लेफ्टिस्ट से लेकर राइटिस्ट तक, हर कोई दे रहा राज किशोर को श्रद्धांजलि

वरिष्‍ठ पत्रकार Raj Kishore नहीं रहे। मैं उनके लिखे का प्रशंसक था। आम बोलचाल की भाषा में सरलता-सहजता से वे जिस तरह गंभीर बात लिख जाते थे, वह उन्‍हें विशिष्‍ट बनाता था। हिंदी के अनेक समाचार-पत्रों में उनके स्‍तंभ थे। दैनिक जागरण, जनसत्ता, अमर उजाला आदि में उनके नियमित लेख छपते थे। मैं बड़े ही चाव से पढ़ता था। कारण कि वे गांधी और लोहिया के विचारों के आलोक में लेखन करते थे और मैं भी इन दोनों महापुरुषों के विचार से अनुप्राणित होता हूं। वे साम्‍यवाद के आलोचक थे। Continue reading

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नंदकिशोर त्रिखा : पत्रकारिता के आचार्य

  इस कठिन समय में जब पत्रकारिता की प्रामणिकता और विश्वसनीयता दोनों पर गहरे सवाल खड़े हो रहे हों, डा. नंदकिशोर त्रिखा जैसे पत्रकार, संपादक, मीडिया प्राध्यापक के निधन का समाचार विह्वल करने वाला है। वे पत्रकारिता के एक ऐसे पुरोधा थे जिसने मूल्यों के आधार पर पत्रकारिता की और बेहद प्रामाणिक लेखन किया। अपने विचारों और विश्वासों पर अडिग रहते हुए संपादकीय गरिमा को पुष्ट किया। उनका समूचा व्यक्तित्व एक अलग प्रकार की आभा और राष्ट्रीय चेतना से भरा-पूरा था।

डॉ. त्रिखा

  भारतीय जनमानस की गहरी समझ और उसके प्रति संवेदना उनमें साफ दिखती थी। वे लिखते, बोलते और विमर्श करते हुए एक संत सी धीरता के साथ दिखते थे। वे अपनी प्रस्तुति में बहुत आकर्षक भले न लगते रहे हों किंतु अपनी प्रतिबद्धता, विषय के साथ जुड़ाव और गहराई के साथ प्रस्तुति उन्हें एक ऐसे विमर्शकार के रूप में स्थापित करती थी, जिसे अपने प्रोफेशन से गहरी संवेदना है। इन अर्थों में वे एक संपादक और पत्रकार के साथ पत्रकारिता के आचार्य ज्यादा दिखते थे।

  नवभारत टाइम्स, लखनऊ के संपादक, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के पत्रकारिता विभाग के संस्थापक अध्यक्ष, एनयूजे के  माध्यम से पत्रकारों के हित की लड़ाई लड़ने वाले कार्यकर्ता, लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता, संस्कृतिकर्मी जैसी उनकी अनेक छवियां हैं, लेकिन वे हर छवि में संपूर्ण हैं। पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल में उनके छोटे से कार्यकाल की अनेक यादें यहां बिखरी पड़ी हैं। समयबद्धता और कक्षा में अनुशासन को उनके विद्यार्थी आज भी याद करते हैं। ये विद्यार्थी आज मीडिया में शिखर पदों पर हैं लेकिन उन्हें उनके बेहद अनुशासनप्रिय प्राध्यापक डा. त्रिखा नहीं भूले हैं। प्रातः 8 बजे की क्लास में भी वे 7.55 पर पहुंच जाने का व्रत निभाते थे।

वे ही थे, जिन्हें अनुशासित जीवन पसंद था और वे अपने बच्चों से भी यही उम्मीद रखते थे। समय के पार देखने की उनकी क्षमता अद्भुत थी। वे एक पत्रकार और संपादक के रूप में व्यस्त रहे, किंतु समय निकालकर विद्यार्थियों के लिए पाठ्यपुस्तकें लिखते थे। उनकी किताबें हिंदी पत्रकारिता की आधारभूत प्रारंभिक किताबों  में से एक हैं। खासकर समाचार संकलन और प्रेस विधि पर लिखी गयी उनकी किताबें दरअसल हिंदी में पत्रकारिता की बहुमूल्य पुस्तकें हैं। हिंदी में ऐसा करते हुए न सिर्फ वे नई पीढ़ी के लिए पाथेय देते हैं बल्कि पत्रकारिता के शिक्षण और प्रशिक्षण की बुनियादी चिंता करने वालों में शामिल हो जाते हैं।

इसी तरह दिल्ली और लखनऊ में उनकी पत्रकारिता की उजली पारी के पदचिन्ह बिखरे पड़े हैं। वे ही थे जो निरंतर नया विचार सीखते, लिखते और लोक में उसका प्रसार करते हुए दिखते रहे हैं। उनकी एक याद जाती है तो दूसरी तुरंत आती है। एनयूजे के माध्यम से पत्रकार हितों में किए गए उनके संघर्ष बताते हैं कि वे सिर्फ लिखकर मुक्त होने वालों में नहीं थे बल्कि सामूहिक हितों की साधना उनके जीवन का एक अहम हिस्सा रही है। डॉ. त्रिखा छह वर्ष भारतीय प्रेस परिषद् के भी सदस्य रहे ।उन्होंने 1963 से देश के अग्रणी राष्ट्रीय दैनिक नवभारत टाइम्स में विशेष संवाददाता, वरिष्ठ सहायक-संपादक, राजनयिक प्रतिनिधि और स्थानीय संपादक के वरिष्ठ पदों पर कार्य किया । उससे पूर्व वे संवाद समिति हिन्दुस्थान समाचार के काठमांडू (नेपाल), उड़ीसा और दिल्ली में ब्यूरो प्रमुख और संपादक रहे ! अपने इस लम्बे पत्रकारिता-जीवन में उन्होंने देश-विदेश की ज्वलंत समस्याओं पर हजारों लेख, टिप्पणिया, सम्पादकीय, स्तम्भ और रिपोर्ताज लिखे।

   विचारों के प्रति गहरी प्रतिबद्धता के बावजूद उनकी समूची पत्रकारिता में एक गहरी अंतर्दृष्टि, संवेदनशीलता, मानवीय मूल्य बोध, तटस्थता के दर्शन होते हैं। उनके संपादन में  निकले अखबार बेहद लोकतांत्रिकता चेतना से लैस रहे। वे ही थे जो सबको साध सकते थे और सबके साथ सधे कदमों से चल सकते थे। उनका संपादक सभी विचारों- विचार प्रवाहों को स्थान देने की लोकतांत्रिक चेतना से भरा-पूरा था। जीवन में भी वे इतने ही उदार थे। यही उदात्तता दरअसल भारतीयता है। जिसमें स्वीकार है, तिरस्कार नहीं है। वे व्यक्ति और विचार दोनों के प्रति गहरी संवेदना से पेश आते थे। उन्हें लोगों को सुनने में सुख मिलता था। वे सुनकर, गुनकर ही कोई प्रतिक्रिया करते थे। इस तरह एक मनुष्य के रूप में उन्हें हम बहुत बड़ा पाते हैं।

आखिरी सांस तक उनकी सक्रियता ने हमें सिखाया है किस बड़े होकर भी उदार, सक्रिय और समावेशी हुआ जा सकता है। वे रिश्तों को जीने और निभाने में आस्था रखते थे। उनके मित्रों में सत्ताधीशों से लेकर सामान्य जन सभी शामिल थे। लेकिन संवेदना के तल पर वे सबके लिए समभाव ही रखते थे। बाद के दिनों उनकी किताबें बड़े स्वरूप में प्रकाशित हुयीं जिसे माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय ने प्रकाशित किया। अंग्रेजी में उनकी किताब रिपोर्टिंग आज के विद्यार्थियों को ध्यान में रखकर लिखी गयी है। इसी तरह प्रेस ला पर उनकी किताब बार-बार रेखांकित की जाती है। वे हमारे समय के एक ऐसे लेखक और संपादक थे जिन्हें हिंदी और अंग्रेजी भाषाओं पर समान अधिकार था।

वे अपने जीवन और लेखन में अगर किसी एक चीज के लिए याद किए जाएंगें तो वह है प्रामणिकता। मेरे जैसे अनेक पत्रकारों और मीडिया प्राध्यापकों के लिए वे हमेशा हीरो की तरह रहे हैं जिन्होंने खुद को हर जगह साबित किया और अव्वल ही रहे। हिंदी ही नहीं समूची भारतीय पत्रकारिता को उनकी अनुपस्थिति ने आहत किया है। आज जब समूची पत्रकारिता बाजारवाद और कारपोरेट के प्रभावों में अपनी अस्मिता संरक्षण के संघर्षरत है, तब डा. नंदकिशोर त्रिखा की याद बहुत स्वाभाविक और मार्मिक हो उठती है।

लेखक संजय द्विवेदी माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष और कुलसचिव हैं।

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फक्कड़ और घुमन्तू पत्रकारिता के झंडाबरदार अम्बरीश दादा खुद में एक संस्था थे

घुमंतू की डायरी अब बंद हो गयी क्योंकि इसे लिखने वाला फक्कड़ पत्रकार 19 जनवरी-2018 की रात ना जाने कब दुनिया छोड़ गया। दिल में यह हसरत लिये कि अभी बहुत कुछ लिखना-पढ़ना है। पत्रकारिता के फकीर अम्बरीश शुक्ल का हम सब को यूं छोडकर चले जाना बहुत खल गया। हिन्दी पत्रकारिता के पुरोधा अमर शहीद गणेश शंकर विद्यार्थी के शहर कानपुर में 35 साल से अधिक (मेरी अल्प जानकारी के मुताबिक) वक्त से फक्कड़ और घुमन्तू पत्रकारिता के  झण्डाबरदार अम्बरीश दादा, चलते फिरते खुद में एक संस्था थे।

उन्हें किसी एक संस्थान में बांधना ठीक न होगा। नवभारत टाइम्स के सांध्य संस्करण से शुरू हुआ खांटी पत्रकारिता का यह सफर राष्ट्रीय सहारा तक जारी रहा। बीच में स्वतंत्र भारत के कार्यकारी स्थानीय संपादक, इंडिया टुडे में धारदार लेखन, समाचार ए़जेंसी  हिन्दुस्तान समाचार जैसे अनेक पड़ाव भी इस सफर के साक्षी बने। संघर्ष भी उन्हें डिगा नहीं पाया। कनपुरियापन और ठेठ मारक पत्रकारिता दोनों उनके अमोघ अस्त्र रहे। अड्डेबाजी, घण्टाघर की बैठकी तो मौत ही रोक पायी। दुनिया से विदा लेने से एक दिन पहले तक घण्टाघर गए। गली नुक्कड़ चौपाल में चाय लड़ाई।

उनकी अंतिम यात्रा में उनके समकक्ष लोगों के साथ साथ हमारे जैसे उनके अनुजवत भी शरीक थे। अभी 15 दिन पहले ही कुमार भाई (वरिष्ठ पत्रकार कृष्ण कुमार त्रिपाठी) को मिले तो अपने विनोदी स्वभाव के मुताबिक कुमार भाई ने पूछ लिया अंतिम इच्छा तो बताअो गुरू…तपाक से बोल पड़े बस इच्छा यही कि जाते जाते किसी को बल्ली करके जाएं और हंस पड़े। उधर अम्बरीश जी चिरशैया पर लेटे थे, इधर कुमार भाई यह प्रसंग सुनाकर भावुक हो पड़े। वरिष्ठ फोटो जर्नलिस्ट श्याम गुप्ता ने एक और संस्मरण छेड़ा जो अम्बरीश दादा की दिलेरी का परिचायक  था। बात मुलायम सिंह के पहले मुख्यमंत्रित्वकाल की है, मुलायम सिंह कानपुर के दौरे पर आए थे, स्वदेशी हाउस (कमिश्नर का दफ्तर) में प्रेस कान्फ्रेंस थी। 

अम्बरीश जी के तीखे सवालों से मुलायम सिंह तिलमिला गए….पूछा पंडित जी किस अखबार में हो? अम्बरीश जी का जवाब था…अखबार तो बदलते रहते हैं नेता जी, नाम अम्बरीश शुक्ल है, फिलहाल तो एक घण्टे तक स्वतंत्र भारत में हूँ।

अम्बरीश जी का यह अन्दाज युवा पत्रकारों के लिए अंदाज-ए-बयां बना। अम्बरीश जी के साथ वर्षों तक काम कर चुके वरिष्ठ पत्रकार सुरेश त्रिवदी, अोम चौहान, प्रमेन्द्र साहू और वरिष्ठ पत्रकार अंजनी निगम जी जैसे कई साथियों ने इसकी तस्दीक भी की और कई ऐसे संस्मरण भी सुनाए जो उनके फफ्कड़पन, दिलेरी और बिना लागडाट के सिर्फ और सिर्फ पत्रकारिता के लिए उनके समर्पण की पुष्टि भी करते हैं। यूं भी कह सकते हैं कि अम्बरीश दादा एक पत्रकार थे और पत्रकारिता ही ओढ़ते और बिछाते थे।

वरिष्ठ पत्रकार दुर्गेन्द चौहान की फेसबुक वॉल से।

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श्रीनिवास तिवारी रीवा से लेकर भोपाल दिल्ली तक यथार्थ से ज्यादा किवंदंती के जरिए जाने गए

Jayram Shukla : एक आम आदमी का जननायक बन जाना… श्रीनिवास तिवारी रीवा से लेकर भोपाल दिल्ली तक यथार्थ से ज्यादा किवंदंती के जरिए जाने गए। दंतकथाएं और किवंदंतियां ही साधारण आदमी को लोकनायक बनाती हैं। विंध्य के छोटे दायरे में ही सही तिवारीजी लोकनायक बनकर उभरे और रहे। मैंने अबतक दूसरे ऐसे किसी नेता को नहीं जाना जिनको लेकर इतने नारे,गीत-कविताएं गढ़ी गईं हों। सच्चे-झूठे किस्से चौपालों और चौगड्डों पर चले हों। उनकी अंतिमयात्रा में उमड़ा जनसैलाब इन सब बातों की तस्दीक करता है।

राजनीति उनके रगों में थी या यूँ कहें कि उनका राजनीति जुडाव जल व मीन की भांति रहा। वे अच्छे से जानते थे कि इसे कैसे प्रवहमान बनाए रखा जाए। वे जितने चुनाव जीते लगभग उतने ही हारे लेकिन उन्होंने खुद को हारजीत के ऊपर बनाए रखा। कविवर सुमन की ये कविता- क्या हार में क्या जीत में किंचित नहीं भयभीत मैं, संघर्ष पथपर जो मिले यह भी सही वह भी सही..अटल बिहारी वाजपेयी की जुबान से निकलने के पहले उनकी जुबान से सन् 1985 में तब निकली थी जब अर्जुन सिंह ने उनकी टिकट काट दी थी और अमहिया में 20 से 25 हजार समर्थकों की भीड़ उनपर यह दवाब बनाने के लिए डटी थी कि वे कांग्रेस से बगावत करके न सिर्फ लड़ें अपितु विंध्य की सभी सीटों से अपने उम्मीदवार खड़ा करके कांग्रेस को सबक सिखाएं। उन्होंने समर्थकों को यह कहते हुए धैर्य रखने को कहा कि कांग्रेस का मतलब अकेले अर्जुन सिंह थोड़ी न है और भी बहुतकुछ है। देखते जाइए..। और फिर 85 में अर्जुन सिंह के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के दूसरे दिन जब राजीव गांधी ने उनसे इस्तीफा लेकर पंजाब का राज्यपाल बनाया तब उनके समर्थकों को तिवारी जी के कहे का मतलब समझ में आया और यह वाकया भी दंतकथाओं में चला गया।

अर्जुन सिंह के इस्तीफा लिए जाने के पीछे तिवारीजी की कोई भूमिका रही हो या न रही हो पर किसी घटनाक्रम को राजनीति में अपने हिसाब से कैसे मोड़ा जा सकता है तिवारीजी से बेहतर कोई नहीं जानता। यद्यपि प्रचंड विरोध के बाद भी अर्जुन सिंह से उनके संवाद निरंतर कायम रहे। तिवारीजी कहा करते थे प्रतिद्वन्द्विता में संवादहीनता स्थायी दुश्मन बना देती है और राजनीति में न कोई दोस्त होता और न दुश्मन। समय के साथ भूमिका बदलती रहती है। आगे दिग्विजय सिंह के साथ यही हुआ भी। 1993 में तिवारीजी श्यामाचरण शुक्ल को मुख्यमंत्री बनाने की मुहिम के अगुआ थे लेकिन बन गए दिग्विजय सिंह और बाद में प्रदेश ने दिग्विजय सिंह तिवारीजी की युति को भी देखा और दोस्ती को भी।

तिवारीजी को आमतौर पर समाजवादी नेता के तौर पर देखा जाता था। 72 में कांग्रेस में आने के बाद गाँधीवादी भी हो गए ऐसा लोग मानते हैं। हकीकत तो यह है कि तिवारीजी न समाजवादी थे न गाँधीवादी। वे यथार्थवादी थे, वे अपने वाद के खुद प्रवर्तक थे उनके आदर्श का खुद का अपना पैमाना था। कभी भी किसी भी इंटरव्यू में न तो उन्होंने लोहियाजी अपना आदर्श माना और न ही गाँधीजी को। वे अपने आदर्श की खोज जनता के सैलाब में करते थे। उनका आदर्श कोई व्यक्ति नहीं बल्कि भाव था और वह भाव था जनता-जनार्दन। जनता जनार्दन कहने वाले तो आज भी बहुतेरे हैं पर उसे वाकय जनार्दन मानने वाले वे विरले नेता थे। हाँ वे अपने नेता के रूप में जिंदगी में सिर्फ दो लोगों को स्वीकार किया एक जगदीश जोशी जिनकी बदौलत वे सोशसलिस्टी हुए, दूसरी इंदिरा गांधी जिनके भरोसे वे काँग्रेस में शामिल हुए।

काँग्रेस में रहते हुए भी सभी समाजवादी उन्हें अपनी बिरादरी का मानते रहे लेकिन ये बात बहुत कम लोगों को ही मालुम होगी कि उनकी डाक्टर लोहिया से कभी नहीं पटी। वजह तिवारीजी इतने दुस्साहसी थे कि लोहिया को भी तड़ से जवाब देने से नहीं चूकते थे। दो घटनाएं मुझसे साझा की थी, पहली सन् 52 के पहले आम चुनाव की थी। लोकसभा के चुनाव में सीधी संसदीय क्षेत्र से भगवानदत्त शास्त्री को सोशलिस्ट पार्टी से उतारा गया था। शास्त्री जी को सिंबल मिला उन्होंने पर्चा भी दाखिल कर दिया। इसी बीच लोहियाजी को क्या सूझी वे कानपुर के एक उद्योगपति सेठ रामरतन को लेके आ गए, कहा सीधी से सोपा की टिकट पर अब ये लड़ेगे। लोहिया के फैसले को चुनौती देना उन दिनों सोशलिस्टों के लिए भगवान को चुनौती देना था। साथियों की रोकटोक के बाद भी तिवारीजी ने कहा हम डाक्टर साहब का फैसला नहीं मानेंगे। ये क्या बात हुई दिनभर सेठ साहूकारों,जमीदारों के खिलाफ बोलों और रात को सेठों से समझौता..नहीं होगा ऐसा।

