मुकेश अंबानी अपने छोटे भाई अनिल अंबानी के कारोबार को लील गए!

तकनीक के तेवर रिश्तों को तहस नहस कर रहे हैं। मुकेश अंबाजी और अनिल अंबानी को ही देख लीजिए। दोनों भाई हैं। सगे भाई। धीरूभाई अंबानी के स्वर्ग सिधारते ही रिश्तों में दूरियां आ गई थी, और दोनों मन से बहुत दूर हो गए। फिर मोबाइल फोन के जिस धंधे में अनिल अंबानी थे, उसी मोबाइल की दुनिया में कदम रखते ही मुकेश अंबानी ऐसा भूचाल ले आए कि उनके स्मार्टफोन और फ्री डेटा से अनिल अंबानी की दुनिया न केवल हिलने लगी, बल्कि गश खाकर धराशायी हो गई। इन दिनों अनिल अंबानी की नींद उड़ी हुई है। वे धंधा समेटने की फिराक में है। वैसे भी वे कोई मुनाफे का धंधा नहीं कर रहे हैं। भारी कर्ज का बोझ उनके सर पर है और बहुत आसानी से इससे उबरने की फिलहाल कोई गुंजाइश नहीं है।

मुकेश अंबानी अपने रिलायंस जियो के जरिए मोबाइल की दुनिया में तूफान खड़ा किए हुए है, तो अनिल अंबानी के रिलायंस कम्यूनिकेशन (आरकॉम) की नैया उस तूफान में हिचकोले खा रही है। वैसे, यह कहने को हर कोई आजाद है कि मुकेश अंबानी को ऐसा नहीं करना चाहिए था। भाई द्वारा भाई की मदद करने के विषय पर बहुत साल पहले एक फिल्म आई थी, नाम था – भाई हो तो ऐसा। लेकिन लेकिन इस उल्टी गंगा को देखकर यही तथ्य अब सवाल की मुद्रा में हमारे देश में पूछा जा रहा है कि – भाई हो तो ऐसा ऐसा ? मुकेश अंबानी के जियो के आते ही तीन महीने में ही अनिल की कंपनी को कुल एक हजार करोड़ का नुकसान हुआ है। जी हां, एक हजार करोड़। हमारे हिंदुस्तान की सवा सौ करोड़ जनता में से एक सौ चौबीस करोड़ लोगों को अगर यह पूछा जाए कि एक करोड़ में कितने शून्य होते हैं, तो वे बता भी नहीं पाएंगे। मगर, यहां तो मामला एक हजार करोड़ के नुकसान का है।

रिलायंस जियो की लांचिंग से हालांकि सभी टेलिकॉम आपरेटर की कमाई को जबरदस्त झटका लगा है। लेकिन अनिल अंबानी के आरकॉम पर जियो ने कुछ ज्यादा ही करारी चोट की है। मुकेश अंबानी के मोबाइल फोन और इंटरनेट की कदम रखते ही अनिल अंबानी की हालत खराब है। अनिल परेशान हैं। आरकॉम के आंकड़ों को देखकर डरावनी तस्वीर सामने आ रही है। बड़ी संख्या में इनिल अंबानी के ग्राहक आरकॉम छोड़कर जियो सहित दूसरे ऑपरेटरों की सर्विस ले रहे हैं। हालांकि एयरटेल, वोडाफोन और आइडिया कुछ हद तक अपने ग्राहकों को सहेजने में सफल रहे हैं। लेकिन आरकॉम को अपने डेटा ग्राहकों के मामले में भी बहुत बड़ा नुकसान उठाना पड़ा है। एक साल पहले आरकॉम के पास 38.9 मिलियन ग्राहक थे। लेकिन 2017 की आखिरी तिमाही में उसके पास सिर्फ 28.3 मिलियन ग्राहक बचे हैं। मतलब, करीब 10 मिलियन ग्राहक उन्हें छोड़ गए हैं।

देश के बड़े कर्जदारों में अनिल अंबानी का नाम लगातार शिखर की ओर बढ़ रहा हैं। वे लगातार कर्ज के बोझ तले दबते जा रहे हैं और हालात यह हैं कि जिनकी उनकी सकल संपत्ति है, उससे ज्यादा उन पर कर्ज है। अनिल अंबानी की रिलायंस को उधार देने वालों की नींद उड़ी हुई है और इस कंपनी में जिन्होंने निवेश किया है, वे भी परेशान हैं। मार्च 2017 के जाते जाते अनिल अंबानी की कंपनी आरकॉम कुल 45 हजार 733 करोड़ रुपये के कर्ज के बोझ तले आ गई है। अनिल अंबानी की आरकॉम का भविष्य कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा है। बीते साल की आखरी तिमाही के नतीजों में कंपनी में रेवेन्यू तो बड़ी मात्रा में घटी ही है, आरकॉम के नेट प्रॉफिट में भी बहुत बड़ी गिरावट आई है। आंकड़ों पर नजर डालें, तो सन 2017 में जनवरी – मार्च की तिमाही में कंपनी को कुल 948 करोड़ रुपये का घाटा झेलना पड़ा है। मतलब करीब एक हजार करोड़ का घाटा। मतलब साफ है कि आनेवाले दिनों में अनिल अंबानी की तरफ से कोई बड़ी खबर सुनने को मिल सकती है। 

छोटे भाई अनिल अंबानी कर्जे के इस बोझ को कम करने का मन बना चुके हैं। इसके लिए वे अपना मोबाइल टॉवर का कारोबार बेचने की तैयारी में हैं। आरकॉम के मोबाइल टॉवर कारोबार की कुल कीमत करीब 25 हजार करोड़ रुपये मानी जा रही है। ब्रूकफील्ड नाम की कंपनी इसके लिए तैयार भी है। अनिल अंबानी आश्वस्त हैं कि इसके अलावा थोड़ी बहुत रकम उन्हें अपनी कंपनी के एयरसेल के साथ मर्जर से भी मिल ही जाएगी। सो, वे इस संकट से पार पा लेंगे। लेकिन फिर भी रिलायंस को उधार देने वालों की नींद उड़ी हुई है और अनिल अंबानी की कंपनी में निवेश करनेवालों को अपने भविष्य पर संकट दिख रहा है।

बीते एक साल के दौरान शेयर मार्केट में रिलायंस कंम्यूनिकेशन के शेयर लगभद 40 फीसदी टूट चुके हैं। बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज में उनके शेयर काफी नीचे उतर गए हैं। नैशनल स्टॉक एक्सचेंज पर भी कंपनी का शेयर 20 फीसदी से अधिक कमजोर हुए। मुकेश अंबानी की रिलायंस जियो की आक्रामक मार्केटिंग और बेहद कम कीमत रखने की नीति के कारण छोटे भाई अनिल अंबानी की कंपनी रिलायंस कम्युनिकेशंस को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है। यह सब इसलिए हैं क्योंकि धंधे में कोई किसी का भाई नहीं होता।

लेखक निरंजन परिहार मुंबई के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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जिन्ना हाउस ध्वस्त होना ही चाहिए, आखिर भारत के विभाजन की निशानी है

पाकिस्तान के राष्ट्रपिता मोहम्मद अली जिन्ना ने भारत के टुकड़े करने के लिए जिस जगह का उपय़ोग किया, वह जिन्ना हाउस एक बार फिर खबरों में है। इस बार उसे ध्वस्त करने की मांग की गई है। महाराष्ट्र में बीजेपी के वरिष्ठ विधायक मंगल प्रभात लोढ़ा चाहते हैं कि भारत के विभाजन की याद दिलानेवाले जिन्ना हाउस को ध्वस्त करके उसकी जगह एक कल्चरल सेंटर का बनाना चाहिए। विधायक लोढ़ा ने जिन्ना हाउस को ध्वस्त करने की यह मांग विधानसभा में की।

आज़ादी से पहले भारत के तीन टुकड़े करने का षड़यंत्र जिस जिन्ना हाउस में रचा गया,  वह षडयंत्र संपन्न इमारत, अब एनिमी प्रॉपर्टी एक्ट संसद में पास हो जाने के बाद यह सरकार की संपत्ति है। मोहम्मद अली जिन्ना ने जिस इमारत में बैठकर भारत के विभाजन करने का ताना बाना बुना, उसे ध्वस्त किये जाने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं होना चाहिए। क्योंकि उसे देखकर देश के तीन टुकड़े होने की याद आती है, और इस तरह की याद किसी भी तरह से आनेवाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणादायी नहीं हो सकती।

करीब दस साल तक जिन्ना हाउस में बैठकर भारत के तीन टुकड़े करवाने के बाद 15 अगस्त 1947 से पहले मोहम्मद अली जिन्ना पाकिस्तान चले गए। लेकिन उनके सपनों को पूरा करनेवाला यह उनका यह घर वे साथ नहीं ले जा सकते थे, सो जिन्ना हाउस मुंबई में ही रह गया। करीब 70 साल से जिन्ना हाउस उजाड़ पड़ा है। भारत की आजादी के साथ ही राजस्थान, पंजाब व कश्मीर से सटा इलाका पश्चिमी पाकिस्तान बना और पश्चिम बंगाल से सटा इलाका जो पाकिस्तान को दिया गया, वह जो अब बांग्लादेश के नाम से जाना जाता है, वह पूर्वी पाकिस्तान बना। तब से लेकर जिन्ना हाउस पर कब्जे के लिए जिन्ना की बेटी दीना वाड़िया एवं उनके नाती नुस्ली वाडिया कई कोशिशें करते रहे हैं। लेकिन अब आखिरकार एनिमी प्रॉपर्टी एक्ट संसद में पास हो जाने के बाद जिन्ना के वारिसों का इस संपत्ति पर कानूनी अधिकार समाप्त हो गया है।

वाडिया परिवार द्वारा जिन्ना हाउस पर अब अपना कब्जा बताने का कानूनी औचित्य ही नहीं हैं। जिस जिन्ना में बैठकर भारत के टुकड़े किये गए,  उस षड्यंत्र स्थल जिन्ना हाउस के टुकड़े टुकड़े करके वहां पर महाराष्ट्र की स्थापना के 50 वर्ष पूर्ण होने पर वहां पर महाराष्ट्र की अस्मिता को प्रकाशित करनेवाला एक कल्चरल सेण्टर स्थापित करने की मांग लोढ़ा ने की।

महाराष्ट्र में लगातार पांचवी बार विधायक बने लोढ़ा का कहना है कि जिन्ना हाउस को ध्वस्त करने की मांग को भारत के सामान्य देशप्रेमी समाज की भावना के रूप में स्वीकारा जाना चाहिए। वैसे भी  ऐतिहासिक इमारतें किसी भी समाज के लिए धरोहर मानी जाती हैं। लेकिन जिस जगह पर राष्ट्र के विभाजन की साझिश रची गई हो, उसे धरोहर तो किसी भी हाल में नहीं माना जा सकता।

जिन्ना हाउस निश्चित रूप से भारत के दुखद विभाजन का प्रतीक है। दक्षिण मुंबई में सबसे महंगे इलाके मलबार हिल में भाऊसाहेब हीरे मार्ग पर स्थित जिन्ना हाउस सन 1936 में बनाया गया था। उस जमाने में इसके निर्माण पर कुल दो लाख रुपए की लागत आई थी। ब्रिटिशकालीन इंडो गोथिक स्टाइल के भवन निर्माण शैली में करीब 2.5 एकड़ जमीन पर निर्मित जिन्ना हाउस वास्तुकार क्लाउड बेटली के निर्देशन में बनाया गया था।

सन 1944 से लेकर 1947 में भारत विभाजन तक जिन्ना ने इसी इमारत में देश के टुकड़े करने का षड़यंत्र रचा एवं जिन्ना ने महात्मा गांधी एवं जवाहर लाल नेहरू को भी कई बार इसी इमारत में बुलाकर बैठकें की थीं। इस तरह की दुखद यादों वाली इमारत जिन्ना हाउस को ध्वस्त किये जाने में कोई किसी को कोई आपत्ति भी नहीं होनी चाहिए। क्योंकि भारत में गांधी हाउस का तो महत्व है, लेकिन जिन्ना हाउस के बने रहने का क्या औचित्य ?

लेखक Niranjan Parihar से संपर्क niranjanparihar@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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‘न्यू इंडिया’ के लिए राष्ट्रपति कौन… ये, वो या फिर कोई और?

