खुला पत्र : अखिलेश यादव जी, अवाम की नज़र में आपकी छवि एक कायर नेता की हो गई है

माननीय मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव जी के नाम खुला पत्र…..

समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याघ्र,

जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध…

माननीय मुख्यमंत्री जी, आज दैनिक अमर उजाला में आपका एक वक्तव्य पढ़ा आपने एक कार्यक्रम दौरान अपने संबोधन में कहा है कि…”हम वैसे ही काम कर रहे हैं जैसे गार्जियन की इच्छा”… अखिलेश जी, 2017 में अगर उत्तर-प्रदेश में फ़ासिस्ट ताक़तों की फिरकापरस्त हुक़ूमत मुसल्लत हुयी और उत्तर-प्रदेश की सेक्युलर अवाम को फ़िरक़ा परस्तो के हाथों में सौपा गया तो जितनी ज़िम्मेदारी आपके चाचा शिवपाल जी,आपके पिता जी मुलायम सिंह यादव जी की होगी उससे कहीं बढ़कर इसके ज़िम्मेदार आप ख़ुद होंगे।सिर्फ ये कहने भर से की जैसे बड़ो की मर्ज़ी…से आप अपने दामन को नहीं बचा सकते।

उत्तर-प्रदेश की अवाम ने आपको अपना नेता माना तो अवाम आपसे ये तवक़्क़ो भी रखती है कि विपरीत परिस्तिथि में आपको कठोर क़दम उठाना चाहिये था,हक़ और बातिल की जंग में हक़ परस्ती का क़ायदा बन कर उभारना चाहिये था,आप सिर्फ अब नेता जी के बेटे नहीं,शिवपाल चाचा के भतीजे ही नहीं बल्कि 4.5 करोड़ की आबादी के सरपरस्त भी हैं,आप न तो अच्छे बेटे ही साबित हो पाए और न ही अच्छे सरपरस्त…या तो आपको अपने परिवार के आगे बिलकुल हथियार डाल देने चाहिये थे और चुपचाप पद से इस्तीफा दे कर वापस ऑस्ट्रिलिया चले जाना चाहिये था ताकि कम से कम एक आदर्शवादी बेटे की छवि तो बनी रहती आपकी…

फिर अगर अवाम का क़ायद बनने का जज़्बा वाक़ई आपके दिल में था तो ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आपको अपनी आवाज़ बुलंद करते हुये खड़े हो जाना चाहिये था।अखिलेश जी ये जम्हूरी निज़ाम है यहाँ दोनों हाथ में लड्डू नहीं चलते, अवाम को इतना भी बड़ा बेवक़ूफ़ मत समझीये की वो आपको इतनी आसानी से माफ़ कर देगी वो भी तब की जब अवाम हर कदम पर हर फैसले में आपके साथ शाना ब शाना खड़ी हुई, बुज़ुर्गों की दुआ आपके साथ,नोवजवां का खून आपके साथ,बच्चो का प्यार आपके साथ… और क्या चाहिये था आपको साहब…मगर आपको डर सता रहा था अपना इख़्तेदार जाने का, आप डर गए फैसला लेने से.

मौजूदा वक़्त में अवाम की नज़र में आपकी हैसियत अब सिर्फ एक कायर नेता की बची है जिसको हमेशा कुर्सी जाने का डर सताता रहा…मुस्लिम वोटों पर हुक़ूमत में आप आये तो आपको थोड़ा तारीख़े इस्लाम भी पड़ना चाहिये था…अगर मेरे हुसैन ज़ालिम के हाथ पर बैत कर जाते तो आज इस्लाम का वुजूद न होता…और इस वक़्त आपकी कारगर्दगी बता रही है कि आपमें वो जज़्बा इच्छाशक्ति नहीं है कि ज़ुल्म के ख़िलाफ़ परचम बुलंद कर पाएं और इतिहास में अमर हो जाएं,आपकी कायरता ये बयां कर रही है कि आप कितना भी विकास पुरुष होने का डंका पीट लें मगर अब अवाम की नज़र में आप कायर पुरुष ही हैं…

अखिलेश जी, संघर्ष की कोख से नायक जन्म लेता है और अब आप नायक नहीं खलनायक बन कर सामने आये हैं…न तारीख माफ़ करेगी, आपको और न अवाम… अखिलेश जी, आप सियासत में हारे हुए उस राज कुमार की तरह नज़र आरहे हैं जिसके सामने शतरंज की सारी बिसात पलट गयी और राजकुमार अपनी बारी का ही इंतेज़ार करता रहा… अखिलेश जी, इतिहास “बारी” को न लिखता है न याद करता है, इतिहास हमेशा फैसले को मान्यता देता है…

डॉ. एस. ई. हुदा
नेशनल कन्वेनर
हुदैबिया कमेटी
बरेली

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टर्मिनेट किए जाने के बाद IIMC के शिक्षक नरेंद्र सिंह राव ने डीजी केजी सुरेश को लिखा खुला पत्र

My Open Letter to the Director General, IIMC

To

Mr KG Suresh
The Director General
Indian Institute of Mass Communication
JNU New Campus, New Delhi-67

Dated: December 25, 2016

Dear Mr. KG Suresh,

I, Narendra Singh Rao, so far, had been teaching in a full-time basis as Academic Associate at the Indian Institute of Mass Communication, (IIMC), New Delhi, since August 2010. I am in receipt of the office order F.No.I/Consultancy/ 2012 dated 21stDecember, 2016 (mailed to me on the evening of 22nd December, 2016) “terminating my services with immediate effect without assigning any reason”.

