‘पतंजलि’ ब्रांड से ‘खेलने वालों’ के मंसूबे निलंबित, दवाएं बहाल

यशवंत सिंह-

आचार्य बालकृष्ण जब हाल में ही एक बड़े प्रोजेक्ट के तहत हिमालय के अक्षत, अविजित और दुर्गम इलाकों से मानवता के लिए ढेर सारी खुशखबरियों के साथ लौटे थे तो भड़ास से विस्तार से बातीचत में अंतरराष्ट्रीय दवा माफिया का जिक्र किया था. दुनिया को पहले रोगग्रस्त करना, फिर डराना और फिर रोग को स्थगित रखने के लिए ताउम्र दवाएं खाना खिलाना… इस दुष्चक्र को रचने वाले दैत्याकार ड्रग माफिया को हर वो शख्स नापसंद है जो एलोपैथी के अलावा किसी अन्य तरीके से रोगों को हमेशा के लिए खत्म करने की बात करता है. ध्यान रखिए, रोग को स्थगित रखना एक चीज है और रोग को जड़ से खत्म करना बिलकुल अलग चीज.

आचार्य बालकृष्ण की चिंताएं अभी महीने भर की भी नहीं हुईं थी कि वो दु:स्वप्न फिर सामने आ गया. द टेलीग्राफ अखबार में दस नवंबर को एक खबर का विस्तार से प्रकाशन किया जाता है. पतंजलि की पांच दवाएं प्रतिबंधित. आज 13 नवंबर को उसी टेलीग्राफ अखबार में लीड खबर है, दवाओं पर यूटर्न.

दस नवंबर से तेरह नवंबर.

इन तीन दिन में तीस तरह की घटनाएं, बातें, शंकाएं, उम्मीदें आईं गईं. पर आखिर में हारे पतंजलि ब्रांड से समय-समय पर ‘खेल करने वाले’. ये कौन हैं पतंजलि से खेल करने वाले, पतंजलि से डरने वाले, पतंजलि के नाम पर बीमार पड़ने वाले… जो इस ब्रांड को ध्वस्त करने के लिए समय समय पर गेम प्लान करते रहते हैं… और इस गेम में छोटी मोटी मछलियों को चारा फेंककर शामिल कर लेते हैं.

जानने वाले जानते हैं कि ड्रग से संबंधित जितने सरकारी विभाग हैं, वो हर उस पैथी पर तगड़े मेहरबान रहते हैं जिन जिन से मोटे पैसे पूरे सिस्टम को पहुंचते हैं. यही कारण है कि भारत की एक दवा कंपनी विदेश में ऐसी दवाएं निर्यात कर देती है जिसे खा पीकर वहां के बच्चे मर जाते हैं. जाहिर है, उन दवाओँ को ‘निर्यात योग्य का प्रमाण पत्र’ भारत के ही सरकारी दवा तंत्र ने मुहैया कराया होगा. पर जहां से चढ़ावा नहीं आता, वहां की दवाओं के लिए सरकारी दवा तंत्र के मानक बड़े तगड़े, कड़े और टू द प्वाइंट रहते हैं. लेंस लगाकर भाई लोग चेक करते हैं और किन्हीं अदृश्य ताकतों के निर्देश के तहत मनमाफिक त्रुटियां रचते-पकड़ते रहते हैं. ऐसे पतंजलि के साथ बार बार किया जाता है. उनके मंसूबे बार बार निलंबित होते हैं, दवाएं बार बार बहाल होती हैं. ये एक अनवरत युद्ध है. अतरराष्ट्रीय युद्ध. इस विदेशी हमले में कुछ देसी भी शामिल हैं.