निरंजन परिहार

राजनीति की रपटीली राहों पर राष्ट्रपति चुनाव की बिसात बिछनी शुरू हो गई है। पांच राज्यों में चुनाव हो गए। चार राज्यों में बीजेपी की सरकारें बन गई। दो में जोड़ तोड़ से, तो दो में ऐतिहासिक बहुमत से। यूपी में बीजेपी को मिला भारी बहुमत उसके लिए राष्ट्रपति चुनाव की राह आसान करने का साधन साबित हो गया है। लेकिन कौन बनेगा राष्ट्रपति, यह सबसे बड़ा सवाल है। दुनिया के सबसे बड़े गणतंत्र के इस सर्वोच्च सर्वशक्तिमान बीजेपी में बहुत सारे दावेदार हैं। सूची लंबी है। बहुत लंबी। कई केंद्रीय मंत्री भी कतार में हैं। पार्टी के बुजुर्ग नेता तो पहले से ही अपने भाग्य का छींका टूटने का इंतजार कर रहे हैं। कुछ जाने माने और प्रतिष्ठित गैर राजनीतिक लोग भी लुटियन के टीले में अपना बुढ़ापा काटने के मंसूबे पाले हुए हैं। इस सबके बावजूद, कोई नहीं जानता कि राष्ट्रपति के पद के लिए अंतिम रूप से किसके नाम पर मोहर लगेगी। मगर, इतना तय है कि राष्ट्रपति के संदर्भ में ही उपराष्ट्रपति का नाम भी लगभग निश्चित हो जाएगा।

बीजेपी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह अपना कद इतना ऊंचा ले जा चुके हैं कि इस मामले में उनसे सवाल करने की किसी की हिम्मत नहीं है। पता तो उन्हें सब है, लेकिन राजनीति में इस तरह के फैसले दुनिया के लिए आम नहीं किए जाते। इसीलिए मोदी और शाह कौन बेगा राष्ट्रपति जैसे सवाल पर अनभिज्ञ जैसा व्यवहार करते हैं। लेकिन इसी से साफ लग जाता है कि किसको राष्ट्रपति बनाना है, इस बारे में सब कुछ तय है।

वैसे भी, जिस देश में पंच, सरपंच, और विधायक जैसे छोटे से पद के लिए भी सालों पहले से चेहरे लगभग तय कर दिए जाते हों, उस देश के सर्वोच्च राजनीतिक पद के लिए अब तक कोई नाम तय नहीं है, इस बात पर कौन भरोसा करेगा। यूपी में योगी आदित्यनाथ को सीएम बनाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, बीजेपी और संघ परिवार ने जो बहुत सारे संदेश एक साथ दिए हैं, उनमें से एक यह भी है कि राष्ट्रपति पद के लिए निर्णय उसी के नाम पर होगा, जिस पर सभी की सहमति होगी। और अंतिम मोहर भले ही संघ परिवार की लगे, लेकिन नाम तो मोदी और अमित शाह ही तय करेंगे।

नाम बहुत सारे हैं। राष्ट्रपति पद के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल में से देखें, तो वित्त मंत्री अरुण जेटली, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, नगर विकास मंत्री वेंकैया नायडू समेत लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन जैसे भी कुछेक जानदार नाम हैं। पार्टी में देखे, तो लालकृष्ण आडवाणी भी सबसे प्रबल स्वरूप में सामने हैं। मुरली मनोहर जोशी, शांता कुमार, केशूभाई पटेल और यशवंत सिन्हा भी उम्मीद पाले हुए हैं। लेकिन इन सब में जेटली और आडवाणी को छोड़कर बाकी सभी को तो उपराष्ट्रपति पद से भी संतुष्ट किया जा सकता है। दरअसल, मनोहर पर्रिकर के गोवा का सीएम बनकर दिल्ली छोड़ देने से रक्षा मंत्री का पद खाली हो गया है। उस पर किसी को बिठाना है। कलराज मिश्र 75 पार के हो रहे हैं। उनकी जगह भी खाली होनेवाली है। सो, कुछेक हफ्तों में मंत्रिमंडल में फेरबदल भी बहुत जरूरी होगा।

देश को तो राष्ट्रपति पद के लिए हमेशा से लालकृष्ण आडवाणी का नाम सबसे वाजिब लगता ही है, बीजेपी के ज्यादातर लोगों को भी उन्हीं का नाम सहज स्वरूप में उचित और अर्थपूर्ण दोनों लगता है। आडवाणी सबसे वरिष्ठ नेता हैं। बीजेपी के लिए उनका समर्पण और सेवा भाव सबसे ज्यादा रहा है। पार्टी को जन्म देने से लेकर, पैरों पर खड़ा करने, मजबूत बनाने और उसको विस्तार देने में अटल बिहारी वाजपेयी की बराबरी का समर्पण आडवाणी का रहा है।

फिर वे, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजनीतिक गुरू भी रहे हैं। पिछले दिनों अपनी गुजरात यात्रा को दौरान प्रधानमंत्री के संकेतों को जो लोग साफ साफ पढ़ पाए थे, उनका दावा है कि मोदी के मन में कहीं न कहीं राष्ट्रपति के लिए आडवाणी का नाम जरूर है। लेकिन उनको लेकर मोदी के मन में यह आशंका भी हो सकती है कि आडवाणी अगर बनते हैं, तो राजनीति में लंबे समय तक खुद को दरकिनार किए जाने के वैमनस्य को अगर वे पचा नहीं पाए, तो सरकार के कामकाज में अडंगा भी लगा सकते हैं।

मगर, आडवाणी के नियंता संघ परिवार के लोग मानते हैं कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने और बहुत मजबूत हो जाने के बाद अब आडवाणी की कोई प्रकट राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं है। अब स्थिति यह है कि यदि आडवाणी को राष्ट्रपति बनाया जाता है तो वे मोदी के कृतज्ञ रहेंगे। इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि बीडजेपी के बड़े नेताओं को दरकिनार करने के जो आरोप प्रधानमंत्री मोदी पर लगते रहे हैं, वे भी धुल जाएंगे और देश के दिलों में मोदी का एक कृतज्ञ सद्भाव स्वरूप भी बहुत ऊभरकर सामने आएगा।

लेकिन साथ ही यह भी लगता है कि आडवाणी के प्रति अगर मोदी अपनी कृतज्ञता का भाव प्रकट करते हैं, तो मुरली मनोहर जोशी, कलराज मिश्र और शांता कुमार जैसे नेता भी आस पालेंगे। सो, आडवाणी राष्ट्रपति पद के लिए बेहतर उम्मीदवार होने के बावजूद, बाकी बुजुर्गों को बिठाना मोदी के लिए एक नई तरह की मुश्किल हो सकती है। वैसे, आडवाणी को अगर बनाना ही होगा, तो मोदी वैसे इस तरह की मुश्किलों से तो चुटकी में निपट लेंगे।   

मोदी फिर से प्रधानमंत्री बनेंगे, तो उसी कार्यकाल के दौरान भारत अपनी आजादी के 75 साल मना रहा होगा। अपने हर कार्य को बेहद शानदार कार्यक्रम के रूप में जश्न के साथ मनाने वाले मोदी भारत की आजादी के अमृत महोत्सव को कैसे मनाएंगे, इसका अंदाज उनके विदेश दौरों में होनेवाले इवेंट्स के जलवों को देखकर लगाया जा सकता है। इसलिए, सबसे बड़ी एक सच्चाई यह भी है कि प्रधानमंत्री के रूप में मोदी अपने अगले कार्यकाल की सफलता और न्यू इंडिया के सपने को चमत्कारिक स्वरूप में साकार करने के लिए अपेक्षाकृत जवान राष्ट्रपति चाहते हैं। ताकि मोदी उससे भी अगली यानी तीसरी पारी में भी बीजेपी को सत्ता में लाने के लिए काम कर सकें। इस दौरान मोदी चाहते हैं कि वे हर तरह से सिर्फ देश के भीतर के मामलों में ही सक्रिय रहें, और विकास के सारे काम पूरे करें।

और, उधर संसार भर से रिश्ते निभाने का काम राष्ट्रपति करते रहें। इसके लिए उन्हें शारीरिक, मानसिक और व्यावहारिक रूप से सबल, समर्थ, सक्षम और सक्रिय राष्ट्रपति चाहिए। भारत के राष्ट्रपति के रूप में लंबे समय तक अंतर्राष्ट्रीय मंच पर दमदार नेता के रूप में स्थापित होने का माद्दा जेटली में है। देश के वर्तमान रानीतिक परिदृश्य में फिलहाल तो जेटली ही अकेले नेता हैं, जो मोदी के सपनों के राष्ट्रपति के रूप में उम्मीदों के आसमान पर खरे उतर सकते हैं।

न्यू इंडिया बनानेवाले मोदी की ऐसे राष्ट्रपति की यह तलाश भी सिर्फ अरुण जेटली पर जाकर पूरी होती है। वे मोदी के मुरीद हैं। दोस्त भी हैं और सहयोगी भी। जानकार तो खैर वे बहुत ज्यादा है और तेजतर्रार भी गजब के हैं। लेकिन ये तो सारे कयास हैं। इन सबके अलावा कोई और भी हो सकता है। क्योंकि न्यू इंडिया के निर्माण के दौर में राष्ट्रपति पद के लिए असल उम्मीदवार की अगर किसी को खबर है, तो वह हैं अमित शाह और मोदी। इन्हीं का दिल जानता है। लेकिन मामला राजनीति का है, सो… दिल है कि जानता नहीं…!

लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्लेषक एवं वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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प्रशांत किशोर की उस्तादी खतरे में, धंधा बंद होने की कगार पर

-निरंजन परिहार-

देश के राजनीतिक पटल पर चुनाव प्रबंधन के उस्ताद के रूप में अचानक प्रकट हुए प्रशांत किशोर की उस्तादी खतरे में है। उनके चुनावी फंडे फालतू साबित हुए और खाट बिछाने के बावजूद कांग्रेस की खटिया खड़ी खड़ी हो गई। आनेवाले दिन प्रशांत किशोर के लिए भारी संकट से भरे होंगे। कांग्रेस की करारी हार के बाद अब चुनावों में उन्हें कोई काम मिल जाए, तो उनकी किस्मत। 

यूपी के चुनाव ने प्रशांत किशोर के पराभव की पटकथा लिख दी है। चुनाव के शर्मनाक नतीजों के बाद कांग्रेस तो क्या किसी भी राजनीतिक दल में अब उनके लिए कोई इज्जतदार जगह नहीं बची है। भविष्य में किसी राजनीतिक दल का कोई छोटा – मोटा काम मिल गया, तो उनके लिए बहुत बड़ी बात होगी। प्रियंका गांधी ने चलते चुनाव में ही उनसे किनारा कर लिया था, और सोनिया गांधी ने तो शुरू से ही उन्हें कोई भाव नहीं दिया। कांग्रेस के बड़े नेता अपने परंपरागत सेटअप में सैंध लगाने के कारण प्रशांत किशोर से पहले से ही दूरी बनाए हुए थे, मगर अब हार के बाद उनके सारे पैसे अटक गए हैं। कांग्रेस पर प्रशांत किशोर का बहुत बड़ा बिल बाकी है। चुनाव से पहले ही वे इसकी वसूली चाहते थे। लेकिन कांग्रेस मुख्यालय से मामला आगे सरकाया जाता रहा कि चुनाव हो जाने दीजिए, फिर कर लेंगे। मगर, अब उनका धंधा बंद होने की कगार पर है। कांग्रेस को अब समझ में आ रहा है कि राजनीति सिर्फ राजनीतिक तरीकों के जरिए ही साधी जा सकती है, नए नए फंडों से नहीं। और, चुनाव रणनीतिक कौशल से जीते जाते हैं, इवेंट मेनेजमेंट से नहीं।  

राहुल गांधी को खाट सभाएं करने का नया फंडा पेश करनेवाले प्रशांत किशोर कांग्रेस की खटिया खड़ी करवानेवाले साबित हुए। कांग्रेस के सारे दिग्गज नेता तो पहले से ही कह रहे थे कि उनको जमीनी राजनीति की कोई समझ नहीं है, इसलिए उन पर बहुत भरोसा करने की जरूरत नहीं है। लेकिन राहुल गांधी को प्रशांत किशोर ने विश्वास में ले लिया था, सो उन्होंने अपने किसी भी नेता की नहीं सुनी। राहुल ने उन्हें को सर आंखों पर बिठा लिया था और जैसा प्रशांत किशोर कहते रहे, वैसा ही वे करते रहे। सो, अब भुगत भी रहे हैं। देश देख रहा है कि प्रशांत किशोर ने राहुल गांधी की राजनीति का सत्यानाश कर दिया, कांग्रेसियों का भट्टा बिठा दिया और यूपी में कांग्रेस को इतिहास की तस्वीरों में दर्ज होने के गर्त में धकेल दिया।

यूपी में कांग्रेस की ऐतिहासिक हार के बाद राजनीतिक दलों को अब समझ में आ जाना चाहिए कि विश्लेषण और सर्वेक्षण वगैरह करवाने तक तो प्रोफेशनल एजेंसियों से भले ही काम लिया जाना चाहिए। लेकिन पार्टी के अंदरूनी मामलों में उनका दखल कतई नहीं हो। प्रशांत किशोर ने सबसे बड़ी गलती यही की कि पार्टी की रणनीति बनाने से लेकर समाजवादी पार्टी से समझौता कराने और रैलियों की तारीख, जगह और वक्त तक तय करने का काम भी उन्होंने अपने हाथ में ले लिया। यहां तक कि गठबंधन में सीटों का बंटवारा, नेताओं के दौरे, भाषण के मुद्दे, रोड़ शो के रास्ते और टिकट बांटने तक में उन्होंने दखल देकर कई बड़े नेताओं को नाराज भी किया। यूपी के एक बड़े नेता ने तो चलते चुनाव में ही राहुल गांधी को यहां तक साफ साफ कह दिया था कि दशकों तक पार्टी की सेवा करनेवालों को भी अब क्या बाहरी लोगों के निर्देश पर ही चुनाव में हर काम करना होगा ?

