अमित शाह का केस लड़ ने वाला वकील सुप्रीम कोर्ट में जज बना, जिस जज ने शाह को बरी किया वह राज्यपाल बन गया

भारत में न्यायपालिका को लेकर बहस जारी है. सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने जो विद्रोह कर सुप्रीम कोर्ट के भीतर सब कुछ ठीक न चलने की जो बात कही है, उसके दूरगामी मायने निकाले जा रहे हैं. इसी दौर में कुछ लोगों ने कुछ घटनाओं की तरफ ध्यान दिलाया. जैसे अमित शाह का जो केस एक वकील लड़ रहा था, उसे सुप्रीम कोर्ट में जज बना दिया गया. सुप्रीम कोर्ट के जिस जज ने अमित शाह को बाइज्जत बरी किया, उसे रिटायरमेंट के बाद राज्यपाल बना दिया गया.

जिस जज ने अमित शाह को अभियुक्त करार देते हुए दंडित किया, उसकी बहन की शादी में आयकर विभाग का छापा पड़ गया. ये तीनों खबरें विभिन्न समय पर विभिन्न वेबसाइटों पर छप चुकी हैं. तीनों खबरों का स्क्रीनशाट यहां दिया जा रहा है ताकि आप जान सकें कि अदालतों का किस कदर राजनीतिकरण किया जा चुका है. साथ ही यह भी कि अगर आप अदालत को न्याय का घर मानते हैं तो यह आपकी अपनी समझदारी का स्तर है. अदालतें भी अब गिव एंड टेक के चंगुल में बुरी तरह  फंस चुकी हैं.

जुमला सुन भोंकने लगा

सुप्रीम कोर्ट में जिस न्यायाधीश ने अमित शाह को हत्या, अपहरण ठगी आदि केस से बरी कर दिया था, वह जज रिटायर के 7 दिन बाद केरल के राज्यपाल बन गए…

जो वकील अमित शाह का केस लड़ रहा था, वह वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट का जज बन गया है…

गुजरात हाई कोर्ट में जिस जज ने अमित शाह को अभियुक्त करार देते हुए दंडित किया था, उनकी बहन की शादी में आय कर विभाग का छापा पड़ गया..

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मजीठिया मामला : सुप्रीम कोर्ट ने दैनिक भास्कर प्रबंधन को राहत देने से किया इनकार

धर्मेन्द्र प्रताप सिंह, लतिका चव्हाण और आलिया शेख के मामले में भास्कर प्रबंधन को लगा झटका

जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले में मुंबई उच्च न्यायालय के एक आदेश के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट गए दैनिक भास्कर (डी बी कॉर्प लि.) अखबार के प्रबंधन को सुप्रीम कोर्ट ने राहत देने से इनकार करते हुए उसे वापस मुंबई उच्च न्यायालय की शरण में जाने के लिए मजबूर कर दिया है। यह पूरा मामला मुंबई में कार्यरत दैनिक भास्कर के प्रिंसिपल करेस्पॉन्डेंट धर्मेन्द्र प्रताप सिंह संग मुंबई के उसी कार्यालय की रिसेप्शनिस्ट लतिका आत्माराम चव्हाण और आलिया इम्तियाज़ शेख की मजीठिया वेज बोर्ड मामले में जारी रिकवरी सर्टीफिकेट (आरसी) से जुड़ा हुआ है… पत्रकार सिंह और रिसेप्शनिस्ट चव्हाण व शेख ने मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट उमेश शर्मा के मार्गदर्शन एवं उन्हीं के दिशा-निर्देश में कामगार आयुक्त के समक्ष 17 (1) के तहत क्लेम लगाया था।

कामगार आयुक्त कार्यालय में यह सुनवाई पूरे एक साल तक चली.. कंपनी की एचआर टीम ने अपने वकील के जरिए वहां तरह-तरह के दांव-पेंचों का इस्तेमाल किया… यहां तक कि धर्मेन्द्र प्रताप सिंह का सीकर (राजस्थान) और लतिका चव्हाण का मुंबई से काफी दूर सोलापुर (महाराष्ट्र) ट्रांसफर भी कर दिया गया था! इसके विरुद्ध सिंह को इंडस्ट्रियल कोर्ट से स्टे मिल गया, तब भी कंपनी ने उन्हें दफ्तर में लेने में आनाकानी की तो उन्होंने लेबर कोर्ट में अवमानना का मुकदमा दायर कर दिया… दैनिक भास्कर ने अब उन्हें पुन: दफ्तर में एंट्री दे दी है। बहरहाल, लेबर ऑफिस में बकाए के मामले की चली लंबी सुनवाई के बाद सहायक कामगार आयुक्त नीलांबरी भोसले ने 6 जून को ऑर्डर और 1 जुलाई, 2017 को डी बी कॉर्प लि. के खिलाफ आरसी जारी करते हुए वसूली का आदेश मुंबई के जिलाधिकारी को निर्गत कर दिया था।

इस आदेश के बाद डी बी कॉर्प ने मुंबई उच्च न्यायालय में फरियाद लगाई तो उच्च न्यायालय ने 7 सितंबर, 2017 को आदेश जारी किया कि डी बी कॉर्प प्रबंधन सर्वप्रथम वसूली आदेश की 50-50 फीसदी रकम कोर्ट में जमा करे। मुंबई उच्च न्यायालय के इसी आदेश के खिलाफ डी बी कॉर्प प्रबंधन सुप्रीम कोर्ट गया था, जहां उसे मुंह की खानी पड़ी है… सुप्रीम कोर्ट ने कंपनी प्रबंधन को राहत देने से इनकार करते हुए वापस मुंबई हाई कोर्ट जाने को विवश कर दिया। इसके बाद कंपनी की ओर से 25 अक्टूबर को मुंबई उच्च न्यायालय को सूचित कर प्रार्थना की गई है कि वह धर्मेन्द्र प्रताप सिंह, लतिका चव्हाण और आलिया शेख के बकाए की 50-50 फीसदी राशि आगामी 6 सप्ताह के अंदर जमा कर देगी…

यह राशि क्रमश: 9 लाख, 7 लाख और 5 लाख है। ज्ञात रहे कि आरसी मामले में जिलाधिकारी द्वारा वसूली की प्रक्रिया बिल्कुल उसी तरह की जाती है, जैसे जमीन के बकाए की वसूली की जाती है… इसमें कुर्की तक की कार्यवाही शामिल है! मुंबई उच्च न्यायालय में इस मामले की सुनवाई जस्टिस एस जे काथावाला के समक्ष चल रही है, जबकि उनके समक्ष इन तीनों का पक्ष वरिष्ठ वकील एस पी पांडे रख रहे हैं।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट
9322411335

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मजीठिया वेज बोर्ड के लिए अब जो क्लेम करेगा, वह हार हाल में जीतेगा : एडवोकेट उमेश शर्मा

सुप्रीम कोर्ट के टाइम बाउण्ड के निर्णय का स्वागत… जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले में माननीय सुप्रीमकोर्ट में देश भर के मीडियाकर्मियों का केस लड़ रहे जाने-माने एडवोकेट उमेश शर्मा ने 13 अक्टूबर को सुप्रीमकोर्ट द्वारा मजीठिया वेज बोर्ड मामले को श्रम न्यायालय और कामगार विभाग द्वारा टाइम बाउंड करने के निर्णय का स्वागत किया है और कहा है कि मजीठिया वेज बोर्ड मामले में क्लेम लगाने वाले मीडियाकर्मियों की हर हाल में जीत तय है, वह एक निश्चित समय के भीतर। इससे एक बार फिर साबित हो गया है कि जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ उनको ही मिलेगा जो वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट की धारा 17(1) के तहत क्लेम लगाएंगे।

एडवोकेट उमेश शर्मा ने कहा कि माननीय सुप्रीमकोर्ट का आदेश साफ संकेत देता है कि मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ पाने का दो रास्ता है। एक तो ये कि मालिक अपने आप वेज बोर्ड की सिफारिशों को ईमानदारी से लागू कर दें जो कि असंभव है। ऐसे में दूसरा और आखिरी रास्ता बचता है 17 (1) का क्लेम लगाना। उमेश शर्मा ने साफ कहा है कि जो भी मीडियाकर्मी क्लेम लगाएंगे, उनकी जीत तय है।

एक अन्य प्रश्न के उत्तर में उमेश शर्मा ने कहा कि मैं शुरू से ही इस मामले को टाइम बाउंड कराने और इस बाबत एक कमेटी बनाने पर जोर दे दे रहा था। आपको बता दें कि माननीय सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को जस्टिस माजीठिया वेज बोर्ड मामले में अहम फैसला सुनाते हुए देश के सभी राज्यों के श्रम विभाग एवं श्रम अदालतों को निर्देश दिया कि वे अखबार कर्मचारियों के मजीठिया संबंधी बकाये सहित सभी मामलों को छह महीने के अंदर निपटाएं।

सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति रंजन गोगोई एवं नवीन सिन्हा की पीठ ने ये निर्देश अभिषेक राजा बनाम संजय गुप्ता/दैनिक जागरण (केस नंबर 187/2017) मामले की सुनवाई करते हुए दिए। गौरतलब है कि मजीठिया के अवमानना मामले में 19 जून 2017 के फैसले में इस बात का जिक्र नहीं था जिसे लेकर अभिषेक राजा ने सुप्रीम कोर्ट से इस पर स्पष्टीकरण की गुहार लगाई थी। एडवोकेट उमेश शर्मा ने सभी मीडियाकर्मियों से मजीठिया वेज बोर्ड मामले में क्लेम लगाने का निवेदन किया है।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
9322411335

