राजनीतिक इस्तेमाल करते हैं। तो इसके जरिये वह भी राजनीति के करीब आती है। और इस कड़ी में कल उसको भी राजनीतिक चस्का लग सकता है। और एकबारगी अगर राजनीति का खून उसके मुंह में लग गया। तो फिर देश की राजनीति को उसके चंगुल में जाने से बचा पाना मुश्किल होगा।

पाकिस्तान की नजीर आप के सामने है। अयूब खान के सत्ता पर कब्जे के बाद लोकतंत्र जो पटरी से उतरा। तो फिर कभी ठीक से उस पर नहीं चढ़ सका। और उसका नतीजा यह रहा कि सेना और राजनीति के बीच सत्ता पर बर्चस्व का खेल वहां चलता रहता है। कभी सेना भारी पड़ती है। तो कभी राजनीति। लेकिन आखिरी सच यही है कि खाकी ने वहां सत्ता पर अपनी स्थाई पकड़ बना ली है। जिसके चंगुल से राजनीति को निकालना अब मुश्किल हो रहा है। भारत में भी राजनीति का जो हाल है। वह आश्वस्त करने वाला नहीं है। गोते में अपनी साख तलाशती इस राजनीति को जनता कभी भी लात मार सकती है। बशर्ते उसे एक विकल्प मिल जाए। हालांकि 67 सालों के लोकतंत्र में यह बहुत मुश्लिक है। और एक हद तक नामुमकिन भी। लेकिन एक पल के लिए ही सही अगर आप कल्पना करें। सेना कोई विकल्प लेकर सामने आ जाए। तो एक बड़ी जमात जो इन लुटेरे नेताओं और उनकी गिरफ्त से राजनीति को मुक्त कराने की पक्षधर है। क्या उसके साथ खड़ी नहीं हो सकती है? अगर ऐसा हो जाए तो किसी को अचरज नहीं होना चाहिए।

अनायास नहीं कारगिल के बाद जब बीजेपी की कुछ इकाइयां या उसके एक हिस्से ने पोस्टरों में तीनों सेना अध्यक्षों की तस्वीर छापी। तो उस समय के सेनाध्यक्ष जरनल वीपी मलिक ने उस पर कड़ा एतराज जाहिर किया। इस मसले पर बाकायदा उन्होंने तब के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मुलाकात की थी। जिसमें उन्होंने कहा था कि सेना अराजनीतिक है और उसे वैसा ही बनाए रखना उचित होगा। अटल ने उनसे इत्तफाक जाहिर करते हुए उन हरकतों पर रोक लगाने की बात कही थी। वीपी मलिक ने यह बात अपनी किताब ‘कारगिल फ्राम सरप्राइज टू विक्ट्री’ में दर्ज्ञ की है। उसके साथ ही इस किताब में उन्होंने एक और वाकये का जिक्र किया है। जिसमें उन्होंने बताया कि उसी दौरान वीएचपी यानी विश्व हिंदू परिषद का एक प्रतिनिधमंडल उन्हें राखी बांधने सेना के हेडक्वार्टर पहुंच गया। लेकिन उन्होंने उससे मिलने से इनकार कर दिया। फिर निराश होकर वो लोग पीआरओ के कमरे अपनी राखियां छोड़कर चले गए। इस घटना के बाद से ही सेना के मुख्यालय में लोगों के प्रवेश में सख्ती बरती जाने लगी।

मौजूदा समय आलम यह है कि बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह खुलेआम इस मामले को जनता के बीच ले जाने की बात कर रहे हैं। न कोई उनको रोकने वाला है। और न ही कहीं से एतराज जताया जा रहा है। सेना के आला अधिकारियों की चुप्पी भी इस मसले पर बेहद रहस्यमय है। कहीं से किसी तरह के प्रतिरोध की खबर नहीं आ रही है। यहां तक कि सेना से जुड़े पूर्व अधिकारी भी इस पर चुप्पी साधे हुए हैं। यह बात बीजेपी के लिए तो मुफीद है। लेकिन सेना का इसमें क्या हित हो सकता है। यह समझना मुश्किल है। या फिर यह कहीं बीजेपी-संघ की बड़ी साजिश का हिस्सा तो नहीं? दरअसल बीजेपी जनता के सैन्यीकरण की हिमायती रही है। और इस तरह के किसी भी मौके को हाथ से नहीं जाने देना चाहती। यह अकेली ऐसी पार्टी है जिसने एक पूर्व सेनाध्यक्ष को सीधे राजनीति में प्रवेश दिलाने का काम किया है। यह एक तरह से सेना के सीधे राजनीतिकरण की शुरुआत है। लेकिन वर्दी जब खादी में बदलती है। तो उसके नतीजे बेहद खतरनाक होते हैं। दुनिया के इतिहास ने इस बात को कई बार साबित किया है। लिहाजा इस तरह के किसी प्रयोग में जाने का कोई तुक नहीं बनता। और जाने से पहले एक हजार बार सोचना चाहिए।

इसमें अभी तक किसी तरह का शक रहा हो। तो सेना संबंधी मनमोहन सिंह से जुड़ा हिंदू का खुलासा मौजूदा सरकार के लिए काफी है। बावजदू इसके सरकार अभी भी इससे कोई सबक सीखने के लिए तैयार नहीं हो। तो यह देश के लिए किसी दुर्भाग्य से कम नहीं होगा। इसका मतलब है कि सरकार अपने स्वार्थ में अंधी हो गई है। और उसे न तो देश का ख्याल है न ही उसके हितों का। एकबारगी सोचिए मनमोहन सिंह 2011 में मौजूदा कार्रवाई से भी बड़ी कार्रवाई करके चुप बैठे थे। जबकि विपक्ष से लेकर पूरा देश उनके ऊपर हमले कर रहा था। यहां तक कि कुछ एक लोग उन्हें कायर सरीखे घिनौने शब्द से भी नवाजने से बाज नहीं आए।

लेकिन मनमोहन सिंह मौन रहे। क्योंकि उन्हें अपने से ज्यादा अपने देश की इज्जत और उसके हित की चिंता थी। चाहते तो खुद कुछ कहना भी नहीं पड़ता और किसी एक रिपोर्टर के हवाले से पूरी कहानी सामने आ जाती। लेकिन सिर्फ राजनीतिक तंत्र ही नहीं बल्कि सेना से लेकर पूरा सत्ता प्रतिष्ठान इस पर चुप्पी साधे रहा। यह होता है एक शासक उसका धैर्य और उसकी संजीदगी। वह सब कुछ जानते हुए भी उसको जज्ब कर लेता है। वह खुद विष पीता है लेकिन देश और उसके लोगों पर आंच नहीं आने देता। मौजूदा दौर में भी जब सत्ता प्रतिष्ठान से जुड़े लोगों ने पूर्व सरकारों पर हमला शुरू किया। और इतिहास में इस तरह की किसी स्ट्राइक की बात को खारिज किया। तब भी मनमोहन सिंह शांत रहे। चाहते तो बोलते और बहुत कुछ बोलते। और अब सीधे सत्ता के प्रति उनकी कोई जवाबदेही भी नहीं थी। लेकिन अपनी गोपनीयता की शपथ कहिए या फिर नैतिक संस्कार या कहिए देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी ने उनके हाथ बांध रखे थे।

लेकिन दूसरी तरफ मौजूदा सरकार और उसका पूरा निजाम नंगे तरीके से तुच्छ राजनीतिक स्वार्थों के लिए हर वह काम करने के लिए तैयार है। जिसकी देश और उसके हित इजाजत नहीं देते। एक ऐसी स्ट्राइक जो सवालों के घेरे में है। उसका घूम-घूम कर डंका पीटा जा रहा है। और लाभ लेने के लिए उसके नेता अब सड़कों पर निकल पड़े हैं। इतना ही नहीं उसके प्रवक्ता और पिछलग्गू तमाम कुतर्कों के साथ इन हरकतों को जायज ठहराने की कोशिश कर रहे हैं। और आखिर में सबसे बड़ा सवाल यह है कि सरकार में रहते कोई कैसे झूठ बोल सकता है। और वह भी अपनी पिछली सरकारों के बारे में?

पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट महेंद्र मिश्र की एफबी वॉल से.

