डा. आंबेडकर को ठिकाने लगाने की आरएसएस की एक और कोशिश

Kanwal Bharti : डा. आंबेडकर को ठिकाने लगाने की आरएसएस की एक और कोशिश…  दूरदर्शन पर खबर थी, रामानुजाचार्य की जयंती पर, प्रधानमंत्री मोदीजी ने कहा है कि रामानुजाचार्य के दर्शन से डा. आंबेडकर भी प्रभावित थे. यह जुमलेबाज़ मोदी जी का झूठ नहीं है, बल्कि यह वह एजेंडा है, जिसे आरएसएस ने डा. आंबेडकर के लिए तैयार किया है. इस एजेंडे के दो बिंदु हैं, एक- डा, आंबेडकर को मुस्लिम विरोधी बनाना, और दो, डा. आंबेडकर को हिन्दूवादी बनाना. वैसे, उन्हें मुस्लिम-विरोधी बनाना भी हिन्दूवादी बनाना ही है. यह काम वो नब्बे के दशक से ही कर रहे हैं.

1996 में मैंने “डा. आंबेडकर को नकारे जाने की साजिश” किताब लिख कर आरएसएस के इस एजेंडे का खंडन किया था. उनका सबसे खतरनाक प्रचार, जिसे वे आज भी जोरशोर से कह रहे हैं, वह यह है कि डा. आंबेडकर ने अपने संघर्ष की प्रेरणा भगवद्गीता से ली थी. इस संबंध में 7 दिसम्बर 1944 की वह कतरन आज भी देखी जा सकती है, जिसे फ्री प्रेस आफ इंडिया ने जारी किया था. उसमें के. सुब्रामणियम ने लिखा है, “डा. आंबेडकर ने गीता के अध्ययन में पन्द्रह वर्ष व्यतीत किये हैं. उनकी खोज यह है कि गीता का लेखक या तो पागल था, या मूर्ख था.” भला, ऐसा व्यक्ति गीता से क्या प्रेरणा लेगा?

अब नया शगूफा यह छोड़ा गया है कि डा. आंबेडकर पर रामानुजाचार्य का प्रभाव पड़ा था. एक झूठ को अगर हजार बार हजार लोग एक साथ बोलेंगे, तो वह लोगों को सच लगने लगता है. आरएसएस के झूठे एजेंडे का यही मकसद है. आरएसएस के सामने वह दलित समाज है, जो हिन्दू रंग में रंगा हुआ है और जिसका पढ़ाई-लिखाई से कोई वास्ता नहीं है. वह बस आंबेडकर की माला जपने वाला समुदाय है. ऐसा समुदाय आरएसएस के बहुत काम का है, क्योंकि वह उसका ब्रेनवाश आसानी से कर सकता है.

रामानुजाचार्य जैसों के दर्शन पर डा. आंबेडकर की किताब “रिडिलस आफ हिन्दुइज्म” को ही पढ़ना काफी होगा. रामानुजाचार्य वह दार्शनिक थे, जिन्होंने ब्रह्म में सगुण को प्रवेश कराया है, और नाम, रूप, लीला, धाम, वर्ण, का मार्ग प्रशस्त किया है. यादव प्रकाश उनके गुरु थे, जिनसे उन्होंने वेदों की शिक्षा ली थी. ऐसे वेद्मार्गी, सगुण मार्गी और वर्ण मार्गी रामानुजाचार्य अम्बेडकर को प्रभावित करेंगे. ऐसा सोचना भी हास्यास्पद होगा.

एक क्षण को अगर मान भी लिया जाये, कि रामानुजाचार्य से डा. आंबेडकर प्रभावित हुए थे, तो फिर उन्होंने हिन्दूधर्म का परित्याग क्यों किया? वेद-विरोधी, वर्ण-विरोधी और ईश्वर-विरोधी बौद्धधर्म को क्यों अपनाया था? आरएसएस के लोग शायद इसका भी तोड़ निकाल ही रहे होंगे. 

जाने-माने दलित चिंतक कँवल भारती की एफबी वॉल से.