तय हुआ कि शास्त्रीजी पर्चा वापस लें और रामरतन सोपा के उम्मीदवार बनें। सहज शास्त्री तो तैयार बैठे थे। पर जिस दिन परचा खींचने की बात आई तिवारी सीधी पहुँचे एक सायकिल जुगाड़ी, किसी बहाने शास्त्रीजी को सायकिल के डंडे में बैठाया और उन्हें लेकर जंगल भाग गए। जब पर्चा खींचने की मियाद खत्म हुई तभी लेकर लौटे।

कल्पना कर सकते हैं कि लोहियाजी का गुस्सा कैसे रहा होगा पर राजनीति में करियर बनाने के दिनों में तिवारीजी के ये तेवर थे। किसी ने पूछा- ऐसा क्यों किया? तिवारीजी ने जवाब दिया चुनाव जनता जिताती है, लोहिया नहीं। खैर लोकसभा के पहले आमचुनाव में सीधी लोकसभा सीट से भगवानदत्त शास्त्री जीते लोहियाजी के सेठ रामरतन नहीं। जबकि लोहियाजी ने भी सभाएं कीं थीं व शास्त्री से रामरतन को वोट देकर विजयी बनाने की अपील भी करवाई।

दूसरा वाकया था जब मध्यप्रदेश का गठन हुआ तो विधानसभा में सोपा विधायक दल का नेता कौन हो? लोहियाजी का विचार था कि पिछड़े वर्ग से आने वाले बृजलाल वर्मा हमारे दल के नेता बनें। तिवारी यद्यपि 56 का चुनाव हार चुके थे फिर भी उन्होंने लोहियाजी से खुले मुँह कहा नेता तो जगदीश जोशी होंगे हम जाति के सवाल पर योग्यता को बलि नहीं चढ़ने देंगे। डाक्टर लोहिया तुनुककर चले गए इधर जोशीजी को ही सोपा विधायक दल का नेता चुना गया। लोहियाजी इतने खफा हुए कि तिवारीजी को सभी समितियों से निकाल बाहर किया पर तिवारी तो तिवारी ही थे, दुस्साहसी, निश्चय के पक्के दृढ़ चट्टान की भांति अड़े रहने वाले।

राजनीतिक प्रतिबद्धता कोई तिवारीजी से सीखे। जहाँ रहो आखिरी साँस तक उसी को जियो और यदि त्याग दिया तो- तजौ चौथि के चंद की नाईं। विंध्यप्रदेश की विधानसभा में जमीदारी उन्मूलन, आँफिस आफ प्राफिट तथा विलीनीकरण के खिलाफ उनके ऐतिहासिक भाषण हुए। बीबीसी तक ने उन भाषणों को कवर किया था ऐसा जोशीजी बताते थे। तिवारीजी के भाषणों में पंडित शंभूनाथ शुक्ल नहीं बल्कि पं जवाहरलाल नेहरू निशाने पर रहते थे। यहाँ तक कि लोहिया एक बार इस बात से नाराज भी हो गए थे कि अपना स्तर देख के विरोध भी करना चाहिए। नेहरू पर तो लोहिया ही अँगुली उठा सकता है तिवारी को कहो कि वह अपने मुख्यमंत्री तक सीमित रहा करें। पर तिवारी कहाँ किसी की सुना करते थे। उस पचीस साल की उमर में तिवारी जी को ‘मेयो की पार्लियामेंट्री प्रैक्टिस’ रटी थी। आफिस आँफ प्राफिट वाली बहस में उनका भाषण लाजवाब था। आगे चलकर नजीर भी बना। कुछ साल पहले जब सोनिया गाँधी, जया बच्चन व अन्य नेताओं पर ये सवाल पार्लियामेंट में खड़ा हुआ तो विंध्यप्रदेश की ये बहस वहाँ नजीर के तौरपर पेश की गई।

तिवारीजी सन् 72 में चंदौली सम्मेलन में जगदीशचंद्र जोशी के कहने पर काँग्रेस में शामिल हुए। तब वे मनगँवा से विधायक थे। इसके बाद वो कांग्रेस में साँस लेने लगे। उन्होंने बताया था कि जब वे काँग्रेसी बनके रीवा लौटे तो साथियों से कह दिया कि सोशलिस्ट पार्टी को वे गंगा में बहा आए हैं अब कांग्रेस में जीना और यहीं मरना। तिवारीजी कितने प्रतिबद्ध काँग्रेसी बन गए थे इससे अनूठा उदाहरण राजनीति के इतिहास में कुछ हो ही नहीं सकता जो उन्होंने विधानसभा में अपने भाषण में दिया। सन् 74 में जयप्रकाश नारायण का आंदोलन चरम पर था तिवारीजी ने मध्यप्रदेश की विधानसभा में काँग्रेस की ओर से भाषण देते हुए यहाँ तक कह डाला- जयप्रकाश नारायण ने सेना और पुलिस को विद्रोह के लिए आह्वान किया है, यह सरासर राष्ट्रद्रोह है उन्हें तत्काल गिरफ्तार कर जेल में डाल देना चाहिए..। ये शब्द उन तिवारीजी के थे जो सोशलिस्ट में रहते हुए डाक्टर लोहिया से ज्यादा जयप्रकाश को मानते थे। उन्हीं जयप्रकाश ने 1950 में रीवा में हिंद किसान पंचायत के सम्मेलन में.. जोशी-जमुना-श्रीनिवास का नारा दिया था।

तिवारीजी के लिए राजनीति के अपने नियम थे। वे जुनूनी थे राजनीति में रिश्ते और दिल निकाल कर ताक पर रख देते थे। 75 में इमरजेंसी लगी। उनके पुराने समाजवादी साथी जेल में बंद कर दिए गए जोशीजी जो कि अब काँग्रेस में उनके नेता थे, जब कभी जेल में बंद पुराने समाजवादी साथियों के प्रति सहानुभूति दर्शाते तो तिवारीजी कहते कि हमारी पार्टी(काँग्रेस) और नेता (इंदिरा गांधी) के विरोधी हैं इन लोगों को जेल में ही सड़ना चाहिए। कवि ह्रदय जोशीजी ने अंततः कांग्रेस छोड़ने का मन बना लिया। तिवारीजी और अच्युतानंदजी को बुलाकर कहा चलो अब जनतापार्टी में लौट चलते हैं तिवारी जी ने जवाब दिया-खसम किया बुरा किया,करके छोड़ दिया और बुरा किया। तब तो हम सोपा छोड़ना ही नहीं चाहते थे आपने छुड़वा दी, अब जहाँ हूँ वहीं रहूँगा आपको जाना हो जाइए। तबके इंदिरा गांधी के अत्यंत नजदीक,परमविश्वासी जोशीजी जनता पार्टी में चले गए। तिवारीजी ने एक सभा में संभवतः जोशीजी की शोकसभा में कहा था -जोशी जी तब काँग्रेस नहीं छोड़े होते तो वे 1980 में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते। कुछ समय तक इंदिराजी के यहाँ जोशीजी की वही हैसियत थी जो आज सोनिया गाँधी के यहाँ अहमद पटेल की है।

तिवारीजी राजनीति में बड़ी लकीर खींचने की बजाय उस लकीर को मिटाकर अपनी खींचने पर यकीन करते थे। अल्पकाल के लिए मंत्री और दस वर्ष तक विधानसभाध्यक्ष रहते हुए यही किया। अस्सी की शुरुआत में उनकी अर्जुनसिंह से गाढ़ी छनती थी। वजह 77 में नेताप्रतिपक्ष बनाने में तिवारीजी ने अर्जुनसिंह के लाए लाँबिंग की थी। तेजलाल टेंभरे इस पद के बड़े दावेदार थे। समाजवादी पृष्टभूमि होने के नाते वे मानकर चल रहे थे कि तिवारीजी और उनका गुट सपोर्ट करेगा पर तिवरीजी ने कृष्णपाल सिंह व अन्य को अर्जनसिंह के लिए तैयार किया। 80 में मुख्यमंत्री बनने के बाद हाल यह था कि अर्जुनसिंह तिवारीजी के बँगले में रायमशवरा करने जाते थे। तिवारीजी की कई टिप्स उनके काम भी आई। जैसे अर्जुन सिंह मुख्यसचिव को बरखाश्त करने का साहस ही नहीं जुटा पा रहे थे। तिवारीजी ने अर्जुन सिंह से कहा का ये पुण्यकाम कल करना चाहते हैं तो आज अभी करें तभी प्रदेश चला पाएंगे। फिर जो हुआ प्रदेश जानता है। समस्त नियमों को शिथिल करते हुए की भाषा तिवारीजी ने ही दी।

तिवारीजी की तार्किकता का कोई जवाब नहीं। एक बार उन्होंने शिक्षा विभाग की फाईल में टीप लिख दी। हंगामा मच गया। कैबिनेट में तिवारीजी ने कहा कि मैंने मंत्री पद की शपथ ली है विभाग की नहीं। हर फैसले की जब सामूहिक जिम्मेदारी होती है तो मेरे विभाग में भी शिक्षामंत्री का उतना ही अधाकार है जितना मेरा उनके विभाग में। विभाग वितरण तो एक व्यवस्था है। कैबिनेट में मुख्यमंत्री की हैसियत को लेकर फर्सट एमंग इक्वल का सवाल उन्होंने तभी उठा दिया था जो आज सुप्रीम कोर्ट के जज लोग उठा रहे हैं। स्वास्थ्यमंत्री पद से उनका इस्तीफा नितांत वैयक्तिक व पारिवारिक कारणों से हुआ था। अर्जुनसिंह के मुख्यमंत्री रहते तिवारी की दहशत का आलम यह था का काँग्रेस में रहते हुए ही सहकारिता मंत्री राजेन्द्रजैन का ऐसा मसला उठा दिया कि लगा कि सरकार ही गिर जाएगी। उनके हरावल दस्ते में मोतीलाल वोरा,केपी सिंह,शिवकुमार श्रीवास्तव,हजारीलाल रघुवंशी जैसे दिग्गज हुआ करते थे। 85 में इन सबकी टिकट कटी।

विधानसभाध्यक्ष रहते हुए उन्होंने देश को बताया कि स्पीकर क्या होता है। उनका फार्मूला था मोटी चमड़ी खुली जुबान। स्पीकर रहते हुए उन्होंने सबसे ज्यादा संरक्षण विपक्ष के विधायकों दिया। वे जिग्यासु विधायकों के सच्चे मायनों में गुरू थे। भाजपा की दूसरी लाईन के जो नेता आज मप्र,छग में राज कर रहे हैं प्रायः संसदीयग्यान के मामले में तिवारीजी के ही तरासे हुए हैं चाहे वे नरोत्तम मिश्र हों या छग के ब्रजमोहन अग्रवाल। विधानसभा में उन्होंने कई प्रतिमान गढ़े, और संसदीय इतिहास को अविस्मरणीय बनाया। तिवारीजी को महज एक लेख में नहीं समेटा जा सकता वे जिंदगीभर एक खुली किताब रहे वक्त ने उसपर मोटी जिल्द चढ़ाकर सदा के लिए बंद कर दिया। उनकी स्मृतियों को नमन! बस आज इतना ही..बाकी फिर कभी।

वरिष्ठ पत्रकार जयराम शुक्ल की एफबी वॉल से.

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यदि आपको पत्रकारिता में रहना हो तो ब्राह्मणों के इन गुणों को अपने आप में विकसित कीजिए…

Surendra Kishore : बहुत दिनों से मैं सोच रहा था कि आपको अपने बारे में एक खास बात बताऊं। यह भी कि वह खास बात किस तरह मेरे जीवन में बड़े काम की साबित हुई। मैंने 1977 में एक बजुर्ग पत्रकार की नेक सलाह मान कर अपने जीवन में एक खास दिशा तय की। उसका मुझे अपार लाभ मिला। मैंने फरवरी 1977 में अंशकालीन संवाददाता के रूप में दैनिक ‘आज’ का पटना आफिस ज्वाइन किया था। हमारे ब्यूरो चीफ थे पारस नाथ सिंह। उससे पहले वे ‘आज’ के कानपुर संस्करण के स्थानीय संपादक थे। वे ‘आज’ के नई दिल्ली ब्यूरो में भी वर्षों तक काम कर चुके थे। पटना जिले के तारण पुर गांव के प्रतिष्ठित राजपूत परिवार में उनका जन्म हुआ था। वे बाबूराव विष्णु पराड़कर की यशस्वी धारा के पत्रकार थे। विद्वता और शालीनता से भरपूर।

इधर मैं लोहियावादी समाजवादी पृष्ठभूमि से निकला था। पिछड़ों के लिए आरक्षण का प्रबल समर्थक। सक्रिय राजनीति से निराश होकर पत्रकारिता की तरफ बढ़ा ही था कि देश में आपातकाल लग गया। पहले छोटी-मोटी पत्रिकाओं में काम शुरू किया था। उन पत्रिकाओं में नई दिल्ली से प्रकाशित चर्चित साप्ताहिक ‘प्रतिपक्ष’ भी था। उसके प्रधान संपादक जार्ज फर्नांडिस और संपादक कमलेश थे। गिरधर राठी और मंगलेश डबराल भी प्रतिपक्ष में थे। भोपाल के आज के मशहूर पत्रकार एन.के.सिंह भी कुछ दिनों के लिए ‘प्रतिपक्ष’ में थे।  पर वह जार्ज के दल का मुखपत्र नहीं था। वह ब्लिट्ज और दिनमान का मिश्रण था। आपातकाल में मैं फरार था। बड़ौदा डायनामाइट केस के सिलसिले में सी.बी.आई.मुझे बेचैनी से खोज रही थी कि मैं मेघालय भाग गया।

जब आपातकाल की सख्ती कम हुई तो में पटना लौट आया और ‘आज’ ज्वाइन कर लिया। मैंने अपनी पृष्ठभूमि इसलिए बताई ताकि आगे की बात समझने में सुविधा हो। आज ज्वाइन करते ही मैंने देखा के ‘आज’ में हर जगह ब्राह्मण भरे हुए हैं। मैंने पारस बाबू से इस संबंध में पूछा और सामाजिक न्याय की चर्चा की। उन्होंने जो कुछ कहा, उसका मेरे जीवन पर भारी असर पड़ा। ऋषितुल्य पारस बाबू ने कहा कि आप जिस पृष्ठभूमि से आए हैं, उसमें यह सवाल स्वाभाविक है। पर यह कोई लोहियावादी पार्टी का दफ्तर नहीं है। यदि यहां ब्राह्मण भरे पड़े हैं तो यह अकारण नहीं हैं। ब्राह्मण विनयी और विद्या व्यसनी होते हैं। ये बातें पत्रकारिता के पेशे के अनुकूल हैं। यदि आपको पत्रकारिता में रहना हो तो ब्राह्मणों के इन गुणों को अपने आप में विकसित कीजिए। अन्यथा, पहले आप जो करते थे, फिर वही करिए।

मैंने पारस बाबू की बातों की गांठ बांध ली। उसके अनुसार चलने की आज भी कोशिश करता रहता हूं। उसमें मेहनत, लगन और ध्यान केंद्रण अपनी ओर से जोड़ा। यदि 1977 के बाद के शुरूआती वर्षों में पत्रकारिता के बीच के अनेक ब्राह्मणों ने मुझे शंका की दृष्टि से देखा,वह स्वाभाविक ही था।उन्हें लगा कि पता नहीं मैं अपने काम में सफल हो पाऊंगा या नहीं। पर पारस बाबू की शिक्षा मेरे जीवन में रंग दिखा चुकी थी। नतीजतन मेरे पत्रकारीय जीवन में एक समय ऐसा आया जबकि देश के करीब आध दर्जन जिन प्रधान संपादकों ने मुझे स्थानीय संपादक बनाने की दिल से कोशिश की, उनमें पांच ब्राह्मण ही थे।उनमें से एक -दो तो अब भी हमारे बीच हैं। मैं इसलिए नहीं बना क्योंकि मैं खुद को उस जिम्मेदारी के योग्य नहीं पाता। पर, आज भी मेरे पास लिखने-पढ़ने के जितने काम हैं ,वे मेरी क्षमता से अधिक हैं। पैसे के मामले में भी संतुष्टि है। नौकरी में रहते हुए जितने पैसे मुझे मिलते थे, उससे अधिक अब भी मिल जाते हैं। मूल्य वृद्धि को ध्यान में रखने के बावजूद। यह सब पारस बाबू के गुरू मंत्र का कमाल है। मैंने तो अपने जीवन में ‘आरक्षण’ का विकल्प ढूंढ लिया। वैसे यह बता दूं कि मैं अनारक्षित श्रेणी वाले समाज से आता हूं।

वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर की एफबी वॉल से.

