पत्रकार ने अमित शाह को मजीठिया वेज बोर्ड के सवाल पर घेरा तो बगले झांकने लगे

जयपुर में आज अमित शाह की प्रेस कांफ्रेंस में मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर कुछ पत्रकारों ने सवालों का ऐसा गोला दागा कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह बगले झांकने लगे और बड़ी बेशर्मी से अमित शाह ने कह दिया कि उन्हें मजीठिया वेजबोर्ड के बारे में कुछ नहीं मालूम। अमित शाह पर सवालों का ये गोला दागा था राजस्थान के मजीठिया क्रांतिकारी अमित मिश्रा ने। Continue reading

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अमित शाह का केस लड़ ने वाला वकील सुप्रीम कोर्ट में जज बना, जिस जज ने शाह को बरी किया वह राज्यपाल बन गया

भारत में न्यायपालिका को लेकर बहस जारी है. सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने जो विद्रोह कर सुप्रीम कोर्ट के भीतर सब कुछ ठीक न चलने की जो बात कही है, उसके दूरगामी मायने निकाले जा रहे हैं. इसी दौर में कुछ लोगों ने कुछ घटनाओं की तरफ ध्यान दिलाया. जैसे अमित शाह का जो केस एक वकील लड़ रहा था, उसे सुप्रीम कोर्ट में जज बना दिया गया. सुप्रीम कोर्ट के जिस जज ने अमित शाह को बाइज्जत बरी किया, उसे रिटायरमेंट के बाद राज्यपाल बना दिया गया.

जिस जज ने अमित शाह को अभियुक्त करार देते हुए दंडित किया, उसकी बहन की शादी में आयकर विभाग का छापा पड़ गया. ये तीनों खबरें विभिन्न समय पर विभिन्न वेबसाइटों पर छप चुकी हैं. तीनों खबरों का स्क्रीनशाट यहां दिया जा रहा है ताकि आप जान सकें कि अदालतों का किस कदर राजनीतिकरण किया जा चुका है. साथ ही यह भी कि अगर आप अदालत को न्याय का घर मानते हैं तो यह आपकी अपनी समझदारी का स्तर है. अदालतें भी अब गिव एंड टेक के चंगुल में बुरी तरह  फंस चुकी हैं.

जुमला सुन भोंकने लगा

सुप्रीम कोर्ट में जिस न्यायाधीश ने अमित शाह को हत्या, अपहरण ठगी आदि केस से बरी कर दिया था, वह जज रिटायर के 7 दिन बाद केरल के राज्यपाल बन गए…

जो वकील अमित शाह का केस लड़ रहा था, वह वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट का जज बन गया है…

गुजरात हाई कोर्ट में जिस जज ने अमित शाह को अभियुक्त करार देते हुए दंडित किया था, उनकी बहन की शादी में आय कर विभाग का छापा पड़ गया..

और आखिरी में यह भी पढ़ें-देखें….

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द वायर के खिलाफ स्टे लेने में जय शाह कामयाब, अब कोई कुछ न लिखे-बोले!

Om Thanvi : वायर, दायर और कायर… जय अमित शाह ने अहमदाबाद डिस्ट्रिक्ट कोर्ट के अनेक अतिरिक्त सिविल जजों में एक चौथे जज की अदालत में द वायर के ख़िलाफ़ दायर सिविल मुक़दमे में स्टे प्राप्त कर लिया है। कि वे रोहिणी सिंह वाली ख़बर के आधार पर आगे और कुछ किसी भी रूप में (प्रिंट, डिज़िटल, इलेक्ट्रोनिक, ब्रॉडकास्ट, टेलिकास्ट या किसी अन्य मीडिया में ख़बर, इंटरव्यू, बहस, टीवी परिचर्चा की शक्ल में, किसी भी भाषा में, न प्रत्यक्ष न अप्रत्यक्ष) मुक़दमे के अंतिम निपटारे तक कुछ भी नहीं लिखेंगे-बताएँगे।

बताइए, लोकतंत्र का कैसा दौर है। न्यायपालिका ही अन्याय कर रही है? बग़ैर मीडिया (लेखक, प्रकाशक/प्रसारक) को नोटिस पहुँचाए, बग़ैर मीडिया का पक्ष सुने स्टे का इकतरफ़ा (एक्स-पार्टी) फ़ैसला दे दिया। यह आदेश भी अदालत ने बचाव पक्ष को नहीं भेजा। जय शाह के वकीलों ने भेजा है। न्याय तब मुकम्मल होता है जब दूसरे पक्ष को सुने बग़ैर उसके ख़िलाफ़ कोई स्टे आदि न दिया जाय। यहाँ तो अभिव्यक्ति की आज़ादी का मौलिक अधिकार ताक पर था।

मेरे वक़ील मित्रों का कहना है कि उन्हें इसमें ज़रा शक़ नहीं कि उच्च अदालत में यह इकतरफ़ा स्टे ख़ारिज हो जाएगा। मुझे भी न्यायपालिका से उच्च स्तर पर बड़ी उम्मीदें हैं। हालाँकि निचले स्तर पर भी न्यायप्रिय जज हैं। मगर ऊपरी अदालतों में अपीलों की तादाद बढ़ती ही है, घटती नहीं।

मज़ा देखिए छोटे शाह ने वायर पर फ़ौजदारी मुक़दमा मेट्रो कोर्ट में दायर किया है और सिविल मुक़दमा डिस्ट्रिक्ट (रूरल) कोर्ट में। जबकि जिन पत्रकारों के ख़िलाफ़ दावा किया है, उन सबका पता दिल्ली का है। बहरहाल, द वायर को (सिर्फ़ वायर को!) आगे कुछ न लिखने-दिखाने से रोकने की इस दूरस्थ कोशिश को मीडिया का, दूसरे शब्दों में लोकतंत्र का गला मसोसने के सिवा और क्या कहा जा सकता है?

वरिष्ठ पत्रकार और चर्चित संपादक रहे ओम थानवी की एफबी वॉल से.

ओम थानवी का लिखा ये भी पढ़ें…

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एनडीटीवी और एबीपी न्यूज के अलावा बाकी सभी अखबार-चैनल करवा चौथ व्रत पर हैं!

Sheetal P Singh : सिर्फ एनडीटीवी और एबीपी न्यूज़ ही यह सूचना लोगों तकपहुंचा रहे हैं कि जय शाह की संपत्ति 16000 गुना बढ़ी| जबकि यह खुद जय शाह ने अपने रिटर्न में दाखिल किया है| बाकी सारे चैनल/ अखबारों के वेबपेज आज करवा चौथ के व्रत पर हैं!

Avinish Mishra : भक्तों की गुप्त डायरी से… मोटा भाई ने कोई घोटाला नहीं किया है.. मोटा भाई का संपत्ति तीन सौ गुणा नहीं बढ़ा है.. मोटा भाई के बेटे का बिजनेस 16000 गुणा नहीं बढ़ा है.. ये सब कोरी अफवाह है.. पार्टी को बदनाम करने कि साजिश है.. वामपंथी साजिश एक बार फिर नाकाम होंगे.. सुधर जाओ वामपंथियों.. दूध जैसे मोटा भाई पर दाग लगा रहे हो?? आई लव मोटा भाई.. आई लव जै भाई.. आई लव मोदी.. धन्यवाद!!

Dilip Khan : दो ही बातें हो सकती हैं। या तो जय शाह ने ईमानदारी से पैसे कमाए या फिर बेइमानी से। अगर ईमानदारी से कमाए तो जय शाह उद्यमियों का नायक हो सकता है। लेकिन सारे भक्त जिस तरह इस स्टोरी पर रिएक्ट कर रहे हैं, उससे ईमानदारी वाली बात ख़ुद ही ख़ारिज हो जा रही है। भक्त ख़ुद ही मिट्टी पलीद कर देते हैं वरना मैं तो शुरू से कह रहा कि जय शाह ने “दीन दयाल उपाध्याय पुत्रोन्नति योजना” के तहत पैसे कमाए। जय शाह जब उद्यमी बना तो कुछेक हज़ार रुपए से शुरुआत की। जय शाह को 2013-14 में 1,724 रुपए का घाटा हुआ। फिर जय शाह के पापा जिस पार्टी के अध्यक्ष थे, वो सत्ता में आ गई। जय शाह की कंपनी अगले ही साल साढ़े 80 करोड़ रुपए का व्यापार करने लग गई। ये देखकर पूरे देश में खुशहाली छा गई। अभूतपूर्व विकास देखकर लोगों ने रोटी की जगह केक खाना शुरू कर दिया। यूनेस्को ने इसे सर्वश्रेष्ठ विकास घोषित कर दिया। [आप चाहें तो जय शाह को विकास शब्द से रिप्लेस करके भी पढ़ सकते हैं]

वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी सिंह, अविनीश मिश्रा और दिलीप खान की एफबी वॉल से.