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मायावती का खेल खत्म ही समझो : कंवल भारती

याद कीजिये मेरी 26 जनवरी की इस पोस्ट को…

”आज बसपा के एक जमीनी नेता से बात हुई, वह बहिन मायावती से बहुत नाराज दिखे. उन्होंने अपनी नाराजगी में दो सवाल तुरंत दाग दिए- 1. जब बहिन जी ने अंसारी बंधुओं को टिकट देने में कोई संकोच नहीं किया तो स्वामी प्रसाद मौर्य को तीन टिकट क्यों नही दिए, जबकि वह बीस साल से उनके साथ था? 2. मुसलमानों को 97 टिकट किस राजनीति के तहत दिए, जबकि यह स्पस्ट है कि वे मुस्लिम वोट ही डिवाइड करेंगे, और उसका लाभ भाजपा को होगा. मैंने कहा, आप कहना क्या चाहते हैं? उन्होंने जवाब दिया, बहिन जी भाजपा के दबाव में हैं. और वह अपने भाई को बचाने के लिए भाजपा की तरफ से खेल रही हैं. उन्होंने यहाँ तक कहा कि भाजपा ने सुरक्षित सीटों पर सबसे ज्यादा जाटव और चमार जाति के लोगों को ही टिकट दिए हैं. बोले, पूछो क्यों? मैंने कहा, क्यों? वह बोले, इसलिए कि बसपा का वोट डिवाइड हो, और वह कमजोर हो. मैंने कहा, फिर? वह बोले, फिर क्या, बसपा खत्म.”

अब आइए आज की बात करते हैं, चुनाव रिजल्ट आने के बाद की बात… मायावती की हार के कारण को समझने की कोशिश करते हैं…

मायावती की यह आखिरी पारी थी, जिसमें उनकी शर्मनाक हार हुई है. 19 सीटों पर सिमट कर उन्होंने अपनी पार्टी का अस्तित्व तो बचा लिया है, परन्तु अब उनका खेल खत्म ही समझो. मायावती ने अपनी यह स्थिति अपने आप पैदा की है. मुसलमानों को सौ टिकट देकर एक तरह से उन्होंने भाजपा की झोली में ही सौ सीटें डाल दी थीं. रही-सही कसर उन्होंने चुनाव रैलियों में पूरी कर दी, जिनमें उनका सारा फोकस मुसलमानों को ही अपनी ओर मोड़ने में लगा रहा था. उन्होंने जनहित के किसी मुद्दे पर कभी कोई फोकस नहीं किया. तीन बार मुख्यमंत्री बनने के बाद भी वह आज तक जननेता नहीं बन सकीं. आज भी वह लिखा हुआ भाषण ही पढ़ती हैं. जनता से सीधे संवाद करने का जो जरूरी गुण एक नेता में होना चाहिए, वह उनमें नहीं है. हारने के बाद भी उन्होंने अपनी कमियां नहीं देखीं, बल्कि अपनी हार का ठीकरा वोटिंग मशीन पर फोड़ दिया. ऐसी नेता को क्या समझाया जाय! अगर वोटिंग मशीन पर उनके आरोप को मान भी लिया जाए, तो उनकी 19 सीटें कैसे आ गयीं, और सपा-कांग्रेस को 54 सीटें कैसे मिल गयीं? अपनी नाकामी का ठीकरा दूसरों पर फोड़ना आसान है, पर अपनी कमियों को पहिचानना उतना ही मुश्किल.

अब इसे क्या कहा जाए कि वह केवल टिकट बांटने की रणनीति को ही सोशल इंजिनियरिंग कहती हैं. यह कितनी हास्यास्पद व्याख्या है सोशल इंजिनियरिंग की. उनके दिमाग से यह फितूर अभी तक नहीं निकला है कि 2007 के चुनाव में इसी सोशल इंजिनियरिंग ने उन्हें बहुमत दिलाया था. जबकि वास्तविकता यह थी कि उस समय कांग्रेस और भाजपा के हाशिए पर चले जाने के कारण सवर्ण वर्ग को सत्ता में आने के लिए किसी क्षेत्रीय दल के सहारे की जरूरत थी, और यह सहारा उसे बसपा में दिखाई दिया था. यह शुद्ध राजनीतिक अवसरवादिता थी, सोशल इंजिनियरिंग नहीं थी. अब जब भाजपा हाशिए से बाहर आ गयी है और 2014 में शानदार तरीके से उसकी केन्द्र में वापसी हो गयी है, तो सवर्ण वर्ग को किसी अन्य सहारे की जरूरत नहीं रह गयी, बल्कि कांग्रेस का सवर्ण वोट भी भाजपा में शामिल हो गया. लेकिन मायावती हैं कि अभी तक तथाकथित सोशल इंजिनियरिंग की ही गफलत में जी रही हैं, जबकि सच्चाई यह भी है कि मरणासन्न भाजपा को संजीवनी देने का काम भी मायावती ने ही किया था. उसी 2007 की सोशल इंजिनियरिंग की बसपा सरकार में भाजपा ने अपनी संभावनाओं का आधार मजबूत किया था.

