मुस्लिम लड़के से प्यार में धोखा खाई तो मरने के पहले पूरे कौम को कमीना बता गई (पढ़ें पत्र)

Sanjay Tiwari : वह दलित होकर भी वेमुला नहीं थी। न ही अखलाक हो पायी थी। आनंदी होती तो टीवी रोता। सोशल मीडिया भी निंदा ही करता लेकिन उसका दुर्भाग्य यह था कि वह न रोहित थी, न टीवी की आनंदी, इसलिए बिहार के एक जिले में सिंगल कॉलम की खबर बनकर रह गयी। लेकिन पूनम भारती की मौत का एक संदेश है। उसी तरह का संदेश जैसे रोहित वेमुला की मौत में एक संदेश था। पूनम भारती एक ऐसे झूठे फरेब का शिकार हुई जिससे वह प्यार के आवेग में बच नहीं पायी।

बिहार में जहानाबाद की पूनम भारती जिस कोचिंग इंस्टीट्यूट में पढ़ने जाती थी वहां जाल बिछाये एक बहेलिये ने उसे फंसा लिया। “प्यार” के इस फंदे में फंसकर पूनम वहां तक चली गयी जहां कोई लड़की शादी से पहले जाने से बचती है। लेकिन जहांगीर ने तो उसे अपनी पत्नी बता ही दिया था लिहाजा जहांगीर ने उसे बिना शादी के “पेट” से कर दिया। यहां से आगे का रास्ता पूनम के लिए या तो जहांगीर के साथ जाता था, नहीं तो फिर कहीं नहीं जाता था। पूनम ने घर में कुछ भी नहीं बताया था कि वह एक ऐसे लड़के के प्यार में पड़ चुकी है जो उसकी जाति और धर्म का नहीं था। पेट का बच्चा गिराकर जहांगीर उसका साथ पहले ही छोड़ चुका था। इसके बाद वह कहां जाती? उसने एक छोटी सी चिट्ठी लिखी और पटना गया रेलवे लाइन को अपनी जिन्दगी का आखिरी मुकाम बना लिया।

उसने जो चिट्ठी लिखी है उसमें एक पूरी कौम को कसूरवार ठहराया है। “मियां जात कमीना होता है। इसकी जुबान पर कभी भरोसा नहीं करना चाहिए।” रोहित वेमूला की तरह पूनम दलित होकर भी किसी ब्राह्मणवाद का शिकार नहीं हुई है। वह एक और वाद का शिकार हुई है जिसकी बुनियाद में ऐसे मौलवी और उनकी मानसिक संतान बैठे हुए हैं जो एक खास किस्म के “जिहाद” पर है। यह “जिहाद” एक मुशरिक को “पाक” बनाने की प्रक्रिया है। पूनम भारती शायद इसी मानसिकता का शिकार हो गयी। अगर ऐसा न होता तो इतनी बड़ी बात वह कभी न लिखती कि “मियां जात” पर कभी भरोसा मत करना।

लेकिन पूनम भारती की मौत पर सवाल के सारे दरवाजे हमारी बौद्धिक दुनिया ने “लव जिहाद का झूठा प्रलाप” बताकर पहले ही बंद कर दिया है। हमारे समय की त्रासदी यही है कि हमने धोखा, फरेब और मौत का भी मजहबीकरण कर दिया है। ऐसे हालात में पूनमों के हिस्से में भले ही मौत हो लेकिन जहांगीरों के हिस्से में पूरी आजादी है। वे जो चाहें कर सकते हैं उसको बौद्धिक संरक्षण देनेवाले लोग दो मिनट का मौन तो रखेंगे लेकिन श्रद्धांजलि देने के लिए नहीं बल्कि चुप्पी साधने के लिए।

वेब जर्नलिस्ट संजय तिवारी के एफबी वॉल से. उपरोक्त स्टेटस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं…

Shahnawaz Malik : दिल्ली में हर दिन शादी का झांसा देकर रेप और ख़ुदकुशी की कहानी छपती है। आरोपी सारे तिवारी शर्मा होते हैं। ख़ैर नफ़रत कम फैलाएं वरना इतिहास में नफ़रत फ़ैलाने वालों में.

Gaurav Sharma : Shehnawaj ji Delhi main Ek bhi crime ki khabar dikhao Jis main koi musalman na ho.

