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जब रामेश्वर पांडेय ने मुझसे कहा- ‘आगे से ऐसी हिमाकत मत करना’!

अमरीक-

श्री रामेश्वर पांडे से मेरे कुछ हमउम्र दोस्त खास लगाव रखते थे। एकाध को ‘अमर उजाला’ में नौकरी के लिए उपयुक्त भी पाया गया। जालंधर संस्करण की बजाए कहीं और भेजा गया ताकि ताक में बैठे दुष्ट भाई लोग विवादों का नया पिटारा न खोल दें।स्वीडन जा चुका मेरा एक दोस्त विनय प्रताप सिंह, पांडे जी से विशेष स्नेह रखता था। उसके पिता आईपीएस अधिकारी थे और उन दिनों उनकी ड्यूटी मुंबई एयरपोर्ट पर थी। घरवालों से विनय की बनती नहीं थी क्योंकि वह ‘सुल्फी यार’ था। मैं उसकी ऐसी किसी महफ़िल में शरीक नहीं होता था। अंग्रेजी किताबों का उसे जबरदस्त नशा था और उन पर वह घंटों बात कर सकता था। विनय पहली बार पांडे जी को तब मिला जब हम उसके फार्म हाउस गए।

मैं हैरान था कि इतना ज्यादा बोलने वाला मेरा यह दोस्त आज पांडे जी के आगे एकदम चुप है और एक मिनट के सवाल का जवाब कई मिनटों में ले रहा है। हमारा वहीं रुकने का इरादा था। रसरंजन में वह शामिल नहीं हुआ लेकिन सुल्फी की अपनी तलब पूरी करने के लिए उठकर बार-बार बाहर आता-जाता रहा। फिर बात का सिलसिला वहीं से पकड़ता जहां से छूटता था। अगली बार बाहर गया तो पांडे जी ने कहा कि कमरे में अटैच बाथरूम है और यह बाहर बार-बार क्यों जाता है। इसका फोन भी यहीं पड़ा है। मैंने कहा सर ‘सुल्फी’ में मदहोश होने के लिए। पांडे जी ने पूछा कि वह क्या होती है तो मेरा जवाब था कि 80 फीसदी नौजवानों के लिए वन वे स्ट्रीट! यानी आगे मौत!!

तब ‘उड़ते पंजाब’ की भूमिका परिदृश्य पर आ चुकी थी। पांडे जी बेहद ज्यादा तनाव में आ गए। मुझसे पूछा कि क्या मैं इस बाबत इससे बात कर सकता हूं। मैंने कहा क्यों नहीं.. वह आपको पिता तुल्य मानता है। जो भी बातचीत हुई–वह बेनतीजा थी। खैर, पांडे जी को नोएडा और मेरठ जाना था। उनकी खुद की गाड़ी उन दिनों थोड़ी खराब चल रही थी और उम्मीद के खिलाफ उम्मीद थी कि वह सही सलामत नोएडा और मेरठ चली जाएगी।

एक दिन के बाद पांडे जी को निकलना था। विनय प्रताप सिंह चंडीगढ़ से मेरे लिए हिंदी की कुछ किताबें पैन लाया था और उसे मालूम था कि आज मैं डॉल्फिन में मिलूंगा। हम सब दोस्त पांडे जी के पांव को हाथ लगाते थे। ऐसा करके वह (भी) चुपचाप सोफे के कोने में बैठ गया। इस बीच गाड़ी-प्रकरण चलता रहा। पांडे जी स्थानीय संपादक थे और इस नाते उन्हें बड़े आराम से टैक्सी भत्ता मिल जाता। इस तरफ ध्यान ही नहीं गया। बात विनय प्रताप के समझ आई तो उसने कहा कि अंकल (श्री रामेश्वर पांडे) मेरी गाड़ी से जाएंगे। एतराज न हो तो दिल्ली में मुझे कोई काम है, मैं भी साथ चल पड़ता हूं। सुनकर पांडे जी को खुशी हुई। ‘मान न मान मैं तेरा मेहमान’ की कहावत को सही साबित करते हुए मेरा भी कार्यक्रम बन गया। विनय के पास नई अंबेसडर गाड़ी थी। जो उन दिनों शोरूम से आम नहीं मिलती थी। उस ब्रांड की बिक्री बंद हो चुकी थी। बुकिंग करवाकर असेंबल करवानी पड़ती थी।