मुझे तो यह विडम्बना ही लगती है कि जो बहुजन राजनीति कभी खड़ी ही नहीं हुई, कांशीराम और मायावती को उसका नायक बताया जाता है. केवल बहुजन नाम रख देने से बहुजन राजनीति नहीं हो जाती. उत्तर भारत में बहुजन आंदोलन और वैचारिकी का जो उद्भव और विकास साठ और सत्तर के दशक में हुआ था, उसे राजनीति में रिपब्लिकन पार्टी ने आगे बढ़ाया था. उससे कांग्रेस इतनी भयभीत हो गयी थी कि उसने अपनी शातिर चालों से उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिए और वह खत्म हो गयी. उसके बाद कांशीराम आये, जिन्होंने बहुजन के नाम पर जाति की राजनीति का माडल खड़ा किया. वह डा. आंबेडकर की उस चेतावनी को भूल गए कि जाति के आधार पर कोई भी निर्माण ज्यादा दिनों तक टिका नहीं रह सकता. बसपा की राजनीति कभी भी बहुजन की राजनीति नहीं रही. बहुजन की राजनीति के केन्द्र में शोषित समाज होता है, उसकी सामाजिक और आर्थिक नीतियां समाजवादी होती हैं, पर, मायावती ने अपने तीनों शासन काल में सार्वजानिक क्षेत्र की इकाइयों को बेचा और निजी इकाइयों को प्रोत्साहित किया. उत्पीडन के मुद्दों पर कभी कोई आन्दोलन नहीं चलाया, यहाँ तक कि रोहित वेमुला, कन्हैया कुमार और जिग्नेश कुमार के प्रकरण में भी पूरी उपेक्षा बरती, जबकि ये ऐसे मुद्दे थे, जो उत्तर प्रदेश में बहुजन वैचारिकी को मजबूत कर सकते थे.

इन चुनावों में मायावती को मुसलमानों पर भरोसा था, पर मुसलमानों ने उन पर भरोसा नहीं किया, जिसका कारण भाजपा के साथ उनके तीन-तीन गठबंधनों का अतीत है. उन्हें पश्चिमी उत्तर प्रदेश से मात्र 4 और पूर्वी उत्तर प्रदेश से मात्र 2 सीटें मिली हैं, जिसका मतलब है कि उनके जाटव वोट में भी सेंध लगी है. मायावती की सबसे बड़ी कमी यह है कि वह जमीन की राजनीति से दूर रहती हैं. न वह जमीन से जुड़ती हैं और न उनकी पार्टी में जमीनी नेता हैं. एक सामाजिक और सांस्कृतिक आन्दोलन का कोई मंच भी उन्होंने अपनी पार्टी के साथ नहीं बनाया है. यह इसी का परिणाम है कि वह बहुजन समाज के हिन्दूकरण को नहीं रोक सकीं. इसी हिन्दूकरण ने लोकसभा में उनका सफाया किया और यही हिन्दूकरण उनकी वर्तमान हार का भी बड़ा कारण है.

