मायावती का धर्म परिवर्तन राजनीति से प्रेरित!

लखनऊ : ‘मायावती का धर्म परिवर्तन राजीनीति से प्रेरित है.’ यह बात आज एस. आर. दारापुरी, पूर्व पुलिस महानिरीक्षक एवं संयोजक जनमंच उत्तर प्रदेश ने प्रेस को जारी ब्यान में कही है. उनका कहना है कि मायावती की धर्म परिवर्तन की धमकी के पीछे उसके दो उद्देश्य हैं- एक तो भाजपा जो हिंदुत्व की राजनीति कर रही है पर दबाव बनाना और दूसरे हिन्दू धर्म त्यागने की बात कह कर दलितों को प्रभावित करना.  मायावती की इस धमकी से बीजेपी और हिन्दुओं पर कोई असर होने वाला नहीं है क्योंकि हिन्दू तो बुद्ध को विष्णु का अवतार और बौद्ध धर्म को हिन्दू धर्म का एक पंथ मानते है.

वैसे एक यह बात भी उल्लेखनीय है कि मायावती ऐसी घोषणा तब तब करती है जब वह सत्ता के बाहर होती है. मायावती सत्ता में होने पर धर्म परिवर्तन की बात करके सर्वजन को नाराज़ करने से डरती है और अब उसके खिसक जाने से धमकी दे रही है और दलितों को प्रभावित करना चाहती है. 

यह भी ज्ञातव्य है कि मायावती ने इसी प्रकार की घोषणा 2006 में भी की थी. उस समय उसने कहा था कि वह धर्म परिवर्तन की स्वर्ण जयंती के अवसर पर नागपुर जा कर धर्म परिवर्तन करेगी. वह उस दिनांक को नागपुर गयी भी थी परन्तु उसने वहां धर्म परिवर्तन नहीं किया था बल्कि वह अपने अनुयायियों से यह कह कर चली आई थी कि वह धर्म परिवर्तन तभी करेगी जब केंद्र में बसपा की बहुमत की सरकार बनेगी.

अब यह बात स्पष्ट है कि मायावती का धर्म परिवर्तन व्यक्तिगत आस्था से नहीं बल्कि राजनीति से जुड़ा हुआ है. मायावती अगर वास्तव में धर्म परिवर्तन करना चाहती है तो उसे कौन रोक रहा है. यह बात गौर तलब है कि भाजपा ने धर्म परिवर्तन को रोकने के लिए सभी भाजपा शासित राज्यों में सखत कानून बनाये हैं. अगर मायावती सचमुच में धर्म परिवर्तन की पक्षधर है तो उसे इन कानूनों का राजनितिक स्तर पर विरोध करना चाहिए. परन्तु उसने आज तक ऐसा नहीं किया है.

यह भी देखना समीचीन होगा कि सत्ता में रह कर मायावती ने बौद्ध धर्म के लिए क्या किया है? हाँ, उसने बुद्ध की कुछ मुर्तिया तो ज़रूर लगवायीं परन्तु बुद्ध की विचारधारा को फ़ैलाने के लिए कुछ भी नहीं किया. यह बात विशेष तौर पर विचारणीय है कि 2001 से 2010 के दशक में जब मायावती तीन बार मुख्य मंत्री रही उसी दशक में उत्तर प्रदेश में बौद्धों की जनसख्या एक लाख कम हो गयी जैसा कि 2011 की जनगणना के आंकड़ों से स्पष्ट है. क्या यह बौद्ध धर्म आन्दोलन पर सर्वजन की राजनीति के कुप्रभाव का परिणाम नहीं है?

एस.आर.दारापुरी
पूर्व पुलिस महानिरीक्षक
एवं संयोजक जनमंच उत्तर प्रदेश
मोब: 9415164845 

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गठबंधन की कोशिशों पर बहनजी का ग्रहण, माया के एक दांव से ढेर सारे धुरंधर हुए धराशायी

अजय कुमार, लखनऊ

बिहार की सत्ता से बेदखल होने के बाद लालू एंड फेमली जख्मी शेर की तरह दहाड़ रही है। उसको सपनों में भी मोदी-नीतीश दिखाई देते हैं। नीतीश के मुंह फेरने से लालू के दोनों बेटे आसमान से जमीन पर आ गिरे। सत्ता का सुख तो जाता रहा ही, सीबीआई भी बेनामी सम्पति मामले में लालू परिवार के पीछे हाथ धोकर पड़ गई है। ऐसे में लालू का तमतमा जाना बनता है। चारा घोटाले में सजायाफ्ता लालू यादव ने बिहार खोया तो उत्तर प्रदेश में अखिलेश, मायावती और कांग्रेस के सहारे वह मोदी को पटकनी देने की राह तलाशने में लग गये। वैसे भी लालू लम्बे समय से उत्तर प्रदेश में बीजेपी के खिलाफ महागठबंधन की वकालत करते रहे हैं।

यह गठबंधन तब तक पूरा नहीं हो सकता है, जब तक की सपा-बसपा आपस में एक न हो जायें। इसी लिये लालू यादव ने पटना में ‘भाजपा भगाओ, देश बचाओ’ रैली में भाग लेने के लिये यूपी के सभी दिग्गज नेताओं को आमंत्रित किया था। लालू के प्रयासों को सबसे पहला झटका समाजवादी नेता मुलायम सिंह यादव ने यह कहकर दिया कि उत्तर प्रदेश में किसी गठबंधन की जरूरत नहीं है। यह और बात है कि बाप की सोच से अलग बेटा अखिलेश यादव ने लालू की रैली में शिरक्त करने में गुरेज नहीं की।

यूपी में गठबंधन जरूरी नहीं है कि मुलायम सोच उनकी प्रबल प्रतिद्वंदी मायावती को संभवता रास आई होगी, इसलिये उन्होंने भी लालू की रैली से दूरी बना ली। हो सकता है, मायावती ने सोचा हो कि चारा घोटाले में सजायाफ्ता लालू के साथ मंच शेयर करने से उनकी छवि भी खराब हो सकती है। इसी सोच की वजह से शायद कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी रैली में नहीं गये होंगे। माया और राहुल गांधी के रैली से दूरी बनाये जाने के बीच अखिलेश और राष्ट्रीय लोकदल नेता जयंत चौधरी की उपस्थिति लालू के आंसू पोंछने का काम नहीं कर सकी।

बहरहाल, सबसे अधिक चर्चा बसपा सुप्रीमों मायावती के रैली से दूरी बनाये जाने को लेकर हो रही है। कहा यह भी जा रहा है कि मायवती अपने आप को समाजवादी पार्टी के साथ खड़ा नहीं दिखाना चाहती हैं। वैसे, माया नें रैली में न जाने के बावजूद अपने को  लालू की गठबंधन वाली सोच से अलग दिखने की कोशिश नहीं की। उन्होंने गठबंधन बनाने के लिए सभी विपक्षी दलों के सामने एक शर्त रख दी है कि जब तक टिकटों का बंटवारा नहीं होगा, तब तक वह कोई भी मंच साझा नहीं करेंगी।वह यहीं नहीं रूकी। इसके तुरंत बाद उन्होंने पार्टी के वरिष्ठ पदाधिकारियों और कोऑर्डिनेटरों के साथ कुछ बैठकें कीं। इसमें उन्होंने साफ कहा है कि गठबंधन हो या न हो लेकिन हमारी तैयारी पूरी होनी चाहिए। उन्होंने अभी से लोकसभा चुनाव में हर सीट पर तैयारी के निर्देश पदाधिकारियों को दे दिए हैं। कुछ सीटों पर तो प्रभारी नियुक्त भी कर दिए गए हैं। गौरतलब हो ,बीएसपी में  प्रभारी ही प्रत्याशी होते हैं। उन्होंने अभी से ऐसे प्रभारियों की तलाश के निर्देश दिए हैं जो अपनी सीट निकाल सकें। वह प्रभारियों के चयन के लिए खुद भी कई स्तर से फीडबैक ले रही हैं।

ऐसा लगता है कि एक बार फिर माया ने एकला चलो की राह पकड़ कर मिशन 2019 की तैयारी शुरू कर दी है। अपनी पारम्परिक कार्यशैली के अनुरूप उन्होंने लोक सभाओं में प्रभारी बनाने शुरू कर दिए हैं। ये प्रभारी ही 2019 में प्रत्याशी होंगे। वहीं विधान सभा स्तर पर संगठन प्रभारी बनाए जा रहे हैं, जो लोकसभा प्रत्याशियों की मदद करेंगे। इसके साथ ही मायावती 18 सितंबर से रैलियों के जरिए भीड़ जुटाकर अपनी ताकत दिखाने की तैयारी कर रही हैं।

बसपा सुप्रीमों मायावती प्रत्येक माह की 18 तारीख को रैलियों का ऐलान पहले ही कर चुकी हैं। पहली रैली 18 सितंबर को मेरठ-सहारनपुर मंडल में होनी है। 18 अक्टूबर को दूसरी रैली आजमगढ़ में होगी। उन्होंने इसके लिए खास तौर से पूर्वांचल के कोऑर्डिनेटरों को तैयारी के निर्देश दे रखे हैं। संगठन को मजबूत बनाने और पार्टी कार्यक्रमों को सफल बनाने के लिए तमाम विधान सभा प्रभारियों  को संगठन और कार्यक्रमों की तैयारी का भी जिम्मा सौंपा गया है। विधायक और प्रभारी मिलकर कार्यक्रमों की तैयारी करेंगे।

