जेएनयू में सत्ता और संघ ने सारा जोर लगा दिया पर जीते लाल झंडे वाले, एबीवीपी का सूपड़ा साफ

Sheetal P Singh : JNU भी अजीब शै है! संघी एक युग से परेशान हैं इससे! कुल जमा दस हज़ार स्टूडेंट्स होंगे जिनके दिल दिमाग़ पर क़ब्ज़ा कर पाने में नागपुर से दिल्ली तक के मठ और सल्तनत अनवरत फेल है! वे दुनिया जीत कर आते हैं पर जेएनयू हार जाते हैं! लाल सलाम वालों का छोटा सा अनूठा द्वीप है jnu जो धर्म धन और संकीर्णता को अपने अंदाज में पराजित कर क्रांति के प्रतीक्षित सपने में डूब जाता है, अगले साल तक के लिए!

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मज़दूर क्रांति के ध्येय को समर्पित एक बुजुर्ग साथी द्वारा तैयार किया गया पर्चा… बहस के लिए

मूलाधार और अधिरचना में जाति-समस्या

भारत में जाति की समस्या कई दशकों से व्यापक चर्चा का विषय रही है। इस चर्चा में वामपंथी आंदोलन का भी हस्तक्षेप रहा है, खास कर कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी आन्दोलन का। वामपंथी आन्दोलन में इस समस्या को लेकर एक लम्बे अरसे से विचार-मंथन चल रहा है।
एक सैद्धान्तिक आन्दोलन होने के चलते जब कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी आन्दोलन ने इसमें हस्तक्षेप किया और इस विषय पर विचार-मंथन शुरू किया तब यह स्वाभाविक ही था कि विषय पर वह व्यापकता और गहराई में जाकर विचार-विमर्श करें तथा इसका सांगोपांग अध्ययन करें और समाधान प्रस्तुत करें।
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झारखंड में क्रांतिकारी नारे लगाने पर 800 अज्ञात और 12 को नामजद कर एफआईआर दर्ज

विशद कुमार,  गिरिडीह से

गिरिडीह : जनता से आखिर इतना डर क्यों? यह सवाल मजदूर संगठन समिति के केंद्रीय महासचिव बच्चा सिंह उस वक्त कर रहे हैं जब पिछले 7 नवंबर को महान बोल्शेविक क्रान्ति के सौवें वर्षगांठ पर झारखंड के गिरिडीह जिला के मुफस्सिल थाना अन्तर्गत चतरो में “महान बोल्शेविक क्रान्ति की शताब्दी समारोह समिति” झारखंड, के तत्वावधान में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें क्षेत्र के लगभग 10 हजार लोगों ने भाग लिया। मंचीय कार्यक्रम के पूर्व एक रैली निकाली गई जो काफी शांतिपूर्ण तरीके से लगभग 5-6 कि.मी. की दूरी तय करते हुए वापस कार्यक्रम स्थल पर पहुंची और आयोजित समारोह भी काफी शांतिपूर्ण तरीके से सम्पन्न हुआ, जिसे सभी समाचार-पत्रों ने सहजता से छापा भी। बावजूद जिला प्रशासन ने रैली में शामिल लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज किया है जिसमें 800 अज्ञात तथा 12 लोगों को नामजद अभियुक्त बनाया गया है।

अपने ही सवाल के जवाब में वे कहते हैं कि जहां वामपंथ धारा के पक्षधरों द्वारा 7 नवंबर 1917 को रूस में हुई ऐतिहासिक परिवर्तन को प्रतीकात्मक रूप से बोल्शेविक क्रांति के सौवें वर्षगांठ को पूरे देश में मनाया जा रहा है वहीं हमारे द्वारा मनाये जा रहे कार्यक्रम के खिलाफ प्रशासन का यह रवैया इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में अभिव्यक्ति की आजादी पर एक खतरनाक हमला है। जिसका कारण मात्र यह है कि पिछले दिनों मजदूर संगठन समिति द्वारा राज्य के तीन जगहों मधुबन, चन्द्रपुरा और बोकारो थर्मल में मजदूरों के सवालों को लेकर जोरदार आंदोलन किया गया, परिणामस्वरूप इन तीनों जगहों के प्रबंधन को मजदूरों के आन्दोलन के सामने झुकना पड़ा और मजदूर की ताकत बढ़ी।

जाहिर है यह फासीवादी रघुवर की सरकार मजदूरों की बढ़ती ताकत को बर्दाश्त नहीं कर पा रही है। चूंकि “महान बोल्शेविक क्रांति की शताब्दी समारोह समिति” झारखंड, में शामिल 13 संगठनों में मजदूर संगठन समिति भी शामिल है अतः मसंस के बहाने मजदूरों कों मुकदमे में फंसाने की धमकी से डरा कर उन्हें चुप रखने की एक साजिश है और समारोह समिति द्वारा घोषित राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में आयोजित बोल्शेविक क्रांति के कार्यक्रमों को भी रोकने की साजिश का भी यह एक हिस्सा है, मगर मजदूर चुप नहीं रहने वाले हैं और न ही “महान बोल्शेविक क्रांति की शताब्दी समारोह समिति” झारखंड, के कार्यक्रमों में कोई बदलाव करने वाला है, हम इस फासीवादी रघुवर सरकार की किसी भी साजिश को सफल नहीं होने देंगे।

उल्लेखनीय है कि अक्टूबर में 13 संगठनों की एक बैठक करके बोल्शेविक क्रांति के सौवें वर्षगांठ पर पूरे झारखंड में कार्यक्रम मनाने की सहमति बनी और उक्त कार्यक्रम को “महान बोल्शेविक क्रांति की शताब्दी समारोह समिति” झारखंड, का नाम दिया गया, जिसमें ‘मजदूर संगठन समिति’ (झारखंड), ‘मेहनतकश महिला संघर्ष समिति’ (बोकारो), ‘आदिवासी, मूलवासी अधिकार मंच’ (बोकारो), ‘तेनुघाट विस्थापित बेरोजगार संघर्ष समिति’ (ललपनिया, बोकारो), ‘आदिवासी, मूलवासी विकास मंच’ (बोकारो), ‘उलगुलान बेरोजगार मंच’ (गिरिडीह), ‘भारतीय आदिम जनजाति परिषद’ (गढ़वा), ‘भारतीय भूईंया विकास परिषद’ (गढ़वा), ‘भारतीय आदिवासी विकास परिषद’ (गढ़वा), ‘जल, जंगल, जमीन रक्षा समिति’ (दुमका), ‘जन जागरण वनाधिकार संघर्ष समिति’ (गुमला, सिमडेगा), ‘भारत नौजवान सभा’ (गिरिडीह) , ‘महिला उल्गुलान संघ ‘(रांची) शामिल हुए। कार्यक्रम 7 नवंबर को गिरिडीह से शुरू करते हुए 30 नवम्बर को रांची में समाप्त करना तय हुआ। कार्यक्रम राज्य के विभिन्न स्थलों में में होना तय हुआ।

इसी संदर्भ में समारोह समिति के आयोजन कर्ताओं द्वारा अक्टूबर में ही गिरिडीह के बरवाडीह करबला मैदान मैनेजिंग कमिटी, गिरिडीह को एक पत्र देकर कार्यक्रम के लिए करबला मैदान को बुक करवा लिया गया था। मगर जब जिला प्रशासन के पास कार्यक्रम करने की अनुमति पत्र के लिए जब संपर्क किया गया, तब जिला प्रशासन द्वारा अनुमति पत्र को स्वीकृति देने के बजाय करबला मैदान मैनेजिंग कमिटी को ही कारण बताओ नोटिस भेज दिया कि वह बिना प्रशासन की अनुमति पत्र के मैदान आवंटित कैसे कर दिया ? परिणामत: जैसा होना लाजिमी था करबला मैदान मैनेजिंग कमिटी का प्रबंधन प्रशासन की घुड़की से डर कर आवंटित मैदान को रद्द कर दिया।

प्रशासन के इस हरकत से आक्रोशित ‘महान बोल्शेविक क्रांति की शताब्दी समारोह समिति’ के आयोजकों ने तय किया कि कार्यक्रम जिले के चतरो अवस्थित मजदूर संगठन समिति के शाखा कार्यालय के मैदान में मनाया जायगा और इसी तयशुदा कार्यक्रम के तहत समिति ने 7 नवंबर को कार्यक्रम मनाया जिसमें 10 हजार के करीब लोग शामिल हुए। कार्यक्रम के पूर्व एक रैली निकाली गई जो लगभग 7 कि0मी0 की दूरी तय करते हुए अजीडीह के चक्रव्यूह मैदान से वापस कार्यक्रम स्थल तक आई।

सबकुछ काफी शान्ति से सम्पन्न हुआ और कार्यक्रम के बाद काफी शान्ति के साथ सारे लोग अपने अपने घर वापस हो गए। एक बात उल्लेखनीय रही कि कार्यक्रम की समाप्ति तक जिला प्रशासन पूरी तरह मुस्तैद रहा और इस कोशिश में लगा रहा कि कार्यक्रम अव्यवस्थित हो जाय, मगर आयोजकों की सावधान मुस्तैदी ने प्रशासन की हर कोशिश पर पानी फेर दिया जिसका इजहार प्रशासन ने दूसरे दिन 8 नवंबर को समारोह में शामिल लोगों और आयोजकों पर एफआईआर दर्ज करके किया। जिला के मुफस्सिल थाना में प्रशासन ने जिला उद्योग केंद्र के उद्योग विस्तार पदाधिकारी परमेश्वर सिंह द्वारा शिकायत दर्ज करवाते हुए 800 अज्ञात एवं 12 नामजद लोगों के खिलाफ भदवि की धारा 147, 148, 149, 341, 342, 323, 504, 506, 353 के तहत प्राथमिकी दर्ज कराई गई।

गिरिडीह से विशद कुमार की रिपोर्ट.

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चीन एक ध्रुवीय दुनिया को लोकतांत्रिक दुनिया बनाने की पहल लेता है तो भारत को उससे लाभ होगा!

चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की 19 वीं कांग्रेस के बारे में कामरेड अखिलेन्द्र प्रताप सिंह का विश्लेषण : टाइम्स आफ इण्डिया ने अपने सम्पादकीय में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के दूसरी बार चुने गए महासचिव शी जिनपिंग को नया माओ कहा है। माओ जी दोंग की जब बात होती है तो चीन ही नहीं एशिया यहां तक की विश्व कम्युनिस्ट आंदोलन में स्टालिन के बाद उसके प्रमुख प्रेणता के रूप में लोग उन्हें जानते है। दाशर्निक स्तर पर लेनिन के बाद उनकी प्रकृति, समाज, ज्ञान और वर्ग संघर्ष के बारे में द्वंद्वात्मक समझ को स्टालिन से परिपक्व और उन्नत माना जाता है। जबकि स्टालिन की द्वंद्वात्मक समझ को अधिभूतवाद से प्रभावित माना जाता है।

बहरहाल माओं के बाद देंग जिआओं पिंग चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के नेता बनकर उभरे और चीन में जो सुधार कार्यक्रम उन्होंने शुरू किया तो उन्हें ढ़ेर सारी आलोचनाओं का शिकार होना पड़ा और उन्हें चीन का ख्रुश्चेव भी कुछ लोगों ने घोषित किया। माओ निर्विवाद रूप से एक महान नेता थे और देंग की भी भूमिका चीन को खड़ा करने में बहुत महत्वपूर्ण रही है। देंग भी चीन में माओ के बाद महान नेता की ही श्रेणी में आते है और उनकी भी विचारधारा को चीनी दस्तावेज में जगह मिली हालांकि थ्येन मैन चैक में नागरिक अधिकार आंदोलन पर जिस तरह का दमन हुआ वह चीनी इतिहास में काले धब्बे के रूप में ही जाना जायेगा।

शी जिनपिंग की 19 वीं कांग्रेस के बाद जिस तरह से चर्चा हो रही है और उनके नए युग के चीनी विशिष्टता के समाजवाद को चीन के संविधान में जो जगह मिली है उससे लोग उन्हें माओ जी दोंग के बाद देंग से भी अधिक ताकतवर मान रहे है। माओ जहां वर्ग संघर्ष को ही मुख्य कड़ी के रूप में लेते हुए उत्पादन पर जोर बढ़ा रहे थे वहीं देंग ने उत्पादक शक्तियों को बढ़ाने और तद्नुरूप आर्थिक-सामाजिक संरचना को बदलने पर जोर दिया लेकिन एक समाजवादी राज्य के निर्देशन व नियत्रंण में ही चीन ने चैतरफा विकास किया। वैश्विक वित्तीय पूंजी की आक्रामकता के बाबजूद चीनी राज्य ने मौद्रिक और वित्तीय नीतियों पर अपना नियंत्रण बनाएं रखा। देंग ने चीन को अंदर से मजबूत करने, अपना उत्पादन बढ़ाने, दुनिया भर में व्यापार को विकसित करने पर जोर दिया लेकिन जिस तरह अंर्तराष्ट्रीय स्तर पर अपनी राजनीतिक भूमिका को बेहद सीमित कर दिया और अमरीका के मनमाने ढ़ग से सम्प्रभु राष्ट्रों पर की गयी कार्यवाहियों पर चुप्पी साध ली उसे लोकतांत्रिक शक्तियों में अच्छा नहीं माना गया और चीन की आलोचना भी हुई।

चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव शी जिनपिंग के जिस नए युग की बात हो रही है उसमें चीन आने वाले दिनों में देंग के बरक्स अंर्तराष्ट्रीय स्तर पर अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाना चाहता है और इसे चीन की एक साम्राज्यी महत्वकांक्षा की चाल कहकर इसकी आलोचना करना और इससे भारत के सम्भावित खतरों पर बात करना सरासर गलत है। चीन एक ध्रुवीय दुनिया को लोकतांत्रिक दुनिया बनाने की पहल करता है तो भारत को उससे लाभ होगा। बराबरी और न्यायपूर्ण अंर्तराष्ट्रीय व्यवस्था भारत के लिए बेहद जरूरी है। चीन की व्यापारिक नीति और ओबीओआर (वन बेल्ट वन रोड) की पहलकदमी को किसी भी स्तर पर साम्राज्यवादी पहलकदमी कहना पूरी तौर पर गलत है। ओबीओआर से आंखे चुराना या उसका विरोध करना उचित नहीं है।

भारत का राष्ट्रीय हित अमरीका की आंचलिक शक्ति बनने में कतई नहीं है। उत्पादन, तकनीक और व्यापार के क्षेत्र में अमेरीका जैसी ताकतें हमें कभी भी स्वावलम्बी नहीं होने देंगी। नवउदारवादी नीतियों के इन पच्चीस सालों में इससे बड़ा प्रमाण और क्या मिल सकता है कि अमरीका फस्र्ट की घोषणा जो बार-बार ट्रम्प करते है उसकी चोट हमारे ऊपर पड़ने लगी है। आईटी से लेकर ढ़ेर सारे सेवा क्षेत्र उससे प्रभावित होने लगे है, यह बताने की जरूरत नहीं है। भारत भी चीन की तरह वित्तीय, मौद्रिक और व्यापार नीतियों पर अपना नियंत्रण बनाए रखता तो हम भी हो रहे गहरे आर्थिक संकट की मार से बच सकते थे। भारत को अमरीका, जापान की धुरी से बंधने से बेहतर होता कि हम अन्य उभर रहे विकल्पों पर भी विचार करते। बराबरी की हैसियत से चीन, रूस, मध्य एशिया, ईरान जैसे देशों के साथ अपना बेहतर रणनीतिक रिश्ता कायम करना कहीं से गलत नहीं होता। खैर चाहे जो भी हो, शी जिनपिंग चीन के लिए नए युग के प्रेणता बने इसके लिए उन्हें चीन में भी एक ऐसी बहुआयामी गतिशील राजनीतिक व्यवस्था कायम करनी होगी जिसमें थ्येन मैन चैक की घटना की पुर्नरावृत्ति नहीं होगी और हर हाल में मानव मर्यादा की रक्षा होगी।

अखिलेन्द्र प्रताप सिंह

स्वराज अभियान

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एक कामरेड पत्रकार के शोषण से तंग आकर महिला पत्रकार ने सुसाइड की कोशिश की!

‘दी वायर हिंदी’ में काम करते हैं आरोपी पत्रकार कृष्णकांत… एक साथ कई लड़कियों को प्रेम के जाल में फांसने और उन्हें धोखा देने का आरोप…

उपासना झा : प्रियंका ने आत्महत्या का प्रयास किया था.. बहुत अवसाद में चल रही थी.. उसके माता-पिता पहुँच चुके हैं… अब ख़तरे से बाहर तो है लेकिन उसे इस हाल में पहुंचाने वाले कृष्णकांत पर जिस तरह उसके खेमे वाले (वामपंथी) चुप हैं वह बहुत लज्जास्पद है.. नीचे वो पोस्ट दे रही हूं जिसे प्रियंका ने खुद लिखकर अपनी वॉल पर पोस्ट किया है…

”The Wire Hindi लगातार महिलाओं से जुड़े मुद्दों को उठाता है लेकिन खुद अपने ही साथी कर्मी, एक झूठे क्रांतिकारी पत्रकार, धोखेबाज़ और धूर्त व्यक्ति का पक्षधर बना हुआ है. वायर में काम कर रहे कृष्णकांत ने एक महिला पत्रकार को इस मुकाम पर ला खड़ा कर दिया कि वह लगातार में अवसाद में रहते हुए भयानक मानसिक पीड़ा और लगातार आते अटैक्स से जूझ रही हैं. सिर्फ यही नहीं, अपनी सफाई में कृष्णकांत ने वही सब कहा जो एक अपराधी मानसिकता वाला व्यक्ति कह सकता है/कर सकता है. कृष्णकांत लगातार लोगों को मैसेज भेज कर और फोन द्वारा अपनी सफाई पेश कर रहा है कि लड़की विक्टम कार्ड खेल रही है, बदनाम कर रही है, मेरे अस्वीकार देने पर पगला गयी है. जबकि यही सारी बातें यह साबित करती हैं कि कृष्णकांत धूर्त व्यक्ति है. वह लगातार लड़की के दोस्तों को फ़ोन करके सभी पोस्टें हटा लेने को कहता है और रोने-धोने का नाटक करता है. हम हैरान हैं कि Siddharth Varadarajan जो महिला की लिस्ट में भी हैं और लगातार इस मसले से अवगत हैं वह कैसे मौन है!! कृष्णकांत की नीचता की हद यह है कि उसने यह भी कहना शुरू कर दिया है कि वायर में महिला को जॉब नहीं दी तो बदला ले रही है…यह बेहद शर्मनाक बात है कि अपनी कालीकरतूतों को छिपाने के लिए यह झूठा आदमी महिला पर अनगर्ल बातें मढ़ रहा है. कुछ दिनों पहले नेशनल दस्तक ने अपने कर्मी ओमसुधा को उसके इसी तरह के कृत्यों को जान कर उसे संस्थान से अलग किया था. ज्ञात रहे कि नेशनल दस्तक अपने तरह का एक मात्र प्रतिष्टित संस्थान है जैसा कि वायर है. हम The Wire Hindi यानी सिद्धार्थ वर्धराजन से उम्मीद करते हैं कि वह इस मसले पर अधिक देर तक और मौन नहीं रहेंगे. महिला मुद्दों पर आवाज़ उठाना और दबी चुप्पी को तोड़ना ही आपकी पहचान है जिसे आप बनाये रखेंगे ऐसी हम आशा करते हैं.”

फेसबुक पर महिलाओं के मुद्दे को लेकर सक्रिय लेखिका उपासना झा की वॉल से.

उपरोक्त स्टेटस पर आए ढेर सारे कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं…

Naveen Raman शर्म आती है ये कहते हुए कि ये हमारे परिचित हैं। मुझे तो नफरत हो गयी है वामपंथियों से।

उपासना झा इस आदमी पर केस दर्ज होना चाहिए। एक साथ न जाने कितनी लड़कियों को बेवकूफ बना रहा था। उसे जेल जाना चाहिए।

Mamta Pandey हाँ…पर इस तरह मरने से बेहतर है उसे ही मार देती!

Suyash Deep Rai वो प्रियंकाके लिए प्रेस क्लब नही जाएँगे। फुटेज नहीं मिलेगा न। क्रांतिकारी पत्रकार थोड़े न हैं, अभिनेता हैं सारे के सारे। ख़ासतौर पर ये ब्रिगेड।

Sarjana Sharama nothing new. this is way communist and all left leaning people behave. They have double standards. Sidhrath vardrajan is leftist . These people believe in freedom of body freedom of kiss on the road. For them women are just to be used and abused. Though they –hathi ke daant khaney ke aur dikhaney ke aur

Apoorva Pratap Singh आप खेमेबंदी देखिये ! अभी कुछ और मामला होता, जनता इंसाफ दिलाने निकल पड़ती । इनके टुच्चेपन को देख के लगता है कि इनकी दुर्गति सही ही हो रही है

उपासना झा डेढ़ महीने से ये बड़े लोग चुप हैं। मौन व्रत कर रहे। पिछले साल योगिता को इसने इसी हाल में पहुंचाया था। अगर प्रियंका परसों रात में मर जाती तो!

Nishant Yadav इसकी पोस्ट देखी थीं कितना आदर्शवादी बनता था, यार जो आदमी रिश्तों में ईमानदार न हो वो काहे का आदर्शवादी, यहां फ़ेसबुक पे ऐसे ऐसे पोस्ट लिखते हैं कि ये दुनिया बदल देंगे, और खुद वहीं उसी कीचड़ में पड़े हैं

उपासना झा एक नहीं, कई लड़कियों को उल्लू बनाया

Nishant Yadav हाँ मेने प्रियंका के पोस्ट पढ़ें हैं पहले वो मित्र थीं अब पता नही कैसे अनफ्रेंड हो गई तो पढ़ नही पाया, आज पढ़े, कई लड़कियों को धोखा दिया, और मेने तो देखा है लड़कियाँ अक्सर शादी और प्यार के झांसे में आजाती हैं मैन कई ऐसे केस देखें हैं.. बाकी ये तो ऐसे ऐसे क्रांतिकारी पोस्ट करता था, और खुद के जीवन मे ये हाल है

Shams Hussain दुःखद! कृष्णकांत को अच्छा साथी समझता था मैं. बेहद वाहियात किश्म का टुच्चा आदमी निकला. आज प्रियंका के अवसाद में जाने का दोषी सिर्फ और सिर्फ कृष्णकांत हैं.