मायावती की इससे भी बड़ी कमी यह है कि वह नेतृत्व नहीं उभारतीं. हाशिए के लोगों की राजनीतिक भागीदारी जरूरी है, पर उससे ज्यादा जरूरी है उनमें नेतृत्व पैदा करना, जो वह नहीं करतीं. इसलिए उनके पास एक भी स्टार नेता नहीं है. इस मामले में वह सपा से भी फिसड्डी हैं. मायावती के भक्तों को यह बात बुरी लग सकती है, पर मैं जरूर कहूँगा कि अगर उन्होंने नयी लीडरशिप पैदा नहीं की, वर्गीय बहुजन राजनीति का माडल खड़ा नहीं किया और देश के प्रखर बहुजन बुद्धिजीवियों और आन्दोलन से जुड़े लोगों से संवाद कायम करके उनको अपने साथ नहीं लिया, तो वे 11 मार्च 2017 की तारीख को बसपा के अंत के रूप में अपनी डायरी में दर्ज कर लें.

जाने माने दलित चिंतक कंवल भारती की एफबी वाल से साभार.

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बसपा के पास गुंडे नहीं हैं, पर लुटेरे हैं, जबकि सपा के पास गुंडे और लुटेरे दोनों हैं : कंवल भारती

Kanwal Bharti : क्या उत्तर प्रदेश में २०१७ में बसपा सत्ता में आ सकती है? पूछा कुछ बसपाईयों ने. मैंने कहा, अगर यही हालात रहे, जो आज हैं, और कोई विशेष घटना नहीं घटी, तो बसपा वापिस आ सकती है. वे बोले, कैसे? जरा समझाइये. मैंने कहा, अगर कोई विशेष घटना नहीं हुई, तब.

वे बोले, सर यही तो समझाइये.

मैंने कहा, सारे वाम दल एक जगह आ गए हैं, वाम मोर्चा बन गया है. अगर उसने उप्र में अपनी जबरदस्त दस्तक दे दी, तो सपा-बसपा दोनों का खेल बिगड़ जायेगा. और अगर वाम मोर्चा दस्तक नहीं दे सका, तो मैं यही कहूँगा–लूट तंत्र इज बेटर देन गुंडा तंत्र.

वे बोले, क्या मतलब?

मैंने आगे कहा, बसपा के पास गुंडे नहीं हैं, पर लुटेरे हैं,जबकि सपा के पास गुंडे और लुटेरे दोनों हैं. जनता को गुंडों से परेशानी है, लुटेरों से नहीं, इसलिए बसपा आ सकती है.

वे बोले, सर. आप यह क्या कह रहे हैं? हम लुटेरे हैं?

मैंने कहा, बसपा में मायावती के सिवा क्या कोई नेता है? अगर हो तो बताओ?

रोहित वोमिला के मामले में क्या बसपाई सड़कों पर आये? नहीं आये. क्योंकि मायावती जी का आदेश नहीं था. फिर कौन नेता हुआ?

मैंने कहा, बसपा ने दलाल पैदा किये हैं, और वे गांव गांव में हैं, ब्लाक स्तर का बसपाई भी गाड़ी और शाम का खर्चा निकाल लेटा है.

वे बोले, क्या आपने राज्य सभा में उनका भाषण नहीं सुना. उन्होंने स्मृति ईरानी की बोलती बंद कर दी.

मैंने कहा, मायावती ने दलितों को भ्रमित किया है. आप लोग बिला वजह खुश हो रहे हैं. उन्होंने सिर्फ यह सवाल उठाया था कि जाँच समिति में एक दलित को रखना चाहिए. मैं पूछता हूँ कि अगर स्मृति ईरानी दलित को रख लेंगी, तो क्या वह दलित मायावती के अनुसार काम करेगा? क्या वह भाजपा और आरएसएस का आदमी नहीं होगा?

मैंने कहा कि मायावती को हैदराबाद युनिवर्सिटी के कुलपति की बर्खास्तगी और स्मृति ईरानी के इस्तीफे की मांग करनी चाहिए थी. लेकिन उन्होंने बहुत छोटी और घटिया मांग की, और आप खुशी से उछल रहे हैं. मैं कहता हूँ कि मायावती से राजनीति करनी ही नहीं आती है.

जाने माने दलित साहित्यकार और चिंतक कंवल भारती के फेसबुक वॉल से.