Shahnawaz Malik : शर्माजी…या तो रिकॉर्ड खंगालिए या फिर योगा करिए

Saurabh Dwivedi : इतिहास में नफरत फ़िलहाल एक ही कौम फैलाती आई और फैलाती रहेगी. रोज़ हज़ारो लाखो मासूमो को अपना निशाना बना कर कभी सुसाइड बॉम्बर बन के तो कभी आतंकवादी हमले करके उससे भी जी नहीं भरा तो लव जिहाद पे उतारू है

Shahnawaz Malik : तिवारीजी की वाल पर ट्रैफिक का स्टैंडर्ड काफी लो है। रेटोरिक कब तक करेंगे।

राकेश कुमार मिश्रा : कोई आवाज़ नहीं उठेगी कहीं से। अगर कोई विरोध करेगा भी तो उसे सेक्यूलर लोग संघी कह कर दो समुदायों में दरार पैदा करने की साज़िश कह कर ख़ारिज कर देंगे। वैसे मुझे इस लड़की के साथ कोई सहानुभूति नहीं है। अवैध सम्बन्ध बनाते समय तो इसने कुछ नहीं सोचा अपने माँ बाप और परिवार की इज़्ज़त के बारे में और लेटर में लेक्चर झाड़ रही है।

Yusuf Ansari : संजय भाई, आपने पूनम की आवाज बुलंद करके अच्छाी काम किया है। मरने वाले का बयान सच्चा माना जाता है। मैं भी चाहता हूं कि पूनम को खुदकुशी के लिए मजबूर करने वाले को सज़ा मिले। मैं भी आपकी पोस्ट शेयर कर रहा हूं।

Shahnawaz Malik : यूसुफ़ साब…दिल्ली समेत पूरे देश में हर दिन इसी तरह के रेप और मर्डर के मामले होते हैं, आप उसे क्यूं नहीं शेयर करते?

Yusuf Ansari : भाई Shahnawaz Malik, मैं न्याय के पक्ष में हूं और अन्याय के ख़िलाफ़। मेरा मानना है कि सबको इंसाफ़ मिलनमा चाहिए। बग़ौर घार्मिक और जातीय भेदभाव के। मैंने पहले भी ऐसी कई पोस्ट शेयर की हैं। आगे भी करूंगा। आपने याद दिलाया है तो और ज़्यादा ध्यान रखूंगा।

Shahnawaz Malik : न्याय के पक्ष में कौन नहीं है। तिवारी की इस पोस्ट में घृणा है और तर्क सारे खोखले। रोहित या अख़लाक़ अपनी पहचान की वजह से मारे गए, जबकि इस मामले में ऐसा नहीं है। रेप और मर्डर के सामान्य केस में जाति और धर्म जोड़ने से न्याय होगा या नहीं लेकिन अन्याय ज़रूर होगा।

Yusuf Ansari : भाई Shahnawaz Malik, आपकी बात सही है। लेकिन क्या सिर्फ़ इसी वजह से हम इंसाफ के लिए आवाज़ छोड़ देें। पूनम को प्यार में धोखा मिला है। ये धोखा उसे जहंगीर की जगह कोई जसबीर भई दे सकता था। उसके साथ नाइंसाफ़ी तो ङुई है।

Shahnawaz Malik : ये एक नॉर्मल क्राइम है जो दिल्ली और देश के हर कोने में हर दिन होता है। आप आवाज़ उठाएंगे तो मैं पूछूँगा कि बाक़ियों के लिए क्यों नहीं उठाया। तिवारी का तो मकसद समझ आता है क्योंकि इसमें आरोपी मुस्लिम है। ये लोग दिनभर यही करते हैं।

Yusuf Ansari : भाई Shahnawaz Malik, सबके लिए इंसा की आवाज उठनी ही चाहिए। हम हिंदू और मुसलमान छोड़कर इंसान की बात करें तो बेहतर है।

Shahnawaz Malik : काश आप जैसा तिवारी महाशय भी सोचते। मैं इस लड़की के लिए आवाज़ फिर भी उठा सकता हूँ लेकिन ये पोस्ट नहीं शेयर करूँगा।

Yusuf Ansari : हमें शुरुआत अपने से करनी चाहिए। हमने शुरुआत कर दी है। इंशाल्लाह नतीजे अच्छे ही होंगे। Shahnawaz Malik भाई, कोई बात नहीं आप आवाज़ उठाइए। पोस्ट शेयर मत कीजिए। आपकी आवाज़ यहीं से दूक तर जाएगी।

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क्या गूगल, क्या माइक्रोसॉफ्ट और क्या फेसबुक… आप सबके लिए मोहरे हैं…

Sanjay Tiwari : इंटरनेट पर आजादी की दुहाई के दिन फिर से लौट आये हैं। फेसबुक अगर नयी तैयारी से मुफ्त सेवा देने के लिए कमर कसकर दोबारा लौटा है तो उसी फेसबुक पर उसकी इस मुफ्त सेवा का मुखर विरोध भी शुरू हो गया है। अच्छा है। जनता के हक हित और आजादी की मांग तो होनी ही चाहिए लेकिन आजादी की यह दुहाई थोड़ी बचकानी है। जिन दिनों फेसबुक मैदान में उतरा ही था उन दिनों भी कहा गया था कि यह प्राइवेसी में बहुत बड़ी सेंध लग रही है। लेकिन सेंध क्या? फेसबुक ने तो पूरा पनारा ही खोल दिया। क्या हुआ प्राइवेसी का? यह जानते हुए कि आपकी प्राइवेसी को सचमुच खतरा है फिर भी क्या बिना फेसबुक एकाउण्ट बनाये रह सकते हैं आप?