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छह माह से संपादकीय कामकाज से दूर रहने की लाचारी ने शेखर त्रिपाठी को तोड़ दिया था

Upendranath Pandey : शेखर भाई, तुमने यह अच्छा नहीं किया! आखिर तुमने फेसबुक फेस न करने की मेरी कसम तुड़वा दी। इसी छह मार्च को इसी जगह मुझे भाई संतोष तिवारी के जाने का दर्द बयां करना पड़ा, आज तुम इस जहां से चले गए। जाते समय तुमने यह भी नहीं सोचा कि हम मम्मी को कैसे फेस कर पाएंगे, जिनके हार्ट तुम्हीं थे। उनके हार्ट को कैसे बचाएं, क्या करें। गुड़िया भाभी अभी कल रात यशोदा अस्पताल से मेरे लौटते समय डबडबाई आंखों से मुझसे हाल पूछ रही थीं, जब मैं तुम्हें पुकार कर आईसीयू से लौटा था। अगर तुम्हें जाना था तो कंधा उचका कर और गर्दन हिलाकर मुझे संकेत क्यों किया कि फिक्र न करो।

स्व. शेखर त्रिपाठी

तुमने अपना वादा तोड़ दिया, आपरेशन थियेटर जाते समय मुझसे कहा था-फिक्र न करो यार, अभी दस मिनट में लौटता हूं, और लौटकर हमें अपने अंदाज में प्यार से गले लगाने की जगह स्वर्ग पहुंच गए, ईश्वर से इंटरव्यू करने। कहते हैं ईश्वर अच्छे लोगों को जल्दी अपने पास बुला लेता है। ईश्वर तेरी यह कौन सी नीति है। हमें वापस कर दे हमारा शेखर, अच्छा न सही–हम उसे बुरा बनाकर भी अपने पास रोक लेंगे। हमें गाली भी दे और मारे भी तो भी गम नहीं, पर उसे इस तरह स्वर्गलोक क्यों ले गए।

बीते शुक्रवार से फौलाद बने शिवम और मुझसे अभी फोन पर रो-रोकर पुकार कर रहे मासूम प्रखर का तो चेहरा देखते भगवन। …और …साइं बाबा, आपसे तो यह उम्मीद बिलकुल नहीं थी। शेखर के शनिवार की सुबर आपरेशन कक्ष में जाने के बाद से आपरेशन पूरा होने तक गुड़िया भाभी तुम्हारे चरणों में बैठी प्रार्थना ही करती रहीं। मैं तो उन्हें और उनके आंसू देख देख कर घबड़ाहट मे हास्पिटल टेंपल से गीता उठाकर पडने लगा था, साईं बाबा तुम क्या कर रहे थे जो भाभी की पुकार नहीं सुन पाए। मम्मी के चेहरे का दर्द नहीं पढ़ पाए।
अब तुम लापरवाही नहीं कर सकते बाबा, मम्मी भाभी शिवम प्रखर सब तुम्हारे हवाले। हे ईश्वर, एक वर्ष के भीतर दो दो मित्रों की विदाई,.. कैसे झेलेंगे हम। यह तो जिंदगी भर का दर्द दे दिया आपने।

(शेखर त्रिपाठी, दैनिक जागरण के इंटरनेट एडीटर थे, और दैनिक जागरण लखनऊ के संपादक, दैनिक हिंदुस्तान वाराणसी के संपादक, आजतक एडीटोरियल टीम के सदस्य रहे। फाइटर इतने जबरदस्त कि कभी हार नहीं मानी, कभी गलत बातों से समझौता नहीं किया। किंतु जागरण डॉट कॉम के संपादक रूप में दायित्व निभाते संस्थान हित में वह दोष अपने ऊपर ले लिया जिसके लिए वे जिम्मेदार ही नहीं थे। चुनाव सर्वेक्षण प्रकाशन के केस में एक रात की गिरफ्तारी और फिर हाईकोर्ट में पेंडिंग केस के कारण बीते छह महीने से संपादकीय कारोबार से दूर रहने की लाचारी ने उन्हें तोड़ दिया। गाजियाबाद के कौशांबी मेट्रो स्टेशन के निकट यशोदा हास्पिटल में उन्होने अंतिम सांस ली)

वरिष्ठ पत्रकार उपेंद्र पांडेय की एफबी वॉल से.

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दैनिक जागरण लखनऊ, गोरा सांप और शेखर त्रिपाठी के दिन

Raghvendra Dubey  : शेखर! आप बहुत याद आएंगे… बहुत बाद में आत्मीय रिश्ते बने भी तो सेतु स्व. मनोज कुमार श्रीवास्तव थे। वही मनोज , अमर उजाला के विशेष संवाददाता। शेखर, दैनिक जागरण लखनऊ में, संभवतः 1995 तक मेरे समाचार संपादक थे। कार्यरूप में, कागज पर नहीं। पद उन दिनों स्थानीय संपादक विनोद शुक्ल के तात्कालिक तरंगित और भभकते मूड पर निर्भर था। कभी-कभी तो एक ही दिन, सुबह की 11 बजे वाली रिपोर्टर मीटिंग में किसी का पद कुछ और जिमखाना क्लब से शाम को लौट कर वह (विनोद शुक्ल) कुछ कर देते थे।

बहरहाल शेखर अधिकांश समय समाचार संपादक ही थे। लेकिन लिखन्त-पढन्त में यानी विधिवत नहीं। जागरण में तब दो ग्रुप थे। वैसे तो कई। किसी गुंडा और तानाशाह व्यक्तित्व के तले यह बहुत स्वाभाविक था।

रामेश्वर पांडेय काका समेत कुछ जो खुद को प्रगतिशील पढ़ा-लिखा, पारदर्शी और साफ-सुथरा मानते थे या दिखते थे, शेखर के साथ थे। एक दूसरा ग्रुप था जिसका संचालन एक ‘गोरा सांप’ करता था। उसे ‘गोरा सांप’ की खास संज्ञा आगरा में ही

किसी ने क्यों दी, यह बात भी शेखर ने ही किसी दिन विस्तृत ढंग से बताई। मैं लखनऊ नया-नया आया था। जागरण की इस गुटबन्दी से परिचित नहीं था। ‘गोरे सांप’ से ही जुड़ गया। लिहाजा शेखर मुझे पसंद नहीं करते थे। उनसे जुड़े लोग भी। अयोध्या मामले पर मैने एक रपट लिखी थी। दादा एसके त्रिपाठी ने वह खबर शेखर को बढ़ा दी।

शेखर के ही एक मित्र, जिन्होंने कल्याण सिंह (तात्कालिक मुख्यमंन्त्री) से कह कर उन्हें सरकारी आवास दिलाया था, शेखर से कहा — ‘ ….अरे यह फलां का आदमी है, आप इसकी रपट को अच्छा डिस्प्ले क्यों देते हो? इस रपट को अंदर के पेज पर डालिये।’

शेखर ने चिढ़ कर कहा था — ‘… स्साले .. ऐसी ही तुम लिखो या कोई दूसरी दो …। यह कॉपी एंकर डिजर्व करती है, वहीं जायेगी। भले मेरे मुखालिफ गोल के आदमी ने लिखी हो।’

शेखर से दूसरी मुलाकात राष्ट्रीय सहारा, गोरखपुर में हुई। कुमार हर्ष और दीप्तभानु डे को याद हो शायद। मैं गोरखपुर से आजमगढ़ दंगा कवर करने भेजा गया था। यह शेखर का ही प्लान था। वह रिपोर्ट पढ़कर, शेखर, पूरे न्यूज रूम में घूम-घूम कर उसकी लाइनें दुहराते रहे। रिपोर्ट में एक लाइन थी — ‘ …. ख़ौफ़ पसलियों की संधि में घुस गया था …। ‘ उन्होंने मेरे सिर पर पीछे से हाथ मारते कहा था — ‘…और स्साले यह रिपोर्ट मेरी …. में घुस गयी है ।’

शेखर जी आपका वह ईमानदार पत्रकारीय, थोड़ा रूमानी और खिलंदड़ व्यक्तित्व तो मेरी यादों में कहीं गहरे तक धंसा है । कभी नहीं भूलोगे आप। एक तड़प सी भीतर उठी है तो इसलिए कि आपके बारे में और बता सकूं लोगों को, सूफियों की भाषा नहीं है मेरे पास। मीडिया इंडस्ट्री में लगातार चलते रहने वाले आपसी छाया युद्धों के बीच, आप बहुत अपने लगते थे। आप के साथ भी साजिशें हुईं। बहुत कम लोग होते हैं आप की तरह। नहीं , कभी नहीं और मेरी अपनी सांस तक, मुझे तो नहीं भूलेंगे शेखर। शशांक शेखर त्रिपाठी।

वरिष्ठ पत्रकार राघवेंद्र दुबे की एफबी वॉल से.

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अकेले शराब पीने को हस्त मैथुन मानते थे रवींद्र कालिया

Dayanand Pandey : संस्मरणों में चांदनी खिलाने वाला रवींद्र कालिया नामक वह चांद… आज रवींद्र कालिया का जन्म-दिन है… ‘ग़ालिब छुटी शराब’ और इस के लेखक और नायक रवींद्र कालिया पर मैं बुरी तरह फ़िदा था एक समय। आज भी हूं, रहूंगा। संस्मरण मैं ने बहुत पढ़े हैं और लिखे हैं। लेकिन रवींद्र कालिया ने जैसे दुर्लभ संस्मरण लिखे हैं उन का कोई शानी नहीं। ग़ालिब छुटी शराब जब मैं ने पढ़ कर ख़त्म की तो रवींद्र कालिया को फ़ोन कर उन्हें सैल्यूट किया और उन से कहा कि आप से बहुत रश्क होता है और कहने को जी करता है कि हाय मैं क्यों न रवींद्र कालिया हुआ। काश कि मैं भी रवींद्र कालिया होता। सुन कर वह बहुत भावुक हो गए।

उन दिनों वह इलाहबाद में रहते थे। बाद के दिनों में भी मैं उन से यह बात लगातार कहता रहा हूं । मिलने पर भी , फ़ोन पर भी । हमारे बीच संवाद का यह एक स्थाई वाक्य था जैसे। इस लिए भी कि ग़ालिब छुटी शराब का करंट ही कुछ ऐसा है। उस करंट में अभी भी गिरफ़्तार हूं। इस के आगे उन की सारी रचनाएं मुझे फीकी लगती हैं। ठीक वैसे ही जैसे श्रीलाल शुक्ल के रागदरबारी के आगे उन की सारी रचनाएं फीकी हैं। ग़ालिब छुटी शराब के विवरणों में बेबाकी और ईमानदारी का जो संगम है वह संगम अभी तक मुझे सिर्फ़ एक और जगह ही मिला है। खुशवंत सिंह की आत्म कथा सच प्यार और थोड़ी सी शरारत में। रवींद्र कालिया खुशवंत सिंह की तरह बोल्ड और विराट तो नहीं हैं पर जितना भी वह कहते परोसते हैं उस में पूरी ईमानदारी और पारदर्शिता झलकती है। जैसे बहते हुए साफ पानी में दिखती है। मयकश दोनों हैं और दीवाने भी। लेकिन खुशवंत सिंह को सिर्फ़ एक मयकशी के लिए दिन-दिन भर प्रूफ़ नहीं पढ़ने पड़ते। तमाम फ़ालतू समझौते नहीं करने पड़ते। इसी लिए रवींद्र कालिया की मयकशी बड़ी बन जाती है।

कितने मयकश होंगे जो अपने अध्यापक के साथ भी बतौर विद्यार्थी पीते होंगे। अपने अध्यापक मोहन राकेश के साथ रवींद्र कालिया तो बीयर पीते थे। बताईए कि पिता का निधन हो गया है। कालिया इलाहबाद से जहाज में बैठ कर दिल्ली पहुंचते हैं, दिल्ली से जालंधर। पिता की अंत्येष्टि के बाद शाम को उन्हें तलब लगती है। पूरा घर लोगों , रिश्तेदारों से भरा है। घर से बाहर पीना भी मुश्किल है कि लोग क्या कहेंगे। घर में रात का खाना नहीं बनना है। सो किचेन ही ख़ाली जगह मिलती है। वह शराब ख़रीद कर किचेन में अंदर से कुंडा लगा कर बैठ जाते हैं। अकेले। गो कि अकेले पीना हस्त मैथुन मानते हैं।

श्वसुर का निधन हो गया है। रात में मयकशी के समय फ़ोन पर सूचना मिलती है। पर सो जाते हैं। सुबह उठ कर याद करते हुए से ममता जी से बुदबुदाते हुए बताते हैं कि शायद ऐसा हो गया है। अब लेकिन यह ख़बर सीधे कैसे कनफ़र्म की जाए। तय होता है कि साढ़ू से फ़ोन कर कनफ़र्म किया जाए। साढ़ू इन से भी आगे की चीज़ हैं। कनफ़र्म तो करते हैं पर यह कहते हुए कि आज ही हमारी मैरिज एनिवर्सरी है। इन को भी अभी जाना था। सारा प्रोग्राम चौपट कर दिया। शराब ही है जो आधी रात मुंबई में धर्मवीर भारती के घर पहुंचा देती है । उन की ऐसी-तैसी कर के लौटते हैं। सुबह धर्मयुग की नौकरी से इस्तीफ़ा भेजते हैं।

शराब ही है जो अपना प्रतिवाद दर्ज करने इलाहबाद में सोटा गुरु भैरव प्रसाद गुप्त के घर एक रात ज्ञानरंजन के साथ पहुंच कर गालियां का वाचन करवा देती है। रात भर। भैरव प्रसाद गुप्त के घर से कोई प्रतिवाद नहीं आता। सारी बत्तियां बुझ जाती हैं। कन्हैयालाल नंदन को जिस आत्मीयता से वह अपनी यादों में बारंबार परोसते हैं वह उन की कृतज्ञता का अविरल पाठ है। परिवार चलाने के लिए ममता कालिया की तपस्या, उनका त्याग रह-रह छलक पड़ता है ग़ालिब छुटी शराब में। हालांकि शराब पीने को वह अपने विद्रोह से जोड़ते हुए लिखते हैं, ‘मुझे क्या हो गया कि मसें भीगते ही मैं सिगरेट फूंकने लगा और बीयर से दोस्ती कर ली। यह शुद्धतावादी वातावरण के प्रति शुद्ध विद्रोह था या वक्ती या उम्र का तकाज़ा। माहौल में कोई न कोई जहर अवश्य घुल गया था कि सपने देखने वाली आंखें अंधी हो गई थीं। योग्यता पर सिफ़ारिश हावी हो चुकी थी।’

वरिष्ठ पत्रकार दयानंद पांडेय की एफबी वॉल से.

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संस्मरण – देवेन्द्र शर्मा ‘इन्द्र’ जी : अभी मन भरा नहीं…

अवनीश सिंह चौहान

सुविख्यात साहित्यकार श्रद्देय देवेन्द्र शर्मा ‘इन्द्र’ जी (गाज़ियाबाद) से कई बार फोन पर बात होती— कभी अंग्रेजी में, कभी हिन्दी में, कभी ब्रज भाषा में। बात-बात में वह कहते कि ब्रज भाषा में भी मुझसे बतियाया करो, अच्छा लगता है, आगरा से हूँ न इसलिए। उनसे अपनी बोली-बानी में बतियाना बहुत अच्छा लगता। बहुभाषी विद्वान, आचार्य इन्द्र जी भी खूब रस लेते, ठहाके लगाते, आशीष देते, और बड़े प्यार से पूछते— कब आओगे? हर बार बस एक ही जवाब— अवश्य आऊँगा, आपके दर्शन करने। बरसों बीत गए। कभी जाना ही नहीं हो पाया, पर बात होती रही।

इधर पिछले दो-तीन वर्ष से मेरे प्रिय मित्र रमाकांत जी (रायबरेली, उ.प्र.) का आग्रह रहा कि कैसे भी हो इन्द्र जी से मिलना है। उन्हें करीब से देखना है, जानना-समझना है। पिछली बार जब वह मेरे पास दिल्ली आये, तब भी सोचा कि मिल लिया जाय। किन्तु, पता चला कि वह बहुत अस्वस्थ हैं, सो मिलना नहीं हो सका। एक कारण और भी। मेरे अग्रज गीतकार जगदीश पंकज जी जब भी मुरादाबाद आते, मुझसे सम्पर्क अवश्य करते। उनसे मुरादाबाद में कई बार मिलना हुआ, उठना-बैठना हुआ। फोन से भी संवाद चलता रहा। उन्होंने भी कई बार घर (साहिबाबाद) आने के लिए आमंत्रित किया। प्रेमयुक्त आमंत्रण। सोचा जाना ही होगा। जब इच्छा प्रबल हो और संकल्प पवित्र, तब सब अच्छा ही होता है। 30 अक्टूबर 2017, दिन रविवार को भी यही हुआ।

सुखद संयोग, कई वर्ष बाद ही सही, कि रायबरेली से प्रिय साहित्यकार रमाकान्त जी का शनिवार को दिल्ली आना हुआ; कारण— हंस पत्रिका द्वारा आयोजित ‘राजेन्द्र यादव स्मृति समारोह’ में सहभागिता करना। बात हुई कि हम दोनों कार्यक्रम स्थल (त्रिवेणी कला संगम, तानसेन मार्ग, मंडी हाउस, नई दिल्ली) पर मिलेंगे। मिले भी। कार्यक्रम के उपरांत मैं उन्हें अपने फ्लैट पर ले आया। विचार हुआ कि कल श्रद्धेय इन्द्र जी का दर्शन कर लिया जाय और इसी बहाने गाज़ियाबाद के अन्य साहित्यकार मित्रों से भी मुलाकात हो जाएगी। सुबह-सुबह (रविवार को) जगदीश पंकज जी से फोन पर संपर्क किया, मिलने की इच्छा व्यक्त की। उन्होंने सहर्ष अपनी स्वीकृति दी और साधिकार कहा कि दोपहर का भोजन साथ-साथ करना है।

फिर क्या था हम जा पहुंचे उनके घर। सेक्टर-दो, राजेंद्रनगर। समय- लगभग 12 बजे, दोपहर। स्वागत-सत्कार हुआ। मन गदगद। अग्रज गीतकार संजय शुक्ल जी भी आ गए। हम सभी लगे बतियाने। देश-दुनिया की बातें— जाति, धर्म, राजनीति, साहित्य पर मंथन; यारी-दोस्ती, संपादक, सम्पादकीय की चर्चा; दिल्ली, लखनऊ, इलाहबाद, पटना, भोपाल, कानपुर पर गपशप। बीच-बीच में कहकहे। सब कुछ आनंदमय। वार्ता के दौरान दो-तीन बार पंकज जी का फोन घनघनाया। वरिष्ठ गीतकार कृष्ण भारतीय जी एवं साहित्यकार गीता पंडित जी के फोन थे। पंकज जी ने उन्हें अवगत कराया कि रमाकांत और अवनीश उनके यहाँ पधारे हैं। नमस्कार विनिमय हुआ। पंकज जी ने भारतीय जी से बात भी करवायी। पता चला कि भारतीय जी की सहधर्मिणी का निधन हो गया, सुनकर बड़ा कष्ट हुआ, हमने सुख-दुःख बाँटे। रमाकांत जी ने भी उन्हें सांत्वना दी। रमाकांत जी ने फोन पंकज जी को दे दिया। भारतीय जी ने पंकज जी से आग्रह किया कि उनकी पुस्तक हमें दे दी जाय। भारतीय जी की ओर से शुभकामनाएं लिखकर पंकज जी ने उनका सद्यः प्रकाशित गीत संग्रह ‘हैं जटायु से अपाहिज हम’ मुझे और रमाकांत जी को सप्रेम भैंट किया; संजय शुक्ल जी ने भी अपना गीत संग्रह ‘फटे पाँवोँ में महावर’ उपहारस्वरुप प्रदान किया। पंकज जी से न रहा गया, बोले कि एक फोटो हो जाय। सहयोग और सहभागिता के लिए उन्होंने अपनी धर्मपत्नी जी को बुलाया और दोनों सदगृहस्थों ने बड़ी आत्मीयता से हम सबका फोटो खींचा।

तीन बजने वाले थे। बिना देर किये  देवेन्द्र शर्मा ‘इन्द्र’ जी के यहाँ पहुंचना था, क्योंकि उन्हें विद्वान लेखक ब्रजकिशोर वर्मा ‘शैदी’ जी की ‘नौ पुस्तकों’ के लोकार्पण समारोह में 4 बजे जाना था। सो निकल पड़े। ई-रिक्शा से। 5-7 मिनट में पहुँच गए, उनके घर। विवेकानंद नगर। दर्शन किये। अभिभूत, स्पंदित। लगभग 84 वर्षीय युवा इंद्र जी। गज़ब मुस्कान, खिलखिलाहट, जीवंतता- ऐसी कि मन मोह ले। उनकी दो-तीन बातें तो अब भी मेरे मन में हिलोरे मार रही हैं। वह बोले, ‘मुझे ठीक से कुर्ता पहना दो, सजा दो, फोटो जो खिंचवानी है’; ‘क्यों हनुमान (जगदीश पंकज जी), स्वर्गवाहिनी का इंतज़ाम हुआ कि नहीं?’ (कार्यक्रम में जाने के लिए कैब बुकिंग के सन्दर्भ में); ‘अवनीश, फिर आना, अभी मन भरा नहीं।’ बड़े भाग हमारे जो उनसे मिलना हुआ। वह भी मिले तो ऐसे जैसे वर्षों से मिलना-जुलना रहा हो हमारा। क्या कहने! समय कम था, फिर भी, हमारी मुलाकात सार्थक और आनंदमय रही। ​जय-जय।

अवनीश सिंह चौहान
प्रेम नगर, लाइन पार, मझोला
मुरादाबाद (उ.प्र.)-244001
9456011560
Managing Editor : Creation and Criticism
संपादक : पूर्वाभास

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राजेश शर्मा के निधन से भड़ास ने एक सच्चा शुभचिंतक खो दिया

राजेश शर्मा चले गए. दिवाली की रात. हार्ट अटैक के कारण. उमर बस 44-45 के आसपास रही होगी. वे इंडिया न्यूज यूपी यूके रीजनल चैनल के सीईओ थे. राजेश भाई से मेरी जान पहचान करीब आठ साल पुरानी है. वो अक्सर फोन पर बातचीत में कहा करते- ”यशवंत भाई, तुम जो काम कर रहे हो न, ये तुम्हारे अलावा कोई दूसरा नहीं कर सकता. मैंने मीडिया इंडस्ट्री को बहुत करीब से देखा है. यहां सब मुखौटे लगाए लोग हैं. भड़ास के जरिए तुमने आजकल की पत्रकारिता को आइना दिखाया है.”