I can well understand why you have decided to terminate my six-and-a-half years long continuous services in such an abject and callous manner at a time when I was officially on medical leave as I was suffering from acute headache and fluctuating blood pressure due to a month long continuous and brute harassment, and gross victimization thrust upon me by the illegally and-newly appointed Course Director of the department of Ad/PR, Ms. Surbhi Dahiya, about which I had filed a complaint with you via e-mail dated December 18, 2016.  And, in turn, in order to protect the victimizer and harasser, Ms. Surbhi Dahiya, you have terminated my services without any reason. I could never imagine the institute I had been serving for so long with all honesty and integrity would be sacking me in such a crude and medieval manner, wherein, I, the complainant, have been sacked from my job undemocratically and illegally just because I dared to file a complaint against harassment and victimization.   

Essentially, your decision of terminating my services in such a ruthless and illegal manner clearly reflects the spirit of vendetta which motivated you to ‘punish’ and victimize me as I had raised my voice against a number of atrocities being committed against vulnerable people in the campus, which include the recent illegal sacking of 25 Dalit safai karmacharis, constant victimization of a Dalit rape survivor, harassment of  a Muslim student, who was forced to contemplate suicide, by the reactionary and brahmanical forces of IIMC nurtured and supported by you, the illegal appointment of Course Director of Ad/PR, Ms. Surbhi Dahiya (who does not even have basic qualification or experience in Ad/PR and has been rejected for the lectureship in the department as recently as 2013), pressure tactics used by your administration to force a female student to withdraw the case of cyber-sexual harassment, rampant attempts being made to saffronise the media education and ethos in the campus (wherein only journalists with Right-wing, Hindutva/RSS leanings are invited for special lectures), rampant contractualization and bureaucratization of academics, and many other such issues on which I took pro-democracy, secular and pro-academic positions which were not in sync with your personal and  political agenda.

I am proud of the fact that I could live by my lifelong ideals of equality, liberalism, fraternity, secularism and social justice, and did not compromise even for the sake of saving my job. You can surely remove me from my job, but you shall never be able to remove the imprints of intellect I have left on the young minds through more than 500 classroom lectures and tutorials I have delivered during my teaching career at IIMC in the last six-and-a half years during which I was promoted three times for my teaching skills and academic contribution to the institute.

The past tells us about where the people who stand by their ideals of social justice, democratic, liberalism, and academic excellence go down in history. History never forgets and forgives people like you who undemocratically and illegally snatch away jobs from dissenting voices in order to fulfill their petty personal and political agenda. The world is full of dissenting voices which speak against all kinds of injustices, atrocities and oppressions, come what may. You can never scare them by snatching away their jobs. For me, this ‘punishment’ given by you is a badge of honour which I will wear with pride all my life. It reassures my faith in myself that I am a man of integrity who believed in academic excellence, and who refused to compromise in the face of direct assaults by communal-fascist forces and the tyranny of crass mediocrity.

If you are terminating my services for my unshakable and non-negotiable faith in humanistic ideals and academic freedom, I, without any qualms, accept your decision; and, thereby, pledge to fight back with all vigour and legal means.     

Sincerely,

Narendra Singh Rao
IIMC, New Delhi
December 25, 2016

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केजरीवाल की तानाशाही के खिलाफ मयंक गांधी ने किया विद्रोह, पढ़िए कार्यकर्ताओं के नाम लिखी उनकी खुली चिट्ठी

प्रिय कार्यकर्ताओं,

मैं माफी चाहता हूं कि राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में कल जो कुछ हुआ उसे बाहर किसी को न बताने के निर्देशों को तोड़ रहा हूं। वैसे मैं पार्टी का एक अनुशासित सिपाही हूं। 2011 में जब अरविंद केजरीवाल लोकपाल के लिए बनी ज्वाइंट ड्राफ्ट कमेटी की बैठक से बाहर आते थे तो कहते थे कि कपिल सिब्बल ने उनसे कहा है कि बैठक में जो कुछ हुआ उसे वो बाहर न बताएं। लेकिन अरविंद कहते थे कि ये उनका कर्तव्य है कि वे देश को बैठक की कार्यवाही के बारे में बताएं क्योंकि वो कोई नेता नहीं थे बल्कि लोगों के प्रतिनिधि थे। अरविंद ने जो कुछ किया वो वास्तव में सत्य और पारदर्शिता थी।

राष्ट्रीय कार्यकारिणी में मेरी मौजूदगी कार्यकर्ताओं के प्रतिनिधि के तौर पर ही है और मैं ईमानदार नहीं होऊंगा अगर मैं ये निर्देश मानता हूं। कार्यकर्ताओं को किसी समीकरण से नहीं हटाया जा सकता। वे पार्टी के स्रोत हैं। उन्हें सेलेक्टिव लीक और छिटपुट बयानों से जानकारी मिले, इसकी बजाय मैंने फैसला किया है कि मैं मीटिंग का तथ्यात्मक ब्योरा सार्वजनिक करूंगा।

पिछली रात मुझसे कहा गया कि अगर मैंने कुछ भी खुलासा किया तो मेरे खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी। अब जो हो, मेरी पहली निष्ठा सत्य के प्रति है। यहां योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण की बर्खास्तगी के संबंध में मीटिंग के तथ्य दिए जा रहे हैं। मैं राष्ट्रीय कार्यकारिणी से निवेदन करूंगा कि मीटिंग के मिनिट्स रिलीज किए जाएं।