चुनाव जितानेवाले उस्ताद के रूप में खुद को प्रचारित करने के बावजूद प्रशांत किशोर यूपी और उत्तराखंड में कांग्रेस को दिलासा देने लायक बहुमत तक नहीं दिला पाए। यूपी में कभी राज करनेवाली कांग्रेस के पास पिछली विधानसभा में 28 सीटें थीं। मगर उनकी सलाह पर रुपया पानी की तरह बहाने के बावजूद 403 में से कांग्रेस सिर्फ 7 विधायकों पर संतोष करने को मजबूर है। कुल 500 करोड़ में सिर्फ 7 विधायक। उधर, उत्तराखंड में भी केवल 15 विधायक जीते और खुद मुख्यमंत्री हरीश रावत की दो जगहों से हार भी वे नहीं बचा पाए। चुनाव तो पंजाब में भी थे, जहां कांग्रेस को भारी बहुमत मिला। मगर, वहां कैप्टन अमरिंदर सिंह ने प्रशांत किशोर तो पहले से ही अपने से बहुत दूर रखा था, और दिल्ली दरबार के बड़े से बड़े कांग्रेसी नेता का दखल भी नहीं स्वीकारा।

यह साफ हो गया है कि सिर्फ एक चुनाव जीतती हुई मजबूत पार्टी में ही प्रशांत किशोर के चुनावी फंडे काम आ सकते हैं। कमजोर और हारती हुई पार्टी को जिताने के लिए वे कुछ नहीं कर सकते। प्रशांत किशोर अपने बारे में 2014 के लोकसभा चुनाव और बिहार का उदाहरण रखते हैं। लेकिन उस लोकसभा चुनाव में देश में मोदी लहर थी और उसके बाद बिहार में भी नीतीश कुमार जब लालू यादव को अपने साथ लाए, तो बहुत मजबूत स्थिति में उभरे थे। दरअसल, लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी ने प्रशांत किशोर के ‘स्ट्रेटेजी बेस्ड पॉलिटिकल इवेंट्स सिस्टम’ का चुनावी उपयोग इसीलिए किया, क्योंकि ये इवेंट्स उनके विचारों, उनके कार्यक्रमों और उनकी प्रतिभा को प्रसारित और प्रचारित करने के लिए सहायक थे। लेकिन नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी को मिली प्रचंड जीत का सेहरा प्रशांत किशोर ने अपने माथे बांधा था। पर, उस चुनाव में मोदी के मंसूबे बहुत ऊंचे थे, सो कौन क्या श्रेय ले रहा है, इसकी उनको कोई खास परवाह भी नहीं थी। और बीजेपी के किसी नेता ने तो विरोध इसलिए नहीं किया, क्योंकि तब प्रशांत किशोर तब सीधे मोदी के आदमी थे। मगर, केंद्र में सरकार बनते ही बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने प्रशांत किशोर को दरवाजा दिखा दिया। तो बिहार का बेटा होने की दुहाई देकर प्रशांत किशोर नीतीश कुमार के साथ हो लिए। लेकिन अब उनसे यह सवाल क्यों नहीं किया जाना चाहिए कि बिहार में भी यूपी की तरह लालू यादव, नीतीश कुमार, कांग्रेस, और बीजेपी सारे अलग अलग चुनाव लड़ रहे होते, तो भी क्या वे नीतीश को बिहार में जिता पाते ? यूपी और उत्तराखंड में कांग्रेस की शर्मनाक हार ने यह साबित कर दिया कि पेशेवर सलाहकारों की सलाहों पर किसी राजनीतिक दल के लिए चुनाव जीतना संभव नहीं है। अब तक के इतिहास की सबसे शर्मनाक हार से कांग्रेस को तो फिर से खड़ा होने में सालों लगेंगे ही, प्रशांत किशोर की दुकान भी बंद हो जाएगी। न हो तो कहना।

(लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्लेषक एवं वरिष्ठ पत्रकार हैं) 

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बजट से डर नहीं लगता साहब, उसकी मार से डर लगता है!

बजट आनेवाला है। सरकार कमर कस रही है। वित्त मंत्री व्यस्त हैं। अफसर पस्त हैं। और बाजार ध्वस्त। ज्वेलर निराश हैं। गोल्ड ही नहीं डायमंड और सिल्वरवाले भी परेशान है। बाजार से ग्राहक गायब है। सेल गिर गई है। उधार आ नहीं रहा है। नया माल बिक नहीं रहा है। कारीगर भी गांव निकल गए हैं। आगे क्या होगा, कुछ भी तय नहीं है। नोटबंदी ने मार डाला। सरकार के तेवर डरा रहे हैं। ज्वेलर घर से निकलकर बाजार आता है। बाजार से निकल कर घर जाता है। आता – जाता तो वह पहले भी था, लेकिन पहले उम्मीद के साथ आता था। और खुश होकर घर लौटता था। लेकिन अब परेशानी लेकर बाजार में आता है और खाली जेब वापस जाता है।

मोदी जी की नोटबंदी भले ही दुनिया भर में उम्मीद जगा रही हो, लेकिन ज्वेलरी बाजार में हताशा के हालात हैं। खर्चे लगातार बढ़ रहे हैं और माहौल में कहीं भी नरमी के संकेत नहीं दिख रहे हैं। हर किसी की हालत खराब है और खासकर ज्वेलरों की हालत का अंदाज तो सिर्फ इसी से लगाया जा सकता है कि जयपुर से लेकर जबलपुर और रायपुर से लेकर राजकोट तक के सारे ज्वेलर चुप्पी साधे हैं। दिल्ली में भी हालत खराब है और केरल भी कमजोर पड़ता जा रहा है।

ज्वेलरी ही नहीं, देश के किसी भी बाजार में कहीं भी कोई धंधा ही नहीं है। ऐसे में, अगले महीने की पहली तारीख, यानी 1 फरवरी को देश का बजट आ रहा है। पहले बजट उम्मीद जगाता था। लेकिन अब बजट की बात से ही डर लगने लगा है। ‘दबंग’ फिल्म के विख्यात डायलॉग की तर्ज पर कहें, तो ‘बजट से डर नहीं लगता साहब, बजट की मार से डर लगता है।’ दरअसल, ज्वेलरी बाजार के लिए हर बार का बजट राहत के बजाय सेहत खराब करनेवाले प्रावधान लेकर आता है।

इस बार क्या होगा, कोई नहीं जानता। लेकिन जिस तरह की खबरें आ रही हैं, वे डरा रही हैं। क्योंकि ये खबरें देश की सरकार द्वारा ज्वेलरों के साथ पहले किए गए व्यवहार के मुताबिक ही आ रही हैं। ज्वेलर इसीलिए डर रहे हैं। लेकिन बजट तो बजट है। उसे तो आना ही है। हर साल आता है। इस बार भी आएगा जरूर। जब आएगा, तो बाजार के लिए कोई नई खबर भी लाएगा। लेकिन निश्चित रूप से उम्मीद यही है कि यह खबर खुश करनेवाली नहीं होगी। वित्त मंत्री के पिटारे से आज तक जो कुछ निकलता रहा है, उसमें ज्वेलरी बाजार के लिए चौंकानेवाली खबर जरूर होती है, खुश करनेवाली नहीं।

वैसे भी ज्वेलरी बाजार पर सरकार की कोई मेहरबानी कभी रही नहीं। बीते कुछ समय की सरकार की कोशिशों पर नजर डालें, तो गोल्ड का इंपोर्ट रोकने, उस पर इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ाने, फिर गोल्ड की खरीद पर पैन कार्ड अनिवार्य करने और हॉलमार्किंग से लेकर कई तरह के छोटे छोटे नियम, कानून और कायदे ज्वेलरी बाजार को डराते रहे हैं। अब बजट आ रहा है, तो फिर से नई किस्म का डर सताने लगा है। राम जाने, क्या होगा।    

सवाल ज्वेलरी बाजार का ही नहीं है। इससे जुड़े हर धंधे की हालत खराब है। देश भर में ज्वेलरी मशीनरी का धंधा ठप है, तो ज्वेलरी पेकेजिंग इंडस्ट्री भी साल भर से झटके झेल रही है। डायमंड बाजार तो पहले से ही मौत के मुंह में समाता जा रहा है। जब गोल्ड ही नहीं बिक रहा तो, डायमंड क्या लोहे में जड़ेंगे। सो, डायमंडवाले भी रो रहे हैं। बीते साल भर में डायमंड बाजार को इतिहास का सबसे बड़ा नुकसान झेलना पड़ा है। सूरत, मुंबई और देश भर के अन्य बाजारों में डायमंड व्यापारी सरकार की कारवाई से परेशान है। नोटबंदी के बाद से जीना मुहाल है। देश में लोकल लेवल पर डायमंड का ज्यादातर धंधा कैश में चलता है। अब आगे व्यापार कैसे करेंगे, यह चिंता की बात है। ज्वेलरी बाजार से जुड़े कैश से सबसे बड़े धंधे, सट्टा व्यवसाय की तो हालत और ज्यादा खराब है। सारे लोग हाथ पर हाथ धरे बैंठे हैं।

सट्टा बाजार वैसे भी कभी नरम तो कभी गरम चलता रहा है। लेकिन साल भर से तो सांसत में था ही, अब सरकार की नोटबंदी के बाद उसे बहुत जोर का फटका लगा है। इसी में फंसे, मुंबई में जवेरी बाजार के एक नामी युवा राजस्थानी ज्वेलर को सट्टेबाजी में हाल ही में ऐसा झटका लगा कि उसे दादी – नानी सब याद आ गई। मामला 40 करोड़ के पार का था। सो, खबर है कि राजकोट से लेकर दुबई तक के सारे तार जीवंत हो गए। हर तरफ से बदबाव आया तो, आखिर कुछ तो ले – देकर सेटल कर दिया, और बहुत कुछ अब भी बाकी है। जो, दिए बिना छुटकारा नहीं मिलनेवाला। पैसा तो गया ही, अच्छा खासा नाम था, वह भी खराब हुआ सो अगल। सट्टेबाजी में ऐसा ही होता है। आता है, तो एक साथ आता है, और जाता है, तो पुराना कमाया हुआ भी निकाल कर ले जाता है।

गोल्ड बिजनेस पर लगाम कसकर दूसरे देशों से हमारे यहां गोल्ड का इंपोर्ट कम करने की सरकार की कोशिश से धंधा चौपट हो रहा है। दिसंबर में खत्म हुए इस वित्तीय वर्ष के तीसरे क्वार्टर ने गोल्ड बिजनेस की कमर तोड़कर रख दी है। हमारे देश में अक्टूबर नवंबर और दिसंबर गोल्ड की बिक्री के हिसाब से सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। इन तीनों महीनों में देश फेस्टिवल मूड में होता है। रमजान से लेकर ईद और नवरात्रि से लेकर दीपावली व क्रिसमस आदि सभी इसी दौरान आते हैं।

इन दिनों लोग खूब ज्वेलरी खरीदते हैं। लेकिन इस साल बाजार में गोल्ड की सेल में जो कमी आई है, वह नोटबंदी का असर है। बाजार की हालत हालत खराब है और उसे सरकार का डर भी है। लेकिन मोदी सरकार के मायने में नोटबंदी का बाद देश में बहुत कुछ अच्छा होगा। क्योंकि अब जो भी होगा, पारदर्शी होगा। फिर भी व्यापारी समाज में बजट का डर लगातार बढ़ रहा है। पर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की झोली में कई जादू है। देखते हैं, इस बार के बजट में उनकी सरकार क्या खेल दिखाती है।

(लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्लेषक हैं)

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कंगाली के पचास दिन और देश का विश्वास

-निरंजन परिहार-
लालू यादव भले ही देश को याद दिला रहे हो कि 31 दिसंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए किसी चौराहे का इंतजाम कर लीजिए। लेकिन सवाल न तो किसी चौराहे का है और ना ही प्रधानमंत्री द्वारा गोवा से देश को दिए संदेश में उनके 50 दिन में सब कुछ ठीक हो जाने के वचन का। बल्कि सवाल यह है कि आखिर 30 दिसंबर को नोटबंदी के पचास दिन पूरे होने के बाद देश के सामने आखिर रास्ता होगा क्या। पचास दिन होने को है। नोट अब तक छप ही रहे हैं। बैंक अभी भी नोटों के इंतजार में हैं। एटीएम के बाहर खाली जेब लोगों की लंबी लंबी कतारें लगातार बढ़ती जा रही हैं। और जनता अभी भी परेशान हैं।

मोदी अकेले खेवनहार हैं और सामने सवालिया मुद्रा में खड़ी हैं देश की सवा सौ करोड़ जनता। यह सही है कि मोदी की मारक मुद्राएं विरोधियों को डराने, बेईमानों को धमकाने और भ्रष्ट लोगों को बचकर निकल जाने के भ्रम से निकालने के लिए हैं। लेकिन सच यह भी है कि देश अब भी मोदी पर भरोसा करता है, इसलिए विपक्षी दलों के बहकावे में नहीं आ रहा। राहुल गांधी कहते रहे कि मोदी ने 50 अमीरों को बचाने के लिए देश को संकट में डाल दिया। ममता बनर्जी  भले ही मोदी को कोस रही हों। और मायावती भले ही चीखती – चिल्लता रहे कि मोदी देश को बरबाद कर रहे हैं। लालू यादव भी ललकार रहे हैं। लेकिन इनकी सुनता कौन हैं ! 