मूल खबर ये है :

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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश- ‘मजीठिया वेज बोर्ड के सभी प्रकरण 6 महीने के भीतर निपटाएं’

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को मजीठिया वेज बोर्ड मामले में अहम फैसला सुनाते हुए देश के सभी राज्यों के श्रम विभाग एवं श्रम अदालतों को निर्देश दिया कि वे अखबार कर्मचारियों के मजीठिया संबंधी बकाये सहित सभी मामलों को छह महीने के अंदर निपटाएं। सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति रंजन गोगोई एवं नवीन सिन्हा की पीठ ने ये निर्देश अभिषेक राजा बनाम संजय गुप्ता / दैनिक जागरण (केस नंबर 187/2017) मामले की सुनवाई करते हुए दिए।

गौरतलब है कि मजीठिया के अवमानना मामले में 19 जून 2017 के फैसले में इस बात का जिक्र नहीं था जिसे लेकर अभिषेक राजा ने सुप्रीम कोर्ट से इस पर स्पष्टीकरण की गुहार लगाई थी। हालांकि स्पष्टीकरण की याचिका जुलाई में ही दायर कर दी गई थी मगर इस पर फैसला आज आया जिससे मीडियाकर्मियों में एक बार फिर खुशी की लहर है।

आप सभी मीडियाकर्मियों से अपील है कि अपना बकाया हासिल करने के लिेए श्रम विभाग में क्लेम जरूर डालें अन्यथा आप इससे वंचित रह सकते हैं। अब अखबार मालिक किसी भी तरह से आनाकानी नहीं कर सकेंगे और मामले को लंबा नहीं खींच सकेंगे। अगर वे ऐसा करते हैं तो इस बार निश्चित रूप से विलफुल डिफेमेशन के दोषी करार दिए जाएंगे।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
मुंबई
संपर्क : 9322411335 , shashikantsingh2@gmail.com

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इस संजय गुप्ता को सुप्रीम कोर्ट की बात न मानने पर हुई दस दिन की जेल, एक करोड़ 32 लाख रुपये जुर्माना भी भरना होगा

ये संजय गुप्ता एक मिल मालिक हैं. इनका भी काम  कोर्ट को गुमराह करना हो गया था. सो, इस संजय गुप्ता को सुप्रीम कोर्ट ने दस दिन की जेल और एक करोड़ 32 लाख रुपये का जुर्माना लगाकर दिमाग ठिकाने पर ला दिया. इस फैसले से पता चलता है कि कोई भी अगर माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन नहीं करेगा और अदालत को गुमराह करते पाया गया तो उसे एक लाख रुपये प्रतिमाह का जुर्माना और दस दिन की जेल होगी. सोमवार को शीर्ष अदालत ने संजय गुप्ता नामक एक मिल मालिक को 10 दिन की कैद के साथ-साथ एक करोड़ 32 लाख रुपये का जुमार्ना सुनाया है.

पीठ का कहना है कि अदालत आदेश पर आदेश पारित करती है, लेकिन इसके पालन की किसी को चिंता ही नहीं है. ऐसे में सबक सिखाना जरूरी था। चीफ जस्टिस जेएस खेहर और न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ ने संजय गुप्ता नामक फैक्टरी मालिक को सात दिनों के भीतर तिलक मार्ग थाने में समर्पण करने को कहा है. पीठ ने जुर्माने की राशि को एक अगस्त तक सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री में जमा कराने का निर्देश दिया है.

पीठ ने कहा कि यह आदेश उनके लिए एक टोकन चेतावनी है, जो अदालती आदेश का पालन नहीं करते और एक के बाद एक झूठ बोल कर अदालत को गुमराह करने की कोशिश करते हैं. यह सुप्रीम कोर्ट के लिए एक विपदा है. पीठ ने तल्खी दिखाते हुए कहा कि अदालत आदेश पर आदेश पारित करती हैं, लेकिन किसी को इसकी चिंता ही नहीं है. भविष्य में कोई सुप्रीम कोर्ट को हल्के में न ले, इसलिए इस तरह का आदेश जरूरी है.

पीठ ने पाया कि दिल्ली के रिहायशी इलाकों से फैक्टरी को शिफ्ट करने के अदालती आदेश के बावजूद संजय गुप्ता बापरोला में दाल की मिल चला रहा था, लेकिन वह लगातार झूठ बोलता रहा कि उसने फैक्टरी को शिफ्ट कर दिया है. बापरोला गांव के निवासी ने अवमानना याचिका दायर कर संजय गुप्ता पर आदेश की अनदेखी का आरोप लगाया था. पीठ ने अदालत में मौजूद संजय गुप्ता से कहा कि आपको सजा तो जरूर मिलेगी, क्योंकि आपने अदालत को लंबे अर्से तक गुमराह किया है.

पीठ ने गुप्ता को सजा के दो विकल्प दिये. पहला या तो वह वर्ष 2004 से 2015 तक (जिस दौरान गुपचुप फैक्टरी चला रहा था) प्रति महीने एक लाख रुपये के हिसाब से 1 करोड़ 32 लाख रुपये जुमार्ना और 10 दिनों की कैद का विकल्प चुने. दूसरा वर्ष 2004 से लेकर 2015 तक 10 हजार प्रति महीने के हिसाब से जुमार्ना और तीन महीने कैद की सजा भुगते. गुप्ता ने पहला विकल्प चुना, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया. माना जा रहा है कि यह नियम अब उन अखबार मालिकों पर भी लागू होगा जिन्होंने जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश अपने यहां नहीं लागू किया.

पत्रकार शशिकांत सिंह की रिपोर्ट.

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ईमानदार जज जेल में, भ्रष्टाचारी बाहर!

सुप्रीम कोर्ट देश की सबसे बड़ी अदालत है, इसलिए उसका फ़ैसला सर्वोच्च और सर्वमान्य है। चूंकि भारत में अदालतों को अदालत की अवमानना यानी कॉन्टेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट की नोटिस जारी करने का विशेष अधिकार यानी प्रीवीलेज हासिल है, इसलिए कोई आदमी या अधिकारी तो दूर न्यायिक संस्था से परोक्ष या अपरोक्ष रूप से जुड़ा व्यक्ति भी अदालत के फैसले पर टीका-टिप्पणी नहीं कर सकता। इसके बावजूद निचली अदालत से लेकर देश की सबसे बड़ी न्याय पंचायत तक, कई फ़ैसले ऐसे आ जाते हैं, जो आम आदमी को हज़म नहीं होते। वे फ़ैसले आम आदमी को बेचैन करते हैं। मसलन, किसी भ्रष्टाचारी का जोड़-तोड़ करके निर्दोष रिहा हो जाना या किसी ईमानदार का जेल चले जाना या कोई ऐसा फैसला जो अपेक्षित न हो।

चूंकि जज भी इंसान हैं और इंसान काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार जैसे पांच विकारों या अवगुणों के चलते कभी-कभार रास्ते से भटक सकता है। ऐसे में इंसान होने के नाते जजों से कभी-कभार गलती होना स्वाभाविक प्रक्रिया है। इस दलील पर एकाध स्वाभाविक गलतियां स्वीकार्य हैं, हालांकि उन गलतियों का दुरुस्तीकरण भी होना चाहिए, लेकिन कई फैसले ऐसे होते हैं, जिनमें प्रभाव, पक्षपात या भ्रष्टाचार की बहुत तेज़ गंध आती है। कोई बोले भले न, पर उसकी नज़र में फ़ैसला देने वाले जज का आचरण संदिग्ध ज़रूर हो जाता है। किसी न्यायाधीश का आचरण जनता की नज़र में संदिग्ध हो जाना, भारतीय न्याय-व्यवस्था की घनघोर असफलता है।

न्यायपालिका को अपने गिरेबान में झांक कर इस कमी को पूरा करना होगा, वरना धीरे-धीरे उसकी साख़ ही ख़त्म हो जाएगी, जैसे बलात्कार के आरोपी अखिलेश सरकार में मंत्री रहे गायत्री प्रजापति की ज़मानत मंजूर करके जिला एवं सत्र न्यायधीश जस्टिस ओपी मिश्रा ने न्यायपालिका की साख़ घटाई। दो साल पहले बॉम्बे हाई कोर्ट के जस्टिस अभय थिप्से ने अभिनेता सलमान ख़ान को हिट रन केस में कुछ घंटे के भीतर आनन-फानन में सुनवाई करके ज़मानत दे दिया और जेल जाने से बचा लिया था। इसी तरह कर्नाटक हाईकोर्ट के जस्टिस सीआर कुमारस्वामी ने महाभ्रष्टाचारी जे जयललिता को निर्दोष करार देकर फिर उसे मुख्यमंत्री बना दिया था। ऐसे फ़ैसले न्यायपालिका को ही कठघरे में खड़ा करते हैं।