और फेसबुक तो बहुत बाद में आता है। उसके पहले आता है वह प्लेटफार्म जहां खड़े होकर आप फेसबुक ट्विटर का तामझाम फैलाते हैं। एन्डरॉयड। जो कि दुनिया के अस्सी फीसदी से ज्यादा स्मार्टफोन एन्डरॉयड पर चल रहे हैं। आपको मुफ्त सेवा देनेवाली गूगल बदले में आपसे कहां कहां से क्या क्या ले रही है, कभी ख्याल आया क्या? कभी आपने सोचा कि गूगल ने सर्च इंजन के बाद सबसे ज्यादा पैसा एण्डरॉयड के विकास पर ही क्यों खर्च किया?

यह मार्केट इकोनॉमी है साहब और यहां कुछ भी मुफ्त नहीं होता। न तो वालस्ट्रीट में बैठे पूंजीपति मूर्ख हैं और न ही सिलिकॉन वैली में मंहगी पगार लेनेवाले कोई जनक्रांति कर रहे हैं। क्या गूगल, क्या माइक्रोसॉफ्ट और क्या फेसबुक। आप सबके लिए मोहरे हैं। वे जैसा चाहेंगे चाल चलेंगे और आपको उन्हीं की मर्जी के मुताबिक अपनी आजादी की सीमारेखा भी तय करनी पड़ेगी। पिंजरे में बंद तोता पिंजरे में कितनी उछलकूद करके टांय टांय कर ले, उछलकूद करने से वह आजाद नहीं हो जाता। उसे खाने के लिए एक लाल मिर्ची मिल जाती है। बस।

वरिष्ठ वेब जर्नलिस्ट संजय तिवारी के फेसबुक वॉल से.

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रजत अमरनाथ को दुबारा हार्ट अटैक, संजय तिवारी की हालत स्थिर

दो पत्रकार साथियों के स्वास्थ्य को लेकर सूचनाएं आ रही हैं. वरिष्ठ पत्रकार रजत अमरनाथ को दुबारा हार्ट अटैक हुआ. उन्हें तत्काल अस्पताल में भर्ती कराया गया और उनकी एंजियोग्राफी की गई. आपरेशन सफल रहा. फिलहाल वह बेड रेस्ट पर हैं. रजत अमरनाथ को मई माह के शुरुआत में ही एक बार हार्ट अटैक हुआ था. बाद में मई आखिरी सप्ताह से पहला दुबारा और तगड़ा हार्ट अटैक आया. डाक्टरों ने ब्लाकेज ज्यादा देखकर तुरंत एंजियोग्राफी करने का फैसला लिया और उनके हार्ट में ब्लाकेज हटाकर वहां छल्ला डाला गया. रजत अमरनाथ को खानपान और लाइफस्टाइल में बदलाव की सलाह डाक्टरों ने दी है.

उधर, विस्फोट डाट काम के संजय तिवारी का स्वास्थ्य स्थिर है. यूरिन इनफेक्शन और कमजोरी के कारण दिनोंदिन उनकी हालत बिगड़ती जा रही थी. दिल्ली की आम आदमी पार्टी की सरकार में मंत्री गोपाल राय ने संजय तिवारी की सेहत के बारे में जानकारी मिलने पर एक टीम भेजकर परीक्षण कराया. संजय इन दिनों आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा की शरण में हैं. उनकी हालत स्थिर है. लगातार अकेलापन, आर्थिक तंगी, अवसाद और अन्य कई वजहों से संजय दिनोंदिन कमजोर होते गए और एक क्षण ऐसा आया जब वह बिस्तर से उठने के काबिल न रहे. तब उनके कुछ परिचितों, कुछ दूर के परिजनों ने संबल दिया और अपने घर ले जाकर खान-पान के साथ दवा वगैरह की व्यवस्था की. फिलहाल संजय शारीरिक कमजोरी और आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं.

 

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एबीपी न्यूज के पत्रकार का अनुवाद, जी न्यूज के एंकर का आत्मविश्वास, इंडिया टीवी और आईबीएन7 के एंकरों की निर्दयी आवाज!