संक्षिप्त पृष्ठभूमि
दिल्ली के चुनाव प्रचार के दौरान प्रशांत भूषण ने कई बार धमकी दी कि वे पार्टी के खिलाफ प्रेस कॉन्फ्रेंस करेंगे क्योंकि उन्हें उम्मीदवारों के चयन पर कुछ आपत्ति थी। हममें से कुछ किसी तरह इस मुद्दे को चुनाव तक शांत रखने में सफल रहे। आरोप था कि योगेंद्र यादव अरविंद केजरीवाल के खिलाफ साजिश कर रहे हैं और इसके कुछ सबूत भी रखे गए। अरविंद केजरीवाल और प्रशांत भूषण व योगेंद्र यादव के बीच मतभेद सुलझने की हद से बाहर चले गए और उनके बीच विश्वास का संकट था। 26 फरवरी की रात जब राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य उनसे मिलना चाहते थे, अरविंद ने ये संदेश दिया कि अगर ये दो सदस्य पीएसी में रहेंगे तो वो संयोजक के तौर पर कार्य नहीं कर पाएंगे। 4 मार्च को हुई राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक की यही पृष्ठभूमि थी।

राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक
योगेंद्र यादव ने कहा कि वो समझ सकते हैं कि अरविंद उन्हें पीएसी में नहीं देखना चाहते, चूंकि अरविंद के लिए उनके साथ काम करना मुश्किल है इसलिए वो और प्रशांत पीएसी से बाहर रहेंगे लेकिन उन्हें बाहर नहीं किया जाना चाहिए। ऐसे में दो फॉर्मूले उनके द्वारा पेश किए गए।

-पीएसी का पुनर्गठन हो और नए सदस्य चुने जाएं। इसके लिए होने वाले चुनाव में प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव अपनी उम्मीदवारी पेश नहीं करेंगे।
-पीएसी अपने वर्तमान रूप में ही काम करती रहे और योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण मीटिंग में हिस्सा नहीं लेंगे।

मीटिंग कुछ समय के लिए रुक गई और मनीष व अन्य सदस्यों ने दिल्ली टीम के आशीष खेतान, आशुतोष, दिलीप पांडेय और अन्य से मशविरा किया। इसके बाद मनीष ने योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण की बर्खास्तगी का प्रस्ताव रखा। संजय सिंह ने इसका समर्थन किया। मैं इन दो कारणों की वजह से वोटिंग से बाहर रहा।

-अरविंद पीएसी में अच्छे से काम कर सकें इसके लिए मैं इस बात से सहमत हूं कि प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव पीएसी से बाहर रह सकते हैं और कुछ दूसरी महत्वपूर्ण भूमिका ले सकते हैं।
-मैं उन्हें सार्वजनिक रूप से बाहर रखने के प्रस्ताव के विरोध में था खासकर तब जब कि वे खुद अलग होना चाहते थे। इसके अलावा उन्हें हटाने का ये फैसला दुनिया भर के कार्यकर्ताओं की भावनाओं के खिलाफ है।

यानी, मैं उनके पीएसी से बाहर जाने से सहमत था लेकिन जिस तरह से और जिस भावना से ये प्रस्ताव लाया गया वो अस्वीकार्य था। इसलिए मैंने गैरहाजिर रहने का निर्णय लिया। दूसरी जानकारियां मीटिंग के मिनट्स जारी होने पर बाहर आ सकती हैं।

ये कोई विद्रोह नहीं है और न ही पब्लिसिटी का कदम है। मैं प्रेस में नहीं जाऊंगा। मेरे इस कदम के चलते मेरे खिलाफ प्रत्यक्ष या परोक्ष कार्रवाई हो सकती है, तो ऐसा हो जाए।

जय हिंद

मयंक गांधी


मूल पत्र अंग्रेजी में है जिसे मयंक गांधी ने अपने ब्लाग पर अपलोड किया हुआ है… मूल पत्र को यहां भी दिया जा रहा है…

Dear Volunteers,

I am extremely sorry that I am breaking the diktat of not speaking to anyone outside on what transpired in the National Executive meeting, yesterday. Generally, I am a disciplined soldier of the party.

Arvind used to say that when they were coming out of the joint draft committee meeting of the Lokpal in 2011, Kapil Sibal used to ask them not to reveal anything to the outside world. Arvind used to answer that it was his primary duty to inform the nation about the proceedings, as he was not a leader but a representative of the people. Truth and transparency was all that he had.

My presence in the National Executive is only as a representative of the volunteers. And I would be dishonest to accept the gag order. The volunteers cannot be removed from the equation; they are the source of the party. Rather than get information from selective leaks and stray statements, I have decided to give some factual details of the meeting in the public domain.

Last night I was told that disciplinary action would be taken against me, if I revealed anything. So be it – my first allegiance is to the higher truth. Here is an essence of the meeting with regards to removal of YY and PB, based on my understanding. I would request NE to release the minutes of the meeting.