अनु प्रिया जल्द ठीक हो जाओ प्रियंका..!! कृष्णकांत को सजा मिलनी चाहिए !!

उपासना झा हाँ अनु जी, सज़ा मिलनी चाहिए

Neera Jalchhatri शुक्रिया उपासना ….प्रियंका की खबर देने के लिए….कई दिनों से कुछ पता नही चल रहा था…ये सूचना बहुत दुखद है. उसे हिम्मत से काम लेना होगा…..और अपने आपको कष्ट देने के बजाय कानूनी लड़ाई की तरफ़ जाना चाहिए…

सरस जैन ऐसे लोगों के सामाजिक बहिष्कार की जरूरत हैं, इनको लज्जित करना जरूरी।

Aparna Anekvarna He should be booked for this.. I met her once at the book fair. A well mannered, sweet girl who helped me choose books. I am unable to associate that bubbly girl with this trauma.. how this stress has affected her.. more power to her!

उपासना झा अपर्णा जी, उसने इस हाल में मदन योगिता को भी पहुँचाया था।

Manisha Choudhary हर चीज़ को अपने वाद से ही तौलने की कोशिश करेंगे लोग तो इंसानियत जियेगी कैसे

Amarendra Kishore जो भी हुआ दुखद है।प्रियंका हिम्मत से काम ले।किसी के बगैर भी ज़िन्दगी चलती है–इसलिए उसे अपना मन मजबूत रखना होगा।आत्महत्या किसी समस्या का समाधान नहीं है।इस मामले को आपी या वामी से जोड़ने का घटिया प्रयास खेदपूर्ण है।यह समस्या है जिसका समाधान समाज के स्तर पर कानून के रास्ते से हो।
उपासना झा यह इसलिए कि अगर किसी संघी ने किया होता तो इनका उत्साह देखते आप।

Amarendra Kishore करनेवाला न संघी होता है और न आपी, न कांग्रेसी।करनेवाला सिर्फ करनेवाला होता है।किये जाने के बाद जनता ही कुछ करती है। गर्भवती शिवानी भटनागर को मां बनानेवाला पहले इंसान था तब वह किसी पार्टी से था।कर्ता अपने कर्म के बाद झंडे का इस्तेमाल अपने बचाव में करता है।डेरा सच्चा सौदा इसका उदाहरण है। उसे किसका संरक्षण था। उसके साथ किसने गठबंधन था? क्या गठबंधन करनेवाले राजनीतिक दल ने उसे अनाचार की छूट दी थी? शायद नहीं।

Rakesh Singh ए बात आज प्रियंका प्रकरण मे उसके पोस्ट पर कही जा रही है, जो एक तरह से आवरण सदृश दिखता है| अगर यही विचार सामने वाले प्रकरणो मे भी अपनाए जाय ,तो हम सब संयुक्त रूप से अपराधियो पर ज्यादा प्रहार कर सकते हैं | अमरेन्द्रजी विचार सही है आपका पर इसका प्रयोग पूर्वाग्रही रूप में ही हुआ है |उपासना जी आपके इस सहज प्रयास को बहुत बधाई व शुभकामनाएँ |

उपासना झा पिछले डेढ़ महीने से इस मुद्दे पर बड़े लोग चुप्पी साधे हुए हैं।

Amarendra Kishore आप इस मामले को वामी होने से क्यों जोड़ रहीं हैं। और इतनी बड़ी दो घटनाओं आसाराम और डेरा सच्चा सौदा के बाद? इस समस्या के मानवीय पहलू को समझिए। हां,कानून अपना काम करे, ये जरूरी है।

Nishant Yadav मैंने आज प्रियंका के सारे पोस्ट पढ़े, पहले वे मित्र सूची में थी , कृष्णकांत मेरे भी सूची में है कितना कमज़र्फ निकला, लोगों के कई चेहरे होते हैं उसकी पोस्ट कितनी क्रांर्तिकारी , होती थी, जातिवाद, ऑनर किलिंग, प्रेम सबके ऊपर, लेकिन खुद ही इसमें डूबा हुआ है ये सब पत्रकारों का यही हाल है क्या , यहां लिखते कुछ हैं और जीवन मे होते कुछ हैं

Sarjana Sharama Leftist will talk about women rights and most them leave their wife or husband for another male or female. Shabana azami and sitaram yetury are two major example. But I love the honey irani attitude . She said— let jawed akhtar marry shabana who will fight for this Buddha ( old man)

Amarendra Kishore पत्नी को छोड़ने की परंपरा किसी एक राजनीतिक दल की नहीं है। एक महिला और मानवीय होकर लिखिए,बोलिये।पार्टी प्रवक्ता बनने की जरूरत शायद अब नहीं है।खास तौर से इस मामले में।

Sarjana Sharama It is not your wall do not teach me I stand by my statement leftists talk about child labour bring minors as domestic help from Bengal and Bihar. Suppose u.s.a but their children study in U.S on American scholarship . They wear lives jeans smoke 555 talk about women rights and practice multi relations. When I come on your wall you can object

Amarendra Kishore ऐसा लिखना शायद आपकी विवशता हो मगर यहां कौन कम है।गरीबों और जरूरतमंदों की चिंता करनेवाला कोई एक भी हो तो बताएं।किसी भी दल का। आपको 555 और जीन्स दिख गया।विदेश में पढ़ते बच्चे दिख गए लेकिन उन दलों का हाल भी बयाँ करें जहां जूतों में दाल बांटे जा रहे हैं।

Sarjana Sharama I have many leftist friends I have seen the reality this is my experience . They I read something and themselves practice something else. I can not give their names and detail . Do not undermine others.. One should follow what you preach . Leftist only preach

Ramashish Kumar ये वही कृष्णकांत है क्या जो गले में गमछा लपेट कर सात्र हुआ करता था/है? कितनी बड़ी बड़ी बातें करता था/है वो ! इसीलिये जरुरी है कि लेफ्ट के इस चिंतन से परहेज करना चाहिये कि मनुष्य सिर्फ देह है । खास कर स्त्रियों को ! लेकिन सुनता कौन है ! और ये भी जरुरी है कि उन्हें किसी भी के लिखे को बहुत धीरे धीरे पढ़ना चाहिये, शब्द में नहीं उलझन चाहिए । लिखे के पीछे के भाव को समझना चाहिए । धीरे धीरे व्यक्तित्व समझने में मदद मिलेगी।

Rustam Hayat Khan Koi us krishnkant ka ek pic to share karo…

Animesh Mukharjee मेरा एक विनम्र सवाल है, सम्भव हो तो समझाएं। दोनों लंबे समय से एक रिलेशन में थे, कई कारणों से जिनमें कृष्णकांत की गलतियां ज़्यादा होंगी, ये रिश्ता नहीं चल पाया। प्रियंका खुद भी इससे बाहर ही जा चुकी हैं। कृष्णकांत भी शायद ऐसा कुछ चाहते हैं। ऐसे में वायर क्यों दोषी है, कृष्णकांत अपराधी क्यों हैं? क्या kk किसी तरह से ब्लैकमेल कर रहा है। क्या बिना कंसेंट के कुछ करने का मामला है। अगर kk सीरियल मोलेस्टर है तो और लड़कियां सामने आएं, वरदराजन से मिलें। अपराध क्या है मुझे अभी तक समझ नहीं आया।

उपासना झा अनिमेष एक साथ कई लड़कियों को बेवकूफ़ बनाना अपराध ही है। शादी के नाम पर सम्बन्ध बनाना भी

Amarendra Kishore सवाल सहमति का नहीं है।सवाल उसकी निजता को असुरक्षित करने का है। किनाराकशी अन्याय है।लेकिन इस अन्याय का प्रतिकार हो।प्रियांका गलत कर रही है।उसे सहानुभूति चाहिए। लेकिन मामले को समझना होगा– जब जैविक रिश्ते में दरार आ सकता है तो ऐसे रिश्तों का वजूद तो कपूर के धेले के माफिक होता है। कृष्णकांत को जेल भेजना समाधान नहीं है।

उपासना झा हाँ, मैंने प्रियंका को यही कहा था कि सब लड़कियाँ एकसाथ केस करो

Amarendra Kishore चोर दरवाजे या सहमति या शादी के इरादों से बने विवाहपूर्व संबंध शायद ही सकारात्मक दिशा और निश्चित मुकाम हासिल कर पाते हैं। शादी से पहले सम्बन्ध बन जाना आज की तारीख में एक आम बात है शहरों में। ज़्यादातर लोग इसके बाद शादी न होने को सहजता से लेते हैं। शादी का वादा करके सम्बन्ध बनाने में में पीड़ित की गलती ज़्यादा मानता हूं। अगर लड़की को बाद में लगे कि लड़का सही नहीं तो? तब वो बाहर नहीं जाएगी रिश्ते से? विवाहपूर्व या विवाहेत्तर संबंध केवल शहरी ज़िन्दगी का मौकापरस्त मनोवृति नहीं है।सहमति दोनो की होती है,समाज की नहीं।लेकिन एक पक्ष को बाद संबंध रास नहीं आकर रिश्ते से खुद को अलग कर लेना और दूसरे का ठगा महसूस होना केवल लड़का या केवल लड़की के साथ नहीं होता।समाज से अलग हटकर या उसके प्रारूप को धता बताकर बने ऐसे सहमतिमूलक संबंध एक दूसरे से लाजमुक्त हो चुके होते हैं।गलती दोनों पक्षों की होती है।

Sudipti Satyanand यही मुझे भी लगता है। प्रियंका को पहले दिन से सपोर्ट करने, समझाने के बाद भी यही कि अगर रिश्ते में इतनी बार दरारें आईं, खामियां रहीं और बाहर आ गए तो ऐसे आदमी के।लिए जान क्यों देना? शादी अगर हो भी जाए तो नहीं चलती है तो लोग अलग होते हैं न? संबंध नहीं चला, अलग हो गए, उसकी धूर्तता भी सामने लायी गयी पर अब उस लड़की को बाहर आना चाहिए न? शादी नहीं चलती तो लोग तलाक लेते हैं जान नहीं देते।

Amarendra Kishore आप बिलकुल सही कह रहीं हैं–किसी ने कहा भी है कि आँसुओं में धुली खुशी की तरह,रिश्ते होते हैं शायरी की तरह।रिश्ते निभाने की अंदर से ज़िद्द होती है। डंडे के बूते न रिश्ता चलता है और न ही कानून का भय दिखाकर रिश्तों की मिठास लौटाती है।यदि कल तक प्रेम था तो आज प्रतिकार क्यों? जो भी वक़्त गुजार लिया उसके अच्छे पलों को याद कर आगे बढिये– वह तुम्हारा नहीं था, लिहाजा नहीं लौटा, तुम्हारा होता तो कहीं नहीं जाता। कल तक सहमति थी यानी दोनो की इच्छा थी।परस्पर संतुलन रख पाना दोनो के बूते की बात नहीं थी।इसलिए गलती भी दोनो की रही होगी।