इन्हें भी पढ़ें…

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अमित शाह की ओर से पीयूष गोयल ने ‘द वायर’ पर 100 करोड़ का आपराधिक मुकदमा ठोकने की बात कही

‘द वायर’ की पड़ताल ने कांग्रेस से लेकर बीजेपी तक को हिला दिया है

Nitin Thakur : अमित शाह के बेटे की कमाई का हिसाब किताब जान लीजिए। जब आपकी नौकरियां जा रही थीं, तब कोई घाटे से 16 हज़ार गुना मुनाफे में जा रहा था। द वायर की पड़ताल ने कांग्रेस से लेकर बीजेपी तक को हिला दिया है।

Nitesh Tripathi : जब लगभग अधिकांश मीडिया हाउस सरकार के चरणों में लोट रही हैं ऐसे में ‘द वायर’ की एक स्टोरी ने सरकार के नाक में दम कर दिया. हालांकि इस खबर पर कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी लेकिन सरकार इतना तो जाने ले कि सब कुछ पक्ष में होने के बाद भी कोई तो ऐसा है जो अब भी धारा के विपरीत चलने का माद्दा रखता है. अमित शाह की ओर से पीयूष गोयल ने प्रेस कांफ्रेंस कर ‘वायर’ पर 100 करोड़ का आपराधिक मुकदमा ठोकने की बात कही है.

Abhishek Parashar : भक्तों ने मोटा भाई के बेटे की कंपनी में रातों रात हुई बेतहाशा बढ़ोतरी की खबर सामने लाने वाली रोहिणी सिंह के खिलाफ अपना काम शुरू कर दिया है. अभी कुछ लंपट यह कह रहे हैं कि उन्होंने ईटी से निकाल दिया गया, हो सकता है कल को यह बात कहीं और पहुंच जाए. लेकिन इन मूर्खों को यह समझ में नहीं आएगा, यह वही रोहिणी सिंह हैं, जिन्होंने वाड्रा के खिलाफ भी स्टोरी की थी. वही स्टोरी, जिसकी दम पर सवार होकर बीजेपी सत्ता में आई. भक्त भूलते बहुत तेजी से हैं, उन्हें याद नहीं रहता कुछ भी.

Manish Shandilya : न्यूज़ वेबसाइट ‘द वायर’ की ख़बर में दावा किया गया कि भारतीय जनता पार्टी के नेता अमित शाह के बेटे जय अमितभाई शाह की कंपनी का टर्न-ओवर नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री और उनके पिता के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद बेतहाशा बढ़ा है. ये ख़बर सोशल मीडिया में बहुत तेज़ी से फैली और ट्विटर और फ़ेसबुक पर टॉप ट्रेंड्स में शामिल हो गई. @ishar_adv नाम के हैंडल ने लिखा, ”बीजेपी ने अपना स्लोगन बदल लिया है. विकास की जय के बजाय जय का विकास. कोई ज्यादा अंतर नहीं है. अब हमें समझ आया कि आख़िर विकास कहां छिपा बैठा है.”

पत्रकार नितिन ठाकुर, नीतेश त्रिपाठी, अभिषेक पराशर और मनीष शांडिल्य की एफबी वॉल से.

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तुम्हारे पास रॉबर्ट वाड्रा है, हमारे पास जय शाह!

Atul Chaurasia : जिनको लगता है कि मोदीजी ने भ्रष्टाचार मुक्त, स्वच्छ सरकार दे रखी है देश को उसे अमित शाह के बेटे जय शाह का प्रकरण जानना चाहिए. साथ ही आनंदी बेन पटेल के बेटे और बेटी का भी मामला जोड़ लीजियेगा। पिछली सरकार में दामादों की चांदी थी इस बार गुजरातियों के हाथ सोना-चांदी है।

Thakur Gautam Katyayn :  तुम्हारे पास रॉबर्ट वाड्रा है तो हमारे पास जय शाह है। दोनों इतने प्रतिभावान हैं कि अपने -अपने सरकार के दौरान एक -दो साल में हीं इनकी कंपनी ने कई हज़ार गुना कमाई कर ली। रॉबर्ट वाड्रा को DLF ने unsecured लोन दिया था और अमित भाई शाह जी के बेटे जय शाह को रिलायंस के करीबी सांसद परिमल नाथवानी के समधी ने 15 करोड़ का लोन दिया। दोनों उद्योगपतियों ( रॉबर्ट और जय ) को प्राकृतिक संसाधनों से बहुत प्यार है। रॉबर्ट वाड्रा जमीन के धंधे में थे और जय शाह अनाज की खरीद- बिक्री और अक्षय ऊर्जा के कारोबार में। दोनों को खुद सामने आकर सफाई देने की कोई जरूरत नहीं है , उनके बिना कहे हजारों- लाखों लोग उनके वकील और चार्टर्ड एकॉउंटेंड बन कर उन्हें सही ठहराने में जुटे मिलेंगे। (नोट- संविधान के मुताबिक जब तक दोषसिद्ध नहीं हो जाता , व्यक्ति निर्दोष माना जायेगा। उपरोक्त विचार वरिष्ठ पत्रकार श्री मनीष झा जी के हैं। मुझे व्यक्तिगत रूप से अच्छा लगा तो साझा कर रहा हूँ।)

Mayank Saxena : भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के बेटे के पक्ष में देश का रेलमंत्री प्रेस कांफ्रेंस कर के, उनकी कम्पनी की आय और काम के तरीके के आंकड़े समझा रहा है…आपको और अच्छे दिन चाहिए तो इस बार अमित शाह को ही प्रधानमंत्री बनाने की मांग कीजिए क्योंकि दाउद तो पीएम बनने भारत आने से रहा….

Rohini Gupte : अमि‍त शाह के सुपुत्र की कारस्‍तानी देख ली ना? शि‍वराज सिंह के सुपुत्र पर भी ध्‍यान रखि‍एगा। इसी साल से पट्ठे ने भोपाल में खोमचा खोलकर ‘फूल’ बेचना शुरू कि‍या है, र्स्‍टाटअप के नाम से…

पत्रकार अतुल चौरसिया, ठाकुर गौतम कात्यायन, मयंक सक्सेना और रोहिणी गुप्ते की एफबी वॉल से.

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अमित शाह की संपत्ति और मीडिया का भय

Ravish Kumar : भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की संपत्ति में तीन सौ फ़ीसदी की वृद्धि की ख़बर छपी। ऐसी ख़बरें रूटीन के तौर पर लगभग हर उम्मीदवार की छपती हैं जैसे आपराधिक और पारिवारिक पृष्ठभूमि की ख़बरें छपती हैं। कुछ मीडिया ने अमित शाह की ख़बर नहीं छापकर और कुछ ने छापने के बाद ख़बर हटा कर अच्छा किया। डर है तो डर का भी स्वागत किया जाना चाहिए। इससे समर्थकों को भी राहत पहुँचती है वरना प्रेस की आज़ादी और निर्भीकता का लोड उठाना पड़ता। जो लोग चुप हैं उनका भी स्वागत किया जाना चाहिए। बेकार जोखिम उठाने से कोई लाभ नहीं।

हम सब इसी तरह से डर का डर दिखाकर डराते रहें तो एक दिन डर का राष्ट्रवाद या राष्ट्रवाद का डरवाद सफ़लतापूर्वक क़ायम हो जाएगा। मुझे आपत्ति सिर्फ एक बात से है। कहीं इस ख़बर पर पर्दा डालने के लिए धर्मनिरपेक्षता का इस्तमाल तो नहीं हुआ? अगर ऐसा नहीं हुआ तो चिंता की बात नही वरना बिहार में फिर शपथ ग्रहण समारोह होने लग जाएगा।

मुझे लगता है कि बीजेपी और अमित शाह को बदनाम करने के लिए दो अख़बारों ने इस ख़बर को छापकर हटाया है। कई बार जायज़ कारणों से भी संपत्ति बढ़ती है। इसका जवाब यही है कि ये ख़बर बीजेपी के नेता ख़ुद ट्वीट कर दें। अपनी वेबसाइट पर लगा दें। ट्रेंड करा दें। मेरा भरोसा करें, संपत्ति में तीन सौ से लेकर हज़ार फीसदी वृद्धि की ख़बरों से जनता को कोई फर्क नहीं पड़ता है। रूटीन की ख़बर है ये। करोड़पतियों के पास अपनी कार नहीं होती और वे पर्यावरण की रक्षा के लिए महँगी कार से ही चलते नज़र आते हैं, साइकिल से नहीं!

