सलिल सरोज की रचना पढ़ें- ”क़त्ल हुआ और यह शहर सोता रहा…”

क़त्ल हुआ और यह शहर सोता रहा
अपनी बेबसी पर दिन-रात रोता रहा ।।1।। Continue reading

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सुदीप-आलोक का ‘नूर’ मुंबई में रिलीज़

‘नूर’ के साथ जुड़ी हैं कई नई बातें… नए दौर के ग़ज़ल-गायक सुदीप बनर्जी और कवि-पत्रकार आलोक श्रीवास्तव का नया ग़ज़ल सिंगल ‘नूर’ मुंबई में रिलीज़ हुआ. ए ग्रांड ग़ज़ल फ़ेस्टिवल ‘ख़ज़ाना’ में इस एलबम को ग़ज़ल-सम्राट पंकज उधास, तलत अज़ीज़ और गायिका रेखा भारद्वाज ने रिलीज़ किया. Continue reading

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पहले तो तू मेरी आँखों का पानी भी पढ़ लेता था….

-सलिल सरोज-

क्या हुआ ऐसा कि इस कदर बदल गया है तू
पहले तू मेरी आँखों का पानी भी पढ़ लेता था Continue reading

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प्रताप सोमवंशी के सौ शेर : एक पत्रकार का शायर बन जाना…

अम्मा भी अखबार के जैसी रोज सुबह
पन्ना-पन्ना घर भर में बंट जाती हैं

ये दो लाइनें किसी का भी मन बरबस अपनी ओर खींचने को काफी हैं। कितनी गहराई है इन दो लाइनों में। कोई गंभीर पत्रकार जब शायर या गज़लकार के रूप में सामने आता है तो कुछ ऐसे ही गजब ढाता है। गजल, शायरी में अपनी अलग किस्म की पहचान रखने वाले प्रताप सोमवंशी के सौ शेर प्रकाशित हुए हैं।

हिन्दुस्तानी साहित्य की पत्रिका ‘गुफ्तगू’ ने इसे प्रकाशित किया है। एक से बढ़कर एक उम्दा शेर। खासियत यह कि इसे पढ़ते हुए ज्यों-ज्यों आगे बढ़ते हैं, ऐसा लगता है कि पहले वाले से ये शेर ज्यादा बेहतर है… रचनाओं का बेहतर खजाना। शुरू में ही पहला शेर अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराता है। अब इसके आगे का शेर-

लायक कुछ नालायक बच्चे होते हैं
शेर कहां सारे ही अच्छे होते हैं।

केवल लिखना भर ही नहीं, लिखने के बाद, अगर खुद पढ़ते हुए रचनाकार को वो कमतर लगे तो कम-बेसी का अहसास तो होने लगता ही है। शायद रचनाकार को भी इसका आभास होने लगता है- ‘लायक कुछ नालायक बच्चे होते हैं…’। ईमानदारी के साथ, बेधड़क सच को स्वीकारने में भी वे पीछे नहीं हटते। सजग रचनाकार की ये पहचान भी होती है। रचना की तुलना अपने बच्चों के होने जैसा करना, रचना की गंभीरता को दर्शाता है। अलग-अलग मायने में उकेरे गए शब्द-चित्र जो शेरों-शायरी की इस तरह की भी शक्ल अख्तियार कर लिए हैं।

दो दशक से ज्यादा पत्रकारीय अनुभवों से रूबरू होना, उसे सहेजना, शब्दों का खिलंदड़पन, ये सब प्रतापजी की आदत में शुमार है। इनको करीब से जानने वाले ये मानते हैं कि पैनी दृष्टि, संदर्भित विषयों की अच्छी पकड़, शब्दों और भावों की बेहतरीन प्रस्तुतियों के लिए प्रताप भाई पहले से ही ‘ख्यात-कुख्यात’ रहे हैं। जनसत्ता से लेकर कई बड़े अखबारों में प्रभावी और यादगार रिपोर्टिंग करने वाले प्रताप सोमवंशी की मजबूत पकड़ गजल-शायरी लेखन के क्षेत्र में भी उतनी ही मजबूत है।