Gunjan Jhajharia दी कल से सोच रही हूँ, प्रियंका को कुछ मैसेज करूँ, लेकिन समझ नही आ रहा क्या लिखूँ। वामपंथ विचारधारा आइडियल है, लेकिन इसके फॉलोवर्स आइडियल नहीं हैं। कृष्णकान्त को सजा मिलनी चाहिए, लेकिन दी प्रियंका का इश्क़ पाक था, उसको सज़ा मिलने से भी उसे कोई फर्क नहीं पड़ेगा, बस इसे समय चाहिए। जरूर ये मुश्किल समय होगा, लेकिन हिम्मत रखनी होगी। खुद का साथ देना होगा प्रियंका तुम्हें, तुम अपने आपको नहीं छोड़ सकती। तुम ये समझ लो, ऐसा हर दूसरे आदमी के साथ होता है, जब उनके जज्बातों से खिलवाड़ किया जाता है, और फिर बदनाम करने की कोशिश की जाती है।
तुम उन सभी से कमज़ोर नहीं हो,
खुद को कमज़ोर साबित मत करो,
उसे छोड़ खुद पर ध्यान दो, उसके साथ क्या हो क्या नहीं, कुछ भी कहे वो, सच्चाई तुमसे बेहतर कौन जानता है। तुम खुद से इस कीमती जिंदगी के अच्छे पल नहीं छीन सकती। प्रियंका तुम्हें अभी बहुत कुछ करना है दूसरों के लिए भी। सबको तुमसे उम्मीदें हैं। कम से कम मुझे तो हैं।

DrAjit Pandey वामपंथ का पाखण्ड यही है। जिन मुद्दों पर दूसरों को कटघरे में खड़ा करते हैं, उन्हीं मुद्दों पर वे अमल करते हैं। BHU के प्रोफेसर कृष्णमोहन सिंह ने 2014 में अपनी महिला मित्र के साथ मिलकर अपनी पत्नी की खुलेआम पिटाई की थी। उनकी पत्नी ने उनके इस अवैध सम्बन्ध का विरोध किया था लेकिन प्रोफेसर अपने घर में महिला मित्र को ले आये थे। वस्तुतः हर वाद के समर्थकों में ऐसे लोग मिल जाते हैं जिनकी कथनी और करनी में अन्तर होता है।

Mrinal Ashutosh पहले प्रियंका जी को ठीक होने दीजिये। फिर इस मामले को सही से ठीक करिये। @#$कांत से भी पूछ लीजिये कि जनाब, क्या है यह? अपना विचार जल्दी बताओ। नहीं तो दूसरा विचार किया जाएगा।

Majdoor Jha मैं अपने निजी अनुभव में द वायर और नेशनल दस्तक के अलोकतांत्रिक रवैये को महसूस कर चुका हूं। विस्तार से इस पर जरूर लिखूंगा। लेकिन एक बात जरूर कहना चाहूंगा वह ये कि हमारे तमाम सामाजिक सरोकार के कार्यक्रमों के बावजूद हमें जनता से शिकायत रहती है कि वह इतना अलोकतांत्रिक शक्तियों को ही क्यों चुनती है। तो इसका जवाब है कि जब जब आपको अपने और सच में से एक को चुनना होता है आप सच का गला घोंट देते हैं और ये बात वह जनता भी जानती है जिसे आप बेवकूफ समझते हैं ।

Devesh Pandey घटना दुःखद है….. पर कहीं ना कहीं दुख के कारण को इन लोगों ने स्वयं चुना है। धोखा देने वाला दोषी है पर जो धोखा खाते जा रही हैं उनको भी विचार करना चाहिए

Ritu Tiwary घरवाले उसको लेकर गाँव चले गये। वो जल्दी आये सब प्रार्थना कीजिए।

सुलोचना लड़कियों को कुछ क्रांतिवीर बेवकूफ समझते हैं और एक साथ एक से अधिक अफेयर चलाते हैं जैसे कि उन्हें कुछ पता ही न चलेगा

Arvind Arora अपने विषैले ज़हनों की गंदगी लीप-पोत कर आरोपी को मौक़े पर ही ‘क्लीन चिट’ दे रहे और प्रियंका को क़ानूनी कार्यवाही से रोकने का हर जतन घिनौना प्रयास कर रहे दरिंदों के कमेंट पढ़ रहा हूँ और घिन से भर रहा हूँ उपासना झा. यही वह लोग हैं जो कुछ दिनों से BHU मामले पर स्त्रीवाद का झंडा फहराते घूम रहे थे!? थू है इस बेशर्मी पर. कैसे-कैसे हैवान घूम रहे हैं आसपास की दुनिया में इंसान की पहचान और सरोकारों का नक़ाब ओढ़े!

Arvind Arora  इस पोस्ट को और कुछ वक़्त ख़र्च कर के सारे कमेंट्स को भी पढ़िए और हो सके तो इस पर लिखिए भी Shobha Shami. अभी परसों ही आपने पोस्ट लिखी थी कि कैसे ख़ुद को Politically Correct रखने के लिए आपकी एक मित्र ने आपको ही उलाहनों भरी ‘शिक्षा’ दी थी, यहाँ तो बड़ी संख्या में प्रियंका को आगे कार्रवाई न करने की ताक़ीद के साथ ही आरोपी को अभी से ही ‘क्लीन चिट’ देने वाले लोग दिख जाएँगे आपको. और ध्यान रहे यह सब अभी तक BHU वाले मसले पर हायतौबा मचा कर स्त्रीवाद के सर्टिफिकेट जीतने वाले लोग हैं.

उपासना झा विभा रानी नाम की एक महिला में मेरे इनबॉक्स में पहुँच गयी। बोल रही कि आप केस करिये मैं बेल कराऊंगी।

Arvind Arora ऐसा!? बताओ, यह लोग गिरोहबंद अपराधियों से कैसे कम हैं!?

Arti Varma yakeen nahi hota priyanka jaisi strong ladki aisa kar sakti hai..kis hadd tak aahat thi tum dost:'( jaldi niklo isse aasaan nahi hai par namumkin bhi nahi

Pragya Pande यह क्या मामला है । अभी आपकी वाल से पता चला। ईश्वर प्रियंका को जल्दी स्वस्थ करे।

Shreekant Satyadarshi U have unravelled many masks Upasanaji,i hope culprit heads will roll,sincere accolades to u

Qamrul Hasan Siddiqui The Wire को इसपर तुरंत संज्ञान लेना चाहिए वर्ना उनकी छवि को धूमिल होने में समय नहीं लगेगा।

Mamta Pathak Sharma वामपंथी अपनी सुविधानुसार बोलते हैं उपासना झा…प्रियंका स्वस्थ हों और घर आयें…ऐसी कामना है…

Chandrakala Tripathi मध्यवर्गीय सुविधापरस्ती के फ्रेम में ज्यादातर हैं। उन्हें इसका भाष्य चतुराई से करने भी आता है। स्त्री के लिए भी वही निरंकुशता उसके स्पेस का फायदा उठाना। कोई भी घटना उठा कर देखो इनके पैतरे दिख जाएंगे। यहां वाम दक्षिण सब एक से दिखेंगे। जरूरी है कि प्रियंका को साहस में लौटाया जाए। मुकाबला करना चाहिए इसका।

Ritu Tiwary किसी का चरित्र उसका व्यक्तिगत होता है..उसका किसी विचारधारा से सम्बंध नहीं..।कृष्णकांत का जो चरित्र वर्णन मैंने देखा ये ज़रूर उम्मीद करूँगी कि उनके मित्र जो उनके साथ उठते बैठते थे उन्हें मामले में पड़ना चाहिए..आख़िर समाज का भय कहाँ चला गया। इतनी उद्दंडता वो इसी वजह से करने का साहस कर रहा है क्योंकि उसे परिवार, दोस्त, रिश्तेदार और समाज का भय नहीं। ये भय लोगों में ख़त्म होगा तो अराजकता बढ़ेगी।

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कॉमरेड फिदेल कास्त्रो : एक क्रांतिकारी जीवन का उत्सव

फिदेल कास्त्रो 90 वर्ष की उम्र में एक दीर्घ सक्रिय जीवन जीने के बाद २५ नवम्बर २०१६ को इस दुनिया से रुखसत ज़रूर हुए लेकिन वे करोड़ों – अरबों दिलों में हमेशा के लिए बसे रहेंगे। वे बेशक दुनिया के दूसरे सिरे पर मौजूद एक छोटे से देश के शासक थे लेकिन उन्होंने अनेक देशों की आज़ादी की लड़ाई में निर्णायक भूमिका निभायी और बेहतरीन मानवीय गुणों वाले मनुष्य समाज को बनाया। कहा जा सकता है कि अगर फिदेल न होते तो अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के अनेक देशों के  मुक्ति संघर्षों का नतीजा बहुत अलग रहा होता। उनके निधन के उपरान्त इंदौर में उनके प्रशंसकों ने तय किया कि फिदेल की याद में कोई कार्यक्रम शोक या श्रद्धांजलि का नहीं किया जाएगा बल्कि उनकी याद में एक क्रांतिकारी जीवन का उत्सव मनाया जाएगा।

इसलिए ३ दिसम्बर २०१६ को इंदौर के सभी प्रगतिशील-जनवादी और वामपंथी संगठनों द्वारा फिदेल कास्त्रो की याद में “फिदेल कास्त्रो : एक क्रांतिकारी जीवन का उत्सव” कार्यक्रम आयोजित किया। अखिल भारतीय शांति एवं एकजुटता संगठन (एप्सो),  भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, सोशलिस्ट यूनिटी सेंटर ऑफ इंडिया (एसयूसीआई), भारतीय जन नाट्य संघ, जनवादी लेखक संघ, प्रगतिशील लेखक संघ, मेहनतकश, रूपांकन और संदर्भ केंद्र का ये संयुक्त आयोजन हिदी साहित्य समिति  सभागृह में किया गया।  वक्ताओं में भी उनके नाम तय किये गए जो क्यूबा जा चुके हैं और अपनी नज़रों से क्यूबा देख चुके हैं। इंदौर में ऐसे दो ही नाम ढूंढें जा सके। एक अर्थशास्त्री डॉ. जया मेहता का जो १९९० के दशक में कुछ महीनों के लिए क्यूबा गईं थीं, एक बैंक अधिकारी यूनियन के प्रमुख राष्ट्रीय नेता आलोक खरे का जो कुछ वर्षों पहले  ट्रेड यूनियन के अंतरराष्ट्रीय सम्मलेन में भाग लेने क्यूबा गए थे  और एक भोपाल के वरिष्ठ पत्रकार लज्जाशंकर हरदेनिया जो १९७० के दशक में पत्रकारों के एक अंतरराष्ट्रीय सम्मलेन में भाग लेने क्यूबा गए थे।

कार्यक्रम की शुरुआत में फिदेल कास्त्रो और क्यूबा का संक्षिप्त परिचय देते हुए जया मेहता ने बताया कि फिदेल कास्त्रो का यूँ तो पूरा जीवन ही संघर्षपूर्ण था लेकिन मैं तीन संघर्षों को उनके सबसे बड़े संघर्ष मानती हूं। पहला संघर्ष जो उन्होंने अपने देश क्यूबा को बटिस्टा की तानाशाही से आजाद कराया। दूसरा संघर्ष था क्यूबा जैसे पिछड़े देश में में समाजवादी व्यवस्था और समाजवादी चेतना कायम करने का। उनका तीसरा सबसे बड़ा संघर्ष था  कि जब  ९० के दशक में सोवियत संघ का विघटन हो गया और पूर्वी योरप के देशों में समाजवादी व्यवस्थाएं ढह गईं तब बिना डगमगाए समाजवाद के परचम को क्यूबा ने थामे रखा।