Short background
During the Delhi campaign, Prashant Bhushan had threatened multiple times that he will hold press conference against the party, because of his concerns on candidate selection. Some of us were successful in somehow or other to stave off the threat till the elections. It was alleged that Yogendra Yadav was conspiring against Arvind and some evidences were produced. There were also operational irreconcilable differences and trust deficit between AK, PB and YY

On 26th Feb night when members of the NE went to meet him, Arvind conveyed that he will not be able to work as Convenor, if these two members were part of the PAC. That was the background of the NE on 4th March.

NE meeting
Yogendra said that he understood that Arvind did not want them in PAC, as it was difficult to him to work together. He and Prashant would be happy to stay out of PAC, but they should not be singled out. Two formulas were put forward by him.

· That the PAC be reconstituted and new PAC members be elected through voting. PB and YY will not put their candidature.

· That PAC continue to function in the present form and YY and PB would not attend any of the meetings.

The meeting broke for some time and Manish and others conferred with the Delhi team of Ashish Khetan, Asutosh, Dilip Pandey and others. After reassembling, Manish proposed a resolution that YY and PB be removed from the PAC and it was seconded by Sanjay Singh.

I abstained to vote, because of two contrary reasons

1. Arvind needs a smooth working in the PAC. So, I agreed that PB and YY may be out of PAC and take some alternate important roles.

2. I was taken aback by the resolution of removing them publicly, especially as they themselves were willing to leave.Also, this decision to sack them was against the overwhelming sentiments of volunteers from all over the world.

So, while I agreed that they can step down from the PAC, the manner and intention behind the resolution was not acceptable. Hence, the decision to abstain.

The other details may come when the minutes of meeting is released.

This is not a revolt, nor is this some publicity ploy. I will not go to the press. There may be some repercussions overt and covert against me. So be it.

Jai Hind

Love

Mayank Gandhi


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xxx

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‘टाइम्स नाऊ’ चैनल का बॉयकाट होगा, सोशल एक्टिविस्टस की तरफ से अरनब गोस्वामी को खुला पत्र

Dear Mr Arnab Goswami,

We, the undersigned, who have on many occasions participated in the 9:00 p.m. News Hour programme on Times Now, anchored by you, wish to raise concerns about the shrinking space in this programme for reasoned debate and the manner in which it has been used to demonize people’s movements and civil liberties activists.

On 17th  and 18th February 2015, in the News Hour show , a section of activists were invited to contribute to the debate on the “offloading” of Greenpeace representative Priya Pillai. Right from the start, the activists were denied the right to articulate their views. Not only were their mikes at times muted, they were repeatedly heckled and subjected to hate speech, with you, as the anchor, encouraging, even orchestrating and amplifying these responses.

We would like to make it clear here that the point to note is not our personal hurt, humiliation or the lack of respect shown to us from the other panelists, the anchor, or the channel. We also recognize that combative questions could be put to us when we participate in such a programme and that people may express their disagreements in a heated manner.

But we do object, and take serious exception, to the repeated branding of activists as ‘anti-national’ or ‘unpatriotic’ – words that are terms of abuse and hate-speech, and that can, when repeated ad nauseam in an influential media space, have serious repercussions. Rights activists, public figures and defendants in legal cases have been subjected to hate crimes, and even killed, in the country.

The media, which has a duty to conduct itself responsibly, cannot be allowed to aggravate the vulnerability of human rights activists, who are already being targeted, vilified and demonized, by the state and other vested and dominant interests.

We are aware that on earlier occasions, too, many other guests at the News Hour studios have also been subjected to similar treatment by anchors like you or your colleagues. In the process, debates and discussions on important subjects of national import have been reduced to a one-sided harangue, with differing and dissenting voices being deliberately stifled. Loose allegations have been made about them, aspersions cast on their motives, and insinuations made about their patriotism, with all obligations of the media to conduct  themselves in a neutral, fair and accurate manner being flung to the winds.

Our objection is not restricted to the occasions when activists have been subjected to this treatment. We find it equally objectionable when guests with points of view opposed to our own, are at the receiving end. We seek media space for rational presentation of arguments – our own as well as those whom we may disagree with, not for endorsement of our points of view by the media.

We believe it is important to seek transparency and accountability from the media. We are concerned when journalistic ethics outlined by the National Broadcasting Authority are willfully and habitually violated. We would like to cite here relevant portions of the Code of Ethics issued by the NBA.

    “News shall not be selected or designed to promote any particular belief, opinion or desires of any interest group….

    “Broadcasters shall ensure a full and fair presentation of news as the same is the fundamental responsibility of each news channel. Realizing the importance of presenting all points of view in a democracy, the broadcasters should, therefore, take responsibility in ensuring that controversial subjects are fairly presented, with time being allotted fairly to each point of view….

    “TV News channels must provide for neutrality by offering equality for all affected parties, players and actors in any dispute or conflict to present their point of view. Though neutrality does not always come down to giving equal space to all sides (news channels shall strive to give main view points of the main parties) news channels must strive to ensure that allegations are not portrayed as fact and charges are not conveyed as an act of guilt.”

    “… avoid… broadcasting content that is malicious, biased, regressive, knowingly inaccurate, hurtful, misleading….”

The television shows cited here were designed to canvas certain views held by the Government and the Intelligence Bureau and appeared as a platform for the public heckling and jeering of the activists involved, not just by other panelists but by the  anchor himself. Far from maintaining neutrality and professionalism, you as the anchor were blatantly and aggressively opinionated, and never once provided the space for guests, whose views differed with yours, to voice their own opinions without continuous interruption and heckling. Apart from the fact that a fair allotment of time to them was never made, never once did you as the anchor consider the legitimate questions they raised as worthy of a response.

