अजमेर में ट्रेनिंग ले रहे हैं देश के प्रथम नेत्रबाधित न्यायाधीश

अजमेर : बहुत शीघ्र आप एक ऐसी अदालत देखेंगे, जिसके न्यायाधीश नेत्र बाधित होंगे। यहां इन दिनो ब्रम्हानंद शर्मा जज की ट्रेनिंग ले रहे हैं। वह देश के संभवतः पहले नेत्रबाधित न्यायाधीश बनने जा रहे हैं। उनका चयन पिछले दिनों ही राजस्थान न्यायिक सेवा में हुआ है। ब्रम्हानंद उस आखिरी बैच के हैं, जिन्हें राजस्थान लोक सेवा आयोग ने चुना है। अब राजस्थान हाईकोर्ट मजिस्ट्रेटों की भर्ती करेगा।

भीलवाड़ा जिले के आसींद के रहने वाले ब्रम्हानंद शर्मा न्यायाधीश पद के लिए चयनित होने से पहले एक साल भीलवाड़ा कलेक्ट्रेट और उसके बाद करीब सालभर सार्वजनिक निर्माण विभाग में कनिष्ठ लिपिक रहे हैं। 7 अगस्त, 1973 को जन्मे ब्रम्हानंद शर्मा आयु की दृष्टि से अपने बैच में सबसे बड़े ही नहीं, जज्बा भी सबसे अधिक रखते हैं, वह अब ये साबित करने के मोहताज नहीं हैं। 

द्वितीय श्रेणी से सेवानिवृत्त शिक्षक रामस्वरूप शर्मा के बेटे ब्रम्हानंद की ज्यादातर पढ़ाई भीलवाड़ा में हुई। समाज शास्त्र में एमए के बाद उन्होंने भीलवाड़ा के राजकीय विधि महाविद्यालय से एलएलबी भी की। ब्रम्हानंद की पढ़ाई अभी छूटी नहीं है। वे वर्द्धमान महावीर खुला विश्वविद्यालय से बिजनेस मैनेजमेंट में एलएलएम भी कर रहे हैं।

ब्रम्हानंद बताते हैं कि उनके पास एक सॉफ्टवेयर है, जिसमें लिखी या टाइप की  हुई सामग्री को स्कैन कर कम्प्यूटर में अपलोड कर दिया जाता है। सॉफ्टवेयर उस सामग्री को आवाज में बदल देता है। इस तरह वह सुनकर मुकदमे की पूरी फाइल समझ लेंगे। पढ़ाई और परीक्षा की तैयारी भी तो इसी तरह की है। उनका मानना है कि भविष्य में आने वाले ई-कोर्ट उनके लिए वरदान साबित होंगे। 

ये संयोग ही कहा जाएगा कि ब्रम्हानंद शर्मा के रूप में पहले नेत्रबाधित न्यायाधीश अजमेर की उसी अदालत परिसर में हैं, जहां आजादी के पहले देश के पहले नेत्रहीन वकील मुकुट बिहारी लाल भार्गव वकालत किया करते थे। भार्गव देश की संविधान निर्मात्री सभा के एक मात्र नेत्रहीन सदस्य थे और पहली भारतीय संसद के पहले नेत्रहीन सदस्य थे। वे अजमेर के पहले लोकसभा सदस्य चुने गए थे। भार्गव ब्रिटिशकाल में हाईकोर्ट का दर्जा रखने वाली अजमेर-मेरवाड़ा यूनियन प्रोविन्स के ज्यूडिशियल कमिश्नर की अदालत, लंदन की प्रिवी कौंसिल और आजादी के बाद सुप्रीम कोर्ट में भी वकालत किए थे।  

लेखक राजेंद्र हाड़ा अजमरे के जाने-माने वकील और पत्रकार हैं. उनसे संपर्क ”राजेंद्र हाड़ा, 860/8, भगवान गंज, अजमेर- 305 001” या 09829270160 व 09549155160 या rajendara_hada@yahoo.co.in के जरिए किया जा सकता है.

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: अखबारों-टीवी की विज्ञापन नीति और नैतिक मापदंडों के लिए मदद करें : बड़े नाम के किसी भी अखबार और पत्रिका को उठा लीजिए, मजीठिया वेतन बोर्ड आयोग की सिफारिशों के अनुरूप पत्रकारों को वेतन देने में बहानेबाजी कर रहे अखबार मालिकों की माली हैसियत सामने आ जाएगी। लेकिन इनके अखबारों में विज्ञापनों की इतनी भरमार रहती है कि कभी तो उनमें खबरों को ढूंढना पड़ता है। लेखकों को दिए जा रहे पारिश्रमिकों की हालत यह है कि सिर्फ लेख लिखने के दम पर गुजारा करने की बात सोची नहीं जा सकती। हमारे देश में सिर्फ एक अखबार या पत्रिका में लेख या स्थायी स्तंभ लेखन के जरिए गुजारे की कल्पना करना, उसमें भी हिन्दी भाषा में, असंभव है।

मजीठिया के बहाने ही सही, कुछ पत्रकारों ने आखिर एकजुटता और अदालत के दरवाजे खटखटाने का साहस तो दिखाया। सन् 1981 की बात है। बीए ऑनर्स के द्वितीय वर्ष में था। लेखन के दम पर गुजारे को लेकर चली ऐसी ही एक चर्चा में एक प्राध्यापक ने मुझे एक सर्वे के बारे में बताया जो उन्होंने उन्हीं दिनों किसी अंतरराष्ट्रीय पत्रिका में पढ़ा था। सर्वे में उस समय निकलने वाले धर्मयुग का भी जिक्र था। धर्मयुग के सर्क्युलेशन, छपाई, टैक्स और मालिक के अच्छे खासे मुनाफे के बाद लेखकों को उस दौर में एक पृष्ठ के लेख के आठ सौ रुपए मिलने चाहिए। 44 साल पहले एक पृष्ठ के लेख का मेहनताना आठ सौ रुपए आंका गया था। दो सवाल हैं। पहला- आज यह कितना होना चाहिए?  और दूसरा- आज कितना मिल रहा है? इसी अनुपात में अगर हम विज्ञापनों की दर देखें और विज्ञापनों की भरमार देखें तो फटी आंखें बंद होना भूल जाती है।

कुछ सालों बाद जब दूरदर्शन पर इतवार की सुबह रामायण, महाभारत, बुधवार की रात आठ बजे चित्रहार और इतवार की शाम पांच बजे हिन्दी फिल्म आती थी तो इनमें विज्ञापनों की भरमार बढ़ने लगी। उन्हीं दिनों जनसत्ता या नवभारत टाइम्स में एक कार्टून छपा था। इसमें दूरदर्शन पर बढ रहे विज्ञापनों का कटााक्ष करते हुए कहा गया था, ‘इस समाचार के प्रायोजक हैं।’ दरअसल उन दिनों तक समाचार के दौरान विज्ञापन की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। आज हर न्यूज चैनल पर हैडलाइंस, मुख्य समाचारों, खास खबरों तक के लिए ‘ब्रॉट टू बाय’ या ‘स्पान्सर बाय’ अलग से होते हैं।