राजेश प्रैक्टिकल आदमी थे. वह मीडिया और बाजार के रिश्तों को अच्छे से समझते थे. वह कहते भी थे- ”यार, हम लोगों को टारगेट पूरा करना होता है, रिजल्ट देना होता है. तब जाकर सेलरी मिलती है.”

मेरी पिछली बातचीत राजेश शर्मा से तब हुई जब इंडिया न्यूज के मालिक कार्तिक शर्मा ने भड़ास पर मुकदमा किया था. बहुत सारी बातें हुई थी फोन पर. राजेश ने कहा था कि यार यशवंत, बहुत दिन हुआ, बैठते हैं अपन एक दिन.

काफी पहले की बात है. राजेश तब इंडिया न्यूज में नहीं थे. नौकरी तलाश रहे थे. उनके रिक्वेस्ट पर एक बार मैं तबके अपने मित्र रहे समाचार प्लस वाले उमेश शर्मा के पास ले गया. वहां से मिलकर हम दोनों बाहर निकले. राजेश के कार में ज्यों ही बैठा, त्यों कुछ लोगों ने मेरा नाम पूछा और मुझे बाहर निकाल कर टांग लिया. वे लोग खुद को पुलिस वाले बता रहे थे. राजेश बेहद डर गए, इस अप्रत्याशित घटनाक्रम से. बाद में उन्होंने बताया था- ”यशवंत, मैं यार इतना डर गया था कि गाड़ी फुल स्पीड में भगाते हुए सीधे अपने घर जाकर ही रुका.” यह राजेश की साफगोई थी, उनकी सहजता थी जो इस बात को भी सीधे-सीधे कह दिया.

बता दें कि नोएडा पुलिस की एसटीएफ द्वारा की गई उस गिरफ्तारी के बाद मुझे दो दिन नोएडा के कई थानों के हवालातों में रखा गया. फिर डासना जेल भेज दिया गया जहां 68 दिन रहने के बाद छूटा. इस जेल जीवन पर ‘जानेमन जेल’ नामक किताब लिखी. यह गिरफ्तारी इंडिया टीवी, दैनिक जागरण समेत कई चैनलों-अखबारों के मालिकों-मैनेजरों-संपादकों की एक बड़ी साजिश के तहत हुई थी. तात्कालिक कारण बना विनोद कापड़ी और उनकी पत्नी साक्षी जोशी से मेरा पुराना झगड़ा. इन दोनों के कंधें पर बंदूक रहकर ढेर सारे मीडिया हाउसेज ने पूरी योजना बनाई कि अबकी यशवंत और भड़ास को नेस्तनाबूत कर देना है. इस साजिश में मीडिया मालिकों ने यूपी की तत्कालीन नई-नई आई अखिलेश सरकार के बड़े अफसरों और मुलायम घराने के कुछ बड़े नेताओं को भी शामिल कर लिया था, गलत तथ्य और गलत जानकारियां देकर.

खैर, बात हम लोग कर रहे थे राजेश शर्मा की.

भड़ास पर जब जब आर्थिक मदद के लिए अपील की गई, राजेश भाई ने हर बार चुपचाप पांच हजार या दस हजार रुपये भड़ास के एकाउंट में डालने के बाद फोन पर कहते- ”यशवंत यार इस मदद के बारे में किसी से न जिक्र करना और न कुछ लिखना.”

राजेश प्रबंधन के हिस्से हुआ करते थे, इसलिए जानते थे कि भड़ास से खुलेआम संबंध शो करना करियर के लिए अच्छा नहीं. वो इसका जिक्र फोन पर मजाक में किया करते थे और चुटकी लेते हुए कहते थे- ”भड़ास से दोस्ती और दुश्मनी दोनों करियर के लिए बुरी है…” यह कहते हुए वह ठठा कर हंसते थे…

जिंदादिल राजेश से एक दफे लखनऊ के एक होटल में मुलाकात हो गई, अचानक. राजेश अपने आफिसियल टूर पर लखनऊ गए थे और होटल में रुके हुए थे. मैं एक प्रोग्राम में शिरकत करने होटल में गया हुआ था. हम दोनों होटल के रेस्टोरेंट में अचानक टकरा गए. निगाह मिलते ही राजेश भाई एकदम से खड़े हुए और दोनों हाथ फैलाकर मुस्कराते हुए आगे बढ़े, मैं भी उनकी ओर मुखातिब हुआ. उन्होंने गले लगाया और पीठ थपथपाते हुए कई बार कहा- ”मेरे भाई, मेरे भाई… जमाने बाद मिले हम लोग.” फिर देर तक बात हुई, हंसी-मजाक चला.


मूल खबर :


राजेश को लेकर बहुत सारी बातें हैं, यादें हैं. क्या-क्या कहा जाए. एक इतने जीवंत, सहज, सरल, जिंदादिल और भावुक आदमी का इतना जल्द चले जाना किसी को भी हजम नहीं हो रहा. पर मौत एक कड़वी सच्चाई है जिसे मन मसोस कर कुबूल करना पड़ता है, हजम करना पड़ता है. राजेश का शरीर भले ही आग के हवाले होकर राख में तब्दील हो चुका है लेकिन उनकी यादें हम जैसों के दिलों में हमेशा बनी रहेंगी, जीवंत रहेंगी…

राजेश मेरे अच्छे शुभचिंतकों में से थे लेकिन हम दोनों फेसबुक पर फ्रेंड नहीं थे. राजेश रिश्तों की शो-बाजी पसंद नहीं करते थे. और, शायद भड़ास वाला यशवंत होने के कारण मेरे साथ रिलेशन को पब्लिक डोमेन में चर्चा का विषय नहीं बनाना चाहते थे क्योंकि यह उनके करियर की भी मजबूरी थी. राजेश के मन-दिल को मैं समझता था इसलिए उनकी भावनाओं, उनकी मजबूरियों को भी महसूस करता था. सो, हम लोग फेसबुक पर भले फ्रेंड न रहे हों, लेकिन दिल के स्तर पर बेहद करीबी नाता था…

दोस्त, जिस भी दुनिया में गए हो, ऐसे ही हंसते मुस्कराते इठलाते जीना.. तुम्हारे जाने से मीडिया की दुनिया एक शानदार शख्सियत से महरूम हो गई है… खासकर मैंने अपना एक सच्चा शुभचिंतक / साथी खो दिया है जो हमेशा पूछा करता था- ”यशवंत, कोई दिक्कत हो तो बताना…” ये पूछना ही मेरे लिए काफी था क्योंकि आजकल की मायावी दुनिया में कौन किसकी चिंता करता है…

राजेश भाई, आप कहा करते थे, साथ क्या जाएगा, सब यहीं रह जाएगा, इसलिए किसके खातिर बेइमानी करना. आपके भीतर एक उदात्त किस्म का इंसान था जो सब कुछ, हर ओर-छोर महसूस करता था और सबकी सीमाओं-दायरों को समझा करता था. राजेश अपनी व्यस्त लाइफ, आफिसियल टूर आदि को लेकर कई बार चिंतित होते थे. कहते- यार सांस लेने की फुर्सत नहीं मिलती. एक जगह से टूर निपटा कर लौटे तो दूसरा टूर तैयार रहता है.

राजेश भाई, आपने देख लिया न करियर की आपाधापी का नतीजा. इस तनाव और भागदौड़ से निजात पाने के लिए एल्कोहल का सहारा लेते हैं. योगा कसरत के लिए समय निकाल नहीं पाते. नतीजा, शरीर और नसें दिन प्रतिदिन शिथिल होती जातीं. कई किस्म के लेयर्स नसों के भीतर चढ़ते भरते चले जाते हैं… एक दिन नतीजा आता है हार्ट अटैक के रूप में… उम्मीद करते हैं आपके असमय चले जाने से मीडिया के कुछ ऐसे साथी सबक लेंगे जो आपकी ही तरह की व्यस्ततम लाइफस्टाइल जीते हैं. मुझे याद आता है राजेश भाई आपके घर पर घंटों बैठकर बतियाना. तब मैं दिल्ली के बाबा नीम करोली आश्रम गया था और बगल में ही छतरपुर में आपका घर था. मैंने फोन लगाया और आपने फौरन घर पर बुला लिया. वह केयर, प्यार और सम्मान सब याद आ रहा.

लव यू राजेश भाई, सैल्यूट यू राजेश भाई…

लेखक यशवंत भड़ास4मीडिया डॉट कॉम के संस्थापक और संपादक हैं. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com

भड़ास पर राजेश शर्मा को लेकर छपी पिछली खबर ये है…

इस खबर में राजेश शर्मा की तस्वीर है, दीपक चौरसिया और रवि शर्मा के साथ…

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यह संजय, शराब और शेरो शायरी का दौर था…. कह सकते हैं डिप्रेसन की इंतिहा थी…

स्वर्गीय संजय त्रिपाठी


होते हैं कुछ लोग जो सिर्फ़ संघर्ष के लिए ही पैदा होते हैं। हमारे छोटे भाई और फ़ोटोग्राफ़र मित्र संजय त्रिपाठी ऐसे ही लोगों में शुमार रहे हैं। आज जब संजय त्रिपाठी के विदा हो जाने की ख़बर सुनी तो दिल धक से रह गया। फ़रवरी, 1985 से हमारा उन का साथ था। 32 साल पुराना साथ आज सहसा टूट गया। लखनऊ में वह पहले मेरे ऐसे दोस्त बने जिन से आत्मीयता बनी। दुःख सुख का साथ बना। बिना किसी टकराव और अलगाव के कायम रहा। बिना कुछ कहे-सुने भी हम एक दूसरे को समझ लेते थे। साथ खबरें करते थे, घूमते थे, सिनेमा देखते थे। खुद्दारी रास आई सो दलाली, फोर्जरी, चापलूसी, चमचई न मुझे कभी भाई न संजय को जबकि पत्रकारिता में यह आम बात हो चली है। बिना इस के अब गुज़ारा नहीं है।

जो जितना बड़ा दलाल, उतना बड़ा पत्रकार। हम यह नहीं कर सके सो हम ने तो इस की भारी क़ीमत चुकाई है, चुका रहा हूं। कहां होना था और आज कहीं का नहीं रह गया हूं। एक से एक कौवे दलाली, चापलूसी कर के भाग्य विधाता बन गए और हम इन कौवों की बीट देखते-देखते खत्म हो गए। संजय त्रिपाठी भी इस मामले मेरे हमराही थे। वह इस बेरंग जिंदगी को विदा कह गए, मैं जाने क्यों शेष रह गया हूं। वह कोई तीन साल मुझ से छोटे थे। जब मेरे घर आते तो मेरे पैर छूते मेरे बड़े होने के नाते। बाद में मैं ने बहुत मना किया कि हम दोस्त हैं तो वह किसी तरह माने।

जनसत्ता, दिल्ली से स्वतंत्र भारत, लखनऊ में जब मैं रिपोर्टर हो कर आया था तब संजय वहां पहले ही से फ़ोटोग्राफ़र थे। हम भी तब मुटाए नहीं थे लेकिन संजय त्रिपाठी ख़ूब दुबले-पतले थे। सींक सलाई जैसे। उन के चेहरे पर मासूमियत कुलांचे मारती थी, उत्साह जैसे हिलोरें मारता था। संकोच की चादर जैसे उन के पूरी देह पर लिपटी रहती थी। खुद्दारी की खनक उन के हर भाव से मिलती रहती थी। वह साईकिल से चलते थे। गले में कैमरा लटकाए, कैमरा संभालते, साईकिल चलाते उन को देखना मुश्किल में डालता था। लेकिन वह मुश्किल में नहीं रहते थे। पान कूंचते हुए वह अपनी सारी मुश्किलें जैसे साईकिल के टायर से कुचलते चलते थे। स्वतंत्र भारत था तो उस समय लखनऊ का सब से बड़ा अखबार, सवा लाख रोज छपता था लेकिन संजय त्रिपाठी का शोषण तब यह अख़बार बहुत करता था। उस समय सब को पालेकर अवार्ड के हिसाब से तनख्वाह मिलती थी, ठीक ठाक मिलती थी लेकिन संजय त्रिपाठी को प्रति फ़ोटो पांच रुपए मिलते थे। वह भी प्रकाशित फ़ोटो पर।

वह फ़ोटो चाहे जितनी खींचें पर पैसे छपी फ़ोटो पर ही मिलती थी। और कई बार फ़ोटो सेलेक्ट हो कर भी नहीं छपती थी। कभी अचानक विज्ञापन आ जाने के कारण जगह की कमी के चलते। तो कभी किसी फ्रस्ट्रेटेड डेस्क के साथी की मनबढ़ई और सनक के चलते। खैर जैसे-तैसे संजय त्रिपाठी फोटोग्राफरी क्या चाकरी करते रहे थे। इस उम्मीद में कि कभी तो नौकरी पक्की होगी और कि उन्हें भी पालेकर अवार्ड वाली तनख्वाह मिलेगी। वह भी सम्मानजनक जीवन जिएंगे। लेकिन उन दिनों स्वतंत्र भारत में एक विशेष प्रतिनिधि थे शिव सिंह सरोज। निहायत ही मूर्ख, दुष्ट और धूर्त प्रवृत्ति के थे लेकिन चूंकि दलाल टाईप के पत्रकार थे सो उन की अख़बार और अख़बार से बाहर भी ख़ूब चलती थी। संजय को वह भरपूर परेशान और अपमानित करते। नित नए ढंग से। उन को चढ़ाई करने के लिए अपना फ्रस्ट्रेशन निकालने के लिए रोज कोई शिकार चाहिए होता था। संजय त्रिपाठी से कमज़ोर शिकार कोई और नहीं मिलता था।

संजय त्रिपाठी और शिव सिंह सरोज जब कि एक ही क्षेत्र के रहने वाले थे। बाराबंकी के हैदरगढ़ के। बल्कि संजय त्रिपाठी के पिता श्री रामकिशोर त्रिपाठी साठ के दशक में हैदरगढ़ से विधायक रहे थे। लेकिन वह गांधीवादी थे सो पैसा नहीं बनाया, बेईमानी नहीं की। वह  पराग दुग्ध संघ के अध्यक्ष थे। चाहते तो संजय को कहीं अच्छी नौकरी दे सकते थे, किसी जगह सिफ़ारिश कर सकते थे। संजय ने ऐसा कई बार चाहा भी लेकिन पिता ने सख्ती से हर बार इंकार किया। संजय मन मसोस कर रह जाते थे। संजय के पिता जी एक समय भूदान आंदोलन में सक्रिय रहे थे। उत्तर प्रदेश में तमाम भूमिहीनों को भूमि के पट्टे दिए। लेकिन अपने किसी परिजन को एक इंच भूमि नहीं दी। अपने बच्चों को तो खैर क्या देते। आवश्यक वस्तु निगम के भी एक समय प्रशासक रहे। लेकिन उस भ्रष्ट विभाग में भी एक पैसा भी संजय के पिता ने न तो छुआ, न किसी को छूने दिया।

ऐसे ईमानदार पिता के पुत्र संजय त्रिपाठी पांच रुपए प्रति फ़ोटो पर गुज़ारा कर रहे थे। रोज जीते थे, रोज मरते थे। किसी-किसी दिन एक भी फ़ोटो नहीं छपती। वह उदास हो जाते। शिव सिंह सरोज को बर्दाश्त करना उन के लिए दिन पर दिन भारी होता जा रहा था। नौकरों को भी कोई क्या डांटेगा जिस तरह शिव सिंह सरोज उन्हें डांटते, जलील करते। पर संजय करते भी तो क्या करते। उन के पास कोई विकल्प नहीं था। मैं देख रहा था, संजय दब्बू बनते जा रहे थे।  उन की मासूमियत उन से मिस हो रही थी। खैर थोड़े दिन में वह संपादक वीरेंद्र सिंह की कृपा से दैनिक वेतन भोगी फ़ोटोग्राफ़र बन गए। अब थोड़ा ही सही, कम से कम एक निश्चित पैसा प्रति माह उन्हें मिलने लगा था। दबे-दबे से रहने वाले संजय अब फिर से हंसने लगे थे। उभरने लगे। संजय त्रिपाठी की खिंची फ़ोटो में भी निखार आने लगा।