राजनैतिक पंडितों का कहना है कि मायावती अकेले और गठबंधन के साथ चुनाव लड़ने के दोनों विकल्पों को लेकर चल रही हैं। अभी से रैलियां और प्रत्याशियों का चयन करके वह विरोधियों को दिखाना चाहती हैं कि उनकी पार्टी को भले ही सीटें कम मिली हों लेकिन उनकी उर्जा में कोई कमी नहीं आई है। इसके अलावा भी वह एक और रणनीति पर काम कर रही हैं। यदि गठबंधन की राह खुलती है तो ये तैयारी दूसरे दलों पर दबाव बनाने के काम आयेगी। इसे उनकी ज्यादा से ज्यादा सीटें हासिल करने की रणनीति के तहत भी देखा जा रहा है।

लब्बोलुआब यह है कि मायावती के लिये 2019 का लोकसभा चुनाव जीवन-मरण का सवाल बन गया है। इस लिये उन्होंने अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं और दुश्मनी को कुछ समय के लिये खूंटी पर टांग दिया है। उनका सारा ध्यान अपने वोट बैंक और बीजेपी के सामने सशक्त चुनौती पेश करने तक ही केन्द्रित है। फिलहाल तो इतना ही कहा जा सकता है कि गठबंधन से दूरी बनाने के बसपा सुप्रीमों मायावती के एक दांव से तमाम धुरंधर धाराशायी नजर आ रहे हैं।

लेखक अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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मायावती से तीखा सवाल पूछने वाली उस लड़की का पत्रकारीय करियर शुरू होने से पहले ही ख़त्म हो गया!

Zaigham Murtaza : अप्रैल 2002 की बात है। उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगा था। मायावती की सत्ता में वापसी की आहट के बीच माल एवेन्यु में एक प्रेस वार्ता हुई। जोश से लबरेज़ मैदान में नई-नई पत्रकार बनी एक लड़की ने टिकट के बदले पैसे पर सवाल दाग़ दिया। ठीक से याद नहीं लेकिन वो शायद लार क़स्बे की थी और ख़ुद को किसी विजय ज्वाला साप्ताहिक का प्रतिनिधि बता रही थी। सवाल से रंग में भंग पड़ गया। वहां मौजूद क़रीब ढाई सौ कथित पत्रकार सन्न। Continue reading

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हरिशंकर तिवारी के यहां दबिश पर विधानसभा से वाकआउट करने वाली मायावती सहारनपुर के दलित कांड पर चुप क्यों हैं?

लखनऊ : “मायावती की सहारनपुर के दलित काण्ड पर चुप्पी क्यों?” यह बात आज एस.आर. दारापुरी, भूतपूर्व आई.जी. व प्रवक्ता उत्तर प्रदेश जनमंच एवं सस्यद, स्वराज अभियान ने प्रेस को जारी ब्यान में कही है. उनका कहना है कि एक तरफ जहाँ मायावती हरीशंकर तिवारी के घर पर दबिश को लेकर बसपा के प्रदेश अध्यक्ष को गोरखपुर भेजती है और विधान सभा से वाक-आऊट कराती है वहीं मायावती सहारनपुर के शब्बीरपुर गाँव में दलितों पर जाति-सामंतों द्वारा किये गए हमले जिस में दलितों के 60 घर बुरी तरह से जला दिए गए, 14 दलित औरतें, बच्चे तथा बूढ़े लोग घायल हुए में न तो स्वयम जाती है और न ही अपने किसी प्रतिनिधि को ही भेजती है. वह केवल एक सामान्य ब्यान देकर रसम अदायगी करके बैठ जाती है.

इसके इलावा शब्बीरपुर के दलितों पर हमले के दोषी व्यक्तियों की गिरफ्तारियां तथा दलितों को मुयाव्ज़ा तथा न्याय दिलाने के लिए आवाज़ उठाने वाली भीम सेना से बिलकुल पल्ला झाड़ लेती है. वर्तमान में पुलिस भीम सेना के लगभग तीन दर्जन सदस्यों की गिरफ्तारियां करके उनका उत्पीड़न कर रही है और मायावती बिलकुल खामोश है. क्या मायावती का यह कृत्य उसकी सर्वजन की राजनीति का ही हिस्सा नहीं है जिस में दलितों की अपेक्षा सवर्णों के हित अधिक हावी हैं? मायावती को इस मामले में अपनी चुपी का जवाब ज़रूर देना पड़ेगा.

श्री दारापुरी ने आगे कहा है कि जबसे उत्तर प्रदेश में जोगीजी की सरकार बनी है तब से जाति-सामंतों के  हौसले बहुत बुलंद हो गए हैं और वे खुल कर अल्पसंख्यकों और अब दलितों पर हमले कर रहे हैं. सरकार द्वारा निष्पक्ष कार्रवाही न करके उन दबंगों को ही संरक्षण देने की सबसे बड़ी उदाहरण सहारनपुर के सांसद राघव लखनपाल शर्मा द्वारा 20 अप्रैल को पहले बिना अनुमति आंबेडकर जुलूस निकाल कर दलित और मुस्लिम संघर्ष कराने का प्रयास करने तथा बाद में पुलिस अधीक्षक के घर पर तोड़फोड़ करने पर भी उसके खिलाफ कोई भी कार्रवाही न किया जाना है. यदि उक्त मामले में लखनपाल शर्मा के विरुद्ध कानूनी कार्रवाही हो गयी होती तो जाति-सामंतों के हौसले इतने बुलंद नहीं होते और शायद शब्बीर पुर में दलितों पर हमले का काण्ड भी नहीं होता. इससे पूरे प्रदेश में अल्पसंख्यकों और दलितों में असुरक्षा की भावना व्याप्त हो गयी है. 

एस.आर.दारापुरी
प्रवक्ता, उत्तर प्रदेश जन मंच
सदस्य स्वराज अभियान
मोब: 9415164845   

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नोटबंदी के बाद पार्टी एकाउंट में करोड़ों जमा कराने को लेकर चुनाव आयोग ने बसपा को दी भारी राहत

बहुजन समाज पार्टी द्वारा नोटबंदी के बाद दिल्ली के करोल बाग़ स्थित यूनियन बैंक ऑफ़ इंडिया के अपने पार्टी अकाउंट में 02 दिसंबर से 09 दिसंबर 2016 के बीच 104 करोड़ रुपये के पुराने नोट जमा कराये जाने के सम्बन्ध में निर्वाचन आयोग ने पार्टी को भारी राहत दी है. इस सम्बन्ध में इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच में पीआईएल दायर करने वाले प्रताप चंद्रा की अधिवक्ता डॉ नूतन ठाकुर ने बताया कि निर्वाचन आयोग ने 29 अगस्त तथा 19 नवम्बर 2014 द्वारा वित्तीय पारदर्शिता सम्बन्धी कई निर्देश पारित किये थे.

इन निर्देशों में कहा गया है कि कोई भी राजनैतिक दल उन्हें चंदे में प्राप्त नकद धनराशि को प्राप्ति के 10 कार्यकारी दिवस के अन्दर पार्टी के बैंक अकाउंट में अवश्य ही जमा करा देगा और इन निर्देशों का उल्लंघन किये जाने पर पार्टी के खिलाफ निर्वाचन चिन्ह (आरक्षण एवं बटाई) आर्डर 1968 के प्रस्तर 16ए में मान्यता रद्द करने सहित तमाम कार्यवाही की जा सकती है.

प्रताप चंद्रा ने कोर्ट को कहा था कि नोटबंदी का आदेश 08 नवम्बर को आया था पर बसपा ने 2 दिसंबर के बाद 104 करोड़ रुपये जमा कराये, जो सीधे-सीधे इन निर्देशों का उल्लंघन है, जिसपर कोर्ट ने आयोग को तीन माह में कार्यवाही के आदेश दिए थे.

नूतन ने बताया कि आयोग के नोटिस दिनांक 02 मार्च 2017 पर बसपा ने अपने दिनांक 12 मार्च के उत्तर में स्वीकार किया कि उन्होंने नोटबंदी के बाद 104.36 करोड़ कैश जमा कराया पर साथ ही कहा कि पार्टी का एकमात्र अकाउंट दिल्ली में है, अतः पूरे देश से पैसा पहले दिल्ली लाया जाता है और फिर जमा होता है. यह सारा पैसा नेताओं की विभिन्न रैलियों में इकठ्ठा हुआ था. पार्टी ने नोटबंदी के तुरंत बाद बैंक से संपर्क किया लेकिन बैंक ने तत्काल पैसा जमा कराने के असमर्थता दिखाई और बैंक की सुविधानुसार धीरे-धीरे पैसा जमा किया गया.

इस पर आयोग ने अपने आदेश दिनांक 04 मई 2017 द्वारा मामले की असाधारण स्थिति और बसपा द्वारा बताई गई व्यवहारिक परेशानी को संज्ञान लेते हुए प्रकरण को समाप्त करने का निर्णय लिया. साथ ही बसपा को भविष्य में इन निर्देशों का कड़ाई से पालन करने के भी निर्देश दिए.

