दयाशंकर शुक्ल सागर को तीसरा कुलिश अवार्ड देंगे राष्ट्रपति

इलाहाबाद “हिन्दुस्तान” के संपादक दयाशंकर शुक्ल सागर के नेतृत्व में “हिन्दुस्तान टीम” को इस साल के “केसी कुलिश अवार्ड फार एक्सिलेंस इन जर्नलिज्म” के लिए फिर चुना गया है। यह अवार्ड ‘अंधे दलित का दर्द’ नाम की उस समाचार श्रृंखला के लिए दिया जा रहा है जिसमें अखबार के प्रयास से एक दलित परिवार को इंसाफ मिला। इससे पहले श्री शुक्ल को ‘इस आतंकवादी की खता क्या है और ‘फर्जी खाते बना कर करोड़ों की लूट नाम की समाचार श्रृंखला पर दो बार केसी   कुलिश अवार्ड से नई दिल्ली में नवाजा जा चुका है।

इलाहाबाद के कोरांव तहसील के सुदूर लड़ियारी गांव में मायावती शासन के अंतिम दौर में एक दलित के आधे परिवार की भूख से मौत हो गई। इन मौतों के कारणों की पड़ताल करते हुए ‘हिन्दुस्तान‘ ने ‘अंधे दलित का दर्द’ नाम की एक श्रृंखला शुरू की। इन खबरों को इस साल पत्रकारिता के मशहूर ‘केसी कुलिश इंटरनेशनल अवार्ड फार एक्सीलेंस इन जर्नलिज्म’ के लिए चयनित किया गया है। 30 अक्टूबर 2013 को राष्ट्रपति भवन में आयोजित एक समारोह में राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी श्री शुक्ल को सम्मानित करेंगे। टीम के सदस्यों में लड़ियारी गांव के संवाद साथी धीरेन्द्र शुक्ल व गंगापार यमुनापार संस्करण के डेस्क प्रभारी देवेन्द्र कुमार शुक्ल शामिल हैं। सामाजिक सरोकार से जुड़ी पुरस्कृत स्टोरी  ‘भूख से मौत और सिस्टम का सच हम यहां दे रहे हैं जिसमें बताया गया कि आज के दौर में भी अखबार कैसे बदलाव की शुरूआत कर सकता है।    

भूख से मौत और सिस्टम का सच

दयाशंकर शुक्ल सागर

गरीबी रेखा की तरह भूख से मौत की भी एक अदृश्य रेखा होती है जिसे आज तककोई नहीं देख पाया। भूख से हुई मौत को साबित करना आसान नहीं। कोई आमरण अनशन के दौरान प्राण त्याग दे तो आप कह सकते हैं वह कई दिनों से भूखा था इसलिए प्रस्थान कर गया। लेकिन अपने ही घर में खाने को कुछ न हो तो भी आदमी कब तक भूख रहेगा। भीख मांगकर भी खाने के लिए दो जून की सूखी रोटी का इंतजाम कर ही लेगा। शायद इसीलिए इलाहाबाद ही नहीं देश के किसी भी जिले का प्रशासन यह मानने को कतई तैयार नहीं होता है कि फलां व्यक्ति की मौत भूख से हुई है। प्रशासन का हमेशा यह तर्क रहता है कि मौत किसी बीमारी से हुई।

इलाहाबाद के एक सुदूर गांव में दलित शिव कुमार की पत्नी प्रमिला उर्फ गूंगी गर्भवती थी और घर में प्रसव के दौरान उसकी मौत हुई। हो सकता है कि जिला प्रशासन यह मान रहा हो कि किसी गरीब की जोरू का गर्भवती होना भी एक बीमारी है। इसलिए गूंगी की मौत में कुछ भी अस्वाभाविक नहीं जिस पर इतना हो हल्ला मचाया जाए। वह गूंगी थी इसलिए प्रसव पीड़ा के दौरान मदद के लिए चिल्ला नहीं पाई होगी कि उसकी आवाज एएनएम या बहूरानी आशा के कानों तक सुनाई देती। तो कोई गुनहगार नहीं। बड़े गांव कस्बों में इस तरह की छोटी-छोटी घटनाएं होती रहती हैं। सच पूछिए तो यह कोई खबर भी नहीं थी जिसके लिए अखबार के पन्ने काले किए जाएं या खबरों की श्रृंखला चलाई जाए। मीडिया के गुरू जानते हैं कि इस तरह की खबरें डाऊन मार्केट खबरें हैं। एक तरह की स्पेस किलिंग खबरें।  लेकिन पत्रकारिता के सामाजिक सरोकार ने मजबूर किया कि हम इस खबर की तह दर तह कुरेदें।

‘हिन्दुस्तान के पास जब दलित की पत्नी, अगले दिन नवजात शिशु और दो दिन बाद पांच साल के बेटे के भूख से मरने की खबर आई तो हमने सबसे पहले शिवकुमार की रसोई में झांककर गरीबी के अर्थशास्त्र को समझने की कोशिश की। रसोई ही थी क्योंकि वहां मिट्टी का एक चूल्हा बना था। बुझी राख की ठंडक गवाह थी कि चूल्हा कई दिन से जला नहीं था।

हमारे स्थानीय संवाद साथी धीरेन्द्र शुक्ल ने घर में रखे डालडे के पुराने डिब्बों में भी झांका जिसमें आम तौर पर गरीब परिवार आटा या दाल रखते हैं। वहां दो डिब्बे थे, दोनों खाली। इन सब की तस्वीरें खींची गईं ताकि हम साबित कर सकें कि उस गरीब के घर पर खाने के लिए वाकई कुछ नहीं था।

शिवकुमार, गर्भवती पत्नी गूंगी, तीन बच्चे और अस्सी साल की बूढ़ी मां। जरा सोचिए कि घर में अन्न का दाना न हो तो ये परिवार कितने दिन और जी पाएगा। भीख भी मांगेंगे तो कोई कितने दिन खिलाएगा। जबकि पूरा परिवार भूखा हो। हमारे लिए मुद्दा यह नहीं है कि इस 21वीं सदी में इस चमकते भारत में भूख और गरीबी से कैसे एक परिवार का आधा हिस्सा खत्म हो जाता है। असल सवाल यह है कि केन्द्र से लेकर हमारी लोकप्रिय राज्य सरकार दलितों के लिए कितनी योजनाएं चला रही हैं। आखिर यह योजनाएं दलित के चौखट तक क्यों नहीं पहुंच पा रही हैं। इतनी महंगाई में हम जो टैक्स सरकार को दे रहे हैं उसका क्या हो रहा है? अगर वह गरीबों की मदद के लिए नहीं खर्च हो रहा है तो वह किसकी जेब में जा रहा है? यही सवाल अन्ना भी कर रहे हैं। इनकम टैक्स भरने वाला मिडिल क्लास इसीलिए अन्ना के साथ है। पर यह अलग बहस का मुद्दा है।

हिन्दुस्तान ने इस बारे में खबरों और फालोअप का सिलसिला चला कर  जिला प्रशासन और उसके अफसरों को सिर्फ आइना दिखाया। हमारे सिस्टम में आशा बहू से लेकिन एसडीएम तक कैसे काम कर रहे हैं? जिले में तैनात मुख्य विकास अधिकारी विकास कार्यों की निगरानी कैसे कर रहा है? जनप्रतिनिधि क्या कर रहे हैं? बीस साल से विधवा को पेंशन नहीं मिली इसके लिए कौन जिम्मेदार है? गरीबी की महीन रेखा के सबसे निचले पायदान पर खड़े इस दलित परिवार का इंदिरा आवास किसने नहीं बनने दिया? गर्भवती मां को प्रसव के दौरान घर में क्यों दम तोड़ना पड़ा? पांच साल का सोनू सूखे रोग से क्यों मर गया? छोटी सावित्री स्कूल क्यों नहीं जाती थी। दो साल का मोनू कब से भूखा है। आंगनबाड़ी में इसे दलिया क्यों नहीं मिलता? दलित की जमीन ठाकुर ने कैसे गिरवी रख ली? सवाल इतने हैं कि हर सवाल से कई और सवाल खड़े हो जाते हैं लेकिन उसका जवाब किसी के पास नहीं। ये सारे सवाल हमने खबरों के जरिए उठाए। लगातार छपी खबरों से प्रशासन की नींद टूटी। पर असल सवाल ये भी है कि क्या अखबार में छपी खबर की अलार्म घड़ी के बजे बिना सरकारी अफसरों की नींद नहीं टूटेगी?

बहरहाल, खबरें छपने के बाद डीएम साहब जागे। आनन-फानन में विधवा मां की पेंशन के कागज बनने का काम शुरू हो गया। विकलांग पेंशन भी दलित के खाते में आ गई। बिटिया का दाखिल कस्तूरबा गांधी विद्यालय में हो गया। ‘हिन्दुस्तान’ के कुछ भावुक पाठकों ने चेक देकर दलित की नि:स्वार्थ मदद की और ठाकुर साहब उस धन से गिरवी खेत वापस करने को राजी हो गए। उनका मन थोड़ा और पसीजा और उन्होंने खेत में खड़ी फसल दलित को दान कर दी। वह खुश थे मानों गंगा नहा आए। इस कहानी का अंत एक परी कथा की तरह सुखद है। घर के बाहर सब खुश थे। जब हम चेक देने गांव पहुंचे तो हाथ में चेक लिए नेत्रहीन शिवकुमार की अंधेरी आंखों में भी हमें एक चमक दिखी। कभी-कभी पीड़ा का हद से गुजर जाना भी एक तरह के सुख की अनुभूति देता है।

मैं दलित की उजाड़ झोपड़ी के उस नए लगे दरवाजे को खोलकर अंदर झांकता हूं। उस सीलन से भरी अंधेरी झोपड़ी से मुझे एक दर्दनाक गूंगी चीख सुनाई देती है। यह प्रसव पीड़ा से कराहती एक मां की चीख थी जो अब इस दुनिया में नहीं। मैं घबरा कर वह किवाड़ बंद कर देता हूं। वह चीख अब भी मेरे कानों में लगातार गूंज रही है।
 

सोशल मीडिया के उपयोग पर सेबी देगा दिशा-निर्देश

सेबी पूंजी बाजार में सोशल मीडिया के दुरुपयोग की आशंका दूर करने के लिए दिशा-निर्देश बनाने पर काम कर रहा है ताकि निवेशकों के हितों की रक्षा की जा सके। सेबी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि टि्वटर और फेसबुक जैसी साइटों की लोकप्रियता बढ़ने के साथ दुनियाभर के पूंजी बाजार नियामक संपूर्ण रख को समझने एवं खुफिया जानकारी हासिल करने के लिए इस तरह के टूल का इस्तेमाल करने की संभावना तलाश रहे हैं।

उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया के उपयोग से संबद्ध दिशा-निर्देशों को अंतिम रूप देने में बाजार नियामक को थोड़ा वक्त लगेगा।

रावण जी की आज पुण्यतिथि है

Yashwant Singh :  रावण जी की आज पुण्यतिथि है. इस मौके पर मैं रावण को सादर नमन करता हूं. रावण को मैं असली योद्धा मानता हूं. आपने झुकने या टूटने की जगह अंतिम दम तक लड़ाई लड़ना पसंद किया और लड़ते हुए प्राण त्यागने को अपना गौरव समझा. कायरों की इस दुनिया में जिनकी थोड़ी-थोड़ी, छोटी-छोटी बातों से फट जाती है, उन्हें रावण से सबक लेना चाहिए कि हर हालत में, चाहें भले ही हार सुनिश्चित हो, मौत तय हो, आपको अपने साहस के साथ डटे रहना चाहिए… रावण ने अपने परिजन शूर्पणखा के अपमान का बदला लेने के लिए आखिरी दम तक लड़ाई लड़ी…

रावण को हराने के लिए दुश्मन पार्टी ने रावण के खानदान में फूट डलवाने की रणनीति अपनाई और एक भाई को गद्दार बनने को प्रेरित किया, जिसमें सफलता भी पाई… इन्हीं कारणों से रावण जी की हार हुई… दुश्मन पार्टी के लेखकों-कवियों ने रावण जी को महान खलनायक बनाने की पूरी कोशिश की और इसमें सफलता पाई… जबकि वे अपने पक्ष की बुराइयों पर रोशनी डालते कम देखे गए.

रावण ने अपनी बहिन की नाक काटे जाने पर दूसरी पार्टी की औरत का अपहरण कर डाला जिसे दुश्मन पार्टी छलपूर्वक उठाया गया कदम बताया लेकिन दुश्मन पार्टी ने जब छलपूर्वक रावण के एक भाई का ब्रेनवाश कर उसे अपनी पार्टी में मिला लिया तो इसे सत्यकर्म साबित करने में जुट गए… कुल मिलाकर राम, रावण, रामायण पर नए सिरे से सोचने विचारने की जरूरत है और रावण को फूंकने की जगर उनसे बहुत कुछ सीख लेना वक्त का तकाजा है…

भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

Zafar Irshad : कानपुर में दशहरा के दिन रावण की पूजा भी होती है…उसका एक 200 साल पुराना मंदिर भी यहाँ है, जो साल में एक बार खुलता हैं, आज के दिन बस…इससे सिद्ध होता है की शायेद रावण एक ख़राब आदमी नहीं था, इस लिए आज भगवान रामचंद्र की जय के अलावा जय लंकेश भी कहे..आप लोग….(वैसे यह मैं दावे के साथ नहीं कह सकता की रावण अच्छा आदमी था-या ख़राब-क्योंकि मुझे ज्यादा धार्मिक ज्ञान नहीं है, मैंने आपको बस एक जानकारी दी है.. इस लिए कृपया मुझे गालियाँ न दें…

कानपुर के वरिष्ठ पत्रकार जफर इरशाद के फेसबुक वॉल से.

‘आपकी अदालत’ में केजरीवाल ने यशवंत देशमुख को आरएसएस का एजेंट कहा!

Manish Kumar : आज बहुत दिनों के बाद इंडिया टीवी पर आप की अदालत देखा. अरविंद केजरीवाल आज कटघरे में था. इस कार्यक्रम में क्या हुआ उसका कुछ अंश नीचे लिख रहा हूं… अरविंद ने आज देश को बताया कि कुछ दिन पहले टीवी चैनलों पर जितने भी सर्वे हुए वो एक "स्कैम" था, जिसमें 5 टीवी चैनल शामिल थे. लेकिन आदतन, उसने कोई सबूत नहीं दिया.

फिर अरविंद ने बताया कि सर्वे कराने वाली एजेंसी सी-वोटर के मालिक यशवंत देशमुख आरएसएस के एजेंट हैं. इसके बाद रजत शर्मा जी से उल्टा यह भी पूछा कि यशवंत देशमुख के बारे में यह आप नहीं जानते हैं?

जब रजत जी ने आम आदमी पार्टी के दागी उम्मीदवारों की लिस्ट सामने रखी तो अरविंद का होश उड़ गया. उसने यह कहा कि अगर यह साबित हो गया तो इन लोगों से पार्टी टिकट छीन ली जाएगी. अरविंद ने यह भी माना कि अमेरिका से फंड आ रहे हैं लेकिन ये फंड एनआरआई दे रहे हैं.

अरविंद केजरीवाल ने दावा किया कि वो सब सर्वे फ्रॉड है जिसमें आम आदमी पार्टी को तीसरे नंबर पर दिखाया गया है. सिर्फ आम आदमी पार्टी के योगेन्द्र यादव द्वारा किया गया सर्वे ही सच्चा है. अरविंद के मुताबिक योगेंद्र जी के सर्वे में आम आदमी पार्टी को सबसे ज्यादा 32% वोट मिल रहे हैं.

आज अरविंद को देख कर यही लगा कि उसका तर्क बहुत ही सिम्पल है कि हिंदुस्तान में सिर्फ वही एक ईमानदार व्यक्ति है.. और जो भी उसके साथ नहीं है वह या तो भ्रष्ट है या फिर आरएसएस का एजेंट.. जो सर्वे उसके फेवर में है वो सत्य है बाकि फ्रॉड है.

फिलहाल, मेरी तरफ से सिर्फ एक ही सवाल है… अगर चुनाव में आम आदमी पार्टी को 32% वोट नहीं मिले तो क्या अरविंद केजरीवाल अपने सहयोगी व आम आदमी पार्टी के नेता योगेंद्र यादव को फ्रॉड कहेंगे..

इंडिया टीवी में काम कर चुके और कई वर्षों से 'चौथी दुनिया' व संतोष भारतीय की सेवा में रत पत्रकार मनीष कुमार के फेसबुक वॉल से.

‘हिंदुस्तान’ ने खबर छापी है कि मैंने अपने विरोधियों को धमकी दी है : कंवल भारती

Kanwal Bharti : 'हिंदुस्तान' ने खबर छापी है कि मैंने अपने विरोधियों को धमकी दी है. मैं 'हिंदुस्तान' का आभारी हूँ कि उसने मुझे अपनी गलती का अहसास कराया. दरअसल मैं खुद इस बात को लेकर दुखी हूँ कि मेरे जो मित्र कल तक मेरे साथ खड़े थे, आज वे मेरे इस कदर विरोधी हो गये हैं कि तीखी आलोचना के साथ-साथ तीखे व्यंग्य-बाण भी चला रहे हैं. वे मेरे संकट के साथी हैं, उनकी आलोचनाओं को मैं अपने लिए चुनौती समझता हूँ और शीघ्र ही यह साबित भी हो जायेगा कि मैं अपने आन्दोलन से जरा भी विचलित नहीं हुआ हूँ.

पर उन मित्रों का क्या करूँ जो अशालीन तरीके से और मेरे चेट बॉक्स में असंसदीय भाषा में बात करने लगे थे. क्या किसी विचारक या लेखक को राजनीति में आने का अधिकार नहीं है? मैंने कौन सा अलोकतांत्रिक और समाज-विरोधी काम कर दिया? ऐसे ही मित्रों को मैंने unfriend और block करने की बात कही थी. मैं अपने उन तमाम मित्रों से क्षमा चाहता हूँ, जिन्हें मेरे comment से तकलीफ हुई.

दलित चिंतक और साहित्यकार कंवल भारती के फेसबुक वॉल से.

राजेंद्र यादव प्रकरण पर हिंदी पट्टी में इतना गहरा सन्नाटा देख विभूति छिनाल प्रसंग याद आता है

Samar Anarya : राजेन्द्र यादव के घर में कार्यरत एक व्यक्ति द्वारा एक युवा लेखिका का अशालीन वीडियो बना लिए जाने की और उसे सार्वजनिक कर दिए जाने की धमकी दी जाती है और लेखिका के शिकायत करने पर राजेन्द्र जी सुबह बात करने की बात करते हैं. तमाम प्रयासों के बाद अंततः जब बात होती है त उनके समे उस लड़की पर यौन हमला होता है, उसके कपड़े फाड़े जाते हैं और जब वह पुलिस बुलाने की कोशिश करती है तो राजेन्द्र यादव पहले पुलिस को वापस फोन कर न आने की सलाह देते हैं आर फिर आ जाने पर शराब की रिश्वत दे कोशिश करते हैं कि मामला दब जाय.

और इस सब पर उस लेखिका के बयान के बावजूद हिंदी पट्टी में इतना गहरा सन्नाटा होता है कि थानेदार विभूति बाबू का छिनाल प्रसंग याद आ जाता है. क्यों? सिर्फ इसीलिए कि इस मामले को एक साम्प्रदायिक, घोषित मोदी भक्त पत्रकार सामने ले कर आया? यकीन करिये कि आपकी चुप्पी से उस संघी पत्रकार की पहले से ख़त्म विश्वसनीयता को न कोई फ़र्क पड़ना था न पड़ा. हाँ आपकी प्रगतिशीलता की कलई जरूर थोड़ी सी और साफ़ हो गयी है. (भाई पंकज कुमार झा के इस प्रसंग पर मेरी 'चुप्पी' का राज पूछने पर हतप्रभ भर हुआ था मैं, क्योंकि खबर तक नहीं थी. अब हुई तो बोल रहा हूँ.)

लेखक अविनाश पांडेय 'समर' अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारवादी हैं और इन दिनों हांगकांग में पदस्थ हैं. उन्होंने उपरोक्त बातें अपने फेसबुक वॉल पर प्रकाशित की हैं. उनकी उपरोक्त बातें पर जो कुछ प्रतिक्रियाएं आई हैं, वो नीचे हैं..

    पंकज कुमार झा धन्यवाद Samar भाई.
 
    Indra Mani Upadhyay राजेन्द्र जी साहित्य के आशाराम हैं
 
    Samar Anarya धन्यवाद कैसा पंकज भाई? मैं तो स्तब्ध हूँ कि खबर ही नहीं हुई इतनी बड़ी बात की, वरना जितना हो पाए बोलता हूँ मैं, चुप रहने वालों में से नहीं हूँ. हाँ, यह जरुर है कि संदिग्ध विश्वसनीयता वाले लोग सही सवाल भी उठायें तो हश्र यही होता है. ज्योति जी ने गलत आदमी चुन लिया अपनी बात रखने के लिए. और यहाँ मामला संघी होने की वजह से गलत होने का नहीं है, आप संघी हैं, मैं वामपंथी, एक दूसरे के लिए विचारधारात्मक रूप से गलत, पर उससे हम दोनों एक दूसरे की तथ्यात्मकता पर कहाँ शक करते हैं. पर कोई निष्पक्षता के नकाब में (या उस आदमी के लिए बुरका) मोदी भजन करे तो शक होना लाजमी है. पर आइये, अब मिल के लड़ते हैं. See Translation
   
    Mohammad Yusuf English mein likhye
    
    Surajit Dasgupta Who's this new netherworld creature?
     
    Samar Anarya Rajendra Yadav is the most celebrated Hindi litterateur, editor of Hans and a champion of Dalit/feminist issues. The impartial patrkar is one Ashish Kumar Anshi, a sanghi stooge Surajit.
     
    Surajit Dasgupta सड़कों पर जुलूस निकालो इनकी. नंगा करके मारो सालों को.
     
    Surajit Dasgupta I am increasingly convinced there is no effective way of handling the women's security issue other than violent vigilantism.
     
    Samar Anarya That's no solution Surajit, that would actually end up legitimizing the right wing vigilante groups only!!!
     
    Surajit Dasgupta Apolitical vigilantism. On the spot justice. Whoever comes to know this has happened in his neighbourhood must immediately spring into action before any political group comes to know of it.
     
    खां साहेब अंशु बाबू इतने मासूम तो नहीं हैं जितना मासूमियत भरा उनका लेख है। हुआ कुछ ये है कि ज्योति बोलती गयी और अंशु भाई दर्ज करते गए। कुछ स्वाभाविक सवाल या तो ज्योति से किए नहीं गए या फिर करने के बावजूद दर्ज नहीं किए गए।
     
    अमिता नारायण जीओ समर!! जब तक सफ़ेदपोश यह सोचते रहेंगे की वो कुछ भी करें वो बच जाएँगे, बाक़ी डर की वजह से चुप रहेंगे, ऐसे वाक़या होते रहेंगे। hypocrisy can only go by baring such truths. It has to be fought at all levels.See Translation
     
    Sandeep Kumar मामला केवल उतना ही नहीं है जितना अंशूजी बता रहे हैं. यह ज्योति कुमारी का सच है. एक सच प्रमोद का भी है लेकिन निस्संदेह इस सबमें सबसे घटिया भूमिका राजेंद्र यादव की है और उन सबकी भी जो इस बात को महत्त्वहीन या घटिया- छिछला बताकर इसे सार्वजनिक करने या सार्वजनिक टीप करने से बच रहे हैं.
     
    Samar Anarya नारीवाद की जितनी समझ है खां साहेब, Sandeep भाई उसमें स्त्री के पक्ष को प्रधानता देनी ही होती है। और बात यहाँ उस संघी अंशु की है ही कहाँ, मामला यह है कि ज्योति ने पुलिस में जाने का, जाँच करवाने का हौसला किया है और अब तक की सूचना के मुताबिक़ राजेन्द्र यादव जाँच रोकने की कोशिश कर रहे हैं। बहुत कुछ साफ़ हो जाता है इसी से।
     
    Sandeep Kumar आप को बातों से पूरी सहमती है Samar. पुरुष सत्ता इतनी घाघ है की आप जिन चीज़ों से बचने के लिए घर से बहार निकलते हैं आखिर में खुद को उन्ही बातों के अगुआ मठाधीशों के चंगुल में पाते हैं. तब आपकी बचाव की कोशिअहोन का ये लोग ऐसे ही गला घोंट देते हैं.
     
    Meenu Jain मैं हिंदी की साहित्यकार नहीं हूं न ही हिंदी लेखक जगत की अंदरूनी राजनीति से परिचित हूं परंतु एक महिला लेखक पर हुए यौन हमले को रफा दफा करने की साजिश का पर्दाफाश किए जाने का जोरशोर से समर्थन करती हूं . इस प्रसंग को लेकर हिंदी पट्टी में छाए सन्नाटे की बात का उत्तर तो यह है कि ' बड़े आदमी ' से पंगा लेने में घबराते हैं सभी लेखक – चाहे पुरुष हों या स्त्री , वामपंथी हों या दक्षिणपंथी . मेरा सवाल यह है कि हिंदी की सारी नारीवादी महिला लेखकों की ज़ुबान को लकुवा क्यों मार गया? मुझे लगता है कि राजेंद्र यादव महिला लेखकों को टॉयलेट पेपर समझते हैं . कुछ दिन पहले भी फेसबुक पर पढ़ रही थी कि कैसे एक महिला को उन्होंने रातोंरात एक पत्रिका के सम्पादनकार्य से रातोंरात बिना कोई नोटिस इत्यादि दिए हटा दिया था .


पूरे प्रकरण को जानने-समझने के लिए नीचे दिए गए दो शीर्षकों पर क्लिक करें…

जब मैं समझ गई कि राजेंद्र यादव के घर से बच कर निकलना नामुमकिन है, तब मैंने सौ नंबर मिलाया

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राजेंद्र यादव ने तरह-तरह के एसएमएस भेजे, वे साहित्यिक व्यक्ति हैं, इसलिए उनकी धमकी भी साहित्यिक भाषा में थी

पत्रकार मयंक सक्सेना और रंगकर्मी इला जोशी की लखनऊ में आज शादी है

Yashwant Singh : एक पत्रकार और दूसरा रंगकर्मी. दोनों ने अपने अपने क्षेत्र को जन सरोकार से जोड़ा और जिया. अन्ना का आंदोलन हो या दामिनी कांड के खिलाफ जन उभार, आपदाग्रस्त इलाकों में राहत हो या आम आदमी का दुख-सुख.. हर एक जगह ये दोनों पूरे दमखम के साथ मौजूद रहे और एक बड़ी टीम को अपने साथ जोड़कर नेतृत्व किया… ढेर सारे मुश्किल दुख झेले देखे इनने.. लेकिन अपने जिद, जुनून और जज्बे को कायम रखा, आगे बढ़ते रहे…

ये दोनों लीक से हटकर सोचने और जीने वाले जीव हैं. एक्टिविज्म के दौरान ही ये दोनों साथी एक दूजे के करीब आए और शादी करने का फैसला किया… जी हां, Ila Joshi और Mayank Saxena की बात हो रही है. आज इनकी शादी है. शाम सात बजे इस बारात का हिस्सा बनने हम लोग महाराजा अग्रसेन कालेज, मोती नगर (नीयर एशबाग रेलवे स्टेशन) पहुंच रहे हैं… अगर लखनऊ में हैं तो आप भी आइए और इन दोनों क्रांतिकारी दोस्तों को नई पारी की शुरुआत करने की बधाई दे जाइए…

भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.


Keshav Kumar बधाई

सुनीता भास्कर यह एक्टिविजम आगे भी इसी सहभागिता के साथ बरकरार रहे..तहे दिन बधाई

Abhishek Cartoonist Badhai

DrCoomar Arunodaya मुद्दों पर संघर्ष की पूर्णाहुति…. नव -जीवन की अशेष सुमंगल कामनाएं…..जीते और जीतते रहें…..!!

Poojāditya Nāth उम्मीद है जज़्बा कायम रहेगा विवाह के बाद भी… बधाई…

B L Yadav Congratulations !!

Shuja Uddin Shams मंगलम भगवान् विष्णु मंगलम गरुड़ध्वजः | मंगलम पुन्डरीकाक्षो मंगलायतनो हरि ||

Nandni Gupta conrts… sir n mam

दीक्षित आशीष सागर मंगल कामना

Abdul Noor Shibli bahut bahut mubarak ho donon ko

Pradeep Sharma बहुत बहुत बधाई हो ….))))

Shyam Tyagi दोनों को बहुत बहुत बधाईयां

Mahendra Singh Parihar bahut-bahut badhai
 
Jitendra Dixit बहुत-बहुत शुभकामना।
 
Shambhu Dayal Vajpayee मुबारक हो ।
 
Mamta Yadav shubhkhamnaye aap dono ko
 
Ramesh Sarraf badhaai
 
Abdullah Aqueel Azmi मुबारक हो
 
Sunil Kumar बधाई
 
Kamal Nayan Silori bahut bahut badhai ,
 
Chandrashekhar Hada नवदंपत्ति को बहुत- बहुत बधाई, शुभकामनायें…….

कसीनो वाले से सत्तर हजार वसूलते हुए टीवी रिपोर्टर गिरफ्तार, पढ़ें पुलिस को सौंपा गया माफीनामा

कल मुक्तसर में एक टीवी रिपोर्टर को कसीनो लाटरी वाले से पैसा लेते रंगे हाथों पुलिस ने पकड़ा. इनका नाम है कुलविंदर ग्रोवर. ये बठिंडा के रहने वाला हैं. कल मुक्तसर में  कसीनो लाटरी की चलती दुकानों पर ये कैमरा ले कर पहुंच गए और बोला कि पैसे दो अन्यथा आपकी खबर चला देंगे. इसने एक लाख की मांग की और सौदा 70 हज़ार में हो गया. मौके पर ही 35 हज़ार दे दिया गिया. बाकी के पैसे एक घंटे बाद देने थे.

एक घंटे बाद पैसे देने दुकानदार पहुंच गये लेकिन उक्त आदमी से उनका झगड़ा हो गया. मामला पुलिस तक चला गया. टीवी रिपोर्टर को उसकी कार के साथ मुक्तसर पुलिस थाने ले आई. पहले तो वो अपने आप को कभी NDTV तो कभी IBN7 का रिपोर्टर बताता रहा. बाद में उसने अपनी गल्ती कुबूली और 35 हज़ार पुलिस को सौंप दिए. उसने एक माफ़ीनामा भी लिखकर पुलिस को दिया.
 

एक ही मंडप में हुआ निकाह व सात फेरों की रस्म

बाराबंकी। देवा महादेवा की सरजमी पर भारतीय किसान यूनियन के सहयोग से एक ही स्थल पर निकाह और अग्नि के समक्ष सात फेरे लगाकर विवाह का कार्यक्रम अपने आप में एक सम्प्रदायिक सौहार्द का मिसाल बन गया। आज हुए एक साथ चार निकाह और 122 विवाह के बाद मुस्लिमों के साथ हिन्दू भाइयों में एक प्यार मोहब्बत का नया जोश दशहरा और बकरीद के त्यौहारों से पूर्व देखने को मिला।

मालूम हो भाकियू के द्वारा बीते लगातार दो वर्षों के बाद इस बार तीसरे वर्ष भी किसानो के महात्मा महेन्द्र सिंह टिकैत के सम्मान में तृतीय विवाह संस्कार समारोह आयोजित कर एकता का पैगाम दे श्रद्धांजलि अर्पित की। भाकियू के प्रदेश महासचिव मुकेश सिंह व उनकी टीम में जुड़े लोगों ने इस पूरे आयोजन को सफलता का जामा पहनाने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। यहां पर कुल 150 जोड़ों का पंजीकरण हुआ था। जिसमें से 126 जोड़ों ने यहां नई जिन्दगी को आत्मसात किया। मालूम हुआ है कि 122 हिन्दू वर-कन्याओं का विवाह वैधिक रीति रिवाज के साथ हुआ तो दूसरी तरफ चार निकाह भी हुए जिन्हें शौहर व बीवी ने खुशी-खुशी कुबूल किया।

खराब मौसम के बावजूद भी यहां पर भाकियू समर्थकों में गजब का उत्साह दिखाई दे रहा था। निशांतगंज लखनऊ से आये महबूब अहमद पुत्र मकसूद व अमसेरवा की आसिया पुत्री जहीर का जब निकाह कुबूल हुआ तो सभी ने मुबारकबाद दी। मो0 अय्यूब व फातिमा निवासी मानपुर जिला बलरामपुर, मो0 जाबिर पुत्र अमीन निवासी जैदपुर तथा रूखसाना पुत्री दिलदार निवासी उसमापुर कोठी का भी निकाह हुआ।

इसके अलावा रूचि पुत्री परिदीन निवासी सादुल्लापुर का विवाह अर्जुन पुत्र रतीपाल निवासी दयालपुर तथा संगीता वर्मा पुत्री सोहनलाल निवासी दौलतपुर बाराबंकी एवं नीरज वर्मा पुत्र राधेश्याम तथा बेबी गुप्ता पुत्री देवनरायन निवासी गोण्डा का विवाह संतोष गुप्ता पुत्र मुरारीलाल निवासी सिकन्दरपुर, शीला देवी पुत्री देवराम असन्द्रा का विवाह आशीष रावत लालापुरवा निवासी के साथ धूमधाम से हुआ। इसके अतिरिक्त अन्य सभी जोड़ो का विवाह पूरी परम्पराओं को जीते हुए भाकियू के वैवाहिक समारोह स्थल पर करवाया गया। इस दौरान जहां मुकेश सिंह दौड़-दौड़कर अपने साथियों के साथ विवाह समारोह की छोटी से बड़ी व्यवस्थाओं को संभाल रहे थे। वहीं दूसरी ओर वर व कन्या पक्ष के लोगों के साथ अन्य लोग भी अपने-अपने कामों में जुटे हुए थे। बराते आती गयी और जनाती स्वागत करते गये।

ऐसा कुछ नहीं छूटा जो विवाह में रस्म के रूप में यहां पर न किया गया हो। बिदाई की बेला में किसान भाइयों ने दुल्हनों को बहन व बेटी की तरह बिदा करते हुए उन्हें यथाशक्ति उपहार भी दिये। भाकियू के प्रान्तीय महामंत्री मुकेश सिंह ने बताया कि गत वर्ष समारोह में 107 जोड़ों का विवाह कराया गया था जिसमें आधा दर्जन मुस्लिम जोड़े थे। सबसे खास बात इस कार्यक्रम की यह थी कि यहां पर हिन्दू-मुस्लिम भाई-भाई का नारा बुलंद दिखा। वहीं सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा की खुशबू भी फैली दिखाई पड़ी। समाजवादी पार्टी के नेताओं को इस कार्यक्रम से आयोजकों ने दूर रखा।

बाराबंकी से रिजवान मुस्तफा की रिपोर्ट.

दाऊद को लेकर जो काम भारतीय पत्रकार न कर सके, वो इटली के पत्रकारों ने कर दिखाया

नई दिल्ली। इटली के दो पत्रकारों ने वो काम कर दिखाया जिसे दरअसल भारतीय पत्रकारों को करना चाहिए था. यह काम है दाऊद इब्राहिम से संबंधित कुछ नए खुलासों को लेकर. इन नए खुलासों के बाद से पाकिस्तान एक बार फिर बेनकाब हो गया है. इटली के दो खोजी पत्रकार प्रैंसेसका मरीनो और बेनियामो नटाल ने वर्षों की खोजी पत्रकारिता और सूबतों के आधार पर ने अपनी किताब `एन एनाटॉमी ऑफ द वर्ल्डस मोस्ट डेंजरस नेशन’ में दाऊद को लेकर कई सनसनीखेज खुलासे किये हैं.

किताब में दावा किया गया है कि दाऊद न सिर्फ आईएसआई के सहयोग से भारत विरोधी कार्रवाई को अंजाम देता है, बल्कि पाकिस्तान को परमाणु हथियार मुहैया कराने में दाऊद ने वित्तीय मदद की. उसके संयंत्रों को चलाने में भी मदद कर रहा है. चीन और उत्तर कोरिया से परमाणु तकनीक हासिल करने में दाऊद की भूमिका थी. अभी तक माना जाता था कि पाकिस्तानी वैज्ञानिक अब्दुल कदीर खान ने इस काम को अंजाम दिया है.

मरीनो और नटाले ने दाऊद से जुड़े और भी कई सनसनीखेज खुलासे भी किये हैं. इसके मुताबिक, दाऊद न सिर्फ पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई, बल्कि पाकिस्तान सरकार को भी अपनी काली कमाई का बड़ा हिस्सा मुहैया कराता है. उसकी कमाई का बड़ा हिस्सा ड्रग्स, हथियारों के कारोबार और जबरन वसूली से आता है. दाऊद ने दक्षिण एशिया और अफ्रीका में ड्रग्स और हथियारों के कारोबार का बड़ा नेटवर्क बना लिया है. यही नहीं, मुंबई में दाऊद गिरोह द्वारा पैसे की उगाही का काम लगातार जारी है और वह इन्हीं पैसों का इस्तेमाल भारत के खिलाफ करता है।

बॉलीवुड और बिल्डरों से पैसे की उगाही कर हवाला के जरिये दाऊद को भेजे जाते हैं. भारत में उसका हवाला कारोबार न सिर्फ फल-फूल रहा है, बल्कि लगातार बढ़ रहा है. मुंबई में 26 नवंबर, 2011 को हुए आतंकी हमले की साजिश में दाऊद न सिर्फ शामिल था, बल्कि उसने आतंकवादियों को हथियार और वित्तीय मदद भी मुहैया करायी थी.

इस हमले को अंजाम देने में लश्कर सरगना हाफिज सईद के शामिल होने के बारे में भी किताब में विस्तार से बताया गया है. अंतर्द्वंद्वों से भरा देश बताते हुए कहा गया है कि धर्म के आधार पर गठित पाकिस्तान की शुरुआत एक लोकतांत्रिक देश के तौर पर हुई थी, लेकिन जल्द ही सेना ने सत्ता पर कब्जा जमा लिया और वर्षो तक उसकी नीतियों का निर्धारण किया.

‘बिहार में पत्रकारिता का इतिहास’ किताब में कई अच्छी व नई जानकारियां

पटना : इतिहास के पन्ने में झांके तो बिहार के सासाराम का महत्व शेरशाह सूरी के दौर से शुरू होता है। लेकिन आजादी आजादी लड़ाई और उस दौर की पत्रकारिता में भी इस शहर ने अपनी पहचान को नये सिरे से स्थापित किया। भाषाई पत्रकारिता के इतिहास में यह बात अत्यंत महत्वपूर्ण है कि बिहार में पहला प्रिंटिंग प्रेस पटना में न होकर एक छोटे -से स्थान सासाराम में था। आरा से प्रकाशित होने वाले एक उर्दू अखबार यही से छप कर जाता था। यह बात एक शोध पर आधारित पुस्तक में आई है। पुस्तक का नाम है–बिहार में पत्रकारिता का इतिहास।

वरिष्ठ पत्रकार अमरेन्द्र कुमार एवं प्रो. अलाउद्दीन अजीजी ने उक्त किताब के हवाले से बताया है कि अंगरेजी को छोड़कर भाषाई पत्रकारिता के क्षेत्र में पहली दस्तक उर्दू अखबार ने दी थी, जो आरा से प्रकाशित होता था। अखबार का नाम था-नूर-अल- अलवर और उसे सैयद मोहम्मद हासिल प्रकाशित करते थे। अखबार की शुरुआत 1953 में हुई थी। उसकी छपाई सासाराम में होती थी, क्योंकि सासाराम में 1950 में ही प्रिंटिग प्रेस की स्थापना शाह कबीरुद्दीन अहमद ने की थी।

उन्होंने किताब के आधार पर यह भी बताया कि उस समय किताबें कोलकाता और बंबई के साथ-साथ सासाराम से छप कर दूसरे जगहों पर जाती थी। शैक्षणिक दृष्टिकोण से भी सासाराम का अपना अलग पहचान कायम है। मदरसा खानख्वाह कबीरिया स्कूल यहां पर मौजूद है और इसका इतिहास नालंदा विश्वविद्यालय जितना पुराना है।

कंवल भारती तो पांच दिन में ही कांग्रेस के कमलापति त्रिपाठी बन गए!

: आने के ही साथ जगत में कहलाया 'जानेवाला' : अरे यह क्या? कंवल भारती तो कांग्रेस में अपने पांच दिन की आयु में ही कमलापति त्रिपाठी बन गए। चिट्ठी लिखने लग गए। वह भी फ़ेसबुक पर। आप को याद ही होगा कि जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे तब कमलापति त्रिपाठी को कांग्रेस का कार्यकारी अध्यक्ष तो बना दिया था पर उन्हें पैदल करने के लिए उन्हों ने अर्जुन सिंह को उपाध्यक्ष बना कर सारे अधिकार उन्हें ही थमा दिए था। सो कमलापति त्रिपाठी ने कांग्रेस में बाकी जीवन राजीव गांधी को चिट्ठी लिखते हुए ही बिताया था।

ज़िक्र ज़रूरी है कि कमलापति त्रिपाठी भी लेखक-पत्रकार और चिंतक थे। विद्वता के लिए जाने जाते थे। पत्रकारिता की लंबी पारी खेली थी उन्हों ने और राजनीति की भी। उन्हों ने कई स्मरणीय निबंध लिखे हैं। बरसों आज के संपादक रहे। सक्रिय और प्रतिष्ठित संपादक। लेखन और पत्रकारिता के साथ-साथ सत्ता का शहद भी उन्हों ने खूब चाटा और उपेक्षा का भी। स्वतंत्रता सेनानी थे। नेहरु के साथ राजनीति सीखी थी। इंदिरा गांधी के विश्वस्त थे। मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री की लंबी पारी खेली थी। कंवल भारती भी दलित चिंतक हैं और उन के कई लेख चर्चित हैं। कांशीराम के दो चेहरे किताब उन्हों ने तब लिखी थी और दलित होने के बावजूद लिखी थी जब कांशीराम का सूर्य भारतीय राजनीति में अंगड़ाई ले रहा था। वह आसान नहीं था। धारा से उलटी तैराकी थी यह कंवल भारती की। जो कोई साहसी लेखक ही कर सकता था।

खैर आज उन्हों ने फ़ेसबुक पर राहुल गांधी को एक चिट्ठी लिखी है और कांग्रेस द्वारा दलितों को निरंतर धकियाने का रोना रोया है। ढेर सारे सवाल उठा दिए हैं। मायावती को भी लताड़ा है। अपनी लंबी चिट्ठी में कंवल भारती लिखते हैं, और कि ठीक ही लिखते हैं, 'यदि सामाजिक आन्दोलनों से निकली हुई कोई बहुजन-हित की पार्टी लाखों-हजारों की बात तो दूर, एक दर्जन दलित नेता भी पैदा नहीं कर सके, तो इसका यही कारण हो सकता है कि अब सामाजिक और लोकतान्त्रिक आन्दोलन उसके सरोकारों में नहीं रह गये हैं. यह दलित आन्दोलन के लिए अवश्य ही चिंताजनक स्थिति है. लेकिन मैं आपके समक्ष यहाँ यह प्रश्न रखना चाहता हूँ कि दलित आन्दोलन और दलित-समस्या को लेकर कांग्रेस के भीतर भी कोई गम्भीर चिंता नहीं देखी जाती है. सामाजिक और लोकतान्त्रिक आन्दोलनों से वह भी उतनी ही दूर है, जितना कि बहुजन समाज पार्टी दूर है.

कांग्रेस ने कहाँ लाखों दलित नेता पैदा किये? उसने कहाँ रेडिकल दलित नेतृत्व उभारा? अगर कांग्रेस ने ज़मीन से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ जुड़कर दलित आन्दोलन को आगे बढ़ाने में रूचि ली होती, तो मायावती को ज़मीन कहाँ मिल पाती? तब क्या कांग्रेस उत्तरप्रदेश में सत्ता से उखड़ती? मान्यवर, नेतृत्व दो प्रकार का होता है— एक रेडिकल और दूसरा स्वतन्त्र, जो व्यक्तिवादी और अवसरवादी हो सकता है. इस दूसरे नेतृत्व से बहुत ज्यादा अपेक्षा नहीं की जा सकती. लेकिन कांग्रेस ने इसी दूसरे दलित नेतृत्व से संबंध ज्यादा बनाये. अपने स्वार्थ के लिए कांग्रेस में यह नेतृत्व स्वामिभक्ति के साथ हमेशा ‘यस मैन’ की भूमिका में रहा और दलित सवालों के प्रति अपनी आँखें मूंदे रहा. इसने अत्याचार, दमन और शोषण के मुद्दों पर न कांग्रेस के भीतर आवाज़ उठायी और न बाहर.'

इतना ही नहीं वह तो लिख रहे हैं कि, 'हालाँकि कांग्रेस में मेरी विधिवत ज्वाइनिंग नहीं हुई है, पर यह हो भी सकती है और नहीं भी, यह इस गारन्टी पर निर्भर करता है कि दलित नेतृत्व पर कांग्रेस का वर्तमान रुख अपने इतिहास को दोहरायेगा या उसे ख़ारिज करेगा?'

गरज यह कि मुझे तो बच्चन जी की मधुशाला की एक रुबाई याद आ गई है :

छोटे- से जीवन में कितना प्यार करूँ, पी लूँ हाला,
आने के ही साथ जगत में कहलाया ' जानेवाला'।
स्वागत के ही साथ विदा की होती देखी तैयारी,
बंद लगी होने खुलते ही मेरी जीवन- मधुशाला।

अब कंवल भारती की इस चिट्ठी की गंध, इस की इबारत यह बताती मिलती है कि कंवल भारती विधिवत कांग्रेस में गए नहीं और उनकी घुटन उफान पर आ गई है। विदा लेने की तैयारी हो गई है। तो क्या इसे समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच बढ़ती समझ का भी उपज नहीं मान लिया जाना चाहिए? या कि इस चिट्ठी को कंवल भारती की हड़बड़ाहट के रुप में दर्ज कर मान लिया जाना चाहिए कि वह लेखकीय राजनीति और उखाड़-पछाड़ में चाहे जितने पारंगत हों, दलित चेतना के नाम पर जो भी लिख-पढ़ लें पर यहां राजनीति के चक्रव्यूह में वह अभिमन्यु की गति को प्राप्त हो गए हैं। विश्वनाथ प्रताप सिंह की एक कविता याद आ गई है जो उन्हों ने जनमोर्चा के दिनों में लिखी थी। शीर्षक था लिफ़ाफ़ा। आप भी गौर करें और दर्ज करें कि क्या कंवल भारती भी कहीं लिफ़ाफ़ा तो नहीं बन गए? आज़म और कांग्रेस के बीच के?

पैगाम उन का
पता तुम्हारा
बीच में फाड़ा मैं ही जाऊंगा।

इस लिए भी कि राजनीति में एक शब्द होता है समझौता, जो शायद सब के वश का होता नहीं। भारत भूषण के एक गीत में जो कहें कि, 'भीतर-भीतर घुटना/ बाहर खिल-खिल करना।' यह कला राजनीति का अनिवार्य तत्व है। यह भी कि राजनीति क्रांति नहीं, समाज सेवा नहीं, मिशन नहीं, अब एक व्यवसाय है। कंवल भारती को यही समझना अभी शेष है। अब से भी जो वह समझ लेंगे तो चल जाएंगे, बच जाएंगे। नहीं कमलापति मार्ग पर तो वह आ ही गए हैं। दूसरे एक तल्ख सच भी उन्हें जान लेना चाहिए, वह जानते ही होंगे कि समूची भारतीय राजनीति आज की तारीख में कारपोरेट सेक्टर की रखैल है। सारी की सारी पार्टियां। सिर्फ़ वामपंथी पार्टिया ही एक हद तक इस से बची हुई हैं। पूरी तरह अब वह भी नहीं। तो कंवल भारती को यह भी जान ही लेना चाहिए कि वह जिस भी किसी राजनीतिक पार्टी में रहेंगे कारपोरेट की रखैल या बांदी बन कर ही रहेंगे। क्रांतिवीर बन कर तो कतई नहीं।

बहरहाल यह अंतहीन बहस है। और निर्मम सच। कोई स्वीकार कर लेता है, कोई आंख मूंद लेता है। पर कालीन के नीचे का सच तो यही है। मुकेश अंबानी हवा में तो कहते नहीं कि कांग्रेस और भाजपा दोनों ही हमारी दुकानें हैं। और मुलायम वगैरह तो अंबानियों की ज़ेब में रुमाल की तरह रहते हैं जिन से वह जब-तब नाक आदि पोंछ लेते हैं। कुछ और काम भी ले लेते हैं। फ़ेहरिस्त राजनीति और कारपोरेट की अनंत है।

अभी तो तुरंत और तुरंत राहुल गांधी को संबोधित कंवल भारती की पूरी चिट्ठी पर गौर कीजिए । और गाना गाइए कि, 'तसवीर बनाता हूं, तदवीर नहीं बनती !'

राहुल गांधी के नाम एक खुला पत्र

सम्माननीय राहुल जी,

सादर नमस्कार, जय भीम

निवेदन करना है कि मेरा नाम कँवल भारती है और मैं एक आंबेडकरवादी और समाजवादी विमर्श का लेखक हूँ. मुझे हिंदी दैनिक अख़बार “अमर उजाला” के 10 अक्टूबर के अंक के जरिये पता चला कि आपने अपने एक कार्यक्रम में संभवत: अलीगढ में कहा था कि ‘यदि आप दलित आन्दोलन को आगे ले जाना चाहते हैं, तो इसके लिए एक या दो दलित नेता काफी नहीं हैं, (बल्कि) लाखों दलित नेताओं की जरूरत पड़ेगी. मायावती ने दलित आन्दोलन पर कब्जा कर लिया है और उन्होंने अपने अलावा किसी अन्य दलित नेता को उभरने नहीं दिया है.’

निश्चित रूप से आपका बयान स्वागतयोग्य है. इस तथ्य की उपेक्षा नहीं की जा सकती कि मायावती ने देश में क्या, उत्तर प्रदेश में भी किसी दलित नेता को उभरने नहीं दिया, जो अपनी क्षमता और योग्यता से उभरे भी, तो उन्होंने उनको भी पार्टी से निकाल कर खत्म कर दिया. यह एक ऐसी पार्टी की वास्तविकता है, जिसका जन्म कांशीराम के सामाजिक आन्दोलनों से हुआ है. यदि सामाजिक आन्दोलनों से निकली हुई कोई बहुजन-हित की पार्टी लाखों-हजारों की बात तो दूर, एक दर्जन दलित नेता भी पैदा नहीं कर सके, तो इसका यही कारण हो सकता है कि अब सामाजिक और लोकतान्त्रिक आन्दोलन उसके सरोकारों में नहीं रह गये हैं. यह दलित आन्दोलन के लिए अवश्य ही चिंताजनक स्थिति है.
लेकिन मैं आपके समक्ष यहाँ यह प्रश्न रखना चाहता हूँ कि दलित आन्दोलन और दलित-समस्या को लेकर कांग्रेस के भीतर भी कोई गम्भीर चिंता नहीं देखी जाती है. सामाजिक और लोकतान्त्रिक आन्दोलनों से वह भी उतनी ही दूर है, जितना कि बहुजन समाज पार्टी दूर है. कांग्रेस ने कहाँ लाखों दलित नेता पैदा किये? उसने कहाँ रेडिकल दलित नेतृत्व उभारा? अगर कांग्रेस ने ज़मीन से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ जुड़कर दलित आन्दोलन को आगे बढ़ाने में रूचि ली होती, तो मायावती को ज़मीन कहाँ मिल पाती? तब क्या कांग्रेस उत्तरप्रदेश में सत्ता से उखड़ती?

मान्यवर, नेतृत्व दो प्रकार का होता है— एक रेडिकल और दूसरा स्वतन्त्र, जो व्यक्तिवादी और अवसरवादी हो सकता है. इस दूसरे नेतृत्व से बहुत ज्यादा अपेक्षा नहीं की जा सकती. लेकिन कांग्रेस ने इसी दूसरे दलित नेतृत्व से संबंध ज्यादा बनाये. अपने स्वार्थ के लिए कांग्रेस में यह नेतृत्व स्वामिभक्ति के साथ हमेशा ‘यस मैन’ की भूमिका में रहा और दलित सवालों के प्रति अपनी आँखें मूंदे रहा.इसने अत्याचार, दमन और शोषण के मुद्दों पर न कांग्रेस के भीतर आवाज़ उठायी और न बाहर.

किन्तु, रेडिकल नेतृत्व समाज में परिवर्तन के लिए काम करता है. उसकी ज़मीन सामाजिक आन्दोलनों की ज़मीन होती है. वह अत्याचार, दमन और शोषण के खिलाफ आवाज उठाता है और जनपक्षधरता की राजनीति करता है. मान्यवर, मुझे कहने दीजिये कि ऐसे रेडिकल दलित नेतृत्व को कांग्रेस ने कभी महत्व नहीं दिया. पूंजीवादी राजनैतिक सत्ताएं ऐसी रेडिकल शक्तियों से भयभीत रहती हैं, और कांग्रेस भी. आंबेडकरवादी आन्दोलनों के ऐसे बहुत से रेडिकल दलित नेताओं को कांग्रेस ने अपने भीतर शामिल किया. लेकिन अफ़सोस ! उसने उनका विकास नहीं किया, न उनके नेतृत्व का लाभ उसने उठाया, वरन उस नेतृत्व को खत्म करने की रणनीति को अंजाम दिया. बीपी मौर्य जैसे कितने ही दलित नेता कांग्रेस की इस रणनीति का शिकार होकर खत्म हो गये, रिपब्लिकन पार्टी (RPI) का सारा रेडिकल नेतृत्व कांग्रेस ने ही खत्म किया, जिसके ताज़ा शिकार रामदास अठावले हुए, जिन्हें अंततः अपने वजूद को बचने के लिए शिव सेना की शरण में जाना पड़ा. क्यों? क्या इस प्रश्न पर आप विचार करना चाहेंगे?

मान्यवर, यह प्रश्न मैं आपके समक्ष इसलिए रख रहा हूँ कि कांग्रेस में आप एक स्वतन्त्र विमर्शकार के रूप में जाने जाते हैं. अनेक मुद्दों पर आपने अपनी पार्टी के विरुद्ध जाकर अपनी राय व्यक्त की है. और अभी हाल में दागी मंत्रियों को बचाने के लिए कांग्रेस द्वारा लाया गया अध्यादेश आपके ही जोरदार हस्तक्षेप से कानून नहीं बन सका. मान्यवर, दलितों में लाखों दलित नेता मौजूद हैं, जो समाज में परिवर्तन के लिए काम कर रहे हैं. वे भारत की राजनीति में एक सार्थक हस्तक्षेप करना चाहते हैं. पर कांग्रेस में दलित नेतृत्व के दमन के पुराने इतिहास को देखते हुए वे कांग्रेस को अपने शत्रु के रूप में देखते हैं. क्या आप इस स्थिति को बदलने की कोशिश करेंगे? क्या कांग्रेस से जुड़ने वाले रेडिकल दलित नेतृत्व को आप यह भरोसा दिला सकते हैं कि वह अपनी सामाजिक और लोकतान्त्रिक ज़मीन के साथ आपकी पार्टी में अन्त तक चल सकेगा?
मान्यवर, मैं यह कहने का साहस इसलिए कर रहा हूँ कि जिस दिन आप रामपुर आये थे, उससे एक दिन पहले अर्थात 8 अक्टूबर को केन्द्रीय मानव संसाधन राज्यमंत्री माननीय जितेन्द्र प्रसाद जी ने रामपुर में मुझे कांग्रेस से जोड़ा था, या कहिये मुझे कांग्रेस में शामिल किया था. हालाँकि कांग्रेस में मेरी विधिवत ज्वाइनिंग नहीं हुई है, पर यह हो भी सकती है और नहीं भी, यह इस गारन्टी पर निर्भर करता है कि दलित नेतृत्व पर कांग्रेस का वर्तमान रुख अपने इतिहास को दोहरायेगा या उसे ख़ारिज करेगा?

आपके प्रति ससम्मान.
आपका
कँवल भारती
12-10-2013


लेखक दयानंद पांडेय वरिष्ठ पत्रकार और उपन्यासकार हैं. उनसे संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है. यह लेख उनके ब्‍लॉग सरोकारनामा से साभार लिया गया है.


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भड़ास पर दनपा

हिंदुस्तान विज्ञापन घोटाला : शोभना भरतिया के एसएलपी पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई ग्यारह नवंबर को

बिना आरएनआई के बिहार में कई एडिशन प्रकाशित करने और इस अवैध एडिशनों में झूठे दस्तावेजों के आधार पर सरकारी विज्ञापन लेकर छापने व इसके जरिए करोड़ों-अरबों रुपये का गड़बड़-घोटाला करने के आरोपियों में से एक हिंदुस्तान अखबार की मालिकन शोभना भरतिया के स्पेशल लीव पेटिशन पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई ग्यारह नवंबर को होगी. इस विज्ञापन घोटाले का खुलासा बिहार के पत्रकार श्रीकृष्ण प्रसाद समेत दो-चार लोगों ने किया और हिंदुस्तान प्रबंधन के खिलाफ लगातार लड़ाई लड़ रहे हैं. इस प्रकरण के बारे में श्रीकृष्ण प्रसाद की ये रिपोर्ट पढ़ें…

Dainik Hindustan Advertisement Scandal: Supreme Court to hear Shobhana Bhartia's S L P No. 1603 of 2013 on Nov 11, 2013 next

By ShriKrishna Prasad, Advocate

New Delhi , Oct 13.The website of the Supreme Court of India(New Delhi) has notified that the Supreme Court of India will hear the Special Leave Petition(Criminal) No. 1603 of 2013 of the petitioner,Shobhana Bharatia,the Chairperson of the M/S Hindustan Media Ventures Limited,New Delhi on November 11, 2013 next.

The website of the Supreme Court of India has said," Criminal Matters– Matters for/against quashing of criminal proceedings in the S.L.P(Criminal) No. 1603 of 2013 will be heard on November 11,2013 next."

The Registrar orders to list the matter before the court

:The Hon'ble Justice Mr.Sunil Thomas, the Registrar-II, the Supreme Court of India, on Sept,19,2013, in the Special Leave Petition (Criminal) No. 1603/2013(Shobhana Bhartia Versus State of Bihar and Another), passed an order to list the matter before the Hon'ble Court as per rules.

The Court of the Hon'ble Registrar-II, the Supreme Court of India, on Sept, 19,2013, ordered , "In view of the urgency expressed by the parties and service being complete, list the matter before the Hon'ble Court as per rules after the expiry of three weeks."

The Hon'ble Court also mentioned in the order," The Respondent No.-02,Mantoo sharma, Party-in-Person, has filed the Counter-Affidavit.The Respondent No.01, Mr.Samir Ali Khan, Advocate, seeks three weeks' time for filing the Counter-Affidavit."

It is worth mentioning that the Respondent No.01,Mr.Samir Ali Khana, Advocate is the Hon'ble counsel for the State of Bihar.

Mantoo Sharma files his counter-affidavit in Supreme Court

:Mr.Mantoo Sharma, Respondent No.-02 in the Special Leave Petition (Criminal) No. 1603 of 2013, filed by the Shobhana Bhartia, the chairperson of M/S Hindustan Media Ventures Limited(New Delhi), has filed his counter-affidavit in 315 pages in the Supreme Court on Sept, 16 recently. Mr.Mantoo Sharma is the informant in the Munger Kotwali P.S Case No. 445/2011 in Bihar.