हाल ही में दो बेहद चर्चित जज न्यायिक सेवा से रिटायर हुए। मई में गायत्री को बेल देने वाले जज ओपी मिश्रा ने अवकाश ग्रहण किया, जून में कलकत्ता हाईकोर्ट के जज जस्टिस सीएस कर्णन। कर्णन की चर्चा बाद में पहले जज ओपी मिश्रा का ज़िक्र। गायत्री पर एक महिला और उसकी नाबालिग बेटी से बलात्कार करने का आरोप था, इसके बावजूद जज मिश्रा ने ज़मानत दी। इलाहाबाद हाईकोर्ट की रिपोर्ट में पता चला है कि जज मिश्रा ने गायत्री से 10 करोड़ रुपए लेकर ज़मानत पर रिहा कर दिया था। करोड़ों रुपए डकारने के बावजूद जज मिश्रा और दूसरे रिटायर्ड जज आराम से सेवानिवृत्त जीवन जी रहे हैं।

दूसरी ओर जस्टिस कर्णन पर कभी भी भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं लगा, फिर भी वह जेल की हवा खा रहे हैं। यह भी गौर करने वाली बात है कि जस्टिस कर्णन दलित समुदाय के हैं और दुर्भाग्य से भारतीय न्यायपालिका में दलित और महिला समाज का रिप्रजेंटेशन नहीं के बराबर है। दलित या महिला समुदाय के किसी जज को हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट को जज बनाया गया यह विरला ही सुनने को मिलता है। फिर जस्टिस कर्णन ऐसे समय बिना गुनाह (इसे आगे बताया गया है) के जेल की हवा खा रहे हैं, जब किसी दलित व्यक्ति को देश का प्रथम नागरिक बनाकर सर्वोच्च सम्मान देने की होड़ मची है और दलित समाज के दो शीर्ष नेता रामनाथ कोविंद और मीरा कुमार राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ रहे हैं।

जस्टिस कर्णन को सजा देने का फैसला भी किसी एक जज ने नहीं किया, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के सात सीनियर मोस्ट जजों की संविधान पीठ ने किया है। संविधान पीठ ने जस्टिस कर्णन को सर्वोच्च न्यायिक संस्था की अवमानना का दोषी पाया और एकमत से सज़ा सुनाई। सुप्रीम कोर्ट के सात विद्वान जजों की पीठ के दिए इस फैसले की न तो आलोचना की जा सकती है और न ही उसे किसी दूसरे फोरम में चुनौती दी जा सकती है। इतना अवश्य कहा जा सकता है कि जस्टिस कर्णन प्रकरण बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। भारतीय न्याय-व्यवस्था में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ जब किसी सेवारत जज को जेल की सजा हुई हो।

जबसे जस्टिस कर्णन गिरफ़्तार करके जेल भेजे गए हैं। आम आदमी के मन में यह सवाल बुरी तरह गूंज रहा है कि आख़िर कर्णन का अपराध क्या है? क्या उन्होंने कोई संगीन अपराध किया? उत्तर – नहीं। क्या उन्होंने कोई ग़लत फ़ैसला दिया? उत्तर – नहीं। क्या उन्होंने किसी से पैसे लिए या कोई भ्रष्टाचार किया? उत्तर – नहीं। क्या उन्होंने कोई ऐसा आचरण किया जो किसी तरह के अपरोक्ष भ्रष्टाचार की ही श्रेणी में आता है? उत्तर – नहीं। मतलब न कोई अपराध किया, न ग़लत फ़ैसला दिया और न ही कोई भ्रष्टाचार किया, फिर भी हाईकोर्ट का जज जेल में है। लिहाजा, आम आदमी के मन में सवाल उठ रहा है कि फिर जस्टिस कर्णन जेल में क्यों हैं? उत्तर – उन्होंने कथित तौर पर कई भ्रष्ट जजों के नाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दे दिए थे।

दरअसल, जस्टिस कर्णन ने 23 जनवरी 2017 को पीएम मोदी को लिखे खत में सुप्रीम कोर्ट और मद्रास हाई कोर्ट के दर्जनों जजों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे। कर्णन ने अपनी चिट्ठी में 20 जजों के नाम लिखते हुए उनके खिलाफ जांच की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस कर्णन के इस आचरण को कोर्ट की अवमानना क़रार दिया और उन्हें अवमानना नोटिस जारी कर सात जजों की बेंच के सामने पेश होने का आदेश दिया। इसके बाद जस्टिस कर्णन और सुप्रीम कोर्ट के बीच जो कुछ हुआ या हो रहा है, उसका गवाह पूरा देश है। भारतीय न्याय-व्यवस्था में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ जब किसी कार्यरत जस्टिस को जेल की सज़ा हुई हो।

यह मामला सिर्फ़ एक व्यक्ति बनाम न्यायपालिका तक सीमित नहीं रहा। इस प्रकरण का विस्तार हो गया है और यह देश के लोकतंत्र के 80 करोड़ से ज़्यादा स्टैकहोल्डर्स यानी मतदाओं तक पहुंच गया है। देश का मतदाता मोटा-मोटी यही बात समझता है कि जेल में उसे होना चाहिए जिसने अपराध किया हो। जिसने कोई अपराध नहीं किया है, उसे जेल कोई भी नहीं भेज सकता। सुप्रीम कोर्ट भी नहीं। इस देश के लोग भ्रष्टाचार को लेकर बहुत संजीदा हैं, क्योंकि भ्रष्टाचार की बीमारी से हर आदमी परेशान है। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर देश के लोगों ने भ्रष्टाचार से लड़ने का दावा करने वाली एक नई नवेली पार्टी को सिर-आंखों पर बिठा लिया था।

बहरहाल, भारत का संविधान हर व्यक्ति को अपने ख़िलाफ़ हो रहे अन्याय, पक्षपात या अपने मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के खिलाफ़ बोलने की आज़ादी देता है। अगर कर्णन को लगा कि उनके साथ अन्याय और पक्षपात हो रहा है, तो उसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना उनका मौलिक अधिकार था। इतना ही नहीं, उन्होंने जजों के ख़िलाफ़ आरोप प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में लगाए थे। उस प्रधानमंत्री को जिसे देश के सवा सौ करोड़ जनता का प्रतिनिधि माना जाता है। लिहाज़ा, अवमानना नोटिस जारी करने से पहले जस्टिस कर्णन के आरोपों को सीरियली लिया जाना चाहिए था, उसमें दी गई जानकारी की निष्पक्ष जांच कराई जानी चाहिए थी। उसके बाद अगर जस्टिस कर्णन गलत पाए जाते तो उनके ख़िलाफ़ ऐक्शन होना चाहिए था। दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ।

सुप्रीम कोर्ट देश की सबसे बड़ी अदालत है। लिहाज़ा, उसका ध्यान उन मुद्दों पर सबसे पहले होना चाहिए, जिसका असर समाज या देश पर सबसे ज़्यादा होता है। मसलन, देश की विभिन्न अदालतों में दशकों से करोड़ों की संख्या में विचाराधीन केसों का निपटान कैसे किया जाए, लेकिन ऐसा नहीं हैं। देश की सबसे बड़ी अदालत सबसे ज़्यादा शिथिल है। इसकी एक नहीं कई कई मिसालें हैं, जिनसे साबित किया जा सकता है कि सुप्रीम कोर्ट संवेदनशील केसेज़ को लेकर भी उतनी संवेदनशील नहीं है, जितना उसे होना चाहिए।

उदाहरण के रूप में दिसंबर 2012 के दिल्ली गैंगरेप केस को ले सकते हैं। जिस गैंगरेप से पूरा देश हिल गया था। सरकार ने जस्टिस जगदीश शरण वर्मा की अध्यक्षता में आयोग गठित किया। उन्होंने दिन रात एक करके रिपोर्ट पेश की। आनन-फानन में संसद का विशेष अधिवेशन बुलाया गया और अपराधिक क़ानून में बदलाव किए गए। उस केस की सुनवाई के लिए फॉस्टट्रैक कोर्ट गठित की गई जिसने महज 173 दिन यानी छह महीने से भी कम समय में सज़ा सुना दी थी और दिल्ली हाईकोर्ट ने भी केवल 180 दिन यानी छह महीने के अंदर फांसी की सज़ा पर मुहर लगा दी थी, लेकिन उसे सुप्रीम कोर्ट ने लटका दिया और उसे फैसला सुनाने में तीन साल (1145 दिन) से ज़्यादा का समय लग गया।

देश का आम आदमी हैरान होता है कि करोड़ों की संपत्ति बनाने वाली जयललिता को निचली अदालत के जज माइकल चून्हा ने 27 सितंबर 2014 को चार साल की सज़ा सुनाई, जिससे उन्हें सीएम की कुर्सी  छोड़नी पड़ी और जेल जाना पड़ा। उनका राजनीतिक जीवन ही ख़त्म हो गया। लेकिन आठ महीने बाद 11 मई 2015 को कर्नाटक हाईकोर्ट के कुमारस्वामी ने जया को निर्दोष करार दे दिया। वह फिर मुख्यमंत्री बन गई और जब मरी तो अंतिम संस्कार राजा की तरह हुआ। जबकि क़रीब दो साल बाद सुप्रीम कोर्ट को ही कुमारस्वामी का फ़ैसला रद्द करना पड़ा। देश की सबसे बड़ी अदालत के न्यायाधीशों की नज़र में कुमारस्वामी का आचरण क्यों नहीं आया। अगर उन्होंने ग़लत फ़ैसला न सुनाया होता तो एक भ्रष्टाचारी महिला दोबारा सीएम न बन पाती और उसकी समाधि के लिए सरकारी ज़मीन न देनी पड़ती। इससे पता चलता है कि कुमारस्वामी ने कितना बड़ा अपराध किया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उनको कोई नोटिस जारी नहीं किया। सबसे अहम कि कुमारस्वामी पर भी भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं।