अखबारों के मुखपृष्ठ पर दोहरा मुखौटा जड़ना आम बात है। पहले पेज पर सिर्फ अखबार का बैनर या मास्टर हैड होता है। फिर पूरे पृष्ठ का विज्ञापन। तीसरा पृष्ठ उस अखबार का वास्तविक तौर पर मुखपृष्ठ होता है। यह अब हर तीसरे चौथे दिन की बात हो गई है। बाकी पेजों पर भी कई बार तो एक आध न्यूज होती है वरना आधा पृष्ठ तक के विज्ञापन आम बात हैं। पिछली दीपावली पर तो दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका और दैनिक नवज्योति ने लगातार तीन-चार दिन एक ही दिन के अखबार में तीन से चार तक मास्टर हैड या बैनर लगे पूरे-पूरे पेज के विज्ञापन दिए।  इस बारे में न कोई नैतिकता है, ना ही मापदण्ड। आजकल किसी संस्थान के अखबार के आकार के स्पॉंसर पेज भी अखबार के साथ बांटने एक तरीका और चला है। जिसमें अखबार का नाम नही होता। जाहिर है इसे अपने अखबार के साथ बांटने के लिए विज्ञापनो जितनी ही रकम ली गई होगी। यह तो सरासर धोखाधड़ी है। कारण है कि इसे लेकर अब तक कोई कानून नजर नहीं आता। कुछ सिफारिशें जरूर बताई जाती है।

विज्ञापनों की अपनी अलग दुनिया है। कानून है, अश्लीलता अभद्रता रोकथाम के लिए। परंतु अखबार-टीवी तो इनसे आजाद नजर आते हैं। यौन दुर्बलता, यौन अक्षमता, यौन बलवर्द्धक दवाइयों और संतुष्टि के कृत्रिम संसाधनों,  फ्रेंडशिप के प्रस्तावों में जो भाषा इस्तेमाल होती है अपना दावा है कि उस अखबार के संपादक, मालिक, निदेशक अपनी बहनों, बेटियों, बहुओं के सामने खुद नहीं पढ़ सकते। पैसे की चकाचौंध तो उन्हें इस बारे में की फुर्सत ही नहीं देती। क्लासिफाइड विज्ञापनों में अखबार प्रबंधन की ओर से एक छोटी सी चेतावनी होती है। इसका लब्बोलुआब यह होता है कि विज्ञापन पढने के बाद आप द्वारा किए गए किसी संव्यवहार से आपको कोई आर्थिक-शारीरिक नुकसान होता है, इसके लिए हम नहीं आप ही जिम्मेदार हैं।

सोचिए अपनी नैतिकता छोड़ गंडे-ताबीज, वशीकरण, जादू टोने आदि ऐसी कितनी चीजों को छापना तो कानूनी है। उसे पढ़कर प्रेरित या भ्रमित होकर नुकसान होना लाजिमी है। यह तथ्य भी जानते हैं परंतु अखबार की कोई जिम्मेदारी नहीं। छापकर पैसा लेने की जिम्मेदारी है, उससे होने वाले नुकसान की नहीं। अखबार मालिक जानते हैं कि समझदार तो कोई भ्रमित होगा नहीं। भ्रमित होगा दुखी, नादान, कम शिक्षित और गरीब। ऐसी बातेे हो रही है और हम आज भी हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं।        

देश के कई भागों में ऐसा होगा परंतु राजस्थान के कुछ शहरों में तो पक्के तौर पर हॉकर आपके घर अखबार डालने के दस-पंद्रह रूपए हर महीने अलग से लेता है। एमआरपी यानि अधिकतम खुदरा मूल्य पर वह खुले आम दस रुपए महीने के लेता है। इस बारे में उनमें एकता भी है। पैसे नहीं दोगे तो कोई अखबार नहीं डालेगा जबकि उन्हें इसका कमीशन वगैरह मिलता है। अखबार प्रबंधक कहते हैं, हम कुछ नहीं कर सकते, यह हॉकर्स का मामला है।

यही हाल खबरों का है। जिसका जनाजा निकालना हो निकाल दीजिए। खबर गलत भी होगी तो एकाएक कोई पंगा लेने की हिम्मत नहीं करता। कानूनी प्रक्रिया इतनी लम्बी होती है तो मुकदमा करने वाले को ही एक स्तर पर ऐसा अहसास होने लगता है कि उसने क्या गलत कर दिया। वह प्रार्थी की जगह मुजरिम जैसी प्रताड़ना का शिकार होने लगता है। अखबार मालिक जानता है कि पहला तो वहा कानूनी प्रक्रिया मंे ही उसे थका डालेगा अगर नहीं थका और नौबत अखबार के गलत साबित होने की आ गई तो क्षमायाचना कर लेंगे। किसी आदमी पर पुलिस ने झूठा मुकदमा ही दर्ज किया हो या किसी ने गलत आरोप ही लगाए हो परंतु रोजाना ऐसे ब्रेकिंग न्यूज चलती है मानो टीवी चैनल ही उसका ट्रायल करने के लिए जिम्मेदार हो। मुकदमा दर्ज हुआ है परंतु हैडलाइंस चलती है इस मामले में सजा कितनी होगी। सजा होगी या नहीं यह सोचने कि फुर्सत उन्हें नहीं है। हो भी कैसे जिन्हें यह ज्ञान ही नहीं है कि जम्मू-कश्मीर को लेकर विवाद में रहने वाला संविधान का अनुच्छेद-370 है या धारा-370 है। मीडिया ट्रायल के बाद अब न्यूज टेªडर का इजाद ऐसी वजहों से हुआ। 

आखिर कब तक चुप रहा जाए। इसलिए एक एनजीओ ने हिम्मत की है। इन सारे मामलों को हाईकोर्ट में चुनौती देने की। संभव है तब कहीं इनके बारे में कोई कानूनी नीति, नियम, कायदे कुछ बनें। कहीं तो कुछ अंकुश भी लगे। उक्त तथ्यों या इनसे जुड़े अन्य तथ्य जो आम आदमी के अधिकारों, नैतिकता से सीधे जुडे़ हैं, आप हम तक भेजें। इनके बारे में आपकी राय, सोच क्या है, इसे बताएं। सरकारी / गैर सरकारी / स्वायत्तशासी संस्थाओ की सिफारिशें, परिपत्र अगर हों तो हमें भेजें। संबंधित कानून भी आपको पता हो तो हमसे शेयर करें। अन्य देशों के नीतिगत कानून, निर्देश, आदेश भी बताएं। कुल-मिलाकर इनसे जुड़ा जो भी आपकी जानकारी में है, उसे हम तक साझा करें। उसे आप नीचे कमेंट बाक्स में या फिर शीघ्र भड़ास या नीचे दिए गए पते पर भेजें ताकि इस दिशा में हाईकोर्ट में यचिका दायर की जा सके।   

पता-

राजेंद्र हाड़ा
860/8, भगवान गंज,
अजमेर- 305 001

फोन- 09829270160, 09549155160
मोबाइल- rajendara_hada@yahoo.co.in

लेखक राजेंद्र हाड़ा अजमरे के जाने-माने वकील और पत्रकार हैं.