Before filing his counter-affidavit, Mr.Sharma sent one set of the counter-affidavit to M/S Karanjawala & Co., Advocates for the petitioner, Shobhana Bhartia, the Chairperson of M/S Hindustan Media Ventures Limited, The Hindustan Times House, 18-20, Kasturba Gandhi Marg, New Delhi -110001 by the registered parcel and two sets of his counter – affidavit to the government lawyer of the Bihar government in the Supreme Court by hand.Four sets of the counter- affidavit were filed in the court of the Reistrar -II, Mr.Sunil Thomas.

The petitioner prays for the stay of investigation in the Munger Kotwali P.S Case No.445/2011(Bihar):

The petitioner, Shobhana Bhartia has filed the Special Leave Petition( Criminal) No. -1603 of 2013 in the Supreme Court and prayed for an interim ex-party stay of investigation in the Munger Kotwali P.S Case No. 445/2011, dated Nov.,18,2011 under sections 8(b)/14/15 of the Press & Registration of Books Act, 1867 read with Sections 420/471/476 of the Indian Penal Code

Named accused persons in the Munger Kotwali P.S Case No.445/2011(Bihar): In the Munger Kotwali P.S Case No.445/2011 in Bihar, the Chairperson of M/S Hindustan Media Ventures Limited (New Delhi)Shobhana Bhartia, the Chief Editor,Dainik Hindustan, Shashi Shekhar(New Delhi), the Regional Editor,Dainik Hindustan,Patna edition, Akku Srivastawa, the Regional Editor, Dainik Hindustan,Bhagalpur edition,Binod Bandhu and the Publisher, ,M/S Hindustan Media Ventures Limited( Nw Delhi), Amit Chopra, have been accused of receiving the government money to the tune of about rupees two hundred crores illegally and fraudulently by obtaining and printing the advertisements of the Union and Bihar governments in the name of illegally printed and published Munger and Bhagalpur editions of Dainik Hindustan for a decade continuously in Bihar. The Munger police ,meanwhile, have submitted the Supervision Report No.01 and the Supervision Report No.-02 and have found all allegations "prima-facie true" against all the named accused persons including the principal accused Shobhana Bhartia (New Delhi) under sections 8(b)/14/15 of the Press & Registration of Books Act, 1867 and sections 420/471/476 of the Indian Penal Code.

The historical order of the Patna High Court : The Hon'ble Justice of the Patna High Court, Justice Anjana Prakash, in her order, dated Dec 17,2012, in the Criminal Miscellaneous No. 2951 of 2012, refused to interfere in the police investigation and directed the Munger police to complete the investigation in the Kotwali P.S Case No. 445/ 2011 within the three months from the date of the order.

By ShriKrishna Prasad,advocate

Mobile No.-09470400813

भास्कर का स्टेट हेड इतना डरा कि घर छोड़ने कई पत्रकारों को जाना पड़ा

पानीपत में ब्यूरो चीफ से सीनियर रिपोर्टर बने अजय राजपूत ने स्टेड हैड शिवकुमार विवेक पर पक्षपात करने का आरोप लगाया। वाकया बुधवार का है। हुआ यूं कि सीनियर रिपोर्टर अजय राजपूत का फोटोग्राफर हैप्पी बुद्धी राजा से फोटो को लेकर कहासुनी हुई। बीच में ब्यूरोचीफ निशांत ने हस्तक्षेप किया। उन्होंने फोटोग्राफर का फेवर लेते हुए राजपूत को उल्टा-सीधा कहना शुरू कर दिया। न्यूज रूम में हंगामा मचने पर स्टेड हैड शिवकुमार विवेक ने अजय राजपूत को अपने केबिन में बुलाकर हड़काना शुरू कर दिया।

राजपूत ने स्टेड हैड से दोनों पक्षों से बात करने की गुहार की, लेकिन स्टेड हैड विवेक का एकालाप जारी रहा। इस पर अजय राजपूत ने स्टेड हैड को कायदे से बात करने की नसीहत देते हुए अपने शब्दों को संयमित तरीके से निकालने की सलाह दी। बताते हैं कि राजपूत ने स्टेड हैड पर पक्षपात पूर्ण रवैया अपनाने समेत कई गंभीर आरोप लगाते हुए कोर्ट में देख लेने की धमकी दी।

अजय राजपूत की धमकी से स्टेड हैड इतना डर गया कि आनन-फानन में सिटी टीम की मीटिंग बुलाकर मामले को शांत करने की रणनीति बनाई। डरे सहमे सम्पादक को रात को घर छोडऩे चार-पांच पत्रकार गए। दूसरे दिन अजय राजपूत को बुलाकर सोनीपत ब्यूरो में स्थानान्तरण के आदेश थमा दिए। बताते हैं शिवकुमार विवेक ने स्टेड हैड बनने के बाद ब्यूरोचीफ के पद से अजय राजपूत को हटा कर पानीपत में ही सीनियर रिपोर्टर बना दिया था। इस अपमान से भी अजय राजपूत दुखी चल रहे थे। (कानाफूसी)

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पत्रकार विक्रम राव की पुस्तक ‘न रुकी, न झुकी यह कलम’ का मुलायम और अखिलेश ने किया विमोचन

'श्रमजीवी पत्रकारों को अधिक संख्या में पुस्तकें लिखनी चाहिए ताकि जनसाधारण का ज्ञान और बढ़े।' लोहिया पार्क में एक सार्वजनिक सभा में पूर्व रक्षा मंत्री मुलायम सिंह यादव तथा उ.प्र. के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने पत्रकार के. विक्रम राव की पुस्तक 'न रुकी, न झुकी यह कलम' का लोकार्पण करते समय यह सुझाव दिया। अनामिका (दिल्ली) द्वारा 45 लेखों का यह संग्रह विभिन्न राष्ट्रीय दैनिक में छपी रचनाओं का संकलन हैं। इसमें विविध विषयों पर विचारोत्तेजक लेख हैं।

इस अवसर पर श्री विक्रम राव ने कहा इतिहास ऐसी साजिशों की कथाओं से भरा है, जब जिह्ना को सुन्न किया गया। कलम को कुंद बनाया गया। अभिव्यक्ति को अवरुद्ध कर दिया गया। मगर विचार निर्बाध रहे क्योंकि उसे कैद करने की जंजीर इजाद नहीं हुई है। श्रमजीवी पत्रकार की लेखनी कबीर की लुकाटी की भांति है। घर फूंक कर वह जनपक्ष में जूझती है।

मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा स्वाधीन भारत में अभिव्यक्ति के खिलाफ क्रूरतम दमनचक्र 1975-77 में चला था, तब विक्रम राव दूसरी जंगेआजादी की प्रथम पंक्ति में थे। अखबारी सेंशरशिप से लड़ते हुए वे भारत की छह जेलों और थानों में पुलिसिया अत्याचार सहते रहे। वे बाकियों से जुदा थे और हैं। इस पुस्‍तक के प्रकाशन पर वर्किंग जर्नलिस्‍ट एसोशियेशन ऑफ बिहार की ओर से के. विक्रम राव को बधाई दी गयी है।

प्रेस विज्ञप्ति

भोपाल : गोपाल बाजपेयी ने भास्कर छोड़ा, अजय द्विवेदी ने ‘दबंग दुनिया’ ज्वाइन किया

दैनिक भास्कर, भोपाल से खबर है कि डिप्टी न्यूज एडिटर गोपाल स्वरूप बाजपेयी ने रिजाइन कर दिया है. उन्होंने इस बारे में प्रबंधन को एक महीने का नोटिस थमा दिया है. गोपाल बाजपेयी दैनिक भास्कर के सिटी डेस्क इंचार्ज के रूप में करीब पौने तीन साल से तैनात थे. वे रिपोर्टिंग व डेस्क दोनों कंट्रोल करते थे.

पत्रकारिता में 18 साल का अनुभव रखने वाले बाजपेयी इससे पहले दस साल से ज्यादा समय तक अमर उजाला दिल्ली से जुड़े रहे. वहां वह दिल्ली एनसीआर डेस्क इंचार्ज थे. इससे पहले वह नवभारत, बांबे और पुणे में तैनात थे. नई दुनिया, भोपाल में भी वे अपनी सेवाएं दे चुके हैं. गोपाल कहां जा रहे हैं, यह पता नहीं चल पाया है.

भोपाल से ही एक अन्य खबर के मुताबिक वरिष्ठ पत्रकार अजय द्विवेदी ने भोपाल में दबंग दुनिया के साथ अपनी नई पारी शुरू की है. इसके पहले अजय द्विवेदी भोपाल में राज एक्सप्रेस, जन जन जागरण और कई अखबारों में काम कर चुके हैं. दबंग में इन्हें क्या जिम्मदारी सौंपी गई है ये पता नहीं चल पाया है.

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फीका रहा ‘जिया न्यूज’ का शुरुआती प्रदर्शन, चुनावों तक चैनल चलने की उम्मीद

'जिया न्यूज' नामक जो चैनल पिछले दिनों लांच किया गया, उसका शुरुआती प्रदर्शन काफी फीका बताया जाता है. चैनल कई जगहों पर दिखाई नहीं दे रहा. चैनल का कंटेंट, लेआउट और प्रजेंटेशन बेहद सामान्य सा है. न्यूज चैनलों के बीच जबरदस्त आपसी होड़ के बीच 'जिया न्यूज' का टोटल फील ऐसा नहीं है कि कहा जा सके- यह चैनल कुछ अलग और आक्रामक करता दिख रहा है. चैनल के अंदरखाने कई पावर सेंटर भी हैं जिसकी वजह से इंटरनल पालिटिक्स भी शुरू हो गई है.

सूत्रों का कहना है कि चैनल की जिम्मेदारी जिस ज्वाय सेबस्टियन को दी गई है, उनका ट्रैक रिकार्ड कोई ऐसा नहीं रहा है कि उनसे एक नए चैनल को सफलती की गारंटी के बारे में सोचा जा सकता हो. हां, ये जरूर है कि जब कोई एक नया चैनल लांच होता है तो उसकी स्थापना की प्रक्रिया में करोड़ों रुपये खर्च होते हैं और इस प्रक्रिया में करोड़ों रुपये की कमाई की गारंटी चैनल लांचिंग की प्रक्रिया से जुड़े लोगों को होती है. यह इंडस्ट्री का स्थापित सच है और इस मिथ को रेयरेस्ट आफ रेयर की कोई कंपनी मालिक तोड़ पाया है. कहा ये जाता है कि जो टीम चैनल लांच कराती है, वो काफी मुनाफे में रहती है, भले ही चैनल पिट जाए. बाद में पुरानी टीम हटाकर जो नई टीम बनाई जाती है, वह चैनल चलाने को लेकर ज्यादा सीरियस रहती है क्योंकि वह कमाई में नहीं, कंटेंट और प्रदर्शन पर जोर देती है. फिलहाल तो 'जिया न्यूज' का हाल 'न्यूज नेशन' चैनल वाला होता दिख रहा है, न कोई पूछने वाला, न कोई देखने वाला, न कोई जानने वाला. ऐसे में कयास लगाया जा रहा है कि कहीं ये चैनल लोकसभा चुनावों तक के लिए तो नहीं है? अगर लोकसभा बाद भी चैनल चला तो ये तय माना जा रहा है कि चैनल हेड लेवल पर बदलाव किए बिना चैनल का जोर पकड़ पाना असंभव है.  चैनल चलाने के लिए एक डायनमिक टीम लीडर की जरूरत होती है जो कंटेंट के मामले में चैनल को न सिर्फ सुर्खियों में रखे बल्कि बाकी न्यूज चैनलों को पछाड़ सके.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.


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‘न्यूज100’ नाम से लांच होगा न्यूज चैनल, मनोज कुमार श्रीवास्तव वाइस प्रेसीडेंट

विधानसभा चुनावों और लोकसभा चुनाव को देखते हुए अखबार, मैग्जीन, चैनल लांच करने की होड़ मची हुई है. भड़ास के पास आई एक सूचना के मुताबिक नोएडा से चौबीसों घंटे का एक न्यूज चैनल शुरू होने जा रहा है. नाम है 'न्यूज100'. जो मीडिया कंपनी इस चैनल को लांच कर रही है वो एक आडियो-विजुवल समाचार एजेंसी एआईएनएस भी संचालित करती है.

चैनल के वाइस प्रेसीडेंट मनोज कुमार श्रीवास्तव हैं जो वरिष्ठ पत्रकार हैं. मनोज इंडियन एक्सप्रेस, इंडिया टीवी, आजतक, बीआईटीवी समेत कई न्यूज चैनलों और अखबारों में कार्य कर चुके हैं. चैनल को पहले उन्हीं प्रदेशों में लांच किया जा रहा है जहां विधानसभा चुनाव होने वाले हैं यानि दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और मिजोरम. बाद में लोकसभा चुनावों को देखते हुए इसका विस्तार कई राज्यों में किया जाएगा.

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करनाल से ‘भारतीय राजनेता’ मैग्जीन शुरू कर रहे हैं मयंक जोगी

'भारतीय राजनेता' नाम से जल्द ही एक पत्रिका शुरू हो रही है जो पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, झारखण्ड, उत्तराखंड, महाराष्ट्र, गोवा, जम्मू व कश्मीर, दिल्ली, चंडीगड़, गुजरात व पश्चिम बंगाल राज्यों में प्रसारित होगी. यह पत्रिका हरियाणा के करनाल से प्रकाशित की जाएगी. इस पत्रिका के मुख्य संपादक मयंक जोगी हैं.  अभी करनाल में इसका मुख्यालय बनाने का काम चल रहा है जो इस माह के अंत तक पूरा हो जायेगा.

भारतीय राजनेता पत्रिका की मालिक मंजीत कौर हैं और अगले माह यह पत्रिका आप सब के हाथों में होगी. पत्रिका हिन्दुस्तान के नेताओं की पोल खोलेगी. भारत के सभी सांसदों के बारे में बताया जाएगा. इनकी पिछली कहानी से लेकर वर्तमान कहानी तक को पेश किया जाएगा. इनका चुनावों में क्या हाल होगा, इसे भी बताया जाएगा.

प्रेस विज्ञप्ति

श्रम आयुक्त ने एचआर मैनेजर से पूछा- तुमको एचआर से न्यूज लिखने वाले डिपार्टमेंट में लगाया जाय तो क्या तुम कर पाओगे?

यशवंत जी नमस्कार, आपने जो न्यूज लगायी है वो बहुत ही अच्छी है. इसकी तारीफ मीडिया से जुड़े सभी कर्मचारी कर रहे हैं. मजीठिया वेज बोर्ड की अगली सुनवाई 24.10.2013 को सुप्रीम कोर्ट में होने वाली है इसलिए हिन्दुस्तान मीडिया मैनेजमेंट शैतानों की तरह व्यवहार कर रहा है. हम सभी चारों कम्प्लेन करने वाले कर्मचारी अंजनी कुमार, पारस नाथ शाह, नवीन कुमार, संजय दूबे और मैनेजमेंट की तरफ से एचआर मैनेजर संजीव सिन्हा को अतिरिक्त श्रम आयुक्त श्री प्रदीप श्रीवास्तव ने बुलाकर मैनेजमेंट को ये निर्देश दिया कि इन लोगों को सितम्बर माह की सेलरी तत्काल दी जाय. इसके बाद भी मैनेजमेंट ने अभी तक सेलरी नहीं दी है.

प्रबंधन ने हम लोगों का जो ट्रांसफर किया है, श्रम आयुक्त ने उसको भी अवैध बताया है और डिपार्टमेंट परिवर्तन को भी अवैध बताया है, क्योंकि टेक्निकल से हटाकर बिजनेस कैडर में ट्रांसफर करना गलत है. जो काम हम कर रहे हैं उसको चेंज करने के लिए 21 दिन पहले नोटिस देना चाहिए और उसका श्रम आयुक्त से अनुमोदन कराना आवश्यक है, ऐसा ना करके आनन फानन में डिपार्टमेंट चेंज कर दिया गया जो कि अवैध था.

श्रम आयुक्त ने एचआर मैनेजर से पूछा कि तुमको एचआर से हटाकर न्यूज लिखने वाले डिपार्टमेंट में लगा दिया जाय तो क्या तुम कर पाओगे. उसने तुरन्त मना कर दिया, तो फिर इतने लोअर केटेगरी वाले इम्प्लायी सर्क्युलेशन में बाहर के जिले झांसी, महोबा, उन्नाव, फतेहपुर में जाकर सेंटर सुपरवाइजर का काम कैसे कर सकता है, ये तो इन लोगों पर जुल्म है. पेपर का सेल रोज 15 कापी बढ़ाओगे तो रजिस्टर में अटेंडेंस मार्क होगा, इस पर भी श्रम आयुक्त ने कहा कि ये अवैध है. ये इन्सेंटिव से रिलेटेड हो सकता है पर इस कारण सेलरी रोकना बिल्कुल गलत है.

एचआर मैनेजर को स्टैंडिंग आर्डर लेकर 15.10.2013 को नेक्स्ट मीटिंग में बुलाया गया है जिसमें कम्पनी के अथराइज्ड अधिकारी को बुलाया गया है. अभी कुछ दिन पहले यूनिट हेड्स की मीटिंग हुई थी जिसमें सारे वेज बोर्ड इम्पलायी को निकालने के लिए कहा गया है. आल इंडिया के लगभग 25 यूनिट हेड में से केवल दो यूनिट कानपुर और देहरादून ने यह ठेका लिया कि आप हमारे यहाँ ट्रांसफर कर दीजिए हम मेंटली ह्रासमेंट करके निकाल देंगे. इन दोनों जीएम को दूसरे को बलि देकर अपनी सेलरी बढ़ाने और प्रमोशन करवाने का भूत सवार है.

यशवंत जी आप ही एकमात्र सहारा हो और कोई हम लोगों की हेल्प करने वाला नहीं है. आप इसी तरह कृपादृष्टि रखियेगा और डेली कुछ-कुछ न्यूज हम लोगों से सम्बन्धित लगाते रहियेगा. हम लोगों के दुःख दर्द को सुनने वाला कोई नहीं है.

धन्यवाद

आपका

पारस नाथ शाह
नवीन कुमार
अंजनी प्रसाद
संजय दूबे


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पत्रकार की पुलिसिया पिटाई को लेकर प्रेस काउंसिल ने सात अफसरों को तलब किया

यूपी के सुल्तानपुर जिले के पुलिस अधीक्षक कार्यालय परिसर में 25 फरवरी को कवरेज के दौरान एक हिंदी दैनिक अख़बार के फोटोग्राफर की पुलिस पिटाई के मामले में भारतीय प्रेस परिषद् ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव समेत सात अधिकारियों को 29 अक्टूबर को नई दिल्ली तलब किया है.

भारतीय प्रेस परिषद की उप सचिव पूनम सिब्बल की तरफ से जारी किये गए नोटिस में पीड़ित दैनिक हिन्दुस्तान समाचार पत्र के फोटोग्राफर राजबहादुर यादव के शिकायती पत्र का हवाला दिया गया हैय तलबी नोटिस में यूपी के मुख्य सचिव, गृह सचिव पुलिस, फैजाबाद रेंज के तत्कालीन पुलिस महानिरीक्षक पीयूष मोर्डिया, जिलाधिकारी के. धनलक्ष्मी, पुलिस अधीक्षक किरण एस., नगर क्षेत्राधिकारी वेद प्रकाश सिंह और नगर कोतवाल जीतेन्द्र गिरी को 29 अक्टूबर को साक्ष्यों के साथ इस आशय के लिए बुलाया गया है कि वे प्रकरण से संबंधित मौखिक अथवा दस्तावेजी साक्ष्य सहित अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं. इसके पूर्व मार्च माह में जारी की गयी नोटिस में प्रकरण में दोषियों के विरुद्ध की गयी कार्यवाही के सम्बन्ध में जिला प्रशासन के द्वारा दी गयी रिपोर्ट से असंतुष्ट भारतीय प्रेस परिषद् ने तलबी की कार्यवाही की है.

वरिष्ठ टीवी पत्रकार विनोद कापड़ी ‘मिस टनकपुर हाजिर हो’ फीचर फिल्म बना रहे

वरिष्ठ टीवी पत्रकार विनोद कापड़ी जल्द ही एक फीचर फिल्म लेकर सामने आने वाले हैं,  फिल्म का टाइटल होगा 'मिस टनकपुर हाजिर हो'. ये एक ट्रेजडी से भरी कॉमेडी फिल्म है. विनोद के मुताबिक फिल्म एक सच्ची घटना पर आधारित है, जो कि सिस्टम के एक बड़े सच से पर्दा उठाएगी. फिल्म को राजधानी दिल्ली के नजदीक उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले में 40 दिनों के अंदर शूट किया जाएगा.

करीब 15 महीने पहले विनोद कापड़ी ने अखबार में एक खबर पढ़ी… खबर चौंकाने वाली थी. कापड़ी के मुताबिक इस सच्ची घटना ने उन्हें फिल्म बनाने की प्रेरणा दी. कापड़ी के मुताबिक "इस खबर पर विदेशी कवरेज देखकर उनका ये विश्वास मजबूत हुआ कि विदेशी मीडिया भारत की दिक्कतों ओर खासियतों को अजूबा बनाने का मौका नहीं छोड़ता है. पर इस खुलासे में सचमुच कुछ ऐसा विचित्र था जिसकी अनदेखी मैं भी नहीं कर सका."

'इस खबर में हमारे पुलिस स्टेशन, अस्पताल, अदालतों और दूसरी जगह का जो सच दिखाया गया था उस पर आंखें मूंद लेना संभव नहीं था. दिलचस्प ये था कि ये अंधेर सरकार की आंखों के नीचे मची थी." कापड़ी फिल्म रिलीज़ होने से पहले ये सस्पेंस नहीं खोलना चाहते कि उनकी फिल्म में मिस टनकपुर कौन है. ऐसा करने के पीछे शायद इच्छा ये है कि दर्शक आखिर तक ये कयास लगाते रहे कि मिस टनकपुर कौन है, क्या ये एक लड़की है.. किसी दूसरे देश से आई राजकुमारी है, या वो फिर वो इंसान ही नहीं है बल्कि कुछ और है. पर कापड़ी का दावा है कि उनकी फिल्म व्यवस्था में घुन की तरह चिपक गए भ्रष्टाचार की पोल खोल देगी.

विनोद कपाड़ी अब तक 100 से ज्यादा डॉक्यूमेंट्री बना चुके हैं, जिसमें 13 दिसंबर संसद पर हमला और 26 नवंबर मुंबई अटैक खास हैं. कापड़ी के मुताबिक 'मिस टनकपुर हाज़िर हों' जैसी फिल्म बनाने का ये सबसे अच्छा समय है, क्योंकि भारतीय दर्शक अब एक अलग तरह का सिनेमा देखना पसंद करने लगे हैं. पिछले पांच-छह सालों में सिनेमा पूरी तरह बदल चुका है और व्यव्यसायिक तौर पर भी ये काफी सफल हो रही हैं. दर्शक लीक से हटकर बनी फिल्मों का स्वागत कर रहे हैं.

कापड़ी ने इस फिल्म में फिल्म जगत के मझे हुए कलाकारों को लिया है. कापड़ी के मुताबिक ओमपुरी, अनु कपूर, रवि किशन और संजय मिश्रा के अलावा कोई इस रोल पर खरा नहीं उतर सकता था. ऋषिता भट्ट और राहुल बग्गा भी इस फिल्म में हैं. कापड़ी के मुताबिक कहानी लिखते समय ही उनके दिमाग में पूरी स्टारकास्ट मौज़ूद थी.

प्रेस रिलीज

जब शूर्पणखा नाक कटाने से पहले भाग गई

साल 2000 का दशहरा मनाने के बाद हमारी मंडली को रामलीला करने का खयाल आया। उन दिनों गांवों में टीवी की ज्यादा पहुंच नहीं थी, इसलिए रामलीला, स्वांग और इसी तरह के आयोजन मनोरंजन का बड़ा माध्यम थे। आखिरकार हमारी मित्र मंडली ने फैसला किया कि इस बार हम रामलीला का मंचन करेंगे। इस बात का पूरा ध्यान रखा गया कि इस बारे में ज्यादा प्रचार नहीं किया जाएगा, क्योंकि हमारे पात्रों की यह पहली ही रामलीला थी।

अगर मंचन में कोई गड़बड़ हुई तो बड़े लोग खिल्ली उड़ाएंगे और इस असफलता को हमेशा याद रखा जाएगा। इसलिए बड़ों को रामलीला देखने का निमंत्रण नहीं दिया गया और हम चुपके-चुपके तैयारी करने लगे। समय कम था और काम ज्यादा। तय हुआ कि रामलीला के पहले ही दिन लक्ष्मण द्वारा शूर्पणखा का नाक काटा जाएगा। उस महान दिन के लिए हमने धनुष-बाण, धोती, चाकू और दूसरी जरूरतों का इंतजाम किया। रामलीला के संवाद लिखे गए। मन ही मन हमें गर्व की अनुभूति हो रही थी कि इस गांव के इतिहास में जो कभी नहीं हुआ वह आज होकर रहेगा। हम साबित कर दिखा देंगे कि बच्चे भी किसी से कम नहीं।

तैयारियां लगभग पूरी हो चुकी थीं। बस शाम होने का इंतजार था। तभी मेरे एक दोस्त ने कहा, रामलीला के मंचन के लिए यह जरूरी है कि मेरे बड़े भाई साहब यहां न आएं। अगर उन्होंने मुझे शूर्पणखा बनते देख लिया तो घर जाकर बहुत पिटाई होगी। मामला गंभीर था, लेकिन इसका तुरंत कोई बड़ा समाधान हमारे पास भी नहीं था। हम सिर्फ  दुआ कर सकते थे कि भाई साहब कुछ देर के लिए यहां से दूर रहें। अन्यथा रंग में भंग पड़ना तय है। रात को रामलीला के मंचन की तैयारी शुरू हुई। मालूम हुआ कि भाई साहब किसी जरूरी काम से बाहर गए थे। लगता था हमारी दुआ जल्द कबूल हो गई। रामलीला के पात्र शृंगार करने में व्यस्त थे। रावण तवे की कालिख से बड़ी-बड़ी मूंछें बना रहा था। लक्ष्मण अपने धनुष-बाण और चाकू की जांच कर रहा था। वहीं शूर्पणखा लक्ष्मण को बता रही थी कि नाक काटने के अभिनय में चाकू और नाक के बीच कितनी दूरी रहनी चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि सच्ची में नाक कट जाए। तैयारियां जोर-शोर से जारी थीं। सभी हालात हमारे पक्ष में लग रहे थे। मंच पर दरी बिछा दी गई थी। लालटेन पूरी रोशनी के साथ जल रही थी।

आखिर इंतजार की घड़ियां खत्म हुईं और रामजी के जयकारे के साथ रामलीला का श्री गणेश हुआ। लंकेश रावण जरूरत से ज्यादा डरावना लग रहा था, तो लक्ष्मण अपने रोल के मुताबिक बहुत छोटा था। शूर्पणखा को देखकर डर कम और हंसी ज्यादा आ रही थी। इस विचित्र जमावड़े को देखकर दर्शकों का बुरा हाल था। पात्रों के हर संवाद पर लोग ताली पीटकर हंस रहे थे। रामलीला पूरे परवान पर थी। कुछ ही देर में शूर्पणखा की नाक कटने वाली थी। तभी हमें गांव की ओर आने वाले रास्ते पर कुछ रोशनी दिखाई दी। मोटरसाइकिल पर सवार कुछ लोग गांव की ओर आ रहे थे। कुछ और नजदीक आने पर आकृति जानी-पहचानी लगी। जब मोटरसाइकिल थोड़ी ही दूरी पर थी तो मालूम हुआ कि ये तो शूर्पणखा और रावण के बड़े भाई साहब थे। ऐसी स्थिति की किसी ने कल्पना तक नहीं की थी। यह देखकर शूर्पणखा और रावण मंच से सरपट भागे। शूर्पणखा अपने कपड़े फेंक कर निकर-शर्ट पहन चुकी थी। रावण अंधेरे में छुपकर दाढ़ी-मूंछ धो रहा था। हमारे अरमानों पर इतनी जल्दी पानी फिरेगा, यह किसी ने सोचा नहीं था। मंच के पास आकर भाई साहब ने मोटरसाइकिल रोकी। यहां दर्शक बैठे थे और सभी पात्र गायब। इस पर वे बोले, नाटक बंद क्यों कर रखा है भाई? चालू करो तमाशा। अगर हमारे दोनों शैतान दिखाई दें तो उन्हें घर भेज देना। उनकी गणित की कॉपी देखे बहुत दिन हो गए।

इसके बाद वे घर चले गए। इधर रंग में भंग पड़ चुका था। रावण के चेहरे से दाढ़ी-मूंछ साफ हो चुकी थीं। शूर्पणखा का कोई अता-पता नहीं था। लक्ष्मण वहीं मौजूद था लेकिन अब उसका होना, न होना बराबर था। तभी एक लड़के ने खड़े होकर रामलीला समाप्ति की घोषणा की। दरी समेट कर अलमारी में रख दी। लालटेन बुझा दी गई। इतिहास में शायद यह पहली रामलीला थी जब शूर्पणखा नाक कटाने से पहले ही भाग गई।

राजीव शर्मा

संचालक

गांव का गुरुकुल

ganvkagurukul.blogspot.com

देखो मुझे, महाप्रतापी महिषासुर की वंशज हूं मैं

विजयादशमी, दशहरा या नवरात्रि का हिन्दू धार्मिक उत्सव, असुर राजा महिषासुर व उसके अनुयायियों के आर्यों द्वारा वध और सामूहिक नरसंहार का अनुष्ठान है। समूचा वैदिक साहित्य सुर-असुर या देव-दानवों के युद्ध वर्णनों से भरा पड़ा है। लेकिन सच क्या है ? असुर कौन हैं? और भारतीय सभ्यता, संस्कृति और समाज-व्यवस्था के विकास में उनकी क्या भूमिका रही है? इस दशहरा पर, आइये मैं आपका परिचय असुर वंश की एक युवती से करवाता हूं।

वास्तव में, सदियों से चले आ रहे असुरों के खिलाफ  हिंसक रक्तपात के बावजूद आज भी झारखंड और छत्तीसगढ़ के कुछ इलाकों में 'असुरों' का अस्तित्व बचा हुआ है। ये असुर कहीं से हिंदू धर्मग्रंथों में वर्णित 'राक्षस' जैसे नहीं हैं। हमारी और आपकी तरह इंसान हैं। परंतु 21 वीं सदी के भारत में भी असुरों के प्रति न तो नजरिया बदला है और न ही उनके खिलाफ हमले बंद हुए हैं। शिक्षा, साहित्य, राजनीति आदि जीवन-समाज के सभी अंगों में 'राक्षसों' के खिलाफ  प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष ब्राह्मणवादी दृष्टिकोण का ही वर्चस्व है।

भारत सरकार ने 'असुर' को आदिम जनजाति की श्रेणी में रखा है। अर्थात् आदिवासियों में भी प्राचीन। घने जंगलों के बीच ऊंचाई पर बसे नेतरहाट पठार पर रहने वाली सुषमा इसी 'आदिम जनजाति' असुर समुदाय से आती है। सुषमा गांव सखुआपानी (डुम्बरपाट), पंचायत गुरदारी, प्रखण्ड बिशुनपुर, जिला गुमला (झारखंड) की रहने वाली है। वह अपने आदिम आदिवासी समुदाय असुर समाज की पहली रचनाकार है। यह साधारण बात नहीं है। क्योंकि वह उस असुर समुदाय से आती है जिसका लिखित अक्षरों से हाल ही में  रिश्ता कायम हुआ है। सुषमा इंटर पास है पर अपने समुदाय के अस्तित्व के संकट को वह बखूबी पहचानती है। झारखंड का नेतरहाट, जो एक बेहद खूबसूरत प्राकृतिक रहवास है असुर आदिवासियों का,  वह बिड़ला के बाक्साइट दोहन के कारण लगातार बदरंग हो रहा है। आदिम जनजातियों के लिए केन्द्र और झारखंड के राज्य सरकारों द्वारा आदिम जनजाति के लिए चलाए जा रहे विशेष कल्याणकारी कार्यक्रमों और बिड़ला के खनन उद्योग के बावजूद असुर आदिम आदिवासी समुदाय विकास के हाशिए पर है। वे अघोषित और अदृश्य युद्धों में लगातार मारे जा रहे हैं। वर्ष 1981 में झारखंड में असुरों की जनसंख्या 9100 थी जो वर्ष 2003  में घटकर 7793  रह गई है। जबकि आज की तारीख में छत्तीसगढ़ में असुरों की कुल आबादी महज 305  है। वैसे छत्तीसगढ़ के अगरिया आदिवासी समुदाय को वैरयर एल्विन ने असुर ही माना है। क्योंकि असुर और अगरिया दोनों ही समुदाय प्राचीन धातुवैज्ञानिक हैं जिनका परंपरागत पेशा लोहे का शोधन रहा है। आज के भारत का समूचा लोहा और स्टील उद्योग असुरों के ही ज्ञान के आधार पर विकसित हुआ है लेकिन उनकी दुनिया के औद्योगिक विकास की सबसे बड़ी कीमत भी इन्होंने ही चुकायी है। 1872 में जब देश में पहली जनगणना हुई थी, तब जिन 18  जनजातियों को मूल आदिवासी श्रेणी में रखा गया था,  उसमें असुर आदिवासी पहले नंबर पर थे,  लेकिन पिछले डेढ़ सौ सालों में इस आदिवासी समुदाय को लगातार पीछे ही धकेला गया है।

झारखंड और छत्तीसगढ़ के अलावा पश्चिम बंगाल के तराई इलाके में भी कुछ संख्या में असुर समुदाय रहते हैं। वहां के असुर बच्चे मिट्टी से बने शेर के खिलौनों से खेलते तो हैं,  लेकिन उनके सिर काट कर। क्योंकि उनका विश्वास है कि शेर उस दुर्गा की सवारी है,  जिसने उनके पुरखों का नरसंहार किया था।

बीबीसी की एक रपट में जलपाईगुड़ी ज़िले में स्थित अलीपुरदुआर के पास माझेरडाबरी चाय बागान में रहने वाले दहारू असुर कहते हैं,  महिषासुर दोनों लोकों- यानी स्वर्ग और पृथ्वी,  पर सबसे ज्यादा ताकतवर थे। देवताओं को लगता था कि अगर महिषासुर लंबे समय तक जीवित रहा तो लोग देवताओं की पूजा करना छोड़ देंगे। इसलिए उन सबने मिल कर धोखे से उसे मार डाला। महिषासुर के मारे जाने के बाद ही हमारे पूर्वजों ने देवताओं की पूजा बंद कर दी थी। हम अब भी उसी परंपरा का पालन कर रहे हैं।

सुषमा असुर भी झारखंड में यही सवाल उठाती है। वह कहती है, मैंने स्कूल की किताबों में पढ़ा है कि हमलोग राक्षस हैं और हमारे पूर्वज लोगों को सताने,  लूटने, मारने का काम करते थे। इसीलिए देवताओं ने असुरों का संहार किया। हमारे पूर्वजों की सामूहिक हत्याएं की। हमारे समुदाय का नरसंहार किया। हमारे नरंसहारों के विजय की स्मृति में ही हिंदू लोग दशहरा जैसे त्योहारों को मनाते हैं। जबकि मैंने बचपन से देखा और महसूसा है कि हमने किसी का कुछ नहीं लूटा। उल्टे वे ही लूट.मार कर रहे हैं। बिड़ला हो, सरकार हो या फिर बाहरी समाज हो, इन सभी लोगों ने हमारे इलाकों में आकर हमारा सबकुछ लूटा और लूट रहे हैं। हमें अपने जल, जंगल, जमीन ही नहीं बल्कि हमारी भाषा-संस्कृति से भी हर रोज विस्थापित किया जा रहा है। तो आपलोग सोचिए राक्षस कौन है।

यहां यह जानना भी प्रासंगिक होगा कि भारत के अधिकांश आदिवासी समुदाय 'रावण'  को अपना वंशज मानते हैं। दक्षिण के अनेक द्रविड़ समुदायों में रावण की आराधना का प्रचलन है। बंगाल,  उड़ीसा,  असम और झारखंड के आदिवासियों में सबसे बड़ा आदिवासी समुदाय 'संताल' भी स्वयं को रावण वंशज घोषित करता है। झारखंड-बंगाल के सीमावर्ती इलाके में तो बकायदा नवरात्रि या दशहरा के समय ही 'रावणोत्सव' का आयोजन होता है। यही नहीं संताल लोग आज भी अपने बच्चो का नाम 'रावण' रखते हैं। झारखंड में जब 2008  में 'यूनाइटेड प्रोग्रेसिव एलायंस', यूपीए) की सरकार बनी थी संताल आदिवासी समुदाय के शिबू सोरेन जो उस वक्त झारखंड के मुख्यमंत्री थे,  उन्होंने रावण को महान विद्वान और अपना कुलगुरु बताते हुए दशहरे के दौरान रावण का पुतला जलाने से इंकार कर दिया था। मुख्यमंत्री रहते हुए सोरेन ने कहा था कि कोई व्यक्ति अपने कुलगुरु को कैसे जला सकता है, जिसकी वह पूजा करता है,  गौरतलब है कि रांची के मोरहाबादी मैदान में पंजाबी और हिंदू बिरादरी संगठन द्वारा आयोजित विजयादशमी त्योहार के दिन मुख्यमंत्री द्वारा ही रावण के पुतले को जलाने की परंपरा है। भारत में आदिवासियों के सबसे बड़े बुद्विजीवी और अंतरराष्ट्रीय स्तर के विद्वान स्व. डा. रामदयाल मुण्डा का भी यही मत था।

ऐसा नहीं है कि सिर्फ आदिवासी समुदाय और दक्षिण भारत के द्रविड़ लोग ही रावण को अपना वंशज मानते हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बदायूं के मोहल्ला साहूकारा में भी सालों  पुराना रावण का एक मंदिर है,  जहां उसकी प्रतिमा भगवान शिव से बड़ी है और जहां दशहरा शोक दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसी तरह इंदौर में रावण प्रेमियों का एक संगठन है, लंकेश मित्र मंडल। राजस्थान के जोधपुर में गोधा एवं श्रीमाली समाज वहां के रावण मंदिर में प्रति वर्ष दशानन श्राद्ध कर्म का आयोजन करते हैं और दशहरे पर सूतक मानते हैं। गोधा एवं श्रीमाली समाज का मानना है कि रावण उनके पुरखे थे व उनकी रानी मंदोदरी यहीं के मंडोरकी थीं। पिछले वर्ष जेएनयू में भी दलित-आदिवासी और पिछड़े वर्ग के छात्रों ने ब्राह्मणवादी दशहरा के विरोध में आयोजन किया था।

सुषमा असुर पिछले वर्ष बंगाल में संताली समुदाय द्वारा आयोजित श्रावणोत्सव्य में बतौर मुख्य अतिथि शामिल हुई थी। अभी बहुत सारे लोग हमारे संगठन झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखडा को अप्रोच करते हैं सुषमा असुर को देखने, बुलाने और जानने के लिए। सुषमा दलित-आदिवासी और पिछड़े समुदायों के इसी सांस्कृतिक संगठन से जुड़ी हुई है। कई जगहों पर जा चुकी और नये निमंत्रणों पर सुषमा कहती है,  'मुझे आश्चर्य होता है कि पढ़ा-लिखा समाज और देश अभी भी हम असुरों को ई सिरों, बड़े-बड़े दांतो-नाखुनों और छल-कपट जादू जानने वाला जैसा ही राक्षस मानता है। लोग मुझमे राक्षस  ढूंढते हैं, पर उन्हें निराशा हाथ लगती है। बड़ी मुश्किल से वे स्वीकार कर पाते हैं कि मैं भी उन्हीं की तरह एक इंसान हूं। हमारे प्रति यह भेदभाव और शोषण-उत्पीडऩ का रवैया बंद होना चाहिए। अगर समाज हमें इंसान मानता है तो उसे अपने सारे धार्मिक पूर्वाग्रहों को तत्काल छोडऩा होगा और सार्वजनिक अपमान व नस्लीय संहार के उत्सव विजयादशमी को  राष्ट्रीय शर्म के दिन के रूप में बदलना होगा।'

प्रेमकुमार मणि का लिखा यह लेख फारवर्ड प्रेस के अक्‍टूबर, 2012  अंक में छपा है. फॉरवर्ड प्रेस भारत की पहली संपूर्ण अंग्रेजी–हिंदी मासिक पत्रिका है जो भारत के दलित और पिछड़े वर्ग पर एक नजरिया प्रदान करती है. फारवर्ड प्रेस से संबंधित किसी भी प्रकार की जानकारी प्राप्त करने के लिए अपने फोन नंबर के साथ इस पते पर ईमेल कर सकते हैं : info@forwardpress.in

जादूगोड़ा चिटफंड घोटाला : प्रशासन कर रहा है लगातार कार्रवाई का दावा पर नतीजा शून्य

प्रिय यशवंत जी, बहुत दुःख एवं आश्चर्य के साथ बताना चाहता हूँ कि जादूगोड़ा में चिटफंड संचालकों द्वारा अरबों लेकर भाग जाने के लगभग पन्द्रह दिनों बाद भी अभी तक पुलिस प्रशासन द्वारा कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गयी है, ना तो संचालक पकड़े गए हैं और ना ही उनके एजेंटों के ऊपर कोई पुलिसिया कार्रवाई हुई है. चिटफंड संचालकों के ऑफिस, घर, माल, होटल, रेस्टोंरेंट, ( संचालकों के २३/०९/२०१३ से भाग जाने के बाद सभी बंद पड़े हैं ) किसी को भी सील नहीं किया गया है और न ही कोई कागजात जब्त किया गया है. 

 

विश्वस्त सूत्र बताते हैं कि इन जगहों के सीसीटीवी फुटेज एवं कंप्यूटर का डाटा निकालने पर बड़ी जानकारी पुलिस को मिल सकती है, लेकिन स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों ने संचालकों (कमल) से इतने गिफ्ट लिए हैं कि हो सकता है की फुटेज में वे खुद दिखाई पड़ जायें और उनकी पोल खुल जाये.

घोर आश्चर्य की बात यह है कि इन संचालकों ( कमल सिंह एवं दीपक सिंह ) के माता पिता पर किसी प्रकार का दवाब पुलिस प्रशासन नहीं बना रही है उल्टे उन्हें प्रशासन द्वारा सुरक्षा मुहैया कराई गयी है, जबकि कई निवेशकों ने उनके माता पिता के माध्यम से भी निवेश कराये थे एवं वे दोनों भी कमल के इस खेल में पूरी तरह से शामिल हैं.

दैनिक अखबार में छपे समाचार के अनुसार स्थानीय दल झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेताओं द्वारा उपायुक्त कार्यालय में ०७/१०/२०१३ को आवेदन देकर कहा गया है कि जादूगोड़ा पुलिस प्रशासन के लोगों द्वारा २३/०९/२०१३ को रात १२.३० बजे पुलिस वाहन से स्काट कर इन संचालकों को क्षेत्र से बाहर सुरक्षित पहुंचाया गया. आवेदन में यह भी बताया गया है कि यूसिल माइंस गेट में लगे कैमरों में सबकुछ कैद है.

०८/१०/२०१३ को प्रभात खबर के समाचार के अनुसार फरार संचालक कमल सिंह, दीपक सिंह तथा उनके एजेंट रूद्र  नारायण भकत, मिहिर चंद्र मल्लिक, सीदो पूर्ति, अजित पात्रो, एवं वरुण सी को पुलिस पन्द्रह दिनों बाद भी पकड़ने में विफल रही है, इससे लोगो में तरह–तरह की चर्चा है, स्थानीय लोगों का कहना है कि पुलिस अप्रत्यक्ष रूप से कमल ग्रुप को संरक्षण एवं मदद दे रही है. लोगों का कहना है कि पुलिस की नीयत साफ रहती तो अगस्त माह में ही कमल टीम को गिरफ्तार कर सकती थी. लोगों का कहना है कि पुलिस कहती थी कि फरार होने से पहले किसी ने शिकायत नहीं की तो किस आधार पर पुलिस कमल को थाना एवं गेस्ट हाउस में बुलाकर घंटो पूछताछ करती थी. पुलिस केवल कागजी कार्रवाई एवं छापेमारी दिखा कर लोगों को गुमराह कर रही है, लोगों का कहना है कि आज भी संचालकों के एजेंट क्षेत्र में खुलेआम घूम रहें हैं जिनके ऊपर ठगी का मामला दर्ज करवाया गया है, परन्तु पुलिस ने केवल पांच एजेंटों पर ही मामला दर्ज किया है.

अब स्थानीय पुलिस के अंदर का सच मैं आपको बता रहा हूँ, स्थानीय पुलिस पहले कमल सिंह से पैसे लेती थी संरक्षण देने के नाम पर, अब सुनने में यह आ रहा है कि थाना से नाम काटने के नाम पर पुलिस एवं एजेंटों में दो-दो लाख रुपये का सौदा हो रहा है, यानी कि हाथी ज़िंदा भी सवा लाख का और मरा हुआ भी सवा लाख का.

अभी तक १६३ लोगों ने थाना में इन संचालकों एवं एजेंटों के विरुद्ध मामला दर्ज करवाया है, जबकि इन्वेस्टरों की संख्या ५ हज़ार से भी अधिक है.

इसी बीच जादूगोड़ा के लोगों को एक और चिटफंड कंपनी अपरूपा भविष्वा भी करोड़ों की चपत लगाकर अपना कार्यालय जादूगोड़ा में बंद कर चुकी है. लोगों के समक्ष हाथ मलने के अलावा कुछ नहीं बचा है. कई लोगों ने मुझे बताया कि पुलिस के पास जाकर क्या होगा उल्टे हमें ही परेशान किया जायेगा.

यहां यह भी बताना जरुरी है कि पुलिस प्रशासन ने जादूगोड़ा में पूरी तरह से अपना विश्वास खो दिया है.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

अवधेश आकोदिया के संपादन में ‘राजस्थान सम्राट’ रीलॉन्च

जयपुर। 1982 से प्रकाशित पाक्षिक समाचार पत्र 'राजस्थान सम्राट’ का नया रूप सामने आया है। वरिष्ठ पत्रकार अवधेश आकोदिया ने इसे रीलॉन्च किया है। अब तक 8 पेज के टेबलायड अखबार के रूप में प्रकाशित हो रहे 'राजस्थान सम्राट’ का नया अंक मैगजीन के रूप में सामने आया है। पत्रिका की कवर स्टोरी वसुंधरा राजे के बदले हुए व्यवहार पर केंद्रित है। गौरतलब है कि राजस्थान की राजनीति में सक्रिय होने से लेकर अब तक राजे के व्यवहार में काफी परिवर्तन आए हैं।

इनमें से कुछ 'पॉजिटिव’ और कुछ 'निगेटिव’। पूरी तरह से राजस्थान पर 'फोकस्ड’ इस पत्रिका का नया कलेवर पाठकों को काफी पसंद आ रहा है। पत्रिका के संपादक अवधेश आकोदिया ने बताया कि 'वैसे तो राजस्थान में पत्रिकाओं की कमी नहीं है, लेकिन इनमें पूरी तरह से राजस्थान पर केंद्रित एक भी पत्रिका नहीं है। हमने इसी कमी को पूरा करने का प्रयास किया है। राजस्थान सम्राट पूरी तरह से राजस्थान को समर्पित पत्रिका है। पाठको को हमारा कन्सेप्ट पसंद आ रहा है।‘

68 पेज की इस मैगजीन में राजस्थान की कई चर्चित शख्सियतों को स्तंभकार के रूप में जोड़ा गया है। देश-दुनिया में तकनीक के क्षेत्र में होने वाले नवाचारों से रूबरू करवाने की जिम्मेदारी संभाली है बालेंदु शर्मा दाधीच ने। दाधीच की गिनती देश के श्रेष्ठ साइबर पत्रकारों में होती है। वे मूलत: राजस्थान के ही हैं। 'राजस्थान सम्राट’ में उनका 'स्मार्ट वॉच’ नाम से कॉलम है। कला-संस्कृति से जुड़ा 'यायावर’  कॉलम कला व संस्कृति विशेषज्ञ डॉ. राजेश कुमार व्यास ने लिखा है। यायावरी में स्थान-विशेष की यात्रा भी होगी, संस्कृति से जुड़े उनके अनुभव भी, कला और कलाकार भी तो शब्दों  से जुड़े संस्कृति के सरोकार भी। स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों पर 'जान है तो जहान है’ नाम से डॉ. वीरेंद्र सिंह का कॉलम है। वे सवाई मान ङ्क्षसह अस्पताल के अधीक्षक हैं। समाज के 'एलीट क्लास’  की इस शिकायत को दूर करने के लिए कि मीडिया दूसरों की खामियों का पोस्टमार्टम तो बखूबी करता है, लेकिन अपनी खामियों कभी नोटिस नहीं करता, 'राजस्थान सम्राट’ ने वरिष्ठ पत्रकार नारायण बारेठ का 'फोर्थ पिलर’ नाम से कॉलम प्रारंभ किया है। इसमें वे हर बार मीडिया से जुड़े मसलों पर रोशनी डालेंगे। इस बार उन्होंने 'पेड न्यूज’ के मुद्दे को खंगाला है। चुनाव के मौसम में, इससे अच्छा विषय और कोई हो भी नहीं सकता।

'राजस्थान सम्राट’ में राजस्थानी भाषा को भी पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिला है। प्रदेश के साहित्यकारों की इस शिकायत को दूर करने के लिए कि परंपरागत मीडिया राजस्थानी भाषा को पर्याप्त तवज्जो नहीं देता, 'आपणी भाषा’ स्तंभ प्रारंभ किया है। इस बार साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार से सम्मानित दुलाराम सहारण का आत्मकथ्य है। भविष्य में वे ही इस स्तंभ का जिम्मा संभालेंगे। ख्यात व्यंग्यकार अनुराग वाजपेयी का कॉलम 'खटराग’ भी पत्रिका में है। धर्म की चर्चा का जिम्मा दर्शन व संस्कृत के चर्चित विद्वान शास्त्री कोसलेंद्रदास के कंधों पर है। 'राजस्थान सम्राट’ के संपादक अवधेश आकोदिया बताते हैं कि 'हमने प्रत्येक क्षेत्र को विशेषज्ञ को अपने साथ जोडऩे का प्रयास किया है। कई चर्चित शख्सियतें हमसे जुड़ चुकी हैं और कई जुडऩे की प्रक्रिया में हैं। अपने क्षेत्र की दिग्गज हस्तियों के जुडऩे से हमारी पत्रिका संभ्रांत वर्ग में चर्चा का विषय बन रही है।’

इस सवाल पर कि इस नए कलेवर को बरकरार रखना कितनी बड़ी चुनौती है, अवधेश आकोदिया कहते हैं कि 'हमने इस लायक संसाधन जुटाने के लिए विशेष रणनीति बनाई है। आपको यह जानकर अच्छा लगेगा कि इस दौरान हम उन व्याधियों से दूर रहेंगे, जिन्होंने 'कॉरपोरेट मीडिया’ को बुरी तरह से जकड़ रखा है। हम कोई 'क्रांति’  करने का दावा तो नहीं करते, लेकिन इतना यकीन जरूर दिला सकते हैं कि 'राजस्थान सम्राट’ में प्रासंगिक खबरें कभी हाशिए पर नहीं रहेंगी। हमारा फोकस निजी स्वार्थ पर नहीं, बल्कि सामाजिक स्वार्थ के सवालों पर होगा।’

अखिलेश, आज़म को दंगा पीआईएल में सुप्रीम कोर्ट नोटिस

सुप्रीम कोर्ट ने मुजफ्फरनगर दंगों के सम्बन्ध में सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर, रविन्द्र राजौरा तथा वी द पीपल द्वारा इलाहाबाद हाई कोर्ट की इलाहाबाद और लखनऊ बेंच में दायर पीआईएल को अपने यहाँ स्थानांतरित करने के बाद इस सम्बन्ध में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और कैबिनेट मंत्री आज़म खान को नोटिस जारी किया है.

सुप्रीम कोर्ट द्वारा उक्त तीनों वादीगण के मुकदमों को डॉ नूतन ठाकुर आदि बनाम भारत सरकार एवं अन्य नामित करते हुए उनकी सुनवाई 17 अक्टूबर 2013 को 2.00 बजे निर्धारित की गयी है. नोटिस के अनुसार वादीगण के अतिरिक्त अखिलेश यादव एवं आज़म खान को व्यक्तिगत रूप से अथवा अपने एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड के माध्यम से कोर्ट के सामने उपस्थित रहने के निर्देश दिए गए हैं अन्यथा प्रकरण में उनकी अनुपस्थिति में सुनवाई और निर्णय कर दिया जाएगा.

देवालय आस्था का प्रतीक है और शौचालय मूल आवश्यकता है : राजनाथ सिंह

न्यूज24 पर 'आमने-सामने' कार्यक्रम में अनुराधा प्रसाद (एडिटर इन चीफ) के साथ खास बातचीत में बीजेपी के अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कहा कि नरेंद्र मोदी देश के किसी भी कोने से चुनाव लड़ सकते हैं। अब ये फैसला नरेंद्र मोदी को करना है कि वो कहां से चुनाव लड़ना चाहते हैं। बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कहा है कि नरेंद्र मोदी बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार है और उनकी लोकप्रियता को देखते हुए अब ये मोदी को तय करना है कि वो कहां से चुनाव लड़ेंगे।

राजनाथ सिंह ने नरेंद्र मोदी के विवादास्पद बयान पहले शौचालय फिर देवालय पर मचे बवाल पर सफाई देते हुए कहा कि  मोदी के बयान पर स्थिति साफ करना चाहता हूं,। देवालय आस्था का प्रतीक है और शौचालय मूल आवश्यकता है। 'आमने–सामने' में बातचीत के दौरान बीजेपी अध्यक्ष ने इस बात से इंकार किया कि पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव, लोकसभा चुनाव का सेमीफाइनल है। हालांकि राजनाथ ने कहा कि मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में हमारी सरकार फिर से बनेगी और दिल्ली और राजस्थान में भी बीजेपी  सरकार बनाने जा रही है। अगर राजनाथ की मानें तो अगले 5 राज्यों में से 4 राज्यों में बीजेपी की सरकार बनने जा रही है।

राजनाथ सिंह ने कहा कि दिल्ली में बीजेपी के मुख्यमंत्री पद पर अंतिम फैसला बीजेपी पार्लियामेंटरी बोर्ड करेगी। राजनाथ से आमने – सामने में जब ये सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा कि ''हमने रणनीति के तहत दिल्ली में मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार पर फैसला नहीं लिया है। कई बार हम रणनीति के तहत फैसला लेते हैं और कई बार नहीं लेते हैं।'' अरविंद केजरीवाल से जुड़े सवाल पर राजनाथ ने कहा कहीं कुछ नहीं है।

राजनाथ सिंह ने बीजेपी को सेकुलर और समाजवादी पार्टी और कांग्रेस को कम्युनल करा दिया। आमने–सामने में राजनाथ ने कहा कि ''बीजेपी सेक्युलर पार्टी है। कांग्रेस कम्युनल पार्टी है। कांग्रेस ने साम्प्रदायिक कटुता बढ़ाने का काम किया है। बीजेपी इंसाफ और इंसानियत के आधार पर राजनीति करती है। मोदी के शासनकाल में गुजरात में एक दंगा हुआ। जबकि कांग्रेस के राज में सैकड़ों दंगे हुए। समाजवादी पार्टी अपने को सेकुलर कहती है। लेकिन जब जब इनकी सरकार आती है, यूपी में दंगे क्यों होते हैं।''

मुजफ्फरनगर में बीजेपी विधायक पर दंगा भड़ाकने के आरोप में गिरफ्तारी पर राजनाथ ने कहा ''दंगा भड़काने में बीजेपी के एमएलए का कोई हाथ नहीं है। समाजवादी सरकार अपना चेहरा छुपाने के लिए कुछ भी कर सकती है। सपा ने दंगे कराये, इनका काम देश की जनता के आंखों में धूल झोंकना है।''

आमने–सामने में राजनाथ सिंह ने मोदी को देश का सबसे लोकप्रिय बताते हुए कहा कि, …देश में मोदी की लहर है। राजनाथ ने इस लहर की बदौलत लोकसभा चुनाव में अपने दम पर बहुमत हासिल करने का दावा किया। “ इस बार करिश्मा होने जा रहा है। जो पिछले चुनाव को देखते हुए आकलन कर रहे हैं,… वो चूक होगी। अपने दम पर इस बार हम 272 का आंकड़ा पार करेंगे। “ राजनाथ ने कहा कि पार्टी सुशासन और विकास के मुद्दे पर चुनाव लड़ेगी। उन्होंने कहा कि देश गंभीर सकंट के दौर से गुजर रहा। देश की जनता
कांग्रेस से त्रस्त है, और कांग्रेस से निजात चाहती है। राजनाथ ने दावा किया कि विधानसभा और लोकसभा चुनाव में पार्टी जीत हासिल करेगी।

आमने–सामने में राजनाथ सिंह ने मोदी – राजनाथ के जोड़ी के अटकलों पर भी सफाई पेश की। राजनाथ ने कहा कि ''नरेंद्र मोदी और मेरी कोई जोड़ी नहीं है, मैं अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी निभा रहा हूं। आमने – सामने में अनुराधा प्रसाद के साथ बातचीत के दौरान राजनाथ सिंह ने जेडीय़ू पर लोहिया के सिधांतों से भटकने का आरोप लगाया। राजनाथ ने जेडीयू से अपील करते हुए कहा कि “ राममनोहर लोहिया और दीनदयाल उपाध्याय को वे ना भूलें, जिन्होंने हमेशा गैर कांग्रेसवाद की राजनीति की है।''

लोकसभा चुनाव बाद सहयोगी जुटाने के सवाल पर राजनाथ ने कहा कि हमारी पहली कोशिश होगी 272 का आंकड़ा अपने दम हासिल करने की। पर उन्होंने कहा कि बीजेपी के लिए कोई अछूत नहीं है। जरुरत पड़ने पर पुराने सहयोगी जेडीयू के पास जाने से उन्होंने इंकार नहीं किया। लेकिन ममता बनर्जी के साथ किसी भी समझौते से उन्होंने इंकार कर दिया। पर जयललिता के साथ रिश्तों को रणनीति का हिस्सा बताते हुए इसके बारे में कोई भी खुलासा करने से इंकार कर दिया।

नरेंद्र मोदी की ताजपोशी पर पार्टी के पितामह लालकृष्ण आडवाणी की नाराजगी पर राजनाथ ने कहा कि ''आडवाणीजी पार्टी के मार्गदर्शक हैं। वे हमारे नेता हैं, सरंक्षक है एनडीए को लेकर कोई भी फैसला लेने का अधिकार आडवाणीजी के ही पास है।"

राजनाथ ने आडवाणी – मोदी के रिश्तों में कटास की बात को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि  दूरियां रहती तो आडवाणीजी मोदी की तारीफ करते क्या ? बीजेपी को बहुमत नहीं मिलने की सूरत में सहयोगी जुटाने के लिए आडवाणी का नाम पीएम पद के लिए आगे करने के सवाल को राजनाथ ने काल्पनिक बनाया। हालांकि उन्होंने खुद को पीएम पद के रेस से अलग करते हुए कहा कि "मैं प्रधानमंत्री नहीं बनूंगा। कोई सवाल ही पैदा नहीं होता है।"

आमने सामने में राजनाथ सिंह संघ को लेकर भी सफाई पेश की उन्होंने कहा कि " बीजेपी आरएसएस ने कभी भी बीजेपी के कामकाज में दखल नहीं दिया। मैं भी संघ से जुड़ा हूं। आरएसएस ने पार्टी पर कभी भी दवाब नहीं बनाया। कभी कभी हमलोग अपनी तरफ से उनके पास जाकर राय लेते हैं। संघ हमें सुझाव देता है। वो स्वीकार्य होता है वो हम मानते हैं। " गाजियाबाद सीट के बदलने का कोई कारण नहीं है। लेकिन कई बार संसदीय बोर्ड फैसला बदल देता है।

प्रेस रिलीज

दैनिक जागरण, नोएडा के ब्यूरो चीफ कुमार संजय का इस्तीफा, मनोज त्यागी को प्रभार

दैनिक जागरण से खबर है कि नोएडा के ब्यूरो चीफ कुमार संजय का इस्तीफा हो गया है. सूत्रों का कहना है कि दैनिक जागरण, एनसीआर के एडिटर विष्णु त्रिपाठी और नोएडा ब्यूरो चीफ कुमार संजय के बीच किसी बात को लेकर गर्मागर्म बहस हुई. इस बहस के बाद कुमार संजय ने आफिस जाना बंद कर दिया. अब सूचना आ रही है कि उन्होंने इस्तीफा दे दिया है. उनकी जगह मनोज त्यागी को नोएडा का नया ब्यूरो चीफ बनाया गया है.