Sanjay Tiwari : आस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री टोनी एबट अपने बयान में टेररिस्ट कहने की बजाय पोलिटिकली मोटिवेटेड पर्पेट्रेटर शब्द का इस्तेमाल कर रहे थे लेकिन एबीपी न्यूज अपने स्क्रीन पर “पर्पेट्रेटर” शब्द का अनुवाद “आतंकवादी” कर रहा था. आखिर हमारे चैनलों को “आतंकवाद” फैलाने की इतनी जल्दी क्यों रहती है?

“दिल्ली के खान मार्केट में सुरक्षा के कोई पुख्ता इंतजाम नहीं है इसलिए अगर सिडनी जैसी कोई घटना दिल्ली में घटती है तो आप समझ सकते हैं अंजाम क्या होगा?” बख्तरबंद लगाओ गृहमंत्री जी. सेना बुलाओ. बस्सी साहब को काम पर लगाओ. जो करना है जल्दी करो. एबीपी न्यूज पर खबर आ गयी है. 🙂

चार बार अल ‘नसूरा’ अल ‘नसूरा’ करने के बाद जी न्यूज की एंकर ने बहुत आत्म विश्वास से ‘अल नुसरा’ के आस्ट्रेलिया में शामिल होने की पूरी जानकारी दी और ब्रेक पर चली गयी. हाय! 🙂

पेशावर में अब तक १०० से ज्यादा बच्चों के मौत की जानकारी देते हुए इंडिया टीवी और आईबीएन-7 की महिला एंकरों के लहजे में कोई नर्मी नहीं आई. आंखें नम न हुईं हो तो न सही, थोड़ा लहजा ही नम कर लेती मोहतरम!

भारतीय टीवी चैनलों पर पेशेवर महिला एंकरों की निर्दयी आवाजें पेशावर से बड़ा सदमा दे रही है. क्या उन्हें मासूम मौतों और हादसों के एंकरिंग की कोई ट्रेनिंग नहीं दी गयी है कि नकली ही सही, थोड़ी सी संवेदनशील दिख जाएं.

वेब जर्नलिस्ट संजय तिवारी के फेसबुक वॉल से.

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हरियाणा में आर्यसमाजियों की सरकार है, इसलिए संत रामपाल के खिलाफ कार्रवाई तेज कर दी गयी है

Sanjay Tiwari : झगड़ा आर्यसमाज बनाम कबीरपंथ का है। 2006 के जिस मर्डर केस में संत रामपाल आरोपी बनाये गये हैं, सतलोक आश्रम के बाहर वह झड़प आर्यसमाज के समर्थकों के साथ ही हुई थी। बाबा निजी तौर पर मर्डर में शामिल थे या नहीं, यह अदालत जाने लेकिन जो दुनिया जानती है वह यह कि आर्यसमाजवाले किसी भी कीमत पर कबीरपंथी संत रामपाल और उनके सतलोक आश्रम को बर्दाश्त नहीं कर रहे थे।

अब तक तो यह न हो सका क्योंकि प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी। लेकिन अब इसलिए हो रहा है क्योंकि अब प्रदेश में आर्यसमाजियों की सरकार है। मुख्यमंत्री जी खुद आर्य हैं, और मुख्यमंत्री का प्रेस सलाहकार भी आर्य ही नियुक्त किया गया है। इसलिए कार्रवाई तेज कर दी गयी है। नहीं तो गैर जमानती वारंट तो दीपेन्द्र हुड्डा के नाम आज भी बनारस के कोर्ट में जारी किया रखा है। देश दुनिया की छोड़िये शायद दीपेन्द्र हुड्डा को भी इस बात का पता न हो।

वेब जर्नलिस्ट संजय तिवारी के फेसबुक वॉल से.

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गांधी जी को जब बनारस के एक पंडे ने काफी भला-बुरा कहा था…

Sanjay Tiwari : एक बार गांधी जी भी काशी गये थे. तब जब वे देश के आंदोलन का हिस्सा नहीं हुए थे. इन दिनों वे दक्षिण अफ्रीका में गिरमिटिया आंदोलन को गति दे रहे थे और उसी सिलसिले में समर्थन जुटाने के लिए भारत भ्रमण कर रहे थे. इसी कड़ी में वे काशी भी पहुंचे थे. बाबा विश्वनाथ का आशिर्वाद लेने के बाद बाहर निकले तो एक पंडा आशिर्वाद देने पर अड़ गया. मोहनदास गांधी ने जेब से निकालकर एक आना पकड़ा दिया. पंडा जी को भला एक पैसे से कैसे संतोष होता? आशिर्वाद देने की जगह बुरा भला कहना शुरू कर दिया और पैसा उठाकर जमीन पर पटक दिया.