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आज़म खान, रामपुर की पुलिस और दोगला चरित्र

Kanwal Bharti : कल रामपुर पुलिस ने फेसबुक पर आज़म खान के खिलाफ लिखने वाले किसी व्यक्ति को गिरफ्तार किया है। खबर है कि उसने आज़म और उसके परिवार पर कोई टिप्पणी की थी। किन्तु रामपुर पुलिस दोगली चरित्र की है।

इसी आज़म के बेटे और उसके साथियों ने फेसबुक पर ही मुझे अभद्र भाषा में गालियां दी थीं, मुझे घर से उठाने की धमकी दी थी।

मैंने पूरे प्रमाण के साथ इसकी शिकायत डीजी, आईजी, डीआईजी और एसपी को की थी। साल भर हो गया, पर आज तक रामपुर की पुलिस ने किसी को गिरफ्तार नहीं किया। क्यों? है न दोगला चरित्र। क्या मान और भावनाएं सिर्फ आज़म और उसके परिवार की ही आहत होती हैं?

जाने माने दलित चिंतक कंवल भारती के फेसबुक वॉल से.

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कैंसर हो गया तो ये रुपया ही काम आएगा, कोई सगा संबंधी नहीं, इसलिए खूब भ्रष्टाचार करो, रुपया कमाओ!

Kanwal Bharti : अभी बरेली से मेरे एक मित्र ने बताया कि उनकी पत्नी को कैन्सर है और दिल्ली में राजीव नाम के एक अस्पताल में वे इलाज करा रहे हैं। अब तक 11 लाख रूपये खर्च हो चुके हैं और इलाज अभी जारी है। मुझे याद आया कि ओमप्रकाश वाल्मीकि के इलाज में कोई 22 लाख रूपये खर्चे में आये थे। फिर भी वे बच नहीं सके थे। Continue reading

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डा. आंबेडकर के मिशन से भटकने वाले दलित नेताओं का यही अंजाम होना है

Kanwal Bharti : जीतनराम मांझी ने दलित राजनीति को झकझोर कर रख दिया है. उन्होंने बहुत से अनसुलझे सवालों को भी सुलझा दिया है और लोकतंत्र में दलितों की हैसियत क्या है, इसका भी आईना दिखा दिया है. दलित आखिर जाएँ तो जाएँ कहाँ? किसी भी पार्टी में उनकी इज्जत नहीं है, सिर्फ उनका उपयोग है. यह लोकतंत्र, यह धर्मनिरपेक्षता और यह समाजवाद (जो सिर्फ हवाई है) दलितों के हितों की बलि पर ही तो जिन्दा है.

आखिर कब तक लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के नाम पर दलित वर्ग अपने आप को बलि चढ़ाता रहेगा ? मांझी ने अच्छे से समझा दिया है कि दलित को शासक बनाना कोई दल नहीं चाहता. शायद इसीलिए वह अपने हितों के लिए हमेशा सत्ता के साथ रहा है? यह उसकी विवशता ही है, क्योंकि अगर वह सत्ता की धारा के विरुद्ध जायेगा, तो अपना वजूद खो देगा. अब समझा जा सकता है कि मायावती का भाजपा के समर्थन से मुख्यमंत्री बनना, केंद्र की सत्ता के साथ रहना, पासवान, उदित राज और अठावले आदि का सत्तारूढ़ दल में पलायन करना उनके वजूद के लिए कितना जरूरी था.

जीतन राम मांझी का भी भाजपा में जाना तय है. क्योंकि जेडी (यू) में तो वह अपमानित हो ही चुके हैं, और राजनीति में जो हैसियत उन्होंने बना ली है, उससे पीछे लौटने का मतलब है, आत्मघात करना. लेकिन आत्मघात तो भाजपा में जाकर भी होना है. और अब स्पष्ट हो गया कि आखिर, भाजपा ने मांझी को कहीं का नहीं छोड़ा. मैंने उन्हें इसी अर्थ में अलविदा कहा था. यह अलविदा दलित राजनीति के लिए भी है. क्योंकि डा. आंबेडकर के मिशन से भटकने वाले दलित नेताओं का यही अंजाम होना है.

जाने-माने दलित चिंतक और साहित्यकार कंवल भारती के फेसबुक वॉल से.

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सलाम मांझी! सलाम कंवल भारती!

