ऋषिकेश में पत्रकारों का गंगा को साफ करने का प्रण

उत्तराखण्ड में ऋषिकेश के सुरम्य गंगा तट पर पत्रकारों ने शपथ लिया कि देश में गंगा तथा अन्य नदियों को साफ और प्रवाह निर्मल तथा अविरल रखेंगे ताकि अगली पीढ़ी को संतुलित पर्यावरण और साफ, निर्मल नदियों का प्रवाह मिल सके.
 
उत्तराखण्ड में ऋषिकेश के पांच दिवसीय पत्रकार समागम में चौबीस प्रदेशों के 948 पत्रकारों के अलावा श्रीलंका तथा दक्षेस राष्ट्रों के 21 प्रतिनिधियों ने भाग लिया. ऋषिकेश में आयोजित इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट की राष्ट्रीय परिषद के 66 वें अधिवेशन के अवसर पर आयोजित पत्रकार समागम में पत्रकारों ने कहा कि गंगा तथा अन्य नदियों को साफ, प्रवाह निर्मल तथा अविरल रखेंगे. गंगातट के परमार्थ निकेतन में आयोजित इस एशियाई परिसंवाद की अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार साथी के. विक्रम राव ने की.
 
अपने उद्घाटन भाषण में उत्तराखण्ड के मुख्य मंत्री विजय बहुगुणा ने नदी सफाई पर मीडिया के फिक्र की प्रशंसा की. उत्तराखण्ड राज्य के पत्रकारों के लिए आवास, स्वास्थ्य, सुरक्षा आदि की मांग को आई.एफ.डब्लू.जे. के अध्यक्श के द्वारा उठाने पर मुख्य मंत्री ने कहा कि उत्तर प्रदेश के पत्रकारों की भांति इस पहाड़ी राज्य के पत्रकारों को भी सारी सुविधायें दी जायेंगी. उन्होंने कहा कि महिला पत्रकारों के लिए हास्टल का निर्माण किया जायेगा. इस मौके पर बहुगुणा जी के साथ तीन काबीना मंत्री हरक सिंह रावत, यशपाल आर्य तथा मंत्रीप्रसाद नैथानी भी उपस्थित थे.
 
पत्रकार समागम को सम्बोधित करते हुए गंगा एक्शन प्लान के स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने आशीर्वचन दिया तथा पत्रकारों को अगली पीढ़ी के लिए काम करने को कहा. ताकि गंगा और अन्य नदियां निर्मल तथा अविरल प्रवाहित हो सकें. जिससे पर्यावरण संरक्षित रह सके. अमरीकी ऊर्जा केन्द्र के डा. दर्शन गोस्वामी ने सौर ऊर्जा के अधिक उपयोग का आग्रह किया. हंगरी में भारत के राजदूत मलय मिश्र ने कहा सत्तर राष्ट्रों की उनकी यात्रा पर उन्होंने आमजन का गंगा के प्रति आदर और सरोकार देखा. आल-इण्डिया रेलवे मेन्स फेडरेशन के प्रधान सचिव शिवगोपाल मिश्र का भी उद्बोधन हुआ.
 
बिहार के वरीय पत्रकार डा. देवाशीष बोस ने कहा कि बिहार में गंगा जहां प्रदूषण की शिकार है, वहीं अपने प्रवाह रेखा से दूर हट रही है, जिसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा. भारत की सबसे महत्वपूर्ण नदी गंगा बिहार ही नहीं बल्कि उत्तर भारत के मैदानों की विशाल नदी है. उन्होंने कहा कि गंगा भारत तथा बांग्लादेश में मिलकर 2,510 किलोमीटर की दूरी तय करती है. यह अपने बेसिन में बसे विराट जनसमुदाय के जीवन का आधार बनती है. गंगा की रक्षा के लिए जन जागरण की आवश्‍यकता है. इसके लिए मीडिया को जनजागृति के अलावा सरकार पर दबाव बनाने का काम करना पड़ेगा.
 
भारत की नदियों पर विशिष्ट अध्ययन पत्र भी पेश  किये गये, जिनमें साबरमती पर डा. मीना पाण्ड्या, गोदावरी पर तेलंगाना के पी. जंगारेड्डी, झेलम और रावी पर जम्मू के डा. उदय चन्द, गोदावरी पर तमिलनाडु तथा कर्नाटक के क्रमशः वी. पाण्ड्यन और जानकी रामन, इन्दिरा नहर पर जयपुर के सत्य पारिख, सरस्वती पर डा. के. सुधा राव, गंगा पर डा. योगेश मिश्र (उत्तर प्रदेश), मनोज दास (उड़ीसा) और डा. देबाशीष बोस (बिहार) तथा गोमती पर दीपक मिश्र (लखनऊ) उल्लेखनीय थे. एक खास आकर्षण था, कोलम्बो से आई हिन्दी अध्यापिका सुभाषिनी रत्ननायके का गंगा पर पत्र. इसके आयोजक मुम्बई के मनोज सिंह थे. आई.एफ.डब्लू.जे. के प्रधान सचिव परमानन्द पाण्डेय, राष्ट्रीय सचिव हेमन्त तिवारी, उत्तराखण्ड यूनियन के शंकरदत्त शर्मा तथा मनोज रावत ने सबका स्वागत किया.
 
श्रीलंका प्रेस एसोशियन का निमंत्रण स्वीकार करते हुए आई.एफ.डब्लू.जे. ने एक विशाल प्रतिनिधि मंडल कोलम्बो भेजने का निर्णय लिया है. रावण द्वारा कैद देवी सीता का स्थल अशोक वाटिका की यात्रा इसमें शामिल है. नवम्बर 18 से 24 तक आइ.एफ.डब्लू.जे. का 115 सदस्यीय दल भूटान की अध्ययन यात्रा पर जा रहा है. इसमें उत्तर प्रदेश के 62 पत्रकार हैं, जिसका नेतृत्व हसीब सिद्दीकी करेंगे. जबकि बिहार से भी पत्रकारों का एक दल भूटान की अध्ययन यात्रा करेगा. पत्रकार समागम में बिहार के 56 लोगों ने भाग लिया. जिसमें अध्यक्ष एसएन श्याम, सचिव अभिजीत पाण्डेय तथा संगठन सचिव सुधीर मधुकर आदि शामिल थे. यह कार्यक्रम 18 अक्तूबर से प्रारंभ होकर 23 अक्तूवर 2013 को संपन्न हुआ.
 

स्त्री और दलित विमर्श के प्रवर्तक थे राजेंद्र यादव

झांसी। बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के जनसंचार और पत्रकारिता विभाग में बुधवार को अपराह्न बाद हुई एक शोकसभा में हिंदी के प्रख्यात साहित्यकार राजेंद्र यादव को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई. वक्ताओं ने उन्हें हिंदी समाज में स्त्री और दलित विमर्श का प्रवर्तक बताते हुए श्रद्धासुमन अर्पित किए.
 
विभागाध्यक्ष डा. सी.पी. पैन्यूली की अध्यक्षता में हुई सभा में हिंदी साहित्य में राजेंद्र यादव के योगदान पर विस्तार से चर्चा की गई. वक्ताओं ने कहा कि राजेंद्र यादव ने साहित्य की तमाम बहसों विवादों और मतभेदों में से रचना संसार के लिए एक उदार लोकतांत्रिक स्थान बनाया. तमाम नए सामाजिक आंदोलनों का न केवल उन्होंने समर्थन किया बल्कि उनकी अगुआई भी की. कई नये लेखकों को उन्होंने शुरूआती मंच भी दिया. सभा में प्रवक्ता सतीश साहनी, जय सिंह, उमेश शुक्ल आदि ने राजेंद्र यादव के कृतित्व और व्यक्तित्व के विविध पहलुओं का उल्लेख करते हुए उन्हें महान प्रयोगधर्मी बताया. वक्ताओं ने उन्हें अनूठा संपादक बताते हुए कहा कि उनकी कमी समाज को हमेशा खलती रहेगी. सभा में दो मिनट का मौन रखा गया.

मुझे समझ आ गया कि राजेन्द्र यादव का मतलब क्या होता है

न्यूज चैनलों में राजेन्द्र यादव की मौत की खबर देखकर फिर अखबारों को पढ़कर थोड़ा दुख हुआ. हालांकि मेरे दुख का पैमाना हिन्दी साहित्य जगत और उनके मित्रों प्रशसंको और चाहने वालों के दुख के मुकाबले काफी छोटा है, क्योंकि मेरा उनसे सम्बन्ध महज 3-4 घंटे का रहा.
 
मुझे हिन्दी साहित्य में परंपरावादी लेखन के समानान्तर लिखने वाले राजेन्द्र यादव से मिलने का सौभाग्य 11 वर्ष की अवस्था में मिला जब मैं साहित्य का ककहरा अपने दादाजी की लाइब्रेरी में रखी मोटी-मोटी पुस्तकों से सीख रहा था. मौका था 1990-91 के भागलपुर के भगवान पुस्तकालय में आयोजित भागलपुर जिला हिन्दी साहित्य सम्मेलन का, जिसमें राजेन्द्र यादव के अलावा चित्रा मुदगल, अवध नारायण मुद्गल, अर्चना वर्मा और शैलेश मटियानी जैसे हिन्दी के दिग्गज लेखकों का जमावडा हुआ था.
 
यह मेरा सौभाग्य था कि अपने दादाजी स्व. रामजी मिश्र मनोहर और सच्चिदांनद सिन्हा, लाइब्रेरी के मुख्य पुस्तकलाध्यक्ष राम शोभित सिंह के साथ मैं भी इस ऐतिहासिक कार्यक्रम में शामिल हुआ. कार्यक्रम के आयोजक स्व. विष्णु किशोर झा बेचन जो दादा जी के एक अच्छे मि़त्र होने के नाते मुझे अपना पोता मानते थे, ने मेरा राजेन्द्र यादव से परिचय कराया था.
 
मुझे अभी भी वह शाम अच्छी तरह याद है जब राजेन्द्र यादव बेचन जी के कमरे में बैठकर अपना ग्लास भर रहे थे और मैं धमकता हुआ उस कमरे में पहुंच गया. मेरे लिए काला चश्मा लगाये राजेन्द्र यादव और उनका ग्लास दोनों कौतूहल का विषय था. यूं कि मनोहर जी और फिर बेचन जी के पोते होने के कारण पूरे आयोजन स्थल में मेरे कहीं आने जाने पर कोई रोक टोक नहीं थी इसलिए मैं बिना संकोच के सीधा उनके पास पहुंच गया. इस बीच वहां पहुंचे मौजूद एक अन्य शख्श ने मुझे इशारे से वापस लौट जाने को कहा. मगर राजेन्द्र यादव जी ने मेरा हाथ पकड़कर अपने बगल में बिठा लिया. तब तक उस कमरे में और कई साहित्यकार पहुंच चुके थे. वहां मुझे राजेन्द्र यादव के पास बैठा देखकर सबको आश्चर्य भी हुआ क्योंकि राजेन्द्र यादव के बारे में ऐसा कहा जाता था कि वो अत्यंत गंभीर किस्म के व्यक्ति हैं और जल्दी किसी से बात नहीं करते जबकि इसके विपरीत वो अपना ग्लास भी खाली कर रहे थे और मुझसे बातें भी कर रहे थे. बातचीत के दौरान उन्होंने मुझसे मेरी रूचि के बारे में पूछा. हिन्दी में क्या पढ़ते हो जैसे सवाल पूछे. इतना ही नहीं जब मैंने उन्हें बताया कि प्रेमचंद की ईदगाह और फणीश्वर नाथ रेणु की बहुरियां पढ़ी हैं तब उन्होंने उस कहानी के पात्रों की भी चर्चा की. करीब तीन घंटे तक मैं उनके साथ बातें करता रहा और वो सवालों का जवाब देते रहे. मेरे एक सवाल पर कि आप काला चश्मा क्यों लगाते हैं उन्होंने सपाट शब्दों में कहा था कि इससे बुरी चीजें नहीं नजर आती है, मुझे आज भी याद है. इतना ही नहीं जब मैं उस कमरे से निकलने लगा तो उन्होंने अपने कुर्ते की जेब से पांच रूपये का एक नोट निकालकर मुझे दिया.
 
जब मैंने रूपये लेने से मना किया तब पास बैठे एक व्यक्ति ने तपाक से कहा ले लो बेटा तुम बड़े भाग्यशाली हो जो राजेन्द्र यादव तुम्हें पैसे दे रहे है. हम लोग इनसे चाहकर भी एक रूपया खर्च नहीं करवा पाते हैं. इस घटना को लगभग 22 वर्ष हो गये हैं. भागलपुर जिला हिन्दी साहित्य सम्मेलन में उनके दो दिन प्रवास के दौरान उनके साथ बिताये क्षण आज भी किसी फिल्म की तरह आंखो के सामने गुम जाते हैं.
 
इन दो दशकों में मुझे इतनी समझ भी आ गयी कि राजेन्द्र यादव का मतलब क्या होता है. मगर अब काफी देर हो चुकी है.
 
 
अमित मिश्र  यू एन आई रांची में वरीय उपसंपादक हैं.

आज बारह बजे महुआ आफिस घेर लो, हड़ताली मीडियाकर्मियों के समर्थन में आप सभी पहुंचें

नोएडा फिल्म सिटी एक ऐतिहासिक संघर्ष का गवाह बना हुआ है. तीन महीने से सेलरी के बिना काम कर रहे महुआ न्यूज के कर्मियों ने कल शाम से बेमियादी हड़ताल कर रखा है और पूरे आफिस पर कब्जा कर लिया है. इनकी मांग है कि तीन महीने की बकाया सेलरी दो और दो महीने की एडवांस सेलरी. इसके बाद महुआ न्यूज बंद कर दो. प्रबंधन इन हड़ताली कर्मियों के बीच फूट डालने की पूरी कोशिश कर रहा है और इन्हें हतोत्साहित करने के लिए कई हथकंडे अपना रहा है. लेकिन सारे महुआ न्यूज कर्मी एकजुट हैं और आरपार की लड़ाई लड़ने का माद्दा अपने भीतर इकट्ठा किए हुए हैं.

इन हड़ताली मीडियाकर्मियों के समर्थन में सैकड़ों मीडियाकर्मियों और मीडिया संगठनों ने आज एक नवंबर को दिन में बारह बजे महुआ न्यूज का आफिस घेर लेने का ऐलान कर दिया है. इस घेराव का मकसद महुआ न्यूज के अंदर संगठित होकर लड़ रहे साथियों को नैतिक समर्थन देना है और प्रबंधन को ये चेतावनी की अगर जल्द से जल्द मांगें नहीं मानी गई तो महुआ न्यूज के बाहर हजारों लोग न सिर्फ आमरण अनशन पर बैठेंगे बल्कि महुआ के सिक्योरिटी गार्डों को हटाकर खुद पूरे आफिस पर नियंत्रण कर लेंगे और मैनेजमेंट के लोगों को भी आफिस में आने से रोक देंगे.

उल्लेखनीय है कि आईबीएन7, सीएनएन-आईबीएन समेत कई चैनलों में एकमुश्त छंटनी के खिलाफ भी सैकड़ों पत्रकारों ने फिल्म सिटी में प्रदर्शन कर यह संदेश दे दिया था कि प्रबंधन की मनमानी अब पत्रकार नहीं सहने वाले और अन्याय के खिलाफ अब सड़कों पर लड़ाई लड़ी जाएगी. हालांकि पिछले प्रदर्शन में छंटनी के शिकार पत्रकारों में से कुछ एक ही आए थे, इसलिए आंदोलन लंबा नहीं चल सका. लेकिन इस बार तो सारे पीड़ित पत्रकार खुद पूरे आफिस पर कब्जा करके अपने जज्बे और जुनून का प्रदर्शन कर चुके हैं. ऐसे में आप सभी पढ़े-लिखे, संवेदनशील, पत्रकार, गैर-पत्रकार लोगों से अपील है कि वो आज यानि एक नवंबर को दिन में बारह बजे नोएडा फिल्म सिटी स्थित महुआ न्यूज के आफिस के सामने पहुंचें और एक ऐतिहासिक संघर्ष को समर्थन देने का अपना नैतिक कर्तव्य पूरा करें.

भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह जो कल रात लगातार महुआ न्यूज के आफिस के सामने मौजूद रहे और आंदोलनकारी कर्मियों से मिलकर उन्हें अपना समर्थन दिया, ने एक बयान में कहा है कि कल बारह बजे भड़ास की पूरी टीम और समर्थकों की फौज महुआ न्यूज के सामने पहुंच रही है. उन्होंने कहा- ''आप सभी न्यू मीडिया, वेब, ब्लाग, सोशल मीडिया के साथियों समेत पूरे मीडिया जगत और आम लोगों से अपील है कि इस ऐतिहासिक मौके पर जरूर पहुंचें ताकि मीडियाकर्मियों का संघर्ष आगे बढ़ सके और प्रबंधन को घुटने टेकने के लिए मजबूर किया जा सके. आज बारह बजे महुआ न्यूज को घेरने का आंदोलन किसी एक संगठन या किसी एक पोर्टल या किसी एक पत्रकार की तरफ से नहीं बल्कि सवा सौ हड़ताली महुआ मीडियाकर्मियों के समर्थन में स्वतःस्फूत उपजा आंदोलन है जिसे आगे भी चलाया जाता रहेगा.''

महुआ आफिस का पूरा पता यूं है:

महुआ मीडिया प्रा. लि.

FC-17, SEC-16 A

फिल्म सिटी, नोएडा

(यूपी)


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महुआ आफिस कब्जा

इलाहाबाद के वरिष्‍ठ पत्रकार शिवाशंकर पांडेय पर हिस्‍ट्रीशीटर बदमाश ने किया हमला

: तमंचा सटाकर दी जान से मारने की धमकी : शिकायत के बावजूद पुलिस ने दर्ज नहीं किया मामला : इलाहाबाद। वरिष्‍ठ पत्रकार के जान के लाले पड़ गए हैं। पुलिस से शिकायत के बाद भी अब तक प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई है। एक हिस्‍ट्रीशीटर और शातिर अपराधी ने इलाहाबाद के वरिष्‍ठ पत्रकार शिवाशंकर पांडेय के ऊपर तीन दिन के भीतर दो बार जानलेवा हमला किया। तहरीर देने के बावजूद कर्नलगंज और नवाबगंज थाने की पुलिस ने एहतियाती कदम उठाना तक जरूरी नहीं समझा। भुक्तभोगी पत्रकार ने एसएसपी से मिलकर जान के सुरक्षा की गुहार लगाई है।

देखना यह है कि इलाहाबाद में कानून का राज कायम रहेगा या गुंडे बदमाश सरेराह लोगों को दहशतजदा कर अपना समानांतर राज कायम रखेंगे। खास बात यह है कि वरिष्‍ठ पत्रकार शिवाशंकर पांडेय भारतीय जनता पार्टी के पूर्व विधायक प्रभाशंकर पांडेय के छोटे भाई हैं। प्रभाशंकर पांडेय मौजूदा समय में भारतीय जनता पार्टी के संगठन में काशी क्षेत्र के महामंत्री पद की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।  

गंगापार के नवाबगंज थाना क्षेत्र का पेशेवर अपराधी व संगठित गिरोह चलाने वाला बदमाश संतोष मिश्रा ने वरिष्‍ठ पत्रकार शिवाशंकर पांडेय पर 28 अक्टूबर को जिला कचहरी में सीआरओ ऑफिस के सामने तमंचा सटाकर जान से मारने की धमकी दी। भुक्तभोगी ने इसकी लिखित शिकायत एसपी क्राइम से की। एसपी क्राइम ने मामले को गंभीरता से लेते हुए थाना कर्नलगंज को मुकदमा दर्ज करने का आदेश दिया। 30 अक्टूबर शाम तक इस मामले में पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। पुलिस के ढुलमुल रवैए का नतीजा यह निकला कि उसी मनबढ़ अपराधी ने 30 अक्टूबर को सुबह नवाबगंज चौराहे पर जानलेवा हमला कर दिया। किसी तरह लोगों ने पत्रकार को बचाया। भुक्तभोगी पत्रकार ने नवाबगंज थाने में जान की सुरक्षा और एफआईआर दर्ज करने की तहरीर दी है।

उधर, पत्रकार साथियों और विभिन्न सामाजिक संगठनों से भी मदद की अपील की है। हमलावर बदमाश के खिलाफ नवाबगंज, कैंट, कर्नलगंज, सिविललाइंस आदि थानों में डेढ़ दर्जन से ज्यादा गंभीर आपराधिक मुकदमे पहले से ही दर्ज हैं। वह नवाबगंज थाने का हिस्ट्रीशीटर बदमाश है। ऑन ड्यूटी दारोगा पर जानलेवा हमला, नशीले ड्रग्स की तस्करी, जुए के अड्डे का संचालन, गुंडा टैक्स वसूली जैसे तमाम मुकदमे दर्ज हैं। शिवाशंकर पांडेय का कहना है कि वे खुद और उनका पूरा परिवार दहशत के साए में है। आम लोगों पर फर्जी मुकदमे दर्ज करने वाली पुलिस जांच की नौटंकी में जुटी हुई है।

देखिए तस्वीर, रोहतक में कैसे पुलिस उत्पीड़न के शिकार हुए पत्रकार

सचिन तेंदुलकर के खेल को कवर कर रहे हरियाणा के पत्रकारों पर मंगलवार को पुलिस ने लाठियां बरसाईं। चार पत्रकारों को तो पुलिस ने बुरी तरह लाठियों से पीटा। हरियाणा के रोहतक में चले रणजी ट्राफी मैच में तीन दिन सचिन तेंदुलकर अपने बल्ले का जलवा दिखाए। इस दौरान सचिन के दर्शन पाने के लिए उनके चाहने वालों को पुलिस की लाठियां खानी पड़ी। भीड़ नियंत्रित करने के नाम पर पुलिस ने सचिन के चाहने वालों से उठक बैठक तक कराई।

ये सब चीजें भास्कर हरियाणा के सबसे प्रतिभावान फोटोग्राफर संजय झा ने अपने कैमरे में कैद की और संजय ने अपनी तस्वीरों से यहां तक एक्सपोज किया कि खुद पुलिस कप्तान गरीब लोगों पर लाठियां बजाते नजर आए। ये सब भास्कर में छपा तो बात दूर तक गई और पुलिस खुन्नस खाए बैठी थी। अगले रोज संजय के साथी दो पत्रकार व एक फोटोग्राफर ने अपने कैमरे में एक नया खपला कैद किया कि कैसे पुलिस वाले अपने लोगों को बिना किसी पहचान पत्र के रोहतक के स्टेडियम में एंट्री दिला रहे थे।

बस, ये देखते ही पुलिस बौखला गई और पत्रकारों पर धावा बोल दिया। यूं तो छुटपुट कई पत्रकारों को चोटें लगीं। इनमें हरिभूमि के रोहतक संवाददाताए अनिल चहल, न्यूज एक्सप्रेस के गुडगांव संवाददाता मनू महता व एमएच वन सुदर्शन व ए वन तहलका हरियाणा अशोक राठी को बुरी तरह से टारगेट बनाया गया। पर पुलिस बिना कुछ देखे लाठियां बरसानी शुरू कर दी। एक अन्य फोटाग्राफर के मुंह पर पुलिस ने खूब घूंसे बरसाए।

दुख की बात ये है कि हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र हुड्डा के शहर में यह शर्मनाक वाकया हुआ। सभी पत्रकार यही कह रहे हैं हुड्डा शर्म करो कुछ तो शर्म करो। सीएम ने देर शाम तक न तो घटना पर कोई टिप्पणी की और न ही कोई सख्त एक्शन की। मात्र एक सिपाही को बलि का बकरा बनाकर आंसू पोंछने की कोशिश की।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

राजेंद्र यादव साहित्य के पारस थे : निशंक

देहरादून : उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल 'निशंक' ने हिंदी साहित्य में नयी कहानी आन्दोलन के प्रणेता प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. राजेन्द्र यादव के आकस्मिक निधन को भारतीय साहित्य के एक और युग का अवसान बताया है.

डॉ. निशंक ने कहा है कि राजेन्द्र यादव साहित्य के पारस थे. उन्होंने न केवल भारतीय साहित्य को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अधिक प्रासंगिक बनाया अपितु मुशी प्रेमचंद द्वारा आरम्भ की गयी साहित्यक पत्रिका ‘हंस’ का फिर से प्रकाशन करके पिछले साठ साल में लोगों के दिलों में कहानी सम्राट को जिंदा भी रखा.

एक शोक सन्देश में पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. पोखरियाल ने डॉ. राजेन्द्र यादव के परिजनों, मित्रों तथा प्रशंसकों के प्रति हार्दिक सहानुभूति व्यक्त करते हुए शोक संतप्त परिवार को इस दारुण दुःख को सहने तथा दुःख की घड़ी में उनको संबल देने की परमात्मा से प्रार्थना की है. 

प्रेस रिलीज

एबीपी न्यूज उपर चढ़ा, जी न्यूज का पतन जारी

43वें हफ्ते की टीआरपी चार्ट से पता चलता है कि एबीपी न्यूज बढ़त की तरफ है. अगर यही हाल रहा तो इंडिया टीवी को नंबर दो से धड़ाम होकर नंबर तीन पर आना पड़ेगा. दोनों चैनलों के बीच बहुत कम फासला रह गया है. लाख कोशिशों के बावजूद जी न्यूज टॉप फोर में नहीं आ पा रहा. चौथे नंबर पर अड़े इंडिया न्यूज को जी न्यूज नीचे नहीं उतार पा रहा. पूरा चार्ट यूं है…

WK 43 2013, (0600-2400)
Tg CS 15+, HSM:
Aaj Tak 16.7 dn 0.9
India TV 13.7 dn 0.8
ABP News 13.5 up 1.1
India news 10.8 same
ZN 10.1 dn 0.3
News 24 9.5 dn 0.2
IBN 6.7 up 0.2
NDTV 6.1 up 0.3
Samay 5.9 up 0.3
DD 2.7 dn 0.1
Tez 2.5 up 0.2
Live India 1.9 up

 

समाचार प्लस राजस्थान में तेजी से ईटीवी की गर्दन की तरफ बढ़ रहा

राजस्थान के लिए नया लांच हुआ रीजनल न्यूज चैनल 'समाचार प्लस' ने टीआरपी के मामले में बड़ी बढ़त इस हफ्ते हासिल की है. लगभग दुगुनी की छलांग लगाकर समाचार प्लस ने नंबर दो की स्थिति अपनी और ज्यादा मजबूत कर ली है और नंबर एक ईटीवी राजस्थान के गर्दन की तरफ खुद को बढ़ा लिया है.

राजस्थान में बाकी चैनलों की क्या स्थिति है, यह जानने के लिए उपरोक्त चार्ट देखें… उधर, यूपी-उत्तराखंड में भी समाचार प्लस का प्रदर्शन जोरदार है. नंबर चार की पोजीशन में इस चैनल ने इस 43वें हफ्ते काफी अच्छी बढ़त हासिल की है. यूपी-उत्तराखंड में ईटीवी नंबर वन की पोजीशन में है. यूपी-उत्तराखंड में बाकी चैनलों की क्या स्थिति है, यह जानने के लिए उपरोक्त चार्ट देखें.

समाचार प्लस, राजस्थान से जुड़े जय प्रकाश शर्मा अपने फेसबुक वॉल पर लिखते हैं: ''मित्रों, समाचार प्लस पर दर्शकों के विश्वास की निरंतरता बनी हुई है. इस विश्वास और अपनेपन के लिए हम राजस्थान के सुधि दर्शकों के प्रति कृतज्ञ हैं. शुरुआत के साथ ही प्रदेश के दर्शकों ने चैनल को जो अपनापन दिया है, वो अभिभूत करने वाला है. रेटिंग्स में इतनी जल्दी और इतनी तेजी से समाचार प्लस का आगे बढ़ना किसी कीर्तिमान से कम नहीं है. आप सभी मित्रों से मिलने वाले सुझाव हमारे लिए पथ प्रदर्शक रहे हैं. हमारे एडिटर इन चीफ उमेश कुमार जी और एक्जीक्यूटिव एडिटर प्रवीण साहनी जी के कुशल निर्देशन में हम निरंतर परिश्रमरत हैं. आपका स्नेह हमारी पूंजी है.''

हे अखिलेश यादव जी, सेलरी नहीं दे रहीं मीना तिवारी, हम हड़ताल पर हैं (79 हड़ताली महुआकर्मियों ने भेजा पत्र)

सेवा में, श्री अखिलेश यादव, माननीय मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश : महोदय, महुआ न्यूज के कार्यरतकर्मियों को तीन महीने से वेतन नहीं मिला है…।  प्रबंधन से इस बावत कई बार  संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन कंपनी के एचआर विभाग की तरफ से बार-बार आश्वासन दिया गया। एचआर के मुताबिक गत माह सितंबर की सैलरी के लिए इस महीने की कई तारीखें दी गईं।

जब आज दिनांक 30 अक्टूबर, 2013 को भी सैलरी नहीं आई तो महुआ न्यूज के सभी विभागों के कर्मचारियों ने नाराजगी जाहिर की। एचआर से बात करने के बाद भी वर्तमान में कंपनी के मालिक प्रमोद कुमार तिवारी की पत्नी मीना तिवारी जो इस वक्त चैनल का कार्यभार संभाल रही हैं, उनसे भी सभी विभागों के वरिष्ठ कर्मचारियों ने बातचीत की। लेकिन उन्होंने एक बार फिर से एक महीने इंतजार करने का आश्वासन दिया।

आप को ये पता होगा महोदय कि दिवाली आने वाली है…लिहाजा कर्मचारियों में इस वजह से काफी निराशा का माहौल है। आज जब प्रबंधन ने फिर से सैलरी को लेकर कोई ठोस जवाब नहीं दिया। तो चैनल के सभी विभागों के कर्मचारियों ने काम रोक दिया…और सैलरी आने तक काम नहीं करने का करीब कंपनी में मौजूद 150 कर्मचारियों ने निर्णय लिया है। जिसके बाद कंपनी प्रबंधन ने कई विभागों में ताला भी लगा दिया।  आपको बता दें, कंपनी में कार्यरत महिला कर्मचारी भी शामिल हैं…..सभी कर्मचारियों को आशंका है कि कंपनी मालिक इस बीच कर्मचारियों को कंपनी से बल पूर्वक बाहर निकलवाने की कोशिश कर सकते हैं।

महोदय आपसे अनुरोध है कि सभी कर्मचारियों को सुरक्षा प्रदान की जाए और उनकी सेलरी दिलाई जाए।

हम हैं


 
दिनांक- 30-10-2013

महुआ मीडिया प्रा. लि.

FC-17, SEC-16 A

फिल्म सिटी, नोएडा (यूपी)


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महुआ आफिस कब्जा

शुद्ध अवसरवाद की चाशनी में लिपटा अशुद्ध धर्मनिरपेक्षतावाद

30 अक्टूबर 2013 को राजधानी दिल्ली में राजनीति की बारिश में, बरसाती मेंढकों …..(माफ़ कीजिएगा)…. तीसरे मोर्चे की टर्र-टर्र सुनायी दी. टर्र-टर्र…ये आवाज़ इसलिए जानी पहचानी लगती है, क्योंकि ये मौसमी है. मौसम के हिसाब से टर-टराती है. इस आवाज़ की यही पहचान है. लेफ्ट पार्टियों की पहल पर जमा ये मौसमी … गैर-कांग्रेसी, गैर-भाजपाई कुनबा…."धर्म-निरपेक्ष मोर्चा". बिलकुल नया, तारो-ताज़ा नाम.
 
जी हाँ! यही नया नाम है, इस तथा-कथित तीसरे मोर्चे का, इस बार के चुनावी मौसम में. मज़े की बात ये कि मुजफ्फर-नगर दंगों के ज़रिये "शोहरत" बटोर चुके ध्रुवीकरण के पैरोकार…..मुल्ला-मुलायम सिंह इस के केंद्र में रहे.  मोदी-विरोधी कैम्प के अगुवा, नीतीश कुमार भी जोश दिखाते नज़र आये. ए.आई.ए.डी.एम.के., बीजू जनता दल, जनता दल(सेक्युलर) सहित 17 क्षेत्रीय पार्टियों के आका या उनके प्रतिनिधि इस "चुनावी तमाशे" में जमा हुए. ऐसा तमाशा, जो हिन्दुस्तान की पब्लिक 1989 से पता नहीं, कितनी बार देख चुकी है.
 
इस तमाशे की ख़ास बात…..बन्दर बनने को कोई तैयार नहीं, सब-के-सब मदारी बनने की जुगत में ! चुनाव के पहले संयुक्त परिवार और चुनाव के बाद विभाजित परिवार, यही है इस मोर्चे का महा-गोपनीय और महा-सार्वजनिक एजेंडा. इतना हिडेन और इतना खुल्ला कि कोख में पल रहे राजनीतिक शिशु को भी समझ में आ जाए और इन्हें वोट देने वालों को समझ में ना आये.
 
इस मोर्चे को लगता है कि डेमोक्रेट और रिपब्लिकन की छाया बनती कांग्रेस और भाजपा अपरिहार्य नहीं है. पेट से ज़्यादा, कौम ज़रूरी है. मुर्दों की कीमत, जीते-जागते इंसान से कुछ ही कम है. बिजली-पानी-सड़क की बात बे-ईमानी है. अवसरवाद, इबादत का दूसरा नाम है. हिन्दू-मुसलमान का भेद, इन नेताओं की राजनीतिक उम्र में इज़ाफा करेगा. भूख-भय-भ्रष्टाचार के खात्मे की बात नहीं बल्कि कौम का उन्माद इन्हें राजनीति में ज़िंदा रखेगा. इस मोर्चे को लगता है कि हिन्दुस्तान की पब्लिक बेवकूफ है. कौम और कत्लेआम, इस मुल्क में, इनके वजूद को मरने नहीं देगा. 
 
अल्लाह-ईश्वर तेरो नाम- सबको सन्मति दे भगवान् !
शुद्ध अवसरवाद की चाशनी में लिपटा….अशुद्ध धर्मनिरपेक्षतावाद ! ख़ुदा खैर करे ! 
 
अजित कुमार 
+91-9594471363

Yash Birla Group Companies is now beginning to hurt investors

dear yashwant ji, need your precious advice on Yash Birla Group Of companies as i found that they are not backing the maturity proceeds of FDR taken by general public especially from two Yash Birla Group companies, Zenith Birla (India) and Birla Power Solutions.

one of my near one & myself has become victim of this group as we had invested 10000 each in group companies like birla cotsyn, birla power & zenith birla for 3year & 1 year. FDR no 0055990 taken on 10/10/2012 has been matured on 9/10/2013 but is still due for payment.

i had send FDR to registrar which was duly acknowledged by them on 30th sept & since than getting no response from organisation. neither their contact no provided with company registrar for registered office , corporate office nor company secretary & customer grievance redressal compliance officer contact no nor any of their email provided are working.

had sent several email to the Yash Birla companies for their responses. Till the time of writing this message, i have not received any answers from them.

kindly guide as what should one do & how can he proceed further for legal process under IPC apart from filing complain with ministry of corporate affairs, company law board etc.

i had checked on several blogs that group is now beginning to hurt investors who have trusted their money to unsecured fixed deposits of a clutch of companies. Investors are writing complain that they are not getting back their maturity proceeds by yash birla group.

thanks

nitin rathi

इलाहाबाद में पत्रकार पर हमला, सुरक्षा की मांग

 
इलाहाबाद। पत्रकार की जान के लाले पड़ गए हैं. जीवन पूरी तरह असुरक्षित है. एक हिस्ट्रीशीटर और शातिर अपराधी ने इलाहाबाद के वरिष्ठ पत्रकार शिवाशंकर पांडेय के ऊपर तीन दिन के भीतर दो बार जानलेवा हमला किया. तहरीर देने के बावजूद कर्नलगंज और नवाबगंज थाने की पुलिस ने एहतियाती कदम उठाना तक जरूरी नहीं समझा. भुक्तभोगी पत्रकार ने एसएसपी से मिलकर जान की सुरक्षा की गुहार लगाई है. देखना यह है कि इलाहाबाद में कानून का राज कायम रहेगा या गुंडे बदमाश सरेराह लोगों को दहशतजदा कर अपना समानांतर राज कायम रखेंगे. खास बात यह है कि वरिष्ठ पत्रकार शिवाशंकर पांडेय भारतीय जनता पार्टी के पूर्व विधायक प्रभाशंकर पांडेय के छोटे भाई हैं. प्रभाशंकर पांडेय मौजूदा समय में भारतीय जनता पार्टी के संगठन में काशी क्षेत्र के महामंत्री पद की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं.  
 
गंगापार के नवाबगंज थाना क्षेत्र का पेशेवर अपराधी व संगठित गिरोह चलाने वाले बदमाश संतोष मिश्रा ने वरिष्ठ पत्रकार शिवाशंकर पांडेय पर 28 अक्टूबर को जिला कचहरी में सीआरओ ऑफिस के सामने तमंचा सटाकर जान से मारने की धमकी दी. भुक्तभोगी ने इसकी लिखित शिकायत एसपी क्राइम से की. एसपी क्राइम ने मामले को गंभीरता से लेते हुए थाना कर्नलगंज को मुकदमा दर्ज करने का आदेश दिया. 30 अक्टूबर शाम तक इस मामले में पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की. पुलिस के ढुलमुल रवैए का नतीजा यह निकला कि उसी मनबढ़ अपराधी ने 30 अक्टूबर को सुबह नवाबगंज चौराहे पर जानलेवा हमला कर दिया. भुक्तभोगी पत्रकार ने नवाबगंज थाने में जान की सुरक्षा और एफआईआर दर्ज करने की तहरीर दी है. उधर, पत्रकार साथियों और विभिन्न सामाजिक संगठनों से भी मदद की अपील की है. हमलावर बदमाश के खिलाफ नवाबगंज, कैंट, कर्नलगंज, सिविललाइंस आदि थानों में डेढ़ दर्जन से ज्यादा गंभीर आपराधिक मुकदमे पहले से ही दर्ज हैं. वह नवाबगंज थाने का हिस्ट्रीशीटर बदमाश है. ऑनड्यूटी दारोगा पर जानलेवा हमला, नशीले ड्रग्स की तस्करी, जुएं के अड्डे का संचालन, गुंडा टैक्स वसूली जैसे तमाम मुकदमे दर्ज हैं। शिवाशंकर पांडेय का कहना है कि वे खुद और उनका पूरा परिवार दहशत के साए में हैं.
 
            इलाहाबाद के एक पत्रकार के मेल पर आधारित
 

‘द हिंदू’ की पत्रकार विद्या सुब्रमण्यम बोलीं- मेरे मसले को उठाकर कांग्रेस ने ठीक नहीं किया

नई दिल्ली। कांग्रेस मीडिया सेल के प्रभारी अजय माकन ने नरेंद्र मोदी को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुश्मन करार दिया. अजय माकन ने पार्टी की ब्रीफिंग में एक अंग्रेजी अखबार की महिला पत्रकार ('द हिंदू' की पत्रकार विद्या सुब्रमण्यम) को सरदार वल्लभ भाई पटेल पर लिखे एक लेख के कारण मिल रही धमकियों का मामला उठाया और बताया कि उन्होंने गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे से इसकी जांच कराके समुचित कार्रवाई को कहा है.

उन्होंने आरोप लगाया कि 'द हिंदू' की पत्रकार विद्या सुब्रमण्यम को संघ परिवार और मोदी के समर्थकों से शारीरिक रूप से नुकसान पहुंचाने और बम से हमला करने की धमकियों वाले फोन कॉल आ रहे हैं. इसकी पुलिस मे शिकायत दर्ज कराई गई है. माकन ने कहा कि एक तरफ तो मोदी सरदार पटेल की प्रतिमा की आधारशिला रख रहे हैं, दूसरी तरफ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला करके सरदार पटेल द्वारा रखी गई राष्ट्र की आधारशिला पर प्रहार कर रहे हैं.

उधर, 'द हिंदू' की पत्रकार विद्या सुब्रमण्यम ने एक न्यूज चैनल से कहा कि उनसे जुड़े मुद्दे को उठाकर कांग्रेस ने ठीक नहीं किया. उन्होंने कांग्रेस को इस मुद्दे को उठाने की इजाजत नहीं दी थी. कांग्रेस के मीडिया सेल के चीफ अजय माकन ने कहा था कि सरदार पटेल और आरएसएस के संबंधों पर लेख लिखने के लिए एक महिला पत्रकार को संघ परिवार की ओर से धमकाया जा रहा है.

दीपक चौरसिया पर ईंट के बाद पत्थर पड़े

इंडिया न्यूज के भले अच्छे दिन आ गए हों लेकिन लगता है दीपक चौरसिया के बुरे दिन शुरू हो गए हैं. इंडिया न्यूज उनके लिए निजी तौर पर काफी झटके देने वाला प्रोजेक्ट साबित हो रहा है. पहले उनकी टांग टूटी. दो-दो बार आपरेशन हुआ. आखिरकार जब ठीक हुए तो पहले जैसे न बन पाए. अब वो लंगड़ा कर चलने लगे हैं. इंडिया न्यूज को टीआरपी दिलाने के जुनून में पहले आम आदमी पार्टी और केजरीवाल, फिर आसाराम के पीछे पड़ गए. टीआरपी तो मिली लेकिन दीपक के ढेरों दुश्मन और विरोधी पैदा हो गए. आप वालों से लेकर आसाराम वालों तक ने दीपक चौरसिया के खिलाफ कई तरह की मुहिम सोशल मीडिया पर शुरू कर दी है जिसमें दीपक चौरसिया के करप्शन की फाइल खोल दी गई है. फिर जब वो चुनावी शो करने फील्ड में उतरे तो पहले उन पर ईंट पड़े, अब पत्थर पड़ने की सूचना आई है.

बताया जाता है कि बुधवार छत्तीसगढ़ के दुर्ग इलाके में दीपक चौरसिया की गाड़ी पर पत्थर फेंके गए. दीपक अपना चुनावी शो खत्म कर अपनी कार बैठ रहे थे. तभी कुछ लोगों ने उनकी गाड़ी में घुसने की कोशिश की. दीपक के बाउंसर्स ने उन्हें ऐसा करने से रोका. तब करीब पांच लोगों ने दीपक चौरसिया की गाड़ी पर पत्थर फेंके. दीपक को चोट तो नहीं आई पर कार के शीशे टूट गए हैं. एक हमलावर पकड़ लिया गया है. पुलिस जांच में जुट गई है.

कहा जा रहा है कि दीपक चौरसिया की आगे की जिंदगी अब स्मूथ नहीं रही. वे पहले जैसे बेखौफ फील्ड रिपोर्टिंग नहीं कर पाएंगे. उन्होंने अगर आम आदमी पार्टी और आसाराम एंड कंपनी का मीडिया ट्रायल कर अपनी टीआरपी बढ़ाई है तो अपनी निजी ज़िंदगी और फील्ड की आजादी खोई है. वहीं कुछ लोगों का कहना है कि ये मनहूस इंडिया न्यूज चैनल का साया है कि जो भी एडिटर यहां आता है, उसकी परसनल लाइफ बिगड़ने लगती है और उसे तरह-तरह से परेशान होना पड़ता है. तो क्या माना जाए, जेसिका लाल की आत्मा विनोद शर्मा एंड फेमिली के साथ-साथ यहां कार्यरत संपादकों से भी तरह-तरह से तरीके-तरीके से बदला लेती है?  कोई दीपक चौरसिया के दिल से पूछे. उन्हें अब अपने आगे पीछे कई बाउंसर रखने पड़ रहे हैं. मतलब, अब दीपक का फील्ड का करियर खत्म. सिर्फ स्टूडियो से डिबेट करेंगे-कराएंगे.

याद रहेगी केपी की बेपरकी……!!

वह 80 के दशक का उत्तरार्द्ध था. जब मैं पत्रकारिता में बिल्कुल नया था. यह वह दौर था जब रविवार, धर्मयुग व साप्ताहिक हिंदुस्तान जैसी राष्ट्रीय स्तर की पत्रिकाएं बंद हो चुकी थीं. लेकिन नए कलेवर के साथ संडे आब्जर्वर, संडे मेल और दिनमान टाइम्स के रूप में कुछ नए साप्ताहिक समाचार पत्र बाजार में उतरे. बिल्कुल नई शैली में ये पत्र या कहें पत्रिकाएं 12 से 14 पेज के अखबार जैसे थे. साथ में बेहद चिकने पृष्ठों वाला एक रंगीन चार पन्नों का सप्लीमेंट भी होता था. उस समय इस सामग्री के साथ एक रंगीन पत्रिका भी साथ में देकर संडे मेल ने तहलका मचा दिया.
 
कन्हैया लाल नंदन के संपादकत्व में निकलने वाले इस पत्र की रंगीन पत्रिका में अंतिम पृष्ठों पर बेपरकी स्तंभ के तहत व्यंग्यकार के. पी. सक्सेना का व्यंग्य प्रकाशित होता था. बेसब्री से प्रतीक्षा के बाद पत्रिका हाथ में आते ही मैं सबसे पहले स्व. सक्सेना का व्यंग्य ही पढ़ता था। चुनांचे, अपने तई व बेपरकी समेत तमाम अपरिचित व नए जुमलों के साथ उनका व्यंग्य कमाल का होता था. वे गंभीर बातों को भी बेहद सरलता के साथ बोलचाल की भाषा में पेश करते थे. व्यंग्य में वे खुद के रिटायर्ड रेलवे गार्ड होने का जिक्र बार-बार किया करते थे यही नहीं सामाजिक विडंबनाओं पर भी वे बेहद सरल शब्दों में इतने चुटीले प्रहार किया करते थे कि हंसने के साथ ही सोच में पड़ जाना पड़ता था. ऐसा करते हुए वे देश के आम आदमी का प्रतिनिधित्व करते मालूम पड़ते थे. उनके स्तंभ को पढ़ कर बहुत मजा आता था. किसी काम में समय बीतने को या किसी क्षेत्र में योगदान देकर संसार से विदा लेने वालों के लिए वे, 'खर्च हो गए' जैसे जुमले का प्रयोग करते थे. यह उनका एक खास अंदाज था. 
 
मुझे याद है उसी दौर में तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. नरसिंह राव पर तब सूटकेस में भर कर एक करोड़ रुपए लेने का आरोप लगा था. इसके लिए स्व. सक्सेना ने, "उम्र बीत गई रेलवे में गार्डी  करते, लेकिन सपने में भी कभी अटैचा नहीं दिखा", जैसे वाक्य का प्रयोग कर पाठकों को हंसने पर मजबूर कर दिया. यही नहीं उसी दौर में सरकार ने विधवा की तर्ज पर विधुर पेंशन शुरू करने की पेशकश की तो स्व. सक्सेना ने, "हम रंडुवों को पेंशन पाता देख बीबी वालों के बनियान तले सांप लोटने लगेंगे", जैसे वाक्य से गजब का व्यंग्य लिखा, जिसे आजीवन भूलाया नहीं जा सकता. उस दौर में कोई भी पत्रिका हाथ में आने पर मेरी निगाहें उनके व्यंग्य को ही ढूंढा करता थीं. जीवन की भागदौड़ के बीच फिर सक्सेना बिसर से गए. कई बार अचानक याद आने पर मैं चौंक पड़ता था कि कवि सम्मेलनों में बेहद दुबले-पतले से नजर आने वाले के. पी क्या अब भी हमारे बीच हैं. सचमुच हिंदी जगत के आम-आदमी से जुड़े व्यंग्यकार थे स्व. के. पी. सक्सेना …. उनको मेरी श्रद्धांजलि …
 
                    लेखक तारकेश कुमार ओझा दैनिक जागरण से जुड़े हैं तथा पश्चिमी मेदिनीपुर (पश्चिम बंगाल) में रहते हैं. इनसे संपर्क 09434453934 पर किया जा सकता है.

 

आज केपी सक्सेना भी न रहे… लेकिन स्मृतियां तो जीवित रहती ही हैं न

Virendra Yadav : आज केपी सक्सेना भी न रहे. यूं तो लखनऊ शहर के एक ही इलाके में रहते हुए भी इधर कई वर्षों से मिलने जुलने का कोई नियमित सिलसिला नहीं था. इधर अस्वस्थ होने के पूर्व भी शहर के साहित्यिक अयोजनो में भी उनकी उपस्थिति लगभग न के ही बराबर थी. फिर भी जब कभी कभार चलते फिरते देखा देखी हो जाती तो उसी चार दशकों पूर्व की उस आत्मीय मुस्कराहट के साथ मिलते जब हम लोगों का मिलना जुलना सप्ताह में एक दो बार जरूर होता था….

दरअसल मिलने जुलने का यह सेतु था सातवें आठवें दशक का 'कंचना' नाम का वह चायखाना जो मध्य अमीनाबाद में उन दिनों पुराने लखनऊ के लेखकों, पत्रकारों, सामाजिक व् राजनीतिक कार्यकर्ताओं और मुख्यतः कविसम्मेलनी मंचीय कवियों की अड्डेबाजी का केंद्र था. हम लोगों की रिहाईश भी तब वहीं आसपास थी. के पी सक्सेना अक्सर चारबाग रलवे स्टेशन से जब अपनी स्टेशनमास्टरी की ड्यूटी समाप्त कर अपने हाथ में चार कटोरों वाला टिफिनबाक्स लिए वापस हो रहे होते तो वहां झांकते और परिचितों दोस्तों के मिलने पर अड्डा जमाते.

मेरा उनसे परिचय और मिलना यहीं हुआ था और तब मैं विश्वविद्यालय का छात्र था. उन दिनों वे कई पत्रिकाओं और समाचारपत्रों में नियमित व्यंग्य स्तम्भ लिखते थे. इनमें कुछ ऐसी पत्रिकाएं भी थीं जिनका जिक्र होने पर वे संकोच भी महसूस करते थे. लेकिन हम लोग शरारतन उनसे अक्सर उन्ही पत्रिकाओं में उनके व्यंग्य छपने की चर्चा करते थे जिनका जिक्र वे नहीं सुनना चाहते थे. उनकी लेखन क्षमता कितनी विलक्षण थी इसका अंदाज़ा उसी दौर की एक घटना से हुआ.

हुआ यह कि उन दिनों हम लोग विश्वविद्यालय से 'विद्यार्थी लोक' नाम का एक पाक्षिक पत्र प्रकाशित करते थे. तय हुआ कि उसके पंद्रह अगस्त अंक में केपी सक्सेना का व्यंग्य प्रकाशित किया जाये. वे सहर्ष इसके लिए तैयार भी हो गए और लेख देने की तारिख व समय निश्चित कर दिया. वो अखबार के प्रेस में जाने की अंतिम डेडलाईन भी थी. लेकिन जब मैं उनके घर लेख लेने गया तब वे व्यस्तताओं में इसे लिखना पूरी तरह भूल गए थे. मुझे देखते ही उन्हें याद आया तो शर्मिंदा होते हुए उन्होंने कहा कि अच्छा एक घंटे बाद आकर ले लो.

मुझे बहुत गुस्सा आया कि कि ये नाहक मुझे टाल रहे हैं एक घन्टे में ये कैसे लिख देंगे! फिर भी मैं जब दो घंटे बाद गया तो वे लेख लिखकर उसे लिफाफे में बंद कर पत्नी को उसे मुझे देने की हिदायत देकर टहलने चले गए थे. मैंने सोचा कि इन्होंने चलताऊ ढंग से मुझे निपटा दिया लेकिन जब मैंने उसे पढ़ा तो वह नोकपलक दुरुस्त व्यंग्य था जिसके छपने पर सराहना भी हुयी थी ……आज ४२ वर्षों बाद वह सब याद आ गया, जब वे नहीं हैं… स्मृतियाँ तो जीवित रहती ही हैं न!

वीरेंद्र यादव के फेसबुक वॉल से.

Kumar Ketkar meets Modi-Eyes Sudhindra Kulkarni’s role in Team Modi

Veteran Marathi journalist and staunch Gandhi family loyalist Kumar Ketkar is in a mood to shift his age old loyalty,sources from Mumbai BJP claims. Ardent supporter of Sonia Gandhi and aggressive RSS and Modi basher Kumar Ketkar,secretly met BJP's PM in waiting Narendra Modi with BJP leader Shyam Jaju at New Delhi and conveyed his best wishes to Narendra Modi for 2014 general elections.This meeting was aimed at pressing for top berth in Modi's non political team at Delhi,if Modi becomes PM after next year general elections.

State BJP leaders Madhav Bhandari,Atul Bhatkhalakar and Vinod Tawade are opposing the move citing Ketkar's strong anti-RSS views and RSS bashing rhetoric. Also all three has apprised Modi of Ketkar's anti-Hindutva credentials. According to BJP sources Narendra Modi has not given any assurance regarding inducting Ketkar in his new team,but Ketkar was at least successfully sent filler in RSS-BJP circle by meeting Modi.

Divya Marathi editor Samar Khadas clarified that Ketkar is not going to be a BJP member,but he wants to contribute in Narendra Modi's nation building project by sharing his own huge experience in journalism and politics.As now Sudhindra Kulkarni has no say in post-Advani BJP,Kumar Ketkar is eyeing the important role in Modi's Media and policy wing.

But Ketkar must have clear many hurdles from Mumbai RSS,who has strong objections for Ketkar. Next Modi-Ketkar meeting is scheduled during Diwali,told Samar Khadas-a Ketkar right hand in Divya Marathi.

खाने का बिल भी डकार गए चंडीगढ़ प्रेस क्लब के प्रेसिडेंट

कई घोटालों के लिए मशहूर चंडीगढ़ प्रेस क्लब में एक नया घोटाला सामने आया है। घोटाले का खुलासा खुद क्लब के जनरल सेक्रेटी रंजू एरी ने किया है। घोटाले का आरोप क्लब के अध्यक्ष सुखबीर बाजवा पर है। रंजू एरी ने अपने ही अध्यक्ष को शो काज नोटिस भी जारी कर दिया है। रंजू एरी दवारा जारी नोटिस के मताबिक सुखबीर बाजवा ने क्लब के खाने का बिल क्लब को नहीं दिया। यह राशि दो लाख रुपए से उपर है।

रंजू एरी ने उन्हें 15 दिन के अंदर जवाब देने के कहा है। क्लब के ही पूर्व ज्वाइंट सेक्रेटी जसवंत सिंह राणा भी खाना खाने के बाद बिल देने से मुकर गए है। उनके हालात तो यह है कि उन्होंने खाने के बिल का भुगतान चेक से किया। लेकिन बैंक में चेक ही बाउँस हो गया। शो काज नोटिस नीचे है…

SHOW CAUSE NOTICE

The Chandigarh Press Club had given Notice on 13 July,2013 ,to all its members to clear their pending bills. It is found in the Club records that some members have deliberately ignored this notice and huge bills are pending against them in club records. Some of them have been pointed out in club’s audit report too.