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भाजपा ने सर्जिकल स्ट्राइक को कैश कराना शुरू किया, यूपी में रक्षा मंत्री जगह-जगह अभिनंदन करा रहे

Mahendra Mishra : जिस बात की आशंका थी आखिरकार वही हुआ। रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर अपना अभिनंदन कराने आगरा और लखनऊ पहुंच गए। उन्होंने न दिल्ली को चुना। न जयपुर। न हैदराबाद। और न ही देश का कोई दूसरा इलाका। चुनाव वाला उत्तर प्रदेश ही इसके लिए उन्हें सबसे ज्यादा मुफीद दिखा। सर्जिकल स्ट्राइक को अब कैश कराने का वक्त आ गया है। क्योंकि सरहदी एटीएम में वोट भरे पड़े हैं। लिहाजा बीजेपी अब उसे भुनाने निकल पड़ी है।

वैसे पीएम ने सहयोगियों को छाती न पीटने की सलाह दी थी। फिर क्या पर्रिकर के इस कार्यक्रम को उससे जोड़कर न देखा जाए? या फिर कोई यह भी कह सकता है कि वो छाती नहीं अपनी पीठ थपथपवाने गए थे। या पीएम साहब का यह बयान दिखावे के लिए था। और अंदर से काम जारी रखने की हरी झंडी थी। शायह यह इतिहास में पहला मौका होगा जब सेना की कार्रवाई का राजनीतिकरण हो रहा है। कोई राजनीतिक पार्टी अब तक शायद ही सेना के नाम पर वोट मांगी होगी। कल्पना कीजिए अगर बीजेपी के दौर में 1971 हुआ होता? और पाकिस्तान से कटकर बांग्लादेश बना होता? फिर इनके कार्यकर्ता क्या करते। आज तो आलोचकों को देशद्रोही ही कह रहे हैं। उस समय तो ये देश निकाला का फरमान जारी कर देते।

पूरे यूपी में जगह-जगह सर्जिकल स्ट्राइक से जुड़े पोस्टर लगे हैं। एक तरफ बीजेपी कह रही है कि यह राष्ट्रीय मुद्दा है। सभी राजनीतिक मतभेदों को भुलाकर सबको सरकार का साथ देना चाहिए। दूसरी तरफ खुद उसी मुद्दे पर वोट मांगने निकल पड़ी है । कोई इनसे पूछ सकता है कि फिर सरहद पर सरकार का साथ देने वाली विपक्षी पार्टियां क्या करेंगी। बीजेपी के हिसाब से तो उन्हें चुनाव ही नहीं लड़ना चाहिए। और बीजेपी प्रत्याशियों को वाकओवर देकर उन्हें घर बैठ जाना चाहिए। दरअसल ये सार्वजनिक राजनीति की न्यूनतम मर्यादा भी निभाने के लिए तैयार नहीं हैं। लाशों पर वोट हासिल करने का इनका इतिहास पुराना है। बाबरी से लेकर गुजरात के बाद अब सरहद की बारी है। राष्ट्रवाद इनके वोट की नई मशीन है। और अब ये सैनिकों की लाशों का सौदा करने पर उतारू हैं। उरी में सैनिकों पर हमला इनके लिए मिनी गोधरा है। और बीजेपी इस मौके को अब कतई हाथ से जाने नहीं देना चाहती है।

यूपी में बारात तो सज गई है। और मुद्दा भी मिल गया है। लेकिन उसकी अगुवाई करने वाला दूल्हा नहीं था। हालांकि उसकी तलाश पूरी हो गई है। लेकिन वह चुनावी घोड़ी पर चढ़ने के लिए तैयार नहीं है। कश्मीर से लेकर उरी और पूरे सरहदी संघर्ष के मामले में आप एक चीज नई देख रहे होंगे। न यहां मोदी का चेहरा सामने है। न सुषमा स्वराज का। न अजीत डोवाल का। बार-बार केवल अकेला चेहरा गृहमंत्री राजनाथ सिंह का दिखता है। कश्मीर से जुड़े किसी मामले की बैठक हो या कि घाटी का दौरा। हर जगह राजनाथ होते हैं। आम तौर पर मोदी जी किसी को श्रेय नहीं लेने देते। सुषमा स्वराज का मामला किसी से छुपा नहीं है। लेकिन इस समय उल्टी गंगा बह रही है।

दरअसल मोदीजी और अमित शाह यूपी में राजनाथ को पार्टी का चेहरा बनाना चाहते हैं। लेकिन राजनाथ ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया था। इसमें उन्हें अपने लिए कोई फायदा नहीं दिख रहा है। गृहमंत्रालय तो जाएगा ही। सरकार न बनने पर सब कुछ के खत्म होने की आशंका है। लेकिन मोदी के इस तीर के दो निशाने हैं। या फिर कहें उनके दोनों हाथ में लड्डू हैं। अवलन उन्हें केंद्र में अपने सबसे मजबूत प्रतिद्वंदी से निजात मिल जाएगी। और अगर पार्टी जीत गई फिर तो बल्ले-बल्ले है। और हारने पर राजनाथ नाम की यह बला हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी। इसीलिए कश्मीर की पूरी कवायद में राजनाथ के चेहरे को आगे रखा गया है। और उन्हें एक विजेता सेनापति के तौर पर पेश करने की कोशिश की जा रही है। अगर फिर भी राजनाथ नहीं माने। तो सूबे में नीचे के कार्यकर्ताओं से उनकी मांग शुरू करवा दी जाएगी। जिसकी कि छिटपुट खबरें आनी भी शुरू हो गई हैं। और उसके बाद भी पार्टी की जरूरत को ठुकराने पर उन्हें खलनायक के तौर पर पेश करना आसान हो जाएगा।

सरहद के गर्म तवे पर पीएम ने भी वोट की रोटी सेंकने का ऐलान कर दिया है। दूसरों को छाती न पीटने की सलाह देने वाले मोदी जी ‘रावण नवाज’ को मारने लखनऊ जाएंगे। पहली बार कोई पीएम दशहरा दिल्ली से दूर मनाएगा। लखनऊ जाने के पीछे वोट के अलावा दूसरा और क्या कारण हो सकता है? सरकार और पार्टी ने मिलकर पाकिस्तान विरोधी भावनाओं को वोट में बदलने का फैसला कर लिया है। और इसके लिए वो कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहती हैं। लेकिन भारतीय राजनीति का यह चेहरा बेहद विकृत है। यह घृणास्पद होने के साथ निंदनीय भी है।

खून से सनी वर्दियों का इससे बढ़कर कोई दूसरा अपमान नहीं हो सकता है। सूबे में सांप्रदायिक गोलबंदी हो इसका हर तरीके से इंतजाम किया जा रहा है। अखलाक की हत्या के आरोपी का शव तिरंगे में लिपटाया गया। चर्चित अभिनेता नवाजुद्दीन सिद्दीकी को अपने गांव की रामलीला में अभिनय करने से मना कर दिया गया। अगर पहले ने गंगा-जमुनी तहजीब को कलंकित करने का काम किया है। तो दूसरे ने तिरंगे को अपमानित करने का।

वरिष्ठ पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट महेंद्र मिश्र की एफबी वॉल से.

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गुजरात फाइल्‍स : अफसरों की जुबानी-मोदी अमि‍त शाह की काली कहानी

कुछ सालों पहले तक उत्तर प्रदेश पूरे देश का नेतृत्व किया करता था। लेकिन लगता है कि देश को सात-सात प्रधानमंत्री देने वाले इस सूबे की राजनीति अब बंजर हो गई है। इसकी जमीन अब नेता नहीं पिछलग्गू पैदा कर रही है। ऐसे में सूबे को नेता आयातित करने पड़ रहे हैं। इस कड़ी में प्रधानमंत्री मोदी से लेकर उनके शागिर्द अमित शाह और स्मृति ईरानी तक की लंबी फेहरिस्त है। स्तरीय नेतृत्व हो तो एकबारगी कोई बात नहीं है। लेकिन चीज आयातित हो और वह भी खोटा। तो सोचना जरूर पड़ता है। यहां तो तड़ीपार से लेकर दंगों के सरदार और फर्जी डिग्रीधारी सूबे को रौंद रहे हैं। इस नये नेतृत्व की हकीकत क्या है। इसकी कुछ बानगी पत्रकार राना अयूब की गुजरात दंगों और दूसरे गैर कानूनी कामों पर खोजी पुस्तक ‘गुजरात फाइल्स’ में मौजूद है। 

मोदी जी और अमित शाह से जुड़े इसके कुछ अशों को उसी रूप में देने की हम कोशिश कर रहे हैं जिसमें गुजरात के आला अफसरों के इनके बारे में विचार हैं। इसको पढ़ने के बाद आपके लिए इस ‘आयातित नेतृत्व’ के बारे में किसी नतीजे पर पहुंचना आसान हो जाएगा। बातचीत के कुछ अंशः

जी एल सिंघल, पूर्व एटीएस चीफ, गुजरात

प्रश्नः ऐसी क्या चीज है जिसके चलते गुजरात पुलिस हमेशा चर्चे में रहती है? खासकर विवादों को लेकर?