दलित-पिछड़ों यानी मूलनिवासी की वकालत को द्विज पचा नहीं पा रहे हैं। सामाजिक मंच पर वंचित हाषिये पर तो हैं ही, अब राजनीतिक और साहित्यिक मंच पर भी खुल कर विरोध में द्विज आ रहे हैं। बिहार के मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के आर्यों के विदेशी होने के बयान से उच्च जाति वर्ग पार्टी और विचार धारा से ऊपर जाकर बौखलाहट और तीखा विरोध के साथ सामने आया तो वहीं लखनउ में कथाक्रम की संगोष्ठी ‘लेखक आलोचक, पाठक सहमति, असहमति के आधार और आयाम’, में लेखक कंवल भारती के यह कहने पर कि ‘साहित्य और इतिहास दलित विरोधी है। ब्राह्मण दृष्टि असहमति स्वीकार नहीं करती।

सत्ता में बदलाव और संघ परिवार के मजबूत होने से दलित साहित्य के ज्यादा बुरे दिन आने वाले हैं।’ बस इतना ही कहना था कि संगोष्ठी में मौजूद द्विजों ने कंवल पर मुद्दे को भटकाने का आरोप लगाते हुए हमला बोल दिया। साहित्यिक माहौल में द्विजों का एक दलित लेखक पर उसकी अभिव्यक्ति पर हमला, साबित करता है कि राजनीतिक और सामाजिक मंच की तरह साहित्यिक मंच भी जातिवादी जड़ता से बाहर नहीं आ पाया है। जातिवादी जड़ता पूरी मजबूती से कायम है। तथाकथित जातिवादी नहीं होने का जो मुखौटा दिखता है वह नकली है।

जीतन राम मांझी के आर्यों के विदेशी होने के बयान पर द्विजों की बौखलाहट और तीखा विरोध से एक बात बिलकुल साफ है कि उच्च जाति वर्ग के बुद्धिजीवियों, राजनेताओं और कार्यकर्ताओं में पार्टी और विचार धारा से ऊपर जाकर उच्च जाति के मुद्दे पर एक एकता है। पीएमएआरसी के अध्यक्ष और दलित चिंतक अरूण खोटे मानते हैं कि उन सबके बीच इस बात की भी आम सहमति है कि सत्ता व्यवस्था पर चाहें कोई भी दल, व्यक्ति या विचाधारा का कब्जा हो लेकिन वह पूर्णरूप से उच्च जाति वर्ग के अधीन हो और जो उच्च जाति की वर्चास्यता को चुनौती न दे सके वहीं दलित और पिछड़े वर्ग के नेता और बुद्धिजीवी अपनी पार्टी, नेता और विचारधारा को अपने वर्ग से ज्यादा महत्त्व देते हैं बल्कि अनेक अवसरों पर अपने वर्गीय हितों के खिलाफ होने वाली गोलबंदी के समथन में भी खड़े हो जाते हैं। सच भी है मांझी के बयान से सभी द्विज गोलबंद हो गये। हिन्दूवादी मीडिया भी मांझी के बयान के विपक्ष में खड़ा दिखा। सोषल मीडिया पर जीतन राम मांझी के ज़ज्बे को सलाम किया गया। सत्ता व व्यवस्था के शिखर पर पहुंच कर जिस तरह से मांझी ने वंचित वर्ग की अस्मिता, पहचान और हक-हूक के सवाल को पूरी ताकत के साथ रखा है वह काबिले तारीफ है। महत्वपूर्ण बात यह है कि जीतन राम मांझी ने अपने बयान में दलित, आदिवासी और पिछड़ों को एक पहचान दिलाने की भरपूर कोषिष की। मूल निवासियों के हक की बात की। वह भी व्यवस्था के उच्च पद से।