It is the found that Mr Jaswant Rana had given cheque No. 276467 30/09/2013 of Allahabad bank and club restored his services but later the was bounced.  It is clear case of breach of the rules of the club.  

Para 52 of the Constitutions of Chandigarh Press club says,

DUTIES AND RESPONSIBILITIES
52 GENERAL
All irregularities and a breach of the rules shall be checked by the Secretary-General.

    Taking cognizance of these gross this irregularities and violation of the Chandigarh Press Club constitution/by laws of the club, a SHOW CAUSE NOTICE is hereby given to these members “Why an appropriate action should not be taken against them”.

    They are given 15 days time to reply.

    Members, who have already cleared their dues are requested to ignore this notice.

Ranju Aery

Secretary General

Dated : 30 Oct 2013.

हावड़ा-पोरबंदर एक्सप्रेस ट्रेन में घुसे लुटेरे, लूटपाट जारी

अभी-अभी पुणे के सीनियर साफ्टवेयर प्रोफेशनल अमित भट्ट का एक मेल भड़ास के पास आया है जिसमें बताया गया है कि हावड़ा-पोरबंद एक्सप्रेस ट्रेन में लुटेरे घुस चुके हैं और लूटपाट जारी है. इस ट्रेन में अमित भट्ट की बहन, जीजा और इनके बच्चे यात्रा कर रहे हैं. यात्रियों से लाखों रुपये, क्रेडिट कार्ड, मोबाइल, ज्वेलरी आदि की लूटपाट की जा चुकी है. लुटुरे अब भी ट्रेन में हैं और दूसरे डिब्बों के यात्रियों को निशाना बना रहे हैं. पूरी मेल यूं है..

Urgent: Please help Passengers…Loot in the Howrah-Porbandar Exp. train

Hello Sir/Madam,

I want to share one news of loot near Nandurbar area.

My Sister is traveling with my Bro-In-Law and children from Raigarh to Jamnagar in Howrah-Porbandar Exp. train.

Yesterday night someone pulled the chain near Nandurbar area and looted many passengers. They lost thousands of rupees, mobiles, credit cards etc.

They are still in the train…….Kindly help to the passengers….

As we know,  in this area, a very often dacoits looted many passengers in the past but there is lapse of security while travelling through train in this area.

Kindly contact my Bro-In-Law Mr. Hitesh Joshi (M: 09427708642) for more details……He is still traveling in the same train……

Hoping a positive response from media,

Amit Bhatt,

Senior Software Professional,

Pune

हिमाचल पुलिस के प्रवक्ता की बदजुबानी, अंडरकवर रिपोर्टर को कह दिया दलाल

हिमाचल प्रदेश से संचालित होने वाले ‘सिटी चैनल’ के अंडरकवर रिपोर्टर संजीव शर्मा द्वारा किए गये मानव तस्करी के खुलासे से हिमाचल प्रदेश पुलिस के प्रवक्ता संजीव रंजन औझा बोखला चुके है, कैमरे के सामने अपनी जवाबदेही तय करने की जगह उलटा स्टिंग आपरेशन को अंजाम देने वाले पत्रकार को ही धमकाया गया। दरअसल हिमाचल प्रदेश के जिला सिरमौर में लड़कियां और महिलाओं को मानव तस्कर नीलाम करते है, खरीदारी के लिए हरियाणा से आने वाले खरीदारों को ये लड़कियां नीलाम की जाती है।

करीब दस दिन के अन्दर क्राइम रिपोर्टर संजीव शर्मा  ने आधा दर्जन दलाल और महिला दलालों को खुफिया कैमरे में सौदेबाजी करते हुए दिखाया है। इस आपरेशन कलयुग में रिपोर्टर ने उस दलाल को भी बेनकाब किया है, जो पुलिस के साथ मिलकर मानव तस्करी का खेल खेलता है, यही नहीं नाबालिग लड़कियों को बिकते हुए भी दिखाया है। इतना ही नहीं एक ऐसा दलाल भी खुफिया कैमरे का शिकार बना जिसके बेटे खुद हिमाचल पुलिस में कार्यरत है, यही नहीं एक दलाल ने तो महिला पुलिसकर्मी तक का सौदा करने की बात खुफिया कैमरे पर कबूली।

दरअसल ख़बर का प्रोमों चैनल पर चलने के बाद हिमाचल प्रदेश महिला आयोग की अध्यक्षा घन्वेश्वरी ठाकुर ने कड़ा रूख लिया, लगे हाथ उन्होने डीजीपी हिमाचल प्रदेश संजय कुमार और जिला सिरमौर की एसपी सुमैधा द्विवेदी को फटकार लगाई, साथ ही स्टिंग आपरेशन पर भी जवाब मांगा। वहीं दूसरी तरफ ये स्टिंग आपरेशन पूरा होने के बाद सिटी चैनल के रिपोर्टर लगातार, वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के संपर्क में थे, लेकिन कैमरे के सामने कोई भी आने को तैयार नहीं था।

तारीख 30 अक्तूवर 2013 को सीआईडी क्राइम डीआईजी ने सिटी चैनल को स्टिंग सहित अपने आफिस में बुलाया और आश्वासन दिया कि वो भी इस स्टिंग को लेकर गंभीर है, साथ ही सीआईडी की तरफ से कहा गया कि वो इस आपरेशन को सिटी चैनल के रिपोर्टर के साथ करना चाहते है ताकि दलालों को पकड़कर सलाखों के पीछे ले जाए और हिमाचल में लड़कियों को बिकने से बचाया जा सके। यही नही सीआईडी क्राइम ने आने वाले अगले महीने की 4 तारीख भी तय की।

अंडरकवर रिपोर्टर ने सीआईडी की इस दलील पर भरोसा करते हुए हामी भर दी। इसके साथ ही सीआईडी के डीआईजी ने, पुलिस प्रवक्ता को कहा कि वो रिपोर्टर के कार्य की कदर करते हुए उन्हे इंटरव्यू दे दें। पुलिस प्रवक्ता ने रिपोर्टर को 3 बजकर 15 मिनट में मिलने को कहा जिस पर तय समय सीमा पर रिपोर्टर एक कैमरापर्सन और सहयोगी, अंडरकवर रिपोर्टर के साथ मिलने पहुंचे।

कुछ भी बोलने से पहले आईपीएस आफिसर बिना स्टिंग को देख बोलने से बचते रहे, स्टिंग आपरेशन का प्रोमो देखने के बाद उन्होंने लगे हाथ डीजीपी हिमाचल प्रदेश संजय कुमार को फोन करके कहा कि मानव तस्करी पर सिटी चैनल ने बहुत बड़े खुलासे को अंजाम तक पहुंचाया है। जो लोग दलाली करते हैं उनके साथ हमारे कुछ पुलिस वाले भी शामिल हैं, डीजीपी ने फोन पर ही संजीव रंजन को तुरंत कैमरे के सामने कुछ भी बोलने से इंकार कर दिया।

अचानक कुछ देर पहले स्टिंग आपरेशन की तारीफ करने वाले आफिसर, रिपोर्टरों को ही खरी-खोटी सुनाने लगे, इन शब्दों पर जब रिपोर्टर ने विरोध किया तो, अपना आपा खोते हुए आईपीएस आफिसर ने रिपोर्टर का कैमरा ये कहकर छीन लिया कि रिपोर्टर ने उसे कैमरे में कैद किया है। यहीं नही, कैमरे के अन्दर लगी कैसेट को भी तोड़ दिया। उस केबिन के अन्दर कोई भी पुलिसकर्मी या सुरक्षा कर्मी मौजूद नहीं था तब भी रिपोर्टर की तलाशी आईपीएस आफिसर ने ली, वर्दी और अपने पद का रोब दिखाते हुए रिपोर्टर को धमकाया भी गया और अंजाम भुगतने के लिए तैयार रहने को कहा गया।

इसके साथ ही भाषा आरोप लगाने की सारी मरियादा तोड़ते हुए उक्त आफिसर ने जहां पत्रकारों को गालियों से नवाजना शुरू कर दिया तो वहीं, पुलिस स्टेशन छोटा शिमला थाना को भी सूचित किया गया। दरअसल उक्त आफिसर को इस बात को लेकर शक हुआ कि रिपोर्टर ने उसे कैमरे में कैद कर लिया है। रिपोर्टर और कैमरापर्सन के साथ-साथ एक और टीम सहयोगी को भी पुलिस थाने लेकर आ गई, अधिकारी की तरफ से पुलिस पर दबाव बनाया गया कि वो रिपोर्टरों के खिलाफ मामला दर्ज करें। इस बात की ख़बर जैसे ही मीडिया को लगी तो करीब 50 मीडियाकर्मी पुलिस स्टेशन पहुंच गये।

मीडिया की दखलअंदाजी के बाद जहां हिमाचल प्रदेश पुलिस के प्रवक्ता अपना मुंह छिपाता नजर आया तो वहीं पुलिस ने भी मामला दर्ज करने से तौबा कर दी, क्योंकि पुलिस की हकीकत बेनकाब करने के लिए स्टिंग आपरेशन काफी था। इसके साथ ही शिमला के मीडियाकर्मियों ने फैसला लिया है कि उक्त आईपीएस आफिसर के खिलाफ प्रदेश के पुलिस महानिदेश संजय कुमार से सिटी चैनल के रिपोर्टर के साथ हुए अभद्र बर्ताव की शिकायत करेंगे साथ ही उक्त आफिसर को तत्काल प्रभाव से प्रवक्ता पद से हटाने की मांग भी की जाएगी अगर पुलिस की तरफ से कोई भी ठोस कदम नहीं उठाया जाता तो हिमाचल के मुख्यमंत्री से शिकायत करेंगे।

उप्र सरकार द्वारा पुलिस एसोसियेशन की मांग अस्वीकृत

उत्तर प्रदेश शासन ने आइपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर द्वारा उत्तर प्रदेश में एकीकृत पुलिस एसोशियेशन बनाए जाने और उसे उत्तर प्रदेश पुलिस एसोसियेशन नाम से पंजीकृत कराये जाने की मांग को खारिज कर दिया है. गृह विभाग ने 15 अक्टूबर 2013 के अपने आदेश द्वारा बिना कोई कारण बताये श्री ठाकुर की मांग अनौचित्यपूर्ण बताते हुए उसे अस्वीकृत कर दिया.

साथ ही यह भी कहा कि उत्तर प्रदेश के आइपीएस और पीपीएस अफसर उत्तर प्रदेश पुलिस बल के सदस्य और पुलिस अधिकारी नहीं हैं. इसीलिए उत्तर प्रदेश पुलिस के अन्य पुलिसकर्मियों के विपरीत उन्हें बिना सरकार की अनुमति के अपनी संस्था बनाने का अधिकार है.

सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर ने इस आदेश को पूरी तरह अविवेकपूर्ण बताया है क्योंकि उनके अनुसार यह कैसे माना जा सकता है कि आइपीएस और पीपीएस अफसर पुलिस अफसर और यूपी पुलिस का हिस्सा ही नहीं हैं.

एबीपी के लाइव शो कौन बनेगा मुख्यमंत्री शो में खून खराबा… कांग्रेसी-भाजपाई आपस में भिड़े

रायपुर के नगर निगम मुख्यालय के सामने गार्डन में आयोजित एबीपी चैनल की चुनावी परिचर्चा में कांग्रेसी और भाजपाई भिड़ गये. मंत्री बृजमोहन अग्रवाल और महापौर किरणमयी नायक की मौजूदगी में कुर्सियां तोड़ी गई. एक-दूसरे पर हमले भी किये गये, इससे आधा दर्जन कार्यकर्ताओं को चोटें आई हैं. टीवी चैनल ने संभावित मुख्यमंत्री को लेकर आयोजित सार्वजनिक परिचर्चा में दक्षिण विधानसभा के दोनों प्रमुख प्रत्याशियों बृजमोहन अग्रवाल एवं किरणमयी नायक समेत कई और लोगों को बुलाया था. काफी संख्या में कांग्रेस व भाजपा के कार्यकर्ता भी जुटे थे. सवाल-जवाब के दौर में एकाएक एक-दूसरे पर व्यक्तिगत टिप्पणी की जाने लगी और देखते ही देखते कार्यकर्ता भड़क गये. कार्यक्रम में मौजूद सुरक्षा बल भी भड़के कार्यकर्ताओं को नहीं रोक पाया.

लाइव शो में महापौर किरणमयी नायक ने भाजपा सरकार एवं समस्त मंत्रियों को नकारा एवं निकम्मा कह दिया, जिसके बाद मंत्री बृजमोहन अग्रवाल भड़क उठे और उन्होंने महापौर की शब्दावली पर आपत्ति जताई। इस पर भी महापौर शांत नहीं हुईं और पुन: उक्त शब्दों का उपयोग किया, जिसके बाद भाजपाई कार्यकर्ताओं ने जमकर उपद्रव मचाया। भाजपाइयों ने कार्यक्रम के दौरान ही कुर्सियां उठा-उठा कर कांग्रेसी कार्यकर्ताओं पर मारना शुरू कर दी। इस हमले में मंत्री बृजमोहन अग्रवाल एवं कांग्रेस के उम्मीदवार किरणमयी नायक सहित एक दर्जन लोगों के घायल होने की खबर है। इसके अलावा पार्षद प्रमोद दुबे, सतनाम पनाग, ममता राय आदि भी घायल हो गए। उक्त घटना के बाद कार्यक्रम स्थल पर भगदड़ की स्थिति निर्मित हो गई और कांग्रेसियों ने भी अपना आपा खो दिया। न्यूज चैनल द्वारा कार्यक्रम का सीधा प्रसारण किया जा रहा था और उक्त स्थिति के कारण उन्हें अपना कार्यक्रम बंद करना पड़ा।

महापौर ने घटना की जानकारी देते हुए बताया कि बृजमोहन अग्रवाल अब अपनी संभावित हार से घबरा रहे हैं, इसलिए गुण्डागर्दी पर उतर आए हैं। कांग्रेसी कार्यकर्ता शिव ग्वालानी ने कहा कि चुनाव के दौरान सभी राजनैतिक दल एक-दूसरे पर निकम्मा एवं नाकारा जैसे शब्दों का प्रयोग करते हुए आरोप लगाते हैं, जो कि कतई अशोभनीय भी नहीं है फिर भी भाजपाइयों द्वारा जिस प्रकार गुण्डागर्दी की गई, उस पर भी पुलिस द्वारा कार्रवाई ना करना यह साबित करता है कि प्रदेश में निष्पक्ष एवं भयमुक्त वातावरण में चुनाव कार्य सम्पन्न नहीं कराया जा रहा है। वहीं कांग्रेसी पार्षद सतनाम पनाग ने बताया कि भाजपाइयों के हमले से उनके कान के पर्दे झनझना गए हैं, तथा पीठ पर भी किसी भारी वस्तु के पड़ने से पीठ लाल हो गई है।

इधर कांग्रेसियों द्वारा कोतवाली घेराव की जानकारी मिलने पर भाजपा के जिलाध्यक्ष अशोक पाण्डेय, भाजयुमो अध्यक्ष संजू नारायण सिंह, हज कमेटी अध्यक्ष सलीम राज भी भाजपा के कार्यकर्ताओं के साथ कोतवाली पहुंच गए और कांग्रेस के कार्यकर्ताओं पर आरोप लगाया कि महापौर की अशोभनीय शब्दावली के कारण उक्त स्थिति निर्मित हुई है। कार्यक्रम के दौरान जो घटना घटी उसके लिए भाजपाई जिम्मेदार नहीं हैं, बल्कि महापौर ने कांग्रेसियों को इशारा किया कि और उन्होंने ही भाजपा कार्यकर्ता पर कुर्सियां फेंककर मारना शुरू कर दिया। इस हमले में मंत्री बृजमोहन अग्रवाल और भाजपा कार्यकर्ताओं को भी चोटें आई हैं। हम पुलिस से मांग करते हैं कि वह महापौर को तत्काल गिरफ्तार करे।

इस घटना के बाद शहर भर के कांग्रेसी भाजपा उम्मीदवार बृजमोहन अग्रवाल एवं उनके समर्थकों पर कार्रवाई की मांग को लेकर कोतवाली पहुंचे। उन्होंने कोतवाली टीआई को दोषियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर कार्रवाई की मांग की, अपनी लिखित शिकायत भी दी, परंतु पुलिस द्वारा कार्रवाई न करने पर कांग्रेसी कार्यकर्ता भड़क उठे और पुलिस प्रशासन पर यह आरोप लगाया कि वह मंत्री के दबाव चलते कार्रवाई नहीं कर रही है। महापौर ने कहा कि अभी प्रदेश में आदर्श आचार संहिता लागू है और जिला प्रशासन एवं पुलिस प्रशासन के लोग अब भी वर्तमान सरकार के दबाव में कार्य कर  रहे हैं, जो कि आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन है।

हमारी भारत निर्वाचन आयोग से मांग है कि वह मामले में संज्ञान लेवे और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई के निर्देश देवें.. कोतवाली घेराव करने पहुंचे कांग्रेसी भाजपाइयों के हमले से तिलमिलाए हुए थे, उस पर पुलिस की निष्क्रियता ने उनके गुस्से को और भड़का दिया। बार-बार आग्रह करने के बावजूद पुलिस द्वारा एफआईआर नहीं लिखे जाने के कारण कांग्रेसी बेकाबू हो गए और कोतवाली के सामने हंगामा मचाने लगे। इस दौरान कुछ कांग्रेसियों ने पुलिस पर पथराव कर दिया। जिसके बाद पुलिस ने कांग्रेसियों को खदेड़ने के लिए लाठिया लहराई और दो-चार कांग्रेसी इसकी जद में आ गए और उनकी पीठ लाल हो गई।

दीवाली सिर पर और महुआ अपने कर्मियों की तीन माह की तनख्वाह रोके है, इसलिए हड़ताल करना सही

शंभूनाथ शुक्ल : कितना अजीब लगता है कि दीवाली सिर पर हो और एक चैनल महुआ अपने कर्मचारियों की तीन महीने की तनखा रोके हो। ऐसे में अगर वहां के कर्मचारियों ने सामूहिक रूप से हड़ताल का फैसला लिया तो गलत क्या है। एक चैनल जिसके कार्यक्रम सफल रहे हों अपने कर्मचारियों की वजह से इस ऊँचाई पर पहुंचा और फिर उन्हीं की तनखा डकार गया। जितनी भी निंदा की जाए कम है।

साथी Yashwant Singh बधाई के पात्र हैं कि उनकी लड़ाई को सामने ही नहीं लाए वरन् उसका नेतृत्व भी संभाले हैं। उनके यहां प्रकाशित खबर देखें… "बड़ी खबर है कि महुआ न्यूज में सभी कर्मचारी तनख्वाह ना मिलने के कारण हड़ताल पर चले गये हैं, जिसकी वजह से महुआ में काम ठप्प पड़ गया है.

महुआ में काम कर रहे सभी कर्मचारियों को पिछले तीन महीने से वेतन नहीं दिया जा रहा था. ये कर्मचारी पिछले कई दिनों से महुआ प्रबन्धन से वेतन दिये जाने की मांग कर रहे थे, लेकिन प्रबन्धन के द्वारा वेतन नहीं दिये जाने के कारण आज मजबूर होकर महुआ के सभी कर्मचारियों ने हड़ताल पर जाने का फैसला कर लिया".

वरिष्ठ पत्रकार और कई अखबारों के संपादक रहे शंभूनाथ शुक्ला के फेसबुक वॉल से.


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महुआ आफिस कब्जा

महुआ आफिस पर कब्जा, काम बंद और बेमियादी हड़ताल की खबरें किसी अखबार-चैनल में नहीं आई

शिवानन्द द्विवेदी 'सहर' : महुआ में क्रांति शुरू हो गई है… यहाँ कर्मचारी सैलरी की मांग को लेकर काम ठप कर धरने पर बैठ गए हैं। प्रबंधन से जवाब देते नहीं बन रहा। यह बड़ा सवाल है कि आखिर दुनिया जहान की खबरें एक्सक्लूसिव बनाकर ब्रेक करने वाले न्यूज चैनल मैनेजमेंट अपनी अंदरूनी करतूतों पर चुप क्यों रहते हैं। अभी तक मैंने किसी भी अखबार और चैनल पर एक लाइन की कोई स्टोरी नही देखी जो महुआ चैनल के इन कर्मचारियों के लिए लिखी या चलाई गयी हो।

ऐसे ही दौर में भड़ास जैसी वेबसाइट्स की प्रासंगिकता बढ़ जाती है। अभी अभी मीडिया वालों के शोषण के खिलाफ आवाज उठाने वाले भाई Yashwant Singh के द्वारा पता चला कि वेतन आदि को लेकर धरने पर अड़े महुआ न्यूज कर्मियों के समर्थन में कल बारह बजे विरोध प्रदर्शन है, नोएडा स्थित फिल्म सिटी में महुआ न्यूज के आफिस के सामने। तमाम सरोकारी मित्रों से अपेक्षा है कि वो इस विरोध प्रदर्शन का हिस्सा बनकर महुआ के इस शोषण नीति के खिलाफ आवाज को बुलंद करें।

युवा पत्रकार शिवानन्द द्विवेदी 'सहर' के फेसबुक वॉल से.


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महुआ आफिस कब्जा

महुआ आफिस पर कब्जा जमा चुके मीडिया वाले साथियों के समर्थन में कल और साथी वहां पहुंच रहे

Samar Anarya : कुछ तो बदल रहा है दोस्तों.. एक वो दिन थे जब हिंदुस्तान टाइम्स से निकाल दिए गए सैकड़ों मीडियाकर्मियों की सालों चलने वाली लड़ाई को वामपंथी संगठनों से अलग कोई मदद नहीं मिलती थी और एक ये है कि महुआ न्यूज़ के साथियों ने तीन महीने बिना वेतन काम करने को मजबूर किये जाने के बाद ऑफिस पर कब्ज़ा ही नहीं कर लिया बल्कि और साथी उनकी मदद के लिए पंहुचने को हैं!

पहुंचिये कल दोपहर 12 बजे.. नोएडा फिल्म सिटी में स्थित महुआ न्यूज के आफिस के सामने… आंदोलनकारी और हड़ताली मीडियाकर्मियों के सपोर्ट में… सीएनएन-आईबीएन के बाद शुरू हुई यह नई रवायत बदलाव का बड़ा बायस बन भी सकती है.. शुक्रिया Yashwant भाई.. वहां पंहुचने का भी, हम सब को बताने का भी..

अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारवादी अविनाश पांडेय 'समर' के फेसबुक वॉल से.


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महुआ आफिस कब्जा

महुआ के मालिकों ने पहले बैंकों का पैसा खाया, अब अपने कर्मियों का पैसा हड़पने में जुटे

Sanjaya Kumar Singh : मीडिया क्षेत्र की एक बड़ी खबर। वेतन ना मिलने से नाराज कर्मचारियों ने हड़ताल कर दी है। मजदूर हड़ताल तो करते रहते हैं, महुआ न्यूज के कर्मचारियों की हड़ताल की खासियत यह है कि वे धरना देकर ऑफिस में ही बैठ गए हैं और देर रात तक जमे रहे। उनका कहना है कि बकाया वेतन मिलने तक वे ना घर जाएंगे ना काम करेंगे (यानी चैनल नहीं चलने देंगे)। इससे नोएडा के फिल्म सिटी में गहमा-गहमी का माहौल है।

पता चला है कि कर्मचारियों का तीन महीने का वेतन बकाया हो गया है। इससे पहले अरबों रुपए के अपने कर्ज की वसूली के लिए बैंक वाले महुआ न्यूज के ऑफिस में छापे जैसी कार्रवाई कर चुके हैं। पंजाब नेशनल बैंक महुआ न्यूज और इसके कर्ताधर्ता तथा स्वामी कंपनी से कोई डील न करने की चेतावनी अखबार में छपवा चुका है। बैंक की तरफ से एक राष्ट्रीय अखबार में विज्ञापन अगस्त में प्रकाशित कराया गया था। इसके मुताबिक महुआ वालों ने 109 करोड़ रुपए का कर्ज लिया है जिसकी वसूली नहीं हो रही है।

ऐसे में बैंक इस कर्ज के गारंटरों की निजी संपत्ति के सौदे न करने की चेतावनी आम जनता को जारी कर चुका है। कर्मचारियों की तनख्वाह नहीं देने वाला महुआ समूह कई बैंकों के पैसे नहीं लौटा रहा है। ऐसे में यहां आगे क्या होता है देखना दिलचस्प रहेगा। मूल कंपनी – सेंचुरी कम्युनिकेशन लिमिटेड ने देश का पहला भोजपुरी समाचार एवं मनोरंजन चैनल लांच किया था।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.


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महुआ आफिस कब्जा

महुआ की मालकिन पहुंची आफिस, हड़ताली कर्मचारियों से झूठ बोला

महुआ न्यूज के आफिस पर कब्जा कर चुके सवा सौ हड़ताली कर्मचारियों के बीच आज सबुह महुआ के मालिक पीके तिवारी की पत्नी मीना तिवारी यानि महुआ की मालकिन पहुंचीं और रणनीतिक तौर पर कुछ ऐसे बयान दिए जिससे कर्मचारियों का मनोबल टूट जाए. उन्होंने हाथ जोड़कर हड़ताली कर्मचारियों से कहा कि वे लोग संकट में हैं और अगले तीन महीने तक कोई सेलरी नहीं दे पाएंगे. इसलिए हड़ताली कर्मचारियों को जो करना है करें, वे यहां से जा रही हैं और उनकी कोई भी मांग मान पाने में असमर्थ हैं.

सूत्रों का कहना है कि हजारों करोड़ रुपये की बैंकों से ठगी करने वाले महुआ के मालिक पीके तिवारी और उनकी पत्नी मीना तिवारी और इनके परिजनों के नाम सैकड़ों करोड़ की अघोषित संपत्ति है. महुआ एंटरटेनमेंट चैनल पर करोड़ों रुपये का रियल्टी शो प्रसारित किया जा रहा है और इसकी शूटिंग भी महुआ आफिस के आधे हिस्से में बने स्टूडियो में कल से की जा रही है. इसमें करोड़ों रुपये देकर रवि किशन, कल्पना, मालिनी अवस्थी जैसे कलाकारों को जज के रूप में बिठाया गया है. इन्हें देने के लिए पैसे हैं, महंगी गाड़ियों पर चलने के लिए पैसे हैं, दूसरी अय्याशियों के लिए पैसे हैं, दुनिया भर में फैले सेंचुरी ग्रुप के आफिसों के लिए पैसे हैं लेकिन सवा सौ कर्मचारियों को देने के लिए पैसे नहीं हैं. मालकिन की इस धूर्तता पर हड़ताल कर रहे कर्मचारियों ने शेम शेम कहा है.

सूत्रों का कहना है कि कर्मचारियों से निपटने का मोर्चा संभाल रहीं मीना तिवारी की पूरी कोशिश है कि पहले कर्मचारियों को हताश-निराश करो फिर समझौते लिए इतना नीचे गिरा दो कि वे सिर्फ महीने भर की सेलरी लेकर आफिस छोड़ने के लिए राजी हो जाएं या फिर पोस्ट डेटेड चेक (जो कि अंततः बाउंस हो जाते हैं, जैसा कि कई चैनलों का पुराना इतिहास बताता है) लेकर आफिस छोड़कर चले जाएं. पर हड़ताली कर्मचारियों ने कह दिया है कि वे न तो एक महीने की सेलरी पर मानेंगे और न ही पीडीसी (पोस्ट डेटेड चेक) लेकर घर जाने वाले. उन्हें पूरे तीन महीने की बकाया सेलरी और अगले दो महीने की एडवांस सेलरी चाहिए, तभी आफिस छोड़ेंगे वरना आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए बाहर के मीडिया संगठनों को बुलाएंगे और महुआ न्यूज के आफिस के बाकी आधे हिस्से में चल रहे महुआ एंटरटेनमेंट के कामकाज को भी ठप कराकर यहां झंडा बैनर लगवाकर परमानेंट आंदोलन शुरू कर देंगे.


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महुआ आफिस कब्जा

डरपोक, काइंया, अवसरवादी, दलाल, चंपादक किस्म के प्राणी न तो इसे पढ़ें और न ही मौके पर आएं…

Yashwant Singh :  कल बारह बजे महुआ के आफिस को घेर लो… नोएडा फिल्म सिटी स्थित महुआ न्यूज के आफिस पर सवा सौ कर्मचारियों ने कब्जा कर रखा है, तीन महीने से सेलरी न मिलने के विरोध में… दीवाली काली होने से बचाने के लिए आंदोलन रत इन साथियों के समर्थन में हमको आपको मौके पर पहुंचना चाहिए ताकि हम आप बता सकें हमारा आपका उनको दिया गया समर्थन सिर्फ फेसबुकी नहीं बल्कि जमीनी है.

इसलिए फेसबुक पर यह स्टेटस पढ़ने वाले कम से कम पचास साथियों से चाहूंगा कि वो कल नोएडा फिल्म सिटी में महुआ न्यूज के आफिस के सामने दिन में बारह बजे जरूर पहुंचें और पहुंचने की गारंटी देने के लिए नीचे कमेंट करें या मुझे मैसेज करें… ये ऐतिहासिक मौका है.. मीडिया के मालिकों की मनमानी पर अंकुश लगाकर आम मीडियाकर्मियों की ताकत को दिखाने के लिए… ताकि फिर कोई चैनल, फिर कोई अखबार अपने लोगों की सेलरी न रोके…. कृपया इसे शेयर करें और आगे बढ़ाएं… खुद आने की गारंटी करें और अपने परिचित एक-दो लोगों को साथ लाने की जरूर कोशिश करें…

बाकी डिटेल इस लिंक में है…
http://www.bhadas4media.com/print/15529-2013-10-31-08-03-49.html

((नोट– कृपया डरपोक, काइंया, अवसरवादी, दलाल, चंपादक किस्म के प्राणी न तो इसे पढ़ें और न ही मौके पर आएं… सिर्फ वो आएं जिनकी रीढ़ सीधी है और जिनमें सच बोलने का न सिर्फ साहस है बल्कि सच के लिए लड़ रहे लोगों को मौके पर जाकर समर्थन देने का जज्बा है. आप की विचारधारा कोई भी हो सकती है. अन्याय के खिलाफ लड़ रहे लोगों को समर्थन देना किसी विचारधारा का मोहताज नहीं है. इसलिए सवा सौ हड़ताली मीडियाकर्मियों के सपोर्ट में जरूर कल बारह बजे नोएडा फिल्म सिटी में स्थित महुआ न्यूज के आफिस के सामने पहुंचें… आप सभी का इंतजार रहेगा… ध्यान रखें, करो या मरो की लड़ाई लड़ रहे महुआ के साथियों के समर्थन में कल नहीं पहुंचे तो फिर आपके दुखों की लड़ाई लड़ने कौन पहुंचेगा… इसलिए खुद आएं, और अपने साथ एक-दो अन्य साथियों को ले आएं…))

भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.


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महुआ आफिस कब्जा

रोहतक में पुलिस ने मीडिया पर बरसाई लाठियां, चार पत्रकार घायल

सचिन तेंदुलकर के खेल को कवर कर रहे हरियाणा के पत्रकारों पर मंगलवार को पुलिस ने लाठियां बरसाईं। चार पत्रकार को तो पुलिस ने बुरी तरह लाठियों से पीटा। हरियाणा के रोहतक में चल रहे रणजी ट्राफी मैच में तीन दिन से क्रिकेट के भगवान कहे जाने वाले सचिन तेंदुलकर अपने बल्ले का जलवा दिखा रहे थे। इस दौरान सचिन के दर्शन पाने के लिए उनके चाहने वालों को पुलिस की लाठियां खानी पड़ी। भीड़ नियंत्रित करने के नाम पर पुलिस ने सचिन के चाहने वालों से उठक बैठक तक कराई।

ये सब चीजें भास्कर हरियाणा के फोटोग्राफर संजय झा ने अपने कैमरे में कैद की और संजय ने अपनी तस्‍वीरों से यहां तक एक्सपोज किया कि खुद पुलिस कप्तान लोगों पर लाठियां बजाते नजर आए। ये सब भास्कर में छपा तो बात दूर तक गई और पुलिस खुन्नस खाए बैठी थी। बुधवार को संजय के साथी दो पत्रकार व एक फोटोग्राफर ने आज अपने कैमरे में एक नया घपला कैद किया कि कैसे पुलिस वाले अपने लोगों को तो बिना किसी पहचान पत्र के यहां रोहतक के स्टेडियम में एंट्री दिला रहे थे।

बस ये देखते ही पुलिस बौखला गई और पत्रकारों पर धावा बोल दिया। यूं तो छुट पुट कई पत्रकारों को चोटें लगीं। इनमें हरिभूमि के रोहतक संवाददाताए अनिल चहल, न्यूज एक्सप्रेस के गुडगांव संवाददाता मनू महता व एमएच वन सुदर्शन व ए वन तहलका हरियाणा अशोक राठी को बुरी तरह से टारगेट बनाया गया। पुलिस बिना कुछ देखे लाठियां बरसानी शुरू कर दी। एक अन्य फोटाग्राफर के मुंह पर पुलिस ने खूब घूंसे बरसाए। दुख की बात ये है कि हरियाणा के मुख्‍यमंत्री भूपेंद्र हुड्डा के शहर में यह शर्मनाक वाकया हुआ। सीएम ने देर शाम तक न तो घटना पर कोई टिप्पणी की और न ही कोई सख्‍त एक्शन की। मात्र एक सिपाही को बलि का बकरा बनाकर पत्रकारों के आंसू पोंछने की कोशिश की।

टीवी पत्रकार से अभद्रता करने के आरोपी उप निरीक्षक समेत तीन पुलिसकर्मी निलंबित

लखनऊ। राजधानी के चौक थाना क्षेत्र में इंडिया टीवी के पत्रकार मोहसिन हैदर से अभद्रता के आरोपी पुलिस उप निरीक्षक व दो सिपाहियों को निलंबित कर दिया गया है। उत्तर प्रदेश राज्य मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति की आज एनेक्सी मीडिया सेंटर में इस मामले को लेकर बुलायी गयी बैठक में प्रदेश के गृह सचिव देवी शंकर शर्मा ने इस बात की जानकारी दी। समिति ने गृह सचिव को घटना की जानकारी देते हुए आरोपी पुलिस वालों को निलंबित कर उनकी गिरफ्तारी की मांग की थी।

गृह सचिव ने मीडिया सेंटर पहुंच का समिति के अध्यक्ष हेमंत तिवारी, सचिव सिद्धार्थ कलहंस, कार्यकारिणी सदस्य श्रीधर अग्निहोत्री, जितेश अवस्थी, नायला किदवाई, वरिष्ठ पत्रकार प्रदुम्न तिवारी, विजय शंकर पंकज, गोलेश स्वामी व दर्जनों पत्रकारों को उक्त मामले में अब तक हुयी कारवाई से अवगत कराया। गृह सचिव ने कहा कि आरोपी पुलिस कर्मियों के खिलाफ कठोर कारवाई की जाएगी। समिति के प्रतिनिधिमंडल को पत्रकारों की सुरक्षा के बारे में आशवस्त करते हुए उन्होंने कहा कि इस मामले में सभी जरुरी कदम उठाए जाएंगे।

गौरतलब है कि मंगलवार की रात को इंडिया टीवी के संवाददाता के साथ पुलिस कर्मियों ने चौक थाना क्षेत्र में अभद्रता की थी। मौके पर पहुंचे मीडिया कर्मियों ने इस मामले की एफआईआर चौक कोतवाली में दर्ज करवायी थी।

और विलियम दादा भूत बन गए

यह कहानी ट्रेन यात्रा के दौरान मिले एक व्यक्ति ने मुझे सुनाई, जो लंदन से भारत आए थे. उनके पास एक पुरानी डायरी थी जिसमें गहरी काली स्याही से परिवार के बुजुर्गों के नाम लिखे हुए थे. वे काफी बूढ़े हो चुके थे, इसलिए अपने साथ हमेशा एक छड़ी रखते. उन्होंने एक गोल हैट पहना हुआ था, जो शायद उन्हीं के लिए बना था. पहली ही नजर में वे बेहद दिलचस्प अंकल लगे. वे मुझे अपना नाम बताना भूल गए, इसलिए आज भी मैं उन्हें अंकल हैट ही कहता हूं. वे खिड़की के पास वाली सीट पर बैठकर सिगार पी रहे थे. बातचीत में उन्होंने बताया कि उनका भारत आना बहुत जरूरी था. वे गर्मियों की छुट्टियां भारत में ही बिताना चाहते थे, लेकिन अत्यधिक बेसब्री की वजह से उन्हें जनवरी की कड़क ठंड में ही आना पड़ा. अंकल हैट के साथ उनकी पोती थी, जो सफेद कोट में किसी परी की तरह लग रही थी. मैंने उसे कहानियों की एक किताब, धागे से चलने वाली फिरकी और सेब काटने का छोटा चाकू दे दिया.
 
अंकल हैट ने मुझे बताया कि रिश्ते में उनके एक परदादा की कब्र भारत में ही है. वे 1859 की किसी तारीख को ब्रिटेन से भारत पहुंचे थे. वे बेहद भले आदमी थे लेकिन बाद में भूत बन गए और कई बार मेरी पोती तान्या को सपने में दिख चुके हैं. उन्हें इस बात की शिकायत है कि अब कोई उनकी कब्र पर गुलाब नहीं चढ़ाता. हालांकि वे बहुत अच्छे भूत थे.
 
क्या भूत अच्छे भी होते हैं? मैंने पूछा. उन्होंने कहा, बिल्कुल. कुछ भूत बहुत अच्छे होते हैं और मेरे परदादा उन्हीं में से एक हैं. एक घटना के बाद उन्हें भूत बनना पड़ा, जो वे बिल्कुल नहीं बनना चाहते थे.
 
इस दौरान अंकल हैट ने सिगार से लंबा कश लिया और खिड़की के बाहर धुआं फेंकते हुए बोले, उनका नाम मि. विलियम था. भारत आने के बाद उन्होंने चाय का व्यापार किया और बहुत पैसे कमाए. उन पैसों से उन्होंने हैट और सिगार की दुकान शुरू की. दोनों चीजों में विलियम को कमाल हासिल था. तब भारत के बड़े-बड़े अफसरों के घरों में उनके सिगार जाते. साहब लोगों की पत्नियां उनके बनाए हैट पहनती थीं. एक दिन उन्होंने ब्रिटेन की महारानी को एक हैट और सिगार डाक से भेजा. कई महीनों बाद उन्हें पत्र मिला कि रानी साहिबा को हैट बहुत पसंद आई और उन्होंने खुश होकर मि. विलियम को तीन गांवों का राजा बनाया है. यह उनके लिए बहुत खुशी का दिन था. राजा बनते ही उन्होंने एक बग्घी खरीदी और रियासत का भ्रमण किया. उन्हीं दिनों उन्होंने विज्ञान में शोध शुरू किया. कठोर परिश्रम और विश्लेषण के बाद वे इस नतीजे पर पहुंचे कि हाथी और सूअर के पूर्वज एक ही थे, क्योंकि बचपन में दोनों की ही शक्ल में काफी समानता होती है. राजा के तौर पर वे बहुत दयालु और खुले दिल के आदमी थे. हालांकि वे कोई बहुत बड़े राजा भी नहीं थे.
 
अंकल हैट ने अपने बॉक्स से कुछ बिस्किट निकालकर मुझे और तान्या को दिए. इसके बाद वे बोले, एक बार आस-पास के सभी राजाओं की मीटिंग हुई. उसमें विलियम को खासतौर से आमंत्रित किया गया. मीटिंग में वे ढेर सारे हैट और सिगार लेकर आए. तब सबसे बड़े राजा ने एक सिगार सुलगाई और पीने लगे. उन्होंने अपने जीवन में पहली बार सिगार पिया था, इसलिए उन्हें हिचकी आने लगी. काफी देर बाद भी हिचकी नहीं रुकी तो राजा साहब ने विलियम की प्रतिभा पर शक किया और उन्हें नौसिखिया बता दिया. यह बात उन्हें सहन नहीं हुई और उन्होंने उसी वक्त बड़े राजा की पिटाई कर दी.
 
इस घटना से बड़े राजा नाराज हुए और उन्होंने एक पत्र में पिटाई का आंखों देखा हाल लिखकर महारानी के पास लंदन भेज दिया. कुछ दिनों बाद विलियम के पास महारानी का पत्र आया. उसमें लिखा था – इस पत्र को पढ़ने वाला मूर्ख विलियम तुरंत राजा के पद से हटाया जाता है. उसकी शानदार बग्घी में अब बड़े राजा बैठेंगे. 
 
विलियम ने राजपाट छोड़ा और अब वे अपनी हैट व सिगार की दुकान चलाने लगे. साथ ही उन्होंने वायलिन बजाने का भी अभ्यास शुरू किया जिसमें उन्हें कामयाबी नहीं मिली. एक दिन एक लड़की दुकान पर हैट खरीदने आई. उसने कुछ सिगार का ऑर्डर भी नोट कराया और सिक्कों में भुगतान किया. एक हफ्ते बाद जब वह आई तो विलियम ने उससे तुरंत कहा कि मैं तुमसे शादी करना चाहता हूं और बहुत जल्द लंदन जाकर हैट का कारोबार करूंगा. लड़की ने कहा कि इसके लिए तुम्हें मेरे पिता से बात करनी होगी. दूसरे दिन विलियम उसके घर पहुंचे. वहां जाकर मालूम हुआ कि उस लड़की के पिता वही राजा साहब थे जिनकी पिछले साल उसने पिटाई की थी. राजा उसे देखते ही छड़ी लेकर पीटने दौड़े. यह मीटिंग सफल नहीं हुई. कुछ दिनों बाद विलियम और उस लड़की ने भागकर शादी कर ली. इससे गुस्साए राजा बंदूक लेकर उसकी तलाश करने लगे. जब वे नहीं मिले तो राजा ने एक मशाल जलाई और उनकी दुकान नष्ट कर दी. राजा के साथ आए सैनिक सभी हैट और सिगार लूट कर ले गए.
 
इस घटना के बाद का इतिहास अज्ञात है. कुछ लोगों का मानना है कि दुकान जला देने के बाद विलियम ने चाय का कारोबार शुरू किया और फिर से धनवान हो गया. वहीं कुछ लोग यह भी कहते हैं कि उसने नाम बदलकर बच्चों को जादू दिखाने का काम शुरू कर दिया था. कई साल बाद वे बहुत धनवान होकर मरे और उन्हें भारत के ही एक कब्रिस्तान में दफनाया गया. हर साल विभिन्न अवसरों पर उनकी कब्र पर गुलाब का फूल चढ़ाया जाता था. साल 1947 के बाद सभी अंग्रेज ब्रिटेन लौट गए, इसलिए यह सिलसिला टूट गया. इसके बाद दादा विलियम भूत बन गए और वे तान्या के सपने में आने लगे. कई लोग बताते हैं कि वे आज भी रात को हैट पहनकर घूमते हैं. अंकल हैट ने कहा, इसलिए मैंने तय कि अब से मैं भी हैट पहनना शुरू करूंगा, ताकि दादा विलियम की आत्मा को शांति मिल जाए.
 
ट्रेन पूरी रफ्तार से दौड़ रही थी और अंकल हैट अपनी डायरी से मुझे वे फोटोग्राफ दिखाने लगे जिनका सम्बंध विलियम से था. मैं नहीं जानता कि भूत होते हैं या नहीं, लेकिन अंकल हैट और तान्या का मानना है कि विलियम दादा भूत बन गए. इस घटना को कई साल बीत गए हैं. विलियम अभी हैट लगाकर अपनी टूटी दुकान में दिखाई देते हैं या स्वर्ग चले गए, यह पूरे भरोसे के साथ कोई नहीं कह सकता. आज भी जब मैं ट्रेन में बैठता हूं तो खिड़की वाली सीट पर अंकल हैट को ढूंढ़ता हूं. शायद उन्हें विलियम दादा का सही पता मालूम हो.
 
राजीव शर्मा
संचालक – गांव का गुरुकुल

राजकोष से मुआवजा देकर चिटफंड कारोबार का अपराध धुलेगा?

मां माटी मानुष की सरकार राजकोष से आम टैक्स पेयर जनता के पैसे का वारा न्यारा करके चिटपंड के शिकार लोगों का जुबान बंद रखने को मुआवजा बांटकर दागी मंत्रियों, सांसदों, विधायकों और नेताओं का पाप धोने में लगी है. रोज एक के बाद एक सनसनीखेज खुलासा हो रहा है, लेकिन न जांच हो रही है और न रिकवरी.
 
प्रवर्तन निदेशालय की जिरह का सामना करने के बाद तृणमूल के निलंबित सांसद ने अब शारदा चिटफंड मामले में सीधे तौर पर पश्चिम बंगाल के बहुचर्चित परिवहनमंत्री मदन मित्र पर आरोपों की बौछार कर दी है. कुणाल के मुताबिक विष्णुपुर से शारदा कर्णदार सुदीप्तो सेन के उत्थान की कथा मदन मित्र को ही मालूम है. इसी सिलसिले में शारदा प्रतिदिन समझौते के सिलसिले में कुणाल ने प्रतिदिन के संपादक और तृणमूल सांसद सृंजय बोस को भी लपेटा है। इसके साथ ही लास वेगास में शारदा के कार्यक्रम के प्रसंग में उन्होंने आईपीएस अफसर रजत मजुमदार का नामोल्लेख भी कर दिया. गौरतलब है कि मदन मित्र 2009 में विष्णुपुर से विधायक चुने गये थे. प्रवर्तन निदेशालय की जिरह में कुणाल ने सुदीप्तो के उत्थान के साथ विष्णुपुर से मदनबाबू के अवतार का टांका जोड़ दिया है जबकि परिवहन मंत्री का कहना है कि अगर वे दोषी होते तो निदेशालय कुणाल से नहीं उन्हीं से पूछताछ कर रहा होता. इसके जवाब में कुणाल का दावा है कि अगर मंत्री मदन मित्र, सांसद सृंजय बोस और आईपीएस अफसर रजत मजुमदार से जिरह की जाये तो शारदा फर्जीवाड़ा के सारे राज खुल जायेंगे.
 
 
शारदा फर्जीवाड़े में दागी मंत्रियों, सांसदों, विधायकों और नेताओं की लंबी सूची है. आरोप है कि शारदा का पैसा ठिकाने लगाने के लिए सांसद और पूर्व रेलमंत्री मुकुल राय व कुणाल घोष के साथ बैठक के बाद ही सीबीआई को पत्र लिखकर अपनी खासमखास देबजानी के साथ सुदीप्त काठमांडू पहुंच गये और उन्हीं के इशारे पर लौटकर कश्मीर में जोड़ी में पकड़े गये. तब से संगी साथियों के साथ सुदीप्तो और देबजानी सरकारी मेहमान हैं. जिस सीबीआई को खत लिखने से इस प्रकरण का खुलासा हुआ, मजे की बात है कि चिटपंड फर्जीवाड़े की जांच में उसकी कोई भूमिका ही नहीं है. चिटपंड कारोबार में अपना चेहरा काला होने की वजह से सत्ता से बेदखल वामपंथी विपक्षी नेता भी इस मामले में ऊंची आवाज में कुछ भी कहने में असमर्थ हैं.
 
नतीजतन इस मामला से पीछा छुड़ाने के लिए मां माटी मानुष की सरकार राजकोष से आम टैक्स पेयर जनता के पैसे का वारा न्यारा करके चिटपंड के शिकार लोगों का जुबान बंद रखने को मुआवजा बांटकर दागी मंत्रियों, सांसदों, विधायकों और नेताओं का पाप धोने में लगी है. रोज एक के बाद एक सनसनीखेज खुलासा हो रहा है लेकिन न जांच हो रही है और न रिकवरी.
 
तृणमूल कांग्रेस से निलंबित किए जा चुके घोष ने बार बार दावा किया कि उन्हें चिटफंड घोटाले के बारे में कोई जानकारी नहीं थी. लेकिन वे बार बार सबकुछ खुलासा कर देने की धमकी भी साथ साथ दे रहे हैं. केंद्र और राज्य सरकार की ओर से शारदा फर्जीवाड़े मामले के भंडापोड़ के बाद नया कानून बनाकर चिटफंड कारोबार रोकने की कवायद भी बंद हो गयी है. बहरहाल सेबी को पोंजी कारोबार रोकने के लिए संपत्ति जब्त करने और गिरफ्तारी के पुलिसिया अधिकार जरुर दिये गये. सेबी रोजवैली और एमपीएस जैसी कंपनियों को नोटिस जारी करके निवेशकों के पैसे लौटाने के लिए बार बार कह रही है. इस बीच एमपीएस के पचास से ज्यादा खाते भी सेबी ने सील कर दिये लेकिन शारदा समूह समेत किसी भी चिटफंड कंपनी से न कोई रिकवरी संभव हुई है और न निवेशकों को किसी कंपनी ने पैसे लौटाये हैं. शिकंजे में फंसी पोंजी स्कीम चलाने वाली कंपनियों के कारोबार पर थोड़ा असर जरुर हुआ है लेकिन बाकी सैकड़ों कंपनियों का कारोबार बेरोकटोक चल रहा है. सीबीआई जांच नहीं हो रही है. अब जरुर केंद्र की ओर से प्रवर्तन निदेशालय और कारपोरेट मंत्रालय के गंभीर धोखाधड़ी अपराध जांच आफिस भी जांच में लग गये हैं लेकिन रोजाना सनसनीखेज राजनीतिक खुलासे के अलावा कुछ हो नहीं रहा है.
 
अकेले शारदा ग्रुप से जुड़े पश्चिम बंगाल के कथित चिटफंड घोटाले के 2,460 करोड़ रुपये तक का होने का अनुमान है. ताजा जांच रिपोर्ट में यह भी खुलासा हुआ है कि 80 प्रतिशत जमाकर्ताओं के पैसे का भुगतान किया जाना बाकी है. रिपोर्ट कहती है कि गिरफ्तार किए गए शारदा के चेयरमैन सुदीप्त सेन का उनके ग्रुप की सभी कंपनियों की सभी जमा रकम पर पूरा कंट्रोल था. सेन पर आरोप है कि उन्होंने कथित फ्रॉड करके फंड का गलत इस्तेमाल किया. पश्चिम बंगाल पुलिस और ईडी की इस संयुक्त जांच रिपोर्ट के मुताबिक 2008 से 2012 की ग्रुप की समरी रिपोर्ट से खुलासा हुआ है कि ग्रुप की चार कंपनियों ने अपनी पालिसियां जारी करके 2459 करोड़ रुपये को ठिकाने लगाया है. इन्वेस्टर्स को 476.57 करोड़ रुपये का भुगतान हुआ. 16 अप्रैल 2013 तक निवेशकों को 1983.02 करोड़ रुपये का प्रिंसिपल अमाउंट दिया जाना बाकी था. निवेशकों की ओर से अब तक 560 शिकायतें दाखिल की गई हैं. इस घोटाले का खुलासा इस साल की शुरुआत में हुआ था.
 
उलटे हुआ यह कि शारदा फर्जीवाड़ा के भंडापोड़ के बाद तमाम दूसरी कंपनियों का पोंजी चेन गड़बड़ा जाने से निवेशकों का पैसा फंस गया है. नॉन बैंकिंग कम्पनी यानि चिटफंड कम्पनी के खिलाफ कसे गये शिकंजे से एक ओर जहां लाखों लोगों की गाढ़ी खून पसीने की कमाई डूब गई, कम्पनी मालिक और संचालक रातों रात या तो फरार हो गये या फिर कम्पनी में तालाबंदी कर भूमिगत हो गये. लोगों के करोड़ों रूपये डूबे और इन रूपये के डूबने से हजारों  छोटे परिवारों के लोगों की जमा पूंजी हमेशा के लिए चली गई, वहीं चिटफंड या नान बैंकिंग कम्पनी में तो ताला लग जाने से कम्पनी के मालिक और संचालक को फायदा ही हुआ, लेकिन कम्पनी के रोजगार में लगे वेतन भोगी कर्मचारी सीधे सडक पर आ गये. सनप्लांट, प्रयाग ग्रुप, एक्टिव इंडिया, शारदा ग्रुप जैसे कम्पनी का कर्मचारी होना तो गौरव और सम्मान की बात थी लेकिन अचानक से ताला लगने के बाद ये लोग सडक पर आ गये हैं. जेनरेटर वाला, चाय वाला, और कम्पनी में उधार देनेवाला दुकानदार जैसे फर्नीचर दुकानदार, कम्प्यूटर दुकानदार इत्यादि को भी नुकसान हुआ है. अचानक बंद हुए कम्पनी और चिटफंड के कारण उनका बकाया मिल नहीं सका और अब इस बकाया राशि की वसूली के उपाय नहीं हैं क्योंकि कम्पनी में तालाबंदी है और संचालक या मालिक फरार है. इस परिस्थिति से लोगों को राहत देने में सरकारी मुआवजा कितना और किस हद तक दिया जा सकेगा, यह यक्ष प्रश्न अभी अनुत्तरित है.
 
 
इस बीच तृणमूल कांग्रेस के निलंबित सांसद कुणाल घोष के बाद सीरियस फ्रॉड इंवेस्टिगेशन ऑफिस (एसएफआइओ) ने तृणमूल कांग्रेस के एक अन्य सांसद सृंजय बोस से पूछताछ की. एसएफआइओ ने लगभग दो घंटे तक बोस से पूछताछ की है. बोस से दिल्ली स्थित एसएफआइओ के कार्यालय में पूछताछ की गयी है लेकिन मुकुल राय, शताब्दी राय, मदन मित्र जैसे अभियुक्तों से अभी कोई पूछताछ नहीं हो सकी है. लगभग दो घंटे तक सृंजय से पूछताछ की गयी. सूत्रों के अनुसार, शारदा कांड से संबंधित मामले में उनसे पूछताछ की गयी. पूछताछ के बाद संवाददाताओं के सवाल के जवाब में उन्होंने बताया कि शारदा के साथ उनके व्यावसायिक संबंध थे. उससे संबंधित कुछ दस्तावेज उन्होंने एसएफआइओ के अधिकारियों को सौंपे हैं. इसके पहले गुरुवार को तृणमूल के निलंबित सांसद कुणाल घोष से लगभग सात घंटे तक पूछताछ की गयी थी. सूत्रों के अनुसार कुणाल व सृंजय ने दस्तावेज जमा किये हैं, उसके आधार पर फिर उन दोनों को पूछताछ के लिए तलब किया जा सकता है.
 