और देखते देखते, 30 तारीख तो आ गई। नोटबंदी की डेडलाइन खतम होने को है। नोट छापने में तेजी की बातों से लेकर कैशलेस अर्थव्यवस्था को कामयाब करने की दिशा में प्रयत्नों की परिभाषा गढ़ने का वक्त समाप्त हो रहा है। दिहाड़ी मजदूर का भी सारा पैसा बैंकों में जमा हो गया और वह खाली जेब भटक रहा है।   कैशलेस के लिए क्रेडिट कार्ड का उपयोग करने और पेटीएम के प्रचार की परिभाषा का दूसरा पहलू यह भी है कि नौकरियां जा रही हैं और रोजगार के अवसर समाप्त हो रहे हैं। भिवंड़ी का 50 फीसदी मजदूर खाली बैठा है। मुंबई के हजारों बंगाली ज्वेलरी कारीगर अपने गांव लौट गए हैं।

आगरा में तिलपट्टी बनानेवाले भी हाथ पर हाथ धरे हैं। मुंबई का कंस्टरक्शन मजदूर भी बेकार बैठा है और फिल्मों के लिए अलग अलग काम में दिहाड़ी काम करनेवाले करीब दो लाख लोग भी गांव लौट गए हैं। मनरेगा से लेकर देशभर के दिहाड़ी मजदूर को जोड़ा जाए, तो उनका आंकड़ा करीब 27 करोड पार के पार जाता है। 50 दिन पूरे होने जा रहे हैं, लेकिन इन सबकी हथेली खाली है। और पेट तो वैसे भी कभी भरा हुआ था ही नहीं। सरकारी आकड़े बताते हैं कि नवंबर 2015 के मुकाबले इस बार मनरेगा में 55 फिसदी रोजगार कम रहा। नोटबंदी की मार मनरेगा के मजदूर पर इस कदर पड़ेगी, यह सरकार ने भी पता नहीं सोचा था या नहीं। लेकिन यह पक्का है कि मनरेगा का रोजगार भी सिर्फ 100 दिन के लिए ही होता है, साल भर के लिए नहीं। अब हालात और बिगड़े हैं क्योंकि पैसा तो बैंकों में जमा हो गया। और उधर, नए नोटों की कमी और पुराने नोटों से खदबदा रहे बैंकों के भीतर का सच यह भी है कि उनकी रोजमर्रा की जिंदगी कब फिर से बहाल होगी, यह वे खुद भी नहीं जानते।

इसलिए आज सवाल यह नहीं है कि 30 दिसंबर के बाद अचानक कोई जादू की छड़ी अपना काम शुरू कर देगी। मगर, सवाल ये है कि नोटबंदी के बाद देश, तकदीर के जिस तिराहे पर आ खड़ा हुआ है, वहां से जाना किधर है, यह समझ से परे होता जा रहा है। आपने तो कहा था मोदीजी कि – ‘50 दिन दीजिए, सिर्फ 50 दिन। सब ठीक हो जाएगा।’ लेकिन सच्चाई यही है कि सब ठीक होना तो छोडिये, हालात में सिर्फ उम्मीद जगाने लायक ही बदलाव आया है। मगर, उससे भी बड़ी सच्चाई यह है कि कोई भी व्यवस्था सिर्फ एक रात में खड़ी नहीं हो सकती। या इन्फ्रास्ट्रक्चर कोई जादू की छड़ी घुमाने से विकसित नहीं जाता। यह भी देश जानता है। आपमें भरोसा इसीलिए बना हुआ है।

तस्वीर देखिए, सरकार देश की नोटों की मांग पूरी ना कर पाने के लाचारी की हालत से उबरने के लिए कैशलेस हो जाने का राग आलाप रही हैं। लेकिन जिस देश की करीब 30 फीसदी प्रजा को गिनती तक ठीक से लिखनी नहीं आती हो, जहां के 70 फीसदी गांवों में इंटरनेट तो छोड़ दीजिए, बिजली भी हर वक्त परेशान करती हो। उस हिंदुस्तान में कैशलेस के लिए मोबाइल बटुए, ईपेमेंट, पेटीएम और क्रेडिट कार्ड की कोशिश कितनी सार्थक होगी, यह भी एक सवाल है। देश कतार में है, और कतारों से मुक्ति दिलानेवाले का संघर्ष करते दिखनेवाले विपक्षी नेता रैलियों में सरकार पर आरोप जड़े जा रहे हैं। लेकिन देश यह समझ गया है कि 30 दिसंबर के बाद अगर हालात सामान्य होने शुरू नहीं हुए, तो न केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मिशन फेल हो जाएगा, बल्कि देश को उबारने की एक ईमानदार कोशिश भी फेल हो जाएगी।

मगर, देश की ज्यादातर जनता को मोदी में अटल विश्वास है। उसे भरोसा है कि बीजेपी के उदय के बारे में अटल बिहारी वाजपेयी के सूत्रवाक्य ‘अंधेरा छंटेगा, सूरज उगेगा, कमल खिलेगा’ की तर्ज पर ‘यह साल जाएगा, नया साल आएगा, मोदी के सपनों की खुशहाली लाएगा।’ वैसे भी नोटबंदी की सफलता सिर्फ जनता के विश्वास पर ही टिकी है। जनविश्वास की बिसात का बहुत बड़ा मतलब होता है। इसलिए यह सवाल ही बेमतलब हो जाता है कि देश के करोडो मजदूरों के पास अगर काम ही नहीं होगा तो वे जाएंगे कहां? और इस सवाल का भी कोई अर्थ नहीं है कि गरीब के हाथ में काम नहीं है तो क्या आने वाले दिनों में अराजकता का माहौल नहीं बनेगा? फिलहाल तो ऐसा कुछ नहीं लगता। क्योंकि नोटबंदी के मामले में मोदी ने जनता का विश्वास अर्जित कर लिया है। क्योंकि देश मानने लगा है कि मोदी की यह जंग बेईमानी, भ्रष्टाचार और लूट के खिलाफ हैं। यह कोई मजबूरी नहीं है। बल्कि बीते 70 साल की व्यवस्था से उपजी परेशानी के खिलाफ फैसला है। इतने सालो में देश में आमजन भ्रष्टाचार के सामने हथियार डाल चुका है, बेईमानी के सामने घुटने टेक चुका है और व्यवस्था में विकसित हो रहे लोगों की लूट से थक चुका है। भरोसा उसका इसी कारण है। 

तो क्या नोटबंदी को प्रधानमंत्री मोदी का सबसे बडा दांव कहा जाए, जिसे उन्होंने देश के विश्वास की बिसात पर खेला है। यानी देश सचमुच बेईमानी और ईमानदारी के बीच बंट चुका है, जैसा कि राहुल गांधी आरोप लगाते हैं? अगर यह आरोप सही है, तो मोदी बिल्कुल सही राह पर जा रहे हैं। क्योंकि जंग जब बेईमानी और ईमानदारी की ही है, तो जनता सिर्फ ईमानदारी को चुनती है। बात सही है कि नोट बदलने से काली कमाई खत्म नहीं हो जायेगी। और यह भी सही है कि नोटबंदी से लोग बहुत परेशान है। वैसे, अब तक का इतिहास गवाह है कि जंग जब आम आदमी के असल मुद्दे की हो, और वह भले ही सच भी हो, तो भी हर हाल में जीत देश को खोखला बनानेवाली राजनीति की हुई है। मगर, शायद पहली बार राजनीति हार रही है और विश्वास जीत रहा है।

यह भी इतिहास है कि इतने खराब और बहुत हद तक खतरनाक हालात में भी देश ने अपने प्रधानमंत्री पर भरोसा किया है कि उन्होंने नोटबंदी के जरिए जो भी किया है, वह देश के अच्छे के लिए किया है। तस्वीर साफ है कि लालू यादव की सलाह पर मोदी के लिए किसी को चौराहा तलाशने की जरूरत नहीं है। सारी परेशानियों के बावजूद देश भरपूर विश्वास के साथ मोदी के साथ खड़ा है। देश मान रहा है कि 50 दिन आते आते हालात सुधर रहे हैं। तो आगे और सुधरेंगे। वरना, हर तरफ हाहाकार मचाते देश में अब तक तो कभी का गृहयुद्ध सुलग गया होता। इसलिए, राहुल गांधियों, लालू यादवों, मायावतियों, ममता बनर्जियों और अरविंद केजरीवालों को माफ कर दिजिए। चिल्लाने दीजिए। इनकी सुन कौन रहा है। और वैसे भी विपक्ष के पास फिलहाल चिल्लाने के अलावा बचा ही क्या है। नोट तो सारे बैंको में जमा हो गए! 

(लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्लेषक हैं)

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राहुल गांधी की ‘पप्पू’ छवि बनाने वाली भाषण कला के माहिर खिलाड़ी हैं मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने भाषणों में कभी मजाकिया लहजे में तो कभी आक्रामक अंदाज में राहुल गांधी को हमेशा निशाने पर रखते हैं। दरअसल, राहुल गांधी के मामले में अपने भाषणों में मोदी इन दिनों बहुत आक्रामक दिख रहे हैं। मतलब साफ है कि माफ करना उनकी फितरत में नहीं है। और बात जब कांग्रेस और राहुल गांधी की हो, तो वे कुछ ज्यादा ही सख्त हो जाते हैं।

-निरंजन परिहार-

वे मदमस्त अंदाज में मंच पर आते हैं। जनता उनके तेवर ताकती है। वे मंच के तीनों तरफ घूमकर अभिवादन के अंदाज में हाथ हिलाते हैं। लोग अपने आप को धन्य समझने लगते हैं। फिर वे माइक पर जाकर जिस मकसद से आए हैं, उस विषय पर भाषण शुरू करने के चंद मिनट बाद तत्काल ही अपने अगले निशाने का रास्ता अख्तियार कर लेते हैं। तो लोग उन्हें हैरत से देखते हैं। मूल भाषण से मुड़ते ही अब, वे अपने भाषण में सबसे पहले वे कंधे उचकाते हैं। फिर विशेष तरीके से गर्दन हिलाते हैं। और, अंत में मजाकिया लहजे में मुस्कराते हुए दोनों बांहें चढ़ाने का अंदाज दिखाते हुए सवालिया अंदाज में हैरत से जनता की तरफ झांकते हैं। तो साफ लगता है कि वे बिना नाम लिए ही सीधे राहुल गांधी की तरफ जनता को धकेल रहे होते हैं। फिर पब्लिक तो पब्लिक है। वह मन ही मन राहुल गांधी को याद करते हुए, जोरदार हंसी के साथ तालियां बजाकर उनकी खिल्ली उड़ाती नजर आती है।

यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कांग्रेस के सबसे ताकतवर नेता राहुल गांधी पर प्रहार का अपना  अंदाज है। वे अकसर अपनी जनसभाओं में राहुल गांधी को इसी तरह एक नॉन सीरियस राजनेता के रूप में देश के दिलों में लगातार स्थापित करते जा रहे हैं। राहुल जब मोदी पर अपने तीर छोड़ते हैं, तो मोदी राहुल के शब्दों में ही अपने कुछ शब्द और जोड़कर तीर से भी तीखी धार बख्शते हुए राहुल के वार को पूरी कांग्रेस की तरफ उल्टा मोड़कर माहौल को हैरत में डाल देते हैं। तो, सारा देश राहुल गांधी पर फिर हंस पड़ता है। मोदी का यह अजब अंदाज गांव के आदमी को भी मुस्कुराहट देता है। और टीवी के दर्शक को खुशी बख्शता है। इस सबके बीच जो लोग उनके सामने बैठे होते हैं, वे और उनके भक्तगण मोदी के इस अभिनेता अंदाजवाले भाषणों के बीच  जोश के साथ मोदी – मोदी के नारे लगा रहे होते हैं। दुनिया के किसी भी लोकतंत्र का इतिहास उठाकर देख लीजिए, इतना आक्रामक प्रधानमंत्री और लगभग हर किसी के उपहास के पात्र के रूप में गढ़ दिया गया विरोधी पार्टी का नेता कहीं और नहीं मिलेगा।