सूत्रों के मुताबिक निशिकांत ठाकुर गिरोह के सफाये के क्रम में ही कुमार संजय को दैनिक जागरण से जाने के लिए मजबूर किया गया. वे पिछले 17 वर्षों से दैनिक जागरण में सेवारत थे. बिहार के रहने वाले कुमार संजय का डिजीगनेशन चीफ रिपोर्टर का था. कहने वाले कहते हैं कि कुमार संजय खुद को संस्थान का सबसे बड़ा हितैषी समझते थे और संस्थान के हर अच्छे-बुरे आदेश का मन लगाकर पालन करते थे, पर उन्हें तनिक नहीं अंदाजा था कि एक दिन वे ऐसी स्थिति को प्राप्त हो जाएंगे.

भड़ास तक सूचनाएं bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

उज्जवल भट्टाचार्या को लखनऊ प्रेस क्लब में 14 अक्टूबर की शाम 4 बजे सुनिए

Siddharth Kalhans : सशक्त रचनाकार, कवि, कई बेहतरीन अनुवाद करने वाले रेडियो पत्रकार उज्ज्वल भट्टाचार्य इन दिनों लखनऊ में हैं। बीते 30 सालों से जर्मनी में रह रहे उज्ज्वल दा रेडियो डायचे वैले में कई दशक तक काम कर चुके हैं। लखनऊ श्रमजीवी पत्रकार यूनियन उज्ज्वल जी के साथ एक शाम उनसे बातचीत और सुनने का कार्यक्रम रखा है। तारीख 14 अक्टूबर समय शाम 4 बजे प्रथम तल हाल में।

आपकी शिरकत बायसे मसर्रत होगी। इंतजार रहेगा। हां इस आयोजन के पीछे अपनी स्वार्थ भी है। वो यह कि उज्ज्वल दादा की आवाज में अमेरिका में गोरो के सरदार को रेड इंडियन सियट्ल सरदार के भेजे गए संदेश का मार्मिक अनुवाद सुनना जो हमें भारत में आदिवासियों को उनकी जमीन से खदेड़ने के खिलाफ चल रहे संर्घषों की याद दिलाता है। कुछ ताजातरीन हाईकू की भी दरकार रहेगी।

पेश है उज्जवल दादा का एक कलाम…

उज्जव भट्टाचार्या
उज्जव भट्टाचार्या
जो कुछ धरती पर गुज़रता है, जल्द ही उसके बेटों पर भी आता है. तुम्हें अपने बच्चों को सिखाना पड़ेगा, कि उनके क़दमों के नीचे की धरती हमारे पुरखों की राख है. ताकि वे इस धरती से प्यार करें, उनको बताना कि इस धरती के नीचे हमारे पुरखों की आत्मा छिपी है. अपने बच्चों को सिखाना, जो हम अपने बच्चों को सिखाते हैं: धरती मां है. इंसान जब धरती पर थूकता है, वह खुद को गंदा करता है. हम इतना जानते हैं कि धरती इंसान की नहीं, इंसान धरती का है – इतना हम जानते हैं. सब एक-दूसरे के साथ जुड़े हैं. जो कुछ धरती पर गुज़रता है, उसके बेटों पर भी आता है. ज़िंदगी का ताना-बाना इंसान ने नहीं बनाया है, वह तो महज़ उसका एक धागा है. जब तुम इस ताने-बाने को छेड़ते हो, तुम अपने-आप पर चोट करते हो. नहीं, दिन और रात साथ-साथ नहीं रह सकते. हमारे मुर्दे धरती की मीठी नदियों में जीते रहते हैं, वसंत की हल्की आहट के साथ वे लौट-लौटकर आते हैं, झीलों को सहलाती हवा में उनकी आत्मा बसी हुई है.

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ कलहंस के फेसबुक वॉल से.

शरद यादव ने बताया महिला पत्रकार को ‘खूबसूरत’

भोपाल : राजग संयोजक एवं जनता दल (यू) अध्यक्ष शरद यादव ने मंगलवार को भोपाल की एक महिला पत्रकार को उस समय ‘खूबसूरत’ बता दिया, जब उसने उनसे पूछा कि बिहार एवं मध्यप्रदेश में कौन बेहतर प्रदेश है।

प्रदेश जद (यू) कार्यालय पर बातचीत के दौरान इस महिला पत्रकार ने यादव से पूछा कि बिहार एवं मध्यप्रदेश में से उन्हें कौन सा प्रदेश बेहतर लगता है। इस पर उन्होंने तपाक से कहा, ‘‘बिहार और मध्यप्रदेश ही क्यों पूरा देश बेहद खूबसूरत है और आप भी खूबसूरत हैं’’। उनके इस जवाब पर वहां मौजूद सारे पत्रकार एवं पार्टी कार्यकर्ताओं की हंसी फूट पड़ी, जिनमें खुद प्रश्नकर्ता महिला पत्रकार भी शामिल थी।

आपदा के बाद ईटीवी, उत्तराखंड को बहुगुणा सरकार ने पौने दो करोड़ रुपये दिए

: आपदा से कराह रहा था उत्तराखंड, विजय बहुगुणा एंड कंपनी मीडिया मैनेज कर रही थी : कर्णप्रयाग : उत्तराखंड में 15, 16 जून को आई भारी बारिश ने उत्तराखंड की विजय बहुगुणा की सरकार के आपदा प्रबंधन के दावों की पोल खोल कर रख दी. स्थानीय और राष्ट्रीय मीडिया लचर आपदा प्रबंधन और उत्तराखंड सरकार द्वारा लागू किए गए विनाशकारी विकास की खबरों के साथ राज्य सरकार पर टूट पड़ा. खोज, राहत और बचाव का अभियान शुरू हुआ और धीरे-धीरे मीडिया की सरकार के प्रति तल्खी भी कुछ कम पड़ने लगी. समाचार पत्रों में उत्तराखंड की सरकार की अपील और उपलब्धियां भी दिखनी शुरू हो गयी. स्थानीय और राष्ट्रीय मीडिया के नर्म सुरों से लगा की सरकार ने अपनी लापरवाही से सबक सीखते हुए व्यवस्था को चाक-चौबन्द करना शुरू कर दिया है.

लेकिन अब सूचना अधिकार से हुआ खुलासा बता रहा है कि मीडिया के स्वरों में नरमी की वजह सरकार का आपदा से निपटने के प्रति संवेदनशील रवैया नहीं बल्कि कुशल मीडिया मैनेजमेंट है. आर.टी.आई.कार्यकर्ता गुरविन्दर सिंह चड्ढा द्वारा सूचना अधिकार के अंतर्गत प्राप्त आंकड़े सरकार के प्रति मीडिया के रुख में आई नरमी का कारण काफी हद तक स्पष्ट करते हैं. राज्य के सूचना एवं लोक संपर्क विभाग के लोक सूचना अधिकारी आशीष कुमार त्रिपाठी द्वारा उपलब्ध करवायी गयी सूचना के अनुसार आपदा आने के बाद से 04 सितम्बर 2013 (सूचना आवेदन की तिथि) तक राज्य सरकार ने इलेक्ट्रानिक और प्रिंट मीडिया को 22,77,42,510 रु.(बाईस करोड़ सत्तर लाख बयालीस हज़ार पाँच सौ दस रुपये) के विज्ञापन बांटे. इसमें से 10,62,28,042 (दस करोड़ बासठ लाख अट्ठाईस हज़ार बयालीस रुपए) के विज्ञापन तो समाचार चैनलों की झोली में ही गिरे.

प्रतिदिन सरकारी विज्ञापन को खबर की शैली में दिखाने वाले न्यूज़ चैनल-ई.टी.वी.पर तो सरकार की विज्ञापनी मेहरबानी जम कर बरसी. ई.टी.वी.को 1,78,33,650 रु. (एक करोड़ अठत्तर लाख तैंतीस हज़ार छह सौ पचास रुपया) जून 2013 के बाद दिया गया. इतना ही नहीं  ई.टी.वी. उर्दू को भी 25,28,850 रु. विज्ञापन के रूप में मिला. निजी एफ.एम.चैनल-रेडियो मिर्ची जिंगल पर भी सरकार ख़ासी मेहरबान रही, जिसे 1,27,39,122 रु. का विज्ञापन दिया गया।

यह इसलिए भी चौंकाने वाला है कि उत्तराखंड के अधिकांश पहाड़ी क्षेत्रों में तो एफ.एम.रेडियो चलता ही नहीं है.टी.वी.100, इंडिया न्यूज, समाचार प्लस, वॉयस आफ नेशन, जैन टी.वी.आदि स्थानीय न्यूज चैनल आपदा के विज्ञापनों की बौछार में एक करोड़ के क्लब में शामिल होने से मात्र कुछ लाख रुपये ही पीछे रहे. दिल्ली वाले न्यूज चैनल हालांकि इनसे काफी पीछे थे पर विज्ञापनों में उनका शेयर भी लाखों में ही था.

सरकार द्वारा आपदा के समय विज्ञापनों का भार कितना था, इसका अंदाजा इस बात से लगता है कि 23 जून 2013 को मुसीबत की घड़ी में साथ रहने का विज्ञापन 28.50 लाख रुपये का था तो 24 जून 2013 को ऐसा ही विज्ञापन 31.50 लाख रुपये “मात्र” का था। मुख्यमंत्री की अपील 6. 55 लाख की थी तो आपदा प्रबंधन मंत्री की अपील 5.80 लाख रुपये की थी.

प्रदेश से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्रों को दैवीय आपदा पर आधारित विज्ञापनों के लिए दो भुगतानों का ब्यौरा सूचना एवं लोकसमपर्क विभाग द्वारा दी गयी सूचना में है. प्रदेश से प्रकाशित समाचार पत्रों को एक भुगतान 31,26,826 का है तो दूसरा 62,389 रुपये का है तथा इसमें अवशेष भुगतान 26,053 रुपये का है। विज्ञापन एजेंसियों के माध्यम से किया गया भुगतान 82,76,446 रुपये का है और इनको दी जाने वाली बकाया धनराशि 70,84 360 रुपये है.

भारत की कम्युनिष्ट पार्टी (माले) के गढ़वाल सचिव इंद्रेश मैखुरी कहते हैं की एक ऐसे समय में जबकि लोग अपना सब कुछ गंवा रहे थे या गँवाने के कगार पर खड़े तो उन्हें संकट से उबारने के त्वरित उपाय करने के बजाय सरकार का ज़ोर इस पर ज्यादा रहा कि इन अभागों की बदहाली की दास्तान सामने ना आने पाये और समाचार माध्यमों को प्रभावित करके वह अपनी साख बचा ले. सरकार द्वारा समाचार पत्रों और न्यूज चैनलों को विज्ञापन दिया जाना एक रूटीन प्रक्रिया है। लेकिन पिछले एक साल से तमाम समाचार माध्यमों के प्रति अपने रूखे व्यवहार के लिए चर्चित सरकार, जब संकट की घड़ी में विज्ञापनों की भारी बारिश करती है तो उसकी मंशा पर संदेह होना लाज़मी है.

कर्णप्रयाग से अरविंद चौहान की रिपोर्ट.

48वाँ ज्ञानपीठ पुरस्कार तेलुगु कथाकार डॉ. रावूरि भरद्वाज को

नयी दिल्ली : साहित्य में उत्कृष्ट योगदान के लिए भारतीय ज्ञानपीठ का वर्ष 2012 का ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ तेलुगु के सुप्रसिद्ध कथाकार डॉ. रावूरि भरद्वाज को नेहरू स्मारक संग्रहालय एवं पुस्तकालय सभागार, नयी दिल्ली में सुप्रसिद्ध सरोदवाद· उस्ताद अमजद अली खाँ के कर कमलों द्वारा प्रदान किया गया.

भारतीय ज्ञानपीठ के प्रबन्ध न्यासी साहू अखिलेश जैन ने डॉ. रावूरि भरद्वाज का पुष्प गुच्छ से स्वागत किया. दीप प्रज्वलन के बाद भारतीय ज्ञानपीठ के आजीवन न्यासी श्री आलोक प्रकाश जैन ने स्वागत भाषण में कहा कि तेलुगु के शीर्षस्थ कथाकार डॉ. रावूरि भरद्वाज मनुष्य जीवन की संवेदनशील अभिव्यक्ति के लिए विख्यात हैं. प्रेमचंद की  तरह इनकी रचनाओं में आदर्शोन्मुखी यथार्थवाद की झलक मिलती है.

ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रवर परिषद् के अध्यक्ष, डॉक्टर सीताकान्त महापात्र की अनुपस्थिति में सुश्री राजनंदिनी ने उनके वक्तव्य का वाचन किया. डॉक्टर महापात्र ने अपने वक्तव्य में कहा कि डॉ. रावूरि भरद्वाज तेलुगु साहित्य में श्री चालम के उत्तराधिकारी ही नहीं है, अपनी अनोखी शैली, कहन, चरित्र-चित्रण और कथा-बनावट की दृष्टि से अपनी अलग पहचान भी रखते हैं.

अपने पुरस्कार स्वीकारोक्ति भाषण में डॉ. भरद्वाज ने आभार प्रकट करते हुए कहा कि मात्र आदर्श का पालन करना ही नहीं, उसपर चलते हुए ही अपने उद्देश्य की प्राप्ति करना ही आदर्श की स्थापना करना है. मेरी रचनाओं को ज्ञानपीठ ने जो सम्मान दिया है यह उनके चयन की निष्पक्षता को दर्शाता है.. इस सम्मान ने मुझे बहुत बल दिया है और मेरे सामने चुनौति रख दी है कि मैं अपने साहित्य में सामाजिक प्रतिबद्धता को उसी तरह निभाता चलूँ जैसी मेरी पहचान बनी है और जो मेरी लेखन-शक्ति है.

उस्ताद अमजद अली खाँ ने अपने उद्बोधन में कहा कि ज्ञानपीठ पुरस्कार समारोह में आना मेरे लिए गर्व की बात है. साहित्य, ·ला और संगीत का मूल स्वर और उद्देश्य एक होता है. यहाँ साहित्य और संगीत का मधुर मिलन देखने को मिला. उस्ताद अमजद अली खान ने कहा की उनके गुरु कहा करते थे की इस ब्रह्माण्ड में दो दुनिया है, एक शब्दों की दुनिया और दूसरी स्वर की दुनिया. इन दो दुनिया में से किसी एक को चुनना होगा. इन दोनों दुनिया को एक साथ चुनना बहुत कठिन होता है, मैंने संगीत की दुनिया चुना.

कार्यक्रम के अन्त में भारतीय ज्ञानपीठ के निदेशक श्री रवीन्द्र कालिया ने धन्यवाद ज्ञापन करते हुए कहा कि डॉ. रावूरि भरद्वाज आज तेलुगु के ही नहीं अपितु सम्पूर्ण भारतीय साहित्य की श्रेष्ठता के प्रतीक बन चुके हैं. वे अपने भारतीय साहित्य की अमूल्य निधि हैं और उनकी कीर्ति देश-विदेश तका फैली हुई है. भारतीय ज्ञानपीठ सम्मान स्वीकार करके उन्होंने हमारा मान बढ़ाया है. प्रबन्ध न्यासी साहू अखिलेश जैन की पहल पर इस बार साहित्य का यह सर्वोच्य पुरस्कार एक संगीतकार द्वारा प्रदान किया गया है जो कलाओं के सामंजस्य का मार्ग प्रशस्त करता है. सम्मान समारोह में अनेक गणमान्य व्यक्ति, साहित्यकार, पत्रकार उपथित थे.

प्रेस विज्ञप्ति

अंग्रेजी बनाम देशी पुस्तक

आज के युग में इंटरनेट सूचना प्रसार का सबसे बड़ा, लोकप्रिय और सशक्त माध्यम है। वर्तमान युग में इंटरनेट पर किसी भी सूचना को आसानी से प्राप्त करने के अवसर सुलभ हैं। नेट पर पुस्तकें, पत्रिकाएं और समाचार पत्र भी आसानी से पढ़े जा सकते हैं। माना जाता है कि नेट की वजह से आज पुस्तकों के पाठकों की संख्या कम हो गयी है लेकिन यह देखा गया है कि प्रायः प्रिंट माध्यम के पाठक और इंटरनेट के पाठक अलग-अलग होते हैं। जो लोग पुस्तक खरीद कर पढ़ने में रुचि रखते हैं उन्हें इंटरनैट पर उपलब्ध मूल्यरहित सामग्री भी अच्छी नहीं लगती और वे पुस्तक खरीदकर ही पढ़ते हैं।

साथ ही लोग पुस्तकें इसलिये भी खरीदते हैं क्योंकि पुस्तकों का घर और पुस्तकालय में संकलन किया जा सकता है और जब चाहे उसे पढ़ा जा सकता है। पुस्तकों के प्रति लोगों की रुचि घटने का एक बड़ा कारण पुस्तकों का मूल्य है। इस महंगाई के दौर में किताब खरीदना पाठकों की जेब पर भारी पड़ रहा है। स्तरीय साहित्य अगर कम कीमत पर उपलब्ध हो तो पाठक इसे छोड़ना नहीं चाहते। वे श्रेष्ठ साहित्य को पढ़ने का लोभ संवरण नहीं कर पाते। इसका उदहारण गत वर्ष प्रगति मैदान में आयोजित पुस्तक मेले में देखने को मिलता है। नौ दिवसीय इस मेले के अंतिम दिन शनिवार को कई प्रकाशकों ने किताबों पर भारी छूट दे दी थी, जिसके कारण खूब बिक्री हुई। कुछ स्टालों पर तो पुस्तकों की खरीद पर कपड़ों के सेल की तर्ज पर छूट दी गई। कहीं 20 व 50 रुपये में किताबों का बंडल था तो कहीं 100 रुपये चार किताबों का ऑफर। ऐसे स्टाल पर ग्राहकों की भारी भीड़ लगी थी। रीडर्स लाउंज में बैठकर लोग किताबें पढ़ रहे थे। जाहिर है कि पुस्तकों के पाठक आज भी हैं बशर्ते उचित मूल्य पर पुस्तकें उपलब्ध कराई जा सकें।

साहित्यिक मेलों, आयोजनों में हिंदी का स्पेस बढ़ रहा है, हिंदी लेखन में विविधता बढ़ रही है। आज अक्सर सुनने को आता है कि कविता के पाठक नहीं रहे और कविता का भविष्य खतरे में है । लेकिन इसके लिए कोई प्रमाण नहीं दिया जाता है। लोग मान कर चलते हैं कि पहले का युग कविता के लायक था, आज का युग विरोधी है। सच तो यह है कि पिछले पाँच सौ वर्षों से स्वयं अंग्रेजी में कविता को लेकर क्षमायाचना का भाव रहा है । दो सौ साल पहले शेली को कहना पड़ा कि कवि दुनिया के मान्यता विहीन विधायक हैं, और वे आज भी हैं । हिन्दी में खड़ी बोली का इतिहास महज सौ साल का है । एक समय था जब निराला,पंत और प्रसाद की पुस्तकें भी बहुत कम छपती और बिकती थीं । कवि सम्मेलनों की परम्परा ने अवश्य कविता को साधारण लोगों से जोड़ा पर वह भी धीरे धीरे फूहड़ हो गई।

कहते हैं कि सूर, कबीर और तुलसी आज भी लोकप्रिय हैं, निर्विवाद रूप से भक्त कवियों की रचनाओं की पहुंच जनसामान्य तक है लेकिन आज कितने लोग तुलसीदास को काव्यप्रेम के कारण पढ़ते हैं। तय है भक्ति भावना के अन्तर्गत धार्मिक आन्दोलनों के अंग के रूप में इन्हें अधिक प्रसार मिला। बाद में स्वाधीनता आन्दोलन के दौरान मैथिलीशरणगुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी तथा दिनकर को लोकप्रियता मिली। प्रगतिशील आन्दोलन ने नागार्जुन, शील आदि को कुछ जनप्रियता दी,  लेकिन कुल मिलाकर कविता प्रेम के कारण कविता पढ़ने सुनने वाले हमेशा कम ही रहे। इसलिए आज भी यदि कविता के प्रति प्रेम कम है, तो कोई अनहोनी बात नहीं है । बहरहाल इस विषय में कवियों को गंभीरता से सोचना होगा कि ऐसा क्यों हैं आज कविता पाठकों के मन पर प्रभाव छोड़ पाने में अक्षम क्यों हो गई है? कहीं उनमें ही तो कोई कमी नहीं है?

भारत में प्रिंट मीडिया उद्योग लगातार विकास के पथ पर अग्रसर है और पिछले वित्त वर्ष की तुलना में चालू वित्त वर्ष में इसमें 6.25 प्रतिशत की बढ़ोतरी इस बात का पुख्ता सबूत है। देश में पंजीकृत समाचारपत्रों की कुल संख्या 82 हजार 237 है। प्रेस की स्थिति के संबंध में जारी 55वीं वार्षिक रिपोर्ट में इस बात का खुलासा हुआ है कि भारत में प्रिंट मीडिया दिनोंदिन तरक्की कर रहा है। रिपोर्ट के अनुसार समाचारपत्रों के प्रकाशन के मामले में हिन्दी सभी भाषाओं पर भारी है। समाचारपत्रों के पंजीयक की ओर से सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में पेश की गई रिपोर्ट में बताया गया है कि चालू वित्त वर्ष में प्रकाशित हो रहे हिन्दी समाचारपत्रों की संख्या 7,910 है। एक हजार 406 समाचारपत्रों के प्रकाशन के साथ अंग्रेजी दूसरे स्थान पर और 938 समाचारपत्रों के साथ उर्दू तीसरे स्थान पर है। गुजराती के 761, तेलुगु के 603, मराठी के 521, बांग्ला के 472, तमिल 272, ओडिया 245, कन्नड 200 और मलयालम के 192 समाचारपत्र प्रकाशित हो रहे हैं।

प्रसार संख्या के मामले में भी हिन्दी के अखबार अव्वल हैं। हिन्दी अखबारों की कुल प्रसार संख्या 15 करोड़ 54 लाख 94 हजार 770 है, जबकि अंग्रेजी के समाचारपत्रों की कुल प्रसार संख्या दो करोड़ 16 लाख 39 हजार 230 प्रतियां हैं। वहीँ इंडियन रीडरशिप सर्वे का डाटा रिलीज हुआ है। उसके अनुसार हिंदी अखबार दैनिक जागरण लगातार पहले स्थान पर है। दैनिक जागरण की कुल पाठक संख्या 5.45 करोड़ बतायी गयी है। दूसरे नंबर है दैनिक भास्कर। दैनिक भास्कर की पाठक संख्या 3.19 करोड़ पाठकों के साथ वह देश का दूसरा सबसे बड़ा अखबार बना हुआ है। तीसरे नंबर पर हिन्दी का ही एक अखबार है – अमर उजाला। अमर उजाला के पाठकों की संख्या 2.87 करोड़ बतायी गयी है। चौथे नंबर पर भी हिन्दी का एक और अखबार दैनिक हिन्दुस्तान है। आईआरएस के आंकड़े बताते हैं कि कुल पाठक संख्या 2.67 करोड़ पहुंच गयी है। पांचवे स्थान पर मराठी दैनिक लोकमत काबिज है। लोकमत के  कुल पाठकों की संख्या 2.06 करोड़ पहुंच गयी है। छठे नंबर पर तमिल अखबार डेली थंथी के पाठकों की संख्या 2.04 करोड़ पर पहुंच गयी है। सातवें नंबर भी एक तमिल दैनिक दिनकरण है। दिनकरण के पाठकों की संख्या ताजा सर्वे के अनुसार 1.68 करोड़ है। आठवें स्थान पर पश्चिम बंगाल का बांग्ला दैनिक आनंद बाजार पत्रिका है। आनंद बाजार पत्रिका के पाठकों की संख्या 1.55 करोड़ है। नौंवे स्थान पर हिन्दी अखबार राजस्थान पत्रिका है. राजस्थान पत्रिका के कुल 1.4 करोड़ पाठक हैं। तेलुगु दैनिक इनाडु दसवें नंबर पर है। ईनाडु के पाठकों की संख्या 1.39 करोड़ है।

भारत के शीर्ष दस अखबारों में अंग्रेजी का एक भी अखबार शामिल नहीं है। अंग्रेजी के सबसे बड़े अखबार टाईम्स आफ इंडिया के पाठकों की संख्या 1.33 करोड़ है, जबकि दूसरे नंबर के अंग्रेजी के सबसे बड़े अखबार हिन्दुस्तान टाईम्स के पाठकों की संख्या 63.4 लाख है। हिन्दू तीसरे नंबर पर है और उसके पाठकों की संख्या 53.73 लाख है। 28.18 लाख पाठकों के साथ द टेलीग्राफ चौथे नंबर पर है। 27.68 लाख पाठकों के साथ डेक्कन क्रानिकल पांचवे नंबर पर है। छठे नंबर पर टाईम्स समूह के व्यावसायिक अखबार द इकोनामिक टाईम्स है। उसके कुल पाठकों की संख्या 19.17 लाख है। मुंबई से निकलनेवाला टैबलाइड मिड डे सातवें नंबर पर है। मिड-डे के पाठकों की संख्या 15.83 लाख है। आठवें नंबर पर द न्यू इंडियन एक्सप्रेस है जिसके पाठकों की संख्या 15.66 लाख है। मुंबई मिरर के पाठकों की संख्या 15.57 लाख है और वह नौवें नंबर पर है जबकि दसवें नंबर पर डीएनए है और उसके पाठकों की कुल संख्या 14.89 लाख है। हिंदी पर अकादमिक जकड धीरे-धीरे कम होती जा रही है, वैचारिकता का आग्रह  कम होता जा रहा है। इसलिए साहित्यिक मेलों, आयोजनों में हिंदी का स्पेस बढ़ रहा है, हिंदी लेखन में विविधता बढ़ रही है। भारतीय भाषाओं के बीच हिन्दी का विशेष महत्व है। हिन्दी के लेखक भी खासी बड़ी संख्या में हैं। हिन्दी भाषा में प्रकाशन भी बहुत होता है और हिन्दी में प्रकाशकों की संख्या भी अच्छी खासी है। हिन्दी में पत्रिकाएं बड़ी तादाद में निकलती हैं। इस दृष्टि से अन्य भाषाओं की तुलना में हिन्दी एक बहुप्रचलित भाषा है।

निश्चित रूप से हिंदी में साहित्य के पाठक कम हुए हैं। यह बात हिंदी के तमाम प्रकाशक भी मानते हैं कि कविता-कहानी-उपन्यास के पाठक कम हुए हैं। आलोचना के पाठक तो पहले ही कम थे। हिंदी के कई शीर्ष प्रकाशकों ने तो साहित्य छापना ही कम कर दिया है। साहित्येत्तर विषयों की किताबें धड़ाधड़ बिक रही है। कहीं आज का हिंदी साहित्यकार, कवि मध्य वर्ग का वह प्राणी भर तो नहीं जिसे जनता और जनसामान्य से कोई लेना देना नहीं इसलिए वह जन सामान्य से कोई तादात्म्य ही नहीं बिठा पा रहा है। वह ग्लोबलाईज हो गया है। व्यक्तिगत लाभ-हानि की बात भर सोच पा रहा है। उसका सोच द्विस्तरीय है। ऐसे में साहित्य के कम पढ़े जाने का रोना धोना छोड़ उसे वस्तुगत आत्मविश्लेषण अवश्य करना होगा।

शैलेन्द्र चौहान का विश्लेषण.

‘जानेमन जेल’ से मुझे कैदी और बंदी के बीच का फर्क समझ आया

Dev Gupta : 'जानेमन' का इंतजार था, पर इजहार करने में इंतहा हो गयी….. 'जानेमन' को आनलाइन मंगाने के बाद पढ़ने के लिए बेसब्री से इंतजार था। 'जानेमन' के मिलने की डेट 20 अगस्त के बाद तय थी, न मिलने पर फोन भी किया तो तकनीकी कारण का पता चला। 22 को किताब मिल गयी। भेजने वाले शख्स शैलेष भारतीय का धन्यवाद करने के बाद पढ़ना शुरू किया। पत्रकारिता करते हुए पढ़ना था तो अपना मनपसंद समय निकाला रात का। तीन दिनों में पूरी किताब पढ़ ली।

किताब के बीच में कुछ पत्रकार मित्रों का जिक्र था, तो लगा कि मैने कमेंट करने में जल्दी की होती तो मैं भी वहां होता। सोचा किताब पर प्रतिक्रिया मैं ही पहले लिखूंगा, पर यहां भी मेरे लिखने में इंतहा हो गयी। आखिरकार अन्य लोगों की प्रतिक्रिया को देख प्रतिक्रिया देने का मन हुआ, सो लिख दिया। जैसे के हर खबर की जान उसका शीर्षक व इंट्रो होता है, वैसे ही 'जानेमन जेल' का नाम ही काफी है, अन्दर के पन्ने पलटने के लिए।

सबसे बड़ी बात कि जेल की जीके बढ़ाती है किताब जिसमें बंदी और कैदी का अन्तर सबसे महत्वपूर्ण है। इस अन्तर को पत्रकारिता के कर्इ पर्वतदिगार द्वारा एक समान अर्थात बंदी व कैदी में कोर्इ अन्तर नहीं करते देखा गया है। जेल की रिपोर्टिंग मैंने नहीं की। कायदे से मुझे भी क्लीयर नहीं पता था, पर जानेमन पढ़ने के बाद पता चला मठाधीश क्या लिख देते हैं।

दूसरी बात इस किताब को पढ़कर कर्इ और किताबें पढ़ने की उत्सुकता बढ़ी। उपन्यास कभी पढ़ा नहीं, बस उसकी मोटार्इ देखकर मन बोर हो जाता था। पर जानेमन से कर्इ किताबों के पढ़ने व कलेक्शन करने का भाव पैदा हुआ। जानेमन की एक वनलाइनर जिसे शायद हर स्ट्रींगर के मुंह से निकल जाता है, खास कर पूर्वांचल की फेमस वन लाइनर है। सबसे बड़ी बात जो मेरा भी विचार है कि कुछ भी हो जाये, जिन्दगी रुकती नहीं। उसी तरह किताब 'जानेमन जेल' ये प्रेरणा देती है कि आप कहीं भी हों, जिन्दगी रुकती नहीं…..उसे चलाते जाओ। जेल से सबको डर लगता है और लगना भी चाहिए। जेल सजा के लिए होता है पर सच्चे लोग भी जेल जाते हैं। तो वहां भी अपनी सच्चार्इ को जारी रखो….. जैसे जेल के सच्चे अनुभव से जारी हुआ जानेमन………।

जनसंदेश टाइम्स में कार्यरत मिर्जापुर निवासी पत्रकार देव गुप्ता के फेसबुक वॉल से.

उत्तराखंड में सूचना निदेशालय का बड़ा घोटाला : चोर को कहा चोरी कर कोतवाल को कहा जागते रहो

देहरादून। उत्तराखण्ड सरकार की नाक के नीचे जो हो जाए वह कम है। यहां थानेदार को ही चोरी करने का पूरा मौका दे दिया जाता है। राज्य में आई  भीषण आपदा के बाद से ही राज्य का सूचना एंव लोक संपर्क विभाग सुर्खियां बटोरता रहा है। आपदा प्रभावित लोगों को प्रभावी विस्थापन के बजाय मुख्यमंत्री इस विभाग का सदुपयोग पूरे देश के मीडिया संस्थानों को विज्ञापन बांटकर अपनी छवि सुधारने का नाकाम प्रयास करते रहे हैं। हाल ही में खुलासा हुआ कि यह चर्चित विभाग मुख्यमंत्री के इशारे पर 90 करोड़ रुपए से अधिक के विज्ञापन और न्यूज डायरी के नाम पर बांट चुका जिसकी चर्चा पूरे देश में है ।

सूचना विभाग में एक और कारनामा इन दिनों सुर्खियों में है। मुख्यमंत्री के अधीन इस विभाग में वित्त विभाग के जिस व्यक्ति को वित्तीय गड़बडियों को पकड़ने की जिम्मेदारी दी गयी थी उसी व्यकित को बिल पास करने की भी अनुमति दे दी गयी  है। यानि वह खुद ही गड़बड़ी करेगा व बाद में खुद ही वित्त अधिकारी बनकर उस गड़बड़ी पर मुलम्मा लगाएगा. इतना ही नहीं, इस अधिकार को विभाग का आहरण -वितरण (डीडीओ) भी बना दिया गया है. अब यह बात आम आदमी के  समझ से परे है कि जो व्यक्ति विभागीय बिल पास करेगा, वह वित्तीय गड़बडियों पर कैसे अंकुश लगा सकता है । आम तौर पर व नियमतः विभागीय मुखिया के पास बिल पास करने की जिम्मेदारी होती है या वह काम के बोझ को देखते हुए अपने ही विभाग के किसी जिम्मेदार अधिकारी को यह अधिकार दे देता है न कि अपने विभाग से इतर किसी अन्य विभाग के अधिकारी को  यह जिम्मेदारी दी जा सकती है।

यहां अजब तमाशा यह भी  हुआ कि महानिदेशक  ने विभागीय अधिकारियों को दरकिनार कर किसी दूसरे विभाग के अधिकारी को वह जिम्मा दे डाला  जिसको  सरकार  ने उस विभाग की वित्तीय अनियमितताओं  के खुलासे के लिये नियुक्त किया गया है ,इतना ही नहीं वित्त विभाग के इस  अधिकारी को 2 – 2  लाख रूपए तक के बिलों को पास करने का अधिकार तक भी दे दिया गया है ।

उल्लेखनीय है कि  सूचना विभाग में तैनात वित्त विभाग के इस वित्त अधिकारी के पास सूचना विभाग के अतिरिक्त नगर निगम देहरादून के  वित्त अधिकारी की भी जिम्मेदारी है। नियमतः  वित्त अधिकारी का काम विभाग में आर्थिक घोटालों का पता लगाकर उन पर प्रभावी कार्रवाही  करना वित्तीय अनियमितताओं को रोकने की होती है, मगर सूचना विभाग में शासन में बैठे उच्चाधिकारियों ने उल्टी गंगा ही बहा दी। सूचना विभाग में तैनात इस वित्त अधिकारी को  2 लाख रूपए तक के बिलों के भुगतान का भी अधिकार देकर नियमतः वित्त अधिकारी के अधिकार को बौना कर दिया गया है । यही नहीं पूरे प्रदेश के साथ देश के विभिन्न प्रदेशों से राज्य सूचना विभाग से होने वाले पत्राचार को जांचने को ठेका भी  इसी वित्त अधिकारी को दे दिया गया है । अब शासन में बैठे उच्चाधिकारियों को कौन समझाए कि पत्राचार में मीडिया से संबंधित विभिन्न मसलों को विभाग के सम्मुख रखा जाता है और उन सब चीजों को समझने के लिए विभाग के अधिकारियों से बेहतर कोई  नहीं होता। वित्त विभाग का अधिकारी मीडिया से संबंधित मामलों पर कितना प्रभावी निर्णय ले सकता है, यह शासन में बैठे उच्चाधिकारी ही बेहतर जानते होंगे। लेकिन प्रशासन के इस निर्णय ने यह साफ कर दिया कि विभाग की ओर से बांटे गए विज्ञापनों के घोटाले को ढकने के लिए सूचना विभाग से इतर अधिकारी को यह जहाँ घोटाले करने की छूट दे दी है वहीँ उसी को इन घोटालों को दबाने का अधिकार भी दे दिया है ताकि घोटाले सार्वजनिक न हो पायें और फाइलों में ही दफ़न होकर रह जाएँ ।

यहाँ  हुए घोटालों का सबसे रोचक पहलू तो यह भी है कि  प्रदेश सरकार ने अब तक लगभग 90  करोड़ के विज्ञापन देश भर की मीडिया को इसलिए दे डाले ताकि आपदा के बाद मुख्यमंत्री की दागदार हो रही छवि को देश के सामने साफ़ सुथरी बनाकर पेश की जाये चाहे आपदा प्रभावित इलाकों में सरकार ने कोई कार्य किया हो अथवा नहीं . इस मामले में प्रदेश के सूचना विभाग में तैनात वित्त विभाग के इस अधिकारी ने अपनी जिम्मेदारी का किस तरह से निर्वहन किया इसकी एक बानगी यह है कि  जहाँ इस विभाग ने राज्य से प्रकाशित होने  वाले  पत्रों को डी ए वी पी से निर्धारित अथवा सूचना  निदेशालय से निर्धारित न्यूनतम दरों पर विज्ञापन जारी किये वहीँ देश अथवा राज्य से प्रसारित होने वाले चेनलों को विज्ञापन देने में न तो न्यूनतम दरों का ही ध्यान रखा गया और न डी ए वी पी से निर्धारित दरों का.

इस समूचे प्रकरण में घोटाले की बू तब साफ़ आती  है जब प्रदेश में मात्र एक या आधा घंटे का स्लॉट लेकर चेनल चलाने वालों को राज्य में स्थापित 24 घंटे प्रसारित होने वाले चैनलों से दो से तीन गुना अधिक रुपयों का पैकेज दिया गया। इतना ही नहीं राज्य में मात्र एक आध स्थानों पर ही दिखाई देने वाले चैनलों पर भी विभाग ने जमकर मेहरबानी की है वो भी व्यावसायिक दरों पर। ऐसे में सूचना विभाग में वित्तीय अनियमितताओं को रोकने के लिए वित्त विभाग के इस अधिकारी की जिम्मेदारी पर भी सवालिया निशान लगता है जिसने सरकारी खजाने को मुक्त हाथों से लूटने दिया।

सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार वित्त विभाग के इस गड़बड़ झाले की जानकारी कांग्रेस के तमाम आला नेताओं  द्वारा मुख्यमंत्री तक को की जा चुकी है लेकिन अब यह देखना होगा अब तक तमाम विवादित लोगों चाहे वह आयुष विभाग के रजिस्ट्रार का मामला रहा हो या राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में सदस्य सचिव या कोई अन्य को उत्तराखंड की धरती पर लाने  वाले मुख्यमंत्री इस मामले में क्या निर्णय लेते हैं इसका इंतजार प्रदेश की जनता कर रहीं है।

देहरादून से राजेंद्र जोशी की रिपोर्ट.

उत्तराखंड में विजय बहुगुणा की उल्टी गिनती शुरू!

उत्तर प्रदेश से अलग होने के बाद गुजरिश्ता १३ सालों में उत्तराखंड राज्य में ७ मुख्यमंत्री बन चुके हैं और एक बार फिर नेतृत्व परिवर्तन को लेकर सत्ता के गलियारों से ताजा हवा निकल रही है। लगातार मीडिया में सुर्खियां बन रहे इस मुददे पर मुख्यमंत्री कैंप का मौन, यह बताने के लिए काफी है कि नेतृत्व परिवर्तन का यह धुंआ बिना आग के हवा में यों ही नहीं तैर रहा है। दरअसल मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की ताजपोशी के बाद से ही विरोध के सुर तेज हो गये थे, किसी तरह एक साल पूरा हो पाया था कि जून मध्य में आये जल प्रलय ने सरकार को हिला दिया। हालांकि शुरूआती हीलहवाली के बाद राहत व बचाव कार्य तो कर दिया गया लेकिन इस दौरान सरकार की जो भूमिका रही, वो आपदा के पहले दिन से ही सवालों के घेरे में घिरी रही।

स्थानीय लोगों के पुर्नवास का मामला अधर में लटकना भी मुख्यमंत्री की नाकामी में गिना जा रहा है। यह मुददा आगामी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पर भारी पड सकता है। सरकार व संगठन के बीच के फासले व राज्य के बडे काग्रेसी नेताओं के बीच अपसी खींच तान ने मुखिया की परेशानी बढा दी है। शायद इस बात को समझते हुए ही नये निजाम को कुर्सी पर बैठाने की कवायद की जा रही है। लेकिन पांच राज्यों के चुनाव कार्यक्रम की घोषणा हो जाने के बाद फिल्हाल मुख्यमंत्री बहुगुणा को इस आफत से राहत मिलती दिखाई दे रही है।

विजय बहुगुणा उस राजनेता के राजनीतिक वारिश हैं जिसने हमेशा सिद्वातों की राजनीति की। हेमवतीनंदन बहुगुणा को कभी भारतीय राजनीति का चाणक्य कहा जाता था। अपने दम पर वो भारतीय राजनीति का केन्द्र रहे। लेकिन उनके पुत्र व उत्तराखंड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा मुख्यमंत्री के अब तक के कार्यकाल में कभी भी ऐसा नहीं दिखा कि वो एचएन बहुगुणा की विरासत से जुडे हैं। सरकार की कमान संभालने के बाद से शायद ही कभी बहुगुणा सरकार पटरी पर दौडती नजर आई हो। अफरसरशाही के हावी होने की बात की जाती रही है। कभी भाजपा सरकार में सर्वेसर्वा रहा एक अधिकारी इन दिनों कांग्रेस सरकार का थिंकटैंक बना हुआ है। देहरादून हो या दिल्ली यह ब्यूरोक्रेट मुख्यमंत्री बहुगुणा से चिपका दिखाई देता है। असल में मुख्यमंत्री बहुगुणा में राजनीतिक अनुभव की कमी के चलते सरकार न तो जनआकांक्षाओं पर खरी उतर पा रही है और नहीं पार्टी संगठन संतुष्ट हो पा रहा है। पार्टी संगठन से जुडे कुछ नेताओं को राज्यमंत्री का दर्जा देकर गुस्सा शांत करने की कोशिश भी सरकार की छवि सुधारने में मददगार नहीं हो सकती है। इसके अलावा मुख्यमंत्री के सामने सबसे बडी चुनौति पार्टी के कददावर नेताओं को मनाने की है। जो शायद ही मनाये जा सकें।

अब सूबे में नये निजाम के आने की चर्चाएं जोर पकड रही हैं। हालांकि कांग्रेस हाईकमान की ओर से इस संदर्भ में ऐसा कोई संकेत नहीं दिया गया है लेकिन कांग्रेस के पार्टी प्रभारी के इस मुददे पर चुप्पी साधने के चलते राजनीतिक समीक्षक अपनी अपनी ओर से अर्थ निकालने में लगे हैं। अब चूंकि पांच राज्यों का चुनाव कार्यक्रम चुनाव आयोग की ओर से घोषित कर दिया गया है ऐसे में अब उत्तराखंड में नेतृत्व परिवर्तन की गुंजाइश वेहद कम नजर आ रही है। ८ दिसम्बर को इन राज्यों में मतगणना होगी । इस बीच दिसम्बर माह में पंचायत चुनाव होने हैं। पंचायत चुनाव के ठीक पहले मुख्यमंत्री बदला जायेगा, इसमें संशय है। हां यह जरूर है कि त्रि स्तरीय पंचायत चुनाव में सत्ताधारी कांग्रेस यदि उम्मीदों के मुताबिक प्रर्दशन करने में नाकाम रही तो, एक बार फिर नेतृत्व परिवर्तन की आवाज गुंजने लगेगी। दूसरी ओर मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा खेमा भी यही उम्मीद पाले हुआ था कि किसी तरह पांच राज्यों का चुनाव कार्यक्रम घोषित हो जाय और सरकार इस दौरान आपदा प्रभावितों के पुर्नवास के साथ ही कुछ लोककल्याणकारी योजनाओं की घोषणा कर दी जाय, जिससे पार्टी को पंचायत चुनाव में लाभ मिल सके। यह बहुगुणा कैंप की अपनी रणनीति है।

पीडीएफ की भूमिका –

राज्य विधान सभा में सत्ताधारी कांग्रेस के ३३ सदस्य हैं, जबकि ३ वहुजन समाज पार्टी व ४ निर्दलीय विधायकों का भी सरकार को समर्थन है। इस सबको मिलाकर वर्तमान समय में सरकार को ४० विधायकों का समर्थन है। विपक्षी भाजपा के राज्य विधानसभा में ३० सदस्य हैं। अंकों के खेल के लिहाज से सरकार को समर्थन दे रहे सात विधायकों की नेतृत्य परिवर्तन में अहम भूमिका रहेगी। भरोसेमंद सूत्रों के मुताबिक पीडीएफ नहीं चाहता है कि इतनी जल्दी नेतृत्त में बदलाव हो। बहुगुणा कैंप को यूनाईटेड डेमोकेटिक फं्रट के सात विधायकों का भी सर्मथन है। फं्रट के नेता व सूबे के माध्यमिक शिक्षा मंत्री मंत्री प्रसाद नैथानी का कहना है कि राज्य में नेतृत्व परिवर्तन से पहले फं्रट से उनकी राय भी पूछी जानी चाहिए। उनका यह कहना कहीं न कहीं मुख्यमंत्री बहुगुणा के लिए राहत अवश्य है।

तो क्या पंचायत चुनाव तक अभयदान –

लोगों की उम्मीदों पर खरा न उतरने के आरोप में घिरे मुख्यमंत्री बहुगुणा को त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव तक अभयदान मिल गया है। हालांकि विरोधी गुट की ओर से हर हाल में नेतृत्व परिवर्तन की बात को सही ठहराया जाता रहा। यहां तक की श्राद्घ पक्ष के तुरंत बाद मुख्यमंत्री बदले जाने की चर्चाएं खूब चली। वकायदा तिथि तक गिनाई जाने लगी, लेकिन चर्चाओं से आगे मामला नहीं बढा। अब कयास लगाये जा रहे हैं कि त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव के बाद मुख्यमंत्री बदलना तय है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में सत्ताधारी कांग्रेस को जोर का झटका लगेगा। सरकार की हर मोर्चे पर विफलता व पार्टी के अंदर शीर्षस्थ नेताओं के अंर्तविरोध के चलते विपक्षियों का काम आसान हो जायेगा। लेकिन सवाल फिर वही कि क्या त्रिसस्तरीय चुनाव में हार के बाद कांग्रेस हाई कमान सूबे में नेतृत्व परिवर्तन करेगा।

देहरादून से दीपक सती की रिपोर्ट.

जनता का पैसा और सिस्टम का नाकारापन

भारत सरकार पर जनता के पैसे को खर्च करने की जिम्मेवारी होती है, जिसे वह अनेक प्रकार के टैक्स के रूप में जनता से वसूल करती है. केंद्र तथा राज्य सरकारें मिलकर एक साल में लगभग 15 से 16 लाख करोड़ रुपये खर्च करती हैं, जिसमें 60 प्रतिशत केंद्र द्वारा तथा 40 प्रतिशत राज्यों द्वारा खर्च होता है. इस पैसे का लेखा-जोखा (audit) रखने की जिम्मेवारी Comptroller and Auditor General (CAG, कैग) पर होती है.

संविधान द्वारा स्थापित चुनाव आयोग (EC), केन्द्रीय सतर्कता आयोग (CVC) तथा कैग- इन तीन संस्थाओं पर शासन की गुणवत्ता निश्चित करने की जिम्मेवारी होती है. इनकी प्राथमिकी पर ही केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) गहराई से छान-बीन कर मामले को अदालत तक पहुंचाता है. आज़ादी के तुरंत बाद डाक्टर अम्बेडकर ने कहा कि कैग द्वारा पैसे का सही हिसाब-किताब रखना उच्चतम न्यायालय के काम से ज्यादा महत्वपूर्ण है. भ्रष्टाचार के विकराल रूप लेने में इन संस्थाओं की निष्क्रियता एक मुख्य कारण बनती है.

1990 के दशक में टी.एन. शेषन ने चुनाव आयोग को एक स्वतंत्र एवं सक्रिय रूप दिया, जिसके कारण चुनावों के दौरान अपराधिक घटनाओं पर नियंत्रण आया. अभी चुनावों में पैसे की शक्ति को कम करना बाकि है. 90 के ही दशक में बिहार राज्य का 37 करोड़ 70 लाख रुपये का चारा घोटाला लगातार सुर्ख़ियों में रहा, जिसमें 17 वर्ष बाद इस वर्ष दोषियों को सज़ा हुई है. बिहार राज्य का एक छोटा सा विभाग कई वर्षों तक खजाने से सीधे पैसा निकालता रहा और शीर्ष संस्था कैग को इंडियन एक्सप्रेस (मार्च 25, 1996) की एक विस्तृत रिपोर्ट से इसका पता चला.

पिछले पांच वर्षों में कैग संस्था की अचानक बढी सक्रियता से सरकार हतप्रभ हुई. कैग विनोद राय सुर्खिओं में आये जब उन्होनें २ जी, कोलगेट, कामनवेल्थ गेम्स आदि अनेक घोटालों को उजागर किया. इन घोटालों को जनता के समक्ष लाने में टीवी मीडिया ने भी सक्रिय भूमिका निभाई. इन सभी मामलों में सीबीआई ने गहराई से छान-बीन की और अदालत से दोषियों को सजा भी दिलवाई.

कैग के अनुमान के अनुसार कोयला घोटाले में  1.86 लाख करोड़ रुपये का नुक्सान हुआ. केंद्र सरकार ने कैग पर कार्यपालिका की नीतिओं में हस्तक्षेप करने का आरोप लगाया. परंतू सन २००४ में कोयला मंत्रालय के सचिव ने पुरानी स्क्रीनिंग कमेटी की खामिओं के बारे में सरकार को आगाह किया था परन्तु कोयला मंत्रालय ने अपने सचिव के नोट की अनदेखी की. कैग ने अपनी कोई नीति न बनाते हुए सरकार की नीतिओं के आधार पर ही नुक्सान की गणना की. सन 1971 में पारित कैग (डीपीसी) एक्ट के अनुसार कैग को सरकार की वित्तीय जांच के अतिरिक्त उसके प्रदर्शन की जांच का भी अधिकार है. सरकार ने जनता के पैसे का कुशलता से उपयोग किया या नहीं – यह कैग के अधिकार क्षेत्र मैं आता है.

यहाँ पर मंत्री तथा मंत्रालय के सचिव के अधिकारों की विवेचना करना जरूरी है. हालांकि पोलिसी बनाने में सचिव अपनी राय देता है, परंतू पालिसी की जिम्मेवारी मंत्री की होती है. भारत सरकार द्वारा सन 2005 में जारी किये वित्तीय नियमों के अनुसार सचिव मंत्रालय का मुख्य लेखा-जोखा अधिकारी है. उसके ऊपर पालिसी के तहत प्रोग्राम को अंजाम तक ले जाने की भी जिम्मेवारी है. इसके अलावा किसी भी पालिसी पर पार्लियामेंट की जन लेखा कमिटी (PAC) के समक्ष जबाबदेही भी उसी की है. फिर मंत्रालय के काम की समीक्षा के लिए कैग भी है. यदि कैग मंत्रालय के कामकाज पर कोई अनुचित टिप्पणी करता है तो धारा 311 के तहत मंत्री अपने अधिकार से सचिव को दण्डित भी कर सकता है.

कैग को अपनी कार्यशैली की भी समीक्षा करनी चाहिए. भारत ही ऐसा एक देश है जहाँ ऑडिट कोड, मैनुअल्स आदि गुप्त रखे जाते हैं, जबकि यहाँ भी कुछ दशक पहले ये आसानी से बुकस्टोर्स पर उपलब्ध होते थे. उसी प्रकार भारत कुछ विरले देशों में आता है जहाँ पर कैग केंद्र सरकार तथा राज्य सरकारों का ऑडिट खुद ही करता है. राज्य स्तर पर लेखा अधिकारी को कोई अधिकार नहीं हैं.

सन १९९२ में जब कैग पर सुस्त होने के आरोप लगे तो उसने शकधर कमेटी का गठन किया. कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में बताया की राज्य विधान सभा की वित्त कमेटीयां लेखा रिपोर्ट्स पर बहस को वर्षों तक टाले रखती हैं. इस सन्दर्भ में राजीव गांधी में राज्यों के कार्यक्षेत्र में आने वाले ग्रामीण विकास कार्यक्रम पर की गयी टिप्पणी महत्वपूर्ण है. उन्होंने कहा था कि इन योजनाओं पर सरकारी बजट का केवल 15 प्रतिशत पैसा ही गाँवों तक पहुँचता है.

लेखक कन्हैया झा माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के शोध छात्र हैं. उनसे संपर्क +919958806745, (Delhi) +918962166336 (Bhopal) या kanhaiya@journalist.com के जरिए किया जा सकता है.

जयप्रकाश बाबू होते तो इन समाजवादी नेताओं को देख उन्हें रोना आता

''संपूर्ण क्रांति अब नारा है, भावी इतिहास हमारा है'' कौन दिया था यह नारा? 1974 में जेपी के नेतृत्व में संपूर्ण क्रांति की ज्योति बिहार में जल रही थी। इसी ज्योति में कई छात्र नेता नेतागिरी का ककहरा सीखने में लगे थे। ककहरा सीखने में लालू यादव सबसे आगे थे। पटना विश्वविद्यालय में छात्रसंघ के अध्यक्ष थे  लालू यादव। सुशील मोदी महासचिव व रविशंकर प्रसाद संयुक्त महासचिव थे। इसके अलावा रामविलास पासवान, नीतिश कुमार, राजीव प्रताप रूडी, नरेंद्र सिंह, मंगनी लाल मंडल, रामजीवन सिंह, शिवानन्द तिवारी… ये सभी छात्र राजनीति की धारा में आ कर राजनीति का पाठ पढने में जुटे थे। लालू यादव,रामविलास पासवान,सुशील मोदी व नीतिश  कुमार ने अपने अपने स्तर से राजनीतिक स्पेस खोजकर अपनी पहचान बनाई। नब्बे के द्शक में लालू यादव पिछड़ी जाति के मसीहा बनकर सामने आए।

सर्वणवाद के खिलाफ लालूजी ने नारा भी दिया। भूराबाल (भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण, लाला) को साफ कर देा। मतलब साफ था कि लालू यादव पिछड़ी जाति का कार्ड खेलने में सफल हुए थे,खासकर मुसलमान और यादव समीकरण का फामूर्ला हिट हो गया था जिसे माय समीकरण के नाम से जाना गया। शुद्ध  देसी ठेठ में राजनीति करने का अंदाज लालू यादव को जनता के बीच लोकप्रिय बनाते चला गया। मुझे याद है बिहार के सहरसा जिले के पंचगछिया गांव में एक सभा हुई थी लालू यादव की। 

मैं नवीं कक्षा का छात्र था लेकिन मुझे भी इच्छा थी कि लालू जी को देखेंगे। लेकिन लोकप्रिय होने के बीच लालू जी विकास का फार्मूला भूल गए या कहे तो उन्हें लगने लगा कि अब हम बिहार के परमानेंट सीएम हो गए हैं। चारा का चोरी भी कर डाला। लेकिन जनता ने लालू को धीरे धीरे बायपास पर धकेल दिया जिसका पता शायद  लालू यादव को नहीं चल सका। फिर समता पार्टी के जार्ज फर्नांडिस समाजवाद के ओरिजनल स्वरूप को जनता के बीच ले जाने में सफल रहे। जनाधार दिन ब दिन बढता गया। समता पार्टी टूट कर जदयू बनी। जार्ज फर्नांडिस ,शरद यादव ने रात दिन मेहनत की । नीतिश  जी इसी मेहनत पर सियासत कर आगे बढते रहे।

शरद  यादव ने लोकसभा चुनाव मे मधेपुरा  के जमीन पर लालू यादव को पटकनी दी उसी वक्त इस बात का अंदेशा  लग गया था कि जनता अब दूसरे मूड में है। जनता ने लालू की पार्टी को सत्ता से बाहर कर दी। हांलाकि पूर्व चुनाव आयुक्त के जे राव व इलेक्टानिक वोटिंग मशीन ने  भी लालू राज के गुंडई चुनावी व्यवस्था पर अंकुश  लगाने में अहम भूमिका निभाई थी।  भाजपा -जदयू के गठबंधन में बनी पहली सरकार में नीतिश  कुमार को आगे करकें भाजपा   भावी राजनीतिक जमीन तैयार करने का खेल खेलना चाह रही थी जिसमें नीतिश कुमार जीते। यही से नीतिश कुमार जदयू में हावी होते गए। शरद यादव को भी नीतिश कुमार जार्ज बाबू की तरह हटाने का प्रयास करते रहे। लेकिन शरद यादव मंझे हुए राजनीतिज्ञ थे और यह बात नीतिश जी भी समझ चुके थे। मसलन,ये सभी नाम समाजवाद और समाजवादी राजनीति के आधार पर पला बढा और फला भी । जिसमे रामविलास पासवान भी कामयाब रहे थे।

बहरहाल, बिहार में न लालू जी, न नीतिश जी, न रामविलास जी और न अन्य जी कोई भी अब समाजवादी  नेता कहलाने के योग्य नहीं है । सब ने अंततः इंदिरा के कांग्रेस को स्वीकार कर लिया । यही हाल उत्तर प्रदेश  का है जहां के एक मात्र समाजवादी नेता मुलायम सिंह यादव कब का कांग्रेसिया चोला ओढ लिऐ। और चल दिए तीसरा मोर्चा का गठन करने ,वो भी उस मार्क्सवादियों के साथ. जिसपर जयप्रकाश जी ने कारावास की कहानी पुस्तक में लिखा था की ''बहुत सारे कांग्रेसी छिपे हुए कम्युनिस्ट हैं। वे श्रीमती गांधी का साथ अंतिम हद तक देंगे। वे हमेशा ही लोकतंत्र के शत्रु रहे हैं ''.  लोहिया, जयप्रकाश बाबू के सिद्यांत को ताड़ ताड़ और शर्मसार कर दिया इन सभी समाजवादी नेताओं ने। आज जेपी होते तो रोते,फूट फूट कर रोते। अरे जिस कांग्रेस पार्टी को जड से उखाडने के लिए जयप्रकाश  नारायण जी जीवन पर्यंत संघर्ष  करते रहे । जिस इंदिरा गांधी ने जेपी बाबू को जेल मे सड़ने पर विवश  कर दिया।

आज उसी पार्टी के गोद में मुलायम सिंह यादव, नीतिश कुमार, लालू यादव, रामविलास पासवान सहित कई नेता जा बैठे। यहां मैं शरद यादव का जिक्र इसलिए नहीं करूंगा क्योंकि शरद यादव आज एक ऐसे नेता हैं जो दिल से समाजवादी हैं। जेपी जी की तरह ताउम्र कांग्रेस के खिलाफ लड़ाई लड़ते रहे है और लड़ते रहेंगे। युवा वर्ग में आज भी शरद जी का क्रेज उतना ही है जितना किसी अन्य रास्ट्रीय  पार्टी के लोकप्रिय नेता का है।

तो ऐसे में यह सवाल लाजिमी है कि आनेवाले दिनो में कौन होगा समाजवाद का खेवहनहार? या ये मान लिया जाए कि मार्क्सवाद के बाद अब भारत में समाजवाद भी अपनी उम्र के अंतिम पड़ाव पर है। ये कौन सी राजनीति कर रहें हैं समाजवादी का सिंबल लेकर घूमने वाले,बताएंगे जरा। यह सवाल उन सभी नेताओं  से जो जेपी बाबू के पदचिन्हों पर चलकर राजनीति का एबीसीडी सीखा  और आज जब जेड तक लाने की बारी आई तो ऐसा क्या हो गया कांग्रेस मे जहां सभी समाजवादियों को कांगेस में पूर्ण समाजवाद दिखने लगा। राम मनोहर लोहिया, जयप्रकाश  नारायण जी को तो नहीं दिखा था कभी कांग्रेस में समाजवाद।

बहरहाल, कितना अच्छा होता अगर लोहिया और जेपी के सिद्यांत पर चलकर समाजवाद के आधार पर राजनीति करते समाजवादी नेता। सत्ता ,सत्ता और बस सत्ता यही भावना समाजवाद के ढलान का सबसे बड़ा कारण बना है। अगर जयप्रकाश  जी चाहते तो प्रधानमंत्री का पद उनके लिए  दुर्लभ नहीं था। क्या ऐसे में यह उम्मीद की एक किरण शरद यादव हो सकते हैं यह  भी एक गंभीर विषय  है। लालू यादव,रामविलास पासवान,नीतिश  कुमार तो अब समाजवादी नेता नहीं रहे,इसमें कोई संदेह नहीं। तो ऐसे में आज हमें जेपी बाबू के लिखे उन शब्दों पर गौर करने की जरूरत है‘‘चारों ओर हुंआ-हुआं और हू हू की आवाज सुनायी पड़ती है। लेकिन कालचक्र तो घूमता ही रहता है। रात चाहे कितनी ही अंधेरी हो,प्रभात तो फूटकर ही रहता है‘‘ ।

लेखक जितेन्द्र ज्योति पत्रकार सह सामाजिक कार्यकर्ता हैं. इनसे संपर्क 08860325838 के जरिए किया जा सकता है.