जांच रिपोर्ट के मुताबिक, शारदा ग्रुप की चार कंपनियों का इस्तेमाल तीन स्कीमों के जरिए पैसा इधर-उधर करने में किया गया. ये तीन स्कीम थीं- फिक्स्ड डिपॉजिट, रिकरिंग डिपॉजिट और मंथली इनकम डिपॉजिट. इन स्कीम के जरिए भोले भाले जमाकर्ताओं को लुभाने की कोशिश हुई और उनसे वादा किया गया कि बदले में जो इनसेंटिव मिलेगा वो प्रॉपर्टी या फॉरेन टूर के रूप में होगा।
 
अब तक 10 बार पुलिस की लम्बी जिरह का सामना कर चुके कुणाल ने रविवार को कहा कि शारदा चिट फंड घोटाले की पूरी साजिश ही उन्हें फंसाने के लिए रची गई है. उन्होंने अपनी बात को प्रमाणित करते हुए कहा कि शारदा का कारोबार बहुत बड़ा रहा है, मैं सिर्फ मीडिया इकाई से जुड़ा रहा हूं. इसके बावजूद सभी एजेंसियां घोटाले की जांच के लिए पूछताछ को मुझे ही बुला रही हैं. कुणाल पहले भी कई बार कह चुके हैं कि इस घोटाले में और बड़े लोग भी शामिल हैं, लेकिन उनसे पूछताछ नहीं हो रही है. तृणमूल सुप्रीमों के कोपभाजन हो चुके कुणाल ने तृणमूल के एक नेता पर पैसे मांगने का भी आरोप लगाया है. बावजूद इन सब के साल्टलेक पुलिस कमिश्नरेट सिर्फ उन्हीं को पूछताछ के लिए बुला रहा है. उन्होंने फिर कहा कि पुलिस मुझे जब जब बुलाएगी मैं हाजिर रहूंगा.
 
उल्लेखनीय है कि राज्य पुलिस के अलावा केंद्र का प्रवर्तन निदेशालय और कार्पोरेट मंत्रालय का गंभीर धोखाधड़ी अपराध जांच आफिस भी कुणाल से लम्बी पूछताछ कर चुका है.
 
कुणाल ने आरोप लगाया कि शारदा प्रकरण में उन्हें फंसाने की साजिश का सूत्रपात समूह के मुखिया सुदीप्त सेन की ओर से सीबीआई को लिखे तथाकथित पत्र से हुआ है. उन्होंने आज फिर मांग की कि इस घोटाले की जांच सीबीआई को करनी चाहिए.
 
दूसरी ओर, नया कंपनी कानून लागू करने की दिशा में सरकार ने प्रस्तावित नेशनल फाइनेंशियल रिपोर्टिंग अथारिटी (एनएफआरए) के लिए नियमों का मसौदा जारी कर दिया. एनएफआरए के अलावा, गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय (एसएफआईओ) और कंपनियों द्वारा जमा स्वीकारने के सम्बन्ध में भी नियमों का मसौदा कंपनी कानून, 2013 के तहत जारी किया गया है. देश में कंपनियों को प्रशासित करने वाले छह दशक पुराने कानून की जगह नए कानून के विभिन्न अध्यायों के लिए कंपनी मामलों के मंत्रालय द्वारा जारी नियमों के मसौदे का यह तीसरा सेट है. भागीदार एवं आम जनता नियमों के इन मसौदे पर एक नवंबर तक अपनी राय भेज सकते हैं. नए कंपनी कानून में 29 अध्याय हैं. एनएफआरए के पास लेखा व अंकेक्षण नीतियां तय करने के अधिकार होंगे. साथ ही उसके पास कंपनियों या कंपनियों के वर्ग के लिए मानक तय करने के भी अधिकार होंगे. यह नई इकाई लेखा व अंकेक्षण मानकों का अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए जिम्मेदार होगी. वहीं, नए कानून में एसएफआईओ को और अधिकार दिए गए हैं. वर्तमान में, यह शारदा चिटफंड घोटाले सहित कई बड़े मामले देख रहा है. मंत्रालय को अभी तक निगमित सामाजिक दायित्व खर्च व अंकेक्षण सहित विभिन्न विषयों पर हजारों की संख्या में टिप्पणियां प्राप्त हुई हैं.
 
एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास​ की रिपोर्ट

फिल्म सिटी स्थित महुआ न्यूज के आफिस में घुसे यशवंत, दिया समर्थन

Yashwant Singh :  अभी घर लौटा हूं नोएडा फिल्म सिटी से. करीब सवा सौ मीडियाकर्मियों ने तीन महीने से सेलरी न मिलने से नाराज होकर महुआ न्यूज का आफिस कब्जा लिया है. कामकाज ठप है. न कोई घर जाएगा और न कोई काम करेगा. सबकी एक मांग है. तीन महीने का पुराना बकाया चुकता करो और दो महीने का एडवांस वेतन दो. इतना लेकर सब कर्मी घर चले जाएंगे, ये चैनल सदा के लिए छोड़कर. फिर महुआ का मालिक पीके तिवारी महुआ न्यूज को चलाए या बंद करे, उसकी बला से.

ट्रेजडी ये दिखी कि महुआ के फिल्म सिटी स्थित आफिस के आधे हिस्से में महुआ एंटरटेनमेंट के शो 'सुर संग्राम' की शूटिंग चल रही थी, जहां मालिनी अवस्थी, मनोज तिवारी, रवि किशन आदि बड़े बड़े लोग बैठे कर युवा गायकों के गाने सुनकर वाह वाह कर रहे और लंबी लंबी बातें फेंक रहे… वहीं महुआ के आफिस के बाकी आधे हिस्से में कर्मचारी सेलरी न मिलने से हड़ताल किए हुए बैठे थे, भूखे-प्यासे, ये ठानकर कि अब आरपार होगा…. सच कहते हैं, टीवी में जो रियल्टी शो आदि दिखाए जाते हैं, उनके पीछे की असलियत कुछ अलग ही होती है, जिसे कोई नहीं जान पाता…

मालिनी के पति यूपी के बड़े आईएएस अफसर हैं. उनको चाहिए कि वो इस मामले में हस्तक्षेप करतीं-करातीं और महुआ न्यूज के कर्मियों को उनकी सेलरी दिलाने के लिए दबाव बनवातीं. पर इस सुविधाभोगी दौर में कौन किसी के संकट की परवाह करता है.. सब अपने अपने सुख देखते हैं और अपने अपने सुखों के लिए तमाम समझौते करते हुए विद्रूपों, उलटबांसियों, दुर्भाग्यों, दुखों पर चुप्पी साधे रहते हैं….

जब महुआ न्यूज के आफिस से और फिल्म सिटी के दूसरे न्यूज चैनलों के साथियों की तरफ से फोन आया कि महुआ न्यूज में कर्मचारी हड़ताल पर हैं, तो मैं एक एवार्ड फंक्शन के समारोह के बाद प्रेस क्लब में आयोजित छोटी-सी पार्टी से दौड़ा-दौड़ा फिल्म सिटी की तरफ भागा. भड़ास से जुड़े साथियों ने खबरों के प्रकाशन का मोर्चा अलग से संभाला. फिल्म सिटी पहुंचकर मैं महुआ न्यूज के आफिस के अंदर घुस गया, सिक्योरिटी गार्डों के मना करने और रोकने-टोकने के बावजूद. रिसेप्शन के पास जाकर लोगों से मिला और बात की. उन्हें अपना समर्थन दिया. उसके बाद फिल्म सिटी के कई चैनलों के कर्मियों से मिलकर इस लड़ाई को गोलबंद होकर आगे बढ़ाने का अनुरोध किया ताकि कल कोई चैनल अपने इंप्लाइज की सेलरी रोकने की हिम्मत ना कर सके…

अरे यार, जब सेलरी नहीं दे सकते तो डाक्टर ने कहा है कि चैनल चलाओ… बंद करो अपनी ठगी और गोरखधंधे की दुकान….

भड़ास के संपादक यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.


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महुआ आफिस कब्जा

राजस्थान में मुफ्त गेहूं के नाम पर आदिवासी खर्च कर रहे सौ रूपये

बारां, राजस्थान। आदिवासी बारां जिले की किशनगंज व शाहाबाद तहसील में करीब 20 हजार सहरिया परिवार हैं, जिन्हें प्रति माह प्रति परिवार 35 किलो गेहूं निःशुल्क उपलब्ध कराया जाता है. इन दोनों तहसीलों में सहरियाओं को प्रतिमाह करीब सात हजार क्विंटल गेहूं का वितरण होता है. पूर्व में भूख से हुई मौतों को लेकर इस क्षेत्र के सुर्खियों में आने के बाद सरकार की ओर से इन्हें निःशुल्क गेहूं उपलब्ध कराना शुरू किया गया था. कहा गया कि इस योजना को प्रारंभ किए जाने से सहरिया परिवारों को भरपेट भोजन उपलब्ध हो सकेगा. हकीकत कुछ और ही बयां करती है. निःशुल्क गेहूं को प्राप्त करने के लिए सहरियाओं को काफी मशक्कत करनी पड़ रही है. इस गेहूं के लिए भी इन्हें ताकना पड़ रहा है. क्षेत्र के कई गांवों में गेहूं लेने भी पैदल जाना पड़ता है. 35 किलो निःशुल्क गेहूं को प्राप्त करने के लिए लगभग सौ रुपए खर्च करने पड़ रहे हैं.
 
शाहाबाद तहसील के चोराखाड़ी गांव के केदार सहरिया ने बताया कि 35 किलो निःशुल्क गेहूं बीलखेड़ा पंचायत मुख्यालय जाकर लाना पड़ता है. चोराखाड़ी से बीलखेड़ा की दूरी 5 किलोमीटर है. यह दूरी पैदल ही चलकर पूरी करते हैं. गेहूं को पिसाने चोराखाड़ी से देवरी जाते है. देवरी जाने का करीब 40 रुपए किराया लगता है. 20 रुपए गेहूं के कट्टे के लग जाते हैं तो 35 रुपए पिसाई के. इस तरह 35 किलो गेहूं को प्राप्त करने में लगभग 100 रुपए खर्च हो जाते हैं. सूंडा गांव के सहरियाओं ने बताया कि उन्हें 35 किलो गेहूं लेने 5 किलोमीटर दूर खंडेला जाना पड़ता है. साइकिल या फिर किराए से ट्रैक्टर ट्रॉली करके लेकर जाते हैं. गेहूं पिसाई के लिए 2 किलोमीटर दूर गणेशपुरा गांव जाते हैं. हरिनगर से बीलखेड़ा डांग करीब 15 किलोमीटर दूर है. हरिनगर के सहरियाओं को ट्रैक्टर किराए पर करके बीलखेड़ा से निःशुल्क गेहूं लेकर आना पड़ता है. बीलखेड़ा दूर होने से गेहूं पिसाई के लिए मध्यप्रदेश के गलथूनी गांव जाते हैं. हरीनगर से यह गांव 6 किलोमीटर दूर ही है. सांधरी गांव में 110 सहरिया परिवार निवास करते हैं. हर महीने मिलने वाले निःशुल्क गेहूं को पिसाने के लिए 18 किलोमीटर दूर देवरी गांव जाते हैं. देवरी आने जाने में 30 रुपए प्रति सवारी किराया लगता है. किराए के रूप में 30 रुपए गेहूं के कट्टे के और पिसाई के 35 रुपए लग जाते हैं यानी लगभग सौ रुपए खर्च हो जाते हैं. सनवाड़ा ग्राम पंचायत के मडी सांभर सिंगा गांव के बाशिदें करीब 3 किलोमीटर पैदल चलकर सांधरी गांव से गेहूं लेकर आते हैं.
 
निःशुल्क गेहूं वितरण के दावों की पोल इसी से खुलती है कि इस क्षेत्र के सहरियाओं को कैसे यह गेहूं पाने के लिए जूझना पड़ रहा है. क्षेत्र की कई ग्राम पंचायतों में गेहूं का वितरण एक महीने की देरी से किया जा रहा है. इकलेरा डांडा में जून माह में अप्रैल महीने का राशन दिया गया. कई परिवारों को बाजार से महंगे दर पर गेहूं खरीदना पड़ रहा है. हाल ही खबर आई कि किशनगंज ब्लाक के खांखरा ग्राम पंचायत के जगदीशपुरा गांव के सहरिया परिवारों को पिछले पांच माह से राशन सामग्री ही नहीं मिली. इन परिवारों को फरवरी से जुलाई 2013 तक के राशन का इंतजार है. (यह रिपोर्ट इंक्लूसिव मीडिया फैलोशिप के अध्ययन का हिस्सा है)
 
राजस्थान से बाबूलाल नागा की रिपोर्ट

महुआ आफिस का हाल, एक तरफ सुरतान की लहरियां दूसरी तरफ भूखे प्यासे कर्मचारी हड़ताल पर

महुआ न्यूज में तीन महीने से वेतन ना मिलने के कारण जहां सारे कर्मचारी जिनमें महिला कर्मचारी भी शामिल हैं, भूखे प्यासे हड़ताल पर बैठे हैं वहीं दूसरी तरफ इसके इंटरटेनमेंट के स्टूडियो में रंगारंग कार्यक्रम चल रहा है. इस कार्यक्रम में मशहूर भोजपुरी कलाकार मालिनी अवस्थी , मनोज तिवारी तथा रविकिशन जैसे लोग आये हुए हैं.
 
बताते चलें कि फिल्मसिटी स्थित महुआ के आफिस के दो हिस्से हैं, एक में महुआ न्यूज चैनल है तथा दूसरे में महुआ इंटरटेनमेंट है. जब उसी आफिस के एक हिस्से में कर्मचारी भूखे प्यासे हड़ताल पर बैठे हैं तो ये कलाकार उन्हीं कर्मचारियों के सामने सुरतान की लहरियां छेड़ रहे हैं. इन लोगों को जरा भी फर्क नहीं पड़ रहा है कि जो कर्मचारी हड़ताल पर हैं उनके घरों में चूल्हा बुझने की नौबत आ गयी है. बच्चों की फीस जमा करने के लिये पैसा नहीं है जिस वजह से पढ़ाई बंद होने के कगार पर है.
 
मालिनी अवस्थी जिनके पति वरिष्ठ आईएएस अधिकारी हैं मनोज तिवारी तथी रविकिशन बड़े स्टार हैं. ये लोग हमेशा बहुत सामाजिक बने फिरते हैं लेकिन क्या इन लोगों को इन कर्मचारियों की हालत पर जरा भी संवेदना नहीं जग पा रही और महुआ प्रबंधन जो कि अपने कर्मचारियों को पिछले तीन महीने से वेतन नहीं दे रहा है वो किस तरह इन मंहगे कलाकारों को लाकर कार्यक्रम करवा रहा है. अरे महुआ प्रबंधन और कला के साधकों जरा ये भी सोचों कि इन कर्मचारियों के दिलों पर क्या बीत रही होगी.


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महुआ आफिस कब्जा

 

महुआ न्यूज के हड़ताली मीडियाकर्मियों के समर्थन में संपादक किशोर मालवीय ने दिया इस्तीफा

महुआ न्यूज से बड़ी खबर है कि संपादक किशोर मालवीय ने हड़ताल कर रहे कर्मचारियों के समर्थन में इस्तीफा दे दिया है. भड़ास4मीडिया से बातचीत में उन्होंने बताया कि कर्मचारियों की वाजिब मांगों के चलते उनके समर्थन में उन्होंने ये कदम उठाया है. उन्होंने कहा कि कर्मचारियों ने उनसे कहा कि उन्हें पिछले तीन माह से वेतन नहीं मिल पा रहा है, इसलिए वे हड़ताल पर जा रहे हैं. कर्मचारियों के सामने अब जीवन चलाने के लिए संसाधनों के चरम अभाव की स्थिति आ गई है. कर्मचारियों ने किशोर मालवीय से आग्रह किया कि वे प्रबंधन से बात करें. सूत्रों का कहना है कि प्रबंधन ने जब कर्मचारियों की मांग मानने में टालमटोल का रवैया अपनाया तो किशोर मालवीय ने अपना खुद का इस्तीफा सौंप दिया.

बताया जाता है कि करीब सवा सौ कर्मचारी कामकाज ठप कर नोएडा फिल्म सिटी स्थित महुआ न्यूज के मुख्यालय को अपने कब्जे में कर लिया है. कर्मचारियों ने तय किया है कि जब तक उनकी मांगें नहीं मानी जाती, वे मौके से हिलेंगे नहीं. न तो काम करेंगे और न घर जाएंगे और न आफिस छोड़ेंगे. महुआ न्यूज में हड़ताल की खबर नोएडा फिल्म सिटी में जंगल में आग की तरह फैली. देखते ही देखते कई न्यूज चैनलों के कर्मचारियों के बीच कानाफूसी होने लगी और दूसरे चैनलों के लोग हाल जानने के लिए महुआ न्यूज के आफिस के सामने पहुंचने लगे. कई लोग फोन करके ही महुआ न्यूज के कर्मियों से ताजे घटनाक्रम के बारे में अपडेट लेते रहे.


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महुआ आफिस कब्जा

महुआ न्यूज के हड़ताल कर रहे कर्मचारियों ने एसएसपी नोएडा से की सुरक्षा की मांग

महुआ न्यूज के फिल्म सिटी नोएडा के आफिस में धरने पर बैठे कर्मचारियों ने नोएडा के एसएसपी को हड़ताल की सूचना दे दी है तथा प्रशासन से सुरक्षा की मांग की है. कर्मचारियों को आशंका है कि प्रबंधन हड़ताल को खत्म करने के लिये प्रशासन की मदद से कर्मचारियों को बलपूर्वक बाहर निकलवा सकता है. अतः कर्मचारियों ने नोएडा सेक्टर 20 के थानाध्यक्ष से लिखित रूप से सुरक्षा की मांग की है. इस हड़ताल में महुआ की महिला कर्मचारी भी शामिल हैं.
 
महुआ न्यूज के कर्मचारियों को पिछले तीन महीने से वेतन नहीं मिला है. दीपावली आने वाली है अतः कर्मचारियों को पैसों की सख्त आवश्यकता है. इसलिये कंपनी में काम कर रहे वरिष्ठ कर्मचारियों ने वर्तमान में कंपनी का कार्यभार संभाल रही मीना तिवारी जो कि मालिक प्रमोद तिवारी की पत्नी भी हैं से बात की. उन्होंने कर्मचारियों को एक महीने और इन्तजार करने को कहा. आज जब फिर बात की गयी तो सेलरी को लेकर कोई ठोस जवाब नहीं दिया गया जिसके कारण कर्मचारियों ने काम रोक दिया है.


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महुआ आफिस कब्जा

 

दिल्ली जर्नलिस्ट एसोसिएशन ने किया महुआ न्यूज के कर्मचारियों की हड़ताल का समर्थन

दिल्ली जर्नलिस्ट एसोसिएशन (डीजेए) के महासचिव अनिल पाण्डेय ने कहा है कि डीजेए महुआ में कर्मचारियों की छंटनी और सेलरी रोके जाने की निन्दा करता है. भड़ास4मीडिया से फोन पर उन्होंने कहा कि अचानक छंटनी कर देने की प्रक्रिया बन्द होनी चाहिये. साथ ही सेलरी रोकने की प्रथा भी अब खत्म करनी चाहिए. उन्होंने कहा कि हम सभी महुआ के हड़ताली कर्मचारियों के साथ हैं तथा मालिकों से अपील करते हैं कि पत्रकारों का उत्पीड़न बंद करें. उन्होंने कहा कि आजकल तमाम चिटफंड कंपनियां अपने स्वार्थ साधने के लिये मीडिया के क्षेत्र में आ गयी हैं जो कि पत्रकारों का शोषण करती हैं.

उन्होंने कहा है कि भारत सरकार को इस मामले में हस्तक्षेप करना चाहिये और ऐसे लोगों का लाइसेंस रद्द करना चाहिये. सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को पत्रकारों का शोषण रोकने के लिये नयी नीति का निर्माण करना चाहिये. इस मुद्दे पर प्रेस काउंसिल के चेयरमैन जस्टिस काटजू को हस्तक्षेप करना चाहिये जो हमेशा बोलते रहते हैं लेकिन पत्रकारों के उत्पीड़न पर चुप हो जाते हैं.

उन्होंने कहा कि बहुत सारे मीडिया हाउस वेज बोर्ड की सिफारिशों को लागू नहीं कर रहे हैं, वे वेज बोर्ड की सिफारिशों को शीघ्र लागू करें. सभी पत्रकारों से इस मुद्दे पर आगे आकर इस तरह से शोषण के खिलाफ एकजुट होने की अपील की है तथा इस लड़ाई को आगे ले जाने के लिये रणनीति बनाने की बात कही है.


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महुआ आफिस कब्जा

 

वेतन ना मिलने तक आफिस नहीं छोड़ेंगे महुआ के कर्मचारी

महुआ न्यूज में हड़ताल पर गये कर्मचारियों ने घोषणा की है कि जब तक वेतन नहीं दिया जायेगा तब तक सभी कर्मचारी महुआ के आफिस पर ही धरने पर बैठेंगे. सभी 150 कर्मचारी महुआ के फिल्मसिटी के आफिस में धरने पर बैठे हैं. पूरी फिल्म सिटी में गहमागहमी का माहौल है.
 
महुआ न्यूज के कर्मचारियों ने प्रबन्धन के द्वारा पिछले तीन महीने से वेतन ना दिये जाने को लेकर कंपनी के प्रबंन्धन से कई बार संपर्क करने की कोशिश की लेकिन एचआर की तरफ से बार-भार आश्वासन दिया जा रहा था. कंपनी की तरफ से सितम्बर के वेतन के लिये इस महीने की तारीख दी गयी थी लेकिन फिर भी वेतन नहीं दिया गया. दीवाली आने वाली है लेकिन प्रबंधन की तरफ से मांग ना मांगने के कारण सभी कर्मचारियों ने हड़ताल का फैसला किया है.


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महुआ आफिस कब्जा

महुआ न्यूज में कर्मचारी हड़ताल पर, काम ठप्प

बड़ी खबर है कि महुआ न्यूज में सभी कर्मचारी तनख्वाह ना मिलने के कारण हड़ताल पर चले गये हैं, जिसकी वजह से महुआ में काम ठप्प पड़ गया है. महुआ न्यूज में काम कर रहे सभी कर्मचारियों को पिछले तीन महीने से वेतन नहीं दिया जा रहा है. ये कर्मचारी पिछले कई दिनों से महुआ प्रबन्धन से वेतन दिये जाने की मांग कर रहे थे, लेकिन प्रबन्धन द्वारा वेतन नहीं दिये जाने के कारण आज मजबूर होकर महुआ के सभी कर्मचारियों ने हड़ताल पर जाने का फैसला कर लिया.

प्रबंधन हर बार वेतन देने की नई तारीख बताकर चुप्पी साध लेता था. जब भी कर्मचारी वेतन देने की मांग करते तो प्रबंधन उन्हें सिवाय आश्वासनों के कुछ नहीं देता. पिछले तीन महीने से दर्जनों बार आश्वासन पाकर खाकर कर्मचारी त्रस्त हो गए थे. अंततः आज सभी ने एकसाथ एकजुट होकर काम बंद करने का ऐलान कर दिया. साथ ही न्यूज रूम पर कब्जा करके मांगें न माने जाने तक आफिस न छोड़ने की भी घोषणा कर दी.

देखते ही देखते बात महुआ के मालिकों तक पहुंची तो पीके तिवारी समेत सभी परिवारी मालिकों मालकिनों के हाथ-पांव फूल गए. कई तरह के संदेश महुआ कर्मचारियों के नाम भिजवाए जाने लगे लेकिन आश्वासनों से पक चुके कर्मियों ने अब किसी भी आश्वासन पर भरोसा न करने की बात कह दिया. फिलहाल नोएडा के फिल्म सिटी स्थित महुआ न्यूज के मुख्यालय में हलचल चरम पर है.


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महुआ आफिस कब्जा

‘जननेता’ के लड्डुओं से पत्रकारों को ‘फूड प्वायजनिंग’!

रेवाड़ी। खुद को 'जननेता' कहने वाले शहर के नेता ने दिवाली के तोहके के नाम पर कई पत्रकारों के पेट में दर्द कर दिया। इस कथित जननेता की ओर से कुछ राष्ट्रीय समाचार पत्रों के पत्रकारों को जहां महंगे गिफ्ट भेजे, तो छोटे या साप्ताहिक समाचार पत्रों के पत्रकारों को सिर्फ गोंद के लड्डू ही नसीब हो पाए। जब ऐसे पत्रकारों को गिफ्ट की जानकारी मिली, तो उन्होंने लड्डू लौटाने की बात कही। कुछ पत्रकार स्वाद चखने के कारण यह काम भी नहीं कर पाए।

हाल ही में इस नेता की ओर से दिवाली पर्व के ताहफे के रूप में जहां अधिक प्रसार संख्या वाले पत्रकारों को मोटे गिफ्ट और मिठाई के डिब्बे भेजे, तो कुछ को सिर्फ गोंद के लड्डुओं के डिब्बे। इस काम को करने के लिए एक को नियुक्त किया गया। जब आम पत्रकारों तक लड्डुओं के डिब्बे पहुंचे, तो उन्होंने उनका स्वाद चखना शुरू कर दिया। जब चार-चार लड्डुओं वाले डिब्बों की मिठाई खत्म हो गई, तो उन्हें पता चला कि उनके साथ गिफ्ट के नाम पर भेदभाव किया गया है।

बस इस बात का पता चलते ही कई पत्रकारों ने नेता को फोन करने शुरू कर दिए। लड्डुओं के डिब्बे भी वापस पहुंचाने की धमकी देने लगे, लेकिन अधिकांश इन लड्डुओं को पहले ही डकार चुके थे। कई पत्रकार एक-दूसरे के पास फोन करके अपनी-अपनी भड़ास निकालने लगे। जब ऐसे पत्रकारों ने नेता से संपर्क किया, तो उसने उन्हें बताया कि गिफ्ट बांटने वाले व्यक्ति का भेजा दोपहर के समय खराब हो जाता है, इसलिए उसने भेदभाव कर दिया। उसने उलाहना देने वाले पत्रकारों को यह आश्वासन भी दिया कि उन्हें बाद में गिफ्ट मिल जाएगी। नेता की इस करतूत के कारण कई पत्रकारों को दस्त लगे हुए हैं। चर्चा यही है कि लड्डू से हुआ फूड प्वायजनिंग अपना काम कर रहा है। बिना गिफ्ट का डिब्बा लगातार उन्हें परेशान कर रहा है। (कानाफूसी)

इलाहाबाद पुलिस द्वारा सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का खुला उल्लंघन

इलाहाबाद पुलिस के लिए शायद सुप्रीम कोर्ट के आदेश का कोई मतलब नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह की जनहित याचिका पर 22 सितम्बर 2006 को थानाध्यक्ष सहित अन्य वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के तबादले के सम्बन्ध में कई निर्देश दिए थे जिनमे प्रत्येक जिले में इनके तबादले के लिए पुलिस स्थापना बोर्ड बनाए जाने की बात कही गयी थी.

उत्तर प्रदेश सरकार ने इस आदेश के अनुपालन में 08 अप्रैल 2010 के शासनादेश द्वारा प्रत्येक जिले के एसएसपी/एसपी की अध्यक्षता में जिला स्तरीय स्थापना बोर्ड बनाए जाने के आदेश दिए. लेकिन लखनऊ स्थित आरटीआई कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर को जन सूचना अधिकारी, एसएसपी कार्यालय, इलाहाबाद से प्राप्त पत्र दिनांक 25 अक्टूबर के अनुसार “थानाध्यक्ष/ प्रभारी निरीक्षक के लिए जनपद स्तर पर पुलिस स्थापना बोर्ड गठित नहीं है.”

डॉ ठाकुर ने इसे सीधा सुप्रीम कोर्ट की अवमानना तथा इस सम्बन्ध में जारी शासनादेश का उल्लंघन बताया है और डीजीपी, उत्तर प्रदेश को प्रेषित अपने पत्र में पूछा है कि यदि इलाहाबाद जिले में पुलिस स्थापना बोर्ड गठित ही नहीं है तो वहां अब तक थानाध्यक्षों के तबादले किसके द्वारा किये जाते रहे हैं? उन्होंने अब तक इस बोर्ड के गठित नहीं होने के लिए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाही करने की भी मांग की है.

प्रभात खबर में प्रोन्नति की बहार, अखबारों की मार्केटिंग टीम हुई आक्रमक

भास्कर की आहट के बाद बिहार के सभी अखबार अपने तीर-कमान पर से जंग छुड़ाने में जुट गए हैं। प्रभात खबर के पटना समेत बिहार के अन्य यूनिटों में कर्मचारियों को प्रमोशन दिया गया है। यह प्रमोशन सीनियर से चीफ सब एडीटर तक का है। एकाध को डीएनए भी बनाया गया है। बताया जाता है कि प्रमोशन के साथ पैसों में भी इजाफा हुआ है।

चर्चा है कि भास्कर का टारगेट प्रभात खबर ही है। इस बात से प्रबंधन भी अवगत है। यही कारण है कि कर्मचारियों के असंतोष को कम करने और अखबार से जोड़े रखने के लिए प्रभात खबर ने प्रोन्नति दी है। हालांकि इसका लाभ सभी को नहीं मिला है। प्रोमोशन से वंचित लोगों में असंतोष भी बताया जा रहा है।

उधर हिन्दुस्तान कनटेंट के स्तर पर एक्सरसाइज शुरू कर दिया है। हिन्दुस्तान प्रबंधन का मानना है कि उच्च वेतन वाले कर्मचारी अखबार नहीं छोड़ेंगे, लेकिन मध्यम वेतन लोगों के लिए विकल्प खुला है। यही वजह है कि हिन्दुस्तान कुछ सुपर स्ट्रिंगरों को स्टाफर बनाने पर विचार कर रहा है।

इस बीच भास्कर ने अभी बड़े पैमाने पर नियुक्ति की शुरुआत नहीं की है। माना जा रहा है कि छठ के बाद नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू होगी। हांलाकि एका-दुका नियुक्ति अभी भी हो रही है। भास्कर से जुड़ने की अपेक्षा रखने वाले लोग उसके वेतनमान को लेकर संशय की स्थिति में हैं। दूसरे अखबारों से टूटने व भास्कर से जुड़ने की गति बहुत कुछ भास्कर के वेतनमान व कार्यशैली पर भी निर्भर कर सकती है।

उधर सभी अखबार आक्रमक मार्केटिंग पर उतर आए हैं। सभी का अभी सदस्यता अभियान चल रहा है और एक से बढ़कर एक प्रलोभन पाठकों को दिया जा रहा है। इस मामले में भास्कर को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। ग्राहक पहले अखबार की मांग कर रहे हैं और भास्कर का अभियान चलाने वाले अभी सिर्फ आश्वासन व अखबार निकलने की तिथि भर बता रहे हैं।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

‘The Sunday Indian’ Cheques bounce, salary denied to employees

Dear Yashwant, please publish it.. TSI Cheques bounce, salary denied to employees.. Myself Nakshab Khan, I worked for The Sunday Indian in the online division for over a year between JAn 6, 2012 to Jan 6, 2013 and I am yet to receive my salary of Rs 42,000.

We were given Post dated cheques for different months but they all bounced one by one. Many of the employees including me are planning to file cheque bounce case against Arindam Choudhary. There are at least 50 employees who have not got their salaries. The last cheque given to us by TSI was dated for October 2013 which has already expired. And there is no hope of getting our salary.

The TSI management is just giving promises on a day today basis instead of their salaries.

Please publish it.

Nakshab Khan

मुझे तो बदले दौर का पूरा मीडिया ही मसालेदार दिखाई देने लगा है : राजेंद्र यादव

बात है एक महीने पहले की… राजेंद्र यादव जी का नंबर मिलाया…अपने बारे में बताया…यू-ट्यूब पर चल रहे अपने चैनल क्राइम्स वॉरियर (Crimes Warrior) के बारे में बताया। मैंने उनसे गुजारिश की..सर मैं आपका एक लंबा इंटरव्यू करना चाहता हूं…उधर से जबाब मिलने के बजाये…सवाल आया…क्यों ऐसा मैंने क्या नया फसाद खड़ा कर दिया कि अब यू ट्यूब वालों को भी मेरा इंटरव्यू लेने की जरुरत महसूस होने लगी? मैंने कहा, नहीं सर ऐसी बात नहीं है। बस मन हुआ। सोचा कि आपसे कई साल से मुलाकात नहीं हुई है। इंटरव्यू के साथ आपका आशीर्वाद भी मिल जायेगा। मैंने कहा।

राजेंद्र जी बोले- ऐसा हो ही नहीं सकता है कि, जिस दौर से मैं (राजेंद्र यादव) गुजर रहा हूं, उसमें आपको (क्राइम्स वॉरियर) को कोई मसाला न चाहिए हो…फिर जोर से हंसे और बोले- ‘आजकल कुछ कमजोरी महसूस कर रहा हूं। और तुम टीवी (चैनल) वाले इंटरव्यू में सामने वाले को (जिसका इंटरव्यू होना हो) बुलवाते बहुत ज्यादा हो। ताकि कुछ ऐसा मसाला गरमा-गरम मिल जाये, जिसे बाजार में जोर-शोर से बेचा जा सके। राजेंद्र यादव का इंटरव्यू भी अगर बाजार में नहीं बेच सके तो और लानत मलामत होगी। इसलिए आप अपने इंटरव्यू का मकसद पहले साफ करो, तभी मैं बात करने की सोचूंगा।’

इधर से मैंने कहा, कि सर मैं आपके अतीत पर बातचीत करना चाहता हूं…मैं आगे कुछ बोलूं उससे पहले ही उन्होंने उधर से रोक दिया और बोले- ‘सुनो संजीव चौहान साहब मेरा अतीत कोई ऐसा नहीं है जिसे आने वाली पीढ़ियों को दस्तावेज बनाकर सौंपा जाये। दूसरे तुम लोग न (पत्रकार जमात) मेरे अतीत से शुरु करते हो और वर्तमान पे आकर अटक-भटक जाते हो। इसलिए अब सोचता हूं कि, मेरी जुबांन तुम लोग न ही खुलबाओ, तो ठीक रहेगा। तुम लोग मेरे गिरहबान में झांकने की कोशिश करते हो, यह सोचकर कि मसाला मिलेगा। और मुझे तो बदले दौर का पूरा मीडिया ही मसालेदार दिखाई देने लगा है।’

मैंने उन्हें विश्वास दिलाने की कोशिश करते हुए कहा- सर मैं तो आपके बच्चे के बराबर हूं। ऐसा कुछ नहीं होगा। हर पत्रकार एक सा नहीं है। आप तो मुझसे बहुत सीनियर रहे हैं। आप मुझ पर विश्वास तो कीजिए। इतना सुनते ही वे बोले… ‘तो फिर वो खबर और खबरनवीस ही क्या जो मसाले में न लिपटा हो। अब तो थू-थू करने कराने वाली खबरों का बोलबाला है। कोई बात नहीं। अब मुझे कुछ थकान सी महसूस हो रही है। तुम दो-चार दिन बाद मुझसे संपर्क करना। बैठने (इंटरव्यू) की जगह तय कर लेंगे। लेकिन कुछ ऐसा उल्टा-पुल्टा मत पूछ बैठना कि बची हुई जिंदगी के दो-चार दिन भी सफाई देने में ही गुजर जायें। मुझे इंटरव्यू देने में कोई दिक्कत नहीं है। आने से पहले फोन पर बात जरुर कर लेना।’

‘ठीक है सर नमस्कार आने से पहले आपसे बात कर लूंगा पक्का’ कहकर मैंने काट दिया। उस वक्त मुझ या राजेंद्र यादव जी को अहसास भी नहीं रहा था/ रहा होगा…कि अब न हमारी कभी बात होगी। न वो (राजेंद्र यादव) कुछ ऐसा बोल पायेंगे, जो मसाला साबित होगा। न इसकी सोची थी, कि जिस इंटरव्यू के लिए मैं इतने समय तक राजेंद्र यादव जी को समझाने की कोशिश करता रहा, वो इंटरव्यू भी अब कभी नहीं होगा। क्या कहूं या समझूं इसे! यही समझना शायद ज्यादा बेहतर होगा कि एक ऐसा इंटरव्यू जो अब कभी न लिया जा सकेगा….

लेखक संजीव चौहान वरिष्ठ खोजी पत्रकार हैं और कई चैनलों में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं.

गो तस्करों ने ली पत्रकार जका की जान

खुर्जा, (बुलंदशहर) : पत्रकार जकाउल्ला हत्याकांड के खुलासे ने खुर्जा में चल रहे गोकशी के गोरखधंधे का एक बार फिर पर्दाफाश कर दिया है। पुलिसिया खुलासे के मुताबिक, जकाउल्ला की हत्या में गोकशी ही प्रमुख वजह बनी। इससे यह भी साफ हो गया है कि शहर में गोकशी का यह धंधा कितने बड़े पैमाने पर संगठित रूप से चल रहा है। पत्रकार जकाउल्ला खां निवासी मोहल्ला पंजाबियान का 25 अगस्त को बोरे में बंद शव चोला चौकी क्षेत्र के जंगलों में बरामद हुआ। 27 अक्टूबर को पुलिस ने कोतवाली खुर्जा में खुलासा किया कि जकाउल्ला की हत्या नगर निवासी तीन लोगों ने मिलकर की थी।

इस हत्या का कारण वर्चस्व की जंग बताई गई। पुलिस के अनुसार, जकाउल्ला को गोकशी के कारोबार के बारे में काफी हद तक जानकारी हो गई थी। इससे कुछ लोगों को जका से खतरा पैदा हो गया था। कुछ का वर्चस्व दांव पर लग गया था। इसलिए जकाउल्ला की हत्या कर दी गई। पुलिस के पास इस मामले में कोई ठोस आधार भले ही न हो, लेकिन पुलिस इस मामले में परिस्थितिजन्य सबूतों को बड़ा आधार बता रही है। पुलिस का दावा है कि उसके पास एक ऐसी चिट्ठी है, जिसमें जकाउल्ला के घर वालों को धमकी लिखकर भेजी गई है। उसमें लिखा गया है कि अगर मामले की पैरवी की तो ठीक नहीं होगा। हाथ से लिखी उस पाती को पुलिस ने अपना सबूत बनाया है।

पुलिस उस युवक को गवाह बना रही है, जिसने आरोपी के घर के बाहर रात एक बजे आखिरी बार जकाउल्ला को देखा था। कोतवाली प्रभारी प्रमोद कुमार का कहना है कि आरोपियों ने उन्हें कार्रवाई न करने के लिए पेशकश की भी थी। पुलिस इस मामले में गद्दों का राज भी एक सबूत मानकर चल रही है। सूत्रों के मुताबिक, आरोपियों ने दो नए गद्दे कुछ दिनों पहले खरीदे थे। हत्या के बाद दोनों गद्दे गायब हैं। एक गद्दे के खोल में ही जका का शव लपेटे जाने की दलील भी पुलिस दे रही है। (साभार- दैनिक जागरण)

बनारस में भारत रत्न स्व. बिस्मिल्ला खां के नाम पर लगे शिलापट्ट से जूते लटक रहे

: कला-संस्कृति के शोर में हम याद न तुमको कर सके! : खुद के शहर में विस्मृत होती जा रही स्मृतियां : बनारस। इन दिनों शहर में कला-संस्कृति के पहरूए साहित्य, कला को बचाने के लिए झंडा उठाये फिर रहे हैं. आयोजनों की बहार है. बनारस महोत्सव चल ही रहा है, गंगा महोत्सव की तैयारी है. खबर आ रही है कि कैलाश खेर महोत्सव में चार चांद लगाने आ रहे हैं. इधर दुनिया के पैमाने पर भारतीय कला और संस्कृति को ले जाने वाले कलाकारों के स्मृतियों पर ग्रहण लगता जा रहा है. भारत रत्न स्व. बिस्मिल्ला खां साहब के नाम पर लगे शिलापट्ट के सहारे जूते लटके नजर आ रहे हैं.

विश्वकवि रवि बाबू द्वारा नृत्य साम्राज्ञी की उपाधि से सम्मानित सितारा देवी के नाम पर उनके मोहल्ले में लगा शिलापट्ट सड़कों पर गिरा पड़ा धूल फांक रहा है. संगीत नायक के नाम से मशहूर पं छोटे राम दास मिश्र जी के घर पर तो पहले से ही विवाद के चलते प्रशासन का ताला चढ़ा हुआ है. बाकी बचे उनकी निशानी के नाम पर लगे शिलापट्ट पर कूड़ा फेंका जा रहा है.

ये उस शहर के कलाकारों से जुड़ी स्मृतियों की कहानी है जिस शहर को कला और संस्कृति की राजधानी कहा जाता है. कला-संस्कृति की राजधानी में कला-संस्कृति के नाम पर भले ही हम ढोल पीट कर उत्सव-महोत्सव मनाकर कर खुश हों लें, पर हकीकत ढोल के अन्दर पोल की तरह है. साल के 365 दिन कला और संस्कृति के नाम पर कुछ न कुछ आयोजन होने वाले इस शहर में कला-संस्कृति से जुड़ी नामचीन हस्तियों के नाम पर लगाए गये शिलापट्ट धूल-धूसरित हो रहे हैं. शहर भर के कलाकारों, कलाप्रेमी और संगीत-कला के नाम पर अपनी दुकान चलाने वालों को कहीं कुछ भी नजर नहीं आता.

शहनाई वादक भारत रत्न बिस्मिल्ला खां, विश्वकवि रवीन्द्र नाथ टैगोर द्वारा नृत्य साम्राज्ञी की उपाधि से अंलकृत कथक नृत्यांगना सितारा देवी और संगीत के नायक पं. छोटे राम दास मिश्र के नाम पर लगाए गए शिलापट्टों का हाल कुछ ऐसा ही है. कभी इनको सम्मान देने के लिए इनके नाम पर लगाए गये शिलापट्ट अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रहे हैं.

कबीरचौरा की गली में सितारा देवी के नाम का शिलापट्ट चित पड़ा है, तो पूर्व नगर प्रमुख सरोज सिंह द्वारा पिपलानी कटरा मार्ग पर स्थित काशी के राजवैद्य पं. शिवकुमार शास्त्री के संगीत के गुरू रहे संगीत नायक छोटे राम दास जी के घर के गली के मोड़ पर लगाया संगीत नायक छोटे राम दास जी वीथिका के शिलापट्ट पर कूड़ा फेंका जा रहा है और भारत रत्न का क्या कहना. भारत रत्न बिस्मिल्ला खां के नाम पर बेनियाबाग मोड़ पर लगाए गये शिलापट्ट के सहारे तो बाकायदे जूते टांग कर बेचा जा रहा है.

अपने कला के बूते अंतराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति पाए कलाकारों का ऐसा विरला सम्मान शायद कही और नहीं होता होगा. वास्तविकता से आंखे मूंद कर शहर की कला-संस्कृति के नाम पर गाल बजाने वालो के मुंह पर ये करारा तमाचा है. रही बात शासन के संस्कृति विभाग और प्रशासन की, तो एक का ध्यान कला के उपासकों से ज्यादा कार्यक्रमों के बजट पर है और दूसरे की नजर में पारम्परिक कला और संस्कृति की समझ कला और संस्कृति के नाम पर आयोजित किए जा रहे कार्यक्रमों में चेहरे पर जबरन हंसी और बोझिल मन लिए आगे की पंक्तियों में बैठकर वक्त गुजारने और बालीवुड के नामचीन कलाकारों के आगमन पर उनके साथ मय परिवार  फोटो खिचवाने से ज्यादा कुछ और नहीं है.

ऐसे में दिखावे के इन आयोजनों में शिरकत कर रहे कला-संस्कृति के इन तथाकथित वाहकों के पास इतनी फुरसत कहा कि वो उधर भी नजर फेरें जिधर कला और संस्कृति की स्मृतियां सिसक रही हैं.

बनारस से भास्कर गुहा नियोगी की रिपोर्ट. संपर्क: 09415354828

शरद शंखधार ने जागरण हल्द्वानी ज्वाइन किया, रामनिवास चौधरी का साधना न्यूज़ से इस्तीफा

खबर है कि जागरण हल्द्वानी में शरद शंखधार ने सीनियर सबएडिटर के पद पर ज्वाइन किया है. ये अमर उजाला जम्मू में बतौर सीनियर सबएडिटर काम कर रहे थे. इन्होंने दस दिन पहले जागरण ज्वाइन किया है. जम्मू के पहले ये अमर उजाला बदायूं में कार्यरत थे जहां जनवरी में पूरे आफिस को लेनदेन में घपले के चलते सस्पेंड कर दिया गया था. बाद में मैनेजमेंट से सिफारिश करने पर इन्हें पुनः नियुक्त कर जम्मू भेज दिया गया था.

उधर, रामनिवास चौधरी ने साधना न्यूज़ से इस्तीफा दे दिया है. वे राजस्थान के मार्केटिंग मैनेजर हुआ करते थे. रामनिवास चौधरी ने अपनी पारी इंडिया न्यूज़ के साथ शुरू की है.  रामनिवास इंडिया न्यूज़ में सीनयर मैनेजर मार्केटिंग के पद पर पहुंचे हैं. रामनिवास इससे पहले पी7न्यूज़, टीवी99 और वॉइस ऑफ़ इंडिया और राजस्थान पत्रिका में अपनी सेवाएं दे चुके हैं.

पुलिसकर्मियों ने लखनऊ के चौक में पत्रकार को पीटा

लखनऊ : चौक कोतवाली थानाक्षेत्र में मंगलवार देर रात एक दारोगा ने कुछ पुलिसकर्मियों के साथ एक न्यूज चैनल के पत्रकार मोहसिन हैदर की पिटाई कर दी। बताया गया कि पत्रकार अपने परिवार के साथ कहीं से आ रहे थे। चौक चौराहे के पास बैरिकेडिंग लगी हुई थी। इसी बात को लेकर उनकी सिपाही सुनील से बहस हो गई। इस बीच मौके पर सिपाही सियाराम व दारोगा रुमा यादव भी मौके पर पहुंच गए।

आरोप है कि पुलिसकर्मियों ने मिलकर मोहसिन की पिटाई कर दी। सूचना मिलने पर पहुंचे पुलिस के आला अधिकारियों ने मामले की गंभीरता को देखते हुए देर रात सिपाही सुनील व सियाराम तथा दारोगा रुमा यादव के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया। पुलिस कर्मियों के निलंबन की कार्रवाई की जा रही है।
 

भास्कर के मालिक पैसा कमाने के लिए अपने कर्मचारियों को दीवाली भी मनाने नहीं देना चाहते

भाई यशवंत जी, भास्कर के मालिक पैसा कमाने के लिए अपने कर्मचारियों को दीवाली भी मनाने नहीं देना चाहते. देखिए, ये किस किस्म का इंटरनल मेल जारी किया गया है भास्कर में…

Dear All,

This is in continuation to our earlier mail, management has taken a call on team request that 04thNovember 2013 will be a holiday on account of Diwali. Since News Paper will be printed on 04thNovember and published on 05th November, therefore all the related operational departments (like Editorial, Production, Scheduling etc.) will be attending the office and they can avail a comp of in lieu of this holiday.

Thank you.

Warm Regards,

From: HR Cell
Sent: Friday, October 25, 2013 11:06 AM
Subject: Change in Holiday Calendar – 2013

Dear All,

As we all know that till beginning of November 2013 is the season time for our business. Therefore this is to bring to your notice that Corporate Bhopal we will not have a holiday on 04thNovember 2013, it will be a working day. We will substitute any other holiday post the season time and the same shall be communicated separately.

Thank you,

Warm Regards,


एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

महाराष्ट्र के यवतमाल में ‘पुण्यनगरी’ के दफ्तर पर शिवसैनिकों का हमला

महाराष्ट्र के यवतमाल जिले के वणी में आज सुबह दैनिक अखबार पुण्यनगरी के ऑफिस पर शिवसेना कार्यकर्ताओं ने हल्ला बोल दिया. इससे आफिस का काफी नुकसान हुआ है. इस वारदात के बाद यवतमाल, वाशिम जिले के पुण्य नगरी के सभी ऑफिसों को पुलिस प्रोटेक्शन के अधीन कर दिया गया है.

आज के पुण्यनगरी अखबार में एपी भावना गवली और वणी के एमएलए संजय राठौड़ के बारे में कुछ आपत्तिजनक विज्ञापन पब्लिश हुआ है. इस पर आपत्ति जताते हुए शिव सैनिकों ने पुण्यनगरी के कार्यालय पर हमला बोल दिया. महाराष्ट्र पत्रकार हमला विरोधी कृती समिती ने इस हमले की निंदा की है. हमलावरों पर कार्रवाई करने की मांग भी समिती ने की है.

क्या अमर्त्य सेन के मॉडल पर काम कर रही है नीतीश सरकार?

पिछले कुछ दिनों से देश में विकास के मॉडलों पर गंभीर चर्चाएं हो रही हैं. यह अच्छी बात है कि जो सवाल कल तक अतिबुद्धिजीवियों के बहस का मसला हते थे, उस पर चुनावी सभाओं में भी बातें होने लगी है. कहने को देश में विकास के दो मॉडल हैं एक भगवती मॉडल और दूसरा अमर्त्य सेन मॉडल. भगवती मॉडल जहां मानता है कि अगर व्यापार बढ़ा तो उसका लाभ निचले तबके तक पहुंच ही जायेगा, मगर अमर्त्य सेन मॉडल मानता है व्यापार बढ़ने से कई दफा पूंजी का ध्रुवीकरण होता है और गरीब और गरीब होते चले जाते हैं.

इसलिए सरकार को चाहिये कि वंचित तबकों का विशेष ख्याल रखे. हालांकि अगर इन दोनों मॉडल में से अगर एक मॉडल चुनने कहा जाये तो कोई भी समझदार व्यक्ति बिना सोचे अमर्त्य सेन के मॉडल को चुन सकता है. निश्चित तौर मेरी व्यक्तिगत पसंद भी वही है, इसके बावजूद इस बहस के कुछ मसले पर मेरी असहमतियां हैं.

1. बहस के दौरान माना गया है कि मोदी भगवती मॉडल के पैरोकार हैं और नीतीश अमर्त्य सेन मॉडल के. इस मान्यता का आधा हिस्सा तो सच है कि मोदी भगवती मॉडल के पैरोकार हैं, मगर दूसरा आधा हिस्सा पूरी तरह गलत हैं.

2. नीतीश ने अमर्त्य सेन को तो स्वीकार किया है, मगर उनके मॉडल को कतई स्वीकार नहीं किया है. इसे ऐसे समझ सकते हैं.

3. नीतीश जिसे सुशासन का नाम देते रहे हैं, उसकी तीन खूबियां. पहला- बेहतरीन सड़कें एवं अधोसंरचना का निर्माण, दूसरा- अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई, तीसरा सरकारी अस्पतालों में व्यवस्था का सुधार. इन तीन कामों के अलावा नीतीश के राज में कोई दूसरा बेहतर काम नजर नहीं आता.

4. पहला काम जो अधोसंरचना का निर्माण है वह विश्व बैंक की सहायता से हुआ है और अगर यह कोई मॉडल है तो मोदी-भगवती-चंद्रबाबू नायडू मॉडल ही है. इस काम ने अप्रत्यक्ष रूप से अपराध में कमी लाने में भी भूमिका निभायी है, क्योंकि सारे पूर्व अपराधी ठेकेदार बनकर सड़क-अस्पतालों के लिए भवन और पुल-पुलिये बनाने में व्यस्त हो गये हैं. उन्हें आपराधिक गतिविधियों के लिए फुरसत ही नहीं है.

5. दूसरा बड़े अपराधियों पर ठोस कार्रवाई का काम. यह काम नीतीश ने कल्याण सिंह मॉडल को अपनाते हुए सैप जवानों की मदद से किया है. मैं मानता हूं कि इस काम में कोई बुराई नहीं है. निगरानी और फास्ट ट्रैक अदालतों ने दिखावे के कुछ उदाहरण जरूर पेश किये हैं. मगर आम तौर पर इनकी कार्रवाइयां लोगों में भरोसा नहीं जगा पायी.

6. अस्पतालों की व्यवस्था में सुधार में एक पूर्व स्वास्थ्य मंत्री की बेहतरीन भूमिका रही है, मगर राजनीतिक कारणों से बाद में उन्हें हटा दिया गया.

अब यह जानना दिलचस्प होगा कि गरीबों के लिए नीतीश ने क्या किया.

1. विकास को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने के लिए सत्ता का विकेंद्रीकरण पहली शर्त है. मगर बिहार में पंचायतों की स्थिति बहुत बुरी है. मुखिया भ्रष्टाचार में डूबे हैं और पंचायती राज मुखिया से नीचे जा ही नहीं पाया है.

2. ग्रामसभाएं होती ही नहीं है, पंचायतों के जिम्मे कोई काम नहीं है. आज भी बीडीओ साहब ही गांव की व्यवस्था के लिए सर्वशक्तिमान हैं. उनकी इच्छा के बगैर गांव के एक व्यकित को सरकारी योजना का लाभ नहीं मिल सकता.

3. इंदिरा आवास किसे मिले यह तय करने का अधिकार भी पंचायतों से छीन लिया गया है. सिर्फ इस बिना पर कि मुखिया रिश्वत लेते हैं. रिश्वत के नाम पर केंद्रीकृत व्यवस्थाएं थोपी जा रही हैं.

4. पंचायतों को अब तक पंचायत भवन भी नहीं मिले हैं. जबकि महज दो साल पहले पंचायती राज व्यवस्था को अपनाने वाले झारखंड के तीन चौथाई पंचायतों में पंचायत भवन काम करने लगे हैं.

5. बिहार के महज तीन जिलों में ई-गवर्नेंस योजना के तहत काम हो रहा है, जबकि पड़ोसी राज्य झारखंड में अब सारे जरूरी प्रमाणपत्र आवास, जन्म, मृत्यु आदि पंचायतों में ऑनलाइन बन रहे हैं.

6. मनरेगा को लागू करने का मसला इतना बुरा है कि मजदूर फिर से पंजाब-दिल्ली जाने लगे हैं. इसके बावजूद मनरेगा के तहत देश में सबसे कम मजदूरी बिहार में ही मिलती है.

7. आंगनबाड़ियों के पैसों से सीडीपीओ मोटी हो रही है और राज्य में आज भी हर पांच में से चार बच्चा कुपोषित है.

8. स्वास्थ्य बीमा के पैसों के लिए हजारों महिलाओं का यूटरस बेवजह निकाल लिया गया, मगर एक डॉक्टर को अब तक सजा नहीं हुई.

9. मुजफ्फरपुर में हर साल इन्सेफ्लाइटिंस से सैकड़ों बच्चे असमय काल कलवित हो जाते हैं.

10. कृषि कैबिनेट और कृषि का रोडमैप खूब बना, मगर किसानों को आजतक सिंचाई, खाद या बीज की सुविधा नहीं मिली. यह संभवतः अकेला ऐसा राज्य है जहां सिंचाई के लिए डीजल सब्सिडी दी जाती है. यानी खेती भी आबोहवा में जहर घोलने का अपराधी बनाया जा रहा है. वैसे, यह सब्सिडी राज्य के प्राइवेट बस चालकों के सिवा किसी को लाभ नहीं पहुंचाती.