उत्तरः यह एक हास्यास्पद स्थिति है। अगर कोई शख्स अपनी शिकायत लेकर हमारे पास आता है और हम उसे संतुष्ट कर देते हैं तो उससे सरकार नाराज हो जाती है। और अगर हम सरकार को खुश करते हैं तो शिकायतकर्ता नाराज हो जाता है। ऐसे में हम क्या करें? पुलिस के सिर पर हमेशा तलवार लटकी रहती है। एनकाउंटर में शामिल ज्यादातर अफसर दलित और पिछड़ी जाति से थे। राजनीतिक व्यवस्था ने इनमें से ज्यादातर का पहले इस्तेमाल किया और फिर फेंक दिया।

प्रश्नः मेरा मतलब है कि आप सभी वंजारा, पांडियन, अमीन, परमार और ज्यादातर दूसरे अफसर निचली जाति से हैं। सभी ने सरकार के इशारे पर काम किया। जिसमें आप भी शामिल हैं। ऐसे में ये इस्तेमाल कर फेंक देने जैसा नहीं है?

उत्तरः ओह हां, हम सभी। सरकार ऐसा नहीं सोचती है। वो सोचते हैं कि हम उनके आदेशों का पालन करने के लिए बाध्य हैं। और बने ही हैं उनकी जरूरतों को पूरा करने के लिए। प्रत्येक सरकारी नौकर जो भी काम करता है वो सरकार के लिए करता है। और उसके बाद समाज और सरकार दोनों उसे भूल जाते हैं। वंजारा ने क्या नहीं किया। लेकिन अब कोई उसके साथ खड़ा नहीं है।

प्रश्नः लेकिन ये अमित शाह के साथ क्या चक्कर है। मैंने आपके अफसरों के बारे में भी सुना………मेरा मतलब है कि वहां अफसर-राजनीतिक गठजोड़ जैसी कुछ बात है। खास कर एनकाउंटरों के मामले में। मुझे ऐसा बहुत सारे दूसरे मंत्रियों से मिलने के बाद महसूस हुआ।

उत्तरः देखिये, यहां तक कि मुख्यमंत्री भी। सभी मंत्रालय और जितने मंत्री हैं। सब रबर की मुहरें हैं। सभी निर्णय मुख्यमंत्री द्वारा लिए जाते हैं। जो भी फैसले मंत्री लेते हैं उसके लिए उन्हें मुख्यमंत्री से इजाजत लेनी पड़ती है। सीएम कभी सीधे सीन में नहीं आते हैं। वो नौकरशाहों को आदेश देते हैं।

प्रश्नः उस हिसाब से तो आपके मामले में अगर अमित शाह गिरफ्तार हुए तो सीएम को भी होना चाहिए था?

उत्तरः हां, ये मुख्यमंत्री मोदी जैसा कि अभी आप बोल रही थीं अवसरवादी है। अपना काम निकाल लिया।

प्रश्नः अपना गंदा काम

उत्तर- हां

प्रश्नः लेकिन सर आप लोगों ने जो किया वो सब सरकार और राजनीतिक ताकतों के इशारे पर किया। फिर वो क्यों जिम्मेदार नहीं हैं?

उत्तरः व्यवस्था के साथ रहना है तो लोगों को समझौता करना पड़ता है।

जीएल सिंघल के बाद राना अयूब की मुलाकात गुजरात एटीएस के पूर्व डायरेक्टर जनरल राजन प्रियदर्शी से हुई। वो बेहद ईमानदार और अपने कर्तव्यों का पालन करने वाले नौकरशाह के तौर पर जाने जाते रहे हैं। दलित समुदाय से आने के चलते व्यवस्था में उन्हें अतिरिक्त परेशानियों का भी सामना करना पड़ा। लेकिन वो अपने पद की गरिमा को हमेशा बनाए रखे। शायद यही वजह है कि वह सरकार के किसी गलत काम का हिस्सा नहीं बने। नतीजतन किसी भी गलत मामले में कानून के शिकंजे में नहीं आए। बातचीत के कुछ अंशः

राजन प्रियदर्शी, पूर्व डायरेक्टर जनरल, एटीएस गुजरात

प्रश्नः आपके मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी गुजरात में बहुत लोकप्रिय हैं?

उत्तरः हां, वो सबको मूर्ख बना लेते हैं और लोग भी मूर्ख बन जाते हैं।

प्रश्नः यहां कानून की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं न? शायद ही कोई अफसर ठीक हो?

उत्तरः बहुत कम ही ऐसे हैं। ये शख्स मुख्यमंत्री पूरे राज्य में मुसलमानों की हत्याओं के लिए जिम्मेदार है।

प्रश्नः जब से मैं यहां आई हूं प्रत्येक व्यक्ति सोहराबुद्दीन एनकाउंटर की बात कर रहा है?

उत्तरः पूरा देश उस एनकाउंटर की बात कर रहा है। मंत्री के इशारे पर सोहराबुद्दीन और तुलसी प्रजापति की हत्या की गई थी। मंत्री अमित शाह वह कभी भी मानवाधिकारों में विश्वास नहीं करता था। वह हम लोगों को बताया करता था कि ‘मैं मानवाधिकार आयोगों में विश्वास नहीं करता हूं’। अब देखिये, अदालत ने भी उसे जमानत दे दी।

प्रश्नः तो आपने उनके (अमित शाह) मातहत कभी काम नहीं किया?

उत्तरः किया था। जब मैं एटीएस का चीफ था।……….एक दिन उसने मुझे अपने बंग्ले पर बुलाया। जब मैं पहुंचा तो उसने कहा ‘अच्छा, आपने एक बंदे को गिरफ्तार किया है ना, जो अभी आया है एटीएस में, उसको मार डालने का है।’ मैंने कोई प्रतिक्रिया नहीं जताई। तब उसने कहा कि ‘ देखो मार डालो, ऐसे आदमी को जीने का कोई हक नहीं है’। उसके बाद मैं सीधे अपने दफ्तर आया और अपने मातहतों की बैठक बुलाई। मुझे इस बात का डर था कि अमित शाह उनमें से किसी को सीधे आदेश देकर उसे मरवा डालेगा। इसलिए मैंने उन्हें बताया कि मुझे गिरफ्तार शख्स को मारने का आदेश दिया गया है। लेकिन कोई उसे छूएगा भी नहीं। उससे केवल पूंछताछ करनी है। मुझसे कहा गया था। लेकिन मैं उस काम को नहीं कर रहा हूं। इसलिए आप लोग भी ऐसा नहीं करेंगे। आपको पता है जब मैं राजकोट का आईजीपी था तब जूनागढ़ के पास सांप्रदायिक दंगे हुए। मैंने कुछ लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की। गृहमंत्री (तब गोर्धन झड़पिया थे) ने मुझे फोन किया और पूछा राजनजी आप कहां हैं? मैंने कहा सर मैं जूनागढ़ में हूं। उसके बाद उन्होंने कहा कि अच्छा तीन नाम लिखिए और इन तीनों को गिरफ्तार कर लीजिए। मैंने कहा कि ये तीनों मेरे साथ बैठे हुए हैं और तीनों मुसलमान हैं और इन्हीं की वजह से हालात सामान्य हुए हैं। यही लोग हैं जिन्होंने हिंदुओं और मुसलमानों को एक दूसरे के करीब लाने का काम किया है। और फिर दंगा खत्म हुआ है। उसके बाद उन्होंने कहा कि देखो सीएम साहिब का आदेश है। तब यही शख्स नरेंद्र मोदी मुख्यमंत्री था। मैंने कहा कि सर मैं ऐसा नहीं कर सकता। भले ही यह सीएम का आदेश ही क्यों न हो। क्योंकि ये तीनों निर्दोष हैं।

प्रश्नः तो क्या यहां की पुलिस मुस्लिम विरोधी है?

उत्तरः नहीं, वास्तव में ये नेता हैं। ऐसे में अगर कोई अफसर उनकी बात नहीं सुनता है तो ये उसे किनारे लगा देते हैं।

प्रश्नः वो व्यक्ति जिसको अमित शाह खत्म करने की बात कहे थे क्या वो मुस्लिम था?