Election Commission major relief to BSP

The Election commission of India has given major relief to Bahujan Samaj Party as regards the Rs. 104 crores cash money deposited by it in old between 02 December 20 to 09 December 2016 in the Party’s bank account in Karol Bagh branch, New Delhi after the demonetization order.

Dr Nutan Thakur, counsel of Petitioner Pratap Chandra who had Public Interest Litigation in the Lucknow bench of Allahabad High Court told that the Election Commission had issued Guidelines for financial transparency on 29 August and 19 November 2014. These Guidelines say that any political party must deposit its cash collections in its bank account within 10 working days of the fund collection and any violation of these Guidelines would lead to action including cancelling the recognition of the political party under the provisions of Para 16A of the Election Symbols (reservation and Allotment) Orders 1968.

Pratap Chandra had told in the Court that BSP had deposited Rs. 104 crores cash money in old currency after 08 November, which is a clear violation of these Guideline, to which the Court had directed the Commission to take action in 03 months.

Nutan said that Election Commission issued notice to BSP on 02 March 2017 to which

it responded on 12 March, where it accepted depositing Rs. 104.36 crores during the said period. The Party said that it has only one Bank account in Delhi and all the cash is first transferred to Delhi where it is deposited. It said that the money was collected at various rallies held by Party leaders. The Party immediately contacted the Bank to get the cash deposited but the Bank officials showed inability to deposit such huge amount in one go. Hence the money was deposited based on the Bank’s ability to count and deposit it.

Through its order dated 04 May, the Commission has accepted the BSP’s explanation and dropped the matter, citing the peculiar circumstances and practical difficulties explained by BSP as the reason. It has also warned the Party to scrupulously follow the Instructions in future.

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…लेकिन मायावती सबक लेने को तैयार नहीं हैं!

अजय कुमार, लखनऊ
फिर बसपा से एक और नेता की विदाई और एक बार फिर मायावती पर धन उगाही का आरोप। यह सिलसिला लगता है कि बीएसपी के लिये अनवरत प्रक्रिया हो गई है। बसपा छोड़ने या निकाले जाने वाला शायद ही कोई ऐसा नेता रहा होगा जिसने ‘बहनजी’ पर धन उगाही का आरोप न लगाया हो। नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने भी इसी सिलसिले को आगे बढ़ाया है। अपनी बात साबित करने के लिये उनके द्वारा मायावती से टेलीफोन पर हुई वार्तालाप का ऑडियो क्लिप जारी किया गया है। नसीमुद्दीन की विदाई के साथ ही बीएसपी में एक युग समाप्त हो गया है। नसीमुद्दीन को कांशीराम ही बसपा में लाये थे। नसीमुद्दीन के बाहर जाने के बाद अब बसपा में कांशीराम के समय का कोई कद्दावर नेता पार्टी में नहीं बचा है। बड़े नेताओं के नाम पर मााया के अलावा सतीश मिश्रा ही बचे हैं। सतीश मिश्रा भले ही बीएसपी के कद्दावर नेता हों, लेकिन बीएसपी में उनका आगमन काफी देरी से हुआ और बीएसपी मूवमेंट में उनका कोई खास योगदान भी नहीं रहा है।

निश्चित ही बसपा को झटके पर झटके लग रहे हैं, लेकिन मायावती इससे सबक लेने को तैयार नहीं हैं। माया की कमजोरी की वजह से उत्तर प्रदेश में बीजेपी को रोकने की मुहिम भी प्रभावित हो रही है। वैसे, हालात समाजवादी पार्टी के भी कोई खास अच्छे नहीं हैं। अखिलेश को एक साथ कई मोर्चो पर लड़ना पड़ रहा है तो उनकी राजनैतिक अपरिपक्ता भी आड़े आ रही है। जंग में गुजरात के सैनिक नहीं मरते वाला उनका बयान और अपनी हार स्वीकारने की बजाये  ईवीएम पर दोषारोपण जैसे तमाम मुद्दांें को अखिलेश बेवजह हवा दे रहे हैं।

खैर, बात नसीमुद्दीन सिद्दीकी की ही कि जाये तो पार्टी से निकाले जाने के बाद उन्होंने बसपा प्रमुख माया पर जो आरोप मढ़े और कथित प्रमाण के तौर पर ऑडियो टेप पेश किए उनकी गंभीरता का पता इससे लगाया जा सकता है कि माया कों ऑडियो टेप में कही बातों को झूठा साबित करने के लिए स्वयं मीडिया के सामने आना पड़ गया। उन्हें ऐसा ही तब भी करना पड़ा था, जब विधानसभा चुनाव के पहले उनके एक भरोसेमंद नेता स्वामी प्रसाद मौर्य ने पार्टी छोड़ने की घोषणा की थी।

बात विधान सभा चुनाव से पहले की है जब स्वामी प्रसाद मौर्य ने बसपा छोड़ी थी। तब माया को लगता था कि स्वामी के जाने से बीएसपी को कोई नुकसान नहीं होगा। तब माया का सारा दारोमदार मुस्लिम-दलित गठजोड़ पर टिका हुआ था, लेकिन मोदी लहर के चलते ऐसा नहीं हुआ। बसपा तीसरे स्थान पर खिसक गई। उसकी इतनी भी हैसियत नहीं रही है कि वह अपनी सुप्रीमों को राज्यसभा में भेज सके।

एक समय नसीमुद्दीन बसपा के कद्दावर नेताओं में गिने जाने के साथ ही मायावती के बेहद करीबी भी माने जाते थे, माया ने नसीमुद्दीन के सहारे ही मुस्लिमों को सौ के करीब टिकट देकर मैदान में उतारा था, परंतु यह प्रयोग असफल रहा तो माया के लिये नसीमृद्दीन अप्रसांगिक हो गये। वैसे भी मायावती अपने नेताओं को दरवाजा दिखाने के लिए जानी जाती रही हैं, उन्हें इस बात की कभी कोई चिंता नहीं रही कि धीरे-धीरे उनके सारे पुराने साथी बाहर होते जा रहे हैं। अब मायावती के साथ पार्टी को मजबूत करने वाले ऐसा कोई नेता नहीं रह गया हैं जो अपने जनाधार के साथ अपनी पहचान भी रखता हो। तमाम दलित नेताओं की विदाई की वजह से ही बसपा का दलित आंदोलन भी हासिये पर पहुंच गया है। दलितों का बसपा से मोह भंग होता जा रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह माया का कहीं मुसलमानों को तभी ब्राहमण-बनियों को दलितों पर तरजीह देना था।

वैसे कहने वाले यह भी कह रहे हैं कि यह बिखराव नहीं है। बहुजन समाज पार्टी में मंथन का दौर चल रहा है। हिन्दुस्तान की सियासत में मोदी का प्रभाव बढ़ने के बाद अब वोट बैंक की सियासत का रंग ढंग बदल गया है।  लोकसभा और उसके बाद विधान सभा चुनाव मे मिली करारी हार के लिये भले ही बसपा सुप्रीमों माायवती ईवीएम (वोटिंग मशीन) को जिम्मेदार ठहरा रही हो,लेकिन हकीकत उनसे छिपी नहीं है। मुसलमान बसपा पर भरोसा कर नहीं रहा है तो दलित वोट बैंक में बीजेपी सेंधमारी करती जा रही है।

ऐसे में बसपा का सियासी ग्राफ का गिरना स्वभाविक भी है। विधान सभा चुनाव  में बसपा ने दलित-मुस्लिम गठजोड़ के सहारे सत्ता हासिल करने के लिये बड़ा दांव चला था, लेकिन सफलता हाथ नहीं लगी। अब माया को लगने लगा है कि मुलसमानों के चक्कर में दलित भी उससे दूर होता जा रहा है, इसको माया किसी भी तरह रोकना चाहती हैं। दरअसल, बसपा के संस्थाक मान्यवर कांशीराम ने पार्टी के अंदर दलित नेताओं की जो फौज तैयार की थी उसमें से अब सिर्फ मायावती ही पार्टी में बची रह गई है, जो पार्टी की सर्वेसर्वा भी है, लेकिन वह दलिातों के सभी वर्गो पर अपना प्रभाव नहीं रखती हैं। यह काम बसपा के अन्य दलित नेता किया करते थे,जिनको बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।

उत्तर प्रदेश की सत्ता पर तीन बार काबिज हो चुकी बसपा सुप्रीमों मायावती के अड़ियल रूख के कारण अनेक बड़े नेता पार्टी से बाहर गये तो  कई बार बीएसपी दो फाड़ भी हुई। लोकसभा चुनाव के बाद तो बसपा के बुरे दिनोें की शुरूआत ही हो गई। माया के पुराने सियासी साथी एक-एक कर अलग होते जा रहे हैं। इसमें से कुछ ने माया की नीतियों के खफा होकर पार्टी से किनारा कर लिया तो कई को मायावती ने बाहर का रास्ता दिखा दिया। ताजा मामला नसीमुद्दीन सिद्दीकी को बाहर का रास्ता दिखाये जाने का है। नसीमुद्दीन की गिनती कभी माया के सबसे करीबी नेताओं में हुआ करती थी। सिद्दीकी बसपा का मुस्लिम चेहरा थे, परंतु जब मायावती को यह लगने लगा कि अब मुस्लिम वोट बैंक की सियासत के दिन लद गये हैं तो उन्होंने नसीमुद्दीन को ही पार्टी से चलता कर दिया।

