ईमानदार जज जेल में, भ्रष्टाचारी बाहर!

सुप्रीम कोर्ट देश की सबसे बड़ी अदालत है, इसलिए उसका फ़ैसला सर्वोच्च और सर्वमान्य है। चूंकि भारत में अदालतों को अदालत की अवमानना यानी कॉन्टेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट की नोटिस जारी करने का विशेष अधिकार यानी प्रीवीलेज हासिल है, इसलिए कोई आदमी या अधिकारी तो दूर न्यायिक संस्था से परोक्ष या अपरोक्ष रूप से जुड़ा व्यक्ति भी अदालत के फैसले पर टीका-टिप्पणी नहीं कर सकता। इसके बावजूद निचली अदालत से लेकर देश की सबसे बड़ी न्याय पंचायत तक, कई फ़ैसले ऐसे आ जाते हैं, जो आम आदमी को हज़म नहीं होते। वे फ़ैसले आम आदमी को बेचैन करते हैं। मसलन, किसी भ्रष्टाचारी का जोड़-तोड़ करके निर्दोष रिहा हो जाना या किसी ईमानदार का जेल चले जाना या कोई ऐसा फैसला जो अपेक्षित न हो।

चूंकि जज भी इंसान हैं और इंसान काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार जैसे पांच विकारों या अवगुणों के चलते कभी-कभार रास्ते से भटक सकता है। ऐसे में इंसान होने के नाते जजों से कभी-कभार गलती होना स्वाभाविक प्रक्रिया है। इस दलील पर एकाध स्वाभाविक गलतियां स्वीकार्य हैं, हालांकि उन गलतियों का दुरुस्तीकरण भी होना चाहिए, लेकिन कई फैसले ऐसे होते हैं, जिनमें प्रभाव, पक्षपात या भ्रष्टाचार की बहुत तेज़ गंध आती है। कोई बोले भले न, पर उसकी नज़र में फ़ैसला देने वाले जज का आचरण संदिग्ध ज़रूर हो जाता है। किसी न्यायाधीश का आचरण जनता की नज़र में संदिग्ध हो जाना, भारतीय न्याय-व्यवस्था की घनघोर असफलता है।

न्यायपालिका को अपने गिरेबान में झांक कर इस कमी को पूरा करना होगा, वरना धीरे-धीरे उसकी साख़ ही ख़त्म हो जाएगी, जैसे बलात्कार के आरोपी अखिलेश सरकार में मंत्री रहे गायत्री प्रजापति की ज़मानत मंजूर करके जिला एवं सत्र न्यायधीश जस्टिस ओपी मिश्रा ने न्यायपालिका की साख़ घटाई। दो साल पहले बॉम्बे हाई कोर्ट के जस्टिस अभय थिप्से ने अभिनेता सलमान ख़ान को हिट रन केस में कुछ घंटे के भीतर आनन-फानन में सुनवाई करके ज़मानत दे दिया और जेल जाने से बचा लिया था। इसी तरह कर्नाटक हाईकोर्ट के जस्टिस सीआर कुमारस्वामी ने महाभ्रष्टाचारी जे जयललिता को निर्दोष करार देकर फिर उसे मुख्यमंत्री बना दिया था। ऐसे फ़ैसले न्यायपालिका को ही कठघरे में खड़ा करते हैं।

हाल ही में दो बेहद चर्चित जज न्यायिक सेवा से रिटायर हुए। मई में गायत्री को बेल देने वाले जज ओपी मिश्रा ने अवकाश ग्रहण किया, जून में कलकत्ता हाईकोर्ट के जज जस्टिस सीएस कर्णन। कर्णन की चर्चा बाद में पहले जज ओपी मिश्रा का ज़िक्र। गायत्री पर एक महिला और उसकी नाबालिग बेटी से बलात्कार करने का आरोप था, इसके बावजूद जज मिश्रा ने ज़मानत दी। इलाहाबाद हाईकोर्ट की रिपोर्ट में पता चला है कि जज मिश्रा ने गायत्री से 10 करोड़ रुपए लेकर ज़मानत पर रिहा कर दिया था। करोड़ों रुपए डकारने के बावजूद जज मिश्रा और दूसरे रिटायर्ड जज आराम से सेवानिवृत्त जीवन जी रहे हैं।