पिछले कुछ समय के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषणों का आंकलन करें, तो मोदी कुछ ज्यादा ही ताकतवर अंदाज में देश भर में दहाड़ रहे हैं। हालांकि नोटबंदी के बाद राहुल गांधी भी हमलावर अंदाज में हैं। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बिल्कुल निश्चिंत। अपने ज्यादातर भाषणों में प्रधानमंत्री मोदी की कोशिश यही रहती है कि कैसे भी करके देश की जनता में राहुल गांधी सिर्फ और सिर्फ एक नॉन-सीरियस नेता के रूप में ही जाने जाएं। मोदी से पहले देश में कोई प्रधानमंत्री ऐसा नहीं रहा, जिसने अपनी विपक्षी पार्टी के सबसे बड़े नेता को इतने लंबे समय तक इतना ज्यादा निशाने पर रखा हो, जितना वे राहुल गांधी को रखे हुए हैं। राहुल की छवि देश में हल्की बनी रहे, इसके लिए अपने हर भाषण के जरिए मोदी ने यह काम बखूबी किया है। मोदी के गढ़ गुजरात में जब राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री पर भ्रष्‍टाचार का सीधा आरोप लगाया तो बहुत वाजिब था कि पूरे देश को इसके जवाब का इंतजार था। लेकिन मोदी ने सीधे इसका कोई जवाब ही नहीं दिया।

कांग्रेस की सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि उसके नेताओं और लगभग पूरी पार्टी को बेईमानी के साथ जोड़ना मोदी के लिए बहुत आसान खेल है। इसीलिए, मोदी जब 70 साल की बात करते हैं, तो बिना नाम लिए ही देश का मन सीधे कांग्रेस की तरफ चला जाता है। लेकिन राहुल गांधी कोशिश करते भी हैं, और बीजेपी को भ्रष्ट पार्टी बताते हैं, तो कोई गंभीरता से नहीं लेता। मुंबई से लेकर बनारस, और पुणे से लेकर …….. हर शहर के मोदी के भाषण देख लीजिए, वे अपने भाषणों में अपने संस्‍कारों को ईमानदारी से जोड़ते हुए नोटबंदी का विरोध करने वालों के संस्‍कारों को बेइमानी से जुड़ा बताते हैं, तो हर कोई कांग्रेस को दिमाग में रखकर राहुल गांधी पर अविश्वास करने लगता है। तभी अगले ही पल, जब मोदी गरजते हैं – ‘मैं कभी सोच भी नहीं सकता था कि कुछ नेता और कुछ दल इतनी हिम्‍मत के साथ बेइमानों के साथ खड़े हो जाएंगे…’, तो मोदी कांग्रेस को बहुत सरलता के साथ बेइमानी से जोड़ देते हैं। वे अपने हर भाषण में कांग्रेस को घनघोर बेईमान साबित करने से नहीं चूकते।

हाल ही में बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी बुद्धिजीवियों के एक कार्यक्रम में मोदी नोटबंदी से शुरुआत करके सीधे सफाई अभियान की तरफ पहुंच गए। बोले – ‘देश में इन दिनों एक बड़ा सफाई अभियान चल रहा है…!’ सिर्फ इतना सा बोलकर चुप्पी के साथ वे थोड़ी देर हैरत से लोगों को देखते हैं। उनकी यह चुप्पी लोगों को ताली बजाने और मुस्‍कुराने का अवसर देती है। कांग्रेसी भले ही मानते हों कि भाषण कला के इस जादुई खेल की कलाबाजियों की कसावट राहुल गांधी भी सीख ही लेंगे, लेकिन अपन इसमें भरोसा नहीं करते। इससे पहले की एक सभा में लोग इंतजार करते रहे, लेकिन मोदी ने लोगों की उम्‍मीद के विपरीत राहुल गांधी पर सबसे आखिरी में निशाना साधा। मोदी सिर्फ इतना कहकर कुछ सैकंड के लिए रुक जाते हैं कि – ‘उनके एक युवा नेता हैं…!’ और पूरी सभा में हंसी फूट पड़ती है। मोदी पहले दुनिया को राहुल गांधी पर हंसने का मौका देते हैं। इसके बाद वे बोलते हैं – ‘वे अभी बोलना सीख रहे हैं।’ मोदी को पूरा अंदाजा रहता है कि उनके मुंह से राहुल गांधी का जरा सा जिक्र भी लोगों को बहुत आनंद देता हैं। वे अपने श्रोताओं को आनंद में गोते लगाने देने का मौका कहीं भी नहीं छोड़ते।

मोदी अपने भाषणों में भले ही कांग्रेस पर प्रहार करें, या राहुल गांधी पर, लेकिन वे स्थानीय मुद्दों से खुद को जोड़ने में देर नहीं लगाते। पुणे में मेट्रो की शुरूआत के मौके पर नोटबंदी की परेशानी में उलझे लोगों के बीच उन्होंने कहा कि शरद पवार के लिए मेरे मन में बहुत सम्मान है, तो तो लोग खुश हो उठे। इसी तरह बनारस में ‘हर-हर महादेव’ का घोष करते हुए मोदी कहते हैं कि भोले बाबा की धरती से गंदगी साफ करने की ताकत मिली है, तो लोग अपनी माटी की महक में खो जाते हैं। हाल ही में एक सभा में तो मोदी ने लोकसभा नहीं चलने देने के लिए विरोधियों के गठजोड़ को जेबकतरों की जमात के रूप में घोषित कर डाला। अब तक का सबसे तीखा हमला करते हुए मोदी बोले – ‘जेबकतरे जिस तरह से लोगों की जेब साफ करने के लिए आपसी तालमेल करके लोगों का ध्यान भंग करते हैं, उसी तरह विपक्ष सरकार का ध्‍यान दूसरी ओर खींच रहा है। ताकि काला कारोबार करने वाले अपना माल आसानी से ठिकाने लगा लें।’

भाषण कला के मंजे हुए खिलाड़ी मोदी अपने संबोधनों में जनता के सामने अकसर वो मिसालें देते हैं, जिससे देश बहुत नफरत करता है। इस कोशिश में वे कांग्रेस को पाकिस्तान की बराबरी में खड़ा करने से भी नहीं चूकते। नोटबंदी के मामले में कांग्रेस के आरोपों को मोदी अपने भाषणों में सीमा पर घुसपैठियों को फायदा पहुंचाने के लिए की जाने वाली पाकिस्तान की कवर फायरिंग से जोड़ते हैं। मोदी कहते हैं कि नोटबंदी का विरोध करके कांग्रेस बेईमान लोगों का समर्थन कर रही है। दरअसल, मोदी यह अच्छी तरह जानते हैं कि नोटबंदी की सारी सफलता सिर्फ जनता की भावना से जुड़ी है। अगर लोग संतुष्‍ट रहेंगे, तभी उनका जलवा बरकरार रहेगा। सो, मुंबई में बीकेसी की सभा में वे लोगों के घंटों कतार में खड़े रहने की तकलीफ जानने की बात कहते हैं। फिर अगले ही पल, कालाधन रखनेवालों को धमकाते हुए कहते हैं – ‘ये सीधे सादे लोग तुम लोगों की वजह से कतार में परेशान हो रहे हैं। तुमको इसका भुगतान करना पड़ेगा।’ तो, लोग कतार में खड़े रहने के अपने दर्द को भूलकर खुशी में फिर ‘मोदी – मोदी’ के नारे लगाने लगते हैं। उसके तत्काल बाद बेईमानों की बरबादी के समय के प्रारंभ होने की बात कहते हुए मोदी जब बिना किसी का नाम लिए 70 साल तक मलाई खाने की बात करते हैं, तो फिर लोग इसे कांग्रेस पर प्रहार मानकर मजे से ‘मोदी – मोदी’ के नारे में झूम उठते हैं।

कोई पांच साल हो रहे हैं। देश के हर प्रदेश के हर शहर की हर सभा में करीब करीब ऐसा ही होता रहा है। प्रधानमंत्री जैसे बहुत ताकतवर पद पर आने की प्रक्रिया में समाहित होने से पहले गुजरात के अपने मुख्यमंत्री काल से ही मोदी ऐसा करते रहें हैं। याद कीजिए, जब सारे लोग राहुल गांधी को युवराज कहते थे, उस जमाने में भी मोदी शहजादा कह कर लोगों के बीच राहुल गांधी की नई शक्ल गढ़ रहे थे। तब से ही मोदी देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के इस सबसे चमकदार नेता को लगातार निशाने पर रखे हुए हैं। देश मोदी को लगातार ध्यान से सुन भी रहा है और उन पर भरोसा भी कर रहा है। वैसे, भाषण के मामले में मोदी को अटल बिहारी वाजपेयी की बराबरी खड़ा कर देनेवालों की संख्या भी हमारे देश में कम नहीं है। लेकिन यह बात खुद मोदी भी मानते हैं कि अटलजी की तरह उनके भाषण में न तो समा बांधने वाली ताल है और न ही लोगों को भावविभोर कर देनेवाली लयबध्दता। मगर, गैर हिंदी भाषी होने के बावजूद मोदी ने खुद को जिस आला दर्जे के वक्ता के रूप में दुनिया के दिलों में खुद को स्थापित किया है, वह अपने आप में बहुत अदभुत और अदम्य है। इसलिए किसी को भी यह मानने में कोई ऐतराज नहीं होना चाहिए कि हमारे देश के ज्ञात इतिहास में अटलजी के बाद सबसे लोकप्रिय वक्ता के रूप में अगर कोई हमारे सामने है, तो वह सिर्फ नरेंद्र मोदी ही है। भले ही वे भाषण देते वक्त कांग्रेस और खासकर राहुल गांधी के मामले में न केवल अत्यंत आक्रामक बल्कि बहुत क्रूर होने की हद तक चले जाते हैं। देखा जाए तो, मोदी को इस क्रूर अंदाज में लाने का श्रेय भी कांग्रेस और खासकर राहुल गांधी और उनकी माता सोनिया गांधी को ही जाता है, जिन्होंने मोदी को ‘लाशों का सौदागर’ से लेकर ‘शहीदों के खून का दलाल’… और न जाने क्या क्या कहा। फिर वैसे देखा जाए, तो लोकतंत्र में अपनी ताकत को ज्यादा लंबे वक्त तक जमाए रखने के लिए कुछ हद तक क्रूर और अत्यंत आक्रामक होना भी आज मोदी की सबसे पहली जरूरत है।

वैसे, मोदी के अंदाज देखकर राहुल गांधी को अब तक यह समझ में आ जाना चाहिए था कि भाषण देना भी कुल मिलाकर सिर्फ और सिर्फ एक कला है। और यह भी समझ में आ जाना चाहिए था कि अपने भाषण में धारदार शब्दों के जरिए ही विरोधी को कटघरे में खड़ा करके उसकी छवि का मनचाहा निर्माण किया जाता है। मोदी इस कला के माहिर खिलाड़ी हैं और राहुल गांधी की ‘पप्पू’ छवि को वे इतना मजबूत कर चुके हैं कि उससे पीछा छुड़ाना पूरी कांग्रेस के लिए भी कोई बहुत आसान काम नहीं है। कांग्रेस को यह भी मान लेना चाहिए कि मोदी जैसी भाषण देने की कला में पारंगत होना राहुल गांधी के बस की बात ही नहीं है। ज्यादा साफ साफ कहें तो कम से कम मोदी की तरह भाषण देने में पारंगत होने के लिए तो राहुल गांधी को नय़ा जनम लेना पड़ेगा। वैसे भी राहुल खुद स्वीकार कर चुके हैं कि राजनीति जहर है। और दुनिया तो खैर, यहां तक भी कहती है कि राजनीति राहुल गांधी के बस की बात है ही नहीं। आप भी कुछ कुछ ऐसा ही मानते होंगे!

लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं. संपर्क- 09821226894

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तो अब प्रियंका गांधी के सहारे राहुल मजबूत होंगे?

कांग्रेस अब बदलाव की तैयारी में है। अपने 131वें स्थापना दिवस से पहले कांग्रेस प्रियंका गांदी को पार्टी में पद पर लाकर राहुल गांधी को मजबूत करने की कोशिश कर सकती है। इससे पार्टी से युवा तो जुडेंगे ही, महिलाएं भी मजबूती से जुड़ेगी। जो, कि बीते दस साल में पार्टी से दूर होते गए हैं। मगर, ऐसा नहीं हुआ, तो फिर कांग्रेस की दशा और दिशा किधर जा रही होगी, यह सबसे बड़ा सवाल है। मतलब साफ है कि नियुक्ति करे तो भी और नहीं करे तो भी, कांग्रेस फिलहाल सवालों के घेरे में है। वैसे, राजनीति अपने आप में एक सवाल के अलावा और है ही क्या?