मोहनदास तो ठहरे मोहनदास. उन्होंने वह एक पैसा उठाकर जेब में रख लिया और आगे बढ़ने को हुए कि पंडा चिल्लाया ‘क्या करता है अधर्मी.’ मोहनदास ने कहा आपको इतनी कम दक्षिणा नहीं चाहिए और मैं इससे ज्यादा दूंगा नहीं. झट पंडे ने पैंतरा बदला, एक तो कम दक्षिणा देकर तू खुद नर्क का भागी बन रहा है. तो क्या मैं भी इंकार करके तेरी तरह नर्क का भागी बन जाऊ. गांधी जी ने वह एक आना पंडे को पकड़ा दिया और वहां से बाहर आ गये.

वेब जर्नलिस्ट संजय तिवारी के फेसबुक वॉल से.

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बाघा बार्डर पर जिस जुनदुल्लाह ने आत्मघाती हमले की जिम्मेदारी ली है वह तहरीके तालिबान से अलग हुआ धड़ा है

Sanjay Tiwari : विशेषज्ञ इसे भारत के लिए चिंता की बात बताएं, इससे पहले बता दें कि बाघा बार्डर पर जिस जुनदुल्लाह ने आत्मघाती हमले की जिम्मेदारी ली है वह तहरीके तालिबान से अलग हुआ धड़ा है. वही तहरीके तालिबान जिसके सफाये के लिए पाकिस्तान नये सिरे से वजीरीस्तान इलाके में सैन्य अभियान संचालित कर रहा है. पाकिस्तान में दो तरह के तालिबान हैं. वजीरिस्तान के तालिबान और पंजाब के तालिबान. अकेले पंजाब में करीब आधा दर्जन तालिबान हैं जबकि वजीरिस्तान में अमीबा की तर्ज पर एक तालिबान से दूसरा तालिबान पैदा होता रहता है. जो भी नया तालिबान पैदा होता है वह पंजाब के तालिबान को अपना दुश्मन नंबर एक मानता है फिर भले ही उनकी रहनुमाई सैन्य संपर्कों वाला हाफिज सईद ही क्यों न करता हो.

पाकिस्तान में जब तक जरदारी रहे, पंजाब के तालिबान पिंजड़े में बंद रहे. कभी कभी कराची में कोई छोटी (और बड़ी भी) वारदात कर देते थे. लेकिन बीते जनरल असेम्बली इलेक्शन में पंजाबी तालिबानियों ने नवाज शरीफ की पार्टी का जमकर सपोर्ट किया और पूरे पंजाब में शरीफ परिवार की जय जयकार हो गई. शायद यही कारण है कि प्रधानमंत्री बनने के बाद नवाज शरीफ ने जब काउंटर टेररिज्म आपरेशन स्टार्ट किया तो सारी सैन्य कार्रवाई वजीरीस्तान में शुरू की गई. जबकि पंजाब के आतंकी गुटों को धन देकर धार्मिक और राजनीतिक प्रक्रिया में शामिल करने की कोशिश शुरू कर दी गई.

जाहिर है वजीरीस्तान के तालिबानों को यह क्योंकर पसंद आयेगा भला. इसलिए कराची एयरपोर्ट पर हुए आतंकी हमले के बाद अब उन्होंने पंजाब को निशाना बनाया है. यह हमला सीधे सीधे पाकिस्तान को चेतावनी है कि अगर तुम हमारे घर में घुसकर हमें मार सकते हो तो हम भी तुम्हारे घर में घुसकर तुम्हें मार सकते है. ‘तुम्हारे’ मतलब पंजाब का शरीफ परिवार और ‘घर’ मतलब पंजाब और लाहौर. हो सकता है उन्होंने जानबूझकर बाघा बार्डर का चुनाव किया हो ताकि पूरे सुरक्षातंत्र और सेना को बताया जा सके कि दुश्मन की सेना से बाद में निपटना पहले हमसे निपट लो.

वेब जर्नलिस्ट संजय तिवारी के फेसबुक वॉल से.

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डा. सुब्रमण्यम स्वामी पर आंख मूंद कर भरोसा न करें, ये झूठ भी बोलते हैं, देखिए दो तस्वीरें

Sanjay Tiwari : पहला चित्र देखिए जिसमें एक यजीदी लड़की रोते हुए कह रही है कि कैसे आइसिस के मुस्लिम हत्यारों ने उसके साथ लगातार तीस बार बलात्कार किया और उसे खाना खाने तक की फुर्सत नहीं दी गई. अपने फेसबुक वॉल पर यह ‘शंखनाद’ करनेवाले कोई और नहीं बल्कि देश के ”महान हिन्दू राष्ट्रवादी नेता” डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी है. स्वामी जी के झूठ को सच मानने से पहले अब जरा दूसरी तस्वीर देख लीजिए.