एनडीटीवी के चर्चित एंकर रवीश कुमार की एफबी वॉल से.

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अमित शाह की संपत्ति और स्मृति इरानी की डिग्री वाली खबरें टीओआई और डीएनए से गायब!

Priyabhanshu Ranjan : स्मृति ईरानी भी कमाल हैं। 2004 के लोकसभा चुनाव के वक्त अपने हलफनामे में अपनी शैक्षणिक योग्यता B.A बताती हैं। 2017 के राज्यसभा चुनाव में अपने हलफनामे में खुद को B. Com. Part 1 बताती हैं। 2011 के राज्यसभा चुनाव और 2014 के लोकसभा चुनाव में भी उन्होंने खुद को B. Com. Part 1 ही बताया था। बड़ी हैरानी की बात है कि 2004 में खुद को B.A बताने वाली स्मृति जी 2011, 2014 और 2017 में खुद को B. Com. Part 1 बताती हैं।

इससे भी बड़ी हैरानी की बात ये है कि इतने साल के बाद भी B. Com पूरा नहीं कर सकी हैं। खैर, आपको असल में बताना ये था कि ‘अमित शाह की संपत्ति में 5 साल में 300 फीसदी इजाफा’ वाली खबर की तरह स्मृति ईरानी के हलफनामे में झोल वाली खबर भी न्यूज वेबसाइटों ने हटा ली है। अब सोचना आपको है कि ये खबरें आखिर किसके दबाव में हटाई जा रही हैं। इसी मुद्दे पर द वॉयर ने एक खबर की है। नीचे तस्वीर में स्मृति ईरानी की ओर से 2004 में दायर हलफनामे की प्रति है।

पीटीआई में कार्यरत प्रतिभाशाली पत्रकार प्रियभांशु रंजन की एफबी वॉल से.

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मीडिया हाउसों ने अमित शाह की 300 गुना संपत्ति बढ़ने वाली खबर डिलीट कर दी! (देखें मेल)

Sheetal P Singh : मीडिया दंडवत नहीं बल्कि “डागी” में बदल गया है. जी न्यूज़ चलाने वाले मैनेजमेंट को बाकायदा निर्देश मिले, जिसका उन्होंने बाकायदा पालन किया. बाद में सारे मीडिया ने किया.  निर्देश था कि काली दाढ़ी उर्फ़ अमित शाह की ३०० गुना संपत्ति वृद्धि की खबर तत्काल हर जगह (पोर्टल / टीवी आदि ) से हटा ली जाय.

Priyabhanshu Ranjan : 5 साल में अमित शाह की संपत्ति में 300 फीसदी बढ़ोत्तरी की खबर Navbharat Times Online ने हटा क्यों दी है? कोई दबाव था क्या? दरअसल एक मेल आता है और अमित शाह की संपत्ति में 300% इजाफे की खबर गायब कर दी जाती है। मेरे मीडिया हाउस में ऐसा कोई मेल नहीं आया। मुझे किसी और मीडिया हाउस के पत्रकार ने सबूत के तौर पर वो मेल दिखाया है। उस मेल में साफ तौर पर लिखा गया है कि अमित शाह वाली खबर नहीं चलानी है। अगर खबर चला दी गई है तो उसे हटाया जाए। टाइम्स ऑफ इंडिया, नवभारत टाइम्स, आउटलुक, दैनिक भास्कर, ZEE etc. etc. सबने अमित शाह की संपत्ति में तीन गुना उछाल वाली खबर हटा ली। सीधा कहें तो लगभग सारे न्यूज पोर्टल ने खबर हटा ली है। चैनल वालों ने दिखाया ही नहीं तो हटाने की बात कौन करे? अब भी कोई बोलेगा कि भारत में EMERGENCY जैसे हालात नहीं हैं?

Dilip Khan : कल ज़ी न्यूज़ ने ऑनलाइन डेस्क को मेल किया कि अमित शाह वाली ख़बर मत लगाइए और अगर लगा दी है तो तत्काल हटा दीजिए। मेरे पास वो मेल है। हम जानना चाहते हैं कि ज़ी न्यूज़ को किसने ख़बर हटाने को कहा? जब ख़ुद अमित शाह अपनी संपत्ति का ब्यौरा दे रहे हैं तो आपत्ति क्या है? ख़बर हटाने से अब हम लोगों को लग रहा है कि अनैतिक तरीके से अमित शाह ने पैसे कमाए। इस तरह अमित शाह की बदनामी कर दी मीडिया वालों ने। मीडिया को अमित शाह की संपत्ति वाली ख़बर नहीं हटानी चाहिए थी। कोई भ्रष्टाचार से थोड़ी उन्होंने पैसे बनाए हैं! ईमानदार पार्टी के अध्यक्ष हैं। ख़बर हटाने के बाद लोगों को शक हो रहा है कि उन्होंने ग़लत तरीके से पैसे बनाए हैं। मीडिया ने उनकी छवि ख़राब कर दी। लोगों को लग रहा है कि दबाव में मीडिया ने ख़बर हटाई। इस तरह मीडिया ने ख़ुद की छवि भी ख़राब की और माननीय अमित शाह की भी।

Nitin Thakur : अमित शाह की संपत्ति वाली खबर इसलिए हटाई गई क्योंकि उनके रसूख को देखते हुए ये छोटा सा आंकड़ा उनको शर्मसार कर रहा था!! अमित शाह ही क्यों.. बीजेपी के सभी मंत्रियों और सांसदों की संपत्ति का आंकड़ा भी निकालकर पेश किया जाना चाहिए। विपक्ष और मीडिया का काम और है ही क्या ? छापकर खबर हटाना तो और भी गलत है। अमितशाह ने अहमदाबाद में संपत्ति के बारे में हलफनामा पेश किया है। कोई भी उस हलफनामे के आधार पर खबर छाप सकता है। जिनके पास ये खबर चलाने के अधिकार हैं उनको अपना फर्ज़ निभाना चाहिए.. कपिल शर्मा और राजनीतिक उठापटक की खबरें बेचने में कौन सी बहादुर पत्रकारिता है? पत्रकारिता के सम्मान बांटने वालों को भी अपने मानक थोड़े सख्त करने की ज़रूरत है।

Sanjaya Kumar Singh : अमित शाह की संपत्ति में 300 फीसदी इजाफे वाली ख़बर मीडिया से गायब! अखबारों और बेवसाइटों ने अमित शाह की संपत्ति में 300 प्रतिशत इजाफे की खबर हटा ही नहीं ली आज के अखबारों में अमित शाह का यह बयान छपा है कि, “देश में लगातार बढ़ रही है भाजपा की ताकत”। पुराने समय में ऐसे दावे करते ही, सवाल पूछे जाते थे। कोई भी पूछ लेता था कि ऐसी खबर आई थी, हटा ली गई आप क्या कहेंगे। उनका जवाब हो सकता था, खबर गलत थी, मैंने शिकायत की थी। इसलिए हट गई होगी। सही स्थिति इस प्रकार है …..। यह भी बकवास होता, पर छपता। पाठक निर्णय करता। मुमकिन है समझ जाता, नहीं भी समझता। पर ईमानदारी के इस जमाने में, अब आपको खबर नहीं दी जाती। पकी-पकाई राय दी जाती है। भाजपा लगातार मजबूत हो रही है – बंगारू लक्ष्मण वाली भाजपा की तरह नहीं अमित शाह की भाजपा की तरह, (जो तड़ी पार रह चुके हैं)।