मूल निवासी की बात को लेकर मुख्यधारा की मीडिया कभी सामने नहीं आयी। सोशल मीडिया में मूल निवासी की अवधारणा पर बहस करने वालों को इस बहस को आगे बढ़ाने में बल मिलेगा। साथ ही जीतनराम मांझी के समर्थन में मजबूती से साथ खड़ा सार्थक भूमिका होगी। जीतन राम मांझी  और कंवल भारती के बयान से बौखलाये द्विजों की प्रतिक्रिया ने बुद्धिजीवियों, राजनेताओं और सामाजिक कार्यकत्ताओं के चेहरे से नकाब हटा दिया है। बल्कि खुद ही उनके असली और नकली होने का प्रमाण दे दिया। थोड़ी देर के लिए राजनीतिक मंच को छोड़ दिया जाये और साहित्यकारों व बुद्धिजीवियों को देखा जाये तो, जो कुछ कथाक्रम की संगोष्ठी में दलित मुद्दे की बात कहने पर घटित हुई वह द्विजों के लिए अक्षम है। संस्कृति की राह दिखाने वाले खुद जब अपसंस्कृति की राह पकड़ ले तो इसे क्या कहा जाये?

इस हंगामे पर प्रो रमेश दीक्षित कहते हैं, कंवल भारती बढि़या बोल रहे थे। किसी को कोई दिक्कत थी, तो उसके लिए मंच था। वैचारिक स्वतंत्रता है, देश में अभी फासीवाद नहीं आया। वहीं जलेस के नलिन रंजन सिंह मानते हैं कि लोकतंत्र में अपनी बात कहने का हक है। ऐसे में कंवल भारती का विरोध करना गलत था। उनसे असहमति रखने के बाद भी उनके बोलने के अधिकार पर रोक का विरोध करता हूं। लेखक पंकज प्रसून कहते हैं, कंवल भारती तय करके के आए थे कि उनको क्या बोलना है। ऐसा कई बार लोग लोकप्रियता के लिए भी करते हैं। वे मुद्दों पर रहते तो विवाद नहीं होता। साहित्य में विवाद न हो तो संवाद नहीं होगा। विरोध पर कंवल भारती कहते हैं, ऐसा विरोध मेरे लिए नया नहीं है। मेरे साथ अक्सर ऐसा होता रहता है मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। मैं अपनी बात तो कहूंगा ही आप असहमत हैं तो अपना पक्ष रख सकते हैं।

द्विजों ने मूल निवासी पर मांझी को एवं साहित्य-इतिहास दलित विरोधी पर कंवल भारती को जिस तरह से धेरा वह सवाल खड़ा करता है। क्या कोई दलित-पिछड़ा (वंचित वर्ग) अपनी बात नहीं कह सकता? मांझी या फिर कंवल भारती ने कौन सी गलत बात कर दी? जब किसी वंचित को सत्ता-व्यवस्था में उच्च स्थान मिलता है तो उसे उसकी जाति से जोड़ कर क्यों देखा जाता है? सवाल उठाया जाता है। मुद्दों-बयानों में धेरा जाता है और साबित करने की कोषिष की जाती है कि दलित-पिछड़े-आदिवासी है इसलिये मोरचे पर असफल हैं! जबकि द्विजों पर यह हमला दलित-पिछड़े-आदिवासी की ओर से नहीं होता है। बहरहाल, दलित-पिछड़े-आदिवासी की आवाज को बुलंद करने के लिये जीतन राम मांझी और कंवल भारती को सलाम!

लेखक संजय कुमार बिहार के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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मोदी की मुलाकातों की तस्वीरों में भारत के एक खौफनाक भविष्य की तस्वीरें देख रहा हूं

Kanwal Bharti : अमेरिका में कारपोरेट और उनके सीईओस के साथ मोदी की मुलाकातों की तस्वीरों में मैं भारत के एक खौफनाक भविष्य की तस्वीरें देख रहा हूँ. उनमें मजदूरों के शोषण और उत्पीड़न के खतरनाक दृश्य देख रहा हूँ. गरीबी और भुखमरी से ग्रस्त लोगों के फांसी पर झूलते शरीर और उनके कंकाल देख रहा हूँ.

बेरोजगारी के अजगर के जबड़े में फंसे भविष्य के डाक्टरों और इंजीनियरों को देख रहा हूँ. लाखों रूपये देकर एमबीए डिग्री धारकों को कारपोरेट में सब्जियां बेचते देख रहा हूँ. देख रहा हूँ शिक्षित युवा वर्ग को असामाजिक भूमिका में. और यह सब इसलिए देख रहा हूँ, क्योंकि मोदी ने कारपोरेट को वचन दिया है कि वे उनके धन की सुरक्षा करेंगे. क्या यह सुरक्षा गरीबों-मजदूरों की सामाजिक सुरक्षा को ख़त्म किये बिना हो सकती है?