पतंजलि एक स्वदेशी ब्रांड है, भारत का ब्रांड है. इस ब्रांड ने मल्टी नेशनल माफियाओं की भारतीय बाजार में घुसपैठ और लूट को काफी दूर तक लखेदने का काम किया है. तो ये स्वदेशी ब्रांड कहां सबको पचने वाला. भारत में अगर बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण एक बड़ा ब्रांड बनाकर उसके जरिए दूसरे अंतरराष्ट्रीय ब्रांड्स को लगातार चैलेंज करते हैं तो ये दुनिया के सबसे सुसंगठित और सबसे खतरनाक माफिया तंत्र के लिए तगड़ी चुनौती है. इसमें सहायक बनते हैं भारत के कुछ ऐसे सरकारी, गैर-सरकारी और कम ज्यादा असरकारी चेले-चपाटे जो छोटे से प्रलोभन पर फंस जाते हैं और इनके हाथों कोई भी कैसी भी रिपोर्ट जारी हो जाते हैं.

सुपरसोनिक सूचना तंत्र के आज के दौर में एक नियोजित रिपोर्ट जारी कराकर किसी ब्रांड को कैसे नुकसान पहुंचा सकते हैं, इसका ताजा उदाहरण एक बदमाश आदमी द्वारा ट्विटर पर आठ डालर देकर एक बड़ी अमेरिकी दवा कंपनी के नाम पर वेरीफाइड एकाउंट खोलकर उसके जरिए दवा कंपनी के इंसुलिन को फ्री में दिए जाने की घोषणा के जरिए जान सकते हैं. इस घोषणा का असर ये हवा कि दवा कंपनी का शेयर देखते ही देखते चार प्रतिशत गिर गया और कंपनी के अरबों रुपये चले गए.

देखें संबंधित खबर- 8 डॉलर वेरीफाइड अकाउंट के घनचक्कर में दिग्गज फार्मा कंपनी के शेयर चार फ़ीसदी गिर गए!

तो आज युद्ध तलवारों भालों तीरों तोपों राकेटों से नहीं लड़ा जाता बल्कि निहित स्वार्थाी सूचनाओं रिपोर्टों आदि को सुनियोजित तरीके से फैलाकर किया जाता है. वो एक शेर है न— वो झूठ भी बोलेगा तो लाजवाब कर देगा, हम सच भी बोलेंगे तो हार जाएंगे… तो आजकल के दौर में झूठ को कुछ इस तरह फैलाया जाता है कि वो सच लगे. सच को कुछ इस तरह प्रोजेक्ट किया जाता है जैसे वह झूठ हो.

पतंजलि के कर्ताधर्ताओं के कई दर्जन घंटे बेचैनी में बीते. तह तक घुसकर पूरी जानकारी इकट्ठी की गई. आचार्य बालकृष्ण ने तब तक चैन की सांस न ली जब तक दूध का दूध और पानी का पानी न हो गया.आचार्य बालकृष्ण समझते हैं कि आगे की राह भी आसान नहीं है. साजिशें किसी भी तरफ से उछाली जा सकती हैं और उसे वैश्विक सत्य बनाने का विकट अभियान चलाया जा सकता है. पर वे मानते हैं कि तप और सच के आगे देर तक कृत्रिम और झूठी चीजें नहीं टिक सकतीं.

स्वामी रामदेव के सपनों से निर्मित ‘पतंजलि’ को दुनिया का सबसे बड़ा ब्रांड बनाने का आचार्य बालकृष्ण का सपना यूं ही नहीं है. बड़े धोखे हैं इस राह में. बड़े छलिया हैं इस काम में. पर उम्मीद है अबकी ये भारतीय पताका को सबको परास्त कर विश्व के मस्तक पर फहराएगा.