स्वामी जी जिसे बलात्कार पीड़ित यजीदी लड़की बता रहे हैं वह लड़की न यजीदी है और न ही इराक में संजर उसका घर. यह एक फिलिस्तीनी मुस्लिम लड़की है जिसके पिता उसी इजरायल के हवाई हमले में मारे गये थे जिस इजरायल की स्वामी हिमायत करते हैं. वह स्वामी जी के “बलात्कार की पीड़ा” से नहीं बल्कि अपने पिता की मौत पर रो रही है. जुलाई के आखिरी हफ्ते में यह तस्वीर वाशिंगटन पोस्ट में ‘बेस्ट फोटो आफ द वीक’ शीर्षक से प्रकाशित हुई है.

वेब जर्नलिस्ट संजय तिवारी के फेसबुक वॉल से.

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कर्मचारियों का हक छीनकर अमीर होनेवाले कारोबारियों के लिए सावजी काका इस दीवाली सबसे बढ़िया तोहफा

Sanjay Tiwari : सावजी काका सत्तर के दशक में सूरत आये थे. खाली हाथ. काम की तलाश में. उधार लेकर हीरा कारोबार शुरू किया और आज 45 साल के कारोबारी संघर्ष के बाद 6000 करोड़ के श्रीकृष्णा इंटरप्राइज के मालिक हैं. कारोबार का यह कोई इतना बड़ा कारू का खजाना नहीं है कि उनका विशेष तौर पर जिक्र किया जाए लेकिन कल से वे इसलिए चर्चा में हैं कि उन्होंने अपने यहां काम करनेवाले 1200 कर्मचारियों को 50 करोड़ खर्च करके कार, घर और ज्वैलरी का दीपावली तोहफा दिया है. हालांकि कारोबार के ऐवज में बोनस की रकम भी इतनी बड़ी नहीं है कि सावजी काका को सिरमाथे पर बिठा लिया जाए.

सावजी काका


 

लेकिन सावजी काका की तारीफ होनी चाहिए. जमकर होनी चाहिए. क्योंकि पूंजीवादी शोषण के ऐसे दौर में जब कर्मचारियों का शोषण लाभांश बढ़ाने का सबसे बड़ा हथियार हो गया हो तब सावजी काका या नारायणमूर्ति जैसे लोग समझाते हैं दौलत अपनों के बीच बांटने से भी बढ़ती है. वे अपने कारीगरों को औसत एक लाख से ऊपर महीने का मेहनताना देते हैं. वे मानते हैं कि उनका पूरा कारोबार उन्हीं कारीगरों की बदौलत चलता है जिन्हें वे बोनस बांटकर नाम कमा रहे हैं. सूरत वाले सावजी काका की यही समझ शायद उन्हें यहां तक लाई है. कर्मचारियों का पेट काटकर, हक छीनकर अमीर होनेवाले कारोबारियों के लिए सावजी काका इस दीवाली पर सबसे बढ़िया तोहफा है.

वेब जर्नलिस्ट संजय तिवारी के फेसबुक वॉल से.

मूल खबर….

हीरा कंपनी के मालिक ने कर्मचारियों को 4-4 लाख रुपये दिए, बोनस भी अलग से

अहमदाबाद : दिवाली के मौके पर अपने कर्मचारियों को तोहफा देते हुए सूरत की एक हीरा कंपनी हरि कृष्णा एक्सपोर्ट्स ने अपने 1,268 कर्मचारियों को 4-4 लाख रुपये दिए हैं। इन कर्मचारियों में सफाईकर्मी भी शामिल हैं। कर्मचारियों को यह राशि कार, फ्लैट तथा आभूषण खरीदने के लिये दी गई है। कंपनी ने यह सालाना दिवाली बोनस के अलावा दिया है। इससे कंपनी पर 50 करोड़ रुपये का खर्चा आएगा। हरि कृष्ण एक्सपोर्ट्स के चेयरमैन तथा प्रबंध निदेशक सावाजी ढोलकिया ने यहां कहा कि सभी कर्मचारियों को दिये गये दिवाली बोनस के अलावा हम निष्ठावान, मेहनती तथा समर्पित कर्मचारियों को पुरस्कृत करने के लिये एक कार्यक्रम चला रहे हैं। उनके एक साल के कामकाज का मूल्यांकन करने के बाद हमने ऐसे 1,268 कर्मचारियों को चुना है।