दूसरी ओर जस्टिस कर्णन पर कभी भी भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं लगा, फिर भी वह जेल की हवा खा रहे हैं। यह भी गौर करने वाली बात है कि जस्टिस कर्णन दलित समुदाय के हैं और दुर्भाग्य से भारतीय न्यायपालिका में दलित और महिला समाज का रिप्रजेंटेशन नहीं के बराबर है। दलित या महिला समुदाय के किसी जज को हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट को जज बनाया गया यह विरला ही सुनने को मिलता है। फिर जस्टिस कर्णन ऐसे समय बिना गुनाह (इसे आगे बताया गया है) के जेल की हवा खा रहे हैं, जब किसी दलित व्यक्ति को देश का प्रथम नागरिक बनाकर सर्वोच्च सम्मान देने की होड़ मची है और दलित समाज के दो शीर्ष नेता रामनाथ कोविंद और मीरा कुमार राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ रहे हैं।

जस्टिस कर्णन को सजा देने का फैसला भी किसी एक जज ने नहीं किया, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के सात सीनियर मोस्ट जजों की संविधान पीठ ने किया है। संविधान पीठ ने जस्टिस कर्णन को सर्वोच्च न्यायिक संस्था की अवमानना का दोषी पाया और एकमत से सज़ा सुनाई। सुप्रीम कोर्ट के सात विद्वान जजों की पीठ के दिए इस फैसले की न तो आलोचना की जा सकती है और न ही उसे किसी दूसरे फोरम में चुनौती दी जा सकती है। इतना अवश्य कहा जा सकता है कि जस्टिस कर्णन प्रकरण बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। भारतीय न्याय-व्यवस्था में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ जब किसी सेवारत जज को जेल की सजा हुई हो।

जबसे जस्टिस कर्णन गिरफ़्तार करके जेल भेजे गए हैं। आम आदमी के मन में यह सवाल बुरी तरह गूंज रहा है कि आख़िर कर्णन का अपराध क्या है? क्या उन्होंने कोई संगीन अपराध किया? उत्तर – नहीं। क्या उन्होंने कोई ग़लत फ़ैसला दिया? उत्तर – नहीं। क्या उन्होंने किसी से पैसे लिए या कोई भ्रष्टाचार किया? उत्तर – नहीं। क्या उन्होंने कोई ऐसा आचरण किया जो किसी तरह के अपरोक्ष भ्रष्टाचार की ही श्रेणी में आता है? उत्तर – नहीं। मतलब न कोई अपराध किया, न ग़लत फ़ैसला दिया और न ही कोई भ्रष्टाचार किया, फिर भी हाईकोर्ट का जज जेल में है। लिहाजा, आम आदमी के मन में सवाल उठ रहा है कि फिर जस्टिस कर्णन जेल में क्यों हैं? उत्तर – उन्होंने कथित तौर पर कई भ्रष्ट जजों के नाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दे दिए थे।

दरअसल, जस्टिस कर्णन ने 23 जनवरी 2017 को पीएम मोदी को लिखे खत में सुप्रीम कोर्ट और मद्रास हाई कोर्ट के दर्जनों जजों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे। कर्णन ने अपनी चिट्ठी में 20 जजों के नाम लिखते हुए उनके खिलाफ जांच की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस कर्णन के इस आचरण को कोर्ट की अवमानना क़रार दिया और उन्हें अवमानना नोटिस जारी कर सात जजों की बेंच के सामने पेश होने का आदेश दिया। इसके बाद जस्टिस कर्णन और सुप्रीम कोर्ट के बीच जो कुछ हुआ या हो रहा है, उसका गवाह पूरा देश है। भारतीय न्याय-व्यवस्था में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ जब किसी कार्यरत जस्टिस को जेल की सज़ा हुई हो।

यह मामला सिर्फ़ एक व्यक्ति बनाम न्यायपालिका तक सीमित नहीं रहा। इस प्रकरण का विस्तार हो गया है और यह देश के लोकतंत्र के 80 करोड़ से ज़्यादा स्टैकहोल्डर्स यानी मतदाओं तक पहुंच गया है। देश का मतदाता मोटा-मोटी यही बात समझता है कि जेल में उसे होना चाहिए जिसने अपराध किया हो। जिसने कोई अपराध नहीं किया है, उसे जेल कोई भी नहीं भेज सकता। सुप्रीम कोर्ट भी नहीं। इस देश के लोग भ्रष्टाचार को लेकर बहुत संजीदा हैं, क्योंकि भ्रष्टाचार की बीमारी से हर आदमी परेशान है। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर देश के लोगों ने भ्रष्टाचार से लड़ने का दावा करने वाली एक नई नवेली पार्टी को सिर-आंखों पर बिठा लिया था।