तानाशाही के खिलाफ एक अभियान थी संपूर्ण क्रांति की पूरी संकल्‍पना : प्रो. मनोज कुमार

वर्धा : लोकनायक जयप्रकाश के जन्‍म दिवस पर महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय के अहिंसा और शांति अध्‍ययन विभाग की ओर से ‘संपूर्ण क्रांति: एक मूल्‍यांकन’ विषय पर एक विशेष व्‍याख्‍यान समारोह का आयोजन किया गया। विवि के महात्‍मा गांधी फ्यूजी गुरूजी शांति अध्‍ययन केंद्र के निदेशक प्रो. मनोज कुमार ने जयप्रकाश के प्रांरभिक जीवन एवं सामाजिक जीवन के बीच के पडा़वों को स्‍पष्‍ट करते हुए कहा कि साम्‍यवादी जयप्रकाश समाजवादी होते हुए सर्वोदय में प्रशिक्षण लेते हैं।

उन्‍हें कहना पड़ता है कि समाजवाद को सर्वोदय में विलीन होना पडे़गा। बिहार आंदोलन की उपलब्धियों को रेखांकित करते हुए उन्‍होंने स्‍पष्‍ट किया कि 25 मार्च, 1974 के बाद अहिंसक क्रांति का बीज जे.पी. ने बोया और इसी कारण श्रीमती इंदिरा गांधी को कहना पडा़ कि ऐसे सामाजिक कार्यकर्ता सक्रिय राजनीति में उतरने की कोशिश कर रहे हैं। इतना ही नहीं, इन पर सेना और पुलिस को भड़काने का भी आरोप लगा। 5 जून को गांधी मैदान से जे.पी. ने घोषणा की थी कि यह कोई विधानसभा विघटन का आंदोलन नहीं है बल्कि संपूर्ण क्रांति का आंदोलन है। 1973 में ही जेपी इस संकट को समझ चुके थे इसलिए उन्‍होंने ‘यूथ फार डेमोक्रेसी’ का गठन किया था।

12 जनू,1977 को इलाहबाद उच्‍च नयायालय के ऐतिहासिक फैसले ने देश में जिस आतंक का बीजारोपण किया उसकी परिणति आपातकाल में हुई लेकिन बनने वाली सरकार ने जनता के संदेश को नहीं समझा। आंदोलन का स्‍पष्‍ट संकेत था कि अगर कोई प्रतिनिधि या सरकार भ्रष्‍ट आततायी या निकम्‍मी हो गई तो मतदाता को उनका इस्‍तीफा मांगने का अधिकार है। इनके बीच सार्व‍जनिक तू-तू मैं-मैं के तमाशे से जनता ऊब गई और सरकार का ‘प्रिमैच्‍योर एबार्शन’ हो गया।

प्रो. मनोज कुमार ने कहा कि संपूर्ण क्रांति एक स्‍वप्‍न है उसे एक व्‍यक्ति पूरा कर ही नहीं सकता एक पीढी़ भी उसके लिए कम है। दरअसल संपूर्ण क्रांति की पूरी संकल्‍पना तानाशही के विरूद्ध छेडे़ गए आंदोलन के गर्भ से उत्‍पन्‍न हुई थी। जनता को सरकार से अधिक मजबूत बनाने का स्‍वप्‍न धरा रह गया। जे.पी. ने साफ कहा था कि मनुष्‍य और समाज की जड़ता वैचारिक बौद्धिक क्रांति से समाप्‍त होती है। रामधारी सिंह ‘दिनकर’को उद्धृत करते हुए उन्‍होंने कहा कि –

‘है जयप्रकाश वह नाम जिसे

इतिहास समादर देता है

बढ़कर जिसके पद चिन्‍हों को

उर पर अंकित कर लेता है’

आनंद पटवर्धन ने 1975 में लिखा कि ‘दलगत राजनीति संसदीय कार्य प्रणाली में सुधार ला सकती है परन्‍तु क्राति नहीं ला सकती। जनता पार्टी की सरकार में भी प्रतिशोध के कृत्‍य चलते रहे और जब लौटकर इंदिरा गांधी की सरकार आयी तो उसने भी कुदाल जॉच आयोग का गठन कर गांधीय संस्‍थाओं को कटघरे में खडा़ करने की तमाम कोशिश की। इन सभी के बीच हमारे सामने यह सवाल खडा़ है कि संपूर्ण क्रांति ने जो संदेश दिया था उस संदेश का अनुपालन उसी प्रकार नहीं हुआ या विस्‍मृत किया गया जिस तरह 1947 के बाद गांधी के सपनों को सपना ही रखा गया।

अहिंसा एवं शांति अध्‍ययन विभाग के अध्‍यक्ष डॉ.नृपेन्‍द्र प्रसाद मोदी ने अपने स्‍वागत एवं संचालन करते हुए कहा कि लोकनायक दूसरी आजादी के नायक थे और वे हमारे लिए अविस्‍मरणीय हैं। इस अवसर पर डॉ.धूपनाथ प्रसाद, डॉ.चित्रा माली, डॉ.मिथिलेश सहित बड़ी संख्‍या में शोधार्थी और विद्यार्थी उपस्थिति रहे।

प्रेस रिलीज

पंजाब केसरी, दिल्ली : नो पोलिटिकल न्यूज, ओनली पेड न्यूज!

: यह कैसा लोकतंत्र है? चुनाव आयोग मौन : उत्तर भारत में सबसे ज्यादा प्रकाशित होने का दावा करने वाले पंजाब केसरी अखबार में दो दिन पहले दिल्ली के स्थानीय संपादक अश्वनी कुमार की अध्यक्षता में अखबार के संपादकीय विभाग की एक बैठक का आयोजन किया गया। इस बैठक में संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष स्वदेश भूषण जैन भी मौजूद थे। इस मौके पर सारे रिपोर्टरों और डेस्क स्टाफ को ताकीद की गई कि नो पोलिटिकल न्यूज, ओनली पेड न्यूज।

अखबार के संपादकीय विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि बैठक में बताया कि गया कि मुफ्त समाचार केवल अरविंद केजरीवाल और उसकी आप पार्टी के खिलाफ ही जाएंगे। बाकी लोगों से समाचार के एवज में पैसा वसूला जाएगा। इस मौके पर सभी संपादकीय विभाग के लोगों को दिए गए रेट कार्ड के अनुसार, कलर में 10 बाई 8 की न्यूज का रेट 64 हजार और ब्लैक एंड व्हाइट का रेट 52 हजार रुपए रखा गया है। ग्राहक की जरूरत के हिसाब से आधे साइज की खबर आधे दाम में भी छापी जा सकती है।

इस मौके पर संपादकीय विभाग को बताया गया कि अखबार में केवल क्राइम के समाचार जाएंगे। जिन समाचार की प्रकृति राजनीतिक है, उन्हें बिना कीमत वसूले नहीं छापा जाएगा। इसके लिए किसी संपादकीय विभाग के कर्मचारी को उधार में खबर छापने की इजाजत भी नहीं होगी।

बताया गया कि केवल अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी के खिलाफ इसलिए मुफ्त समाचार छापे जा रहे हैं, क्योंकि उनके रोहिणी के उम्मीदवार राजेश गर्ग ने लोकायुक्त के यहां शिकायत करके पंजाब केसरी का सरकारी जमीन से अवैध कब्जा हटवाने का प्रयास किया था। हालांकि वह इसमें पूरी तरह से सफल नहीं हो पाए, लेकिन इससे पंजाब केसरी की पोल पट्टी सारी जनता के सामने सोशल नेटवर्किंग साइट के माध्यम से खुलकर आ गई है।

उल्लेखनीय है कि पिछले करीब एक दशक से पंजाब केसरी, दिल्ली हर बार विधानसभा और निगम चुनावों में इसी प्रकार पेड न्यूज छापता है। उस पैसे का कोई रिकार्ड नहीं रखा जाता। वह शाम को इकट्ठा करके मालिक के पास पहुंचा दिया जाता है। इस तरह से अखबार के मालिक हर चुनाव में कई करोड़ की ब्लैक मनी जमा करते हैं। इस तरह से पंजाब केसरी अखबार वर्तमान मालिक अपने दादाओं के बनाए गए सिद्धांतों की जमकर धज्जियां उड़ा रहे हैं और लोकतंत्र का मखौल करते हुए मोटा माल अंदर कर हैं। (कानाफूसी)

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

मध्य प्रदेश में फीलगुड चौहान को सिंधिया की चुनौती

भोपाल : कांग्रेस ने मध्य प्रदेश में चुनाव अभियान समिति की कमान अंततः केन्द्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया को सौंप दी हैं।  कांग्रेस के इस ऐलान से सत्तारूढ़ भाजपा की धुकधुकी बढ़ गयी है। इस घोषणा के बाद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, संगठन के महत्वाकांक्षी मुखिया  नरेंद्र तोमर और  सांसद प्रभात झा समेत भाजपा नेताओं के बयानों से  जाहिर है कि भयाक्रांत बीजेपी को अब अपनी रणनीति  नये सिरे से तैयार करनी होगी। कांग्रेस आलाकमान के ताजा फैसले से फीलगुड में डूबी भाजपा की दिक्कतें इस नाते बढ़ गयी है कि कांग्रेस ने ब्रांड शिवराज के मुकाबले ऐसे ब्राण्ड को मैदान में उतारा है, जो कहीं अधिक आकर्षक, चमकीला और आबदार है तथा पांसा  पलटने की  ताब  रखता है।

फिलवक्त मध्य प्रदेश चुनावों की देहलीज पर है औेर भारतीय जनता  तीसरी पारी खेलने को  बेताब। कांग्रेस में आंतरिक बिखराव औेर गुटबाजी के चलते बीजेपी कुछ सालों से फीलगुड में डूबी हुई हैं। उनका यह फीलगुड इनके छोटे बड़े नेताओं  के बयानों में फिर फिर व्यक्त होता रहा हैं । कांग्रेस का मखौल उड़ाने  में बीजेपी के वार्ड स्तर से लेकर राज्य और राष्ट्र स्तर तक के नेता पीछे नहीं रहे, लेकिन 3 सितंबर को तस्वीर बदलने के सिलसिले की शुरुआत तब हो गयी, जब  कांग्रेस आलाकमान ने तमाम धड़ों  को एकजुट कराने के कदम उठाये और मध्य प्रदेश में चुनाव प्रचार की कमान केंद्रीय  ऊर्जा राज्यमंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया को सौंप दी। इसके साथ ही  पार्टी ने कमलनाथ दिग्विजय सिंह, कांतिलाल भूरिया, सुरेश पचौरी, अजय सिंह, अरूण यादव, प्रेमचंद गुड्डू आदि को भी महत्वपूर्ण दायित्व सौंपे।

यह अकारण नहीं है कि कांग्रेस ने रामेश्वर नीखरा, बालकवि बैरागी, प्रतापभानु शर्मा, मीनाक्षी नटराजन, बाला बच्चन, कुणाल चौधरी,  असलम शेर खां, आरिफ अकील, नरेन्द्र नाहटा, महेन्द्र सिंह कालूखेड़ा, सत्यब्रत चतुर्वेदी, सज्जन वर्मा, एनपी प्रजापति, सत्यदेव  कटारे, गोविंद सिंह, विश्वेश्वर भगत,  कैप्टेन जयपाल सिंह, लक्ष्मण सिंह, विजयलक्ष्मी  साधो आदि को भी महत्वपूर्ण  दायित्व सौंपे । पार्टी के विभिन्न धड़ों में एका कायम करने के मकसद से कमलनाथ को विभिन्न समितियों का समन्वयक बनाया गया।

तीन सितंबर के  फैसले से यह तय हो गया कि कांग्रेस मध्य प्रदेश में विधानसभा का चुनाव एक व्यक्ति नहीं, बल्कि टीम के बूते लड़ने के मूड में हैं । उसने चुनाव के  पूर्व सीएम के नाम का ऐलान नहीं करने की  अपनी परंपरा  कायम रखी और ‘ वन मैन मार्का‘ रणनीति अख्तियार नहीं की। साथ ही आत्ममुग्ध बीजेपी को  कड़ी टक्कर देने के  प्रयोजन से उसने ब्रांड शिवराज के मुकाबले ब्राण्ड सिंंिधया मैदान में उतार दिया ।

मध्य प्रदेश बीजेपी  की तीसरी  पारी की उम्मीद सुषमा स्वराज और अरूण जेटली से लेकर राजनाथ सिंह  तक को इसलिये  है कि उन्हें ब्राण्ड शिवराज पर जरूरत से ज्यादा यकीन है। इस ब्राण्ड की दूसरी बार सफलता के भरोसे वे इसलिये पेशगी फूले नहीं समा रहे थे कि कांग्रेस की ओर से मुकाबले में कोई ब्राण्ड न था।, जिस तरह नरेन्द्र मोदी ने लोकसभा चुनाव 2014 के संपन्न होने के करीब एक  साल पहले से  प्राइम मिनिस्टर की तरह ‘ बिहेव‘ करना शुरू कर दिया है, इसी तरह पांव पांव  वाले  भैया जी कई माह पहलीे  से ऐसा आचरण  करने लगे है मानों प्रदेश की जनता ने उन्हें चुनाव के पहले बिना  मतदान के फिर से सीएम चुन लिया हो।

मप्र में बीजेपी के पास  एक ही सिक्का है। एक मात्र सिक्का शिवराज । फकत शिवराज। कोई दूसरा सिक्का नहीं । कोई चवन्नी अठन्नी नहींे । कोई रेजगारी नहींे। सिक्का ऐसा है कि पार्टी ने सारी चिल्हर पर धूल डाल दी। मप्र में बीजेपी की दशा देखिये शिवराज कप्तान। इलेवन (एकादश) के 11 खिलाड़ियों का अता पता नहीं। शिवराज  अलोन विल प्ले द गेम। गुमान का  आलम यह है कि कप्तान को टीम की जरूरत ही नहीं। मप्र में सत्ता दल के वरिष्ठतम नेता ने जब निजी चर्चा में कहा कि शिवराज को टीम की जरूरत ही नहीं । वे तो स्वयं को महाबली मानते हैं, तो अचरज नहींे हुआ। यकीनन शिवराज को न तो मप्र की राजनीति के अपराजेय योद्धा। बाबूलाल गौर के मश्वरे की जरूरत है और न ही अपने करिश्माई व्यक्तित्व से मप्र में बीजेपी को सत्ता में लाने  वाली गैरिक वसना संन्यासिनी उमा भारती की ओैर तो और वे प्रभात झा और अनिल दवे जैसे  बौद्धिक सहयोगियों पर भी ज्यादा यकीन नहीं करते । संगठन के  कूचे से प्रभात झा की बहुत बेआबरू विदाई का सबब कोई ओर नहीं चोैहान ही थे और जावली के कमांडर अनिल माधव दबे से उनके रिश्तों का आलम यह है कि चौहान ने उन्हें  करीब एक  साल तक मिलने के लिये अपाइन्टमेंट तक  नहीं दिया। प्रभुता से मद आता हैं मद  से गुरूर ओैर गरूर गफलत पैदा करता है। इन गफलतों में सलाहकारों और नौकरशाहों ने खूब  हवा भरी हैं मलाई चाट-चाट कर भरी हवा से फुग्गा फूल गया हैं चाचा- ताऊ , बुआ- मौसी की जरूरत नहीं, बीजेपी की नैया मप्र में अकेले मामा जी पार लगायेंगे।

तो अब शिवराज मामा के मुकाबले कांग्रेस ने अपना ब्राण्ड उतार दिया हैं। इधर ब्राण्ड का ऐलान हुआ, उधर बीजेपी की जुबान फिसलने का  दौर शुरू । तरकश का पहला तीर निकला सामंतवाद का । सिंधिया से  करारा जवाब मिला । शिव राज  बूमरैंग के शिकार हुए । वे राजमाता को भूल गये। इन राजमाता विजयराजे सिंधिया को जिन्होंने बीजेपी की  मप्र में सही अर्थों में स्थापना की। शिवराज ने  बयान देने से  पेश्तर बेहतर होता कि  अपने  गुरू सुंदरलाल पटवा से  मश्वरा कर लिया होता। बीजेपी में  सखलेचा के मुकाबले पटवा की सत्ता  स्थापित हुई तो किसकी बदौलत? उमा भारती को  बीजेपी में कौन लाया? शीतला सहाय, नरेश जौहरी, जगदीश गुप्ता, दादा  सुखेन्द्र सिंह,  शेजवलकर, ईश्वर दास रोहाणी जैसे नेताओं के राजनीतिक  करियर को किसने संवारा? मप्र में  भगवा-ब्रिगेड की प्रातः स्मरणीय शख्सियत  राजमाता को एकबारगी छोड़ भी दें तो वसुंधरा राजे सिंधिया और यशोधरा राजे सिंधिया के बारे में  सामंतवादी होने का बयान किसान पुत्र शिवराज ने अब तक क्यों नहीं किया ?

वस्तुतः इस देश में आपात्काल के बाद ऐसी घटानाएं घटी हैं कि वंशवाद और  सामंतवाद के मुद्दे  अप्रासंगिक हो गये है। दरअसल शिवराज का  बयान ब्राण्ड सिंधिया के ऐलान से पैदा हुई झुरझुरी का नतीजा है। बताते हैं कि बीजेपी ने फैसला किया है कि पार्टी की ओर से जयभान पवैया, प्रभात झा और यशोधरा राजे  ज्योतिरादित्य को घेरेंगे। यदि ऐसा है तो यह चयन ही अटपटा और और हास्यास्पद है । एक ओर जहां  पवैया की सामर्थ्य को लेकर संशय है, वहीं राहुल  भैया की की गुगली के शिकार प्रभात झा, जो अपनी ही पार्टी के सखा के  दिये घाव सहला रहे हैं, आखिर किन मुद्दों को लेकर सिंधिया को घेरेंगे? रही बात यशोधरा की, सो यह सिंधिया,  घराने की परिपार्टी है कि  उसके सदस्य एक दूसरे के खिलाफ मोर्चा नहीं बांधते।

ज्योतिरादित्य के मैदान में आने, उनकी भाव भंगिमा और तेवरों से बीजेपी का  यकीन मुगालते में बदल गया है कि ब्राण्ड शिवराज का कांग्रेस के पास कोई जवाब नहीं है। जहां तकि ब्राण्ड सिंधिया की बात है, अपने घराने की गौरव  गरिमा,  पिता  स्व माधवराज सिंधिया की  बेदाग छवि और रजानीतिक  पुण्य प्रताप तथा अपने  आकर्षक व्यक्तित्व के  कारण ज्योतिरादित्य ऐसे  चमकीले  ब्राण्ड है, जिसके सामने ब्राण्ड शिवराज मलिन दीखते है। ज्योतिरादित्य  युवा हैं, डायनामिक हैं और कहीं भी परिचय के मोहताज नहीं है। इनकी कमीज बेतरह उजली है। न वहां नेपथ्य में  डंपर का शोर है और न ही शर्मा और सूर्यवंशी को प्रश्रय का लांछन । यह सिंधिया का क्रेज, उनका ग्लैमर और उनकी छवि है कि 11 सितंबर को  राजधानी भोपाल की फिजां बदली हुई नजर आयी । प्रेस कांफ्रेंस और मीट द प्रेस में उन्होंने जिस तरह प्रश्नों के उत्तर दिये, वह उनकी परिपक्वता, सोच और समझ दर्शाता है। उनके पास प्रांजल भाषा है, आकर्षक प्रभावशाली शैली है और वे स्पष्टवादी  व सकारात्मक हैं। सामंती पृष्ठभूमि के लांछन पर उन्होंने जिस तरह बीजेपी को दोमुंहेपन के लिए आड़े हाथों लिया, वह बेशक सराहनीय हैं उन्होंने  कहा कि  सामंतवाद जनम से  नहीं होता, कार्यप्रणाली से होता हैं उन्होंने यह भी कहा कि वे महाराज या श्रीमंत कहलाना  पसंद नहीं करते ।  उन्हें लालबत्ती भी पसंद नहीं और वे कम बोलने, ज्यादा करने में भरोसा रखते हैं।

ताजा फैसले से  कांग्रेस की यह कोशिश साफ नजर आती है कि ज्योतिरादित्य की फेस वैल्यू और बेदाग छवि को भुनाया जाये। पार्टी सूत्रों के अनुसार राहुल गांधी मानते हैं कि ज्येातिरादित्य युवाओं को बखूबी आकर्षित कर सकते हैं । प्रतीत होता है कि सिंधिया को इस  आशय का संकेत बहुत पहले मिल गया था, नतीजतन वे चंबल- ग्वालियर के अलावा  मालवा, निमाड़, बुंदेलखंड के दौरे कर चुके है। मुरैना  रैली में उनका स्पष्ट प्रभाव परिलक्षित हुआ । राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना के जरिये वे करीब तीन दर्जन जिलों में सभायें कर चुके है। उन्होंने किसान सम्मेलनों में भी शिरकत की है। एक बड़ी  बात  जो भाजपा भूल रही है, यह है कि ज्योतिरादित्य के पास पिता और  पितामही का जादुई ताबीज है। यह ताबीज आसन्न चुनाव में असर दिखायेगा । राजमाता कभी मध्य प्रदेश की राजनीति में नयी इबारतें लिखने का सबब बनी थीं और माधव ……..? माधव राव तो इस महादेश की राजनीति के अपराजेय योद्धा थे । यह उनकी अपार लोकप्रियता ही थी कि उन्होंने देश के तीन बार प्रधानमंत्री रहे अटलबिहारी  वाजपेयी को पौने दो लाख मतों से शिकस्त दी थी। बीजेपी के आत्ममुग्ध पुरोधाओं  को यादव होगा कि  तब अटल जी ने मतगणना समाप्ति के पूर्व ही विनम्रतापूर्वक अपनी पराजय स्वीकार कर ली थी।

कहते हैं कि इतिहास अपने को दोहराता है । क्या मध्य प्रदेश में किंचित भिन्नता के साथ इतिहास दोहराया जायेगा? इस फैसले में अभी थोड़ा व समय है किंतु अभी यह देखना दिलचस्प होगा कि ब्राण्ड सिंधिया के मुकाबले के लिये सरकारी टकसाल में  गढ़े ब्राण्ड शिवराज की ओर से क्या रणनीति  अख्तियार की जाती है? इस बीच  नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह लोकायुक्त के  सम्मुख इस आशय की शिकायत दर्ज कर चुके हैं कि सीएम शिवराज ने तीन माह में खुद की ब्रांडिंग पर 500 करोड़ रूपये  खर्च किये हैं।

डा. सुधीर सक्सेना मध्य प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं. वर्षों तक 'माया' के ब्यूरो प्रमुख रहे हैं. वर्तमान में 'दुनिया इन दिनो' मैग्जीन के संपादक हैं. उनसे संपर्क 09711123909 या 09425022404 के जरिए किया जा सकता है.

`गवर्नेंस नाउ’ के को-आर्डिनेटिंग एडिटर दीपक रस्तोगी को ‘केसी कुलिश इंटरनेशनल मेरिट अवार्ड’

'गवर्नेंस नाउ’ के को-ऑर्डिनेटिंग एडिटर दीपक रस्तोगी को 'केसी कुलिश अवार्ड फॉर एक्सेलेंस इन प्रिंट जर्नलिज्म’ का 'मेरिट अवार्ड’ प्रदान करने की घोषणा की गई है। 3० अक्टूबर को राष्ट्रपति भवन में पुरस्कार समारोह रखा गया है। राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी पुरस्कार प्रदान करेंगे। राजस्थान पत्रिका समूह द्बारा अखबारी जगत में उल्लेखनीय पत्रकारिता के लिए यह पुरस्कार दिया जाता है। इसके लिए दुनिया भर के अखबारों में छपी खोजी खबरों की समीक्षा की जाती है। वर्ष 2०1० में केन्द्रीय विषय था- 'क्रूसेड अगेन्स्ट करप्शन’ (भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग)।

'केसी कुलिश अवार्ड फॉर एक्सेलेंस इन प्रिंट जर्नलिज्म’ की जूरी ने दीपक रस्तोगी की जमीन घोटाले पर खोजी खबरों की सिरीज को मेरिट अवार्ड श्रेणी में शीर्ष पर रखा। कोलकाता समेत बंगाल के विभिन्न हिस्सों में कुल 57,००० एकड़ जमीन के घोटाले को लेकर नई दुनिया के नई दिल्ली संस्करण में 13 दिसंबर 2००9 से 2० फरवरी 2०11 के बीच पांच खोजी खबरें छपी थीं। इन खोजी खबरों का व्यापक असर हुआ। वाममोर्चा की एक पूर्व सांसद के पति, बेटे, दामाद, दो उद्योगपतियों समेत तीन दर्जन से अधिक गिरफ्तार किए गए। सरकारी एजेंसियों ने फिलिप्पींस और सिंगापुर में हवाला से धन भेजे जाने की जांच शुरू की।

टाइम्स ऑफ इंडिया में 'सेंसिटिव टेक टू न्यू फर्म अंडर अ क्लाउड’ शीर्षक से छपी रिपोर्ट को अवार्ड श्रेणी पुरस्कार के लिए चुना गया है। 'क्रूसेड अगेन्स्ट करप्शन’ की जूरी के सदस्यों के नाम इस प्रकार हैं- सैम मिलर (बीबीसी के भारत प्रमुख), टीएन शेषन (पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त), प्रॉन्जय गुहा ठाकुरता (वरिष्ठ पत्रकार), जीबी एंडरसन (न्यूयार्क टाइम्स की न्यूज सर्विस डिवीजन के वाइस प्रेसीडेंट), एचके दुुआ (राज्यसभा सदस्य, हिंदुस्तान टाइम्स के पूर्व संपादक और इंडियन एक्सप्रेस के पूर्व प्रधान संपादक), पीयूष पांडे (विज्ञापन गुरू), एन राम (द हिंदू के पूर्व प्रधान संपादक और कम्युनिस्ट विचारधारा के चिंतक), अरुणा राय (पूर्व आईएएस और समाजसेवा में मैग्सेसे पुरस्कार विजेता), एस गुरुमूर्ति (मीडिया सलाहकार), वाईके अलघ (पूर्व केन्द्रीय मंत्री और जाने-माने शिक्षाविद), बकुल ढोलकिया (आईआईएम अहमदाबाद के प्रोफेसर और विश्व बैंक के सलाहकार) और एन रविचंद्रन (आईआईएम इंदौर के निदेशक)।

हिंदी पत्रकारिता में पिछले 23 साल से सक्रिय दीपक रस्तोगी देश के जाने-माने मीडिया हाउसेज में अहम जिम्मेदारियां संभाल चुके हैं। बेहद लो प्रोफाइल मेंटेन करने वाले दीपक रस्तोगी को संपादकीय की हर विधा पर मजबूत पकड़ के साथ ही प्रोडक्शन और मार्केटिंग की भी नब्ज का जानकार माना जाता है। प्रिंट, टेलीविजन और वेब पत्रकारिता में समान रूप से कमांड रखने वाले दीपक रस्तोगी `जनसत्ता', कोलकाता, `ज़ी न्यूज़' (ब्यूरो चीफ, बंगाल), `राजस्थान पत्रिका' (संपादकीय प्रभारी, कोलकाता और जयपुर), `अमर उजाला' (समाचार संपादक, प्रभारी- सी डेस्क, कॉरपोरेट मुख्यालय, नोएडा), `नई दुनिया' (रीजनल एडिटर, कोलकाता और दिल्ली) में काम कर चुके हैं।


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राजनाथ सिंह का क्षत्रिय पराक्रम

लखनऊ : एन मौके पर समाजवादी पार्टी ने निर्दल दबंग क्षत्रिय विधायक रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया को साध लिया। राजा को लाल बत्ती (कैबिनेट मंत्री) देकर सपा नेतृत्व ने भाजपा के मंसूबों पर पानी फेर दिया। इसके साथ ही राजा के भाजपा में आने की चर्चाओं पर भी विराम लग गया। लेकिन सपा एक अन्य दबंग ठाकुर नेता बृज भूषण शरण सिंह को नहीं रोक सकी। उन्होंने सांसदी का टिकट ठुकरा कर समाजवादी पार्टी को बॉय-बॉय कह दिया।

कैसरगंज के सपा सांसद बृजभूषण शरण सिंह ने आजकल भाजपा से काफी करीबी बना रखी है। वैसे, इस सच्चाई को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता है कि सपा में आने से पूर्व वह भाजपा के टिकट से तीन बार संसद पहुंच चुके हैं। उनकी छवि कट्टर हिन्दुवादी नेता के रूप में होती थी। लाल कृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा और अयोध्या मंदिर आंदोलन में भी भूषण ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। भाजपा बृज को गोंडा या फैजाबाद से मैदान में उतार सकती है। दंगों के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट नेता सोमपाल शास़्त्री के बाद बृजभूषण शरण सिंह दूसरे ऐसे नेता हैं जिन्होंने सपा का लोकसभा का टिकट ठुकरा दिया है। बृजभूषण की नाराजगी की वजह उनके क्षेत्र में विकास के काम नहीं हो पाने के अलावा पश्चिमी यूपी में ठाकुर नेताओं का उत्पीड़न भी था। गौरतलब हो शास़्त्री ने मुजफ्फरनगर दंगों में सपा सरकार की भेदभाव पूर्ण नीति और जाट बिदादरी के ऊपर हो रहे अत्याचार के खिलाफ सपा का टिकट ठुकराया था। बृजभूषण बहराइच में होने वाली नरेन्द्र मोदी की रैली में भाजपा में लौटने की घोषणा कर सकते हैं।

बात राजा भैया और राजनाथ सिंह की कि जाये तो यह साफ हो जाता है कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह और रघुराज प्रताप सिंह जिनके बीच पहले भी काफी अच्छे संबंध थे, पिछले कुछ दिनों काफी निकटता देखी जा रही थी। आजम के चलते राजा सपा अलाकमान से नाराज थे और आजम से मुलाकात के बाद ही वह उदार हुए थे। बदले हालात के बाद भी इतना जरूर कहा जा सकता है कि राजा भैया ने जो निर्णय लिया है, वह सपा से क्षत्रियों की नाराजगी कोई खास नहीं कम कर पायेगा। न राजा ही अपने साथ हुए दुर्व्यवहार को भूल पायेंगे कि किस तरह आजम के कहने पर सपा ने उन्हें दूध की मक्खी की तरह निकाल कर फेंक दिया था।

खैर, राजनाथ जो स्वयं ठाकुर नेता हैं, उत्तर प्रदेश में भाजपा के पक्ष में क्षत्रियों की एक सशक्त लॉबी तैयार करना चाहते हैं, ताकि भाजपा तो मजबूत हो ही उनकी ताकत भी बढ़े। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दंगों ने राजनाथ की राह काफी आसान कर दी थी। दस जनपथ के कभी काफी करीबी रहे सुल्तानपुर के सांसद संजय सिंह पर भी भाजपा डोरे डाल रही है। संजय के आजकल कांग्रेस आलाकमान से वैसे रिश्ते नहीं रह गये हैं जैसे पहले हुआ करते थे। इसके अलावा सुल्तानपुर और अमेठी में जिस तरह से कांग्रेस कमजोर हो रही है, उसे देखने हुए भी संजय सिंह पाला बदलने में ही भलाई समझ रहे हैं। भाजपा सुल्तानपुर से वरूण गांधी को चुनाव लड़ाना चाह रही है, जबकि कुछ कांग्रेसी सुल्तानपुर से प्रियंका को चुनाव मैदान में उतारने के लिये ताल ठोंक रहे हैं।

बताते हैं कि राजनाथ सिंह ठाकुर नेता संजय सिंह को ट्रम्प कार्ड के रूप में अमेठी से राहुल गांधी के खिलाफ भी उतार सकते हैं। अगर संजय जीत गये तो भाजपा की बल्ले-बल्ले हो जायेगी और हार भी गये तो खोने के लिये उनके पास कुछ भी नहीं रहेगा। संजय को पार्टी में हार के बाद भी पूरा सम्मान दिया जायेगा। संजय को पता है कि वरूण के चुनाव मैदान में कूदने से उनकी जीत फंस सकती है, इसलिए वह भाजपा का दामन थामने में ही भलाई समझ रहे हैं। संजय सिंह की पत्नी अमिता सिंह भी राजनीति के मैदान में हैं। वह पिछला विधान सभा चुनाव अमेठी से कांग्रेस के टिकट पर लड़ी थीं और हार गई थीं। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह अपने गृह राज्य को लेकर काफी गंभीर हैं। वह नहीं चाहते हैं कि उनके ऊपर यह आरोप लगे कि उनकी अपनी ही बिरादरी में कोई पकड़ नहीं है तो वह प्रदेश में भाजपा के पालनहार कैसे बन सकते हैं।

लेखक अजय कुमार लखनऊ में पदस्थ हैं. वे यूपी के वरिष्ठ पत्रकार हैं. कई अखबारों और पत्रिकाओं में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं. अजय कुमार वर्तमान में ‘चौथी दुनिया’ और ‘प्रभा साक्षी’ से संबद्ध हैं.


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भड़ास पर अजय कुमार

राजेंद्र यादव ने तरह-तरह के एसएमएस भेजे, वे साहित्यिक व्यक्ति हैं, इसलिए उनकी धमकी भी साहित्यिक भाषा में थी : ज्योति कुमारी

लेखिका ज्योति कुमारी की जुबानी उनकी अपनी कहानी… (भाग दो) : इन सारी घटनाओं के दौरान जब मैं थाने में बैठी थी। मेरे मित्र मज्कूर आलम के पास फोन किया जा रहा था। मज्कूर आलम उस दिन अपने घर बक्सर (बिहार) में थे। उन्हें फोन पर बताया जा रहा था- ‘ज्योति थाने में है। यह अच्छा नहीं है। उसे वापस बुला लीजिए।’

मैंने सुना थाने में कई लोगों से कह कर फोन कराया गया। दबाव बनाने के लिए। यदि यह बात सच है तो दिल्ली पुलिस की सराहना की जानी चाहिए कि वे किसी के दबाव में नहीं आए। मैं अकेली रात एक बजे तक थाने में बैठी रही। इस बीच मेरा एमएलसी (मेडिकल लीगल केस) कराया गया। मैं वहां देर रात तक इसलिए बैठी रही क्योंकि मैंने तय कर लिया था, जब तक मेरा एफआईआर (फर्स्ट इन्फॉरमेशन रिपोर्ट) नहीं हो जाता, मैं वहां से हिलूंगी नहीं। मेरे एमएलसी में आ गया कि चोट है। ईएनटी में दिखलाया, वहां कान के चोट की भी पुष्टि हो गई। एक बजे रात में एक लेडी कांस्टेबल मुझे घर तक छोड़ कर गई।

मुझे जानकारी मिली कि मेरे घर आने के थोड़ी देर बाद ही प्रमोद को छोड़ दिया गया। उसके बाद दो महीने तक केाई कार्यवायी नहीं हुई। मै अपने कान के दर्द से परेशान थी। मुझे चोट लगी थी। दो महीने तक पुलिस की तरफ से कोई कार्यवायी नहीं हुई। पुलिस की जांच पड़ताल चल रही होगी, यह अलग बात है। उन्होंने दो महीने तक एक जुलाई की घटना के लिए सीआरपीसी की धारा 164 में मेरा बयान भी  नहीं कराया।

घटना के अगले दिन दो जुलाई को राजेन्द्र यादव का फोन आया मेरे पास। उन्होंने कहा -‘क्या मिल गया, पुलिस में बयान दर्ज कराके। लड़का छूट गया। लड़का घर आ गया।’

मैंने जवाब दिया- ‘क्या हो गया यदि प्रमोद छूट कर आ गया। मैंने वही किया जो मुझे करना चाहिए।’

फिर राजेन्द्र यादव ने कहा- ‘अच्छा ऐसा कर शाम छह बजे मेरे घर आ जा।’

मैंने जवाब में कहा- ‘अब मैं आपके घर कभी नहीं आने वाली।’

राजेन्द्र यादव- ‘कभी नहीं आना, आज आ जा।’

ज्योतिः ‘क्यों आज ऐसा क्या खास है कि मुझे इतना कुछ हो जाने के बाद भी आपके घर आ जाना चाहिए।’

राजेन्द्र यादवः ‘मैंने पुलिस वाले को कह दिया है, वकील को भी बुला लिया है। तू भी आ जा। प्रमोद भी रहेगा। वह तुझे सॉरी बोल देगा। बात खत्म हो जाएगी।’

ज्योतिः ‘उसे पब्लिकली सॉरी बोलना होगा। उसने इतनी बूरी हरकत की है मेरे साथ। तब मैं माफ करूंगी। मुझे लगता है कि जिसे वास्तव में महसूस होगा कि उसने गलती की है, वह सार्वजनिक तौर पर माफी मांगेगा। जब कोई महसूस करता है, अपनी गलती तो उसे सार्वजनिक तौर पर गलती की माफी मांगनी चाहिए। यदि वह सार्वजनिक तौर पर माफी मांगेगा तो उसे सुधरने और अच्छा बनने का एक मौका दिया जा सकता है। उस माफी के बाद भी उसकी हरकतें नहीं बदलती तो उस पर फिर कार्यवायी होनी चाहिए लेकिन प्रमोद को एक मौका मिलना चाहिए, इस बात के मैं हक में हूं।’

राजेन्द्र यादवः ‘फिर ऐसा कर, सोनिया गांधी को बुला ले, मनमोहन सिंह को बुला ले, ओबामा को बुला ले। रामलीला मैदान में माफी मांगने का सार्वजनिक कायक्रम रख लेते हैं।’

ज्योतिः ‘आपको जो भी लगे लेकिन जब तक वह सार्वजनिक तौर पर माफी नहीं मांग लेता, मैं माफ नहीं करूंगी।’

जब मेरी और राजेन्द्र यादव की फोन पर यह बात हो रही थी, मीडिया और साहित्य में बहुत से लोगों को इस घटना की जानकारी हो चुकी थी। बहुत से लोगों के फोन आने लगे थे।
एक दिन पहले यानि एक जुलाई को जिस दिन दुर्घटना हुईं, जब मैं पुलिस के आने का इंतजार कर रही थी, उसी वक्त साहित्यिक पत्रिका पाखी के संपादक प्रेम भारद्वाज राजेन्द्र यादव के घर आए थे। प्रेम भारद्वाज जब भी पाखी का नया अंक आता है, उसे देने के लिए वे स्वयं हर महीने राजेन्द्र यादव के घर आते हैं। उस दिन भी वे पाखी देने ही आए थे। जब प्रेम भारद्वाज वहां पहुंचे तो उन्होंने मेरी हालत देखी। राजेन्द्र यादव ने प्रेम भारद्वाज के हाथ से पाखी लेकर बोला- ‘ठीक है, ठीक है। अब जाओ।’

मैंने कहा- ‘प्रेम भारद्वाज जाएं क्यों, उन्हें भी पता चलना चाहिए, आपके घर में क्या हुआ है?

प्रेम भारद्वाज ने पूछा – ‘क्या हुआ?’

राजेन्द्र यादव का जवाब था- ‘कुछ नहीं हुआ, तुम जाओ यहां से।’

प्रेम भारद्वाज के जाने के बाद पुलिस आई। पुलिस के आने का जिक्र मैं पहले कर चुकी हूं। राजेन्द्र यादव द्वारा दिया गया, शराब पीने का ऑफर जब दिल्ली पुलिस ने ठुकरा दिया और इस बात पर भी सहमत नहीं हुए कि किसी स्त्री पर हमला छोटी बात होती है तो राजेन्द्र यादव को लगा कि यह बात उनसे अब नहीं संभलेगी। उन्होंने किशन को कहा- ‘भारत भारद्वाज को फोन मिलाओ।’

जब तक भारत भारद्वाज आए, पुलिस दरवाजे तक आ चुकी थी। भारत भारद्वाज ने आते ही कहा- ‘मैं डीआईजी हूं आईबी डिपार्टमेन्ट में। आप पहले मुझसे बात कीजिए, उसके बाद प्रमोद को लेकर जाइएगा। ’

मैंने वहीं पर कहा- ‘ये रिटायर हो चुके हैं।’

मैने देखा, प्रेम भारद्वाज गए नहीं थे। वे भारत भारद्वाज के साथ लौट आए थे। हो सकता है कि वे भारत भारद्वाज के पास पत्रिका देने गए हों और राजेन्द्र यादव का फोन आ गया हो।

भारत भारद्वाज ने फिर पूछा- ‘क्या हुआ?’

मैंने पूरी कहानी उन्हें बताई, यह भी बताया कि घटना के बाद मैंने शिकायत की है और मेरी शिकायत पर पुलिस आई है।

भारत भारद्वाज फिर राजेन्द्र यादव के लिए, सलाह देने में व्यस्त हो गए। अनंत विजय को बुला लो, उसके एक भाई सुप्रीम कोर्ट में वकील हैं। पुलिस ने भारत भारद्वाज से कहा- ‘सर आपको जो भी बात करनी है, थाने में आकर करिए।’

जब एक महिला के साथ बलात्कार होता है या फिर बलात्कार की कोशिश होती है। लड़की की इससे सिर्फ शरीर की क्षति नहीं होती। उसका मन भी टूटता है। हमले का मानसिक असर भी गहरा होता है। मेरे साथ जो हुआ, मैं उससे अभी तक बाहर निकल नहीं पाई हूं। यह अलग बात है कि मैं लड़ रही हूं। मैने हिम्मत नहीं हारी है। कानूनी रूप से जो कर सकती थी, कर रही हूं। लेकिन इस घटना का मेरे अंदर जो असर हुआ है, उसे सिर्फ मैं समझ सकती हूं। इस तरह के अपराध के लिए समझौता कभी नहीं हो सकता है। कोई ऐसे मामले में समझौता शब्द का इस्तेमाल करता है, इसका मतलब है कि वह लड़की के साथ अन्याय करता है। मैंने इस अन्याय को भोगा है। इस तरह के मामले में समझौते की बात कहीं आनी नहीं चाहिए।

मैं ना समझौते के लिए कभी तैयार थी, ना हूं और ना इस मामले में आने वाले समय में समझौता करूंगी। यह संभव है कि कोई गलती करता है और अंदर से इस बात को महसूस करता है और माफी मांगता है तो उसे माफ करके एक मौका दिया जा सकता है। समझौता और माफी देने में अंतर होता है। यदि मैं प्रमोद को माफ करने पर विचार कर रही हूं तो इसे समझौता बिल्कुल ना कहा जाए। यह शब्द एक पीड़ित लड़की के लिए अपमानजनक है। एक तो लड़की के साथ गलत हुआ है। लड़की ने उसे भुगता। उस पीड़ा के शारीरिक मानसिक असर से लड़की गुजरी। अब उस पीड़ा से जुझ रही लड़की से अपराधी को माफ करने के लिए कहा जा रहा है और उसे समझौता नाम दिया जा रहा है। यह ऐसा ही है जैसे किसी ने पीड़ा से गुजर रही लड़की को दो थप्पड़ और मार दिया हो। वही सारी घटनाएं फिर एक बार मेरे साथ दुहराई जा रही हों। इसलिए समझौता नहीं, प्रमोद के लिए माफी शब्द का इस्तेमाल होना चाहिए। यदि उसे अपनी गलती का एहसास है तो जरूर उसे एक मौका मिलना चाहिए।

अकेला प्रमोद इस गुनाह में शामिल है या फिर कुछ और लोग भी प्रमोद के पीछे इस गुनाह में शामिल हैं। इसका सही-सही जवाब राजेन्द्र यादव दे सकते हैं। मान लीजिए प्रमोद ने किसी के बहकाने पर यह सब किया। पैसा लेकर किया। लेकिन सच यह है कि मेरे साथ अपराध प्रमोद ने किया। मेरा अपराधी प्रमोद है। उसने ऐसा कदम क्यों उठाया? इसका जवाब प्रमोद दे सकता है।

सच्चाई है कि राजेन्द्र यादव ने मेरा वीडियो नहीं बनाया, मुझ पर शारीरिक हमला भी नहीं किया। फिर भी मैने हंस का बहिष्कार किया। इसके पीछे वजह यही है कि राजेन्द्र यादव स्त्री सम्मान की बात करते हैं लेकिन जब उनके सामने स्त्री सम्मान पर हमला हुआ तो वे चुप थे। प्रमोद को पहले दिन थाने से निकलवाने में राजेन्द्र यादव की अहम भूमिका रही। प्रमोद के खिलाफ एफआईआर ना हो, इसमें राजेन्द्र यादव की पूरी भूमिका रही। वह नहीं रुकवा पाए, यह अलग बात है, लेकिन उन्होंने जोर पूरा लगा लिया था। पहले दिन जब प्रमोद थाने से छूट कर आया तो उनके घर में ही था। उनके घर में वह काम करता रहा। उसकी दूसरी बार दो महीने बाद गिरफ्तारी उनके घर से ही हुई। यदि कोई लड़का आपके यहां काम करता हो तो यह बात समझ में आती है कि वह आपके नियंत्रण में ना हो और उसका अपराध आपकी जानकारी में ना हो। लेकिन जब राजेन्द्र यादव एक जुलाई की घटना के चश्मदीद हैं, सबकुछ उनकी आंखों के सामने घटा है, वे कम से कम प्रमोद से अपना रिश्ता खत्म कर सकते थे। प्रमोद उनके घर में रहा और काम करता रहा। इतना ही नहीं, उलट राजेन्द्र यादव मुझपर ही दबाव बनाते रहे कि समझौता कर लो। केस वापस ले लो। उनकी तरफ से कई लोगों के फोन आ रहे थे- ‘तुम्हारा साहित्यिक कॅरियर चौपट हो जाएगा। तुम साहित्य से बाहर हो जाओगी।’

मैं नहीं मानी।

राजेन्द्र यादव ने तरह-तरह के एसएमएस भी मेरे पास भेजे। वे साहित्यिक व्यक्ति हैं, इसलिए उनकी धमकी भी साहित्यिक भाषा में थी।

‘तुम जो कर रही हो, समझो इसमें सबसे अधिक नुक्सान किसका है?’

‘मूर्ख उसी डाल को काटता है, जिस पर बैठा होता है।’

‘तुम्हें आना तो मेरे पास ही पड़ेगा।’

यह सारे एसएमएस मेरे पास सुरक्षित हैं। 27 जुलाई को राजेन्द्र यादव का फोन आया- ‘प्रमोद माफी मांगने को तैयार है। लेकिन सार्वजनिक माफी से पहले, वहां कौन-कौन से लोग होंगे, यह तय करने के लिए हम लोग मिले। मिलकर बात करते हैं। वह मिलकर भी तुमसे माफी मांग लेगा और सार्वजनिक तौर पर भी माफी मांग लेगा। मिलने की जगह नोएडा (उत्तर प्रदेश), सेक्टर सोलह का मैक डोनाल्ड तय हुआ।

बात हुई थी माफी मांगने की लेकिन प्रमोद वहां भी मुझे धमकाने लगा। अपना केस वापस ले लो वर्ना मार के फेंक देंगे। लाश का भी पता नहीं चलेगा। किशन भी साथ दे रहा था। उस दिन मज्कूर आलम मेरे साथ थे। राजेन्द्र यादव उनके द्वारा सार्वजनिक माफी के लिए सुझाए जा रहे सारे नामों को एक-एक करके खारिज कर रहे थे। मानों घर से राजेन्द्र यादव प्रमोद के साथ सार्वजनिक माफी की बात सोचकर निकले हों और यहां आकर बदल गए हों। नामों को लेकर राजेन्द्र यादव की आपत्ति कायम थी। नहीं यह नहीं होगा। इसे क्यों बुलाएंगे। ऐसा करो कि वकील को बुला लेते हैं। बात खत्म करो।

उनका यह रूख देखकर मुझे हस्तक्षेप करना पड़ा।

‘जब मैंने स्पष्ट कर दिया है कि सार्वजनिक माफी से कम पर बात नहीं होगी और आपको यह स्वीकार्य नहीं है तो मिलने के लिए क्यों बुलाया?’

राजेन्द्र यादव का वहां बयान था- ‘अब मैं और तुम आमने-सामने हैं। अब प्रमोद से तुम्हारी लड़ाई नहीं है। यदि तुमने मेरी बात नहीं मानी तो अब तुम्हारी लड़ाई मुझसे है।’

इस घटना से पहले मैं राजेन्द्र यादव को ई मेल पर हंस और राजेन्द्र यादव के बहिष्कार की सूचना दे दी थी। उन्होंने हंस के अंक में मेरी कहानी की घोषणा की थी। मैंने कहानी देने से मना कर दिया। मैं ऐसी पत्रिका को कहानी नहीं दे सकती, जिसका दोहरा चरित्र हो। मेरे ई मेल भेजे जाने के बाद भी उन्होंने मेरी समीक्षा छाप दी। (यह बातचीत हंस, अक्टूबर 2013 अंक आने से पहले हो चुकी थी, उस वक्त हंस में ‘समीक्षा’ के लिए राजेन्द्र यादव की माफी नहीं छपी थी) मैने जो ई मेल राजेन्द्र यादव को भेजा था, उसमें साफ शब्दों में लिख दिया था कि मेरा निर्णय समीक्षा पर भी लागू होता है। इसके बावजूद उन्होंने समीक्षा छाप दी। समीक्षा छापने के बाद उन्होंने मुझे सूचना भी नहीं दी। मेरी लेखकीय प्रति अब तक मेरे पास नहीं आई।

मेरे पास एक परिचित का फोन आया, तुमने हंस का बहिष्कार किया है और तुम्हारी समीक्षा हंस में छपी है। यह फोन आने के बाद  मैने राजेन्द्र यादव को फोन किया। उनकी पत्रिका 20-21 से पहले कभी प्रेस में नहीं जाती है लेकिन राजेन्द्र यादव ने कहा- इस बार पत्रिका 18 को ही प्रेस में चली गई। इसलिए समीक्षा रोक नहीं पाए। मैने कहा- आप अगले अंक में छाप दीजिएगा कि समीक्षा कैसे छप गई? जिससे पाठकों में भ्रम ना रहे। राजेन्द्र यादव ने उस वक्त कहा कि ठीक है। तीन दिनों बाद राजेन्द्र यादव का फोन आया- ‘समीक्षा छापने का निर्णय संजय सहाय का था, इसलिए वही बताएंगे कि क्या जाएगा?’

मैने राजेन्द्र यादव से कहा- ‘आप संजय सहाय से बात करके खबर करवा दीजिएगा।

उनकी तरफ से कोई फोन नहीं आया। मैंने फिर उन्हें ई मेल किया। आपने स्पष्टीकरण की बात कही थी, आप इस बार हंस में क्या छाप रहे हैं, आपका जवाब नहीं आया। इस ई मेल का जवाब नहीं आया तो मैने एक और ई मेल उन्हें लिखा। लेकिन उसका जवाब भी नहीं आया।

जब हंस का सितम्बर अंक हाथ में आया, उसमें राजेन्द्र यादव ने मेरे लिए अपमानजनक बातें लिखी थी। जो उन्हें लिखना था, ज्योति ने हंस का बहिष्कार किया है। वह कहीं नहीं लिखा। उन्होंने मना करने के बावजूद समीक्षा छापने की बात भी कहीं नहीं लिखी। जब तक मैं उनके पास काम कर रही थी, तब तक बहुत अच्छी थी। जब मैने उनके घर में हुए गलत हरकत का विरोध किया तो उन्होंने मेरा साथ नहीं दिया। जब मैने उनका और उनकी पत्रिका का बहिष्कार किया तब उनको याद आया कि मेरा काम दस हजार के लायक भी नहीं था। यदि मेरा काम अच्छा नहीं था तो मुझे हंस में अपने पास रखा क्यों था? निकाला क्यों नहीं? मैंने तो कभी उनसे चंदा नहीं मांगा। क्या राजेन्द्र यादव जबर्दस्ती चंदा बांटते हैं। यदि राजेन्द्र यादव जबर्दस्ती चंदा बांटते है तो फिर यह चंदा सिर्फ ज्योति को क्यों? यदि चंदा ही दे रहे थे तो फिर बदले में इतना काम क्यों लेते थे?

…जारी…

आशीष कुमार अंशु
आशीष कुमार अंशु
युवा पत्रकार आशीष कुमार अंशु के 'बतकही' ब्लाग से साभार.


आशीष कुमार अंशु के ब्लाग में ज्योति कुमारी की कहानी के दूसरे भाग से पहले ये टिप्पणी प्रकाशित हुई है, जिसे हूबहू दिया जा रहा है: जैसा कि इस श्रृंखला के पहले अंक में लिखा गया था कि यह कहानी अधूरी है, जब तक राजेन्द्र यादव का पक्ष इसके साथ नहीं जुड़ जाता। इस संबंध में बतकही की तरफ से राजेन्द्र यादव से उनका पक्ष को जानने के उद्देश्य से फोन किया गया था, श्री यादव के अनुसार- इस संबध में उनके पास कहने के लिए कुछ नहीं है। राजेन्द्रजी का पक्ष अभी भी हमारे लिए महत्वपूर्ण है। यदि उनका पक्ष नहीं आता तो ज्योति के बयान पर उनका यह मौन, ‘सहमति’ माने जाने का भ्रम उत्पन्न करेगा। वैसे राजेन्द्र यादव के शुभचिन्तक कह रहे हैं कि राजेन्द्र यादव ब्लॉग को गंभीर माध्यम नहीं मानते, यदि उन्हें जवाब देना होगा तो हंस के नवम्बर अंक में अपने संपादकीय के माध्यम से देंगे। वास्तव में हमारे लिए यह महत्वपूर्ण नहीं है कि उनका पक्ष कहां आता है, किसके माध्यम से हम सबके बीच आता है। महत्वपूर्ण यह है कि उनका पक्ष सबके सामने आए। बहरहाल ज्योति कुमारी की बातचीत का दूसरा भाग यहां प्रकाशित कर रहे हैं। इस बातचीत को साक्षात्कार या रिपोर्ट कहने से अच्छा होगा कि हम बयान कहें। चूंकि पूरी बातचीत एक पक्षीय और घटना केन्द्रित है। यहां गौरतलब है कि दूसरा पक्ष जो राजेन्द्र यादव का है, उन्होंने इस विषय पर बातचीत से इंकार कर दिया है। फिर भी उनका पक्ष उनकी सहमति से कोई रखना चाहे तो स्वागत है। यदि राजेन्द्र यादव स्वयं अपनी बात रखें तो इससे बेहतर क्या होगा.


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जब मैं समझ गई कि राजेंद्र यादव के घर से बच कर निकलना नामुमकिन है, तब मैंने सौ नंबर मिलाया

लोग मुझे याद करेंगे मेरे मर जाने के बाद : डॉ लोहिया

: 12 अक्टूबर पुण्यतिथि पर : इस देश के अनोखे नेता डॉ राममनोहर लोहिया को आज याद करने का दिन है. वही डॉ लोहिया जिसने उस वक्त जर्मनी से अर्थशास्त्र में पीएचडी किया जब हिटलर उभर रहा था और उनके अपने विचारों के कारण उनके प्रोफ़ेसर ने उनका पीएचडी का इन्टरव्यू समय से पहले करवा दिया ताकि हिटलर के सत्ता में आने से पहले वे जर्मनी छोड़ दें. वही डॉ लोहिया जो जर्मनी गए तो जर्मन नहीं जानते थे और जर्मन जाने बिना वहां छात्र नहीं बन सकते थे तो उन्होंने अपने प्रोफ़ेसर से केवल दो महीने का समय मांगा और जब दो माह बाद वो दुबारा अपने प्रोफ़ेसर से मिले तो जर्मन बोलते हुए मिले.

वही डॉ लोहिया जो देश के करो या मरो नारे के मुख्य चिन्तक थे और गाँधी जी को इस हद तक ले जाने के लिए उन्हें पूरे एक हफ्ते तक उनके साथ रह कर तर्क करना पड़ा था. वही डॉ लोहिया जिन्होंने १९४२ में जब सारे नेता जेल चले गए थे तो भूमिगत रह कर देश की आजादी की लड़ाई को धार दिया.

वही डॉ लोहिया जिनको लाहौर की जेल में आजादी की लड़ाई के लिए भारी यातनाएं दी गयी थी और फिर भी नहीं झुके थे. वही डॉ लोहिया जिनको गाँधी जी ने कलकत्ता बुला लिया था जब देश आजादी का जश्न मना रहा था, उस वक्त रक्तपात से डूबे कलकत्ता को शांत करने के लिए. ये अलग बात है कि उनका जिक्र नहीं होता है. वही डॉ लोहिया जिनको गाँधी जी ने पहले देश के सरकार में मंत्री बन कर जिम्मेदारी लेने को कहा पर लोहिया जी की दृष्टि और चिंतन को सुनकर उन्हें ३० जनवरी की शाम को राजनीतिक चर्चा के लिए बुलाया था. पर उस दिन जब लोहिया वहा पहुंचने वाले थे तो कुछ दूर पहले उन्हें पता लगा कि बापू की फासीवादी ताकतों ने हत्या करा दिया, वर्ना कोई राजनीतिक तस्वीर उभर सकती थी.  