सद्यः प्रकाशित इनके सौ शेर पढ़ते समय ये बात फिर से एक बार साबित हो जाती है। लेखकीय अनुभवों का एक बड़ा खजाना मौजूद है प्रताप सोमवंशी के पास। अलग-अलग विषय, अलग-अलग बिंब, प्रतीक, शब्द-शिल्प देखने के बाद मजबूत पकड़ होने वाले दावे को और ज्यादा बल मिलता है। शेर संग्रह में जीवन की विसंगतियों, उतार चढ़ाव, सामाजिक विद्रूपता का सुंदर उदाहरण मिलता है, साथ ही सच के एकदम नजदीक ही दिखता है। देखिये इन शेरों को आप भी मान जाओगे।

राम तुम्हारे युग का रावण अच्छा था
दस के दस चेहरे सब बाहर रखता था

झूठ पकड़ना कितना मुश्किल होता है
सच भी जब साजिश में शामिल होता है

लक्ष्मण रेखा भी आखिर क्या कर लेगी
सारे रावण घर के अंदर निकलेंगे

गमछे बिछा के सो गयी घर की जरूरतें
जागी तो साथ हो गयीं घर की जरूरतें

इससे जियादा मां को चाहिए भी क्या
बच्चों के दरमियान मुहब्बत बची रहे  

गालियों की तरह ही लगती है
ये जो नकली-सी मुस्कराहट है

कवि-शायर को अक्सर खुद से भी लड़ना पड़ता है। कई मौके ऐसे भी आते हैं, जब वैचारिक द्वंद्वों की मुठभेड़ किसी सर्जिकल स्ट्राइक से कम नहीं साबित होती। कुछ उदाहरण साफतौर पर मिलते हैं-

खुद को कितनी देर मनाना पड़ता है
लफ्जों को जब रंग लगाना पड़ता है

बेबसी हो मुफलिसी हो या दूसरी मजबूरियां
रोकती हैं ये सभी अक्सर मगर बोलूंगा मैं

रात और नींद रोज लड़ते रहे
और ख्वाबों ने खुदकुशी कर ली

तुममें सुनने का सब्र जब न रहा
मैंने बातों में ही कमी कर ली

आ जाएगा आसानी से अब मुझको संभलना
आदत तेरी मेरे लिए ठोकर की तरह है

प्रताप सोमवंशी के सौ शेर में ज्यादातर भोगे हुए यथार्थ और सच के एकदम करीब दिखते हैं-

आ जाए कौन कब कहां कैसी खबर के साथ
अपने ही घर में बैठा हुआ हूं मैं डर के साथ

सूरज की रोशनी में यह बातें याद रखना
डेहरी से जब बढ़ोगे परछाइयां भी होंगी

रेस में होंगी सड़क पर जिंदगी की गाड़ियां
एक अस्सी तो होगी एक की रफ्तार सौ

एक बूढ़ा जो दुखों का पूरा दस्तावेज है
वो बहाने, वायदे, धोखा लिए मिलता है रोज

नीचे के लिखे ये शेर भी देखिये जो मौजूदा सामाजिक विद्रूपताओं का बेहतरीन उदाहरण तो मिलता है साथ ही व्यवस्था पर ये तंज भी कसता है-

उनकी झोली में भलाई के हैं किस्से कितने
बात करते हैं मिसालों से घिरे रहते हैं

साहब जी ने ऐब तलाशे
हमने जब अधिकार तलाशा 

उस दिन हम अपने आप पे काबू न रख सके
जिस दिन लिपट के रो गईं घर की जरूरतें

मीठे लोगों से मिलकर हमने जाना
तीखे कड़वे अक्सर सच्चे होते हैं

रोटी की खातिर उसका जुनूं दब के मर गया
बचपन में ही डुबो गयीं घर की जरूरतें

एक भारत वो है जो भूख से मरता है रोज
एक वो भी है जहां पर रेस्तरां खुलता है रोज

मेरे दौर को कुछ यूं लिक्खा जाएगा
राजा का किरदार बहुत ही बौना था

सुना है तेरे नगर में
जो सच्चा है वही घबरा रहा है

कुल मिलाकर प्रताप सोमवंशी के ये सौ शेर संग्रह न सिर्फ अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराते हैं, बल्कि अलग अलग मुकम्मल घटनाओं की उलाहनाभरी तहरीर होने का आभास भी कराते हैं। बेहतर…उम्दा… आमीन!