Not surprisingly then, an opportunity to question the accusations raised by the Government was not allowed. Instead, Government allegations were presented as self-evident facts by you as the anchor. You went on to claim that you had the ‘facts’ to prove the ‘anti-national’ character of one organization in particular and activists in general. While the responses of the activists on these panel were deliberately distorted, you as the anchor insinuated baselessly that the said activists were employing ‘hackers’, and that they had ‘deposed against India’.

We know that a similar scenario has been played out on many other occasions on the Newshour. The label ‘anti-national’ is attributed to invited guests without any basis in fact or law, as a term of abuse and hate-speech. Similar terms, used as forms of hate-speech, include, ‘Naxal’, ‘terrorist’, ‘terrorist sympathiser’.

It is inappropriate and irresponsible for channels to label anyone as ‘nationalist’ or ‘anti-national’ or ‘terrorist’ or the like. If panelists indulge in such terms, it is in fact the duty of the anchor to rein them in, and to ensure that such loaded and provocative words are not used to drown out the substantive points of the discussion or disagreement.

For moderators of the debate to allow such terms to be hurled at participants, and in fact to endorse and repeat such terms, is a gross abuse of the media’s immense power.

On one previous Newshour show on sexual violence in December 2013, intended ironically to mark the first anniversary of the ‘Nirbhaya’ rape, a prominent panelist on your programme repeatedly shouted that the two feminists on the panel were ‘Naxals who believed in free sex’. As such, the words ‘Naxalite’ and ‘free sex’ need not be pejorative. All sex should indeed be free. But in this case the terms were used as tools of abuse, equivalent to ‘terrorist’ and ‘slut’, in order to detract from reasoned argument.

Surely, even debates involving  panelists’ views on, or association with, the Naxalite movement in India, have to be conducted fairly and reasonably, without allowing the term ‘Naxal’ to be used as a form of abuse or to heckle a participant. Surely, even if participants and guests support self-determination in Kashmir; or are representatives of another country; or hold an abolitionist view on the death penalty; a news channel inviting them to express their views has the obligation to allow them to do so without being branded as ‘terrorists’ or ‘anti-nationals.’ If the Government can have talks with organisations who hold these opinions, or with leaders of these countries, they are surely entitled to be heard on national television with a modicum of dignity?

In protest against the vilification of activists and dissenting opinions, and the violation of the basic norms of professionalism, neutrality, reasonableness and fairness, we have for the present decided to stay away from Times Now debates. The purpose of this gesture of protest is to demand accountability of the television media, including Times Now, to the norms outlined by the NBA’s Code of Ethics. We take this step as an effort to promote public debate and a responsible engagement with opposing ideas and stances in order to deepen democracy.

Sincerely,

Vrinda Grover – Lawyer, Supreme Court of India

Sudha Ramalingam, Lawyer, Madras High Court and Civil liberties Activist

Pamela Philipose, Feminist and Senior Journalist

Aruna Roy, Right to Information, NREGA and Democratic Rights Activist

Anjali Bharadwaj, Right to Information Activist

Kavita Krishnan, Women’s movement and Left Activist

Kavita Srivastava, Women’s movement and Civil Liberties activist

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चैनल वन से बकाया सेलरी के लिए लड़ रहे एक मीडियाकर्मी का खुला पत्र

संपादक, भड़ास4मीडिया, सादर प्रणाम, मैं भड़ास4 मीडिया का एक नियमित पाठक हूं. आप लोगों ने ना जाने कितनी बार हम पत्रकार लोगों के साथ जो अन्याय कभी हुआ है उसके खिलाफ कदम से कदम मिला कर साथ दिया है, उसके लिए तहे दिल से शुक्रिया अदा करना चाहूंगा. मैं आपको अपने साथ जो अन्याय हुआ है उसके बारे में अवगत कराना चाहूंगा. आशा करता हूं कि आप इसे प्रमुखता से छापकर मेरे जैसे ना जाने कितने लोगों को फर्जी स्टिंग, ब्लैकमेलिंग और कर्मचारियों का शोषण करने वाले इस बदनाम प्रवृति के न्यूज चैनल ‘चैनल वन’ से सावधान कर उनका सही दिशा में मार्ग दर्शन कर सकते हैं. 

महोदय

जिस चैनल की तुच्छ मानसिकता और घटियापन के बारे में जिक्र करने वाला हूं वो आपके लिए नया नहीं है उसकी बदनाम कार्यशैली और बलैकमेलिंग के किस्सों की सच्ची दास्तान अक्सर सुनने को मिल जाया करते हैं. मामला जून 2013 का है, जब मैने लोगों से नौकरी के नाम पर बंधुआ मजदूर की तरह काम कराकर, खून चूसने वाले नौएडा के एफ 42 सेक्टर 6 स्थित न्यूज चैनल वन के पीसीआर में कार्यरत अपने एक मित्र के कहने पर पैनल प्रोड्यूसर के पद पर ज्वाईन किया था।