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शाहनवाज हुसैन की पत्नी रेनु की किताब का 11 साल बाद फिर विमोचन

पूर्व केंद्रीय मंत्री शाहनवाज हुसैन की पत्नी रेनु के कविता संग्रह ‘जैसे’ का शनिवार, 13 फरवरी 2015 को अजमेर में हुआ विमोचन राजनीतिक चर्चाओं का हिस्सा बन गया। बताया जाता है कि इस कविता संग्रह का विमोचन सन् 2003 में हो चुका है। इतने साल बाद फिर से विमोचन कई को बेनकाब कर गया। अजमेर के कुछ चाटुकार साहित्यकारों और राजनेताओं की जुगलबंदी ने राजनीतिक फायदे और शाहनवाज से निकटता बढ़ाने के मकसद से रेनु को अजमेर के महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय में एक समारोह में आमंत्रित किया।

उनके आमंत्रण के पीछे वसुंधरा सरकार के एक अति उत्साही और स्वार्थी मंत्री का दिमाग बताया जाता है। रेनु को बुलवाने के पीछे मंत्री का शातिर दिमाग इतनी हरकत में रहा कि उसने जानते बूझते इस हकीकत की जानकारी किसी को नहीं दी। यही नहीं, विश्वविद्यालय के अफसरों को बेवकूफ बनाते हुए उनसे यह घोषणा भी करवा दी कि इस काव्य संग्रह की कविताओं को विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में शामिल करवाया जाएगा। उनका बस नहीं चला वरना रेनु के मुंह पर लगाम भी लगा देते और वह कुछ नहीं कहने देते जो उन्होंने यहां कहा।

रेनु ने अपने भाषण और अखबारों को दिए इंटरव्यूज में साफ कहा कि लव के साथ जेहाद जैसा कुछ नहीं होता। उन्होंने खुद बीस साल पहले शाहनवाज से लव किया था। उन्हें जेहाद जैसी किसी परिस्थिति का सामना नहीं करना प़ड़ा। उन्होंने हिन्दू-मुस्लिम दोनों संस्कृतियों को नजदीक से देखा है। जो आज लव जेहाद का मुद्दा उठा रहे हैं, उन्हें शायद लव के बारे में भी कुछ नहीं पता। प्यार सच्चा हो तो वह कोई सीमाएं नहीं मानता। शाहनवाज हुसैन के हंसमुख स्वभाव और आदतों का जिक्र करते हुए उन्होंने अपनी शादी, दो बच्चों और खुशहाल जिन्दगी के लिए सूफी संत गरीब नवाज ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती की जमकर तारीफ की। 

अजमेर से राजेंद्र हाड़ा की रिपोर्ट. संपर्क: 09549155160 और 09829270160 

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अब फिर रोज खुलने लगा अजमेर का अजयमेरू प्रेस क्लब

स्थापना के 14 सालों में कई साल बंद रहने के बाद अब अजयमेरू प्रेस क्लब फिर रोजाना खुलने लगा है। अजमेर नगर निगम की ऐतिहासिक बिलडिंग गांधी भवन के उपरी तले पर अगर आप किसी भी दिन सुबह दस से शाम 5 बजे तक जाते हैं तो वहां सेवा राम मिलता है। नाम का ही नहीं काम का भी सेवा राम। शुरूआत हुई है तो अब मात्र ढाई रूपए में चाय भी मिलने लगी है। यह व्यवस्था शुरू होने के बाद से तो याद नहीं कि वहां आने वाले किसी सदस्य ने अकेले चाय पी हो। पीछे स्थित मदार गेट पर हर तरह का नाश्ता मिलता ही है। वैसे बाजार में चाय के दाम दस से पंद्रह रूपए है। काफी लम्बा अरसा बंद रहने के बाद जुलाई 2014 में क्लब फिर शुरू हुआ।

बंद क्यों रहा यह किस्सा फिर कभी। स्टेशन रोड पर रेलवे स्टेशन से थोड़ा हटकर स्थित इस प्रेस क्लब के अब तक जिले भर से करीब दो सौ से अधिक सदस्य बन चुके हैं। पत्रकारों के साथ साहित्यकारों, लेखकों, प्रबुद्ध नागरिकों के लिए भी गुंजाइश रखी गई है। इसलिए सदस्यता के भी कुछ रूप दिए गए हैं। सन् 2000 में स्थापना हुई तब इसके पहले अध्यक्ष बने दैनिक भास्कर के स्थानीय संपादक डॉ. रमेश अग्रवाल। उनके बाद नवज्योति के नरेंद्र चौहान, राजेंद्र गुंजल, नरेन राजगुरू रहे। फिर क्लब बंद हो गया। अब फिर से लोग जुटे और सर्वसम्मति से एक बार फिर डॉ. रमेश अग्रवाल को इसका अध्यक्ष बना दिया गया।

महासचिव बने जी न्यूज मरूधरा के मनवीर, पंजाब केसरी के एसपी मित्तल और हिन्दू के कमल वर्यानी उपाध्यक्ष बने हैं। पर मानना पड़ेगा क्लब जिंदा रखने के लिए फोटोग्राफर सत्य नारायण जाला और दैनिक भास्कर के वरिष्ठ पत्रकार प्रताप सनकत को जो किसी ड्यूटी की तरह बिना नागा रोजाना क्लब आते हैं और इसके लिए संसाधन जुटाते हैं। छह सात महीने में, आधा दर्जन से ज्यादा दफा सदस्य सामूहिक भोज कर चुके हैं। यह भोज कराया कुछ सदस्यों ने स्वेच्छा से। दो दफा तिरंगा झंडा भी फहरा चुके हैं। कुछ अन्य गतिविधियों के लिए कमेटियों का गठन भी किया हुआ है। वरिष्ठ पत्रकार गिरधर तेजवानी ने जहां सदस्यता छानबीन समिति संभाली है, वहीं राजेंद्र हाड़ा को विधि सलाहकार का जिम्मा दिया गया है। सबसे अधिक सक्रिय हैं लम्बे समय तक खेल खबरें देखने वाले विनीत लोहिया। लोहिया ने कैरम प्रतियोगिताओं का ऐसा आयोजन शुरू किया है कि प्रेस क्लब पर अब रोजाना दोपहर 1 से शाम 4 बजे तक बीस-पच्चीस सदस्य जुट जाते हैं।