निरंजन परिहार

कांग्रेस के भीतर अगर सब कुछ ठीक ठाक रहा और देश की राजनीति ने कोई बहुत बड़ी करवट नहीं ली, तो आनेवाले साल से पहले, मतलब 31 दिसंबर 2016 से पहले राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष और प्रियंका गांधी पार्टी की महासचिव होगी। सोनिया गांधी ने इसके लिए अपनी हामी दे दी है और अब सिर्फ वक्त का इंतजार है। नोटबंदी के बाद राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता की परख हो चुकी है और पार्टी के भीतर जो हालात हैं, उनको देखकर साफ लगने लगा है कि राहुल और प्रियंका के सामूहिक नेतृत्व में ही कांग्रेस को आसानी से आगे बढ़ाया जा सकता है। जो नेता कांग्रेस की नीतियां तय करते हैं, उनमें से एक वरिष्ठतम नेता की मानें, तो पार्टी ने इसकी मानसिक तैयारी कर ली है। बहुत संभव है कि सोमवार यानी 26 दिसंबर के बाद इस बारे में कभी भी अधिकारिक ऐलान किया जा सकता है। यह भी हो सकता है कि राहुल गांधी फिलहाल उपाध्यक्ष के रूप में ही अध्यक्ष के सारे अधिकारों का उपयोग करने के लिए अधिकृत कर दिए जाएं और सोनिया गांधी पार्टी की सर्वेसर्वा बनी रहे। 28 दिसंबर को कांग्रेस का स्थापना दिवस है और बहुत संभव है, उसी दिन कांग्रेस देश को यह नई खबर दे दे। 

दरअसल, कांग्रेस की कमान पूरी तरह राहुल और प्रियंका के हाथ सोंपने की मंशा के पीछे पार्टी की मान्यता यह है कि कांग्रेस को इससे बहुत बड़ा फायदा होगा। सबसे पहली बात तो, युवा मतदाता, जो कि पिछले एक दशक में पार्टी से दूर हो चुका है, वह कांग्रेस से फिर से जुड़ेगा। और इससे भी बड़ा फायदा होगा, प्रियंका गांधी के पार्टी में ताकतवर होने से। माना जा रहा है कि प्रियंका के पार्टी में पद पर आने से महिलाओं को जोड़ने का जो काम सोनिया गांधी अब तक नहीं कर सकीं, वह काम बहुत आसानी से हो सकता है। प्रियंका की युवा वर्ग में तो अपील है ही, महिलाएं भी बड़ी संख्या में उन्हें पसंद करती है, जो कि कांग्रेस से फिर से जुड़ेंगी। दरअसल, इंदिरा गांधी के बाद महिलाओं को अपने से जोड़ने के काम में कांग्रेस कभी बहुत सफल नहीं रही। लेकिन वह काम प्रियंका के जरिए आसानी से हो सकता है, क्योंकि देश की जनता उनमें इंदिरा गांधी की छवि देखती है। पार्टी का एक धड़ा नता है कि राहुल गांधी को अभी भी नेतृत्व की अपनी योग्यता को साबित करना बाकी है। मगर, प्रियंका गांधी के पार्टी में पद पर आने के बाद यह काम आसानी से हो सकता है, क्योंकि तब राहुल गांधी अकेले नहीं होंगे। इस पूरी प्रकिया में, जहां तक सोनिया गांधी का सवाल है, उन्हीं के मार्गदर्शन में राहुल और प्रियंका पार्टी को नई दिशा देंगे। 

कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता की मानें, तो प्रियंका गांधी को पार्टी का महासचिव नियुक्त किए जाने के बारे में फैसला लगभग हो चुका है। दिल्ली के 10 जनपथ की दीवारों के दायरों का हाल जाननेवाले एक वरिष्ठ नेता की राय में देश के वर्तमान राजनीतिक हालात में कांग्रेस की हालत देखकर खुद प्रियंका गांधी भी पार्टी में अपनी नई भूमिका के लिए मन बना चुकी है। वैसे, इससे पहले भी प्रियंका को कांग्रेस  संगठन में बड़ी जिम्मेदारी देने की पेशकश तीन बार की गईं थी। लेकिन हर बार वे इसे टालती रहीं। और, राजनीतिक रूप से सक्रिय रहने के लिए प्रियंका गांधी सोनिया गांधी के चुनाव क्षेत्र रायबरेली और राहुल गांधी की संसदीय सीट अमेठी तक ही खुद को सीमित रखे हुए रहीं। मगर, हाल ही में पंजाब और यूपी चुनाव में प्रचार के लिए प्रियंका के जिम्मेदारी लेने की हामी भरते ही कांग्रेस को लगा कि उन्हें पार्टी में पद पर आने का फिर से प्रस्ताव दिया जाना चाहिए। बदली हुई राजनीतिक परिस्थितियों में प्रियंका को भी लगने लगा है कि उनको कोई तो फैसला घोषित करना ही पड़ेगा। इसीलिए उत्तरप्रदेश, पंजाब, गोवा और फिर गुजरात जैसे महत्वपूर्ण राज्यों में विधानसभा चुनाव से पहले उन्हें कोई फसला लेना ही होगा। यह सही अवसर है और खबर है कि सोनिया गांधी ने खुद उन्हें मनाया है। 

राहुल गांधी की उपाध्यक्ष से पदोन्नति के बारे में अंदर की खबर यह है कि फिलहाल उन्हें पार्टी अध्यक्ष के तौर पर पदोन्नति देने के मामले में कांग्रेस में मतभेद है। पार्टी नेताओं का एक बड़ा धड़ा यह मानता है कि 131 साल पुरानी किसी पार्टी के सर्वेसर्वा के रूप में विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्रिक राष्ट्र में जो नेतृत्व परिपक्वता किसी नेता में होनी चाहिए, वह राहुल गांधी में हैं तो सही, लेकिन अब तक उभर कर सामने नहीं आ पाई है। इसलिए फिलहाल अध्यक्ष पद तो सोनिया गांधी ही सम्हाले। लेकिन पार्टी में युवा वर्ग के नेता मानते हैं कि राहुल गांधी सफलतम अध्यक्ष साबित होंगे। उनके अध्यक्ष बनने से देश का युवा वर्ग पार्टी से जुड़ेगा। महिलाओं का मामला प्रियंका गांधी सम्हाल ही लेंगी। सो, सहारा भी मिल जाएगा।   

आनेवाली 28 दिसंबर को कांग्रेस की स्थापना के 131 साल पूरे हो रहे हैं। देश भर में हर गां इकाई तक कांग्रेस का उत्सव मनेगा और पार्टी नए सिरे से नई ताकत के साथ देश भर में अपना बिगुल फूंकेगी। लेकिन कांग्रेस के नेतृत्व की तस्वीर में अगर कुछ भी नहीं बदला, तो इस उत्सव का कोई असर नहीं होगा। इसीलिए तस्वीर में ये दो नए फोटो फिट करने के बारे में निर्णय हुआ माना जा रहा है। खबर है कि 28 दिसंबर से पहले राहुल गांधी और प्रियंका गांधी दोनों की ही नियुक्तियों का ऐलान किया जा सकता है। उम्मीद की जानी चाहिए कि 131 साल बाद कांग्रेस फिर से नई उर्जा से समाहित होकर मैदान में उतरेगी। हर पार्टी खुद को मजबूत करने और लंबे चलने के लिए जो कोशिशें करती है, वहीं कांग्रेस भी कर रही है। तस्वीर साफ है कि प्रियंका को साथ लाकर राहुल को मजबूत करने की यह कोशिश है। लेकिन यह भी तय है कि ऐसा हुआ, तो कांग्रेस और कांग्रेसियों पर एक बार फिर वंशवाद को नमन करने के आरोप भी लगेंगे, जिनका किसी भी स्तर पर जवाब देना किसी के लिए भी कोई आसान खेल नहीं होगा ! और अगर बिना नियुक्ति हुए कांग्रेस में सब कुछ वैसा ही चलता रहा, जैसा कि फिलहाल चल रहा है, तो पार्टी का विकास कैसे होगा, युवा कैसे जुड़ेंगे, महिलाएं कैसे कांग्रेस के नजदीक आएंगी और संगठन की तस्वीर कैसे बदलेगी, ये सबसे बड़े सवाल हैं !

निरंजन परिहार
राजनीतिक विश्लेषक
niranjanparihar@gmail.com
09821226894

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तो क्या राहुल गांधी ठिकाने लगा देंगे वरिष्ठ नेताओं को?

-निरंजन परिहार-
कांग्रेस के बड़े नेता भीतर ही भीतर भुनभुना रहे हैं। ये सब मान रहे है कि नोटबंदी के बाद राहुल गांधी की राजनीति तो चमकी हैं, लेकिन उन्हें यह भी लगने लगा है कि जल्दबाजी में राहुल गांधी नई आफत भी मोल लेते जा रहे हैं। कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेता राहुल के ताजा राजनीतिक रवैये से खुश नहीं हैं। मजबूरी यह है कि वे नाराजगी जाहिर नहीं नहीं सकते। अगर कर दें, तो राहुल गांधी तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरुद्ध भूचाल भले ही नहीं ला पाए, मगर राहुल के विरुद्ध पार्टी में भूकंप जरूर आ जाएगा। माना जा रहा है कि सही समय पर ये वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी से इस मामले पर बात करेंगे। ये सारे पार्टी के बड़े नेता हैं, सो बाहर बोलें भी, तो बोलें कैसे। क्योंकि उनका यह आचरण पार्टी लाइन के विरुद्ध काम होगा।

बड़े लोग वैसे भी मामले संभालने के लिए होते हैं, बिगाड़ने के लिए नहीं। उनका मानना है कि राहुल गांधी के रणनीतिकार जो सलाह दे रहे हैं, वह तात्कालिक रूप से भले ही पब्लिसिटी दिलाने में सफल रही हो। लेकिन लंबी दूरी की रणनीति में राहुल का यह रोल कारगार साबित नहीं होगी और पार्टी को फायदे के बजाय नुकसान ही होगा। इसी कारण कांग्रेस के ये बड़े नेता मन ही मन नाराज से दिख रहे हैं। पार्टी की नई टीम के कुछ लोग इसे, राहुल गांधी द्वारा वरिष्ठ नेताओं के बजाय नई पीढ़ी को ज्यादा तवज्जोह देने से जोड़कर देख रहे हैं। वैसे यह घोषित तथ्य है कि राहुल गांधी नई पीढ़ी के नेताओं को लगातार मजबूत करते जा रहे हैं और उनके मुकाबले पुराने नेताओं को कोई बहुत भाव नहीं दे रहे हैं।  

तस्वीर साफ है कि कांग्रेस उपाध्यक्ष के रूप में राहुल गांधी कांग्रेस के सारे फैसले लेने शुरू कर दिए हैं। अधिकारिक रूप से भले ही राहुल गांधी अध्यक्ष पद पर नहीं है, फिर भी अध्यक्ष सोनिया गांधी की तरफ से उन्हें एक तरह से हर तरह के फैसले के लिए फ्री हेंड मिला हुआ है। पंजाब में अमरिंदर सिंह को आगे करने से लेकर उत्तर प्रदेश में राज बब्बर को ताकत बख्शने और समाजवादी पार्टी से दोस्ती का हाथ बढ़ाने जैसे सारे फेसले राहुल गांधी के अपने फैसले हैं। लेकिन हाल ही में संसद में प्रधानमंत्री से मिलने जाने के फैसले में राहुल गांधी से चूक हो गई, ऐसा माना जा रहा है। पार्टी के पुराने और वरिष्ठ नेताओं की राय में प्रधानमंत्री से अकेले कांग्रेस को नहीं मिलना चाहिए था। क्योंकि इससे विपक्ष की एकता तो आघात पहुंचा है। इसके साथ ही राहुल गांधी ने मोदी के खिलाफ जो भूचाल लानेवाले सबूत पेश करने की बात कही थी। कहा था कि उनके पास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निजी भ्रष्टाचार के सबूत हैं। लेकिन उसके बाद राहुल ने चुप्पी साध ली। दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल जैसों को भी इसी कारण कांग्रेस पर प्रहार का मौका मिल गया। केजरीवाल ने खुला चैलेंज देते हुए साफ साफ कहा कि राहुल गांधी ने मोदी से डील की है। केजरीवाल ने पूछा कि राहुल गांधी प्रधानमंत्री से मिले थे और उसके तत्काल बाद राजनीतिक दलों को पुराने नोट बिना टैक्स और बिना जुर्माने के बैंकों में जमा कराने के फैसले की घोषणा की गई। केजरीवाल ने कहा कि राहुल गांधी इस डील का खुलासा करें। इससे पहले राहुल भ्रष्टाचार को लेकर मोदी पर बराबर आरोप लगा रहे थे। लेकिन उन्होंने इन आरोपों को सार्वजनिक नहीं किया। कांग्रेस के बड़े नेताओं का मानना है कि इससे कांग्रेस की मजबूत छवि को आघात पहुंचा है।