ये चैनल अक्सर कर्मचारियों को जिस सैलरी पर नियुक्त करता है बाद में उससे कम सैलरी देने और आयाराम गयाराम के लिए मशहूर था, लेकिन मित्र ने बताया कि कुछ प्रोफेशन लोगों की टीम सहारा समय से आई है सब कुछ लिखित में होगा, लेकिन बदकिस्मती के ज्वाईनिगं के चार दिन बाद ही उस प्रोफेशनल टीम ने भी काम करने की आजादी ना होने और जहीर अहमद एंड कम्पनी के चापलूसों की वजह से इस घटिया चैनल को अलविदा कह दिया इसके बाद तो अस्थिरता का माहौल लगातार बना रहा और नए-नए तुगलगी फरमान जहीर अहमद एंड चमचा कंपनी की तरफ से कर्मचारियों पर थौपे जाने लगे, कभी 10 घंटे की शिफ्ट बना दी तो कभी पंचिंग मशीन की आड़ में कर्मचारियों का शोषण किया जाने लगा फिर अचानक कुछ नौसिखए पत्रकारों की चैनल में आई नई नवेली टीम को चैनल के मालिक ने कुछ नया करके दिखाने को कहा तो बेचारों ने प्रेशर के चलते उत्तराखंड के गृह सचिव जेपी जोशी का फर्जी स्टिंग ही प्रसारित कर दिया और जिसके बाद बड़ी कमाई के चक्कर में ब्लेकमेल करने लगा मामला ऐसा उल्टा पड़ की उत्तराखंड का रिपोर्टर तो जेल गया है साथ में काफी दिनों तक जहीर अहमद अपने दोनो बेटों एंड चमचा कंपनी के साथ चैनल से ही फरार हो गऐ और आज तक कोर्ट कचहरियों के चक्कर काट रहे है.

दूसरा मामला, देश के एक दूसरे प्रतिष्ठित प्रोफेशनल न्यूज चैनल न्यूज एक्सप्रेस का है जिसने चैनल वन की आड़ में स्ट्रिंगरों से जो अवैध उगाही करने के लिए कैसे जाल बिछाया जाता है, जहीर अहमद के अंगूठा टेक मानसिकता का स्टिंग करके दुनिया को इनका असली चेहरा दिखाया. साथ ही चैनल वन जो कि पत्रकारिता के पेशे को बदनाम कर रहा था, उसको बेनकाब किया. इसके लिए मैं न्यूज एक्सप्रेस को बधाई देना चाहूंगा.

खैर बात मेरे साथ हुए अन्याय की हो रही थी. चैनल वन ने दिसंबर 2013 तक तो मेरा ही नहीं लगभग सभी कर्मचारी, चमचे एंड कंपनी को छोडकर, तरह-तरह से शोषण किया. शायद ही कभी ऐसा हुआ कि पूरी सैलरी मिली हो. कभी पंचिंग मशीन की खराबी का शिकार होना पड़ा तो कभी चैनल के ऐसे चापलूसों का जिनका काम केवल मुफ्त की सैलरी लेकर कर्मचारियों की गलत चुगली करना था, लेकिन जब जनवरी 2014 में लोगों की सैलरी आई तो चैनल में अफरा तफरी मच गई. वजह, अपनी आदत के मुताबिक जहीर अहमद ने चापलूसों की सलाह पर हर किसी कर्मचारी की मनमाने ढंग से सैलरी कम कर दी गई. नतीजन बहुत ही कम लोगों ने समर्पण किया और ज्यादातर कर्मचारियों ने अपनी खुद्दारी को प्राथमिकता देते हुए नौकरी छोड़ दी. इनमें से मैं भी एक था लेकिन पीसीआर से सभी कर्मचारियों के एक साथ नौकरी छौड़ने से मालिक को बैकफुट पर आना पड़ा और केवल पीसीआर कर्मचारियों को पूरी सैलरी देने का आश्वासन देकर अगले दिन वापस बुला लिया गया, जिसमें से कुछ लोगों को 10-15 दिन तंग करने के बाद पूरी सैलरी मिलने लगी.

कुछ कर्मचारियों को चैनल की आर्थिक स्थिति की दुहाई देकर वित्तीय वर्ष समाप्त होने पर कटौती की गई सैलरी को देने का वादा किया गया. बेचारे कर्मचारी करते भी तो क्या. अचानक नौकरी का संकट जो खड़ा हो गया था जिनमें से मै भी एक था। खैर वित्तीय वर्ष भी समाप्त हो गए लेकिन आश्वासन के सिवा मुझे कुछ नहीं मिला. एक दिन चैनल के चापलूसों में से एक ज्योति खुराना जो कि चैनल का प्रशासनिक कार्य संभालती थी, से सैलरी को लेकर मेरा बहस करना उसके ईर्द गिर्द घूमने वाले दूसरे चमचों को बुरा लगा. 5 जून को दुबारा वेतन मांगने पर पूरी प्लानिंग के साथ ज्वानिंग के समय दिये गए फोटो लगाकर मेरे खिलाफ कुछ फर्जी कागजात तैयार करा रखे गए थे. ये ज्योति खुराना ने तैयार किये थे. ऐसे तरीके से कितने ही लोगों को फर्जी फंसाने की धमकी देकर सैलरी हड़प कर जाते हैं ये भेड़िये. साथ ही चैनल की फर्जी आईडी इस्तेमाल करने का आरोप लगाकर मुझे आफिस के गेस्ट रुम में चैनल को लूट कर खाने वाले असली चोर पंकज, शम्मी ने पूरी प्लानिंग के साथ मेरे कुछ रिशतेदार जिनसे प्रापर्टी बंटवारे का झगड़ा था, जोकि लगातार जहीर अहमद के पीएसओ शब्बीर अहमद के संपर्क में थे, चैनल में बुलाकर पहले ही लिखी गई पटकथा के आधार पर मेरे साथ मारपीट की गई, जिसकी वीडियों फुटेज सीसीटीवी कैमरे में कैद हो गई थी. इसे बाद में पुलिस में शिकायत होने पर डिलीट कर दिया गया.