इसी तरह हिट ऐंड रन केस में अभिनेता सलमान ख़ान को 7 मई 2015 को निचली अदालत ने सज़ा सुनाई। आम आदमी को ज़मानत लेने में महीनों और साल का समय लग जाता है, लेकिन बॉम्बे हाई कोर्ट के जस्टिस अभय थिप्से ने सलमान ख़ान को कुछ घंटों के भीतर  बेल दे दी। इतना ही नहीं जब पूरा देश उम्मीद कर रहा था कि सलमान को शर्तिया सज़ा होगी, तब बॉम्बे हाईकोर्ट के जज जस्टिस एआर जोशी ने 10 दिसंबर 2015 को रिटायर होने से कुछ पहले दिए गए अपने फ़ैसले में सलमान को बरी कर दिया। इस फ़ैसले से सरकार ही नहीं देश का आम आदमी भी हैरान हुआ। साफ़ लगा कि अभिनेता ने न्यायपालिका को मैनेज कर लिया। जब जज ओपी मिश्रा रिश्वत ले सकते हैं तो हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट का जज भी रिश्वत ले सकता है, इस संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता। बहरहाल, सलमान को रिहा करने की राज्य सरकार की अपील अब दो साल से सुप्रीम कोर्ट के पास है। अगर सुप्रीम कोर्ट ने सलमान को सज़ा दे दी तो क्या जस्टिस एआर जोशी के ख़िलाफ कार्रवाई होगी, ज़ाहिर है नहीं, क्योंकि इस तरह की कोई व्यवस्था संविधान में नहीं हैं।

बहरहाल, अगर भ्रष्टाचार से जुड़े मामले पर जस्टिस कर्णन ने पीएम को पत्र लिखा तो अवमानना नोटिस देने से पहले कर्णन के आरोपों की गंभीरता और तथ्यपरकता की जांच होनी चाहिए थी। जिन पर कर्णन ने आरोप लगाया, उनका बाल भी बांका नहीं हुआ और आरोप लगाने वाले कर्णन को उनके आरोप ग़लत साबित होने से पहले ही जेल भेज दिया गया। न्यायपालिका के भीतर रहते हुए कोई उसकी व्यवस्था पर प्रश्न नहीं उठा सकता और उसके बाहर होने पर भी आलोचना नहीं कर सकता। वह अवमानना का विषय बन जाएगा। यह तो निरंकुशता हुई, जिसका समाधान जल्द से जल्द खोजा जाना चाहिए।

लेखक Hari Govind Vishwakarma से संपर्क 09920589624 के जरिए किया जा सकता है.

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(पार्ट थ्री) मजीठिया पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हिंदी अनुवाद पढ़ें

16. याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि अधिनियम की धारा 12 के तहत केंद्र सरकार द्वारा सिफारिशों को स्वीकार करने और अधिसूचना जारी किए जाने के बाद श्रमजीवी पत्रकार और गैर पत्रकार कर्मचारी मजीठिया वेजबोर्ड अवार्ड के तहत अपना वेतन/मजदूरी प्राप्त करने के हकदार हैं। यह, अवमानना याचिकाकर्ताओं के अनुसार, अधिनियम की धारा 16 के साथ धारा 13 के प्रावधानों से होता है, इन प्रावधानों के तहत वेजबोर्ड की सिफारिशें, अधिनियम की धारा 12 के तहत केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित होने पर, सभी मौजूदा अनंबधों के साथ श्रमजीवी पत्रकार और गैर पत्रकार कर्मचारियों की सेवा की शर्तों को नियंत्रित करने वाले विशिष्ट अनुबंध/ठेका व्यवस्था को अधिलंघित  (Supersedes) करती है या इसकी जगह लेती है।

वेजबोर्ड द्वारा अनुसंशित, जैसे कि केंद्र सरकार द्वारा मंजूर और स्वीकृत वेतन/मजदूरी को संबंधित श्रमजीवी और गैर पत्रकार कर्मचारियों के अधिनियम द्वारा गारंटी दी जाती है। केवल अधिक लाभकारी/फायदेमंद और अनुकूल दरों को अपना कर ही अधिसूचित वेतन/मजदूरी को निर्गत/खत्म किया जा सकता है। इसलिए, अवमानना याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि पिछली मजदूरी संरचना द्वारा नियंत्रित किसी भी समझौता या परिवचन/वचन(अंडरटेकिंग), जो मजीठिया वेजबोर्ड द्वारा सुझाई गई सिफारिशों से कम अनुकूल है, वो वैध नहीं है। इसके अलावा, वाद-विवाद उठाया गया था कि कोई भी परिवचन/वचन(अंडरटेकिंग) स्वैच्छिक नहीं है, इन्हें दबाव और स्थानांतरण/बर्खास्त किए जाने के खतरे के तहत प्राप्त किया गया है। इसलिए अवमानना याचिकाकर्ताओं का निवेदन है कि उपरोक्तानुसार न्यायालय द्वारा मजीठिया वेजबोर्ड अवार्ड को स्पष्ट किया जा सकता है।

17. जहां तक कि वेरिएवल-पे, अनुबंध/संविदा/ठेका कर्मचारियों, और वित्तीय क्षमता का संबंध है, अवमानना याचिकाकर्ताओं का मामला इस प्रकार से है कि उपरोक्त सभी मामलों को मजीठिया वेजबोर्ड द्वारा पूरी तरह से निपटाया गया है। उन सिफारिशों को मजीठिया वेजबोर्ड द्वारा स्वीकार कर लिया गया है, तो कथित वजह पर कोई और बहस या विवाद के लिए कोई गुंजाईश नहीं है। अनुमोदित और अधिसिूचित वेजबोर्ड की सिफारिशें अनुबंध/संविदा/ठेका कर्मचारियों सहित सभी श्रेणियों के कर्मचारियों पर लागू होती हैं, जो वेरिएवल पे/ परवर्तित वेतन के हकदार होंगे और वेरिएवल पे के समावेश द्वारा सभी भत्तों की गणना करेंगे। सभी नियोक्ता निर्धारित अवधि से बकाया राशि का भुगतान करने के लिए भी बाध्य हैं, जब तक कि एक प्रतिष्ठान को अवार्ड/पंचाट के कार्यान्वयन की तारीख से पहले तीन पूर्ववर्ती लेखा वर्षों में भारी नकदी हानि का सामना करना पड़ रहा है, जो कि नियोक्ता द्वारा अनुमानित महज वित्तीय कठिनाइयों से अलग होना चाहिए। 

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जागरण के पत्रकार पंकज के ट्रांसफर मामले को सुप्रीमकोर्ट ने अवमानना मामले से अटैच किया

दैनिक जागरण के गया जिले (बिहार) के मीडियाकर्मी पंकज कुमार के ट्रांसफर के मामले पर आज सोमवार को माननीय सुप्रीमकोर्ट में सुनवाई हुई। इस मुकदमे की सुनवाई कोर्ट नम्बर 4 में आयटम नम्बर 9, सिविल रिट 330/2017 के तहत की गई। न्यायाधीश रंजन गोगोई ने सुनवाई करते हुए इस मामले को भी मजीठिया वेज बोर्ड के अवमानना मामला संख्या 411/2014 के साथ अटैच कर दिया है। माननीय न्यायाधीश ने कहा कि ऐसे ही अन्य मामलों पर निर्णय आने वाला है, लिहाजा याचिका का निपटारा भी इसी में हो जाएगा।

पत्रकार पंकज कुमार के ट्रांसफर मामले में उनका पक्ष सुप्रीमकोर्ट में पटना हाई कोर्ट के रिटायर मुख्य कार्यकारी न्यायाधीश नागेंद्र राय ने रखा और राज्य सरकार के साथ साथ दैनिक जागरण को भी इस मामले में पार्टी बनाया गया। यह सुनवाई सुप्रीमकोर्ट में न्यायाधीश रंजन गोगोई की अदालत में हुई। उन्होंने मजीठिया वेज बोर्ड की सुनवाई को पूरा करके इस मामले में अपना फैसला सुरक्षित रखा हुआ है। बिहार गया के वरिष्ठ पत्रकार पंकज कुमार का तबादला मजीठिया मांगने के कारण दैनिक जागरण प्रबन्धन द्वारा जम्मू कर दिया गया था। इसके खिलाफ भड़ास4मीडिया में विस्तृत रिपोर्ट का प्रकाशन किया गया जिसके बाद पूरे देश में खलबली मची।

पंकज कुमार सामाजिक सरोकार के व्यक्ति हैं और गया जिले में मगध सुपर थर्टी के संचालन से जुड़े हैं। इसमें प्रतिभावान गरीब छात्र छात्राओं को गुरुकुल परंपरा के तहत निशुल्क आवास, भोजन तथा पठन पाठन की सुविधा उपलब्ध कराई जाती है। इस संस्थान से निकले सैकडों छात्र छात्राएं आईआईटी, एनआईटी तथा अन्य महत्वपूर्ण तकनीकी शिक्षण संस्थाओं में पढ़ रहे हैं या नौकरी कर रहे हैं।