दैनिक भास्कर में प्रशासनिक बीट संभालने वाले वरिष्ठ पत्रकार सुरेश कासलीवाल ने नए भवन की जिम्मेदारी ली है। काफी हद तक काम चल रहा है। केंद्र सरकार के जल संसाधन राज्य मंत्री सांवर लाल जाट, राज्य सरकार में महिला व बाल विकास राज्य मंत्री अनिता भदेल और स्कूल शिक्षा राज्य मंत्री वासुदेव देवनानी तीनों प्रेस क्लब आ चुके हैं और यहां की मानद सदस्यता ले चुके हैं। इनसे पहले 14 साल पहले मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और सबसे पहले मूर्धन्य पत्रकार प्रभाष जोशी इस क्लब की मानद सदस्यता ले चुके हैं।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की प्रतिमा लगे और उन्हीं के नाम पर बने ऐतिहासिक गांधी भवन में इस क्लब का चलने और शाम 6 बजते तक ताले लग जाने से आप समझ ही चुके होंगे कि अन्य प्रेस क्लबों जैसी दारू की परम्परा यहां नहीं है। यूं ज्यादातर सदस्यों को दारू की लत भी नहीं है। प्रेस क्लबों में क्या यह अपवाद नहीं है। शायद इसीलिए ज्यादातर अमीरों से दारू की जगह प्रेस क्लब में नया फ्रिज, नई मेज-कुर्सिया, आलमारी, कारपेट, चमकती टाइलें, टीवी, कैरम, शतरंज, वाई फाई जुटा ली गई हैं। अब टेबिल टेनिस की नई टेबलें लाने की तैयारी हैं। आई तो चौदह साल पहले भी थीं पर अब वे कबाड़ जो हो चुकी हैं।

फोटो: अजयमेरू प्रेस क्लब में हुई कैरम प्रतियोगता के प्रथम चरण के विजेता प्रेस क्लब अध्यक्ष डॉ. रमेश अग्रवाल और हौंसलों की उडान समाचार पत्र के सुनील को चल वैजयंती प्रदान करते अखिल भारतीय टेबिल टेनिस महासंघ के सचिव धनराज चौधरी। साथ खडे़ हैं प्रेस क्लब के खेलकूद संयोजक विनीत लोहिया और उपाध्यक्ष एसपी मित्तल।

अजमेर से वरिष्ठ पत्रकार और वकील राजेंद्र हाड़ा की रिपोर्ट. संपर्क: 09549155160 और 09829270160

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मजीठिया वेज बोर्ड : यशवंत के साथ ना सही, पीछे तो खड़े होने की हिम्मत कीजिए

Rajendra Hada


मंगलवार, 20 जनवरी 2015 की शाम भड़ास देखा तो बड़ी निराशा हुई। सिर्फ 250 पत्रकार मजीठिया की लड़ाई लड़ने के लिए आगे आए? दुर्भाग्य से, जी हां दुर्भाग्य से, मैंने ऐसे दो प्रोफेशन चुने जो बुद्धिजीवियों के प्रतीक-स्तंभ के रूप में पहचाने माने जाने जाते हैं। वकालत और पत्रकारिता। दुर्भाग्य इसलिए कि दुनिया को अन्याय नहीं सहने की सलाह वकील और पत्रकार देते हैं और अन्याय के खिलाफ मुकदमे कर, नोटिस देकर, खबरें छापकर मुहिम चलाते हैं लेकिन अपने मामले में पूरी तरह ‘चिराग तले अंधेरा’ वाली कहावत को चरितार्थ करते हैं। अपनी निजी भलाई से जुडे़ कानूनों, व्यवस्थाओं के मामले में बुद्धिजीवियों के ये दो वर्ग लापरवाही और अपने ही साथियों पर अविश्वास जताते हैं। यह इनकी निम्नतम सोच का परिचय देने को काफी है।

दस साल तक दैनिक नवज्योति अखबार और उसके बाद दस साल तक दैनिक भास्कर अखबार में रहते हुए साथियों के अनुभव से मैंने यही जाना कि सेठ यानि मालिक सिर्फ मालिक होता है और आप सिर्फ नौकर। आप मालिक के साथ कितनी भी भलाई करें, मालिक अगर आपको दूध में मक्खी की तरह निकालना होगा तो, निकालकर ही मानेगा। मेरे साथ गनीमत रही कि जहां भी रहे, अपनी योग्यता के बल पर टिके रहे। पार्ट-टाइम रहते हुए भी जब जी चाहा तब तक नौकरी की और इच्छा होने पर बाकायदा एक महीने का नोटिस दिया। नोटिस में दी तारीख से अखबार के दफ्तर जाना छोड़ दिया। मालिक या संपादक के फैसले का इंतजार नहीं किया। इसीलिए नोटिस और इस्तीफे आज तक संभाल कर मेरे पास रखे हुए हैं।

हां, तो मैं बात कर रहा था साथियों की। मजेदार बात यह है कि मालिक के मुहंलगे, हां में हां मिलाने वाले, चमचागिरी कर यसमैन बने पत्रकार भी जरूरत पड़ने पर ऐसे आंखे फेर लेते हैं जैसे साथियों को जानते तक नहीं। हालात ऐसे होते हैं कि कई बार तो वह मालिक तो क्या शहर के एमएलए और अफसरों के तलुए चाटते दिखते हैं लेकिन अपने साथियों को इस कदर उपेक्षित करते हैं कि वे सोचने को मजबूर हो जाते हैं। यह और बात है कि वक्त बदलते देर नहीं लगती और जो अन्याय खुद अपने साथियों के साथ करते हैं, कुछ समय बाद उनके साथ वैसा तो क्या उससे बुरा भी होता है। भले ही वह झूठी शान में मरे जाते हैं परंतु उनकी हकीकत किसी से छिप नहीं पाती। ऐसे एक नहीं कई उदाहरण हैं, भगवान ने चाहा तो बहुत जल्द बाकायदा नाम सहित आपके सामने वे नंगे खड़े होंगे। कुछ ऐसा ही हाल वकालत में है परंतु वह फिर कभी।