उत्तरः नहीं, नहीं, वो उसको किसी व्यवसायिक लॉबी के दबाव में खत्म कराना चाहते थे।

अशोक नरायन गुजरात के गृह सचिव रहे हैं। 2002 के दंगों के दौरान सूबे के गृह सचिव वही थे। नरायन रिटायर होने के बाद अब गांधीनगर में रहते हैं। वह एक आध्यात्मिक व्यक्ति हैं। साहित्य और धर्मशास्त्र पर उनकी अच्छी पकड़ है। एक कवि होने के साथ ऊर्दू की शेरो-शायरी में भी रुचि रखते हैं। उन्होंने दो किताबें भी लिखी हैं। राना अयूब की अशोक नरायन से दिसंबर 2010 में मुलाकात हुई। इसके साथ ही उन्होंने गुजरात के पूर्व आईबी चीफ जीसी रैगर से भी मुलाकात की थी। पेश है दो विभागों के सबसे बड़े अफसरों से बातचीत के कुछ अंशः

अशोक नरायन, पूर्व गृहसचिव, गुजरात

प्रश्नः मुख्यमंत्री को इतना हमले का निशाना क्यों बनाया गया? ऐसा इसलिए तो नहीं हुआ क्योंकि वो बीजेपी से जुड़े हुए थे?

उत्तरः नहीं, क्योंकि दंगों के दौरान उन्होंने वीएचपी (विश्व हिंदू परिषद) को सहयोग दिया था। उन्होंने ऐसा हिंदू वोट हासिल करने के लिए किया था। जैसा हुआ भी। जो वो चाहते थे वैसा उन्होंने किया और वही हुआ भी।

प्रश्नः क्या उनकी भूमिका पक्षपातपूर्ण नहीं थी? (गोधरा कांड के संदर्भ में)

उत्तरः वो गोधरा की घटना के लिए माफी मांग सकते थे। वो दंगों के लिए माफी मांग सकते थे।

प्रश्नः मुझे बताया गया कि मोदी ने एक पक्षपातपूर्ण भूमिका निभाई थी उन्होंने उकसाने का काम किया था। जैसे कि गोधरा से लाशों को अहमदाबाद लाना। और इसी तरह के कुछ दूसरे फैसले।

उत्तरःमैंने एक बयान दिया था जिसमें मैंने कहा था कि वही एक शख्स हैं जिन्होंने गोधरा ट्रेन कांड की लाशों को अहमदाबाद लाने का फैसला लिया था।

प्रश्नः इसका मतलब है, फिर सरकार आप के खिलाफ हो गई होगी?

उत्तरः देखिए, शवों को अहमदाबाद लाना आग में घी का काम किया। लेकिन वही शख्स हैं जिन्होंने ये फैसला लिया।

प्रश्नः राहुल शर्मा का क्या मामला है?

उत्तरः वो विद्रोहियों में से एक हैं।

प्रश्नः क्या मतलब?

उत्तरः उन्होंने किसी की सहायता नहीं की। वो केवल दंगों को नियंत्रित करना चाहते थे।

प्रश्नः क्या उन्हें भी किनारे लगा दिया गया?

उत्तरः उनका तबादला कर दिया गया। तबादले के खिलाफ डीजीपी के विरोध, चक्रवर्ती के विरोध और इन दोनों की राय से मेरी सहमति के बावजूद ऐसा किया गया।

प्रश्नः सिर्फ इसलिए क्योंकि वो मुख्यमंत्री के खिलाफ गए थे?

उत्तरः निश्चित तौर पर।

प्रश्नः एनकाउंटरों के बारे में आप का क्या कहना है?

उत्तरः एनकाउंटर धार्मिक आधार पर कम राजनीतिक ज्यादा होते हैं। अब सोहराबुद्दीन मामले को लीजिए। वो नेताओं के इशारे पर मारा गया था। उसके चलते अमित शाह जेल में हैं।

जी सी रैगर, पूर्व इंटेलिजेंस हेड, गुजरात

प्रश्नः यहां एनकाउंटरों का क्या मामला है? उस समय आप कहां थे?

उत्तरः मैं कई लोगों में से एक था। एक अपराधी (सोहराबुद्दीन) एक फर्जी एनकाउंटर में मार दिया गया। इसमें सबसे मूर्खतापूर्ण बात ये रही कि उन्होंने उसकी पत्नी को भी मार दिया।

प्रश्नः इसमें कोई मंत्री भी शामिल था?

उत्तरः गृहमंत्री अमित शाह।

प्रश्नः उनके मातहत काम करना बड़ा मुश्किल भरा रहा होगा?

उत्तरः हम उनसे सहमत नहीं थे। हम उनके आदेशों का पालन करने से इनकार कर देते थे। यही वजह है कि एनकाउंटर मामलों में गिरफ्तारी से हम बच गए। यह शख्स (सीएम) बहुत चालाक है। वो हर चीज जानता है। लेकिन एक निश्चित दूरी बनाए रखता है। इसलिए वह इसमें (सोहराबुद्दीन मामले में) नहीं पकड़ा गया।

प्रश्नः मोदी जी से पहले एक मुख्यमंत्री थे केशुभाई पटेल। वो कैसे थे?

उत्तरः मोदी जी की तुलना में वो संत थे। मेरा मतलब है कि केशुभाई जानबूझ कर किसी को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहेंगे। उसका जो भी धर्म हो। कोई मुस्लिम है इसलिए उसे परेशान किया जाएगा। ऐसा नहीं था।

प्रश्नः वास्तव में मैं पीसी पांडे से भी मिली।

उत्तरः ओह, वो पुलिस कमिश्नर थे।

प्रश्नः अच्छा, तो आप दोनों दंगे के दौरान एक साथ काम कर रहे थे?

उत्तरः हां, हमें करना पड़ा। मैं आईबी चीफ था।

प्रश्नः दूसरे जिन ज्यादातर अफसरों से मैं मिली उनका कहना था कि पांडे पर सीएम बहुत भरोसा करते हैं। और दंगों के दौरान अपने सारे काम उन्हीं के जरिये कराये थे?

उत्तरः अब, आपको दंगों के बारे में हर चीज पता ही है। (हंसते हुए) ‘आप जानती हैं ये हरेन पांड्या मामला एक ज्वालामुखी की तरह है। एक बार सच्चाई सामने आने का मतलब है कि मोदी जी को घर जाना पड़ेगा। वो जेल में होंगे’।

हरेन पांड्या हत्याकांड का सच…. तब के गुजरात के डीजीपी के चक्रवर्ती और मुख्यमंत्री के चहते अफसर पीसी पांडे से राना अयूब की बातचीत के कुछ अंशः

के चक्रवर्ती, पूर्व डीजीपी गुजरात

प्रश्नः क्या वो (सीएम मोदी) सत्ता का भूखा है?

उत्तरः हां

प्रश्नः तो क्या प्रत्येक चीज और हर व्यक्ति पर विवाद है वो दंगे हों या कि एनकाउंटर?

उत्तरः हां, हां। एक गृहमंत्री भी गिरफ्तार हुआ था।

प्रश्नः सभी अफसर उसे नापसंद करते थे?

उत्तरः हां, हां। प्रत्येक व्यक्ति उससे नफरत करता था। अमित शाह को बचाने के लिए पूरा संगठित प्रयास किया जा रहा था। इस काम में नरेंद्र मोदी के साथ तब के राज्य सभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली ने 27 सितंबर 2013 को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को एक पत्र लिखा था- “अपनी गिरती लोकप्रियता के चलते कांग्रेस की रणनीति बिल्कुल साफ है। कांग्रेस बीजेपी और नरेंद्र मोदी से राजनीतिक तौर पर नहीं लड़ सकती है। उसको हार सामने दिख रही है। खुफिया एजेंसियों के बेजा इस्तेमाल के जरिये वो गलत तरीके से गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी तब के गृहमंत्री अमित शाह और दूसरे बीजेपी नेताओं को गलत तरीके से फंसाने की कोशिश कर रही है।”

पीसी पांडे, 2002 में पुलिस कमिश्नर, अहमदाबाद, मौजूदा समय में डीजीपी, गुजरात

प्रश्नः लेकिन देखिये, मोदी को मोदी दंगों ने बनाया। यह सही बात है ना?

उत्तरः हां, उसके पहले मोदी को कौन जानता था? मोदी कौन था? वो दिल्ली से आए। उसके पहले हिमाचल में थे। वो हरियाणा और हिमाचल जैसे मामूली प्रदेशों के प्रभारी थे।

प्रश्नः यह उनके लिए ट्रंप कार्ड जैसा था। सही कहा ना?

उत्तरः बिल्कुल ठीक बात….अगर दंगे नहीं होते वो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नहीं जाने जाते। उसने उन्हें मदद पहुंचाई। भले नकारात्मक ही सही। कम से कम उन्हें जाना जाने लगा।

प्रश्नः तो आप इस शख्स को पसंद करते हैं?