उग्रवाद प्रभावित मगध क्षेत्र से आने वाले युवा भी इसके माध्यम से आज अपना जीवन संवार रहे हैं और समाज को राह दिखा रहे हैं। पंकज कुमार के साथ दैनिक जागरण द्वारा किये गए व्यवहार की खबर जैसे ही भड़ास पर प्रकाशित हुई, इन सैकडों युवाओं तथा पंकज कुमार के परिचितों ने भड़ास का लिंक लगाकर पीएम तथा केन्द्रीय मंत्रियों को टैग करके ट्वीट किया। पंकज कुमार की इमानदारी का ही फल था कि उच्चतम न्यायालय में बिहार पटना उच्च न्यायालय के रिटायर्ड कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश श्री नागेन्द्र राय जी उनसे बिना कोई फीस लिए मुकदमा लड़ने के लिए तैयार हो गए।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आर टी आई एक्सपर्ट
9322411335

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दैनिक जागरण के पत्रकार पंकज के ट्रांसफर मामले में आज सुप्रीम कोर्ट में होगी ऐतिहासिक सुनवाई

पटना हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य कार्यकारी न्यायाधीश रखेंगे मीडियाकर्मी का सुप्रीम कोर्ट में पक्ष… देश भर के अखबार मालिकों की जहां मजीठिया वेज बोर्ड मामले में सांस टंगी है वहीं दैनिक जागरण के बिहार के मीडियाकर्मी पंकज कुमार के ट्रांसफर मामले में आज सोमवार को सुप्रीमकोर्ट में एक ऐतिहासिक सुनवाई होने जा रही है। ऐतिहासिक इस मामले में यह सुनवाई होगी कि दैनिक जागरण, बिहार के गया जिले के वरिष्ठ पत्रकार पंकज कुमार का तबादला किए जाने पर फौरन सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में होने जा रही है, साथ ही पीड़ित पत्रकार का पक्ष माननीय सुप्रीमकोर्ट में पटना हाई कोर्ट के रिटायर मुख्य कार्यकारी न्यायाधीश नागेंद्र राय रखेंगे।

यह सुनवाई सुप्रीमकोर्ट में न्यायाधीश रंजन गोगोई की अदालत में ही होगी जिन्होंने जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड लागू किए जाने के आदेश की अवमानना करने के मामले की सुनवाई कर इस प्रकरण मामले में अपना फैसला सुरक्षित रखा है। बिहार गया के वरिष्ठ पत्रकार पंकज कुमार का तबादला मजीठिया वेज बोर्ड मांगने के कारण दैनिक जागरण प्रबन्धन द्वारा जम्मू कर दिया गया। इसको लेकर भड़ास4मीडिया में एक रिपोर्ट भी प्रकाशित की हुई थी। पंकज कुमार सामाजिक सरोकार के व्यक्ति हैं और गया में मगध सुपर थर्टी के संचालन से जुड़े हुए हैं जहां प्रतिभावान गरीब छात्र छात्राओं को गुरुकुल परंपरा के तहत निशुल्क आवास, भोजन तथा पठन पाठन की सुविधा उपलब्ध कराई जाती है।

इस संस्थान से निकले सैकड़ों छात्र-छात्राएं आईआईटी, एनआईटी तथा अन्य महत्वपूर्ण तकनीकी शिक्षण संस्थाओं में पढ़ रहे हैं या नौकरी कर रहे हैं। उग्रवाद प्रभावित मगध क्षेत्र से आने वाले युवा भी इसके माध्यम से आज अपना जीवन संवार रहे हैं और समाज को राह दिखा रहे हैं। पंकज कुमार के साथ दैनिक जागरण द्वारा किये गए दुर्व्यवहार की खबर जैसे ही भड़ास पर प्रकाशित हुई, सैकड़ों युवाओं तथा पंकज कुमार के परिचितों ने भड़ास4मीडिया में प्रकाशित खबर का लिंक लगाकर पीएम तथा केन्द्रीय मंत्रियों को टैग कर ट्वीट किया। इन लोगों ने पंकज कुमार के साथ हो रहे अत्याचार में हस्तक्षेप करने की मांग की। गया जिले के जाने माने वकील मदन तिवारी ने भी पंकज के प्रकरण को लेकर हर तरफ सक्रियता दिखाते हुए उन्हें न्याय दिलाने का प्रण किया और इस बारे में भड़ास4मीडिया के संपादक यशवंत सिंह से कई राउंड बातचीत की।

पंकज कुमार की इमानदारी का ही फल था कि उच्चतम न्यायालय में बिहार पटना उच्च न्यायालय के रिटायर्ड कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश श्री नागेन्द्र राय जी उनसे बिना कोई फ़ीस लिए मुकदमा लड़ने के लिए तैयार हो गए। उक्त मुकदमे की सुनवाई सोमवार को माननीय सुप्रीम कोर्ट में कोर्ट नम्बर 4 में आयटम नम्बर 9, सिविल रिट 330 के तहत माननीय न्यायमूर्ति श्री रंजन गोगई के न्यायालय में होने की संभावना है। इस सुनवाई पर देश भर के सभी पत्रकारों की नजर है।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आर टी आई एक्सपर्ट
9322411335

मूल खबर…

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मजीठिया वेज बोर्ड पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई पूरी, फैसला सुरक्षित, कई मालिक नपेंगे

बड़ी खबर सुप्रीम कोर्ट से आ रही है. प्रिंट मीडिया के कर्मियों को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ न देने पर चल रही अवमानना मामले की सुनवाई आज पूरी हो गई. कोर्ट ने फैसला सुरक्षित कर लिया है. इसके पहले जस्टिस रंजन गोगोई की अदालत के सामने मीडिया मालिकों व मीडियाकर्मियों के पक्षों के वकील उपस्थित हुए और अपने अपने तर्क रखे. पूरी सुनवाई के बाद विद्वान न्यायाधीश ने सुनवाई पूरी होने और फैसला सुरक्षित किए जाने की घोषणा की.

अब देखना है कि ये फैसला कब आता है. पीड़ित मीडियाकर्मियों में इस बात की तो खुशी है कि सुनवाई पूरी हो गई. लेकिन वे आशंकित हैं कि कहीं फैसला आने में महीनों न लग जाए. सैकड़ों मीडियाकर्मियों की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में मजीठिया वेज बोर्ड अवमानना मामले की लड़ाई लड़ रहे एडवोकेट उमेश शर्मा का कहना है कि अदालत का फैसला जल्द आएगा और इस फैसले में कुछ अखबार मालिकों को टांगे जाने के आदेश भी हो सकते हैं.

श्री शर्मा के मुताबिक कई राज्यों के श्रम आयुक्तों ने बड़े अखबार मालिकों के हित को ध्यान में रखते हुए मेनुपुलेटेड रिपोर्ट बनाई है जिसके कारण संभव है दैनिक भास्कर और दैनिक जागरण जैसे समूहों के मालिक बच जाएं.

हालांकि ये भी संभव है कि कुछ लोगों को अवमानना मामले में दंडित करने के साथ साथ कोर्ट कोई कमेटी गठित कर दे जिसमें आगे आने वाले और वर्तमान के मामलों की केस टू केस बेसिस पर सुनवाई हो सके. एडवोकेट शर्मा कहते हैं कि फैसला जो आएगा वह मूलत: मीडियाकर्मियों के ही हित में होगा लेकिन अदालत यह भी ध्यान रखेगी कि कहीं उसके फैसले से मीडिया प्रबंधन का इतना नुकसान न हो जाए जिससे अखबारों के प्रकाशन पर असर पड़े.

कुल मिलाकर ऐसा प्रतीत होता है कि फैसला थोड़ा मीडियाकर्मियों और थोड़ा मालिकों के पक्ष में होगा. लेकिन उन मीडियाकर्मियों को सीधा और पूरा लाभ मिलेगा जिन्होंने केस किया हुआ है और क्लेम किया हुआ है.

पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट शशिकांत सिंह की रिपोर्ट.

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मजीठिया मामले के निपटारे को सुप्रीम कोर्ट द्वारा कमेटी बनाए जाने की उम्मीद : एडवोकेट उमेश शर्मा

मजीठिया मामले में तीन मई को आरपार की उम्मीद…. देश भर के मीडियाकर्मियों के लिये माननीय सुप्रीमकोर्ट में जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई लड़ रहे एडवोकट उमेश शर्मा का मानना है कि अखबार मालिकों के खिलाफ चल रही अवमानना मामले की यह लड़ाई अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुकी है और तीन मई को इस मामले में आरपार होने की उम्मीद है। यह पूछे जाने पर कि इस लड़ाई का निष्कर्ष क्या निकलने की उम्मीद है, एडवोकेट उमेश शर्मा का कहना है कि लड़ाई मीडियाकर्मी ही जीतेंगे लेकिन जहां तक मुझे लग रहा है, सुप्रीमकोर्ट इस मामले में एक कमेटी बना सकती है।

यह कमेटी अखबार मालिकों से साफ कहेगी कि आप कर्मचारियों की लिस्ट और इनकम टैक्स विभाग में जमा कराया गया अपना 2007 से 2010 तक की बैलेंसशीट लेकर आईये। यह कमेटी फाईनल कर देगी कि आपने वेज बोर्ड की सिफारिश लागू किया या नहीं। यह कमेटी दस्तावेज देखकर तुरंत बता देगी कि अखबार मालिकों ने जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ कर्मचारियों को दिया है या नहीं। इससे काफी कुछ साफ हो जायेगा।

