जेएनयू में सत्ता और संघ ने सारा जोर लगा दिया पर जीते लाल झंडे वाले, एबीवीपी का सूपड़ा साफ

Sheetal P Singh : JNU भी अजीब शै है! संघी एक युग से परेशान हैं इससे! कुल जमा दस हज़ार स्टूडेंट्स होंगे जिनके दिल दिमाग़ पर क़ब्ज़ा कर पाने में नागपुर से दिल्ली तक के मठ और सल्तनत अनवरत फेल है! वे दुनिया जीत कर आते हैं पर जेएनयू हार जाते हैं! लाल सलाम वालों …

मज़दूर क्रांति के ध्येय को समर्पित एक बुजुर्ग साथी द्वारा तैयार किया गया पर्चा… बहस के लिए

मूलाधार और अधिरचना में जाति-समस्या भारत में जाति की समस्या कई दशकों से व्यापक चर्चा का विषय रही है। इस चर्चा में वामपंथी आंदोलन का भी हस्तक्षेप रहा है, खास कर कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी आन्दोलन का। वामपंथी आन्दोलन में इस समस्या को लेकर एक लम्बे अरसे से विचार-मंथन चल रहा है। एक सैद्धान्तिक आन्दोलन होने के …

झारखंड में क्रांतिकारी नारे लगाने पर 800 अज्ञात और 12 को नामजद कर एफआईआर दर्ज

विशद कुमार,  गिरिडीह से

गिरिडीह : जनता से आखिर इतना डर क्यों? यह सवाल मजदूर संगठन समिति के केंद्रीय महासचिव बच्चा सिंह उस वक्त कर रहे हैं जब पिछले 7 नवंबर को महान बोल्शेविक क्रान्ति के सौवें वर्षगांठ पर झारखंड के गिरिडीह जिला के मुफस्सिल थाना अन्तर्गत चतरो में “महान बोल्शेविक क्रान्ति की शताब्दी समारोह समिति” झारखंड, के तत्वावधान में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें क्षेत्र के लगभग 10 हजार लोगों ने भाग लिया। मंचीय कार्यक्रम के पूर्व एक रैली निकाली गई जो काफी शांतिपूर्ण तरीके से लगभग 5-6 कि.मी. की दूरी तय करते हुए वापस कार्यक्रम स्थल पर पहुंची और आयोजित समारोह भी काफी शांतिपूर्ण तरीके से सम्पन्न हुआ, जिसे सभी समाचार-पत्रों ने सहजता से छापा भी। बावजूद जिला प्रशासन ने रैली में शामिल लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज किया है जिसमें 800 अज्ञात तथा 12 लोगों को नामजद अभियुक्त बनाया गया है।

चीन एक ध्रुवीय दुनिया को लोकतांत्रिक दुनिया बनाने की पहल लेता है तो भारत को उससे लाभ होगा!

चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की 19 वीं कांग्रेस के बारे में कामरेड अखिलेन्द्र प्रताप सिंह का विश्लेषण : टाइम्स आफ इण्डिया ने अपने सम्पादकीय में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के दूसरी बार चुने गए महासचिव शी जिनपिंग को नया माओ कहा है। माओ जी दोंग की जब बात होती है तो चीन ही नहीं एशिया यहां तक की विश्व कम्युनिस्ट आंदोलन में स्टालिन के बाद उसके प्रमुख प्रेणता के रूप में लोग उन्हें जानते है। दाशर्निक स्तर पर लेनिन के बाद उनकी प्रकृति, समाज, ज्ञान और वर्ग संघर्ष के बारे में द्वंद्वात्मक समझ को स्टालिन से परिपक्व और उन्नत माना जाता है। जबकि स्टालिन की द्वंद्वात्मक समझ को अधिभूतवाद से प्रभावित माना जाता है।

एक कामरेड पत्रकार के शोषण से तंग आकर महिला पत्रकार ने सुसाइड की कोशिश की!

‘दी वायर हिंदी’ में काम करते हैं आरोपी पत्रकार कृष्णकांत… एक साथ कई लड़कियों को प्रेम के जाल में फांसने और उन्हें धोखा देने का आरोप…

उपासना झा : प्रियंका ने आत्महत्या का प्रयास किया था.. बहुत अवसाद में चल रही थी.. उसके माता-पिता पहुँच चुके हैं… अब ख़तरे से बाहर तो है लेकिन उसे इस हाल में पहुंचाने वाले कृष्णकांत पर जिस तरह उसके खेमे वाले (वामपंथी) चुप हैं वह बहुत लज्जास्पद है.. नीचे वो पोस्ट दे रही हूं जिसे प्रियंका ने खुद लिखकर अपनी वॉल पर पोस्ट किया है…

कॉमरेड फिदेल कास्त्रो : एक क्रांतिकारी जीवन का उत्सव

फिदेल कास्त्रो 90 वर्ष की उम्र में एक दीर्घ सक्रिय जीवन जीने के बाद २५ नवम्बर २०१६ को इस दुनिया से रुखसत ज़रूर हुए लेकिन वे करोड़ों – अरबों दिलों में हमेशा के लिए बसे रहेंगे। वे बेशक दुनिया के दूसरे सिरे पर मौजूद एक छोटे से देश के शासक थे लेकिन उन्होंने अनेक देशों की आज़ादी की लड़ाई में निर्णायक भूमिका निभायी और बेहतरीन मानवीय गुणों वाले मनुष्य समाज को बनाया। कहा जा सकता है कि अगर फिदेल न होते तो अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के अनेक देशों के  मुक्ति संघर्षों का नतीजा बहुत अलग रहा होता। उनके निधन के उपरान्त इंदौर में उनके प्रशंसकों ने तय किया कि फिदेल की याद में कोई कार्यक्रम शोक या श्रद्धांजलि का नहीं किया जाएगा बल्कि उनकी याद में एक क्रांतिकारी जीवन का उत्सव मनाया जाएगा।