ढोलकिया ने कहा कि कुल 6,000 कर्मचारियों में से प्रबंधन ने उल्लेखनीय काम, कंपनी के प्रति समर्पण तथा निष्ठा के आधार पर 1,268 कर्मचारियों को चुना है। उन्होंने कहा कि हमने इन प्रत्येक कर्मचारियों को 4-4 लाख रुपये दिए हैं। इससे कंपनी पर करीब 50 करोड़ रुपये का खर्च आएगा। यह कर्मचारियों पर छोड़ा गया है कि वे कौन सा उपहार चाहते हैं। उदाहरण के लिये जिनके पास कार और फ्लैट है, वे आभूषण का विकल्प चुन सकते हैं। इससे कर्मचारियों का मोराल बढ़ेगा और अन्य को अच्छा काम करने के लिये प्रेरित करेगा। ढोलकिया ने कहा कि 491 कर्मचारियों ने कार खरीदने के विकल्प को चुना जबकि 207 कर्मचारियों ने फ्लैट एवं 570 ने आभूषण को चुना।

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शाओमी एमआई3 का डाटा एक रिमोट सर्वर पर सेव होता है जिसके बारे में ग्राहक को पता नहीं होता!

Sanjay Tiwari : शाओमी एमआई 3. नाम सुनते ही खरीदने के लिए मन मचल जाए. शायद ही मोबाइल का कोई ऐसा मनचला हो जो 14 हजार रूपये वाले इस बेहतरीन फोन को खरीदने का ख्वाब न पाल बैठा हो. फ्लिपकार्ट पर तो ऐसी मारामारी मची है जैसी कभी आईफोन के लिए भी न हुई.

लेकिन एमआई के दीवानों के लिए एक बुरी खबर. शाओमी के फोन, फेबलेट और टेबलेट सिर्फ इलेक्ट्रानिक उपकरण ही नहीं बल्कि किसी ‘अनजान व्यक्ति या संस्था’ के लिए जासूसी के हथियार हैं. शाओमी कंपनी भी स्वीकार कर चुकी है कि उसके उत्पादनों का डाटा एक रिमोट सर्वर पर सेव होता है जिसके बारे में ग्राहक को पता नहीं होता. तो अपनी निजता या अपने देश की सुरक्षा की चिंता हो तो एमआई फोन की दीवानगी पर थोड़ा काबू रखिए. यह आपके और आपके देश, दोनों के हित में होगा.

विस्फोट डाट काम के संपादक संजय तिवारी के फेसबुक वॉल से.

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विस्फोट डाट काम के संपादक संजय तिवारी पर जानलेवा हमला, आरोपी अब भी पुलिस गिरफ्त से बाहर

विस्फोट डाट काम के संपादक और संस्थापक संजय तिवारी पर पिछले दिनों जानलेवा हमला हुआ. उनके दरियागंज स्थित आवास पर उनका एक पुराना जानकार अनूप शक्ति नामक बीस बाइस साल का युवक पहुंचा. वह पूरी तैयारी के साथ आया था. उसने बैग में रस्सी, क्लोरोफार्म, हथौड़ी, कैंची आदि लिया हुआ था. उसे देख और शुरुआती बातचीत के बाद जब संजय तिवारी कुछ ही देर के लिए घर से बाहर निकलने को दरवाजे की तरफ मुड़े तो उस अनूप शक्ति नामक युवक ने पीछे से सिर पर हथौड़े से वार कर दिया. संजय तिवारी चिल्लाते हुए गिर गए. आरोपी अनूप शक्ति इस बीच संजय तिवारी को घसीटकर पीछे के कमरे में ले जाने लगा. संभवतः वह मर्डर कर देने के इरादे से आया था और यही काम करने के लिए वह संजय को घसीटते हुए पीछे के कमरे में ले जाने लगा. पर संजय तिवारी की तेज-तेज चीख-चिल्लाहट के कारण मकान मालिक आ गए और अंदर से बंद कमरे को बाहर से जोर-जोर से खटखटाने लगे.