11. ग्रीनपीस संस्था के साथ राज्य सरकार ने राज्य में एक हजार सोलर पंप बांटने की योजना बनायी थी, पता नहीं उसका क्या हुआ.
12. शिक्षा के मसले राज्य सरकार ने कुछ काम किये हैं, जैसे स्कूलों में साइकिल और ड्रेस बंटवाना. मगर किताबें समय पर मिल जाये इसकी कोई व्यवस्था नहीं हुई है.

13. सबसे रोचक तो यह है कि बिहार में अगर आपको पुलिस विभाग में भरती होना है तो आपको परीक्षा देनी होगी, मगर शिक्षक की नियुक्ति मार्कशीट देखकर ही हो जाती है.

14. संभवतः यही एक ऐसा राज्य होगा, जहां अपराधियों से ज्यादा लाठी शिक्षकों ने खायी है. अपने लिए सुविधाएं मांगते हुए. यह रोचक है कि जब रनबीर सेना का प्रमुख की मौत पर एक खास जाति के लोग पटना में हंगामा करते हैं तो पुलिस वीडियोग्राफी करती है, मगर जब शिक्षक प्रदर्शन करते हैं तो सीधी कार्रवाई का आदेश दे दिया जाता है.

15. यही एक ऐसा राज्य है जहां महादलित आयोग है मगर नरसंहार के एक भी मुकदमें में नीतीश राज्य में दलितों को न्याय नहीं मिला है.

16. सरकार भूमिसुधार के मसले पर मौन है.

17. कोसी महाप्रलय के नाम पर दुनिया भर से 9 हजार करोड़ की भीख बटोरने वाली इस सरकार ने अब तक सिर्फ दस हजार पीडित परिवारों का आधा-अधूरा पुनर्वास किया है. पता नहीं दो लाख पीड़ितों का पुनर्वास कब तक हो पायेगा.

18. कोसी के खेतों में आ भी बालू जमा है. आपदा के पांच साल बाद भी और सरकार के पास इसके लिए कोई योजना नहीं है.

19. जरूरतमंदों को अंत्योदय और अन्नपूर्णा योजना का अनाज छह-छह महीने नहीं मिलता है. इस बीच अगर किसी की मौत भूख से हो जाये तो सरकार तरह-तरह की बहानेबाजी करती है.

20. गरीबों का एक काम बगैर घूस दिये नहीं होता है. अगर बीपीएल कार्ड बनवाना हो तो भी पैसे मांगे जाते हैं. लिहाजा पैसे वाले ही मान्यता प्राप्त गरीब हो सकते हैं.

और, भी कई जानकारियां हैं, मगर मेरे हिसाब से इतनी जानकारियां तो यह साबित करने के लिए पर्याप्त हैं कि यह सरकार अमर्त्य सेन के मॉडल पर काम नहीं कर रही.

पुष्यमित्र के ब्लाग 'हजारों ख्वाहिशें ऐसी' से साभार.

पीआईएल होते ही आज़म खान ने अपना आदेश वापस लिया

सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर द्वारा इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच में पीआईएल दायर करते ही मंत्री तथा जल निगम के अध्यक्ष आज़म खान ने अपना विधिविरुद्ध आदेश तत्काल वापस ले लिया. डॉ ठाकुर ने अपनी याचिका में कहा था कि उ०प्र० जल निगम उत्तर प्रदेश जल आपूर्ति एवं सीवरेज अधिनियम 1975 की धारा 7(3) के अनुसार अध्यक्ष का पद लाभ का पद नहीं माना जाएगा और उसका निगम के किसी प्रबंधकीय कार्य पर कोई अधिकार नहीं होगा, लेकिन इसके बावजूद श्री खान ने अपने हस्ताक्षर से 28 अगस्त 2012 को एक कार्यालय ज्ञाप जारी कर सारे प्रबंधकीय अधिकार स्वयं ले लिए थे.

अतः उन्होंने श्री खान को इस पद से हटाये जाने और 28 अगस्त 2012 के आदेश को निरस्त किये जाने की मांग की थी. आज यह मामला जस्टिस इम्तियाज़ मुर्तजा और जस्टिस देवेन्द्र कुमार उपाध्याय की बेंच के सामने सुनवाई पर आते ही जल निगम के अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि कल 29 अक्टूबर को ए के मित्तल, एमडी, जल निगम के हस्ताक्षर से यह विवादित आदेश वापस ले लिया गया है. इसके बाद हाई कोर्ट ने इस मामले में अपना फैसला सुरक्षित कर लिया है.

नौवें नंबर का चैनल बन गया है आईबीएन7

41वें हफ्ते की टीआरपी में टॉप के सभी चैनलों की टीआरपी गिरी है पर लेकिन पोजीशन सबकी जस की तस बरकरार है. जी न्यूज को फायदा हुआ है पर वह अब भी इंडिया न्यूज से पीछे है. एनडीटीवी को भी फायदा हुआ है लेकिन वह न्यूज24 से पीछे है. सबसे बुरी गत आईबीएन7 की है.

भारी भरकम तनख्वाह पाने वाले भारी मात्रा में विद्वान, क्रांतिकारी, कलाकार, साहित्यकार, भाषणबाज टाइप लोग यहां आईबीएन7 में काम करते हैं पर टीआरपी के मामले में यह चैनल लगातार धूल चाटता जा रहा है. अब तो यह नौवें नंबर का न्यूज चैनल बन गया है. टीआरपी चार्ट यूं है…

WK 41 2013, (0600-2400)
Tg CS 15+, HSM:
Aaj Tak 17.0 dn 1.5
India TV 13.8 dn 1.8
ABP News 13.1 same
India news 10.8 dn 0.9
ZN 9.6 up 0.7
News 24 8.9 up 0.7
NDTV 6.9 up 1.1
IBN 6.7 dn 0.4
Samay 5.1 up 0.9
DD 3.5 up 0.8
Tez 2.4 dn 0.2
Live India 2.2 up 0.6

Tg CS M 25+ABC
Aaj Tak 17.0 dn 2.5
India TV 14.0 dn 1.1
ABP News 13.4 dn 0.3
India news 10.7 dn 0.8
ZN 10.1 up 0.4
News24 8.3 up 1.3
NDTV 7.8 up 0.8
IBN 7.5 up 0.1
Samay 4.1 up 0.7
DD 2.7 up 0.4
Live India 2.3 up 0.9
Tez 2.0 up 0.1

हिन्दू कालेज में राजेंद्र यादव को दी गई श्रद्धांजलि

दिल्ली। 'हंस' के सम्पादक और प्रसिद्ध साहित्यकार राजेन्द्र यादव के असामयिक निधन पर हिन्दू कालेज के हिंदी विभाग द्वारा श्रद्धांजलि दी गई।  शोक सभा में विभाग के आचार्य डॉ रामेश्वर राय ने कहा कि स्त्री और दलित विमर्श की ज़मीन तैयार करने वाले साहसी सम्पादक और विख्यात लेखक का जाना असामयिक इसलिए लगता है कि उन्होंने अपने को अप्रासंगिक नहीं होने दिया था। 

डॉ राय ने उनके उपन्यास 'सारा आकाश' को हिंदी रचनाशीलता के श्रेष्ठ उदाहरण के रूप ने रेखांकित करते हुए उनके अवदान की चर्चा भी की।  वरिष्ठ प्राध्यापक डॉ हरीन्द्र कुमार ने यादव के कहानी लेखन की चर्चा करते हुए 'जहां लक्ष्मी कैद है' और नयी कहानी आंदोलन में उनकी भूमिका के बारे में बताया। 

विभाग की पत्रिका 'हस्ताक्षर' की सम्पादक डॉ रचना सिंह ने हस्ताक्षर में उनके साक्षात्कार के बारे में बताया और कहा कि अपने मत पर अडिग रहने वाले दूरदर्शी सम्पादक के रूप में यादव जी को याद किया जाता रहेगा। सभा में विभाग के प्रभारी डॉ विमलेन्दु तीर्थंकर ने कहा कि कहानी, उपन्यास और सम्पादन के साथ साथ यादव जी को हिंदी गद्य की उच्च स्तरीय समीक्षा के लिए भी याद किया जाता रहेगा।

डॉ तीर्थंकर ने 'अठारह उपन्यास ' को उपन्यास आलोचना की श्रेष्ठ कृति बताया और कहा कि गद्य के लिए साहित्य में जैसा मोर्चा राजेंद्रा यादव ने लिया वह कोई साधारण बात नहीं है।  डॉ अरविन्द सम्बल और डॉ रविरंजन ने भी सभा में भागीदारी की।  संयोजन कर रहे हिंदी साहित्य सभा के परामर्शदाता डॉ पल्लव ने कहा कि पाखण्ड से भरे भारतीय जीवन में अपनी स्थापनाओं के लिए राजेन्द्र यादव को याद किया जाता रहेगा। उन्होंने कहा कि हंस के माध्यम से यादव जी ने अपने समय की सबसे प्रभावशाली और ईमानदार पत्रिका पाठकों को दी। अंत में सभी अध्यापकों और विद्यार्थियों ने दो मिनिट का मौन रख राजेन्द्र यादव के प्रति श्रद्धांजलि व्यक्त की।

रविरंजन

सहायक आचार्य

हिंदी विभाग

हिन्दू कालेज

दिल्ली

 

अमृतसर में अखबार विक्रेताओं की हड़ताल, भास्कर के सरकुलेशन मैनेजर ने दी गालियां

अमृतसर में अखबार विक्रेताओं की यूनियन की हड़ताल के चलते पिछले चार दिनों से दैनिक भास्कर अखबार नहीं बंट रहा है. अखबार विक्रेता यूनियन बहुत दिनों से अपना कमीशन बढ़ाने के लिये संस्थान से बात कर रहा था. भास्कर के सर्कुलेशन स्टेट हेड मनीष सिंह कई बार अमृतसर का दौरा कर चुके हैं और उन्होंने यूनियन के प्रधान से बात करके मामला सुलझाने की कोशिश की, लेकिन यूनियन अपनी बात पर अड़ा रहा और अन्ततः कोई उम्मीद ना देख रविवार को हड़ताल की घोषणा कर दी.

चूंकि दीपावली का समय है तो इस समय विज्ञापन भी खूब प्रकाशित होता है. ऐसे में अगर अखबार घर-घर नहीं बंट पा रहा तो भास्कर मैनेजमेंट के हाथ पांव फूलने लगे. आरोप है कि भास्कर के जालंधर सर्कुलेशन मैनेजर देवी प्रसाद ने अखबार विक्रेता यूनियन, अमृतसर के प्रधान बाबूराम को फोन करके गालियां दी और कहा कि सबको हिमाचल में बंधवा कर मारूंगा. अमृतसर के 90 प्रतिशत अखबार विक्रेता हिमाचल के ही रहने वाले हैं इसलिये सारे अखबार विक्रेता और नाराज हो गये हैं. अखबार विक्रेता यूनियन के प्रधान ने ये बातचीत रिकार्ड करके सबको सुना भी दी है. इस वजह से बात और बिगड़ गयी. बाद में भास्कर के सर्कुलेशन स्टेट हेड मनीष सिंह को रात के 11:45 बजे अखबार विक्रेता यूनियन के प्रधान के घर जाकर माफी मांगनी पड़ी. लेकिन कोई बात नहीं बनी और अभी तक अखबार नहीं बट रहा.

न्यूज डिस्ट्रीब्यूटर एसोशिएसन, अमृतसर के प्रधान बाबूराम ने भड़ास4मीडिया के साथ बातचीत में देवी प्रसाद द्वारा अभद्रता किये जाने की पुष्टि की और कहा कि उनके पास पूरी बातचीत की रिकार्डिंग है. उन्होंने कहा है कि भास्कर प्रबंधन की तरफ से कोई सार्थक पहल नहीं की जा रही है. भास्कर अखबार विक्रेताओं की मांगों पर ध्यान नहीं दे रहा और ठीक से बात नहीं कर रहा है. यूनियन वाले भी अपनी मांग पर अड़े हुए हैं कि जब तक उनकी मांग नहीं मांगी जाती तब तक कोई अखबार विक्रेता भास्कर की एक भी प्रति नहीं उठायेगा. चार दिनों से हड़ताल जारी है जिससे ना तो लोगों को अखबार मिल पा रहा है और साथ ही जिन्होंने विज्ञापन के लिये लाखों दिये हैं उनका भी नुकसान हो रहा है.

लखनऊ के डीएम, एसपी के स्थानांतरण और समाजसेवियों की सुरक्षा की मांग

लखनऊ। सामाजिक संगठन ऐश्वर्याज सेवा संस्थान, उत्तर प्रदेश ने लखनऊ में महिलाओं और पत्रकारों के साथ मारपीट किये जाने की घटना की निंदा करते हुए इस सम्बन्ध में लखनऊ के जिलाधिकारी तथा वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक का तत्काल स्थानांतरण किये जाने की मांग की है. संगठन ने इन अधिकारियों द्वारा राजधानी में कानून व्यवस्था सुनिश्चित ना किये जाने के कारणों की जांच तथा प्रदेश में सामाजिक कार्यकर्ताओं को चिन्हित कर उनको सुरक्षा प्रदान प्रदान करने का तंत्र विकसित करने की मांगो के साथ राज्यपाल, मुख्यमंत्री को ज्ञापन भेजा है.
 
लखनऊ में कुछ दिनों पहले पूर्व दर्जा प्राप्त मंत्री के बेटे और उसके समर्थकों द्वारा रविवार सरेशाम न्यू हैदराबाद इलाके में दो घंटे तक गुंडई की गई लेकिन कोई इन्हें रोकने वाला नहीं था. इन लोगों ने महिलाओं के हक में काम करने वाले संगठन आली के दफ्तर पर हमला बोलकर तोड़फोड़ और मारपीट की. घर के बुजुर्ग केयरटेकर को मारा पीटा और किराये दारों के यहां भी तोड़फोड़ की. आशीष शुक्ला एनजीओ की दो महिलाओं समेत चार लोगों को बोलेरो में किडनैप करके गोमती नदी के किनारे खाटू श्याम मंदिर के पास ले गया तथा महिलाओं के साथ अभद्रता की तथा रेप करने की धमकी दी. उसके गुंडों ने रास्ते में दोनों युवतियों मारपीट कर लहूलुहान कर दिया तथा उनके मोबाइल फोन, पर्स, एटीएम कार्ड, सेलफोन व दो हजार रूपये भी छीन लिये.
 
प्रदेश की राजधानी में इस तरह दो घंटे तक किडनैपिंग और गंडागर्दी की जाती रही और कोई पुलिस इन लोगों को रोकने वाली नहीं थी. राजधानी में पाश इलाके में प्रशासन की नाक के नीचे ऐसी घटना का हो जाना ये सिद्ध करता है कि जिला प्रशासन राजधानी में कानून व्यवस्था सुनिश्चित करने में असफल रहा है. जब सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों का यह हाल है तो आम लोगों को किस तरह सुरक्षा प्रदान की जा रही होगी इसका अंदाजा लगाया जा सकता है.

राडिया टेप : सीबीआई ने सीनियर इनकम टैक्स आफिसर रिपोर्ट दर्ज की

नई दिल्ली : सीबीआई ने राडिया टेप मामले में एक सीनियर इनकम टैक्स आफिसर के खिलाफ प्राथमिक जांच (पीई) के लिए नई रिपोर्ट दर्ज की है। इस अधिकारी पर अपने तबादले के लिए बिचौलिये के माध्यम से सीबीडीटी के अधिकारियों को रिश्वत की पेशकश करने का आरोप है। सूत्रों ने कहा कि वरिष्ठ आयकर अधिकारी, इस अधिकारी से संपर्क रखने वाले कथित बिचौलिए तथा कुछ अन्य को इस मामले में शुरुआती जांच में नामित किया गया है।

सीबीआई सूत्रों ने कहा, इस आरोप का सत्यापन करना है कि आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण में तैनाती के दौरान उक्त अधिकारी ने कथित तौर पर सीबीडीटी में रिश्वत देकर दिल्ली तबादले के लिये प्रयास किया था। उच्चतम न्यायालय के निर्देश पर सीबीआई ने अब तक 13 पीई दर्ज की हैं। उच्चतम न्यायालय ने सात अक्तूबर को सीबीआई से कहा था कि वह कारपोरेट लाबिस्ट नीरा राडिया टैप मामले से जुड़े विभिन्न मुददें की जांच करे।

इन टैप में राडिया की विभिन्न राजनेताओं, नौकरशाहों तथा उद्योगपतियों से टेलीफोन पर बातचीत रिकॉर्ड है। न्यायालय ने सीबीआई से इस मामले में स्थिति रिपोर्ट दो महीने में पेश करने को कहा है। उल्लेखनीय है कि सीबीआई अंकुला, सिंघभूम (झारखंड) में लौह अयस्क खानों के टाटा स्टील को आवंटन में कथित अनियिमितताओं की जांच कर रही है। इसमें झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोडा तथा झारखंड सरकार के अज्ञात अधिकारियों को आरोपी बनाया गया है।

Sahara seeks modification in SC order barring Subrata Roy to go abroad

New Delhi : Sahara Group on Tuesday moved the Supreme Court claiming there was a mistake in its Monday's order restraining its chief Subrata Roy from leaving the country till it hands over title deeds of its properties worth Rs.20,000 crore to SEBI. Senior advocate C A Sundaram, appearing for Sahara Group, submitted that the apex court had on Monday said if documents are not handed over to the market regulator within three weeks only then Roy would be restrained from going abroad.

Appearing before a bench of justices K S Radhakrishnan and A K Sikri, he said that the order uploaded on the apex court website, however, said that Roy is restrained from going abroad till documents are supplied to SEBI which is different from what the bench had yesterday said.

After hearing Sundaram's contention, Justice Sikri said he will consult his brother judge Justice J S Khehar, who was part of the bench which passed the order yesterday, and will consider its plea.

Holding that it was playing "hide and seek" and cannot be trusted any more, the apex court had yesterday directed the Sahara Group to hand over title deeds of its properties worth Rs.20,000 crore to SEBI warning that failure to comply would mean Subrata Roy cannot leave India.

The order which was uploaded on Supreme Court website, however, said, "Till the above direction (to hand over title deeds to SEBI) is complied with to the satisfaction of SEBI, the alleged contemnors (Roy and other directors) shall not leave the country without the permission of this court."

The order was on Monday passed by justices Radhakrishnan and Khehar.

Making it clear that there is no "escape" from depositing the investors' money with the market regulator, the apex court had asked Sahara to also give valuation reports of properties to SEBI which will verify worth of assets.

Roy's counsel had, earlier, pleaded that his reputation and business will be hit.

The bench, however, had assured Sahara that its interests will be protected if investors money is paid back.

It had posted the case for hearing on November 20 when it would consider passing further orders on what to be done to the properties, whose title deeds will be handed over to SEBI.

Sundaram had submitted that it was not possible to pay Rs.20,000 crore in cash and the company would liquidate if it is directed to pay cash.

He had given details of properties including Ambey Valley and said that title deeds of various assets would run in thousands of pages as 30,000 title deeds are there.

SEBI, however, had expressed reservation over taking title deeds and said the group itself should sell the properties and hand over the cash to it.

But the bench had asked SEBI to go through the title deeds and valuation records of the properties to be handed over to it by Sahara.

The court was hearing three contempt petitions filed by SEBI against Roy, the two firms–Sahara India Real Estate Corp Ltd (SIREC) and Sahara India Housing Investment Corp Ltd (SHIC)–and their directors.

It had on August 31 last year directed the Sahara Group to refund Rs.24,000 crore by November end. The deadline was further extended and the companies were directed to deposit Rs.5,120 crore immediately and Rs.10,000 crore in first week of January and the remaining amount in first week of February.

The group, which had handed over the draft of Rs.5,120 crore on December 5, 2012 has failed to pay the rest of the amount.

It had directed the two companies to refund the money to their investors within three months with 15 per cent interest per annum. It had also said SEBI can attach the properties and freeze the bank accounts of the companies if they fail to refund the amount.

The two companies, their promoter Roy and directors Vandana Bhargava, Ravi Shankar Dubey and Ashok Roy Choudhary were told to refund the collected money to the regulator.

Making it clear that there is no "escape" from depositing the investors' money with the market regulator, the apex court had asked Sahara to also give valuation reports of properties to SEBI which will verify worth of assets.

Roy's counsel had, earlier, pleaded that his reputation and business will be hit.

The bench, however, had assured Sahara that its interests will be protected if investors money is paid back.

It had posted the case for hearing on November 20 when it would consider passing further orders on what to be done to the properties, whose title deeds will be handed over to SEBI.

Sundaram had submitted that it was not possible to pay Rs.20,000 crore in cash and the company would liquidate if it is directed to pay cash.

He had given details of properties including Ambey Valley and said that title deeds of various assets would run in thousands of pages as 30,000 title deeds are there.

SEBI, however, had expressed reservation over taking title deeds and said the group itself should sell the properties and hand over the cash to it.

But the bench had asked SEBI to go through the title deeds and valuation records of the properties to be handed over to it by Sahara.

The court was hearing three contempt petitions filed by SEBI against Roy, the two firms–Sahara India Real Estate Corp Ltd (SIREC) and Sahara India Housing Investment Corp Ltd (SHIC)–and their directors.

It had on August 31 last year directed the Sahara Group to refund Rs.24,000 crore by November end. The deadline was further extended and the companies were directed to deposit Rs.5,120 crore immediately and Rs.10,000 crore in first week of January and the remaining amount in first week of February.

The group, which had handed over the draft of Rs.5,120 crore on December 5, 2012 has failed to pay the rest of the amount.

It had directed the two companies to refund the money to their investors within three months with 15 per cent interest per annum. It had also said SEBI can attach the properties and freeze the bank accounts of the companies if they fail to refund the amount.

The two companies, their promoter Roy and directors Vandana Bhargava, Ravi Shankar Dubey and Ashok Roy Choudhary were told to refund the collected money to the regulator.

साभार : PTI


 

प्री-पोल सर्वे में भाजपा को भारी बहुमत से जिताने वाली खबरों पर आईबीएन7, ईटीवी और तीन अखबारों को नोटिस

रायपुर से एक बड़ी खबर आ रही है. यहां के कलेक्टर और जिला निर्वाचन अधिकारी सिद्धार्थ कोमल सिंह 'परदेशी' ने प्री-पोल सर्वे से संबंधित समाचार के मामले में आदर्श आचरण संहिता के खुला उल्लंघन होने पर रायपुर से प्रकाशित तीन दैनिक समाचार पत्रों के साथ ही एक क्षेत्रीय न्यूज चैनल ईटीवी मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़ और राष्ट्रीय न्यूज चैनल आईबीएन7 को नोटिस जारी करते हुए तीन दिन के भीतर जानकारी मांगी है.

नोडल अधिकारी (निर्वाचन व्यय) एम.डी. कांवरे ने बताया कि रायपुर से प्रकाशित होने वाले तीन दैनिक समाचार पत्रों में 29 अक्टूबर को मतदान से संबंधित प्री-पोल सर्वे का समाचार प्रकाशन किया गया है. यह आदर्श आचरण संहिता का खुला उल्लंघन है। इसी प्रकार एक क्षेत्रीय तथा एक राष्ट्रीय न्यूज चैनल द्वारा भी 28 एवं 29 अक्टूबर को इस संबंध में समाचार प्रसारित किया गया है. उक्त समाचार पेड न्यूज की श्रेणी में प्रतीत होने के कारण संबंधित समाचार पत्रों के सम्पादकों तथा न्यूज चैनलों के ब्यूरो प्रमुखों से जानकारी मांगी गई है कि समाचार किस आधार पर तथा किसके द्वारा प्रसारित या प्रकाशित कराया गया है. इस संबंध में समाचार पत्रों के सम्पादकों एवं न्यूज चैनलों के ब्यूरो प्रमुखों को तीन दिन के भीतर जानकारी प्रस्तुत करने कहा गया है.


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आईबीएन7 प्री-पोल सर्वे : अंबानी पोषित न्यूज चैनलों की भाजपा के पक्ष में लाबिंग के निहितार्थ

मैंने अब तक के जीवन में उन जैसा जनतांत्रिक व्यक्ति नहीं देखा

साहित्य का राजहंस हमें छोड़ गया। आदरणीय राजेंद्र यादव के न रहने से हमने हिंदी साहित्य के उस आवेग, असहमति और साहस को गंवा दिया है, जिसकी भरपाई शायद ही कभी संभव हो और उसके बिना हम एक भारी निरसता और ठंडेपन का अनुभव करेंगे। अभी कल ही तो 'दृश्यांतर' में उनके उपन्यास 'भूत' का अंश पढ़कर मैंने टिप्पणी की थी। राजेंद्र जी के साथ मुझे भी कुछ महीनों काम करने का समय मिला था। मैंने अब तक के जीवन में उन जैसा जनतांत्रिक व्यक्ति नहीं देखा।

वे हम जैसे नवोदित और अपढ़-अज्ञानी लोगों से भी बराबरी के स्तर पर बात करते थे और अपनी श्रेष्ठता को बीच में कहीं फटकने तक नहीं देते थे। किशन से नजरें चुराकर कवि रवींद्र स्वप्निल प्रजापति और मुझे अनेक बार उन्होंने अपनी थाली की रोटी खिलाया था। मैं जब-तब उनका हमप्याला भी बना। वे एक बार कृष्णबिहारी जी के पास अबूधावी गये थे, तो वहाँ से मेरे लिये वहाँ की एक सिगरेट का पैकेट लेकर आये थे। उन्होंने सबसे नौसिखुआ दिनों में 'हंस' के कुछ महीनों में मुझे जो आजादी दी थी, उसे मैं भूल नहीं सकता। बाद में रोजी-रोटी और पारिवारिक जरूरतों के कारण मुझे 'हंस' छोड़ना पड़ा था।

राजेंद्र जी को जब पता चला कि 'हंस' से अधिक मेहनताने का ऑफर एक दूसरी जगह से मुझे है, तो उन्होंने मेरी भावुकता को फटकारते हुए कहा था कि जा, तू…आगे की जिंदगी देख। तुम्हारे आगे अभी लंबी जिंदगी पड़ी है। उन्होंने हंस के संपादकीय में अगले महीने लिखा कि हमारे सहायक संपादक हरे प्रकाश उपाध्याय अब कादंबिनी में आ रहे हैं। ऐसा ही कुछ था। मैंने उनसे पूछा कि आपने 'जा रहे हैं', क्यों नहीं लिखा, तो बोले कि– ''तुम जा नहीं सकते मेरे यहाँ से''।

बाद में जीवन की आपाधापी में उनसे मिलना कम होता गया। मैंने उनसे क्या-क्या छूट नहीं ली। अपनी अज्ञानता में उन पर तिलमिलानेवाली न जाने कैसी-कैसी टिप्पणियां की, कभी एकदम सामने तो कभी लिखकर, पर उन्होंने शायद ही कभी बुरा माना। अगर माना भी हो, तो मुझे तो कम से कम ऐसा आभास नहीं होने दिया। आज यह सब लिखते हुए मैं सचमुच रो रहा हूँ।

राजेंद्र जी, आपसे जो लोग निरंतर असहमत रहते थे और झगड़ते रहते थे- वे सब रो रहे होंगे। अब हमें जीवन और कोई राजेंद्र यादव नहीं मिलेगा। राजेंद्र यादव जैसा कोई नहीं मिलेगा। राजेंद्र जी का जीवन सचमुच खुली किताब की तरह है। दिल्ली के बड़े लेखकों में अगर सबसे ज्यादा उपलब्ध, सहज और मानवीय कोई था, तो राजेंद्र यादव। दिल्ली के मेरे दिनों की अगर मेरी कोई उपलब्धि है, तो राजेंद्र यादव से मिलना, उनसे बहसना और उनके साथ काम करना। बातें काफी हैं, पर मैं अभी नहीं लिख पाऊंगा और सभी तो कभी नहीं लिख पाऊंगा।

लेखक हरे प्रकाश उपाध्याय युवा कवि और पत्रकार हैं. इन दिनों लखनऊ से प्रकाशित हिंदी दैनिक जनसंदेश टाइम्स में फीचर एडिटर के बतौर कार्यरत हैं. उसके पहले कादंबिनी समेत कई पत्रिकाओं-अखबारो में कार्य कर चुके हैं.


भड़ास पर प्रकाशित राजेंद्र यादव के दो पुराने इंटरव्यू आप इन शीर्षकों पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं…

एनडीटीवी में भी काफी पक्षपात : राजेंद्र यादव

कभी पिकनिक मनाने गए और कोई गरीब दिखा, उस पर कहानी दे मारी


भड़ास तक अपनी बात bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

चर्चित साहित्यिक पत्रिकाओं को ‘दृश्यांतर’ ने दी तगड़ी चुनौती

अजित राय बहुत साहसी, गुणी और संवेदनशील पत्रकार और संस्कृतिकर्मी हैं। सबसे बड़ी बात है कि कला और संस्कृति जगत की सारी विधाओं में उनकी दिलचस्पी और दखल रहती है, चाहे सिनेमा हो, रंगमंच हो, ललित कला हो, नृत्य-संगीत से लेकर साहित्य तक हर मोर्चे पर वे कहीं न कहीं अपनी भागीदारी करते दिखाई दे जाते हैं। लंबे समय तक उन्होंने साहित्य-संस्कृति के सभी पहलुओं की गहमागहमी को अंतरंग होकर समझा है।

समकालीन वरिष्ठ लेखकों, फिल्मकारों, पेंटरों और रंगकर्मियों के अंदर-बाहर को उन्होंने बार-बार झांककर देखा है। वे चाहें तो समसामयिक भारतीय संस्कृति की गहमागहमी के पर्दे के पीछे चलने वाले रंगारंग अभिनय को औपन्यासिक रूप में लिखकर बवंडर खड़ा कर सकते हैं, पर वे मित्रताओं और निजताओं का संवेदनशील सजगता और संयम के साथ निर्वाह करते हैं। ऐसे पत्रकार हिंदी में दुर्लभ हैं। ऐसी बहुमुखी प्रतिभा को दूरदर्शन ने अपनी मासिक पत्रिका दृश्यांतर का संस्थापक संपादक बनाकर एक तरह से जग जीत लेने जैसा काम किया है। सरकारी पत्रिकाएं तमाम संसाधनों के बावजूद जिस अधकचरेपन और मूक उपस्थिति को जाहिर करने को अभिशप्त हो जाती हैं, वह हाल दृश्यांतर का नहीं होने जा रहा है। हम आनेवाले समय में देखेंगे कि 'दृश्यांतर' दिल्ली से निकलने वाली चर्चित साहित्यिक पत्रिकाओं के समक्ष किस तरह की कठिन चुनौती पेश करती है।

वैसे अजित राय की जैसी बहुआयामी दिलचस्पी की झलक दृश्यांतर में दिखाई पड़ रही है, उसमें इसकी तो तुलना ही किसी से नहीं है। इसमें एक तरफ श्याम बेनेगल का साक्षात्कार, वही असगर वजाहत का अद्भुत नाटक- पाकिटमार रंगमंडल जो रंगमंच की दुनिया के अभाव और अंतरंग को व्यंग्यात्मक तरीके से सामने लाकर हमारी संवेदनाओं को झकझोर डालता है। यह नाटक रंगकर्मियों की बेचैनी, दुविधा, वेदना और जुगाड़ को जिस तरीके से उजागर करता है, वैसा प्रयास अब तक नहीं दिखाई पड़ा है। पिंजर और मोहल्ला अस्सी के बहाने मशहूर फिल्मकार चंद्रप्रकाश द्विवेदी न सिर्फ सिनेमा और साहित्य के द्वंद्व और फिल्म निर्माण की बारीकियों को सामने लाते हैं बल्कि इन कृतियों में छुपे एक अनूठे पाठ को भी स्पष्ट करने की कोशिश करते हैं।

सी. रामचंद्र और अनारकली से संबद्ध यतीन्द्र मिश्र का लेख भी हमें एक नये तरह के अनुभव से समृद्ध करता है। देवेन्द्रराज अंकुर ने रामगोपाल बजाज पर क्या खूब लिखा है, जो उनकी विकास यात्रा और स्वभाव को समझने में मदद करता है। कुल मिलाकर हर रचना बेजोड़ है। शिवमूर्ति जी ने अपनी माँ की बीमारी और निधन , फिर अपनी बीमारी पर लिखते हुए जीवन और मौत के दार्शनिक पक्षों को समझते दिखाई पड़ते हैं। पहली बार शिवमूर्ति जी की कलम से इतनी दार्शनिकता और वो भी संस्मरण के माध्यम से सामने आयी है। इसके कारण इस पत्रिका को तो लोग संभालकर रख लेंगे और अपने निराशा के समय में बार-बार पढ़ेंगे। विनोद भारद्वाज तो जब भी कोई चीज लिखते हैं, उसमें इतना जीवंत आवेग होता है कि उसे पढ़ते हुए सिनेमा देखने का अनुभव हासिल होता है। वे सचमुच हिंदी के आधुनिक और बोल्ड लेखक हैं।

अजित राय जी को कभी उनकी रचना प्रक्रिया और जीवन को जीने और समझने के समझने की प्रक्रिया को लेकर अनौपचारिक साक्षात्कार पेश करना चाहिये। तेजेन्द्र शर्मा तो कमाल के लेखक हैं ही। यहाँ उनका उपन्यास अंश पढ़ लीजिये- विल्जडन जंक्शन। आप भी उनके मुरीद हो जाएंगे। अदभुत प्रेम कथा है। और हां अपने राजेंद्र यादव जी को देखिये। भूत में वे औरत और मर्द के रिश्ते को जिस साहस से व्यक्त कर रहे हैं- ऐसा तो कोई भी युवा लेखक या लेखिका भी नहीं कर पा रही है। सत्येंद्र प्रकाश, उमेश चतुर्वेदी और मंजीत ठाकुर के लेख भी बहुत अच्छे हैं।

विश्वनाथ प्रसाद तिवारी की डायरी भी है, जिससे उनकी अलग ही संवेदनशीलता प्रकट होती है- उनकी राजनीतिक सजगता का यह रूप मैं पहले नहीं समझ पाया था। सचमुच बधाई के पात्र हैं अजित राय जी, पर इतना बेहतर काम करके वे बहुत से विघ्नसंतोषी पैदा कर लेंगे। बहुत लोग जिनका रचनात्मकता से कोई लेना-देना नहीं है, जो किसी कॉलेज या यूनिवर्सिटी में हिंदी पढ़ाते हैं या किसी लेखक संगठन में झंडा लिये साहित्य के मसीहा बने फिरते हैं- वे सब जरूर ही अजित राय के सामने भी बाधाएं पैदा करेंगे। उनसे भी साहस के साथ उन्हें जूझना होगा। कोई भी पत्रिका मैं इस तरह एक झटके में नहीं पढ़ पाता पर दृश्यांतर ऐसी पत्रिका ही है जिसे आप एक झटके में पढ़े बिना रह ही नहीं सकते।

लेखक हरे प्रकाश उपाध्याय युवा कवि और पत्रकार हैं. इन दिनों लखनऊ से प्रकाशित हिंदी दैनिक जनसंदेश टाइम्स में फीचर एडिटर के बतौर कार्यरत हैं. उसके पहले कादंबिनी समेत कई पत्रिकाओं-अखबारो में कार्य कर चुके हैं.


'दृश्यांतर' मैग्जीन के बारे में ज्यादा जानकारी के लिए इसे भी पढ़ सकते हैं…

'दृश्यांतर' मैग्जीन के विमोचन में बोले नामवर सिंह- 'ये अजित राय तो संपादकीय लिखने लगा'

टीवी टुडे ग्रुप में गार्डों की बदतमीजी से स्टाफ परेशान

टीवी टुडे नेटवर्क के चैनलों में मैनेजमेंट की शह पर आजकल सिक्योरिटी गार्डों की गुंडई चल रही है. ये गार्ड हर किसी से गलत तरीके से बोलकर उन्हें अपमानित करते हैं. इससे काम करने वाला स्टाफ खुद को बहुत ही अपमानित महसूस करता है लेकिन नौकरी के डर से कोई बोलता नहीं है.

आलम यह है कि चाहे कोई मंत्री हो या रिपोर्टर, जब आफिस में आता है तो उसकी ऐसे तलाशी ली जाती है जैसे कोई आतंकवादी हो और जब जाता है तो भी तलाशी ली जाती है जैसे चोर हों. यहां तक कि शूट पर जाती टीम की भी तलाशी ली जाती है. ऐसे माहौल में वहां काम करने वालों का दम घुट रहा है. कृपया खौफ और तलाशी का ऐसा अपमानित करने वाला दौर न चलाएं. सुरक्षा जांच के लिए और भी तरीके हैं, उन्हें अपनाएं. कम से कम आफिस से जो निकल रहा हो उसकी तलाशी तो ना ली जाए.

भड़ास को मिले एक पत्र पर आधारित.

उत्तर प्रदेश में सरकारी भर्तियां और अखबारों की चांदी

उत्तर प्रदेश के विभिन्न सरकारी महकमों में बंपर भर्तियों की प्रक्रिया जारी है, जिसमें शिक्षा व पुलिस विभाग प्रमुख हैं. फिलहाल शिक्षा विभाग के अंतर्गत प्राथमिक विद्यालयों में उर्दू शिक्षकों व उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों में विज्ञान व गणित शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया चल रही है. ऐसे में यूपी सरकार की अखबारों को विज्ञापन देने की गलत नीति के कारण तीन प्रमुख अखबारों की चांदी कट रही है. लेकिन, यूपी के खजाने से पैसे की बेवजह बर्बादी हो रही है जो कि आम आदमी के खून पसीने की गाढ़ी कमाई में से कुछ अंश टैक्स के रूप हासिल कर जमा किया जाता है. 
 
असलियत में मामला यह है कि यूपी की सपा सरकार द्वारा शिक्षकों की भर्ती के लिए विज्ञापन निकाले जा रहे हैं, जिसके आवदेनों को ऑनलाइऩ मंगाया गया है. ऑनलाइन आवेदनों के लिए सरकार ने एक अलग से वेबसाइट भी चला रखी है. इस पूरी प्रक्रिया में गलत नीति यह है कि प्रदेश के प्रत्येक जिले के जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी द्वारा अपने जिले में अभ्यर्थियों से ऑनलाइन आवेदन आमंत्रित करने के लिए अखबारों में विज्ञापन दिए जा रहे हैं. विज्ञापन करीब दो कॉलम से लेकर ढाई कॉलम तक का होता है. सभी जिलों के विज्ञापनों में रिक्तियों की संख्या के अतिरिक्त सभी कुछ एक जैसा है. प्रदेश में 71 जिले हैं. एक ही बात को प्रदेश भर में 71 बार कहने के लिए तीनों अखबारों को 71-71 विज्ञापन मिल रहे हैं. एक विज्ञापन को प्रदेश भर में प्रकाशित किया जा रहा है. विज्ञापन प्रदेश के तीन समाचार पत्रों दैनिक जागरण, अमर उजाला व हिदुस्तान में प्रकाशित किए जा रहे हैं. तो ऐसे में प्रदेश की खराब विज्ञापन नीति का लाभ भी यही तीनों अखबार उठा रहे हैं.
 
इस मामले में प्रत्येक जिले से प्रदेश भर में तीन से चार बार विज्ञापन प्रकाशित किये जायेंगे. अभी ऑनलाइन आवेदन का विज्ञापन, फिर कट ऑफ लिस्ट का विज्ञापन प्रत्येक जिले द्वारा प्रदेश भर में अलग-अलग प्रकाशित करवाया जायेगा. ऐसे ही दूसरी कट ऑफ लिस्ट का विज्ञापन, फिर तीसरी का शायद चौथी कट ऑफ लिस्ट की भी आवश्यकता पड़ जाये, क्योंकि एक-एक अभ्यर्थी ने तीस-तीस, चालीस-चालीस जिलों में आवेदन किया है. मालूम यह भी पड़ा है कि कुछ धुरंधर अभ्यर्थियों ने सभी 71 जिलों में आवदेन कर दिया है.
 
होना यह चाहिए था कि प्रदेश के शिक्षा सचिव द्वारा प्रदेश के तीनों प्रमुख अखबारों में जिलेवार रिक्तियों की सूची देते हुए आवश्यक सूचना के साथ ऑनलाइन आवेदन के लिए केवल एक विज्ञापन प्रकाशित करवाना चाहिए था. इसी प्रकार वेबसाइट पर पहली, दूसरी या शायद तीसरी, चौथी कट ऑफ लिस्ट जारी होने की सूचना के एक-एक विज्ञापन सभी अखबारों में प्रकाशित करवाने चाहिए थे.
 
हो सकता है सपा के कर्ता-धर्ता सोच रहे हो कि विज्ञापन के जरिए अखबारों को ऑब्लाइज किया जा सके ताकि जारी छीछालेदर को कम किया जा सके. वैसे सपा सरकार का शिक्षा विभाग में भर्ती प्रक्रिया शुरु करने के लिए तहेदिल से शुक्रिया अदा तो किया ही जाना चाहिए. चलो इस बहाने अखबारों की भी कमाई हो गई. अखबार वाले भी खुश, अभ्यर्थी भी खुश, शायद सरकार भी अपनी पीठ खुद ठोककर खुश हो रही होगी. सभी खुश. सभी की चांदी.
 
                  आशीष कुमार कुमार पत्रकारिता एवं जनसंचार में शोध कर रहे हैं. इनसे 09411400108 पर संपर्क किया जा सकता है.
 

राजेन्द्र यादव, हिन्दी साहित्य का चमकता सितारा

राजेन्द्र यादव नहीं रहे. हिन्दी साहित्य का एक सितारा सो गया. राजेन्द्र यादव को क्या कहा जाय कहानीकार, उपन्यासकार, कवि या सम्पादक. राजेन्द्र यादव ने सब कुछ तो किया और वो भी मजबूती के साथ. साहित्य के मठों में नहीं गये लेकिन हर मठाधीश उनके सामने सिर झुकाता था.
 
आगरा में 1929 में जन्में और प्रारम्भिक से लेकर उच्च शिक्षा आगरा में ही प्राप्त की. 1951 में आगरा विश्वविद्यालय से एमए हिन्दी प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण किया. उनका विश्वविद्यालय में पहला स्थान रहा था.
 
नयी कहानी की तिकड़ी के तीसरे स्तम्भ थे राजेन्द्र यादव. उन्होंने कमलेश्वर और मोहन राकेश के साथ मिलकर हिन्दी साहित्य में नयी कहानी की शुरुआत की थी. उन्होंने अपनी रचनाओं में समाज के वंचित तबकों तथा महिला अधिकारों की पैरवी की. उन्होंने हिन्दी में स्त्री आंदोलन और उसके लेखन को एक आवाज और दिशा दी.
 
प्रेमचंद द्वारा प्रकाशित की जाने वाली पत्रिका हंस का पुनर्प्रकाशन शुरू किया और अन्त तक इसके सम्पादक बने रहे. उन्होंने प्रेमचंद के जन्मदिवस 31 जुलाई 1986 को अक्षर प्रकाशन के तले इसका प्रकाशन प्रारम्भ किया. हंस के सम्पादक रहते हुए उन्होंने इस साहित्यिक पत्रिका को सामाजिक बहसों का मंच बना दिया जो एक बड़ी उपलब्धि रही. वे बहसें जो इस समाज में यहां तक कि साहित्यिक बिरादरी में भी नहीं हो रही थी, राजेन्द्र यादव उन्हें बाहर ले आये.
 
राजेन्द्र यादव ने हिन्दी के नये ना जाने कितने नये कथाकारों को हंस में स्थान दिया. वे ऐसे सम्पादक रहे जो रचना के अप्रकाशित होने पर भी पाठक को सूचना देते थे तथा साथ में रचना की कमियों पर टिप्पणी भी करते थे कि कैसे इसे सुन्दर बनाया जाय. हंस का जो स्थान आज था उसके लिये राजेन्द्र जी ही जिम्मेदार थे.
 
उनके निधन पर साहित्य जगत से उन्हें श्रद्धांजलि दी जा रही है. उनके साथ हंस में काम कर चुके तथा वर्तमान में समकालीन सरोकार के सहायक सम्पादक हरेप्रकाश उपाध्याय ने अपने फेसबुक पेज पर उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए कहते हैं कि "मैंने अब तक के जीवन में उन जैसा जनतांत्रिक व्यक्ति नहीं देखा। वे हम जैसे नवोदित और अपढ़-अज्ञानी लोगों से भी बराबरी के स्तर पर बात करते थे और अपनी श्रेष्ठता को बीच में कही फटकने तक नहीं देते थे."
 
हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा में प्राध्यापक सुनील कुमार सुमन ने लिखा है "राजेन्द्र जी घोषित तौर पर अंबेडकरवादी नहीं थे लेकिन उन्होंने अंबेडकरवाद की ज़मीन तैयार करने में अपनी बड़ी भूमिका निभाई. तमाम तरह की कुंठाओं और सामंती संस्कारों से लैस हिंदी के बड़े-बड़े मठाधीशों के बीच राजेन्द्र जी 'डॉन' बनकर अपनी ठसक के साथ रहे और ब्राह्मणवाद के खिलाफ अपनी लौ को अंत तक तेज़ किए रहे."
 
राजेन्द्र यादव इस समय के सबसे चर्चित कहानीकार थे लेकिन उन्होंने केवल कहानी ही नहीं बल्कि उपन्यास कविता तथा कई रचनाओं का अनुवाद भी किया. वे पिछले कुछ समय से अस्वस्थ होने के बावजूद हंस का संपादन करते रहे.
 
प्रेत बोलते हैं, उखड़े हुए लोग, कुल्टा, शह और मात, एक इंच मुस्कान इनके प्रमुख उपन्यास हैं. प्रेत बोलते हैं जिसका पुनः प्रकाशन सारा आकाश के नाम से हुआ, इस पर सारा आकाश नाम से ही वासु चटर्जी ने एक फिल्म भी बनायी थी. इनके कई कहानी संग्रह प्रकाशित हुए जिनमें देवताओं की मृत्यु, खेल खिलौने, जहां लक्ष्मी कैद है, वहां पहुचने की दौड़ प्रमुख है. आवाज तेरी है के नाम से इनका एक कविता संग्रह भी प्रकाशित हुआ.
 
राजेन्द्र यादव अपने विचार बेबाकी से रखने के लिये जाने जाते रहे. इसकी वजह से वो विवादों में भी रहे. हंस के सालाना वर्षगांठ पर किये जाने कार्यक्रमों की वजह से भी वो विवादों में आये तथा लोगों ने उनपर आरोप लगाये. ये भी कहा गया कि वे जानबूझकर चर्चा में बने रहने के लिये विवाद करते हैं. वे अपने ऊपर लगे आरोपों पर हंस में जवाब देते थे.
 
उनका विवाह मन्नू भंडारी के साथ हुआ था. उनकी एक बेटी है. मन्नू भंडारी भी लेखिका हैं राजेन्द्र यादव के साथ उनका एक उपन्यास एक इंच मुस्कान 1963 में प्रकाशित हो चुका है. उनका वैवाहिक जीवन सुखद नहीं रहा था और उन्होंने एक दूसरे से दूर रहने का फैसला कर लिया था.
 

सिंधी दैनिक हिंदू के संपादक किशन वर्यानी का निधन

सिंधी दैनिक हिंदू के मुख्‍य संपादक किशन वर्यानी का सोमवार को मुंबई में निधन हो गया. वे 77 वर्ष के थे तथा कुछ दिनों से अस्‍वस्‍थ चल रहे थे. सोमवार की शाम को उनका अंतिम संस्‍कार वैदिक रीति से मुंबई में किया गया. वे अपने पीछे बच्‍चों का भरा पूरा परिवार छोड़ गए हैं. किशन जी लंबे समय से सिंधी समाचार पत्र का प्रकाशन कर रहे थे. वे समाज की बेहतरी के लिए लगातार प्रयासरत थे. किशन वर्यानी के निधन पर सिंधी समाज एवं पत्रकारिता जगत ने शोक जताया है.

बसपा नेता के समर्थकों ने एनबीटी के फोटोग्राफर को उठाया

: पुलिस ने कराया मुक्‍त : लखनऊ में इन दिनों बसपा के एक पूर्व राज्‍यमंत्री के परिवार व समर्थकों ने हंगामा मचा रखा है. बसपा नेता आशीष शुक्‍ला की पुत्री ने दो दिनों पूर्व घर से भागकर एनजीओ आली के पास पहुंची तथा आरोप लगाया कि उसके पिता और भाई उससे छेड़छाड़ कर रहे हैं. उसने थाने में दोनों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दिया. इसकी सूचना जब बसपा नेता आशीष शुक्‍ला को मिली तो उनके समर्थक आली के ऑफिस पहुंच गए तथा हंगामा मचाने लगे.

इसकी सूचना मिलने पर नवभारत टाइम्‍स का फोटोग्राफर शरद भी पहुंच गया. शरद से जब फोटो खिंचनी शुरू की तो पूर्व मंत्री समर्थकों ने उसका अपहरण कर लिया तथा कहीं ले जाने लगे. आली के लोगों ने इसकी सूचना पुलिस को दी. पुलिस ने वाहन का पीछा कर शरद को मुक्‍त कराया. शरद ने इस मामले की एफआईआर दर्ज करा दी है. बताया जा रहा है कि बसपा नेता की पुत्री किसी युवक से विवाह करना चाहती है, जिसके लिए परिवार तैयार नहीं और यह हंगामा जारी है. कोर्ट परिसर में भी पूर्व मंत्री समर्थकों ने सोमवार को हंगामा किया.

जाने माने साहित्यकार राजेन्द्र यादव का निधन

हिन्दी साहित्य और नयी कहानी के प्रमुख हस्ताक्षर राजेन्द्र यादव नहीं रहे. वे 84 वर्ष के थे. कल देर रात सांस लेने में तकलीफ होने के चलते अस्पताल ले जाते वक्त रास्ते में ही उन्होंने दम तोड़ दिया.
 
राजेन्द्र यादव का जन्म 28 अगस्त 1929 को उत्तर प्रदेश के आगरा जिले में हुआ था. उन्होंने प्रारम्भिक तथा उच्च शिक्षा आगरा में ही पाई. उन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से 1951 में हिन्दी विषय से एमए किया था. वे हंस के सम्पादक थे. उन्होंने ही हंस का पुनर्प्रकाशन 1986 में प्रारम्भ किया था.
 
राजेन्द्र यादव ने हिन्दी साहित्य में नयी कहानी की शुरुआत की थी. वे अपने लेखन में महिलाओं के अधिकारों तथा समाज के वंचित तबकों के लिये आवाज उठाते रहे थे. वे अपनी बेबाक बयानी के लिये भी जाने जाते थे. वे हर मुद्दे पर खुलकर अपनी राय रखते थे. 
 

उनका पार्थिव शरीर दिल्ली के मयूर विहार स्थित उनके घर पर रखा गया है. आज दोपहर उनका संस्कार किया जायेगा. लेखिका मन्नू भंडारी के साथ उनका विवाह हुआ था. उनकी एक बेटी भी है.

चिल्लाहट, चुप्पी और मौन : आदमी होना या आदमखोर होना बनाम आदमियों से उपर उठना

चिल्लाने वाले चुप हो जाएंगे.. जो चुप बैठे हैं वो चिल्लाएंगे… कुछ चुप-चिल्लाहट के मर्म जान धीरे धीरे मौन साध जाएंगे… उन्हीं की ये दुनिया नहीं जो… चुप हैं और घात में हैं या फिर… जो चिल्ला रहे हैं और हावी हैं… ये दुनिया उनकी ज्यादा है… जो मौन हैं, स्वेच्छाधारी मौन… देखिए न, ये आसमान ये हवाएं ये बनस्पतियां ये तारे सितारे ये समुद्र ये पाताल ये जलचर नभचर प्राणी चेतन अचेतन… सब तो ज्यादातर मौन रहते हैं…. हमसे ज्यादा योगदान करते हैं इस धरती के बचे-बने रहने में.. इस धरती के जीने लायक बनाए रखने में… अपने मौन के मंत्र के माध्यम से…

एक हम मनुष्य ही हैं जो घात-प्रतिघात के चुप-चिल्लाहट के जरिए लगातार बिगाड़ रहे हैं धरती के लय सुर ताल को… और, कहते हैं कि हम सबसे समझदार हैं… अरे नादानों, तुमसे बड़ा मूर्ख नहीं इस धरती पर… अपने ही जाल में फंसकर अब मरते चले जा रहे हो… और तेज कर दी है स्पीड धरती के काउंटडाउन की… टिक टिक टिक टिक की सुई कोई सुने ना सुने… वो सुन रहे हैं बहुत तेज… जिनके हाथ में हैं दुनिया भर के कब्जाए हुए संसाधन और दूसरों से छीनकर अर्जित किया हुआ सामर्थ्य… उन्हें पता है इस लंगड़ी लूली होती जाती धरती का असली हाल… सो हो रहीं तैयारियां जाने के अंतरिक्ष के उस पर, किसी दूसरी धरती पर बसेरा बसाने के लिए….

शायद यही नियति है… या शायद ऐसे ही चलता रहता है सब… क्या फरक पड़ता है आपकी विचारधारा क्या है… क्या फर्क पड़ता है आपकी पार्टी क्या है… क्या फर्क पड़ता है आप आम जनता के समर्थक हैं.. क्या फर्क पड़ता है आप आम जनता के विरोधी हैं… क्या फर्क पड़ता है आप जातिवादी हैं.. क्या फर्क पड़ता है आप जातिवादी हैं.. क्या फर्क पड़ता है कि आप आदमी के साथ हैं या कि आदमखोर हैं! अंततः होना तो यही है कि मनुष्य लड़ेगा मनुष्य से या मनुष्य बचाएगा मनुष्य को… पर दोनों ही स्थितियों में मर रही धरती को बचाने की संभावनाएं शून्य है क्योंकि हम लोगों के एजेंडे में सिर्फ आदमी ही आदमी भरपूर है… जो आदमी को मार रहे या जो आदमी को बचा रहे, दोनों के लिए अंतिम सच आदमी का बॉस बन कर राज करने, शासन करने के सुख को जीने का है.. उनके एजेंडे में बड़े वृहत्तर, मानवेतर, यूनीवर्सल सवाल आएंगे ही नहीं क्योंकि आदमी आदमी को उखाड़ने के लिए लगा रहेगा, मारने के लिए लगा रहेगा… इसी प्रक्रिया में कोई चिल्लाएगा.. कोई चुप रहेगा… घात-प्रतिघात का खेल चलता रहेगा… हत्यारों की टोली होगी तो हत्याविरोधियों की भी टोली जन्मेगी… कभी इनका पलड़ा भारी तो कभी उनका… फारमेट बदलते रहेंगे… काम यही होता रहा है.. होता रहेगा..