अभी तो जमाना यह है कि आप बेइमान को बेइमान, घोटालेबाज को घोटालेबाज और चोर को चोर भी कह नहीं सकते। ऐसा कहते ही वे आपसे बात करना छोड़ देते हैं। आपको देखते ही मुंह फेर लेते हैं। उन्हें लगता है जैसे आंख बंद कर ली है तो अंधेरा हो गया है। उनके घर में एक पैसे की मेहनत की कमाई नहीं होती परंतु करोड़ों के मकान में रहते हैं, बच्चे महंगे स्कूलों में पढ़ते हैं। कुर्सी पर जब भी ये लोग जमे तो फर्जीवाड़े ऐसे-ऐसे किए कि आज तक हाथ पैर चलाए बिना उन बेनामी ट्रांजेंक्शंस की फसले काट रहे हैं। तुर्रा यह कि बनते ऐसे ईमानदार हैं कि दुनिया में राजा हरीशचंद्र के बाद पैदा ही वे हुए हैं। कई संस्थाओं में पैसा लगा हुआ है। नरेंद्र मोदी की नकल में ना खाउंगा ना खाने दूंगा जैसे नारे लगा रहे हैं।

आप सोच रहे होंगे आखिर कहना क्या चाह रहा हूं। दोस्तों यह भड़ास ही है जिस पर आपके सामने इन बेइमानों, घोटालेबाजों, चोरों के गिरोह के सभी लोगों को नंगा करने का प्रयास किया जा रहा है। ऐसा कहने की हिम्मत भी इसलिए है कि यह यशवंत और उनका भड़ास ही है कि कई मुद्दे इस पर उठाए जा चुके हैं और उठाए जाएंगे। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और इनके पैरोकारों में तो वह ताकत रही नहीं कि कुछ लिखा जाए। वे खुद तो इतने पंगु है कि गलत होते हुए भी उसे गलत कहने का साहस नहीं रखते, अगर आप उस बारे में कुछ लिख देते हैं तो उसे छापने की हिम्मत भी नहीं रखते। अगर वह हिम्मत रखते हैं तो उनका सेठ इसकी इजाजत नहीं देता। परंतु वे कुर्सी पर जमे रहते हैं।

यशवंत से अपनी रूबरू मुलाकात सिर्फ दो दफा, और फोन व भड़ास के माध्यम से कई दफा की है। यशवंत को इतना विश्वास है कि अपन कभी गलत खबर नहीं भेजते और ना भेज सकते हैं। इसी कारण उन्होंने आज तक कोई इंक्वायरी नहीं की कि खबर क्यों छापी जाए। जो भेजा वह छापा। आप लड़ते हैं, यशवंत आपका साथ देते हैं। अजमेर से सवा तीन सौ किलोमीटर दूर बैठे और शायद आठ सौ किलोमीटर दूर के मूल बाशिंदे पर इतना विश्वास सिर्फ और सिर्फ इसलिए कि यशवंत आपके लिए लड़ते हैं। जब मामला आपका निजी हो तो भी वे जी जान लगा देते हैं और आप हैं कि खुद ही पीछे हट जाते हैं। जैसे कि इस बार मजीठिया के मामले में कर रहे हैं।

मजीठिया मिलने और सुप्रीम कोर्ट जाने से यशवंत को कुछ नहीं मिलने वाला। वे आपके लिए लड़ रहे हैं। ऐसे में आप उनके साथ ना सही, पीछे तो खड़े होने का साहस कीजिए। आप खुशनसीब हैं कि आपको यशवंत के रूप में आपका कोई हमदम, कोई दोस्त है। उस दोस्त की कद्र कीजिए। उस पर विश्वास कीजिए। दोस्तों जिंदगी में अवसर कभी कभार दस्तक देता है। इस अवसर को मत चूकिए। मजीठिया की लड़ाई लड़ने की पहल यशवंत ने की है। आप कम से कम साथ तो दीजिए। साथ ना सही पीछे तो खड़े होने की हिम्मत कीजिए। 

राजेंद्र हाड़ा
वरिष्ठ पत्रकार और वकील
अजमेर
राजस्थान
संपर्क : 09829270160, 09549155160
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पत्रिका के कार्यक्रम ‘हमराह’ को लेकर नवज्योति के मालिक दीनबंधु चौधरी का इगो टकरा गया!

राजस्थान पत्रिका और दैनिक नवज्योति की लड़ाई इतवार 14 दिसंबर की सुबह अजमेर की सड़कों पर नजर आई। पत्रिका का कार्यक्रम और नवज्योति के मालिक दीनबंधु चौधरी का इगो टकरा गया। पत्रिका ने पिछले कुछ दिनों से एक कार्यक्रम शुरू किया है, ‘हमराह’, इसके लिए इतवार की एक सुबह के लिए एक ऐसी सड़क का कुछ मीटर हिस्सा तय किया जाता है जहां दो घंटे सुबह 7 से 9 बजे तक शहर के लोग आकर बेलौस अंदाज में अपनी गतिविधियों, प्रतिभाओं का प्रदर्शन कर सकें।

पत्रिका ने इसके लिए चुना आनासागर झील के किनारे चौपाटी वाले रोड को। बजरंगगढ़ से चौपाटी के सिरे को इसके लिए चुना गया। शायद इसलिए भी कि इस सड़क का एक वैकल्पिक मार्ग जवाहर रंगमंच से होता हुआ वापस बजरंगगढ़ पहुंच जाता है। दो तीन दफा तो यह कार्यक्रम हो गया परंतु 14 दिसंबर को सबकुछ ठीकठाक नहीं रहा। जिस सड़क के छोटे से हिस्से पर यह कार्यक्रम होता है, उसी पर आनासागर झील के सामने नवज्योति के मालिक और प्रधान संपादक दीनबंधु चौधरी का भी मकान है। प्रतिद्वन्द्वी अखबार और उनके आंगन में उछलकूद मचवाए और अपना नाम कमाए। छोटा सा शहर है, सो कुछ छिपा नहीं रह पाता। पता लगा दीनू जी ने शहर के पुलिस कप्तान को इस आयोजन की अनुमति नहीं देने की एक लिखित शिकायत, बड़ी न्यूसेंस होती है, कहते हुए करवा दी। जिन लोगों से शिकायत करवाई गई वे पिछले आयोजन के फोटो में कुछ प्रभावशाली लोगों के पीछे हाथ बांधे खडे नजर आ रहे थे।

खबर तो यह भी है कि पुलिस कप्तान को फोन भी किया गया जवाब में उन्होंने यह कहते हुए कि हमने किसी को अनुमति ही नहीं दी है, मामला टाल दिया। अगले दिन इस बात पर भी बड़ा एतराज करवाया गया कि ट्रैफिक डाइवर्ट क्यों किया जा रहा है। पुलिस ने फिर टका सा जवाब दे दिया कि हम कहां डाइवर्ट कर रहे हैं, हम तो खडे़ हुए हैं। पत्रिकावाले खुद डाइवर्ट मे लगे हुए हैं। चौपाटी शहरवासियों के लिए घूमने की जगह भी है, पता लगा कि उसके गेट पर ताला लगवा दिया गया। लोगों ने बड़ा एतराज किया। कुछ ने गुस्से में आकर ताला वाला तोड़कर फेंकफांक दिया। सुबह की सैर को आए लोगों ने दीनू जी के घर के बाहर ही उनकी हाय हाय के नारे लगा डाले।