डॉक्टर जया मेहता, आमिर और विक्की द्वारा अमेरिकी डाक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता सॉल लैंडो द्वारा फिदेल कास्त्रो पर बनाई हुई डॉक्यूमेंट्री “फिदेल १९७१” के चुने हुए हिस्से दिखाए। फिल्म के इन दृश्यों से फिदेल और उनके साथियों का क्रांतिकारी जीवन, क्यूबा की जनता के साथ उनका जीवंत संबंध, क्यूबा की जनता का संघर्ष, आजादी के बाद देश की समस्याएं और समाधान ढूंढने के जनवादी तरीके फिल्मों के इन टुकड़ों के माध्यम से दिखाए गए।

पहले दौर में क्यूबा को मुक्त कराने का संघर्ष भी एक हैरतअंगेज़ बहादुराना संघर्ष था जिसमें उनके पास न अधिक साथी थे और न ही अधिक संसाधन। फिर भी उन्होंने मुक्ति की अदम्य चाहत, विवेक संम्मत रणनीति और सजगता के साथ दृढ इच्छाशक्ति से जीत हासिल की। इसमें उन्हें हौसला और साथ हासिल हुआ सिएरा मेस्त्रा के गरीब किसानों का जिनका रक्त शोषण की आंच में  सूख रहा था। उस गुरिल्ला लड़ाई और साथियों की याद फिल्म में फिदेल को भावुक कर देती  है।

फिल्म दिखाने के साथ-साथ डॉ. जया मेहता ने बताया कि जब फिदेल ने बटिस्टा के खिलाफ गुरिल्ला लड़ाई छेड़ी तो उनके साथ मात्र ३०० साथी थे जबकि उनके खिलाफ 10 हज़ार हथियारबंद सेना थी। फिल्म में फिदेल कहते हैं कि हम क्यूबा की सिएरा मेस्त्रा पहाड़ों के जंगल में थे जिसका हम चप्पा चप्पा जानते थे। हमारा मोर्चा सुरक्षित जगह पर था लेकिन फिर भी हमें स्थानीय किसानों और गाइडों का सहारा लेना पड़ता था। कई बार ऐसा हुआ जब लोगों ने हमें धोखा दिया। पद और पैसों के लालच में हमारी जानकारी सीआईए को दे दी गयी। कई बार हम बाल-बाल बचे और कई बार हमारे साथी शहीद हुए। उन्होंने हवाई जहाज़ों से भी हम पर हमले किए। लेकिन हर मुठभेड़ ने हमें मज़बूत बनाया और कई बार बचने के बाद हमें ये भरोसा हो गया था कि अब हमें कोई नहीं हरा सकता।

फिदेल ने एक शोषक तानाशाह से अपने देश को मुक्त करवाकर एक अशिक्षित, अविकसित और संसाधनहीन देश की बागडोर संभाली। सन १९५९ में क्यूबा में क्रांति हुई और देश अमेरिकी साम्राज्यवादी तानाशाही और शोषण से आज़ाद हो गया, लेकिन ठीक अमेरिका के पीछे मौजूद क्यूबा में नयी व्यवस्था कैसे कायम  की जाए, जो लोगों के लिए बेहतर ज़िन्दगी देने वाली हो, ये सवाल क्रांतिकारियों के लिए भी बहुत अहम् था। इसी सवाल से जूझते हुए फिदेल  कास्त्रो इस नतीजे तक पहुंचे कि मनुष्य का सही विकास केवल समाजवादी  सकता है, न कि पूँजीवाद में। जिस समाजवादी राष्ट्र का उन्होंने निर्माण किया उसमें उन्होंने जनवाद को समाज के निचले सिरे तक पहुंचाना सुनिश्चित किया। ये उनका दूसरा बड़ा संघर्ष था।

फिल्म में फिदेल लोगों से खूब मिलते-जुलते दिखते हैं। वे खुद भी कहते हैं कि बटिस्टा का तख्ता पलटने के बाद हमारे पास असल समस्या थी कि देश को कैसे चलाया जाए, लेकिन हमें भरोसा था कि हम कर लेंगे।  फिदेल कहते हैं कि मेरे काम करने का तरीका ये है कि मैं दफ्तर में लगभग नहीं के बराबर रुकता हूँ और अक्सर गाँवों और बस्तियों में लोगों के पास जाता रहता हूँ। जनता से बेहतर आपको कोई अपनी समस्याएं नहीं समझा सकता और समस्याएँ ठीक से समझे बिना आप उनका सही समाधान नहीं ढूँढ़  सकते।

फिल्म में क्यूबा की क्रांति के १५  वर्ष पूरे होने पर फिदेल को क्यूबा के अपने देशवासियों को संबोधित करते दिखाया गया है। वे क्रांति की १५ वीं वर्षगाँठ को अपने साथी शहीद चे गुएवारा को समर्पित करते हुए सामने मौजूद लाखों की जनता से कैसे जोशीला संवाद स्थापित करते हैं,  इसे लक्ष्य करके डॉ. जया मेहता ने फिदेल के बारे में चे गुएवारा की बात को साझा किया।  चे कहते थे, ‘फिदेल का जनता से जुड़ने का तरीका कोई तब तक नहीं समझ सकता जब तक उन्हें उस रूप में कोई देख न ले। वे जनता से इस तरह संवाद स्थापित करते हैं मानो किसी चिमटे की दो भुजाएं एक जैसे कम्पित हो रही हों, बिलकुल सम पर। ये कम्पन बढ़ता जाता है और चरम तक पहुँचता है जिसमे फिदेल उस संवाद को ‘संघर्ष, इन्किलाब की जीत’ की गर्जना से अचानक समाप्त करते हैं और वो जनता के भीतर बहुत देर तक झंकृत होता रहता है।’

तीसरे दौर का संघर्ष, जिसे ‘मुश्किल दौर (difficult peiod)’ कहा जाता है, 90 के दशक में शुरू हुआ। इस दौर में सोवियत संघ की सरकार गिर चुकी थी। सोवियत संघ से सभी विकासशील देशों को बहुत सहायता मिलती थी। सोवियत संघ के बिखरने से क्यूबा को भी बड़ा आघात पहुंचा। लेकिन फिदेल ने अपनी जनता से कहा कि इतिहास ने समाजवाद को आगे बढ़ाने की ज़िम्मेदारी हमें सौंपी है और हम इसे कामयाबी से निभाएंगे। और तमाम मुश्किलों के बाद भी पूरे क्यूबा को साथ लेकर समाजवाद की जिम्मेदारी को उन्होंने मजबूती से आगे बढ़ाया। फिदेल कास्त्रो ने अपनी मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति से अपनी पूरी आबादी को साथ में लेकर उस ‘मुश्किल दौर’ को पार किया। क्यूबा बटिस्टा के जमाने से यानि 1960 के पहले से ही रासायनिक खेती और उत्पादन की पूंजीवादी पद्धतियों से चल रहा था। अमेरिकी कॉरपोरेटों के लिए गन्ने की खेती और शक्कर का उत्पादन ही उनकी एकमात्र आर्थिक और उत्पादन गतिविधि थी जो वो अपनी ही ज़मीनों पर गुलामों की तरह करते थे। क्रांति के बाद भी क्यूबा रासायनिक उर्वरक आधारित खेती से अपनी आर्थिक व्यवस्था चलाता था। ये फर्क ज़रूर आया था कि अब वो अपनी शक्कर अमेरिका के बजाय मित्र देश सोवियत संघ को बेचने लगा था जिसके उसे अच्छे दाम और अन्य अनेक सहयोग मिलते थे।

क्यूबा ईंधन के लिए पूरी तरह सोवियत संघ से प्राप्त होने वाले तेल पर आश्रित रहता था। सोवियत संघ के विघटन के बाद जब तेल और रासायनिक खाद की आपूर्ति मिलना बंद हो गई। लेकिन क्यूबा लड़खड़ाया नहीं क्योंकि क्यूबा की क्रांति तेल और बाहरी मदद पर आधारित नहीं थी, बल्कि क्यूबा की क्रांति समाजवाद के मूल्यों पर आधारित थी। अपने देश के लोगों की मदद से फिदेल कास्त्रो ने अपने समाज में आमूलचूल बदलाव लाकर भी समाजवाद को कायम रखा। उस वक्त फिदेल की उम्र करीब 65 साल रही होगी जब उन्होंने अपने नागरिकों को अपने देश को सन्देश दिया कि हम अब साइकिल चलाएंगे। रातोरात चीन से हजारों-लाखों साइकिल आयात की गई और 65 बरस की उम्र में खुद फिदेल कास्त्रो ने भी साइकिल चलाना सीखा। पूरा मुल्क मोटर- कारों को छोड़कर साइकिल पर आ गया।

क्यूबा की लगभग 99% खेती रासायनिक उर्वरकों पर आधारित थी। फिदेल कास्त्रो ने अपने वैज्ञानिकों का आह्वान किया कि अब हमारे पास रासायनिक खाद का संकट है, और उनके वैज्ञानिको ने बमुश्किल पांच से 10 सालों के भीतर क्यूबा को जैविक खेती के क्षेत्र में दुनिया में अव्वल नंबर पर पहुंचा दिया। क्यूबा की शिक्षा व्यवस्था, क्यूबा के डॉक्टर, क्यूबा की रिहायश व्यवस्था, क्यूबा की रोजगार व्यवस्था – यह सब मिलकर क्यूबा को क्यूबा बनाती हैं और फिदेल कास्त्रो को फिदेल कास्त्रो।

फिल्म में फिदेल कहते हैं जनता के पास अगर घर है तो उन्हें रोड चाहिए। रोड हैं तो उन्हें परिवहन चाहिए। परिवहन मिल गया तो उन्हें अस्पताल चाहिए, स्कूल चाहिये, वगैरह, वगैरह। इसलिए उनकी ज़रूरतों को समझने का बिना उनके पास जाए कोई  विकल्प नहीं है। और ये काम लगातार होते रहना चाहिए। कार्यक्रम का सूत्र संचालन करते हुए विनीत तिवारी ने फिल्म का एक दृश्यबंध दिखाते हुए कहा कि फिदेल के समाजवादी शासन – प्रशासन से क्यूबा की पूरी जनता खुश हो गयी हो, ऐसा नहीं था। जो मुट्ठी भर लोग बटिस्टा के शासन में लाभ उठा रहे थे, उनके मुताबिक तो फिदेल ने क्यूबा को नरक बना दिया था। फिदेल ने ज़मींदारों से ज़मीनें चाहें लीं और उन्हें भी खेतों में काम पर लगा दिया। फिल्म में ऐसे सुविधाभोगी लोगों के साक्षात्कार दिखाए गए जो क्यूबा छोड़कर अमेरिका में मियामी, फ्लोरिडा, और न्यू यॉर्क  तरफ जाने  आवेदन लेकर क़तार में खड़े हैं। उनसे पूछा गया कि क्यों जाना चाहते हैं आप क्यूबा छोड़कर तो वे कहते हैं, ‘यहां तो हमारे बच्चों का भविष्य असुरक्षित है, यहां उन्हें क्रांतिकारी बातें सिखा रहे हैं।’ एक कहता है, ‘मैं अच्छा-खासा व्यापारी था। मुझे उन्होंने खेत में काम पर लगा दिया। देखिये काम करते करते मेरी नाक में चोट भी लग गयी।’ फिल्म में बताया गया कि क्रांति के बाद क्यूबा में ये नियम बनाया गया कि अगर किसी को देश छोड़कर जाना है तो राष्ट्र निर्माण में श्रमदान करके बिना प्रमाण पत्र  हासिल किये नहीं जा सकते हैं। ऐसे ही चंद सौ असंतुष्ट लोगों के ज़रिये दुनिया भर में फिदेल को बदनाम करने की कोशिश की गयी हालांकि वे अधिक कामयाब नहीं हुए। फिदेल का कहना था कि समाजवादी दुनिया में गैरबराबरी को जगह नहीं दी जा सकती।