दलित चिंतक कंवल भारती के फेसबुक वॉल से साभार.

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फेसबुक पर आज़म खान के खिलाफ पोस्ट लिखने वाले फैसल लाला को पुलिस ने गिरफ्तार कर जेल भेज दिया

Kanwal Bharti : कल आजादी की पूर्व संध्या पर फेसबुक पर आज़म खान के खिलाफ पोस्ट लिखने वाले फैसल लाला को भी पुलिस ने गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. उन पर आरोप है कि छ महीने पहले कुछ कांग्रेसियों ने सपाइयों के साथ मारपीट की थी, उनमें फैसल लाला भी शामिल थे.

अब आज़म खान के निशाने पर उनके एक और विरोधी डा. तनवीर हैं, उन पर भी दो मुकदमे करा दिए गये हैं. किसी भी समय कुछ भी हो सकता है. मुझे भी फिर से गिरफ्तार कराने की आशंका लगने लगी है, मामला वह कुछ भी बना सकते हैं.

दलित चिंतक कंवल भारती के फेसबुक वॉल से. कुछ माह पहले आजम खान के खिलाफ लिखने के आरोप में कंवल भारती को भी पुलिस ने गिरफ्तार किया था.

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काश, बेहमई की ठाकुर महिलाओं ने स्त्री के पक्ष में अपनी संतानों को स्त्री की इज्जत करना सिखाया होता!

कंवल भारती


Kanwal Bharti : वर्ष 2000, 3 जून का ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’. बेहमई कांड पर खबर थी–“अपर कास्ट पीपुल वांट टू टेक रिवेंज आन दलिट्स” (उच्च जातियों के लोग दलितों से बदला लेना चाहते हैं). इस खबर में कहा गया था– सवर्ण हिन्दू सिर्फ बदला चाहते हैं, और कुछ नहीं. इस खबर की रिपोर्टिंग हैदर नकवी ने की थी. एक ग्रामीण ने कहा था, ‘फूलन ने 21 को मारा था, अब हम 25 को मरेंगे’. एक ठाकुर महिला ने कहा था– ‘हाँ, बेहमई उबल रहा है. बच्चे बड़े हो गये हैं. वे किसी के बश में नहीं हैं. अगर अब वे बन्दूक से इन्साफ चाहते हैं, तो इसमें गलत क्या है?’

मैं उन दिनों “माझी जनता” का संपादक था. मैंने इस खबर पर अपने सम्पादकीय में एक लम्बी टिप्पणी की थी. वह पूरी टिप्पणी तो नहीं, पर उसका एक अंश यहाँ दे रहा हूँ. मैंने लिखा था–“आज फूलन देवी भले ही सांसद हैं, पर उनके चेहरे पर ठाकुरों के आतंक का खौफ आज भी साफ़ देखा जा सकता है. उसकी मुस्कराहट के पीछे उस दर्द की रेखाएं साफ नजर आती हैं. फूलन देवी की अस्मिता और जवानी को लील लेने वाले उन ठाकुरों की औलादें आज इसलिए उबल रही हैं, क्योंकि उनकी माँओं ने उन्हें यह सिखा कर बड़ा किया है कि उनके पिताओं की हत्याएं एक नीच जाति की स्त्री फूलन ने की हैं, जिसकी कोई इज्जत नहीं होती है. बेहमई की इन ठाकुर महिलाओं ने अपनी औलादों को यह नहीं बताया कि उनके पिताओं ने कैसे-कैसे जुल्म फूलन पर ढाये थे, किस कदर उसको नंगा करके सरेआम बेइज्जत किया गया था. वह रो रही थी, इज्जत की भीख मांग रही थी, पर हरामखोर ठाकुरों के दिल नहीं पसीजे थे”.

काश, बेहमई की ठाकुर महिलाओं ने स्त्री के पक्ष में अपनी संतानों को स्त्री की इज्जत करना सिखाया होता!

दलित चिंतक और साहित्यकार कंवल भारती के फेसबुक वॉल से.

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चोरी करना पाप नहीं है, केवल समस्या है

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