लीगल इशूज के मामले पर उमेश शर्मा ने कहा कि मैं बार बार कहता हूं कि लीगल इशूज कोई गंभीर मुद्दा नहीं हैं। इसके जरिये कुछ लोग सिर्फ भ्रम फैला रहे हैं और अखबार मालिक भी सुप्रीमकोर्ट को भ्रमित कर रहे हैं। एक अन्य प्रश्न के उत्तर में श्री शर्मा ने कहा कि जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले का सही निराकरण कमेटी बनाकर ही हो सकता है और कमेटी बनी तो हम केस जीत भी जायेंगे। नहीं तो, लीगल इश्यू में फसेंगे तो फंसते ही जायेंगे।

उमेश शर्मा कहते हैं- अरे भाई साफ बताईये, हम अ्वमानना की सुनवाई में गये हैं तो इसमें लीगल इश्यू कहां से आ गया। लीगल इश्यू के ज्यादा चक्कर में पड़ेंगे तो हमें जिन्दगी भर लेबर कोर्ट का चक्कर ही काटना पड़ेगा। मैं आज भी अपने इस बात पर कायम हूं। लीगल इश्यू जो फ्रेम हुये हैं, सुप्रीम कोर्ट अगर सुनवाई के बाद यह बोल दे कि २० जे का मामला विवादित है और ये हमारे अधिकार क्षेत्र में नहीं आता तो हम इस पर कुछ नहीं कर सकते हैं।

दूसरी चीज अगर सुप्रीम कोर्ट यह बोल दे कि कंटेंप्ट के तहत यह स्पष्ट नहीं हो रहा कि मालिकों ने जान बूझ कर अवमानना की है, तो हो गया ना सबको नुकसान। इसका तरीका यह है कि पहले जांच कमेटी बनाने पर जोर दिया जाता फिर जांच कमेटी के सामने २० जे व अन्य समस्याओं के बारे में तथ्य इकट्ठा कर सुप्रीम कोर्ट के सामने लाया जाये तो सुप्रीमकोर्ट भी इसे गंभीरता से लेती। मैं फिर कह रहा हूं कमेटी बनाना ही एक मात्र उचित विकल्प होगा।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्टीविस्ट
९३२२४११३३५

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सुप्रीम कोर्ट ने दिया पत्रकार गिरिराज शर्मा पर मानहानि का मामला दर्ज करने का आदेश

रायपुर। मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव अमन सिंह तथा उनकी पत्नी के विरूद्ध तथ्यहीन तथा दुराग्रहपूर्ण समाचार प्रकाशित करने के आरोप में रायपुर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र ”पत्रिका” के तत्कालीन संपादक गिरिराज शर्मा के विरूद्ध मानहानि का फौजदारी प्रकरण दर्ज करने के आदेश दिए गए हैं. यह आदेश सुप्रीम कोर्ट ने दिया. कोर्ट ने न्यायायिक दंडाधिकारी रायपुर को प्रकरण दर्ज कर प्रतिवादी, को सम्मन जारी करने के लिये आदेशित किया है.

पत्रिका अखबार द्वारा 30 अक्टूबर, 2012 को इस आशय का समाचार प्रकाशित किया गया था कि चुनाव परिणाम के पश्चात् मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह के प्रमुख सचिव अमन कुमार सिंह दुबई भाग सकते हैं. इसके साथ ही कई अन्य आरोप भी श्री सिंह के खिलाफ लगाये गये थे. कांग्रेस प्रवक्ता टिकेन्द्र ठाकुर तथा आर. पी. सिंह की शिकायत के आधार पर यह समाचार प्रकाशित किया गया था. इस पर आपत्ति करते हुये सिंह दम्पत्ति ने भारतीय दंड विधान की धारा 499 तथा 500 के अंतर्गत दो करोड़ रूपये की मानहानि का प्रकरण न्यायिक दंडाधिकारी की अदालत में प्रस्तुत किया गया था. इस पर टिकेन्द्र ठाकुर तथा आर.पी. सिंह पर तो मानहानि का प्रकरण दर्ज किया गया लेकिन पत्रिका के तत्कालीन संपादक गिरिराज शर्मा को छोड दिया गया.

सिंह दम्पत्ति ने गिरिराज शर्मा को भी आरोपी बनाने हेतु क्रमशः उच्चतर न्यायालयों में पुनरीक्षण याचिका प्रस्तुत की लेकिन राज्य के न्यायालयों में उन्हें राहत नहीं मिली. अंततः सिंह दम्पत्ति ने उच्च न्यायालय के आदेश दिनांक 26 सितम्बर, 2014 के विरूद्ध सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर की. सिंह दम्पत्ति के अधिवक्ता राकेश श्रोती के तर्कों से सहमत होते हुये सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश एस. ए. बोबडे तथा एल. नागेशवर राव की डबल बेन्च ने छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के आदेश को निरस्त करते हुये यह व्यवस्था दी है कि प्रेस एण्ड रजिस्ट्रेशन एवं बुक एक्ट की धारा 7 में स्पष्ट उल्लेख है कि समाचार पत्र में प्रकाशित समस्त समाचारों के प्रकाशन की जवाबदेही स्थानीय संपादक की होती है. अतः न्यायायिक दंडाधिकारी रायपुर गिरिराज शर्मा के विरूद्ध मानहानि का फौजदारी प्रकरण दर्ज करते हुये प्रतिवादी गिरिराज शर्मा को सम्मन जारी कर विधि अनुसार कार्यवाही करें.

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एनडीटीवी माफी मांग ले तो एक दिन का प्रतिबंध हम भी माफ कर देंगे : मोदी सरकार

एक दिन का प्रतिबंध लगाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है. केंद्र की मोदी सरकार ने कहा है कि पठानकोट एयरबेस पर आतंकी मामले की गलत रिपोर्टिंग के लिए चैनल अगर माफी मांग ले तो वह एक दिन के प्रतिबंध को माफ कर सकती है. एनडीटीवी के वकील ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि उन्हें हफ्ते भर का समय दिया जाए ताकि वह एनडीटीवी प्रबंधन से बात कर उसके रुख की जानकारी दे सकें. ऐसे में माना जा रहा है कि चैनल प्रबंधन विवाद को आगे न बढ़ाते हुए माफी मांगने को तैयार हो जाएगा और पूरे मामले का पटाक्षेप हो जाएगा.

न्यूज चैनल एनडीटीवी के प्रसारण पर एक दिन का प्रतिबंध लगाने के मामले में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी पक्ष पेश किया है जिसके मुताबिक एनडीटीवी 2 जनवरी 2016 को पठानकोट एयरबेस पर आतंकी हमले की रिपोर्टिंग के लिए माफी मांग ले तो वह एक दिन का बैन नहीं लगाएगी. एनडीटीवी के अधिवक्ता हरीश साल्वे ने कहा कि चैनल को माफी मांगने की जानकारी देने के लिए उन्हें एक हफ्ते का समय चाहिए. कोर्ट ने हफ्ते भर का समय दे दिया है. मामले की अगली सुनवाई 31 मार्च को होगी.

केंद्र सरकार के सूचना प्रसारण मंत्रालय का आरोप है कि एनडीटीवी इंडिया ने पठानकोट एयरबेस पर आतंकी हमले की कवरेज में संवेदनशील जानकारी लीक की. इसके दंड में मंत्रालय ने  9 नवंबर की रात से 10 नवंबर 2016 की रात तक 24 घंटे तक प्रसारण बंद रखने का आदेश दिया था. इस पर खूब हंगामा हुआ. बाद में मंत्रालय ने चैनल पर एक दिन के प्रतिबंध को ठंडे बस्ते में डाल दिया. उधर, चैनल इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट चला गया.

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सुप्रीम कोर्ट हुआ सख्त- पैसे न दिए तो एंबी वैली नीलाम कर देंगे

सुप्रीम कोर्ट ने सहारा मामले में अपने फरवरी के आदेश को संशोधित कर दिया है… सहारा को अब सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री के मुकाबले सेबी-सहारा खाते में रकम जमा करानी होगी.. सुप्रीम कोर्ट ने सहारा को चेताते हुए कहा अगर उसने पैसे नहीं जमा कराए तो एंबी वैली को नीलाम कर देंगे… सहारा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फरवरी के आदेश को संशोधित करते हुए समूह के न्यूयॉर्क स्थित होटल की नीलामी से मिलने वाली रकम को सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री में जमा कराए जाने के बदले सेबी-सहारा के संयुक्त खाते में जमा कराने का आदेश दिया है…

इस होटल की बिक्री से कंपनी को करीब 750 करोड़ रुपये मिलने की उम्मीद है… साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने सहारा को चेतावनी देते हुए कहा कि अगर वह तय समय पर पैसा जमा कराने में विफल होती है तो वह एंबी वैली को नीलाम कर देगी… सुप्रीम कोर्ट ने सहारा ग्रुप को 17 अप्रैल तक 5,000 करोड़ रुपये जमा कराए जाने का आदेश दिया था… इससे पहले सहारा समूह को बड़ा झटका देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने लोनावाला में सहारा की प्रॉप्रटी एंबी वैली को जब्त किए जाने का आदेश दिया था… सहारा ग्रुप के इस प्रॉपर्टी की कीमत 39,000 करोड़ रुपये है…