कांग्रेस के इन सीनियर नेताओं की राय में नोटबंदी पर राहुल गांधी शुरू शुरू में सही जा रहे थे। लेकिन अगर उनको वास्तव में कुछ कहना और करना ही था, तो उन्हें संसद में आखिर के दो दिनों में सदन के भीतर कुछ कर लेना चाहिए था। लेकिन उन्होंने सिर्फ पीएम का गुब्बारा फटने और भूकंप आने की बात कहने के बावजूद कुछ नहीं कहा। जिससे सारा गुड़ गोबर हो गया। इन नेताओं का राय में अब संसद का सत्र समाप्त हो चुका है, तो कोई बात नहीं। राहुल गांधी प्रधानमंत्री मोदी के बारे में जो कुछ कहना चाहते थे, वह उनको प्रेस कॉन्फ्रेंस करके देश के सामने कह देना चाहिए। इन नेताओं की चिंता यह है कि अगर ऐसा नहीं हुआ, तो देश राहुल गांधी को बहुत हल्के में लेगा। और सरकार में बैठे लोग और बीजेपी कहेगी कि भूकंप लानेवालों और गुब्बारे की हवा निकालनेवालों की खुद ही हवा मिकल गई। ऐसे में, जितना समय निकलता जाएगा, उतना ही राहुल की व्यक्तिगत छवि पर असर पड़ता जाएगा। ये नेता राहुल गांधी के बैंक की लाइन में लगने को भी ठीक नहीं मानते। इनकी राय में अगर राहुल गांधी का यह कदम सही होता, तो देश के बाकी बहुत सारे बड़े नेता भी उनका अनुसरण करते। लेकिन कोई बैंक की कतार में नहीं लगा। जनता भी मोदी सरकार के खिलाफ खुलकर सामने नहीं आई। 

 

कुल मिलाकर राहुल गांधी की लीडरशिप के मजबूत होने के बावजूद पार्टी के भीतर सब कुछ ठीक ठाक नहीं है। राहुल गांधी से सीधे पंगा मोल लेने की इन नेताओं की हिम्मत नहीं है। लेकिन नई पीढ़ी के नेताओं से घिरे राहुल गांधी के आहत नेताओं की ये मंडली कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी तक अपनी भावना पहुंचा चुकी हैं। अब वे इस इंतजार में है कि सोनिया गांधी से कहें। हालांकि अपना मानना है कि कांग्रेस के बड़े नेता अकसर तभी पार्टी से ज्यादा प्रेम जताने लगते हैं, जब उन्हें कोई नहीं पूछता। राजनीतिक विश्लेषकों की राय में  राहुल गांधी की काम करने की शैली से नाराज ये नेता इस तथ्य से अच्छी तरह वाकिफ हैं कि सोनिया गांधी उनकी बात सुन भी लेंगी, तो भी होगा तो वहीं, जो राहुल गांधी चाहेंगे। लेकिन ऐसा करने से वे पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी के समक्ष पार्टी के बारे में चिंता करनेवाले एवं राहुल गांधी के राजनीतिक कदमों की समीक्षा करनेवाले के रूप में तो जगह बना ही लेंगे। बात जो भी हो, लेकिन संकेत साफ है कि कांग्रेस में चाहे कोई कितना भी नाराज हो, राहुल गांधी को अब किसी की कोई खास परवाह नहीं है। उनसे निपटना और उन्हें निपटाना राहुल गांधी को अच्छी तरह आता है। क्योंकि राहुल गांधी यह भी जान गए हैं कि कांग्रेस में गुटबाजी से निपटने और गुटबाजी पैदा करनेवालों को निपटाने के लिए उन्हें कोई बहुत दिक्कत नहीं आएगी। भरोसा नहीं हो तो, देखते रहिए, कुछ ही दिन की तो बात है। राहुल गांधी पर भुनभुनानेवाले ये नेता आनेवाले दिनों में ठिकाने लग चुके नजर न आएं, तो कहना।

(लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्लेषक हैं)

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तकदीर के तिराहे पर नवजोत सिंह सिद्धू : …क्योंकि राजनीति कोई चुटकला नहीं है

-निरंजन परिहार-

वे क्रिकेटर हैं। राजनेता हैं। कमेंटेंटर हैं। कवि हैं। समां बांधनेवाले वक्ता है। दिखने में सुदर्शन हैं। टीवी एंकर भी हैं। और कलाकार तो वे हैं ही। एक आदमी सिर्फ एक ही जनम में आखिर जो कुछ हो सकता है, नवजोत सिंह सिद्धू उससे कहीं ज्यादा हैं। उनको बहुत नजदीक से जानने वालों को यह कहने का हक है कि जीवन में वे अब अगर और कुछ भी नहीं कर पाए, तो भी उनका चुटीला कविताई अंदाज उन्हें बेराजगारी से तो बचा ही लेगा। लेकिन फिर भी पता नहीं सिद्धू के बारे में ऐसा क्यों लग रहा है कि भस्मासुर के कलयुगी अवतार में आने की वजह से वे जीते जी मोक्ष को प्राप्त होनेवाले हैं। पंद्रह साल के राजनीतिक जीवन में पहली बार नवजोत सिंह सिद्धू को राजनीति के मैदान में अपने खडे होने लायक जगह तलाशनी पड़ रही है।

सिद्धू  पहले क्रिकेट में एक बार जीरो पर आउट हुए थे, अब राजनीति में उनका वही हाल होता दिख रहा है। सार्वजनिक जीवन में ही नहीं, निजी जीवन में भी सिद्धू वक्त न गंवानेवाले व्यक्ति के रूप में मशहूर हैं। लेकिन सन 1990 में जीरो पर आउट होने की बात पर कपिल शर्मा के कॉमेड़ी शो में रह रहकर मजाक का केंद्र बननेवाले इस सरदार के बारे फिलहाल तो यही लग रहा है कि जीवन की सफलताओं के सारे मुकाम पार करने के बावजूद राजनीति में अब वे ऐसे मुकाम पर हैं, जहां पर आकर उनका खराब वक्त आ रहा है या इसे यूं भी समझा जा सकता है कि उनका वक्त खराब हो रहा है।

अपने राजनीतिक जीवन के अस्तित्व की जिस सबसे महत्वपूर्ण जंग के लिए नवजोत सिंह सिद्धू अपनी ‘मां’ बीजेपी का घर छोड़कर बाहर निकले, हैं, उसका तो सारा आधार ही पंजाब की गरिमा से जुड़ा है। उनके राजनीतिक मोर्चे का नाम तक ‘आवाज-ए-पंजाब’ है। लेकिन फिर भी मशहूर दिवंगत लेखक सरदार खुशवंत सिंह ने कुछ साल पहले पता नहीं क्यों अपने एक लेख में नवजोत सिंह सिद्धू को बाकायदा ‘जोकर’ बताते हुए सिख सम्प्रदाय की महिमा को कम करने वाला बता दिया था। यह अपनी समझ से परे हैं। लेकिन ताजा तस्वीर यह है कि बदले हुए राजनीतिक हालात में सिद्धू और उनके राजनीतिक चेले और बाकी साथी आगे बढ़ने की कोई एक लाइन पर नहीं सोच पा रहे हैं। क्रिकेट की भाषा में कहे, तो सिद्धू नई ओपनिंग नहीं कर पा रहे हैं। उनका अकेले चुनाव मैदान में उतरना मुश्किल मामला है। सो, कांग्रेस तो बहुत बाद में पिक्चर में आई, उससे भी बहुत पहले वे केजरीवाल की पार्टी से प्रेमालाप कर रहे थे।

लेकिन मामला जब टूटता दिखा, तो वे कांग्रेस की तरफ बढ़े। कांग्रेस ने लचकाया और अमरिंदर सिंह ने भाव नहीं दिया, तो फिर से आम आदमी पार्टी में आस दिखने लगी। बीचे मेंफिर एक बार दिल्ली दरबार में कांग्रेस ने उन्हें आस दिखाई। लेकिन नवजोत सिंह सिद्धू की संयोग से हमनाम पत्नी नवजोत कौर सिद्धू केजरीवाल की आम आदमी पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ना चाहती हैं। नवजोत कौर बीजेपी की विधायक रही हैं और पंजाब सरकार में मंत्री भी। उनके दूसरे साथी वहीं हॉकी टीम के कैप्टन रहे परगट सिंह कांग्रेस की राह पकड़ना चाहते हैं। वे कांग्रेस के कैप्टन अमरिंदर सिंह से  लेकर कई बड़े नेताओं से मिलकर बात भी कर चुके हैं। लेकिन सिद्धू हैं कि कांग्रेस टीम में शामिल होने के बजाय उससे गठबंधन करने की राह पर चलना चाहते हैं। न इधर, न उधर, तस्वीर कहीं भी साफ नहीं है।

आप जब यह पढ़ रहे होंगे, तब तक सिद्धू अकेले होंगे, या फिर कहां किसके साथ, कैसे और कहां खड़े होंगे, यह आपको साफ दिख रहा होगा। लेकिन क्रिकेट के पुराने वीडियो फुटेज देखें, तो नवजोत सिंह सिद्धू कभी टीम इंडिया के चमकदार सितारे हुआ करते थे। क्रिकेट के खेल में उनकी सफलता ने सिद्धू की दीन – दुनिया ही बदल गई। वे जब जीतकर लौटते थे, तो हर बार उनका अभिनंदन बहुत शानदार तरीके से होता रहा है। उस स्वागत की शान ऐसी हुआ करती थी, वैसी तो कारगिल के विजेताओं की भी पंजाब ने नहीं देखी।

वे क्रिकेट के खेल से ही करोड़पति बने और कॉमेडी के जरिए बने किंग। लेकिन क्योंकि राजनीति न तो क्रिकेट का खेल है और न ही कोई कॉमेड़ी शो। इसलिए राजनीति में आकर वे भरपूर सफल भी हुए और घनघोर असफल भी यहीं से होते लग रहे हैं। राजनीति के आईने में गुरू का गेम बिगड़ता दिख रहा है। क्योंकि कांग्रेस उनके मामले में अपने रुख पर अड़ी है और केजरीवाल उन्हें भाव ही नहीं दे रहे है। और बीजेपी से वे रिश्ता पहले ही इतने खराब तरीके से तोड़ चुके हैं कि वापसी की संभावनाएं लगभग क्षीण हैं। राजनीति में उनकी इस हालत पर सिर्फ यही कहा जा सकता हैं कि नवजोत सिंह सिद्धू तकदीर के तिराहे पर खड़े हैं। जहां से आगे का हर रास्ता उनके लिए पहले से ज्यादा खराब, खतरनाक और बहुत ऊबड़ खाबड़ है।   

पंजाब के पटियाला जिले में जन्मे नवजोत सिंह सिद्धू सिख हैं, और उनके कट्टर शाकाहारी होने के कारण जितने लोग उन्हें पंजाब में पसंद करते हैं, उससे भी ज्यादा उन्हें किसी भी अन्य सिख के मुकाबले देश में ज्यादा पसंद करता है। सन 1983 से लेकर 1999 तक वे टीम इंडिया में क्रिकेट खेलते थे। और क्रिकेट से संन्यास लेने के बाद बीजेपी के टिकट पर लोकसभा 2004 में अमृतसर से लोकसभा के लिए पहली बार चुने गये। सांसद के रूप में तो सिद्धू ने ऐसा कुछ भी नहीं किया, जिसे देश याद रख सके। लेकिन उनकी तुकबंदियों के मिसरे और चुटकलों के चुटिले अंदाज ने देश को उनका दीवाना जरूर बना दिया। हालांकि वे राजनीति करते हुए जितने चर्चित रहे, उससे ज्यादा उनकी चर्चा एक व्यक्ति की गैर इरादतन हत्या के लिए मिली तीन साल की सजा को लेकर होती है।

इस केस के बाद उन्होंने लोकसभा की सदस्यता से त्यागपत्र देकर उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर की। जहां निचली अदालत के सजा के फैसले पर रोक लगने के बादउन्होंने 2007 में फिर उसी सीट से चुनाव लड़ा और कांग्रेस को करीब 75 हजार से भी ज्यादा  वोट  से हराया। इसके बाद वे 2009 में एक बार वहीं से फिर बीजेपी के सांसद बने। और 2014 में उन्हें लोकसभा का टिकट न देकर बीजेपी ने 2016 में उन्हें राज्यसभा के लिए मनोनीत किया। लेकिन कुछ दिन के बाद वे इस्तीफा देकर घर आ गए।