आदमी से परे सोचना विचारना अमूर्त कहा जाता है … और इस मनःस्थिति में पहुंच गयों को आदमी कम माना जाता है…. बुढ़ा गया माना जाता है… खिसका हुआ पाया जाता है… दुनियादारी से भागा हुआ कहा जाता है…. पर क्या रक्खा है आप आदमियों की दुनिया में.. सिवाय अंतहीन चिल्लाहट युक्त चुप्पी और चुप्पी युक्त चिल्लाहट के सिवा…

चलिए, आप चिल्ला रहे हैं तो चिल्लाना जारी रखिए.. चिल्लाने से होने वाले लाभों का खूब पता है आपको इसलिए मचाते रहिए अपने हिसाब से चीख-चिल्लाहट… आप चुप हैं, आप नजर रखे हुए हैं, आप सही वक्त के इंतजार में हैं, आप रणनीतिक हैं, आप कर गुजरते हैं, चिल्लाते नहीं तो आप भी जबर्दस्त कर रहे हैं… लगे रहिए और एक के बाद एक सफलताएं अपनी झोली में डालते रहिए क्योंकि आपको खूब पता व पसंद है अपनी चुप्पी के जरिए शिकार करने की स्टाइल या चुप्पी को अचानक चिल्लाहट में बदल डालने का छापामार राज…

मेरा साथ उनके साथ जो मौन-मगन हैं… जो जान चुके हैं मौन की मंजिल… जिन्हें जीना है मौन को… इसलिए उन्हें पाना है वो माहौल, बनाना है वो माहौल, तलाशनी है वो जगह जहां मौन पाया जाता है भरपूर… उसे बस भर लेना होता है सांसों में, नथुनों में भरपूर… .फुला लेना होता है पूरा फेफड़ा ताकि चुप्पी, चिल्लाहट, हाहाकार, आय हाय, हाय हाय के साइड इफेक्ट्स से मुक्ति पा सकें और जी सकें वो नया वक्त जो शुरू होता है मौन की मंजिल पर पहुंचने के बाद.. मौन को पाकर भीतर समा लेने के बाद… जय हो….

लेखक यशवंत भड़ास से जुड़े हुए हैं. उन्होंने अपनी मनःस्थिति, मन में चलने वाले कुछ सवालों, कुछ स्थितियों को उपरोक्त शब्दों के जरिए सामने रखा है ताकि इस रॉ यानि कच्चे किस्म के मंथन-चिंतन पर कुछ और लोग रोशनी डालें, सवालों को जवाब की दिशा में ले जाएं. संपर्क: yashwant@bhadas4media.com

आईबीएन7 प्री-पोल सर्वे : अंबानी पोषित न्यूज चैनलों की भाजपा के पक्ष में लाबिंग के निहितार्थ

Yashwant Singh : असल में सब कुछ अंबानी के आदेश के तहत हो रहा है. बहुत पहले यह तय किया जा चुका है कि अंबानी समूह अबकी मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहता है. इस बारे में एक शीर्ष स्तरीय बैठक विदेश में हुई थी. चर्चा तो यहां तक है कि मोदी को पीएम बनाने के एजेंडे पर काम करने के मुकेश अंबानी के फरमान पर राजदीप सरदेसाई ने अपनी असहमति जताते हुए बैठक का बहिष्कार कर दिया था. लेकिन बाद में उन्हें ढर्रे पर यानी पटरी पर यानि सब कुछ बुझे मन से मान लेना पड़ा.

मीडिया घरानों को कारपोरेट घरानों ने इसीलिए कब्जाना शुरू किया ताकि वे देश की राजनीति की दशा-दिशा तय करने में खुलकर खेल सकें और देश के जन-मानस को अपने हिसाब से बदलने में कामयाब हो सकें. अभी तक वो लोग ये काम पर्दे के पीछे से करते थे, यानि पार्टीज को फंडिंग के जरिए करते थे. पर अब कारपोरेट घराने कोई मोर्चा छोड़ना नहीं चाहते. उन्हें अब ऐसा पीएम चाहिए जो आम जनता को भरमा सके, बांध सके, जरूरत पड़ने पर सेना-पुलिस से विरोधियों को कुचलवा सके, कारपोरेट घरानों के तेज विकास के लिए रास्ता-माहौल बना सके और देश के संसाधनों के कारपोरेट्स के बीच भरपूर बंटवारे व उपभोग की प्रक्रिया को तेज कर सके…

कांग्रेस राज में पग-पग पर मौजूद करप्शन के दैत्य से खफा और जनता में लोकतांत्रिक प्रणाली (जो कि अंततः पूंजीपतियों, कारपोरेट घरानों, बड़े लोगों, प्रभावशाली लोगों, एलीट लोगों को लगातार विकास कराते रहने वाली प्रणाली है) के प्रति बढ़ते विरोध व मोहभंग को ध्यान में रखकर कारपोरेट घरानों ने इस बार बदलाव कराने के लिए अपने स्तर पर खूब तैयारियां कर ली हैं. इसी दिशा में मीडिया का एजेंडा सेट कर दिया गया है. जाने कब से मोदी को मीडिया राष्ट्रीय हीरो और संभावित पीएम की तरह ही पेश कर रहा है. यहां तक कि अगर राहुल व मोदी अलग अलग जगहों पर एक साथ भाषण देते हैं तो मोदी सबसे ज्यादा भाव, स्क्रीन, कवरेज पाते हैं…

बात हो रही थी अंबानी के मीडिया घराने यानि नेटवर्क18 की. अंबानी के जो न्यूज चैनल है, आईबीएन7, सीएनएन-आईबीएन, ईटीवी आदि को यह कह दिया गया है कि इस बार हर हाल में बीजेपी को प्रमोट करना है. इसी एजेंडे के तहत देश के जनमानस को बदलने का काम शुरू कर दिया गया है. छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में भारी बहुमत से भाजपा सरकार की वापसी का ऐलान इन अंबानी पोषित न्यूज चैनलों ने कर दिया है… इसी लाइन पर अन्य प्रदेशों और लोकसभा चुनावों से संबंधित प्री-पोल सर्वे आप देखने-सुनने-पढ़ने वाले हैं…

मुझे बिलकुल आश्चर्य नहीं हुआ कि आखिर ये अंबानी पोषित न्यूज चैनल क्यों बीजेपी के पक्ष में जोरदार तरीके से दांव लगा रहे हैं.. सारा कुछ पहले से तय था… अब उसे एक्जीक्यूट किया जा रहा है और इस एक्जीक्यूशन के दौर में राजदीप सरदेसाई, आशुतोष आदि जैसे एक्जीक्यूटिव जोरशोर से लगे हुए हैं… आईबीएन7 पर शिवराज सिंह खूब प्रसन्न दिखे … ये होना ही था, क्योंकि उनके पीछे बड़े बड़ों का हाथ हैं… जब अंबानी हों साथ तो फिर क्यों न बने बात…

(भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.)


Vikram Singh Chauhan : मुझे बिलकुल आश्चर्य नहीं हुआ कि आखिर ये अंबानी पोषित न्यूज चैनल क्यों बीजेपी के पक्ष में जोरदार तरीके से दांव लगा रहे हैं.. सारा कुछ पहले से तय था… अब उसे एक्जीक्यूट किया जा रहा है और इस एक्जीक्यूशन के दौर में राजदीप सरदेसाई, आशुतोष आदि जैसे एक्जीक्यूटिव जोरशोर से लगे हुए हैं… आईबीएन7 पर शिवराज सिंह खूब प्रसन्न दिखे … ये होना ही था, क्योंकि उनके पीछे बड़े बड़ों का हाथ हैं… जब अंबानी हों साथ तो फिर क्यों न बने बात…

आईबीएन ,द वीक और सीएसडीएस का मिला -जुला चुनाव पूर्व सर्वेक्षण आया जिसमें बताया जा रहा है कि मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा तीसरी बार चुनाव जीत रही है .यह पूरा सर्वेक्षण एकपक्षीय ,पूर्वाग्रह से प्रेरित ,गलत तथ्यों व पैरामीटर (पैमाने ) पर आधारित हैं . कोई भी निष्पक्ष प्रेक्षक ,समीक्षक और सर्वेक्षक के साथ ही छत्तीसगढ़ में स्व्यमं सत्ता में बैठे शीर्ष राजनेताओं को अपनी जीत पर विश्वास नहीं है .सीएम से लेकर नीचे स्तर तक के मंत्रियों पर खुलेआम भ्रष्टाचार का आरोप है ऐसे में यह सर्वेक्षण विचलित करता है .आईबीएन में राजदीप सरदेसाई से लेकर कई बड़े नाम है ! लेकिन उनका यह सर्वे सर के ऊपर से निकल रहा है .भाजपा व कांग्रेस ने सभी 90 प्रत्याशियों की अभी घोषणा भी नहीं की और यह सर्वे गुमराह करके एंटी इन्कमबैंसी फैक्टर को नज़रअंदाज़ कर रहा है .कांग्रेस व भाजपा के बीच मतों का अंतर 2008 में डेढ़ फीसदी से कम था उस अंतर को यह सर्वेक्षण 14 फीसदी तक ले जा रहा हैं .

हम नहीं कहेंगे यह प्लांटेड व टेन्टेड ,पेड़ खबर है पर 8 दिसंबर को यह साबित हो जायेगा कि भाजपा की हैट्रिक इस बार तो नहीं ! मोदी फैक्टर का स्थानीय लोगों पर उतना असर नहीं है जितना मेट्रो शहरों में हो सकता है .प्रायोजित भीड़ जुटाने में भगवाई हमेशा आगे रहते है .आईबीएन के साथ सर्वेक्षण में एक रीज़नल चैनल भी जुड़ा है इसलिए निष्पक्ष सर्वेक्षण पर ऊँगली उठना स्वाभाविक है ,क्योकिं रीज़नल चैनल थोक में इनसे अर्थ लेते रहे है ? .वैसे हमें 2004 में एनडीए का ''फीलगुड '' याद है . मुगालते में रहकर जीना भाजपा ने सीख लिया है .भाजपा को इस सर्वे से खुश होना चाहिए लगता है राजदीप सरदेसाई का 52 करोड़ का बंगला बनाने में रमन और शिवराज का बड़ा हाथ है !

विक्रम सिंह चौहान के फेसबुक वॉल से.

शोभन सरकार का स्टिंग कर ले आए इंडिया टीवी के पत्रकार अभिषेक उपाध्याय

तेजतर्रार पत्रकार अभिषेक उपाध्याय ने वो काम कर दिखाया, जिसे इतने भारी-भरकम मेनस्ट्रीम मीडिया वाला कोई पत्रकार-संपादक नहीं कर पाया. हजार करोड़ टोने वाली चर्चा, कुचर्चा, खबर, अभियान, गासिप, दावा… जो कह लीजिए… के असली जनक शोभन सरकार तक कोई मीडिया हाउस नहीं पहुंच पाया और न ही किसी ने जरूरत समझी कि इस शख्स को सामने लाकर इनकी असलियत, इनकी सोच, इनका नजरिया आम जनता के सामने पेश किया जाए.

शोभन सरकार के प्रतिनिधि के नाम पर एक भदेस बाबा जो ओम बाबा के नाम से जाने जाते हैं, मीडिया के सामने आते और उसी तरह से बयान देकर चले जाते जिस तरह से पोलिटिकल पार्टियों के प्रवक्ता करते हैं. मीडिया वालों पर जाने क्या भय, दबाव, डर था कि किसी ने शोभन सरकार के यहां घुसने की हिम्मत नहीं जुटाई. शायद उन्हें डर था कि कहीं इतने बड़े संत बिगड़ न जाएं और तस्वीर न छापने के अपने आदेश का उल्लंघन होते देख श्राप न दे दें.

इससे समझ सकते हैं कि हम लोगों के देश में न्यूज चैनल वालों और अखबार वालों की दिमागी हालत कितनी लोकतांत्रिक हो पाई है. मीडिया का काम होता है सच्चाई को सामने लाना और इस कड़ी में जो सबसे पहले काम किया जाना चाहिए था वह था शोभन सरकार को शीघ्र से शीघ्र सामने लाना. देश में एक से बढ़कर एक स्टिंगबाज हैं. एक से बढ़कर एक तुर्रमखां संपादक हैं. एक से बढ़कर एक चैनल और उसके ज्ञानवान संपादक हैं. एक से बढ़कर एक टीआरपीबाज हैं. पर किसी को यह नहीं लगा कि शोभन सरकार तक पहुंच कर उनकी असली सोच, असली चिंतन को सामने लाया जाए.

अभिषेक उपाध्याय को बधाई. इंडिया टीवी को बधाई. इसे विनोद कापड़ी की इंडिया टीवी से विदाई के साथ ही नकारात्मक दौर के खात्मे का नतीजा माना जाए या कमर वहीद नकवी के आगमन से इंडिया टीवी के तेवरों में आए सकारात्मक बदलाव का परिणाम. जो भी मानिए, पर इस स्टिंग ने इंडिया टीवी को बाकी हिंदी न्यूज चैनलों से बहुत अलग खड़ा कर दिया है.  शोभन सरकार का स्टिंग करके अभिषेक उपाध्याय और इंडिया टीवी ने पूरे प्रकरण के एक और मजबूत व जरूरी पक्ष को सामने ला दिया. उम्मीद करते हैं कि बाकी न्यूज चैनल इस स्टिंग से सबक लेंगे और ऐसे प्रकरण सामने आने पर तुरंत इस तरह की खोजी पत्रकारिता को आगे कर सच्चाई को जल्द से जल्द जनता के सामने लाने का प्रयास करेंगे.

अभिषेक उपाध्याय द्वारा किए गए स्टिंग और इससे संबंधित खबर जो इंडिया टीवी चैनल पर प्रसारित हो चुकी है, को देखने के लिए यहां क्लिक करें…


http://www.indiatvnews.com/video/india-tv-exclusive-india-tv-meets-039-gold-treasure-039-baba-shobhan-sarkar-1-30023.93.html

http://www.indiatvnews.com/video/india-tv-sting-operation-india-tv-meets-039-gold-treasure-039-baba-shobhan-sarkar-2-30024.93.html


इंडिया टीवी की वेबसाइट पर इस स्टिंग आपरेशन के बारे में जो टेक्स्ट फार्मेट में खबर है, वो यूं है…

India TV meets 'gold treasure' baba Shobhan Sarkar

Unnao (UP) : Shobhan Sarkar, the man who triggered a massive hunt by Archeological Survey of India for the imaginary 1,000 tonnes of gold said to be hidden inside the earth on the grounds of an old crumbling fort in Daundiya Kheda, has for the first time in Indian television spoke to India TV reporter about the excavation.

With the help of a hidden camera India TV reporter Abhishek Upadhyay with cameraman Balram Yadav recorded Shobhan Sarkar's interview, and brought his face before the world.

After days of painstaking efforts, the India TV team went to Shivla in Kanpur, nearly 70 km from Daundiya Kheda. Both the reporter and cameraman were subjected to rigorous body check, yet they managed to take a hidden camera.

Shobhan Sarkar spoke to India TV on the "gold treasure" and on governance. The baba is popular in Unnao and neighbouring areas, but he has no opulent bungalow, no limousines nor any ashram fitted with air-conditioners.  Watching Shobhan Sarkar, nobody can believe he can predict the existence of 1,000 tonnes of hidden gold.

A man of average build, wheatish complexion, aged 51 years, Shobhan Sarkar gets his head, moustache and beard fully shaved. He does not wear cloth on his upper torso. From the waist below, he wraps a saffron dhoti, and uses part of the dhoti to cover his shaved head. No ear rings, no string of beads on his neck. The baba always stays without footwear.

When India TV team went to meet him, he was sitting on the floor on a 'chatai' (mat made of sticks), with some newspapers displaying news about th excavation.

India TV reporter Abhishek Upadhyay began with the question on the gold treasure.

Abhishek: You had said that you are in a spiritual world. The way you predicted 1,000 tonnes of gold, science can never predict.
Shobhan Sarkar: Look, our gurus now want establishment of dharma. It's not the gold of Daundiya Kheda, nor the gold of Adampur. It's the spectacle of the penance of our gurus. Do you understand? This is all 'tap kaa tamaasha' (the spectacle of penance).  Nothing else.. Now we will speak about Adampur and tell them, all of you jointly excavate, if you can recover then do it.

The baba was clearly saying it was all a 'tamasha' (spectacle), but he is adamant on his prediction.  The baba said: "treasures are never exhausted.. nor can anybody recover them".

Abhishek: One thing, India was once used to be described as "sone ki chidiya" (the golden bird).

Shobhan Sarkar:  At every step, my son.
Abhishek: There was the Chandragupta Maurya empire, the Gupta empire, Ashoka's empire, when India used to be described as 'sone ki chidiya'. Then foreign invaders came, the British came, did they take away all the gold?

Shobhan Sarkar: Look, my son, they took *****(expletives deleted).  Everything is lying here inside the earth, with Mother Earth. Say, you die after burying two pots inside earth. Your soul will stay with the pots. Your soul will encircle those pots.  Human soul is like the sky, nobody can see it, nobody can take it away. If you want, you can kill them, and if you want, you can give it away, but the treasure remains with the soul of the human being, nobody can take it away, whatsoever one may do, they will get nothing.

When India TV reporter asked why he did not disclose about the existence of golden treasures to people all these years, the baba replied:  "Son, I am not hungry for fame that I'd go around speaking to all and sundry".

(Shobhan Sarkar on Monday made a secret trip by steamer on the river Ganga to Daundiya Kheda, spoke to ASI officials and policemen and returned to his ashram.)

Union minister of state for Food Processing Charan Das Mahant is an old disciple of Shobhan Sarkar. It was the baba who after writing a letter to RBI about the hidden gold, handed another letter to Mahant. The minister spoke to senior leaders at the Centre, ASI and Geological Survey of India, and directions were issued to start excavation.
Shobhan Sarkar told Mahant that if gold was recovered, he would become the chief minister of Chhattisgarh, from where he hails.

Abhishek: A case has been filed against Charandas Mahant.

Shobhan Sarkar: So what, what the ****(expletive deleted) can they do? I have already told him he will become the CM after the elections.

Abhishek: Of Chhattisgarh?

Shobhan Sarkar: Aur kya (what else)?

Abhishek: But Charandas Mahant is now cornered?

Shobhan Sarkar: Howsoever he may be cornered..let the gold come out, then Charandas will become Charandas, and shout clearly to say he has done nothing wrong. These are all his party's men..The party is divided, isn't it? If gold is found, Charan will become Charan, and say I did this. He will be in stupor.

Abhishek: Does he have the right to claim so?

Shobhan Sarkar: Yes he does have the right.

The baba continues to claim that Rs 3 lakh crore worth gold will definitely be found.

(साभार: इंडिया टीवी)

भड़ास के एडिटर यशवंत की रिपोर्ट. संपर्क: yashwant@bhadas4media.com

मुक्ता पाठक से बातचीत में दिग्विजय सिंह ने खोले पब्लिक-प्राइवेट जीवन के कई राज

मध्य प्रदेश की पहली महिला टेलीविज़न पत्रकार और आजकल 'जिया न्यूज' चैनल की मध्य प्रदेश स्टेट हेड के रूप में कार्यरत मुक्ता पाठक ने पिछले दिनों दिग्गज कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह का लंबा इंटरव्यू किया. यह इंटरव्यू जिया न्यूज पर प्रसारित भी हुआ. इंटरव्यू में मुक्ता से बातचीत के दौरान दिग्विजय सिंह ने अपने पब्लिक और प्राइवेट जीवन के कई सारे राज साझा किए.

अपने रिटायरमेंट, अपनी जीवन संध्या से बात शुरू करके दिग्विजय ने गांधी परिवार, खुद के परिजनों, राजनीति की दशा-दिशा, खुद के जीवन व सोच आदि पर विस्तार से बातचीत की. इस 28 मिनट के इंटरव्यू को आप भी यहां क्लिक करके देख-सुन सकते हैं…

http://www.youtube.com/watch?v=zJn9pFsLkFU

Menace of paid news!

Rapid advancement in Information Technology and communications and their convergence have paved the way for the media to permeate the lives of people through various communication modes of newspaper, radio, Television, Internet, mobile phone and so on. Simultaneously, a menacing syndrome of paid news has overtaken Indian media world barring few honourable exceptions. The dangerous trend of presenting the paid information as news content has spread at remarkable pace across the media to benefit particular individuals, organizations or corporate entity. What are essentially advertisements, are disguised as paid news syndrome.

In this backdrop, dissemination of information, which is meant to be factual, neutral, fair and objective, is vitiated. The paid news trend is a serious and damaging fraud on the innocent public. It undermines and threatens democratic process by impacting free and fair elections, affects financial, stock, real estate market, health and industry and is also a tax fraud. It is so clandestine and subtle that conclusive proof cannot be had except the circumstantial one. News Broadcasters Association (NBA) calls it just a matter of ethics. This viewed in the context of size and dimensions of Indian media is mind boggling with enormous potential for distortion and damages to the time tested fabric of the nation.

As on December 31, 2012, Indian media comprise 93,985 registered newspapers, 850 TV channels of which 413 are news and current affairs channels and 437 non-news entertainment and programme channels and over 920 million mobile telephony. Added to this, Doordarshan runs 37 channels. Besides, there are 250 FM radio and numerous websites and online news agencies.

Election Commission of India (ECI), Press Council of India (PCI) and Securities and Exchange Board of India (SEBI) have in their respective investigations reported that paid news is a logical culmination of the crass commercialism in the media, which has now reached the level of blackmail and extortion. It is a natural outcome of convergence of editorial, advertising, public relations and lobbying industries. This has become an organized phenomenon that large PR firms, professional designers and ad agencies handle contracts worth unfathomable enormous amount of money, not just to position ads but to create them.

Emergence of paid news is alluded to decline of journalists with imposition of contract system on them. Contract system reduces journalists to marketing agents, ad copywriters and stenographers. It demeans role and status of editors. It erodes freedom enjoyed by journalists under the Working Journalists Act. Under this syndrome, the revenue determines importance of news that it may generate to the media company. With the preponderance of management, the institution of the professional editorial has collapsed. Some other reasons include decline of the independence of journalists caused by annihilation of journalists’ union, imposition of contract system for journalists and so.

Some other relevant pointers relate to beginning of the concept of media being seen like any other business rather than a mission with no social and political responsibility towards country, initially during the last decade of the 20th century. Keeping this in consideration, paid news contract deals are struck at top level and all that editors get are time-to-time instructions to carry a particular news item or photographs. This has blurred distinction between management and editorial. Emergence of the trend of newspapers without editors and owners becoming editors is the other cause of paid news. The whole system of paid news is now institutionalized with the media owners themselves taking money. Yet another alarming trend is emergence of army of stringers in vernacular and language press. They are ill paid though the proprietors are making fortunes. Stringers double up as agents collecting ads for the organizations and earning commission on the revenue that comes from such ads.

The other startling trend is private treaties between media companies and corporations that enable the corporations to transfer certain shares to media companies, considered a form of paid news, militating against the rights of people to be informed accurately and truthfully. Private treaties help market and regularize boosting of corporate marketing as news. Another vicious trend is cross media holdings that promote monopolies in media and come in the way of free flow of information. Paid news in Supplement, Head mast carries advertorial, entertainment and promotional features.
Any solution to the problem of paid news calls for people at large to fight for their inherent right to correct news. The Government generally develops cold feet in contemplating action against such racketeering. Media claim that they are just a business and a case is made out to raise the bogey of “attack on the press freedom”, which usually scares off the Government from taking action.
To deal with this menace, ECI, PCI and SEBI have favoured improving working conditions, job security and editorial independence to journalists, a statutory regulatory mechanism in view of a glaring failure of self-regulatory mechanism of media themselves, mandatory disclosure by the media companies or group of its stake in the corporate sector along with stringent audit of accounts, conflict of interest, revenue sources, transparency, compliance of Corporate Governance, adherence to Programme and Advertising Codes, creating strong public opinion that paid news is diluting their right to free flow of information and they are fed information which is not correct. These are considered to be the best antidotes in the long run.

The free media in our system of the rule of law based democratic governance should convey correct and true information to the people. With paid information presented as news content as deliberate, false, suggestive, innuendos and half-truths, people are misled and their judgments hampered to form correct opinion. This also generates negative sentiments all about the nation, its time tested values and otherwise. Hence, urgent need to protect the right of public to correct and unbiased information!

M.Y. Siddiqui

Former Director, Public Relations, Ministry of Law & Justice and Railways

भदोही के वरिष्ठ पत्रकार सुरेश गांधी का घर लूटने वालों के खिलाफ रपट दर्ज

ज्ञानपुर-भदोही। संत रविदास नगर भदोही के वरिष्ठ पत्रकार सुरेश गांधी के कमरे का ताला तोड़कर लाखों के सामान उठा ले जाने के मामले में कोतवाली भदोही ने न्यायालय के आदेश पर विनोद गुप्ता पुत्र स्वर्गीय बाकेलाल गुप्ता व सुमित गुप्ता उर्फ बिट्टू पुत्र विनोद गुप्ता सहित दो अन्य के खिलाफ रपट दर्ज की है। घटना पहली जून 2013 की है। घटना के बाद पत्रकार द्वारा पुलिस अधीक्षक सहित सूबे के मुख्यमंत्री व आला अफसरों को रजिस्टर्ड सूचना दी थी, बावजूद इसके पुलिस रपट दर्ज नही की। बाद में पत्रकार द्वारा मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के यहां याचिका दायर की। विद्वान अधिवक्ता तेज बहादुर यादव की दलीलों के बाद सीजीएम ने कोतवाली भदोही को रपट दर्ज करने का आदेश दिया।

अभियोजन पक्ष के अधिवक्ता ने बताया कि पत्रकार सुरेश गांधी मेहीलाल बिल्डिंग स्टेशन रोड भदोही मे किराए के मकान में रहते थे। उनके साथ उनकी पत्नी समेत दो बच्चे भी थे। यहां से वह अपने कार्यालय के भी कामकाज करते थे। मकान मालिक विनोद गुप्ता आदि को हर माह किराए देते रहे। गत दिनों पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों के नाकामी और गैर जिम्मेदाराना कार्यों सहित भदोही में हुए दंगे में प्रशासनिक लापरवाही व जनप्रतिनिधियों के काले कारनामों को उजागर करने पर डीएम एसपी व कुछ जनप्रतिनिधि कुपित हो गये। साजिश के तहत कोतवाल भदोही संजयनाथ तिवारी ने बिना किसी अपराध के पत्रकार के खिलाफ धारा 110 जाब्ता फौजदारी के अन्तर्गत उपजिलाधिकारी को रिपोर्ट दे दिया और जब पत्रकार ने 23 मार्च 2013 को दोपहर में अपना जवाब दाखिल किया कि पुलिस द्वारा दर्ज की गई कार्यवाही के तीनों मुकदमों में पुलिस ने खुद फाइनल रिपोर्ट लगाई है या वह न्यायालय से दोषमुक्त हैं तो कोतवाल ने मकान मालिक विनोद गुप्ता व सुमित गुप्ता निवासी काजीपुर रोड भदोही को साजिश में लेकर रंगदारी मांगने की झूठी रपट दर्ज कर दी। पुलिस ने पत्रकार के खिलाफ गुंडा एक्ट की कार्यवाही कर दी और बगैर मौका दिए जिलाधिकारी ने 9 अप्रैल 2013 को जिला बदर कर दिया। इस दौरान पुलिस व प्रशासन पत्रकार को मारने-पीटने व गिरफ्तार करने की धमकी देती रही। इसी बीच उच्च न्यायालय इलाहाबाद ने 20 मई को जिलाबदर की कार्यवाही पर रोक लगा दी। इसके पूर्व पत्रकार जब गुण्डाएक्ट व जिलाबदर के चलते जनपद से बाहर था तो 7 मई 2013 को मकान मालिक ने कमरे का ताला तोड़कर विज्ञापन के 1.5 लाख नगद, जेवर, जरूरी कागजात व तमाम साक्ष्य उठा ले गये। इसकी सूचना पत्रकार की पत्नी रश्मि गांधी ने कोतवाली से लेकर एसपी तक को दी, लेकिन रपट नहीं लिखी गई। 30 मई 2013 को लूट की प्रार्थना पत्र तैयार कर पहली जून 2013 को सुबह सीजीएम न्यायालय में 156 (3) जाब्ता फौजदारी के अन्तर्गत याचिका दायर की और सुबह 10 बजे कमरे पर आकर अपनी मौसी के बेटे के शादी में शामिल होने के लिए कुछ कपड़े लेकर जीप से बनारस चले गये। वहां से बस से रांची के लिए चले गये। इस बीच सायंकाल 4 बजे मोबाईल से सूचना मिली कि पुलिस की मौजूदगी मे मकान मालिक आदि कमरे का ताला तोड़कर सामान उठा ले जा रहे हैं। इसकी सूचना तत्काल गांधी की पत्नी ने मोबाईल के जरिये कोतवाली व एसपी के अलावा शहर के तमाम संभ्रांत नागरिकों को दी और ऐसा न करने व तोडफोड व लूटपाट रोकवाने की गुहार लगाई, लेकिन सुनवायी नहीं हुई। मकान मालिक विनोद गुप्ता व बिट्टू गुप्ता आदि मेरी शादी में मिले व 15 सालों में कमाई के गृहस्थी कमरे में रखे दो कम्प्यूटर सेट, कैमरा, वीडियो कैमरा, आज तक चैनल का लोगो, आलमारी, फ्रिज, वाशिंग मशीन, रंगीन टीवी, पलंग, कपड़े व कमरों मे रखे अन्य सभी कीमती लगभग 20 लाख के सामान उठा ले गये। गांधी ने बताया कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस उत्पीड़नात्मक मामले में डीएम, एसपी व कोतवाल समेत प्रमुख गृह सचिव को नोटिस भेजकर जवाब तलब किया है। इसके अलावा पुलिस द्वारा दर्ज मुकदमों पर रोक लगा दी है।

भड़ास तक कोई भी जानकारी bhadas4media@gmail.com पर मेल करके पहुंचा सकते हैं.

मासिक न्यूज मैग्जीन ‘क्लाउन टाइम्स’ के दस साल पूरे, दादा अजय मुखर्जी होंगे सम्मानित

बनारस : मासिक समाचार पत्रिका 'क्लाउन टाइम्स' ने 10 वर्षों की सफल यात्रा पूरी कर 11वें वर्ष में प्रवेश किया है। इस यात्रा के दौरान 'क्लाउन टाइम्स' ने न केवल अपने सामाजिक दायित्वों का बखूबी निर्वाह किया बल्कि अन्याय, अत्याचार, शोषण एवं भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। साथ ही पत्रकार हितों की खबरों को भी क्लाउन टाइम्स ने प्रमुखता दी। यही वजह है कि संघर्ष के शुरुआती वर्षों के बाद इस पत्रिका ने आम लोगों के साथ ही मीडिया जगत में एक अलग पहचान बनायी।

खबरों को नयी धार व विस्तार देनें के क्लाउन टाइम्स के सतत प्रयासों और उनको लगातार अपनी वेबसाइट पर प्रसारित करने के चलते भारत ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में इस पत्रिका के पाठकों की संख्या में लगातार वृद्धि हुई। क्लाउन टाइम्स के 11वें वर्ष में प्रवेश करने के उपलक्ष्य में 29 अक्टूबर को अपराह्न डेढ़ बजे से बनारस के होटल रेडिसन में एक समारोह का आयोजन किया गया है जिसमें शहर के तीन विशिष्टजनों श्री अनिल कुमार जैन जिन्होंने क्षय मुक्‍त काशी के नारे के साथ मानवता की सेवा की, श्री सुरेन्‍द्र नारायण गौड जिन्‍होंने तालाब और कुण्‍डों के अतिक्रमण के विरुद्ध अलख जगा रखी है व श्री अजय मुखर्जी जिनका सर्वहारा वर्ग के हक की लडाई व प्रेस कर्मचारियों के हितों की रक्षा के लिए महत्‍वपूर्ण योगदान रहा है, को 'माटी के सपूत सम्मान 2013' से सम्मानित करने का संकल्‍प लिया गया है।

इस समारोह में अंधविश्वास के खिलाफ लड़ाई में शहीद हुए महान समाजसेवी डॉ. नरेंद्र डाभोलकर की बेटी मुक्ता डाभोलकर को विशेष रूप से आमंत्रित किया गया है। दूसरी ओर मिर्गी से जुड़े अंधविश्‍वास को हमेशा के लिए समाप्‍त करने की डॉ. विजय नाथ मिश्र (काशी हिन्‍दू विश्‍वविद्यालय के न्‍यूरोलॉजी विभागाध्‍यक्ष) की मुहिम पर क्‍लाउन टाइम्‍स द्वारा प्रकाशित विशेषांक को इस मौके पर लोकार्पित किया जायेगा। उल्‍लेखनीय है कि डॉ. मिश्र मिर्गी रोग संबंधी अंधविश्‍वास के खिलाफ बनायी गई अपनी फिल्‍म 'एक नया दिन' के माध्‍यम से देश भर में लोगों को जागरूक करने में जुटे हुए हैं। आने वाले दिनों में ये फिल्‍म भारत के अलावा सार्क से जुड़े सातो देशों में दिखाई जाएगी।

प्रेस विज्ञप्ति


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इंटीग्रेटेड मेडिकल एसोसिएशन ने दिलबर गोठी और अमलेंदु भूषण खां को सम्मानित किया

आयुर्वेदिक, यूनानी और सिद्धा पद्धति के डॉक्टरों की संस्था इंटीग्रेटेड मेडिकल एसोसिएशन ने पत्रकारिता के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य के लिए नवभारत टाइम्स के स्थानीय संपादक दिलबर गोठी और नेशनल दुनिया के विशेष संवाददाता अमलेन्दु भूषण खां को पिछले दिनों हिन्दी भवन में सम्मानित किया।

सम्मान प्राप्त करते अमलेंदु भूषण खां.


दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री डॉ. अशोक कुमार वालिया और विधानसभा अध्यक्ष डॉ. योगानंद शात्री ने दोनों पत्रकारों को प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया। दिलवर गोठी पिछले तीस सालों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं जबकि अमलेन्दु भूषण खां पिछले बीस सालों से पत्रकारिता कर रहे हैं। नेशनल दुनिया से पहले अमलेन्दु भूषण खां अमर उजाला में थे और पत्रकारिता की शुरुआत द टाइम्स ऑफ इंडिया बोकारो, झारखंड से शुरु की। द इंडियन नेशन, हरिभूमि समेत कई संस्थानों से अमलेंदु जुड़े रहे हैं।

झांसी में पत्रकार को पुलिस ने हवालात में बंद कर बुरी तरह पीटा, अस्पताल में भर्ती

सच का सामना कराने की आदत के कारण झाँसी में एक पत्रकार को पुलिस की बर्बरता का शिकार होना पड़ा। एक पत्रकार को झाँसी के नवाबाद थाना इलाके के मंडी चौकी में बंद कर दरोगा ने घंटो पीटा। लाठी डंडों और पिस्टल की बटों से पत्रकार को इतना पीटा कि पुलिस के चंगुल से मुक्त होने के बाद उसे अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। इस पूरी बर्बरता का कारण थी वह खबर, जिसमें लूट की शिकार एक मरणासन्न महिला की खबर इस पत्रकार ने दरोगा के मना करने के बावजूद चला दी थी।

घटना उस समय घटी जब पत्रकार कुलदीप अवस्थी का एक मित्र शहर से अपने घर बरुआसागर ओर जा रहा था। रास्ते में बस स्टैण्ड पर तैनात कुछ सिपाहियों ने रुपया वसूलने के मकसद से वाहन रोक लिया। जब काफी प्रयास के बाद वाहन नहीं छूटा तो वाहन में सवार जीतेन्द्र बिरथरे ने कुलदीप को मामले की जानकारी दी। कुलदीप अपने मित्र की सहायता करने के

अस्पताल में भर्ती पीड़ित पत्रकार
अस्पताल में भर्ती पीड़ित पत्रकार
मकसद से मंडी चौराहे पर पहुंचे। यहाँ सिपाहियो से उसकी बात चल ही रही थी कि इसी बीच चौकी प्रभारी सुनीत सिंह वहाँ आ पंहुचा। कुलदीप को देखते ही उसने अपने सिपाहियों से मामले के जानकारी ली और कुलदीप को धमकी देते हुए कहा कि गाड़ी तो बाद में छूटेगी पहले मेरे खिलाफ खबर दिखाने का अंजाम तो देख लो। इसके बाद दरोगा ने जीतेन्द्र और कुलदीप को चौकी में बंद कर कार में सवार महिलाओं को गाली देकर भगा दिया। चौकी में बंद कर दरोगा सुनीत ने पुलिसिया जुल्म की को तस्वीर पेश की उसे सुनने के बाद रुह तक काँप उठेगी।

दारोगा ने कुलदीप और जीतेन्द्र को लाठी डंडों से पीटना शुरू किया। बीच बीच में कुलदीप से यह भी कहता रहा कि अब और दिखाना मेरे खिलाफ खबर। रात दस बजे से शुरू हुयी यह यातना देर रात तक चलती रही। किसी तरह यह बात कुछ पत्रकारों को मालूम हुयी तो उन्होंने पुलिस के आला अधिकारियो को इसकी जानकारी दी और बंधक पत्रकार को मुक्त कराने की कोशिश की। हालांकि पुलिस अधिकारियों के जवाब से यह साफ़ हो गया कि सब कुछ उनकी संज्ञान में है और पत्रकारों को सबक सीखने के लिए कुलदीप पर यह जुल्म ढाया गया। यह पूरी घटना पच्चीस अक्टूबर की रात की है।

डीआईजी को ज्ञापन देते पत्रकार

देर रात कुलदीप को कुछ पत्रकारों की मदद से मुक्त कराया जा सका। इसके बाद सुबह पत्रकारों ने झाँसी के जिलाधिकारी और एसएसपी से मिलकर दारोगा सुनीत पर मुकदमा दर्ज़ करने की मांग की। इस मामले में जिलाधिकारी तनवीर जफ़र अली ने मैजिस्ट्रेटी जांच के आदेश और जांच रिपोर्ट के आधार पर कारर्वाई का सरकारी आश्वासन पत्रकारों को दिया। एसएसपी इस पूरे मामले में दारोगा की तरफदारी करते दिखे। उसे निलम्बित करने और उस पर मुकदमा दर्ज़ करने में उनकी उदासीनता के बाद पत्रकारों ने डीआईजी सूर्यनाथ सिंह और कमिश्नर बीवी सिंह से मुलाकार कर आंदोलन की चेतावनी दी। पत्रकारों ने डीआईजी को बताया कि दारोगा सुनीत बलात्कार के एक मामले में जेल के हवा खा चुका है। इसके अलावा इस पर अपने ही विभाग के एक सिपाही को पीटने का भी मुकदमा दर्ज़ किया जा चुका है।

सैय्यद हुसैन ने ‘इंडिया टीवी’ ज्वाइन किया, मिथिलेश ‘अमर भारती’ में सीनियर सब एडिटर बने

सैय्यद हुसैन के बारे में पता चला है कि उन्होंने इंडिया टीवी के साथ नई पारी की शुरुआत की है. उन्होंने बतौर सीनियर प्रोड्यूसर और स्पोर्ट्स एंकर ज्वाइन किया है. सैय्यद इरशाद हुसैन इससे पहले आर्यन टीवी, पटना में एंकर हेड और स्पोर्ट्स एडिटर के पद पर कार्यरत थे. वे न्यूज एक्सप्रेस, नोएडा में भी एंकर कम एसोसिएट प्रोड्यूसर के रूप में कार्य कर चुके हैं. उसके पहले मौर्य टीवी में एंकर कम रिपोर्ट होते थे. सैय्यद हुसैन टीवी9, मुंबई के भी हिस्से रह चुके हैं.

मिथिलेश कुमार सिंह ने 'अमर भारती' प्रकाशन समूह' में 'वरिष्ठ उप-संपादक' के पद पर ज्वाइन कर लिया है. पिछले कई सालों से अमर भारती दैनिक अख़बार का कामकाज देख रहे देवनाथ के 'जी न्यूज' में जाने के उपरान्त सूचना प्रोद्योगिकी क्षेत्र से जुड़े मिथिलेश कुमार सिंह को यह महत्वपूर्ण जिम्मेवारी सौंपी गयी है. मिथिलेश राजनीतिक क्षेत्रों में पत्रकारिता में सक्रिय रहे हैं और साहित्यिक समझ भी रखते हैं.

भड़ास तक कोई भी जानकारी bhadas4media@gmail.com पर मेल करके पहुंचा सकते हैं.

सुप्रीम कोर्ट को भी सहारा पर भरोसा नहीं, सेबी से सहारा वालों की संपत्ति के कागजात जमा कराने को कहा

सहारा का असली चेहरा सामने आता जा रहा है. इस कंपनी ने जनता को मूर्ख बनाकर हजारों करोड़ रुपये इकट्ठा किया और जब गलत तरीके से इकट्ठे किए गए पैसे को लौटाने के लिए कहा गया तो यह ग्रुप तरह-तरह से आनाकानी कर रहा है. अब तो सुप्रीम कोर्ट ने कह दिया है कि उसे सहारा कंपनी पर बिलकुल भरोसा नहीं. सेबी-सहारा मामले में सहारा ग्रुप को तगड़ा झटका लगा है. आज मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सहारा ग्रुप को 20,000 करोड़ रुपये की प्रॉपर्टी के असली दस्तावेज सौंपने को कहा है.

साथ ही जस्टिस केएस राधाकृष्णन और जेएस खेहर की पीठ ने निवेशकों का पैसा वापस लौटाने के मामले में सेबी की ओर से दाखिल अवमानना याचिका पर सुनवाई के दौरान दो टूक शब्दों में कहा है कि सहारा ने सेबी और सुप्रीम कोर्ट से बार बार सच छुपाया है और कंपनी पर बिलकुल विश्वास नहीं किया जा सकता.

सुप्रीम कोर्ट ने सहारा को प्रॉपर्टी दस्तावेज तीन हफ्ते में सेबी को सौंपने के लिए कहा है. सहारा के दस्तावेज नहीं मिलने पर सुब्रत रॉय के देश छोड़ने पर रोक लगाई जा सकती है. सहारा का कहना है कि सेबी को 2,500 एकड़ जमीन के दस्तावेज सौंपेगे.  संपत्तियों के मालिकाना हक के ये दस्तावेज सहारा को 2008-09 में बांड जारी कर एकत्र किए गये धन की वापसी की जमानत के तौर पर जमा कराने हैं. समूह की दो कंपनियों- सहारा इंडिया रीयल एस्टेट कॉर्प और सहारा सहारा हाउसिंग इन्वेस्टमेंट कॉर्प ने 2008 में-09 में बांड जारी कर आम लोगों से धन जुटाया था. इसे लेकर पूंजी बाजार नियामक सेबी ने आपत्ति जताई थी. सुप्रीम कोर्ट ने बीते साल 31 अगस्त को सहारा समूह को निवेशकों के 24 हजार करोड़ रुपये 30 नवंबर तक वापस करने का आदेश दिया था.

सोमवार को सुनवाई के दौरान पीठ ने सहारा के रवैये पर नाराजगी जताते हुए कहा, 'लुका-छिपी का खेल बहुत हुआ, वह अब निवेशकों का पैसा देने से नहीं बच पाएगा.' कोर्ट ने सहारा को संपत्ति के मालिकाना हक के मूल दस्तावेज उनकी मूल्यांकन रिपोर्ट के साथ सेबी के पास जमा कराने का आदेश दिया. सेबी सहारा की ओर से जमा कराए गए दस्तावेजों व मूल्यांकन रिपोर्ट की जांच करेगा। इस मामले की अगली सुनवाई 20 नवंबर को होगी.

सहारा के वकील सी सुंदरम ने संपत्तियों के मालिकाना हक के मूल दस्तावेज जमा कराने का विरोध करते हुए कहा था कि पंजाब नेशनल बैंक (पीएनबी) कंपनी की जमीन की सिक्योरिटी ट्रस्टी बनने को राजी है. पहले सहारा की ओर से जमा कराए गए दस्तावेजों की जांच की जाए. इसके अलावा कंपनी की ओर से जमा कराए गए 5,120 करोड़ रुपये का आकलन किया जाए. अगर फिर भी पैसा कम पड़े तो पंजाब नेशनल बैंक की ओर से दी गई सिक्योरिटी को बेचकर बकाया पैसा ले लिया जाए. कंपनी की ओर से जमा कराए गए दस्तावेजों की जांच से पहले ही संपत्तियों के मालिकाना हक के कागजात लेने से रीयल एस्टेट के बिजनेस में लगी कंपनी को अपूरणीय क्षति होगी. लेकिन सहारा के इस सुझाव पर सेबी के वकील राजी नहीं हुए.

राहुल चौधरी छुट्टी पर चल रहे, इंडिया टीवी में जाने की संभावना

आजतक के एसाइनमेंट हेड राहुल चौधरी के बारे में ताजी सूचना ये मिली है कि उन्होंने अभी चैनल से इस्तीफा नहीं दिया है. रिफत जावेद से विवाद के बाद वे अवकाश पर चल रहे हैं. बताया जाता है कि विवाद खबर वेब पर ब्रेक हो पहले या टीवी पर, इसको लेकर था. रिफत जावेद का कहना था कि खबर आते ही सबसे पहले आजतक की वेबसाइट पर ब्रेक हो और न्यूज चैनल विजुअल का इंतजार करे और विजुअल आने पर ब्रेक करे. राहुल चौधरी का कहना था कि ब्रेकिंग न्यूज अगर आ जाए तो उसे न्यूज चैनल समेत सभी माध्यमों पर तुरंत ब्रेक करने की कोशिश होनी चाहिए और विजुअल के इंतजार तक टीवी पर खबर ब्रेक किए जाने से नहीं रोका जाना चाहिए.

बताया जाता है कि ऐसे ही कुछ नीतिगत मामलों में बदलाव को लेकर रिफत जावेद और राहुल चौधरी में मतभेद गहराए. बाद में स्थितियां ऐसी कर दी गईं कि राहुल चौधरी ने अवकाश ले लिया. उन्होंने अभी तक आजतक से इस्तीफा नहीं दिया है. चर्चा है कि इंडिया टीवी के हेड कमर वहीद नकवी से राहुल चौधरी की बातचीत हो गई है और वे इंडिया टीवी ज्वाइन कर सकते हैं. उधर, आजतक में रिफत जावेद के आने के बाद से मची उठापटक बढ़ती जा रही है. पहले से काम कर रहे कई वरिष्ठ लोग खुद के लिए खतरा महसूस करने लगे हैं. रिफत जावेद को जिस तरीके से प्रबंधन ने भरपूर पावर दिया है और उनके अच्छे बुरे को खूब सपोर्ट किया जा रहा है, उससे लगता है कि जो लोग रिफत जावेद के इगो के रास्ते में आएंगे, उन्हें जाना पड़ेगा.

इसके पहले राहुल चौधरी को लेकर भड़ास पर जो खबर छपी थी, उसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें…

http://bhadas4media.com/edhar-udhar/15460-2013-10-28-04-29-46.html

न्यूज वेबसाइट चलाने वाले ने गलत आरोप लगाकर निकाला

समस्तीपुर (बिहार) से कृष्ण कुमार संजय ने एक पत्र लिखकर बताया है कि एक वेबसाइट वाले ने उनके साथ खराब सुलूक किया है. उन्होंने लिखित शिकायत में कहा है कि जब जबरन विज्ञापन वसूली का विरोध किया तो उन्हें अपमानजनक तरीके से बाहर कर दिया गया और निकाले जाने की खबर ब्रेकिंग न्यूज के रूप में चलाकर मोबाइल पर एसएमएस के रूप में और वेबसाइट पर खबर के रूप में प्रसारित-प्रकाशित किया गया.

भड़ास को भेजे पत्र में उन्होंने कहा है कि एक वेबसाइट इंडियन आनलाइन न्यूज डाट काम के नाम पर समस्तीपुर में घटिया पत्रकारिता की जा रही है. इस बेबसाइट के द्वारा मोबाईल पर ब्रेकिंग न्यूज का कारोबार किया जाता है. ब्रेकिंग न्यूज के नाम पर कारोबार करने वाले ये लोग प्रतिदिन एक दो समाचार कुछ खास लोगों को भेजते हैं. जब विज्ञापन का अवसर आता है तो इसमें काम कर रहे लोग क्षेत्र के बाहुबलियों एवं व्यापार जगत के अवैध कारोबारियों पर मीडिया का रौब जमाकर विज्ञापन देने के लिये बाध्य कर देते हैं.

कृष्ण कुमार संजय ने बताया कि वो पिछले बीस महीने से वो इंडियन आनलाइन न्यूज नेटवर्क के लिये काम कर रहे थे लेकिन इसके एवज में कंपनी की तरफ से उन्हें कोई भुगतान नहीं किया गया. जबकि उन्होंने कंपनी को एक लाख रुपये विज्ञापन के बदले दिये. उन्होंने कहा कि अगर मेरे ऊपर वित्तीय अनियमितता का आरोप लगाया गया था तो पहले मेरा स्पष्टीकरण पूछा जाना चाहिये था. बिना मेरा पक्ष लिये इस तरह से ब्रेकिंग न्यूज चला देना ओछी पत्रकारिता का परिचायक है. इसी कारण अधिकांश मीडिया हाउस की पहचान ब्लैकमेलर की बन गयी है.
 

शहीदों पर अपमानजनक टिप्पणी करने वाले अलीगढ़ के डीएम के खिलाफ जांच के आदेश

सैनिकों की शहादत पर अपमानजनक टिप्पणी करने वाले अलीगढ़ के डीएम राजीव रौतेला के खिलाफ उत्तर प्रदेश शासन द्वारा जांच के आदेश दे दिये गये हैं. राजीव रौतेला ने पिछले सितम्बर माह में शहीद सैनिकों और उनके परिवार वालों के खिलाफ सार्वजनिक तौर पर अपमानजनक टिप्पणी की थी. उनके खिलाफ जांच का आदेश सामाजिक कार्यकत्री एवं आरटीआई एक्टिविस्ट लखनऊ की उर्वशी शर्मा की शिकायत पर दिया गया है.

अलीगढ़ के डीएम ने पिछले महीने एक सार्वजनिक मंच पर बोलते हुए कहा था कि हमारा देश विलाप करने वाला देश है. उन्होंने यहां तक कह दिया था कि सिपाही का काम देश की रक्षा करना है. अगर वो सेवा करते हुए अपने प्राणों को त्याग देता है तो परिवार कहता है कि जब तक नेता नहीं आयेंगे, जब तक पचास लाख नहीं मिलेंगे, पेट्रोल पंप नहीं देंगे, सड़क नहीं बनवायेंगे तब तक हम लाश नहीं उठने देंगे. रौतेला ने देश के विकास को रोकने में सैनिकों के परिवार के इस व्यवहार को मुख्य कारण बताया.

उर्वशी शर्मा का कहना है कि राजीव रौतेला ने अपने वक्तव्य में सैनिकों की सेवा बारह वर्ष होने, सैनिकों को पेंशन देने, शहीद सैनिकों को मुआवजा देने आदि सरकारी नीतियों की सार्वजनिक रूप से भर्त्सना की, जो सेवा नियमों के तहत दंडनीय अपराध है. इसलिए मैने प्रदेश सरकार और भारत सरकार से अलीगढ़ के जिलाधिकारी द्वारा शहीदों के प्रति की गयी शर्मनाक टिप्पणियों पर देशद्रोह, मानवाधिकार उल्लंघन एवं सेवा नियमों का उल्लंघन होने के प्रकरण में राजीव रौतेला को तत्काल निलंबित करने और जांच कराकर नियमानुसार दण्डित करने की कार्यवाही करने का अनुरोध किया था.

नियुक्ति विभाग के उपसचिव अनिल कुमार सिंह ने शिकायत पर आगे कार्यवाही हेतु उर्वशी शर्मा से शपथ पत्र देकर शिकायत किये जाने की पुष्टि करने एवं समुचित साक्ष्य प्रस्तुत करने को कहा है. शर्मा ने शीघ्र ही राजीव रौतेला के भाषण के सम्बन्धित अंश के वीडियो की सीडी को साक्ष्य के रूप में शामिल करने हेतु शिकायती शपथ पत्र नियुक्ति विभाग को उपलब्ध किये जाने की बात कही है.

विजय चोपड़ा ने अदालत को नहीं भेजा असली रिकार्ड

पेड न्यूज के मामले में पंजाब केसरी, जालंधर अब अदालत को गुमराह करने के प्रयास में जुटा है। जो अखबार 50 साल से अधिक रिकार्ड को संजोए रखता है वह अब पेड न्यूज संबंधी रिकार्ड नहीं होने का बहाना बना रहा है। इस बारे में एक अन्य हिंदी दैनिक 'सेवरा' ने खबर का प्रकाशन विस्तार से किया है. खबर पढ़ने के लिए नीचे प्रकाशित खबर के शीर्षक पर क्लिक कर दें…


भड़ास तक सूचनाएं देने के लिए bhadas4media@gmail.com पर मेल कर दें.