बाहर किसी आदमी के होने की बात जानकर आरोपी अनूप शक्ति थोड़ा ठिठका और कुछ देर बाद झटके में दरवाजा खोलकर तेजी से भाग खड़ा हुआ. वह जल्दबाजी में अपना बैग भी छोड़कर भाग गया जिसमें पर्याप्त मात्रा में गांजा के साथ क्लोराफार्म, हथौड़ा, रस्सी आदि चीजें थीं. आरोपी अनूप शक्ति अपने घर गया और वहां जाकर कह आया कि उसने संजय तिवारी का मर्डर कर दिया है. पुलिस ने आरोपी के खिलाफ 307 की बजाय सिर्फ 308 की धारा में रिपोर्ट दर्ज किया है. आरोपी अनूप शक्ति और उसके परिजनों से संजय तिवारी की काफी पुरानी जान-पहचान है. संजय का आरोपी के घर आना जाना भी है और पूरे परिवार से बेहद निजी ताल्लुकात हैं. आशंका है कि किसी घरेलू बात को लेकर या घर के किसी मसले में संजय तिवारी की दखलंदाजी को लेकर आरोपी अनूप शक्ति ने संजय तिवारी का मर्डर करने का इरादा कर लिया. हालांकि हमले की असली वजह अभी तक स्पष्ट नहीं है क्योंकि हमलावर फरार हैं और पीड़ित संजय तिवारी खुद नहीं समझ पा रहे कि उसने क्यों जानलेवा हमला किया.

घटना के कई दिन बाद भी हमलावर पुलिस के गिरफ्त से बाहर है, जिससे दरियागंज कोतवाली पुलिस की कार्यशैली पर सवाल खड़े हो रहे हैं. हमलावर अनूप शक्ति अब भी संजय तिवारी से ह्वाट्सएप के जरिए संपर्क साधने की कोशिश कर रहा है और यह बताने की कोशिश कर रहा है कि उसे किसी ने गुमराह किया जिसके कारण वह मर्डर करना चाहता था. कई दिनों तक दरियागंज के एक अस्पताल के आईसीयू में भर्ती रहने के बाद आज दोपहर संजय तिवारी वहां से डिस्चार्ज हो गए. सिर, आंख और गर्दन के आसपास भारी चोट के शिकार हुए संजय को करीब दस टांके लगे हैं. पुलिस ने उनके कमरे जो कि घटनास्थल है, को फोटोग्राफी के बाद सील कर दिया है. संजय तिवारी किसी अपने परिचित के यहां अज्ञात स्थान पर रहने के लिए चले गए हैं. संजय तिवारी का कहना है कि वे खुद आश्चर्यचकित हैं कि वह पुराना परिचित आखिर क्यों मर्डर करने की नीयत लेकर आया था.

कुछ लोगों का कहना है कि पूरे प्रकरण में रहस्य की कोई एक परत है जो खुलने से बची हुई है. बेहद शांत, ईमानदार, आध्यात्मिक और जनपक्षधर वेब जर्नलिस्ट संजय तिवारी के जीवन पर इस घटनाक्रम का बड़ा असर पड़ेगा और वह अपने जीवन दर्शन को नए सिरे से पुनर्परिभाषित करने को मजबूर होंगे. ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर के सिद्धांत पर जीने वाले संजय तिवारी कहते हैं- ‘मुझे खुद भी सपने में तनिक अंदाजा न था कि मेरे पर कभी कोई जानलेवा हमला करेगा, वह भी मेरे घर के अंदर और हमलावर कोई और नहीं बल्कि मेरा जानकार परिचित करीबी होगा.” यह तो चमत्कार हुआ कि संजय तिवारी की जान बच गई लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या संजय तिवारी हमलावर अनूप शक्ति को दंडित कराएंगे और इसके लिए अभियान चलाएंगे या उसे चुपचाप माफ कर पूरे मामले को बीती बात मानकर भुला देंगे. संजय तिवारी फिलहाल गंभीर चोटों के शिकार हैं और आराम कर रहे हैं. उन्होंने फेसबुक पर खुद यह लिखकर सबको चैन की सांस दे दी है कि वे बाल-बाल बच गए हैं और अब बिलकुल ठीक हैं.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की रिपोर्ट.

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दिल्ली में रिलायंस की बिजली कंपनियां दंगाई हो गई हैं

Sanjay Tiwari : दिल्ली में रिलायंस की बिजली कंपनियां दंगाई हो गई हैं. जबसे यह नयी सरकार बनी है तबसे उनके हौसले कुछ ज्यादा ही बुलंद हैं. महीने के महीने बिल और दस दिन की देर हो जाए गुण्डे जैसे बिजली कर्मचारी दरवाजे पर. बिल भरो नहीं तो बिजली काट देंगे.

दिल्ली में अभी तक दो महीने का बिल एकसाथ आता था और एक बिल (दो महीने) का ग्रेस पीरियड होता था जमा करने के लिए. तब इतनी मुश्किल नहीं थी. लेकिन लगता है अब बिजली कंपनियों के मुंह मनमानी मुनाफाखोरी का खून लग चुका है! शायद इसीलिए उनके कर्मचारी खून बटोरने के लिए पूरी दिल्ली में यमदूत बने घूम रहे हैं.

वेब जर्नलिस्ट संजय तिवारी के फेसबुक वॉल से.

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