देश के वणिक समाज के लोग अपने कार्यक्रम में उनकी फोटो लगाते हैं और उनको अपने समाज का गौरव बताते हैं और वे ये भूल जाते हैं तथा इसका जिक्र भी नहीं करना चाहते  कि उसी डॉ लोहिया ने इस देश में जाति तोड़ो अभियान चलाया था और तमाम लोगों ने अपने नाम से जाति का नाम हटा दिया था. ये लोग ये भी याद नहीं रखना चाहेंगे कि उसी डॉ लोहिया ने कई लाखों जनेऊ तुड़वा कर जलवा दिया था. ये तो बिलकुल याद नहीं रखना चाहिए कि उसी डॉ लोहिया ने ''संसोपा ने बाँधी गांठ – पिछड़े पाए सौ में साठ'' का नारा दिया था, जिसने मण्डल कमीशन की बुनियाद रखा. पर उनके नाम के साथ उनकी जाति चिपकाते हुए बताया जाता है की डॉ लोहिया भी दरअसल बनिया थे और डॉ लोहिया को शायद इससे बड़ी गाली दी भी नहीं जा सकती जो उन्हें अपने कद से बहुत छोटा बना देती है.

कुछ दूसरे हम जैसे लोग भी उन्हें शायद याद करेंगे जो उनके चित्र से अपने ड्राइंग रूम या ऑफिस सजाते हैं. हम जैसे लोग उनके इतिहास को याद करने की कोशिश करेंगे, उन्हें याद करने की कोशिश करेंगे केवल एक व्यक्ति के रूप में, एक नेता के रूप में और थोड़ा सा स्वतंत्रता सेनानी के रूप में भी शायद याद कर लें. पर उनकी बातों पर ध्यान नहीं देंगे, उनके विचारों को अपनी अलमारियों के सबसे पीछे खाने के लिए छोड़ देंगे. डॉ लोहिया अगर चाहते तो पूरी जिंदगी सांसद रह सकते थे. वे चाहते तो नेहरू जी की सरकार से लगातार केंद्र का महत्वपूर्ण मंत्री रह सकते थे. वे चाहते तो दिल्ली के एक शानदार बंगले का सुख उठा सकते थे.

पर फिर इतिहास चक्र कौन लिखता, कौन सीता और सावित्री और द्रौपदी के बहाने औरतों की स्वतंत्रता की चर्चा छेड़ता. फिर चित्रकूट में रामायण मेला लगा कर संस्कृति को सहेजता कौन? देश विभाजन के गुनाहगार की चर्चा नहीं कर सकते थे वे. राम, कृष्ण, शिव या केवल कृष्ण लिख कर इनके बहाने जीवन संस्कृति, जिम्मेदारियों, मर्यादाओ और न्याय की चर्चा नहीं कर पाते वे. तब कहां सगुण और निर्गुण की बात हुयी होती नए संदर्भो में. तब नहीं हुई होती चर्चा संसद में अमीरी और गरीबी की इतनी बड़ी खाई की ''तीन आना बनाम छ आना'' की बहस के साथ. तब कौन भारत को चीन के आक्रमण से आगाह करता. कौन होता जो तिब्बत की लड़ाई लड़ता. तब शायद गोवा की आजादी और लम्बी हो जाती और नेपाल में जागरण का सूरज देर से पहुँचता.

कौन दहाड़ कर कहता कि हिमालय बचाओ और जिस पानी की आज चर्चा है उसकी बुनियाद किसने रखी होती ''गंगा बचाओ'' का अभियान चला कर और उसके बहाने सभी नदियों को बचाने की आवाज लगा कर. तब कौन कहता कि दुनिया को सात क्रांतियों की जरूरत है वो रंग भेद के खिलाफ हो, यानि चमड़ी की हो, वो स्त्री पुरुष के बीच भेद की हो, वो जाती के आधार पर भेदभाव के खिलाफ हो, वो धर्म के आधार पर भेदभाव के खिलाफ हो, गरीबी अमीरी के भेदभाव के खिलाफ हो इत्यादि. तब कौन इबारत लिखता चौखम्भा राज की जिसके आधार पर आज का भारत गाँव से देश तक चार सरकारों से संचालित होता है.

यदि डॉ लोहिया ने सब सुख स्वीकार कर लिया होता तो कौन तोड़ता आज़ादी के बाद भी हमें मुह चिढाती अंग्रेजों की मूर्तियों को और महीनों इसके लिए जेल काटता. राजनारायण जैसे साथियों के साथ और मूर्तियाँ आज भी हमारे सीने पर मूंग दल रही होती. तब कौन लड़ाई छेड़ता अंग्रेजी हाय हाय की जिसकी एक परिणिति अभी दिखलाई पड़ी है जब आईएएस के इम्तहान से अंग्रेजी की बाध्यता समाप्त कर दी गयी है. तब कौन लड़ता नौजवानों के लिए विश्वविद्यालयों और कालेजों में जा जा कर और उन्हें आने वाले समय में लोकतंत्र का मजबूत हथियार बनाता.

कौन कहता कि किसान को उसकी उपज का मूल्य दो और गरीब को उसका हक़. वे नहीं कह पाते ''संसोपा ने बांधी गांठ और पिछड़े मांगे सौ में साठ'' और आज का सामाजिक न्याय का परिदृश्य भी शायद दिखलाई नहीं पड़ता या अभी शैशव अवस्था में घुटने पर चल रहा होता. यदि उन्होंने मंत्री पद स्वीकार कर लिया होता तो कौन बताता इस देश को कि पहाड़ जैसे सत्ता में बैठे लोगों से कैसे टकराया जा सकता है और कौन अहसास करवाता की विपक्ष भी कुछ होता है. कौन गैर कांग्रेसवाद का सिद्धांत देकर अजेय कांग्रेस की देश में नौ सरकारें गिरा कर रास्ता दिखाता की कांग्रेस की सरकार हटाई भी जा सकती है. कौन लड़ता नेहरु जी जैसे बड़े नेता से और ये कहने का सहस करता कि मैं जानता हूँ कि पहाड़ से टकरा रहा हूँ पर टकराते टकराते मैं दरार तो पैदा कर ही दूंगा जिसे कल कोई गिरा भी देगा.

हाँ जो सब छोड़ने को तैयार होते हैं वही नए समाज की रचना करते हैं. वही देश की आजादी के योद्धा होते हैं. वही सामाजिक और आर्थिक क्रांतियाँ करते हैं. वही समाज को रास्ता दिखाते हैं. वही उंच नीच के भेदभाव से लड़ते हैं. ऐसे लोग ही होते हैं क्रांतिदूत, समाज परिवर्तक और महामानव. मुझ जैसे लोग जो उन्हें पढ़ कर और जान कर राजनीती में आ गए पता नहीं उनके अभियान को कुछ इंच भी सरका पाए या नहीं. पता नहीं समाज को बदलने की बात करते करते खद ही बदल गए या नहीं. पता नहीं लोगो को न्याय दिलाते दिलाते खुद अन्याय का शिकार तो कही नहीं हो गए. लोगो को खुशहाल बनाते बानते खुद तो बर्बाद नहीं हो गए. पर आज मुझ जैसे उनके तमाम दीवानों का उस चिन्तक और त्यागी डॉ लोहिया को सलाम. डा. लोहिया सदा जिन्दा रहें और उनके सिद्धांतों की लौ जलती रहे. आइये कुछ उनके विचारों पर हम भी विचार भी कर लें. उन्हें पूरे देश का सलाम.

लेखक डॉ. सीपी राय स्वतंत्र चिन्तक एवं स्तंभकार हैं. उनसे संपर्क ०५६२ -२५२२४००, ९४१२२५४४०० के जरिए किया जा सकता है.

हां, दलाली भी करते हैं चैनल

Deepak Sharma : फेसबुक में मैसेज और कमेंट्स में बहुत से मित्र पूछते हैं कि न्यूज़ चैनलों का कंटेंट इतना चीप क्यूँ है? खासकर हिंदी चैनलों में छिछले और चीप शो क्यूँ दिखाए जाते हैं? हाँ एक और सवाल जो लोग पूछते हैं …क्या पत्रकार सरकार (के दफ्तरों )में दलाली और लाइजनिंग भी करते हैं?

मित्रों पिछले ११ साल से मैं आजतक में हूँ और ये कह सकता हूँ कि इंडिया टुडे ग्रुप में कोई पत्रकार दलाली करके रह नही सकता. यही नहीं इंडिया टुडे ने आपातकाल से लेकर कोयला घोटाले तक हमेशा बेधड़क रिपोर्टिंग की है. देश में बचे-खुचे वरिष्ठ पत्रकार इस तथ्य की पुष्टि कर सकते हैं.

लेकिन मित्रों तस्वीर का दूसरा पहलू भी है. देश में २०० से ज्यादा न्यूज़ चैनल ऐसे हैं जिनके मालिक कंस्ट्रक्शन, चिट फंड और सरकारी कान्ट्रेक्ट के धंधो में हैं. टीवी नेटवर्क की ये छदम कम्पनियां कोर मीडिया में नहीं हैं और बहुतों ने न्यूज़ चैनल लाइजनिंग के नाम पर खोले हैं. इन्हीं चैनलों से पत्रकारिता कि वो गंगोत्री निकलती है, जिसमें दलाली, ब्लैकमेल और लाइजनिंग का घोल मिला होता है. पत्रकारिता का छिछलापन एक वाईरस की तरह फैलता है और इसकी छाप फिर हर स्क्रीन पर दिखती है. ज़ाहिर तौर पर फिर आप दमदार खबर नहीं दिखा सकते और टीआरपी में बने रहने के लिए आप चीप कंटेंट का सहारा लेते हैं. यही कंटेंट फिर आपको मेन स्ट्रीम न्यूज़ चैनल में भी दिखने लगता है.

वरिष्‍ठ पत्रकार दीपक शर्मा के एफबी वॉल से साभार.

Hindustan Advertisement Scandal : The Registrar orders to list the matter before the court

New Delhi : The Hon'ble Justice Mr.Sunil Thomas, the Registrar-II, the Supreme Court of India, on Sept,19,2013, in the Special Leave Petition (Criminal) No. 1603/2013(Shobhana Bhartia Versus State of Bihar and Another), passed an order to list the matter before the Hon'ble Court as per rules.

The Court of the Hon'ble Registrar-II, the Supreme Court of India, on Sept, 19,2013, ordered , "In view of the urgency expressed by the parties and service being complete, list the matter before the Hon'ble Court as per rules after the expiry of three weeks."

The Hon'ble Court also mentioned in the order," The Respondent No.-02,Mantoo sharma, Party-in-Person, has filed the Counter-Affidavit.The Respondent No.01, Mr.Samir Ali Khan, Advocate, seeks three weeks' time for filing the Counter-Affidavit."

It is worth mentioning that the Respondent No.01,Mr.Samir Ali Khana, Advocate is the Hon'ble counsel for the State of Bihar. Mantoo Sharma files his counter-affidavit in Supreme Court

Mr.Mantoo Sharma, Respondent No.-02 in the Special Leave Petition (Criminal) No. 1603 of 2013, filed by the Shobhana Bhartia, the chairperson of M/S Hindustan Media Ventures Limited(New Delhi), has filed his counter-affidavit in 315 pages in the Supreme Court on Sept, 16 recently. Mr.Mantoo Sharma is the informant in the Munger Kotwali P.S Case No. 445/2011 in Bihar.

Before filing his counter-affidavit, Mr.Sharma sent one set of the counter-affidavit to M/S Karanjawala & Co., Advocates for the petitioner, Shobhana Bhartia, the Chairperson of M/S Hindustan Media Ventures Limited, The Hindustan Times House, 18-20, Kasturba Gandhi Marg, New Delhi -110001 by the registered parcel and two sets of his counter – affidavit to the government lawyer of the Bihar government in the Supreme Court by hand.Four sets of the counter- affidavit were filed in the court of the Reistrar -II, Mr.Sunil Thomas.

The petitioner prays for the stay of investigation in the Munger Kotwali P.S Case No.445/2011(Bihar):

The petitioner, Shobhana Bhartia has filed the Special Leave Petition( Criminal) No. -1603 of 2013 in the Supreme Court and prayed for an interim ex-party stay of investigation in the Munger Kotwali P.S Case No. 445/2011, dated Nov.,18,2011 under sections 8(b)/14/15 of the Press & Registration of Books Act, 1867 read with Sections 420/471/476 of the Indian Penal Code

Named accused persons in the Munger Kotwali P.S Case No.445/2011(Bihar): In the Munger Kotwali P.S Case No.445/2011 in Bihar, the Chairperson of M/S Hindustan Media Ventures Limited (New Delhi)Shobhana Bhartia, the Chief Editor,Dainik Hindustan, Shashi Shekhar(New Delhi), the Regional Editor,Dainik Hindustan,Patna edition, Akku Srivastawa, the Regional Editor, Dainik Hindustan,Bhagalpur edition,Binod Bandhu and the Publisher, ,M/S Hindustan Media Ventures Limited( Nw Delhi), Amit Chopra, have been accused of receiving the government money to the tune of about rupees two hundred crores illegally and fraudulently by obtaining and printing the advertisements of the Union and Bihar governments in the name of illegally printed and published Munger and Bhagalpur editions of Dainik Hindustan for a decade continuously in Bihar. The Munger police ,meanwhile, have submitted the Supervision Report No.01 and the Supervision Report No.-02 and have found all allegations "prima-facie true" against all the named accused persons including the principal accused Shobhana Bhartia (New Delhi) under sections 8(b)/14/15 of the Press & Registration of Books Act, 1867 and sections 420/471/476 of the Indian Penal Code.

The historical order of the Patna High Court : The Hon'ble Justice of the Patna High Court, Justice Anjana Prakash, in her order, dated Dec 17,2012, in the Criminal Miscellaneous No. 2951 of 2012, refused to interfere in the police investigation and directed the Munger police to complete the investigation in the Kotwali P.S Case No. 445/ 2011 within the three months from the date of the order. (EOM)

Report by ShriKrishna Prasad, advocate. Mobile No.-09470400813

नेपाल संविधान सभा चुनाव में दर्जनभर पत्रकार आजमा रहे हैं किस्मत

काठमांडू : पत्रकारों का राजनीति में आना कोई नई बात नहीं है लेकिन एक आम चुनाव में शायद यह पहली बार होगा जब एक साथ एक दर्जन से अधिक पत्रकार अपना किस्मत आजमाने के लिए चुनावी मैदान में कूद पड़े हैं.  १९ नवम्बर को नेपाल में दूसरी बार होने जा रहे संविधान सभा के चुनाव में सभी प्रमुख पार्टी के तरफ से पत्रकारों को भी टिकट दिया गया है. इनमे से कुछ पत्रकार तो सीधे चुनाव लड़ रहे हैं जबकि कुछ पत्रकारों की सूचि मनोनित सांसद के लिए चुनाव आयोग के पास जमा कर दी गई है. हालांकि इसके लिए तीन दर्जन से अधिक पत्रकारों ने अपने अपने लिए प्रयास किया था लेकिन उम्मीदवार बनने का सौभाग्य इनमे से कुछ पत्रकारों को मिल पाया है.

संविधान सभा में नेपाली कांग्रेस के तरफ से नेपाल पत्रकार महासंघ के दो पूर्व अध्यक्ष हरिहर विरही और धर्मेन्द्र झा का नाम प्रस्तावित किया गया है. विरही और झा दोनों ही कांग्रेस के निकट रहे नेपाल प्रेस यूनियन से भी आबद्ध हैं. नेपाल के माओवादी पार्टी से वर्त्तमान में पत्रकार महासंघ के महासचिव रहे ओम शर्मा का नाम शामिल है. इसी तरह नेपाल कम्युनिष्ट पार्टी एकीकृत मार्क्सवादी लेनिनवादी के तरफ से शम्भू श्रेष्ठ और गगन विष्ट का नाम दिया गया है. ये दोनों नेकपा एमाले निकट पत्राकारों की संस्था प्रेस चौतारी के पूर्व अध्यक्ष रह चुके हैं.   

कुछ पत्रकार सीधे सीधे जनता के बीच जाकर चनाव लड़ रहे हैं इनमे नेपाल के वरिष्ठ पत्रकार देवप्रकाश त्रिपाठी भी शामिल हैं जिन्हें नेपाली कांग्रेस के तरफ से टिकट दिया गया है. भारतीय सीमा से जुड़े मधेश के दो पत्रकारों को भी मधेशी दल के तरफ से संभावित सांसदों की सूचि में सम्मिलित किया गया है. नेपाल में हिंदी पत्रकारिता के लिए लम्बे समय से संघर्ष करते आ रहे पंकज दास को सदभावना पार्टी के तरफ से लगातार दूसरी बार मनोनयन सूचि में नाम को प्रस्तावित किया गया है. विभिन्न भारतीय अखबार और टेलीविजन के लिए नेपाल से रिपोर्टिंग करते आ रहे पंकज दास नेपाल से पहला हिंदी दैनिक प्रकाशित करने वाले पत्रकार हैं.    

इसके अलावा नेपाल में लोकतंत्र की पुनर्बहाली के बाद से भोजपुरी, मैथिली अवधि आदि क्षेत्रीय भाषाओं में पहली बार नेपाल के टीवी और रेडियो में कार्यक्रम प्रस्तोता बनी प्रियंका पाण्डेय को मधेशी जनअधिकार फोरम गणतांत्रिक के तरफ से उम्मीदवार बनाया गया है. नेपाल में हुए मधेश आन्दोलन में अग्रणी भूमिका के कारण चर्चा में आई पाण्डेय एक मात्र महिला पत्रकार हैं जिनका नाम संभावित सांसदों की सूचि में है.  नेपाल में १९ नवम्बर को चुनाव है और करीब एक हफ्ते में पूरी गिनती होने के बाद यह पता लग जाएगा कि इनमे से किस पत्रकार को माननीय सांसद बनकर देश का भाग्य निर्माता बनने का सौभाग्य मिलाता है और किन्हें वापस अपने पत्रकारिता पेशा से ही संतुष्ट होना पड़ता है.

काठमांडू से पंकज दास की रिपोर्ट.

सपा-बसपा हाईकमान के लिए पार्टी नहीं, खुद अपना वर्चस्व प्रमुख है : कंवल भारती

Kanwal Bharti : मायावती जी, पिछले कितने सालों से लगातार कांग्रेस को समर्थन दे रही हैं, पर उनको अब जाकर पता चला है कि कांग्रेस दलित विरोधी है. यह उनकी भोली नासमझी नहीं है, बल्कि राहुल गांधी ने उनकी जिस दुखती रग पर उंगली रखी है, यह उसकी बौखलाहट है. राहुल गाँधी ने क्या गलत कहा कि मायावती ने अपने अलावा किसी अन्य दलित नेता को उभरने नहीं दिया. कोई बताये कि देश भर में मायावती के बाद बसपा में दूसरे-तीसरे नम्बर का कौन दलित नेता है?

जिस दलित पार्टी को नगर-नगर और गाँव-गाँव में अब तक लाखों नहीं तो हजारों दलित नेता (राजनितिक) पैदा कर देने चाहिए थे, उसी पार्टी में दलित नेतृत्व का सबसे भारी संकट है. यह संकट इसीलिए है, क्योंकि मायावती ने अपनी पार्टी में किसी अन्य दलित नेता को उभरने ही नहीं दिया, सिर्फ इस डर से कि कोई उनकी सत्ता के लिए खतरा न बन जाये. ठीक यही काम मुलायम सिंह यादव ने किया. उन्होंने भी अपने और अपने परिवार के सिवा किसी अन्य ओबीसी नेता को उभरने नहीं दिया. वजह यहाँ भी यही है कि उनकी ओबीसी राजनीति पर उन्हीं का वर्चस्व कायम रहे.

लेकिन क्या कारण है कि भाजपा ने ऐसा नहीं किया. उसने दलितों और पिछड़ों दोनों में नेतृत्व उभारने का काम किया, यहाँ तक कि अल्पसंख्यक समुदायों में भी उसने नेतृत्व उभारा. कांग्रेस ने भी दलित-पिछड़ों में नेतृत्व उभारने का काम किया. निश्चित रूप से यहाँ वैयक्तिक वर्चस्व मूल में नहीं है, बल्कि पार्टी का वजूद मूल में है. लेकिन सपा-बसपा हाईकमान के लिए पार्टी नहीं, खुद अपना वर्चस्व प्रमुख है.

लोकतंत्र में दलित-ओबीसी राजनीति का केन्द्रीयकरण ठीक नहीं है. इसका विकेन्द्रीयकरण होना चाहिए. क्योंकि इसी केन्द्रीयकरण की वजह से दलित-ओबीसी नेतृत्व अपनी ज़मीन पर ही पंगु बना हुआ है. अब समय आ गया है कि नगर-नगर और गाँव-गाँव का बहुजन नेतृत्व सपा-बसपा हाईकमान को यह बताये कि तुम्हारी पार्टियाँ हमारे दम से हैं, ये तुम्हारी निजी मिल्कियत नहीं हैं, तुम्हारा भ्रष्ट और नाकारा नेतृत्व देख लिया, अब हमें मौका दो. (आप कह सकते हैं कि कांग्रेस से जुड़ने के बाद मैं ….(जो भी आप समझें) ….हो गया हूँ, पर जो सवाल मैंने उठाये हैं, क्या आप उस पर भी विचार करेंगे?)

दलित चिंतक और साहित्यकार कंवल भारती के फेसबुक वॉल से.

गाजीपुर के बुजुर्गों को ब्रितानिया हुकुमत याद आई

यह बात जन सामान्य की समझ से परे है कि क्यों पूर्वी उ0प्र0 के गाजीपुर जिले में विश्वविद्यालय की मांग पर लोकतांत्रिक तरीके से आमरण अनशन कर रहे अनशनकारियों को जबरन अर्द्धरात्रि में उनके सहयोगियों सहित उठवा लिया गया। उनके अन्य साथियों की राजतंत्र के लठैतों द्वारा बर्बरतापूर्वक धुनाई कर उन्हें बन्द क्यों किया गया और यह लठैत इतने जूनूनी क्यों हो गये कि इन्हें राह चलते वादकारी तथा अन्य का फर्क भी नहीं समझ में आया।

यह कार्यवाही तो दुर्भाग्यपूर्ण रही ही, इससे ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण यह सरकारी बयान का आना कि लाठीचार्ज हुआ ही नहीं। यह गैर जिम्मेदाराना बयान जारी भी हुआ तो उस जिलाधिकारी के हवाले से जिसे जिले की जनता निहायत ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ और बेहद सुलझे अधिकारी के रूप में जानती है। इतना ही नहीं बल्कि हाल ही में आई बाढ़ की विभिषिका में राहत कार्य व अन्य विकास कार्यों में इनकी व्यक्तिगत रुचि की सार्वजनिक सराहना भी करती है। ऐसे जिलाधिकारी के रहते जनपद में इस प्रकार की विसंगति निश्चित रूप से चिन्तनीय है तथा प्राशासनिक गुप्त तंत्र की कार्यशैली को आक्षेपित करती है।

प्रशासनिक गुप्त तन्त्र जो आज अनशनकारियों व उनके सहयोगियों या संरक्षकों की जन्म कुण्डली खोज रहा है वह उस समय किस तन्द्रा में लीन था जब नगर स्थित बड़ा महादेवा मन्दिर पर यह छात्र समूह सार्वजनिक रूप से इस संदर्भ में बैठक कर रहे थे, या फिर रेलवे स्टेशन से प्रारम्भ कर पूरे नगर में मशाल जुलूस निकाल रहे थे। इसी संदर्भ में जनप्रतिनिधियों और माननीयों से अपील करते फिर रहे थे या फिर प्रदेश के समस्त माननीयों को राखी भेजकर बदले में विश्वविद्यालय की मांग कर रहे थे। यह गुप्त तन्त्र उस समय कहां व्यस्त था जब अपने ही खून से इन अनशनकारियों द्वारा प्रदेश के मुखिया तथा महामहिम श्री राज्यपाल को इस संदर्भ में पत्र प्रेषित किया गया था, या फिर यह जब उसी बड़ा महादेवा मन्दिर पर हुए एक बडे़ बैठक में सर्वांगीण विचारोपरान्त आमरण अनशन के लिए संकल्पित हुए।

जाहिर है कि आन्दोलनकारियों द्वारा यह सब कार्य एक दिन या एक महीने मात्र में नहीं किया गया होगा। हमें समझना होगा कि यह मांग भी पुराना है और प्रयास भी। हर स्तर पर किये गये प्रयास के बाद निराशा के शिकार लोगों द्वारा ही आमरण अनशन का संकल्प लिया जाता है। इन जन्म कुण्डली तलाशने वालों को अपनी खोज में यह बात भी ध्यान रखना होगा कि आज समाचार पत्रों के हाकरों द्वारा यह कहा जाना कि आज अखबार कम पड़ गया इसलिए सभी नियमित ग्राहकों को नहीं दिया जा सका। यह निश्चित रूप से जिले में विश्वविद्यालय के मांग के प्रति आमजन के सरोकार तथा इस विषय से सम्बन्धित समाचारों के लिए उत्सुकता का परिचायक है।

हम सभी को यह भी समझना होगा कि सत्याग्रह के जनक महात्मा गांधी का यह मानना था कि ‘‘आमरण उपवास या अनशन सत्याग्रह के शस्त्रागार का अन्तिम शस्त्र है, इसे इसके सम्पूर्ण निहितार्थ के साथ स्वीकार करना चाहिए। महत्वपूर्ण स्वयं उपवास या उपवासकर्ता नहीं बल्कि उसका निहितार्थ है।''

कुल मिलाकर यह मुठ्ठीभर जनों का आन्दोलन नहीं वरन सभी के सहयोग से जारी जनान्दोलन है और जनहित में है जिस पर किये गये हर दमनात्मक प्रयास, प्रयासकर्ताओं को ही हर दृष्टि से निन्दित करेगा। यही कारण है आज जिला प्रशासन चहुंओर हर वर्ग द्वारा किये जा रहे निन्दा का पात्र बन चुका है। आज नागरिक और प्रशासन दोनों असहज स्थिति के शिकार हैं जिसे सामान्य बनाने की दिशा में उपयुक्त होगा कि जनपद के बौद्धिक जनों तथा प्रशासनिक अधिकारियों के बीच वर्तमान हालत विषयक एक गोष्ठी तत्काल आयोजित की जाय फिर समस्त के विचार विनिमय के उपरान्त निकले निष्कर्ष से समाचार पत्रों आदि के माध्यम जनपदवासियों को भी अवगत कराया जाय जिससे जिले के बुजुर्गों के इस कथन ‘‘कि विश्वविद्यालय की मांग कर रहे छात्र आन्दोलनकारियों के प्रति प्रशासन द्वारा बर्बरता पूर्वक की गयी दमनात्मक कार्यवाही ने ब्रितानिया हुकुमत की याद दिला दी है’’ पर विराम लग सके।

शिवेन्द्र पाठक
गाजीपुर
सम्पर्क- 09415290771

जेके, लोहिया, जागरण, कोठारी, झुनझुनवाला जैसे लोग और समूह जब कानपुर शहर उजाड़ेंगे तो बचेगा क्या?

कानपुर में लक्ष्मण बाग कालोनी का मामला आदर्श सोसायटी घोटाला से कतई कम नहीं है। लेकिन दिक्कत यह है कि इसमें सत्ता, विरोध, धन्नासेठों और मीडिया माफियाओं का ऐसा मजबूत गठजोड़ है कि शहर के फेफड़ों को पंचर कर देने वाली, शहर के आक्सीजन जोन को तहस-नहस करने वाली इस जगजाहिर करतूत पर चीखने चिल्लाने के बजाय पूरा शहर अंधा, बहरा और गूंगा बनकर अपनी नामर्दगी का सबूत दे रहा है।

एक केन्द्रीय मंत्री, आधा दर्जन के आस-पास लाल बत्ती वाले प्रदेश सरकार के मंत्री, एक मेयर (भाजपा का) और १०० से ज्यादा सभासद इस शहर में हैं लेकिन शहर की सांसों को छीने ले रहे इस क्रूर कृत्य के खिलाफ कोई नहीं, जानते हैं क्यों..? इसलिए कि इस घोटाले की नींव जे. के. ग्रुप ने रखी और इस पर इमारत बनाई है मार्निंग ग्लोरी इन्फा लिमिटेड ने। जरा इस कम्पनी के डायरेक्टरों के नाम देखिए…।

संजीव कुमार झुनझुनवाला पुत्र लाला कैलाशपत झुनझुनवाला निवासी ११७/के/१३, गुटैया कानपुर, भरत गुप्ता पुत्र देवेन्द्र मोहन गुप्ता निवासी पूरन निवास ७/५१, तिलक नगर कानपुर, राहुल कोठारी पुत्र विक्रम कोठारी निवासी ७/२३, तिलक नगर कानपुर, सिद्धार्थ लोहिया पुत्र आलोक कुमार लोहिया निवासी ३ए/८८, आजाद नगर, कानपुर।

अब जरा सोचिए, जेके, लोहिया, जागरण, कोठारी, झुनझुनवाला जैसे लोग और समूह जब शहर उजाड़ेगे तो बचेगा क्या…?

जय हो !

लेखक प्रमोद तिवारी कानपुर के जाने-माने पत्रकार हैं.


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हरे पेड़ काटने पर स्टे से निवेशकों में हड़कंप, बिल्डर कंपनी फिर लगी गोटें बिछाने

यूपी में ‘पुलिस कम्प्लेन अथॉरिटी’ के लिए अमिताभ ठाकुर ने दायर की याचिका

आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर ने उत्तर प्रदेश में अब तक एक स्वतंत्र “पुलिस कम्प्लेन अथॉरिटी” नहीं बनने के सम्बन्ध में इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच में याचिका दायर किया है. याचिका के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय ने प्रकाश सिंह बनाम भारत सरकार केस में 22 सितम्बर 2006 के अपने आदेश में सभी राज्यों को निर्देशित किया था कि वे अपने यहाँ राज्य स्तर पर और प्रत्येक जिले में स्वतंत्र “पुलिस कम्प्लेन अथॉरिटी” बनाए जो पुलिस विभाग और राज्य सरकार के नियंत्रण से पूरी तरह अलग रहे.

यूपी में अब तक इस प्रकार के अथॉरिटी का गठन नहीं हुआ है, जिसका नतीजा यह है कि उनके द्वारा विभिन्न वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध की गयी शिकायतों पर कोई कार्यवाही नहीं हुई है. अतः श्री ठाकुर ने यूपी में तत्काल राज्य और जिला स्तर पर पुलिस कम्प्लेन अथॉरिटी बनाए जाने की प्रार्थना की है.

याचिका के कुछ अंश इस प्रकार हैं…

To,

The Hon’ble Chief Justice and His other Hon’ble companion Judges of the aforesaid Court:

The humble petition of the above named petitioner most respectfully begs to submit as under:

    That by means of this petition, the petitioner is invoking the extra ordinary jurisdiction of this Hon’ble Court vested with it  through Article 226 of the  Constitution to kindly issue a writ of mandamus to direct the respondents, Principle Secretary (Home) (PS Home, for short) and Director General of Police (DGP, for short) of Uttar Pradesh, to immediately constitute the “Police Complaints Authorities” at the State and district levels in Uttar Pradesh as directed by the Hon’ble Supreme Court in Prakash Singh & Ors vs Union Of India And Ors (Writ Petition (civil) 310 of 1996) (Citation (2006)8SCC1) through its order dated 22/09/2006, within a reasonable period, say two months and to kindly direct the respondents to refer the various complaints sent by the petitioner against various police officers, being mentioned in the subsequent Paras of this Writ Petition to the appropriate Police Complaint Authorities so constituted.

The petitioner declares that he has not filed any other Writ petition before the Hon’ble Supreme Court and this Hon’ble Court either at Allahabad or its Lucknow bench pertaining to the subject matter and/ or for the relief prayed for in the instant writ petition. It is further declared that in respect of the same subject, no caveat notice has been received by the petitioner.

    That the Petitioner Amitabh Thakur is an IPS officer of UP Cadre and is also associated with works in the field of transparency and accountability in governance and issues related with Human Rights at this individual level. Among a few things he is seriously engaged in is regarding the alleged instances of inappropriate, arbitrary, improper, illegal and authoritarian treatment meted to the subordinate police officers in the UP Police by their superior officers. He is filing this Writ Petition in his individual capacity as an affected party whose complaints have remained completely unheard.
    That as stated earlier, the petitioner has taken up many issues related with alleged abuse, ill-treatment, exploitative behavior and action of subordinate police officers by superior police authorities and also as regards inappropriate action taken against him by superior police officers, through the misuse of their superior positions and the power bestowed to them.
    That one of the instances where the petitioner sent a complaint as regards alleged mistreatment to Sri Jay Prakash Kanaujia, the Stenographer in the Rules and Manuals Department in UP Police, where the petitioner was then posted, of which the petitioner is also a witness in the entire episode. On 29/02/2012, Sri Rahul Asthana, then SP in the Rules and Manuals office (now retired) allegedly abused Sri Kanaujia with the most filthy words, in the dirtiest of the manner, using all kind of extremely abusive words. Sri Kanaujia wept before the petitioner about this mistreatment and the petitioner wrote a letter No Ni.Gra./Vividh-100/2012 dated 29/02/2012 immediately to the DGP and DG of the Rules and Manuals Department to take appropriate action in this matter.
    That the DGP gave the enquiry to a DIG rank officer Sri Ashutosh Pandey, who produced an enquiry report dated 16/03/2012 which came more like a covering up exercise of the entire event. The enquiry report admitted that angry dirty words came from Sri Asthana’s chamber but it saved Sri Asthana by giving him all possible benefits of doubt, despite Sri Kanaujia and many other police officers who were eyewitnesses to this episode giving their evidence against Sri Asthana.  
    That when the petitioner got this enquiry report through RTI, he was deeply perturbed by the one sidedness of the report and the apparent slant of the enquiry officer in saving the interests of a fellow IPS officer at the cost of a subordinate police personnel.
    That the petitioner sent a letter No Ni.Gra./Vividh-100/2012 dated 15/10/2012 to the DGP presenting the doubtful and apparently one-sided facts in the enquiry report and asking for an independent and truthful enquiry. Sri Kanaujia also wrote many letters to the DGP praying for enquiry but nothing happened for long and finally when the petitioner went on pursuing the matter, the DGP sent back the enquiry to IG (Rules and Manuals) under whom Sri Kanaujia works. To the best of the petitioner’s information, the enquiry officer is sitting over the matter for months. The petitioner has been orally told by Sri Kanaujia that IG (Rules and Manuals) as enquiry officer had initially tried to persuade Sri Kanaujia by asking him to forget the matter and let bygones be bygones so as to give a statement that he did not want to pursue the matter any further. But when Sri Kanaujia showed reluctance to this suggestion, the IG (Rules and manuals) presumably forgot the enquiry and during many months of the petitioner’s posting in Rules and manuals department, at least his statement was not taken in the case, despite the petitioner being a witness of the entire chain of events. The matter, to the petitioner’s knowledge remains pending and he is sure that Sri Kanujia has very few possibilities of getting justice in his complaint.
    That the second instance is related with Sri V K Sharma, a retired DySP, who was then posted to 38th Bn PAC, Aligarh. Sri Sharma was allegedly harassed and suspended for having vented his pain and agony before the Media whereby he had put some serious allegations of corruption against Sri A C Sharma, then DGP. The moment his statement was relayed through some news channels, Sri V K Sharma was suspended by the State Government on the recommendations of the DGP and the enquiry was assigned to the DIG, PAC, Agra. Since the allegations were there against the DGP of the State, there was naturally no point in getting the matter enquired by an officer subordinate to the DGP and working under him. When the petitioner came to know of this brutal and inhuman incidence, he talked to Sri V K Sharma and after having gathered the requisite information, he sent a letter No AT/VKS/DGP/01 dated 30/12/2012 in his individual capacity to the Respondent No 1 requesting him to get the entire matter enquired by a sufficiently senior officer outside the Police Department, so as to bring the truth.
    That in fact later this Hon’ble Court in its order dated 04/01/2013   in V K Sharma vs State of UP and others (Writ Petition No 1587/2012 (S/B) very clearly said-“From the facts indicated above, it is evident that the impugned order of suspension smacks arbitrariness and colourable exercise of powers by the authorities” and quashed the order of suspension, which this Hon’ble Court resorts to only in the rarest cases.
    That since then the petitioner has sent umpteen numbers of letters requesting for enquiry into the entire episode including the allegations against Sri A C Sharma and the improper suspension of Sri V K Sharma but nothing has happened in this matter so far and now both Sri Sharmas have also retired.
    That in the third instance Sri Raghuraj Singh Bhati, Sub Inspector posted in ps Mirapur in district Muzaffarnagar was suspended by the then SSP of Muzaffarnagar. As per various news paper reports, the SSP suspended Sri Bhati after the SSP had abused him using improper language on which Sri Bhati, feeling hurt and humiliated wrote all these facts in the General Diary of Mirapur police station. When the SSP came to know of this fact that Sri Bhati had recorded this entire episode in the GD, she allegedly suspended him. The enquiry against Sri Bhati was presumably given to an Additional SP working under the same SSP who had been alleged of misbehavior and abusive language.
    That when the petitioner came to know of this episode, he talked to Sri Bhati on phone and after having gathered the requisite information he immediately wrote letter No AT/Muz/Home/01 dated 05/06/2013 in his individual capacity to the respondents where after presenting the facts coming through Media reports, he prayed that the matter be enquired by a sufficiently senior officer outside the Police department so as to provide fair enquiry in the matter.
    That here again despite many reminders since then nothing has happened in the case. After the petitioner’s letter, Sri Bhati got almost immediately reinstated and the matter was presumably hushed up.
    That the fourth case is related with alleged beating of three class IV employees (called “Followers) by SSP Moradabad at his residence for having kept a ruling party politician waiting for an hour or so. When the petitioner came to know of this brutal and inhuman incidence, he talked to the three employees and after having gathered the requisite information, he wrote to the respondents through Letter No AT/MBD/DGP/01 dated 22/09/2013 where he prayed for administrative action against the SSP and also registration of FIR. The SSP got suspended almost immediately but for days no Medical examination of these three police employees was conducted, nor has any FIR been registered so far. The matter has now been given for enquiry to IG, Zone, Bareilly and no one knows what the fate of such an enquiry will be, where even the Medical examination of the victims was conducted days after the episode only after much efforts by the three followers and no FIR has till been registered, to the best of the petitioner’s information.
    That the petitioner has full faith and belief that all these instances related with the complaints presented by the petitioner as regards alleged improprieties and denial of human rights to subordinate police officers would have been quickly and correctly redressed had there been an independent and autonomous police complaint cell/authority, not under the functional and administrative control of the respondents.
    That as explained in above para, all these complaints met such fate the complainant/victim is a subordinate police officer and the person being alleged is a superior officer in the department, though the petitioner agrees that the situation might be the same in cases of complaints made by outsiders/common men against the police officers.
    That one of the major reasons for such situations being faced by the petitioner and other victims whose cases he espoused seems to be the absence of an independent Enquiry Committee/Grievance redressal system and the present grievance redressal mechanism functioning under the police department.
    That if there were an independent and autonomous existence where every person, including the petitioner having his grievance/complaint against the police officers mentioned above would have presented his complaint, it would then have been enquired truthfully and independently (without fear or favour) by that particular Committee/Commission/authority.
    That if there was an independent authority then such things as stated in above Para would never have happened. Whenever the above complaints mentioned would have been presented, the Enquiry Committee/authority would have taken up the complaint in a prescribed manner and would definitely have undertaken an independent and autonomous enquiry without going into the details of whether the accused police officer is a Constable or a DGP.
    That since there is no such mechanism, all the petitioner’s complaints have remained in the mercy of the respondents. No one is willing to undertake the enquiry. Even if some enquiry is being conducted, there is a possibility of its being an eyewash or face-saving exercise because it can be easily understood that a DIG will not enquire against a DGP or because of a possibility of one of these reasons- partisan behavior, nepotism, monetary allurements, functional requirements, day to day interaction and so on.
    That one of the countries known, respected and recognized widely for its efficient, humane, accountable and independent policing is Great Britain. There they have adopted an Independent Police Complaints Commission (IPCC, for short) which is a non-departmental public body in England and Wales responsible for overseeing the system for handling complaints made against police forces in England and Wales.
    That the IPCC is overseen by a Chair, ten operational and two non-executive Commissioners. The Chair is a Crown appointment and Commissioners are public appointments. The IPCC's Commissioners and staff are based in IPCC regional offices. As well as employing its own independent investigators to investigate the most serious cases, the IPCC has staff performing a number of other functions. They also assess appeals from the public concerning the outcome of police decisions regarding complaints. The IPCC also takes a lead role in developing new policy for the complaints system and for police practices.
    That the IPCC's ten operational Commissioners and two non-executive Commissioners are appointed by the Home Secretary for a five or three-year period. The Chair is appointed by the Crown on the recommendation of the Home Secretary. Commissioners by law may not have served with the police at any time, been the Chair or a member of SOCA at any time or been a Commissioner or officer of Customs at any time. They are the public, independent face of the IPCC. The Commission is the governing board of the IPCC, holding collective responsibility for governance of the Commission including oversight of the Executive. As public office holders, Commissioners oversee IPCC investigations and the promotion of public confidence in the complaints system (known as Guardianship). Each Commissioner also has responsibility for a particular portfolio such as firearms, deaths in custody, road policing and youth engagement. Commissioners in making decisions on individual cases act under the delegated authority of the Commission. All appointments, which are full-time and non-executive are for a five-year term, were through open competition. The commission meets bi-monthly and dates can be found on the IPCC website.
    That the principle of natural justice, Nemo iudex in causa sua (or nemo iudex in sua causa) which means, literally, no-one should be a judge in their own cause also speaks and warrants the same thing, which says that no person can judge a case in which they have an interest. The rule is very strictly applied to any appearance of a possible bias, even if there is actually none because "Justice must not only be done, but must be seen to be done”
    That unfortunately this cardinal rule is being broken in this particular aspect of justice where the person being complained against often has very close relationship with the enquiry officer- either as a  superior officer or as juniors or as colleagues, friends, acquaintances etc
    That it was possibly with such things in mind that the Hon’ble Supreme Court in Prakash Singh & Ors vs Union Of India And Ors (Writ Petition (civil) 310 of 1996) (Citation (2006)8SCC1) at Para 14, sub Para 6 of its landmark order dated 22.09.2006 said-“14. With the assistance of learned Counsel for the parties, we have perused the various reports. In discharge of our constitutional duties and obligations having regard to the aforenoted position, we issue the following directions to the Central Government, State Governments and Union Territories for compliance till framing of the appropriate legislations: Police Complaints Authority: (6) There shall be a Police Complaints Authority at the district level to look into complaints against police officers of and up to the rank of Deputy Superintendent of Police. Similarly, there should be another Police Complaints Authority at the State level to look into complaints against officers of the rank of Superintendent of Police and above. The district level Authority may be headed by a retired District Judge while the State level Authority may be headed by a retired Judge of the High Court/Supreme Court. The head of the State level Complaints Authority shall be chosen by the State Government out of a panel of names proposed by the Chief Justice; the head of the district level Complaints Authority may also be chosen out of a panel of names proposed by the Chief Justice or a Judge of the High Court nominated by him. These Authorities may be assisted by three to five members depending upon the volume of complaints in different States/districts, and they shall be selected by the State Government from a panel prepared by the State Human Rights Commission/Lok Ayukta/State Public Service Commission. The panel may include members from amongst retired civil servants, police officers or officers from any other department, or from the civil society. They would work whole time for the Authority and would have to be suitably remunerated for the services rendered by them. The Authority may also need the services of regular staff to conduct field inquiries. For this purpose, they may utilize the services of retired investigators from the CID, Intelligence, Vigilance or any other organization. The State level Complaints Authority would take cognizance of only allegations of serious misconduct by the police personnel, which would include incidents involving death, grievous hurt or rape in police custody. The district level Complaints Authority would, apart from above cases, may also inquire into allegations of extortion, land/house grabbing or any incident involving serious abuse of authority. The recommendations of the Complaints Authority, both at the district and State levels, for any action, departmental or criminal, against a delinquent police officer shall be binding on the concerned authority.”
    That unfortunately the same has not been adopted/incorporated in the State of UP and that possibly is the prime reason for the petitioner’s bane and problems.
    That as explained in above Para, if there such an independent Police Complaints Authority at district and State level in the manner very clearly illustrated and specified by the Hon’ble Supreme Court, none of the petitioner’s complaints mentioned above would have gone unheard or would have met the fate they are presently witnessing.
    That, with the above facts and law, as explained in some details in above Para, the petitioner being personally aggrieved by the inaction of the respondents towards formation of Police Complaints Authority at districts and State level as directed by the Hon’ble Supreme Court resulting in inaction and apathy towards all his complaints mentioned in this Writ Petition, he is left with no other option than to approach the Hon’ble Court with this Writ Petition to ask for certain prayers because of the reasons being stated among the Grounds as enumerated below.
    That the petitioner’s photograph and Identity proof has been enclosed along with.

GROUNDS

    Because the petitioner has sent many complaints to the respondents to enquire into various serious allegations against senior police officers related with other police officers
    Because the respondents have so far failed to act upon any of these complaints
    Because if there had been an independent “Police Complaints Authority” to function autonomously and independently, away from the influence of the respondents, such a thing would never have happened
    Because the Hon’ble Supreme Court in Prakash Singh & Ors vs Union Of India And Ors (Writ Petition (civil) 310 of 1996) (Citation (2006)8SCC1) at Para 14, sub Para 6 of its landmark order dated 22/09/2006 has clearly directed formation of such “Police Complaints Authority” at districts and State level
    Because despite this order some seven years ago, the respondents have failed to comply with this order
    Because this apathy on the part of the respondents have seriously affected the petitioner’s complaints as explained in the Petition
    Because most of the developing Nations have such independent “Police Complaints Authority” known by different names
    Because it is the basic requirement of the Principle of Natural Justice Nemo iudex in causa sua (or nemo iudex in sua causa), that is, no-one should be a judge in their own cause.

PRAYER

Wherefore, it is most respectfully prayed that this Hon’ble Court may be pleased to-

        Issue a writ of mandamus to direct the respondents, Principal Secretary Home and Director General of Police, UP to immediately constitute the “Police Complaints Authorities” at the State and district levels in Uttar Pradesh as directed by the Hon’ble Supreme Court in Prakash Singh & Ors vs Union Of India And Ors (Writ Petition (civil) 310 of 1996) (Citation (2006)8SCC1) through its order dated 22/09/2006, within a reasonable period, say two months
        Issue a writ of mandamus to direct the respondents to refer the various complaints sent by the petitioner through letters No Ni.Gra./Vividh-100/2012 dated 29/02/2012, AT/VKS/DGP/01 dated 30/12/2012, AT/Muz/Home/01 dated 05/06/2013 and AT/MBD/DGP/01 dated 22/09/2013 (along with subsequent reminder letters etc) against various police officers, being mentioned in the subsequent Paras of this Writ Petition, to the appropriate Police Complaint Authorities so constituted for enquiry and appropriate action.

Lucknow                                                     
Amitabh Thakur
Dated- 09/10/2013                                         
Petitioner in Person         
 

हाई कोर्ट ने पूछा- सीएम खुद फाइलों पर साइन क्यों नहीं करते?

इलाहाबाद हार्इ कोर्ट की लखनऊ बेंच ने सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर द्वारा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के स्तर पर पत्रावली पर स्वयं हस्ताक्षर नहीं करने सम्बंधित पीआईएल पर राज्य सरकार से जवाब माँगा है. मामले की अगली सुनवाई 22 अक्टूबर को होगी. जस्टिस इम्तियाज़ मुर्तजा और जस्टिस देवेन्द्र कुमार उपाध्याय की बेंच ने कहा कि यह एक महत्वपूर्ण मुद्दा है जिसे निर्णित होना आवश्यक है. अतिरिक्त महाधिवक्ता बुलबुल गोदियाल ने प्रारम्भिक आपत्ति प्रस्तुत की कि यह पीआईएल नहीं है, जिस पर कोर्ट ने कहा कि सरकार को जो बात कहनी हो, वह लिखित रूप में प्रस्तुत की जाए.

याचिका के अनुसार यूपी में मुख्यमंत्री पत्रावली पर स्वयं हस्ताक्षर नहीं करते और उनकी जगह मुख्यमंत्री कार्यालय के अधिकारी उनके नाम पर पत्रावली अनुमोदित करते हैं. यह विधि के सिद्धांतों के विपरीत है क्योंकि यह उत्तरदायित्व की भावना का विलोप करता है और इससे कई प्रकार के विवाद और दुरुपयोग की संभावना रहती है. अतः नूतन ने मुख्यमंत्री को अपने अधिकारियों की जगह पत्रावली पर स्वयं हस्ताक्षर करने हेतु आदेशित करने की प्रार्थना की है.
 

भास्कर ने ‘नो पेड न्यूज’ का विज्ञापन निकाला

हिंदुस्तान अखबार में निष्पक्ष खबरें छापने और पेड न्यूज का गलत काम न करने का विज्ञापन पिछले दिनों निकाला गया था. अब दैनिक भास्कर ने भी इसी नक्शेकदम पर चलते हुए 'नो पेड न्यूज' का विज्ञापन निकाला है. साथ ही पाठकों से अपील की है कि अगर दैनिक भास्कर में छपी किसी खबर या रिपोर्टर की निष्पक्षता पर किसी को संदेह हो तो भोपाल स्थित भास्कर मुख्यालय को पत्र लिखकर सूचित करें. विज्ञापन पूरा एड्रेस भी दिया गया है. क्या है ये विज्ञापन, इसे पढ़ने के लिए नीचे देखें…

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झूठे शपथ पत्र के आधार पर हड़प ली पत्रकार श्रद्धानिधि

मध्य प्रदेश शासन ने 62 वर्ष से अधिक उम्र वाले पत्रकारों के लिए पांच हजार रू. माह श्रद्धानिधि देने की योजना क्रियान्वित की है, जिसे पांच माह पूर्व से लागू करना बताया है अर्थात प्रारंभ में ऐसे पत्रकारों को 25-25 हजार रूपए दिए गए हैं। इस योजना का एक पत्रकार राधावल्लभ शारदा ने अनुचित लाभ उठाया। इस योजना के नियम 7 में कहा गया है कि आवेदन पर आपराधिक प्रकरण दर्ज नहीं होना चाहिए।

शारदा द्वारा दिए गए शपथ पत्र की कंडिका-5 में कहा गया है कि उस पर कोई आपराधिक प्रकरण दर्ज नहीं है, जबकि टी.टी. नगर थाने द्वारा 26.7.13 को दी गई जानकारी में बताया गया है कि शारदा पर अरुण मालपानी ने धारा 420 में प्रकरण दर्ज कराया था, जिसका अपराध क्र.1062/06-420 है। इसका चालान क्र. 863 दिनांक 26-11-09 को न्यायालय में पेश किया गया, जहां मामला माननीय न्यायाधीश विशाल शर्मा की अदालत में विचाराधीन है। इस प्रकार झूठा शपथपत्र देकर श्रद्धानिधि  हड़पी गई। शारदा की शैक्षणिक योग्यता भी संदेह के घेरे में है।

अधिमान्यता आवेदन में इसने अपनी शैक्षणिक योग्यता स्नातक बताई है और प्रमाण के रूप में कृषि विभाग का वह स्थानांतरण आदेश प्रस्तुत किया है, जिसमें इसका तबादला परिवहन विभाग में किया गया था। वह इस विभाग में निम्न श्रेणी लिपिक था। क्या एक एलडीसी स्नातक हो सकता है? फिर कृषि विभाग से इसे प्रतिनियुक्ति की बजाय सीधे परिवहन विभाग में स्थानांतरित कैसे किया गया, जो नियम में ही नहीं आता है? यहां यह तथ्य भी उल्लेखनीय है कि यदि यह स्नातक है तो श्रद्धानिधि आवेदन में शैक्षणिक योग्यता हायर सेकंडरी क्यों बताई?

इस जालसाज ने श्रद्धानिधि आवेदन में अपना वेतन निरंक बताया है, जबकि जनसंपर्क से बीमारी के आर्थिक सहायता आवेदन में आय 10 हजार रुपए मासिक बताई थी। सच क्या है? म.प्र. श्रमजीवी पत्रकार संघ ने इसकी शिकायत शासन से की है और मांग की है कि भ्रामक जानकारी देकर श्रद्धानिधि हड़पने वाले शारदा पर आपराधिक प्रकरण दर्ज किया जाए तथा श्रद्धानिधि की राशि 25,000 हजार रुपए वसूल की जाकर श्रद्धानिधि बंद की जाए।

भोपाल से अरशद अली खान की रिपोर्ट.

लखनऊ के पत्रकार को मातृशोक

लखनऊ। शहर के वायस आफ लखनऊ समाचार पत्र में कार्यरत वरिष्ठ अपराध पत्रकार मनोज बाजपेयी की माता श्रीमती कमला देवी बाजपेयी का परसों यहां भैंसाकुंड श्मशान घाट पर अन्तिम संस्कार कर दिया गया। वह इकहत्तर वर्ष की थीं। कल मध्यान्ह एलडीए कालोनी कानपुर रोड स्थित आवास पर अचानक तबियत बिगड़ने के बाद अस्पताल पहुंचने से पहले ही उनका निधन हो गया था।

वह अपने पीछे पति, तीन पुत्र और दो पुत्रियों सहित भरा-पूरा परिवार पीछे छोड़ गयी। पत्रकार की माता के निधन पर विभिन्न पत्रकार संगठनों सहित कई प्रमुख लोग शोक व्यक्त करते हुये मनोज बाजपेयी को इस दुखद क्षण से उबरने के लिये सांत्वना दी।

पत्रकारिता से बेचैन आत्माओं का विस्थापन

मीडिया आज एक बड़े पूंजी निवश के उद्योग का रूप ले चुकी है। पत्रकारों के पारिश्रमिक की हालत इससे बेहतर होने का भ्रम पैदा हुआ है। सूचना के मामले में उनका सेवा क्षेत्र व्यापक हुआ है। जिसे जनतंत्र की अहम जरूरत की पूर्ति बताया जा रहा है। इसके पेरौकार कहते हैं कि जब लोगों को ज्यादा तथ्यों से अवगत होने का अवसर मिलेगा तो उनकी जागरूकता का स्तर भी बढ़ेगा। पत्रकारों के रूतबे में भी पहले से बढ़ोत्तरी हुई है जो नौएडा जैसी जगहो पर प्लाट आवंटन की धांधली में उनकी हिस्सेदारी और जिलों के स्तर पर शस्त्र लाइसेंसों में सत्तारूढ़ नेताओं की तरह उनके कोटे को मान्यता के रूप में परिलक्ष्यित है। जिससे व्यवस्था के चौथे स्तम्भ का अहंकार उनके अंदर सजीव हो उठा है। इतनी तमाम उपलब्धियों के बावजूद मीडिया के प्रति जनमानस में ही नहीं रचना धर्मी समाज तक में मोह भंग की स्थिति है। विरोधाभाष का यह पहलू पड़ताल की मांग किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए करता है।

एक समय था जब विचार के स्तर पर बेचैन जन्तु पत्रकारिता के क्षेत्र मे आते थे। कस्बों देहातो में जो पत्रकार थे वे भले ही बहुत पढ़े लिखे न हो लेकिन व्यवस्था के प्रति असंतोष और उसे बदलने के लिए कुछ कर गुजरने का जज्बा ही उन्हें इस फक्कड़ (तब के हालातों में) विधा की ओर धकेलता था। ऐसा नहीं था कि उस समय भी पत्रकारिता में सभी पवित्र लोग हों। तब भी थाने की दलाली और रिश्वतखोर अधिकारी कर्मचारियों व कोटेदारों से हिस्सा बटाने में दक्ष पत्रकार होते थे लेकिन साहित्यकार, बुद्धिजीवियों व आन्दोलन की ऊर्जा के धनी राजनीतिक कार्यकर्ताओं के प्रति उन्हें अंदर से लगाव रहता था। उनके समाचार छापने के लिए पैसा मांगना तो दूर उन्हें अपनी जेब से निकालकर चन्दा देने तक की भावना उस दौर के पत्रकारों में रहती थी। धनबल के बल पर राजनीतिक प्रसिद्धि पाने की अभिलाषा रखने वाले लोग तब पत्रकारों को कितना भी प्रलोभन देकर नहीं फुसला पाते थे। इस कारण सम्पूर्णता में पत्रकारिता तब आम आदमी को अपने करीब की या हमदर्द विधा लगती थी और जनमानस में उसके प्रति मोहभंग की बजाय आस्था की यहीं मूल वजह थी।

आज बेचैन आत्माऐं पत्रकारिता से गायब हो चुकीं हैं। जैसा कि हर उद्योग में होता है मीडिया उद्योग भी पत्रकारिता के लिए प्रोफेशनल तैयार कराने की फैक्ट्री कालेजों के जरिए चला रहा है। पत्रकार बनने के लिए राजनीतिक सामाजिक चेतना की अर्हता अब बेमानी हो चुकी है। अब सम्पादक से लेकर रिर्पोटर तक को अच्छी सेल्समेनशिप आनी चाहिए। वह पाठकों या दर्शकों की बजाय ग्राहक तलाशता है। इसीलिए ज्योतिष, गणित के प्रश्न पत्र की कैसे तैयारी करें, वैलेंटाइन डे पर अपने प्रिय को कौन सा गिफ्ट दें जैसी पत्रकारिता से इतर सामग्री का समावेश प्रचुरता में मीडिया में नजर आने लगा है। विचार और प्रतिबद्धता से अपने को पृथक कर चुकी वर्तमान पत्रकारिता जनतंत्र का चैथा तो क्या पांचवा छठवां या सौवां खम्भा भी कहलाने लायक नहीं है।

ऐसा नहीं है कि पूंजीवाद में सबकुछ बुरा ही होता हो शायद बुनियादी तौर पर भारतीय समाज में रचना धर्मिता व पहल कदमी के गुणों का अभाव है। जिसका दोष किसी भी क्षेत्र में गुणवत्तापूर्ण उत्पाद तैयार करने के मामले में उसकी अक्षमता के बतौर उजागर रहता है। दुनिया के दूसरे देशों में मीडिया काफी पहले उद्योग का रूप ले चुकी थी लेकिन वहां के समाज में उक्त गुणों की वजह से मीडिया का सकारात्मक अवदान क्षीण नहीं हुआ। खासतौर से पश्चिमी मीडिया इसी कारण अपनी विश्वसनीयता को कायम रखे हुए है। दुनिया के किसी देश में अपनी भाषा के साथ मीडिया वैसा खिलवाड़ नहीं करती जैसा भारत में हो रहा है। यहां राष्ट्रभाषा हिन्दी के समाचार पत्रों के जिला संस्करणों में दोष पूर्ण वाक्य विन्यासों की भरमार रहती है। सामान्य शब्द तक गलत छपते हैं यहां तक कि मोटे शीर्षक भी इससे अछूते नहीं रहते। इससे हिन्दी का घोर अवमूल्यन हो रहा है और यह कमी छोटे मोटे अखबारों में ही नहीं नं0 एक का दावा रखने वाले अखबारों तक में है। नवोन्मेष से तो रचनात्मक गुण के अभाव की वजह से देशी पत्रकारिता शून्य है।

साहित्यकार, कवि, जनवादी राजनैतिक सगठन मुख्यधारा की पत्रकारिता से बाहर खदेड़े जा चुके हैं क्योंकि कोई मीडिया प्रतिष्ठान पैसे के बदले में ही खबर देने की आदत बना चुके अपने पत्रकारों पर अंकुश नहीं लगा पा रहा है। पत्रकारिता में प्रगतिशील रूझान में भी पिछले कुछ अरसे से जबरदस्त गिरावट आयी है। शीर्ष स्तर पर तो भले ही कुछ लोकलाज का लिहाज किया जाता हो लेकिन धरातल की पत्रकारिता तो पूरी तरह प्रतिगामी प्रवृत्तियों से संचालित हो रही है जिस पर अंकुश लगाना तो दूर शीर्ष स्तर से ऐसी प्रवृत्तियों को मौन रहकर पूरी तरह प्रोत्साहन प्रदान किया जाता है। इन चुनौतियो के बीच पत्रकारिता को विचारों की मशाल जलाये रखने वाली विधा के रूप में पुनर्जीवन देना एक कठिन काम है। यह कैसे हो हर काल खंड में समाज में मौजूद रहने वाली बेचैन आत्माओं के लिए यह शोचनीय प्रश्न है।

उरई (जालौन) से केपी सिंह की रिपोर्ट. संपर्क: 09415187850

विजयम्मा से मिलने के बाद एक ही सवाल घूम रहा है, नॉर्थ में कब आएगी यह समझ?