सीपीएम के मुखपत्र ‘गणशक्ति’ में मोदी सरकार की दो वर्ष की उपलब्धि का फुल पेज विज्ञापन

Shikha : सीपीएम के दैनिक मुखपत्र अखबार “गणशक्ति” के प्रथम पृष्ठ पर मोदी सरकार की दो वर्ष की “उपलब्धि” का फुल पेज विज्ञापनl क्या अब सीपीएम के “इमानदार” कार्यकर्ताओं को (यदि कोई बचे हैं तो) अपने पार्टी मुख्यालयों पर धावा बोलकर अपने गद्दार नेत्रित्व के हाथ से लाल झंडा छीनकर उनसे किनारा नहीं कर लेना चाहिए? और कितना कलंकित करेगी यह पार्टी महान लाल झंडे को?

गल्तियां करके भी न सीखने वाले को भारतीय वामपंथ कहा जाता है…

Mahendra Mishra : प्रयोग करने वाले गल्तियां करते हैं। हालांकि उन गल्तियों से वो सीखते भी हैं। लेकिन गल्तियां करके नहीं सीखने वाले को शायद भारतीय वामपंथ कहा जाता है। 1942 हो या कि 1962 या फिर रामो-वामो का दौर या न्यूक्लियर डील पर यूपीए से समर्थन वापसी। घटनाओं का एक लंबा इतिहास है। इन सबसे आगे भारतीय समाज और उसमें होने वाले बदलावों को पकड़ने की समझ और दृष्टि। सभी मौकों पर वामपंथ चूकता रहा है। भारत में वामपंथ पैदा हुआ 1920 में लेकिन अपने पैर पर आज तक नहीं खड़ा हो सका। कभी रूस, तो कभी नेहरू, कभी कांग्रेस, तो कभी मध्यमार्गी दलों की बैसाखी ही उसका सहारा रही।

माकपा के सवर्ण कम्युनिस्टों को सदबुद्धि आ गई…

Mukesh Kumar : शुक्र है कि माकपा को अब जाति व्यवस्था से उपजी सामाजिक विषमता के कारण होने वाले अत्याचारों एवं भेदभाव को अपनी नीति-रीति का हिस्सा बनाने की सद्बुद्धि आ गई है। सवर्णों के नेतृत्व ने उसे ऐसा करने से रोक रखा था, लेकिन सफाचट हो रहे जनाधार ने उसे मजबूर कर दिया कि वह अपना रवैया बदले और भारतीय परिस्थितियों में सामाजिक-आर्थिक विषमता को जोड़कर देखे।

जेएनयू के संस्कृतिकर्मी हेम मिश्रा और राजनीतिक कार्यकर्ता रोमा को जमानत मिली

नागपुर की अंडा सेल में दो साल से बंद जेएनयू के संस्‍कृतिकर्मी हेम मिश्रा को ज़मानत मिल गई है। हेम को नक्सलियों से संबंध रखने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। फेसबुक पर पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव ने इस बाबत जानकारी शेयर की है. उनकी पोस्ट पर Rohit Joshi ने कमेंट करके कहा है कि हेम के जमानत मिलने वाली खबर सही है. रोहित की हेम के पापा से बात हुई जिसमें उन्होंने कनफर्म किया है.

येचुरी से भी कोई उम्मीद नहीं… ये सब ड्राइंग रूम वामपंथी हैं…

Gunjan Sinha : येचुरी से भी कोई उम्मीद नही. करात, येचुरी आदि सब ड्राइंग रूम वामपंथी हैं… इन्हें कभी जनता के साथ संघर्ष करते देखा? सुना? चाहे हज़ारों किसान मर जाएं , लोग बिन दवा बिना भोजन मरें, लड़कियां रेप का शिकार हों, देश गिरवी हो जाए, आतंकी धर्मान्धता दिलों को बाँट दे, ये ड्राइंग रूम वामपंथी दिल्ली के एयर कंडीशन बेडरूम के बाहर रात नहीं बिता सकते. कुँए का पानी नहीं पी सकते. लेकिन मीडिया मैनेज कर सकते हैं. इनसे फिर भी बेहतर हैं माणिक सरकार या अतुल अनजान जो अपना काम ईमानदारी से कर रहे हैं.

क्या कोई कामरेड या मार्क्सवादी मुझे ये बताएगा कि ….

Yashwant Singh : क्या कोई कामरेड या कोई मार्क्सवादी ये बताएगा मुझे कि जो मैं जानवरों, पंछियों, मछलियों, कीटों, पतंगों, गहरे समुद्री जीवों, अति बर्फीले इलाके के जंतुओं, अतिशय उड़ान भरने वाले प्राणियों.. मतलब ये कि जलचर, थलचर, उभयचर, हवा चर, ” चराचर 🙂 ” …. आदि इत्यादि को लेकर तमाम तरह के प्रोग्राम ढेर सारे चैनलों यथा डिस्कवरी, डिस्कवरी साइंस, एनजीसी, एनीमल प्लानेट, हिस्ट्री आदि इत्यादि पर देखता समझता सोचता रहता हूं, वह कहीं कोई मार्क्सवादी भटकन, अवमूल्यन, पलायनवाद, प्लैटोनिकवाद आदि इत्यादि तो नहीं ?