अनहोनी की आशंका के चलते मुझे अपनी जान बचाकर भागना पड़ा. बाद में पुलिस में शिकायत की लेकिन मामला चैनल के मालिकों से जुड़ा होने की वजह से कुछ हासिल नहीं हुआ. फिर अपनी मेहनत की कमाई जब मांगी तो फंसाने की फोन पर धमकी मिलने लगी. हारकर 7 जुलाई 2014 को कोर्ट का नोटिस भेजा जिसके जवाब की समय सीमा 15 दिन थी लेकिन मुझे मानसिक तौर पर परेशान करने के लिए एसपी सिटी नौएडा जोकि चैनल वन न्यूज के बराबर अथार्टी में बैठते हैं, वहा मेरे खिलाफ शिकायत की लेकिन जब मैंने डीआईजी मेरठ मंडल को सारे सबूते के साथ अवगत कराया तो सीओ प्रथम नौएडा ने जांच की और मेरे बयान दर्ज किए. साथ ही मेरे द्वारा की गई शिकायतों को सही तो पाया लेकिन चैनल के चमचों के खिलाफ नोटिस जारी होने के बाबजूद क्या कार्रवाई हुई, आज तक नहीं पता चला.

सब जगह से निराशा हाथ लगने के बाद 11 नवम्बर 2014 को सेक्टर 2 स्थित लेबर कोर्ट में शिकायत करने के बाद भी अपनी मेहनत की कमाई के लिए चक्कर काट रहा हूं. लेकिन बेशर्मी की हद तो देखो कि लेबर इंस्पेक्टर से भी आज साफ कह दिया की हम सैलरी नहीं देंगे. लेकिन मैं आपके माध्यम से समाचार चैनल के नाम पर कलंक इस न्यूज चैनल वन के मालिकों को सबक सिखा कर रहूंगा चाहे कुछ भी करना पड़े. सारे शिकायती पत्र आपको भेज रहा हूं. कृपा करके मेरी इस खबर को प्राथमिकता के आधार पर प्रकाशित करें ताकि मुझे मीडिया की आड़ में चैनल वन मालिक जैसे राक्षसों से लड़ने में कठिनाईयों का सामना नहीं करना पड़े. आशा करता हूं कि जिन सक्षम लोगों से मैने न्याय की उम्मीद लगाई थी उनसे आप सवाल पूछें कि क्या वो भी जहीर अहमद एंड चमचा कंपनी के पाप के उतने ही भागीदार हैं. साथ ही मेरा मार्गदर्शन भी करें कि इनके मुंह से अपनी मेहनत की कमाई कैसे निकाल सकूं. सदा आपका आभारी रहूंगा।

धन्यावाद

अकरम खान

Akram khan Khan

पुत्र
इस्लाम अहमद खांन
निवासी 24/225 देवी पुरा प्रथम
बुलंदशहर
09871954581, 09634766114

media.akram786@gmail.com

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राजस्थान पत्रिका के इंप्लाई रहे सुमित ने मालिकों-संपादकों को पत्र लिखकर मजीठिया वेजबोर्ड के हिसाब से भुगतान मांगा

नैतिकता और नीतियों की दुहाई दे देकर खुद का घर भरने वाले अखबारों के मालिकों की चमड़ी इतनी मोटी हो गई है कि इन्हें अब किसी से भय नहीं लगता. राजनीति, नौकरशाही और न्यायपालिका को अपनी मुट्ठी में कर चुके ये लोग अब सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को भी रद्दी की टोकरी में डाल देते हैं. पर इनकी अकूत ताकत से हार न मानते हुए कुछ ऐसे वीर सामने आ जाते हैं जो इन्हें खुली चुनौती दे डालते हैं. ऐसे ही एक वीर का नाम सुमित कुमार शर्मा (मोबाइल- 07568886000) है.

 

सुमित राजस्थान पत्रिका के बीकानेर एडिशन में सरकुलेशन इंचार्ज हुआ करते थे. इन्होंने इस्तीफा दिया तो इनका हिसाब पुराने तरीके से किया गया जबकि इन्हें कायदे से मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से पेमेंट मिलना चाहिए था. इसको लेकर उन्होंने राजस्थान पत्रिका के मालिकों को एक खुला पत्र लिखा है. पत्र यहां दिया जा रहा है.

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श्वेता प्रसाद बसु का मीडिया के नाम खुला पत्र… क्या किसी संपादक में जवाब देने की हिम्मत है?

मीडिया वालों ने श्वेता प्रसाद बसु को वेश्या बता दिया लेकिन कोर्ट ने वेश्यावृत्ति के आरोपों को खारिज कर दिया. अब कहां गये मीडिया वाले. क्या वे श्वेता प्रसाद बसु की इज्जत से खेलने के आरोपी नहीं बन चुके हैं. श्वेता प्रसाद बसु ने खुद को बरी किए जाने के बाद मीडिया वालों को एक खुला पत्र लिखा और बेहद कड़े टोन में ऐसी तैसी की है. अगर मीडिया वालों में, मीडिया के संपादक लोगों, मीडिया के टीआरपी खोरों में थोड़ी भी शरम बाकी हो तो उन्हें इस खुले पत्र का खुला जवाब जरूर लिखना चाहिए. श्वेता का मीडिया के नाम खुला पत्र इस प्रकार है….