Sarvapriya Sangwan : संपत्ति बढ़ने की खबर तक दबा दी गयी तो भ्रष्टाचार की ख़बर कौन दिखायेगा। ये सरकार बहुत ईमानदार है भाई।

अंकित द्विवेदी : अमित शाह की सम्पत्ति वाली ख़बर को 24 घण्टे से ऊपर हो गए लेकिन अब तक इस पर विपक्ष के किसी नेता की कोई प्रतिक्रिया क्यों नहीं आई? फिर 10 हज़ार कमाने वाले पत्रकार अपनी नौकरी दांव पर क्यों लगाए? जब सब नरेंदर से डरते है तो एक ख़बर की वजह से कोई अपनी रोजी – रोटी क्यों गंवाए? इन सब के लिए मीडिया को गरियाने वाले तेलचट्टो जरा अपने नेताओं से पूछो की उनकी कौन सी फ़ाइल अमित शाह की टेबल पर है,जो वो चुप है? मीडिया में जो बहादुर लोग थे,उन्होंने ख़बर बनाई। जो नरेंदर से डरते है,उन्होंने ख़बर हटा दी। इसके साथ ही मीडिया का काम भी खत्म हो गया। अब जो भी करना है विपक्ष को करना है। तभी कोई पत्रकार इस ख़बर पर काम करने का अधिकार भी रखता है।

सौजन्य : फेसबुक

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अमित शाह की प्रेस कांफ्रेस में जूट बैग पाने के लिए भूखे नंगों की तरह टूट पड़े पत्रकार

Sandip Thakur : इन दिनों मोदी सरकार के तीन साल पूरे हाने के उपलक्ष्य पर जश्न का दौर चल रहा है। पीएमओ के निर्देश पर तमाम प्रमुख मंत्रालय के मंत्री और नेता अपन-अपने कामों के 3 साल का ब्यौरा देने के लिए संवाददाता सम्मेलन कर रहे हैं। आज यानी 26 मई को भाजपा मुख्यालय में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की प्रेस कांफ्रेंस थी। वहां मोदी सरकार की उपलब्धियों के बखान वाले उपहार को लेने की पत्रकारों में मची मारामारी के दृश्य पत्रकारिता की गिरती साख के प्रत्यक्ष गवाह थे। जूट के एक बैग जिसमें सरकारी घोषणाओं से भरे कुछ कागज और एलईडी बल्ब थे को हासिल करने के लिए पत्रकारों का हुजूम जिस तरह से एक दूसरे को धकिया मुकिया रहे थे उसे देख कर ऐसा लगा कि मानों भूखे-नंगों को खाने का पैकेट बांटने के लिए कोई गाड़ी आई हो।

इन दिनों संवाददाता सम्मेलनों की बाढ़ आई हुई है। रोज कहीं न कहीं प्रेस कांफ्रेंस, लंच और फिर कोई न कोई गिफ्ट। खिलाने व बांटने वाले हैं मोदी सरकार के मंत्री व पार्टी के नेता, जो तीन साल का बखान करने में लगे हुए हैं। अधिकांश संवाददाता सम्मेलन या तो नेशनल मीडिया सेंटर या फिर शास्त्री भवन के पीआईबी कांफ्रेंस हॉल में होता है। नियमतः ऐसे संवाददाता सम्मेलन में सिर्फ वही पत्रकार आ सकते हैं जिनके पास पीआईबी कार्ड है। इस शर्त का उल्लेख बाकायदा प्रेस निमंत्रण पत्र पर भी होता है। लेकिन सम्मेलन में अवांछित कथित पत्रकारों की भीड़ उमड़ती है। भीड़ का मतलब भीड़।

कोई भी संवाददाता सम्मेलन चार अभियानों में संपन्न होता है। पहला, बैग लूटो अभियान। दूसरा, खाओ-पिओ अभियान। तीसरा, मंत्री के साथ सेल्फी खिंचाओ अभियान और चौथा, सोशल मीडिया पर अपलोड करो अभियान। वैसे अति सुरक्षित नेशनल मीडिया सेंटर में भीड़ अंदर अंदर कैसे आती है, यह अपने आप में जांच का विषय है। क्याोंकि मीडिया सेंटर में सिर्फ उन्हीं पत्रकारों को अंदर आने की इजाजत है जिनके पास पीआईबी का कार्ड है। कार्ड चेक करना मुख्य गेट पर तैनात सीआईएसएफ कर्मियों का काम है। लेकिन ऐसा लगता है कि इनदिनों सीआईएसएफ वाले अपनी ड्यूटी ठीक से नहीं कर रहे हैं। ऐसे में किसी दिन मीडिया सेंटर में किसी अनहोनी की आशंका से पूरी तरह इंकार नहीं किया जा सकता है। जिनके पास पीआईबी कार्ड नहीं है वे अंदर घुसने के बाद क्या करते हैं, जरा उसकी एक बानगी देखिए। कांफ्रेस हॉल के बाहर जहां मंत्रालय वाले प्रेस रीलीज बांटते हैं, जा धमकते हैं। यदि बैग बंट रहा हो तो फिर नजारा देखने लायक होता है। ऐसी मारा मारी मचती है कि पूछिए मत। ऐसे में जो बड़े अखबारों के पीआईबी मान्यता प्राप्त पत्रकार प्रेस रिलीज व चैनलों के संवाददाता होते हैं वे बैग व प्रेस रीलीज दोनों से वंचित रह जाते हैं। क्योंकि वे मारा मारी में पड़ना नहीं चाहते। इंतजार करते हैं लेकिन लूट के बाद कुछ बच नहीं पाता है। खैर बैग लूटने के बाद ऐसे लोग हॉल में जा कर सीटों पर जम जाते हैं।

प्रेस कांफ्रेंस खत्म हुई नहीं कि लिफ्ट व सीढ़ियों से भाग कर खाने के लिए कतार में लग जाते हैं। देखते ही देखते खाने वाले हॉल में ऐसी भीड़ हो जाती है कि पूछिए मत। इतना हीं नहीं मंत्री के साथ फोटो खिंचा उसे सोशल मीडिया पर अपलोड करने के लिए भी अफरा तफरी मच जाती है। पिछले दिनों शिक्षा मंत्री प्रकाश जावेडकर की प्रेस कांफ्रेंस थी। जावेडकर के डायनिंग हॉल में पहुंचने से पहले ही उनके टेबल पर भाई लोग जम गए। किसी ने खाना खाते तो किसी ने बात करते हुए मंत्री के साथ अपनी सेल्फी ली और फटाक से फेसबुक पर अपलोड कर दिया। टेबल पर जमे एक भाई ने मंत्री से कहा, सर, आपका इंटरव्यू नहीं मिलता है। इस पर टिप्पणी करते हुए मंत्री के एक स्टाफ ने कहा कि जितने मंत्री के इर्द गिर्द बैठे हैं वे किसी समाचारपत्र या पत्रिका में हैं ही नहीं तो फिर इंटरव्यू छापेंगे कहां। बात खाने पीने पर ही खत्म नहीं होती है। खाने के बाद भाई लोग ग्रांउड फ्लोर पर बने मीडिया कक्ष में आते हैं और फिर सोफा, कुर्सिंयों पर सो जाते हैं।

एक नींद सोने के बाद ठंडा पानी पिया और मीडिया कक्ष में रखे पत्र पत्रिकाओं को अलटते पलटते दो चार बैग में रख लिया। गत 19 मई को लंबे बाल वाले एक ऐसे ही सज्जन मीडिया रुम में घुस आए। दो चार अखबार समेटे और लेकर जाने लगे। पीआईबी कार्ड होल्डर एक मीडियाकर्मी ने उसे टोका तो बहसबाजी शुरू हो गई और नौबत हाथापाई तक आ गई। फिर अन्य पत्रकारों ने हस्तक्षेप कर मामला शांत कराया। जो सज्जन अकड़ रहे थे वे न तो पत्रकार हैं और न ही उनके पास पीआईबी का कार्ड है। फिर वे नेशनल मीडिया सेंटर के अंदर रिपोर्टस रुम तक कैसे पहुंचे, यह अपने आप में बड़ा सवाल है। वैसे सवाल कई हैं। यदि केंद्रीय मंत्रालय के संवाददाता सम्मेलन में कोई भी आ सकता है तो फिर पीआईबी कार्ड का क्या मतलब है। अवांछित लोगों (जिनके पास पीआईबी कार्ड नहीं है) के प्रवेश से सही पत्रकारों को जो परेशानी होती है उसके लिए कौन जिम्मेदार है। खाने के लिए मारा मारी, बैग लेने के लिए मारा मारी…। कोई भी वरिष्ठ मान्यता प्राप्त पत्रकार ऐसे माहौल से बचना चाहता है। लेकिन उन भाई लाोगों का क्या करें जो ऐसे माहौल के लिए जिम्मेदार हैं।

वरिष्ठ पत्रकार संदीप ठाकुर की एफबी वॉल से साभार. उपरोक्त स्टेटस पर आए ढेर सारे कमेंट्स में से कुछ प्रमुख यूं हैं :

Sn Verma 100% true. About security i talked to concerned staff and complained last year. He told that pib staffs forced us on telefone to allow such persons to enter media centre. Kahi na kahi saanth gaanth hain bhai.