वह जो कहते हैं बाईलाईन, वह भी कभी-कभार संजय त्रिपाठी को फ़ोटो पर मिलने लगी। लेकिन कनवेंस अलाऊंस उन्हें नहीं मिलता था। जो उन दिनों डेढ़ सौ रुपए होता था। क्या तो उन के पास अपना कनवेंस नहीं था। हालां कि वह बहुत गुरुर के साथ कहते कि, ‘ है तो साईकिल मेरे पास! ‘ लोग हंस पड़ते। बहुत लड़े वह इस के लिए। कुछ संघर्ष के बाद उन्हें कनवेंस अलाऊंस भी मिलने लगा। और यह देखिए कि शिव सिंह सरोज के तमाम विरोध के बावजूद संपादक वीरेंद्र सिंह ने संजय त्रिपाठी को स्टाफ़ फ़ोटोग्राफ़र का नियुक्ति पत्र थमा दिया। अब संजय ने लोन ले कर एक मोपेड भी ख़रीद लिया। जिसे उन के साथी फ़ोटोग्राफ़र संजय की बकरी कहते। अभी तक शिव सिंह सरोज के अपमान सहते आ रहे संजय अब थोड़ा दब कर ही सही उन से प्रतिवाद करने लगे थे। लेकिन स्वतंत्र भारत में एक क्राईम रिपोर्टर थे आर डी शुक्ल जो वीरेंद्र सिंह के बड़े मुंहलगे थे, वह भी सताने लगे। लेकिन संजय मेरे साथ बहुत कंफर्ट फील करते।

बहुत से एसाइनमेंट हमारे साथ किए संजय ने। जब साईकिल से चलते थे तब वह हमारे साथ जब चलते तो अपनी साईकिल आफिस में छोड़ कर मेरी स्कूटर पर आ जाते। पीछे बैठे-बैठे ही वह फ़ोटो खींच लेते। ऐसी बहुत सी घटनाएं और यादें हैं। लेकिन कुछ दृश्य भुलाए नहीं भूलते। जैसे एक बार एक प्रदर्शन के समय विधान सभा के सामने लाठी चार्ज हो गया था। संजय बोले, थोड़ा रिश्क लीजिए तो हम बढ़िया फ़ोटो बना लें। हामी भरते ही वह रायल होटल की तरफ से हमारे स्कूटर पर पीछे की सीट पर पीछे मुंह कर के बैठे। बोले, बस खरामा-खरामा चलते चलिए। चौराहे पर आते ही पुलिस ने रोका लेकिन हम झांसा दे कर प्रेस-प्रेस कहते निकल लिए। बीच लाठी चार्ज में हमारी स्कूटर निकली। और संजय का कैमरा चमकने लगा। अचानक ठीक विधान सभा के सामने के आते ही पुलिस की चपेट में हम आ गए।

संजय घबराए और बोले, फुल स्पीड में भाग लीजिए, नहीं पिट जाएंगे। हम कितना भागते। पुलिस की एक लाठी संजय के कैमरे पर आती-आती कि संजय ने कैमरे पर झुक कर अपना सिर लगा दिया। कैमरा बच गया, संजय का सिर फूट गया। चोट गहरी नहीं थी पर थी।  स्कूटर सरपट भगा कर सिविल हास्पिटल आया। संजय को पट्टी वगैरह करवाई। लेकिन संजय को सिर पर चोट की परवाह नहीं थी। ख़ुश थे वह कि कैमरा बच गया और फ़ोटो अच्छी मिल गई थी। इस के पहले एक बार किसी प्रदर्शन में संजय का कैमरा टूट गया था। पांच हज़ार का उन का नुकसान हुआ था तब के दिनों। दफ़्तर से कोई सहयोग नहीं मिला था। वीरेंद्र सिंह ने बाद में मुझे डांटा। कहा कि, वह तो फ़ोटोग्राफ़र है, बैल है, बुद्धि नहीं है पर आप तो रिपोर्टर हैं, तिस पर लेखक भी, अकल से काम लेना था।  कहीं जान पर बन आती तो? एक लाठी चार्ज में एक नेता अक्षयवर मल की ऐसे ही किसी पुलिस लाठी चार्ज में सिर में चोट लगने से उन्हीं दिनों मौत हो चुकी थी। लेकिन दूसरे दिन संजय हीरो थे। अख़बार में आठ कालम की संजय की खींची फ़ोटो संजय की बाईलाईन के साथ छपी थी। ऐसी फ़ोटो किसी और अख़बार के पास नहीं थी। सभी अख़बार पिट गए थे।

एक बार लखनऊ महोत्सव के कवि सम्मेलन में शिव सिंह सरोज ने अपना सम्मान आयोजित करवाया। सम्मान समारोह की गरिमा बनाने के लिए अमृतलाल नागर सहित कुछ और लोगों को भी सम्मान सूची में रखवा लिया। तब के मुख्य मंत्री नारायण दत्त तिवारी को सम्मानित करना था। ठाकुर प्रसाद सिंह कार्यक्रम का संचालन कर रहे थे। वह सम्मान के समय शिव सिंह सरोज का नाम भूल गए और कवि सम्मेलन शुरू कर दिया। शिव सिंह सरोज संजय को ख़ास ताकीद कर के ले गए थे समारोह में कि मेरे सम्मान की बढ़िया फ़ोटो खींचना। पर जब सम्मान समारोह खत्म हो गया, शिव सिंह सरोज का नाम नहीं पुकारा गया तो कवि सम्मेलन शुरू होते ही संजय पेशाब करने पंडाल से बाहर चले गए। लेकिन एक कवि के कविता पाठ के बाद सरोज ने संचालक को याद दिलाया कि उन के सम्मान का क्या हुआ? तो उन्हों ने कवि सम्मेलन रोक कर शिव सिंह सरोज का सम्मान भी करवा दिया। फिर जल्दी ही शिव सिंह सरोज को कविता पाठ के लिए भी बुला लिया।

शिव सिंह सरोज का डबल अपमान हो गया। एक तो क्रम से सम्मान नहीं हुआ दूसरे उन की वरिष्ठता का ख्याल नहीं रखते हुए नए कवियों के साथ पहले ही कविता पाठ करने के लिए बुला लिए गए। गुस्से में आग बबूला वह कविता पाठ करने आए। आग्नेय नेत्रों से ठाकुर प्रसाद सिंह को देखते हुए उन्हों ने बेलीगारद शीर्षक लंबी कविता पढ़नी शुरु की और हूट होने लगे। इतना कि वीर रस की यह कविता करुण रस में तब्दील हो गई। लेकिन लाख हूटिंग के शिव सिंह सरोज ने पूरी कविता पढ़ी। सम्मान में मिली कंधे से गिर गई शाल पीछे मुड़ कर उठाई, कंधे पर रखी और अपनी जगह ऐसे आ कर बैठे सीना तान कर कि हल्दीघाटी जीत कर लौटे हों। लेकिन असली हल्दीघाटी तो दूसरे दिन की रिपोर्टिंग मीटिंग में शेष थी। उन्हों ने संजय से अपने सम्मान समारोह की फ़ोटो मांगी। तो संजय बिदक कर पूछ बैठे कि, ‘आप का सम्मान हुआ भी था?’ और उन्होंने जैसे जोड़ा, ‘हां आप के बेलीगारद कविता पाठ की फ़ोटो ज़रूर खींची है!’; कह कर उन के काव्य पाठ की फ़ोटो सामने रख दी।

शिव सिंह सरोज ऐसे फटे गोया आसमान फट गया हो। फ़ोटो फेकते हुए बोले, ‘बेलीगारद! भाग जाओ यहां से।’ मुख्य मंत्री ने हमको सम्मानित किया, पूरी दुनिया ने देखा और ई बेलीगारद देखि रहे थे!’ संजय उठ कर मीटिंग से बाहर चले गए। फिर घर चले गए। शिव सिंह सरोज ने संजय को बर्खास्त करने के लिए लिख दिया। वीरेंद्र सिंह ने टालते हुए कहा, यह बर्खास्तगी का विषय नहीं है। लेकिन संजय की तबीयत ख़राब हो गई। डिप्रेसन में चले गए। हफ़्ते भर बाद लौटे। संजय की जिंदगी फिर रफ़्तार पर आ गई। लेकिन अकसर बुदबुदाते हुए कहते यह बुड्ढा मेरी नौकरी खा जाएगा किसी दिन। शिव सिंह सरोज के इस बेलीगारद प्रसंग का सविस्तार वर्णन मैं ने अपने उपन्यास अपने-अपने युद्ध में किया है। हुआ यह भी कि मैं संजय को जब-तब बेलीगारद कह कर भी बुलाने लगा। वह कभी मुस्कुरा पड़ता तो कभी ताव खा जाता।

उन दिनों मैं दारुलशफा में रहता था तो मेरे घर अकसर आते संजय। दफ़्तर का दुखड़ा रोते। घर में भी कम दिक्कत नहीं थी। एक दिन वह बहुत ख़ुश होते हुए बोले, मालूम है पांडेय जी, इस दारुलशफा में मैं भी रहा हूं काफी समय। बचपन गुज़रा है मेरा यहां। पूछा कैसे? तो हलके से मुस्कुराते हुए बताया कि पिता जी एम एल थे न! फिर चुप हो गए।

पिता ईमानदारी का बरगद थे पर एक सौतेली माता भी थीं। उन का सौतेलापन भी कम नहीं था। संजय भीतर-बाहर दोनों तरफ टूट रहे थे। संयोग देखिए कि वीरेंद्र सिंह ने स्वतंत्र भारत से इस्तीफ़ा दे दिया तो शिव सिंह सरोज कार्यकारी संपादक बना दिए गए। कुछ दिनों के लिए ही सही। सरोज से मेरी भी नहीं निभती थी। संजय की तो खैर क्या कहूं। वह सरोज को का वा स बोलता। खैर सरोज के बाद पत्रकारिता में एक और दलाली के चैंपियन राजनाथ सिंह सूर्य संपादक की कुर्सी पर शोभायमान हो गए। मेरे लिए और मुश्किल हो गई। स्वतंत्र भारत से छुट्टी हुई और नवभारत टाइम्स आ गया। जल्दी ही राष्ट्रीय सहारा शुरू हुआ तो संजय त्रिपाठी भी स्वतंत्र भारत छोड़ राष्ट्रीय सहारा आ गए।

अब हम उन को संजय के बजाय मज़ा लेते हुए कहते, का हो , बेलीगारद!  राष्ट्रीय सहारा में आ कर संजय की जिंदगी जैसे पटरी पर आ गई। अब वह ख़ुश और मस्त दिखने लगे। लेकिन जल्दी ही वह फिर पटरी से उतर गए। रणविजय सिंह नाम का एक मूर्ख संपादक बन गया। जो पत्रकारिता का क ख ग भी नहीं जानता था। यह रणविजय सिंह शिव सिंह सरोज से भी ज़्यादा मूर्ख और धूर्त निकला। संजय से भी जूनियर था, मुझ से भी। वह संजय जैसे खुद्दार आदमी को निरंतर अपमानित करने लगा। संजय गालियां देते हुए कहता कि यार यह साला किस्मत का पट्टा लिखवा कर लाया है। अल्ला मेहरबान तो गधा पहलवान। फिर जैसे टूटते हुए कहता हम जैसों की किस्मत भगवान ने गधे के लिंग से लिखी है। रणविजय को पेट भर गरियाता और कहता साले को कुछ आता-जाता नहीं लेकिन दिन-ब-दिन मज़बूत हुआ जाता है पैर छू-छू कर। तंत्र-मंत्र कर के। बाद के दिनों में हम भी राष्ट्रीय सहारा पहुंचे। संजय और हम फिर साथ हो गए।

रणविजय सिंह जैसे साक्षर, दलाल और धूर्त से मेरी भी कभी नहीं निभी। अजब अहमक था यह आदमी। बीच मैच में फ़ोटोग्राफ़र से मैन आफ़ द मैच की फ़ोटो मांगता। फ़ोटोग्राफ़र कहता कि अरे मैच खत्म होगा तब तो मैन आफ़ द मैच होगा। वह कहता टेक्निकल्टी मत समझाओ मुझे। मुझे तो बस फ़ोटो चाहिए। एक से एक मूर्खताएं करता रहता वह। समझ से पूरी तरह पैदल। निर्मल वर्मा का निधन हुआ तो तब के दिनों दिल्ली में फ़ीचर देख रहे मित्र से मैं ने फ़ोन कर कहा कि निर्मल जी पर एक विशेष पेज निकलना चाहिए। मेरे पास उन के एक इंटरव्यू सहित कुछ सामग्री है, कहिए तो भेज दूं। वह बोले, पहले संपादक से बात कर लूं फिर बताता हूं।थोड़ी देर में उन का फ़ोन आया। कहने लगे कुछ मत भेजिए। मैं ने कारण पूछा तो वह बताने लगे कि संपादक ने पूछा कि क्या बहुत बड़ा कलाकार था? मैं ने कहा, नहीं लेखक थे। तो मुंह बिचका कर कहने लगा फिर रहने दीजिए।

ऐसी मूर्खताओं के उस के अनेक किस्स्से हैं। लेकिन संजय सही कहता था, अल्ला मेहरबान तो गधा पहलवान। रणविजय तो समूह संपादक हो गया। और यह देखिए कि औरतबाजी, दलाली  करते-करते, ट्रांसफर, पोस्टिंग करते-करवाते सांसद निधि बरसने लगी उस पर, विधायक निधि बरसने लगी उस पर। लाखों, करोड़ों में। वह मैनेजमेंट कालेज खोल बैठा , इंजीनियरिंग कालेज भी। बारात घर भी। कई-कई घर और फार्म हाऊस। इधर संजय नींद की दवा खाने लगा। डिप्रेसन में जाने लगा। बच्चे बड़े हो रहे थे जिम्मेदारियां बढ़ रही थीं। तनाव उस से ज़्यादा। शराब तनाव से भी ज़्यादा। लाठियां खा कर भी फ़ोटो खींचने वाला संजय, कैमरे बचाने में सिर फोड़वा लेने वाला संजय अब एसाइनमेंट से भागने लगा। कभी मासूम सा दिखने वाला संजय अब अड़ने, लड़ने और झगड़ने वाला हो चला था। शिव सिंह सरोज से बड़ा सिरदर्द रणविजय सिंह हो गया संजय के लिए। लेकिन वह जैसे तैसे निभाता रहा। फ़ोटो खींचने में फ़ोटोग्राफ़र अकसर पिटते रहते हैं। कभी पुलिस पीटती है तो कभी गुंडे, कभी भ्रष्ट अफ़सर।

संजय राष्ट्रीय सहारा की नौकरी में भी कई बार पिटा। लेकिन वापस दफ़्तर आ कर भी जलील हुआ तो टूट-टूट गया। परिवार बिखरने लगा। अब यह देखिए कि एक दिन पता चला कि संजय ने आत्महत्या की कोशिश की। ढेर सारी नींद की दवा खा ली थी। परिवारीजनों ने अस्पताल ले जा कर किसी तरह बचा लिया। जल्दी ही संजय ने दूसरी बार आत्म हत्या की कोशिश की। फिर घर वालों ने बचा लिया। पहली बार मैं ने समझाया था, सांत्वना दी थी। दूसरी बार डांटा। कि यह बार-बार की क्या बेवकूफी है। वह लिपट कर रोने लगा। कहने लगा आप बड़े भाई हैं, आप को डांटने का हक़ है! पर मेरी लाचारी समझिए। बच्चों का वास्ता दिया, बेटी का वास्ता दिया। पर एक बहादुर आदमी हर बात पर रोता रहा। अंततः उस ने वायदा किया कि अब यह गलती नहीं करेगा। लेकिन उस की जिंदगी पटरी से उतर गई थी। डिप्रेशन उस का बड़ा भाई बन गया था। अब वह जिस तिस से लड़ पड़ता। इसी बीच वह मुनव्वर राना से उस की मुलाकात हो गई। अब वह उन की शायरी का मुरीद हो गया। बात-बात में वह मुनव्वर राना के शेर कोट करता रहता। अब वह गजलों का शौक़ीन हो चला था। अकसर रात को फ़ोन करता। कहता सो न रहे हों तो बड़े भाई कुछ शेर सुनाऊं। फिर एक से एक शेर सुनाता। कई बार वह यह काम सुबह-सुबह भी करता। फ़ोन करता और कहता, अरे, कब तक सोते रहेंगे, शेर सुनिए। अब वह जब घर आता तो ग़ज़लों की कोई सी डी लिए। कभी पेन ड्राइव लिए हुए।कहता इसे सुनिए।

अब यह संजय,  शराब और शेरो शायरी का दौर था। कह सकते हैं उस के डिप्रेसन की इंतिहा थी।

पिछले दिनों हम दोनों बेटी की शादी खोजने में लगे थे। संजय की बेटी की शादी तय हुई तो वह कार्ड ले कर आया। शादी के दिन ही दिल्ली में मेरा एक कार्यक्रम था। बताया तो कहने लगा कुछ नहीं आना है। अपनी बेटी की शादी में नहीं आएंगे तो कब आएंगे? मैं ने टिकट कैंसिल किया। गया भी शादी में। बेटी की शादी संजय ने ख़ूब धूमधाम से की। इस के पहले संजय के एक छोटे भाई की शादी में अंबेडकर नगर के एक गांव में बारात गई थी। तब संजय का और ही रुप देखने को मिला था। बहुत सी रिपोर्टिंग यात्राओं में भी संजय का साथ रहा है। पर उस के रंग में फर्क नहीं आता था। उस की शेरो शायरी का रंग और ज़िम्मेदारी का रंग कैसे तो सुर्खरू थे। बेटी की शादी कर के वह बहुत निश्चिंत हो गया था। बिलकुल मस्त और मगन। मुझे बेटी के विवाह के लिए परेशान देखता तो कहता कि बेटियां अपना भाग्य ले कर आती हैं सो घबराओ नहीं यार! हो जाएगी बिटिया की शादी भी! वह बेटी की एक से एक फ़ोटो सेशन करता और कहता यह फ़ोटो भेज कर देखिए। अब की तो बात बन जाएगी। जब मेरी बेटी की शादी हुई तो वह आया और ख़ूब ख़ुश। 

ऐसे ही एक दिन मिला तो कहने लगा मालिनी अवस्थी से कभी बात होती है। मैं ने कहा हां, होती है कभी-कभार। मैं ने पूछा कि क्यों क्या हुआ? कहने लगा कि यार अब हमें वह पहचानती ही नहीं। फिर याद दिलाते हुए कहा कि याद है मालिनी अवस्थी के बलरामपुर अस्पताल वाले घर में आप के साथ गया था। आप ने इंटरव्यू किया था, हम ने फ़ोटो खींची थी। वह घर में स्कर्ट पहने बैठी थीं, उन की स्कर्ट में फ़ोटो। स्वतंत्र भारत में छपी थी बड़ी सी। किसी अख़बार में मेरी खींची फ़ोटो ही पहली बार उन की छपी थी, उन्हें याद तो दिलाइए। कि उन को स्टार बनाने में मेरा भी हाथ है। पहचान लिया करें मुझे भी तो अच्छा लगेगा। हम ने कहा, ठीक है। लेकिन मालिनी अवस्थी से यह कभी कह नहीं पाया।