अगले दो दिन के नवज्योति में ‘हमराह’ को ‘शहर की अराजकता’ जैसा संदेश देने वाले समाचार छपे। खैर हमराह तो हो हवा गया परंतु मुसीबत तो नगर निगम और विकास प्राधिकरण की है। पत्रिका अब खबर छाप रहा है कि चौपाटी पर ताला किसने लगाया। नगर निगम और विकास प्राधिकरण क हुक्मरान कह रहे हैं कि हमने नही लगवाया, लगा था तो गलत है, पता नहीं किसने लगवाया। दोनों अखबारों की लड़ाई में उनकी शामत आई हुई है। बात चली है तो आपको बताते चले कि हमराह जिस हिस्से पर आयोजित हुआ, वही हिस्सा है जिसपर पूरे शहर में मात्र इसी हिस्से पर करीब एक दशक तक एकतरफा यातायात रहा। यह किसके आदेश से होता था और क्यों, इसका जवाब हर शहरवासी की जबान पर है। सवाल तो और भी बहुत सारे हैं चौपाटी, आनासागर, टापू, काउंसिल, प्रेस क्लब वगैरह-वगैरह, बोलता कोई नहीं है। किसकी जीत-किसकी हार के बीच खबर यह है कि पत्रिका अगला हमराह 21 दिसंबर की सुबह शहर के दूसरे कोने में स्थित चंदबरदाई खेल स्टेडियम में आयोजित करने जा रहा है। 

राजस्थान से राजेंद्र हाड़ा की रिपोर्ट. संपर्क: rajendara_hada@yahoo.co.in

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पत्रिका में उठापटक का दौर : ज्ञानेश उपाध्याय, उपेंद्र शर्मा, संतोष खाचरियवास, अमित वाजपेयी के बारे में सूचनाएं

राजस्थान पत्रिका में इन दिनों जोरदार उठापटक का दौर है। दौलत सिंह चौहान को पत्रिका जयपुर का संपादक बनाए जाने के ठीक पहले के ये हालात हैं। करीब आठ महीने पहले ही अजमेर के स्थानीय संपादक बनकर आए बिहार मूल के ज्ञानेश उपाध्याय यहां अपने पैर जमा भी नहीं पाए थे कि उन्हें जोधपुर का स्थानीय संपादक बनाकर भेज दिया गया। उनकी जगह जयपुर से भीलवाड़ा मूल के उपेन्द्र शर्मा को अजमेर का स्थानीय संपादक बनाया गया है।

पिछले दस सालों से अजमेर में उप संपादक संतोष खाचरियावास को जयपुर में नए बन रहे डिजिट्लाइज संस्करण में तबादला कर दिया गया है। कोटा के स्थानीय संपादक अमित वाजपेयी को भी जयपुर में फिर से बन रहे स्टेट ब्यूरो में जिम्मेदार पद पर लगा दिया गया है। खबर है कि अभी कई संस्करणों में काफी फेरबदल होने वाले हैं। पांच सात सालों से एक ही जगह जमे लोगों की सूची तैयार हो चुकी है। मजीठिया से निजात पाने की जुगत का शायद एक तरीका हो।

राजस्थान से राजेंद्र हाड़ा की रिपोर्ट. संपर्क: rajendara_hada@yahoo.co.in

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सूफी संत ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती और उनकी दरगाह पर हिन्दी का पहला वेब न्यूज पोर्टल तैयार हो रहा

पिछले एक दो साल से लगातार यह उधेड़बुन थी कि मीडिया के क्षेत्र में ही ऐसा कुछ किया जाना चाहिए जो नया हो। नए मीडिया न्यूज पोर्टल से थोड़ा आगे, थोड़ा हटकर और थोड़ा बहुआयामी भी। वेबसाइट, न्यूज पोर्टल, न्यूज सोर्स, रिसर्च कुलमिलाकर ऐसा ही कुछ। विषय की तलाश अपने शहर अजमेर में ही पूरी हो गई। सूफी संत ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती और उनकी दरगाह। कुछ और भी वजह रहीं। ना गांठ में पैसा था और ना ही कोई संसाधन। बस कर दी शुरूआत। इस सच्चाई को स्वीकारने में कतई संकोच नहीं है कि इसकी शुरूआती प्रेरणा भड़ास के भाई यशवंत से मिली। उन्होंने भड़ास पर कई मर्तबा पत्रकार साथियों को इस बात के लिए प्रेरित किया है कि वे नए मीडिया में आगे आएं। उनकी इस सोच का ही परिणाम Media4Khwajagaribnawaz.com है।

अजमेर से बाहर के जितने भी मिलते हैं। उनके मन में भी ख्वाजा साहब के लिए श्रद्धा, आस्था या फिर अजीब सी उत्सुकता नजर आती है। कुछ ऐसी विचित्रताएं हैं जिसने इस दिशा में और प्रेरित किया। जैसे कि 802 साल पहले ख्वाजा साहब जिस्मानी तौर पर इस दुनिया से जा चुके थे और करीब ढाई सौ साल तक उनकी मजार कच्ची रही। कि किसी को भुलाने-बिसराने के लिए यह अरसा कम नहीं होता परंतु आज वहां दस से पंद्रह हजार लोग रोजाना आते हैं। कि इस्लाम के अनुयायियों के लिए मक्का के बाद दुनिया का यह दूसरा सबसे बड़ा आस्था का केंद्र है। कि रोजाना यहां आने वाले श्रद्धालुओं में मुसलमानों से ज्यादा तादाद हिन्दुओं की है। कि यह पहला मजार है जहां महिलाओं को भी सजदा करने की इजाजत है। कि इस्लाम के चिश्तिया सिलसिले का सबसे बड़ा केंद्र ख्वाजा साहब हैं। कि चिश्तिया सिलसिले में संगीत को प्रमुखता दी गई है। कि महफिल और कव्वाली के बगैर गरीब नवाज का जिक्र अधूरा रहता है। कि हुमायूं की जान बचाने वाले और एक दिन की बादशाहत में चमड़े के सिक्के चला देने वाले भिश्ती बादशाह का मजार इसी दरगाह में है। कि शहंशाह अकबर फतहपुर सीकरी से यहां पैदल चलकर आया। कि बादशाह जहांगीर ने तीन साल यहीं रहकर हिन्दुस्तान की सल्तनत संभाली। कि शाहजहां की बेटी जहांआरा यहीं की होकर रह गई। और यह भी कि नई दिल्ली के ख्वाजा कुतुबुद्दीन के शिष्य और हजरत निजामुद्दीन औलिया के गुरू ख्वाजा साहब की दरगाह में इतिहास के ऐसे ही कई पन्ने खुले हुए हैं।