तय दिन हम उसी अंबेसेडर से पांडे जी को पिक करने सरस्वती विहार उनके घर गए। बावर्दी एक हवालदार गाड़ी का ड्राइवर था। उसके बगल में पुलिस को आवंटित लंबी पिस्तौल लटक रही थी। पांडे जी को आगे बैठाया गया और हम पीछे बैठ गए। पांडे जी की नजर बार-बार पिस्तौल पर जाती थी और मैं इसे भांप गया। विनय से मैंने कहा कि हवालदार से कहो की पिस्तौल-पेटी निकालकर सीट के नीचे रख ले। जब उसने ऐसा किया तब श्री रामेश्वर पांडे कुछ सहज हुए। सर्दियों के दिन थे और चार बजे ही चौतरफा धुंध फैल गई। हमने पानीपत रुकने का इरादा बनाया। पांडे जी ने कहा कि मैं पानीपत में अमर उजाला के किसी सीनियर से बात करता हूं। मैंने कहा सर, कोई जरूरत ही नहीं। हम सर्किट हाउस में ठहरेंगे। आपको वहां कुछ नहीं बोलना।

सर्किट हाउस की रिसेप्शन पर मैंने कहा कि राज्यसभा के फलां सदस्य के नाम जो सुइट बुक है, वह खुलवाइए। रिसेप्शनिस्ट बोला कि हमारे पास तो ऐसी कोई सूचना नहीं। मैंने कहा तो मुख्य सचिव के ऑफिस से आती होगी। अंबेसडर गाड़ी, उस पर लाल बत्ती और बावर्दी हवलदार ड्राइवर! किसी को रत्ती भर शक नहीं हुआ कि पके बालों वाला यह शख्स राज्यसभा का सदस्य नहीं हो सकता। फौरन स्वीट खुल गया। अंदर आकर पांडे जी मुझसे बोले कि तुम यह सब भी कर लेते हो? जानते भी हो कि किसी को जरा सा भी शक हो गया तो मेरा क्या होगा और बैनर की कितनी बड़ी बदनामी होगी।

मैंने कहा सर, आप गुस्सा मत होइए। मैं इसी राज्य का रहने वाला हूं और बखूबी जानता हूं कि सुबह ग्यारह बजे से पहले बगैर बुलाए यहां कोई पास भी नहीं फटकेगा। तब तक तो हम नोएडा पहुंच चुके होंगे। खैर, पांडे जी सामान्य हो गए और हवलदार गुरमीत सिंह रसरंजन का सामान ले आया। मछली के साथ खूब मजा लिया गया। ‘एमपी साहब’ ने थोड़ा कुछ खाया और सो गए। सुबह सात बजे सर्किट हाउस का गेट बंद था। हवलदार ने खुलवाया और हमारी गाड़ी यह जा और वह जा! पांडे जी विनय से बोले कि तुम्हारे दोस्त ने मुझे एक रात के लिए ही सही, राज्यसभा का सदस्य तो बना ही दिया। मुझसे कहा कि आगे से ऐसी हिमाकत मत करना।

उसके बाद कभी-कभी डॉल्फिन में मैं उन्हें ‘एमपी साहब’ कहता तो वह लंबा ठहाका लगाते। दिवाली पर उन्हें लखनऊ फोन किया था तो उनकी हेलो के जवाब में यही कहा था कि सादर प्रणाम एमपी सर। वह हंसे और बोले कि अभी सुधरे नहीं! मैंने कहा आपको भी तो सब कुछ याद है। विनय प्रताप सिंह ने सुल्फी से तौबा कर ली है और वह अकेला आराम की जिंदगी जीता है। मैंने उसे पांडे जी की आकस्मिक मृत्यु के बारे में बताया तो उसे बहुत अफसोस हुआ। कभी-कभार दोनों बात किया करते थे। अन्य दोस्तों के लिए भी यह खबर सामान्य नहीं थी; सभी को असामान्य कर गई। मैं उनक शव यात्रा में शरीक नहीं हो पाया लेकिन अंतिम अरदास पर जाना चाहता था तब भी डॉक्टरों ने जाने नहीं दिया। श्रीकांत अस्थाना भाई साहब ने भी कहा कि अब जो हो गया सो हो गया; अपनी सेहत का ख्याल रखो।