इसके अलावा और भी कई कारण थे जो नसीमुद्दीन की बसपा से ‘विदाई’ की वजह बने। योगी सरकार ने माया राज में हुए चीनी मिल घोटाले की जांच शुरू करा दी है, परंतु माया इसके लिये अपने आप को नहीं नसीमुद्दीन को जिम्मेदार ठहरा चुकी हैं। माया राज में लखनऊ और नोएडा में बने स्मारकों के निर्माण में हुई अनियमितताओं की जांच में लोकायुक्त ने पूर्व मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर घोटाले की विस्तृत विवेचना कराने को कहा था। इस मामले में कई और नेताओं और अधिकारियों का भी नाम आया था। अखिलेश सरकार ने मामले की जांच विजिलेंस को सौंप दी थी। विजिलेंस ने जांच में पाया कि स्मारकों के निर्माण के लिए नियमों को ताक पर रखकर कंसोर्टियम बनाए गए। सभी आरोपियों के खिलाफ सरकारी धन का गबन करने, आपराधिक साजिश रचने और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज हुआ था, जिसकी जांच चल रही है।

नसीमुद्दीन और उनके परिवार के खिलाफ लोकायुक्त के यहां आय से अधिक संपत्ति की शिकायत की गई थी। 2012 में तत्कालीन लोकायुक्त जस्टिस एनके मेहरोत्रा ने मामले की जांच पूरी कर ली। जांच रिपोर्ट के अनुसार नसीमुद्दीन  जांच के दौरान अपनी कई संपत्तियों के बारे में जानकारी नहीं दे पाए थे। लोकायुक्त ने उनके खिलाफ विजिलेंस और प्रवर्तन निदेशालय से जांच की संस्तुति की थी। कहा यही जा रहा है ऐसी ही तमाम वजहों से मायावती ने नसीमुद्दीन को चलता कर दिया।

लब्बोलुआब यह है कि बसपा सुप्रीमों मायावती अपने तमाम संकटमोंचकों के कारण ही संकट में घिरती जा रही हैं,जो उनके अच्छे समय में साथ खड़े रहे वह माया पर संकट आते ही पीठ दिखा कर जा रहे हैं। वैसे दुनिया का दस्तूर ही यही है। माया के साथ आज जो कुछ घट रहा है,वैसा ही आचरण वह स्वयं भी अपने सहयोगियों को दिखा चुकी है।

बीएसपी छोड़ने वालों को नहीं मिली सियासी जमीन

बसपा के कई दिग्गज नेता समय-समय पर मायावती से मनमुटाव के बाद उनसे दूरी बना चुके हैं लेकिन बसपा से दूरी बनाने वाले  अधिकांश नेता बसपा से अलग होने के बाद स्वयं को स्थापित नहीं कर सके। फिलहाल सतीश चंद्र मिश्रा को छोड़ दें, तो पार्टी का जो भी नेता मायावती के ज्यादा करीब पहुंचा, बहुत जल्द ही किनारे हो गया। दीनानाथ भास्कर से लेकर नसीमुद्दीन सिद्दीकी तक इसके उदाहरण हैं। पिछले दो वर्षो में बसपा छोड़ने वाले कुछ नेताओं ने जरूर बीजेपी का दामन थामकर अपनी सियासी नैया पार लगा ली। बसपा का ब्राहमण चेहरा समझे जाने वाले बृजेश पाठक,  स्वामी प्रसाद मौर्या और बीएसपी के पूर्व सांसद दारा सिंह इस समय योगी कैबिनेट में मंत्री हैं।

बात अन्य नेताओं की कि जाये तो 1990 में कांशीराम के काफी करीबी  राज बहादुर और जंग बहादुर ने पार्टी छोड़ी। दोनों ही नेता कुर्मी जाति से थे। राज बहादुर ने बीएसपी(आर) और जंगबहादुर ने बहुजन समाज दल बनाया। माया सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे दद्दू प्रसाद ने मायावती पर टिकट बेचने का आरोप लगाया, जिसके बाद 2015 मंें बसपा सुप्रीमों ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया। पिछले दिनों दद्दू प्रसाद फिर बीएसपी में शामिल हुए हैं। एनआरएचएम और स्मारक घोटाले के आरोपित बाबू सिंह कुशवाहा माया के खास थे। माया ने उन्हें पार्टी से निकाला। 2012 में बीजेपी की सदस्या ली, लेकिन रुक नहीं पाए। माया के करीबी ओम प्रकाश राजभर ने पार्टी छोड़कर सुहलदेव भारतीय समाज पार्टी बनाई। 13 साल तक राजनैतिक परिदृश्य से बाहर रहने के बाद 2014 में बीजेपी से गठबंधन किया और फिर चर्चा में आ गए। कांशीराम और मायावती के करीबी रहे आरके चौधरी ने बीएसपी से अलग होकर राष्ट्रीय स्वाभिमान पार्टी बनाई, लेकिन सफल नहीं रहे। 11 साल बाद 2013 में फिर बीएसपी में शामिल हुए और 2016 में फिर से पार्टी छोड़ दी। बीएसपी के संस्थापक सदस्य दीनानाथ भास्कर ने मायावती की आलोचना करते हुए पार्टी छोड़ी और सपा का दामन थाम लिया। 2009 में फिर बीएसपी में शामिल हुए और 2015 में फिर बीएसपी छोड़ बीजेपी में शामिल हो गए।

कांशीराम के करीबियों में शुमार सोने लाल पटेल ने अपना दल नाम से पार्टी का गठन किया। आज अपना दल (एस) भले ही केंद्र और राज्य की सत्ता में भागीदार हो, लेकिन सोनेलाल पटेल के सामने वह भी महत्वहीन ही रहा। बीएसपी-सपा गठबंधन सरकार में बीएसपी से कैबिनेट मंत्री रहे और कांशीराम के करीबी डॉक्टर मसूद ने पार्टी छोड़ राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी बनाई। वर्तमान में डॉ मसूद राष्ट्रीय लोकदल के प्रदेश अध्यक्ष हैं।

यह भी थी निकाले जाने की वजह

विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद मेरठ, गाजियाबाद, हापुड़, मुजफ्फरनगर, सहारनरपुर, बिजनौर, मुरादाबाद, संभल में कई दलित नेता और कार्यकर्ता नसीमुद्दीन के खिलाफ सड़क पर उतर आए थे। तब सिद्दीकी इन हालातों का सामना करने के बजाए बिना मीटिंग किए बीच में बैठक छोड़कर जाने लगे थे। सिद्दीकी पर पैसे लेकर टिकट बेचने, दलित कार्यकर्ताओं की बेइज्जती करने, मायावती और पार्टी को बदनाम करने के आरोप लगे थे। मेरठ में इस मुद्दे पर दो बार पार्टी कार्यकर्ताओं में मारपीट तक हुई और एफआईआर दर्ज हुई। मायावती ने एक माह पहले नसीमुद्दीन से वेस्ट यूपी के प्रभारी का पद छीना फिर उत्तराखंड के प्रभारी से पैदल कर दिया। बाद में मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में संगठन का जिम्मा दिया। अब पार्टी से ही निकाल दिया। इसके अलावा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गढ़ विधानसभा से चुनाव लड़ चुके एक मीट कारोबारी से नसीमुद्दीन सिद्दीकी के व्यवसायिक रिश्ते अक्सर चर्चा में रहें।  अमरोहा और मुरादाबाद में बीएसपी से जुड़े मुस्लिम नेताओं से उनके व्यापारिक संबंध होने की बात भी सामने आती रही थी। कहा यहां तक जा रहा था कि नसीमुद्दीन की अमरोहा में खुद की मीट फैक्ट्री भी है।

लेखक अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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…तो क्या तत्कालीन आईबीएन7 के यूपी हेड शलभ मणि त्रिपाठी को मारने की साजिश थी?

बसपा से निकाले गए नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने आज खुलासा किया कि मायावती अपने खिलाफ न्यूज लिखने दिखाने वालों को मारने की साजिश रचती थीं. इस बयान के सामने आने के बाद लखनऊ के कई पत्रकारों के दिमाग में तत्कालीन मायावती सरकार का वह मंजर घूम गया जिसमें एनएचआरएम घोटाले को लेकर लगातार हत्याएं हो रही थीं. तत्कालीन आईबीएन7 चैनल के यूपी हेड शलभ मणि त्रिपाठी ने एनआरएचएम घोटाले की कई परतों का पर्दाफाश किया था और उनका चैनल लगातार इसे दिखा भी रहा था. इसको लेकर बसपा सरकार बहुत असहज थी.

(शलभ मणि त्रिपाठी)

उन दिनों शलभ मणि त्रिपाठी को हर तरह से घेरने, परेशान करने और जेल भेजने की कोशिश हुई. उन्हें एक बार हजरतगंज चौराहे से उठा लिया गया और थाने ले जाकर जेल भेजने की तैयारी थी. उनके उपर कई जिलों में ढेर सारे मुकदमें लाद दिए गए. वह जिले जिले जाकर गिरफ्तारी पर स्टे लेते रहे. सूत्रों का कहना है कि उन्हीं दिनों शलभ मणि त्रिपाठी को निपटाने के लिए शीर्ष स्तर पर योजना बनी थी. इसकी सुपारी पूर्वांचल के एक ऐसे शूटर को दी गई जो दाऊद इब्राहिम गैंग से जुड़ा हुआ था. बहुत बाद में उस शूटर का नेपाल के आसपास इनकाउंटर हुआ.