अपनी रिपोर्टिंग के सिलसिले में कल यानी बुधवार को मेरी मुलाकात आंध्र के नेता और कांग्रेस की रातों की नींद उडाने वाले जगन मोहन रेड्डी की मां विजयम्मा से हुई। जगन के जेल में होने के चलते विजयम्मा वाईएसआर कांग्रेस पार्टी यानी वाईआएसआरसीपी की कार्यकारी अध्यक्ष भी हैं। पिछले दो दिनों से वह दिल्ली में आंध्र प्रदेश के विभाजन के खिलाफ राष्ट्रपति और सभी राजनीतिक दलों के नेताओं से मिलने आई थीं।

शायद आगामी दिनों के लिए राजनीतिक साथी तलाशने भी। बहरहाल, मेरी उनसे मुलाकात कुछ अजीब थी। होना ही था क्योंकि विजयम्मा सिर्फ तेलुगु जनती हैं। एक तेलुगु चैनल की पत्रकार ने मुझसे कहा कि वह उनसे बातचीत करके मुझे उनके ख्याल बता देगी। मेरी पास और कोई चारा भी नहीं था। अपने ईटीवी के दिनों में मैंने जो कुछेक तेलुगु शब्द सीखे थे उनके बल पर मैं बातचीत की दिशा समझने की कोशिश कर रही थी। लेकिन कुछ काम नहीं बना। तो मैंने विजयम्मा के व्यक्तित्व पर ध्यान देना शुरू किया।

यह तो साफ था कि अपने पति, वाइएस राजशेखर रेड्डी के जीवन काल में राजनीति में सीमित सक्रियता रखने वाली विजयम्मा को पति के हादसे में मौत और बेटे की गिरफ्तारी ने सीधे पार्टी की जिम्मेदारी लेने को बाध्य कर दिया था। खैर, जब विजयम्मा अपने बेटे व परिवार के साथ कांग्रेस नेतृत्व के छल-कपट, झूठ वगैरह का तेलुगु में विस्तार से बखान कर रही थीं तो मेरी नजर उनके लुक्स पर टिकी हुई थी। और क्या करती?

विजयम्मा ने अपने सांवले माथे पर खूब बडी सी सुर्ख लाल बिंदी लगाई हुई थी। उन्होंने कीमती सूती कपड़े की चौड़ी सुनहली बॉर्डरदार नारंगी रंग की साड़ी पहनी थी। उनकी कलाइयों में साड़ी से मैच करने वाली चमकदार नारंगी रंग की कांच की चूड़ियां थीं। मुझे याद आया हैदराबाद के बाजारों में ऐसी चूड़ियां खूब बिकती हैं। और तभी अचानक कार्टून के किरदारों की तरह मेरे भी दिमाग की बत्ती जल उठी।

मुझे लगा कि वाईएसआर की मौत को तो अरसा बीत चुका है। फिर यह सब कैसे? यहां यह बता देना शायद जरूरी है कि विजयम्मा उन क्रांतिकारी महिलाओं में नहीं हैं जो फेमिनिस्ट दावे को पुष्ट करने के लिए समाज से पंगा लें। दरअसल, सचाई यह है कि दक्षिण का समाज पिछले बहुत सालों से इस सच्चाई या बदलाव को स्वीकार कर चुका है कि पति के दुनिया से चले जाने के बाद भी पत्नी अपने वैधव्य को प्रचारित करने के बजाय एक सामान्य पहनावा अपना सकती है और जो चाहे पहन-ओढ सकती है।

एक वाकया याद आया जब मेरे पूर्व सहयोगी प्रमोद चूंचूवार ने मुझे बताया था कि विदर्भ सहित महाराष्ट्र के कई इलाकों में भी महिलाओं ने इस बदलाव को लाया था और यहां तक दावा किया था कि वह पति के देहावसान के बाद भी सुहाग की निशानियों को अगर चाहें तो त्याग न करें क्योंकि उनके पति उनके मन में हैं, उनका आत्मिक रिश्ता बरकरार है। यह गूढ फलसफा है, इस पर बहस हो सकती है। लेकिन ध्यान देने वाली बात यह है कि यह सब गांव-देहात की महिलाएं थीं। मेरी मित्र निस्तुला ने बताया कि उसके गृह प्रदेश कर्नाटक में भी यह बदलाव दशकों पहले आ चुका है।

स्वाभाविक था मेरे दिमाग में उन सब महिलाओं की तस्वीर कौंध गई जो हमारे समाज में अपने पति को खो देती हैं। खास तौर पर जिनके साथ बेहद कम सम्र में ही ऐसा हादसा हो जाता है। बेशक, अब हमारे समाज में भी रंगीन कपड़ों पर रोक नहीं है लेकिन क्या वे सचमुच अपनी इच्छा से पहन ओढ सकती है? सवाल सुंदर या आकर्षक दिखने का नहीं है। वैसे भी मुझे उनमें से किसी के आकर्षण में कोई अंतर नहीं दिखा। मगर सवाल समाज के दबाव से, तानों के भय से अपनी इच्छाओं को दमन करने का है। और एक या दो दिन या कुछ महीने नहीं, पूरी जिंदगी।

विजयम्मा से मिलने के बाद एक ही सवाल घूम रहा है, नॉर्थ में कब आएगी यह समझ?

लेखिका स्मिता मिश्रा वरिष्ठ पत्रकार हैं. ईटीवी, दैनिक भास्कर, दैनिक हिंदुस्तान समेत कई अखबारों-चैनलों में वरिष्ठ पद पर काम करने के बाद इन दिनों दक्षिण भारत के अंग्रेजी अखबार 'मेट्रो इंडिया' की दिल्ली ब्यूरो चीफ हैं. उनसे संपर्क mishrasmi@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

सोनभद्र से हिंदी वीकली अखबार ‘वनांचल एक्सप्रेस’ तेरह अक्टूबर से

विंध्य की घाटियों और ‘शोण’ नद (सोन नदी) के प्रवाह क्षेत्र में स्थित कैमूर वन क्षेत्र के आदिवासी बहुल जनपद ‘सोनभद्र’ से 13 अक्टूबर, 2013 (रविवार) को हिन्दी साप्ताहिक समाचार-पत्र ‘वनांचल एक्सप्रेस’ का पहले अंक प्रकाशित किया जाएगा. ‘वनांचल एक्सप्रेस’ जनवादी एवं प्रगतिशील लेखकों तथा पत्रकारों की पहल है. यह समाचार-पत्र वनांचल क्षेत्र की पृष्ठभूमि और उससे जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से प्रकाशित करेगा.

इसकी शुरुआत उत्तर प्रदेश के सोनभद्र, मिर्जापुर, चंदौली और वाराणसी, बिहार के कैमूर, झारखंड के गढ़वा, छत्तीसगढ़ के सरगुजा और मध्य प्रदेश के सीधी तथा सिंगरौली जिलों पर केंद्रित कवरेज से हो रही है. इसके अलावा वनांचल क्षेत्र से जुड़ी राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय महत्व वाली खबरों, रिपोर्टों एवं विश्लेषणों को भी प्रकाशित किया जाएगा. इस अखबार से संपर्क vananchalexpress@gmail.com के जरिए किया जा सकता है. अखबार से पत्रकार शिव दास समेत कई लोग जुड़े हुए हैं.

प्रेस रिलीज

सहारा का बड़बोलापन भारी पड़ रहा, पीएफ डिपार्टमेंट जांच करा रहा

सहारा वालों ने एक बार एक विज्ञापन निकालकर बड़ी बड़ी बातें कहीं थी और उसी में यह भी बताया था कि उनके यहां साढ़े दस लाख कर्मचारी काम करते हैं. बस, इसी बात को प्राविडेंट फंड डिपार्टमेंट वालों ने पकड़ लिया और जांच करा रहे हैं कि सहारा में अगरे इतने कर्मचारी हैं तो उनका पीएफ कटता या नहीं. अगर कटता है तो वो कहां जमा हुआ, कब जमा हुआ. सहारा का मामला सुप्रीम कोर्ट से लेकर सेबी तक में फंसा हुआ है.

सहारा वाले अंदरखाने काफी कुछ बदलाव भी कर रहे हैं. कई वेंचर से सहारा का मालिकाना हक खत्म कर रहे हैं ताकि उसे सहारा का एसेट न बताया जा सके. ऐसा इसलिए कि अगर सुप्रीम कोर्ट ने बाइस हजार करोड़ रुपये की गारंटी के लिए सहारा की संपत्तियों को सीज करना शुरू किया तो कुछ ऐसी संपत्ति, कंपनी, वेंचर बच जाएं जो सहारा की तो हों पर सहारा के मालिकाना हक से मुक्त हों. फिलहाल ये खबर पढ़िए जो इकानामिक टाइम्स में प्रकाशित हुई है, विकास धूत की बाइलाइन…

Subrata Roy-run Sahara group under EPFO scanner for compliance lapses

NEW DELHI: The Subrata Roy-run Sahara group is in for fresh trouble, this time from the provident fund department. Central Provident Fund Commissioner KK Jalan has asked officers at the fund's Uttar Pradesh office to initiate swift action for alleged compliance lapses by Sahara group, which claimed to have 10.13 lakh employees in an advertising blitzkrieg last December.

The move comes days after the Supreme Court asked two of the Sahara group companies whether they can give a 20,000-crore bank guarantee. The court was hearing a contempt petition by the Securities and Exchange Board of India (Sebi) against the group.

Sahara had launched the advertising campaign to counter the pall of negativity around its activities ever since it came under the market regulator Sebi and Supreme Court scanners for raising funds from millions of investors allegedly in violation of laws.

Though the regional PF office had initiated a probe into the group's compliance status for these employees under the Employees' Provident Fund Act of 1952 within weeks of the ad campaign, it has been pulled up for failing to take the matter to its logical conclusion. "Necessary action against Sahara and its other defaulting companies has to be initiated and report submitted to the Employees' Provident Fund Organisation ( EPFO) headquarters," Jalan told the officials in-charge of Uttar Pradesh and Bihar at a recent review meeting, minutes of which were reviewed by ET.

Subrata Roy-run Sahara group under EPFO scanner for compliance lapses
A senior official aware of the developments at the meeting told ET that sometimes officials fear taking action against powerful entities.

"So, a clear message has been sent to officials to act against all defaulters irrespective of who they are. The Sahara group and its companies are no exception," the official said. "Now the local PF office has no option but to act."

Jalan also directed all zonal PF heads to personally monitor recovery of workers' retirement savings in all default cases where the pending amount exceeds 50 lakh. Senior PF officials told ET that the Sahara group firms are likely to have evaded employees' PF dues on a large scale, if its claim of having a 10.13 lakh-strong workforce is true.

A Sahara group spokesperson, however, rejected the charge.

"The exercise is in the absence of any apparent violation of any law, rule, regulation or circular of the PF authorities by the Sahara Group," the spokesperson said, stressing that the PF department's action was not the result of any complaint but was a "routine affair". "All inspections till October 2012 have been to the satisfaction of the PF authorities, without any objections till then," he added.

The Sahara group's advertisements, issued on December 1 last year, had claimed that it has a workforce of 10.13 lakh salaried and field workers' who are "earning bread and butter for their families".

"It is submitted that the Sahara group is not privy to either your learning about any action against the group. Further, the investigation being carried out, its manner, procedure and the (illegal) demands made have been challenged before the Hon'ble High Court, Lucknow, and the matter is sub-judice as on date," the Sahara group spokesperson said, adding it would "not be in the appropriateness of things to say anything in respect of the alleged action initiated as per your knowledge".

The PF office had issued a show-cause notice to Sahara India on December 21 last year, asking the company why its premises must not be entered, searched and seized by its inspectors since it has been refusing to share employee records and details related to their PF payments.

(साभार- इकानामिक टाइम्स)

हिंदुस्तान, कानपुर के चार कर्मियों ने अखबार मैनेजमेंट के खिलाफ श्रम विभाग को लिखा पत्र

हिंदुस्तान, कानपुर में कार्यरत चार कर्मियों पारस नाथ साहू, नवीन कुमार, अंजनी प्रसाद और संजय कुमार दुबे ने उप श्रमायुक्त, कानपुर को पत्र लिखकर अपने साथ हो रहे अन्याय के बारे में खुलकर बताया है. इन चारों को इनके मूल काम से अलग कर प्रबंधन ने इन्हें अलग डिपार्टमेंट में ट्रांसफर कर दिया है. प्रबंधन की कोशिश इन्हें किसी तरह अखबार से अलग करने की है. इन लोगों ने पत्र में हिंदुस्तान, कानपुर के महाप्रबंधक नरेश पांडेय पर कई आरोप लगाए हैं. पूरा पत्र नीचे दिया जा रहा है…

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हिंदुस्तान, अखबार कानपुर के पीड़ित कर्मियों और प्रबंधन की तरफ से मैनेजर के बीच श्रम विभाग ने एक बैठक का आयोजन कराया पर इसमें कोई नतीजा नहीं निकला. कर्मियों ने प्रबंधन और श्रम विभाग के अफसर पर उपेक्षा का आरोप लगाते हुए एक अन्य पत्र अपर श्रम आयुक्त, कानपुर को भेजा है. नीचे सारे पत्र प्रकाशित किए जा रहे हैं. इन्हें ध्यान स पढ़िए..

 



उल्लेखनीय है कि हिंदुस्तान प्रबंधन बिहार के कई संस्करणों के दर्जनों कर्मियों का तबादला यूपी और उत्तराखंड की यूनिटों में इसलिए कर दिया है कि ये लोग परेशान होकर खुद नौकरी छोड़ देंगे. ऐसा इसलिए किया गया ताकि मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों के अनुरूप इन्हें वेतन देने से बचा जा सके और इस प्रकार हिंदुस्तान के मालिकों का करोड़ों रुपये बचाया जा सके. पूरा मामला इन लिंक पर क्लिक करके जान समझ सकते हैं…

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अमर उजाला समूह ने आपदा के दौरान किए गए उल्लेखनीय कार्य के लिए किया कर्मियों का सम्मान

देहरादून। अमर उजाला समूह ने जून माह में आई आपदा में उल्लेखनीय रिपोर्टिंग करने वाले संस्थान के संपादकीय सहयोगियों को एक विशेष समारोह में सम्मानित किया। इस अवसर पर नोएडा से आए कार्यकारी संपादक उदय कुमार ने सम्मानपत्र के साथ ही सम्मान राशि का चेक देकर सहयोगियों का हौसला बढ़ाया। अपने संबोधन में उदय कुमार ने कहा कि अमर उजाला सिर्फ एक प्रोडक्ट न होकर पहाड़ के सुख-दुख का साथी है। इसीलिए उसने लोगों के दिल में अपनी जगह बनाई है।

आपदा में सहयोगियों ने अपनी इस भूमिका का जिस कुशलता के साथ निर्वाह किया, वह गर्व का विषय है। अमर उजाला देहरादून के स्थानीय संपादक विजय त्रिपाठी ने आपदा की भयावहता और उससे उत्पन्न चुनौतियों का जिक्र करते हुए सहयोगियों के कामकाज की तारीफ की। उन्होंने कहा कि भविष्य में भी हम हर तरह की चुनौती का सामना करने को तैयार हैं। इस अवसर पर आपदा में कार्य करने वाले सहयोगियों ने अपने अनुभव भी साझा किए।

सम्मानित होने वाले सहयोगी इस प्रकार हैं- सुधाकर भट्ट, संदीप थपलियाल, लखपत रावत, दीपक बेंजवाल, आशाप्रसाद सेमवाल, ओमप्रकाश बहुगुणा, पंकज गुप्ता, सूरत सिंह रावत, सूर्यप्रकाश नौटियाल, दिनेश रावत, प्रमोद सेमवाल, राजा तिवारी, भुवन शाह, देवेंद्र बर्थवाल, विजय मेंदुली, विनय बहुगुणा, लक्ष्मीप्रसाद कु मेड़ी वीरेंद्र कुमार, यशवंत बडियारी, रमेश जोशी, जयवीर मनराल, वसंत शाह, कु लदीप खंडेलवाल, जगमोहन सिंह रावत, विजय दास, मुकेश नैथानी, नवल यादव, अभ्युदय कोटनाला, अतुल कुमार श्रीवास्तव,  प्रिंस माहेश्वरी और महेश कुमार।

‘जो ज्ञानपुर के विधायक विजय मिश्र के खिलाफ छापेगा, वह ढेर सारे फर्जी मामले खुद पर पाएगा’

सेवा में यशवंत जी, संपादक, भड़ास4मीडि‍या, उत्‍तर प्रदेश के भदोही जि‍ले के ज्ञानपुर वि‍धानसभा सीट से बाहुबली सपा वि‍धायक वि‍जय मि‍श्र के के तमाम गोरखधंधे जि‍ले में चल रहे हैं। बालू खनन हो चाहे सड़कों के निर्माण में धांधली का मामला जि‍ले का कोई भी पत्रकार इनके खि‍लाफ खबरें छापने से कतराता है। इसका दो कारण है वि‍धायक जी द्वारा वि‍ज्ञापन और अन्‍य तरह का लाभ पत्रकारों को जम कर दि‍या जाता है। और अगर कोई पत्रकार इन गोरखधंधों की खबर लि‍ख दे तो उसे झूठे मुकदमों में फंसाकर प्रताड़ि‍त कराया जाता है।

ताजा मामला आजतक के भदोही संवाददाता और जनसंदेश टाइम्‍स के पत्रकार सुरेश गांधी उर्फ सुरेश जायसवाल का है। जि‍न्‍होने सड़क से लेकर बालू खनन तक के मामले पत्रकारि‍ता के माध्‍यम से सामने लाया लेकि‍न उन्‍हे पुलि‍स प्रशासन ने इतना प्रताड़ि‍त कि‍या कि उन्‍हें जि‍ला छोड़ना पड़ा और तीन माह से बीबी बच्‍चों को लेकर जि‍ले से बाहर रह रहे हैं। उनके उपर गुण्‍डा एक्‍ट के तहत भी कार्यवाही की गयी जि‍स पर कोर्ट ने रोक लगा रखा है और इस मामले में हाईकोर्ट ने डीएम एसपी, कोतवाल सहि‍त प्रमुख गृह सचि‍व को तलब कि‍या है।

—यह वही वि‍धायक हैं जो राष्‍ट्रपति प्रणव मुखर्जी के भोज में जेल में रहने के दौरान मुख्‍तार अंसारी के साथ पहुंच गए थे। इलाहाबाद के नैनी से जब छूटे तो इनकी बेटी सीमा मि‍श्रा ने पुलि‍सवालों को खुलेआम पांच पांच सौ के नोट बांटे थे। पेशी के दौरान एक सीओ को भी थप्‍पड़ दि‍या था। बसपा सरकार में कैबीनेट मंत्री रहे नंद गोपाल गंप्‍ता नंदी के उपर हुए जानलेवा हमले में आरोपी हैं । इसके आलावां भी तमाम अपराधि‍क इति‍हास है इनका।
 
—आपको सुरेश गांधी का एक वीडि‍यो लिंक भेज रहा हूं जि‍से देखकर आप खुद अंदाजा लगा सकते हैं कि यह कार्यवाही कि‍सके इशारे पर हो रही है। आपसे नि‍वेदन है कि यूट्यूब के इस लिंक पर जरूर जाकर वीडि‍यो देखें और वीडि‍यो सहि‍त प्रकाशि‍त करने की कृपा करें ।

http://www.youtube.com/watch?v=lPJkKtXigD0&feature=share

https://www.facebook.com/suresh.gandhi.35

भदोही पोलखोल bhadohipolkhol@gmail.com नामक मेल आईडी की तरफ से भड़ास को प्रेषित.

‘समाचार प्लस, राजस्थान’ मात्र दो महीने में रेटिंग्स में दूसरे नंबर तक पहुंच गया

Jai Prakash Sharma : मित्रों, आप सभी की शुभकामनाओं से 'समाचार प्लस, राजस्थान' मात्र दो महीने में रेटिंग्स में दूसरे नंबर तक पहुंच गया है. चालीसवें सप्ताह की रेटिंग्स में समाचार प्लस ने बड़ी छलांग लगाते हुए सबको चौंकाया है. ये सब आप सभी मित्रों से मिलने वाले सतत मार्गदर्शन का नतीजा है.

साथ ही ये नतीजा है हमारे एडिटर इन चीफ उमेश कुमार जी और एक्जीक्यूटिव एडिटर प्रवीण साहनी जी के कुशल संपादकीय प्रबंधन का. हम लगातार आगे बढ़ने के लिए परिश्रमरत हैं. आप सभी का सतत सहयोग और आलोचनात्मक मार्गदर्शन आगे भी मिलता रहेगा और हम आगे बढ़ते जाएंगे.

सादर

टीम समाचार प्लस राजस्थान

समाचार प्लस, राजस्थान चैनल के साथ जुड़े जय प्रकाश शर्मा के फेसबुक वॉल से.

पांच न्यूज चैनलों ने ओपीनियन पोल घोटाल किया : अरविंद केजरीवाल (देखें वीडियो)

फायरब्रांड नेता और करप्शन के खिलाफ जंग लड़ने वाले योद्धा अरविंद केजरीवाल दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए पूरी तरह कमर कसे हुए हैं और जनता में जो अंडरकरंट है, उसे देखते हुए वे खुद भी कह रहे हैं कि दिल्ली प्रदेश में अगली सरकार आम आदमी पार्टी की बनने वाली है.

केजरीवाल ने नए लांच चैनल 'जिया न्यूज' से जुड़े पत्रकार विवेक सत्य मित्रम से एक बातचीत में बताया कि पांच न्यूज चैनलों ने ओपीनियन पोल घोटाला किया है. चैनलों का नाम न लेते हुए केजरीवाल ने कहा कि इन न्यूज चैनलों ने जो ओपीनियन पोल किया, उसका कोई डाटा अपने वेबसाइटों पर नहीं डाला. केजरीवाल ने चैनलों को इस तरह कटघरे में खड़ा किया और चुनाव को लेकर क्या क्या बातें कहीं, उसे पूरा जानने सुनने देखने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें…

http://bhadas4media.com/video/viewvideo/766/interview-personality/interview-with-arvind-kejriwal-on-delhi-election.html

राजनीति और पत्रकारिता : विश्वास का संकट

राजनीति और पत्रकारिता। दोनों विश्वसनीयता के संकट का सामना कर रही हैं। पत्रकारिता में पेड न्यूज का मामला सबके सामने है। इसे लेकर मीडिया का अंदरुनी संघर्ष जारी है। जबतक शुद्धि नहीं होती तबतक मुश्किल बनी रहेगी। अब देश के सधे राजनेताओं पर विश्वास का ग्रहण लग रहा है। खासकर देश के प्रथम नागरिक राष्ट्रपति ने लालकृष्ण आडवाणी के कहे को जिस तरह से नकारा हैं, उससे राजनेताओं के साख की पोल खुल रही है। इससे खतरनाक स्थिति बन सकती है।

भरोसे की कसौटी पर ही सार्वजनिक जीवन में राजनेता को बड़ा या छोटा साबित किया जाता रहा है। बीजेपी के भीष्म पितामह आडवाणी सक्रियता का बनावटी परिचय दे रहे हैं। उन्होंने अपराधियों को बचाने के लिए आए अध्यादेश के निरस्त होने का श्रेय राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को दिया था। ब्लॉक पर ऐसा लिखने से संदेश गया कि राष्ट्रपति से अध्यादेश पर हस्ताक्षर कराने में सरकार को मुश्किल आ रही थी। इससे राष्ट्रपति से सरकार के तीन मंत्रियों की मुलाकात को सरकार और राष्ट्रपति के बीच तनाव का आशय निकला। राष्ट्रपति में तुलनात्मक रुप से जनभावना की बेहतर समझ को आख्यानित किया गया। यह राहुल गांधी की ओर से अध्यादेश को बकवास करार दिए जाने और फाड़कर कूड़े में फेंकने के बयान को बेकार की बात बताने के लिए था। आडवाणी के ब्लॉग ओर ट्विट से राहुल गांधी नाटकबाज साबित हो रहे थे। यह साबित हो जाता तो ठीक था। पर राष्ट्रपति ने आडवाणी के दिए श्रेय को लेने से इंकार करके ना सिर्फ खुद को पचड़े से निकाल लिया। साथ ही चुपके से बता दिया कि शालीनता से कोसों का वास्ता रखने वाले युवराज नौटंकी नहीं कर रहे थे।

इससे कई नेताओं की तरह बुजुर्ग आडवाणी की किरकिरी हुई। विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा हो गया। लोग 2002 का वाकया याद दिलाने लगे। तब एनडीए की सरकार ने ऐसे ही अध्यादेश लाकर तात्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम को हैसियत का आईना दिखलाया था। अब्दुल कलाम का नैतिक पक्ष किसी से छिपा नहीं है। उन्होंने राष्ट्रपति बनाए जाने के तमाम एहसान को खारिज करते हुए अध्यादेश पर पहली बार हस्ताक्षर करने से मना कर दिया। अध्यादेश राष्ट्रपति भवन से लौट आया। सिपहसलारों की सलाह पर प्रधानमंत्री वाजपेयी की कैबिनेट ने कलाम साब को हैसियत बताना जरूरी समझा। अध्यादेश को जस का तस राष्ट्रपति के पास दोबारा भेज दिया। दोबारा आए अध्यादेश पर हस्ताक्षर करना राष्ट्रपति की वैधानिक बाध्यता थी,  अब्दुल कलाम की एक ना चली और थक हारकर उनको हस्ताक्षर करना पड़ता।

ऐसा नहीं है कि राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को श्रेय देने वाले ट्विट के वक्त आडवाणी राष्ट्रपति की हैसियत या बाध्यता से अनजान रहे होंगे। खासकर तब जब उनकी ही सरकार के पास राष्ट्रपति को इस मामले में हैसियत बताने का रिकार्ड है। राष्ट्रपति ने श्रेय उलटकर दो काम किया है। पहला, राजनीतिक प्रगाढ़ता की समझ का परिचय दिया है। दूसरा, शीर्ष राजनेताओं के कहे पर भरोसे के संकट को बयां कर दिया है। यह दुखद है। आडवाणी ही नहीं तेलांगना को लेकर सरकार के कई मंत्रियों का सच की कसौटी के विपरीत कई बयान आ रहे हैं। चारों ओर अविश्वास का माहौल बना है। इससे आभास हो रहा है कि आने वाला समय दुरूह होने जा रहा है। जाहिर है भरोसे के अभाव में राजनीति करना और मुश्किल होता जाएगा।

मिसाल की बात करूं तो सिर्फ आडवाणी के विश्वसनीयता ही समस्या में नहीं फंसी बल्कि यही गति नरेन्द्र मोदी की होती दिख रही है। आडवाणी को ठिकाने लगाने वाले नरेन्द्र मोदी बयान देने में अविश्वसनीय तरीके से कच्चे साबित हो रहे हैं। दिल्ली की रैली में एक साथ पाकिस्तान और मीडिया दोनों पर हमला किया। एक ओर नवाज शरीफ की शराफत पर सवाल उठाया तो दूसरी ओर मीडिया को राष्ट्रीय धर्म का पाठ पढाया। मोदी ने एक पाकिस्तानी पत्रकार के बयान को आधार बना जो कहा वह गलत साबित हुआ। मोदी ने भरी जनसभा में जोश दिलाने के लिए “भरे दिल” का हवाला देते हुए कहा कि नवाज शरीफ ने भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को “देहाती औरत” कहा है। यह बात भारतीय पत्रकार के सामने कही गई। पत्रकार ने भारतीय प्रधानमंत्री की तौहीन पर एतराज जताने के बजाय शरीफ के साथ जलपान करना पसंद किया।

तहकीकात के बाद पता लगा कि मोदी की विश्वसनीयता ही ट्रैप में फंस गई। पाकिस्तान ने अधिकारिक बयान जारी करके कहा कि शरीफ ने भारतीय प्रधानमंत्री की तौहीन नहीं की। यह भी पता लगा कि जिस वक्त पाकिस्तान प्रधानमंत्री का कथित आपत्तिजनक बयान आया उस वक्त कोई भारतीय पत्रकार मौजूद ही नहीं था। उल्टे शरीफ को अतिरिक्त शराफत प्रदर्शित करने का मौका मिल गया और भारतीय प्रधानमंत्री से एक न कही बात के लिए माफी मांग ली।

 मीडिया के लिए अधिकारिक बयान का महत्व होता है। यह मानकर चला जाता है कि कोई भी अधिकारिक बयान अविश्वसनीय नहीं होता है। अधिकारिक बयान ही खबरों की पूरी दुनिया यानी मीडिया को संचालित करती है। हर शाम अधिकारिक ब्रीफिंग की विश्वसनीयता की वजह से ही बीजेपी, कांग्रेस, वामपंथी और जनता परिवार के राजनीतिक दलों के दरबार में मत्था टेकने के लिए पत्रकारों की बड़ी फौज जुटती है। इन दफ्तरों की अधिकृत ब्रीफिंग से पत्रकारों को दशकों से वो खुराक मिलता रहा है, जो उनको दिन भर के कठिन परिश्रम से नहीं मिल पाता है। ब्रीफिंग के तथ्य की व्याख्या करने के तरीके पर एतराज या विवाद तो हो सकता है, पर तथ्य पर कोई सवाल नहीं होता। नियमित ब्रीफिंग के अलावा पत्रकार इन दफ्तरों के उन्हीं नेताओं का दरबार सजाया करते हैं, जो विश्वसनीय होते हैं। मिसाल के तौर पर दिग्विजय सिंह को लीजिए। दिग्विजय सिंह के बारे में आप चाहे जो राय रखते हों, पर पत्रकारों के दुलारे वो सिर्फ इसलिए हैं कि उनमें अपने विश्लेषित टीम के जरिए अंदर की बात निकाल लाने का जबदस्त माद्दा है। यह माद्दा तो और भी कई नेताओं के पास है। इसका लाभ उनको मीडिया देती है। जिनकी बताई जानकारी तथ्यपरक होती है और धोखा खाने का डर सबसे कम होता है। उनपर हरदिन खबर निकालकर परोसने वाले पत्रकार सबसे ज्यादा आश्रित होते हैं। यह सहज स्वाभाविक है। अगर दिग्विजय सिंह जैसा नेता कहता है कि पूरबियों से द्वेष के जरिए मराठी मानुष की राजनीति करने वाले राज ठाकरे पुरखे बिहार से थे, तो उसे लेकर मीडिया दौड़ लेती है। प्रसारित करने में मीडिया को कोई दिक्कत नहीं होती है बल्कि अगले दिन ऐसी ही किसी हतप्रभ करने वाले खबर की उम्मीद में उनका दरबार सजाए रखने में मीडियाकर्मियों को कोई दिक्कत महसूस नहीं होती है।

दिग्विजय सिंह विश्वसनीयता बढाने के लिए प्रमोदन ठाकरे की पुस्तक का अंश तबतक मुहैया कराते हैं। दिग्विजय सिंह की तरह ही बीजेपी में अरुण जेटली हैं। हर अधिकारिक ब्रीफिंग के बाद उनके आवास पर होने वाली डी ब्रीफिंग अखबार के सुर्खियों का आधार बनती हैं। न्यूज़ चैनल की ब्रेकिंग न्यूज़ अधिकारिक ब्रीफिंग से ज्यादा इन विश्वसनीय नेताओं के डी ब्रीफिंग से आती है। बाकी नेताओं से भी मीडिया को यही अपेक्षा रहती है। प्रमोद महाजन की कमी आज भी मीडिया को इसी विश्वास की वजह से खटकती है। अधिकारिक ब्रीफिंग में भरोसे का नतीजा है कि मीडिया अरविंद केजरीवाल को आंखों पर रखती है। राबर्ट बढेरा से लेकर सलमान खुर्शीद के खिलाफ मीडिया का प्रचार खुद की जांच से अधिक भरोसा आधारित राजनेताओं से मिली जानकारी पर टिकी होती है।

ऐसे में अपेक्षा लाजिमी है कि नेता भरोसे को तोड़ने का काम न करें। झटके से बड़ा होने की चाहत में आंखों में धुल झोंकने का काम बंद हो और जब जो भी कहा जाए वह पूरी तहकीकात के बाद भरोसे को कसौटी पर कसने के लिए कहा जाए। अधिकारिक ब्रीफिंग की विश्वसनीयता के आधार पर ही युद्ध लडे जाते हैं। मीडिया का काम ब्रीफिंग में कही बात पर एतराज करने के बजाय उसको रिपोर्ट करना होता है। ब्रीफिंग के दौरान वह सिर्फ कही बात को सहजता से लिखने के लिए प्रतिसवाल किया करता है ताकि उस कहे के आधार की पुष्टी हो सके।

लेखक आलोक कुमार ने कई अखबारों और न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. उन्होंने 'आज', 'देशप्राण', 'स्पेक्टिक्स इंडिया', 'करंट न्यूज', होम टीवी, 'माया', दैनिक जागरण, ज़ी न्यूज, आजतक, सहारा समय, न्यूज़ 24, दैनिक भास्कर, नेपाल वन टीवी में अपनी सेवाएं दी हैं.  झारखंड के पहले मुख्यमंत्री के दिल्ली में मीडिया सलाहकार रहे. कुल तेरह नौकरियां करने के बाद आलोक काफी समय से समाज सेवा, पर्यावरण सक्रियता, मुक्त पत्रकारिता की राह पर हैं. उनसे संपर्क aloksamay@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

सुभाष चंद्रा दिल्ली पुलिस मुख्यालय पहुंचे तो उनके समर्थकों ने मीडिया से दुर्व्यवहार किया! (देखें वीडियो)

भड़ास4मीडिया के पास किन्हीं Shilpa Kumar ने kumarshilpa325@gmail.com मेल आईडी से एक वीडियो भेजा है, जिसमें दिखाया गया है कि जी ग्रुप के मालिक और खबर रोकने के लिए नवीन जिंदल से पैसे मांगने के आरोपी सुभाष चंद्रा दिल्ली पुलिस मुख्यालय पहुंच रहे हैं और मीडिया वाले जब उनसे कुछ सवाल पूछते हैं तो उनके आदमी मीडिया वालों को दाएं-बाएं करके सुभाष चंद्रा को आगे बढ़ने के लिए रास्ता बना रहे हैं. इस वीडियो को भेजने वाले ने वीडियो के साथ जो टेक्स्ट लिखकर भेजा है उसमें कहा है कि सुभाष चंद्रा के लोगों ने मीडिया वालों के साथ दुर्व्यवहार किया.

पर वीडियो में दुर्व्यवहार जैसा तो कुछ नहीं दिख रहा है, हां, सुभाष चंद्रा के आदमी मीडिया वालों को सवाल पूछने से रोकने की कोशिश जरूर कर रहे हैं और यह कवायद सुभाष चंद्रा को निर्बाध अंदर जाने के लिए रास्ता बनाने की खातिर किया जा रहा है. शिल्पा कुमार ने यूट्यूब पर ये वीडियो फोकस टेलीविजन ग्रुप नामक यूट्यूब चैनल पर लोड कर रखा है. इससे जाहिर है कि जिंदल के पाजिटिव मीडिया हाउस, जिसके तहत फोकस व हमार समेत कई चैनल आते हैं, के लोगों ने इस वीडियो को यूट्यूब पर अपलोड किया है और भड़ास के पास प्रकाशित होने के लिए भेजा है. मेल के साथ आया पूरा टेक्स्ट इस प्रकार है…


Subhash Chandra Supporters Misbehaving with Media

Black Sheep of journalism Subhash Chandra accused of extortion met Commissioner of Police on Monday at PHQ, Delhi. Avoiding media questions his discomfort was quite evident. Watch this video wherein his supporters misbehaved with media persons.  

It would be interesting to ponder on what his intentions could be? Is he trying to influence the case? I would request you to give it your kind consideration.  

Thanks & regards
Shilpa Kumar
kumarshilpa325@gmail.com


वीडियो देखने के लिए उपर प्रकाशित तस्वीर पर या नीचे दिए गए इस लिंक पर क्लिक करें…

http://old1.bhadas4media.com/video/viewvideo/767/news-incident-event/shubhas-chandra-at-phq-delhi.html


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जिंदल से उगाही की साजिश में चंद्रा के शामिल होने के सबूत


पुलिस ने 100 करोड़ उगाही में सुभाष चंद्रा, सुधीर चौधरी और समीर को दोषी माना, चार्जशीट दायर


जिंदल से डील करते सुधीर चौधरी और समीर अहलूवालिया की सीडी देखने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें..

http://old1.bhadas4media.com/video/viewvideo/638/media-world/zee-jindal-cd-naveen-jindal-sudhir-chaudhari-and-samir-ahluwaliya.html


जी न्यूज की सेल्स टीम को नहीं थी जानकारी, संपादक कर रहे थे जिंदल से डील


सुभाष, सुधीर व समीर ने जांच में सहयोग नहीं किया, सबूतों को नष्ट किया


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zee jindal

पीएसी को दस मिनट देर से आने के लिए तैयार किया था ‘अंकल’ ने (बातचीत की ट्रांसक्रिप्ट)

: मुजफ्फरनगर के कुटबा-कुटबी गांव के दंगाइयों की मोबाइल रिकार्ड में दर्ज बातचीत :  लखनऊ। । मुस्लिम विरोधी जनसंहार के शिकार गांव कुटबा-कुटबी के एक दंगाई के मोबाइल चिप में रिकार्ड बात-चीत का विवरण मीडिया में जारी करते हुये मुजफ्फरनगर, शामली और बागपत में हुये साम्प्रदायिक हिंसा की सीबीआई जांच की मांग की है। मंच ने जारी बयान में कहा है कि उसके पास ऐसे कई साक्ष्य मौजूद हैं जो साबित करते हैं कि मुस्लिमों का जनसंहार सुनियोजित षडयंत्र के तहत हुआ और अब किस तरह सुबूतों को छुपाने की कोशिश प्रशासनिक अमले द्वारा दंगाईयों को बचाने के लिए किया जा रहा है।

मंच ने कहा है कि वह जल्द ही इन तथ्यों को उचित प्लेटफार्म पर रखेगा। यहां से जारी बयान में जांच दल के सदस्यों आवामी काउंसिल फॉर डेमोकेसी एंड पीस के महासचिव असद हयात, राजीव यादव, शाहनवाज आलम और गुफरान सिद्दीकी ने कहा कि प्रदेश सरकार का प्रशासनिक अमला खुद इस षडयंत्र में शामिल रहा है इसलिए राज्य सरकार की तरफ से कराई जाने वाली जांच का कोई औचित्य नहीं है।

रिहाई मंच जांच दल के सदस्यों ने इस हिंसा में सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले गांवों मंे से एक कुटबा-कुटबी जहां आठ मुसलमानों की निर्मम हत्या कर दी गयी, के एक दंगाई के मोबाइल चिप में रिकार्ड बातचीत के व्यौरे के आधार पर सीबीआई जंाच की मांग की है।  फोन रिकार्ड में दर्ज बातचीत में दंगाई आपस में मुसलमानों को मारने उनके घरों को जलाने के साथ साथ पीएसी/सीआरपीएफ के गांवो में थोड़ी देर से आने का जिक्र करते हुए कह रहे हैं कि किस तरह पीएसी को गांव में देर से आने के लिए तैयार किया गया ताकि उन्हे मुसलमानों को काटने और जलाने का पर्याप्त समय मिल सके। रिहाई मंच ने जारी बयान में कहा कि इन गांव के हिंसा पीडि़त कई मुसलमानों ने उन्हें बताया कि इसी गांव के रहने वाले मुंबई एटीएस के चीफ के पी रघुवंशी के परिवार के दो सदस्यों पिन्टू और नीटू खतरनाक और अत्याधुनिक हथियारों जैसा कि फिल्मों में दिखता है (संभवतः एके 56 या एके 47) से लैस होकर दहशत फैला रहे थे। रिहाई मंच जांच दल ने कहा कि दंगाइयों से प्राप्त आडियो रिकार्ड में भी एक लड़की जिसका नम्बर 9917731428 है ने 8 सितंबर 2013 यानि जनसंहार के दिन मोबाइल इस्तेमाल करने वाले युवक से जिसका नाम अनुज है से बताया कि उसने ‘अंकल’ से बात करके पीएसी को गांव में देर से जाने के लिए तैयार किया था।

रिहाई मंच ने मांग की कि यह लड़की किसे ‘अंकल’ कह रही है इसकी जांच होनी चाहिए। रिहाई मंच के अध्यक्ष और एडवोकेट मोहम्मद शुऐब और हरे राम मिश्र ने कहा कि आतंकवाद के नाम पर निर्दोष मुसलमानों को फंसाने के लिए बदनाम और माले गांव, मक्का मस्जिद और समझौता एक्सप्रेस जैसे विस्फोटों के मास्टर माइंड कर्नल पुरोहित के नजदीकी के पी रघुवंशी के गांव कुटबा-कुटबी में ही इस मुस्लिम विरोधी हिंसा में अहम भूमिका निभाने वाले हिन्दुत्ववादी संगठन संघ शक्ति का सक्रिय रहना साबित करता है कि इसमें आला अफसरशाही और हिंदुत्व का गठजोड़ अहम था। उन्होंने कहा कि इसमें केपी रघुवंशी की भूमिका की जांच होनी चाहिए और पूरे मामले की जांच सीबीआई को सौंप देनी चाहिए।

द्वारा जारी-
शाहनवाज आलम, राजीव यादव
प्रवक्ता रिहाई मंच
09415254919, 09452800752

रिहाई मंच जांच दल को प्राप्त हुई चिप में बात चीत का विवरण जिसमें सबसे पहले मोबाइल नंबर तारीख व समय लिखा है। फिर बात चीत का विवरण. कुछ मोबाइल नंबर की जगह मोबाइल में सेव किये गये नाम भी दिख रहे हैं।

1.
+919917731428_2013-09-08_10.38.112021392617
कालर(महिला)- हेलो.
रिसीवर- हैलो.
कालर- एक जीच तू मुझे बता दे
रिसीवर- हां बता.
कालर- गांव में उन लोगेां के मरे या नही मरे
रिसीवर- मर लिये
कालर- पक्की खबर है बिल्कुल
रिसीवर- बिल्कुल पक्की है आग दे रखी है घरों में
कालर- पक्का
रिसीवर- पीएसी आली है, पीएसी लग रही है
कालर-पीएसी आली है, वही तो बात हो रही थी अभी- अभी या थोड़ी लेट भी पता
है क्यों आयी.
रिसीवर-हां.
कालर- रुकवाई थी कहकर कि अंकल थोड़ी देर रुकवा दो. मेरे कहते ही रोक दी.
यू कह रहे थे कि बात ऐसी है कि पूरी टीम को पता चल गया है कि वहां पर
दंगा हो गया. सिर्फ मुश्किल से मुश्किल 10 मिनट रोको फिर 10 मिनट बोलकर
10 मिनट ही रोका.
रिसीवर-हां हो लिए. 5-6 तो मर लिए.
कालर- हां तो चोक्खा(स्थानीय भाषा में बहुत अच्छा)और कुटबा
रिसीवर- कुटबे में ही 5-6 मरे. और तो भाग लिये सब.
कालर- हां अच्छा कुटबे में मरे हैं सब
रिसीवर- भाग गये सब.
कालर-ठीक है. ठीक
2.
+919917731428_2013-09-08_09.36
पुरुष- हैलो
महिला- हैलो.
महिला- और गांव में क्या हाल चाल है.
पुरुष- गांव में आग लग रही  है. तुम बच लो जी.
महिला-आग लग रही हो तभी तो तुम्हे फोन करूं.
पुरुष- आग लगई मै तो सब जाति …………
महिला- एक जीच बता दूं मौ तो.
पुरुष- हां.
महिला- बेज्जती तो करवा न दियो.
पुरुष-आं………
महिला-बेज्जती न करवाना जी पूरी पुलिस फोर्स दावा करके गयी है कि इस बार
कुछ नही किया तो लानत है.और फोर्स कुछ नही कहने को चाहे कितनों को मार
दो. फोर्स कुछ नही कहेगी किसी को चाहे जितनो को मार दो. सारी फोर्स कह
रही है कि बात ये है कि हिन्दू कुछ नही कर रहे हैं।
पुरुष- हां.
महिला-अब तो तुम समझ गये होगे.
—————————————————-
3.
SIM1_20130908_2138
कॉलर-हैलो.
रिसीवर- हैलो
कॉलर-उम्मेर बोल रहा हूं जी. मैं ……… खेडा़ में रह गया. काट मार हो गया.
रिसीवर- हां हिन्दू मुस्लिम हो रही.
कॉलर-हो रही. चोट चाट लगी.
रिसीवर- हां सब फिट……….आप बेफिकर रहिए.
कॉलर-और कहां हैं?
रिसीवर- 6 वहीं हैं घेर रखे हैं
कॉलर-अच्छा मेरी मां.
रिसीवर- तेरी मां एक जगह ही है.
कॉलर-अच्छा.
कॉलर-और मरद भाग गये?
रिसीवर- नही नही पीछा कर रहे हैं मर्दों का
कॉलर-अच्छा.
बाकी आवाजें अस्पष्ट है ………………………………
—————————————————
4.
918859855930_2013-09-08_23.07.30-649065850
कॉलर- हलो.
रिसीवर- क्यों भाई सो गये क्या.
कॉलर- नही
कॉलर- सोना नही भाई
कुछ बातें अस्पष्ट………………………
कॉलर- सोने का क्या मतलब.
रिसीवर- ये नंबर कहां से आया? अच्छा….. उससे लिया होगा…………..
……..फिर कुछ बातें अस्पष्ट………………
कॉलर- कुछ खबर आयीं
रिसीवर- हां भाई गयूर का घर फूंक दिये……..
……………………फिर काफी बातें  अस्पष्ट……………..
———————————————–

5. ़
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महिला-हम कुटबी में हैं जी. कुटबी में क्या हो रहा है?
पुरुष- कुटबे में जी बज रही है(स्थानीय भाषा में बनजे का मतलब पिटाई है)
महिला- आं……. बज रही है.
पुरुष- हां.
महिला- किसे.
पुरुष- कुछ तो भाग गये थे थोड़ी से रह गये थे घर-घुर जला दिये उनके. मार
काट चल रही है पूरी.
महिला- अच्छा.
पुरुष- हां.
महिला-………..बाकी आवाज अस्पष्ट…………………. मै साची फोन
करके पूंछूं क्या चल रहा है?
पुरुष- हां यही चल रहा है.
महिला- यही चल रहा है न.
पुरुष- पीएसी आली है(स्थानीय भाषा में आली को आ रही है बोलते हैं) बहुत सारी.
महिला- हिन्दू को तो नुकसान नही पहुंचा.
पुरुष- नही हिन्दू को तो नही पहुंचा. पर दो गांव हैं हमारी जद में
घड़सोली है और बसी है दोनों गांव का पता कर रहे हैं चढ़ाई कर रहे
है.सिसोली और…….बाकी आवाज अस्पष्ट…………
—————————————————-

6.
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कॉलर-क्या हाल है वहां का
रिसीवर-सब फिट है सब तैयार खड़े हैं
कॉलर-हथियार भी लिये हैं
रिसीवर- हां जो दे रहा है सब ले रहे हैं.
कॉलर- तेरे घर में भी है कुछ.
रिसीवर- हां है एक तमंचा दो गोली.
कॉलर- बस
रिसीवर- हां.
कॉलर- एक तमंचा दो गोली से क्या होगा तेरा?
रिसीवर-हां भाई फरसा भी है हाथ में
कॉलर- फरसा भी है तो गोली क्यों मार रहे थे क्यों
रिसीवर- कहां मार रहे थे.
कॉलर- वहां नही मारी थी गोली कल
रिसीवर- कल तो लाई थी लाओ गोली ला के दो
कॉलर-ठीक है
रिसीवर-गोलियों का जुगाड़ करवाओ
कॉलर- हां होगा गोली का जुगाड़. जी
रिसीवर- कहीं से ………अस्पष्ट आवाज………. करवाओ दो चार
पेट्टी………..तैयार मिलेंगे.
कॉलर-कहां मिल रही………………..अस्पष्ट………………..किसी
के पास स्टाॅक हो तो दे सके
रिसीवर- प्रधान……….अस्पष्ट……………….फोन करे
कॉलर- हां देख ले …… अस्पष्ट
रिसीवर- दंगे में कहीं आग नहीं लगा रखे हैं।
कॉलर- मस्जिद में लगा रखे हैं लेकिन सूअरी (इस क्षेत्र में कटुतावश
मुसलमानों के लिए इस्तेमाल किये जाने वाला जुमला) भाग गए। इनको डालेंगे
बाद में।
रिसीवर-फेर डालेंगे, बाद-बूद दूसरी होती है
………………..बाकी अस्पष्ट………………………
—————————————————-

7.
+919719290691_2013-09-08_17.19.021396270438
 कॉलर- हैलो
रिसीवर-हैलो
कॉलर- हैलो
रिसीवर-हैलो हां जी.
कॉलर- पप्पू बोल रहा है क्या?
रिसीवर- नही पप्पू तो नही बोल रहा अनुज बोल रहा हूं बताइये का बात है.
कॉलर- अनुज
रिसीवर- हां
कॉलर- कौन सा वाला.
रिसीवर- भाई मै तो कौन सा वाला बताउं.
कॉलर- तो.
कॉलर- तू कौन सा वाला बोल रहा है?
रिसीवर-कौन सा वाला बताऊं मै तो एक ही अनुज हूं.
 कॉलर-कुटबी से
रिसीवर- हां कुटबी से, बता तो
कॉलर- पप्पू बोल रहा मै.
रिसीवर- दिल्ली से
कॉलर- अच्छा हां क्या बात थी बताओ?
रिसीवर-झगड़ा तो नही हुआ था.
रिसीवर- हां झगड़ा हुआ, झगड़ा होके खतम हो लिया. फोर्स आयी थी.
कॉलर- ……आवाज अस्पष्ट…………
रिसीवर-हां 6-7 मार रखे हैं.
कॉलर- अच्छा
रिसीवर-……….आवाज अस्पष्ट……………. 6-7 मार रखे हैं और और को
ले गयी है मिलेटरी बैठा के. और जो है कुल मिलाकर दोनों गांवों में कोई
मुसलमान नही है और न काकड़े में न हड़ोली में. सब जा लिए हैं।
कॉलर- शान्ति हो गयी होगी अब तो
रिसीवर- शान्ति तो है फोर्स लग रही है
कॉलर- हां फोर्स लग गयी होगी.
रिसीवर- …………………………
—————————————————-

8.
RASE..babuu _2013-09-08_20.49.471708753978

कॉलर- हेलो.
रिसीवर(महिला)- हैलो. क्या हो रहा है………….
कॉलर-काट दिये मुसलमान
रिसीवर- आं
कॉलर- काट दिये मुसलमान
रिसीवर- काट दिये
कॉलर- हां आठ.
रिसीवर-अच्छा
कॉलर- गांव में…………….
कॉलर- कुटबे वालों ने उन्हे भगा भगा कर काटे………… बावली वालों ने
बजा रखा है………..बड़ौत में, जितने बड़ौत के गांव हैं दाहा,
नेरपड़ा………..(अस्पष्ट)…………….सब में बजा रखी है.
रिसीवर-पता नही क्या होगा.
कॉलर- कुछ नही होने का इन मुसलमानों का नाश होगा. ये जायेंगे दस बीस सौ
पचास हजार अब मरेंगे. बस इतना हो सके.
रिसीवर- मरेंगे तो हिन्दू भी
कॉलर- हिन्दू क्यों मरेंगे जी. फोर्स आयेगी जी तो हिन्दू मरते दिखेंगे
तो फोर्स अपने आप गोली मारेगी इनको………………(अस्पष्ट) ने कहा
है.
रिसीवर- अच्छा
कॉलर- और फोर्स में हिन्दू ने हमें खुद कहा मुसलमानों को हमें पकड़ कर
दियो. फोर्स ने हमें कहा कि तुम्हे क्या जरूरत थी हमें पकड़ने की मार
क्यों नही दिये.
रिसीवर-……अस्पष्ट………
कॉलर- उन्हे तो आदेश है ही नही मारने का.
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द्वारा जारी-
शाहनवाज आलम, राजीव यादव
प्रवक्ता रिहाई मंच
09415254919, 09452800752

प्रेस रिलीज

चैनलों के लिए आसाराम एंड फैमिली तो टीआरपी की फैक्ट्री साबित हो रही है!

Vikas Mishra : बाबा आसाराम कितने बड़े संत हैं, ये मैं नहीं जानता, कितने बड़े दुष्कर्मी हैं, इस पर भी कुछ नहीं कहना चाहता, लेकिन न्यूज चैनलों के लिए बाबा आसाराम भगवान के वरदान की तरह हैं। जिसने जो भी चलाया, कूटकर टीआरपी मिली। आसाराम बाहर थे तो भक्तों को आशीर्वाद देते थे, जेल में बंद हैं तो टीआरपी दे रहे हैं। अब टीवी पर उनकी खबरें उनके भक्त देख रहे हैं या फिर वो जो उनके जेल जाने से खुश हैं, इसका जवाब तो ऊपर वाला जाने, लेकिन चैनलों के लिए बाबा आसाराम एंड फैमिली तो टीआरपी की फैक्ट्री साबित हो रही है।

बाबा आसाराम की खबरों के बलबूते एक चैनल तो दसवें नंबर से चलते हुए अब पांचवें नंबर पर पहुंच गया है और चौथे नंबर के चैनल को धक्का मारने की कगार पर पहुंच गया है। सारी खबरें पस्त पड़ी हैं, तमाम खबरें न्यूज शतक, न्यूज 100 और टिकर की मौत मर रही हैं, छाए हुए हैं बस आसाराम, नारायण स्वामी और उनकी फैमिली।

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सचिन तेंदुलकर ने क्रिकेट से संन्यास ले लिया, इस खबर से लाखों क्रिकेट प्रेमी दुखी होंगे, लेकिन जेल में बंद एक शख्स और पुलिस की गिरफ्तारी से बचने की कोशिशों में जुटा उसका बेटा .. ये दोनों बड़ी राहत की सांस ले रहे होंगे। जी हां आसाराम और उनके बेटे नारायण साईं। चैनलों का ध्यान अब पूरी तरह सचिन पर होगा, तमाम शो, तमाम स्पेशल अब सचिन पर होंगे। आसाराम से मीडिया का फोकस हटेगा तो बाबा को बहुत कुछ मैनेज करने में आसानी होगी। यानी आसाराम के काम आएगा सचिन का ये 'मास्टर स्ट्रोक'।

आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत पत्रकार विकास मिश्रा के फेसबुक वॉल से.

आसाराम के पक्ष में और मीडिया ट्रायल के खिलाफ दो लंबे पत्र

“आज के समय में तो लोग कुछ रुपयों के लिए अपनी इज्जत तक बेच देते हैं फिर लाखों रुपये मिलने पे कोई किसी पे झूठा आरोप लगा दे तो क्या बड़ी बात है?” ताजा मामला संत आसाराम बापू का है जिन्हें बलात्कारी, धोखेबाज, शातिर और कुकर्मी सिद्ध करने का अभियान हमारी मीडिया ने जोर-शोर से चलाया हुआ है। भारत के पढ़े-लिखे युवा से लेकर दिग्गज बुद्धीजीवी, मानवाधिकार के हनन के खिलाफ दिन-रात एड़ियां घिसने वाले भी सहर्ष सुर से सुर मिला कर संत आसाराम बापू को कोसने में लगे हैं। पर बापू और उनके अनुयायिओं को कोसने से पहले ये विडियो जरुर देख लें-

https://www.youtube.com/watch?v=Fh79WPtZ54s

https://www.youtube.com/watch?v=FRQUdJLug6o

क्यूंकि आखिर जब मीडिया कि सुनते हो तो आश्रम कि भी सुन लो इसमें क्या बुरा है और दोनों पक्ष जानने से कौन सा हम बेवकूफ हो जायेंगे या हमें पाप लग जाएगा ?…

चूँकि मित्रों इस मामले में आश्रम का पक्ष जानना कहाँ मना है ? इसलिए मैंने आश्रम के पक्ष को जानने के लिए फेसबुक को टटोलना शुरू किया और मुझे ये दो पेज मिले जहाँ आश्रम के ऊपर लगे आरोपों पे आश्रम के पक्ष के बारे में भी जानने को मिला और सिर्फ पक्ष नहीं बल्कि सच क्या है ये भी समझ में आने लगा आपसे अनुरोध है कि अगर आप मीडिया के अंध भक्त न हों तो दुसरे पक्ष को भी देखें जरुर क्यूंकि आखिर दोनों पक्षों को जानना ही तो निष्पक्षता और बुद्धिमानी है ?…..
जरा आप भी इन दोनों पेज को देखिये और ध्यान से पढ़िए –

https://www.facebook.com/asaramjibapu

https://www.facebook.com/SantShriAsharamJiBapu

ऐसा नहीं है कि संत आसाराम बापू मीडिया की इस आदत के पहले शिकार हैं। निठारी कांड के संदिग्ध रहे पंढेर के साथ भी यही कुछ किया गया था। उन्हें नरपिशाच के रूप में दिखाते हुए भारत की एक प्रमुख सप्ताहिक पत्रिका ने कवर पेज तक छापा था। इस तथाकथित नर पिशाच के बारे मे जब पुलिस जांच पूर्ण हुई तब पता चला कि वह किसी भी हत्याकांड मे शामिल नहीं था। उस आदमी का पूरा जीवन तबाह हो गया आर्थिक और सामाजिक रूप से । उसे और उसके परिवार को हुई क्षति की कोई भरपाई नहीं कर सकता।

संत आशाराम बापू के मामले में मीडिया कि भूमिका पे संदेह करने के कई कारण है आइये डालते हैं उन कारणों पे एक नज़र-

१- पहला कारण ये है कि पहले मीडिया ने शोर मचाया कि बापू के खिलाफ रेप का आरोप लगा है और मेडिकल रिपोर्ट में भी रेप कि पुष्टि हुई है जबकि DCP अजय लाम्बा (https://www.youtube.com/watch?v=zXmVq3YukNE) ने पत्रकारों को एक प्रेस कांफ्रेंस में खुद कहा कि न तो लड़की ने कहीं भी रेप कि बात कि है न तो रेप कि पुष्टि हुई है मेडिकल रिपोर्ट में |

२- संत आसाराम बापू के सेवादार शिवा (https://www.youtube.com/watch?v=sDr9HxbDvyA) के पास बापू की यौन क्रियाओ की क्लिपिंग मिलने का दावा चैनलों ने किया था जो कि बाद में हवा-हवाई सिद्ध हुआ। DCP अजय लाम्बा का ये बयान देखिये (https://www.youtube.com/watch?v=qFYUYIBUMpg)

३- सुप्रीम कोर्ट ने टुंडा और उग्रवादी भट्टल पर अप्रत्यक्ष रूप से टिपण्णी कि की अपराधियों की सुरक्षा पर क्यों इतना खर्च किया जा रहा है ! जबकि मीडिया का कुप्रचार था कि सुप्रीम कोर्ट ने आसाराम का संज्ञान लेते हुए पुलिस को लताड़ा कि एक अपराधी को इतनी सुरक्षा क्यों दी जा रही है !