उत्तरः मेरा मतलब है हां, इस बात को देखते हुए कि 2002 के दंगों के दौरान मैं उनके साथ था। इसलिए ये ओके है। 

वाई ए शेख, हरेन पांड्या हत्या मामले में मुख्य जांच अधिकारी

प्रश्नःये हरेन पांड्या मामला है क्या?

उत्तरः आप जानती हैं ये हरेन पांड्या मामला एक ज्वालामुखी की तरह है। एक बार सच्चाई सामने आने का मतलब है कि मोदी जी को घर जाना पड़ेगा। वो जेल में होंगे।

प्रश्नः इसका मतलब है कि सीबीआई ने अपनी जांच नहीं की?

उत्तरः उसने केवल मामले को रफा-दफा किया। उसने गुजरात पुलिस अफसरों के पूरे सिद्धांत पर मुहर लगा दी। सीबीआई अफसर सुशील गुप्ता ने गुजरात पुलिस की नकली कहानी पर मुहर लगा दी। गुप्ता ने सीबीआई से इस्तीफा दे दिया। अब वो सुप्रीम कोर्ट में वकालत कर रहे हैं। वो रिलायंस के वेतनभोगी हैं। उनसे पूछिए उन्होंने क्यों सीबीआई से इस्तीफा दिया। वो सुप्रीम कोर्ट में बैठते हैं। उनसे मिलिए।

प्रश्नः क्या ये एक राजनीतिक हत्या है?

उत्तरः प्रत्येक व्यक्ति शामिल था। आडवानी के इशारे पर मामले को सीबीआई के हवाले कर दिया गया था। क्योंकि वो नरेंद्र मोदी के संरक्षक थे। इसलिए उन्हें पाक-साफ साबित करने के लिए सीबीआई का इस्तेमाल किया गया। मेरा मतलब है कि लोग स्थानीय पुलिस की कहानी पर विश्वास नहीं करेंगे। लेकिन सीबीआई की कहानी पर भरोसा कर लेंगे।

प्रश्नः उसमें किसकी भूमिका थी? बारोट या वंजारा?

उत्तरः सभी तीनों की। बारोट कहीं और था और चुदसामा को डेपुटेशन पर ले आया गया था। उन्हें चुदसामा मिल गया था। इस एनकाउंटर में पोरबंदर कनेक्शन भी है। ये एक ब्लाइंड केस है।

प्रश्नः सीबीआई ने इसको क्यों हाथ में लिया?

उत्तरः सीबीआई ने इस केस में मोदी को बचाने का काम किया।

साभारः गुजरात फाइल्स

अनुवाद- महेंद्र मि‍श्र

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सुमंत भट्टाचार्य जी, आपने तो इलाहाबाद विश्वविद्यालय के लंपटों का भी कान काट लिया

Mahendra Mishra : सुमंत भट्टाचार्य जी आपने तो इलाहाबाद विश्वविद्यालय के लंपटों का भी कान काट लिया। उन पर लड़कियों का दुपट्टा खींचने का आरोप लगता था। लेकिन आप ने तो सीधे इंडिया गेट पर बलात्कार की ही दावत दे डाली। इलाहाबाद विश्वविद्याल से पत्रकारिता के रास्ते यहां तक का आपका यह सफर सचमुच काबिलेगौर है। हमारे मित्र रवि पटवाल ने इसे नर से बानर बनने की संज्ञा दी है। लेकिन मुझे लगता है कि यह जानवरों का भी अपमान है। पशु और पक्षियों में नर और मादा के बीच एक दूसरे की इच्छा का सम्मान यौनिक रिश्ते की प्राथमिक शर्त होती है। फ्री सेक्स शब्द सुनते ही आप उतावले हो गए। और बगैर कुछ सोचे समझे मैदान में कूद पड़े।

आखिरकार फ्री सेक्स का मतलब क्या होता है? किसी शब्द का एक अर्थ होता है। उसकी एक परिभाषा होती है। और आप भी राजनीति शास्त्र के विद्यार्थी रहे हैं। पत्रकारिकता आप का पेशा रहा है। ऐसे में शब्दों की अपनी अहमियत और विशिष्टता के बारे में न जानने का कोई कारण नहीं दिखता है। फ्री सेक्स का यह मतलब तो कत्तई नहीं है कि कोई महिला सड़क पर बैठ गई है और मुफ्त में सेक्स बंटने लगा है। और कोई भी कतार में खड़ा हो सकता है। इसका मतलब है किसी भी महिला का अपनी देह पर पहला और आखिरी अधिकार। क्या आप इस अधिकार को नहीं देना चाहते? या फिर आपको इस पर कुछ एतराज है? या फिर सनातनी संस्कृति के नाम पर औरत को अभी भी चाहरदीवारी के भीतर ही कैद किए रखना चाहते हैं? या चाहते हैं कि महिला सब कुछ करे लेकिन रहे मर्दों के अंगूठे के नीचे ही। वही पैर की जूती बन कर।

एपवा की राष्ट्रीय सचिव कविता कृष्णन को संबोधित कर लिखी सार्वजनिक पोस्ट में आप एक वहशी बलात्कारी के रूप में दिखते हैं। उस पोस्ट पर शर्मिंदा होने और उसे वापस लेने की जगह आप कविता पर ही नारी उत्पीड़न की आड़ में भागने का आरोप जड़ देते हैं। कुंठित भक्तों के साथ मिलकर किया गया आपका यह राक्षसी अट्टहास पौराणिक कथाओं की याद दिला देता है। फिर भी निर्लज्ज तरीके से अपनी बात पर अड़े हुए हैं। लेकिन बार-बार पूछने के बाद कहीं भी यह बताने की कोशिश नहीं करते हैं कि फ्री सेक्स से आखिरकार आप क्या मतलब निकालते हैं। सेक्स अगर फ्री नहीं है तो कहने का मतलब फिर वह फोर्स्ड है यानी बलात सेक्स है। तो फिर क्या आप बलात सेक्स के पक्ष में हैं। अगर नहीं तो फिर कोई कैसे फ्री सेक्स के खिलाफ हो सकता है। हां यह बात जरूर है कि फ्री सेक्स से पुरुष बर्चस्व के टूटने का खतरा है। शायद यही बात मर्दों को नहीं पच रही है।

दरअसल संविधान में जितना महिलाओं को अधिकार मिला है आप उतना भी उन्हें देने के लिए राजी नहीं हैं। 18 साल से ऊपर किसी भी लड़की को अपना भविष्य चुनने का अधिकार है। वह किससे शादी करे, किससे न करे और किसके साथ रहे। उसे यह तय करने का अधिकार संविधान देता है। इसमें न तो कहीं मां-बाप आते हैं न ही परिवार के लोग। समाज तो बहुत दूर की बात है। और अब तो सुप्रीम कोर्ट ने लिविंग रिलेशन तक को मान्यता दे दी है। और लड़के-लड़की या महिला-पुरुष बगैर शादी किए एक दूसरे के साथ रह सकते हैं। अपनी मर्जी के मुताबिक। फ्री सेक्स का मतलब है बगैर किसी दबाव के सेक्स। यानी स्त्री और पुरुष अपनी मर्जी और बगैर किसी दबाव के आपसी सहमति से एक दूसरे के साथ यौन संबंध बनाएं। यहां तक कि पति भी अगर पत्नी की बगैर इच्छा के संबंध बनाता है। तो वह बलात्कार की श्रेणी में आता है।

एकबारगी आपके इसी प्रस्ताव को उल्टे तरीके से देखा जाए। कोई महिला होती और वह किसी पुरुष को इंडिया गेट पर इसी तरह से सेक्स करने के लिए आमंत्रित करती। जितने शान और अहंकार के साथ आप इस काम को कर रहे हैं। तब क्या होता? आप उसके बारे में क्या खयाल रखते? अवलन तो शायद ही कोई महिला ऐसा साहस कर पाए। और अगर करती भी तो उसे विक्षिप्त करार दे दिया जाता। आप जैसे लोग उसे तत्काल असभ्य लोगों की कतार में खड़े कर देते। और फिर उसे क्या-क्या गालियां दी जातीं और क्या-क्या कहा जाता। उसकी कल्पना करना मुश्किल है। सामने आने और बहस करने की बात तो दूर समाज में उसका जीना दूभर हो जाता। लेकिन वही सब कुछ करके आप पूरे शान से जी रहे हैं। ऊपर से आपको उम्मीद है कि सनातनी बाड़े में इस महिलामर्दन के लिए आपको पुरस्कृत भी किया जाएगा। इसके बदले में आप को तमाम उच्च खिताबों से नवाजा भी जाएगा। इसके सहारे आप पत्रकारिता में दम तोड़ चुके अपने भविष्य को नया पंख देने का ख्वाब बुन रहे हैं। यही है भारतीय समाज में महिला और पुरुष के बीच का अंतर। अगर आप समझ सकें तो? ऐसे में महिलाओं को लेकर पुरुषों के दिमाग में जमे बहुत सारे कचरे का निकलना अभी बाकी है। देश में बराबरी और सम्मान के अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए महिलाओं को अभी बड़ा लंबा रास्ता तय करना है। लेकिन कविता और उनकी मां जैसी महिलाओं के रहते उम्मीद का यह सफर जरूर छोटा हो जाएगा।

पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट महेंद्र मिश्र के एफबी वॉल से.