संस्मरण…

माथुर साहब : वो जब याद आए बहुत याद आए

छत्तीसगढ़ में बेबस हैं चांउर बाबा

इस बार चांउर बाबा बेबस हैं। देश के लोग छत्तीसगढ के मुख्यमंत्री को डा0 रमण सिंह के नाम से जानते हैं लेकिन छत्तीसगढिया डा0 साहब को चांउर बाबा ही कहते है। चांउर बाबा इनका नाम कैसे पड़ गया, इसकी एक लंबी कहानी हैं। उस कहानी में हास्य भी है, ब्यंग्य भी है और कर्मफल भी। शार्टकाट में यही जान जाइए कि पिछले 2003 के चुनाव के बाद डा0 साहब ने प्रदेश वासियों को भले ही कुछ दिया हो या न दिया हो लेकिन सबके घर के दरवाजे पर चावल की पोटली रखवा दी। चावल को इस प्रदेश में चांउर कहते है। 2 रुपए किलो चावल की राजनीति इस प्रदेश में ऐसी चली कि गरीब को कौन कहे, अपने को अमीर कहने वाले लोग भी चांउर मय हो गए।

क्या गरीब  और क्या अमीर सबके बीच चांउर पहुंचा कर डा0 साहब चांउर बाबा कहलाने लगे। इसी चांउर की राजनीति ने बाबा को 2008 का चुनाव जीता दिया और सत्ता की कुर्सी दे दी। लेकिन इस बार उस चांउर की राजनीति फीकी पर गई है। उस चांउर में अब वह बात नहीं रही कि बाबा को फिर सत्ता दिला सके। बाबा इसीलिए परेशान है। लाचार से दिख रहे है। कोई करामात करने को सोंच रहे हैं लेकिन करामात सूझ नहीं रहा है। लगुए भगुए से भी चांउर बाबा ने कुछ करामात करने पर विचार किया लेकिन बात नहीं बनी। पिछले सप्ताह बाबा ने अपने अंतरंगों के साथ बैठक की और चुनाव कैसे जीते इस पर बात की। कोई नया  जीत का फार्मूला गढने की बात की लेकिन कोई निदान नहीं निकला। बाबा दुखी हो गए। बोल भी गए कि इस बार चांउर नहीं चलेगा। जितना मजा मार लिए हो अब भूल जाओ। वो लोग इस बार छोड़ेंगे नहीं। एक वरिष्ठ मंत्री ने सवाल किया कि साहब वो लोग कौन है? बाबा बिफर गए। बोलने लगे कि ‘सब पता चल जाएगा। इतना मासूम मत बनिए। चुनाव हो रहा है और आप इतना भी नहीं समझ रहे हैं कि विपक्षी दल आपको घेरने की पूरी तैयारी कर ली है। जाइए अपना इलाका देखिए। इस्त्री वाले कपड़ों से राजनीति नहीं चमकती है। लोगों के बीच में जाइए।’ बेचारे मूंह लटकाए चले निकल गए।

आप कह सकते हैं कि इस बार के चुनाव में चांउर बाबा के नाम से प्रसिद्ध मुख्यमंत्री रमण सिंह की चुनावी राजनीति सांसत में फंसी हुई हैं। उनको लग रहा है कि उनकी सरकार के विरोध में अंडर करंट चल रहा है। इस सत्ता विरोधी लहर में कांग्रेस को क्या लाभ मिलेगा इसकी कल्पना अभी नहीं की जा सकती लेकिन भाजपा को भारी नुकसान होने की संभावना बताई जा रही है। भाजपा ने अभी हाल में ही एक कंपनी के जरिए गुप्त सर्वे के आंकउ़े इकट्ठा करवाई है। इस सर्वे का रसायन जानने के बाद भाजपाइयों की नींद हराम हैं। सर्वे ने खुलासा किया है कि आसन्न विधान सभा चुनाव में 4 मंत्री तो हर हाल में चुनाव हार जाऐंगे। बाकी के 16 विधायकों की विधायकी भी जाने के संकेत मिले है। ये सर्वे रिपोर्ट पहले तो कुछ दिनों तक पार्टी के बड़े नेताओं तक ही घूमती रही लेकिन जब इस रपट को आम नेताओं के बीच रखी गई तो इस पर राजनीति शुरू हो गई।

जिन विधायकों के नाम हारने वालों की सूची में रखी गई थी उन्होने इस रपट को बकवास बताया और कहा कि पार्टी के लोग पहले से ही  उन्हे टिकट देना नहीं चाह रहे थे  इसीलिए उनके विरोध में इस तरह की रिपोर्ट बनवाई गई है। अब इसके पीछे की राजनीति चाहे जो भी हो लेकिन चांउर बाबा के माथे पर इस रपट के बाद बल पड़ गए है। आडवाणी, राजनाथ सिंह और मोदी से लेकर भाजपा के तमाम केंद्रीय नेताओं ने  चांउर बाबा का गुणगान भले ही  खूब किया हो लेकिन रमण सिंह हकीकत को समझ रहे है। वे मान रहे हैं कि जिस विकास की बात कही जा रही है उसकी सच्चाई कुछ अलग ही है। विकास की कहानी रच कर इस बार चुनाव जितना उतना आसान नहीं है जितना दो चुनावों में चांउर बेचकर वोट उगाहे गए।

तो सच्च ये है कि इस बार के राज्य चुनाव में चांउर और विकास के मुद्दे कारगर सावित नहीं हो रहे है। अब चांउर किसी को नहीं भा रहा और विकास लोग ढ़ूंढते फिर रहे है। राज्य के लोग कहते फिर रहे हैं कि केवल भूखमरी की समस्या राज्य में नहीं रही लेकिन विकास की बात तो सौ फीसदी बेकार है। जब लोगों के जीवन में कोई बदलाव ही नही आए तो विकास किस बात की? आज भी राज्य के बहुत सारे गांव विकास से कोसों दूर है और बेरोजगारी इतनी है कि राज्य की एक बड़ी आवादी माइग्रेशन की शिकार है। अजीत जोगी कहते हैं कि ‘भाजपा झूठ बोलने में माहिर है और उसे भाजपा शासित राज्यों में ज्यादा ही विकास दिखाई पड़ती है लेकिन राज्य के लोग विकास ढूढ रहे है। चुनाव के बाद भाजपा के लोगों को पता चल जाएगा कि विकास की कहानी कितनी खोखली थी। जनता को ज्यादा दिनों तक ठगा नहीं जा सकता। अब केंद्र की खाद्य सुरक्षा योजना के सामने भाजपा की चाडर योजना  कही की नहीं रही।’

चांउर बाबा इस बार कांग्रेसी राजनीति से भी परेशान है। बाबा को लग रहा था कि कांग्रेस की आपसी झगड़े से फिर उनका कल्याण हो सकता है। इस झगड़े को बढाने में कई भाजपाइ नेताओं को भी बाबा ने लगा रखा था। अजीत जोगी को कांग्रेस के विराध में जाने के लिए भाजपा के कई नेताओं ने कई कांग्रेस के कई लगुए भगुए को सिखाया कि जोगी को कांग्रेस से अलग कराओ। इसके लिए कई तरह के लालच भी दिए गए। लेकिन राजनीति के चुतुर खिलाड़ी जोगी और कांग्रेसी सब समझ गए। हालत ये है कि पिछले एक दशक से खंडों में बंटी कांग्रेस पहली दफा एक हो गई है। कांग्रेस की यह एकता रमण सिंह की राजनीति के लिए किसी ग्रहण से कम नहीं है। इस बार भाजपा को अपनी इज्जत बचाने में भी परेशानी हो सकती है। बस्तर जोन में 12 सीटे आती है। पिछले विधान सभा चुनाव में भाजपा ने 11 सीटों पर बाजी मार ली थी। कांग्रेस के कवासी लखवा ही केवल इस जोन से चुनाव जीत पाए थे। लेकिन इस बार की तस्वीर कुछ और ही है। झीरम घाटी हत्याकांड में कई कांग्रेसी नेताओं की मौत के बाद बस्तर की राजनीति बदलती जा रही है। माना जा रहा है कि इस बार के चुनाव में इस जोन से कांग्रेस को कम से कम 6 सीटे मिलने की गुंजाइश है। ऐसा हो गया तो भाजपा की लंका लग सकती है। और ऐसा केवल कांग्रेसी एकता की वजह से हो रहा है।

चांउर बाबा को इस बार एक और परेशानी से सामना हो गया है। सरकार में फैले भ्रष्टाचार और नौकरशाहों की मनमानी की वजह से रमण सरकार विपक्ष के निशाने पर तो हैं ही पांच क्षेत्रिय दलों का साझा मंच ने बाबा की राजनीति पर मानों ब्रेक ही लगा दी है। आदिवासी इलाके से लेकर कई अन्य इलाकों में कुछ जातियों और समुदाओं के बीच राजनीति करने वाली छोटी छोटी पार्टियों ने साझा मंच बनाकर भाजपा की राजनीति को रोक देगी ऐसा लग रहा है।  हलाकि कांग्रेस के पास भ्रष्टाचार के मसले के अलावा अभी कोई बड़ा मुद्दा नहीं है लेकिन कांग्रेस ऐकता और राज्य में हुए भ्रष्टाचार की वजह से भाजपा कमजोर दिख रही है। आगामी चुनाव में भाजपा क्या करेगी या फिर मोदी की राजनीति यहां कितनी सफल होगी यह देखने की बात है लेकिन तय मानिए इस बार चांउर बाबा उस तेवर में नहीं है जिस तेवर में पिछले चुनाव में थे। चांउर ने बाबा को जीत दिलाया था अब वही चांउर बाबा को डर दिखा रहा है।

लेखक अखिलेश अखिल वरिष्ठ पत्रकार हैं और 'हम वतन' अखबार से जुड़े हुए हैं.

‘इंडिया न्यूज’ ने भी ‘एएनआई’ के आगे मत्था टेका, ‘एनडब्ल्यूएस’ बंद करने की तैयारी!

खबर है कि इलेक्ट्रानिक मीडिया के लिए विजुवल-बाइट उपलब्ध कराने वाली न्यूज एजेंसी 'एनडब्ल्यूएस' बंद करने की तैयारी अंदरखाने चल रही है. हिंदी-अंग्रेजी न्यूज चैनलों को वीडियो-विजुवल देने वाली यह न्यूज एजेंसी हरियाणा के कांग्रेसी नेता विनोद शर्मा के पुत्र कार्तिक शर्मा की है. इसी ग्रुप का न्यूज चैनल इंडिया न्यूज है. सूत्रों के मुताबिक ग्रुप के न्यूज चैनल इंडिया न्यूज के लिए एएनआई की सर्विस ली गई है.

इससे पता चलता है कि यह ग्रुप अपनी खुद की न्यूज एजेंसी की सेवा पर भरोसा नहीं करता. एनडब्ल्यूएस के संपादक सतीश जैकब हैं. देश भर के छोटे-बड़े सभी हिंदी-अंग्रेजी न्यूज चैनल एएनआई की सर्विस लेते हैं लेकिन इंडिया न्यूज इसलिए सर्विस नहीं लेता था क्योंकि वह खुद एएनआई जैसी एजेंसी एनडब्ल्यूएस नाम से चलाता था. इंडिया न्यूज कई खबरों में सिर्फ इसलिए पिछड़ा क्योंकि उसके पास एएनआई की सेवा नहीं थी.

सूत्र बताते हैं कि दीपक चौरसिया की सलाह पर अंततः कार्तिक शर्मा ने एएनआई के आगे मत्था टेक दिया है. इंडिया न्यूज ने इस हफ्ते से एएनआई की सर्विस ले ली है. देखना है कि एनडब्ल्यूएस का बोरिया बिस्तर कब तक बंधता है. यहां काम कर रहे मीडियाकर्मी खौफ में हैं कि उनकी नौकरी का क्या होगा. एनडब्ल्यूएस की बंदी के बारे में अभी प्रबंधन की तरफ से कोई अधिकृत घोषणा नहीं की गई है. माना जा रहा है कि घाटे का यह सौदा प्रबंधन देर तक अपने कंधे पर नहीं ढोएगा.

सोनी सोरी और लिंगा कोड़ोपी को ज़मानत देने के मामले में सर्वोच्च न्यायालय में बहस हुई

Himanshu Kumar : आज सोनी सोरी और लिंगा कोड़ोपी को ज़मानत देने के मामले में सर्वोच्च न्यायालय में बहस हुई। हमें पहले से ही अंदेशा था कि सरकार इस मामले में देरी कराने की कोशिश करेगी। वैसा ही हुआ भी जैसे ही सुनवाई शुरू हुई, छत्तीसगढ़ के सरकारी वकील ने खड़े होकर कहा कि हमें तो सोनी सोरी की फ़ाइल आज ही मिली है।

इस पर प्रशांत भूषण और कॉलिन गोंसाल्विस ने कोर्ट को बताया कि छत्तीसगढ़ राज्य को आठ अक्टूबर को ही फ़ाइल सौंप दी गयी थी और एक प्रति छत्तीसगढ़ के स्टेंडिंग काउन्सिल को भी दे दी गयी थी। यह मामला एक ऐसे मामले से संबंधित है जिसमे देरी करना अपने आप में अपराध है। इस पर भी छत्तीसगढ़ शासन के वकील कहते ही रहे कि उन्हें समय दिया जाय।

जज साहब ने कहा कि ठीक है हम छत्तीसगढ़ सरकार को शुक्रवार तक का समय दे रहे हैं। छत्तीसगढ़ के सरकारी वकील ने कहा कि हम कोशिश करेंगे कि शुक्रवार तक जवाब दे दें। कोर्ट ने कहा कि शुक्र वार तक ज़रूर जवाब लेकर आइये। इस पर सरकारी वकील ने कहा की हम कोशिश करेंगे , क्योंकि छत्तीसगढ़ में सभी पुलिस अधिकारी चुनाव में वयस्त हैं।

इस पर इस पर इस मामले में सुनवाई कर रहे सर्वोच्च न्यायलय के न्यायाधीश श्री निज्जर ने छत्तीसगढ़ के सरकारी वकील से कहा कि हम इस मामले से अच्छी तरह वाकिफ हैं , शुक्रवार के बाद सरकार को और मोहलत नहीं दी जायेगी। आप जवाब लेकर ही आइये। इसके बाद सुनवाई को शुक्रवार तक के लिए मुल्तवी कर दिया गया।

मानवाधिकारवादी और सोशल एक्टिविस्ट हिमांशु कुमार के फेसबुक वॉल से.

आज़म खान को जल निगम से हटाने के लिए हाई कोर्ट में पीआईएल

लखनऊ : सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर ने, मंत्री तथा जल निगम के अध्यक्ष आज़म खान को जल निगम से हटाये जाने हेतु इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच में एक पीआईएल दायर किया है. याचिका के अनुसार उत्तर प्रदेश जल निगम उत्तर प्रदेश जल आपूर्ति एवं सीवरेज अधिनियम 1975 से नियंत्रित होता है. इस अधिनियम की धारा 7(3) के अनुसार अध्यक्ष का पद लाभ का पद नहीं माना जाएगा और उसका निगम के किसी प्रबंधकीय कार्य पर कोई अधिकार नहीं होगा. निगम के समस्त प्रबंधकीय कार्य प्रबंध निदेशक एवं अन्य अधिकारी करेंगे. 

इस कानूनी प्रावधान के बावजूद 28 अगस्त 2012 को श्री खान के हस्ताक्षर से एक कार्यालय ज्ञाप जारी कर दिया गया जिसमे कहा गया कि सारे प्रबंधकीय कार्य अध्यक्ष द्वारा किये जायेंगे. तब से श्री खान अधिनियम के प्रावधानों के विपरीत सारे प्रशासनिक और वित्तीय कार्य कर रहे हैं.   अतः डॉ ठाकुर ने श्री खान को इस पद से हटाये जाने और 28 अगस्त 2012 के आदेश को निरस्त किये जाने की मांग की है.

‘लाइव इंडिया’ अखबार के संपादक बने प्रदीप सिंह

'समृद्ध जीवन' समूह की तरफ से संचालित हो रहे लाइव इंडिया न्यूज चैनल और लाइव इंडिया मैग्जीन के बाद जो 'लाइव इंडिया' दैनिक अखबार लांच किया जा रहा है, उसका संपादक प्रदीप सिंह को बनाया गया है. प्रदीप सिंह जनसत्ता अखबार में लंबे समय तक रहे हैं. कुछ वर्ष पहले वे यूएनआई टीवी के हिस्से रहे.

बतौर वरिष्ठ व स्वतंत्र पत्रकार वे कई न्यूज चैनलों में विश्लेषक के रूप में कई वर्षों से सक्रिय रहे हैं. प्रदीप सिंह लाइव इंडिया समूह के ग्रुप एडिटर एनके सिंह को रिपोर्ट करेंगे. 'समृद्ध जीवन' समूह ने हाल के दिनों में इंडस्ट्री के कई बड़े नामों को अपने

प्रदीप सिंह
प्रदीप सिंह
साथ जोड़ा है. एनके सिंह को ग्रुप एडिटर और एडिटर इन चीफ के रूप में ज्वाइन कराया तो प्रबल प्रताप सिंह को लाइव इंडिया न्यूज चैनल का मैनेजिंग एडिटर बनाया गया.

अब प्रदीप सिंह ने लाइव इंडिया अखबार के साथ नई पारी की शुरुआत की है. बताया जाता है कि लाइव इंडिया अखबार को बड़े पैमाने पर लांच किए जाने की तैयारी चल रही है. दिल्ली में इसे दमदार अखबार बनाने के लिए पूरे प्रयास किए जाएंगे. अखबार की साफ्ट कापी प्रकाशित होने लगी है लेकिन अभी इसे मार्केट में नहीं भेजा जा रहा है. प्रदीप सिंह अब आगे अपने हिसाब से टीम बनाएंगे, ऐसा माना जा रहा है. अभी तक लाइव इंडिया अखबार का संपादकीय दायित्व डा. प्रवीण देख रहे थे.

उल्लेखनीय है कि पुणे बेस्ड कंपनी 'समृद्ध जीवन' समूह के मुखिया महेश मोतेवार हैं. मीडिया कंपनी की सीईओ सुप्रिया कणसे हैं.


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चीनी पत्रकार ने सरकारी दबाव में रिश्वत लेने की बात जबरन कुबूल की!

चीन के एक पत्रकार चेन यांगझोउ को पिछले सप्ताह पैसे लेकर खबर लिखने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. अब उनका एक वीडियो चीन की सरकारी न्यूज चैनल 'चाइना सेंट्रल टेलीविजन' (CCTV) पर जारी किया गया है जिसमें उन्होंने स्वीकार किया है कि उन्होंने रिश्वत लेकर एक निर्माण उपकरण निर्माता कम्पनी के बारे में गलत रिपोर्टिंग की थी. यांग ने कहा कि "मैं निश्चित रूप से ये उम्मीद करता हूं कि पूरा मीडिया उद्योग मुझसे सीख लेगा. यदि मुझे दोबारा पत्रकार के रूप में काम करने का मौका मिला तो मैं पत्रकारिता के मूल्यों पर खरा उतरूंगा और लालच से दूर रहूंगा." इस वीडियो में उनके हाथ बंधे हुए हैं और बयान देते वक्त पुलिस उनके पास है.

इस वीडियो को तब जारी किया गया है जब चेन की इस गिरफ्तारी के विरोध में चीन में जगह जगह से आवाजें उठने लगी हैं. चेन की गिरफ्तारी को चीन में पत्रकार, वकीलों और इन्टरनेट यूजर्स पर प्रतिबंध के तौर पर देखा जा रहा है. चीन की सरकार देश में इन्टरनेट के बढ़ते उपयोग से बहुत चिन्तित है. इसकी वजह से लोग सरकारी चैनलों की खबरों पर विश्वास कम करने लगे हैं तथा नियंत्रण के बावजूद सूचनाओं के लिए सोशल मीडिया और इन्टरनेट पर ज्यादा भरोसा करते हैं. चीन की समाचार एजेंसी 'न्यू एक्सप्रेस' के टैब्लायड पर चेन यांगझोउ की रिहाई के लिये समर्थन में फ्रन्ट पेज पर दो खबरें लगायी गयी थीं. जिसके बाद चेन को व्यापक जनसमर्थन मिला था. अभी तक पेपर ने अपने आनलाइन संस्करण पर यांग के इकरारनामें से सम्बन्धित कोई खबर नहीं लगायी गयी है.

चीन में लोग इस मुद्दे पर सोशल मीडिया में बात कर रहे हैं और इस वीडियो को सरकारी दबाव में लिया गया बयान मान रहे हैं. लोगों के अधिकारों के लिये काम कर रहे कार्यकर्ताओं का कहना है कि चीन में किसी के सार्वजनिक रूप से अपराध स्वीकार करने में सरकारी दबाव और अभियुक्त के अधिकारों का खुला उल्लंघन किया जाता है. ज्ञात हो कि चीन में प्रेस पर काफी प्रतिबंध लगे हैं जिससे केवल वही खबरें पता चलती है जो सरकार देना चाहती हैं. चीन में इस तरह से पत्रकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर ये कोई पहला हमला नहीं है. इसके पहले पूरी दुनिया में प्रसिद्ध चीनी कलाकार अई वेई वेई जैसे लोगों को भी जेल जाना पड़ा हैं तथा कई लोग अभी भी जेलों में बंद हैं.

माथुर साहब : वो जब याद आए बहुत याद आए

अपने समय की हिंदी पत्रकारिता के शिखर पर विराजमान स्व. राजेंद्र माथुर मस्त आदमी थे। यारों के यार। मुगलाई खाने के शौकीन और चहुंमुखी प्रतिभा के धनी। मगर स्वभाव इतना सहज कि घमंड उन्हें तनिक भी नहीं था। अपने कक्ष से बाहर आ कर कभी भी हम सबके बीच बैठ जाते और खबरों के संपादन में सहायता करने लगते। लगे हाथों संपादन के कुछ गुर भी बता देते। टाइम्स आफ इंडिया में अगर उन्हें कोई समाचार पसंद आता तो किसी सबएडीटर से उसका अनुवाद न करा कर स्वयं अनुवाद कर देते और उदारता देखिए कि उस पर संवाददाता का नाम भी डाल देते। अखबार में वर्तनी की अशुद्धियां होना आम बात है मगर माथुर साहब किसी अशुद्धि के लिए किसी से पूछताछ न कर अशुद्ध शब्द के साथ शुद्ध शब्द लिख कर नोटिस बोर्ड पर लगा देते। इस प्रकार कुछ ही दिन में अखबार वर्तनी की अशुद्धियों से मुक्त हो गया।

एक दिन मैंने उनसे घर पर खाने का आग्रह किया। मैं सोचता था माथुर साहब ना नुकर करेंगे मगर मेरे प्रस्ताव पर उन्होंने कहा, हां बताओ, कब चलना है। मैंने एक दिन छोड़ कर चलने को कहा तो तुरंत तैयार हो गए। पूछा- और कौन चलेगा तो मैंने बताया कि रब्बी जी, विष्णु नागर और प्रयाग शुक्ल भी होंगे। बोले फिर तो आनंद रहेगा, पिकनिक हो जाएगी। घर रब्बी जी ने देखा था सो नियत समय पर चारों आ गए। आते ही अपने विनोदी अंदाज में बोले- दावत खाने तो ये लोग आए हैं, मैं तो

राजेंद्र माथुर
राजेंद्र माथुर
इनका ड्राइवर हूं। सब हंस पड़े। माथुर साहब ने चारों ओर नजर दौड़ाई और बरामदे से मूढा उठा कर नीम के नीचे डाल कर बैठ गए। बोले यार तुम तो स्वर्ग में रह रहे हो। खाना तैयार था। खाने पर इधर उधर की बातें होती रहीं तो फिर उनका विनोदी स्वभाव जाग गया। बोले- चलिए एक मुसलमान स्टाफ में रखने का यह लाभ तो हुआ कि अब नान वेज खाने को मिल जाया करेगा। बात यह थी कि इन चारों में से किसी की भी पत्नी नान वेज नहीं बनाती थीं। खाना खा कर बोले- चलिए खेतों की ओर चला जाए। अप्रैल का अंतिम सप्ताह था। थोड़ी गरमाहट मौसम में आ गई थी। मैंने इस ओर ध्यान दिलाया तो बोले- अब गांव में आकर भी खेतों पर न घूमा जाए तो गांव आने का लाभ ही क्या। खेतों में इस समय हरियाली समाप्त हो कर गेहूं की बालियां सुनहरी होने लगी थीं। खेत पर आ कर नलकूप की हौदी की मुंडेर पर बैठ कर दूर दूर तक फैली फसल को निहारते रहे। वापसी में बोले- अब आपका गांव भी देख लिया जाए। गांव में उन्हें ऐसे रास्ते पर ले गया जहां से जल्दी ही घर आ गया। कुछ देर आराम के बाद चाय पी और विदा हो गए।

फिर तो यह हुआ कि साल में कम से कम दो बार इन चारों का आगमन होने लगा। एक पांचवां भी बिना निमंत्रण के आने लगा। इसके अतिरिक्त मैं, रब्बी जी और माथुर साहब जब भी कभी मूड होता जामा मस्जिद के करीम होटल चले जाते। एक बार माथुर साहब जिद करने लगे कि भुगतान वह करेंगे। रब्बी जी ने बीच का रास्ता निकाल कर पेमेंट करने को कहा। मगर मैंने कहा इस बार तो पेमेंट मैं ही करूंगा, अगली बार माथुर साहब करेंगे। मगर वह अगली बार कभी नहीं आई। माथुर साहब हमें छोड़ कर चले गए।

अपने घर पर चल कर खाने का आग्रह भी माथुर साहब ने कई बार किया मगर मैं जा न सका। एक बार ऐसे ही करीम होटल से खाना खा कर आ रहे थे। आफिस के गेट पर आ कर रब्बी जी बोले- खाना अधिक खा लिया, अब नींद आ रही है। माथुर साहब ने विनोद करते हुए कहा- रब्बी जी आफिस में सोने के लिए आपको संपादक बनना पड़ेगा।

अबकी बार माथुर साहब गांव आए तो बहुत प्रसन्न मूड में थे। आ कर बैठने के कुछ ही देर बाद चारा काटने की मशीन चलाने लगे और बोले काम तो थोड़ा कठिन लगता है, आप कर लेते हैं इसे? मैंने बताया कि करना पड़ता है। मगर जल्दी ही बिजली की मोटर लगा दी जाएगी तो आसान हो जाएगा। फिर घर के बाहर दरवाजे पर आ गए। सामने खाली प्लाट में बिटौरे रखे थे। उनके पास जा कर बोले- लोग इमारतों और प्राकृतिक दृश्यों के साथ फोटो खिंचाते हैं, हम इन बिटौरों के साथ फोटो खिंचाएंगे।

बिटौरों के साथ माथुर साहब के साथ रब्बी जी, नागर जी और प्रयाग जी के साथ लिया गया यह फोटो माथुर साहब की प्रथम पुण्य तिथि पर मेरे लेख के साथ नवभारत टाइम्स के मुम्बई, जयपुर, लखनउ और पटना संस्करणों में छपा था। इसमें पांचवें बिना बुलाए महमान का भी फोटो था जो पेज बनाने वाले सज्जन ने पेज के मेकअप में स्थानाभाव के कारण हटा दिया था जिस पर बिना बुलाए इस महमान ने बहुत बुरा माना और काफी दिन तक मुझसे बोल चाल ही बंद कर दी मगर बाद में जब वास्तविकता का पता चला तो नार्मल हुए थे। इस दिन माथुर साहब गांव में भी घूमे और कई लोगों से मिले तथा दादरी में रस्सी बंटने का रिकार्ड बना रहे एक अध्यापक से भी मिले जो बहुत दिन तक माथुर साहब को याद करते रहे थे।

माथुर साहब के अलावा एस. पी. सिंह, शैलेश, रमेश गौड़ और धर्मवीर सहाय भी गांव आ कर कोरमा बिरयानी का स्वाद ले चुके थे। पत्नी वास्तव में कोरमा गजब बनाती थीं। गाजियाबाद में तैनाती के दौरान विभूति नारायण राय भी दो बार तथा गाजियाबाद से जाने के बाद एक बार गांव आ कर दावत खा चुके थे। इन्हें एक सहयोगी अरूण वर्धन ले कर आते थे। बकरीद पर तो यूनियन के दस बारह लोग प्रायः आ जाते थे। ये लोग शराब अपने साथ लाते थे। घर के सामने एक शीशम के पेड़ के नीचे बैठ कर मस्त होने के बाद दावत खाते थे। एक बात जो कभी कह न सका, आज कह रहा हूं- घर पर दावत बहुत लोगों ने खाई मगर माथुर साहब, रब्बी जी और यूनियन लीडर प्रमोद कुमार शर्मा के अलावा किसी ने अपने घर खाने पर नहीं बुलाया। माथुर साहब बार-बार आग्रह करते रहे मगर जब मैंने उनके घर जाने का तय किया तो उससे पहले ही माथुर साहब यह संसार छोड़ कर चले गए और बस उनकी यादें ही रह गईं। अब भी जब अखबारों में अशुद्धियां देखता हूं तो माथुर साहब की याद आ जाती है।

लेखक डॉ. महर उद्दीन खां वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं. रिटायरमेंट के बाद इन दिनों दादरी (गौतमबुद्ध नगर) स्थित अपने घर पर रहकर आजाद पत्रकार के बतौर लेखन करते हैं. उनसे संपर्क 09312076949 या maheruddin.khan@gmail.com के जरिए किया जा सकता है. डॉ. महर उद्दीन खां का एड्रेस है:  सैफी हास्पिटल रेलवे रोड, दादरी जी.बी. नगर-203207


अन्य संस्मरणों को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें: भड़ास पर डा. महर उद्दीन खां

टीवी पत्रकारिता : जारी है शोषण का खेल

अगर आप मीडिया में आना चाहते हैं, यदि आप लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ से जुडकर देश के लिए कुछ करने का सपना देख रहे हैं तो एक बार फिर विचार कर लीजिये। क्योंकि इस वक्त देश में ऐसा कोई न्यूज़ चैनल नहीं है जहां सीधे दरवाज़े से आपको प्रवेश मिल सके। यदि आप ये सोच रहे हैं कि ऐसा सिर्फ निजी समाचार चैनलों में ही है तो ये आपकी भूल है. मीडिया की दुनिया में सुनहरे भविष्य का सपना संजोने से पहले एक बार फिर विचार कर लीजिए। यदि आप ये सोचते हैं कि आप अच्छा लिखते हैं, खबरों को लेकर आपकी समझ अच्छी है और अपनी इसी प्रतिभा के बल पर आप मीडिया में अपना मुकाम बना लेंगे तो आप फिर भूल कर रहे हैं। क्योंकि हिन्दी समाचार चैनलों में ऐसे पत्रकारों की आवश्यकता ही नहीं है. जी हाँ सरकारी समाचार चैनलों में भी नहीं। तमाम सरकारी चैनलों जैसे, दूरदर्शन न्यूज़, राज्य सभा टीवी और लोकसभा टीवी में जितने भी लोग कथित तौर पर पत्रकारिता कर रहे हैं वो सभी ऊंची पहुँच और पैरवी रखते हैं। आप यहाँ एक भी ऐसा शख्स नहीं पायेंगे जो किसी नेता, मंत्री, अफसर या उद्योगपति का कृपा-पात्र नहीं है.

निजी समाचार चैनलों में नियुक्ति को लेकर व्याप्त भारी भ्रष्टाचार की बात करना बेमानी है क्योंकि सरकारी टीवी चैनलों में ही पत्रकारों की नियुक्ति का कोई नियम कायदा नहीं बनाया गया. यदि कागजों पर ऐसा कोई नियम है भी तो वो महज़ कागजी खाना-पूर्ती तक ही सीमित है. क्योंकि सूचना के अधिकार के बावजूद यहाँ पत्रकारों की नियुक्ति को लेकर किसी तरह की पारदर्शी प्रक्रिया नहीं अपनाई जाती है. पत्रकारों की नियुक्ति के लिए सरकारी या निजी चैनलों में ना तो कोई आयोग है ना ही कोई निदेशालय. ऐसे में इस बात का आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि किन आधारों पर देश के समाचार चैनलों में पत्रकारों की नियुक्तियां होती हैं? आपको ये जानकार और भी हैरानी होगी कि पत्रकारों के लिए कोई तय वेतनमान भी नहीं है. यानि समाचार चैनलों में काम करने वाले तमाम पत्रकार असल में दिहाड़ी मजदूर हैं, जिन्हें उस मज़दूरी पर काम करना होता है जो उन्हें चैनल ऑफर करता है। यदि वे इसे स्वीकार नहीं करते तो वो बेरोजगार रहने के लिए स्वतन्त्र हैं।

बात-बात पर क़ानून और नियमों की दुहाई देते रहने वाले हमारे समाचार चैनलों का एक और सच ये है कि यहाँ काम के घंटे भी तय नहीं हैं। क़ानून के मुताबिक़ आप किसी मज़दूर से आठ घंटे से ज़्यादा काम नहीं ले सकते और किसी कर्मचारी से छह घंटे से ज़्यादा काम करवाना गैर कानूनी समझा जाता है. लेकिन समाचार चैनलों में ओन रिकोर्ड पत्रकार १० घंटे से ज़्यादा काम करते हैं। इस अतिरिक्त काम का उन्हें कोई मेहनताना भी नहीं दिया जाता। ये सब होता है रचनात्मकता के नाम पर। रचनात्मकता के नाम पर ही खबरिया चैनलों में काम करने वाले युवा पत्रकारों से महीनों रात्रिकालीन शिफ़्ट में काम करवाया जाता है. और ये नाईट शिफ़्ट भी बारह घंटों की रखी जाती है. नियमों के मुताबिक़ यदि किसी कंपनी में किसी कर्मचारी से नाईट शिफ़्ट में काम करवाया जाता है तो उसे डेढ से दो गुना मेहनाता देना होता है और इसके एवाज़ में एक अतिरिक्त छुट्टी भी देनी होती है. इतना ही नहीं कानून किसी भी कर्मचारी से उसकी इच्छा के खिलाफ नाईट ड्यूटी नहीं करवाई जा सकती है। लेकिन अगर आप पत्रकारिता के पेशे में हैं तो क़ानून की बात सिर्फ अपनी पीटीसी में या अपने पॅकेज में ही करने की इजाज़त है.

अब बात करते हैं महिलाओं की सुरक्षा की। क्या पत्रकारिता के पेशे में महिलाएं सुरक्षित हैं? ये सवाल आप उन महिलाओं से पूछकर देखिये जो टीवी चैनलों में पत्रकारिता कर रही हैं। देश में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर घडियाली आंसू बहाने वाले हमारे न्यूज़ चैनलों के न्यूज़ रूम में काम करने वाली महिला पत्रकार क्या न्यूज़ रूम में ही खुद को सुरक्षित महसूस करती हैं? यही कारण है कि ज़्यादातर महिला पत्रकार तीन-चार साल समाचार चैनलों में काम करने के बाद नौकरी छोड़ने को मजबूर हो जाती हैं। जो ऐसा नहीं करती हैं, उन्हें काम में लापरवाही का आरोप लगारकर जबरन नौकरी से निकाल दिया जाता है. और जब तक वो काम करती हैं तब भी वो एक अजीब से डर के सांये में जी रही होती हैं। डर नौकरी जाने का, डर  बिना बात परेशान किये जाने का, डर तानों और फब्तियों का, डर बोस की घूरती नज़रों और न्यूज़ रूम की गंदी राजनीति का. महिला रिपोर्टरों की मनोदशा तो और भी पीडादायक है। क्योंकि बिना बात के उनकी रिपोर्टिंग बीट बदल दिया जाना, उन्हें मुश्किल असाइन्मेण्ट देकर परेशान किया जाना, या फिर रिपोर्टिंग से डेस्क पर शिफ़्ट कर दिया जाना बेहद आम बात है. ऐसे में उनके पास अपने बोस की हर बात बिना शर्त मानने के सिवाय दूसरा कोई चारा नहीं होता है। इस बात को भली प्रकार समझा जा सकता है. आपको किसी भी समाचार चैनल में वृध्द महिला पत्रकार नहीं मिलेंगी। वहीं विवाहित महिला पत्रकारों को भी या तो नौकरी से निकाल दिया जाता है या  इस कदर दबाव बना दिया जाता है कि वो स्वयं ही नौकरी छोड़  देती है.  

बात समाचार चैनलों में कर्मचारियों को मिलने वाली सुविधाओं की कर लेते हैं। आपको ये जानकार हैरानी होगी कि सच का साथ देने और क़ानून और न्याय की बडी-बड़ी बातें करने वाले हमारे देश के ज़्यादातर समाचार चैनल इतने गए गुज़रे हैं कि वो अपने कर्मचारियों को आने-जाने के लिए कैब की सुविधा तक उपलब्ध नहीं करवाते हैं। और जिन चंद गिने हुए समाचार चैनलों में कर्मचारियों के लिए ट्रांसपोर्ट सुविधा उपलब्ध है वो लेटलतीफी और लापरवाही के चलते कर्मचारियों के लिए मुसीबत अधिक है सुविधा कम. इतना ही नहीं ये चैनल भी इस सुविधा के बदले पत्रकारों के वेतन में से रकम काट लेते हैं। आम तौर पर किसी भी कंपनी के कैंटीन में कर्मचारियों को रियायती दरों पर भोजन उपलब्ध रहता है, लेकिन आपको ये जानकार हैरानी होगी कि देश के नामी गिरामी समाचार चैनलों के कैंटीन में भी आप को बाज़ार से भी महंगी कीमत पर खाना मिलेगा, जिसकी क्वालिटी पर आपका सवाल उठाना आपको नौकरी से बेदखल करने के लिए काफी है. यही कारण है की फिल्म सिटी में तमाम न्यूज़ चैनलों के कैंटीन होने के बावजूद वहां के पत्रकार बाहर खडे ठेलों पर चाय – नाश्ता और खाना के लिए भीड़ लगाए देखे जा सकते हैं। इसके अलावा किसी भी तरह की कोई सुविधा की कल्पना समाचार चैनलों के ऑफिस में नहीं की जा सकती है.

पत्रकारों को मिलेने वाले किसी भी तरह के वेतन भत्ते और सुविधाओं की बात आप भूल जाईये. क्योंकि यहाँ किसी तरह का महंगाई भत्ता, टीए – डीए, घर की सुविधा देने का रिवाज़ नहीं है. यहाँ तक कि घर खरीदने के लिए बैंक से लोन लेना चाहते हैं तो आपको सैलरी स्लिप भी नहीं मिलती है. यदि आप किसी खबरिया चैनल में नौकरी करते हैं तो यहाँ सिर्फ नौकरी बचाकर रख पाना ही आपका सबसे बडा हुनर है. क्योंकि यहाँ बिना किसी कारण के बिंदास सैंकड़ो पत्रकारों को नौकरी से निकाला जा सकता है. दुनिया को सच दिखाने के लिए आईना लेकर घूमने वाले हमारे खबरिया चैनलों का प्रबंधन पत्रकारों को नौकरी से निष्कासित करने के लिए किसी भी तरह की कानूनी प्रक्रिया का पालन करना ज़रूरी नहीं समझता है. डंके की चोंट पर खबर दिखाने वाले देश के एक बड़े समाचार चैनल ने हाल ही में सैंकड़ों  पत्रकारों को रातों-रात नौकरी से निकाल कर उनके परिवारों को सड़कों पर ला दिया लेकिन  कोई  आवाज़ सुनाई नहीं दी। जबकि जेट एयरवेज़ की मोटी तनख्वाह लेने वाली एयरहोस्टेस को निकाले जाने पर इन्हीं समाचार चैनलों ने हंगामा दिया था. इससे आप देश में पत्रकारों के सम्मान  और इस पेशे में नौकरी की सुरक्षा का अंदाजा लगा सकते हैं.

बात नौकरी में प्रमोशन और वेतन में बढ़ोतरी की करते है. अगर आप ये सोचकर कम वेतन पर किसी खबरिया चैनल की नौकरी स्वीकार कर लेते हैं कि आने वाले वक्त  में प्रबंधन ने  वेतन बढाने वादा किया है तो, आप फिर भूल कर रहे हैं। क्योंकि खबरिया चैनलों का प्रबंधन अपने नियम खुद बनाता है, वो दबंग तो है लेकिन दबंग का सलमान नहीं है, इसलिए वो अपने वादे भी बहूत जल्द भूल जाता है. ऐसा नहीं है कि  खबरिया चैनलों के मैनेजमेंट की याददाश्त कमज़ोर होती है बल्कि वो मौखिक रूप में इतने सारे वादे करने का आदी होता है कि सभी को निभा पाना उसके लिए ज़रूरी नहीं है. और लिखित में तो यहाँ नियुक्ति पत्र भी नहीं दिया जाता. यदि आपके पास इस बात का कोई प्रमाण है कि आप फलां खबरिया चैनल में काम करते हैं तो ये उस चैनल के प्रबंधन की सज्जनता है जिसके लिए आपको उसका आभार मानना चाहिए, यहाँ तो वक्त  पर चैनल खबर के लिए जान देने वाले   रिपोर्टरों को भी पहचानने से इनकार कर देता है. डंके की चोंट पर खबर दिखाने वाले एक खबरिया चैनल ने बीते दिनों खबर के लिए शहीद  हुए अपने रिपोर्टर को काफी हो-हल्ला होने के बाद पहचाना था. फिलहाल उस रिपोर्टर का परिवार किस हाल में है इसकी सुध लेने की कोई कानूनी ज़िम्मेदारी चैनल के प्रबंधन पर नहीं है.

देश में ऐसा कोई वेतन आयोग नहीं है जो समाचार चैनलों में काम करने वाले पत्रकारों के वेतन और प्रमोशन पर निगरानी  रखता हो और अनुशंसा करता हो. ना ही समाचार चैनलों का प्रबंधन ऐसी किसी सिफारिश को मानने के लिए बाध्य है. अगर आप ये सोच रहे हैं कि प्रेस कौंसिल ऑफ़ इण्डिया आपके हितों की रक्षक है तो आप फिर भूल कर रहे हैं  दरअसल ये संस्था हाथी के दांत की तरह है, जो महज़ शोभा के लिए है और शायद कुछ लोगों को रिटायरमेंट के बाद उपकृत करने, सम्मान देने का ज़रिया भर है। क्योंकि पत्रकारों की दशा या पत्रकारिता की दिशा से इसका कोई सारोकार नहीं है. इससे ये साफ़ हो जाता है कि समाचार चैनलों में नियुक्तिके साथ ही वेतन और प्रमोशन का भी कोई आधार नहीं है. प्रबंधन अपनी मर्जी के मुताबिक़ किसी को भी आउट ऑफ़ टार्न प्रमोशन देकर सीधे एडिटर इन चीफ भी बना सकता है, चाहे उस पत्रकार पर अवैध वसूली और भ्रष्टाचार के कितने ही मामले लंबित हों! ज़ाहिर है प्रबंधन उन्हीं लोगों को प्रमोशन दता है जो पत्रकार, प्रबंधन के किसी हित को साधते है, ना कि उन्हें जो वास्तव में डंके की चोंट पर पत्रकारिता करते है.

अब चर्चा देश में चलने वाले खबरिया चैनलों के स्वरूप और उनमें लगने धन  पर भी कर लेते है. देश के नब्बे फीसदे खबरिया चैनल चिट-फंड चलाने वाली कमपनियों और राजनेताओं की निजी संपत्ति हैं। ऐसे में खबरिया चैनलों में काले धन के लगे होने से इनकार नहीं किया जा सकता। बताने की ज़रुरत नहीं कि बीते साल ही करीब दर्जन भर से ज़्यादा समाचार चैनलों में काले धन के लगे होने के मामले सामने आए. और कईं चैनल के मालिकों को जेल की हवा भी खानी पड़ी है. ऐसे में देश में चल रहे चैनलों के मालिकों और प्रबंधन के चरित्र का अंदाजा लगाया जा सकता है. और इस बात को समझा जा सकता है कि  बरसाती मेंढक  की तरह निकल  आये इन खबरिया चैनलों का असली मकसद क्या है? लेकिन ऊंचे रसूख के चलते खबरिया चैनलों में लगे काले धन और यहाँ होने वाले भ्रष्टाचार की कोई चर्चा नहीं होती।

यहाँ सवाल ये भी है जब मीडिया लोकतंत्र का प्रहरी है, तो इस प्रहरी को काले धन के आकाओं, भ्रष्ट कार्पोरेट व्यवस्था और राजनेताओं का नौकर बनाए रखने के पीछे सरकार का असल मकसद क्या है? जो सरकार बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर सकती है, जो सरकार महाराजाओं की तमाम सुविधाएं और भत्ते निरस्त कर सकती है, क्या वो सरकार मीडिया को उसके भ्रष्ट मालिकों के  चुंगल से छुड़ा कर सच्ची आजादी नहीं दिला सकती. बिलकुल वो ऐसा कर सकती है और देश के मीडिया को चाहे तो सरकार सीधे जनता के हाथों में सौंपकर उसे सच्ची आज़ादी दिला सकती है. तमाम चैनलों का भी बैंकों की ही तर्ज़  पर राष्ट्रीयकरण   किया जा सकता है और इनके सम्पादकीय मंडलों को स्वाधीन किया जा सकता है. लेकिन सवाल  मंशा का है और सवाल है राजनीतिक इच्छा शक्ति का. लेकिन इससे भी बडा सवाल ये कि क्या देश के पत्रकार सच में पत्रकारिता को स्वतन्त्र करना चाहते हैं? या उन्हें गुलामी की लत पड़ चुकी है?

विनय 'शास्त्री'

वरिष्ठ पत्रकार

‘दृश्यांतर’ मैग्जीन के विमोचन में बोले नामवर सिंह- ‘ये अजित राय तो संपादकीय लिखने लगा’

प्रोफेसर नामवर सिंह ने अध्यक्षता की. आयोजन दूरदर्शन भवन (मंडी हाउस के पास) में छठें फ्लोर स्थित कांफ्रेस रूम में हुआ था. मीडिया और साहित्य से चुनिंदा लोग बुलाए गए थे. मंच पर नामवर सिंह के अलावा राजेंद्र यादव, त्रिपुरारी शरण और खुद अजित राय बैठे थे. 'दृश्यांतर' मैग्जीन के संपादक हैं अजित राय. ये मैग्जीन सरकारी यानि दूरदर्शन यानि प्रसार भारती के पैसे से लांच की गई है.

मतलब ये कि प्रसार भारती ने इस मैग्जीन के जरिए प्रिंट में भी पांव रख दिया है. अजित राय को ये ऐतिहासिक जिम्मेदारी मिली कि वो सरकारी मैग्जीन निकालें और इसे ऐसा निकालें कि वह असरकारी हो और गैर-सरकारी मैग्जीनों पर भी भारी हो. छह-सात महीने पहले काम शुरू किया गया. 'दृश्यांतर' नाम तय हुआ. मैग्जीन बाजार में जब आ गई और लोगों ने पढ़ लिया, तब इसका विमोचन समारोह रखा गया ताकि ठीक से फीडबैक मिल सके. सबसे आखिर में बोले नामवर सिंह, क्योंकि वो अध्यक्षता कर रहे थे.

अजित राय के बारे में बोलने लगे. ''मुझे तो कभी लगा ही नहीं कि अजित राय मिलने जुलने के अलावा कोई रुक कर बड़ा काम करेगा… लेकिन इसने तो ऐसी मैग्जीन निकाली की क्या कहने… और, ये अजित राय तो संपादकीय लिखने लगा.. इसने संपादकीय लिखा है 'दृश्यांतर' में… बस देखना कि ये 'दृश्यांतर' अवांतर न हो जाए…''. नामवर सिंह ने यह कहते हुए बात शुरू की कि यहां पर जितने भी वक्ता आए, सब इस मैग्जीन के पहले अंक में छपे हुए हैं.. एक मैं ही हूं जो बाहरी हूं…

नामवर सिंह को अजित राय ने याद दिलाया कि आपके विदेश प्रवास के संस्मरणों की मांग की गई थी… अब अगले अंक के लिए आप दे दीजिए… तब नामवर ने अपने अंदाज में वक्तव्य दिया… ''लिखने से हाथ कट जाता है, बोलने से मुंह नहीं कटता''

नामवर सिंह ने मैग्जीन की तारीफ में ऐसे पुल बांधे कि वहां मौजूद लोग हक्के बक्के रह गए. उन्होंने कहा कि आजादी के बाद से लेकर आज तक के दिन तक ऐसी मैग्जीन नहीं प्रकाशित हुई. कार्यक्रम समापन के बाद कुछ लोग आपस में बतियाते मिले कि ये नामवरजी को क्या हो गया है, जहां भी मंच संभालते हैं, वहां उस आयोजन को लेकर ऐसी तारीफ के पुल बांधते हैं जैसे भूतो न भविष्यति… मतलब अतिरेक पर जाकर क्यों बातें करते हैं ये…

आयोजन के जरिए पता चला कि मैग्जीन के पीछे असली दिमाग यानि मास्टरमाइंड दूरदर्शन वाले त्रिपुरारी शरण हैं. अजित राय संचालन कर रहे थे और बार-बार ये बता रहे थे कि त्रिपुरारी शरण जी ने एक बार भी नहीं टोका कि क्या नहीं छापना है और क्या छापना है. त्रिपुरारी शरण ने अपने संबोधन में लोगों को भरोसा बंधाया कि ये मैग्जीन न सिर्फ पूरे तेवर में रहेगी बल्कि मील का पत्थर बनेगी.

राजेंद्र यादव ने संतुलित वक्तव्य दिया. अलग-अलग धारा, विधा, तेवर की मैग्जीनों के योगदान का उल्लेख करते हुए 'दृश्यांतर' के विशिष्ट होने के बारे में भी बताया.

इस आयोजन के बारे में संजीव सिन्हा ने दो बातें अपने एफबी वॉल पर प्रकाशित की हैं, जो यूं हैं…

संजीव सिन्हा : गत 15 सालों में विभिन्‍न कार्यक्रमों के दौरान आलोचक डॉ. नामवर सिंह को बीस-पच्‍चीस बार तो सुन ही चुका होऊंगा। लेकिन हर बार वो अतिरेकी वक्‍तव्‍य दे डालते हैं। आज 'दूरदर्शन महानिदेशालय' द्वारा प्रकाशित 'दृश्‍यांतर' पत्रिका के लोकार्पण अवसर पर इस पत्रिका के बारे में भी उन्‍होंने ऐसा ही कुछ कह डाला, ''आजादी के बाद से इस स्‍तर की कोई पत्रिका नहीं निकली। यह 'हंस' और 'आलोचना' से भी अच्‍छी है।''

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उफ्फ! राजेंद्र यादव का कविता के प्रति इतना पूर्वाग्रह… आज 'दृश्‍यांतर' पत्रिका के लोकार्पण के अवसर पर 'हंस' के संपादक श्री राजेंन्‍द्र यादव ने फिर कविता-विरोधी वक्‍तव्‍य दे डाला। कहा, ''कविता वर्तमान से अतीत की ओर ले जाती है (यानी अतीतजीवी होती है) जबकि कथा-कहानी अतीत से वर्तमान की तरफ लाती है।'' (नोट : चित्र में जो अतिथि बैठे-बैठे पत्रिका का लोकार्पण कर रहे हैं वे हैं श्री राजेंद्र यादव)


अब बात करते हैं मैग्जीन के कंटेंट आदि के बारे में.. 96 पन्ने की यह मैग्जीन मासिक है और इसका दाम 25 रुपये है. इसमें प्रकाशित ज्यादातर कंटेंट लिखवाया गया है और एक्सक्लूसिव व मौलिक है, यानि कहीं प्रकाशित नहीं है और न ही कहीं से कापी-पेस्ट.

पहले अंक में श्याम बेनेगल से त्रिपुरारी शरण की बातचीत है. इस इंटरव्यू के बारे में नामवर ने कहा कि इसे पढ़कर इंटरव्यू लेने का सलीका सीख सकते हैं. सिनेमा पर डा. चंद्र प्रकाश द्विवेदी ने लिखा है. देवेंद्र राज अंकुर ने रामगोपाल बजाज पर संस्मरण लिखा है. इस संस्मरण की जबर्दस्त चर्चा आयोजन में रही.

मंजीत ठाकुर की रिपोर्ताज है, बुंदेलखंड पर. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी की डायरी है. स्मृति आख्यान में शिवमूर्ति ने लिखा है. दो उपन्यास अंश प्रकाशित किए गए हैं जिसमें पहला विनोद भारद्वाज का है, 'लाइफ इज ब्यूटीफुल', और दूसरा तेजेंद्र शर्मा का, 'विल्जडन जंक्शन'. असगर वजाहत ने इस मैग्जीन के लिए एक नया नाटक लिखा, जिसका प्रकाशन हुआ  है, 'पाकिटमार रंगमंडल' नाम से.  सामयिकी स्तंभ में सत्येंद्र प्रकाश और उमेश चतुर्वेदी के लेख हैं.

कुल मिलाकर न सिर्फ कम दाम में बेहतरीन कंटेंट वाली पत्रिका है, बल्कि यह संभावना भी जगाती है (त्रिपुरारी शरण के वक्तव्य के बाद यह धारणा और मजबूत हुई) कि इस मैग्जीन से हिंदी जगत को वो नए और बेहतरीन लिखने वाले मिलेंगे जो अच्छे प्लेटफार्म न होने या बेहतर की तलाश न किए जाने के कारण कहीं दूर सकुचाए, उपेक्षित पड़े हैं.

अगर आप यह मैग्जीन मंगाना देखना पढ़ना जुड़ना चाहते हैं तो इसके लिए नीचे दिए गए फोन नंबर या मेल आईडी या पोस्टल एड्रेस के माध्यम से मैग्जीन के संपादक अजित राय से संपर्क कर सकते हैं…

011-23097513

drishyantardd@gmail.com

दूरदर्शन महानिदेशालय, कमरा नंबर 1026, बी विंग, कोपरनिकस मार्ग, नई दिल्ली-110001


रिपोर्ट: यशवंत सिंह (एडिटर, भड़ास4मीडिया डॉट कॉम). संपर्क: yashwant@bhadas4media.com

छह साल से जेल में बंद एक सज्जन ने चार सौ पन्नों का उपन्यास लिखा

यशवंत सिंह जी, आपकी पुस्तक 'जानेमन जेल' पढ़ी, अच्छी लगी. आँखों के सामने जेल का वातावरण जैसे सचित्र खड़ा हो गया. आपकी सकारात्मक सोच ने प्रभावित किया। एक और सज्जन हैं, जो फिलहाल 6 वर्षों से जेल में हैं, जिन्होंने जेल में रह कर इसी तरह की सकारात्मक सोच के साथ अंग्रेजी का 400 पन्नों का उपन्यास लिखा है जो अभी प्रकाशित नहीं हुआ है, शायद इस वर्ष के अंत तक छप जाए.

आपके उपन्यास के शुरू के अंश, जिनमें जेल सम्बन्धी तथ्य बताए गए हैं, उन्होंने विस्तार से लिखे हैं. यदि आपकी जानकारी में हों तो कृपया मुझे जेल जीवन पर किन्हीं के भी द्वारा लिखी गई अन्य पुस्तकों के नाम बताएं, हिन्दी अंग्रेजी दोनों में, राजनेताओं को छोड़ कर. दूसरे, एक जानकारी और दें, आपने बाहर आकर लिखा, क्या जेल में रहते हुए किताब लिख और छपवा सकते हैं? क्या इसके लिए जेल अथौरिटी से अनुमति लेनी पड़ती है?

उत्तर दें.

धन्यवाद।

मणिका मोहिनी

manika1905@gmail.com
 


मणिका जी

शुक्रिया, आपको मेरा लिखा पसंद आया. साथ ही 'जानेमन जेल' किताब खरीद कर पढ़ने के लिए आपका आभार. मैं जानना चाहूंगा कि वो कौन सज्जन हैं जो जेल में छह साल से बंद हैं और चार सौ पन्नों का जेल जीवन पर उपन्यास लिखा है. मैं उनसे निजी तौर पर मिलना भी चाहूंगा. कृपया बताइएगा.