Dear,

Members of Media,

I grew up admiring some great journalists and reporters who, some times report even live from war-torn borders, natural disaster sites, terror attacked locations, etc. without hesitating a bit. These heroes inspired me to pursue my degree in Mass Media and Journalism degree too. I always thought, ‘wow! These guys, the media, actually risk their lives to bring us the truth’. And boom! You create a mess in my very life. Well done.

I understand that everything was a chain of reaction and versions of the incident with several mis-leading stories were picked up along with my………..wait, NOT MY ‘statement!’, which said:

“I have made wrong choices in my career, and I was out of money. I had to support my family and some other good causes. All doors were closed, and some people encouraged me to get into prostitution to earn money. I was helpless, and with no option left to choose, I got involved in this act. I’m not the only one who faced this problem, and there are several other heroines who have gone through this phase”

Seriously?? Whoever you are, who imagined this statement, were you smoking funny cigarettes at work? Who talks like that? This sounds like a dialogue from some 80’s Bollywood film. And why so many ‘and’ in that statement, go back to school amateur!

Thankfully my family, my friends and my circle of people didn’t believe this statement. They know I do not speak like that. But, for the rest of India or anyone, anywhere on planet, for the last time : THIS IS NOT MY STATEMENT!

The problem with our society is, as long as I was given sympathy and everyone went ‘awwww’, ‘poor girl’, ‘so sad’ and so on, everybody was supporting me. But, as soon as people understand that they got carried away by a false statement and a girl of 23 can be strong and can stand on her own feet without any sympathies, the society feels that she is lying?? What’s my fault if the news were the way they were? I cannot force anyone to like or respect me. These happen naturally. What happened was beyond my control.

After my detainment, I went straight to the rescue home where I stayed for 59 and a half days. (60th day, I came home), then where and how did I give a statement to media? My phone was confiscated, I made few last calls to Maa and few other close friends. I had absolutely no access to newspapers, television, internet or radio for those 2 months. I had no clue what was going on outside Prajwala rescue home, Mehboob Nagar (outskirts of Hyderabad). Although I had a lovely time there teaching kids Hindi, English and Hindustani Classical vocals. I always do and I always will count those children in my prayers. I also read 12 books in those 2 months. Yes 12. Spent my time very productively.

But, after I came back home in Mumbai on 30th October 2014, I came across all the reports that had been around for those 2 months when I was absent and I was more amused than disappointed!

A report also said that ‘the cops’ said I gave that ‘statement’, which was denied by the Police in Hyderabad when I confronted them. One of the Police said, that no press notes were released by the department of Police, Hyderabad, of any such statement made by me. And anyway, Police is not allowed to reveal identity in such cases, so it was not possible by them to reveal any such statement. It’s against the law. And how could they, firstly this statement does not exist. I was absent in the scene and that was an advantage for it to do the rounds.

And who are these business men in my life? I am just as curious as all of you!
So, here is the riddle: Why were the business men names who were caught ‘along with me’ not revealed?
Clue: Were there any business men with me in that room at the time of detainment in the first place?

Think Think.

PROVE IT!

I was in Hyderabad for Santhosham Awards, which was conducted on 30th August. I was never encouraged to get into commercial sex and no agent booked my tickets and stay there! My tickets and accommodation was done by the award event organizers. The hotel where I stayed with other guests of the award ceremony was a hospitality partner with the event. I still have the itinerary in my email inbox.

My parents did not want me to act after Iqbal (2005). My parents’ bigger concern was me passing my 10th and 12th grade properly and not jumping into movies at 16! We don’t dine at Wasabi every other weekend but that doesn’t mean my parents have not done enough to bring me up well. I had the best possible education, birthday gifts, family vacations, Sports clubs for playing a sport and enrollment at Music Institute for learning music (I learn The Sitar from Sangit Mahabharati, Juhu, Mumbai), everything that a normal upper-middle class parents can do.

I did few south films (Telugu and Tamil) when I was about 18 and then past 3 and half years I had been busy making a documentary film called Roots on Indian Classical music, starring interviews of Ustad  Amjad Ali Khan, Pt Shiv Kumar Sharma, Shubha Mudgal, A R Rahman, Vishal Bhardwaj, Dr L Subramaniam, Pt Hari Prasad Chaurasia to name a few. In fact, in June 2014 along with a friend, Adhiraj Bose I also co-produced and acted in a 12 minute short film named INT. CAFÉ NIGHT that starred myself along with Shernaz Patel, Naseeruddin Shah and Naveen Kasturia, which is doing rounds of film festivals right now. I have been auditioning for acting assignments as well. So what ‘doors’ were closed? Please get your facts right before jumping into conclusions!

However, on 5th December 2014 the Metropolitan Sessions Court, Nampally, Hyderabad, gave me clean chit in the case and withdrew the charges and stay order against me made by the trial court.To all those who supported me through out all this, thank you so much, extending a big hug to all of you.

Anyway, enough said, enough heard. I have completely gone past the whole incident and I overlook everyone who picked up false statement(s) and encouraged mis-leading stories without verifying it’s authenticity. I overlook, because this episode does not deserve any more attention!

-ShwetaBasu Prasad
6/12/2014

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