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गल्तियां करके भी न सीखने वाले को भारतीय वामपंथ कहा जाता है…

Mahendra Mishra : प्रयोग करने वाले गल्तियां करते हैं। हालांकि उन गल्तियों से वो सीखते भी हैं। लेकिन गल्तियां करके नहीं सीखने वाले को शायद भारतीय वामपंथ कहा जाता है। 1942 हो या कि 1962 या फिर रामो-वामो का दौर या न्यूक्लियर डील पर यूपीए से समर्थन वापसी। घटनाओं का एक लंबा इतिहास है। इन सबसे आगे भारतीय समाज और उसमें होने वाले बदलावों को पकड़ने की समझ और दृष्टि। सभी मौकों पर वामपंथ चूकता रहा है। भारत में वामपंथ पैदा हुआ 1920 में लेकिन अपने पैर पर आज तक नहीं खड़ा हो सका। कभी रूस, तो कभी नेहरू, कभी कांग्रेस, तो कभी मध्यमार्गी दलों की बैसाखी ही उसका सहारा रही।

एक बार फिर जब देश में वामपंथ के लिए नई संभावना और जमीन बनती दिख रही है तो उसे कांग्रेस के चरणों में समर्पित करने की सुगबुगाहट भी शुरू हो गई है। हम बात कर रहे हैं कोलकाता में चलने वाले सीपीएम के प्लेनम की। पांच दिनों तक चलने वाले इस प्लेनम से छनकर जो खबरें आ रही हैं वह बेहद चिंताजनक हैं। 38 साल बाद होने वाले इस प्लेनम में पार्टी मध्यमार्गी दलों के साथ गठबंधन का प्रस्ताव पारित कर सकती है। ऐसा होने के साथ ही कांग्रेस से लेकर दूसरे दलों की सरकारों में पार्टी के शामिल होने का रास्ता साफ हो जाएगा। इतिहास गवाह है जब-जब वामपंथी दलों ने समझौता किया। पाया कम गंवाया ज्यादा। मोर्चे से फायदा लेने के मामले में बीजेपी और वामपंथ में उतना ही अंतर रहा है जितना दोनों के विचारों में है। बीजेपी लगातार आगे बढ़ती गई और वामपंथ अपनी जड़ों से उखड़ता गया। यूपी-बिहार में लालू यादव और मुलायम सिंह उसी जमीन की पैदाइश हैं।

ऐसे दौर में जबकि देश में एक निरंकुश और अधिनायकवादी सरकार है। जो शासन और हालात के मामले में इमरजेंसी को भी मात दे रही है। काम के नाम पर उसके पास कारपोरेट और उच्च वर्ग की सेवा है। देने की जगह उसका हर फैसला जनता से छीनने के लिए होता है। रोजी-रोटी का प्रश्न हो या कि बेरोजगारी, सामाजिक सम्मान हो या कि महिलाओं की इज्जत का सवाल, सामाजिक ताना बाना हो या कि राष्ट्र को एकता में बांधने का सूत्र। हर मोर्चे पर सरकार नाकाम साबित हो रही है। विकल्प के नाम पर एक विखरा विपक्ष है। और कांग्रेस ऐतिहासिक तौर पर कमजोर है। ऐसे में भारतीय राजनीति के इस निर्वात को भरने की जगह अगर कोई बैसाखी की तलाश करता है। तो इससे बड़ी विडंबना कुछ नहीं हो सकती। बिहार में एकता की एक छोटी कोशिश ने वामपंथ को चर्चे में ला दिया।

सीपीएम को भी यह समझना चाहिए कि बीजेपी और संघ से आखिरी लड़ाई सड़क पर ही होगी। किसी जोड़-तोड़ के जरिये उससे पार पाना मुश्किल है। कांग्रेस के साथ एक और समझौते से कुछ मिलने की जगह सीपीएम के सीपीआई बनने का खतरा ज्यादा है। भारतीय वामपंथ चुनावी मोर्चे पर भले कमजोर हो लेकिन राजनीतिक-सामाजिक आधार और संगठन के मामले में इतनी ताकत रखता है कि वह नये सिरे से हलचल पैदा कर सके। ऐसे में उसे वामपंथी एकता के साथ स्वतंत्र पहल का नया संकल्प लेने की जरूरत है। न कि किसी नई बैसाखी की तलाश करने की। क्योंकि उसके पास साख है तो संगठन भी है, सिद्धांत है तो वैचारिक हथियार भी है और इन सबसे आगे देश को राजनीतिक विकल्प की जरूरत है।

हालांकि पार्टी महासचिव सीताराम येचुरी ने सामाजिक नीति को लेकर पार्टी की सोच में कुछ बदलाव के संकेत जरूर दिए हैं। इसे एक बड़ी और जरूरी पहल के तौर पर देखा सकता है। क्योंकि इस देश में वामपंथ की यह सबसे बड़ी कमियों में चिन्हित किया जा सकता है। जिसमें भारतीय समाज और राजनीति की ठोस समझ और उसका सटीक विश्लेषण और फिर उसके मुताबिक कार्यनीति और रणनीति का अभाव रहा है। भारत में जितना आर्थिक सवाल जरूरी है उससे कम सामाजिक मुद्दे नहीं हैं। रोजी-रोटी अगर प्राथमिक है तो सामाजिक सम्मान का सवाल उसकी चौखट पर खड़ा हो जाता है। इस लिहाज से जाति एक बड़ी सच्चाई बनकर सामने आ जाती है। भारतीय समाज और राजनीति के बीच की वह ऐसी गांठ है जिसे खोले बगैर सत्ता का कोई भी सवाल हल होना मुश्किल है। जिस सर्वहारा की तलाश वामपंथ को थी वह भारत में दलितों के तौर पर मौजूद था। लेकिन वर्गों को ढूढने के चक्कर में वामपंथ फैक्टरियों से लेकर इधर-उधर भटकता रहा। भारत में क्रांति का रास्ता किसानों से होकर जाता है। लेकिन स्थापित वामपंथ की प्राथमिकता में वह कभी नहीं रहा।

मार्क्सवाद को समाज-राजनीति और व्यवस्था के सबसे अग्रणी दर्शन के तौर पर जाना जाता रहा है। व्यवस्था की आखिरी पैदाइश मजदूर वर्ग की इस पार्टी से किसी बदलाव को सबसे पहले महसूस करने की अपेक्षा की जाती है। लेकिन एक पूरी सूचना क्रांति सामने से गुजर गई और वामपंथ खड़ा देखता रहा। कहीं थोड़ी जुंबिश भी नहीं दिखी। इस्तेमाल उस पार्टी ने किया जिसे हम समाज की सबसे पिछड़ी, दकियानूस, रुढ़िवादी, आधुनिक और तकनीकी विरोधी करार देते हैं। आखिरी दो मसलों के लिहाज से वामपंथ के लिए ग्राम्सी काफी मददगार साबित हो सकते हैं। उनका आधार और अधिरचना के मामले में अधिरचना के कभी प्राथमिक होने की संभावना का सिद्धांत बेहद कारगर है। भारतीय राजनीति में जाति एक उसी तरह की अधिरचना है। मौजूदा समय में आयी सूचना क्रांति को भी अधिरचना के दायरे में ही परिभाषित किया जा सकता है।

छात्र जीवन में वामपंथी आंदोलनों में नेतृत्वकारी भूमिका में रहे पत्रकार महेंद्र मिश्र के फेसबुक वॉल से.