शिवा शंकर पांडेय 

वरिष्ठ पत्रकार, इलाहाबाद

मोबाइल- 9565694757

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गजलों की गूंज के बीच झांसी टाइम्स की रंगारंग लांचिंग

उरई (उ.प्र.) : बुन्देलखण्ड का पहला न्यूज पोर्टल झांसी टाइम्स रविवार को झांसी के मुक्ताकाशी मंच पर आयोजित रंगारंग समारोह में लांच कर दिया गया। इस अवसर पर मण्डल मुख्यालय के सैकड़ों की संख्या में अधिकारी, जनप्रतिनिधि और गणमान्य नागरिक सपरिवार उपस्थित थे। दैनिक जागरण झांसी के सम्पादक यशोवर्धन ने भी इस अवसर पर झांसी टाइम्स की सफलता की शुभकामनायें कीं। 

कार्यक्रम को संबोधित करते के पी सिंह
जालौन टाइम्स की सफलता के बाद इसी टीम ने मण्डल मुख्यालय के जाने माने इलैक्ट्रानिक चैनल पत्रकार विनोद गौतम के नेतृत्व में झांसी टाइम्स के प्रकाशन की योजना बनायी। जालौन टाइम्स जहां अभी फेसबुक पर ही प्रसारित हो रहा है वहीं झांसी टाइम्स को सीधे पोर्टल के रूप में लांच करने की योजना बनायी गयी। रविवार को इसके लिये मुक्ताकाशी मंच पर आयोजित इन्द्रधनुषी समारोह में प्रसिद्ध गजल गायक जगजीत सिंह के शागिर्द जसवन्त सिंह ने अपनी गजलों का जादू बिखेरते हुए रात भर समां बांधे रखा।
इसके पहले इंडिया टुडे के प्रदेश संवाददाता पीयूष गोयल, लखनऊ के बुजुर्ग पत्रकार शिवशंकर गोस्वामी और अनिल त्रिपाठी ने दीप प्रज्जवलित कर कार्यक्रम का शुभारम्भ किया। प्रस्तावना भाषण में झांसी टाइम्स के संपादक केपी सिंह ने कहा कि दस वर्ष से भी अधिक समय पहले देश में इंटरनेट मीडिया की शुरूआत हाईफाई गतिविधि के रूप में हुई थी लेकिन अब जबकि नेट कनेक्टिविटी का असीम विस्तार हुआ है। गांव-गांव तक नेट यूजर तैयार हो गये हैं। हिन्दी के बेहतर एप्लीकेशन आ गये हैं और एन्ड्रायड फोन युवाओं में आम बन गये हैं तो इंटरनेट मीडिया, जन मीडिया के नये चेहरे के रूप में पहचानी जा रही है। इसमें पूंजी की विशेष आवश्यकता न होने से श्रमजीवी पत्रकार भी इसकी शुरूआत करने में सक्षम हैं। नतीजतन पोर्टल न्यूज चैनल में मुनाफे व अन्य स्वार्थ हावी न होने के कारण अधिक वस्तुपरक समाचार व विश्लेषण आयेंगे। उन्होंने कहा कि मीडिया लोकतंत्र का मंच है जिसे कारपोरेट मीडिया ने प्रिन्ट और इलेक्ट्रानिक क्षेत्र में हाईजैक कर रखा है। इंटरनेट मीडिया इसकी लोकतांत्रिक मंच के रूप में बहाली का माध्यम बन रहा है। 
झांसी सदर के विधायक रवि शर्मा, भाजपा के वरिष्ठ नेता प्रदीप सरावगी, राजनीतिक, शैक्षणिक, प्रशासनिक और पत्रकारिता के क्षेत्र की कई बड़ी हस्तियों ने मौजूद रहकर झांसी टाइम्स परिवार की हौसला अफजाई की। अन्त में झांसी टाइम्स के संचालक समन्वयक विनोद गौतम ने अतिथियों का आभार प्रकट किया।

 

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25 नवम्बर नजीर बनारसी की जंयती पर : …हम अपना घर न जलाते तो क्या करते?

हदों-सरहदों की घेराबन्दी से परे कविता होती है, या यूं कहे आपस की दूरियों को पाटने, दिवारों को गिराने का काम कविता ही करती है। शायर नजीर बनारसी अपनी गजलों, कविताओं के जरिए इसी काम को अंजाम देते रहे है। एक मुकम्मल इंसान और इंसानियत को गढ़ने का काम करने वाली नजीर को इस बात से बेहद रंज था कि…

‘‘न जाने इस जमाने के दरिन्दे
कहा से उठा लाए चेहरा आदमी का’’

एक मुकम्मल इंसान को रचने-गढ़ने के लिए की नजीर की कविताएं सफर पर निकलती है, हमे हमारा फर्ज बताती है, ताकीद करते हुए कहती है-