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब तक सहारा से रकम की वसूली नहीं होती है तब तक यह टाउनशिप सुप्रीम कोर्ट के पास ही रहेगी… सहारा ग्रुप का यह टाउनशिप मुंबई के पुणे में है… सहारा ने सुप्रीम कोर्ट में माना कि उसे मूलधन के तौर पर सेबी को 14,000 करोड़ रुपये का भुगतान करना है और कंपनी सेबी को अभी तक 11,000 करोड़ रुपये का भुगतान कर चुकी है।

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‘ईयर ऑफ विक्टिम्‍स’ और मजीठिया मामले में इंसाफ की आस

मजीठिया वेज अवॉर्ड को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रहे अवमानना केसों की सुनवाई ठहर गई है। रुक गई है। एक तरह से विराम लग गया है। तारीख पड़नी बंद हो गई है। तारीख क्‍यों नहीं पड़ रही है, इस पर कुछ वक्‍त पहले अटकलें भी लगती थीं, अब वो भी बंद हैं। सन्‍नाटा पसर गया है। हर शोर, हर गरजती-गूंजती-दहाड़ती, हंगामेदार आवाज इन्‍हें निकालने वाले गलों में शायद कहीं फंस कर रह गई है। या हो सकता है कि इन्‍हें निकालने वाले गलों ने साइलेंसर धारण कर लिया हो। जो भी हो, यह स्थिति है आस छुड़ाने वाली, निराशा में डुबाने वाली, उम्‍मीद छुड़वाने वाली, नाउम्‍मीदी से सराबोर करने वाली, सारे किए-धरे पर पानी फिरवाने वाली।

पिछली तारीख पर जब सुनवाई हुई थी तो ऐसा अनुमान लगाया जाने लगा था कि अब नियमित-निरंतर सुनवाई होगी और शीघ्र ही निष्‍कर्ष-नतीजे-परिणाम पर पहुंचा जा सकेगा। सुप्रीम कोर्ट अपना फैसला सुना देगा क्‍यों कि ये मामला कंटेंप्‍ट का है। ठीक भी है, अपनी ही अवमानना के मामलों को सर्वोच्‍च न्‍यायालय लंबे समय तक लटका कर नहीं रखता-रख सकता, ऐसी आम धारणा है। पर ऐसा हो नहीं रहा और यह धारणा ध्‍वस्‍त होती दिख रही है।

पीछे एक उम्‍मीद और जगी थी कि नए साल में न्‍यायिक निजाम बदलेगा। नए चीफ जस्टिस आएंगे, कार्यभार संभालेंगे और उन केसों के शीघ्र निपटारे की व्‍यवस्‍था करेंगे जो लंबे समय से लटके-लंबित हैं। संभव है उन्‍होंने ऐसा किया हो, लेकिन हमारे केसों का जो हाल है उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि ऐसा कोई इंतजाम नहीं किया गया। उल्‍टे, लगता है कि इन केसों की गठरी बना कर उसे किसी डार्क रूम में रख दिया गया है। नए चीफ जस्टिस के आने के बाद यह चर्चा भी चली थी कि उन्‍होंने सारे केसेज की री-शिडयूलिंग कर दी है और हमारे जैसे पुराने केसेज की सुनवाई अब मंगलवार की बजाय किसी अन्‍य दिन होगी। ऐसा ही हुआ और एक वीरवार को एडवांस लिस्‍ट में था। लेकिन जब फाइनल लिस्‍ट बनी तो उसमें नदारद था। तब से हमारे केसों की कोई सुध-बुध नहीं मिल रही।

अलबत्‍ता, 19 मार्च के अखबारों में छपी एक खबर ने थोड़ी आस जरूर जगाई है। खबर है चीफ जस्टिस जे़एस खेहर के नेशनल लीगल सर्विसेज अथॉरिटी की एक नेशनल मीटिंग में संबोधन के बारे में। शनिवार को हुई इस मीटिंग में जस्टिस खेहर ने वर्ष 2017 को बतौर ‘ ईयर ऑफ विक्टिम्‍स ’ मनाने की इच्‍छा जताई। अपने अनुभव का निचोड़ रखते हुए उन्‍होंने कहा कि गंभीर से गंभीर मामलों के आरोपियों को वकील दिया जाता है। गिरफ़तारी के बाद से ही उसके पास कानूनी सहायता पहुंचती है, लेकिन पीडि़त-विक्टिम के कानूनी हक के लिए कोई उसके पास जाने की बात नहीं करता, कोई उसको कानूनी मदद देने- दिलवाने की पहल नहीं करता। The CJI called it ‘strange’ that in India, while many people reached out to those convicted of serious crimes, victims of their crimes are often neglected. ‘ Ours is a strange country. Bigger the criminal, bigger is the out-reach,’ said the CJI. Calling for 2017 to be ‘ the year for reaching out to victims.’

प्रधान न्‍यायाधीश के इस उद़गार के आलोक में देखें तो हम अनगिनत मीडिया कर्मी अपने मालिकान के शोषण से भयावह रूप से पीडि़त हैं। हमें इन खूनचूसकों के चंगुल से बचाने-निकालने वाला सर्वोच्‍च अदालत के अलावा कोई नहीं है। कार्यपालिका और व्‍यवस्‍थापिका मीडिया मालिकों के ‘न्‍यौछावर’ के मुरीद हैं। उनकी आपस में इतनी गहरी सांठगांठ है कि अनुमान लगाना तकरीबन असंभव है। आजकल चुनावों का दौर-दौरा है। न जाने कितने जनप्रतिनिधि चुने गए हैं- चुने जा रहे हैं, पर हमारे वे किसी भी रूप में प्रतिनिधि नहीं दिख रहे, नहीं बन रहे। वे ‘थैली-प्रतिनिधि ’ के घेरे से बाहर के प्रतिनिधि, प्राणी किसी भी ऐंगल से नहीं लग रहे हैं और न कभी लगे हैं। 

इस संदर्भ में एक सूचना को शेयर करना समीचीन होगा। बताते हैं कि हिदुस्‍तान टाइम्‍स की मालकिन शोभना भरतिया ने अपने एचआर हेड को गंभीर अंजाम की चेतावनी देते हुए कहा है कि ‘ कुछ भी करो, किसी भी तरह से निपटो, लेकिन मुझे सुप्रीम कोर्ट के कठघरे में खड़ा होने से बचाओ। अगर मुझे उस कठघरे में खड़ा होना पड़ गया तो समझ लो तुम नहीं बचोगे, सीधा ऊपर भेज दिए जाओगे।‘ ि‍फल्‍टर होकर बाहर आई इस बात में कितनी सच्‍चाई है, यह छानबीन का विषय। पर इतना तो जरूर है कि ऐसी किसी भी चर्चा-अफवाह में सच्‍चाई का कुछ तो अंश होता ही है। जाहिर है श्रीमती भरतिया अकूत दौलत की मालकिन हैं और कार्यपालिका और व्‍यवस्‍थापिका से उनके रिश्‍ते किसी से छिपे नहीं हैं। और इसी ताकत से किसी को ‘ऊपर’ पहुंचाने के सुर फूटते हैं। 

बहरहाल, हम मीडिया कर्मीबेहद विपरीत परिस्थितियों में अपने हक के लिए, मजीठिया वेज बोर्ड की संस्‍तुतियों के अनुसार सेलरी और एरियर एवं दूसरी सुविधाएं पाने के लिए इंसाफ के मंदिर में पहुंचे हैं। इंसाफ के दीदार कब होंगे, ये तो पता नहीं, लेकिन इसके लिए हम निरंतर प्रयत्‍नशील हैं। हम मीडिया मालिकों के सबसे बड़े विक्टिम हैं, सबसे ज्‍यादा पीडि़़त हैं। ऐसे में यदि यह साल ‘ ईयर ऑफ विक्टिम्‍स ’ है, या होता है, तो महामहिम प्रधान न्‍यायाधीश जी से प्रार्थना है कि हमारे केसों की नियमित हियरिंग करवाकर यथाशीघ्र हमें न्‍याय दिलवाने का कष्‍ट करें। साथ ही केस किए सभी मीडिया साथियों से अनुरोध है कि इंसाफ में अपनी उम्‍मीद किसी भी सूरत में न छोड़ें। उसी तरह बनाए रखें जिसके तहत केस करने सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे।

भूपेंद्र प्रतिबद्ध
चंडीगढ़
bhupendra1001@gmail.com
मो: 9417556066

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मजीठिया मामले में काश सुप्रीमकोर्ट ऐसा कर देता!