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जेटली का चाबुक और मीडिया घरानों का घुटने टेकना… : चौथे खंभे का ‘आपरेशन’ शुरू

: इमरजेंसी के विद्याचरण भी पानी मांगे : वित्तमंत्री अरुण जेटली नये प्रयोगकर्ता के तौर पर सामने आए हैं। उन्होंने डीडीसीए में अगर ‘चारा मॉडल’ को आगे बढ़ाया है। तो सूचना प्रसारण मंत्रालय के जरिये ‘लोकतंत्र में इमरजेंसी’ का नया माडल दिया है। जेटली जी ने छह महीने के भीतर ही चौथे खंभे की ऐसी कमर तोड़ी है कि फिर से उठने में उसे सालों लग जाएंगे। यह सब कुछ सरकारी कोड़े से संभव हुआ है। जेटली की चाबुक क्या चली एक-एक कर सारे मीडिया घराने घुटने टेक दिए। विरोध जताने वाले सरकारी कहर का सामना कर रहे हैं। पत्रकारिता का यह हाल उन जेटली साहब ने किया है जो इमरजेंसी की पैदाइश हैं। सरकारी शिकंजा ऐसा है कि संजय गांधी और विद्याचरण शुक्ल की जोड़ी भी शरमाने लगे।

दरअसल प्रकाश जावड़ेकर जब मोदीजी के मंसूबों को परवान नहीं चढ़ा पाए। तो सूचना-प्रसारण मंत्रालय उनसे छीनकर जेटली को सौंप दिया गया। जेटली जी मीडिया प्रबंधन के शातिर बादशाह माने जाते हैं। उनके जीवन की राजनीतिक सफलता में मीडिया का बड़ा हाथ रहा है। हाथ आने के साथ ही उन्होंने देश के चौथे खंभे का ‘आपरेशन’ शुरू कर दिया। और ‘डॉक्टर’ जेटली उसमें पूरी तरह से कामयाब रहे। मजाल क्या कि मीडिया का कोई घराना आज उनके सामने सिर उठा सके। इमरजेंसी के दौरान तो मंत्रालय से बाकायदा आदेश जारी करना पड़ता था। अघोषित इमरजेंसी में सब कुछ मैनेज्ड है। इस काम में उन्हें ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ी। दूरदर्शन समेत सभी सरकारी चैनेल पहले से ही गुलाम थे। लेकिन पूरी गिरफ्त के लिए उसके ऊपर संघ प्रायोजित विवेकानंद फाउंडेशन के ए सूर्यप्रकाश को लाकर बैठा दिया गया। संघ का डंडा काम आया। दूरदर्शन भी संघी सुर में गाने लगा।

दूरदर्शन की ‘निष्पक्षता’ का आलम यह है कि पिछले महीने उसने नेहरू की जयंती तक का प्रसारण नहीं किया। किसी और राजनीतिक खबर की बात तो दूर है। जबकि लोकसभा चैनेल से लेकर सरकार के दूसरे चैनलों में दीन दयाल उपाध्याय की डाक्यूमेंट्री का कई-कई बार प्रसारण हुआ। किसान चैनेल तो हाफ पैंट पहनकर ही पैदा हुआ है। और लोकसभा में सुमित्रा जी की जागीरदारी है। जिन्हें बीते संसद सत्र के आखिरी दिन विपक्ष के खिलाफ की गई अपनी ही टिप्पणी को संसद की कार्यवाही से निकालनी पड़ी थी। निजी चैनलों की बात की जाए इंडिया और जी टीवी संघ के आनुषंगिक संगठनों के विस्तार हैं। भक्ति में एक दूसरे से आगे निकलने की दोनों में होड़ मची है। इंडिया टीवी चैनल के मालिक रजत शर्मा दिल्ली छात्रसंघ में जेटली जी के शागिर्द रहे हैं। और अब सत्ता में आने के बाद दोनों एक दूसरे का पूरा ख्याल रख रहे हैं। अनायास नहीं इंडिया टीवी को दूसरा दूरदर्शन कहा रहा है। कई मामलों में तो वह दूरदर्शन का भी कान काट ले। मौके-मौके पर दोनों एक दूसरे को उपकृत करते रहते हैं।

आईआईएमसी के निदेशक के लिए बनी सर्च कमेटी में मंत्रालय के सचिव और पत्रकार स्वपन दास गुप्ता के अलावा रजत शर्मा भी उसके तीसरे सदस्य थे। ज़ी टीवी का पूरे देश में बड़ा नेटवर्क है। उसके मालिक सुभाष चंद्रा पिछले हरियाणा चुनाव में टिकट की कतार में थे। हालांकि लाख कोशिशों के बाद भी वह कामयाब नहीं हुए। वफादारी दिखाने के लिए उन्होंने लोकसभा चुनाव में मोदी के साथ चुनावी मंच तक में हिस्सेदारी की। लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। भविष्य में कृपा की उम्मीद में उनकी चरण वंदना जारी है। चैनल उसी का पालन कर रहा है। चैनल हेड सुधीर चौधरी के बारे में क्या कहना। पूरा देश उनकी जेलयात्रा और धन उगाही की कहानी को देख-सुन चुका है। इसके बाद बड़े समूहों में आईबीएन-7 का नाम आता है। राजदीप के समय चैनल आंख दिखा रहा था। लिहाजा उसका भी इलाज ढूंढ लिया गया। और चैनल को अंबानी के हाथ में दिलावकर जेब में कर लिया गया। ईटीवी समेत बीसियों चैनेल सरकार की अब मुट्ठी में हैं। एक समय ब्रांड माना जाने वाला यह चैनल अब भक्तों की भजन मंडली बन कर रह गया है।

अंग्रेजी चैनलों में चीखने, चिल्लाने और नाटकीयता के हर प्रदर्शन के बावजूद नेशन वांट्स टू नो को देखने लायक माना जाता था। लेकिन जेटली ने अर्णब गोस्वामी को ड्राइंग रूम में बिरयानी क्या खिलाई। जनाब जेटली के मुरीद हो गए। उनके खिलाफ अब टिकर पर भी खबर चलाने के लिए तैयार नहीं हैं। देखना होगा नमक का कर्ज कब तक उतरता है। बचा आज तक तो वह बाजार का चैनल है। अरुण पुरी बाजार के रुख को अच्छी तरह से पहचानते हैं। उनके पास अंजना ओम कश्यप और राहुल कंवल जैसे भक्त हैं तो राजदीप सरदेसाई और पूण्य प्रसून जैसे खबर से खेलने वाले पत्रकार भी हैं। लेकिन आज तक के लिए अभी वक्त भक्ति का है।

यहां तक कि राजीव शुक्ला का न्यूज-24 अनुराधा प्रसाद के चलते और वर्ल्ड न्यूज़ में तब्दील हो चुका फोकस जिंदल के मुकदमे के जरिये मैनेज कर लिया गया है। अकेला एनडीटीवी है जो रीढ़ दिखाने की हिम्मत कर रहा है। तो बदले में उसे ईडी और फेरा से लेकर फेमा तक की कार्रवाइयों का सामना करना पड़ रहा है। इतना ही नहीं, आईआईएफटी में गजेंद्र चौहान, सेंसर बोर्ड में पहलाज निहलानी और आईआईएमसी में विवेकानंद फाउंडेशन के शिष्य के जी सुरेश की नियुक्ति के जरिये सारी संस्थाओं को सरकार और संघ की सेवा में लगा दिया गया है।

वरिष्ठ पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट महेंद्र मिश्रा के फेसबुक वॉल से.

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बीजेपी महासचिव राम माधव ने मोदी की लाहौर यात्रा पर संघी गोबर डाल दिया

Mahendra Mishra : भारत, पाक और बांग्लादेश एक ही जिगर के टुकड़े हैं। क्रूर हालात ने इन तीनों को एक दूसरे से अलग कर दिया। इनके बीच दोस्ती और मेल-मिलाप हो। एकता और भाईचारा का माहौल बने। अमन और शांति में विश्वास करने वाले किसी शख्स की इससे बड़ी चाहत और क्या हो सकती है । इस दिशा में किसी पहल का स्वागत करने वालों में हम जैसे लाखों लोगों समेत व्यापक जनता सरहद के दोनों तरफ मौजूद है। इसी जज्बे में लोग प्रधानमंत्री मोदी की लाहौर यात्रा का स्वागत भी कर रहे हैं। लेकिन इस यात्रा का क्या यही सच है? शायद नहीं। यह तभी संभव है जब मोदी जी नागपुर को आखिरी प्रणाम कह दें।