फिल्म का अंतिम हिस्सा फिदेल कास्त्रो के अंतरराष्ट्रीयतावाद पर है। उल्लेखनीय है कि फिदेल ने अनेक पड़ोसी  देशों को ही नहीं बल्कि अफ्रीका के भी अनेक देशों को मुक्ति संग्राम जारी रखने के लिए मदद की। फिदेल कास्त्रो ने अपनी लड़ाई को केवल एक देश की आजादी तक सीमित नहीं रखता उनका कहना था समूची मानवता सारी इंसानियत ही मेरा देश है इसलिए जहां कहीं भी शोषण और अन्याय के खिलाफ जनता लड़ रही थी वहां उन्होंने क्यूबा की ओर से मदद मुहैया कराई। ये मदद केवल आर्थिक ही नहीं थी, बल्कि क्रांतिकारियों को प्रशिक्षण भी दिया और अपने सैनिक भी भेजे। कार्यक्रम में मंच पर लगे मुख्य बैनर पर भी यही सन्देश लिखा था – ‘इंसानियत हमारा मुल्क है।’ जया मेहता ने बताया कि केवल दक्षिण अफ्रीका ही नहीं, फिदेल कास्त्रो के नेतृत्व में क्यूबा ने अंगोला, अल्जीरिया, तंज़ानिया, इथियोपिया सहित अनेक देशों में भी क्यूबा के सैनिकों ने स्थानीय तानाशाह से निपटने में जनता और क्रांतिकारियों की मदद की। फिल्म में अफ्रीका के एक विशेषज्ञ अकादमिक विद्वान कहते हैं कि अगर फिदेल नहीं होते तो अफ्रीका का नक्शा बहुत अलग होता।

फिल्म का एक दृश्य है जहां दक्षिण अफ्रीका की आज़ादी के बाद नेल्सन मंडेला फिदेल को किसी अन्य देश में मिलते हैं और अपने कमरे में फिदेल का स्वागत कर कहते हैं – ‘किसी भी और बात से पहले मैं यह जानना चाहता हूं कि आप हमारे दक्षिण अफ्रीका में  कब आएंगे? दुनिया के तमाम देशों के नेता दक्षिण अफ्रीका आ रहे हैं और जिस देश की वजह से हम आजाद हैं, जिसने दक्षिण अफ्रीका की आजादी की लड़ाई में सबसे ज्यादा साथ दिया, जो हमारा सबसे करीबी दोस्त है – फिदेल कास्त्रो। वो अब तक दक्षिण अफ्रीका नहीं आया। अब मैं और कुछ भी बात सुनने के पहले यही सुनना चाहता हूँ कि  फिदेल कब दक्षिण अफ्रीका आओगे।’ बहुत बार नेल्सन मंडेला का  आग्रह सुनकर फिदेल कहते हैं, ‘दक्षिण अफ्रीका भी मेरा देश है। मैं वहां जल्दी ही आऊंगा।’  और उसके बाद फिदेल कास्त्रो दक्षिण अफ्रीका गए भी। जहां अफ्रीका के अन्य अनेक देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने उनका स्वागत किया।

ऐसे ही अनेक लैटिन अमेरिकी देशों के भीतर चल रहे मुक्तिसंग्रामों को भी क्यूबा ने हर तरह से मदद मुहैया कराई। वेनेजुएला की 21वीं सदी के समाजवाद की क्रांति के रचयिता ह्यूगो शावेज फिदेल कास्त्रो को दक्षिण अमेरिकी देशों का पितामह मानते थे।  बोलीविया, इक्वाडोर, अल-साल्वाडोर, निकारागुआ, चिली जैसे अनेक देशों के क्रांतिकारियों ने फिदेल कास्त्रो, चे गुएवारा और क्यूबा की प्रेरणा और समर्थन से बहादुराना संघर्ष करे और जीते।

ट्रेड यूनियन नेता आलोक खरे इस मीटिंग में नहीं शामिल हो सके लेकिन भोपाल से आये वरिष्ठ पत्रकार लज्जा शंकर हरदेनिया ने अपनी १९७० के दशक में एक पत्रकार सम्मलेन में भाग लेने के लिए की गयी क्यूबा यात्रा के संस्मरण सुनाये। उन्होंने बताया कि वे पत्रकारों के एक दल के साथ सम्मेलन के लिए क्यूबा गए थे। उस समय क्यूबा मास्को से होकर ही जाना होता था। हवाई जहाज का ईंधन खत्म हो गया था। हमारा ढाई सौ पत्रकारों का दल था जिसमें कई संपादक भी शामिल थे। हमें कहीं उतरने की अनुमति नहीं मिल रही थी। नामचीन संपादकों ने अमेरिका और ब्रिटेन सहित तमाम देशों के राष्ट्रपतियों से बात की तब जाकर हमें बरमूडा में उतरने की अनुमति मिली। वहां हमसे हमारे कैमरे ले लिए गए और हमें कह दिया गया कि खिड़की से बाहर भी नज़र मत डालिये वरना आपके साथ कुछ भी हो सकता है।  वे लोग हमें खतरनाक समझ रहे थे क्योंकि हम क्यूबा जा रहे थे। यह खबर क्यूबा में भी पहुंच चुकी थी। जब हम क्यूबा उतरे तो वहां पर फिदेल कास्त्रो मौजूद थे। उन्होंने करीब आधा घंटे संबोधित किया।  वहां 15 से 20000 लोगों का हुजूम था। हम 15 दिन क्यूबा में रहे। लगभग हर दिन वे कार्यक्रम स्थल पर आते थे। हालांकि उनकी सुरक्षा इतनी कड़ी थी कि कार्यक्रम का जो स्थान हमें बताया जाता था, वहां कार्यक्रम कभी भी नहीं होता था। ऐन वक़्त पर बदल दिया जाता था क्योंकि उनके पीछे सीआईए लगी हुई थी। यह उनकी सावधानी और लोगों का प्यार था कि वह बचे रहे। उन्होंने कहा कि फिदेल कास्त्रो को मारने के 664 से ज्यादा प्रयास अमेरिका द्वारा किए गए लेकिन सावधानी और अपने देशवासियों के प्यार और विश्वास के सहारे फिदेल कास्त्रो समाजवाद का परचम बुलंद किये रहे और साम्राज्यवाद की आँखों की किरकिरी बने रहे।

श्री हरदेनिया ने कहा कि क्यूबा के डॉक्टर पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है जहां भी कभी जरुरत हुई वहां के डॉक्टरों ने अपना सहयोग दिया चाहे वह अमेरिका में हो या पाकिस्तान में। सबसे ज़्यादा दुर्गम इलाकों और तूफानों, भूकंपों से पीड़ित लोगों के बीच सबसे पहले क्यूबा अपने डॉक्टर भेजता है। उन्होंने कहा कि क्यूबा की सरकार शिक्षा और स्वास्थ्य पर सबसे ज्यादा खर्च करती है। यही कारण है कि वहां की यह दोनों सुविधाएं दुनिया के अनेक विकसित देशों से भी बेहतर है। दरअसल फिदेल मानते थे कि अगर लोग शारीरिक और मानसिक तौर पर स्वस्थ होंगे तभी वह तरक्की के मार्ग पर अग्रसर होंगे। हरदेनिया जी ने बताया कि फिदेल अपने हर भाषण से पहले अपने देश के पूर्वज जननायक-नायिकाओं को याद करते थे। भारत में, हमारे यहां आजकल कुछ ऐसा हो रहा है जैसे आज के नेताओं से पहले के नेताओं ने कुछ किया ही नहीं। बेशक नेहरू और गाँधी ने या अन्य पूर्ववर्ती नेताओं ने गलतियां भी की होंगी लेकिन हमारे प्रधानमंत्री उनके हर अच्छे बुरे को भूलकर ऐसे भाषण देते हैं मानो सबकुछ शून्य से उन्होंने ही शुरू किया हो। ये कृतघ्नता है और अच्छी बात नहीं है। हमें फिदेल कास्त्रो से सीखना चाहिए। उन्होंने कहा कि मैं पूर्व पुनर्जन्म में विश्वास नहीं रखता लेकिन यह मेरी ख्वाहिश है कि अगर फिदेल का फिर से जन्म हो तो भारत में हो।

वरिष्ठ अधिवक्ता और इप्टा के संरक्षक समाजसेवी आनंद मोहन माथुर ने फिदेल के जीवन से प्रेरणा लेते हुए पूँजीवाद के खिलाफ आवाज उठाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि अमेरिका हो या भारत, दोनों ही जगहों पर पूँजीवादी सरकारें हैं जो सिर्फ अमीरों का भला चाहती हैं। फिदेल कास्त्रो के हर कदम के पीछे अपनी जनता के भले का उद्देश्य होता था और इन सरकारों का हर कदम जनता की मुसीबत बढ़ाने वाला और कॉर्पोरेट को फायदा पहुँचाने वाला होता है। उन्होंने कहा कि अगर सहते रहते तो आज भी क्यूबा के लोग गुलामों की तरह ही रह रहे होते। हमें गलत चीज़ों के खिलाफ खामोश नहीं रहना चाहिए। यही हमारी फिदेल को सच्ची  श्रद्धांजलि होगी। उन्होंने नोटबंदी को गलत फैसला बताया और कहा कि इससे लोग परेशान हो रहे हैं, लेकिन बोल कुछ नहीं रहे हैं। उन्होंने कहा कि अब हमें बोलना होगा अगर हम चुप रहे तो इसके आज से भी ज्यादा घातक परिणाम होंगे।

कार्यक्रम के अंत में इप्टा के १४वें राष्ट्रीय सम्मेलन को कामयाब बनाने के लिए जुटे करीब ८० नौजवान लड़के-लड़कियों को आनंद मोहन माथुर जी के हाथों प्रमाण-पत्र देकर सम्मानित किया गया। ये नौजवान रूपांकन, इप्टा के ग्रीष्मकालीन शिविरों, सन्दर्भ केन्द्र और वर्चुअल वॉयेज कॉलेज के ज़रिये इप्टा से जुड़े हैं।  ज्ञातव्य है कि २-४ अक्टूबर को इंदौर में हुए इप्टा के १४वें राष्ट्रीय सम्मलेन पर दक्षिणपंथियों ने हमला किया था। तब यह सब नए नौजवान साथी वालंटियर्स के तौर पर मौजूद थे और भयभीत होने के बजाय उन्होंने तार्किक तौर पर इप्टा के साथ अपने  प्रगाढ़ करने का और भविष्य में भी जुड़े रहने का फैसला किया था।