Sandip Thakur thats true…i think minister needs crowd,so may be indirectly there is instruction to security staff that let come each and every journalist inside the conference hall.

Govind Mishra V true, bhai, thatswhy I avoid mostly press confrences

Dhanan Jay पीआईबी कार्ड होल्डर क्या सब genuine पत्रकार हैं। मुझे शक है।

Shashidhar Pathak बड़े चिरकुट नंदन घुस आए हैं। फूहड़, म्लेच्छ, राक्षस इंसान के करम होते हैं। ऐसे तमाम निर्लज्ज दुष्ट लोग मीडिया का चीरहरण कर रहे हैँ। एक उत्तराखंड का भी कुख्यात ब्लैक मेलर है। दरअसल, मीडिया उभार के बाद अवसर आए। मीडिया के कई दुर्भिक्षु दुम हिलाकर करोड़पति हो गए। संत संतई में रह गए। यह उसी का नतीजा है।

Dhanan Jay जो पत्रकार गण संदीप की भीड़ में नहीं हैं वे कौन दूध के धुले हैं। वे सफेदपोश कंबल ओढ़ कर घी पी रहे । इतना ही फर्क है।.तो संदीप बाबू इन अकिंचनों की ही लानतमलानत क्यों।

Sandip Thakur हम आप एक नोबल प्राोफेशन में हैं। उसकी एक गरिमा है। उसे मेनटेन करना चाहिए। आप मंत्री से कोई बड़ा काम करवा लीजिए..नो प्राेब्लम। लेकिन आप किसी संवाददाता सम्मेलन में बैग में पानी की बोतल भर लें, पेन फोल्डर के लिए दो बार लाईन में लग जाएं, खाने के डिब्बे पर डिब्बे लेते जाएं..इस चिरकुटआई पर मेरी आपत्ति है। शायद यही वजह है कि आज नेता से लेकर अधिकारी तक पत्रकारों पर हावी हो गए हैं…सिर्फ चिरकुट पत्रकारों के कारण।

Dhanan Jay अगर कोई गिरा है और दिखता भी है तो मुझे कोई प्राबलम नहीं। मुझे दिक्कत उससे है जो इलीट रंग रोगन के अंदर गिरी हुई हरकत करता। मेरा मानना है कि पाखंड किसी भी पाप से ज्यादा घृणित है। और मेरे भाई कौन ऐसा प्रोफेशन है जिसे नोबल नहीं होना चाहिए। जो कुछ आपने हुआ देखा, अच्छा है पत्रकारों की जात तो पहचानी गई। आई एम लविंग इट। सही बात यह है मेरे दोस्त मुझे मुझे बड़ी बड़ी बातें चुभती हैं।

Joginder Solanki संदीप भाई फ्री मे जहर भी मिलेगा तो मार-काट मच जाएगी।

Kewal Tiwari कोई नयी बात नहीं। सत्ता से क्या क्या फायदे नहीं लेते लोग।

Sandip Thakur सत्ता से फायदे उठाना और चिरकुटआई करना, दोनों में फर्क है। मेरी आपत्ति चिरकुटाई पर है। मतलब, पेन फोल्डर के लिए मारामारी करना, बीट नहीं होने पर भी संवाददाता सम्मेलन में जा धमकना, खाने का एक डब्बा बैग में ठूस लेना और दुसरा हाथ में पकड़े रखना, एक की जगह पानी की चार पांच बोतलें बैग में भर लेना…आदि।

Subhash Chandra Sir.. Ek baar PIB card ka verfication ho jaye to behtar. … Kya marketing manager v PIB card le sakta hai aur lisoner v.

Ashok Shukla PIB card? No criteria even a street newspaper carrying the card.

Vishwat Sen सर, मुद्दा तो आपने अच्छा उठाया, मगर पीआईबी कार्ड पर फोकस करके मामले को भटका दिया। गुस्ताखी माफी के साथ एक सवाल करूँगा। वह यह कि क्या जिसके पास पीआईबी कार्ड नहीं है, तो वह पत्रकार नहीं है? माना आपके पास यह कार्ड है और मेरे पास नहीं है। मेरे संस्थान ने मंत्रालय की जिम्मेदारी तय कर दी, तो क्या मैं मंत्रालयों में जाने का हक नहीं रखता? इस देश में कितने ऐसे पत्रकार हैं, जिनके पास पीआईबी या राज्य सरकार का कार्ड है? क्या जो सही मायने में पत्रकार है, उसके पास कार्ड है? आज एक दशक से ऊपर हो गया पीआईबी और दिल्ली सरकार में आवेदन दिए हुए, मगर आज तक कार्ड जारी नहीं हुआ। तो क्या मैं पत्रकार नहीं हूं? क्या मान्यता प्राप्त कार्ड ही पत्रकारिता का मानदंड और पैमाना है? किसी के द्वारा चिरकुटई करना और किसी की पत्रकारिता पर सवाल खड़ा करना, दोनों में फर्क है। आज जो चिरकुट संस्थान में है, वह जुगाड़ से कार्ड बनवा लेता है, मगर पत्रकारिता की मुख्यधारा में काम करनेवाला ठिठकाते रह जाता है। कभी इस पर भी गौर किया है?

Sandip Thakur सवाल पीआईबी या राज्य सरकार के कार्ड का नहीं है। सवाल है पत्रकारिता के क्षेत्र में व्याप्त लचीलेपन का नाजायज फायदा उठा सुख सुविधा बटोरने और ऐसे कथित पत्रकारों के कारण सही पत्रकारों को होने वाली असुविधाओं का। आज तक यदि आप जैसे सैकड़ों सही व जुझारु पत्रकारों का कार्ड नहीं बन पाया है तो उसके लिए जिम्मेदार ऐसे ही झोला छाप पत्रकार हैं जिनका जिक्र मैंने आपनी रपट में किया है। अमित शाह के जिस संवाददाता सम्मेलन का जिक्र मैंने किया है उसमें या किसी और संवाददाता सम्मेलन में पेन, फोल्डर, नोटबुक और गिफ्ट लूटने वाले मान्यता प्राप्त पत्रकार कम नहीं है। जो कहीं पत्रकार नहीं हैं उनकी संख्या टिड्डियों की तरह है। आपके पास कार्ड हो भी न तो आप बैग-फोल्डर काउंटर तक बगैर धक्का मुक्की के पहुंच ही नहीं सकते। पत्रकारिता के नाम पर ऐसे लोगों की बढ़ती संख्या पूरे पेशे के लिए खतरनाक संकेत है।

Sanjay Vohra अब तो संवादाता सम्मेलन में तालियां भी बजती सुनायी देती हैं …पत्रकारों को जुट बेग और मीडिया हाउस मालिकों को विग्यापन …यही होगा

Sn Verma भाई pib hall main bhi aaj six aise log baithe mil gaye. Security person bata raha ki usse adesh mila hai jiske paas bhi press identity card hai, allow hain.

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बादशाह का शाह उर्फ पंचिंग बैग : इस ताजपोशी पर पुराने अध्यक्षों ने कसीदे क्यों काढ़े?