श्री रामेश्वर पांडे आजादशत्रु नहीं थे। जालंधर, मेरठ, बिहार, झारखंड और लखनऊ में जितने उनके दोस्त थे ठीक उतने ही दुश्मन अथवा शुभचिंतक के बाने में दुश्मन। षड्यंत्र की बू उन्हें आ जाती थी और वह साफ पहचान लेते थे कि सामने वाला अपना सारा मीठा उनमें इसलिए घोल रहा है कि वह जहर बन जाए। कुछ को उनकी सख्ती पसंद नहीं थी। कुछ ऐसे थे जिन्हें अपनी कमअक्ली पर कुछ ज्यादा ही घमंड था। कुतर्क श्री रामेश्वर पांडे को बर्दाश्त नहीं होता था और न ही झूठ। सच बताने पर वह कुछ पल गुस्सा करते और झूठ पकड़ लेने पर दसियों दिन ताने देते। कुछ ‘अतिरिक्त समझदार’ सहकर्मियों को सजा देकर समझाना उन्हें अच्छी तरह आता था। सब कुछ सुनने के बाद एक पंक्ति में ही साफ कर देते थे कि यहां तुम पकड़ लिए गए हो।

पांडे जी क्रांतिकारी थे-बेशक बाद में उस क्रांति से थोड़ा परे हो गए हों। मुझे इतना जरूर मालूम है कि पहले वह बिहार लाइन के कॉमरेड थे और उसके बाद बंगाल लाइन अख्तियार कर ली। लेकिन प्रगतिशील विचारधारा सदैव उनके अंग- संग रही। डायलेक्टिकल मैटेरियलिज्म के वह बेहद अच्छे छात्र थे। द्वंद के हर रास्ते से गुजरना आता था। कई लोग उनके जिस्मानी अंत के बाद आपको आज भी मिलेंगे जो कहेंगे कि उनसे बुरा व्यक्ति कोई नहीं था और मैंने तो उन्हें गालियां देकर उनका कॉलर तक पकड़ा हुआ है। क्या आपको लगता है कि ऐसे व्यक्तित्व के साथ कोई बड़े से बड़ा माफिया भी ऐसा सुलूक कर सकता है? उनकी रोशनी का तेज ही इतना था कि घोर अंधकार में भी उन पर हमला करना मौत को दावत देने जैसा था।

उनकी मृत्यु के बाद लोगों ने सोशल मीडिया पर उनकी झूठी तारीफ भी खूब की। जीवित थे तो पीठ पीछे वाहिश गालियां निकालते थे। जितनी तादाद उनके सच्चे दिल से चाहने वालों की है, ठीक उतनी ही जेहनी नफरत करने वालों की भी। मेरा-उनका साथ तो जालंधर तक सीमित रहा। कुछ महीने मेरठ। नोएडा के बाद तो मिलना तक नहीं हुआ। लेकिन सुनने को मजबूर होता था कि वह घोर जातिवादी हैं। पारिवारिक जिम्मेदारियों से बहुत दूरी बनाकर रखते हैं। रोज पीना उनकी कमजोरी है। (जबकि वह रोज पीने वालों में से नहीं थे। डायबिटीज भी इसकी इजाजत उन्हें नहीं देती थी। कहना होगा कि स्वास्थ्य के लिहाज से वह रोज और कभी कबार भी ज्यादा मात्रा में नहीं पी सकते थे)।

मेरे नाकारात्मक प्रवृत्ति वाले दोस्तों को नहीं पता कि उन्होंने अपने लिए कम बल्कि दूसरों के लिए ज्यादा संघर्ष किया है और नौकरी को ताक पर रखकर किया है। उनकी रीढ़ बेहद मजबूत थी और शायद ही कभी किसी के आगे झुकी हो। उस आदमी को जातिवादी कहकर बदनाम करते हो जो एक प्लेट में तमाम जातियों के लोगों के साथ बाखुशी खाना खा सकता था। जब आप महीने में पांच बार पूरे पेज की ऐसी-तैसी फेरोगे तो कॉन्फिडेंशियल रिपोर्ट में यह लिखना पाप हो जाएगा? तबादले की सिफारिश गुनाह हो जाएगी? देसी दारू के अहाते में बैठकर साअधिकार कहोगे कि यह मालिकों का चमचा है और इसे पत्रकारिता का ‘क ख ग’ भी नहीं आता। तो ऐसे वृतांत बहुतेरे हैं। श्री रामेश्वर पांडे तो एक ही थे।

चारेक दिन पहले उनके बड़े बेटे हिमांशु से बात हुई थी। उन्होंने बताया कि पांडे जी के नाम पर हर साल एक अवार्ड दिया जाएगा और उन पर एक किताब भी प्रकाशित की जाएगी। हिमांशु भाई, हम आपके साथ हैं। श्री रामेश्वर पांडे के हजारों हिस्से थे। प्रत्येक प्रशंसक के पास कम से कम एक हिस्सा तो जरूर होगा! आमीन!

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