सूत्रों के मुताबिक तब गृह मंत्रालय की तरफ से एक एडवाइजरी आईबीएन7 चैनल के संपादकों के पास भेजी गई जिसमें शलभ मणि त्रिपाठी की जान को खतरा बताया गया. इस पर मैनेजमेंट ने शलभ को दिल्ली बुलाना चाहा लेकिन शलभ ने लखनऊ छोड़ने से इनकार किया. बाद में उन्हें भी प्रबंधन ने विश्वास में लिया और उन्हें एडवाइजरी दिखाकर एलर्ट रहने को कहा. यह सबको पता है कि एनआरएचएम घोटाले में कई हत्याएं जेल में और जेल के बाहर हुईं.

इस स्कैम में तत्कालीन बसपा सरकार के शीर्षस्थ लोगों के फंसने और जेल जाने का अंदेशा था इसलिए जो भी इस घोटाले को लेकर सच बोल सकता था या बोल रहा था, उसे रास्ते से हटाने की कवायद की गई. शलभ मणि त्रिपाठी ने उन दिनों अपने जीवन और पत्रकारीय करियर का सबसे मुश्किल दौर देखा था. फिलहाल शलभ भाजपा के नेता हैं और यूपी भाजपा के प्रवक्ता भी हैं. पर आज नसीमुद्दीन के खुलासे के बाद लखनऊ के ज्यादातर पत्रकारों के दिमाग में उस समय के खौफनाक हालात के दृश्य तैरने लगे.

(लखनऊ से प्रकाशित वीकएंड टाइम्स ने उन दिनों आईबीएन7 के शलभ मणि त्रिपाठी पर हमले को लेकर कवर स्टोरी प्रकाशित की थी. पढ़ने के लिए उपरोक्त कवर पेज पर क्लिक कर दें.)


माया-नसीमुद्दीन के बीच बातचीत का टेप सुनने के लिए इस शीर्षक पर क्लिक करें…

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मायावती को दौलत की बेटी बताते हुए वरिष्ठ नेता मुंशीलाल जयंत ने बसपा से इस्तीफा दिया

उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले के रहने वाले और बसपा के वरिष्ठ नेताओं में शुमार मुंशीलाल जयंत ने आज बसपा सुप्रीमो पर गंभीर आरोप लगाते हुए पार्टी से इस्तीफा दे दिया है। गुजरात और तीन अन्य प्रदेशों के प्रभारी मुंशीलाल जयंत ने बसपा सुप्रीमो पर गुजरात चुनावों में टिकट के बदले रुपये मांगने का आरोप लगाया। यह कोई पहला मामला नहीं जब बसपा नेताओ ने अपने सुप्रीमो पर चुनाव में टिकटों के बदले रुपये मांगने का आरोप लगाया हो।

मायावती पर इस बार आरोप चार राज्यों के प्रभारी मुंशीलाल जयंत ने लगाया है। मुंशी लाल जयंत ने मायावती पर आरोप लगाते हुए कहा कि मायावती अब दौलत की बेटी बन चुकी हैं। मायावती ने गुजरात चुनाव में टिकट के बदले रुपये की मांग की थी जिसकी वजह से मैंने बसपा से इस्तीफा दे दिया है। मायावती सिर्फ रुपये देने वालों की सुनती हैं और उनसे ही मिलती हैं।

मुंशीलाल जयंत हापुड़ के थाना हापुड़ देहात क्षेत्र के सुभाषनगर के रहने वाले हैं और काफी लम्बे समय से बसपा में वरिष्ठ पद पर बने रहे हैं। मुंशीलाल जयंत ने मायावती पर आरोप लगाते हुए कहा है कि जो टिकट के बदले पैसे नहीं देता है मायावती उसको बाहर का रास्ता दिखा देती हैं। मुंशीलाल जयंत ने मायावती को दौलत की बेटी करार दिया।

संबंधित वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें…

हापुड़ से राहुल गौतम की रिपोर्ट. संपर्क : 09548053751

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बहनजी हार का कारण खुद को बतातीं तो समर्थक टूट जाते, इसलिए EVM को दुश्मन बनाया!

मायावती के निशाने पर ईवीएम के मायने… राजनीति में अक्सर ईवीएम को मोहरा बना दिया जाता है…  बीएसपी की हार से नाखुश दिख रहे दलित हितों को प्रमुखता से उठाने वाले एक संपादक ने मुझसे निजी बातचीत में बहन मायावती जी रवैये पर खासी नाराजगी जाहिर की. कहा, हार के कारणों की सही से समीक्षा नहीं होगी, तो ईवीएम को गलत ठहराने से बहुजन समाज पार्टी का कुछ भी भला नहीं होगा. बहन जी से मिलकर सबको सही बात बतानी चाहिए, भले ही उसमें अपना घाटा ही क्यों ना हो जाये. मैंने अपने संपादक मित्र से इस मामले पर एक घटना का जिक्र किया. जिसे आपके लिए भी लिख रहा हूं.

कांग्रेस ने 13वीं लोकसभा चुनाव (1999) में मिली हार की समीक्षा के लिए बैठक बुलाई. सोनिया गांधी जी चर्चा में तमाम दिग्गज कांग्रेसियों की राय ले रही थी. बात आगे बढ़े, उससे पहले बता दिया देना उचित होगा कि पहली बार लोकसभा चुनाव में ईवीएम को आंशिक तौर पर 1999 में इस्तेमाल शुरू किया गया था. उस समय विदेशी मूल का मुद्दा 12वीं लोकसभा में एक मत से गिरी अटल सरकार के वरदान साबित हुआ. जिसके कारण ही अटल सरकार या कहें पहली गैर-कांग्रेसी सरकार अपने 5 साल पूरा करने में कामयाब रही.

मंच में कांग्रेस के तमाम ऊंची जाति के नेता कांग्रेस की हार समीक्षा में अपनी ऊर्जा इस तरह खपा रहे थे कि कहीं भी हार का ठीकरा सोनिया गांधी पर नहीं फूटे. किसी ने हार का कारण चुनाव में गलत टिकट बटवारे को बताया, किसी में संगठन में अनुशासनहीनता को जिम्मेदार ठहराया, तो किसी चुनाव में युवाओं की भागीदारी की कमी को लेकर भी सवाल खड़ा किया. इसी बीच सोनिया जी ने पूर्वांचल के दिग्गज कांग्रेसी दलित नेता महावीर प्रसाद जी से पूछा कि आपकी राय में कांग्रेस की हार के लिए कौन जिम्मेदार है.

महावीर प्रसाद जी ने कहा कि हार का एकमात्र कारण ईवीएम है. जिसमें वोट डालने पर बीजेपी को एक की जगह दो वोट मिलते थे. दलित नेता की बेतुकी बात सुनकर तमाम दिग्गज और ऊंची जाति के कांग्रेसी नेता व्यंग्य से हंसे और हार के कारणों को जानने के लिए लिए दूसरे नेता की बारी आ गई. ऊंची जाति के नेताओं की व्यंग्यात्मक हंसी महावीर प्रसाद जी के एक समर्थक को काफी खली. चर्चा खत्म होने के बाद जैसे ही महावीर प्रसाद जी बाहर निकले, करीबी समर्थक ने बिलखकर बोला, बाबूजी आप भी गजब करते हैं, आपकी राय को तमाम दिग्गज नेता उपहास में उड़ा दिये. ऐसी राय आपको नहीं जतानी चाहिए थी.

इतना सुनते ही टोपी वाले नेता और बाबूजी के नाम से प्रसिद्ध महावीर प्रसाद जी गुस्से में बोले, मुझे राजनीति मत सिखाओ. हार का कारण क्या है, किसको नहीं मालूम है… सबको मालूम है कि हार का कारण सोनिया जी ही हैं. उनके विदेशी मूल का मुद्दा ही बड़ा कारण है. लेकिन बिल्ली के गले में घंटी बांधे कौन. मैं फिर कहता हूं कि ईवीएम ही हार की जिम्मेदार है.

अब समर्थक सन्न. उसने महावीर प्रसाद जी के सामने श्रद्धा से हाथ जोड़ लिये.

दिवंगत महावीर प्रसाद जी की तरह बहन मायावती जी को भी अच्छी तरह मालूम है कि 2017 यूपी विधानसभा चुनाव में किस कारण से बहुजन समाज पार्टी चुनाव हारी. लेकिन हार की जिम्मेदारी बहन जी के खुद लेने से क्या करोड़ों बीएसपी के वोटरों का मनोबल नहीं गिरेगा? इस सवाल जवाब के बाद मेरे साथी संपादक के चेहरे शांति भाव से खिल गया. जय भीम के नारे संग वो अगली रणनीति को सफल बनाने के लिए बढ़ चले.

नोट : इस लेख का मकसद ईवीएम मशीन को क्लीनचिट देना बिल्कुल नहीं है.

लेखक प्रसून शुक्ला वरिष्ठ पत्रकार हैं और कई न्यूज चैनलों के एडिटर इन चीफ रह चुके हैं. उनसे संपर्क prasoon001shukla@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.