अमित शाह को दुबारा भाजपा अध्यक्ष बना दिया गया। यह क्या है? यह नरेंद्र मोदी की बादशाहत है। मोदी के बाद शाह और शाह के बाद मोदी याने मोदी की बादशाहत! अब सरकार और पार्टी, दोनों पर मोदी का एकाधिकार है। पार्टी-अध्यक्ष का चुनाव था, यह! कैसा चुनाव था, यह? सर्वसम्मत! याने कोई एक भी प्रतिद्वंद्वी नही। जब कोई प्रतिद्वंद्वी  ही नहीं तो वोट क्यों पड़ते? यह बिना वोट का चुनाव है। देश की सारी पार्टियों को भाजपा से सबक लेना चाहिए। याने कांग्रेस-जैसी प्राइवेट लिमिटेड कंपनियों को भी! अभी तो अमित शाह अधूरे अध्यक्ष थे। देर से बने थे। मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद बने थे। उस समय के अध्यक्ष थे, राजनाथसिंह, जिनके नेतृत्व में मोदी जीते और प्रधानमंत्री बने।

राजनाथसिंह गृहमंत्री बने तो अध्यक्ष की खाली कुर्सी पर मोदी ने अपनी छाया बैठा दी- अमित शाह! मोदी-लहर ने अमित को शाह बना दिया। हरयाणा, महाराष्ट्र, झारखंड और जम्मू-कश्मीर- इन सब प्रांतों में जीत का सेहरा शाह के सिर बंध गया, अपने आप! लोकसभा में उ.प्र. की जीत का भी संपूर्ण श्रेय अमित शाह की गजब की राजनीतिक शैली और रणनीति को मिल गया। अब शाह बन गए बादशाह!

लेकिन ज्यों ही बदनाम कांग्रेस की लहर उतरी, मोदी का जादू फीका पड़ा, फूलता हुआ गुब्बारा पंचर हो गया। दिल्ली और बिहार ने दोनों गुब्बारे पिचका दिए। एक गुब्बारा तो पांच साल पूरे करेगा ही लेकिन दूसरे को बदलने का यह बढि़या मौका था लेकिन उसे अब आगे के तीन साल के लिए फिर उड़ा दिया गया है। क्यों? क्योंकि मोदी चतुर खिलाड़ी है।

अब दिल्ली और बिहार-जैसी मार फिर इसी साल पड़नेवाली है। प. बंगाल, तमिलनाडु, केरल और असम! मार पड़ेगी तो पड़े! बादशाह पर क्यों पड़े? शाह पर पड़ेगी। भूसे के थैले पर पड़ेगी! पंचिंग बैग पर! इसीलिए पंचिंग बैग की ताजपोशी पर पुराने तीन अध्यक्षों ने जमकर कसीदे काढ़े! भाजपा की सदस्यता तीन करोड़ से 11 करोड़ कर दी। 500 किमी रोज दौड़ रहे हैं। श्यामाप्रसाद मुखर्जी, दीनदयालजी, अटलजी, मधोकजी, आडवाणीजी, जोशीजी किस खेत की मूली हैं, ऐसे महान व्यक्तित्व के सामने? संघ को भी ठंड लग गई है। वह मोटी रजाई ओढ़े खर्राटे खींच रहा है। बेचारे 11 करोड़ कार्यकर्ता क्या करें? वे बगले झांक रहे हैं।

लेखक डॉ. वेदप्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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पेशे व योग्यता से शेयर ब्रोकर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह भावनाओं से खेलने में उस्ताद हैं

Anil Singh :  राजनीति के दल्ले कहीं के! संसदीय राजनीति हो या मकान की खरीद, शेयर बाज़ार या किसी चीज़ की मंडी, दलाल, ब्रोकर या बिचौलिए लोगों की भावनाओं को भड़काकर अपना उल्लू सीधा करते हैं। राजनीति में सेवा-भाव ही प्रधान होना चाहिए था। लेकिन यहां भी भावनाओं के ताप पर पार्टी या व्यक्तिगत स्वार्थ की रोटियां सेंकी जाती हैं। इसीलिए इसमें वैसे ही लोग सफल भी होते हैं।

जैसे, भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह पेशे व योग्यता से शेयर ब्रोकर हैं। पूर्णकालिक राजनीति में उतरने से पहले वे पीवीसी पाइप का धंधा करते थे। मनसा (गुजरात) में उनका करोड़ों का पैतृक निवास और घनघोर संपत्ति है। मां-बाप बहुत सारी ब्लूचिप कंपनियों के शेयर उनके लिए छोड़कर गए हैं।

भावनाओं से खेलने में अमित शाह उस्ताद हैं। अयोध्या में राम मंदिर की शिलाएं भेजने में वे सबसे आगे रहे हैं। 2002 में गोधरा से कारसेवकों के शव वे ही अहमदाबाद लेकर आए थे। सोमनाथ मंदिर के वे ट्रस्टी हैं। बताते हैं कि उनके बहुत सारे मुस्लिम मित्र हैं। अहमदाबाद के सबसे खास-म-खास मुल्ला तो उनके अभिन्न पारिवारिक मित्र हैं। उनके साथ वे शाकाहारी भोजन करते रहते हैं, लेकिन इस बाबत वे सार्वजनिक तौर पर बात नहीं करते।

कांग्रेस तो ऊपर से नीचे तक दलालों की ही पार्टी हैं। भाजपा, कांग्रेस, सपा व बसपा जैसी तमाम पार्टियों के नेतागण समझते हैं कि भारतीय अवाम को भावनाओं और चंद टुकड़ों के दम पर नचाया जा सकता है। चर्चा है कि जब प्रधानमंत्री मोदी से कुछ लोगों ने कहा कि आपकी छवि इधर खराब होती जा रही है तो उनका कहना था कि आखिरी दो साल (2017 से 2019) में सब संभाल लेंगे और उनकी यह रणनीति गुजरात में सफल होती रही है। लेकिन इन तमाम नेताओं को जनता की तरफ से रोहित बेमुला की मां राधिका ने बहुत सही जवाब दिया है।

सरकार की तरफ से दिए जा रहे 8 लाख रुपए को ठुकराते हुए इस 49 साल की स्वाभिमानी महिला ने कहा, “हमें तुम्हारे पैसे नहीं चाहिए। आठ लाख क्या, तुम आठ करोड़ रुपए भी दोंगे तो हमें नहीं चाहिए। मुझे बस इतना बता दो कि मेरा बेटा क्यों मरा?”

राधिका वेमुला का यह भी कहना था, “जब निर्भया नाम की लड़की से नृशंस बलात्कार व हत्या हुई, तब क्या किसी ने उसकी जाति पूछी थी? फिर रोहित की जाति पर क्यों सवाल उठाए जा रहे हैं?” मालूम हो कि रोहित की जाति पर पहला सवाल मोदी सरकार की चहेती मंत्री व अभिनेत्री स्मृति ईरानी ने बाकायदा प्रेस कॉन्फरेंस करके उठाया था। मोदी ने रोहित को ‘मां भारती का लाल’ कह कर जनभावना का दोहन करने की कोशिश की है। लेकिन हमें भी राधिका बेमुला की तरह आगे बढ़कर जवाब देना चाहिए – भावनाओं की दुकान कहीं और जाकर खेलो, अब हम तुम्हारे झांसे में आनेवाले नहीं हैं।

वरिष्ठ पत्रकार और अर्थकाम डाट काम के संपादक अनिल सिंह के फेसबुक वॉल से.

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‘आप’ को जिताने में जुटा है ‘आजतक’ : अमित शाह

अब तक आरोप यह लगता रहा है कि 90 फीसदी न्यूज चैनल भाजपा के पैरोल पर चल रहे हैं लेकिन अमित शाह ने ‘आजतक’ पर आरोप लगाया है कि वह ‘आप’ को जिताने में मदद कर रहा है. इस आरोप से संबंधित खबर प्रभात खबर और टाइम्स आफ इंडिया में छपी है. पटना डेटलाइन से प्रभात खबर और टीओआई की खबर यूं है….

अमित शाह ने ‘आजतक’ पर ‘आप’ को जिताने के लिए काम करने का आरोप लगाया

पटना : भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने लोकप्रिय हिंदी समाचार टीवी चैनल ‘आजतक’ पर आम आदमी पार्टी (आप) के पक्ष में एजेंडा लागू करने तथा दिल्ली चुनाव में अरविंद केजरीवाल को मदद करने का आरोप लगाते हुए जनता को उससे प्रसारित समाचारों के प्रति ‘सावधान’ रहने को कहा. पटना स्थित भाजपा के प्रदेश मुख्यालय में आज पत्रकारों से बातचीत के दौरान दिल्ली चुनाव में भाजपा की किरण बेदी को ‘बारो प्लेयर’ के तौर पर उतारे जाने के बारे में पूछे जाने पर शाह ने कहा, ‘‘आजतक का एजेंडा है आप पार्टी को लांच करने और दिल्ली चुनाव में जिताने का.पीत पत्रकारिता का इससे बडा कोई उदाहरण नहीं हो सकता.’’
 