आपने पूछा है कि जेल जीवन पर लिखी गई अन्य किताबों के बारे में तो मुझे कोई खास आइडिया नहीं है. हां, अरुण फरेरा नामक एक साथी की जेल डायरी को हम लोगों ने भड़ास पर जरूर प्रकाशित किया था. उसका लिंक दे रहा हूं. आप पढ़िएगा.

http://bhadas4media.com/vividh/6531-2012-11-03-11-53-08.html

http://bhadas4media.com/vividh/6532-2012-11-03-12-05-32.html

मैंने जेल जीवन पर लिखी गई किताबों का पता करने में इसलिए वक्त नहीं गंवाया क्योंकि एक थीम पर प्रकाशित कोई किताब पढ़ लेने के बाद ये खतरा बना रहता है कि जब आप उस पर अपना कुछ लिखें तो पढ़ी गई किताब के बिंब, कथ्य, शैली आदि की छाप पड़ जाए. इसी कारण पहले मैंने अपना हाल बयान किया और उसे प्रकाशित कराया. 'जानेमन जेल पार्ट दो' जब लिख लूंगा तो जेल जीवन पर लिखी गई अन्य किताबों को तलाशूंगा, पढ़ूंगा.

जेल में रहते हुए किताब लिख सकते हैं लेकिन जाहिर है, जब आप जेल में हैं तो जेल प्रशासन के अधीन हैं. आप जो भी वहां लिखेंगे, उसे जेल प्रशासन को दिखाना पड़ सकता है या उनकी अनुमति लेकर लिख पाएंगे. हां, जब आप जेल से बाहर आ गए तो कुछ भी लिखने के लिए आजाद हैं.

आभार
यशवंत

yashwant@bhadas4media.com


'जानेमन जेल' किताब घर बैठे मंगाने के लिए आप किताब का नाम, अपना नाम, पूरा पता पिन कोड सहित और अपना मोबाइल नंबर लिखकर 09873734046 पर SMS कर दें. किताब कुछ ही दिनों में आपके हाथ में होगी. मूल्य सौ रुपये से कम है और छूट के साथ उपलब्ध है.
 


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Yashwant Singh Jail

‘देख तमाशा’ में ‘इंडिया न्यूज’ की लंबी छलांग

लोकस्वामी मैग्जीन के 'देख तमाशा' स्तंभ में तहसीन मुनव्वर ने इस बार 'इंडिया न्यूज' चैनल और दीपक चौरसिया की सफलताओं के बारे में लिखा है. आसाराम प्रकरण में लीड कर और कौटिल्य के बहाने केबीसी की तर्ज पर जीनियस का टेस्ट लांच कर दीपक ने इंडिया न्यूज को टीआरपी में जबर्दस्त उछाल दे दी.

पढ़िए पूरा विश्लेषण…

अगर पढ़ने में दिक्कत आए तो उपरोक्त 'कालम तस्वीर' पर ही क्लिक कर दें.


भड़ास तक अपनी बात bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

आजतक से राहुल चौधरी गए, कल्पतरु में संजीव माथुर सीनियर एनई बने, सूर्यकांत को प्रमोशन

आजतक न्यूज चैनल से एक बड़ी खबर है. बताया जा रहा है कि एसाइनमेंट हेड राहुल चौधरी को हटा दिया गया है. चर्चा है कि रिफत जावेद से विवाद के बाद राहुल को जाने के लिए कह दिया गया.

हिंदी दैनिक कल्पतरु एक्सप्रेस, आगरा से सूचना है कि यहां संजीव माथुर ने बतौर सीनियर न्यूज एडिटर ज्वाइन किया है. कुमार मुकल को प्रमोट करके पहले ही रेजीडेंट एडिटर बनाया जा चुका है. अब डिप्टी न्यूज एडिटर सूर्यकांत त्रिपाठी को प्रमोशन देकर न्यूज एडिटर बना दिया गया है.

भड़ास तक सूचनाएं देने के लिए bhadas4media@gmail.com पर मेल कर दें.

सीत और लोकेश की नई पारी, शमशेर का आजतक से इस्तीफ

दो पत्रकारों के बारे में सूचना मिली है कि इन्होंने नई पारी की शुरुआत कर दी है. कई न्यूज चैनलों में काम कर चुकीं सीत मिश्रा ने अब साधना न्यूज ज्वाइन कर लिया है. उधर, मेरठ के जर्नलिस्ट लोकेश पंडित के बारे में पता चला है कि इन्होंने नई पारी की शुरुआत दैनिक जागरण, आगरा के साथ की है.

एक खबर आजतक न्यूज चैनल से आई है. पता चला है कि लंबे समय से टीवी टुडे ग्रुप से जुड़े और आजतक के रिपोर्टर शमशेर सिंह ने चैनल से इस्तीफा दे दिया है. वहीं कुछ का कहना है कि प्रबंधन ने उन पर इस्तीफे का दबाव डाला था.

भड़ास तक सूचनाएं देने के लिए bhadas4media@gmail.com पर मेल कर दें.

उत्तराखण्ड राज्य : न खुदा ही मिला न बिसाले सनम

उत्तराखण्ड की जनता ने यहां की गिरि-कंदराओं से लेकर देश के महानगरों की सड़कों तक पृथक राज्य आन्दोलन इसलिए लड़ा था कि वह समय की दीवार पर अपना भाग्य स्वयं लिख सके. यह राज्य उसे उपहार में नहीं मिला, बल्कि इसके लिए लोगों ने दशकों तक आत्म-उत्पीड़न झेला और शहादतें दीं हैं. इस आन्दोलन के दौरान राष्ट्रीय राजनैतिक दलों ने पहाड़ के भोले-भाले तथा राष्ट्रभक्त लोगों के आत्म-सम्मान को ठेस पहुंचाई.

मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहा काण्ड जैसे अमानवीय कृत्य इसी आन्दोलन के दौरान हुए. राज्य बनने के बारह वर्ष बाद भी उत्तराखण्डवासी विकास की बाट जोह रहे हैं. अभी तक इस पर्वतीय राज्य को ऊपर से थोपे गये छः मुख्यमंत्री भले ही मिल गये हो परन्तु उनमें यशवंत सिंह परमार जैसा स्वप्नदर्शी योजनाकार एक भी हिमालयी नेता नहीं था जो उत्तराखण्ड के विकास के लिए सही रोड मैप बना सके. राज्य बनने से पहले उत्तराखण्ड क्रांति दल को पहाड़ के संदर्भ में सही सोच वालों का समूह माना जाता था परन्तु 1994 के पृथक राज्य आन्दोलन के बाद हुए लोकसभा चुनाव का बहिष्कार करना उसके लिए इतना भारी पड़ गया कि आज उसका वजूद ही लगभग समाप्त हो गया है.

जिस आशा और विश्वास के साथ उत्तराखण्ड की जनता ने पृथक राज्य का निर्माण करवाया था, यह अब तक उसके इर्द-गिर्द भी नहीं पहुंच पाया है. राज्य बनने से पहले यह धारणा थी कि उत्तराखण्ड के विकास के नाम पर जो पैसा केंद्र सरकार द्वारा भेजा जाता है, वह पहाड़ के गिरि-कंदराओं तक नहीं पहुंच पाता. इसलिए यहां के लोगों को लगा कि विकास के लिए अलग राज्य जरूरी है. परिणामस्वरूप उत्तराखण्ड के आमजन को आन्दोलन के लिए विवश होना पड़ा. 1994 के उस ऐतिहासिक जनान्दोलन में हमेशा काम के बोझ से लदी रहने वाली पहाड़ की मातृशक्ति ने भी अपनी महत्वपूर्ण भागीदारी इसीलिए निभाई थी कि उसके नौनिहालों के हाथों में शराब की बोतल की जगह कोई ढंग का काम होगा. परन्तु सारे सपने इतनी जल्दी चकनाचूर हो जायेंगे, यह शायद किसी ने कभी सोचा भी न होगा. यहां मानना होगा कि राज्य का विकास न तो रातोंरात सम्भव है और न ही किसी के पास जादू की छड़ी. मगर सपने तो हों और उन्हें साकार करने की प्रबल इच्छाशक्ति तो हो.

उत्तराखण्ड राज्य आमजन के संघर्ष और बलिदानों की वजह से बना और उसका मकसद यहां का समुचित विकास कर पलायन समाप्त करना था. लेकिन राज्य बनने के बाद यहां के सभी राजनैतिक दलों के नेताओं ने इसका लाभ अपनी जागीर के तरह लेना शुरू कर दिया. राजनेताओं को उत्तराखण्ड की आशाओं, अपेक्षाओं तथा आकांक्षाओं से कोई भी लेना-देना नहीं है. सत्ता में जिस भी दल की सरकार आई, उसने यहां लूट-खसोट के अलावा कुछ नहीं किया.

इसका मुख्य कारण यह रहा कि पृथक पहाड़ी राज्य के धुर विरोधी नेता ही उनके आकाओं द्वारा यहां के भाग्य-विधाता बना दिये गये. जीवन भर अपने पहाड़ विरोधी रवैये तथा चमचों के विकास पुरुष के नाम से बदनाम रहे और राज्य आन्दोलन के दौरान ‘‘उत्तराखण्ड राज्य मेरी लाश पर बनेगा’’ कहने वाले नारायण दत्त तिवारी इस नवोदित राज्य पर बतौर मुख्यमंत्री कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व द्वारा बलात् थोप दिये गये. तत्कालीन सांसद भुवनचंद्र खण्डूरी का प्रधानमंत्री को श्रीनगर से फोन पर यह कहना कि ‘‘मेरे निर्वाचन क्षेत्र गढ़वाल के एक लाख भूतपूर्व सैनिक 2 अक्टूबर, 1994 की दिल्ली रैली में भाग लेंगे’’ ही वह एकमात्र कारण था जिसने मुजफ्फरनगर काण्ड को जन्म दिया. उस लोमहर्षक अमानवीय कुकर्म के लिए मुलायम सिंह के साथ बराबर के जिम्मेदार होने के बावजूद भाजपा ने उन्हें एक नहीं दो बार उत्तराखण्ड पर बतौर मुख्यमंत्री थोप दिया. उस पर भी अफसोस यह कि उन्होंने मुजफ्फरनगर काण्ड के दोषियों को सजा दिलवाने और अपने माथे पर लगे उस कलंक को धोने के लिए दोनों ही बार कुछ भी नहीं किया. उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन का अपहरण करने वाले केंद्रीय कैबिनेट मंत्री हरीश रावत भी उक्त काण्ड के अपराधियों को सजा दिलाने में कोई दिलचस्पी नहीं लेते. जिन लोगों ने तब राज्य आन्दोलन में अपनी पूरी शक्ति झोंक दी थी, राज्य गठन के बाद राजनेताओं ने उनकी घोर उपेक्षा की. यही नहीं उन लोगों को राज्य के पहले विधानसभा चुनाव में सभी राजनैतिक दलों ने पार्टी में हाशिये में डाल दिया. अलबत्ता उनका इस्तेमाल अपने लिए जरूर किया.

यहां सबसे बड़ी खेदजनक बात यह है कि इस नवगठित पहाड़ी राज्य का विकास भले ही आशानुरूप नहीं हुआ लेकिन नेताओं के पेट जरूर फूलते जा रहे हैं. अलग राज्य बनने से पहले उत्तराखण्ड का सालाना बजट 400 करोड़ था, जो अब 70,000 करोड़ पार कर गया है। आज उत्तराखण्ड की राजनीति में नेता, भूमाफिया, शराब माफिया, बजरी माफिया, खड़िया माफिया का एक खतरनाक तबका उभर आया है जो दिन-प्रतिदिन मजबूत होता जा रहा है. देश के दूसरे हिस्सों की तरह नेताओं के संरक्षण में नौकरशाहों, पूंजीपतियों और माफिया का गठजोड़ यहां भी बड़ी जल्दी बन गया है. इसने उत्तराखण्ड को बेचना और नोचना शुरू कर दिया है. उत्तराखण्डवासियों को उनके पूर्वजों से राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय स्तर पर विख्यात उनकी सच्चाई, ईमानदारी और नैतिकता का जो उपहार विरासत में मिला था, उसे राज्य बनने के बाद राजनेताओं ने क्षीण कर दिया. एक रिपोर्ट के अनुसार आज देश में भ्रष्टाचार के मामले में यह सभी राज्यों से आगे है. इसमें यदि इसका पहला नंबर है तो सिर्फ और सिर्फ इसके अब तक रहे रहनुमाओं की मेहरबानी से.

आजादी के बाद 53 वर्षों में उत्तराखण्ड के 16,000 गांवों में से 1,000 गांव आबादीविहीन हुए, परन्तु अलग राज्य बनने के बाद लगभग दशक भर में ही करीब 400 गांव निर्जन हो गये। इससे स्पष्ट है कि पृथक राज्य बनने के बाद यहां से पलायन और भी तेजी से हुआ. जिस उद्देश्य को लेकर जनता ने आन्दोलन किया था, उसकी पूर्ति में यहां सत्ता में आये सभी राजनैतिक दल पूरी तरह से विफल रहे हैं. आज उत्तराखण्ड में लोकतन्त्र के नाम पर एक नई तरह की माफिया स्टाइल सामन्तवादी व्यवस्था ने जन्म ले लिया है और सभी नेता इस हमाम में नंगे हैं. राज्य बनने से पहले भी यहां की जनता अपने जल, जंगल और जमीन के लिए आन्दोलित थी और आज भी है. जनता के हिस्से में आन्दोलन करना ही रह गया और नेताओं को मिला अपने परिवारों को राजनीति में स्थापित करने का अवसर. आज उत्तराखण्ड के संदर्भ में इससे बड़ी बिडंबना और भला क्या होगी – न खुदा ही मिला, न बिसाले सनम.

लेखक श्यामसिंह रावत से संपर्क 9410517799 के जरिए किया जा सकता है.

शिवराज ने न्यूज एक्सप्रेस चैनल की खबर देखने के बाद क्या ट्वीट किया?

बिहार में सीरियल ब्लास्ट वाली यानि कल बीती रात को केंद्रीय गृहमंत्री म्यूजिक लांच पार्टी में व्यस्त थे. इस खबर को सबसे पहले न्यूज एक्सप्रेस चैनल ने ब्रेक किया. न्यूज एक्सप्रेस चैनल ने बताया कि ब्लास्ट के महज कुछ घंटे बाद गृहमंत्री म्यूजिक लांच में बिजी हैं. इस खबर को भाजपा खेमे ने हाथोंहाथ लपक लिया.

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने न्यूज एक्सप्रेस की खबर के स्क्रीनशाट को ट्वीट किया. शिवराज ने लिखा कि ब्लास्ट की रात उन लोगों (कांग्रेसियों) के लिए म्यूजिक सुनने का वक्त है… नीचे है शिवराज के ट्वीट का स्क्रीनशाट…

https://twitter.com/ChouhanShivraj/status/394518478855491584

 ShivrajSingh Chouhan‏@ChouhanShivraj

Home minister launching music, when there were blasts in Patna. Now it's time for them to hear the music! pic.twitter.com/PculMKZgOb

हर साल करीब सत्तर हजार लोगों के फोन टेप कराती है सरकार

नई दिल्ली। टाटा समूह के पूर्व अध्यक्ष रतन टाटा ने शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में कहा कि प्रमुख नेताओं, नौकरशाहों और कारोबारियों के साथ नीरा राडिया की टैप की गई टेलीफोन की बातचीत औद्योगिक प्रतिद्वंद्विता के कारण ही मीडिया को लीक की गई थी। न्यायमूर्ति जीएस सिंघवी की अध्यक्षता वाली खंडपीठ के समक्ष रतन टाटा की ओर से वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे ने यह सनसनीखेज खुलासा करते हुए कहा कि टाटा टेलीकम्युनिकेशंस को भी टेलीफोन की बातचीत सुनने के लिए हर साल सरकारी प्राधिकारियों से 10 से 15 हजार अनुरोध मिलते हैं। उन्होंने टैप की गई बातचीत लीक करने वालों का पता नहीं लगाने पर केंद्र सरकार की मंशा पर सवाल उठाया।

साल्वे ने कहा कि टाटा टेलीकाम को ही हर साल टेलीफोन सुनने के लिए 10 से 15 हजार अनुरोध मिलते हैं। सभी टेलीकाम कंपनियों को हर साल इस तरह के 60 से 70 हजार अनुरोध मिलते ही होंगे। उन्होंने कहा कि टेलीफोन टैप करने का यह आदेश दूसरी वजहों से दिया गया था। अगर कारपोरेट जगत में लड़ाई नहीं चल रही होती तो यह सार्वजनिक दायरे में नहीं आता। उन्होंने कहा कि उन्हें इसमें कोई संदेह नहीं है कि कारपोरेट प्रतिद्वंद्विता के कारण ही सबसे पहले लीक हुआ था। इस पर जजों ने कहा कि इस मामले में आयकर विभाग की पहल पर टेलीफोन टैप किए गए थे और उसी समय कुछ सेवा प्रदाताओं ने लाइसेंस से वंचित होने के जोखिम पर यह किया था।

साल्वे ने कहा कि टैप की गई बातचीत के विश्लेषण करके काम की सूचना का पता लगाने और निजी स्वरूप के अंशों को नष्ट करने की कोई उचित व्यवस्था नहीं है। उन्होंने जांच एजंसी पर भी सवाल उठाया और कहा कि उसने मीडिया का इस्तेमाल किया जो बहुत ही खतरनाक प्रवृत्ति है। उन्होंने कहा- हमें नहीं मालूम कि यह (राडिया टैप) क्यों और किसे शर्मसार करने के लिए लीक किए गए। साल्वे ने कहा कि सरकार को टैप की गई बातचीत में से काम के अंश अपने पास रखने चाहिए और शेष अंश नष्ट कर देने चाहिए। टैप की गई समूची बातचीत रखने की इजाजत नहीं है। लोगों के निजता के अधिकार की रक्षा करनी होगी।

उन्होंने कहा कि टैपिंग की समीक्षा करने वाली समिति पर काम का दबाव है और उसके लिए सुने गए सभी टेलीफोनों की समूची प्रक्रिया पर गौर करना संभव नहीं है। साल्वे ने कहा कि इस तरह के अनेक मामले सामने नहीं आए हैं। कौन है जो इन सभी मामलों को देख रहा है। क्या हम सरकार के लिए अनुपयोगी बातचीत को नष्ट नहीं करके किसी और वक्त पर इसे ‘डायनामाइट’ (सूचना की खान) के रूप में इस्तेमाल की अनुमति देने जा रहे हैं। इस लीक की केंद्र द्वारा कराई गई जांच पूरी तरह सतही है और इस मामले में उसके हलफनामे में भी एकरूपता नहीं है।

साल्वे ने इस बातचीत को सार्वजनिक नहीं करने की दलील देते हुए कहा कि सरकार ने अपने हाथ खड़े कर लिए हैं। ये टैप मीडिया और याचिकाकर्ता से परे नहीं हैं। आरटीआई है और सरकार को यह फैसला करना है कि टैप की गई बातचीत को सार्वजनिक करना है या नहीं। हमारे पास तो अब पारदर्शिता के लिए आरटीआई की व्यवस्था है। सार्वजनिक मसलो की जांच का मीडिया को अधिकार है और कानून को एक सीमा तक उन्हें भी संरक्षण देना होगा। लेकिन महज संदेह के आधार पर सचूना का प्रकाशन नहीं किया जा सकता। मीडिया को इसे प्रकाशित करने से पहले गपशप की सत्यता का पता लगाने के लिए अभी और आगे की जांच कर लेनी चाहिए।

साल्वे ने कहा कि अदालतों में पेश दस्तावेजों को सार्वजनिक नहीं कहा जा सकता है। उन्होंने कहा- मैं एक पत्रिका के इस दावे को चुनौती दे रहा हूं कि यदि कोई दस्तावेज शीर्ष अदालत में पेश कर दिया गया है तो वह सार्वजनिक है और उसे प्रकाशित करने का अधिकार है।  इस पर जजों ने प्रश्न किया- यह नजरिया किसका है, चूंकि यह लिपिबद्ध वार्ता शीर्ष अदालत के रिकार्ड का हिस्सा है इसलिए यह सार्वजनिक क्षेत्र में है और इसका प्रकाशन किया जा सकता है। जजों ने सवाल किया- क्या वे यह कहते हैं कि उन्हें यह शीर्ष अदालत से मिला है। साल्वे ने कहा कि कहीं भी वे ऐसा नहीं कहते हैं। उन्होंने कहा कि हालांकि अदालत ने टैप की गई बातचीत से निकले कुछ मसलों की सीबीआइ को प्रारंभिक जांच का आदेश दिया है। लेकिन हो सकता है कि बातचीत से कोई मामला ही नहीं बनता हो।

वित्त मंत्री को 16 नवंबर 2007 को मिली एक शिकायत के आधार पर नीरा राडिया के फोन की टैपिंग की गई थी। इस शिकायत में आरोप लगाया गया था कि नौ साल की अवधि में नीरा राडिया ने तीन सौ करोड़ रुपए का कारोबार खड़ा कर लिया है। सरकार ने कुल 180 दिन नीरा राडिया का टेलीफोन रिकार्ड किया था।

राजुल माहेश्वरी को बोलना पड़ा, अमर उजाला का शेयर किसी कारपोरेट हाउस को नहीं बेचा

अमर उजाला को लेकर बाजार में उड़ी चर्चाओं, अफवाहों, कयासों को विराम देने के लिए खुद अमर उजाला के मालिक राजुल माहेश्वरी को आगे आना पड़ा. उन्होंने समाचार एजेंसी प्रेस ट्रस्ट आफ इंडिया से एक बातचीत में कहा कि अमर उजाला का शेयर किसी कारपोरेट हाउस के समक्ष गिरवी नहीं रखा गया है और न ही अमर उजाला अखबार को किसी को बेचने की कोई तैयारी है. उन्होंने बताया कि खुद के परिवार और मित्रों के सहयोग से उन्होंने अशोक अग्रवाल एंड फेमिली के साथ चल रहे विवाद को खत्म किया और उनके शेयर के बदले उन्हें डेढ़ सौ करोड़ रुपये दिए. प्रेस ट्रस्ट आफ इंडिया की तरफ से जारी खबर इस प्रकार है…

Maheshwari group consolidates stake in Amar Ujala

Rajul Maheshwari, along with his family and friends, has acquired 14% stake for an estimated value of Rs150 crore

New Delhi: After buying out global private equity major DE Shaw’s stake, the Maheshwari family has further consolidated its holding in Amar Ujala Publications by acquiring 14% stake from Ashok Agarwal and family.

Rajul Maheshwari, managing director of the company that publishes Hindi daily Amar Ujala, along with his family and friends, has acquired this 14% stake for an estimated value of Rs150 crore. The transaction, which values the firm at about Rs1,000 crore, will give full control to the Maheshwari group, which had also acquired US-based DE Shaw’s 18% stake in Amar Ujala for about Rs140 crore.

An agreement has been signed for the latest deal and is part of a settlement with Agarwal family, which had filed a complaint against its partner at the Company Law Board (CLB).

“We intend to further consolidate Amar Ujala’s share in Hindi language newspaper industry as there is an ample space and opportunity for growth that exists,” Maheshwari said.

“Now with all litigation over, the management henceforth will focus all its energy towards attaining its objective to become leader in the areas it operates in,” he added.

He also vehemently denied rumours pertaining to any dilution in promoter’s equity in favour of any corporate house either presently or in future.

Amar Ujala is one of the country’s leading Hindi dailies and is present across Himachal Pradesh, Uttar Pradesh, Uttarakhand and Jammu regions, among others.

साभार: PTI


मूल खबर…

क्या अमर उजाला अखबार को नवीन जिंदल ने खरीद लिया?

Reply on Post of Mr. Nadim

Dear Yashwant Ji

Greetings, Let me introduce myself that I am a homemaker and regular reader of your website for some authentic information's and news. I have some concerns about a post on your website as "एबीपी न्यूज ने भारी भूल की, मस्जिद या ढांचा विवादित नहीं है, जन्मस्थल पर विवाद है" written by Mr. Nadim S. Akhtar.

I have given my coomment on that post in below format but it's not appearing. So Please post my reply so that the readers can know the others version too; and please don't give space like such a comment which seems to be judgmental, otherwise you may loose the integrity of lacs of  online readers like me who blindly trusting your site Bhadas.

Thanks
Renu S. Pandey


My Reply to Mr. Nadim:

Dear Mr, Nadim

Greetings

Please don't be judgmental. Your knowledge about the disputed structure is sub optimal. Actually it was not constructed by any emperor (Babar) but it was constructed by Meerbanki (rep. pf babar) who has demolished the Sri Ram temple and converted the super structure into a mosque and given the name Babari mosque in the name of his master Babar,

ABP news is more correct and it is a proven fact that Ayodhya is birth place of Lord Ram, and it is holy for every Hindu in their heart (yes including so called secular in their public life for yours vote!!!!!) like Makka in Islam. Matter is still in court so don't try to prove it as Babri mosque by giving tempered facts!!!!!!!

In the last I would like to request Yashwant ji of Bhadas that please don't give space like such a comment which seems to be judgmental, otherwise you may loose the integrity of lacs of  online readers who blindly trusting your site Bhadas.

Thanks
Renu S. Pandey
Home Maker


मूल पोस्ट…

एबीपी न्यूज ने भारी भूल की, मस्जिद या ढांचा विवादित नहीं है, जन्मस्थल पर विवाद है

वीडियो में उस लड़की ने आंसुओं की धार के बीच उस रात का वर्णन किया है

Mayank Saxena : मौन तोड़ देने का समय… हाल के दो दिनों के प्रकरण में बहुत सारी चर्चाएं हुई, कुछ सार्थक और कुछ चकल्लसी…राहत देने वाली बात ये थी कि कई सारे सच सामने आए और कई प्रहसनों-अफ़वाहबाज़ों का पर्दाफ़ाश हुआ….अब सवाल ये कि मैं और इला चुप क्यों थे…चलिए मैं मौन (चुप्पी नहीं) तोड़ देता हूं…

इस पूरे मामले को लेकर कुछ मेरे अज़ीज़ साथी Samar Anarya लिख चुके हैं, बाकी मैं लिख देता हूं…शुरुआत से ही इस मामले में मेरे प्रहसन करने वाले प्रोपोगेंडाबाज़ साथियों की 'पीड़िता' का रुख हमारे सामने कुछ और ज़हरीलों के सामने कुछ और था…इस बारे में हम न केवल उस शख्स से मिले जिस पर आरोप लगाए गए…बल्कि हमने इस मामले को रोकने और प्रोपोगेंडे को हद पार करने से रोकने के लिए हर उपाय किया…हमको जब लगा कि बूंद की ओर से हमको उस शख्स की सार्वजनिक छवि की क्षति रोकने के लिए माफ़ी मांगनी चाहिए तो हम ने माफ़ी मांगी…उस माफ़ीनामे के लिए मुझे आज भी कोई अफ़सोस नहीं है…लेकिन हां, ये भी सब जानते हैं, वो शख्स भी जिनसे माफ़ी मांगी गई थी…कि इस पूरी साज़िश में हमारी कहीं से कोई भूमिका नहीं थी, सिवाय इसके कि हमारी टीम के कुछ लोगों ने हमारा भरोसा तोड़ा…और वो कभी हमारे साथ काम करते थे…

ख़ैर इस बीच एक ख़बर और मिली कि एक वीडियो है जिसे कुछ लोग फिर से लेकर गली-गली घूम रहे हैं…हमारा दिमाग खराब हो चुका था…कई लोग हमें फोन कर के उस वीडियो के बारे में बता चुके थे…अंततः हमको Balendu Swami ने सुझाव दिया कि हम को ज़हरीलों से मिल कर उस वीडियो और इस प्रोपोगेंडा को फैलने से रोकना चाहिए…क्योंकि न केवल यह उस शख्स की छवि को धूमिल करने का शर्मनाक प्रयास था…साथ ही इनके हिसाब से 'पीड़िता' मानी जा रही लड़की की निजता का भी हनन था…न केवल यह ग़ैरइंसानी था बल्कि ग़ैरक़ानूनी भी…

1 अक्टूबर की रात हम कनॉट प्लेस में अपने साथियों के साथ इनसे मिले…इन्होंने कहा कि मीटिंग का मक़सद मतभेद दूर करना है…हम चाहते थे कि वीडियो और कुत्सित षड्यंत्र का दौर खत्म हो…हमको तब तक ये भी ख़बर नहीं थी कि इस वीडियो को एक मोदीवादी एनजीओ एक्टिविस्ट के दफ्तर पर शूट किया गया था…इस बीच वो 'पीड़िता' कहां थी इसका कोई पता नहीं था…न ही वो इस मामले में अपना कोई रुख साफ़ कर रही थीं…ख़ैर उस बैठक में क्या हुआ ये भी समझिए…

1. मीटिंग में शामिल इन सब लोगों में से ज़्यादातर ने कहा और माना कि 'पीड़िता' का जिस तरह का रवैया रहा है, उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता है।

2. ज़्यादातर लोगों ने जानबूझ कर पीड़िता के संदिग्ध व्यवहार की बजाय हमारे माफ़ीनामे को एजेंडा बना दिया, इसमें वो लोग भी थे जो अब समर भाई की वॉल पर उनके और उस शख्स के ख़ैरख्वाह बन रहे हैं, ये लोग उनके भी करीबी हैं, जिन्होंने समर भाई को माफ़ीनामे वाली एक्सक्लूसिव जानकारी दी और उन ज़हरीलों के साथी भी जो ये कर रहे थे।

3. ज़हरीले भाई ने ख़ुद अपने श्रीमुख से कहा कि पीड़िता पर उनको भी भरोसा नहीं है, यही नहीं उन्होंने वीडियो दिखाने को को भी ग़लत माना।

4. इनमें से ज़्यादातर लोग ये मानते थे कि इनके पास न कोई सुबूत हैं न ही पीड़िता का स्टैंड साफ़ और विश्वसनीय है और न ही कोई लड़ाई लड़ी जा सकती है, हम भी ये चाहते थे कि ये नाटक-गंदा खेल खत्म हो।

5. ख़ैर हमारे सामने शर्त रखी गई कि अगर हम माफ़ीनामा हटा लें तो ये उस वीडियो को प्रचारित नहीं करेंगे और साथ ही फेसबुक पर अपना दुष्प्रचार भी बंद कर देंगे।

6. हमारे सामने ये एक अहम मुद्दा था कि आखिर कैसे जिस शख्स के खिलाफ़ दुष्प्रचार हमने एक सार्वजनिक माफ़ीनामे से रोका था, उसे अब फिर से रोका जाए…हमने अपने साथियों के साथ काफ़ी विचार विमर्श किया।

7. लेकिन तब तक फिर से ज़हरीले भाई और उनके साथियों ने दुष्प्रचार का खेल शुरु कर दिया, हालांकि वो ऐसा न करने का वादा कर चुके थे…हमने आपस में बैठ कर काफ़ी बात की और एक बात तय थी कि इस पूरे प्रकरण में ये लोग लगातार हम को भी निशाना बना रहे थे और हम पर भी उतने ही आरोप लग रहे थे, जितने कि उन सज्जन पर…हमारे सामने ये स्पष्ट था कि हमारा और उन सज्जन का सच साझा है…एक की छवि की हानि दूसरे की छवि की हानि है…और ऐसे में हमारी ग़लती कहीं से कोई भी नहीं है, हम तो ख़ुद पीड़ित थे।

8. हां, मैंने वो माफ़ीनामा हटाया, क्योंकि मैं चाहता था कि ये प्रहसन-प्रोपोगेंडा रुक जाए…और साथ ही इसलिए भी कि उस माफ़ीनामे को हम सार्वजनिक लिख चुके थे…उस पर तमाम कमेंट आ चुके थे और हमारी स्थिति साफ़ थी…लेकिन साथ ही ये भी कि शायद हम दोषी नहीं थे, दोषी कोई और था…

9. अफ़सोस कि शातिर लोगों की चालें ऐसी ही होती हैं, माफ़ीनामा हटा लेने के बाद भी इनका कुत्सित खेल जारी रहा, और अब इनके ही बीच के कुछ लोग पहले से तय खेल के मुताबिक उन सज्जन और समर भाई को चालाकी से तैयार किया हुआ सच बता रहे हैं…जबकि उस मीटिंग में वो य़ा उनके करीबी मौजूद थे, जो उन सज्जन के खिलाफ़ ही नहीं थे, बल्कि लगातार इशारों में उनके खिलाफ़ लिखते भी रहे…और ज़हरीले स्टेटस शेयर भी करते रहे…अब ये लोग नया खेल रच रहे हैं..

10 . हम ने सिर्फ एक शख्स की मानहानि रोकने और एक लड़की की निजता के लगातार उस वीडिये के ज़रिए हो रहे ग़ैरक़ानूनी निजता के हनन को रोकने के लिए वो माफ़ीनामा हटाया, हमारी नीयत साफ़ है…हां, ये ज़रूर है कि हम सामने वाले को रोकने के लिए ऐसा करने के लिए मजबूर थे।

यही नहीं अब इन ज़हरीलों का शातिराना रवैया देखने के बाद, उस माफ़ीनामे में लिखी गई ज़्यादातर बातों पर मैं फिर से सहमत हूं, सिर्फ एक बात को छोड़ कर कि इस पूरे प्रकरण में मेरा या बूंद का कहीं से कोई दोष है। हां, मेरा दोष है कि मैंने सरलता से लोगों पर भरोसा किया और धोखा खाया। लेकिन मैं फिर से कह रहा हूं कि इस मामले में मैं और Ila Joshi बराबर के पीड़ित हैं…उतनी ही मानहानि हमारी भी होती रही है, कोई दोष न होने के बावजूद…हां, हम छले गए और फिर भी बार बार लोगों पर भरोसा करने को मजबूर थे, ये हमारा दोष है।

हमने आज तक उस शख्स के खिलाफ़ एक शब्द नहीं लिखा, न ही इस मामले को लेकर कुछ लिखा, हम लगातार कोशिश करते रहे इस गंदे खेल को रोकने की, हम सब लोगो से मिलते रहे, शांतिपूर्ण तरीके से इस खेल को रोकने की कोशिश करते रहे, इस मामले को और गंदा होने से बचाते रहे…हम पर तमाम ऐसे आरोप लगे, जो हम स्वप्न में भी नहीं सोच सकते थे लेकिन हम चुप रहे…लेकिन अब मौन तोड़ देने का समय था…हम बोल रहे हैं…

और हां, हमने उस वीडियो और फेसबुकिया साज़िश के गंदे खेल को रोकने के लिए माफ़ीनामा ज़रूर हटाया पर उसे हटाने का मतलब उसका खंडन भी नहीं है, मैं फिर से कहता हूं कि मैं उसकी मानहानि पर उतना ही दुखी हूं, जितना चिंतित वह हमारे ऊपर हो रहे हमलों से हैं…इस प्रकरण में उनके साथ हमको भी लगातार फ्रेम ही किया गया…उनका साथी ही बताया गया…उम्मीद है कि वे भी समझते होंगे…

इस मामले में हमारी पिछले कुछ दिनों में लगातार कामरेड Girijesh Tiwari से भी बात हुई है और उन्होंने हमारे पक्ष को कितना समझा है वो भी आपको साफ़ कर सकते हैं…बल्कि हम मानते हैं कि कर ही देंगे…

ख़ैर ये हमारा सच है, इसके अलावा जो भी बातें हैं, वो और कई लोग जानते हैं…उस 1 अक्टूबर की मीटिंग में कई लोग थे, जो ये सब जानते हैं…वो भी सच कहेंगे…आप में से किसी को ठगा नहीं गया है…ठगे हुए तो लगातार हम महसूस करते रहे…हां, हम अपनी ओर से ये सब रोकने की कोशिश में नाकाम ज़रूर हुए हैं, इसके लिए हम ज़रूर माफ़ी चाहते हैं…

फिलहाल इतना ही…क्योंकि हम पर दोनों ओर से एक दूसरे का साथ देने का आरोप लग रहा है…आप ही तय करें कि आखिर हम हैं किसके साथ…

मयंक सक्सेना के फेसबुक वॉल से.


Balendu Swami मयंक भाई, मुझे जिस प्रकार आपने उद्धृत किया है, उसके पहले 'अगर' था, साथ ही हमारी आपकी इस विषय में बहुत से पहलुओं पर चर्चा हुई. मुझे आप बहुत मजबूर लगे उस समय! आप भी मेरे लिए उतने ही अपरिचित हैं जितने कि आरोपी, पीड़िता अथवा आरोप लगाने वाले तपन इत्यादि. मैंने उस वीडियो को बिना एडिट किया हुआ पूरा और बड़ी तसल्ली के साथ देखा है. पहले तो मुझे आप या कोई भी ये बताये कि किस किस ने वह वीडियो देखा है? मेरे समझ में नहीं आ रहा कि तपन और उनके साथी उसे अपलोड क्यों नहीं कर रहे हैं अभी तक!

वह वीडियो ऐसा नहीं है जिसे कि आसानी से ख़ारिज किया जा सके. उसमें कोई आरोप नहीं बल्कि उस लड़की ने आंसुओं की धार के बीच उस रात का विस्तृत वृत्तान्त का वर्णन किया है. उस वीडियो को देखकर कदापि भी यह नहीं लगता कि उसे छुपाकर, ब्रेनवाश करके या दबाव में या पुटिया कर बनाया गया है! जिस प्रकार से दावे किये जा रहे हैं कि वो लड़की सामने नहीं आना चाहती या अब वो सामने नहीं आएगी, परन्तु वो सामने तो आ ही चुकी है वीडियो के माध्यम से और यदि कल को वो आपके सामने आकर खड़ी भी हो गई तो क्या कीजियेगा? और मुझे लगता है कि वो आज नहीं तो कल सामने आ भी जायेगी.

मैंने तो तपन से भी कहा था कि कहानी लिखने से अच्छा तो यह है कि वो वीडियो को सामने लायें और लोगों को खुद फैसला लेने दें. मुझे पहले भी आप मजबूर दिखे थे आज भी मजबूर ही दिख रहे हो. एक बात बहुत ही अजीब मुझे सभी जगह दिखाई दे रही है कि उस लड़की की अनुपस्तिथी में बिना उसका पक्ष जाने सभी लोग एकतरफा निर्णय ले रहे हैं और उसके लिए जो मन में आ रहा है, कह रहे हैं. कल्पना करिए कि कल को अगर वो सामने आकर वही कहने लग जाए जो उसने वीडियो में कहा है, फिर क्या होगा!

खुर्शीद जी तथा अन्य साथियों से जैसा सुना कि वह पुलिस और कानूनी कार्यवाही पर विचार कर रहे हैं तो मैंने भी उनसे यही कहा था कि यदि सत्य आपके साथ है तो अवश्य ही आपको अपनी सुरक्षा की व्यवस्था और चिंता करनी चाहिए!

बालेंदु स्वामी के फेसबुक वॉल से.


Samar Anarya : शुक्रिया Mayank भाई, देर से ही सही बोल कर आपने हम तमाम दोस्तों का यकीन टूटने से बचा लिया वरना अब बात सच में हाथ से निकल रही थी. बस यह जरुर कहूँगा कि आपने माफ़ीनामा हटाने के पहले इस मुद्दे से जुड़े रहे हम तमाम लोगों में किसी एक को यकीन में ले लिया होता तो किसी जयकरण सिंह की बात से क्या ही भ्रम फैलता. खैर देर आयद दुरस्त आयद. अब आपके बयान के बाद स्थिति साफ़ हो गयी है. यह कि पीड़िता तो कोई है ही नहीं (वह अब भी सामने आ जाएँ तो और बात है.)) यह भी कि मधु किश्वर नामक मोदी भक्तिन के ऑफिस में बनाये गए वीडियो को लेकर शहर शहर घूम रहे लोगों को पैसा कहाँ से मिल रहा है यह भी बहुत कुछ साफ़ कर देता है.

सो जैसा कि हमेशा कहता रहा हूँ, आँधियाँ हाथ थामने का वक़्त होती हैं, अफ़सोस आपकी चुप्पी ने कुछ देर परेशान जरुर किया पर अब बोलने ने सब कुछ साफ़ कर दिया है. अब मिल के इन जह्रीलों का जहर उतारने का वक़्त आ गया है. और इन्ही का नहीं, उन तमाम निष्पक्ष/निष्कच्छ/सपच्छ/सकच्छ जन का भी जो मधु किश्वर के नेतृत्व में काम कर रहे "कामरेडों" के दम पर एक वरिष्ठ साथी के जीवन भर के संघर्षों पर मिटटी फेर उसके शिकार पर निकले थे.

मुझे लगता है कि अब उन पर कार्यवाही करने का वक़्त आ गया है. मिल के निपटते हैं अब इनसे.और इस निपटने में पहले सवाल..

१. ज़हरीला तपन: न्याय के सिपाही बनते घूमते हो (मधु किश्वर के पैसे से वह और बात है) हिम्मत हो तो सीधे नाम लो. भाग क्यों रहे हो? अदालत जाने से डर लगता है?

२. खद कामरेड होने के दावे वाले तुम लोगों ने यह वीडिओ चुन चुन के मोदी समर्थक पत्रकारों को ही क्यों दिखाया? ऐसे लोगों की तमाम पोस्ट्स हमने पढ़ी हैं मियाँ जिनसे तुम्हारे चेहरे का नकाब उतरता है.

३. कामरेड गिरिजेश तिवारी और Balendu Swami के अलावा तुमने सिर्फ और सिर्फ घोषित साम्प्रदायिक लोगों की मदद ली है. क्यों?

जवाब हों तो जरुर देना, बाकी अनंत काल तक तथ्य इकट्ठे करते रहने का फर्जीवाड़ा नहीं चलेगा जहरीलों … किसी की जिंदगी भर के संघर्षों की कमाई इतनी सस्ती नहीं है कि मधु किश्वर जैसों को बिक गए लोगों पर लुटा दी जाय.

अविनाश पांडेय 'समर' के फेसबुक वॉल से.


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उस लड़की ने उन्हें बताया कि उस वरिष्ठ साथी ने रात में उस लड़की से बलात्कार किया!

कम्युनिटी रेडियो के लिए उमेश कुमार ने काम शुरू किया

पत्रकार और उद्यमी उमेश कुमार ने अब कम्युनिटी रेडियो के फील्ड में काम शुरू कर दिया है. उनकी लंदन की एक कंपनी से इस बारे में डील फाइनल हो चुकी है. उमेश की खुद की कंपनी और लंदन की एक अन्य कंपनी के पार्टनरशिप में छोटे-मझोले शहरों में रेडियो शुरू किया जाएगा. उमेश कुमार 'समाचार प्लस' न्यूज चैनल के मालिक हैं. वे मीडिया के अलावा फिल्म, खेल, विमानन आदि क्षेत्रों में सक्रिय हैं.

भड़ास4मीडिया से बातचीत में उमेश कुमार ने बताया कि 'समाचार प्लस' ने यूपी-उत्तराखंड और राजस्थान में काफी अच्छा प्रदर्शन किया है. दोनों रीजनल चैनल लांच होते ही दूसरे नंबर पर पहुंच गए, ये बड़ी बात है. टीवी के बाद अब हम लोग रेडियो के लिए सक्रिय हैं. छोटे-मझोले शहरों में उन शहरों का अपना रेडियो चैनल शुरू किया जाएगा. कम्युनिटी रेडियो के इस कानसेप्ट के जरिए जन-जन तक पहुंचने की योजना है. इस बारे में जल्द ही आधिकारिक घोषणाएं की जाएंगी. अभी सारा कामकाज शुरुवाती लेवल पर है.

सहारा और चैनल वन में जाने संबंधी खबरें गलत, भड़ास विश्वसनीयता न खोए : सतीश के. सिंह

वरिष्ठ पत्रकार सतीश के. सिंह ने सहारा और चैनल वन में जाने संबंधी भड़ास पर प्रकाशित खबरों को गलत बताया है. उन्होंने कहा कि पहले मुझे सहारा में ज्वाइन किया बताया गया और अब चैनल वन में ज्वायनिंग के संबंध में खबर भड़ास पर प्रकाशित हुई है. ये दोनों ही खबरें गलत हैं.

उन्होंने कहा कि भड़ास को अपनी विश्वसनीयता बचाकर रखने का प्रयास करना चाहिए. अगर भड़ास किसी एजेंडे के तहत मेरे खिलाफ अनाप-शनाप खबरें छाप रहा है तो फिर कोई बात नहीं. अगर ऐसा नहीं है तो खबर देने से पहले एक बार जांच-पड़ताल करने की कोशिश करनी चाहिए और जिसके बारे में खबर हो उसका पक्ष ले लेना चाहिए. इन्हीं खबरों में बताया गया है कि मैं पीएमओ का करीबी हूं जबतक सच्चाई है कि मुझे पीएमओ का रास्ता तक नहीं पता है. इस प्रकार की अनाप-शनाप बातें प्रकाशित करने से छवि पर बुरा प्रभाव पड़ता है. सतीश के. सिंह के मुताबिक वे न तो सहारा ज्वाइन कर रहे हैं और न ही चैनल वन जा रहे हैं. उनके बारे में कायस लगाने और अफवाह फैलाने पर विराम लगाना चाहिए.


(उपरोक्त बातें सतीश के. सिंह ने भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह से फोन पर कहीं. इस बारे में भड़ास के एडिटर यशवंत कहना है कि कानाफूसी कैटगरी में संपादकों से संबंधित गासिप का प्रकाशन होता रहता है. बड़े न्यूज चैनलों के संपादकों या पूर्व संपादकों की गतिविधियों के बारे में चर्चा, गासिप प्रकाशित करना अपराध नहीं है. और, यह जरूरी भी नहीं कि हर कयास जो छपे वो सच साबित हो जाए. कई बार ऐसा होता है, जिसकी संभावना व्यक्त की जाती है, वह सच साबित होता है. कई बार अंदाजा गलत भी हो जाता है. ये सूचनाएं,  गासिप, खबरें मीडिया इंडस्ट्री के विश्वसनीय लोगों से मिलती हैं. ऐसे में जब कानाफूसी होगी तो छपेगी भी. न्यू मीडिया के इस दौर में संपादक, चैनल और अखबार भी खबर के हिस्से हैं. हां, इन लोगों को यह खराब जरूर लगता है कि आखिर देश दुनिया की खबर लेने वालों की खबर भला दूसरा कौन व कैसे ले सकता है. पर अब ये सच है. इस ट्रेंड को भड़ास ने न सिर्फ इस्टैबलिश किया बल्कि इसे एक बड़े आंदोलन का रूप दे दिया जिसके कारण आज दर्जन भर मीडिया वेबसाइट संचालित हो रही हैं और सभी खबर देने वालों की खबर लेने में लगी हैं. इसी प्रक्रिया से मीडिया का लोकतांत्रीकरण होगा. भड़ास ने मीडिया की खबर देने के एवज में न सिर्फ भुगता है बल्कि घाघ, बेइमान और दलाल टाइप संपादकों व मीडिया मालिकों की साजिशों का शिकार भी हुआ है. बावजूद इसके, न तो हमारा हौसला कम हुआ है और न ही इरादा डिगा है. दूसरों के बारे में अनाप शनाप आंय बांय सांय खबरें दिखाने छापने चलाने दिखाने बताने वालों को कभी कभी अपने बारे में भी खबर सुनने पढ़ने देखने के लिए तैयार रहना चाहिए. हां, हम सतीश के. सिंह जी के इस लोकतांत्रिक अधिकार का सम्मान करते हैं जिसके तहत वह खुद के बारे में प्रकाशित किसी खबर पर अपना पक्ष दे सकें और गलत तथ्यों को दुरुस्त कराने की कोशिश कर सकें. भड़ास ने हमेशा खबरों-घटनाओं के दूसरे तीसरे चौथे समेत हर एक पक्ष को सामने लाने का काम किया है और आगे भी करेंगे.)

‘दैनिक जागरण में राजनीति तो होती ही है, फिर भी झा साहब जहां खड़े होंगे, लाइन वहीं से शुरू होगी’

मनोज झा तमाम प्रशंसा और निंदा से ऊपर हैं। संतों की तरह रहते हैं, जैसे हैं, वैसे दिखते हैं। कोई छल नहीं, कोई कपट नहीं। जो मन में आता है, कहते हैं, न कोई राज न कोई राजनीति। भोले के भक्त हैं और भोले भी हैं, यही वजह है कि वो खुद राजनीति के शिकार हो जाते हैं।

उनके तमाम दुश्मन हैं और रहेंगे भी, क्योंकि दैनिक जागरण में राजनीति तो होती ही है, फिर भी झा साहब जहां खड़े होंगे, लाइन वहीं से शुरू होगी। झा साहब ही हैं, जिनमें फुर्ती के लिए सुर्ती की जरूरत नहीं पड़ेगी।

उपरोक्त टिप्पणी दैनिक जागरण, मेरठ में कार्य कर चुके और इन दिनों आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत विकास मिश्रा ने भड़ास पर प्रकाशित पोस्ट दैनिक जागरण, मेरठ के संपादकीय प्रभारी मनोज झा का 'सुर्ती कांड'! को पढ़ने के बाद की.

एबीपी न्यूज ने भारी भूल की, मस्जिद या ढांचा विवादित नहीं है, जन्मस्थल पर विवाद है

Nadim S. Akhter : अच्छा है. एबीपी न्यूज वालों ने संघ और बीजेपी की लाइन ले ली है. वे इसे -बाबरी मस्जिद- नहीं मानते. चैनल इसे -विवादित ढांचा- बता रहा था अपने कार्यक्रम -प्रधानमंत्री- में. एबीपी न्यूज वालों जिस तरह से बाबरी मस्जिद के इतिहास की व्याख्या की, उसका मतलब ये हुआ कि जिस 'ढांचे' को कारसेवकों ने ध्वस्त कर दिया, वह 'ढांचा' पहले मंदिर था. फिर दूसरे धर्म के लोगों (मुसलमानों) ने उस 'ढांचे' पर कब्जा कर लिया और उस ''ढांचे' को मस्जिद बताकर वहां नमाज पढ़नी शुरू कर दी. यानी ढांचा –विवादित– हो गया.

लेकिन ऊपर जो मैंने कहानी बताई, क्या वाकई में ऐसा हुआ. नहीं हुआ ना. तो फिर मस्जिद को -विवादित ढांचा- क्यों और किस आधार पर बता रहा था एबीपी न्यूज. —विवादित ढांचा— का मतलब तो यह होता है कि जिस ढांचे को ढहाया गया, उसी पर विवाद है यानी कि वह ढांचा पहले मंदिर के रूप में बना था और फिर उसे मस्जिद बताया-कहा जाने लगा. मतलब कि एक बने-बनाए ढांचे पर विवाद है.

लेकिन राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद का मामला तो इससे एकदम उलट है. यहां विवाद किसी ढांचे को लेकर नहीं, जन्मस्थान को लेकर है. हिन्दू संगठनों का कहना है कि पहले वहां भगवान राम का मंदिर था, जिसे ढहाकर मस्जिद बना दी गई. उनका दावा है कि मस्जिद के अंदर ही वह जगह-स्थान है, जहां भगवान राम का जन्म हुआ था. और मुस्लिम इसे बस एक मस्जिद मानते हैं, जैसी किसी भी गली-मुहल्ले की मस्जिद होती है, एक आम मस्जिद जहां नमाज पढ़ी जाती है. फर्क ये है कि इस मस्जिद को एक बादशाह ने बनवाया था, जैसे दिल्ली की जामा मस्जिद या कोई भी पुरातत्व महत्व की मस्जिद.

इन तथ्यों के आधार पर अवलोकन करें तो ये पाएंगे कि ढांचा विवादित कैसे हो गया?? उसे तो मस्जिद ही बनाया गया था ना. वहां नमाज भी पढ़ी जाती थी शुरुआत में. हां, ये अलग बात है कि हिन्दू संगठनों की दलीलों के अनुसार उसे मंदिर तोड़कर बनाया गया था और यहीं भगवान राम का जन्म स्थान है, मस्जिद के अंदर. फिर तो मस्जिद नहीं, उसके अंदर स्थित वह जगह विवादित हुई, जहां भगवान राम का जन्म हुआ बताया जाता है. तब तो इसे कहना चाहिए कि –बाबरी मस्जिद के अंदर स्थित विवादित स्थल/जगह-.

लेकिन इस पूरे प्रकरण में बाबरी मस्जिद का ढांचा कैसे विवादित हो गया भाई. वह तो मस्जिद के रूप में बनाई गई थी और गिराए जाने तक मस्जिद ही रही. उसे -विवादित ढांचा- कैसे और क्यों कहा जा सकता है. विवादित तो वह स्थान है, मस्जिद के अंदर का, जहां भगवान राम का जन्म मानते हैं हिन्दू संगठन. तो अगर लिखना ही होगा तो ये लिखेंगे कि —बाबरी मस्जिद के अंदर का विवादित स्थल—-. बाबरी मस्जिद की इमारत को -विवादित ढांचा- किस तर्क के आधार पर लिखा जा सकता है दोस्तों???!!! और जो लिखते हैं, वो मेरी समझ से भारी तथ्यात्मक चूक करते हैं. और यही चूक एबीपी न्यूज ने अपने कार्यक्रम -प्रधानमंत्री- में की. पूरे प्रोग्राम में इसके प्रोड्यूसर ने बाबरी मस्जिद को -विवादित ढांचा- बताया. पता नहीं, इतने महत्वपूर्ण प्रोग्राम के ऑन एयर होने से पहले वरिष्ठ लोग इसे देखते भी हैं या नहीं.

हास्यास्पद ये रहा कि एबीपी न्यूज तो पूरे कार्यक्रम में बाबरी मस्जिद को -विवादित ढांचा- बताता रहा लेकिन जिन Experts-Journalists की राय वह इसमें दिखा रहा था, जिन्होंने बाबरी मस्जिद ढहाए जाने की घटना को अपनी आंखों से देखा था, वो सब इसे -मस्जिद- ही कहते रहे. किसी ने भी इसे -विवादित ढांचा- नहीं बताया. एबीपी न्यूज ने इस प्रोग्राम में वरिष्ठ पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी और शीतला प्रसाद की byte दिखाई, उनकी राय बताई. इन दोनों ने उस ढांचे को -मस्जिद- कहकर ही संबोधित किया, -विवादित ढांचा- नहीं कहा. लेकिन एबीपी न्यूज इसे लगातार -विवादित ढांचा- कहकर संबोधित करता रहा, जो मेरी समझ से तथ्यात्मक रूप से एक बहुत भारी चूक थी और दर्शकों को गुमराह करने की कवायद. बतौर दर्शक एक प्रतिष्ठित राष्ट्रीय न्यूज चैनल पर ऐसी गलती देखना अच्छा नहीं लगा.

तो जो मित्र बाबरी मस्जिद को -विवादित ढांचा- बताने पर तुले थे, मेरे ख्याल से उनका भ्रम अब दूर हो गया होगा. यह -विवादित ढांचा- नहीं है, इसे ऐसे लिखा जा सकता है कि -बाबरी मस्जिद के अंदर का विवादित स्थान या स्थल— यह ढांचा एक मस्जिद थी, इसमें कोई विवाद नहीं है दोस्तों.

पत्रकार नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से.