अगर कोई आरएसएस को जानता हो। या कि बीजेपी की राजनीति से उसका वास्ता हो। या फिर उसे मोदी की सियासत की परख हो। वह किसी भ्रम में नहीं रह सकता। एक तरफ मंदिर बनाने की तैयारी (सुगबुगाहट ही सही) और दूसरी तरफ पाकिस्तान से दोस्ती की लंबी पारी। दोनों एक साथ नहीं चल सकते। कहते हैं कि विदेश नीति और कुछ नहीं बल्कि घरेलू नीति का ही विस्तार होती है। कम से कम पाकिस्तान के मामले में यह 100 फीसद सच है। दोनों देशों के रिश्ते एक दूसरे की घरेलू राजनीति के साथ मजबूती से जुड़े हैं। विदेश नीति वैसे भी रोज-रोज नहीं बदला करती। यह किसी एक यात्रा या कुछ यात्राओं से तय नहीं होती। यह एक लंबे कूटनीतिक मंथन और रणनीतिक जद्दोजहद का नतीजा होती है। यहां तक कि सरकारें बदल जाती हैं लेकिन विदेश नीति नहीं बदलती। ऐसे में मोदी जी की लाहौर यात्रा का क्या मतलब निकाला जाए। यह एक बड़ा सवाल है। पहली बात तो यह यात्रा भले अचानक हुई है। लेकिन इसके पीछे अपने तरह की एक कूटनीति भी काम कर रही है। जो पूरी सोची और समझी है। हालांकि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि इस यात्रा का एक तात्कालिक बड़ा कारण लोगों का ध्यान जेटली प्रकरण से हटाना है।

इस यात्रा को एक दूसरे नजरिये से समझा जाए तो शायद समझना ज्यादा आसान होगा। घरेलू मोर्चे पर जिस तरह से मोदी साहब जनता को कुछ नहीं देना चाहते। बल्कि उल्टा पिछले 65 सालों में जो कुछ मिला था उसे छीना जा रहा है। लेकिन सरकार है कि उसे जनता के लिए कुछ करते दिखना भी चाहिए। इस लाज में मोदी जी ने स्वच्छता अभियान और जनधन योजना जैसे कुछ लॉलीपॉप खोज लिए। लेकिन अब लोग भी नहीं समझ पा रहे हैं कि इस झुनझुने को लेकर वो हंसे कि रोएं। ठीक इसी तर्ज पर मोदी का पाकिस्तान के साथ रिश्ता भी है। जिसमें रिश्ते को ठीक करते हुए दिखना मजबूरी है। इसीलिए इसमें अनौपचारिकताएं ज्यादा हैं योजनाबद्ध काम कम। यात्राएं ज्यादा हैं ठहराव कम। मुलाकातें ज्यादा हैं समस्याओं पर बातें कम। इस तरह के रिश्तों के अपने फायदे हैं। गहरी जड़ न पकड़ने के चलते जब चाहे उन्हें तोड़ा जा सकता है। सचिव स्तर की वार्ता को हुर्रियत नेताओं के पाक उच्चायुक्त से मिलने के चलते रद्द कर दिया गया था।

रिश्ते गहरे हों और आपस में विश्वास हो तो उसके लिए मिलना जरूरी नहीं होता। अगर कोई रिश्ते को गहराई की तरफ नहीं ले जाना चाहता तो उसकी मंशा पर सवाल उठना लाजमी है। पिछले डेढ़ सालों के मोदी शासन का विश्लेषण पाकिस्तान के संदर्भ में करने पर निष्कर्ष उसी तरफ ले जाएगा। इस बीच मोदी और नवाज के बीच तीन मुलाकातें हो चुकी हैं। पहली मोदी जी के शपथ ग्रहण समारोह के दौरान। दूसरी पेरिस में जलवायु सम्मेलन के मौके पर। और अब एक महीने के भीतर यह तीसरी मुलाकात हुई है। लेकिन नतीजा सिफर है। न ही कोई जमीनी तैयारी। न ही कोई भविष्य की रणनीति और सोच। बस ऊपर-ऊपर माहौल। विदेश नीति इतनी लचर रस्सी पर नहीं चलती है। किसी भी रिश्ते की अनिश्चितता उसकी कमजोरी की प्रतीत होती है।

दरअसल मोदी साहब को लंबा रास्ता तय भी नहीं करना है। इसलिए उन्हें किसी जमीन और गहराई की जरूरत भी नहीं है। और आसमानी तौर पर कूद-फांद कर रिश्ते की औपचारिकता पूरी भर कर लेनी है। यह और कुछ नहीं बल्कि मोदी की विदेश नीति का टुटपुजियापन है। क्योंकि जिस पार्टी और सरकार की राजनीति मुस्लिम और पाकिस्तान विरोध पर टिकी हो। उससे किसी लंबे समय के लिए पाकिस्तान के साथ दोस्ती की आशा करना महज एक ख्वाब ही हो सकता है। या तो आरएसएस के अस्तित्व को खत्म मान लिया जाए। या फिर बीजेपी की राजनीति बदल गई है। शायद ही कोई राजनीतिक विश्लेषक अभी इस नतीजे पर पहुंचा हो।

रिश्तों का बीज अभी पड़ा भी नहीं कि संघी फावड़ा सक्रिय हो गया। अनायास नहीं बीजेपी महासचिव और संघ के प्रिय राम माधव ने लाहौर यात्रा पर संघी गोबर डाल दिया। उन्होंने भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश की एकता का पुराना राग अलापा है जिसमें भगवा ध्वज के नीचे अखंड भारत के निर्माण की बात शामिल है। अब अगर नवाज शरीफ चाहें भी तो क्या पाकिस्तान की जनता और विपक्ष उनको आगे बढ़ने देगा? ऊपर से अलजजीरा चैनल के साथ बहस में उन्होंने एंकर को आईएसआईएस का एजेंट तक करार दे दिया। सत्ताधारी पार्टी के किसी वरिष्ठ नेता से क्या ऐसी उम्मीद की जा सकती है? अगर यह मोदी जी की विदेश यात्राओं के सूत्रधार का पाकिस्तान को लेकर रवैया है। तो ऐसे में यह डगर कितनी आगे बढ़ेगी अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। नहीं तो भारत-पाक रिश्ते में विदेश मंत्रालय, सुषमा स्वराज और सरकार के किसी व्यक्ति से ज्यादा राम माधव क्यों रुचि ले रहे हैं। या फिर मोदी साहब उनसे इसके लिए मांफी मांगने के लिए कहेंगे?

खुदा ना खाश्ता रिश्तों की डोर किन्हीं परिस्थितियों में टूटी तो कहने के लिए मोदी साहब और उनके समर्थकों के पास अब बहुत कुछ रहेगा। मसलन उन्होंने रिश्तों को बढ़ाने का बहुत प्रयास किया। लेकिन पाकिस्तान नहीं सुधर सकता। उसे डंडे की ही भाषा समझ में आती है। अब क्या चाहते हैं कि मोदी जी जाकर नवाज शरीफ का तलवा चाटें आदि..आदि। इसके साथ ही पाकिस्तान से दोस्ती की हिमायत करने वालों के भी मुंह बंद कर दिए जाएंगे।

लेखक महेंद्र मिश्रा सोशल एक्टिविस्ट और प्रखर जर्नलिस्ट हैं. उनका यह लिखा उनके फेसबुक वॉल से लिया गया है. महेंद्र इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पढ़े लिखे हैं और कई न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर कार्य कर चुके हैं.

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महिला वीडियो जर्नलिस्ट ने टांग मारकर शरणार्थियों को गिराया, चैनल ने नौकरी से निकाला

एक न्यूज चैनल की महिला वीडियो जर्नलिस्ट पेत्रा लैज्लो ने एक शरणार्थी को टांग मार कर गिरा दिया. इस ओछी हरकत पर उसे अपनी नौकरी गंवानी पड़ी. कैमरा पकड़े नीली जैकेट में महिला पत्रकार की यह शर्मनाक हरकत इंटरनेट पर वायरल हो रही है. एन1टीवी चैनल की कैमरा वुमैन पेत्रा लैज्लो पुलिस से बच कर भाग रहे शरणार्थियों के एक समूह का वीडियो अपने कैमरे से शूट कर रही थीं. जब उसने एक आदमी को टांग अड़ा दी तो वह लडखड़़ाता हुआ गिर गया.

पेत्रा के जानबूझ कर लात मारने से वह आदमी मुंह के बल अपने बेटे के ऊपर गिर गया. वह आदमी अपने बेटे को गोद में उठाए हुए भाग रह था. मासूम बेटे के साथ धरती पर जा गिरा मजबूर शरणार्थी मुड़कर पेत्रा पर चिल्लाया लेकिन वह बेशर्मी से वीडियो बनाती रही. केवल इतना ही नहीं, उसने दूसरे शरणार्थियों को भी लात मार कर गिराने की कोशिश की जिनमें एक छोटी सी बच्ची भी शामिल थी. इसी वजह से बिना किसी देरी के चैनल ने उस महिला को नौकरी से निकाल दिया. ट्विटर पर भी उसके खिलाफ लोगों ने अपना गुस्सा दिखाया है और उसे जेल भेजने की मांग कर रहे हैं.  

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