इस वेब न्यूज पोर्टल के लिए तथ्य एवं ऐतिहासिक सामग्री जुटाने में छह महीने से अधिक का वक्त लगा। करीब पचास से अधिक फारसी और उर्दू से अंग्रेजी में अनुवादित और अंग्रेजी तथा हिन्दी ग्रंथों से सामग्री जुटाई गई। कोशिश यह की गई है कि गरीब नवाज और दरगाह शरीफ के बारे मे आपके मन मे उठने वाले हर सवाल का जवाब इस वेब न्यूज पोर्टल में मिले। ख्वाजा साहब के जन्म से लेकर दुनिया से परदा कर लेने तक की पूरी जानकारी, ख्वाजा साहब की शिक्षाएं, उनकी रहमत से जुड़ी वास्तविक घटनाएं, गरीब नवाज का करम, यहां सजदा करने आई हस्तियां, दरगाह में कहां, क्या है, कौन-कौन सी ईमारतें हैं, जियारत के दौरान किन बातों का ध्यान रखा जाना चाहिए, अजमेर पहुंचने के लिए रेल और बसें, अजमेर पहुंचने के बाद किन-किन रास्तों से गुजर कर दरगाह पहुंचा जा सकता है, इस्लाम में सूफीमत, सूफी सिलसिला, सूफी तसव्वुुफ, गरीब नवाज और चिश्तिया सिलसिला, सूफी काव्य, नृत्य और संगीत, दरगाह कमेटी, अंजुमन सैयद जादगान, अंजुमन शेख जादगान, सज्जादानशीन आदि तमाम ऐसी जानकारियां हैं जो एक जगह और हिन्दी में नहीं मिल सकेगी। इसके अलावा ख्वाजा साहब और दरगाह से जुड़ी जरूरी ताजातरीन खबरें भी मुहैया रहेगी। सूफी संगीत की अपनी अलग दुनिया होती है। इसलिए हर महीने एक सूफी गाना भी इस वेब न्यूज पोर्टल पर सुनने को मिलेगा। आने वाले दिनों में दरगाह के खुद्दाम, अजमेर की होटलें, अजमेर में कहां से क्या खरीदारी कर सकते हैं, टेªवल कंपनियां, सरवाड़ शरीफ, नागौर शरीफ, तारागढ़ शरीफ आदि जानकारियां भी शीघ्र मुहैया करवाई जाएंगी। ख्वाजा साहब, गरीब नवाज और दरगाह शरीफ आदि नामो से कई वैबसाइट हैं। सब में दो बातें समान है। एक सभी अंग्रेजी में हैं और दूसरी ज्यादातर वैबसाइट वे हैं जो ख्वाजा साहब के खादिमों ने बनाई है जिनका मुख्य मकसद लोगों को जियारत के लिए आमंत्रित करना होता है।

दरगाह आने वाले जायरीन में 90 फीसदी हिन्दी भाषा बोलते-समझते हैं। इसलिए इरादा किया गया कि वेबसाइट हिन्दी में हो और इसे रूप दिया गया वेब न्यूज पोर्टल का, www.media4khwajagaribnawaz.com नाम से। एक और मकसद था विभिन्न समाचार पत्रं, पत्रिकाएं, न्यूज व फीचर एजेंसियां, वेबसाइट, न्यूज चैनल चाहें तो इस ‘वेब न्यूज पोर्टल’ की जानकारियों और खबरों का इस्तेमाल अपने लिए कर सकें। कितनी और कैसी खबरें बनती हैं इस दरगाह से। पिछले एक-दो महीने में यहां जम्मू-कश्मीर से पीडीपी की अध्यक्ष महबूबा मुफती, बांग्ला देश संसद की अध्यक्ष डॉ शीरिन शरमीन चौधरी, फिल्म निर्माता मुजफ्फर अली, अभिनेत्री करीना कपूर, शायर वसीम बरेलवी, अनवर जलालपुरी, आप पार्टी की राखी बिडला, दुनिया के सबसे बुजुर्ग चित्रकार सैयद हसन रजा, उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी, उनकी पत्नी सलमा अंसारी, अजय देवगन, क्रिकेटर अजहरूद्दीन, फिल्म अभिनेत्री मनीषा कोईराला आदि यहां जियारत के लिए आए। बाबा फरीद का चिल्ला जियारत के लिए खुला। मोहर्रम में कर्बला का मंजर और हाइदौस की परम्परा। ऐसी बहुत सी खबरें हैं जो पठनीय और जानकारी के लिए जरूरी होती हैं। वेब न्यूज पोर्टल का लिंक http://www.media4khwajagaribnawaz.com है। अभी तक कोई टीम नहीं है। एक अकेले पत्रकार, वकील और राजनीति व मीडिया विश्लेषक राजेंद्र हाड़ा का प्रयास। दस साल दैनिक नवज्योति, दस साल दैनिक भास्कर और अन्य अखबार-एजेंसियों का करीब 28 साल का पत्रकारिता व लेखन का अनुभव साथ है और विश्वास है, अकेले ही कुछ कर दिखाने का।

लेखक राजेंद्र हाड़ा अजमेर के जाने-माने पत्रकार और वकील हैं. उनसे संपर्क 09829270160 या 09549155160 या rajendara_hada@yahoo.co.in के जरिए किया जा सकता है.

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‘वन बार वन वोट’ के हाईकोर्ट आदेश का नहीं हुआ पालन