जब कुछ मीडियाकर्मियों जिनमें अधिकतर टीवी चैनलों के रिपोर्टर शामिल ने पूछा कि यह आप कैसे तय कर सकते हैं कि जनता किस चैनल को देखे तो शाह ने कहा, ‘‘मुझे जो लगता है कहा, काफी और टीवी चैनल भी हमारे खिलाफ रिपोर्टिंग करते हैं और मैंने उनके बारे में नहीं कहा कि उनका एजेंडा तय है.  मैने यह नहीं कहा कि उक्त चैनल को न देखें बल्कि एजेंडा तय है जनता उसे सावधान होकर देखें.’’उन्होंने भाजपा में किरण बेदी को शामिल किए जाने के बारे में कहा कि उनकी पार्टी ‘बारो प्लेयर’ नहीं लाई है बल्कि समाज के विभिन्न क्षेत्रों में बेहतर काम करने वालों को मंच प्रदान करती रही है और उसी के तहत उन्हें भी पार्टी में लाया गया है. पश्चिम बंगाल में ममता के खिलाफ क्रिकेटर सौरभ गांगुली को लाए जाने के बारे में पूछे जाने पर शाह ने कहा कि इस बारे में अभी निर्णय नहीं लिया गया है. पार्टी नेता सिर्धाथ नाथ सिंह सौरभ गांगुली को लेकर अपनी पहल के बारे में स्थिति पहले ही स्पष्ट कर दी है.

Private TV channel helping AAP to win Delhi poll: Shah

PATNA: BJP President Amit Shah on Saturday asked people to be “cautious” about the news dished out by a private Hindi TV channel apparently helping Aam Admi Party to win the Delhi assembly elections.

“The TV channel is having an agenda to launch Aam Admi Party and help Kejriwal win election in Delhi…there cannot be a bigger example of yellow journalism than this,” Shah told reporters here.

The BJP chief’s statement came in response to a question by the channel reporter as to why the party has “borrowed” Kiran Bedi for Delhi election.

When some media persons mostly of TV channels asked angrily as how he could decide which channel public should watch, Shah said “I have expressed my opinion and its on the people whether to take it or not.”

He defended inclusion of Kiran Bedi into the party and said BJP had always been in favour of inclusion of eminent personalities from different walks of lives into its fold.

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रायपुर महोत्सव : रमन सिंह बोले- ये मेरे 11 साल पूरे होने का जलसा, अमित शाह बोले- बीजेपी सरकार ने खूब काम किया

Sharad Shrivastav : बीजेपी सरकार ने रायपुर मे हिन्दी साहित्य के एक उत्सव कराया है। रमण सिंह सरकार के 11 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य मे रायपुर साहित्य सम्मेलन रचाया गया है। इस सम्मेलन मे बहुत से मूर्धन्य साहित्यकार शामिल होने गए हैं, और बहुत से बड़े साहित्यकारों ने बुलावे के बावजूद शामिल होने से इंकार किया है। ये भी पता चला है की साहित्यकारों को उनकी हैसियत के मुताबिक आने जाने का किराया और शामिल होने की फीस भी दी गयी है। इस सम्मेलन के उदघाटन मे रमण सिंह और अमित शाह दोनों थे। हिन्दी के विद्वान लोग इसलिए गए थे की वो रमण सिंह सरकार का प्रतिकार करेंगे, मंच से उनके खिलाफ साहित्य के माध्यम से आवाज उठाएंगे। लेकिन रमण सिंह और अमित शाह ने मामला पलट दिया। उदघाटन भाषण मे इस समारोह को रमण सिंह ने अपने 11 साल पूरे होने का जलसा बना दिया और अमित शाह ने बीजेपी सरकार की उपलब्धि बताने का जरिया।

अफसोस की बात है की हिन्दी साहित्यकारों की कोई कदर नहीं। अब जो साहित्यकार वहाँ नहीं पहुँच सके वो अपने ही साथियों की टांग खींच रहे हैं। उन्हें जलील कर रहे हैं। सालों की साहित्य साधना, गरीब दलित, मजदूर, स्त्री के हित मे लेखन बेकार हो गया। वो सब बुद्धिजीवी अब कम्युनिस्ट नहीं रहे, संघी हो गए। कम्युनिस्ट होने के लिए कैसे कैसे रास्ते पर चलना पड़ता है, कितनी सावधानी बरतनी पड़ती है। एक गलत कदम और आप संघी हो जाते हैं। इसके उलट पल्प साहित्य या लोकप्रिय साहित्य जो किसी गिनती मे नहीं आता। जिसका नाम लेने से इन तथाकथित बुद्धि जीवियों का धर्म भ्रष्ट हो जाता है। उसके लेखक सुरेन्द्र मोहन पाठक का उनके फैन ने खुद सम्मान किया। किसी संस्था, किसी सरकार का मोहताज नहीं बने। किसी का मुंह नहीं देखा किसी से उम्मीद नहीं की कि वो मदद करें।

लेकिन हिन्दी के साहित्य मे ऐसा नहीं हो सकता। यहाँ लोग फैन नहीं एक दूसरे के दुश्मन हैं। गरीब दलित स्त्री के हित कि बात करने वाले असल मे ये लोग उनके सबसे बड़े दुश्मन खुद हैं। हिन्दी के दुश्मन, साहित्य के दुश्मन, जिसकी बात करते हैं उसके दुश्मन। यहाँ ऐसा हो ही नहीं सकता कि किसी पुरस्कार मे कोई राजनीति न हो, किसी के सम्मान से किसी और को दिक्कत न हो। एक ऊपर चढ़ता है तो चार उसे नीचे खींचते हैं। सबसे गंदी दुनिया हिन्दी के साहित्य की है। लेकिन दूसरी दुनिया पर हंसने मे सबसे आगे यही लोग होते हैं। इनकी बातें सुनिए, इनके लेख पढ़िये यही जैसे दुनिया के सबसे पवित्र इंसान हैं, कोई बुराई इन्हें छूकर नहीं गयी। दुनिया को सुधारने का ठेका इन्हीं ने लिया है। इनके अलावा बाकी सब भ्रष्ट हैं।

पाठक साहब जैसा सच्चा इंसान मिलना मुश्किल है। हम कुल जमा 40 लोग थे, जब दो साल पहले हम सबने मिलकर उनका सम्मान किया था प्रेस क्लब दिल्ली मेx। खुद सभी ने मिलकर पैसे जुटाये, पाठक साहब को बुलाया, उनके लिए उपहार लिया , सभी के खाने पीने का प्रबंध किया, सम्मान के बाद सबने पाठक साहब के साथ जीभर के बातचीत की। पाठक साहब भी बड़ी आत्मीयता के साथ सबसे मिले। लेकिन ऐसा आप हिन्दी के किसी साहित्यकार के साथ करने की सोच ही नहीं सकते। अगर मैं चाहूं की किसी बड़े नाम वाले साहित्यकार को बुलाकर सम्मान करूँ जहां हम उनके साथ बातचीत कर सकें उन्हें शुक्रिया अदा कर सकें तो वो नामुमकिन है। सबके अपने अहम हैं। ये लोग आपस मे एक दूसरे के लिए सिर्फ बने हैं। एक बुद्धिजीवी सिर्फ दूसरे बुद्धिजीवी की सुनता है। इनकी सीमित दुनिया है। ये बंगाल का भद्रलोक नहीं हिन्दी की गंदगी है। यहाँ फेसबुक पर खूब दिखती है।

शरद श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से.

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सहारा की लाल डायरी में अमित शाह का नाम!