कुल मिलाकर चार बार, तीन बार लोकसभा टिकट पर और चौथी बार राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत सांसद के रूप में राजनीति में अपना सिक्का जमानेवाले बड़बोले सिद्दू ने सबसे पहले सम्मान के साथ मिली मिलाई राज्यसभा की सदस्यता छोड़ी। फिर जिस बीजेपी को वे कभी ‘मां’ कहते थे, उस ‘मां’ से भी दामन छुड़ा लिया। लेकिन मातृत्व के रिश्ते को तजने के बाद अब नवजोत सिंह सिद्धू अब असमंजस में हैं। न तो उनके कदम सही पड़ रहे है और न ही उनका राजनीतिक गणित सफल होता दिख रहा है। लेकिन राजनीति में कहते हैं कि जो दिखता है, वह होता नहीं। मगर सिद्धू के साथ तो यही हो रहा है।  सिद्धू के अब तक के राजनीतिक कदमों की तासीर पढ़े, तो स्पष्ट तौर पर यही लगता है कि वे राजनीति की गहराई और उथलेपन की असलियत को अब तक सहज स्वरूप में नहीं समझ पाए हैं। संभवतया वे इसी कारण फैसला नहीं कर पा रहे हैं कि जाना किधर है। कभी कोई दरवाजा खुलता सा दिखता है, तो उससे पहले ही वह बंद होता भी दिखता है। चुनाव सर पर हैं और वक्त बिता जा रहा है। ईश्वर करे, वे सफल हों, लेकिन फिलहाल तो यही लग रहा है कि सिद्धू की जिंदगी का सबसे खराब राजनीतिक समय उनके दरवाजे पर खड़ा है और वे खुद तकदीर के तिराहे पर। आपको भी ऐसा ही लगता होगा।

लेखक Niranjan Parihar राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं. Contact- Ph. 09821226894

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एक महिला मुख्यमंत्री की बीमारी पर इतना बवाल… !

जयललिता बीमार हैं। वे अब 68 साल की हैं और यह नहीं पता कि आप जब यह पढ़ रहे होंगे, तब वे बीमारी से निजात पाकर अस्पताल से अपने घर आ चुकी होंगी या वहीं इलाज करा रही होंगी। लेकिन उनकी बीमारी को लेकर तमिलनाड़ु में ही नहीं, देश भर में जो कोहराम मचा हुआ है वह इससे पहले भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास में कभी किसी ने नहीं देखा। एक सीएम के बीमार होने को किसी राष्ट्रीय संकट के सात्विक स्वरूप में देश के सामने खड़ा कर दिए जाने की संभवतया यह पहली घटना है। बाहर क्या घट रहा है, इससे बिल्कुल नावाकिफ जयललिता अस्पताल में जिस अवस्था में हैं, उसके बारे में डाक्टर ही बेहतर बता सकते हैं। लेकिन एक लौहमहिला के शुभचिंतक और अशुभचिंतक दोनों ही इस बार कुछ ज्यादा ही चिंतित है।

तमिलनाड़ु की मुख्यमंत्री जयललिता को बीते 22 सितंबर को बुखार और डिहाइड्रेशन की शिकायत हुई, तो वे चेन्नई के अपोलो अस्पताल में भर्ती कराई गईं। लेकिन उनकी इस बीमारी की खबर फैलते ही राजनीतिक चक्र पता नहीं कैसे इतनी तेजी से घूमा कि वे जैसे ही अस्पताल में गईं, उनकी सेहत को लेकर, समाज से लेकर सांसदों में और विपक्ष से लेकर विरासत संभालनेवालों तक में हर स्तर पर हर तरह के कयास लगाए जाने लगे। तमिलनाड़ु का विपक्ष उनकी पार्टी ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम पर मुख्यमंत्री की सेहत की जानकारी छिपाने का आरोप लगाते हुए सरकार से इस पर बयान जारी करने की भी मांग कर रहा है। तो बीमारी को लेकर मद्रास हाईकोर्ट में पीआईएल भी लगाई गई। जयललिता के स्वस्थ होने तक अंतरिम मुख्यमंत्री नियुक्त करने की मांग तक की गई। वह भी उस प्रदेश में, जिसने करुणानिधि जैसे बेहद बीमार वृद्ध को बरसों तक सीएम के रूप में देखा है।

माहौल ऐसा बनाया गया है जैसे आज तक किसी प्रदेश के सीएम बीमार ही नहीं हुए हों। देश में संभवतया यह पहली बार हुआ है कि किसी सीएम की बीमारी को इस कदर राजनीतिक रंग देने की कोशिश की गई हो और निहायत द्वेषपूर्ण तरीके से सोशल मीडिया पर जयललिता को दिन में कई कई बार मरा हुआ भी घोषित कर दिया गया हो। तमिलनाडु पुलिस ने अपनी मुख्यमंत्री की सेहत के बारे में गलत और जानकारी फैलाने के आरोप में कुल 44 मामले दर्ज किए हैं। और दो लोगों को गिरफ्तार भी किया गया है। लेकिन लोग हैं कि अफवाहें फैलाने से बाज ही नहीं आ रहे। शुक्र है जयललिता जिंदा है और जिंदगी को जिस भी हाल में जी रही है, वहां से वे ठीक होकर लोटें, यह कामना करनेवालों की भी कमी नहीं है।

दरअसल, जयललिता ठीक हैं भी और ठीक नहीं भी हैं। ठीक वह इस मायने में हैं कि उम्र के जिस दौर में वे हैं, उसमें शरीर वैसे भी कोई बहुत ज्यादा समर्थ अवस्था में साथ नहीं देता। उम्र के लिहाज से वे सत्तर साल के करीब हैं और इस उम्र में असकर सारे लोग अस्पताल आते जाते रहे हैं। लेकिन अगर जयललिता को अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत पड़ी, तो ठीक है। पर, बार बार उनको लेकर किसी भी तरह की अफवाहें उड़ाने की किसी को छूट क्यों दी जानी चाहिए। 

तमिलनाड़ु में 32 साल से चली आ रही हर बार सरकार बदलने की परंपरा का राजनीतिक इतिहास उलटते हुए जयललिता लगातार दूसरे कार्यकाल के लिए इसी साल 23 मई 2016 को छठी बार मुख्यमंत्री के बनीं थीं। तब से लेकर आज तक करुणामिधि और उनकी पार्टी ने जयललिता के खुंदक निकालने का कोई मौका नहीं छोड़ा। ताजा विवाद के पीछे भी करुणनिधि की पार्टी डीएमके का कमाल ज्यादा माना जा रहा है। कर्नाटक के मंड्या जिले के पांडवपुरा तालुका के मेलुरकोट गांव में 24 फ़रवरी 1948 को एक ‘अय्यर’ परिवार में जन्मी जयललिता देश की राजनीति में ताकतवर महिला के रूप में अपने चमत्क़त कर देनेवाले अंदाज में आज भी हैं और कल भी थीं।

डीएमके पार्टी के करुणानिधि से उनकी व्यक्तिगत दुश्मनी की हदें दुनिया देख ही चुकी हैं। लेकिन उनकी ताकत को भी लोग मानते हैं। इसी कारण तमिलनाड़ु के लोग जयललिता को आदर के साथ अम्मा कहते हैं। वे खबरों को अपने तानेबाने में बुनती रही है। शायद, यही वजह है कि उनका अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती होना भी रोज खबरों पर खबरें बरसाए जा रहा है। रोज कोई न कोई बड़ा नेता जयललिता से मिलने अस्पताल पहुंच रहा हैं। कांग्रेस के राजकुमार राहुल गांधी भी चार दिन पहले उनसे अस्पताल जाकर मिल आए हैं। हालांकि कुछ साल पहले पता नहीं किस मंशा में सुश्री जे. जयललिता ने कांग्रेस को भंग करने की बात कही थी। और अपनी बात को साबित करने के लिए बहुत सारे साक्ष्य भी खोज लिए थे।

जयललिता का कहना था  कि देश की स्वतंत्रता के बाद महात्मा गांधी कांग्रेस पार्टी को भंग करना चाहते थे। अपनी बात साबित करने करने लिए अम्मा आक्रामक रूप से जो बहुत सारे दस्तावेज भी लाई थीं। उनमें से ‘दी कलेक्टेड वर्क्स ऑफ महात्मा गांधी-वॉल्यूम 90’ के वे कुछ अंश भी उन्होंने विधानसभा में पढ़े, जिनमें महात्मा गांधी ने यह भावना व्यक्त की थी कि देश आजाद हो गया है, अब कांग्रेस की जरूरत नहीं है। जयललिता ने तब यह भी कहा था कि कांग्रेस को अब समाप्त कर देना चाहिए। उस समाप्त कर दी जानेवाली कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी का दिल्ली की रैली में देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को शहीदों के खून का दलाल बताने के दूसरे ही दिन जयललिता का हाल जानने चेन्नई पहुंचना बहुत लोगों को भले ही समझ में नहीं आया। लेकिन इस यात्रा की राजनीतिक सोच यही थी कि प्रधानमंत्री को शहीदों के खून का दलाली करनेवाला बताने से मचे हंगामे से मामला जयललिता के स्वास्थ्य की तरफ शिफ्ट हो जाएगा। मतलब, साफ है कि राहुल गांधी ने भी जयललिता की बीमारी को भी अपने लिए राजनीतिक ढाल के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश की।

कुल मिलाकर जयललिता बीमार है और ईश्वर करे, उन्हें कोई बहुत गंभीर बीमारी भले ही न हो, लेकिन लोग उसे कुछ ज्यादा ही गंभीरता से ले रहे हैं, यह बहुत ज्यादा गंभीर बात है।। उनकी बीमारी पर पर विवाद भी बहुत हो रहा है। लेकिन असल में देखें, तो विवादों को जन्म देना तो असल में जयललिता का शगल रहा है और उनसे घिरे रहना उनकी किस्मत का हिस्सा। विवाद शायद इसीलिए जयललिता का पीछा नहीं छोड़ते।

वैसे जयललिता रणनीति की भी उस्ताद रही हैं। वे एक सोची समझी रणनीति के तहत अपनी हीरोइन मां का दामन थामकर किसी लाजवंती नायिका की तरह तमिल सिनेमा में आईं और एमजीआर के नाम से बहुत प्रसिद्ध तब के वहां के सुपर स्टार एमजी रामचंद्रन की परम सखी के रूप में छा जाने की रणनीति में कब सफल हो गईं, किसी को पता भी नहीं चल सका। बाद में रामचंद्रन राजनीति में घुसे। चूंकि वे सुपर स्टार थे, इसलिए उनके नाम से पार्टी चलने लगी। और राजनीतिक कारणों से तो नहीं पर श्रृंगारिक कारणों की वजह से अपनी रणनीतियों के तहत जयललिता स्वयं को एमजीआर का सच्चा उत्तराधिकारी मानती थीं, जिसमें वे सफल भी रहीं।

एमजीआर की बाकायदा धर्मपत्नी होने के बावजूद बेचारी जानकी तो कहीं किसी भी परिदृश्य में भी नहीं थी। हर जगह जयललिता ही एमजीआर के साथ दिखतीं। उन रणनीतिबाज जयललिता से कांग्रेस का कलह शुरू से ही रहा। लेकिन फिर भी वे कांग्रेसियों के फाइनेंस की हुई फिल्मों में भी जयललिता भरपूर नखरे किया करती थी। छठी बार सीएम बनना कोई हंसी खेल नहीं है। यह राजनीति का शिखर है। उसी शिखर पर बैठी अम्मा अकसर लोगों को मुंहतोड़ जवाब देती रही हैं। राजनैतिक जीवन के दौरान जयललिता पर सरकारी पूंजी के गबन, गैर कानूनी ढंग से भूमि अधिग्रहण और आय से अधिक संपत्ति के आरोप लगे। उन्हें आय से अधिक संपत्ति के एक मामले में सजा भी हुई और मुख्यमंत्री पद भी छोड़ना पड़ा पर वे कभी जिंदगी से नहीं हारी नहीं।

भीषण किस्म के भ्रष्टाचार के मामलों और कोर्ट से सजा होने के बावजूद वे अपनी पार्टी को संसद से लेकर विधानसभा में भारी बहुमत के साथ जिताने में सफल रहीं। इसीलिए जो लोग अम्मा को जानते हैं, वे यह भी मानते ही हैं कि अस्पताल की भवबाधाओं से मुक्ति पाने के बाद वहां से बाहर निकलकर जयललिता के शरीर ने साथ दिया तो, वे चुप नहीं रहेंगी, यह तय है। वैसे भी हर बात पर कोहराम मचाना और कुछ भी चुपचाप सहन कर जाना उनकी आदत का हिस्सा नहीं है।

लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क primetimeindia2012@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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