: 9 नवंबर तक राज्य के सभी वकीलों को देना था हलफनामा : अजमेर। वकीलों के कल्याण और बार एसोसिएशनों के चुनाव सुधार की कवायद जल्द पूरी होती नजर नहीं आ रही है। राजस्थान हाईकोर्ट चाहता है कि इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के तहत राजस्थान में भी जल्द से जल्द ‘वन बार वन वोट’ की नीति लागू की जाए। हाईकोर्ट ने 9 अक्टूबर को एक जनहित याचिका का फैसला करते हुए यह निर्देश भी दिए थे कि राजस्थान के सारे वकील ‘वन बार वन वोट’ की नीति का एक हलफनामा चार सप्ताह के भीतर अपनी बार एसोसिएशनों में दाखिल करें। 9 नवंबर को चार सप्ताह की यह अवधि पूरी हो रही है और अभी तक ऐसा कोई हलफनामा नहीं दिया गया है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने 9 अक्टूबर को एक जनहित याचिका ‘पूनमचंद भंडारी बनाम राजस्थान हाईकोर्ट’ में यह आदेश दिया था कि राजस्थान के सभी वकील किसी भी एक बार एसोसिएशन के सदस्य रहें और वहीं अपना वोट दें। वकील भी वे हों जो वास्तविक और नियमित रूप से अदालतों में वकालत करते हों। हाईकोर्ट का मन्तव्य था कि वकील के रूप में अपना रजिस्टेªशन करवाने के बाद नियमित वकालत नहीं करने और सिर्फ वोट देने के लिए कई बार एसोसिएशनों में सदस्य बनने वाले वकीलों की तादाद बढ़ती जा रही है और इससे कई विसंगतियां औेर दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट इस मुद्दे पर 2012 में ही एक फैसला, ‘सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन बनाम बीडी कौशिक’ में पहले की यह व्यवस्था दे चुका है। देश के कई राज्यों में यह फैसला लागू हो चुका है। राजस्थान बार कौंसिल के फैसला लागू नहीं करने पर एक वकील पूनमचंद भंडारी ने पिछले साल एक जनहित याचिका दायर कर हाईकोर्ट से प्रार्थना की कि बार कौंसिल को निर्देश दिए जाएं कि राजस्थान में शीघ्र, ‘वन बार वन वोट’ का फैसला लागू करे, एक कमेटी बनाई जाए जो नियमित रूप से वकालत करने वाले वकीलों की पहचान कर उन्हें ही वोट देने का अधिकार दे।

हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधिपति सुनील अंबवानी और वीरेंद्र सिंह सिराधना की खंडपीठ ने 9 अक्टूबर को दिए एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को ही दोहराते हुए राजस्थान बार कौंसिल को राज्य में शीघ्र ‘वन बार वन वोट’ की नीति लागू करने और नियमित वकीलों को ही यह अधिकार देेने का आदेश दिया। आदेश में कहा कि हर वकील आज यानि 9 अक्टूबर से चार सप्ताह के भीतर एक हलफनामा दे। हलफनामे में वकील को क्या कहना है वह भी फैसले में बताया गया है। आदेश के मुताबिक सभी बार एसोसिएशनों को अपने वास्तविक सदस्यों की सूची हलफनामे के साथ 10 नवंबर तक राजस्थान बार कौंसिल को भेजनी है। राजस्थान बार कौंसिल इस बात का हलफनामा हाईकोर्ट में देगी। हाईकोर्ट 17 नवंबर को इस मामले की फिर सुनवाई करेगी। राजस्थान बार कौंसिल को यह अधिकार दिया गया कि स्थानीय बार एसोसिएशनों के चुनाव की तारीख वह कभी की भी तय कर सकती है।

क्या है ‘वन बार वन वोट’
राजस्थान बार कौंसिल से वकालत का लाइसेंस मिलने के बाद एक वकील कई बार एसोसिएशनों और हाईकोर्ट बार एसोसिएशन का सदस्य बन जाता है। आम तौर पर चुनाव लड़ने वाला कोई वकील अपनी जीत की खातिर ऐसे लोगों को अपनी बार का सदस्य बनवा देता है। ऐसे सदस्यों की बाद में उस बार में कोई रूचि नहीं रहती। वे कागजों में ही सदस्य बने रहते हैं। उक्त फैसलों के कारण अब एक वकील को एक ही बार एसोसिएशन का सदस्य रहना होगा और वह वहीं वोट दे सकेगा।

यह बातें होंगी हलफनामे में
हर वकील को अपने नाम, स्थानीय पते के अलावा बताना होगा कि वह अदालतों में ‘एक्टिवली एंड रेग्यूलरली’ वकालत करता है। वह जिस बार का सदस्य रहना चाहता है, उसका नाम बताना होगा ताकि वहीं वोट दे सके। उसके खिलाफ कोई गंभीर फौजदारी मुकदमा ना तो चल रहा है और ना ही वह ऐसे किसी मुकदमे में सजायाफता है। उसके खिलाफ राजस्थान बार कौंसिल में व्यावसायिक दुराचरण की कोई इन्क्वायरी नहीं चल रही है, ना ही उसे कभी दोषी ठहराया गया है। अगर उसके खिलाफ तीन महीने से ज्यादा बार एसोसिएशन का शुल्क बकाया है तो उसे सदस्यता से हटा दिया जाए। वह बार कौंसिल ऑफ इंडिया वेल्फयर फंड का सदस्य है और उसका कोई शुल्क बकाया नहीं है। वह किसी और बार एसोसिएशन के सदस्य के रूप में वहां मतदान का अधिकार नहीं रखता है आदि।

हाईकोर्ट में दायर की रिव्यू याचिका
अजमेर जिला बार एसोसिएशन के चुनावों का समय निकल चुका है। इस बारे में जिला बार एसोसिएशन ने राजस्थान बार कौंसिल को 18 अक्टूबर को पत्र भेजकर दिशा निर्देश मांगे। राजस्थान बार कौंसिल का 3 नवंबर का पत्र 7 नवंबर को जिला बार एसोसिएशन को मिला जिसमें कहा गया कि वह राजस्थान हाईकोर्ट के 9 अक्टूबर के आदेशों की पालना करें। साथ ही बताया कि राजस्थान हाईकोर्ट में एक रिव्यू याचिका दायर की गई है, उसमें जो भी आदेश होगा आपको बता दिया जाएगा या आप स्वयं भी हाईकोर्ट से जानकारी कर सकते हैं। 

एडवोकेट एक्ट की उड़ाते हैं धज्जियां
एडवोकेट एक्ट में प्रावधान है कि कोई भी वकील किसी भी रूप में अपना प्रचार नहीं करेगा। मुकदमों या फैसलों के साथ अपना नाम छपवाएगा। वकीलों के किसी संगठन का पदाधिकारी है तो इसका उल्लेख कहीं नहीं करेगा। उसका साइनबोर्ड एक निश्चित आकार सामन्यत: दो गुणा दो फीट का काले रंग का होगा जिसमें  सफेद अक्षरों से उसका नाम लिखा जाएगा। अब रोजाना अखबारों मंे वकीलों के बधाई आदि के विज्ञापन, होर्डिंग नजर आते हैं। अखबारों में प्रेस नोट और टीवी चैनलों पर बाइट्स दी जाती है। वकील के खानदान के सभी वाहनों स्कूटर, मोटरसाइकिल, कार, जीप यहां तक कि सवारी वाहन और लोडिंग टेम्पो तक पर वकीलों के लोगो के स्टीकर लगे नजर आ जाएंगे।

अजमेर से वरिष्ठ पत्रकार और वकील राजेंद्र हाड़ा की रिपोर्ट.

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