‘‘वहां भी काम आती है मोहब्बत
जहा नहीं होता कोई किसी का’’

मोहब्बत, भाईचारा, देशप्रेम ही नजीर बनारसी की कविताओं की धड़कन हैं। अपनी कहानी अपनी जुबानी में खुद नजीर कहते है, ‘‘मैं जिन्दगी भर शान्ति, अहिंसा, प्रेम, मुहब्बत आपसी मेल मिलाप, इन्सानी दोस्ती आपसी भाईचारा…. राष्ट्रीय एकता का गुन आज ही नहीं 1935 से गाता चला आ रहा हूं। मेरी नज्में हो गजलें, गीत हो या रूबाईया….. बरखा रूत हो या बस्त ऋतु, होली हो या दीवाली, शबेबारात हो या ईद, दशमी हो या मुहर्रम इन सबमें आपको प्रेम, प्यार, मुहब्बत, सेवा भावना, देशभक्ति कारफरमा मिलेगी। मेरी सारी कविताओं की बजती बासुरी पर एक ही राग सुनाई देगा वह है देशराग…..मैंने अपने सारे कलाम में प्रेम प्यार मुहब्बत को प्राथमिकता दी है।

हालात चाहे जैसे भी रहे हो, नजीर ने उसका सामना किया, न खुद बदले और न अपनी शायरी को बदलने दिया कही आग लगी तो नजीर की शायरी बोल उठी-

‘‘अंधेरा आया था, हमसे रोशनी की भीख मांगने
हम अपना घर न जलाते तो क्या करते?’’

25 नवम्बर 1925 में बनारस के पांडे हवेली मदपुरा में जन्में पेशे से हकीम नजीर बनारसी ने अंत तक समाज के नब्ज को ही थामे रखा। ताकीद करते रहे, समझाते रहे, बताते रहे कि ये जो दीवारे हैं लोगों के दरमियां, बांटने-बंटने के जो फसलफे हैं, इस मर्ज का एक ही इलाज है, कि हम इंसान बनें और इंसानियत का पाठ पढ़ें, मुहब्बत का हक अदा करें। कुछ इस अंदाज में उन्होंने इस पाठ को पढ़ाया-

‘‘रहिये अगर वतन में तो इन्सां की शान से
वरना कफन उठाइये, उठिये जहान से’’

नजीर का ये इंसान किसी दायरे में नहीं बंधता। जैसे नजीर ने कभी खुद को किसी दायरे में कैद नहीं किया। गर्व से कहते रहे मैं वो काशी का मुसलमां हूं नजीर, जिसको घेरे में लिये रहते है, बुतखाने कई। काशी यानि बनारस को टूट कर चाहने वाले नजीर के लिए बनारस किसी पारस से कम नहीं था। घाट किनारे मन्दिरों के साये में बैठ कर अक्सर अपनी थकान मिटाने वाले नजीर की कविता में गंगा और उसका किनारा कुछ ऐसे ढला-

‘‘बेदार खुदा कर देता था आंखों में अगर नींद आती थी,
मन्दिर में गजर बज जाता था, मस्जिद में अजां हो जाती थी,
जब चांदनी रातों मं हम-तुम गंगा किनारे होते थे।‘‘

नजीर की शायरी उनकी कविताएं धरोहर है, हम सबके लिए। संर्कीण विचारों की घेराबन्दी में लगातार फंसते जा रहे हम सभी के लिए नजीर की शायरी अंधरे में टार्च की रोशनी की तरह है, अगर हम हिन्दुस्तान को जानना चाहते है, तो हमे नजीर को जानना होगा, समझना होगा कि उम्र की झुर्रियों के बीच इस साधु, सूफी, दरवेष सरीखे शायर ने कैसे हिन्दुस्तान की साझाी रवायतों को जिन्दा रखा। उसे पाला-पोसा, सहेजा। अब बारी हमारी है, कि हम उस साझी विरासत को कैसे और कितना आगे ले जा सकते है। उनके लफजों में…

‘‘जिन्दगी एक कर्ज है, भरना हमारा काम है,
हमको क्या मालूम कैसी सुबह है, शाम है,
सर तुम्हारे दर पे रखना फर्ज था, सर रख दिया,
आबरू रखना न रखना यह तुम्हारा काम है।‘‘

बनारस से युवा और तेजतर्रार पत्रकार भाष्कर गुहा नियोगी की रिपोर्ट. संपर्क: 09415354828

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