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मायावती का दलित वोट बैंक क्यों खिसका?

हाल में उत्तर प्रदेश में हुए विधान सभा चुनाव में मायावती और उनकी बहुजन समाज पार्टी की बुरी तरह से हार हुयी है। इस चुनाव में उसके बहुमत से सरकार बनाने के दावे के विपरीत उसे कुल 19 सीटें मिली हैं जिनमें शायद केवल एक ही आरक्षित सीट है। उसके वोट प्रतिशत में भी भारी गिरावट आयी है। एनडीटीवी के विश्लेषण के अनुसार इस चुनाव में उत्तर प्रदेश में बसपा को दलित वोटों का केवल 25% वोट ही मिला है जबकि इसके मुकाबले में सपा को 26% और भाजपा को 41% मिला है। दरअसल 2007 के बाद बसपा के वोट प्रतिशत में लगातार गिरावट आयी है जो 2007 में 30% से गिर कर 2017 में 22% पर पहुँच गया है। इसी अनुपात में बसपा के दलित वोटबैंक में भी कमी आयी है। अभी तो बसपा के वोटबैंक में लगातार आ रही गिरावट की गति रुकने की कोई सम्भावना नहीं दिखती। मायावती ने वर्तमान हार की कोई ईमानदार समीक्षा करने की जगह ईवीएम में गड़बड़ी का शिगूफा छोड़ा है। क्या इससे मायावती इस हार के लिए अपनी जिम्मेदारी से बच पायेगी या बसपा को बचा पायेगी?

यद्यपि कुछ बसपा समर्थकों ने इन आंकड़ों के सही होने के बारे में प्रश्न उठाया है परंतु उत्तर प्रदेश में दलित जातियों की संख्या के विश्लेषण से यह आंकड़ा सही प्रतीत होता है। आइये सब से पहले उत्तर प्रदेश में दलितों की आबादी देखी जाये और फिर उसमें मायावती को मिले वोटों का आंकलन किया जाये. उत्तर प्रदेश में दलितों की आबादी कुल आबादी का 21% है और उनमे लगभग 66 उपजातियां हैं जो सामाजिक तौर पर बटी हुयी हैं. इन उप जातियों में जाटव /चमार – 56%, पासी – 16%, धोबी, कोरी और बाल्मीकि – 15%, गोंड, धानुक और खटीक – 5% हैं. 9 अति- दलित उप जातियां – रावत, बहेलिया खरवार और कोल 5% हैं. शेष 49 उप जातियां लगभग 3% हैं.

चमार/ जाटव आजमगढ़, आगरा, बिजनौर , सहारनपुर, मुरादाबाद, गोरखपुर, गाजीपुर, सोनभद्र में हैं. पासी सीतापुर, राय बरेली, हरदोई, और इलाहाबाद जिलों में हैं. शेष समूह जैसे धोबी, कोरी, और बाल्मीकि लोगों की अधिकतर आबादी बरेली, सुल्तानपुर, और गाज़ियाबाद जनपदों में है. आबादी के उपरोक्त आंकड़ों के आधार पर मायावती की बसपा पार्टी को अब तक बिभिन्न चुनावों में मिले दलित वोटों और सीटों का विश्लेषण करना उचित होगा. अब अगर वर्ष 2007 में हुए विधान सभा चुनाव का विश्लेष्ण किया जाये तो यह पाया जाता है कि इस चुनाव में बसपा को 87 अरक्षित सीटों में से 62 तथा समाजवादी (सपा) पार्टी को 13, कांग्रेस को 5 तथा बीजेपी को 7 सीटें मिली थीं. इस चुनाव में बसपा को लगभग 30% वोट मिला था. इस से पहले 2002 में बसपा को 24 और सपा को 35 आरक्षित सीटों में विजय प्राप्त हुई थी. वर्ष 2004 में हुए लोक सभा चुनाव में बसपा को कुल आरक्षित 17 सीटों में से 5 और सपा को 8 सीटें मिली थी और बसपा का वोट बैंक 30% के करीब था.

वर्ष 2009 में हुए लोक सभा चुनाव में बसपा को आरक्षित 17 सीटों में से 2, सपा को 10 और कांग्रेस को 2 सीटें मिली थीं. इस चुनाव में बसपा का वोट बैंक 2007 में मिले 30% से गिर कर 27% पर आ गया था. इसका मुख्य कारण दलित वोट बैंक में आई गिरावट थी क्योंकि तब तक मायावती के बहुजन के फार्मूले को छोड़ कर सर्वजन फार्मूले को अपनाने से दलित वर्ग का काफी हिस्सा नाराज़ हो कर अलग हो गया था. यह मायावती के लिए खतरे की पहली घंटी थी परन्तु मायावती ने इस पर ध्यान देने की कोई ज़रुरत नहीं समझी.
अब अगर 2012 के विधान सभा चुनाव को देखा जाये तो इसमें मायावती की हार का मुख्य कारण अन्य के साथ साथ दलित वोट बैंक में आई भारी गिरावट भी थी. इस बार मायावती 89 आरक्षित सीटों में से केवल 15 ही जीत पायी थीं जबकि सपा 55 सीटें जीतने में सफल रही थी. इन 89 आरक्षित सीटों में 35 जाटव/चमार और 25 पासी जीते थे इस में सपा के 21पासी और मायावती के 2 पासी ही जीते थे।मायावती की 16 आरक्षित सीटों में 2 पासी और 13 जाटव/चमार जीते थे. इस विश्लेषण से स्पष्ट है कि इस बार मायावती की आरक्षित सीटों पर हार का मुख्य कारण दलित वोटों में आई गिरावट भी थी. इस बार मायावती का कुल वोट प्रतिशत 26% रहा था जो कि 2007 के मुकाबले में लगभग 4% घटा था.
मायावती द्वारा 2012 में जीती गयी 15 आरक्षित सीटों का विश्लेषण करने से पाता चलता है कि उन्हें यह सीटें अधिकतर पच्छिमी उत्तर प्रदेश में ही मिली थीं जहाँ पर उसकी जाटव उपजाति अधिक है. मायावती को पासी बाहुल्य क्षेत्र में सब से कम और कोरी बाहुल्य क्षेत्र में भी बहुत कम सीटें मिली थीं. पूर्वी और मध्य उत्तर प्रदेश में यहाँ प़र चमार उपजाति का बाहुल्य है वहां पर भी मायावती को बहुत कम सीटें मिली थीं। मायावती को पशिचमी उत्तर प्रदेश से 7 और बाकी उत्तर प्रदेश से कुल 8 सीटें मिली थीं। इस चुनाव में यह भी उभर कर आया था कि जहाँ एक ओर मायावती का पासी, कोरी, खटीक, धोबी और बाल्मीकि वोट खिसका था वहीँ दूसरी ओर चमार/जाटव वोट बैंक जिस में लगभग 70% चमार (रैदास) और 30% जाटव हैं में से अधिकतर चमार वोट भी खिसक गया था। इसी कारण से मायावती को केवल पच्छिमी उत्तर परदेश जो कि जाटव बाहुल्य क्षेत्र है में ही अधिकतर सीटें मिली थीं। एक सर्वेक्षण के अनुसार मायावती का लगभग 8% दलित वोट बैंक टूट गया था.

2014 के लोकसभा चुनाव में मायावती को एक भी सीट नहीं मिली थी। इस चुनाव में उसका वोट प्रतिशत 19.6% रह गया था। इस चुनाव में भी चमार/जाटव वोट का बड़ा हिस्सा मायावती से अलग हो गया था परंतु मायावती ने इससे कोई सबक नहीं लिया जिसका खामियाजा इस चुनाव में भुगतना पड़ा है। मायावती के दलित वोट बैंक खिसकने का मुख्य कारण मायावती का भ्रष्टाचार, विकासहीनता, दलित उत्पीड़न की उपेक्षा और तानाशाही रवैय्या रहा है . मायावती द्वारा दलित समस्याओं को नज़र अंदाज़ कर अंधाधुंध मूर्तिकर्ण को भी अधिकतर दलितों ने पसंद नहीं किया है. सर्वजन को खुश रखने के चक्कर में मायावती द्वारा दलित उत्पीड़न को नज़र अंदाज़ करना भी दलितों के लिए बहुत दुखदायी सिद्ध हुआ है. दलितों में एक यह धारणा भी पनपी है कि मायावती सरकार का सारा लाभ केवल मायावती की उपजाति खास करके चमारों/जाटवों को ही मिला है जो कि वास्तव में पूरी तरह सही नहीं है. इस से दलितों की गैर चमार/जाटव उपजातियां प्रतिक्रिया में मायावती से दूर हो गयी हैं. अगर गौर से देखा जाये तो यह उभर कर आता है कि मायावती सरकार का लाभ केवल उन दलितों को ही मिला है जिन्होंने मायावती के व्यक्तिगत भ्रष्टाचार में सहयोग दिया है. इस दौरान यह भी देखने को मिला है कि जो दलित मायावायी के साथ नहीं थे बसपा वालों ने उन को भी प्रताड़ित किया था. उनके उत्पीडन सम्बन्धी मामले थाने पर दर्ज नहीं होने दिए गए. कुछ लोगों का यह भी आरोप है कि मायावती ने अपने काडर के एक बड़े हिस्से को शोषक, भ्रष्ट और लम्पट बना दिया है जिसने दलितों का भी शोषण किया था. यही वर्ग मायावती के भ्रष्टाचार, अवसरवादिता और दलित विरोधी कार्यों को हर तरीके से उचित ठहराने में लगा रहता है. दलित काडर का भ्रष्टिकरण दलित आन्दोलन की सब से बड़ी हानि है.