फिदेल कास्त्रो को अपना सलाम पेश करने के लिए इंदौर जैसे घनघोर पूंजीवादी और दक्षिणपंथी होते जा रहे शहर में भी १५० से ज़्यादा लोग इकट्ठे हुए।  सभागृह पूरा भरा हुआ था और अनेक लोग खड़े-खड़े पूरा कार्यक्रम देखते सुनते रहे। कार्यक्रम में सीपीआई, सीपीएम और एसयूसीआई के ज़िला सचिव क्रमशः कॉमरेड रुद्रपाल यादव, कॉमरेड कैलाश लिम्बोदिया और कॉमरेड प्रमोद नामदेव तो मौजूद थे ही, साथ ही अनेक अन्य ट्रेड यूनियनों, दलों और संस्थाओं से जुड़े वरिष्ठ और युवा मौजूद थे। समाजवादी  पार्टी के पूर्व सांसद  श्री कल्याण जैन ने भी फिदेल कास्त्रो को अपनी श्रद्धांजलि दी। आयोजकों ने भोपाल गैस त्रासदी दिवस की बरसी पर मारे गए लोगों को याद करते हुए श्रद्धांजलि दी।  साथ ही हिंदी और उर्दू ज़ुबानों के बीच मज़बूत पल की तरह सक्रिय रहे शायर बेकल उत्साही के निधन पर उन्हें भी श्रद्धांजलि दी गयी।

Vineet Tiwari
Indore
comvineet@gmail.com

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सीपीएम के मुखपत्र ‘गणशक्ति’ में मोदी सरकार की दो वर्ष की उपलब्धि का फुल पेज विज्ञापन

Shikha : सीपीएम के दैनिक मुखपत्र अखबार “गणशक्ति” के प्रथम पृष्ठ पर मोदी सरकार की दो वर्ष की “उपलब्धि” का फुल पेज विज्ञापनl क्या अब सीपीएम के “इमानदार” कार्यकर्ताओं को (यदि कोई बचे हैं तो) अपने पार्टी मुख्यालयों पर धावा बोलकर अपने गद्दार नेत्रित्व के हाथ से लाल झंडा छीनकर उनसे किनारा नहीं कर लेना चाहिए? और कितना कलंकित करेगी यह पार्टी महान लाल झंडे को?

कामरेड शिखा के उपरोक्त स्टेटस पर आए कुछ कमेंट्स इस प्रकार हैं….

Shishir Gupta : मैंने और कई और लोगों ने भी माकपा के ‘गणशक्ति’ अखबार के मुख्य पृष्ठ पर मोदी सरकार का फुल पेज का विज्ञापन निकालने वाली पोस्ट डाली थी. इस पर बहुत से लोग तर्क दे रहे हैं कि अखबार सरकारी विज्ञापन के लिए कानूनन मना नहीं कर सकते. तो किसने कहा था आप विज्ञापन निकालने के लिए सरकारी विभाग में आवेदन डालिए? (अखबारों को शुरू में आवेदन करना पड़ता है, और कुछ न्यूनतम मानकों पर खरा उतरने पर ही अखबारों को सरकारी विज्ञापन के लिए सूचीबद्ध किया जाता है.) माकपा तो नव-उदारवादी पार्टियों और उनकी नीतियों का विरोध करती है (हालाँकि नीतियाँ उसकी भी कमोबेश वैसी ही होती हैं), फिर इस तरह का आवेदन करने के पहले क्या इस पार्टी को नहीं पता था कि कांग्रेस, भाजपा जैसी पार्टियाँ नव-उदारवादी हैं और अंततः उन्हीं के विज्ञापन देने पड़ेंगे? दूसरे ये तो ख़ुद को मजदूरों-किसानों की पार्टी कहते हैं तो पूंजीपतियों की सरकार के पैसे के दम पर अखबार निकालने का क्या मतलब हुआ? बात का सार ये है कि माकपा अब बहुत हद तक ख़ुद खुले तौर पर नंगा होकर सामने आ रही है. तो समझिये बात को. लाल रंग से इतने सम्मोहित ना हो जाइए कि जहाँ लाल दिखा हाँफते-डांफते पहुँच गए सलामी देने. अंतत: निराशा और अवसाद के अलावा और कुछ हाथ नहीं लगने वाला उससे. बेहतर होता कि आप मार्क्सवाद का अध्ययन करते, और लेनिन के शब्दों में उसे “ठोस परिस्थितियों का ठोस मूल्यांकन” कर कार्यान्वित करने की बात करते.

Ashish Thakur The rules of central govt. advertisements have been written down in the “DIRECTORATE OF ADVERTISING AND VISUAL PUBLICITY” smile emoticonhttp://www.davp.nic.in/Newspaper_Advertisement_Policy.html). The sub clause f of clause 18 says: “A newspaper may be suspended from empanelment by DG, DAVP with immediate effect if It refuses to accept and carry an advertisement issued by DAVP on behalf of the Ministries/Departments of Government of India, public sector undertakings and autonomous bodies on more than two occasions.”

Ish Mishra CPM — Corporate Promoted Marxists

Dinesh Aastik बन्गाल me इसी वजह se इनकी aisi durdasha hui hai. इन्ही paartiyo की वजह se log साम्यवाद ko अव्यवहारिक maanne का भ्रम karne lage.

Gulshan Kumar Ajmani is prakar ke vigyapan ke liye CPM ko lajja aani chaihiye. agar sabhi tarah k sarkari vigyapan hi deikhane hai to Gan shakti ka Party jornal hone ka kya matalab hai.

Amarnath Madhur लाल झंडा जल्द ही बजरंग बली के लाल लंगोट की जगह बाँधा जाएगा.

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गल्तियां करके भी न सीखने वाले को भारतीय वामपंथ कहा जाता है…

Mahendra Mishra : प्रयोग करने वाले गल्तियां करते हैं। हालांकि उन गल्तियों से वो सीखते भी हैं। लेकिन गल्तियां करके नहीं सीखने वाले को शायद भारतीय वामपंथ कहा जाता है। 1942 हो या कि 1962 या फिर रामो-वामो का दौर या न्यूक्लियर डील पर यूपीए से समर्थन वापसी। घटनाओं का एक लंबा इतिहास है। इन सबसे आगे भारतीय समाज और उसमें होने वाले बदलावों को पकड़ने की समझ और दृष्टि। सभी मौकों पर वामपंथ चूकता रहा है। भारत में वामपंथ पैदा हुआ 1920 में लेकिन अपने पैर पर आज तक नहीं खड़ा हो सका। कभी रूस, तो कभी नेहरू, कभी कांग्रेस, तो कभी मध्यमार्गी दलों की बैसाखी ही उसका सहारा रही।

एक बार फिर जब देश में वामपंथ के लिए नई संभावना और जमीन बनती दिख रही है तो उसे कांग्रेस के चरणों में समर्पित करने की सुगबुगाहट भी शुरू हो गई है। हम बात कर रहे हैं कोलकाता में चलने वाले सीपीएम के प्लेनम की। पांच दिनों तक चलने वाले इस प्लेनम से छनकर जो खबरें आ रही हैं वह बेहद चिंताजनक हैं। 38 साल बाद होने वाले इस प्लेनम में पार्टी मध्यमार्गी दलों के साथ गठबंधन का प्रस्ताव पारित कर सकती है। ऐसा होने के साथ ही कांग्रेस से लेकर दूसरे दलों की सरकारों में पार्टी के शामिल होने का रास्ता साफ हो जाएगा। इतिहास गवाह है जब-जब वामपंथी दलों ने समझौता किया। पाया कम गंवाया ज्यादा। मोर्चे से फायदा लेने के मामले में बीजेपी और वामपंथ में उतना ही अंतर रहा है जितना दोनों के विचारों में है। बीजेपी लगातार आगे बढ़ती गई और वामपंथ अपनी जड़ों से उखड़ता गया। यूपी-बिहार में लालू यादव और मुलायम सिंह उसी जमीन की पैदाइश हैं।

ऐसे दौर में जबकि देश में एक निरंकुश और अधिनायकवादी सरकार है। जो शासन और हालात के मामले में इमरजेंसी को भी मात दे रही है। काम के नाम पर उसके पास कारपोरेट और उच्च वर्ग की सेवा है। देने की जगह उसका हर फैसला जनता से छीनने के लिए होता है। रोजी-रोटी का प्रश्न हो या कि बेरोजगारी, सामाजिक सम्मान हो या कि महिलाओं की इज्जत का सवाल, सामाजिक ताना बाना हो या कि राष्ट्र को एकता में बांधने का सूत्र। हर मोर्चे पर सरकार नाकाम साबित हो रही है। विकल्प के नाम पर एक विखरा विपक्ष है। और कांग्रेस ऐतिहासिक तौर पर कमजोर है। ऐसे में भारतीय राजनीति के इस निर्वात को भरने की जगह अगर कोई बैसाखी की तलाश करता है। तो इससे बड़ी विडंबना कुछ नहीं हो सकती। बिहार में एकता की एक छोटी कोशिश ने वामपंथ को चर्चे में ला दिया।

सीपीएम को भी यह समझना चाहिए कि बीजेपी और संघ से आखिरी लड़ाई सड़क पर ही होगी। किसी जोड़-तोड़ के जरिये उससे पार पाना मुश्किल है। कांग्रेस के साथ एक और समझौते से कुछ मिलने की जगह सीपीएम के सीपीआई बनने का खतरा ज्यादा है। भारतीय वामपंथ चुनावी मोर्चे पर भले कमजोर हो लेकिन राजनीतिक-सामाजिक आधार और संगठन के मामले में इतनी ताकत रखता है कि वह नये सिरे से हलचल पैदा कर सके। ऐसे में उसे वामपंथी एकता के साथ स्वतंत्र पहल का नया संकल्प लेने की जरूरत है। न कि किसी नई बैसाखी की तलाश करने की। क्योंकि उसके पास साख है तो संगठन भी है, सिद्धांत है तो वैचारिक हथियार भी है और इन सबसे आगे देश को राजनीतिक विकल्प की जरूरत है।

हालांकि पार्टी महासचिव सीताराम येचुरी ने सामाजिक नीति को लेकर पार्टी की सोच में कुछ बदलाव के संकेत जरूर दिए हैं। इसे एक बड़ी और जरूरी पहल के तौर पर देखा सकता है। क्योंकि इस देश में वामपंथ की यह सबसे बड़ी कमियों में चिन्हित किया जा सकता है। जिसमें भारतीय समाज और राजनीति की ठोस समझ और उसका सटीक विश्लेषण और फिर उसके मुताबिक कार्यनीति और रणनीति का अभाव रहा है। भारत में जितना आर्थिक सवाल जरूरी है उससे कम सामाजिक मुद्दे नहीं हैं। रोजी-रोटी अगर प्राथमिक है तो सामाजिक सम्मान का सवाल उसकी चौखट पर खड़ा हो जाता है। इस लिहाज से जाति एक बड़ी सच्चाई बनकर सामने आ जाती है। भारतीय समाज और राजनीति के बीच की वह ऐसी गांठ है जिसे खोले बगैर सत्ता का कोई भी सवाल हल होना मुश्किल है। जिस सर्वहारा की तलाश वामपंथ को थी वह भारत में दलितों के तौर पर मौजूद था। लेकिन वर्गों को ढूढने के चक्कर में वामपंथ फैक्टरियों से लेकर इधर-उधर भटकता रहा। भारत में क्रांति का रास्ता किसानों से होकर जाता है। लेकिन स्थापित वामपंथ की प्राथमिकता में वह कभी नहीं रहा।

मार्क्सवाद को समाज-राजनीति और व्यवस्था के सबसे अग्रणी दर्शन के तौर पर जाना जाता रहा है। व्यवस्था की आखिरी पैदाइश मजदूर वर्ग की इस पार्टी से किसी बदलाव को सबसे पहले महसूस करने की अपेक्षा की जाती है। लेकिन एक पूरी सूचना क्रांति सामने से गुजर गई और वामपंथ खड़ा देखता रहा। कहीं थोड़ी जुंबिश भी नहीं दिखी। इस्तेमाल उस पार्टी ने किया जिसे हम समाज की सबसे पिछड़ी, दकियानूस, रुढ़िवादी, आधुनिक और तकनीकी विरोधी करार देते हैं। आखिरी दो मसलों के लिहाज से वामपंथ के लिए ग्राम्सी काफी मददगार साबित हो सकते हैं। उनका आधार और अधिरचना के मामले में अधिरचना के कभी प्राथमिक होने की संभावना का सिद्धांत बेहद कारगर है। भारतीय राजनीति में जाति एक उसी तरह की अधिरचना है। मौजूदा समय में आयी सूचना क्रांति को भी अधिरचना के दायरे में ही परिभाषित किया जा सकता है।

छात्र जीवन में वामपंथी आंदोलनों में नेतृत्वकारी भूमिका में रहे पत्रकार महेंद्र मिश्र के फेसबुक वॉल से.