टीवी चैनल वाले तो सिर्फ नरेंद्र मोदी को सुना रहे हैं, राहुल गांधी की आवाज दब गई

Nadim S. Akhter : क्या यह इत्तेफाक है कि दिल्ली की रैली में जब राहुल गांधी बोलने के लिए खड़े हुए, ठीक उसी वक्त पटना में नरेंद्र मोदी बोलने के लिए खड़े हो गए. टीवी के कैमरे दोनों पर है. सीधा प्रसारण हो रहा है. अब देखते हैं कि टीवी चैनल मोदी का भाषण सुनाते हैं या राहुल गांधी का… अरे ये क्या. ज्यादातर चैनल नरेंद्र मोदी को सुना रहे हैं. राहुल का भाषण सिर्फ एनडीटीवी इंडिया दिखा रहा है. हां न्यूज 24 भी. पर भी चेंज हो रहा है. आज तक चैनल अब राहुल को सुना रहा है. मोदी पीछे छूट गए. ये देखिए, एनडीटीवी इंडिया भी अब मोदी को सुनाने लगा…हम्म…अब फिर राहुल गांधी पर आ गया.

उफ्फ, चैनल के संपादकों के लिए मुसीबत. किसको सुनाएं. कांग्रेस को या बीजेपी को. मोदी को या राहुल को. एक चैनल ने तो एक साथ मोदी और राहुल, दोनों के ऑडियो रिलीज कर दिया. दोनों की आवाज आ रही है लेकिन स्पष्ट नहीं सुनाई दे रहा है. वाह! इसे कहते हैं राहुल-मोदी का मीडिया वार. लेकिन इस मीडिया वार में नरेंद्र मोदी, राहुल गांधी पर भारी पड़ते दिखाई दे रहे हैं. सिर्फ दो ही चैनल राहुल की स्पीच अभी सुना रहा है. एनडीटीवी इंडिया और न्यूज 24. अंग्रेजी के Times Now और CNN-IBN चैनल भी मोदी को ही सुना रहे हैं. पता चल गया. कांग्रेस का मीडिया मैनेजमेंट कितना कमजोर है और बीजेपी का कितना मजबूत. (नोटः वैसे ज्यादातर लोग नरेंद्र मोदी का ही भाषण सुनना चाहते हैं, न्यूज रूम में बहस चल रही है. सब मोदी के पक्ष में हैं. माहौल मोदीमय है. जय हो. जय मीडिया)

पत्रकार नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से.

TRP और Media Management से आगे भी कुछ होता है, जिसे नागरिकों के प्रति जिम्मेदारी कहते हैं

Dilnawaz Pasha : आप समझते हैं कि चैनल आपके लिए पत्रकारिता कर रहे हैं. पत्रकारिता में balance यानि संतुलन का भी एक सिंद्धांत होता है. जब तक संतुलन न हो तब तक रिपोर्टिंग हमेशा अधूरी रहती है. भारतीय चैनलों को देखकर तो यही लग रहा है कि ज़्यादातर संतुलन के सिद्धांत को भूल गए हैं. सिर्फ़ नरेंद्र मोदी की ही रैली का प्रसारण किया जा रहा है जबकि दिल्ली में राहुल गाँधी की भी एक रैली थी. होना तो यह चाहिए था कि दोनों को बराबर का वक़्त दिया जाता और जनता दोनों के विचारों पर अपनी राय क़ायम कर पाती.

सिर्फ़ इकतरफ़ा ख़बरें दिखाना न सिर्फ़ दर्शकों के प्रति लापरवाही है बल्कि लोकतंत्र के लिए भी नुकसानदेह है. informed Citizen (जागरूक नागरिक) लोकतंत्र को मजबूत करते हैं, लेकिन जब नागरिकों तक सिर्फ़ एक ही पक्ष पहुँचाया जाए तब लोकतंत्र कमज़ोर हो रहा होता है. इसी गाँधी मैदान में, कुछ ही दिन पहले, इतनी ही भीड़ जुटी थी. मंच से कुछ नेता भी बोले थे. क्या किसी ने भी उनके भाषणों को टीवी पर सुना था. पत्रकारों को खुद से पूछना चाहिए कि क्या वो अपनी रिपोर्टिंग में संतुलन बनाए रख पा रहे हैं? TRP और Media Management (मीडिया प्रबंधन) से आगे भी कुछ होता है, जिसे नागरिकों के प्रति ज़िम्मेदारी कहते हैं. लेकिन हम यहाँ किससे बात कर रहे हैं?

बीबीसी में कार्यरत में पत्रकार दिलनवाज पाशा के फेसबुक वॉल से.

दयाशंकर शुक्ल ‘सागर’ ने कहा- ‘अलविदा इलाहाबाद’

‘न दोस्त है न रकीब है तेरा शहर कितना अजीब है।’ कुछ इसी अंदाज से तीन साल पहले इलाहाबाद आना हुआ था। सब कुछ रुका-रुका-सा थमा-थमा-सा। जैसे जिंदगी ठहर गई हो। पहली नजर में यह शहर सोया-सोया, उनींदा-सा लगा था। हमारे अखबार ने ‘आओ संवारे इलाहाबाद’ की मुहिम शुरू की। शुरुआत सिविल लाइन्स के एमजी रोड से करनी थी। सवाल था लखनऊ का हजरतगंज संवर सकता है तो इलाहाबाद का सिविल लाइन्स क्यों नहीं?

हमने शहर के जिम्मेदार लोगों को दफ्तर में बुला उन्हें कमिश्नर से लेकर डीएम तक से रूबरू कराया। सब उत्साहित थे। हमने यहां के अर्किटेक्ट और इंजीनियरों की एक टीम बनाई जिसे संवरे हुए सिविल लाइन्स का ब्लू प्रिंट तैयार करना था। इसके लिए वे स्वेच्छा से सामने आए थे। लेकिन मैं इस टीम के हर सदस्य को फोन करते-करते थक गया। पर मुझे आज तक उनसे ब्लू प्रिंट नहीं मिला। सब शहर की चिन्ता छोड़ अपने अपने काम में मशगूल हो गए। हमें लगा कि हम अकेले पड़ गए। लेकिन हिम्मत नहीं हारी। कलम की मुहिम जारी रही। और एक दिन एडीए ने वह ब्लू प्रिंट और सिविल लाइन्स के सुंदरीकरण का इस्टीमेट प्लान हमारे हाथ पर रख दिया। प्रस्ताव अब शासन के पास फण्ड के लिए रुका हुआ है। मैंने सीएम अखिलेश यादव से बात करनी चाही लेकिने उनके चेलों ने इस बारे में कोई मदद करने से इंकार कर दिया।

लेकिन मैं जानता हूं आज नहीं तो कल ये फण्ड मंजूर भी हो जाएगा। इलाहाबाद के नौजवान डीएम राजशेखर खुद इस काम में लगे हैं। लेकिन उनकी भी समीमाएं हैं। नगर विकास के प्रमुख सचिव कुंभ के लिए जो पैसा दिल्ली से आया वो इलाहाबाद पर खर्च नहीं करना चाहते। इलाहाबाद के विकास प्राधिकरण ने अपना फण्ड कुंभ पर खर्च कर दिया। अब राज्य सरकार वो पैसा वापस करने को तैयार नहीं। गजब नौटंकी चल रही है। खैर असल सवाल है कि इलाहाबाद के जिम्मेदार लोगों के पास अपने शहर के लिए वक्त क्यों नहीं है? या वह नींद से जागने को राजी नहीं हैं? जब मेरे एक मित्र विपिन गुप्ता ने इस शहर को ‘स्लीपिंग सिटी’ का फतवा दे दिया तोे मुझे यकीन करना पड़ा कि ये वाकई एक सोया हुआ शहर है। इसका कुछ नहीं हो सकता।

लेकिन मेरी यह धारणा बहुत जल्द धराशायी हो गई। आप किसी शहर को तब तक पूरी तरह नहीं समझ सकते जब तक आप खुद उसका हिस्सा नहीं बन जाते। शहर की धड़कन को एक टूरिस्ट की नजर से नहीं पकड़ा जा सकता। त्योहारों के मौसम में मैंने अपने दोस्तों के साथ इस शहर को बहुत करीब से जिया। पथरचट्टी की रामलीला में मैंने आसमान से ठीक नीचे बने कृत्रिम हिमालय की श्रृंखलाओं के बीच शिव द्वारा पार्वती को रामकथा सुनाते साक्षात देखा। देखा दशहरे में पूरा शहर कैसे रामदल की यात्राओं को उत्सव बना देता है। कैसे नवरात्र में गली-गली भव्य दुर्गा प्रतिमाएं सज जाती हैं। कैसे हाईकोर्ट की छूट के बावजूद श्रद्धालु अपनी देवी प्रतिमाओं को नदियों के बजाए झील और तालाबों में विसर्जित करने की होड़ करने लगते हैं ताकि हमारी गंगा-यमुना मैली न हो।

मैंने देखा कैसे मोहर्रम में शिया हजरत इमाम हुसैन की शहादत की याद में दर्दनाक आवाज में मर्सिया पढ़ते-पढ़ते छुरीदार हंटर से खुद को लहुलुहान कर लेते हैं। चौक के रानीमंडी जैसे पुराने इलाके में ऐसा जूनन भरा माहौल होता है कि किसी अजनबी का दहशत से गला खुश्क हो जाए। लेकिन गंगा-जमुनी तहजीब का गजब संगम यहां सड़कों पर दिखा। दिसम्बर के जाड़ों में शहर के चर्च ऐसे सज जाते हैं मानो ईसा मसीह यहीं इलाहाबाद में ही पुनर्जन्म लेने वाले हों। मैंने देखा कुंभ में कैसे करोड़ों श्रद्धालु संगम में डुबकी लगा कर वापस लौट जाते हैं और शहर के चेहरे पर एक शिकन तक नहीं होती। इको-स्पोट्र्स के जमाने में यहां गहरेबाजी के दौरान घोड़ों की रेस आज भी होती है, सड़क पर कबूतर लड़ाते और उड़ाते लोगों की भीड़ देखी। हाईकोर्ट में महत्वपूर्ण फैसले देने के बाद इलाहाबादी मूल के जजों को लोकनाथ में कचौड़ी की दुकान पर बड़ी सादगी से कहते सुना-‘का यार कुछ खिलौबो-पिलौबो नाही।’

कभी आरक्षण के पक्ष और विरोध में यहां कई-कई दिन तक शहर ठप हो जाता है लेकिन जल्द ही सलोरी-अल्लापुर इलाके में ठाकुर और यादवजी अपने नोट्स के संग गलबहियां डाले घूमते दिखते हैं। तो कभी जरा-सी बात पर काले कोट वाले पढ़े लिखे वकील, नादान छात्रों की तरह उपद्रवी बन शहर को सिर पर खड़ा कर लेते हैं। चोर यहां पूरा का पूरा एटीएम उखाड़ कर गधे के सिर से सींग की तरह गायब हो जाते हैं और पुलिस दारू पीकर नाले में लोटपोट करती रहती है। कभी छेड़छाड़ से त्रस्त कोई लड़की लफंगे की बाइक में पेट्रोल छिड़क कर सरेआम आग लगा कर दुर्गा बन जाती है तो कभी इश्क में बेतरह डूबे लड़के यमुना के नए बने पुल से कूद कर बेवजह जान दे देते हैं। ‘गुनाहों के देवता’ यहां आज भी भटकते हैं।

अब ये गजब का शहर छोड़ रहा हूं। मैं समझ सकता हूं कि हरिवंश राय बच्चन से लेकर रवीन्द्र कालिया तक ने ये शहर क्यों छोड़ा। सब कुछ होने के बावजूद इस शहर ने तरक्की के सारे रास्ते बंद कर रखे हैं। लेकिन ये सच है यहां हर किस्सा पल भर में अफसाना बन जाता है और हर अफसाना एक मुकम्मल नॉवल। सब अपनी जिन्दगी में इस कदर मशगूल हैं कि कोई यह मानने को तैयार नहीं कि दुनिया चांद पर पहुंच चुकी है। जिस ‘गॉड पार्टिकल’ पर हिग्स-इंगलर्ट को इस साल नोबल के लिए चुना गया उसे इलाहाबादियों ने संगम की रेती के किनारे न जाने कब का खोज निकाला है। इतनी ठसक और विविधाता से भरा जीवन्त शहर आपको और कहां मिलेगा। क्या बता सकते हैं आप?

लेखक दयाशंकर शुक्ल 'सागर' हिंदुस्तान अखबार, इलाहाबाद के संपादकीय प्रभारी हुआ करते थे. उन्होंने हिंदुस्तान की नौकरी छोड़ दी है और अब अमर उजाला के हिस्से बनकर लखनऊ लौट चुके हैं.

न हो सकी जो बात चौरसिया जी से

हरिभाई हमेशा थोड़ी जल्दी में होते हैं। आँधी की तरह आये, बाँसुरी की तान छेड़ी और खाना-वाना खाये बगैर किशमिश के चार दाने मुंह में डालकर तूफान की तरह चले गये। गाड़ी से उतरकर मंच पर विराजने और लौटकर फिर अपने वाहन में सवार होने तक लोगों ने उन्हें घेरे रखा था। किसी को उनके आटोग्राफ चाहिये थे तो किसी को उनके साथ फोटू खिंचानी थी। कुछ लोग एक सेलिब्रिटी के साथ महज चंद पल गुजारने का सुख लूटना चाहते थे, सो लूट लिया। मुझे उनका इंटरव्यू करना था, जो नहीं हो सका। हरिभाई ने लगातार दूसरी बार धोखा दिया।

इससे पहले ग्वालियर के तानसेन संगीत समारोह में इस तरह का वाकया हो चुका है। कोई 22-23 साल पहले की घटना है। शास्त्रीय गायन के क्षेत्र में उन दिनों दो नाम बेहद उभरकर सामने आ रहे थे। एक थे रशीद खाँ और दूसरे मुकुल शिवपुत्र। रशीद खाँ अब उस्ताद रशीद खाँ हो चुके हैं और बकौल भीमसेन जोशी हिंदुस्तानी संगीत में कम से कम से एक नाम तो ऐसा है जो इसकी शमआ को जलाये हुए लगातार रोशनी बिखेरे हुए है। दूसरी ओर मुकुल शिवपुत्र, जो कुमार गंधर्व के सुपुत्र हैं, लगातार संगीत के अलावा भी दीगर कारणों से खबरों में आते रहे। कभी उनके बारे में मंदिर की सीढ़ियों में भीख मांगने की खबर आयी, तो कभी नशा मुक्ति केंद्र से भाग जाने की और कभी केंद्र में वापस भेज दिये जाने की। बीच-बीच वे प्रोग्राम भी करते रहे पर उन्हें वह मुकाम हासिल नहीं हो पाया जो रशीद खाँ साहब ने बहुत कम उम्र में हासिल कर लिया। यही मुकुल शिवपुत्र ग्वालियर में हरिभाई के आने से पूर्व मोर्चा संभाले हुए थे। कुछ सुनकार उनके व्यवहार में एक खास किस्म की उच्छृंखलता महसूस कर रहे थे पर चूंकि सुबह-सवेरे ही मैं उनसे मिल आया था, मुझे उनके इस रवैये पर कोई हैरानी नहीं हो रही थी।

मुकुल का इंटरव्यू करते हुए मुझे उनके अंदर एक बेचैनी, रोष, वेदना व अस्थिरता के मिले-जुले भाव परिलक्षित हो रहे थे, जिन्हें कला-जगत की भाषा में आम तौर पर ‘फ्रस्टेशन’ के नाम से जाना जाता है। मुकुल उस्ताद अमीर खान व बड़े गुलाम अली खाँ साहब के बाद भीमसेन जोशी को छोड़कर लगभग सारे गवैयों को खारिज करने पर तुले हुए थे। उनके साथ खैरागढ़ के मुकुंद भाले भी थे। मुकुल पूछ रहे थे-शायद अपने आपसे- सब तरफ तो शोर ही शोर है, कराह हैं, चीखें है, आपको संगीत कहाँ सुनाई पड़ता है? तब मुझे अंदेशा नहीं था कि उनके अंदर की यह बेचैनी उन्हें एक दिन नशा मुक्ति केंद्र तक खींचकर ले जायेगी। ये सारी खबरे मुझे टुकड़ों में मिलती रहीं और इनकी पुष्टि का मेरे पास कोई साधन नहीं था। इन्हीं मुकुल शिवपुत्र ने बातों ही बातों में मुझसे कहा कि आप हरिभाई से नहीं मिल पायेंगे। मध्यप्रदेश पर्यटन निगम वालों ने उनके लिये होटल का कमरा तक बुक नहीं किया है और वे आँधी की तरह आकर तूफान की तरह निकलने वाले हैं। तब मुझे क्या पता था कि यही किस्सा इतने अरसे बाद एक बार फिर दोहराया जायेगा।

बहरहाल, हरिभाई शायद स्टेशन से सीधे ही कार्यक्रम स्थल पर पहुंचे थे। मुकुल ने उनके आगमन की आहट के साथ अपना गाना बीच में ही बंद कर दिया। वे कुमार साहब का मशहूर भजन ‘गुरूजी जहाँ बैठूं वहाँ छाया दे’ गा रहे थे। लोग मंत्र-मुग्ध सुन भी रहे थे, पर मुकुल के अंदर कुछ और ही बज रहा था और वे गाना छोड़कर मंच से चले गये। उत्तर भारत की कड़ाके की ठंड के साथ रात के गहराने के बावजूद लोग पंडित हरिप्रसाद चौरसिया को सुनने के लिये जमकर बैठे हुए थे। एक पहाड़ी धुन जो हरिभाई ने सुनाई थी, दो दशकों बाद अब भी कानों में गूंजती है। इस धुन के शबाब में आने पर चौरसिया जी एक छोटी बासुँरी का प्रयोग करते हैं और इसके ऊँचे सुर आपको वहाँ ले जाकर छोड़ते हैं, जहाँ आप अपनी दुनियावी व दिमागी झंझटों से मुक्त होकर अपनी आत्मा के किसी कोने में स्वयं को भारहीन महसूस करते हुए गोते लगाते रहते हैं और जब तक हरिभाई अपनी स्वर लहरियों को समेट कर एक सफेद रुमाल अपने होंठों पर फेरते हैं तब लगता है कि आप कई हजार किलोमीटर की रफ्तार से आकाश से जमीं में आ गिरे हों। लोग मुकर्रर-मुकर्रर के नारे का जाप करते हैं पर हरिभाई कहते हैं कि ‘‘भूख लग आई है। स्नान भी नहीं किया है।’’ पीछे से एक सुनकार कहता है, ‘‘आपके इंतजार में खाना तो हमने नहीं खाया है और भला इतनी ठंड में कोई नहाता है क्या?’’

कल छत्तीसगढ़ के एक नामालूम से कस्बे बेमेतरा में हरिभाई ने फिर यही कहा, ‘‘ भूख लग आयी है।’’ हालांकि खाना उन्होंने नहीं खाया और सीधे कार में सवार होकर ‘यह जा वह जा’ की तर्ज पर रायपुर के लिये रवाना हो गये। अगर रुककर भोजन कर लेते तो शायद इसी दौरान कुछ बातचीत हो जाती पर सोचता हूँ कि ऐसा क्या बचा होगा हरिभाई के पास बताने को और मुझे पूछने को जो इतने सालों में कहा-सुना नहीं गया। संगीत सभाओं में जाकर गाना-बजाना सुनना ही अपना प्रमुख ध्येय होता है और इस दौरान एकाध इंटरव्यू हो जाये तो वह एक बाई-प्रॉडक्ट है। न हो पाये तो कोई मलाल भी नहीं।

हालांकि इंटरव्यू तो फिर भी हुआ। स्कूली छात्रों ने हरिभाई से अजब सवाल पूछे और हरिभाई ने उनके गजब जवाब दिये। वे हल्के मूड में थे। बच्चों का प्रोग्राम था। स्कूली बच्चों के बीच ‘स्पीक-मैके’ शास्त्रीय संगीत के प्रचार-प्रसार के लिये पिछले कई सालों से यह आयोजन कर रही है। हरिभाई ने ‘बड़ों’ को पहले ही चेतावनी दे दी कि वे न तो उनकी कोई फर्माइश पूरी करेंगे और न ही उनके किसी सवाल का जवाब देंगे। बच्चों के लिये पूरी तरह से ‘‘दूध-भात’’ था। एक बच्चे ने पूछा कि आपने वाद्य के रूप में बाँसुरी को ही क्यों चुना? हरिभाई ने कहा कि ‘‘सस्ती पड़ती है। अमेरिका और योरोप में स्टील की बनती है पर अपने यहाँ केवल बाँस से। पांच रूपये में मिल जाती है। हवाई जहाज में जाने पर अलग से किराया देकर लगेज बुक करना नहीं पड़ता। सितार वगैरह खोलकर दिखाना पड़ता है, इसमें सिक्योरिटी का कोई झंझट नहीं है। सबसे बड़ी बात यह कि हाथ में रहे तो रात के सन्नाटे में कुत्ते भी नजदीक आने से डरते हैं!’’

एक दूसरे बच्चे ने पूछा, ‘‘ हारमोनियम व सितार वगैरह को दूसरे कलाकार बजाने के पहले ट्यून करते हैं। बाँसुरी के साथ यह काम कैसे होता है?’ हरिभाई ने जवाब दिया कि ‘‘बाँसुरी ट्यून नहीं करते। अलग-अलग रेंज की चार-पाँच बाँसुरी साथ रखते हैं। पर ज्यादा नहीं रखते। बीस-पच्चीस रख ली तो लोग सोचेंगे कि यह कलाकार नहीं बाँसुरी बेचने वाला है।"

देर तक कुछ इसी तरह के दिलचस्प सवाल-जवाब होते रहे। कर्नाटक से आये पंडित एम. वेंकटेश कुमार ने अपनी गरज भरी आवाज में खयाल, ठुमरी व भजन पेशकर मन मोह लिया पर धन्यवाद का असल पात्र एलांस पब्लिक स्कूल है, जिसने एक बेहद खुशनुमा माहौल में इस तरह के आयोजन का जोखिम उठाया वह भी मेहमानों के साथ सौम्य व्यवहार के साथ। पब्लिक स्कूलों में, जहाँ लोग खांसते व छींकते भी अंग्रेजी में हैं, हिंदी मीडिया के लोगों के साथ सद्व्यवहार आश्चर्यजनक रहा। या शायद मजबूरी हो उनकी, क्योंकि लोकल मीडिया ले-देकर यही है।

लेखक दिनेश चौधरी पत्रकार, रंगकर्मी और सोशल एक्टिविस्ट हैं. इप्‍टा, डोगरगढ़ के अध्‍यक्ष हैं.  उनसे संपर्क iptadgg@gmail.com के जरिए किया जा सकता है. दिनेश के अन्य आलेख / संस्मरण / रिपोर्ट पढ़ने के लिए क्लिक करें… भड़ास पर दिनेश

सेबी कर रही सहारा क्यू शॉप स्कीम का परीक्षण

भारतीय प्रतिभूति एवं विनियम बोर्ड (सेबी) ने सहारा क्यू शॉप स्कीम की जांच शुरू कर दी है. यह तथ्य सेबी द्वारा आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर और उनकी पत्नी नूतन की इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच में दायर याचिका में प्रस्तुत हलफनामे में कही गयी. इस दंपत्ति ने सहारा क्यू शॉप स्कीम की जांच कराये जाने हेतु याचिका दायर किया था जिसमे कोर्ट ने सेबी और सहारा क्यू शॉप लिमिटेड को नोटिस जारी किया था. 

नवीन शर्मा, एजीएम, सेबी, लखनऊ द्वारा दायर हलफनामे के अनुसार पूर्व में सेबी को सभी प्रकार के पूंजी निवेश के विषय में जांच करने का अधिकार नहीं था. लेकिन हाल में सेक्युरिटीज लॉ (संशोधन) अध्यादेश 2013 द्वारा सेबी अधिनियम, 1992 की धारा 11एए में इस प्रकार संशोधन किया गया कि अब 100 करोड़ से ऊपर के लगभग सभी पूंजी निवेश सामूहिक निवेश योजना की श्रेणी में गिने जायेंगे. अब सेबी ने सहारा क्यू शॉप का परीक्षण शुरू कर दिया है.

रेडियोथिरेपी के मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं वीरेन डंगवाल

जो शख्स पूरे जीवन चहंकता, खिलखिलाता, हंसता-हंसाता, संबल बंधाता और जनता के आदमी के बतौर कई पीढ़ियों को जीना सिखाता रहा, वह इन दिनों खुद ऐसे दौर से गुजर रहा है जहां सिवाय संकट, मुश्किल, दर्द, तनहाई और निराशा के कुछ नहीं हैं. फिर भी वे इन बुरे भावों के साये तक को अपने उपर पड़ने नहीं देने की जिद पर अड़े हुए हैं और खूब सारी उम्मीदों के बल पर फिर से उसी अपनी सहज सरल जनता की दुनिया में लौटने को तत्पर हैं जहां खड़े होकर वह जीवन और जनता के गीत लिखा करते, गान गाया करते.

बात हो रही है जाने-माने कवि, पत्रकार, प्रोफेसर वीरेन डंगवाल की. कैंसर से दूसरे राउंड की लड़ाई लड़ रहे वीरेन डंगवाल को अब आवाज की दिक्कत होने लगी है. रेडियोथिरेपी के कारण उनके बोलने में परेशानी हो रही है. आवाज लड़खड़ा रही है. पर खुद वीरेन दा कहते हैं कि सब ठीक हो जाएगा प्यारे.

कीमियोथिरेपी का दौर चलने के बाद वीरेन डंगवाल बरेली चले गए थे. फिर वहां से रेडियोथिरेपी के लिए लौटे. रेडियोथिरेपी का कार्य गुड़गांव के एक अस्पताल में हो रहा है. वे सोमवार से शुक्रवार तक गुड़गांव में रेडियोथिरेपी कराते हैं और शनिवार से रविवार तक दिल्ली के तीमारपुर में अपने पुत्र के यहां आराम करने चले आते हैं. उनसे लगातार संपर्क में रह रहे लोगों का कहना है कि वे ज्यादा अच्छे तब थे जब कैंसर डायग्नोज नहीं हुआ था. कैंसर का इलाज आदमी को जीते जी मार देता है. कीमियोथिरेपी के कारण बाल झड़ने से लेकर कमजोरी तक की स्थिति आई. रेडियोथिरेपी से अब आवाज लड़खड़ाने लगी है. आखिर इन इलाजों का क्या फायदा जिससे अच्छा खासा आदमी बीमार, कमजोर और जर्जर हो जाता है.

यही हाल जाने-माने पत्रकार आलोक तोमर के साथ हुआ था. ज्यों ही उनकी कीमियोथिरेपी शुरू हुई, उनके शरीर में दिक्कतें चालू हो गईं. शरीर फूलने लगा. बाल गिरने लगे. आवाज खत्म होने लगी. शरीर का रेजिस्टेंस पावर धीरे-धीरे कम होने लगा. अब लगता है कि उनके कथित कैंसर का इलाज न हुआ होता तो वो आज भी हम लोगों के बीच होते.

वीरेन डंगवाल कहते हैं कि जो डाक्टर रेडियोथिरेपी कर रहा है, वो उनका बहुत करीबी और परिचित है. उनके कहने, उनके भरोसे पर ही यह सब शुरू हुआ है. इस पर उनको जानने वाले कहते हैं कि ये वीरेन दा दोस्तों पर अटूट भरोसा करते हैं और दोस्तों के लिए ही जीते-मरते हैं, सो उन्हें कभी किसी दोस्त की सलाह को लेकर पछतावा नहीं होगा, यह उनके व्यक्तित्व की विशालता बड़प्पन है. फिलहाल तो वीरेन डंगवाल अपने इलाज के दौरान, रेडियोथिरेपी के दौरान, तरह-तरह की मशीनों की आवाजों के बीच जाने-जाने कौन-कौन-सी कविताएं लिखते बोलते रहते हैं और इन्हीं शब्दों के बल पर, इन्हीं भावों के संबल से आंतरिक मजबूती कायम रखते हुए रोगों मशीनों और तमाम किस्म की थिरेपियों के परे खुद को पालथी मारे बिठाए रखते हैं… पहले सा उन्मुक्त और मस्त बने रहते हैं…

9 अक्टूबर 2013 के दिन, जब रेडियोथिरेपी शुरू हुई, वे कहने लगे- ''आखिर आज रेडियोथिरेपी का खेल भी शुरू हुआ. चेहरे पर एक जाली का मुखौटा कसा हुआ और कानों में अजीब अंतरिक्षिया सूं सांय सांय…''

तभी उनके एक शिष्य ने उन्हें सुनाना शुरू किया, वे आंख मूदे सुनते मुस्कराते रहे, वो ये कि… ''दादा.. मैं अभी टीवी पर स्पेस डाइव शो देख रहा था.. वो जो चैनल हैं न डिस्कवरी हिस्ट्री एनजीसी.. ये सब ऐसा ही कुछ दिखाते रहते हैं… तो इस स्पेस डाइव शो में एक आदमी सबसे ज्यादा उंचाई से छलांग लगाता है… वह आदमी खुद हवाई जहाज में नहीं बल्कि सुपरसोनिक विमान में तब्दील हो जाता है.. उस आदमी की स्पीड हो गई थी एक हजार किलोमीटर प्रति घंटे.. पर वो आदमी जिंदा रहा…. दुर्घटनाग्रस्त जहाजों की तरह टूटा-फूटा नहीं, टुकड़े-टुकड़े नहीं हुआ, घर्षण से आग का शिकार नहीं हुआ, मशीन यानि दिल ने काम करना बंद नहीं किया.. वो सही सलामत जब धरती पर लैंड किया, आखिर कुछ मिनटों के दौरान पैराशूट खोलकर…. तो सबसे पहले दौड़कर उसकी मां ने उसे चूमा… वो ज़िंदा रहा क्योंकि उसको खुद पर यकीन था, उसने ज़िंदा रहने का कई बरसों तक अभ्यास किया… उसने उस उंचाई से कूदने और नीचे आकर खिलखिलाने का मनोबल कई वर्षों से बनाना शुरू किया… उसमें जीतने की ज़िद थी… आप भी जीतेंगे… जि़ंदा रहेंगे… डाइव का दौर आपका जारी है… आप अंतरिक्षिया सूं सांय सांय के दौर से गुजरते हुए धरती की ताजी हवाओं तक फिर पहुंचेंगे और खिलखिलाएंगे… आपके माथे को चूमेंगे आपको चाहने वाले… आमीन…''

वीरेन दा चुप सुनते रहते हैं, महसूस करते रहते हैं… फिर अचानक बताते हैं… ''…डेढ़ महीने का झमेला और है… इंशा अल्लाह… आमीन''

तभी उन्हें फिर कई आवाजें सुनाई पड़ती है… ''वीरेन दा ज़िंदाबाद… तुमको हमारी उमर लग जाए… उपरवाला काहे इतनी परीक्षाएं ले रहा है आपकी… ये परीक्षाएं हम तक पहुंचाई जाए और आपको अब उत्तीर्ण घोषित किया जाए… आप अब पहले की तरह हो जाएं… ''

वीरेन दा हंसते हैं कहते हैं खिलखिलाते हैं… ''चूतिये हैं साले'' …. प्यारे …ओ प्यारे… सब ठीक है, मस्त है… हां हां …. बिलकुल… चलो प्यारे….''

लेखक यशवंत भड़ास4मीडिया से जुड़े हुए हैं.


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संजय कुमार, अनिल कुमार, अभय वर्मा, प्राची, मानव, गजेंद्र, संतोष दीक्षित के बारे में सूचनाएं

कई लोगों के इधर से उधर होने की खबर है. शुरुआत प्रभात खबर से. पटना में कार्यरत संजय कुमार ने इस्तीफा देकर दैनिक हिंदुस्तान, रांची ज्वाइन कर लिया है. वे प्रभात खबर से पहले रांची हिंदुस्तान में ही थे. प्रभात खबर में वे खेल रिपोर्टर थे. हिंदुस्तान में वे सिटी डेस्क पर काम करेंगे. प्रभात खबर से ही एक अन्य खबर के मुताबिक देवघर यूनिट के प्रोडक्शन डिपार्टमेंट में दस वर्षों से कार्यरत अनिल कुमार इस्तीफा देकर दैनिक हिंदुस्तान, रांची के साथ जुड़ गए हैं.

प्रभात खबर, गया के एकाउंट विभाग में तैनात अभय वर्मा ने इस्तीफा देकर नई पारी की शुरुआत हिंदुस्तान, धनबाद के साथ की है. हिंदुस्तान, देहरादून से प्राची बंसल और मानव के इस्तीफा देने की सूचना है. मानव नई पारी की शुरुआत उत्तराखंड से प्रकाशित होने जा रहे मिडडे अखबार के साथ करने जा रहे हैं. उधर, अमर उजाला, कानपुर से खबर है कि यहां गजेंद्र यादव जुड़ गए हैं. संतोष दीक्षित के बारे में खबर है कि उन्होंने सी टीवी नेटवर्क को अलविदा कह दिया है. वे ताज मीडिया और टुडे एक्सप्रेस के आई टी मैनेजर बन गए हैं.

भड़ास तक सूचनाएं bhadas4media@gmail.com पर मेल करके पहुंचा सकते हैं.

उस लड़की ने उन्हें बताया कि उस वरिष्ठ साथी ने रात में उस लड़की से बलात्कार किया!

Samar Anarya : फेसबुक पर कुछ लोग बहुत कहानियाँ सुना रहे हैं.. जहरीली बूंदों की कहानियाँ. बहुत दिन सोचा चुप रहूँ पर अब अब खामोश रहना जुर्म में शरीक रहना होगा सो इन कहानियों के जवाब में सच सुनाता हूँ.. हुआ यह था कि उड़ीसा से लौट दिल्ली आने की पहली शाम ही आदतन एक बहुत प्यारे कामरेड और पुराने दोस्त के घर चला गया था. उस शाम हो रही बातचीत के बीच अचानक पुरानी और प्यारी दोस्त और कामरेड Ila Joshi का फोन आया. फोन पर उन्होंने जो कहा वह होश उड़ा देने वाला था, स्तब्ध करने वाला था. खैर, उस फोन के बाद ज्यादा देर वहाँ बैठना मुनासिब नहीं था सो निकल आया.

फिर इला और Mayank ही नहीं बल्कि लगभग पूरी टीम बूँद से दिल्ली कॉफ़ी हाउस में मुलाकात हुई. जो नाम याद हैं उनमे Gaurav Gupta, Nalin Mishra, KaliKant Jha, Pauline Huidrom, स्वाति मिश्र और कुछ और. खैर, वहाँ इला ने बताया कि एक रात टीम बूँद के कुछ दोस्त एक वरिष्ठ कामरेड साथी के घर गए थे जहाँ बहुत शराब पी लेने के बाद समूह की एक महिला साथी की हालत बहुत ख़राब हो गयी. जिनको उस वरिष्ठ साथी के तमाम बार साथ ले जाने के या कमसेकम बूँद के किसी सदस्य के रुकने के आग्रह को नकार पूरी टीम बूँद उस लड़की को वहाँ अकेला छोड़ चली गयी. इला के मुताबिक़ फिर उस लड़की ने उन्हें बताया कि उस वरिष्ठ साथी ने रात में उस लड़की से बलात्कार किया.

मुझे अभी भी याद है कि अविश्वास से लेकर नफरत तक के कितने भाव मेरे मन में एक साथ आये थे. मेरी पोजीशन बिलकुल साफ़ थी कि ऐसे मामलों में लड़की का बयान ही सही माना जाना चाहिए चाहे फिर आरोपी आपका कितना ही करीबी क्यों न हो. मैंने इला, मयंक और पूरी टीम बूँद (वहाँ मौजूद) को यही कहा कि उन्हें तुरंत उस व्यक्ति के खिलाफ़ एफआईआर करनी चाहिए, और साथ ही उसे कनफ्रंट करना चाहिए. मैंने अपनी यह पोजीशन भी साफ़ कर दी थी कि मैं साथ जाकर उस व्यक्ति को कन्फ्रंट करने को तैयार हूँ. तीसरी बात यह कही कि कानूनी कार्यवाही के साथ साथ उसका सामाजिक बहिष्कार करवाना चाहिए और उसके लिए मैं मेरी और उनकी साझा महिला मित्रों से मैं इस विषय में बात कर सकता हूँ और मुझे करनी चाहिये.

पर आश्चर्यजनक तरीके से इनमे से किसी भी बात पर इला, मयंक और वहाँ मौजूद और दोस्त तैयार नहीं हुए. पीड़िता (नाम नहीं ले रहा अभी, क्योंकि जहरीली बूंदों के जहर के बावजूद सामाजिक और कानूनी दोनों नैतिकताओं का सम्मान करता हूँ, पर आप मजबूर करेंगे तो नाम ले भी सकता हूँ) ने भी इससे साफ़ इनकार कर दिया. उनका तर्क था कि लड़की तैयार नहीं है, उसके सम्मान पर असर पड़ेगा, उसका कैरियर ख़त्म हो जाएगा. टीम बूँद जैसे बड़े दावों वाले संगठन की सदस्य से ऐसी बात सुनना दुखी तो करता है पर फिर, अपने निर्णय लेने की एजेंसी लड़की की है इस समझदारी के साथ मैंने एफआईआर न करने वाली बात मान ली पर कन्फ्रंट करने की जरुरत पर जोर दिया. काफी देर तक हुई बात के बाद यही बात तय पायी गयी. खैर, उसके बाद मैं लगभग रोज इन लोगों को फोन करता रहा कि आज कन्फ्रंट करें, आज करें पर वापस हांगकांग आने तक इनका जवाब कभी नहीं आया.

एक बात और साफ़ कर दूं कि इस पूरे दौर में मैंने उस व्यक्ति से बातचीत बंद कर दी थी पर फिर भी एक बात जो लगातार खटक रही थी वह यह कि ये लोग उस व्यक्ति पर सिर्फ आरोप लगा रहे हैं,और कोई कानूनी या सामाजिक कार्यवाही नहीं कर रहे. फिर अचानक एक दिन टीम बूँद के अन्दर चल रहे घमासान के बारे में खबरें (फेसबुक से ही) मिलनी शुरू हुईं. आर्थिक घपलों की खबरें, टीम पर कब्जे को लेकर लड़ाई की खबरें. और उन्ही के साथ टीम बूँद के कुछ लोग जहरीली बूंदों में तब्दील हो उस व्यक्ति के खिलाफ जहर बुझी पोस्ट्स लगाने लगे.

अब मामला कुछ कुछ साफ़ हो रहा था कि कहीं वह आदमी टीम बूँद की आंतरिक राजनीति का शिकार तो नहीं बनाया जा रहा? फिर थोड़े गुस्से में इला और मयंक को फोन किया कि मामला क्या हुआ? उन्होंने अबकी बार जो बताया वह तो और भी स्तब्ध करने वाला था. या कि तथाकथित पीड़िता ने स्वीकार कर लिया था कि वह झूठा आरोप लगा रही थी. यही नहीं, इन दोनों ने मुझे यह भी बताया कि इस सन्दर्भ में टीम बूँद के तमाम सदस्यों के साथ उस व्यक्ति के घर में मीटिंग हुई जिसमे मयंक, इला Pushpendra Singh और अन्य लोगों के साथ Manisha Pandey को भी बुलाया गया था. उस मीटिंग में टीम बूँद के (वहाँ मौजूद) सदस्यों ने माना कि आरोप गलत हैं, झूठे हैं और उन्होंने उस व्यक्ति से माफ़ी मांगी और सार्वजनिक माफ़ी मांगने का वादा किया.

मैं अब और भी स्तब्ध था. कि यह सब हो गया और मुझे बताया भी नहीं जबकि आरोप के ठीक बाद पहला फोन मुझे किया गया था. उसके बाद और कमाल तब हुआ जब मुझे पता चला कि उस मीटिंग में उस व्यक्ति को यह बताया गया कि टीम बूँद वालों को तो यकीन ही नहीं हुआ, वह तो जब उन्होंने मुझे फोन किया और मैंने कहा कि ऐसे मामलों में पहली नजर में लड़की का पक्ष ही मानना चाहिए और इसीलिए उन लोगों ने कार्यवाही करने का निर्णय लिया. (वैसे मझे इस बात का गर्व है, और अपनी पोजीशन आगे भी यही रहने वाली है, फिर सामने कितना भी जरुरी दोस्त क्यों न हो).

खैर, उसके बाद मैंने वह किया जो मुझे करना चाहिए था. मयंक और इला को फोन और उन्हें या तो कानूनी कार्यवाही करने की या माफ़ी मांगने की सलाह. जब उन्होंने नहीं मांगी, तो मैंने एक स्टेटस लगाया जिसके बाद उन्होंने पहली बिना नाम की माफ़ी मांगी. पर मैं और ठगे जाने को तैयार नहीं था. उसके बाद दूसरा स्टेटस लगाया जहाँ सार्वजनिक चरित्रहनन के लिए सार्वजनिक माफ़ी की बात की. और इसी के बाद मयंक और इला ने टीम बूँद की तरफ से उस व्यक्ति से माफ़ी मांगी.

फिर इस कथा का अगला दौर शुरू हुआ. टीम बूँद के दूसरे खेमे के लोगों द्वारा अपनी राजनीति के लिए उस व्यक्ति को मोहरा बनाने का खेल जिसका नेतृत्व कोई जहरीला तपन नामक आदमी कर रहा है. इस खेल की खबर मुझे तब लगी जब कामरेड Girijesh Tiwari ने मुझे बताया कि जहरीला तपन कोई वीडिओ लेकर उनसे मिलने आजमगढ़ तक गया. उन्होंने यह भी बताया कि जहरीला तपन ने यह माना कि यह वीडिओ नरेंद मोदी भक्त मधु किश्वर के घर में बनाया गया, क्यों यह हममें से कोई नहीं जानता. यह भी कि वह व्यक्ति यह वीडिओ लेकर गली गली घूम रहा है,.

मुझे लगता है कि अब इस मुद्दे से सीधे टकराने का वक़्त आ गया है. वक़्त आ गया है कि अगर इन लोगों को लगता है कि कुछ ऐसा हुआ है तो वह उस व्यक्ति के खिलाफ पीड़िता के साथ कानूनी और सार्वजनिक दोनों कार्यवाहियाँ शुरू करें और मेरा वादा है कि मैं पीड़िता के साथ खड़ा रहूँगा. और अगर वह ऐसा नहीं करें तो साफ़ होगा कि वह इस कहानी के बहाने कोई और खेल खेल रहे हैं और यह नाकाबिले बरदाश्त है. सो अब सीधी चुनौती है, न्याय की लड़ाई लड़नी है तो सामने आकर लड़ने की हिम्मत करें, और नहीं तो इतना तो सामने आयें ही कि वह व्यक्ति आप पर कार्यवाही कर सके.

सो साहिबान, वीडियो ही नहीं, पूरी कहानी नाम के साथ सार्वजनिक कर दें. फुसफुसाहटों से न्याय नहीं पाया जा सकता न.

[उस वरिष्ठ साथी का नाम इसलिए नहीं लिया क्योंकि मैं चाहता हूँ कि यह महान काम वह लोग करें जिससे अगर वे मुकदमा न करें तो उस साथी को उनपर मानहानि का दावा कर 'डैमेजेज' मांग सकें. इसलिए भी कि वह समझ सकें कि पीड़िता का आविष्कार नहीं किया जा सकता, या तो कोई पीड़िता है, या नहीं है. सो जो बात हो साफ़ हो, सीधी हो.]

अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारवादी अविनाश पांडेय 'समर' के फेसबुक वॉल से.

एबीपी न्यूज के संपादक शाजी जमा साहब से एक सवाल

Nadim S. Akhter : एबीपी न्यूज पर -प्रधानमंत्री- नाम का एक बेहद लोकप्रिय प्रोग्राम आता है. मैं शुरु से ही इस कार्यक्रम के दर्शकों में से एक रहा हूं और अभी हाल ही में बीजेपी के भीष्मपितामह लालकृष्ण आडवाणी ने भी इस कार्यक्रम की जमकर तारीफ की थी. दरअसल यह कार्यक्रम मुझे इसलिए भी प्रिय है कि इसमें प्रधानमंत्री और उसके इर्द-गिर्द बुना वह दांव-पेंच बहुत सलीके से बताया जाता है, जो शायद इतिहास की किताबों में हमें ना मिले. आज की युवा पीढ़ी के लिए यह कार्यक्रम देश के सत्ता-सिंहासन और उसके चलने-चलाने को जानने का नायाब मौका है टीवी पर.

लेकिन अभी-अभी चौंक गया, जब एबीपी न्यूज पर एक एंकर बता रही थी —आज एबीपी न्यूज पर प्रधानमंत्री कार्यक्रम जरूर देखिएगा, जिसमें अयोध्या के विवादित ढांचे की कहानी बताई गई है—-

तो सुना आपने. अयोध्या की बाबरी मस्जिद को एबीपी न्यूज वाले -विवादित ढांचा- मानते हैं, वह इसे मस्जिद नहीं मानते. ये देश जानता है, दुनिया जानती है कि जिस इमारत को गिरा दिया गया, वह एक मस्जिद थी. पता नहीं, एबीपी न्यूज के सर्वेसर्वा शाजी जमा साहब ये सब देख रहे हैं या नहीं !!! बाबरी मस्जिद को -विवादित ढांचा- तो संघ परिवार और बीजेपी बताती रही है. तो क्या यह माना जाए कि एबीपी न्यूज, संघ परिवार और बीजेपी की लाइन ले रहा है????!!!

अभी हाल ही में शाजी जमा साहब से मुलाकात हुई थी. बहुत ही सज्जन, विनम्र और गंभीर व्यक्ति हैं. हिन्दी टीवी न्यूज इंडस्ट्री को उन्होंने बहुत कुछ दिया है. मैं शुरू से उनका फैन रहा हूं. सो अभी एबीपी न्यूज पर बाबरी मस्जिद को जिस तरह से -विवादित ढांचा- बताया गया, उससे कोई भी चौंक जाएगा. अब देखना ये है कि -प्रधानमंत्री- कार्यक्रम में भी इसे विवादित ढांचा बताते हैं या फिर बाबरी मस्जिद. हो सकता है कि एंकर या प्रोड्यूसर ने अपनी तरफ से -विवादित ढांचा- शब्द का इस्तेमाल किया हो और -प्रधानमंत्री- कार्यक्रम में इसे बाबरी मस्जिद ही कहा गया हो. सच्चाई क्या है, ये तो रात को प्रोग्राम देखने के बाद ही पता चलेगा.

मुझे याद है जब मैं दिल्ली नवभारत टाइम्स में था तो बाबरी मस्जिद को विवादित ढांचा लिखे जाने पर सख्त ऐतराज जताया था. बात आई-गई हो गई. लेकिन बाद में एक सीनियर ने न्यूज रूम में कहा कि इसे –बाबरी मस्जिद- ही लिखा जाए और तब से वहां 'बाबरी मस्जिद' ही लिखा जाता रहा. अब पता नहीं, वहां इसे क्या लिखा जाता है. खैर, तो आज रात एबीपी न्यूज पर अयोध्या के -विवादित ढांचे- मेरा मतलब है कि बाबरी मस्जिद के गिराए जाने की पूरी कहानी आप भी देखिए.

तेजतर्रार पत्रकार नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से.

आम बोलचाल में भी लोगों की भाषा द्विअर्थी और अश्लील हो गई है

Sanjaya Kumar Singh : पत्रकारिता और जनसंचार में अनुसंधान कर रहे आशीष कुमार ने रेडियो जॉकियों की भाषा पर एक टिप्पणी लिखी है। उनके मुताबिक रेडियो की भाषा पर अश्लीललता का लेप चढ़ा दिया गया है। एक शो में उद्घोषक साहब कुछ महिलाओं और बच्चों की प्रशंसा करते हुए कह रहे थे – “देखो इन्होंने अपराधियों की कैसे कह कर ली।” इन शब्दों के साथ वह उनकी पीठ थपथपा रहे थे। एक अन्य मामले में कहा गया – “कुछ किया तो डंडा हो जाएगा।” ऐसी भाषा बोलने वालों में महिलाएं भी हैं।

मैंने भी इसे महसूस किया है और देखता हूं कि कभी-कभी तो द्वीअर्थी संवाद बोलने के बाद श्रोताओं को दूसरा वाला अर्थ समझने के लिए भिन्न तरह से पर्याप्त संकेत भी दिए जाते हैं। वैसे, मेरा मानना है कि ऐसा सिर्फ रेडियो पर नहीं हो रहा है, आम बोलचाल में भी लोगों की भाषा ऐसी ही हो गई है। एक हास्य कलाकार ने टीवी कार्यक्रम में दीया मिर्जा से नाम पूछा। उसने कहा, दीया। राजू ने पलट कर पूछा – किसको? टीवी – रेडियो पर तो इस तरह की भाषा का मकसद हो सकता है पर लोग जाने-अनजाने बगैर हिचक ऐसी भाषा बोलते हैं उसका क्या किया जाए। लड़कियां और बच्चे भी अब यह कहते सुने जा सकते हैं, "उसकी तो फटती है या फट गई। उसकी ले ली आदि।" मेरे एक परिचित का मामला और दिलचस्प है। "डंडा कर दिया" उनका तकिया कलाम है। इतना कि लोग उन्हें भी डंडा कर देते हैं और वो सगर्व बताते हैं। नतीजा यह है कि वर्षों से उनके साथ रहने वाली उनकी बीवी भी डंडा करने लगी हैं। और कोई ताज्जुब नहीं कि उनके बच्चे भी ऐसा ही बोलें।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

पत्रकार उत्पीड़न पर मानवाधिकार आयोग ने भेजा भदोही के एसपी को नोटिस

भदोही। संत रविदास नगर, भदोही के वरिष्ठ पत्रकार सुरेश गांधी के खिलाफ हुए, पुलिस एवं प्रशासनिक उत्पीड़न की कार्यवाही को लेकर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग सक्रिय हो गया है. आयोग के असिस्टेन्ट रजिस्ट्रार (लॉ) ने पुलिस अधीक्षक संत रविदास नगर, भदोही को पत्र भेजकर श्री गांधी पर हुए उत्पीड़न की कार्यवाही की रिपोर्ट मांगी है. पत्र में कहा गया है कि कार्यवाही किस आधार पर की गयी है. प्रकरण की सक्षम अधिकारी से जांच कराकर रिपोर्ट आयोग को भेजने का निर्देश दिया गया है. एसपी की जांच रिपोर्ट को आयोग अंतिम मानेगा. एसपी की जांच रिपोर्ट के बाद आयोग अपने तरीके से जांच करेगा.

श्री सुरेश गांधी ने बताया कि वह मेहीलाल बिल्डिंग स्टेशन रोड भदोही में किराए के मकान में रहकर पिछले 15 सालों से पत्रकारिता कर रहे हैं. गत दिनों पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों की नाकामी और गैर जिम्मेदाराना कार्यों सहित भदोही में हुए दंगे में प्रशासनिक लापरवाही व जनप्रतिनिधियों के काले कारनामों को उजागर करने पर डीएम, एसपी व कुछ जनप्रतिनिधि कुपित हो गये. इसलिए साजिश के तहत कोतवाल भदोही संजयनाथ तिवारी ने बिना किसी अपराध पत्रकार के खिलाफ धारा 110 जाब्ता फौजदारी के अन्तर्गत उपजिलाधिकारी को रिपोर्ट दे दी. पत्रकार ने 23 मार्च 2013 को दोपहर में अपना जवाब दाखिल किया कि पुलिस द्वारा दर्ज कार्यवाही के तीनों मुकदमों में पुलिस ने खुद फाइनल रिपोर्ट लगाई है या वह न्यायालय से दोषमुक्त है. इस पर कोतवाल ने मकान मालिक विनोद गुप्ता व सुमित गुप्ता, निवासी काजीपुर रोड, भदोही को साजिश में लेकर रंगदारी मांगने की झूठी रिपोर्ट दर्ज कर दी. इतना ही नहीं, पुलिस ने पत्रकार के खिलाफ गुंडा एक्ट की कार्यवाही भी कर दी और बगैर मौका दिए जिलाधिकारी ने 9 अप्रैल 2013 को जिला बदर कर दिया. इस दौरान पुलिस व प्रशासन पत्रकार को मारने-पीटने व गिरफ्तार करने की धमकी देती रहा. इसी बीच उच्च न्यायालय, इलाहाबाद ने 20 मई को जिलाबदर की कार्यवाही पर रोक लगा दी.

इसके पूर्व 7 मई 2013 को जब गांधी गुण्डा एक्ट व जिलाबदर के चलते जनपद से बाहर थे तो मकान मालिक कमरे का ताला तोड़कर विज्ञापन के 1.5 लाख नगद, जेवर, जरूरी कागजात व तमाम साक्ष्य उठा ले गये थे. इसकी सूचना पत्रकार की पत्नी रश्मि गांधी ने कोतवाली से लेकर एसपी तक को दी, लेकिन रिपोर्ट नहीं लिखी गई. 30 मई 2013 को गांधी ने लूट का प्रार्थना पत्र तैयार कर पहली जून 2013 को सुबह सीजीएम न्यायालय में 156 (3) जाब्ता फौजदारी के अन्तर्गत याचिका दायर की और सुबह 10 बजे कमरे पर आकर अपनी मौसी के बेटे के शादी में शामिल होने के लिए कुछ कपड़े लेकर जीप से बनारस तथा वहां से बस से रांची के लिए चले गये. इस बीच सायंकाल 4 बजे उन्हें मोबाईल से सूचना मिली कि पुलिस की मौजूदगी में मकान मालिक आदि कमरे का ताला तोड़कर सामान उठा ले जा रहे हैं. इसकी सूचना तत्काल गांधी और उनकी पत्नी ने मोबाईल के जरिये कोतवाली व एसपी के अलावा शहर के तमाम संभ्रान्त नागरिकों को दी और ऐसा न करने व तोडफोड़ व लूटपाट रुकवाने की गुहार लगाई, लेकिन सुनवायी नहीं हुई. मकान मालिक विनोद गुप्ता व बिट्टू गुप्ता आदि ने उनकी शादी में मिले व 15 सालों की कमाई की सारी गृहस्थी कमरे में रखे दो कम्प्यूटर सेट, कैमरा, वीडियो कैमरा, आज तक लोगो, आलमारी, फ्रिज, वाशिंग मशीन, रंगीन टीवी, पंलग, कपड़े व कमरों में रखे लगभग 20 लाख के कीमती सामान उठा ले गये. गांधी ने बताया कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस उत्पीड़नात्मक मामले में डीएम, एसपी व कोतवाल समेत प्रमुख गृह सचिव को नोटिस भेजकर जवाब तलब किया है. इसके अलावा पुलिस द्वारा दर्ज मुकदमों पर रोक लगा दी है.