४- संत आसाराम बापू और भारतीय मीडिया के बीच पुरानी खुन्नस भी है जो विज्ञापन के दबाव बनाने (क्यूंकि बापू का कोई विज्ञापन नहीं आता इन चैनल्स पे) से शुरू होकर पत्रकारों की पिटाई के बाद रंजिश में बदल चुकी है। याद करिए जब निर्मल बाबा की कारगुजारियां सामने आई थी, तब भी हमें ऐसा ही कुछ देखने को मिला था ,दिन रात मीडिया उनके खिलाफ राग अलापता रहा वो भी महीनो तक । इस दौरान निर्मल बाबा खबरिया चैनलों को ‘चढ़ावे’ के तौर पर जो विज्ञापन दे दिया करते थे, वे भी उन्होंने बंद कर दिया था । लगा कि, भारतीय मीडिया एकदम से सुधर गया है, अपने कर्तव्यों को लेकर जागरूक हो गया है। लेकिन अब जब टीवी के सामने बैठे चैनल पलटते हैं, तो सिर पीटने का मन करता है। वजह , निर्मल बाबा के विज्ञापन फिर से खबरियां चैनलों पर आ गए है । दिन में दो से चार बजे के बीच लगभग सभी बड़े न्यूज़ चैनलों पर उनके विज्ञापन देखे जा सकते है। जाहिर है, इन खबरिया चैनलो ने बाबा से एक लंबी-चौडी डील फाइनल कर ली होगी और बाबा ने भी इस बार दिल खोलकर पैसा दिया होगा, इस करार के साथ कि अब भविष्य में हमारी इस तरह से कलई मत खोलियो ! पर्दे के पीछे जो खेल चल रहा है, उसे चलने देना ! इसलिए ये संदेह पैदा होना लाजिमी है कि क्या संत आसाराम बापू की ‘रासलीला’ के एपिसोड दिखाकर चैनल उन्हें ब्लैकमेल करना चाहते हैं ताकि वो भी निर्मल बाबा के तरह चैनल्स को कुछ विज्ञापन या कीमत दें उलटी सीधी खबरें न दिखाने के लिए |

५- आसाराम पर और बाबूलाल नागर पर दोनों पर एक जैसे आरोप हैं, फिर भी नागर आजाद, ऐसा क्यूँ? जो पत्रकार संत आसाराम बापू की गिरफ्तारी की मांग कर रहे थे? वो अब नागर के केस पर शांत हैं जबकि इस केस में तो नागर के खिलाफ सबूत भी मिल चुका है | फिर ऐसे में भी मीडिया का खामोश रहना क्या मीडिया की नीयत पर सवालिया निशान नहीं लगाता?

६- मीडिया में जिस वैद्य को आशाराम बापू के खिलाफ बोलने में इतना मजा आता है जब मैंने इस के बारे में आश्रम से उनका पक्ष जानना चाहा तो आश्रम के तरफ से मुझे जो बताया गया वो जान के दंग रह गया मैं !!! आप भी जरुर देखिये कौन हैं ये वैद्य और ये आश्रम छोड़ के गए थे या निकाले गए थे: http://www.youtube.com/watch?v=HVlXysQkCD8

७- आश्रम के तरफ से मुझे ये भी बताया गया कि आश्रम में रह रहे एक शख्स जिन्हें आश्रम से निकाल दिया गया था वो भी इस षड्यंत्र में शामिल हैं और उसके स्टिंग ऑपरेशन का तो विडियो भी है आश्रम के पास. और सबसे हैरान करने वाली बात तो ये थी कि ये वीडियो सभी मीडिया चैनल्स को भेजी गयी थी पर न तो किसी चैनल ने इसे दिखाया न तो कोई चैनल ने इसका जिक्र भी किया, उस स्टिंग ऑपरेशन को भी आप इस लिंक पे जा के देख सकते हैं –

http://www.youtube.com/user/vck05/videos?sort=dd&view=0&shelf_index=3

८- उपरोक्त स्टिंग ऑपरेशन ने तो राजू लम्बू, अमृत वैद्य और अघोरी सुखाराम ( http://www.youtube.com/watch?v=2utU3E_Nn9c ) के बापू पर लगाये गए आरोपों की पोल ही खोल दी |

९- हैरान तो मैं तब रह गया जब मुझे ये पता चला कि वैद्य जी ने तो एक बार अपने ही पत्नी को बापू के ऊपर आरोप लगाने के लिए बुरका पहना के खड़ा कर दिया था मीडिया के सामने , और तो और वैद्य जी ने अपने कई मरीजो कि जान तक ले ली जिसमे से एक मरीज कि जान जाने कि खबर इंडियन एक्सप्रेस में भी छपी थी — http://m.indianexpress.com/news/four-days-after-patient-s-death-no-fir-against-ayurvedic-doctor/461453/
फिर इलेक्ट्रानिक मीडिया इसे क्यूँ छुपा रहा ?

१०- २,३ लड़कियों के आश्रम के खिलाफ बोलने पे उन्हें मीडिया द्वारा तवज्जो देना जबकि आश्रम में रहने वाली महिलाओं के पक्ष को उजागर न करना क्या ये आश्रम में रहने वाले महिलाओं का चरित्र हनन नहीं है ? क्या मीडिया को आश्रम में रहने वाले महिलाओं के पक्ष को नही दिखाना चाहिए ?
आश्रम में रहने वाले महिलाओं को भी सुनिए -https://www.youtube.com/watch?v=htTDhfezQKo

११- मीडिया को कम से कम उस कुटीया के मालिक का इंटरव्यू (https://www.youtube.com/watch?v=2ZHBONs1NCc) जरुर दिखाना चाहिए था पर क्यूँ नहीं दिखाया मीडिया ने ये सवाल भी मीडिया के निष्पक्षता और उसके नियत पे सवाल खड़ा करता है |

१२- मीडिया को आश्रम के महिला वैद्य का ये इंटरव्यू (https://www.youtube.com/watch?v=Rqc52RO73JM) जरुर दिखाना चाहिए पर मीडिया ने क्यूँ नही दिखाया ये सवाल भी महत्वपूर्ण है |

१३- हर चैनल को कम से कम बापू के वकील के इस विडियो को जरुर दिखाना चाहिए
1- (https://www.youtube.com/watch?v=buvfFZFUMm8)
२- (https://www.youtube.com/watch?v=Iuz1WNUcCBc)

3-  (http://www.youtube.com/watch?v=Y_OTYE-h_B4)

 

१४- मीडिया ने बापू के समर्थकों को तो गुंडा बता दिया पर अपनी गुंडागर्दी के कारनामें भी जरुर दिखानी चाहिए थी (https://www.youtube.com/watch?v=p7a6cz_YsfY ) |

१५- मीडिया ने पीड़ित लड़की के सहेली (https://www.youtube.com/watch?v=aBeMMvk89-E) का बयान क्यूँ नही दिखाया ?

ऐसे बहुत से और तथ्य हैं जिन्हें मीडिया ने या तो छुपाया या तो तोड़ मरोड़ के पेश किया ऐसे सभी तथ्यों और निष्पक्ष हो के आश्रम के भी पक्ष को जानने के लिए
जरा आप भी इन दोनों पेज को देखिये और ध्यान से पढ़िए –

https://www.facebook.com/asaramjibapu
https://www.facebook.com/SantShriAsharamJiBapu

मैं नहीं कहता कि बापू निर्दोष हैं न तो मैं ये कहता हूँ कि बापू दोषी हैं पर मेरा आग्रह है कि सच क्या है ये जानना हो तो दोनों पक्ष जरुर देखें बस एक पक्ष कि सुन के किसी पे ऊँगली उठाना क्या मीडिया कि अंध भक्ति नही हुई ?…बापू दोषी हैं तो जरुर सजा मिले पर निर्दोष हैं तो वो भी सामने आना चाहिए आखिर किसी एक पक्ष को सुन के ही दुसरे पक्ष को महज़ आरोप के आधार पे दोषी ठहराना कितना जायज है और कहाँ कि बुद्धिमानी है ?…क्या आरोप लगने मात्र से कोई दोषी हो जाता है ? अगर हाँ तो आज भी बापू पे आरोप लगाने वालों १०-१२ लोगों से ज्यादे उन्हें पूजने वाले करोड़ों लोग हैं फिर क्यूँ बापू निर्दोष नही हो सकते ?…जरा निष्पक्ष होक मीडिया के अंधभक्ति से बाहर निकलिए निष्पक्ष बनिए दोनों पक्षों को देखिये सुनिए और फिर कहिये कि क्या बापू दोषी है ?

खैर , जो भी हो पर हमारा तो यही कर्त्तव्य बनता है कि बिना दोनों पक्षों को जानें हमें ऊँगली नहीं उठानी चाहिए … क्या ये मीडिया कि अंधभक्ति नही होगी हमारे द्वारा अगर हम बिना दोनों पक्षों को जाने बस मीडिया कि बात सुन के किसी पे ऊँगली उठाएं ??? और संत राम रहीम जी ने जो कहा कि “ आज के समय में तो लोग कुछ रुपयों के लिए अपनी इज्जत तक बेच देते हैं फिर लाखों रुपये मिलने पे कोई किसी पे झूठा आरोप लगा दे तो क्या बड़ी बात है ? ” क्या ये भी एक कड़वा सच नहीं है?

मेरा सवाल मीडिया से ये भी है कि —

· मीडिया मुजफ्फर नगर दंगों पर शांत क्यों है ?…पैसे मिल गए या खबर दिखाने के पीछे जो नियत था वो पूरा हो गया?
· मीडिया निष्पक्ष है तो मौलवियों के सेक्स स्कैंडल पर लोगों को जागरूक क्यूँ नहीं करता?
· मीडिया निष्पक्ष है तो दोनों पक्ष क्यूँ नही दिखाता ?
· मीडिया निष्पक्ष है तो सिंघवी के CD पे खामोश क्यूँ ?
·  मीडिया निष्पक्ष है तो जम्मू में पादरी ने पोर्न दिखा के जो रेप किये और ग्रेस होम संस्था में जो यौन शोषण हुआ उसपे ट्रायल क्यूँ नही चलाता ?
·  मीडिया निष्पक्ष है तो राहुल और सुकन्या देवी के मुद्दे पे खामोश क्यूँ ?
·  मीडिया निष्पक्ष है तो जम्मू में हुए दंगो पे खामोश क्यूँ ?
·  मीडिया निष्पक्ष है तो एक मौलवी जी को एक लड़का चाक़ू इसलिए मारता है क्यूंकि मौलवी जी ने उसके साथ अपाकृतिक यौन सम्बन्ध बनाया ,फिर मीडिया इस पर खामोश क्यूँ ?
·  मीडिया निष्पक्ष है तो नारायण साईं  और संत आशाराम बापू पे आरोप लगाने वाली दो बहनों कि एक बहन अभी भी आश्रम में है और उसने कल ही आश्रम छोड़ने से मना कर दिया ये क्यूँ नही दिखाता ?
·  मीडिया निष्पक्ष है तो आचार्य भोलानंद पे उनके भाई ने जो आरोप लगाया और उसके ऊपर अपने पिता के हत्या का जो केस चल रहा वो क्यूँ नही दिखाता ?
· मीडिया निष्पक्ष है तो अमृत प्रजापति ने अपने औरत को बुरका पहना के बापू पर आरोप लगाने के लिए मीडिया के सामने खड़ा किया था, ये क्यूँ नही दिखाता? प्रजापति ने अपने मरीज़ की जान तक ले ली और आश्रम में आने वाले मरीजों को जांच के नाम पर बाहर महंगे जांच करवाने भेजता था, ये मीडिया क्यूँ नही दिखाता ?
· मीडिया निष्पक्ष है तो ये क्यूँ नही बताता कि प्रजापति जी ने आश्रम छोड़ा नहीं था बल्कि उसे निकाला गया था और निकालते वक़्त का विडियो क्यूँ नही दिखाता जबकि विडियो Youtube पे भी है ?
·  महेंदर चावला के खिलाफ उसके ही भाइयों और कई आश्रम में आने वालों ने पैसे चुराने के केस करवाए क्यूँ नही दिखाता ? चावला जी आश्रम से क्यूँ निकाले गए इस्पे आश्रम का पक्ष क्यूँ नही दिखाता ?
· मीडिया निष्पक्ष है तो आश्रम में रहने वाले महिलाओं के भी बयां क्यूँ नही दिखाता आश्रम से लाइव ?
· मीडिया निष्पक्ष है तो आश्रम में रह रहे साधकों के बयान क्यूँ नही दिखाता आश्रम में जा के वहां से लाइव ?
· मीडिया निष्पक्ष है तो आशाराम बापू के जमीं घोटालों के तरह वाड्रा के जमीं घोटालों पे ट्रायल क्यूँ नही चलाता ?
· मीडिया निष्पक्ष है तो आश्रम के आदिवासी इलाको में किये गए कार्य क्यूँ नहि दिखाता ?
·  मीडिया निष्पक्ष है तो माता पिता पूजन दिवस के बारे में प्रचार क्यूँ नही करता ?
· मीडिया निष्पक्ष है तो स्वामी लक्ष्मणानंद के हत्या में आरोपी दलित ईसाईयों और धर्मान्तरण पे ट्रायल क्यूँ नही चलाता ?
· मीडिया निष्पक्ष है तो मोदी के दंगो के आड़ में कांग्रेस के दंगो को क्यूँ छुपाता है ?
· मीडिया निष्पक्ष है तो राम सेतु के मुद्दे पे खामोश क्यूँ ? रामसेतु को तोड़ने से जो नुक्सान कमिटी ने बताया वो भी तो बताये ?
· और भी बहुत से सवाल हैं जिनका उल्लेख करना जरूरी है पर मैं समयाभाव में कर नहीं पा रहा और ये भी पूछना चाहूँगा कि आशाराम बापू पर आरोप लगाने से पहले क्या एक पत्रकार के तौर पर आश्रम और वहां के निवासियों का पक्ष सुनना जानना क्या पाप है या पत्रकारिता पर कलंक है ?

आप से उम्मीद है कि आप निष्पक्ष रहते हुए मेरी बात जरूर अपने ब्लॉग में किसी संशोधन के बिना रखेंगे, वरना आपको भी मीडिया के तरह निष्पक्ष रहना हो तो कोई बात नहीं, पर भड़ास पर मैं जो भड़ास निकालना चाहता हूँ उसमें आप मेरी सहायता करेंगें ऐसी उम्मीद के साथ आपका बहुत बहुत धन्यवाद..

आपका अपना

आशुतोष आर्यन
Ashutosh Aryan
aagaazindia@gmail.com


दूसरा पत्र….

Don't Know what solution to use for people like YOU !

With utter disrespect I'm writing this mail to you. I know media today in India has lost its integrity honesty and intellectualism. Its today just become a matter of making anything and everything a sensational news and its nowhere close to spreading any news which should actually be given to the public for the betterment of society.

With days of trending on social media networks about paid media slogans, you people have behaved so irresponsibly that you arr not bothered about hurting sentiments of millions of devotees and fellow Indians. You people boast of unbiased reporting but this whole issue was so unethically trailed by you that a saints life is at risk now. And all blame goes to you people. You people have become so blind in race of TRP and paid news that you not even thinking of verifying the news matters and not thinking of the adverse effects that it may create on the society.

Who gave you the rights to term somebody as criminal even when the case in under trial in the court of law. Why are you provoking his followers by showing baseless false and nonsense news every single minute. Why do you want to mess up with law and order situation of this nation. You people are the real peace breakers. If you have a little shame left do not indulge in showing paid news and misguiding people. When the case is ongoin in court you have no rights to term somebody as criminal. So STOP terming him as criminal.

Stop being biased and showing false news and one side of the story. You are not the judge. So be within your limits. STOP putting unnecessary pressure on judiciary & police.

BEHAVE SENSIBLY AND BE RESPONSIBLE OF YOUR ACTIONS.

SEEING THE DEDICATION WITH WHICH MEDIA HAS BEEN TARGETING ASARAMJI & HIS FAMILY, I WONDER HOW MUCH MONEY THAT HAS FLOWN TO YOUR POCKETS…SOMEBODY'S LIFE AND 40 YEARS OF SELFLESS SERVICE THAT HE GAVE TO MANKIND HAS BEEN RUINED DUE TO THIS..NOT A SINGLE MENTION OF WHAT GOOD WORKS WAS DONE BY ASARAMJI FOR THE BETTERMENT OF SOCIETY & UPLIFTMENT OF EVERY SINGLE INDIVIDUAL THAT WENT TO HIS SHELTER..BUT THEY NOT LEAVING A SINGLE CHANCE OF SPREADING HATRED IN SOCIETY & DEMORALIZING HINDUS …THESE PEOPLE HAVE LOST ALL MORALES AND ETHICS TO GO BENEATH THE LEVELS ON HUMANITY TO DEFAME SUCH A NOBLE SAINT…OFF COURSE THOSE WHO KNOW HIM IT WONT AFFECT THEIR BELIEFS BUT THE HARSH WORDS THAT THEY READ AND HEAR USED BY THESE MEDIA PEOPLE DEFINITELY MAKES A DEEP SCAR IN THEIR HEARTS (MINE TOO)

Varsha Singh

varsha.singh.s@gmail.com

पत्रकारों के खिलाफ तो पोस्टर चिपकने लगे, पर्चे बंटने लगे, देखें महाराष्ट्र का हाल

पत्रकारों के खिलाफ पोस्टर चिपकने लगे हैं, जैसे नेताओं के खिलाफ चिपकते थे. लगातार धंधेबाज हो रही पत्रकारिता के कारण आम लोगों का भरोसा पत्रकारों से उसी तरह उठ गया है जैसे पुलिस व वकीलों से उठ चुका है. यही कारण है कि कई बार लोग सबक सिखाने के लिए पोस्टर वगैरह भी चिपका देते हैं. महाराष्ट्र में पत्रकारिता के व्यवसायीकरण के कारण पत्रकारों पर आए दिन हमले होते रहते हैं.

पत्रकार जब विज्ञापन के नाम पर पैसे मांगेंगे और विज्ञापन न मिलने पर खिलाफ खबर चला देंगे तो ऐसे में सामने वाला कई बार पत्रकार को सबक सिखाने के लिए मजबूर हो जाता है. यही कारण है कि महाराष्ट्र में राजनेता, माफिया और अन्य लोग गाहे-बगाहे पत्रकारों पर हमले करते रहते हैं. एक तरफ पत्रकारों पर हमले हो रहे हैं तो दूसरी तरफ पत्रकारों से विलचित कुछ लोग पत्रकारों को बदनाम करने के लिए इनके विरोध में पोस्टर चिपका रहे हैं. महाराष्ट्र के कई हिस्सों में पत्रकारों के उपर एफआईआर दाखिल किए जा रहे हैं. इससे पत्रकार काफी दिक्कत में हैं.

चंद्रपूर के एक नेता ने तो अलग ही फंडा अपनाया है. उसने कुछ पत्रकारों के विरोध में शहर के विभिन्न भागों मे बड़े बड़े पोस्टर लगाकर पत्रकारों के विरोध में मोर्चा ही खोल दिया है. आश्चर्य की बात यह है कि महापालिका ने बैनर लगाने की भी अनुमती दी है. बताया जाता है कि इसमें जिस प्रकाशक का नाम प्रसिद्ध किया गया है वह फर्जी है. बताया जाता है कि इस नाम का कोई आदमी चंद्रपूर में है ही नहीं. इस घटना से चंद्रपूर के पत्रकार काफी क्रोधित हैं. चंद्रपूर जिला मराठी पत्रकार संघ तथा चंद्रपूर श्रमिक पत्रकार संघ की और से इस घटना की निंदा की गई है. पत्रकार हल्ला विरोधी कृती समिती ने भी आरआर पाटील से निवेदन करके इस पोस्टरबाजी के पीछे के दिमाग को तलाश कर उसे दंडित करने का निवेदन किया है.

इधर पुना के पास आलंदी में सकाल के पत्रकार के विरोध में गांव के स्थानीय नेता ने पत्रक गांव में वितरित किया है. इसका भी विरोध पुना जिला मराठी पत्रकार संघ के अध्यक्ष शरद पाबळे ने किया है. इस प्रकार की बढती घटना रोकने के लिए शीघ्र उपाय करने की मांग की जा रही है.

एएनआई, कोलकाता की एक रिपोर्टर ने दिया इस्तीफा, पढ़ें दीपांजना डे का इस्तीफानामा

एएनआई में खराब वर्किंग कंडीशन और उत्पीड़न से परेशान होकर ठीकठाक जर्नलिस्टों के इस्तीफे का सिलसिला जारी है. ताजी सूचना के मुताबिक कोलकाता की रिपोर्टर दीपांजना डे ने भी इस्तीफा दे दिया है. दीपांजना ने अपने इस्तीफे में बताया है कि उसे कैसे परेशान किया जाता रहा और अब उसके लिए काम करना किस कदर कठिन हो गया था. दीपांजना का पत्र संजीव प्रकाश को संबोधित है, जो एएनआई के प्रोपराइटर हैं. पढ़ें पूरा पत्र…

SanjeevPrakash

Proprietor

ANI

New Delhi

SUB: Resignation for Humiliation

Sir,

I am submitting my resignation today as reporter for ANI in Kolkata. But before leaving I want to inform why I am forced to take this decision.  Before joining here, I have worked for other News Channels but never faced the humiliation that I faced here,  especially from the behaviour of one Ishaan Prakash. I don’t know what  his post in Delhi but he abused me on the phone for no fault. The language he use was abusive and untolerable  even if there is fault.He called me on 16.9.13 because  some problem with the audio during a live interview of Dr Apurva Ghosh, Director Institute of Child Health. He had  knowledge that the cameraman with me was Biswajit Bhakta, but he still yelled and screamed at me instead of the cameraman because as woman he thought I was soft target. He used terms like ‘you bloody  woman’, ‘you useless woman’, ‘you people do nothing, you sit in office’, ‘don’t argue , you have no right to say anything, you can quit’, ‘your cameraman is bloody useless’ etc etc.He abused me on the phone for  almost five minutes on the same theme. It was humiliating as there was no problem with audio and I had nothing to do in how cameraman was shooting. I could have taken the matter to the Women’s Commission as the language was so bad and derogatory. I have double masters,  M.A Journalism from Calcutta Univ. and M.A. English from Rabindra Bharati Univ. with four years experience  in media.  Such abuse from people less educated and bad mannered was never imagined by me. The working terms in ANI have also changed from the time I joined in Dec, 2011. Night shift was started recently from  10.9.2013  under which I was made to work for 20 hours continuously and then getting a break for 12 hours only as the number of staff in  office was not increased to accommodate night shift. Night shift was stopped suddenly on Oct 3rd, after queries from staff on such long duty timings. But  mail by SurinderKapoor sent for that was even more weird. It mentioned duty details like one reporter cameraman for morning, one team for 10, one team for 2 which can go home at 10pm and one cameraman as flexible which made no sense as what will be duty shift for morning team or 10 am team was not mentioned and the ‘flexible’ cameraman what will be his time? All the time I worked with ANI I have done duty for minimum 12 hours every day with no overtime. The idea even now is to make staff work for unlimited time onwards and onwards for 24×7 coverage without overtime or increase in manpower without any question on such practice.  In this matter Surinder Kapoor had said one thing to staff and one thing to Bureau Chief , like Mir Zafar, to create division and not implement proper duty hours or benefits.

 Professionalism is also absent here as many stories I have covered from the distant corners of the state, distant villages and towns and also from Kolkata have been released from Delhi under the name of others staffs and in charge who have not put toe outside air-condition office in Delhi ever to do such stories. Several such stories can be seen on the net. I am sure this is happening with reporters of other Bureaus in ANI. There is lack of proficiency in every bits and corner. Naveen Kapoor  claims that every politician is his ‘friend’ but we got different vibes from his those ‘friend’ politicians,just recently TMC M.P Derek Obrien told me that Naveen Kapoor was asking him to line up reactions and interviews for ANI, he told me  “ why Naveen Kapoor is calling me for lining up reactions of other people I have many work to do rather than lining up stories for ANI” this was so embarrassing for me that I listened those words from a M.P not for my part of fault but for my office wrong doers and this is not good  for me to end up loosing my good contacts which I made over many years effort just because of pushy attitude of Naveen Kapoor.

In News Agency we may not get credit for story I know but credit for story going to others is unheard of anywhere!  After working here so long and doing so many stories I have no body of work to show with ANI but others can show my work as theirs in ANI. This has been most hurtful.  I have also complained many times about mistakes created in my stories by those doing editing but those in charge have not bothered anytime about maintaining any factual creditability or safeguarding against errors in the reports. I find all this very much against Journalism Ethics that I studied in College. I am satisfied that I have finally found the opportunity to put all this in the open. I thank my elder sister Muktanjana Dey and brother- in- law Ranjan Karmakar, both advocates, and my parents, who encouraged me and supported me to find the courage to write this.

Thanking You

Sincerely

DipanjanaDey

8.10.13
 


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अमित झा नक्षत्र न्यूज़ पहुंचे, रोहित जिंदल और अखिलेश ने थमाया जागरण को नोटिस

कशिश न्यूज़ के पत्रकार अमित झा ने इस्तीफा दे दिया है. वे बतौर सीनियर रिपोर्टर कशिश न्यूज़ में पिछले 3 सालों से कार्यरत थे. इसके पहले वे हमार टी.वी सहित कई चैनलों में अपनी सेवा दे चुके हैं. अमित को पटना में राजद बीट में अच्छी पकड़ के लिए जाना जाता हैं. अमित अपनी नयी पारी की शुरुआत नक्षत्र न्यूज़ चैनल से कर रहे हैं. अमित को यहाँ प्रमोशन देकर चीफ करेस्पोंडेंट के तौर पर पटना में ज्वाइन कराया गया है.

पंजाब के भटिंडा शहर से दैनिक जागरण के रिपोर्टर रोहित जिंदल के बाद अब एक अन्य रिपोर्टर अखिलेश बंसल ने भी संस्थान को एक माह का नोटिस थमा दिया है. अखिलेश बंसल इससे पहले दैनिक भास्कर बठिंडा यूनिट में सेवाएं दे चुके हैं. बंसल काम को लेकर आ रही परेशानियों से तंग आकर संस्थान को अलविदा कहना चाहते हैं. एक दिन पहले ही रिपोर्टर रोहित जिंदल ने संस्थान को वन मंथ का नोटिस दिया है. अखिलेश बंसल ने अभी कोई खुलासा नहीं किया है कि वह अपनी अगली पारी कहां से शुरू करने वाले हैं.

भड़ास तक अपनी बात, जानकारी bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

जितेंद्र बच्चन, कविंद्र रंजन बर्मन, अलीशा शर्मा और राहुल के बारे में सूचनाएं

हमवतन अखबार में बतौर मुख्य उप संपादक काम रहे जितेन्द्र बच्चन के बारे में खबर है कि उन्होंने अपनी नई पारी की शुरुआत राष्ट्रीय जनमोर्चा अखबार के साथ की है. वे यहां संपादक की भूमिका में होंगे. इसके पहले बच्चन दैनिक जागरण के साथ लंबी पारी खेल चुके हैं.

इंडिया न्यूज रीजनल न्यूज चैनल के चीफ वीडियो एडिटर कविंद्र रंजन बर्मन ने रिजाइन कर दिया है. वह इन दिनों नोटिस पीरिडय पर चल रहे हैं. बताया जाता है कि वे मीडिया से उबर गए हैं और अपने होमटाउन गुवाहाटी में खुद का कोई बिजनेस शुरू करने जा रहे हैं.

पंजाब केसरी अम्बाला में सब ठीक नही चल रहा है। हाल ही में अम्बाला छावनी की ब्यूरो चीफ बनाई गई अलीशा शर्मा का अचानक नाम छापना बंद कर दिया गया है। इसके पीछे जहां अलीशा शर्मा की तरफ विज्ञापन की रकम बकाया होने को एक कारण बताया जा रहा है, वहीं संस्थान के एक सीनियर रिपोर्टर अनिल दत्ता की मोर्चेबंदी भी कारण बताई जा रही है। ट्रिब्यून व हिंदूस्तान जैसे अख़बारों में काम कर चुके सीनियर रिपोर्टर को अलीशा जैसे नई पत्रकार के मातहत काम करना अखर रहा है। गौरतलब है कि पंजाब केसरी में हर समाचार को संवाददाता के नाम से ही लिखने का चलन है। फिर वह समाचार चाहे कोई प्रैस विज्ञप्ति ही क्यों न हो।

एक अन्य सूचना के मुताबिक राहुल ने साधना से इस्तीफा देकर इएनसी न्यूज एजेंसी में कापी राइटर के बतौर ज्वाइन किया है.

भड़ास तक आप भी कोई जानकारी या सूचना bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

लेखपाल को गाली देने वाले सुधाकर शर्मा को अमर उजाला ने हटाया

अमर उजाला की प्रतिष्ठा की आड़ में बवाल करने के लिए कुख्यात हो चुके सुधाकर शर्मा को अमर उजाला ने आउट कर दिया है, जिससे उसके द्वारा सताये लोग राहत महसूस कर रहे हैं। सुधाकर के स्थान पर फ़िलहाल बदायूं कार्यालय में तैनात तरुण नाम के रिपोर्टर को ही बिसौली तहसील की रिपोर्टिंग की अतिरिक्त जिम्मेदारी दे दी गई है।

उल्लेखनीय है कि सुधाकर शर्मा जनपद बदायूं की तहसील बिसौली में संवाददाता था, लेकिन खुद को अमर उजाला का ब्यूरो चीफ बताते हुए अमर उजाला की प्रतिष्ठा का खुल कर लंबे समय से दुरूपयोग कर रहा था। पिछले दिनों अपने किसी निहाल सिंह नाम के ख़ास व्यक्ति के काम को लेकर फोन पर बिल्सी तहसील में तैनात एक लेखपाल राजेन्द्र प्रसाद को जमकर हड़काने का मामला प्रकाश में आया था। सुधाकर ने फोन पर लेखपाल और तहसीलदार को गालियाँ दीं थीं, जिसकी शिकायत अमर उजाला प्रबन्धन से की गई थी। अमर उजाला का शीर्ष नेतृत्व ख़राब छवि के लोगों को लेकर बेहद सजग रहता है, इसके बावजूद सुधाकर को हटाने में देर होने से अधिकाँश लोग स्तब्ध हैं, वहीँ अभी ऐसे कुछ और चेहरे बाकी हैं, जिनके विरुद्ध कार्रवाई होने से अमर उजाला की प्रतिष्ठा और बढ़ सकती है, जिनमें हाल ही में शाहजहाँपुर से हटाये गए अरुण पाराशरी का नाम प्रमुख तौर पर लिया जा सकता है।

बताया जाता है कि अरुण पाराशरी बलात्कार के आरोपी कुख्यात चिन्मयानंद के लॉ कॉलेज की प्रबंध समिति में उपाध्यक्ष है, जिसके चलते अरुण पाराशरी ने चिन्मयानंद का अखबार के माध्यम से ही नहीं, बल्कि पुलिस के माध्यम से भी खुल कर साथ दिया। बिसौली के सीओ विवेचक थे। अरुण पाराशरी ने सुधाकर के माध्यम से चिन्मयानंद की सेटिंग करा कर केस को कमजोर कराने का पूरा प्रयास किया, जिसकी शिकायत अमर उजाला प्रबन्धन से की जा चुकी है, लेकिन अभी तक अरुण पाराशरी को प्रबन्धन ने अमर उजाला से आउट नहीं किया है। साभार : गौतम संदेश

आजतक उपर चढ़ा, इंडिया टीवी नीचे गिरा, जी न्यूज और न्यूज24 की बुरी स्थिति

चालीसवें सप्‍ताह की टीआरपी आ गई है. पिछले सप्‍ताह के मुकाबले चैनलों की स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है. आजतक नम्‍बर एक पर बना हुआ है. दूसरे नम्‍बर पर मौजूद इंडिया टीवी को मामूली अंकों का नुकसान हुआ है. एबीपी न्‍यूज नम्‍बर तीन तथा इंडिया न्‍यूज नम्‍बर चार पर मौजूद है. इसके अलावा इस सप्‍ताह कोई बड़ा बदलाव देखने को नहीं मिला है. नीचे 40वें सप्‍ताह की टीआरपी.. 

WK 40 2013, (0600-2400)
Tg CS 15+, HSM:

Aaj Tak 18.5 up 0.8
India TV 15.6 dn 0.4
ABP News 13.1 same
India news 11.6 dn 0.3
ZN 8.9 dn 0.3
News 24 8.2 dn 0.3
IBN 7.1 up 0.9
NDTV 5.8 dn 0.5
Samay 4.2 dn 0.4
DD 2.7 up 0.4
Tez 2.5 dn 0.2
Live India 1.6 up 0.3


Tg CS M 25+ABC

Aaj Tak 19.5 up 1.4
India TV 15.1 dn 0.8
ABP News 13.8 up 0.8
India news 11.5 dn 0.7
ZN 9.7 dn 0.4
IBN 7.4 up 0.9
NDTV 7.1 dn 0.4
News24 6.9 dn 0.6
Samay 3.4 dn 0.2
DD 2.3 up 0.3
Tez 1.9 dn 0.6
Live India 1.5 up 0.2

नेटवर्क18 समूह में फिर छंटनी की तैयारी, इस आंतरिक मेल को पढ़कर तो ऐसा ही लग रहा

Dear Team, As we know, our Network has come through a trying period of transformation across some businesses. Change is never painless and it has been no different for us. While the economy may take its time to fully rebound, I believe the worst is behind us as a Network.

Over the last decade, we have grown into one of India’s leading media companies on account of several strengths, from our stellar brands to the top talent that runs them every day. But above all, in my view, the defining grain in our DNA which caused our success so far has been the ability to challenge ourselves as a Network. We have re-invented and unlearnt at the right times. And I believe that we are in the midst of such a time again.

In the past few months, we have begun our journey towards being a Network, that is future-proof and equipped to lead in the digital age. This has required us to re-look at everything – from what we do to how we do it. While much has been reported and said about these changes in recent times, the core of this re-engineering effort has been aimed at marrying two of our biggest strengths – ‘Network’ and ‘Digital’ in a manner that we continue to lead in the long-term. These twin principles must guide us everywhere – from how we gather and produce content at our integrated newsrooms to how we deliver and monetise it on multiple devices.

I am sure there are some unanswered questions and thoughts that many of you would like to share. So, beginning soon, we will be coming over for some open chats across our offices/businesses. Please await word from HR for details on this. Till then, thanks for your patience. The journey, understandably, has been rough but I am confident about the road ahead.

Cheers!

Sai


नेटवर्क18 ग्रुप का उपरोक्त इंटरनल मेल भड़ास4मीडिया के पास आईबीएन7, नोएडा आफिस में कार्यरत एक वरिष्ठ पत्रकार द्वारा फारवर्ड किया गया  है. पत्रकार ने अपना नाम न प्रकाशित करने का अनुरोध किया है.

लक्ष्‍मीकांत ने राजस्‍थान पत्रिका तथा मुकेश पांडेय ने दैनिक जागरण ज्‍वाइन किया

अमर उजाला, मुरादाबाद से खबर है कि लक्ष्‍मीकांत दुबे ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर चीफ रिपोर्टर के पद पर कार्यरत थे. लक्ष्‍मीकांत ने अपनी नई पारी जयपुर में राजस्‍थान पत्रिका के साथ शुरू की है. उन्‍हें यहां पर डीएनई बनाया गया है. उन्‍होंने जयपुर में ज्‍वाइन कर लिया है. लक्ष्‍मीकांत दैनिक भास्‍कर से इस्‍तीफा देकर कुछ महीने पहले ही अमर उजाला ज्‍वाइन किया था, लेकिन उन्‍हें इस अखबार की पारी रास नहीं आई.

लक्ष्‍मीकांत ने अपने करियर की शुरुआत हिंदुस्‍तान, गोरखपुर से की थी. इसके बाद से दैनिक जागरण, सिलीगुड़ी में भी लंबे समय तक रहे. यहां से इस्‍तीफा देने के बाद प्रभात खबर, भागलपुर से जुड़े. यहां से इस्‍तीफ देने के बाद वे दैनिक भास्‍कर के साथ जुड़ गए थे, जहां उन्‍हें मोगा-फरीदकोट का ब्‍यूरोचीफ बनाया गया था. प्रबंधन ने इसके बाद इनका तबादला इंदौर कर दिया था, जिसके बाद इन्‍होंने अमर उजाला ज्‍वाइन कर लिया था.

मुरादाबाद से ही दूसरी खबर है कि हिंदुस्‍तान से मुकेश पांडेय ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर सीनियर सब एडिटर के पद पर कार्यरत थे. मुकेश ने अपनी नई पारी लखनऊ में दैनिक जागरण से शुरू की है. यह दैनिक जागरण के साथ उनकी दूसरी पारी है. उन्‍हें यहां भी सीनियर सब एडिटर बनाया गया है. हिंदुस्‍तान ज्‍वाइन करने से पहले वे अमर उजाला के साथ जुड़े हुए थे.

साईं प्रसाद मीडिया का सर्वे : दिल्ली में त्रिशंकु विधानसभा लेकिन सीएम के रूप में केजरीवाल जनता की पसंद

साईं प्रसाद मीडिया से संबद्ध ‘न्यूज एक्सप्रेस’ मीडिया एकेडमी और ‘हमवतन’ अखबार ने दिल्ली की जनता की नब्ज को टटोला, तो कुछ चौंकाने वाले जवाब सामने आए हैं। मसलन, पिछले 15 सालों से दिल्ली पर राज कर रहीं मुख्यमंत्री शीला दीक्षित मुकाबले में तो बनी हुई हैं, लेकिन उनकी लोकप्रियता में जबर्दस्त गिरावट आई है। इसी तरह सरकार विरोधी माहौल होने के बावजूद भाजपा बहुमत से काफी दूर है। दरअसल, कांग्रेस और भाजपा दोनों के  खेल को बिगाड़ रही है आप। पहली बार किसी चुनाव में भाग ले रही आप को दिल्ली के 21 प्रतिशत से ज्यादा लोग पसंद कर रहे हैं।

70 सदस्यीय दिल्ली विधानसभा चुनाव में त्रिशंकु जनादेश की संभावना बनती दिख रही है। साप्ताहिक ‘हमवतन’ और ‘न्यूज एक्सप्रेस’ मीडिया एकेडमी द्वारा 20 सितंबर से चार अक्टूबर के बीच 7, 550 मतदाताओं के बीच कराए गए सर्वे से, जो रुझान सामने आ रहे हैं, वे त्रिशंकु विधानसभा की ओर इशारा कर रहे हैं। सर्वे के मुताबिक, दिल्ली में कांग्रेस को भारी झटका लग सकता है। सर्वे का दूसरा पहलू यह भी है कि भाजपा के तमाम दावों के विपरीत उसकी भी सरकार बनने की संभावना नहीं है। अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी भाजपा के बढ़ते कदमों को रोक रही है।

साथ ही कांग्रेस के भी कई इलाके आप के कब्जे में जाते दिख रहे हैं। ग्रामीण,  शहरी, इलाकों के युवाओं, बुजुर्गों और महिलाओं के बीच दरवाजे से दरवाजे किए गए सर्वे में कांग्रेस के पक्ष में 26 सीटें आती दिख रही हैं। भाजपा को भी इतनी ही सीटें मिलने की संभावना है। जबकि आप को 12 सीटें और अन्य दलों के बीच छह सीटें जाती दिख रही हैं। कांग्रेस के पक्ष में 29.8 फीसदी जनता विश्वास जता रही है, जबकि भाजपा के पक्ष में 36.75 फीसदी जनता वोट डालने के मूड में है। अभी एक साल के भीतर आंदोलन के गर्भ से निकली केजरीवाल की पार्टी आप को 21.20 फीसदी लोग पसंद कर रहे हैं, जबकि 12.25 फीसदी लोग अभी अन्य दलों या निर्दलीय पर यकीन कर रहे हैं।

दिल्ली के लोगों का मिजाज बदल रहा है। लगता है शीला दीक्षित के शासन से लोग ऊब से गए हैं। दिल्ली में 15 सालों में जो विकास हुए हैं, उससे लोग गदगद तो हैं, लेकिन महंगाई और भ्रष्टाचार की वजह से दिल्ली की जनता अब शीला दीक्षित की जगह केजरीवाल को ज्यादा तरजीह दे रही है। केजरीवाल को मुख्यमंत्री के रूप में 35.35 फीसदी जनता पसंद कर रही है,  जबकि शीला दीक्षित को अगले मुख्यमंत्री के लिए 29.4 फीसदी और विजय गोयल को मात्र 27 फीसदी लोग पसंद कर रहे हैं।

दिल्ली की जनता भले ही इस चुनाव में भाजपा को पसंद कर रही है, लेकिन मुख्यमंत्री के रूप में केजरीवाल को ज्यादा तरजीह दे रहे है। भाजपा को वोट देने वाले करीब 15 फीसदी ऐसे लोग हैं, जो सीएम के रूप में केजरीवाल को पसंद कर रहें हैं। इस सर्वे का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि जिन विधानसभा क्षेत्रों में कांग्रेस के बड़े नेता अब तक चुनाव जीतते रहे हैं, वहां उनके खिलाफ लोगों में ज्यादा गुस्सा है। करीब दर्जन भर कांग्रेस की सीटें ऐसी हैं, जहां बड़े स्तर पर उलटफेर की संभावना है। कांग्रेस के चार मंत्रियों की हार तय मानी जा रही है, क्योंकि उनके इलाके में कहीं भाजपा के प्रति लोगों का रुझान बढ़ा है, तो कहीं केजरीवाल के प्रति।

चौंकाने वाली बात यह है कि दिल्ली में भाजपा के प्रति जिन लोगों की रूचि बढ़ी है, उसके  लिए मोदी फैक्टर सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। आठ विधानसभा ऐसे पाए गए हैं, जहां केवल मोदी के नाम पर भाजपा की जीत होती दिख रही है। हालांकि जनता का रुझान चुनाव होते-होते बदलते रहते हैं, लेकिन इस सर्वे से यह पता चलता है कि दिल्ली में जो 15 सालों में विकास हुए हैं, वह भ्रष्टाचार और महंगाई के नीचे दबते दिख रहे हैं। शीला आज भी लोगों की पसंद हैं और लोग मानते भी हैं कि दिल्ली में विकास हुए हैं, लेकिन महंगाई, बेकारी, भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों ने कांग्रेस की जमीन को कमजोर किया है।

सर्वे में कुछ अलग-अलग पहलुओं पर भी लोगों की राय जानने की कोशिश की गई। कांग्रेस से अगले मुख्यमंत्री के रूप में कौन बेहतर साबित हो सकता है? इस सवाल के जवाब में जो लोगों की राय मिली है, उसमें कांगे्रस के भीतर शीला दीक्षित सबसे ऊपर हैं। 31 फीसदी लोग शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं, सुभाष चोपड़ा को 11 फीसदी लोग पसंद कर रहे हैं। 22 फीसदी लोगों की पसंद मुख्यमंत्री के रूप में जयप्रकाश अग्रवाल हैं, तो 36 फीसदी लोगों ने किसी अन्य को मुख्यमंत्री बनाने की बात कही है।

यही हाल भाजपा के भीतर भी है। हालांकि भाजपा ने अभी अपने मुख्यमंत्री उम्मीदवार की घोषणा नहीं की है, लेकिन जिस तरह से प्रदेश अध्यक्ष विजय गोयल को प्रोजेक्ट करने की बात हो रही है, वह भाजपा के पक्ष में नहीं है। विजय गोयल को मुख्यमंत्री के रूप में 24 फीसदी लोग पसंद कर रहे हैं, जबकि 47 फीसदी लोग सुषमा स्वराज को मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाह रहे हैं। भाजपा अगर सुषमा स्वराज के नजरिये से चुनाव को देखती है, तो भाजपा को और सीटें मिलने की संभावना बढ़ सकती है। 11 फीसदी लोग हर्षवर्धन को और 18 फीसदी लोग किसी अन्य को भाजपा के मुख्यमंत्री के रूप में पसंद कर रहे हैं।

दिल्ली के इस सर्वे में भाजपा के प्रधानमंत्री उम्मीदवार अन्य संभावित प्रधानमंत्री प्रत्याशियों में सबसे आगे निकलते दिख रहे हैं। दिल्ली की 52.7 फीसदी जनता मोदी को अगला प्रधानमंत्री बनाने के  पक्ष में हैं, दूसरे नंबर पर राहुल गांधी हैं। उनके पक्ष में 28.15 फीसदी जनता खड़ी है। सोनिया गांधी प्रधानमंत्री बने, इसकी चाहत 6.25 फीसदी लोगों में है। दिल्ली के इस सर्वे में छह फीसदी लोग बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को भी प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं, जबकि लालकृष्ण आडवाणी के पक्ष में तीन फीसदी और मुलायम सिंह यादव और मायावती के पक्ष में दो-दो फीसदी लोग समर्थन में हैं।

सर्वे रिपोर्ट

‘हमवतन’ एवं ‘न्यूज एक्सप्रेस’ मीडिया एकेडमी द्वारा दिल्ली विधानसभा चुनाव पर सर्वे-2013

-सर्वे की अवधि ( 20 सितंबर से 04 अक्टूबर)

-कुल विधानस सीट- 70

-कुल जनमत संग्रह- 7550

पार्टी             लोगों की राय (में)                संभावित सीटें

कांग्रेस              29.8             –             26

भाजपा              36.75            –             26

आप                21.20            –              12

अन्य                12.25            –              6

– त्रिशंकु विधानसभा के आसार
– कांग्रेस को हानि, भाजपा की बढ़त पर झाडू का अडंÞगा
– किसी भी दल को बहुमत नहीं

भाजपा में सीएम के रूप में कौन है
जनता की पसंद (प्रतिशत में)
विजय गोयल –     24
हर्षवर्धन-           11
सुषमा स्वराज-       47
अन्य-              18
युवाओं की पसंद
मोदी –           58
राहुल –           42

महिलाओं की पसंद
राहुल  –            62
मोदी-               48

कांग्रेस में सीएम के रूप में जनता की पसंद (प्रतिशत में)
शीला दीक्षित  –        31
सुभाष चोपड़ा –         11
जयप्रकाश अग्रवाल-      22
अन्य         –        36

देश का प्रधानमंत्री कौन बने? लोगों की राय (प्रतिशत में)
नरेंद्र मोदी-            52.7
राहुल गांधी-           28.15
सोनिया गांधी-         6.25
नीतीश कुमार-          6
लालकृष्ण आडवाणी-     3
मुलायम सिंह यादव-     2
मायावती        –      2

दिल्ली का मुख्यमंत्री कौन बने, इस पर जनता की राय (प्रतिशत में)
केजरीवाल      –       35.35
शीला दीक्षित    –       29.4
विजय गोयल   –        27.05

पार्टियों के बारे में लोगों की राय

प्रश्न 05 –  सबसे भ्रष्ट पार्टी लोगों की नजर में
कांग्रेस भाजपा सभी पार्टियां
48      41     11

प्रश्न 07 – दिल्ली की प्रमुख समस्या लोगों की नजर में
भ्रष्टाचार  बेरोजगारी  पानी/बिजली महिलाओं से छेड़छाड़
48          28          17            7

प्रश्न 08 – क्या अपराधियों को टिकट मिलना चाहिए?
नहीं   हां   नहीं पता
87    3     10

प्रश्न 10 – दिल्लीवासियों की नजर में देश की समस्या
भ्रष्टाचार आतंकवाद बेरोजगारी महंगाई
41        20       33         14

प्रश्न 11 -लोगों की नजर में राजनीति कैसी हो?
सेक्युलर  धार्मिक  विकास
83         11      6

प्रश्न- 12 -किस आधार पर वोट देंगे
पार्टी के नाम पर  उम्मीदवार के नाम पर
   78                     22

प्रश्न -13-विकास के बारे में दिल्ली की जनता की राय
विकास हुआ है  विकास नहीं हुआ  नहीं जानते
  73                 18                9

प्रश्न -14 क्या शीला दीक्षित को हटना चाहिए?
हां      नहीं   नहीं जानते
46      49       5

प्रश्न-16 क्या आप अपने विधायक से खुश हैं?
हां    नहीं   पता नहीं
34    57     9

प्रश्न- 19 दिल्ली पुलिस का कार्य कैसा है?
अच्छा  बेकार  मालूम नहीं
33     52        15

प्रश्न – 20 देश के दूसरे इलाके में हाल में हुए दंगे जनता की नजर में
राजनीतिक सांप्रदायिक नहीं जानते
73          22          5

प्रेस रिलीज

क्या हम मुसलमान हैं?

क्या सचमुच हम मुसलमान हैं? क्या हम इस्लाम के बताये रास्ते पर चल रहे हैं? अगर आज हम अपने आप को और दुनिया के 61 इस्लामिक मुल्क की 1.50 अरब की आबादी मुसलमान को देखें तो जवाब ना में मिलता है. मुसलमान उसे कहते हैं जो एक अल्लाह और आखिरी रसूल हज़रत मुहम्मद (सल्ल) को माने और इस्लाम के जो अरकान हैं उन पर अमल करे. इस के अतिरिक्त मुसलमानों का चरित्र भी अच्छा होना चाहिये. चरित्र तब ही अच्छा होगा जब आप में ये खूबियां होंगी जैसे ईमानदारी, हार्दिकता, वादा निभाना, सच्चाई और इंसाफ, जो बदकिस्मती से पूरी इस्लामी दुनिया में अब नहीं पायी जाती. जब तक ये खूबियां मुसलमानों में थीं दुनिया ने देखा कि हम कैसे पूरे विश्व पर छा गये थे.

सब से पहले आप ईमानदारी को देखिये. एक समय था जब मुसलमान को सबसे ज्यादा ईमानदार समझा जाता था. आज मुसलमानों से ईमानदारी खत्म हो गयी है. आप देखिए कि अरब मुल्कों में खाने पीने का सामान और दवा सभी अमेरिका और यरोप से आते हैं. डेनमार्क की कंपनी सऊदी अरब और दुबई में डेरी प्रोडक्ट और गोश्त सप्लाइ करती है. सारे मुस्लिम देश जर्मनी, अमेरिका, फ्रांस, स्विटजरलैंड से दवायें लेते हैं. अब आप देखिए कि एक इस्लामिक मुल्क दूसरे इस्लामिक मुल्क से कोई सामान नहीं लेता, क्योंकि वे जानते हैं कि क्वालिटी अच्छी नहीं होती. मुसलमान होने के बावजूद हम मक्का में हज और उमरे के दौरान हाजियों की जेब काटते हैं. वहाँ पर भीख मांगते हैं और पाकिस्तानी मुसलमान तो हज़ और उमरे के नाम पर जा कर चरस, अफीम, हीरोइन ले जाते हैं, पकड़े जाने पर सब को फांसी भी हो जाती है.
 
पहले मुसलमान की खासियत हार्दिकता थी अब मुसलमानों में ये खत्म हो गयी है और हम तंगदिल हो गये हैं. अब मुसलमानों में भी छोटे-बड़े, गोरे-काले, अमीर-गरीब जैसे भेदभाव आ गये हैं. अरबी और गैर अरबी मुसलमानों में भेदभाव जितना इस्लामिक मुल्कों में पाया जाता है पूरी दुनिया में कहीं देखने को नहीं मिलता. दुनिया में बहुत से ऐसे इस्लामी मुल्क हैं जहां लोग 30-40 साल से रह रहे हैं उन्हें नेशनलिटी नहीं दी जाती. आप मुसलमान हो कर भी अरब मुल्कों की लड़कियों से शादी नहीं कर सकते. आप बगैर किसी लोकल स्पांसर की सहायता से स्वयं अपना व्यापार नहीं कर सकते. मुसलमान 72 फिरकों मे बंटे हैं और हर एक दूसरे को काफ़िर कहता है. सब की अपनी अपनी मस्जिदें और अपना कब्रिस्तान है. आज सब से ज्यादा बेचैनी इस्लामिक मुल्कों में है. 61 इस्लामिक मुल्कों में से 25 मुल्कों में बादशाहत है.
 
इस्लाम दुनिया का पहला मज़हब है जिसने शिक्षा पर सब से ज्यादा जोर दिया है. क़ुरान की पहली आयत ही नाज़िल हुई कि इक़रा-पडो. हदीस है कि तुम्हें अगर शिक्षा लेने के लिये चीन भी जाना पड़े तो जाओ मगर आज शिक्षा में इस्लामिक मुल्क और पूरे मुसलमान, भारत के भी, और कौमों से बहुत पीछे हैं. ईसाई दुनिया के 40% नौजवान यूनिवर्सिटी तक पहुंचते हैं जब कि इस्लामी दुनिया के 2% नौजवान यूनिवर्सिटी तक पहुंचते हैं. इस्लामी दुनिया में 20 लाख लोगों में से सिर्फ 230 लोगों को विज्ञान की जानकारी है जब कि अमेरिका में 10 लाख लोगों में 4 हज़ार को विज्ञान की जानकारी है पूरे इस्लामिक मुल्क में 35 हजार रिसर्च स्कॉलर हैं जबकि सिर्फ अमेरिका में इनकी संख्या 22 लाख है. इस समय दुनिया की 200 बड़ी यूनिवर्सिटियों में एक भी यूनिवर्सिटी मुस्लिम मुल्क की नहीं है.
 
इस्लाम ने सब से ज्यादा जनहित, परोपकार या समाज सेवा के लिये मुसलमानों को प्रेरित किया है. इस्लाम ही एक ऐसा धर्म है जिसमें गरीबों की मदद के लिये ज़कात देने को कहा गया है. मगर अफसोस आज मुसलमान इन कामों से दूर होता जा रहा है. अगर हम दुनिया के 50 सबसे ज्यादा दान देने वालों की सूची देखें तो उसमें एक भी मुस्लिम का नाम नज़र नही आता है साथ में कोई हमारे हिन्दू भाई भी नही हैं. इस काम में सिर्फ ईसाई धर्म के लोग आगे हैं. रेडक्रॉस जो दुनिया का सब से बड़ा मानवीय संगठन है इस के बारे मे बताने की जरूरत नहीं है. आप को मालूम होगा कि बिल-मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन में बिल गेट्स ने 10 बिलियन डॉलर से इस फाउंडेशन की बुनियाद रखी है जो कि पूरे विश्व के 8 करोड़ बच्चों की सेहत का ख्याल रखता है. इसके अतिरिक्त एड्स और अफ्रीका के गरीब देशों को खाना और मानवीय सहायता पहुचाता है. दुनिया उस समय दंग रह गयी जब वॉरेन बफेट ने इस फाउंडेशन को 18 बिलियन डॉलर दान में दे दिया. मतलब वॉरेन ने 80% अपनी पूँजी दान में दे दी. दुनिया के 50 सब से ज्यादा दान देने वालों में एक भी मुसलमान नहीं है. अरब का अमीर शाहज़ादा अपने स्पेशल जहाज पर 500 मिलियन डॉलर खर्च कर सकता है मगर मानवीय सहायता के लिये आगे नहीं आ सकता है.
 
इस्लाम ने मुसलमानों को जिन बुराइयों से रोका था आज सब से ज्यादा मुसलमानों में और इस्लामिक मुल्कों में पायी जा रही हैं. शराब, जुआँ, ब्याज, अय्याशी की इस्लाम में सख्त मनाही है मगर आज ये मुसलमानों में आम हो गया है. यही कारण है कि आज हम अल्लाह की सबसे अच्छी कौम होने के उपरान्त भी पूरी दुनिया में हम बदनाम और रुसवा हो रहे हैं. हमारी नमाज़ें और दुआयें कबूल नहीं हो रही हैं. इसलिए मुसलमानों को चाहिए कि इस्लाम के बताये रास्ते पर चलें, शिक्षा पर ध्यान दें, बुरे कामों से तौबा करें और वक्त के साथ चलें. अगर ऐसा न हुआ तो वो दिन दूर नहीं जब मुसलमान दुनिया से पिछड़ जायेंगे. इसी लिये अभी भी समय है कि मुसलमान जागें नहीं तो बहुत देर हो जायेगी. बकौल एक शायर- तुम्हारी दास्तां तक न होगी दस्तानों में.

लेखक अफ़ज़ल ख़ान का जन्म समस्तीपुर, बिहार में हुआ. वर्ष 2000 में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से एमबीए की पढ़ाई कंप्लीट की. इन दिनों दुबई की एक कंपनी में मैनेजर की पोस्ट पर कार्यरत हैं. 2005 से एक उर्दू साहित्यिक पत्रिका 'कसौटी जदीद' का संपादन कर रहे हैं. संपर्क: 00971-55-9909671 और  kasautitv@gmail.com के जरिए.