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माकपा के सवर्ण कम्युनिस्टों को सदबुद्धि आ गई…

Mukesh Kumar : शुक्र है कि माकपा को अब जाति व्यवस्था से उपजी सामाजिक विषमता के कारण होने वाले अत्याचारों एवं भेदभाव को अपनी नीति-रीति का हिस्सा बनाने की सद्बुद्धि आ गई है। सवर्णों के नेतृत्व ने उसे ऐसा करने से रोक रखा था, लेकिन सफाचट हो रहे जनाधार ने उसे मजबूर कर दिया कि वह अपना रवैया बदले और भारतीय परिस्थितियों में सामाजिक-आर्थिक विषमता को जोड़कर देखे।

लेकिन केवल नीतियों के स्तर पर इसे स्वीकारने से कुछ नहीं होगा। ज़रूरी है कि पिछड़ों, दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों और स्त्रियों को संगठन में उचित हिस्सेदारी सुनिश्चित किया जाए। इसके लिए अगर आरक्षण की व्यवस्था लागू करनी पड़े तो किया जाना चाहिए, वर्ना सवर्ण कभी उन्हें ऊपर नहीं आने देंगे। सवर्ण कम्युनिस्टों की मानसिक संरचना ऐसी है कि वे श्रेष्ठताबोध से ग्रस्त रहते हैं और अपने मानदंडों पर ही सारे निर्णय लेने के लिए विवश करते हैं। इनके जाल से निकलकर ही पार्टी अपना जनाधार बढ़ा सकती है। लेकिन उसे ध्यान रखना होगा कि सामाजिक न्याय की उस नारेबाजी में भी न फँसे जिसमें लालू, मुलायम और मायावती वगैरा फँस गए हैं और उनकी राजनीति केवल खुद को किसी भी तरह सत्ता पर बनाए रखना है।

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार के फेसबुक वॉल से

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जेएनयू के संस्कृतिकर्मी हेम मिश्रा और राजनीतिक कार्यकर्ता रोमा को जमानत मिली

नागपुर की अंडा सेल में दो साल से बंद जेएनयू के संस्‍कृतिकर्मी हेम मिश्रा को ज़मानत मिल गई है। हेम को नक्सलियों से संबंध रखने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। फेसबुक पर पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव ने इस बाबत जानकारी शेयर की है. उनकी पोस्ट पर Rohit Joshi ने कमेंट करके कहा है कि हेम के जमानत मिलने वाली खबर सही है. रोहित की हेम के पापा से बात हुई जिसमें उन्होंने कनफर्म किया है.

उधर, मिर्जापुर की जेल में दो माह से बंद राजनीतिक कार्यकर्ता रोमा को सभी 11 मामलों में सोनभद्र की अदालत ने ज़मानत दे दी है. वे दो-चार दिन में बाहर आ जाएंगी. पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव का कहना है कि असली खुशी तब होगी जब कनहर बांध के खिलाफ लड़ रहे जेल में बंद चार ग्रामीणों को भी बेल मिल जाए. उनकी दरख्‍वास्‍त इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय में अभी लंबित है.

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येचुरी से भी कोई उम्मीद नहीं… ये सब ड्राइंग रूम वामपंथी हैं…

Gunjan Sinha : येचुरी से भी कोई उम्मीद नही. करात, येचुरी आदि सब ड्राइंग रूम वामपंथी हैं… इन्हें कभी जनता के साथ संघर्ष करते देखा? सुना? चाहे हज़ारों किसान मर जाएं , लोग बिन दवा बिना भोजन मरें, लड़कियां रेप का शिकार हों, देश गिरवी हो जाए, आतंकी धर्मान्धता दिलों को बाँट दे, ये ड्राइंग रूम वामपंथी दिल्ली के एयर कंडीशन बेडरूम के बाहर रात नहीं बिता सकते. कुँए का पानी नहीं पी सकते. लेकिन मीडिया मैनेज कर सकते हैं. इनसे फिर भी बेहतर हैं माणिक सरकार या अतुल अनजान जो अपना काम ईमानदारी से कर रहे हैं.

येचुरी करात जमात ने शंकर गुहा नियोगी, चंद्रशेखर आदि की तरह कभी लोगों के साथ जुड़ कर संघर्ष नहीं किया. किसी ने सुना क्या? और शायद जगदीश मास्टर का तो नाम भी नहीं सुना होग. ऐसे में क्या उम्मीद की जाए इन से देश की राजनीती को बैलेंस करने की? एक बार राजेन्द्र माथुर ने लिखा था कि भारत की सभी पार्टियां कांग्रेस कल्चर की ही उपज हैं – वामपंथी दलों के बारे में भी अब तो यही लगता है और भाजपा और ‘आप’ के बकरे में भी। जबतक जातीय पहचान नहीं ख़त्म होगी और धर्म सिर्फ व्यक्तिगत आस्था की चीज नहीं होगा जिसका सामाजिक राजनैतिक जीवन में कोई प्रत्यक्ष दखल नहीं हो, तबतक देश में समता समाजवाद की कोई उम्मीद नहीं, साम्यवाद तो दूर की बात।

वरिष्ठ और बेबाक पत्रकार गुंजन सिन्हा के फेसबुक वॉल से.

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क्या कोई कामरेड या मार्क्सवादी मुझे ये बताएगा कि ….

Yashwant Singh : क्या कोई कामरेड या कोई मार्क्सवादी ये बताएगा मुझे कि जो मैं जानवरों, पंछियों, मछलियों, कीटों, पतंगों, गहरे समुद्री जीवों, अति बर्फीले इलाके के जंतुओं, अतिशय उड़ान भरने वाले प्राणियों.. मतलब ये कि जलचर, थलचर, उभयचर, हवा चर, ” चराचर 🙂 ” …. आदि इत्यादि को लेकर तमाम तरह के प्रोग्राम ढेर सारे चैनलों यथा डिस्कवरी, डिस्कवरी साइंस, एनजीसी, एनीमल प्लानेट, हिस्ट्री आदि इत्यादि पर देखता समझता सोचता रहता हूं, वह कहीं कोई मार्क्सवादी भटकन, अवमूल्यन, पलायनवाद, प्लैटोनिकवाद आदि इत्यादि तो नहीं ?

कहीं कोई पूंजीवादी, सामंती, अर्ध पूंजीवादी अर्ध सामंती, कोलोनियल, उपनिवेशवादी, साम्राज्यवादी, अफीमवादी, चिरकुटवादी, घटियावादी आदि इत्यादि विचारधारा को बढ़ाने वाला तो नहीं…? क्योंकि आजकल मेरा मन दिल दिमाग मनुष्य सेंटर्ड टीवी प्रोग्राम्स से बहुत परे जा चुका है… मुझे दुनिया भर के जंगलों, समुद्रों, आसमानों में रहने वाले गैर-मनुष्यों के बारे में जानने सुनने देखने को लेकर भयंकर ललक पैदा हो गई है और जब मैं उनको देख समझ के खुद के यानि मनुष्यों के बारे में सोचता हूं तो लगता है कि यार…. धरती ब्रम्हांड सृष्टि आदि इत्यादि अलग थलग नहीं.. सब एक लय धुन ताल में चल रहे हैं… जिसे समझ पाना वैसे तो बड़ा मुश्किल है लेकिन जो समझ लेगा वो कतई किसी को समझा नहीं सकता कि उसने समझा क्या है… सिर्फ तटस्थ आनंद और तटस्थ दुख या दोनों एक एक करके, से भरा रह सकता है. ये दोनों ही परम आनंद के दो पहिए, दो खंभे, दो लेयर हैं, जो मिलजुल कर एक स्पार्क, एक तटस्थता, एक मुक्ति पैदा करते हैं…. और ये दो हैं, तभी परमआनंद यानि परमानंद है..  🙂

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

उपरोक्त स्टेटस पर आए कुछ कमेंट इस प्रकार हैं…

Niraj Kumar Ranjan Meri bhi manodasha kuchh kuchhh aap se milti julti hai….

Abbhay Pratap Singh Saath me aastha channel to nahi dekhte aap ?

Yashwant Singh आस्था संस्कार आदि इत्यादि धार्मिक चैनलों के कुछ कुछ भजन गीत संगीत अच्छे लगते हैं, जब कभी गल्ती से इन पर रिमोट की सुई पहुंच जाती है. वैसे, इन चैनलों का विजिटर नहीं हूं, लेकिन कोई कुछ समझाता हुआ मिलता है तो सुन लेता हूं .. जैसे आपको पढ़ लिया.. कई लोगों को पढ़ता रहता हूं, सुनता रहता हूं… वैसे ही

ठा. कृष्ण प्रताप सिंह Abbhay Pratap Singh Baba live sunna chaahenge …. Uthenge nahi ye bhakt ka waada hai baba

Rakesh Mishra aap jane ya na jaane but http://www.countercurrents.org/ulfkotte171014.htm
“The CIA Owns Everyone Of Any Significance In The Major Media” By Eric…
countercurrents.org

Pankaj Singh स्वामी यशवन्तानन्द परमहंस भड़ासवाले़़़ …कैसे हो ? शुभकामनाएँ । कभी मिलें तो बातें हों ।

Pradeep Sharma वाह ह्रदय परिवर्तन…एक बार मिलो फिर अच्छी गुफ्तगू होगी आपसे दादा..)

Yashwant Singh Pankaj Singh भैया, आपका आशीर्वाद है। कल आपको रिंग करता हूँ। लव यू।

Pramod Shukla समय रहते कामरेड भाइयों से राय लेने का फैसला कर के आपने पूर्ण परिपक्वता का परिचय दिया है….. यह सुखद है..

Madhav Tripathi सिंह साब इतना ही कहूँगा की घर बार छोड़ के ये सब मजे सच में लिए जा सकते है

Shriniwas Rai Shankar सब एक लय धुन ताल में चल रहे हैं। सही कह रहे हैं- और परमानंद वाह !

Rakesh Srivastava आपका जवाब नहीं .. आप कुछ कमेंट करने लायक भी नहीं छोड़ते

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