देश के अधिकांश अखबार मालिकों के खिलाफ माननीय सुप्रीमकोर्ट में अवमानना का केस चल रहा है। इस मामले में सुप्रीमकोर्ट में अभी डेट नहीं पड़ पा रही है। अगर माननीय सुप्रीमकोर्ट कुछ चीजें कर दे तो सभी अखबार मालिकों की नसें ना सिर्फ ढीली हो जायेंगी बल्कि देश भर के मीडिया कर्मियों को इंसाफ भी मिल जायेगा। इसके लिये सबसे पहले जिन समाचार पत्रों की रिपोर्ट कामगार आयुक्त ने सुप्रीमकोर्ट में भेजी है उसमें जिन अखबार मालिकों ने जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश नहीं लागू किया है या आंशिक रुप से लागू किया है ऐसे अखबारों के मैनेजिंग डायरेक्टर, डायरेक्टर, पार्टनर और सभी पार्टनरों को अदालत की अवमानना का दोषी मानते हुये उनके खिलाफ कामगार आयुक्त को निर्देश दें कि उनके खिलाफ पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज करा दें और सभी जिलाधिकारियों, तहसीलदारों को निर्देश दें कि उनके खिलाफ रिकवरी कार्रवाई शुरू की जाये। उनको जमानत भी माननीय सुप्रीमकोर्ट से तभी प्राप्त हो जब वे मीडियाकर्मियों को उनका पूरा बकाया एरियर वेतन तथा प्रमोशन दें।

जिन मीडियाकर्मियों ने मजीठिया का क्लेम लगाया या याचिका दायर की ऐसे जितने मीडियाकर्मियों का प्रबंधन ने ट्रांसफर या टर्मिनेशन किया है ऐसे मीडियाकर्मियों के ट्रांसफर और ट्रमिनेशन पर रोक लगा दे। अब बाकी बचे ऐसे अखबार मालिक जिन्होंने कामगार आयुक्त को पटा कर यह रिपोर्ट लिखवा लिया कि उनके यहां मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश लागू है ऐसे अखबारों की स्कूटनी करायी जाये। इसके लिये प्रदेश स्तर पर एक जांच कमेटी बनायी जाये। इस कमेटी में आयकर विभाग के अधिकारी, हाईकोर्ट के सेवानिवृत जज, पत्रकारों द्वारा प्रत्येक राज्य में चुने गये उनके प्रतिनिधि और सुप्रीमकोर्ट के एडवोकेट हो।

यह कमेटी सभी अखबारों में यह विज्ञापन जारी करे कि इन अखबारों ने दावा किया है कि ये अपने कर्मचारियों को जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश दे रहे हैं। अखबार मालिकों के एक दावे की जांच के लिये तीन दिवसीय एक कैंप लगाया जा रहा है। अगर किसी भी कर्मचारी को जो इन अखबारों में काम करते हैं उनको वेज बोर्ड के अनुसार वेतन नहीं मिल रहा है तो वे इस कैंप में संपर्क करें। इस कैंप में आयकर अधिकारी अखबारों और उनके प्रबंधन की सहयोगी कंपनियों के २००७ से १० तक की बैलेंससीट और दूसरे कागजात लेकर आयें।

इस कैंप में कामगार आयुक्त इस दावे की पुष्टि के सभी कागजात प्रमोशन लिस्ट लेकर आयें जिसकी एक सीए भी जांच करे और मीडियाकर्मियों की सेलरी स्लीप तथा दूसरे संबंधित कागजातों की उसी समय जांच कर अखबार के मैनेजिंग डायरेक्टर, डायरेक्टर, पार्टनर और सभी पार्टनरों को अदालत की अवमानना का दोषी मानते हुये उनके खिलाफ कामगार आयुक्त को निर्देश दे कि उनके खिलाफ पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज करा दें और  सभी जिलाधिकारियों, तहसीलदारों को निर्देश दे कि उनके खिलाफ रिकवरी कार्रवाई शुरू की जाये। उस अखबार के सभी मीडियाकर्मियों को उनका अधिकार दिलाया जाये। साथ ही इसकी पूरी रिपोर्ट माननीय सुप्रीमकोर्ट में भेजी जाये। इसके बाद जितने मामले १७. २ के लेबर कोर्ट में चल रहा हैं वे खुद ब खुद मीडियाकर्मी वापस ले लेंगे। इस पूरी प्रक्रिया में ६ माह से ज्यादा का समय ना लगे। साथ ही जो मीडियाकर्मी २००७ से २०११ तक जिस पद पर था उसी पद को आधार माना जाये और उनका पद या विभाग या कंपनी ना बदला जाये।  काश सुप्रीमकोर्ट ऐसा कर देता।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
९३२२४११३३५

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मजीठिया वेतनमान : आगे से कौन डरेगा सुप्रीम कोर्ट से…

मजीठिया वेतनमान को लेकर भले ही देश की कानून व्यवस्था और उसका पालन आलोचनाओं के घेरे में हो लेकिन प्रिंट मीडिया में भूचाल देखा जा रहा है, एबीपी अपने 700 से अधिक कर्मचारियों को निकाल रही है, भास्कर, पत्रिका आधे स्टाफों की छंटनी करने जा रहा है, हिंदुस्तान टाइम्स बिक गया आदि बातें स्पष्ट संकेत दे रही हैं सुप्रीम कोर्ट में मजीठिया वेतनमान को लेकर कुछ बड़ा फैसला आने वाला है। अब ये उठा पटक नोटबंदी के कारण हो रही है या किसी और कारण? यह तो समय बताएगा लेकिन मार्च-अप्रैल तक प्रिंट मीडिया में बड़े उलट फेर देखने को मिल सकते हैं. क्योंकि डीएवीपी की नई नीति से उसी अखबार को विज्ञापन मिलेगा जो वास्तव में चल रहा है और जहां के कर्मचारियों का पीएफ कट रहा हो या फिर पीटीआई, यूएनआई या हिन्दुस्थान न्यूज एजेंसी से समाचार ले रहा हो। साथ ही लगने वाला समाचार कापी पेस्ट ना हो, कि बेवसाइट से उठाकर सीधे-सीधे पेपर में पटक दी गई हो। इसका असर प्रिंट मीडिया में पड़ेगा.

ऐसी अवमानना सब पर चले
मजीठिया वेतनमान दिलाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में लगी अवमानना याचिका में जिस तरह सुनवाई चल रही है उससे पत्रकारों की परेशानी बढ़ रही है। यदि भारत का यही कानून है तो ठीक है, ऐसी ही सुनवाई हर केस में हो…  यदि ऐसा होगा तो कानून का भय किसे सताएगा? कोई भी बंदा कोर्ट के आदेश का पालन नहीं करेगा। पीड़ित बंदा अवमानना में जाएगा तो आरोपी कुछ जवाब नहीं देगा। पीड़ित के साक्ष्य मान्य नहीं होंगे. पुलिस या प्रशासनिक अधिकारी जो जांच करेंगे उस पर भी पीड़ित और अधिकारी के अलग-अलग बयान मानकर कार्रवाई नहीं की जाएगी. आरोपी लिखित कह देगा कि हम कोर्ट के आदेश का पालन कर रहे हैं  तो उससे कुछ साक्ष्य नहीं मांगे जाएंगे क्योंकि 3 करोड़ केस पेंडिंग हैं, एक-एक व्यक्ति को सुप्रीम कोर्ट न्याय थोड़े ही दिला पाएगा। मजीठिया वेतनमान में जब सुप्रीम कोर्ट 18 हजार केसों में नियमानुसार वेतन दिलाने में असमर्थतता जता रहा हो तो उसे सवा अरब आबादी को न्याय दिलाना है, वह कैसे दिलाएगा?

सुनवाई भी अजीब है
चूंकि न्यायालय अवमानना अधिनियम 1971 की धारा 5 के अनुसार न्यायालय के फैसले के बाद यदि कोई व्यक्ति न्यायालय की निष्पक्ष आलोचना करता है तो उसे न्यायालय अवमानना का दोषी नहीं माना जाएगा। इस अधिकार के तहत कुछ तथ्य पर चर्चा करना चाहूंगा। कोर्ट ने यह पूछा कि अपने मजीठिया वेतनमान क्यों नहीं दिया तो इस पर कुछ ने बाद में कहा कि हम 20 जे के अधिकार का उपयोग कर वेतन नहीं दे रहे हैं।

अब बात यह उठती है कि परिवादी ने प्रकरण लगाया है उसने 20 जे के तहत कुछ लिखकर नहीं दिया. यदि दिया होता तो वेतन मांगने क्यों आता। पूर्व में चले मजीठिया वेतनमान की वैधानिकता में यह सवाल नहीं उठा तो अवमानना में यह बात कहां से आ गई? यह बात पत्रकार पक्ष के वकीलों ने भी रखी। कुल मिलकर प्रकरण को जानबूझकर लटकाने के लिए जबरन 20 जे का प्रकरण सुना जा रहा है। जबकि उसकी सुनवाई का कोई वैधानिक औचित्य ही नहीं है क्योंकि अवमानना में वही बात उठाई जा सकती है जो मूल प्रकरण में उठाई गई हो। जैसे आप हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में वही बात उठा सकते हैं जो निचले अदालत में रखी हो और उसे इगनोर कर फैसला सुनाया गया हो। अब हर अदालत में उसी प्रकरण के लिए नया तथ्य और नया साक्ष्य नहीं ला सकते।

सैलरी स्लिप और उपस्थिति पंजीयन मांगे
सुप्रीम कोर्ट तो इस मामले में सिर्फ कर्मचारियों की ओरिजनल सैलरी स्लीप और ओरिजनल उपस्थिति पंजीयन मांगना चहिए और मजीठिया वेतन मान के अनुसार वेतन भुगतान का आदेश देना चहिए। वो भी जमानती वारंट के साथ, जो ना भुगतान करें उसे गैर जमानती वारंट में बदल दो। बस इत्ता सा न्याय करने के लिए बरसों बरस लग गए और अभी भी एक बड़ा कन्फ्यूजन है कि देश के आका जनता द्वारा चुनी सरकार है या मीडिया के मालिक हैं?

रमेश मिश्र
पत्रकार
swargeshmishra@rediffmail.com

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