क्या कहता भला। यह भी कोई कहने की बात होती है। रिपोर्टिंग और फ़ोटोग्राफ़ी में ऐसे तमाम मुकाम आते-जाते रहते हैं। बहुत से लोग कंधे पर सिर रख कर निकल गए। जब ज़रुरत हुई सुबह-शाम सलाम किया। ज़रूरत खत्म, पहचान खत्म। कौन किस को याद करता है। लेकिन संजय अकसर याद दिलाता और कहता कि कहा नहीं मालिनी अवस्थी से क्या। मैं हर बार कहता हूं, कह कर टाल जाता। फिर बहुत दिन हो गए इस बात को उस ने यह कहना बंद कर दिया। पर एक दिन फ़ेसबुक पर संजय की वाल पर देखा कि वह मालिनी अवस्थी के साथ एक फ़ोटो में मुस्कुरता हुआ खड़ा था। लेकिन मैं ने उस से कुछ कहा नहीं। जाने कितनी सांस और फांस है संजय के साथ हमारी। जाने कितने लोगों के इंटरव्यू, सेमिनारों, नाटकों, राजनीतिक कार्यक्रमों, धरना, प्रदर्शन, आंदोलन आदि-इत्यादि में उस के साथ की अनेक यादें जैसे दफ़न हैं हमारे सीने में।

कुछ समय पहले इस राष्ट्रीय सहारा की नौकरी से भी इस्तीफ़ा दे दिया था संजय ने। सो जिंदगी जो थोड़ी बहुत पटरी पर थी बिलकुल पटरी से उतर गई थी। आर्थिक समस्याएं जब नौकरी करते हुए नहीं खत्म हुईं तो बिना नौकरी के कैसे खत्म होतीं। उसे अपना फाइनल हिसाब मिलने का इंतज़ार था कि ख़ुद फाइनल हो गया। संजय का एक छोटा भाई विनोद त्रिपाठी भी टाइम्स आफ़ इंडिया में फ़ोटोग्राफ़र था। कुछ साल पहले विनोद भी विदा हो गया था। अब संजय अपने गांव की बात करता रहता था। लेकिन गांव में भी कौन सी जमींदारी थी भला। पुरखे देवरिया से आ कर हैदरगढ़ के पास के गांव पूरे झाम तिवारीपुरवा में बसे थे और पिता विरासत में ईमानदारी और संघर्ष दे गए थे। दुर्भाग्य से संजय भी अपने दोनों बेटों को यही विरासत सौंप गए हैं।

शुरु के दिनों में जब संजय स्वतंत्र भारत में अपने को फ़ोटोग्राफ़र साबित करने के संघर्ष में लगा था, उसे हर कोई फ़ोटोग्राफ़ी सिखाने में लगा था। जिसे कैमरा पकड़ने का शऊर नहीं होता वह भी, जिसे फ़ोटो की समझ नहीं होती वह भी। उन्हीं लोगों में से एक मैं भी था। मैं भी उसे कभी रघु रॉय के फ़ोटो दिखाता तो कभी सत्यजीत रॉय के फ़ोटो। और बताता कि देखो फ़ोटो यह होती है। वह फ़ोटो देखता, मेरी बात सुनता और टाल जाता। यह सब जब कई बार हो गया तो संजय कहने लगा यह दिल्ली नहीं है, बंबई और कलकत्ता नहीं है, लखनऊ है। यहां ऐसी फ़ोटो कौन खींचता है, कौन छापता है। तो मैं उसे अनिल रिसाल सिंह के फ़ोटो दिखाता। सत्यपाल प्रेमी के फ़ोटो दिखाता और कहता यह देखो, यह तो लखनऊ के फ़ोटोग्राफ़र  हैं। वह तड़पता हुआ कहता, इन के कैमरे देखे हैं, इन के लेंस देखे हैं? क्या है मेरा कैमरा? यह कोई कैमरा है?

वह कहने लगा दिला दीजिए ऐसा ही कैमरा, ऐसा ही लेंस और ऐसी ही सुविधा। और फिर धरना, प्रदर्शन, नाटक, नौटंकी की रूटीन फोटुओं से फुर्सत, डाल दीजिए मेरे पेट में भरपेट रोटी। ऐसी ही सुविधा और ऐसी ही निश्चिंतता। इन से अच्छी फ़ोटो खींच कर न दिखाऊं तो कहिएगा। वह कहता, यहां तो रोज जब फ़ोटो खींचता हूं तो शिव सिंह सरोज का अपमानित करने वाला सामंती रवैया दिमाग में सवार रहता है। फ़ोटो क्या खाक खींचूंगा? रोटी दाल चलाने दीजिए परिवार की। व्यवहार में यही है, बाकी सब सिद्धांत है। सच यही है कि अधिकांश रिपोर्टर, फ़ोटोग्राफ़र रोटी दाल में ही स्वाहा हो जाते हैं और अपना बेस्ट नहीं दे पाते हैं। शिव सिंह सरोज और रणविजय सिंह जैसे पत्रकारिता के दलाल गिद्ध जाने कितने संजय त्रिपाठी खा गए हैं, खाते रहेंगे। क्यों कि अब इन्हीं शिव सिंह सरोज और रणविजय सिंह जैसे दलालों और भडुओं का ज़माना है। अख़बारों में यह भडुए दलाल ही भाग्य विधाता हैं। पढ़े-लिखे लोगों की ज़रुरत अब किसी प्रबंधन को नहीं है।

अलविदा मेरे भाई, मेरे दोस्त, मेरे बेलीगारद! बहुत सारी बातें हैं, बहुत सारी यादें हैं। स्मृतियों में तुम सर्वदा उपस्थित रहोगे। अभी इतना ही। शेष फिर कभी। लेकिन तुम ने आज मुझे रुलाया बहुत है। अकसर तुम्हें चुप कराने वाला मैं आज कैसे चुप रह पाता भला। सो रो-रो कर हलका किया ख़ुद को। तुम धू-धू कर जलते रहे, मैं फूट-फूट रोता रहा। यही तो आज हुआ, मेरे बेलीगारद, डियर बेलीगारद! पर अब किसे इतने दुलार से कहूंगा डियर बेलीगारद! तुम तो चले गए!

लेखक दयानंद पांडेय वरिष्ठ पत्रकार और उपन्यासकार हैं. उनसे संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है। यह लेख उनके ब्‍लॉग सरोकारनामा से साभार लिया गया है।


मूल खबर…

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बचपन के मित्र बिग्गन महाराज के गुजरने पर यशवंत ने यूं दी श्रद्धांजलि : ‘दोस्त, अगले जनम अमीर घर ही आना!’

Yashwant Singh : गांव आया हुआ हूं. कल शाम होते-होते बिग्गन महाराज के गुजर जाने की खबर आई. जिस मंदिर में पुजारी थे, वहीं उनकी लाश मिली. उनके दो छोटे भाई भागे. मंदिर में अकेले चिरनिद्रा में लेटे बड़े भाई को लाद लाए. तख्त पर लिटाकर चद्दर ओढ़ाने के बाद अगल-बगल अगरबत्ती धूप दशांग जला दिया गया. देर रात तक बिग्गन महाराज के शव के पास मैं भी बैठा रहा. वहां उनके दोनों सगे भाइयों के अलावा तीन-चार गांव वाले ही दिखे.

बिग्गन महाराज गांव के सबसे गरीब ब्राह्मण परिवार के सबसे बड़े बेटे थे. अभाव और अराजकता के दुर्योग से वह भरी जवानी में बाबा बनने को मजबूर हुए. अगल-बगल के गांवों के मंदिरों पर रहने लगे. कुछ बड़े बाबाओं के शिष्य भी बने. बताया गया कि वह कल मरने से पहले एक यजमान के यहां जाकर उन्हें दीक्षा दी. गुरुमुख बनाया. बदले में उन्हें नया स्टील का कमंडल और एक बछिया मिली. जिस दिन उन्हें इतना कुछ मिला, उसी दोपहर उनके पेट में अन्न जल न था. उपर से तगड़ी धूप. बिग्गन महाराज मंदिर लौटे और गिर कर मर गए. शव के साथ बैठे लोग किसिम किसिम की चर्चाएं कर रहे थे. कौन जानता था अपने यजमान को मोक्ष-मुक्ति का मार्ग बता मंदिर लौट रहे गुरु पर इस मायावी संसार को अलविदा कहने के वास्ते मारण मंत्र का जाप शुरू हो चुका था.

बतकही जारी थी. पुरवा हवा की सरसराहट से बिग्गन महाराज के शव पर पड़ा चद्दर सर से पांव तक इस कदर फड़फड़ा रहा था जैसे पंडीजी बस अब कुछ बोलने के लिए उठने ही वाले थे. ताड़ी से तारी साथ बैठे एक सज्जन उदात्त भाव और तेज स्वर से कहने लगे- बिग्गन महराज गांजा के बाद हीरोइन पीने लगे थे. आजकल तो पैसे के लिए गांव आकर अपनी मां से लड़कर सौ पचास ले जाने लगे थे. जितने मुंह उतनी बातें. कईयों ने मौत को अनिवार्य सच बताया. कुछ ने बिग्गन महाराज की कम उमर होने का हवाला दिया. मुझे अजीब इच्छा हुई. तख्त पर लिटाए गए बिग्गन महाराज के चेहरे को देखने की. रात दो बजे के करीब उनके छोटे भाई ने महराज के चेहरे से चद्दर हटाया. लंबी बाबाओं वाली दाढ़ी और सांवला चेहरा. बिलकुल शांत. लग ही नहीं रहा था कि यह मरे आदमी का चेहरा है. जैसे वो सोए हों. ध्यान में हों. चिलम के असर के बाद मौन साध गए हों.

चार भाइयों में सबसे बड़े बिग्गन महाराज के गुजर जाने से उनके परिवार पर कोई असर न पड़ेगा. एक तो उनका खुद का कोई निजी परिवार न था. उनने शादी न की थी. कह सकते हैं शायद हुई ही न हो. इसलिए वे बाल ब्रह्मचारी कहलाए गए. दूसरे उनके जाने से सगे भाइयों को कभी कभार सौ पचास मां से मांग ले जाने के अप्रत्याशित कर्म से मुक्ति मिली.

हां, बुजुर्ग महतारी जरूर देर तक छाती पीट पीट कर रोती रहीं. शायद मां के कलेजे में उस बेटे के खास तड़प होती है जो थोड़ा मजबूर हो, जो थोड़ा शोषित हो, जो थोड़ा अव्यवस्थित हो, जो थोड़ा मिसफिट हो, जो गैर-दुनियादार हो, जो संघर्षरत हो.

शाम के समय मरने की खबर जब घर पहुंची तो नाती-नातिन के साथ बैठी बुजुर्ग महतारी छाती पीट पीट कर रोने लगी. अगल-बगल घरों की महिलाएं एक एक कर पहुंच कर उन्हें पकड़ कर दिलासा देने लगीं- ”होनी को कौन टाल सकता है मइया, चुप रहिए, भगवान को शायद यही मंजूर था.” पड़ाइन मइया कुछ गा-गा कर लगातार रोती बिलखती हिलती फफकती हांफती रहीं. शायद इस तरह बेटे को अंतिम बार पूरे दिल और पूरी शिद्दत से याद किया उनने.

मुझे बिग्गन महाराज के साथ बचपन के दिन याद आए. उनके साथ बगीचों में आम तोड़ना, उनके साथ पूड़ी खाने दूसरे गांवों में जाना, ढेर सारी शरारतों और बदमाशियों में उनको अपने विश्वासपात्र सिपाही की तरह साथ रखना. बिग्गन महाराज लायल थे. निष्ठा उनने कभी न तोड़ी. दोस्ती की तो खूब निभाया. बाबा बने तो उसी दुनिया के आदमी हो गए, बाकी सबसे नाता तोड़ लिया. बस केवल अपनी मां से नाता रखा. देखने या मांगने चले आते थे, आंख चुराए, मुंह नीचे झुकाए.

बिग्गन महाराज जीते जी मरने की कामना करने लगे थे. मौत के दर्शन और लाभ का शायद वह कोई रहस्यमय धार्मिक अध्याय बांच चुके थे. तभी तो वह दुनियादारों की तरह मौत से डरते न थे और मौत से बचने के लिए कोई उपक्रम न करते. जैसे वह मौत को चुनौती देते रहते. खुद को नशे में डुबोने के लिए वह अतिशय गांजा-चिलम पीने लगे.

बताते हैं कि जिस गांव के मंदिर पर वह पुजारी थे, उस गांव के कुछ नशेड़ियों की संगत में सुल्फा-हीरोइन को अपना बैठे. गांजे के असर की हद-अनहद वह जी चुके थे. उन्हें इसके परे, इससे भी दूर, अंतरिक्ष के पार, जाना था. सफेद धुओं के रथ पर सवार होकर जाना था. हीरोईन-सुल्फा ने इसमें उनकी मदद की होगी शायद.

इस नई शुरुआत ने इतना आनंदित किया कि वह इसे अपना गुरु बना बैठे. हीरोइन-सुल्फा की लत के शिकार बिग्गन महाराज को पहले कभी-कभार फिर अक्सर पैसे का अभाव खलने लगा. ऐसे में उन्हें अपनी मां याद आतीं जिनके अलावा किसी पर उनका कोई अधिकार न था. वह अपने घर आ जाते, चुपके से. मां से लड़ते-झगड़ते और आखिर में कुछ पैसे पा जाते. घर वाले थोड़े परेशान रहने लगे. उनके लिए बिग्गन महराज की यह आदत नई और अप्रत्याशित थी. छोटे तीन भाइयों के बच्चे-पत्नी हैं. वे छोटे-मोटे काम धंधा कर जीवन गृहस्थी चलाने में लगे रहते. पैसे का अभाव सबके लिए एक बराबर सा था. ऐसे में मां जाने कहां से सौ-पचास उपजा लेतीं और बिग्गन महाराज को डांटते डपटते, आगे से आइंदा न मांगने की लताड़ लगाते हाथ पर चुपके से धर देतीं.

बिग्गन महाराज की मिट्टी को जब आज सुबह अंतिम यात्रा पर ले जाया गया तो मैं गहरी नींद में था. देर रात तक सोए बिग्गन महाराज संग जगा मैं जीवन मौत के महात्म्य को समझता गुनता रहा. घर आकर बिस्तर पर गिरा तो सुबह दस बजे आंख खुली. तब तक बिग्गन महाराज गांव से कूच कर चुके थे. उनके शरीर को गंगा के हवाले किया जा चुका था. उन्हें साधुओं सरीखा सम्मानित सुसज्जित कर जल समाधि दी गई.

इस देश में अभाव और गरीबी के चलते जाने कितने बिग्गन महाराज भरी जवानी बाबा बनने को मजबूर हो जाते हैं. फिर इस मजबूरी को ओढ़ने के लिए नशे के धुएं में उड़ने लगते हैं. बिग्गन महाराज हमारे गांव के लिए कोई उतने जरूरी शख्स नहीं थे. वैसे भी गांव में गरीब और गरीबी के हमदर्द-दोस्त होते कहां हैं. बिग्गन महाराज किसी से कुछ न बोलते और गांव से परे रहते. बेहद गरीब परिवार के सबसे बड़े बेटे बिग्गन महाराज को पता था कि उनके लिए कोई निजी इच्छा रखना, किसी कामना को पालना नामुमकिन है इसलिए उनने इसे विरुपित करने वाले चोले को ओढ़ लिया. एक आकांक्षाहीन जीवन को साधु के चोले से ही दिखावट कर पाना संभव था.

बिग्गन महाराज का जाना मेरे लिए बचपन के एक निजी दोस्त का असमय काल के गाल में समाना है. उनने जिस राह को चुना और आगे जिस राह पर जाने को इच्छुक थे, बाबागिरी से मृत्यु यात्रा तक, इसका सफर उनने रिकार्ड कम समय में, बेहद सटीक-सधे तरीके से की. शायद देश के करोड़ों युवा बिग्गन महाराजों के लिए इस व्यवस्था ने मोक्ष और मुक्ति के लिए यही आखिरी रास्ता बुन-बचा रखा है जिससे परे जाने-जीने के लिए कोई विकल्प नहीं है.

राम-राम बिग्गन महाराज.

नई दुनिया के लिए शुभकामनाएं. इस लुटेरी-स्वार्थी दुनिया से जल्द निकल लेने पर बधाई.

दोस्त, अगले जनम किसी अमीर घर ही आना!