इस के अतिरिक्त बसपा की हार का एक कारण यह भी है कि मायावती हमेशा यह शेखी बघारती रही है कि मेरा वोट बैंक हस्तान्तरणीय है. इसी कारण से मायावती असेम्बली और पार्लियामेंट के टिकटों को धड़ल्ले से ऊँचे दामों में बेचती रही है और दलित उत्पीड़क, माफिया और अपराधियों एवं धनबलियों को टिकट देकर दलितों को उन्हें वोट देने के लिए आदेशित करती रही है। दरअसल मायावती ने दलित राजनीति को उन्हीं गुंडों, माफियाओं, दलित उत्पीड़कों एवं पूंजीपतियों के हाथों बेच दिया है जिनसे उनकी लड़ाई है। इस चुनाव में भी मायावती ने आधा दर्जन ऐसे सवर्णों को टिकट दिया था जो दलित हत्या, दलित बलात्कार और दलित उत्पीड़न के आरोपी हैं । इसी लिए इस बार दलितों ने मायावती के इस आदेश को नकार दिया है और बसपा को वोट नहीं दिया. दूसरे दलितों में बसपा के पुराने मंत्रियों और विधायकों के विरुद्ध अपने लिए ही कमाने और आम लोगों के लिए कुछ भी न करने के कारण प्रबल आक्रोश भी था और इस बार वे उन्हें हर हालत में हराने के लिए कटिबद्ध थे. तीसरे मायावती ने सारी सत्ता अपने हाथों में केन्द्रित करके तानाशाही रवैय्या अपना रखा था जिस कारण कुछ लोगों को छोड़ कर कोई भी व्यक्ति मायावती से नहीं मिल सकता था। मायावती केवल मीटिंगों में भाषण देने के लिए ही आती थीं । इसके इलावा उसका दलितों से कोई संपर्क नहीं रहा है जिसने दलितों की मायावती से दूरी को बढ़ाया है। इसके इलावा मायावती ने जिन छोटी दलित उपजातियों को नज़रअन्दाज़ किया था भाजपा ने उन तक पहुँच बना कर उन्हें चुनाव में टिकट देकर अपने साथ कर लिया।

मायावती की अवसरवादी और भ्रष्ट राजनीति का दुष्प्रभाव यह है कि आज दलितों को यह नहीं पता है कि उन का दोस्त कौन है और दुश्मन कौन है. उनकी मनुवाद और जातिवाद के विरुद्ध लड़ाई भी कमज़ोर पड़ गयी है क्योंकि बसपा के इस तजुर्बे ने दलितों में भी एक भ्रष्ट और लम्पट वर्ग पैदा कर दिया है जो कि जाति लेबल का प्रयोग केवल व्यक्तिगत लाभ के लिए ही करता है. उसे दलितों के व्यापक मुद्दों से कुछ लेना देना नहीं है. एक विश्लेषण के अनुसार उत्तर प्रदेश के दलित आज भी विकास की दृष्टि से बिहार, उड़ीसा राजस्थान और मध्य प्रदेश के दलितों को छोड़ कर भारत के शेष सभी राज्यों के दलितों से पिछड़े हुए हैं. उतर प्रदेश के लगभग 60% दलित गरीबी की रेखा से नीचे जी रहे हैं. लगभग 60% दलित महिलाएं कुपोषण का शिकार हैं. एक ताजा सर्वेक्षण के अनुसार 70% दलित बच्चे कुपोषण का शिकार हैं. अधिकतर दलित बेरोजगार हैं और उत्पादन के साधनों से वंचित हैं. मायावती ने सर्वजन के चक्कर में भूमि सुधारों को जान बूझ कर नज़र अंदाज़ किया जो कि दलितों के सशक्तिकरण का सबसे बड़ा हथियार हो सकता था. मायावती के सर्वव्यापी भ्रष्टाचार के कारण आम लोगों के लिए उपलब्ध कल्याणकारी योजनायें जैसे मनरेगा, राशन वितरण व्यवस्था , इंदिरा आवास, आंगनवाडी केंद्र और वृद्धा, विकलांग और विधवा पेंशन आदि भ्रष्टाचार का शिकार हो गयीं और दलित एवं अन्य गरीब लोग इन के लाभ से वंचित रह गए. मायावती ने अपने आप को सब लोगों से अलग कर लिया और लोगों के पास अपना दुःख/कष्ट रोने का कोई भी अवसर न बचा. इन कारणों से दलितों ने इस चुनाव में मायावती को बड़ी हद तक नकार दिया जो कि चुनाव नतीजों से परिलक्षित है.

कुछ लोग मायावती को ही दलित आन्दोलन और दलित राजनीति का पर्याय मान कर यह प्रश्न उठाते हैं कि मायावती के हारने से दलित आन्दोलन और दलित राजनीति पर बुरा असर पड़ेगा. इस संबंध में यह स्पष्ट कर देना उचित होगा कि मायावती पूरे दलित आन्दोलन का प्रतिनधित्व नहीं करती है. मायावती केवल एक राजनेता है जो कि दलित राजनीति कर रही है वह भी एक सीमित क्षेत्र : उत्तर प्रदेश और उतराखंड में ही. इस के बाहर दलित अपने ढंग से राजनीति कर रहे हैं. वहां पर बसपा का कोई अस्तित्व नहीं है. दूसरे दलित आन्दोलन के अन्य पहलू सामाजिक और धार्मिक हैं जिन पर दलित अपने आप आगे बढ़ रहे हैं. धार्मिक आन्दोलन के अंतर्गत दलित प्रत्येक वर्ष बौद्ध धम्म अपना रहे हैं और सामाजिक स्तर पर भी उनमें काफी नजदीकी आई है. यह कार्य अपने आप हो रहा है और होता रहेगा. इस में मायावती का न कोई योगदान रहा है और न ही उसकी कोई ज़रुरत भी है. यह डॉ. आंबेडकर द्वारा प्रारम्भ किया गया आन्दोलन है जो कि स्वतस्फूर्त है. हाँ इतना ज़रूर है कि इधर मायावती ने एक आध बौद्ध विहार बना कर बौद्ध धम्म के प्रतीकों का राजनीतिक इस्तेमाल ज़रूर किया है. यह उल्लेखनीय है मायावती ने न तो स्वयं बौद्ध धम्म अपनाया है और न ही कांशी राम ने अपनाया था. उन्हें दर असल बाबा साहेब के धर्म परिवर्तन के जाति उन्मूलन में महत्व में कोई विश्वास ही नहीं है. वे तो राजनीति में जाति के प्रयोग के पक्षधर रहे हैं न कि उसे तोड़ने के. उन्हें बाबा साहेब के जाति विहीन और वर्ग विहीन समाज की स्थापना के लक्ष्य में कोई दिलचस्पी नहीं है. वह दलितों का राजनीति में जातिवोट बैंक के रूप में ही प्रयोग करके जाति की राजनीति को कायम रख कर अपने लिए लाभ उठाना चाहती है।

उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि मायावती का दलित वोट बैंक बहुत हद तक खिसक गया है। शायद मायावती अभी भी दलितों को अपना गुलाम समझ कर उस से ही जुड़े रहने की खुशफहमी पाल रही है. मायावती की यह नीति कोंग्रेस की दलितों और मुसलामानों के प्रति लम्बे समय तक अपनाई गयी नीति का ही अनुसरण है. मायावती दलितों को यह जिताती रही है कि केवल मैं ही आप को बचा सकती हूँ कोई दूसरा नहीं. इस लिए मुझ से अलग होने की बात कभी मत सोचिये. दूसरे दलितों के उस से किसी भी हालत में अलग न होने के दावे से वह दूसरी पार्टियों से दलितों से दूरी बनाये रखने की चाल भी चल रही है ताकि दलित अलगाव में पड़ कर उस के ही गुलाम बने रहें. पर अब दलित मायावती के छलावे से काफी हद तक मुक्त हो गए हैं. अब यह पूरी सम्भावना है कि उत्तर प्रदेश के दलित मायावती के बसपा प्रयोग से सबक लेकर एक मूल परिवर्तनकारी, अम्बेडकरवादी राजनीतिक विकल्प की तलाश करेंगे और जातिवादी राजनीति से बाहर निकल कर मुद्दा आधारित जनवादी राजनीति में प्रवेश करेंगे. केवल इसी से उनका राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकर्ण हो सकता है।

एस.आर. दारापुरी
आई.पी.एस. (से.नि.)
राष्ट्रीय प्रवक्ता
आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट
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मीडिया ने बसपा और मायावती जैसी कद्दावर ताकत को चुनावी लड़ाई से बाहर कर दिया!