तृणमूल कांग्रेस ने बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह का नाम सहारा की डायरी में पाए जाने पर संसद भवन के गेट पर विरोध प्रदर्शन आयोजित किया. तृणमूल ने यह मुद्दा राज्यसभा में भी उठाया. तृणमूल कांग्रेस के सदस्यों ने आरोप लगाया कि सहारा प्रमुख सुब्रत रॉय से बरामद एक लाल डायरी में अमित शाह का नाम शामिल है. रॉय को 28 फरवरी को गिरफ्तार किया गया था और वह अभी भी जेल में हैं. राज्यसभा की बैठक शुरू होने के साथ ही तृणमूल सदस्य डेरेक ओ ब्रायन ने यह मुद्दा उठाया और सहारा घोटाले में अमित शाह के खिलाफ सीबीआई जांच को लेकर चर्चा कराने की मांग की. सदस्यों ने अमित शाह से संबंधित सहारा की प्रतीकात्मक लाल डायरियां भी लहराई.

राज्यसभा के उपसभापति पीजे कुरियन ने सदस्यों से कहा कि यह मुद्दा 11.30 बजे के बाद उठाया जाए. उधर अन्य सदस्यों ने धान और कपास फसलों के कम खरीद मूल्य को लेकर विरोध जताया, जिसके कारण घोटाले का यह मुद्दा नहीं उठाया जा सका. दोपहर 12 बजे जब सदन की बैठक प्रश्नकाल के लिए शुरू हुई, तो डेरेक ओ ब्रायन ने दोबारा चर्चा की मांग की और कहा कि उन्होंने प्रश्नकाल स्थगित करने का नोटिस दिया है. उन्होंने कहा, ‘महोदय, हम एक मुद्दा उठाना चाहते हैं, बहुत ही महत्वपूर्ण मुद्दा. अमित शाह का नाम सहारा प्रमुख से प्राप्त एक लाल डायरी में शामिल है.’

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आईआईएमसी से निकलते ही होनहार पत्रकार हिमांशु ने ‘सही’ समय पर ‘सही’ कदम उठा लिया!

Abhishek Srivastava : स्‍वागत कीजिए Indian Institute Of Mass Communication(IIMC) से निकले इस होनहार पत्रकार Himanshu Shekhar का, जिसने ‘सही’ समय पर ‘सही’ कदम उठाते हुए पूरे साहस के साथ ऐसा काम कर दिखाया है जो अपनी शर्म-लिहाज के कारण ही सही, बड़े-बड़े पुरोधा नहीं कर पा रहे। मैं हमेशा से कहता था कि संस्‍थान में पत्रकारिता के अलावा बाकी सब पढ़ाया जाता है। बस देखते रहिए, और कौन-कौन हिंदू राष्‍ट्र की चौखट पर गिरता है।

 

युवा मीडिया विश्लेषक अभिषेक श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से. इस पोस्ट पर खुद हिमांशु शेखर ने जो प्रतिक्रिया दी है, वह इस प्रकार है…

Himanshu Shekhar : अभिषेक श्रीवास्तव जी से एकाध बार मुलाकात हुई है। इनके बोलचाल और लेखन से मैं इन्हें गंभीर पत्रकार ही नहीं इंसान भी समझता था। लेकिन ये सज्जन तो एक ऐसे जज की तरह बर्ताव कर रहे हैं जिसे साक्ष्यों से कोई लेेना—देना ही नहीं। उसे तो साक्ष्यों को देखने तक में अपने श्रम के जाया होने का भय है। प्रथम दृष्टया कोई मामला आया और सुना दिया फैसला। काश! अभिषेक जी आप ये फैसला किताब कम से कम एक बार देख कर सुनाते। अगर थोड़ी फुर्सत होती तो भूमिका मात्र ही पढ़ लेते। लेकिन फेसबुक पर कमेंट करने की जल्दबाजी रही होगी शायद आपको, इसलिए आपने ऐसा जहमत नहीं उठाया। खैर, इतनी जल्दबाजी में सुनाए गए निर्णय के बारे में क्या ही कहना! जब आप एक व्यक्ति का सही आकलन नहीं कर सकते तो फिर आईआईएमसी जैसे संस्थान के आकलन में गलती होना स्वाभाविक ही है।

मूल पोस्ट…

हिमांशु शेखर की किताब ‘मैनेजमेंट गुरू नरेंद्र मोदी’ का विमोचन अमित शाह ने किया

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हिमांशु शेखर की किताब ‘मैनेजमेंट गुरु नरेंद्र मोदी’ का विमोचन अमित शाह ने किया

नई दिल्ली : भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अमित शाह ने डायमंड बुक्स से प्रकाशित हिमांशु शेखर की पुस्तक ‘मैनेजमेंट गुरु नरेंद्र मोदी’ का विमोचन किया. इस मौके पर श्री शाह ने ऐसी पुस्तक के प्रकाशन के लिए डायमंड बुक्स के निदेशक श्री नरेंद्र वर्मा को बधाई दी और कहा की आप आगे भी ऐसी पुस्तकों का प्रकाशन करें. अमित शाह ने कहा की यह एक ऐसी पुस्तक है जिसमें उनके मुख्यमंत्री  के कार्यकाल के अलावा बतौर प्रधानमंत्री  के कार्यकाल में उनके द्वारा किए गए कार्यों का विस्तार से उल्लेख है. इन सबको उनके प्रबंधकीय कौशल के दृष्टिकोण से समझने की कोशिश की गई है. इस किताब का एक मकसद यह भी है कि लोगों के सामने उन बातों को लाया जाए, जो नरेंद्र मोदी से सीखी जा सकती हैं.

श्री अमित शाह के मुताबिक ऐसी पुस्तक की जरुरत ना सिर्फ उन लोगों के लिए है जो मोदी जी को पसंद करते हैं बल्कि यह पुस्तक उन लोगों को भी एक नया नजरिया देगी जो हर बात पर मोदी जी की आलोचना करते हैं. उन्होंने कहा की नरेंद्र मोदी के साथ लम्बे तौर पर काम करने के अपने अनुभव से मैं कह  सकता हूँ कि उनसे काफी कुछ सीखा जा सकता है. जिन लोगों को उनके साथ काम करने का अवसर नहीं मिला है, वे मोदी जी की कार्यशैली को देखकर काफी कुछ सीख सकते हैं. इस पुस्तक में मोदी जी के सन्देश और उनसे जो बातें सीखी जा हैं, उसका प्रस्तुतीकरण उनके कामकाज के आधार पर किया है. श्री शाह ने कहा की मैं इस पुस्तक के लेखक और प्रकाशक को इस बात के लिए बधाई देता हूँ कि इन्होंने एक ऐसी पुस्तक तैयार की है जो आम लोगों के लिए बेहद उपयोगी है. मैं इन्हे इस पुस्तक की सफलता के लिए शुभकामनाएं भी देता हूँ साथ ही ईश्वर से यह प्रार्थना करता हूँ कि वे इन्हें इतना समर्थ बनाएं की आने वाले दिनों में ये और भी ऐसे रचनात्मक कार्य कर सकें.

इस पुस्तक के बारे में श्री वर्मा ने  कहा की नरेंद्र मोदी को कुशल प्रबंधकीय कौशल को देखते हुए उन्हें मैनजमेंट गुरू कहना गलत नहीं होगा. बतौर मैनजमेंट गुरु नरेंद्र मोदी हमें क्या सीखा सकते हैं, यही बात यह पुस्तक बताती है. आम लोगों पर नरेंद्र मोदी का जादू चल रहा है. चुनाव-दर-चुनाव इस बात पर मुहर लगती जा रही है. नरेंद्र मोदी का यही जादू है जो उन्हें एक मैनेजमेंट गुरू के तौर पर समझने को प्रेरित करता है. आखिर नरेंद्र मोदी की कार्यशैली की क्या विशेषताएं हैं, जो उन्हें दूसरे नेताओं से अलग करती हैं और उन्हें लगातार सफलता की राह पर लेकर जा रही हैं. मैनेजमेंट गुरू नरेंद्र मोदी के लेखक हिमांशु शेखर के मुताबिक नरेंद्र मोदी के प्रबंधकीय कौशल और इसी दृष्टिकोण से उनकी सफलता को समझने की कोशिश की दिशा में यह पुस्तक एक प्रयास है. एक बेहद साधारण परिवार से, जिसकी कोई राजनीति पृष्ठभूमि न हो, वहां से निकलकर देश के प्रधानमंत्री बनने तक का सफर किसी के लिए भी प्रेरक हो सकता है और इससे एक आम व्यक्ति काफी कुछ सीख सकता है.

प्रेस रिलीज

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