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com


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स्मृति शेष : दिनेश ग्रोवर जितना मजेदार और जिन्दादिल इंसान कम ही देखा है

बड़ी ही मजेदार थी दिनेश ग्रोवर की जिन्दादिली…  बहुत साल पहले की बात है। वयोवृद्ध पत्रकार एवं कवि-लेखक इब्बार रब्बी राजेन्द्र यादव की साहित्यिक पत्रिका ‘हंस’ में संपादन सहायक के तौर पर अवैतनिक सेवा दे रहे थे। रब्बी जी नवभारत टाइम्स से रिटायर हो चुके थे और आर्थिक रूप से परेशान चल रहे थे। रब्बी जी राजेन्द्र यादव के दरियागंज स्थित दफ्तर में बैठकबाजी करने कभी-कदार चले जाया करते थे।

बाद में यादव जी के कहने पर रब्बी जी ‘हंस’ का कुछ काम करने लगे और वह रोज वहां जाने लगे। उन्हें उम्मीद थी कि यादव जी उनके संपादकीय कार्य-सहयोग के बदले में हर महीने उन्हें कुछ न कुछ मुद्रा जरूर थमाएंगे। कई महीने बीत गये, पर यादव जी ने कुछ न दिया। यहां तक कि घर से ‘हंस’ के दफ्तर तक आने-जाने का किराया तक नहीं। रब्बी जी टाइम काटने की गरज से लगभग एक साल तक वहां बैठते रहे। उन्हीं दिनों की बात है कि मैं रब्बी जी से मुलाकात करने ‘हंस’ के कार्यालय गया हुआ था। रब्बी जी राजेन्द्र जी के चैम्बर में उनके सामने वाली कुर्सी पर विराजमान थे।

वहां एक और भी व्यक्ति, जो लगभग राजेन्द्र जी की ही उमर का था, उनकी बायीं तरफ बैठा था। उस व्यक्ति से मैं अपरिचित था। सोचा कोई लेखक-वेखक होगा। कक्ष में जोर-जोर के ठहाके लग रहे थे। बहरहाल, जैसे ही रब्बी जी ने मुझे देखा, अपने बगल वाली कुर्सी पर बैठने का इसारा किया। जब ठहाके थम गये तो रब्बी जी ने उस अपरिचित आदमी से मेरा परिचय करवाया। उस समय मेरे लिए वह अपरिचित व्यक्ति थे— लोक भारती प्रकाशन, इलाहाबाद के मालिक दिनेश ग्रोवर।आज सुबह उनके निधन की खबर फेसबुक पर मिली, तो सहसा ग्रोवर जी का ठहाका लगाता चेहरा सामने घूम गया। मुझे गहरा धक्का लगा।

जिस दिन की मैंने ऊपर चर्चा की है, उस दिन ‘हंस’ के दफ्तर में दरअसल हगने-मूतने से संबंधित किस्से सुने-सुनाये जा रहे थे। एक किस्सा किसी बडे लेखक से जुड़ा था, जो ग्रोवर जी मेरे वहां पहुंचने से पहले सुना चुके थे और उसी पर ठहाके लगाये जा रहे थे। बाद में ग्रोवर जी ने देर तक चले हंसी-मजाक के उपसंहार के तौर पर किसी डॉक्टर के हवाले से एक तथ्य की चर्चा की। उन्होंने बताया कि व्यक्ति का पेट कभी भी पूरी तरह साफ नहीं हो सकता। एक किलो के करीब मल उदर में हमेशा भरा रहता है। यदि वह निकल जाये तो आदमी गश खाकर गिर जाएगा। उनकी इस बात पर भी ठहाका लगा।

कुछ देर बाद ही चैम्बर का माहौल तब तनावपूर्ण हो गया, जब राजेन्द्र जी ने ग्रोवर जी की किसी बात पर कहा—‘’तुम साले हिन्दी जगत के लेखकों का घोर शोषण करते हो।‘’ ग्रोवर जी भी नहीं चूके। उन्होंने कहा— ‘’प्रकाशन की दुनिया का सबसे बड़ा शोषक राजेन्द्र यादव है।‘’ दोनों लोगों के बीच कहासुनी का यह दौर आधे घंटे से ज्यादा चला। दोनों तमतमाया चेहरा देखकर यही लगता था कि इस वाद-विवाद की परिणति निश्चित तौर पर मारपीट होगी। हालांकि ऐसा कुछ हुआ नहीं। बाद में रब्बी जी ने मुझे बताया कि ये दोनों एक-दूसरे के जिगरी दोस्त और जानी दुश्मन दोनों हैं। इस प्रकरण का गवाह बनने के बाद मैं इलाहाबाद जब भी गया, ग्रोवर जी से जरूर मिला। हिन्दी जगत में इतने मजेदार और जिन्दादिल इंसान मैंने कम ही देखे हैं।

इस स्मृति शेष के लेखक विनय श्रीकर वरिष्ठ पत्रकार हैं और ढेर सारे बड़े हिंदी अखबारों में उच्च पदों पर कार्य कर चुके हैं. उनसे संपर्क shrikar.vinay@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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पहले प्रदीप संगम, फिर ओम प्रकाश तपस और अब संतोष तिवारी का जाना….

एक दुर्भाग्यपूर्ण संयोग या दुर्योग, जो कहिए… मेरे ज्यादातर प्रिय पत्रकारों का समुदाय धीरे-धीरे सिकुड़ता छोटा होता जा रहा है… दो-तीन साल के भीतर एकदम से कई जनों का साथ छोड़कर इस संसार को अलविदा कह जाना मेरे लिए स्तब्धकारी है… पहले आलोक तोमर, फिर प्रदीप संगम, उसके बाद ओमप्रकाश तपस और अब संतोष तिवारी… असामयिक रणछोड़ कर चले जाना या जीवन के खेल में आउट हो जाना हर बार मुझे भीतर तक मर्माहत कर गया… सारे पत्रकारों से मैं घर तक जुड़ा था और प्यार दुलार का नाता बहुत हद तक स्नेहमय सा बन गया था… इनका वरिष्ठ होने के बाद भी यह मेरा सौभाग्य रहा कि इन सबों के साथ अपना बोलचाल रहन-सहन स्नेह से भरा रसमय था… कहीं पर कोई औपचारिकता या दिखावापन सा नहीं था… यही कारण रहा कि इनके नहीं होने पर मुझे खुद को समझाने और संभलने में काफी समय लगा…

फिलहाल तो बात मैं संतोष जी से ही शुरू करता हूं । मेरा इनसे कोई 23 साल पुराना नाता रहा। भीकाजी कामा प्सेस के करीब एक होटल में शाम के समय कुछ लोगों से मिलने का कार्यक्रम था । मेरे पास अचानक हिन्दुस्तान से संतोष जी का फोन आया- अनामी शाम को एक जगह चलना है, तैयार रहना। मैने जब जिज्ञासा प्रकट की तो वे बौखला गए। अरे जब मैं बोल रहा हूं तो फिर इतने सारे सवाल जवाब क्यों? बस् इतना जान लो कि जो मेरी नजर में सही और मेरे प्रिय पत्रकार हैं, बस्स मैं केवल उन्ही दो चार को बुला भी रहा हूं।

उल्लेखनीय है कि इससे पहले तो मेरी संतोष जी से दर्जनों बार फोन पर बातें हो चुकी थी, मगर अपने अंबादीप दफ्तर से 100 कदम से कम की दूरी पर एचटी हाउस की बहुमंजिली इमारत में कभी जाकर मैं संतोष जी से मिला नहीं था। ना ही कभी या कहीं इनसे मिलने का सुयोग बना था। मैं फटाफट अपने काम को निपटाया और फोन करके एचटी हाउस के बाहर पहुंच गया। वहां पर संतोषजी पहले से ही मौजूद थे। मुझे देखते ही बोले- अनामी… मेरे सिर हिलाने पर उनने लपक कर मुझे गले से लगा लिया। साले कलम से जितना आक्रामक दिखते हो उतना तीखा और आक्रामक तो तुम लगते नहीं। अब इस पर मैं क्या कहता… बस्स जोर से खिलखिला पड़ा तो वे भी मेरे साथ ही ठहाका लगाने लगे। यह थी मेरे प्रति संतोष जी की पहली प्रतिक्रिया।

देर रात तक मेहमानों के संग बातें होती रहीं और साथ में मदिरामय माहौल भी था। इससे मैं काफी असहज होने लगा तो संतोष जी मुझे कमरे से बाहर ले गए और ज्ञान प्रदान किया। जब तुम कहीं पर पत्रकार के रूप में जाओ तो जरूरी नहीं कि सारा माहौल और लोग तुम्हारी अपेक्षाओं या मन की ही बातें करेंगे। कहीं पर असामान्य लगने दिखने से बेहतर है कि तुम खान पान पर अपने ध्यान को फोकस कम करके काम और जो बातचीत का सेशन चल रहा है उसमें औरों से हटकर बातें करो ताकि सबों का ध्यान काम पर रहे और खान पान दोयम हो जाए। इन गुरूमंत्रों को बांधकर मैं अपने दिल में संजो लिया और अंदर जाकर बातचीत के क्रम को एक अलग तरीके से अपने अनुसार किया।

पत्रकारिता के लगभग दो दशक लंबे दौर में बहुत दफा इस तरह के माहौल का सामना करना पड़ा। जब अपने साथी मित्रों का ध्यान काम से ज्यादा मदिरा पर रहा तो मैंने अपने अनुसार बहुत सारी बातें कर ली और मदिरा रानी के संग झूले में उडान भर रहे मेरे मित्रों ने मेरी बातों पर कोई खास तवज्जो नहीं दी। इसके फलस्वरूप मेरी रिपोर्ट हमेशा औरों से अलग और कुछ नयी रहती या होती थी। इस पर अगले दिन अपने साथियों से मुझे कई बार फटकार भी खानी पड़ी या कईयों ने मुझे बेवफा पत्रकार का तगमा तक दे डाला था कि खबरों के मामले में यह साला विश्वास करने लायक नहीं है। आपसी तालमेल पर भी न्यूज को लेकर किसी समय सीमा का बंधन नहीं मानेगा।

तमाम उलाहनों पर भिड़ने की बजाय हमेशा मेरा केवल एक जवाब होता कि न्यूज है तो उसके साथ कोई समझौता नहीं। इस तरह के किसी भी संग्राम में यदि मैं कामयाब होता या रहता तो संतोषजी का लगभग हमेशा फोन आता, वेरी वेरी गुड अनामी डार्लिंग। वे अक्सर मुझे मेरे नाम के साथ डार्लिंग जोडकर ही बोलते थे। मैने उनसे कई बार कहा कि आप जब डार्लिंग कहते हैं तो बबल कहा करें जिससे लोग समझेंगे कि आप किसी महिला बबली से बात कर रहे हैं…. अनामी में डार्लिंग जोडने से तो लोग यही नहीं समझ पाएंगे कि आप किसी को अनामी बोल रहे है या नामी बोल रहे है या हरामी बोल रहे हैं। मेरी बातें सुनकर वे जोर से ठहाका लगाते… वे कहते- नहीं, बबल कहने पर ज्यादा खतरा है यार… अनामी इतना सुंदर और अनोखा सा इकलौता नाम है कि इसको संबोधित करना ज्यादा रसमय लगता है।

इसी तरह के रसपूर्ण माहौल में मेरा नाता चल रहा था. मुझसे ज्यादा तो मुझे फोन करके अक्सर संतोषजी ही बात करते थे। हमेशा एचटी हाउस की जगत विख्यात कैंटीन में मुझे बुलाते और खान पान के साथ हमलोग बहुत मामले में बात भी कर लिया करते थे। उनका एक वीकली कॉलम दरअसल दिल्ली की समस्याओं पर केंद्रित होता था। कई बार मैने कॉलम में दी गयी गलत सूचनाओं जानकारियों तथ्यों और आंकड़ो की गलती पर ध्यान दिलाया तो मुझे हमेशा लगा कि शायद यह उनको बुरा लगेगा। मगर एक उदार पत्रकार की तरह हमेशा गलतियों पर अफसोस प्रकट किया और हमेशा बताने के लिए प्रोत्साहित किया।

हद तो तब हो गयी जब कुछ प्रसंगों पर लिखने से पहले घर पर फोन करके मुझसे चर्चा कर लेते और आंकड़ो के बारे में सही जानकारी पूछ लेते। उनके द्वारा पूछे जाने पर मैं खुद को बड़ा शर्मसार सा महसूस करता कि क्या सर आप मुझे लज्जित कर रहे हैं, मैं कहां इस लायक कि आपको कुछ बता सकूं। मेरे संकोच पर वे हमेशा कहते थे कि मैं भला तुमको लज्जित करूंगा, साले तेरे काम का तो मैं सम्मान कर रहा हूं, मुझे पता है कि इस पर जो जानकारी तुम दोगे वह कहीं और से नहीं मिलेगी।

उनकी इस तरह की बातें और टिप्पणियां मुझे हमेशा प्रेरित करती और मुझे भी लगता कि काम करने का मेरा तरीका कुछ अलग है। आंकड़ो से मुझे अभी तक बेपनाह प्यार हैं क्योंकि ये आंकड़े ही है जो किसी की सफलता असफलता की पोल खोलती है। हालांकि अब नेता नौकरशाह इसको लेकर काफी सजग और सतर्क भी हो गए हैं मगर आंकडों की जुबानी रेस में ज्यादातर खेलबाजों की गाड़ी पटरी से उतर ही जाती है। संतो,जी र मेरा प्यार और नेह का नाता जगजाहिर होने की बजाय लगातार फोन र कैंटीन तक ही देखा जाता। हम आपस में क्या गूफ्तगू करते यह भी हमारे बीच में ही रहता।

एक वाक्या सुनादूं कि जब वे मयूरविहार फेज टू में रहते थे तो मैं अपने जीवन में पहली और आखिरी बार किसी पर्व में मिठाई का एक पैकेट लेकर खोजते खोजते सुबह उनके घर पर जा पहुंचा। । घर के बाहर दालानव में मां बैठी थी। मैने उनसे पूछा क्या आप संतो,जी की मां है ? मेरे सवाल पर चकित नेत्रों से मुझे देखते हुए अपने अंचल की लोक भाषा में कुछ कहा जिसका सार था कि हां । मैने उनके पैर छूए और तब मेरा अगला सवालथा कि क्या वे घर पर हैं ? मां के कुछ कहने से पहले ही तब तक भीतर से उनकी आवाज आई जी हा अनामी डार्लिंगजी संतोष जी घर पर हैं आप अंदर आईए। उनकी आवाज सुनकर मां ने जाने का रास्ता बना दिया तो मैं अंदर जा पहुंचा।

मेरे हाथ में मिठाई का डिब्बा देखकर वे बोल पड़े ये क्या है ? थोडा तैश में बोले गजब करते हो छोटे भाई हो और बड़े भाई के यहां मिठाई लेकर आ गए। अरे बेशरम मिठाई खाने आना चाहिए ना कि लाना। मैं भी थोडा झेंपते हुए कहा कि आज दीवाली था और आप दिल्ली के पहले पत्रकार हो जिसके घर मैं आया हूं। तो बोले- मुझे ही आखिरी पत्रकार भी रखना जब किसी पत्रकार के यहां जाओगे मिठाई लेकर तो वह तेरी ईमानदारी पर संदेह करेगा कि घर में मिठाई के कुछ डिब्बे आ गए तो लगे पत्रकारों में बॉटकर अपनी चौधराहट दिखाने। कुछ देर के बाद जब मैं जाने लगा तो मुझे मिठाई के दो डिब्बे तमाया एक तो मेरी तरफ से तुमको और दूसरा डिब्बा जो लाया था उसके एवज में यह दूसरा डिब्बा।

मैं दोनों डिब्बे थामकर जोर से हंसने लगा,तो वे थोडा असहज से होते हे सवाल किया कि क्या हुआ? मैंने कहा कि अब चौधराहट मैं नहीं आप दिखा रहे हैं। फिर हमलोग काफी देर तक खिलखिलाते रहे और अंत में फिर चाय पीकर घर से बाहर निकला। दीपावली या होली पर जब कभी शराब की बोतल या कभी कभी बंद पेटी में दर्जनों बोतल शराब की घर पहुंचा देने पर ही मैं अपने उन मित्रों को याद करता जिनके ले यह एक अनमोल उपहार होती। बाद में कई विधायकों को फोन करके दोबारा कभी भी शराब ना भेजने का आग्रह करना पड़ता ताकि मुझे से कपाने के लिए परिश्रम ना करना पड़े।

इसी तरह 1996 के लोकसभा चुनाव में बाहरी दिल्ली के सांसद सज्जन कुमार की एक प्रेसवार्ता में मैं संतोषजी के साथ ही था। मगर सज्जन कुमार के बगल में एक मोटा सा आदमी बैठा था । दोनों आपस में कान लगाकर सलाह मशविरा कर रहे थे। बातचीत के दौरान भी अक्सर उनकी कनफुसियाहट जारी रही। प्रेस कांफ्रेस खत्म होने के बाद मैं दिल्ली प्रदेश कांग्रेस के तालकटोरा रोड वाले दफ्तर के बाहर खडा ही था कि सज्जन कुमार के उसी मोटे चमच्चे पर मेरी नजर गयी। तीसरी दफा अंदर से निकल कर अपनी गाड़ी तक जाना और लौटने की कसरता के बीच मैने हाथ जोडते हुए अभिवादन के साथ ही पकड़ लिया। माफ करेंगे सर मैं आपको पहचाना नहीं?

दैनिक जारगण के रिपोर्टर ज्ञानेन्द्र सिंह मेरे साथ था। मैने अपना और ज्ञानेन्द्र का परिचय दिया तो वो बोल पडा अरे मैं गोस्वामी एचटी से । मगर इस क्षणिक परिचय से मैं उनको पहचान नहीं सका। तब जाकर हिन्दुस्तान के चीफ रिपोर्टर रमाकांत गोस्वामी का खुलासा हुआ। मैने कहा कि सर आप मैं तो सज्जन का कोई पावर वाला चमच्चा मान रहा था। मेरे यह कहने पर वे झेंप से गए मगर तभी उन्होने हाथ में लिए अंडे पकौडे और निरामिष नाश्ते को दिखाकर पूछा कुछ लोगे ? मैने उनसे पूछा कि क्या आप लेते है ? तो वे एक अंहकार भाव से बोले मैं तो पंडित हूं ? तब मैंने तुरंत पलटवार किया मैं तो महापंडित हूं इसको छूता तक नहीं। मेरी बातों से वे बुरी तरह शर्मसार हो उठे। मगर कभी दफ्तर में आकर मिलने का न्यौता देकर अपनी जान बचाई। मैने इस घटना को संतोषजी को सुनाया तो मेरी हिम्मत की दाद दी। हंसते हे कहा की ठीक किय़ा जो लोग पत्रकार होकर चमच्चा बन जाने में ज्यादा गौरव मानते हैं उनके साथ इस तरह का बर्ताव जरूरी है।

शांतभाव से एक प्यार लगाव भरा हमारा रिश्ता चल रहा था कि एकाएक पता लगा कि वे अब दैनिक जागरण में चले गए. इस खबर पर ज्यादा भाव ना देकर मैं एक बार अपने भारतीय जनसंचार संस्थान काल वाले मित्र उपेन्द्र पांडेय से मिलने जागरण पहुंचा तो संयोग से वहीं पर संतोषजी से मुलाकात हुई। जागरण के कुछ स्पेशल पेज में आए व्यापक परिवर्तनों पर मैने उपेन्द्र से तारीफ की तो पता चला कि आजकल इसे संतोषजी ही देखरहे हैं। तब मैंने पूरे उल्लास के साथ उनके काम करने के अंदाज पर सार्थक प्रतिक्रिया दी। मैंने यह महसूस किया कि वे हमेशा मेरी बातों या सुझावों को ध्यान से लेते थे। मैने कहा भी कि आप आए हैं तो भगवती जागरण में धुंवा तो प्रज्जवलित होनी ही चाहिए। मेरी बातों को सुनकर संतोषजी ने फिर कहा अनामी तेरी राय विचारों का मैं बड़ा कद्र करता हूं क्योंकि तुम्हारा नजरिया बहुतों से अलग होता है। यह सुनकर मैंने अपना सिर इनके समक्ष झुका लिया तो वे गदगद हो उठे। उन्होंने कहा तेरी यही विन्रमता ही तेरा सबसे बड़ा औजार है। लेखन में एकदम कातिल और व्यक्तिगत तौर पर एकदम सादा भोला चेहरा। अपनी तारीफ की बातें सुनकर मैं मारे शरम के धरती में गड़ा जा रहा था।