Ashwini Kumar Srivastava : अद्भुत है मीडिया और उसमें काम कर रहे तथाकथित पत्रकार। वरना बसपा और मायावती जैसी कद्दावर ताकत को ही इस बार के चुनाव में लड़ाई से बाहर कैसे कर देता! वैसे मुझे तो इसका कोई आश्चर्य नहीं है। क्योंकि एक दशक से भी ज्यादा वक्त तक दिल्ली और लखनऊ में देश के सबसे बड़े मीडिया संस्थानों में बतौर पत्रकार नौकरी करने के बाद मैं अच्छी तरह से जानता हूँ कि ख़बरें और सर्वे कैसे बनाये-बिगाड़े जाते हैं। इसका एक बहुत बड़ा उदाहरण भी मैं अपने ही निजी अनुभव से आगे बताऊंगा। लेकिन सबसे पहले बात बसपा और मायावती की करते हैं।

मेरा ही नहीं, प्रदेश के तमाम ऐसे लोगों का मानना है कि इस बार चुनाव में त्रिकोणीय संघर्ष है और बसपा की सरकार आने की सम्भावना भी उतनी ही प्रबल है, जितनी मीडिया बाकियों की बता रहा है। मैंने खुद लखनऊ समेत उत्तर प्रदेश के कई जिलों में ढेरों लोगों से राजनीतिक चर्चा में इस बात को महसूस किया है। मीडिया तो अपने सर्वे और ख़बरों के जरिये ऐसी हवा बना रहा है, मानों लड़ाई सिर्फ सपा-कांग्रेस गठबंधन और भाजपा के बीच है। मायावती को तो मीडिया चर्चा के ही काबिल नहीं समझ रहा।
सचमुच बेहद शर्मनाक ही कही जायेगी ऐसी पत्रकारिता, जिसमें किसी पत्रकार या संपादक की निजी राय ही खबर या सर्वे बनाकर जनता को पेश किया जाता हो। पत्रकार और मीडिया का काम बिना किसी भेदभाव और लागलपेट के कड़ी से कड़ी आलोचना करना है और उतने ही मुक्त भाव से प्रशंसा भी करना है। सरकार बनाने के लिए पत्रकारों और संपादकों को भी हर भारतीय की तरह वोट की ताकत मिली ही है।

अगर मायावती या बसपा नहीं पसंद तो अपना वोट मत दीजिये उन्हें लेकिन यह क्या तरीका है कि आप अपने जमीर-पेशे को बेचकर फर्जी ख़बरों, फर्जी सर्वे और लेखों के जरिये अपनी राय ही जबरन थोप कर बाकी के वोटरों का भी मन बदलने का कुत्सित और घृणित प्रयास कर रहे हैं?

मैंने मीडिया में अपनी पूरी नौकरी के दौरान इस बात का हमेशा ख्याल रखा कि खबर और सर्वे गढ़ना मेरा काम नहीं है। मैं सिर्फ डाकिया हूँ, जो समाज और देश में घट रहे पल पल के घटनाक्रम को मीडिया के जरिये देश और दुनिया तक पहुंचाने की ड्यूटी कर रहा है। मेरी निजी राय कुछ भी रही हो और मैं किसी भी पार्टी या नेता को वोट देता रहा हूँ लेकिन मैंने अपना वह पक्षपात कभी मीडिया की नौकरी में नहीं घुसेड़ा।

अब मैं वह अनुभव बताता हूँ, जिसके बाद मीडिया आखिर है क्या, मुझे इस सच्चाई का अंदाजा बखूबी हो गया था। मैंने अपना पत्रकारीय करियर टाइम्स ऑफ़ इंडिया समूह में ट्रेनी पत्रकार के तौर पर 2002 में शुरू किया था। उस वक्त मीडिया में हर कहीं तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल विहारी बाजपेयी के ही मुरीद बैठे थे। फिर आया 2004 में चुनाव का वक्त और प्रमोद महाजन का इंडिया शाइनिंग लेकर मीडिया ने चापलूसी और पक्षपात के रोज नए अध्याय लिखने शुरू कर दिए।

उसी वक्त वाजपेयी जी लाहौर यात्रा पर गए तो साथ ही में हमारे संपादक भी (नाम नहीं लिखूंगा) लाहौर गए।

तब तक महज दो साल में मैं अपने अखबार में अपनी जगह अपने काम से बना चुका था और अखबार का पहला पन्ना तथा उसकी मुख्य खबर यानी लीड, फ्लायर, एंकर, टॉप बॉटम आदि ज्यादातर मुझसे ही एडिट करवाई या एजेंसी आदि की मदद से लिखवाई जाती थी। मैं खुद भी बराबर बिज़नेस आदि रिपोर्टिंग करके पेज वन पर एंकर या किसी न किसी रूप में बाइलाइन लेता रहता था।

बहरहाल, संपादक जी ने टाइम्स समूह के निर्देश पर लाहौर से ही एक स्टोरी की, जिसके लिए मुझे कार्यवाहक संपादक ने अपने केबिन में बुलाया। उन्होंने कहा कि अश्विनी यह स्टोरी बहुत ख़ास है और मालिक लोगों के निर्देश पर की गयी है। इसमें कुछ कटेगा या जुड़ेगा नहीं, इसे सिर्फ आप पढ़ लीजिये। पेज वन पर आज कोई और खबर जाए न जाए लेकिन यह जरूर जाएगा।

खैर, मैंने उसे पढ़ा और हतप्रभ रह गया। उसमें अटल जी की प्रशंसा के अलावा कुछ नहीं था। और, उसमें कई जगह यह लिखा गया था कि अटल जी का कद और लोकप्रियता अब दुनिया में इस कदर बढ़ चुकी है कि भारत में आने वाले लोकसभा चुनाव क्या, अटल जी अगर पाकिस्तान में भी किसी सीट से खड़े हो जाएंगे तो जीत जाएंगे। यह कोई मजाक नहीं था बल्कि बहुत गंभीरता से बाकायदा हिंदुस्तानी-पाकिस्तानी नेताओं-जनता के कोट के साथ लिखा गया था।

अटल जी को गांधी जैसा विश्वव्यापी व्यक्तित्व बनाने के चक्कर में वह लेख पेज वन पर तो आधे से ज्यादा जगह पर काबिज हो गया बल्कि अंदर भी एक पेज पर उसके शेष भाग ने जगह घेर ली। मैं तो उस वक्त पद और अनुभव में किसी हैसियत में ही नहीं था कि उस लेख पर कोई टीका टिप्पणी भी कर पाता। इसी वजह से मैंने नौकरी धर्म का पालन करते हुए अटल जी की ही महानता पर आधारित एक शीर्षक लगाकर उसको अपने बॉस के पास भेज दिया।

अगले दिन जब लेख छपा तो हमारे ही अखबार के एक वरिष्ठ पत्रकार, जो अब कांग्रेस के बड़े नेता हैं और उन दिनों 10 जनपथ कवर करते थे, उन्होंने आकर बता दिया कि मैडम यानी सोनिया जी इस लेख से बहुत नाराज हैं। लेकिन अटल प्रेम में अंधे हो चुके टाइम्स समूह के मालिकों और पत्रकारों ने उनकी बात पर कान नहीं धरा।

उसके बाद चुनाव में जब नतीजे आने लगे और भाजपा का इंडिया शाइनिंग धूल फांकने लगा…. विश्वव्यापी नेता अटल विहारी वाजपेयी भारत में ही सर्वमान्य नेता नहीं रह गए तो अचानक टाइम्स समूह में हड़कंप मच गया। फिर जैसा कि मुझे वहां रहकर सुनने को मिला कि वही पत्रकार महोदय, जो सोनिया की नाराजगी की खबर लाये थे, उनकी लल्लो चप्पो होने लगी कि किसी तरह मैडम से क्षमा हासिल हो जाए। क्षमा कैसे मिली और कब मिली, ये तो मुझे नहीं पता चला लेकिन नतीजों के आने वाली रात ही उन्हीं सम्पादक ने उतना ही बड़ा-लंबा चौड़ा लेख लिखा, जिसमें राहुल को भारत ही नहीं, दुनिया को राह दिखाने वाला युवा नेता बताया गया। और मुझे ही बुलाकर उसे जब सौंपा गया, तो उस लेख में मैंने भी पूरे श्रद्धा भाव से शीर्षक लगाया ‘राह दिखाएँ राहुल’…

अब यह बात मत पूछियेगा कि राहुल जब 2004 में ही राह दिखा रहे थे तो आज खुद किसी मंजिल तक क्यों नहीं पहुँच पाये। आप तो बस यह देखिये कि मीडिया की खबर, लेख और सर्वे कैसे तैयार होते हैं।

जल्द ही मैं आपको अपनी अगली किसी पोस्ट में अपना एक ऐसा अनुभव भी बताऊंगा, जिससे पता चल जाएगा कि हर पार्टी या नेता के खिलाफ बिना किसी भेदभाव या लागलपेट के आलोचना या प्रशंसा करना कभी कभी कितना खतरनाक होता है।

आज जिन मायावती के समर्थन में मैंने मीडिया पर सवाल खड़े किये हैं, यही मायावती जी ने एक दिन मेरी वजह से हिंदुस्तान टाइम्स समूह के ऊपर 250 करोड़ की मानहानि का न सिर्फ मुकदमा ठोंक दिया था बल्कि मेरे समेत चार पत्रकारों को तुरंत बर्खास्त करने की मांग पर भी अड़ गयीं थीं। यह पूरा किस्सा भी मैं विस्तार से जल्द ही लिखूंगा।

लखनऊ के पत्रकार और उद्यमी अश्विनी कुमार श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.

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