भक्त मीडिया को सब दिख रहा पर केंद्रीय सत्ता से सवाल करने की हिम्मत नहीं!

दीपांकर पटेल-

मीडिया में काम करने वाले जब कोरोना की लाशें गिन रहें हैं तो उनका मन अंदर से खीझ रहा है. आस्थावान पत्रकार भी कुंभ के नाम पर मचे महामारी उत्सव की आलोचना करना चाहता है, गोदी मीडिया का पत्रकार भी अपने आराध्य नेता को रैली करने पर सुना देना चाहता है.

लेकिन कहते हैं कि आस्था और भक्ति व्यक्ति का साथ मृत्यु तक नहीं छोड़ती. तो ज्यादातर मीडियाकर्मियों के मन का गुब्बार भी तभी फट रहा है जब उनका कोई करीबी व्यवस्था की खामी का शिकार हो रहा है, काल के गाल में समा जा रहा है.

भक्ति मीडिया को सबकुछ सच दिख रहा है पौने दो लाख केसेस दिख रहे हैं, लेकिन केन्द्रीय सत्ता से सीधा सवाल करने की हिम्मत अभी तक नहीं हो पा रही है.


वरिष्ठ पत्रकार ओम् थानवी क्या कहते हैं, पढ़िए-

कल इंडिया टुडे के आशुतोष मिश्र की ख़बर थी तब तक हरिद्वार में 31 लाख लोग डुबकी लगा चुके थे। कोरोना के नियमों की धज्जियाँ उड़ गईं। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री ने टीवी पर ज्ञान दिया: तबलीग़ के आयोजन से तुलना ठीक नहीं, वे लोग छोटी बंद इमारत में सिमटे हुए थे (जिनमें अनेक पर मुक़दमा दर्ज हुआ, आतंकवादी और देशद्रोही क़रार दिया गया)। हरिद्वार तो खुले में है। जो गंगास्नान करके जाएगा, उसे कोरोना नहीं होगा। मुख्यमंत्री ने कहा सो अपनी जगह, साधुओं-श्रद्धालुओं पर सरकार ऐसे मौक़ों पर हैलिकॉप्टरों से फूल भी बरसा आती है। अशिक्षा और अंधश्रद्धा का ‘नया इंडिया’?


पत्रकार नवीन कुमार ने भी न्यूज़ चैनलों की खबर कुछ यूँ ली-


पढ़ें राहुल सिंह की टिप्पणी-

चुनाव इस देश में पहले भी होते रहे हैं, लेकिन भाजपा के केन्द्र में आने के बाद गैर भाजपा शासित राज्यों में चुनाव एक अलग ही परिघटना हो गई है. इस देश के अठाईस- तीस न्यूज चैनल अम्बानी और अडानी के हैं, उन सबको दिन रात उस राज्य में भाजपा की हवा बनाने में लगा दिया जाता है. ईडी सीबीआई के छापों से सत्ता के मन में भय और जनता के मन में उनके भ्रष्ट होने की छवि बिठाई जाती है.

जिन्हें भ्रष्ट बताया जाता है वे भाजपा से मिल जायें तो पवित्र हो जाते हैं. उसके बाद उन्हें सामने करके यह उनकी सार्वजनिक मंचों से आलोचना कराना आरंभ करते हैं. जिससे जनता में यह संदेश जाये कि यह आदमी तो उसी का था और अब भीतर की बातें बाहर लेकर आ रहा है.

चूंकि केन्द्र की कोई जवाबदेही इन पर है नहीं तो दोनों जने घूम घूम कर राज्यों के दिग्विजय के लिए निकले हुए हैं. जवान मारे जाये कोई बात नहीं. चीन घुस आये कोई बात नहीं. सबसे जरुरी है जिन गैर भाजपाई राज्यों में चुनाव हो, वहाँ यह नरेटिव सेट करना कि बहुसंख्यक हिन्दुओं के साथ अब तक इस राज्य में न्याय नहीं हुआ है.

संघ की आनुषंगिक इकाइयों समेत इतने हिन्दू संगठन रातों रात सक्रिय हो जाते हैं कि किसी भी सत्तासीन राजनीतिक दल ने आज से पहले ऐसे चुनावों का सामना नहीं किया है. गैर भाजपा शासित राज्य विधानसभा चुनावों में केन्द्र के साथ एक अघोषित युद्ध लड़ रही हैं. जिसमें सारी केन्द्रीय एजेंसियां राज्य के खिलाफ सक्रिय कर दी जा रही हैं. बाकी इस युद्ध की वल्गायें गोदी मीडिया ने थाम रखी है.

परम्परागत तरीके से भाजपा से पार पाना मुश्किल है. किसी भी गैर भाजपाई राजनीतिक दल के लिए यह इतनी बड़ी मुसीबत है कि उससे निबटने की तैयारी का वक्त भी वे नहीं निकाल पा रहे हैं और सच तो यह भी है कि इसकी रणनीति भी उनके पास नहीं है. वे लगातार डिफेंसिव होने को अभिशप्त हैं. आफेंसिव होने के लिए तात्कालिक बुनियादी अर्हता वे देश के संसाधनों को कारपोरेट के हाथ में सौंप कर एक हद तक जुटा सकते हैं, लेकिन इसके लिए वे तैयार नहीं हैं. और इसकी कीमत उन्हें चुकानी पड़ रही है.

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