जागऱण छोड़कर उपेन्द्र के साथ चंड़ीगढ बतौर संपादक दैनिक ट्रिब्यून में चले गए। 1990-91 में लेखन के आंधी तूफानी दौर में कई फीचर एजेंसियों के मार्फत ट्रिब्यून में मेरी दर्जनों रपट लेख और फीचर छप चुके थे। 193 में मैं जब चंडीगढ़ एक रिपोर्ट के सिलसिसे में गया तो उस समय के ट्रिब्यून संपादक विजय सहगल जी से मिला। परिचय बताने पर वे एकदम चौंक से गए। बेसाख्ता उन्होंने कहा अरे अनामी मैं तो अभी तक अनामी को 40-45 साल का समझ रहा था. आप तो बहुत सारे प्रसंगों पर रोचक लिखते हैं। सहगल जी की बातें सुनकर मैं भी हंसने लगा। लगभग यही प्रतिक्रिया थी पहले चौथी दुनिया और बाद में राष्ट्रीय सहारा के पटना ब्यूरो प्रमुख परशुराम शर्मा की। 1995 में एक दिन नोएडा स्थित सहारा दफ्तर में मिल गए। परिचय होने पर उन्होंने मुझे गले से लगा लिया- अरे बाप रे बाप,  कितना लिखता है तू। मैं तो उम्रदराज होने की सोच रहा था पर तू तो एकदम बच्चा निकला। दो दशक से भी ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी उनका स्नेह बरकरार है।

कभी कभी मैं लिखने की रफ्तार तथा छपने की बारिश पर सोचता हूं तो अब मैं खुद चौंक जाता हूं। पहले लगता था कि मेरे हाथ में सरस्वती का वास हो। लंबा लिखना मेरा रोग था। कम शब्दों में लिखना कठिन होता था। बस कलम उठाया तो नदियां बह चलीं वाली हालत थी। पर अब लगता है मेरे लेखन का खुमार ही पूरी तरह उतर-सा गया हो। अब तो लिखने से पहले उसकी तैयारी करनी पड़ती है। तब कहीं जाकर लगता है मानो लिखना संभव हो पाता है। मुझे कई बार चंडीगढ भी बुलाया पर मैं जाकर मिल ना सका। उपेन्द्र पांडेय ने मुझे दिल्ली का भी फोन नंबर दिया और कई बार बताया भी कि संतोष, अभी दिल्ली में ही हैं, मगर मैं ना मिल सका और ना ही बातचीत ही हो सकी। अभी पिछले ही माह उपेन्द्र ने फोन करके कहा कि अब माफी नहीं मिलेगी, तुम चंडीगढ़ में आओ, बहुत सारे मित्र तुमसे मिलने के लिए बेताब हैं।

मैं भी अप्रैल में दो तीन दिन के ले जाना चाह रहा था। इसी बहाने अपनी मीरा मां और रमेश गौतम पापा समेत अजय गौतम और छोटे भाई के साथ एक प्यारी सी बहन से भी मिलता। कभी हजारीबाग में रहकर धूम मचाने वाले ज्योतिषी पंडित ज्ञानेश भारद्वाज की भी आजकल चंडीगढ में तूती बोल रही है. संतोष जी के साथ एक पूरे दिन रहने और संपादक के काम काज और तमाम बातों पर चर्चा करने के लिए मैं अभी मानसिक तौर पर खुद को तैयार ही कर रहा था कि एक रोज रात 11 बजे एकाएक फेसबुक पर भडास4मीडिया में संतोष तिवारी के न रहने की खबर देखकर सन्न रह गया। ऐसा प्रतीत हुआ मानों वे रूठ गए हों मुझसे। कोई उलाहना दे रहे हों कि साले दो साल से बुला रहा हूं तो तेरे को फुर्सत नहीं थी तो ठीक है अब तू चंडीगढ़ आ तो सही पर अब मेरे पास भी तुमसे मिलने का समय नहीं।

मैं इस लेख को देर रात तक जागकर कल ही लिख देना चाह रहा था पर मेरे सामने संतोषजी इस कदर मानों आकर बैठ गए हों कि मेरे लिए उनकी यादों से निकलना और शब्द देना संभव नहीं हो पाया। और अंतत: पौने एक बजे रात को मैंने अपना कम्प्यूटर बंद दिया। आज सुबह से ही मेरे भीतर संतोषजी समाहित से हैं। लगता है मानो वे मेरे लेख को देख रहे हों और जल्दी जल्दी लिखने को उकसा रहे हों। आमतौर पर मेरे नयन जल्दी सजल नहीं होते मगर हिन्दी पत्रकारिता ने एक सुयोग्य उत्साही संपादक को खो दिया है। अपने सहकर्मियों को अपने परिवार का सदस्य सा मानकर प्यार और स्नेह देने वाले दिल्ली में कितने लोग रह गए है? उपेन्द्र पांडेय के लाख कहने पर भी अब तो फिलहाल चंडीगढ जाने का उत्साह ही नरम पड़ गया। किस मुंह से जाउं या किसके लिए? फिलहाल तो संतोषजी की अनुपस्थिति / गैरमौजूदगी ही मेरे को काट रही है. मुझे बारबार अनामी डार्लिंग की ध्वनि सुनाई पड़ रही है कि दिल्ली जैसे शहर में संतोषजी के अलावा और कौन दूसरा हो सकता है जो अनामी डार्लिंग कहकर अपना प्यार स्नेह और वात्सल्य दिखला सके।

और अंत में, माफ करेंगे प्रदीप संगम जी और ओम प्रकाश तपस जी। आलोक तोमर भैय्या पर तो एक लेख लिखकर मैं अपना प्यार तकरार इजहार कर चुका हूं। मगर आप दोनों पर अब तक ना लिखने का कर्ज बाकी है। पूरा एक लेख आप लोगों पर हो, यह मेरा प्रयास होगा। फिलहाल तो इस मौके पर केवल कुछ यादों की झांकी। संगम जी से मैं सहारनपुर से जुडा था। जिंदगी में बतौर वेतन कर्मी यह पहली नौकरी थी। शहर अनजाना और लोग पराय़े। मगर डा. रवीन्द्र अग्रवाल और प्रदीप संगम ने मुझे एक सप्ताह के अंदर शहर की तमाम बारीक जानकारियों से अवगत कराया। संगम जी के घर के पास में ही मैं भी किराये पर रहता था तो सुबह की चाय के साथ देर रात तक संगम क्लास जारी रहता। भाभी का व्यावहार स्नेहिल और मिलनसार स्वभाव था। इससे मेरे मन के भीतर की लज्जा खत्म हो गई और संगम जी का घर एक तरह से हमारे लिए जब मन चाहा चले गए वाला अपना घर हो गया था। बाद में संगमजी दिल्ली हिन्दुस्तान में आए तो 1988 की बहुत सारी यादें सजीव हो गयी। हम लोग कनाट प्लेस में अक्सर साथ रहते। मगर सपरिवार संगम जी हिमाचल घूमने क्या गए कि पहाड की वादियों में ही एकाएक हमलोगों को अलविदा बोल गए।

यह मेरे लिए भी एक सदमा था। तभी नवभारत टाईम्स में काम करने वाले वरिष्ठ पत्रकार ओमप्रकाश तपस जी एकाएक हमारे बीच से चले गए। बात 1994 की है जब मैंने दिल्ली के दो गांवों पर एक स्टोरी की. दिल्ली और साक्षरता अभियान को शर्मसार करने वाले दो गांव यमुना नदी के मुहाने पर है। मैं जहांगीरपुरी के निर्दलीय विधायक कालू भैय्या को तीन किलोमीटर तक पैदल लेकर इस गांव में पहुंचा और मुस्लिम बहुल इस गांव की बदहाली पर मार्मिक रपट की। राष्ट्रीय सहारा में खबर तो पहले छपी मगर हमारे डेस्क के महामहिमों के चलते यह खबर पहले पेज पर ना लेकर भीतर के किसी पेज में लगा दी गयी। अगले दिन मैंने काफी नाराजगी भी दिखाई मगर चिड़िया चुग गयी खेत वाली हालत थी।

खबर छपकर भी मर गयी थी, मगर एक सप्ताह के भीतर ही नवभारत टाईम्स में यही खबर छपी- ‘दिल्ली के दो अंगूठा टेक गांव’। खबर छपने पर दिल्ली में नौकरशाही स्तर पर हाहाकार मचा। सरकार सजग हुई और एक माह के अंदर ज्ञान पुर्नवास साक्षरता आदि की व्यवस्था करा दी गयी। मैने खबर की चोरी पर तपस जी से फोन पर आपत्ति की. मैने कहा कि आपको खबर ही करनी थी तो एक बार तो मुझसे बात कर लेते मैं आपको इतने टिप्स देता कि आप और भी कई स्टोरी बना सकते थे। मैं तो फिर से इस प्रसंग पर अब लिखूंगा ही नहीं क्योंकि पेपर वालों को इसकी समझ ही नहीं है। मेरी बातों पर नाराज होने की बजाय तपस जी ने खेद जताया और मिलने को कहा। जब हम मिले तो जिस प्यार उमंग उत्साह और आत्मीयता से मुझसे मिले कि मेरे मन का सारा मैल ही धुल गया। हम लोग करीब 16-17 साल तक प्यार और स्नेह के बंधन में रहे। इस दौरान बहुत सारी बातें हुई और वे सदैव मुझे अपने प्यार और स्नेह से अभिभूत रखा। मगर एक दिन एकाएक सुबह सुबह तपस जी के भी रूठने की खबर मिली. हर अपना वो वो पत्रकार लगातार मेरी नजरों से ओझल हो रहे हैं जिसको मैं बहुत पसंद करता हूं। हे भगवान मुझे इस दुर्भाग्य से बचाओ प्रभू।

लेखक अनामी शरण बबल आईआईएमसी के पासआउट हैं और कई अखबारों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. उनसे संपर्क asb.deo@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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संतोष तिवारी की प्रतिभा को अंकुरित-पल्लवित होते बहुत निकट से देखा था मैंने

Rajendra Rao : दैनिक ट्रिब्यून के संपादक और मेरे अजीज संतोष तिवारी का असमय प्रस्थान स्तब्ध और उदास कर गया। सत्तर के दशक में मैंने उनकी प्रतिभा को अंकुरित और पल्लवित होते बहुत निकट से देखा था। तब वे इंटर में पढ़ते थे। लेखन का जुनून सवार था और अपनी प्रारंभिक रचनाएं दिखाने लाल कालोनी (किदवई नगर) से मेरे घर (अर्मापुर) नियमित रूप से आते थे। उनकी पहली ही कहानी धर्मयुग में छपी और फिर उन्होंने मुड़ कर नहीं देखा।

मैंने उन्हें रविवार के संपादक एसपी सिंह से मिलवाया तो उनकी फ्री लांस पत्रकारिता का दौर शुरू हो गया। आनंद बाजार ग्रुप की अंग्रेजी पत्रिका संडे के लिए रिपोर्टिंग करने को एमजे अकबर ने उन्हें प्रोत्साहित किया। वे हिंदी में रिपोर्टिंग करके भेजते थे और अकबर उन्हें अंग्रेजी में अनुदित करवा कर छापते थे। जैसे ही संतोष तिवारी कानपुर छोड़ कर गए दिल्ली ने उन्हें लपक लिया।

दिनमान में कैरियर की पारी शुरू कर के वे हिंदुस्तान, इंडिया टी वी, दैनिक जागरण होते हुए ट्रिब्यून में शीर्ष पर पहुंचे। पत्रकारिता की तूफानी दुनिया के झंझावातों के बीच साहित्य उनसे छूट गया। एक विलक्षण प्रतिभा के सहसा विलोप हो जाने से हिंदी पत्रकारिता की अपूरणीय क्षति हुई है। मेरे कानों में अब भी उनका ‘भाई साहब’ संबोधन प्रतिध्वनित हो रहा है।

साहित्यकार राजेंद्र राव की एफबी वॉल से.

मुख्यमंत्री तथा सूचना एवं जन सम्पर्क मंत्री का संपादक के निधन पर शोक व्यक्त

शिमला : मुख्यमंत्री श्री वीरभद्र सिंह ने दैनिक ट्रिब्यून समाचार पत्र के सम्पादक श्री सन्तोष तिवारी के निधन पर शोक व्यक्त किया है। उनका आज पीजीआई चण्डीगढ़ में देहांत हो गया। मुख्यमंत्री ने कहा कि श्री तिवारी एक जाने-माने पत्रकार थे, जिन्होंने विभिन्न समाचार पत्रों तथा टी.वी. चैनलों में वरिष्ठ सम्पादकीय पदों पर कार्य कर पिं्रट तथा इलैक्ट्रॉनिक मीडिया में एक बड़ा योगदान दिया है।

श्री वीरभद्र सिंह ने शोक संतप्त परिजनों के प्रति गहरी सवेंदनाएं प्रकट की हैं और दिवंगत आत्मा की शांति के लिए ईश्वर से प्रार्थना की है। सूचना एवं जन सम्पर्क मंत्री श्री मुकेश अग्निहोत्री ने भी वरिष्ठ पत्रकार के निधन पर गहरा दुःख प्रकट किया है। उन्होंने कहा कि श्री तिवारी ने पत्रकारिता के क्षेत्र में चार दशकों से अधिक अवधि के दौरान उत्साहपूर्वक एवं समपर्ण भाव से कार्य किया है और वह लम्बे समय तक नवोदित पत्रकारों के लिए एक प्रेरणास्त्रोत रहेंगे। (विजयेन्दर शर्मा की रिपोर्ट.)

मूल खबरें…

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पत्रकारिता की राह पर शंभूनाथ शुक्ला का सफर… कुछ यादें, कुछ बातें

मैं बनवारी जी से मिलने साढ़े चार सौ किमी की यात्रा तय कर दिल्ली आ गया

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल

जब से विजुअल मीडिया का दौर आया है पत्रकारिता एक ग्लैमरस प्रोफेशन बन गया है। पर हमारे समय में दिनमान ही पत्रकारिता का आदर्श हुआ करता था और रघुवीर सहाय हमारे रोल माडल। लेकिन उनकी दिक्कत यह थी कि वे साहित्यकार थे और पत्रकारिता उनके लिए दूसरे दरजे की विधा थी। पर दिनमान वे पूरी पत्रकारीय ईमानदारी से निकालते थे। हमारे घर दिनमान तब से आ रहा था जब उसके संपादक सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय थे। लेकिन जब मैने उसे पढऩा शुरू किया तो संपादक रघुवीर सहाय हो गए थे।

दिनमान हम पढ़ते जरूर थे। उसके तीखे तेवर, हर विषय पर सामयिक टिप्पणी और उसके शीर्षक। सदस (सर्वेश्वरदयाल सक्सेना) का नियमित कालम तथा श्याम लाल शर्मा, शुक्ला रुद्र, सुषमा पाराशर, त्रिलोक दीप और जवाहर लाल कौल के लेख और रपटें। पर बनवारी जी ने जब इस पत्रिका में कदम रखा तो इसके तेवर ही बदल गए और यह एक विशुद्ध रूप से सामयिक पत्रिका बन गई।

बनवारी जी के लिखने की स्टाइल ही अलग थी। चाहे वह नेपाल के चुनाव की रपटें हों या दिल्ली में कुतुब मीनार की सीढिय़ों से फिसल कर ४२ बच्चों की मौत की रपट। अब तो शायद लोगों को पता भी नहीं होगा कि आज से ३२ साल पहले तक कुतुब मीनार पर चढ़ा भी जा सकता था। लेकिन १९८२ में एक भयानक दुर्घटना घटी। कुतुब मीनार देखने आई छात्राओं की एक भीड़ भरभराती हुई तीसरी मंजिल से नीचे आ गिरी, उसमें ४२ छात्राएं मरीं। बनवारी की इस रपट की हेडिंग थी घिसी हुई सीढिय़ों पर मौत। मुझे यह शीर्षक इतना आकर्षक और रपट इतनी कारुणिक लगी कि मैं सिर्फ बनवारी जी से मिलने के लिए साढ़े चार सौ किमी की यात्रा तय कर कानपुर से दिल्ली आ गया।

चूंकि मैं हावड़ा-दिल्ली (इलेवन अप) एक्सप्रेस पकड़कर दिल्ली आया था और वह ट्रेन सुबह पांच बजे ही पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन आ जाया करती थी इसलिए पूरे तीन घंटे तो प्लेटफार्म पर ही वाक कर काटे और आठ बजे के आसपास वहां से पैदल ही दिनमान के दफ्तर के लिए निकल पड़ा। ठीक नौ बजे १० दरियागंज स्थित टाइम्स बिल्डिंग में पहुंच गया। पता लगा कि बनवारी जी तो दस के बाद आएंगे। लेकिन वहां मौजूद सक्सेना नामके चपरासी ने चाय पिलाई और समोसे लाकर खिलाए।

मैं उसकी सज्जनता से गदगद था। उसने बताया कि टाइम्स से उसे १२ सौ रुपये महीने पगार मिलती है जो मेरी पगार से ड्यौढ़ी थी जबकि मैं कानपुर में दैनिक जागरण में उप संपादक था। खैर करीब सवा दस बजे बनवारी जी आए। मैं उनसे जाकर मिला। वे हल्की लाइनों वाला कुरता तथा एकदम झकाझक सफेद पायजामा धारण किए हुए एक बेहद सौम्य और उत्साही पत्रकार लगे। पर यह भी महसूस हुआ कि शायद पत्रिकाओं के संपादक कुछ हौवा टाइप के हुआ करते थे। क्योंकि बनवारी जी मुझसे बात करते समय कुछ सहमे से लगे और बार-बार संपादक रघुवीर सहाय के केबिन की तरफ देख लिया करते थे। ऐसा लग रहा था कि अभी एक दरवाजा खुलेगा और एक डरावना सा अधबूढ़ा संपादक निकलेगा। जो महान कवि होगा और महान चिंतक भी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ और केबिन खुला तो खाकी रंग की एक जींस नुमा पैंट पहने एक व्यक्ति निकला और लंबे-लंबे संगीतकार जैसे बालों वाले सदस की टेबल तक गया फिर उसने हाल पर नजर डाली मुझे भी देखा और लौट गया। बनवारी जी ने बताया कि वे रघुवीर जी थे।

मेरी मिलने की बहुत इच्छा हुई लेकिन न तो बनवारी जी ने मेरी उनसे मुलाकात के लिए बहुत उत्कंठा जताई और न ही वे सज्जन हाल में ज्यादा देर तक रुके थे। इसलिए मन मारकर चला आया। दिल्ली में तब तक किसी को जानता नहीं था इसलिए नई दिल्ली स्टेशन गया। पता लगा कि गोमती जाने को तैयार है। टिकट लिया कुल बीस रुपये अस्सी पैसे का। और ट्रेन में जाकर बैठ गया। तब गोमती एक्सप्रेस नई-नई चली थी। और दिल्ली के बाद सीधे कानपुर आ कर ही रुकती थी। सामने वाली बर्थ पर जो मोहतरमा थीं वे कोई लखनऊ के नवाब परिवार से ताल्लुकात रखती थीं। जब भी वे अपना पानदान खोलतीं तो पूरा कोच उसकी गमकती खुशबू से भर जाता।

आगे है…

मोहन बाबू ने कहा- नौकरी चलती रहेगी, लेकिन होगी ठेके पर

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