इस प्रकरण से संबंधित कुछ तथ्य, कुछ घटनाक्रम, कुछ विज्ञप्तियां देखिए…

ये हैं टेलीग्राफ के दो स्क्रीनशॉट…

प्रस्थान… दस नवंबर

पूर्णविराम… तेरह नवंबर

कल शाम जारी पतंजलि की विजय विज्ञप्ति

पतंजलि संस्थान ने विश्व में सर्वप्रथम आयुर्वेद की औषधियों को 30 वर्षों के निरन्तर पुरुषार्थ व अनुसंधान से रिसर्च एण्ड एविडेंस बेस्ड मेडिसिन के रूप में स्वीकार्यता दिलाई। माननीय प्रधानमंत्री जी भी देश को सभी प्रकार की गुलामियों की निशानियों को मिटाकर अपनी विरासत के गौरव को प्रतिष्ठित करने के लिए अखण्ड पुरुषार्थ कर रहे हैं। उत्तराखण्ड के आयुर्वेद लाइसेंसिंग अधिकारी अज्ञानी, असंवेदनशील, अयोग्य अधिकारी न केवल पूरी आयुर्वेद की ऋषि परम्परा को कलंकित कर रहे हैं अपितु एक अधिकारी के अविवेकपूर्ण कार्य एवं त्रुटि से आयुर्वेद की परम्परा एवं प्रामाणिक अनुसंधान पर ही प्रश्नचिन्ह खड़ा करने का, उसे कलंकित करने का घोर निन्दनीय कार्य किया गया और पतंजलि को दुर्भावनापूर्वक बदनाम किया। ऐसे षड्यंत्र योग-आयुर्वेद एवं भारतीय परम्परा के विरोधी लोग करते रहते हैं। इन षड्यंत्रों का मुँहतोड़ जवाब वैज्ञानिकतापूर्ण अनुसंधान तथ्य व प्रमाणों के साथ इनका मुकाबला करते हुए आयुर्वेद को विजयी बनाना हमारा धर्म है। जिस विभाग का कार्य आयुर्वेद को गौरव दिलाते हुए आयुर्वेद को राष्ट्रीय चिकित्सा पद्धति के रूप में प्रतिष्ठापित करना था, वही आयुर्वेद को बदनाम करके आयुर्वेद को मिटाने में लगा है। इस दुर्भाग्यपूर्ण कृत्य को हम कभी स्वीकार नहीं कर सकते। पतंजलि विश्व की पहली संस्था है जिसके वैश्विक स्तर पर सर्वाधिक रिसर्च पेपर्स प्रकाशित हुए हैं, दो NABH (एनएबीएच) Accredited हॉस्पिटल हैं और अंतराष्ट्रीय मानकों के स्तर के अनेक NABL (एनएबीएल) Accredited अनुसंधान लैब हैं। 500 से अधिक विश्वस्तरीय वैज्ञानिक यहाँ सेवाएँ प्रदान कर रहे हैं। योग-आयुर्वेद को विश्व में पहुँचाने के लिए जो कार्य किया गया, वह कार्य आजादी के इन 75 वर्षों में किसी सरकार या किसी अन्य संस्थान ने नहीं किया। एक अधिकारी द्वारा जिस तरह का कृत्य किया गया, उससे हम बहुत आहत हैं। आयुर्वेद व योग की स्थापना में किसी भी तरह से कोई भी षड्यंत्र करेगा या किसी भी मेडिकल माफिया या सनातन विरोधी षड्यंत्रकारियों में सम्मिलित होगा, उसके विरूद्ध पतंजलि कानून के दायरे में रहकर अपनी लड़ाई जारी रखेगा। आयुर्वेद को बदनाम करने के इस अविवेकपूर्ण कार्य का संज्ञान लेकर उत्तराखण्ड सरकार ने जिस प्रकार भूल का सुधार किया उसके लिए हम सरकार के प्रति कृतज्ञ हैं कि सरकार द्वारा संज्ञान लेकर इस त्रुटि का सुधार किया गया।

कुछ कागजात, कुछ बात…. देखें ये लिंक-

Letter copy reply by Divya Pharmacy 30-09-2022

Letter received from Licensing officer Ayurvedic & Unani Dehradun Uttrakahnd

Leacked letter for media from Licensing officer Ayurvedic & Unani Dehradun Uttrakahnd

Final Press Release


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Comments on “‘पतंजलि’ ब्रांड से ‘खेलने वालों’ के मंसूबे निलंबित, दवाएं बहाल

  • DR ASHOK KUMAR SHARMA says:

    बहुत ही सुखदायक है ये देखना और महसूस करना कि भड़ास निरंतर गंभीर और खोजपूर्ण खबरों का सार्थक मंच बनता जा रहा है।
    फार्मा माफिया अपने आप में बहुत खतरनाक और बेरहम अंतरराष्ट्रीय दुनिया है जिसके अपने भाड़े के सैनिक हैं जो मीडिया कर्मियों के रूप में काम करते हैं।
    इन्हें अपने हितों के प्रतिकूल कोई भी चीज जब नजर आती है तब उस सरकार उस समाज और उस संस्थान को हानि पहुंचाने के लिए करोड़ो खर्च कर डालते हैं। यह माफिया दुनिया के जाने माने चिकित्सकों को अपनी चपेट में लेते हुए किसी ना किसी प्रकार से ब्लैकमेल करता रहता है। इसमें चिकित्सकों को सपरिवार बढ़िया पर्यटन स्थलों की मुफ्त यात्रा। सेमिनार के नाम पर थाईलैंड में सेक्स पार्टियां शामिल हैं। ये माफिया अपनी महंगी दवाओं को पॉपुलर कराने के लिए बढ़िया प्रैक्टिस वाले डॉक्टरों को मजबूर करने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाता है।
    दुनिया की जानी मानी वायरोलॉजी लैब्स से संपर्क करके नई बीमारियों को फैलाने के अभियानों की कोशिश करता है।
    जिन बीमारियों का इलाज महंगी एलोपैथिक या आधुनिक दवाओं से संभव नहीं है और जिन्हें हम स्थानीय या वैकल्पिक शिक्षा के माध्यम से ठीक कर सकते हैं, ऐसी किसी भी कोशिश को नाकाम करने के लिए पतंजलि जैसे संस्थानों को निशाना बनाना इनकी रणनीति का एक आम हिस्सा है।
    ऐसा नहीं है कि पत्रकार उनके खिलाफ आवाज नहीं उठाते लेकिन अगर उठाते हैं तो ज्यादातर ऐसे पत्रकार पोस्टमार्टम रूम में सिले जा रहे होते हैं। ऐसा होता रहा है ऐसा हो रहा है और ऐसा होगा क्योंकि इसमें राजनेता, अफसर तथा पुलिस भी शामिल है। ज्यादातर फार्मा अफसर इनके दलाल, भड़वे और एजेंट हुआ करते हैं।
    हॉलीवुड ने ऐसी कुछ पिक्चरें बनाई है जिनमें अंग तस्करी करने वाले ऑर्गन ट्रांसप्लांट माफिया के साथ ही इस तंत्र को भी नंगा करने की कोशिश की गई है परंतु उन फिल्मों की लोकप्रियता बढ़ नहीं पाए और वह जनता तक नहीं पहुंच पाई।
    इन विषयों पर बहुत से साहित्यकारों ने उपन्यास भी लिखे हैं लेकिन वह भी ज्यादा चर्चित नहीं हुए।
    यह माफिया अपने खिलाफ जाने वाली प्रत्येक अभिव्यक्ति को रोकने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहता है।

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  • फैसल खान says:

    काफी हद तक आपके लेख से साबित हुवा की आप पंतजलि की दवाइयों को अमृत समझते हैं हालांकि ऐसा बिल्कुल भी नही है, पंतजलि किस तरह से स्वदेशी के नाम पर देशवासियों को बेवकूफ बना रही है ये अब लोग समझने भी लगे हैं और पतंजलि की दवाइयों से दूरी भी बनाने लगे हैं,अगर बिल्कुल ईमानदारी से पंतजलि की जांच हो जाये तो इनकी एक भी दवाई मानक पर खरी नही उतर सकती,
    और रही ये बात की एलोपैथी वाले इनसे चिढ़ते हैं तो इनके खिलाफ दुष्चक्र रचते हैं तो जनाब दो सड़कछाप आदमी खरबो की कंपनी कैसे बना बैठे हैं जांच तो इसकी भी होनी चाहिए,मगर ऐसी कोई जांच होगी बिल्कुल नही ये हम अच्छे से जानते हैं

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