धर्मवीर की समाचार लेखन व संपादन पर पुस्तक प्रकाशित

अंबाला- हरिभूमि हरियाणा संस्करण के अंबाला ब्यूरो चीफ धर्मवीर सिंह की समाचार लेखन व संपादन के सिद्धांत शीर्षक के साथ पुस्तक प्रकाशित हुई है। पुस्तक में उनके साथ गवर्नमेंट कॉलेज अंबाला छावनी के मास कॉम विभाग के हेड रविशंकर कॉ आथर हैं। पुस्तक का विमोचन 26 सितंबर को अंबाला के पुलिस कमीश्नर व जानेमाने साहित्यकार राजबीर देशवाल ने किया। इस मौके पर देशवाल ने पुस्तक के कंटेंट की खूब सराहना की। पुस्तक सुकीर्ति प्रकाशन से प्रकाशित हुई है।

धर्मवीर सिंह हरियाणा के उन पत्रकारों में शुमार रहे हैं जो नियमित अध्ययन रत रहते हैं। इससे पहले धर्मवीर सिंह ने लगातार दो बार यूजीसी की नेट परीक्षा उतीर्ण की थी। धर्मवीर सिंह पत्रकारिता के  स्नातकोत्तर छात्रों को एक्सटेंशन लेक्चर भी देते हैं। उन्हें इस मौके पर अम्बाला के पत्रकारों की तरफ से बधाई भी मिली।

कंवल भारती, कांग्रेस, रामपुर का तानाशाह, कायर और लफ़्फ़ाज़ दोस्तों का दलदल

: एक वह दिन थे कि कारंत के लिए अशोक वाजपेयी सारी अफ़सरी भूल कर रात भर थाने में बैठे रहे थे : मतलब कंवल भारती न हों, वामपंथी मित्रों की जागीर हों। गुलाम हों। कि वह जो भी कुछ करें इन से पूछ कर करें। नहीं यह उन्हें पानी भी नहीं देंगे। दिन-रात कोसेंगे मुफ़्त में। अदभुत है यह तो। गरज यह कि कंवल भारती पहले दलित थे, फिर वामपंथी हुए, अब कांग्रेसी हो गए हैं। गनीमत है कि वह भाजपाई नहीं हुए। कई वामपंथी बल्कि चरम वामपंथी तो मौका मिलते ही भाजपाई तक हो गए हैं। वैसे वामपंथी दोस्त उन के कांग्रेसी होने पर ऐसा स्यापा कर रहे हैं गोया वे सपाई या बसपाई हुए होते तो बेहतर होता। वह शायद इस तथ्य को भूल रहे हैं कि दो दशक पहले ही वह कांशीराम के दो चेहरे किताब लिख चुके हैं। तो बसपा में जा नहीं सकते थे। समाजवादी पार्टी की आग में वह जल ही रहे हैं। वामपंथियों की कोई हैसियत नहीं है रामपुर या उत्तर प्रदेश में। और फिर जो वह कांग्रेसी हो ही गए हैं तो खुशी-खुशी नहीं हुए होंगे।

रामपुर में सपा राज के जंगलराज से आज़िज़ हो कर हुए होंगे। ऐसा मुझे लगता है। नहीं वह तो अपने दलित चिंतन में ही खुश थे। लेकिन रामपुर अब ऐसी जगह है जहां कोई सरकारी कर्मचारी भी नहीं रहना चाहता। डाक्टरों तक ने सामूहिक स्थानांतरण मांग लिया है। और वामपंथी मित्रों की हकीकत यह है कि वह ड्राइंगरुमों मे, सेमिनारों में निंदा बयान की आग तो बरसा सकते हैं, एन.जी.ओ. बना कर आइस-पाइस तो खेल सकते हैं पर मौके पर जान देने और विरोध करने की तो छोड़िए, शव यात्रा में भी जाने से कतरा जाते हैं। बीते दिनों अदम गोंडवी की शव को फूल माला तो नसीब हो गई पर लाख कहने पर भी कोई उन के शव के साथ गोंडा नहीं गया। सिर्फ़ एक समाज सेविका गईं थीं। यकीन न हो तो अदम के बेटे या भतीजे से बात कर के देख लीजिए। सब बता देंगे। और फिर कंवल भारती के लिए भी रामपुर कौन गया ? कंवल भारती के लिए सिर्फ़ बयानबाज़ी भर हुई। सरकार को एक ज्ञापन तक देने कोई नहीं गया। सारे सरोकार अखबारी बयान और फ़ेस-बुक पर लफ़्फ़ाज़ी तक ही सीमित रहे।

दिल्ली, लखनऊ या किसी राजधानी में रह कर बड़ी-बड़ी बातें कर लेना आसान है। रामपुर जैसी छोटी जगह में किसी जानवर या राक्षस के जबड़े में रहने जैसा हो जाता है अगर किसी सत्ताधारी से, किसी गुंडे से, माफ़िया से पंगा हो जाए। आज़म खां बहुत ईमानदार नेता हैं, इस में कोई शक नहीं लेकिन वह वामपंथियों से भी बड़े तानाशाह हैं। अपने आगे वह सब को चोर समझते हैं। बीमारी की हद तक। मुलायम और अखिलेश जैसों को झुका लेते हैं अपने आगे तो कंवल भारती क्या चीज़ हैं? वह तो आज़म से वैसे ही लड़ रहे हैं जैसे बाघ से कोई बिल्ली लड़ जाए। तो बचाव के लिए कहिए, ढाल कहिए वह कांग्रेस की झाड़ की आड़ में चले गए हैं। ऐसा मुझे लगता है। कंवल भारती से मेरी कोई मित्रता नहीं है, कोई परिचय नहीं है। कभी बातचीत नहीं है। तो भी जो परिदृष्य दिख रहा है, उस के मुताबिक मेरा अनुमान ही भर है यह। और लग रहा है कि कंवल भारती के आगे , पीछे दोनों तरफ़ खाई और कुएं का माहौल था। अब वह खाई में गए हैं कि कुंएं में यह तो वक्त बताएगा। पर यह तो तय हो गया है कि किसी भी एक स्वतंत्रचेता व्यक्ति का सीना तान कर अब जीना मुहाल है। उसे समझौता करना लाजमी हो गया है। कम से कम जीने के लिए।

यहां एक न्यायमूर्ति एस सी श्रीवास्तव की एक बात याद आ गई है। जिन्हें लोग बड़े आदर से एस.सी.एस. कहते थे किसी समय। तीन दशक पुरानी बात है। वह रिटायर हो चुके थे। लखनऊ के इंदिरा नगर में रहते थे। एक सेमिनार में उन से किसी ने पूछा था कि इज़्ज़त-पानी से सुरक्षित ढंग से कैसे रहा जाए? तो वह बिना लाग-लपेट के बोले थे। और कहा था कि भाई आप की बात तो नहीं जानता पर अपनी बात आप को बता सकता हूं। घर की बाऊंड्री ऊंची बनवाई है। बिजली के विकल्प के लिए जेनरेटर लगवा रखा है, पानी के लिए बोरिंग करवा कर मोटर लगा रखा है। इलाके के गुंडों से फ़ोन कर के रिक्वेस्ट कर लेता हूं कि रिटायर्ड जस्टिस हूं, हो सके तो मेरा खयाल रखना। जब कोई नया एस.एस.पी या थाने पर नया थानेदार. आता है तो उसे भी फ़ोन कर रिक्वेस्ट कर लेता हूं कि भाई रिटायर्ड जस्टिस हूं ज़रा हमारा खयाल रखना। मैं तो भाई इसी तरह इज़्ज़त-पानी से सुरक्षित रहता हूं। सोचिए कि यह तीन दशक पुरानी बात लखनऊ की है।और यह बात भी एस.सी.एस. कह रहे थे जो कानून की सख्ती के लिए अपने समय में मशहूर थे। एक बार तो उन्हों ने एक आदेश न मानने पर उन्नाव के चीफ़ ज़्यूडिशियल मजिस्ट्रेट तक को हथकड़ी लगवा कर हाईकोर्ट में बुलवाया था। और कहा था कि जब आप न्यायाीश हो कर कानून नहीं मानेंगे तो भला और कोई क्यों मानेगा? और वह जस्टिस रिटायर होने के बाद लखनऊ जैसे शहर में कैसे तो अपना रहना बता रहा था।

तो कंवल भारती भी रिटायर हो चुके हैं। रामपुर जैसे शहर में आज़म खां जैसे तानशाह से मोर्चा खोल कर रह रहे हैं। रामपुर के नवाब परिवार से तो ज़्यादा ताकतवर नहीं हैं कंवल भारती। मुलायम और अखिलेश से ज़्यादा ताकतवर तो नहीं हैं कंवल भारती। रामपुर के नवाब परिवार समेत मुलायम अखिलेश, मुलायम तक जिस आज़म खां के आगे शरणागत हों, हां जयाप्रदा तक। वहां आप एक गरीब लेखक से उम्मीद करें कि वह सीना तन कर मर जाए, अपने बाल-बच्चों को आप की खोखली बयानबाज़ी के बूते। कंवल भारती, आज़म खां की तानाशा्ही से बचने के लिए अगर कांग्रेस की शरण चले ही गए हैं तो कोई अपराध नहीं कर दिया है। उन की यातना को समझें, अपने आप को कोसें और सोचें कि क्या प्रतिरोध ऐसे ही होता है? कि एक लेखक वैचारिक सरणी छोड कर राजनीति के जंगल में छुपने का विकल्प आखिर क्यों चुनता है?

देखिए कि यहीं भड़ास 4 मीडिया चलाने वाले यशवंत सिंह की याद आ गई। मीडिया घरानों की ईंट से ईंट बजाने के लिए वह जाने जाते हैं। पढ़े-लिखे पत्रकारों की लड़ाई अकेले दम पर लड़ते हैं। बिना किसी सुविधा के। कुछ बड़े मीडिया घरानों की साज़िश के चलते उन्हें, और उन के सहयोगी अनिल सिंह को इसी अखिलेश सरकार ने जेल भेज दिया। जिन सुविधाजीवी पत्रकारों की लड़ाई वह भड़ास के मार्फ़त लड़ते आ रहे हैं, सब के सब मूक दर्शक बन गए। यशवंत अपने दम पर और कुछ व्यक्तिगत मित्रों के भावनात्मक संबल पर लड़ कर लंबी जेल काट कर बाहर आए। और 68 दिन जेल में रह कर बाहर आए तो 'जानेमन जेल' उपन्यास भी उन्हों ने लिखा। सारे घटनाक्रम को लेकर। पर तब इसी लखनऊ में मैंने कई पत्रकारों से मुख्यमंत्री को एक ज्ञापन देने के लिए चलने को कहा, धरना देने को कहा तो सब ने हाथ जोड़ लिए। क्या तो उन्हें नौकरी करनी थी। बाल-बच्चे पालने थे। जैसे यशवंत सिंह और अनिल सिंह के बाल बच्चे नहीं थे। तो कंवल भारती के भी तो बाल-बच्चे होंगे ही। भवानी प्रसाद मिश्र की एक कविता याद आ रही है:

देखे हैं मैंने बाढ़ों से पड़े पेड़
एक साथ बहते पेड़ों पर सहारा लिए सांप और आदमी
और तब एकाएक चमका है
यह सत्य है कि बेशक सांप और आदमी आफत में एक है
मौत की गोद में सब बच्चे हैं।

तो मित्रो, कंवल भारती की यातना की पड़ताल भी ज़रुरी है, बहुत ज़रुरी। हो सकता है वह निरे अवसरवादी हों, हो सकता है वह निरे कायर हों, हो सकता है यह उन का विचलन भी हो, हो सकता है उन की राजनीति में जाना महत्वाकांक्षा भी रही हो, कुछ भी हो सकता है। लेकिन एक बार उन की स्थितियों पर गौर कर लेने में हर्ज़ क्या है? हो सकता है वह कि वह लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए भी कांग्रेस में रणनीति के तहत गए हों, हो सकता है वह चुनाव भी जीत जाएं। पर वह लड़ किस से रहे हैं, महत्वपूर्ण यह है। सत्ता केंद्र और किसी तानाशाह से लड़ कर किसी छोटे शहर में देख लीजिए, सारा वामपंथ और बौद्धिकता, सारी क्रांति और सारी लफ़्फ़ाज़ी हिंद महासागर में समा जाएगी। यह समय कंवल भारती को नैतिक और भौतिक समर्थन देने का था, और है। जो हम नहीं दे पाए, नहीं दे पा रहे। सारा ज़ोर और क्षमता अटकलबाज़ी और सुरागरसी में खर्च किए जा रहे हैं। यह बंद होना चाहिए।

एक बहुत मशहूर रंगकर्मी थे ब.व. कारंत। बहुत भले और सरल आदमी। याद है उन की? तब के दिनों वह भारत भवन के रंगमंडल का काम देख रहे थे। लखनऊ की ही एक रंगकर्मी विभा मिश्रा से उन के भावनात्मक संबंध भी किसी से छुपे नहीं थे। किसी बात पर नाराज हो कर एक रात विभा ने अपने घर में खुद आग लगा ली। विभा को बचाने में कारंत खुद भी जल गए। पर पुलिस को उन्हों ने खुद सूचित भी किया। पुलिस ने विभा को अस्पताल भेजा और कारंत को थाने ले आई। यह खबर पाते ही अशोक वाजपेयी थाने आ गए। रात भर कारंत के साथ ही थाने में रहे यह सोच कर कि पुलिस कारंत के साथ कोई दुर्व्यवहार न कर बैठे। कारंत निर्दोष थे यह भी सब जानते थे। पर अशोक वाजपेयी की चिंता अपनी जगह थी। वह एक वरिष्ठ आई.ए.एस. अधिकारी का रुतबा भूल कर कारंत की सुरक्षा में रात भर थाने में बैठ सकते थे, क्यों कि वह कारंत के सच्चे दोस्त थे। दूसरे दिन मुंबई से गिरीश कर्नाड आदि दोस्त भी भोपाल पहुंचे। विभा मिश्रा ने जो खुद मौत से लड़ रही थी, आखिर तक कारंत के खिलाफ़ एक शब्द नहीं कहा न पुलिस से, न प्रेस से। जब कि कारंत जी का मीडिया ट्रायल चालू था। खैर कारंत जी के लिए तो अशोक वाजपेयी रात भर थाने में बैठ गए, अपनी अफ़सरी दांव पर लगा कर। गिरीश करनाड जैसे लोग मुंबई का ग्लैमर, बदनामी का खौफ़ भूल कर भोपाल पहुंचे। पर यहां मेरे लिए यह जानना भी दिलचस्प होगा कि कंवल भारती को उपदेश देने वाले या अन्य ही सही, कौन पहुंचा रामपुर कंवल भारती के लिए। यह ठीक है कि वह एक दिन में ही अदालत से छूट गए। तो भी वैचारिकी का, दोस्ती का कुछ तकाज़ा भी क्या नहीं बनता था?
बनता तो था।

लेकिन नहीं बना और कंवल भारती को कांग्रेस शरणं गच्छामि होना पड़ा। कि आज लोग कंवल भारती के कांग्रेस में जाने पर विधवा विलाप में लग गए गए हैं। कंवल भारती एक जालिम से, एक तानाशाह और ताकतवर से जो जालिम भी है, जो मुख्यमंत्री को भी मुर्गा बना देता है जब मन तब, उस से लड़ रहे हैं, अकेले दम पर लड़ रहे हैं और हम असहमतियों के सूत्र, सिद्धांतों के बीज खोज रहे हैं। कंवल भारती का मनोविज्ञान नापने लगे हैं थर्मामीटर ले कर कि वह कब क्या सोच रहे थे? क्या कर रहे थे, क्या कह रहे थे? भाई वाह ! लेकिन तब गाढ़े के दिनों में कोई रामपुर नहीं गया। कंवल भारती खुद ही लखनऊ-दिल्ली होते रहे। तो आखिर दिल्ली से, लखनऊ से या कहीं और से ही सही रामपुर क्या बहुत दूर था? कि दूरी दिलों में ही थी? वैचारिकी की ज़मीन , दोस्ती की ज़मीन क्या इतनी दलदल भरी हो गई है अब की तारीख में? नहीं, मैं ने पढ़े हैं हिटलर के यातना शिविरों के भी कई विवरण। बार-बार रोंगटे खड़े कर देने वाले। और जाना है कि वैचारिकी, दोस्ती और संबध लोग कैसे तो मौत पर खेल कर, यातना-दर-यातना सहते हुए भी बरसों निभाते रहे थे। निरंतर। जवानी से बुढापा आ गया लेकिन मुंह नहीं खोला। तो क्या आज आज़म खां की तानाशाही अब हिटलर को भी मात कर रही है कि हम सचमुच कायर समय में जी रहे हैं? लफ़्फ़ाज़ी का सर्कस देखते हुए। बशीर बद्र क्या ऐसे समय के लिए ही कहते हैं:

चाबुक देखते ही झुक कर सलाम करते हैं
शेर हम भी हैं सर्कस में काम करते हैं।


लेखक दयानंद पांडेय वरिष्ठ पत्रकार और उपन्यासकार हैं. उनसे संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है. यह लेख उनके ब्‍लॉग सरोकारनामा से साभार लिया गया है.


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भड़ास पर दनपा


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अपने पक्ष में कांग्रेस का समर्थन लेने पर मैं आपकी आलोचना का पात्र बन गया हूं. यह मैं सुबह से देख रहा हूं. सामाजिक और दलित आन्दोलनों के सभी साथी मुझसे नाराज़ हैं. मुलायम सिंह यादव और मायावती ने कांग्रेस की छतरी में जाकर अपने सारे आर्थिक पाप क्षमा करा लिए, किसी दलित और पिछड़े ने उनकी आलोचना क्यों नहीं की? आज भी वे जनता को धोखा दे रहे हैं और लोकसभा में कांग्रेस की ही सरकार बनाने के लिए सपोर्ट करेंगे. तोहफा उन्हें मिल ही चुका है. ये लोग जनता के विश्वासघाती क्यों नहीं हैं? सिर्फ कंवल भारती कांग्रेस की सपोर्ट लेकर विश्वासघाती हो गये?

अजीब तर्क हैं आप लोगों के. क्या डा. आंबेडकर ने कांग्रेस की सपोर्ट नहीं ली थी? क्या वे कांग्रेस की सरकार में मंत्री नहीं बने थे? क्या कांग्रेस की सपोर्ट लेकर वे ब्राह्मणवादी और पूंजीवादी हो गये थे? रामपुर में आज़म खां ने मेरे विरुद्ध कितनी भयाभय स्थितियां पैदा कर दी हैं, आप में से किसी को भी उनका अंदाजा नहीं है. मेरे सामने रामपुर छोड़ने के सिवा कोई चारा नहीं रह गया था. मैं क्या करता?

कांग्रेस से जुड़ना मेरी मजबूरी है, जिसका अहसास आप नहीं कर सकते. लेकिन क्या मैंने कांग्रेस के आगे अपनी वैचारिकी का भी समर्पण कर दिया है, अगर कोई ऐसा समझ रहा है, तो वो गलत समझ रहा है. मैं अपनी विचारधारा के साथ ही रहूँगा, मैं कांग्रेस के खूंटे से नहीं बंध गया हूँ. जिस दिन मुझे लगेगा कि मैं कांग्रेस के साथ नहीं चल सकता, बाहर निकलने में एक क्षण भी नहीं लगाऊंगा. यह मेरा स्पष्टीकरण नहीं है, पर मैं अपने आलोचकों को बताना चाहता हूँ कि मुझे समझना इतना आसान नहीं है, जितना आप समझ रहे हैं.

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जब तक रास्ता नहीं है, तब तक क्या करें? कहाँ जाए आदमी? चार दल के सिवा पांचवां कहाँ है? कम्युनिस्ट भी कल तक कांग्रेस के ही साथ थे. केरल में वे मुस्लिम लीग से गठजोड़ करते रहे हैं. मैंने वामपंथी संघठनों को भी नजदीक से देखा है. NGO चला रहे हैं और मस्त हैं. कोई विकल्प खड़ा किया उन्होंने? इन्हीं की वजह से पूंजीवादी दल फल फूल रहे हैं.

दलित चिंतक और साहित्यकार कंवल भारती के फेसबुक वॉल से.

पत्रकार जेडे हत्याकांड के आरोपी छोटा राजन गिरोह के सदस्य पॉलसन जोसफ को जमानत

मुंबई : बंबई उच्च न्यायालय ने पत्रकार ज्योतिर्मय डे की हत्या के आरोपी और छोटा राजन गिरोह के कथित सदस्य पॉलसन जोसफ को आज जमानत दे दी। न्यायमूर्ति यू वी बाकरे ने एक लाख रुपये के निजी मुचलके पर जोसफ को जमानत दे दी। पॉलसन इस मामले में जमानत प्राप्त करने वाला दूसरी आरोपी है।

अपराध शाखा ने अपराध के सिलसिले में 11 आरोपियों को गिरफ्तार किया था। मामले में आरोपी पत्रकार जिगना वोरा को जमानत पहले ही मिल चुकी है जिसे मामले में गिरफ्तार किया गया था।

मां दुर्गा की तस्वीर के सामने बाप ने छह माह के बेटे की दे डाली बलि

बाराबंकी। एक अंधविश्वासी बाप ने अपने 6 माह के बेटे को कुल्हाड़ी से काटकर उसकी बलि दे डाली। यह जघन्य कृत्य उसने घर में बने पूजा स्थल में रखी मां दुर्गा की तस्वीर के सामने किया। मौके पर पहुंची पुलिस ने इस हत्यारे को गिरफ्तार करके जेल भेज दिया है। वहीं इस खबर ने पूरे इलाके में हड़कम्प मचा दिया है। मिली जानकारी के मुताबिक रामनगर थाना क्षेत्र के ग्राम नरैनी पुरवा निवासी 23 वर्षीय राजकुमार उर्फ हेमन्त कनौजिया पुत्र महेश आज सुबह अपने 6 माह के बेटे अहम को गोद में लेकर घर से निकल गया। इस दौरान उसने स्वयं भी नहाया और अपने बेटे को भी स्नान कराया। स्वयं कपड़े पहने तो बेटे को भी अच्छे कपड़े पहनाये।

इसके बाद वह उसे लेकर पहुंचा दुर्गा पूजा स्थल पर स्थापित मां जगत जननी के दरबार में। ग्रामीणों का कहना है कि उसने बेटे को अहम को यहां दर्शन कराया और फिर घर लेकर पहुंच गया घर में बने लघुपूजा स्थल के सामने। इस दौरान उसकी पत्नी सीमा छत के ऊपर खाना बना रही थी। उसके पिता महेश खेत को गये थे, मां बकरी चराने गयी थी। एकाएक इस जल्लाद पिता ने 6 माह के अबोध बेटे अहम के गले पर कुल्हाड़ी चला उसे काट डाला। जिससे अहम की मौत हो गयी। जब यह वाक्या उसके भाई निर्मल ने देखा तो वह चिल्ला पड़ा। पत्नी सीमा भी दौड़ी तो हत्यारा बाप पत्नी की ओर दौड़ पड़ा जिसके बाद किसी तरह निर्मल ने उसकी जान बचायी।

बेटे की हत्या करने के बाद हत्यारा गांव स्थित एक बाग में छिपकर बैठ गया। इधर घर में कोहराम तो मचा ही पूरे गांव में हाहाकार मच गया। जिसने सुना वह राजकुमार के घर जा धमका। पुलिस भी मौके पर पहुंच गयी। आखिरकार हत्यारा जल्लाद पकड़ा गया। उसके चेहरे पर कोई पश्चाताप नहीं था। पूछने पर वह बोला शैतान का हुक्म था आज का समय निश्चित था इसलिए बेटे की बलि देनी पड़ी फिर मैंने उसका नाम ही अहम बलि देने के लिए रखा था। इस लोमहर्षक घटना की जानकारी पर कप्तान आनंद कुलकर्णी ने भी मौके का दौरा किया। कलेजे के टुकड़े को मांग के सिन्दूर के द्वारा दी गयी मौत के चलते अभागी मां व पत्नी सीमा का रो रोकर बुरा हाल था। फिलहाल पुलिस ने जल्लाद हत्यारे को पकड़कर जेल भेज दिया।

बाराबंकी से रिजवान मुस्तफा की रिपोर्ट.

वोट बैंक की राजनीति के कारण तेलंगाना विरोधियों के बीच जबरदस्त होड़ शुरू, कांग्रेस दुविधा में फंसी

आंध्र प्रदेश का बंटवारा करके अलग तेलंगाना राज्य बनाने के केंद्र सरकार के फैसले के बाद सीमांध्र (तटीय आंध्र और रॉयल सीमा क्षेत्र) में विरोध प्रदर्शनों की होड़ लग गई है। इसके चलते यहां का आम जन-जीवन विरोधी आंदोलनों की चपेट में आ गया है। 30 हजार से ज्यादा बिजली कर्मचारी हड़ताल पर चले गए हैं। इससे सभी बड़े पावर स्टेशन ठप पड़ रहे हैं। बिजली की आपूर्ति बुरी तरह से बाधित हो गई है। इसके चलते सीमांध्र का अधिकांश इलाका अंधेरे में डूब रहा है। विशाखापट्टनम जैसे बड़े शहर बुरी तरह से प्रभावित हो रहे हैं।

तेलंगाना के मुद्दे पर वोट बैंक की राजनीति भी तेज हो गई है। इसी चक्कर में तेलंगाना विरोधियों के बीच भी जबरदस्त होड़ शुरू हो गई है। इस मुद्दे पर कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व भी खासी दुविधा में फंस गया है। क्योंकि, तेलंगाना का मुद्दा उसके लिए दो धारी तलवार साबित हो रहा है। यहां तक कि राज्य के कांग्रेसी मुख्यमंत्री एन किरण रेड्डी भी बगावती तेवरों में आ गए हैं। इसके चलते केंद्र कई और राजनीतिक विकल्पों की तैयारी में जुट गया है। जल्दबाजी में कोई फैसला नहीं किया जा रहा है। क्योंकि, दुविधा यही है कि कहीं आर-पार के किसी फैसले से कांग्रेस को ज्यादा राजनीतिक घाटा न हो जाए?

दरअसल, 3 अक्टूबर को केंद्रीय कैबिनेट ने 29वें राज्य के रूप में तेलंगाना गठन के प्रस्ताव पर मंजूरी दी थी। इस फैसले के बाद ही सीमांध्र में विरोधी आंदोलनों का दौर तेज हो गया है। वाई एस आर कांग्रेस के प्रमुख जगनमोहन रेड्डी ने राज्य के बंटवारे के खिलाफ जोरदार अभियान चला दिया है। वे खुद केंद्र के फैसले के खिलाफ आमरण अनशन पर बैठ गए हैं। उनके बेमियादी अनशन का पांचवां दिन है। इस पार्टी के कार्यकर्ताओं ने सीमांध्र के सभी 13 जिलों में आंदोलन तेज कर दिया है। लोगों को तेलंगाना के विरोध में भावनात्मक रूप से काफी भड़काया जा रहा है। इस मुद्दे पर तेलुगू देशम पार्टी (टीडीपी) से उसका खास मुकाबला शुरू हो गया है। लेकिन, वाई एस आर कांग्रेस के मुकाबले टीडीपी का आंदोलन ज्यादा चमकदार नहीं बन पा रहा है। क्योंकि, तेलंगाना के मुद्दे पर इस पार्टी का रवैया एक दौर में ढुलमुल किस्म का रहा है।

यह अलग बात है कि इस समय सीमांध्र की जनभावनाओं को देखकर टीडीपी प्रमुख चंद्रबाबू नायडू धुर तेलंगाना विरोधी हो गए हैं। उन्हें लगता है कि इस फैसले से केंद्र सरकार ने सीमांध्र के साथ भारी नाइंसाफी कर दी है। पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रबाबू का आरोप है कि राज्य का बंटवारा करके केंद्र ‘गंदी राजनीति’ का खेल शुरू कर रहा है। इसीलिए, उनकी पार्टी आखिरी दम तक इस फैसले का विरोध करेगी। चंद्रबाबू, तेलंगाना के फैसले का विरोध करने के लिए दिल्ली में आमरण अनशन पर बैठ गए हैं। उनके अनशन का आज तीसरा दिन है। तेलंगाना विरोधी टीडीपी और वाई आर एस कांग्रेस के खिलाफ कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व में भी पलटवार की रणनीति अपना ली है। कांग्रेस प्रवक्ता भक्त चरणदास का दावा है कि ये दोनों पार्टियां तेलंगाना के मुद्दे पर लोगों को गुमराह करने में लगी हैं। क्योंकि, टीडीपी का नेतृत्व तो आज तक यह तय नहीं कर पाया है कि उसे तेलंगाना का विरोध करना है या नहीं। कांग्रेस प्रवक्ता ने दावा किया है कि पिछले साल दिसंबर में चंद्रबाबू नायडू ने केंद्रीय गृहमंत्री सुशील शिंदे से मिलकर कहा था कि उनकी पार्टी तेलंगाना की जनभावनाओं के साथ है। इसी तरह जून में वाई एस आर कांग्रेस ने अपने एक प्रस्ताव में कहा था कि पार्टी तेलंगाना के लोगों की जनभावनाओं का आदर करेगी। बस, इतना चाहेगी कि तेलंगाना के मुद्दे पर सीमांध्र के साथ कोई बड़ी नाइंसाफी न हो।

केंद्रीय मंत्री सुशील शिंदे ने मीडिया से अनौपचारिक बातचीत में कहा है कि कुछ राजनीतिक दल महज वोट बैंक की राजनीति के लिए सीमांध्र के लोगों को गुमराह कर रहे हैं।   इस तरह की राजनीति काफी खतरनाक है। क्योंकि, इससे लोगों के बीच बेहद संकीर्ण मुद्दे पर कटुता फैलाने की साजिश हो रही है। शिंदे कहते हैं कि यदि बंटवारे के किन्हीं मुद्दों पर कोई ऐतराज हो, तो बातचीत के रास्ते खुले हुए हैं। इस पर मिल-बैठकर बातचीत हो सकती है। वैसे भी, बंटवारे को लेकर अभी बहुत से फैसले होने बाकी हैं। सरकार ने इसके लिए केंद्रीय मंत्रियों का एक समूह (जीओएम) गठित कर दिया है। यह मंत्रि समूह सभी पक्षों की भावनाएं समझकर अपनी सिफारिशें करने वाला है। लेकिन, कुछ राजनीतिक ताकतें हिंसक वारदातें कराने में सक्रिय हो गई हैं। इन ताकतों को जरूर पहचानना होगा। क्योंकि, ये चेहरे सीमांध्र के हितैषी नहीं हो सकते।

आंध्र में पृथक तेलंगाना की मांग बहुत पुरानी है। अलग राज्य के लिए लंबे समय से आंदोलन चलते आए हैं। 2004 के लोकसभा चुनाव में पहली बार कांग्रेस ने अलग तेलंगाना बनाने का वायदा अपने घोषणा पत्र में किया था। लेकिन, गैर-तेलंगाना इलाकों में विरोध के स्वर मुखर हो जाने के कारण पार्टी ने इस मुद्दे पर चुप्पी साधने का विकल्प बेहतर समझा था। हालांकि, तेलंगाना के मुद्दे पर ही कांग्रेस और तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) के बीच चुनावी गठबंधन हुआ था। इस पार्टी के प्रमुख के. चंद्रशेखर राव यूपीए की पहली पारी में मंत्री भी बने थे। लेकिन, जब मनमोहन सरकार ने तेलंगाना के मुद्दे पर लंबे समय तक टाल-मटोल का रवैया अपनाया, तो उनका मोह कांग्रेस से भंग हो गया था। उन्होंने कांग्रेस से अपनी पार्टी का गठबंधन तोड़ दिया था।

टीआरएस प्रमुख चंद्रशेखर राव कहते रहे हैं कि यदि केंद्र सरकार तेलंगाना गठन का फैसला कर ले, तो वे अपनी पार्टी का विलय कांग्रेस में कर लेंगे। लंबी जद्दोजहद के बाद सरकार ने तेलंगाना गठन पर अपनी मुहर लगा दी है। नए राज्य के गठन के बारे में एक 10 सदस्यीय जीओएम भी गठित कर दिया गया है। इस मंत्रि समूह को डेढ़ महीने के अंदर अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपनी है। उल्लेखनीय है कि यह मंत्रि समूह नए राज्य के गठन को लेकर एक विस्तृत रिपोर्ट सरकार को देगा। जिसमें इस बात का उल्लेख होगा कि राज्य के संसाधनों का बंटवारा किस-किस आधार पर किया जाए? लेकिन, सीमांध्र में जिस तरह से आक्रामक आंदोलन शुरू हुए हैं, ऐसे में इस मंत्रि समूह को स्थानीय स्तर पर मंत्रणा-विमर्श करना भी मुश्किल हो रहा है।

अगले साल लोकसभा का चुनाव होना है। इस चुनाव के लिए सभी प्रमुख दलों ने अपनी-अपनी चुनावी जोर-अजमाइश शुरू कर दी है। 2009 के चुनाव में यहां कांग्रेस को भारी सफलता मिली थी। उसने 42 में से 33 सीटों पर जीत हासिल कर ली थी। इस तरह से आंध्र, कांग्रेस का सबसे मजबूत राजनीतिक किला बनकर उभरा था। लेकिन, 2009 में आंध्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्डी की मौत एक हैलीकॉप्टर दुर्घटना में हो गई थी। दरअसल, रेड्डी की अगुवाई में ही कांग्रेस को इतनी बड़ी सफलता मिली थी। लेकिन, उनके अचानक निधन से कांग्रेस के तमाम राजनीतिक सूत्र बिखरते गए। शुरुआती दौर से ही राजशेखर रेड्डी के युवा सांसद बेटे जगनमोहन रेड्डी ने मुख्यमंत्री बनने की जिद्द शुरू की थी। जबकि, केंद्रीय नेतृत्व एकदम नौसिखिया नेता को इतनी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपने के पक्ष में नहीं था। लेकिन, जगनमोहन, अपने पिता की राजनीतिक विरासत का हवाला देकर दबाव बनाने की राजनीति पर अड़े रहे थे।

यहां तक कि कांग्रेस आलाकमान के समझाने के बाद भी जगनमोहन ने विरोधी तौर-तरीका बनाए रखा। अंतत: उन्होंने विद्रोह की डगर पकड़ ली। केंद्रीय नेतृत्व ने दबाव बनाने के लिए कई हथकंडे अपनाए। लेकिन, जगनमोहन इससे डरे नहीं। दबाव बनाने के लिए उनके बड़े कारोबार के तमाम गोरखधंधों पर केंद्रीय एजेंसियों ने जांच के घोड़े दौड़ाने शुरू किए। इसी फेर में जगन फंसने लगे। आय से अधिक संपत्ति के मामले में वे घिर गए, तो उन्हें जेल जाना पड़ा। पिछले दिनों ही वे 16 महीने तक जेल में रहने के बाद जमानत पर बाहर आए हैं। बाहर आते ही उनकी लोकप्रियता काफी बढ़ गई है। उनकी सभाओं में भारी भीड़ जमा हो रही है। सीमांध्र में उनके पक्ष में सहानुभूति की लहर दिखाई पड़ती है। इसके चलते कांग्रेस का नेतृत्व बेचैन रहा है।

केंद्र सरकार ने तेलंगाना गठन का फैसला किया, तो जगनमोहन ने कांग्रेस के खिलाफ हल्ला बोल दिया है। इसका व्यापक असर दिखाई पड़ रहा है। सीमांध्र के इलाके में लोग विरोध में सड़कों पर उतर आए हैं। कई दिनों से यातायात ठप है। राज्य के हजारों बिजली कर्मचारी हड़ताल पर चले गए हैं, तो कई पावर स्टेशन भी ठप हो गए। इसकी वजह से सीमांध्र में अभूतपूर्व बिजली संकट खड़ा हो गया है। यहां तक कि अधिसंख्य रेलगाड़ियों का संचालन भी बाधित हो गया है। केंद्र के फैसले को लेकर इस इलाके के कांग्रेसी नेता भी बेचैन हैं। उन्होंने भी जनभावनाओं को देखते हुए फैसले का विरोध कर दिया है। सीमांध्र के आधा दर्जन मंत्री केंद्रीय मंत्रिमंडल में हैं। सभी ने सरकार से इस्तीफे की पेशकश की है। केंद्रीय मंत्री एम. पल्लम राजू, डी. पुरंदेश्वरी, के. सूर्य प्रताप रेड्डी व के. चिरंजीवी ने प्रधानमंत्री से मिलकर कहा है कि वे उनका इस्तीफा तुरंत स्वीकार कर लें। क्योंकि, उनके पास और कोई विकल्प नहीं बचा है। चारों मंत्रियों ने मंगलवार को   अपनी सरकारी गाड़ियां लौटा दी हैं और अपने स्टाफ से कह दिया है कि अब वे मंत्री के रूप में कोई काम नहीं करेंगे। केंद्रीय मंत्री के एस राव और के. कृपारानी ने भी इस्तीफे की पेशकश तो की थी, लेकिन इन लोगों ने दूसरे मंत्रियों की तरह ज्यादा अड़ियल रुख नहीं अपनाया है।

तेलंगाना विरोधी राजनीति का मिजाज काफी गर्म है। इसके चलते कई इलाकों में कांग्रेसी विधायकों, सांसदों व मंत्रियों पर हमले भी होने लगे हैं। पिछले दिनों प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष वी. सत्यनारायण के परिजनों पर आंदोलनकारियों ने हमला करने की कोशिश की थी। किसी तरह से सुरक्षा बलों ने उन्हें बचाया था। दरअसल, आंदोलनकारी कांग्रेसी नेताओं को घेरकर दबाव डाल रहे हैं कि वे अपने पदों से इस्तीफा दें। इसी दबाव के चलते केंद्रीय मंत्रियों ने भी इस्तीफे की जिद्द पकड़ी है। खुफिया एजेंसी आईबी ने केंद्रीय गृह मंत्रालय को अगाह कर दिया है कि यदि जगनमोहन रेड्डी की भूख हड़ताल जारी रही, तो सीमांध्र के हालात जल्दी ही बेकाबू हो सकते हैं। क्योंकि, अनशन के चलते जगनमोहन की सेहत खतरे में पड़ी, तो उनके समर्थक हिंसक वारदातें शुरू कर सकते हैं। वैसे ही तेलंगाना के फैसले को लेकर लोग उत्तेजित हैं। हर दिन आंदोलन के नाम पर सरकारी संपत्तियों का नुकसान किया जा रहा है। 100 से ज्यादा सरकारी वाहन आंदोलनकारियों के गुस्से का शिकार हो चुके हैं। उल्लेखनीय है कि पिछले सालों में कई बार तेलंगाना के मुद्दे पर हिंसक आंदोलन हो चुके हैं।

केंद्र सरकार की सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि मुख्यमंत्री किरण रेड्डी का रवैया भरोसे लायक नहीं रहा। दरअसल, मुख्यमंत्री रेड्डी रॉयल सीमा के रहने वाले हैं। ऐसे में, वे अपनी निजी राजनीति को बचाने के लिए धुर तेलंगाना विरोधी बन गए हैं। वे लगातार बयान दे रहे हैं कि केंद्र सरकार ने तेलंगाना का फैसला करके घोर अन्याय किया है। इससे कांग्रेस की राजनीतिक जड़ें हमेशा के लिए सूख जाएंगी। केंद्रीय गृह मंत्रालय के निर्देशों के बावजूद आंध्र सरकार हिंसक आंदोलनकारियों के खिलाफ कारगर कार्रवाई नहीं कर रही। ऐसे में, हालात नियंत्रण से बाहर जाने की आशंका बनी हुई है। हालांकि, दिल्ली में बैठे कांग्रेस के रणनीतिकारों ने मुख्यमंत्री पर दबाव बनाने के लिए कई तौर-तरीके अपनाए हैं। लेकिन, मुख्यमंत्री ने अपना रवैया नहीं बदला।

ऐसे में, केंद्र सरकार ने अनुछेद-356 के जरिए राज्य सरकार को बर्खास्त करने के विकल्प को भी टटोलना शुरू कर दिया है। इसके संकेत मुख्यमंत्री तक भिजवा दिए गए हैं। केंद्रीय गृहमंत्री सुशील शिंदे ने प्रधानमंत्री से मिलकर तेलंगाना के मुद्दे पर राज्य के हालात पर अपनी रिपोर्ट दी है। प्रधानमंत्री कार्यालय ने संकेत दिए हैं कि हालात बेकाबू हुए तो राष्ट्रपति शासन के विकल्प का भी फैसला हो सकता है। यह बात अलग है कि कांग्रेस नेतृत्व आखिरी विकल्प के रूप में ही राष्ट्रपति शासन का फैसला करेगा। कांग्रेस के प्रवक्ता भक्त चरणदास कहते हैं कि फिलहाल, राष्ट्रपति शासन लगाने की नौबत नहीं आई है। लेकिन, राज्य सरकार ने केंद्र को लगातार ठेंगा दिखाने की कोशिश की, तो केंद्र सरकार जरूरत के हिसाब से फैसला लेगी।

इस मुद्दे पर जगनमोहन ने कांग्रेस पर अपने राजनीतिक निशाने तेज कर दिए हैं। उन्होंने तेलंगाना विरोध में तमिलनाडू की मुख्यमंत्री जे. जयललिता और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से भी फोन पर समर्थन मांगा है। इस तरह से जगन, कांग्रेस विरोधी राजनीतिक चक्रव्यूह को भी मजबूत करने में लग गए हैं। टीडीपी नेता चंद्रबाबू नायडू भी कांग्रेस विरोधी मुहिम में पीछे नहीं रहना चाहते। कांग्रेस की सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि राज्य की राजनीति में उसके ‘अपने’ ही चुनौती देने लगे हैं। इस तरह से तेलंगाना के मुद्दे पर कांग्रेस के इस मजबूत किले में खतरनाक दरारें तो आ ही गई हैं। अब चुनौती यही है कि नेतृत्व किसी तरह से अपना यह गढ़ पूरी तरह से ढहने से बचा ले। मजेदार बात यह है कि तेलंगाना के फैसले के बाद भी टीआरएस के प्रमुख के. चंद्रशेखर राव ने भी अपने पत्ते नहीं खोले हैं। वे भी कांग्रेस का सिरदर्द बढ़ा सकते हैं। क्योंकि, उनके पास भी ‘किंतु-परंतु’ का पर्याप्त राजनीतिक मसाला तो है ही।

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengardelhi@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

नीरा राडिया को आयकर विभाग के कुछ अफसरों ने करोड़ों रुपये का लाभ पहुंचाया

सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि आयकर विभाग के कुछ अधिकारियों ने कॉरपोरेट लॉबिस्ट नीरा राडिया को करोड़ो रुपए का फायदा पहुंचाया है। सीबीआई के मुताबिक टैक्स से संबंधित कागजात में छेडछाड़ कर नीरा राडिया को जानबूझकर करोड़ो रुपए की मदद पहुंचाई गई है। टीएनएन के मुताबिक नीरा राडिया के तरफ से की गई करीब 72,000 फोन कॉल की जांच करने के बाद सीबीआई इस नतीजे पर पहुंची है।

इस मामले से संबंधित गोपनीय रिपोर्ट को अतिरिक्‍त सॉलिस्टिर जनरल पारस कुहद ने सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जीएस सिंघवी और वी गोपाल गोडा को सौंप दी है। सूचना प्रौद्योगिकी विभाग की तरफ से पैरवी करते हुए अतिरिक्‍त सॉलिस्टिर जनरल एल नागेश्‍वर राव ने कहा कि चार अक्टूबर को पेश की गई सीबीआई रिपोर्ट में तीन फोन कॉल पर उंगली उठी है। इन फोन कॉल से साफ होता है कि आयकर विभाग के अधिकारियों ने नीरा राडिया को करोड़ो रुपए की मदद गलत तरीके से की है।

इस मामले की अगली सुनवाई 18 अक्टूबर को होगी। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि अगली सुनवाई में इस मामले में टेलीफोन कॉल के इंटरसेप्ट सुने जाएंगे। कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि तब तक इस मामले से संबंधित किसी भी अधिकारी का तबादला और पदोन्‍नति न की जाए। आईटी विभाग की तरफ से किए जाने वाले फोन टैपिंग मामले में यह बात सामने आई थी कि गैर कानूनी रूप से नीरा राडिया ने अपने टैक्स मामले में अपनी जिम्मेदारी घटाने के लिए आयकर आधिकारियों की मदद ली थी।

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राडिया टेप में रेलवे बोर्ड सदस्यों की नियुक्ति और राष्ट्रीय सुरक्षा के मसले भी

चंडीगढ़ से प्रकाशित केडी सिंह का फाइनेंसियल वर्ल्ड अखबार बंद होने की चर्चा

चंडीगढ़ से एक अपुष्ट सूचना आई है कि राज्यसभा सांसद केडी सिंह का अखबार फाइनेंसियल वर्ल्ड बंद हो गया है. बताया जाता है कि करीब दो सौ मीडियाकर्मी बेरोजगार हो गए हैं और नौकरियां तलाशते फिर रहे हैं. बताया जाता है कि फाइनेंसियल वर्ल्ड का दिल्ली एडिशन पहले ही बंद हो गया था जिसका आफिस दिल्ली में तहलका वाले ऑफिस के पास था. यहां के मुखिया शान्तनु गुहा थे.

भड़ास तक अपनी बात, जानकारी bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

दीपक चौरसिया और इंडिया न्यूज के खिलाफ आसाराम एंड कंपनी ने कुत्सित दुष्प्रचार अभियान शुरू किया

आसाराम एंड कंपनी ने इंडिया न्यूज के एडिटर इन चीफ दीपक चौरसिया के खिलाफ कुत्सित अभियान शुरू कर दिया है… यौन उत्पीड़न के ढेर सारे केसों में फंसे आसाराम एंड फेमिली के करीबियों ने एक खास रणनीति के तहत अपने आदमियों, समर्थकों के माध्यम से दीपक चौरसिया पर प्रहार कराना शुरू कर दिया है. इसके लिए सोशल मीडिया का सहारा लिया जा रहा है.

दीपक चौरसिया और इंडिया न्यूज चैनल, दोनों के बारे में फर्जी व घटिया बातें ह्वाट्सएप, फेसबुक, ट्विटर आदि माध्यमों के जरिए एक दूसरे तक फैलाई-पहुंचाई जा रही है. कभी कोई तस्वीर ह्वाट्सएप के जरिए सेंड की जाती है जिसमें इंडिया न्यूज चैनल पर एक फर्जी ब्रेकिंग न्यूज आसाराम के बारे में दिखाया जा रहा है. जाहिर है, इस फर्जी तस्वीर को क्रिएट कर इंडिया न्यूज चैनल को बदनाम किया जा रहा है कि देखो, ये लोग कितने घटिया व पतित हैं कि ऐसी चीजों को भी खबर बना रहे हैं.. इस तस्वीर में साफ दिख रहा है कि जिस फांट में ब्रेकिंग न्यूज की खबर फ्लैश है, वो फांट इंडिया न्यूज में यूज ही नहीं होता. ऐसा इंडिया न्यूज से जुड़े लोगों का कहना है.

खुद चैनल के मैनेजिंग एडिटर राणा यशवंत कहते हैं कि बिलकुल फर्जी व वाहियात चीजें कुछ शरारती लोग फैला रहे हैं. इनके खिलाफ कठोर कार्रवाई कराए जाने को लेकर विचार किया जा रहा है. दीपक चौरसिया के बारे में फेसबुक, ट्विटर व ह्वाट्सएप पर मानहानिकारक पोस्ट, तस्वीरों का प्रसारण हो रहा है जिसका कंटेंट है कि दीपक चौरसिया कैसे पांच सौ करोड़ के मालिक बन गए, इसकी सीबीआई जांच कराई जाए. इस बारे में इंडिया न्यूज के जिम्मेदार लोगों का कहना है कि सीबीआई दीपक चौरसिया की कुंडली बहुत पहले खंगाल चुकी है और उसे कुछ नहीं मिला. यह मामला तबका है जब एक राजनेता से जुड़े मामले में खबर दिखाने पर सीबीआई ने संज्ञान लेते हुए दीपक पर केस दर्ज किया था और पूरी छानबीन व पड़ताल की थी.

नीचे वो कुछ फर्जी मैटर है जो आजकल सोशल मीडिया और मोबाइल पर तेजी से एक दूसरे के यहां भेजा जा रहा है. समझा जा सकता है कि दीपक चौरसिया की और इंडिया न्यूज चैनल की मुहिम के कारण आसाराम एंड कंपनी को जो बड़ा झटका लगा है, उसके एवज में वे लोग इस तरह की भड़ास निकालेंगे ही..

(तस्वीर में लिखे अश्लील शब्दों को ब्लैक कलर से जान-बूझ कर भड़ास की तरफ से पेंट कर दिया गया है)

दीपक चौरसिया की सी.बी.आई. जाच हो… 5000 Rs. की नौकरी करने वाला दीपक चौरसिया 500 करोड़ का मालिक कैसे बन गया… कल इसी के प्रोग्राम में चक्रपाणी महाराज ने जब इस दीपक चौरसिया से ये सवाल पूछा कि आप 500 करोड़ के मालिक इतने कम समय मे कैसे बन गए तो इस चौरसिया की हवाईयाँ उड़ गयी और इसका मुह देखने लायक था। फिर इसने टॉपिक बदल दिया और अपने एक साथी को बुला दिया बहस करने के लिए। मित्रों, ये दीपक चौरसिया सबसे बड़ा दलाल है, लेकिन अफसोस इन मीडिया वालों के खिलाफ बोलने वाला कोई नहीं है कि आखिर ये मीडिया वाले रातों-रात करोड़ों-अरबों के मालिक कैसे बन गए। अगर कोई इनके खिलाफ बोलता भी है तो उनकी बात को जनता के सामने रखेगा कौन?? मीडिया तो अपने खिलाफ बोलने वाले लोगों के बारे मे कभी दिखाएगा नहीं और सबसे बड़ी बात ये है की लोग भी इन मीडिया वालों की बातों मे आ जाते हैं, जो ये दिखाते हैं उसको ही पूर्ण सच मान लेते हैं। लोगों को अब इन पेड मीडिया की असलियत बाटनी होगी और ये काम सोशल मीडिया भी बहुत अच्छी तरह से कर रहा है। तभी तो ये सभी सेकुलर मीडिया वाले आजकल बौखलाए हुए हैं। आखिर इसकी भी जांच होनी चाहिए की इनको पैसा कहाँ से मिलता है, इनकी किस कंपनी से डील हुई है और किस आधार पर हुई है। दरअसल ये इलेक्ट्रोनिक मीडिया एक स्वतंत्र संस्था है इसलिए इसके ऊपर किसी का कंट्रोल नहीं है तो ये अपने मन-मर्जी के हिसाब से कुछ भी दिखाते रहते हैं और लोगों को भ्रमित करते रहते हैं। आखिर इनकी जांच तो होनी ही चाहिए कि ये रातों-रात करोड़ो-अरबों के मालिक कैसे बन गए। ये दूसरों के खिलाफ तो खूब भौंकते हैं लेकिन जब इनके ऊपर सवाल उठते हैं तो ये उस खबर को दबा देते हैं। इसका कोई समाधान तो निकालना ही होगा.. 

उपरोक्त तस्वीरें ह्वाट्स एप व फेसबुक के जरिए और उपरोक्त कंटेंट फेसबुक-ट्विटर के जरिए आसाराम एंड कंपनी के लोग एक दूसरे के यहां भेज रहे हैं, खूब प्रचारित-प्रसारित करने में लगे हैं. जाहिर है, ये लोग इस मानहानिकारक कंटेंट, पिक्चर को इसलिए प्रचारित कर रहे हैं ताकि दीपक चौरसिया और इंडिया न्यूज की छवि धूमिल की जा सके. ऐसा इसलिए ताकि आसाराम बापू एंड कंपनी की करतूतों का लगातार पर्दाफाश किए जाने का वे लोग बदला ले सकें. ऐसे कंटेंट को शेयर, लाइक, फारवर्ड करने से पहले आप सभी को सोचना चाहिए.


लेखक यशवंत सिंह भड़ास4मीडिया के एडिटर हैं. उनसे संपर्क yashwant@bhadas4media.com के जरिए कर सकते हैं.

आईआईएमसी के छात्र रहे और पी7न्यूज के पत्रकार शिव ओम गुप्ता को ‘केसी कुलिश अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार’

Sushant Jha : हमारे लिए खुशी की बात है कि IIMC के हमारे सहपाठी शिव ओम गुप्ता को राजस्थान पत्रिका के 'के सी कुलिश अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार' के लिए चुना गया है। शिव ओम, अन्ना के लोकपाल आन्दोलन के समय अमर उजाला के उस विशेष पृष्ठ के इनचार्ज थे जो उस आन्दोलन को कवर कर रहा था। शिवओम को यह पुरस्कार 'प्रिंट जर्नलिज्म में उत्कृष्ट कार्यों' के लिए दिया जा रहा है।

उन्हें यह पुरस्कार 30 अक्टूबर 2013 को राष्ट्रपति भवन में दिया जाएगा। राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी उन्हें यह पुरस्कार देंगे। शिव ओम एक जुझारू पत्रकार रहे हैं और फिलहाल पी-7 न्यूज चैनल में काम करते हैं। इससे पहले उन्होंने वाल स्ट्रीट जर्नल और अमर उजाला में भी काम किया है।

(क्षेपक: गुप्त सूचना मिली है कि शिव ओम के लिए यह पुरस्कार अपने साथ एक मोटी रकम भी लाई है, जो डॉलर में है और इसका हमारे जैसे कुछ पार्टीबाज मित्रों ने आधिकारिक रूप से स्वागत किया है।)

सुशांत झा के फेसबुक वॉल से.

ग्वालियर से मुंबई में नभाटा के साथ पत्रकारिता करने पहुंचे फिरोज खान को किराए पर मकान नहीं मिल रहा

Ravi Rawat : महीने भर पहले नवभारत टाइम्स में ग्वालियर से आए फिरोज खान ने ज्वाइन किया है। महीना भर उन्होंने अपने एक दोस्त के साथ रहकर गुजार दिया, अब वे अपना अलग घर लेना चाहते हैं किराए पर। फिरोज मुंबई की अलग-अगल जगहों पर घर लेने की कोशिश कर चुके हैं और उनकी कोशिश लगातार जारी है। पर, उन्हें घर नहीं मिल रहा, क्योंकि उनका नाम फिरोज और उपनाम खान, उनके और मकान के बीच बाधा बन गया है।

दूसरे शहरों का तो नहीं पता, लेकिन मुंबई में घर देने से पहले एजेंट और मकान मालिक आपका नाम और धर्म जरूर पूछते हैं। क्या फिरोज या उनके जैसे कई लोगों को सिर्फ इसलिए घर नहीं मिलना चाहिए, क्योंकि उनका धर्म वह है, जिस पर हमने आतंकवादी होने का ठप्पा लगा दिया है? और अगर नहीं, तो करो इस बात का विरोध और नहीं कर सकते, तो खुद को धर्म निरपेक्ष देशवासी कहना बंद करो।

रवि रावत के उक्त फेसबुक स्टेटस पर खुद युवा पत्रकार फिरोज खान ने जो टिप्पणी की है, वो इस प्रकार है…

Firoj Khan : 90 के बाद की सियासत का नतीजा है कि आदमी, आदमी से नफरत करने लगा। यह भी हुआ कि उसके मन में बेतहासा असुरक्षा की भावना पैदा कर दी गई। ये सिर्फ मुसलमान होने की सजा नहीं है। मुसलमानों की बहुसंख्या होने पर हिंदू होने की भी यही सजा है। सच कहूं तो इंसान होने की सजा है। लेकिन इस सब के बाद, दोस्तों को हमेशा साथ रहा। इससे बढ़के और चाहिए भी क्या। शुक्रिया दोस्तो…

ठाकुर राजनाथ सिंह के यहां से दो वरिष्ठ ब्राह्मण पत्रकार भूखे लौट गए…

Shrinarayan Tiwari : आज भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह के यहाँ आये उत्तर प्रदेश मूल के दो बड़े वरिष्ठ ब्राहमण भूखे प्यासे ही लौट गए। आश्चर्य की बात ये है कि नवरात्रि चालू है और ठाकुर साहेब के दरवाजे से दो दो ब्राह्मणों का भूखा प्यासा लौटना? बड़ा अपशकुन माना जा रहा है. सवाल पूछा जा रहा है कि अब क्या होगा? क्या शाप तो नहीं लगा होगा?

हुआ यूं है कि ठाकुर साहेब की रंगसारदा होटल, मुंबई में प्रेस कांफ्रेंस रखी गयी थी. दैनिक जागरण और नवभारत टाइम्स के दो वरिष्ठ पत्रकार, भाजपा नेताओं के विशेष आग्रह पर, वहां आये हुए थे। भाजपा नेता ने माइक पर सभी पत्रकारों से अनुरोध किया वे सब खाना खा लें लेकिन पत्रकारों के पहुँचने से पहले, पार्टी कार्यकर्ताओं की फ़ौज, खाने पर टूट पड़ी।

इससे जब उन वरिष्ठ पत्रकारों के खाने की बरी आई, तब तक तो मैदान साफ हो चुका था. पार्टी कार्यकर्ताओं ने सबकुछ साफ कर डाला था.  इससे उन्हें भूखे प्यासे ही वापस कार्यालयों में जाना पड़ा। एक जनाब ने तो सायन रेलवे स्टेशन पर जाकर भेल खायी. दूसरे साहब मिनरल वाटर पिए और कार्यालय के लिए चल दिए।

जय हो मुंबई भाजपा की। जय हो आयोजन करने वालों की।

लोकमत समाचार (मुंबई) में विशेष संवाददाता श्रीनारायण तिवारी के फेसबुक वाल से. उपरोक्त स्टेटस पर आईं कुछ टिप्पणियां यूं हैं…

    Umesh Mishra आयोजको को ध्यान देना देना चाहिए था की पहले मेहमान खाते फिर मेजबान कही भाजपा ने पत्रकारों को दिखाने के लिए पैसे देकर भूखे नंघे कार्यकर्ताओं को तो नहीं बुला लिया था .. शर्म की बात हैं …

    Sunita Mishra अफ़सोस!!!!
 
    Raj Yadav shrinarayanje do nahi tin patrakar vahan se bina khana khaye loute. Aapne tisare ko chod diya.
 
    Harisingh Rajpurohit bjp ke aayojan me nahi bat nahi hai bjp ki press confrence me karyakarao ka jamavada ek parmpara ban gai hai aapne to bhojan ki bat ki kursi par bhi bjp karykarta jame rahte hai or media valo k e khade rahne ki bjp me parmpra ban gai hai
   
    Shrinarayan Tiwari raj ji mujhe nahi pata tha ki aapko bhi bhojan nahi mila.
    
    Shrinarayan Tiwari harisingh ji ne sahi kaha hai
     
    Shrinarayan Tiwari umesh bhai ye bjp ke natao ko sochana chahiye
     
    Vinod Yadav Bhai Saheb, Rangsharada me jo hua Bahut hi Bura hua. Par Bad me Devendra Fandavis aur khuch netao k liye khana aaya tha.. Par BJP walon ko is Bat ka khyal Rakhana Chahiye tha ki Koi Bhee Navratri me Bhukha na Jane paye…
 
    Omprakash Tiwari to kya patrakar khne jate hai… khane ke liye jate hai aur khana nahi mila to bahiskar dal dijiye bjp ka
   
    Ravindra Ambekar ब्राम्हणों के भूखे लौटने से कोई फर्क नहीं पड़ता! राजनाथ जी को कहा महाराष्ट्र में चुनाव लड़ना है, रूठे हुए ब्राम्हणों को मनाने के लिए ही तो देवेंद्र बैठे हुए है… रही बात भूखे रहने कि तो, कांग्रेस की सरकार ने बंदोबस्त कर रखा है की अब कोई भूखे नहीं सोएगा!
    
    Siddharth Bhambedkar nce discussion
 
    Ashutosh Tiwari BJP ka abhag ye hai ki is party me sab neta hai karyakarta koi nahi…INHE EEK AACHE SASHAK KI JARURAT HAI ..EK AACHE KARYA SAMRAT KI JARURAT HAI INHE MODI SAAHAB KI JARURAT HAI….

बिहार में जाने-माने रंगकर्मी की बर्बर पुलिस पिटाई के खिलाफ सोशल मीडिया पर गुस्से की लहर

Amitesh Kumar : बेगूसराय पुलिस एक दोषी अधिकारी पर कार्यवाही करने की बजाए पुलिसिया पैंतरे अपना रही है. और गुंजन पर केस दर्ज करने का दबाव बना रही है. पुलिस को ऐसे किसी मुगालते में नहीं रहना चाहिये कि इससे घबड़ा कर रंगकर्मी समझौता कर लेंगे. क्योंकि यह सिर्फ़ रंगकर्मी का मामला नहीं है. अगर शहर के एक जाने माने चेहरे के प्रति पुलिस का यह व्यवहार है तो आम आदमी को तो उसने हाइवे पर ही निबटा दिया होता! बिहार पुलिस के आला अधिकारी तक कोई यह सूचना पहुंचा दे कि दोषी को शीघ्र सजा दी जाए और बिहार पुलिस का रवैया ठीक किया जाए. अपनी उर्जा झूठे मुकदमे में खर्च करने की बजाए आम आदमी की सुरक्षा में अधिक ध्यान दिया जाए.

Bhavesh Nandan : पहले फारबिसगंज गोलीकांड फिर मधुबनी गोली कांड, बगहा गोली कांड और अब बिहार पुलिस का घटिया चेहरा फिर सामने आया है बेगुसराय में जहाँ बिहार सरकार के राजकीय सम्मान सम्मानित प्रख्यात रंगकर्मी प्रवीण कुमार गुंजन जी ( Pravin Kumar ) को पुलिस ने एक मामूली से मोटरसाईकिल पर तीन सवारी के आरोप में बेरहमी से पीट कर घायल कर पहले जेल फिर अस्पातल पहुँचाया है.. यह समय चुप रहने का नहीं है, "सोशल नेटवर्किंग साइट्स" के माध्यम से हम संगठित होकर इस अन्याय के खिलाफ आवाज उठा सकते हैं.. ये हमारी जिम्मेवारी है की हम सब मिलकर और निजी स्तर पर इस बर्बरता के खिलाफ जोरदार आवाज उठायें.. हमारी चुप्पी हमारे भविष्य के लिए खतरनाक हो सकता है..

Sanjay Jha Mastan : बिहार में मेरा