बहरहाल, भारत का संविधान हर व्यक्ति को अपने ख़िलाफ़ हो रहे अन्याय, पक्षपात या अपने मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के खिलाफ़ बोलने की आज़ादी देता है। अगर कर्णन को लगा कि उनके साथ अन्याय और पक्षपात हो रहा है, तो उसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना उनका मौलिक अधिकार था। इतना ही नहीं, उन्होंने जजों के ख़िलाफ़ आरोप प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में लगाए थे। उस प्रधानमंत्री को जिसे देश के सवा सौ करोड़ जनता का प्रतिनिधि माना जाता है। लिहाज़ा, अवमानना नोटिस जारी करने से पहले जस्टिस कर्णन के आरोपों को सीरियली लिया जाना चाहिए था, उसमें दी गई जानकारी की निष्पक्ष जांच कराई जानी चाहिए थी। उसके बाद अगर जस्टिस कर्णन गलत पाए जाते तो उनके ख़िलाफ़ ऐक्शन होना चाहिए था। दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ।

सुप्रीम कोर्ट देश की सबसे बड़ी अदालत है। लिहाज़ा, उसका ध्यान उन मुद्दों पर सबसे पहले होना चाहिए, जिसका असर समाज या देश पर सबसे ज़्यादा होता है। मसलन, देश की विभिन्न अदालतों में दशकों से करोड़ों की संख्या में विचाराधीन केसों का निपटान कैसे किया जाए, लेकिन ऐसा नहीं हैं। देश की सबसे बड़ी अदालत सबसे ज़्यादा शिथिल है। इसकी एक नहीं कई कई मिसालें हैं, जिनसे साबित किया जा सकता है कि सुप्रीम कोर्ट संवेदनशील केसेज़ को लेकर भी उतनी संवेदनशील नहीं है, जितना उसे होना चाहिए।

उदाहरण के रूप में दिसंबर 2012 के दिल्ली गैंगरेप केस को ले सकते हैं। जिस गैंगरेप से पूरा देश हिल गया था। सरकार ने जस्टिस जगदीश शरण वर्मा की अध्यक्षता में आयोग गठित किया। उन्होंने दिन रात एक करके रिपोर्ट पेश की। आनन-फानन में संसद का विशेष अधिवेशन बुलाया गया और अपराधिक क़ानून में बदलाव किए गए। उस केस की सुनवाई के लिए फॉस्टट्रैक कोर्ट गठित की गई जिसने महज 173 दिन यानी छह महीने से भी कम समय में सज़ा सुना दी थी और दिल्ली हाईकोर्ट ने भी केवल 180 दिन यानी छह महीने के अंदर फांसी की सज़ा पर मुहर लगा दी थी, लेकिन उसे सुप्रीम कोर्ट ने लटका दिया और उसे फैसला सुनाने में तीन साल (1145 दिन) से ज़्यादा का समय लग गया।

देश का आम आदमी हैरान होता है कि करोड़ों की संपत्ति बनाने वाली जयललिता को निचली अदालत के जज माइकल चून्हा ने 27 सितंबर 2014 को चार साल की सज़ा सुनाई, जिससे उन्हें सीएम की कुर्सी  छोड़नी पड़ी और जेल जाना पड़ा। उनका राजनीतिक जीवन ही ख़त्म हो गया। लेकिन आठ महीने बाद 11 मई 2015 को कर्नाटक हाईकोर्ट के कुमारस्वामी ने जया को निर्दोष करार दे दिया। वह फिर मुख्यमंत्री बन गई और जब मरी तो अंतिम संस्कार राजा की तरह हुआ। जबकि क़रीब दो साल बाद सुप्रीम कोर्ट को ही कुमारस्वामी का फ़ैसला रद्द करना पड़ा। देश की सबसे बड़ी अदालत के न्यायाधीशों की नज़र में कुमारस्वामी का आचरण क्यों नहीं आया। अगर उन्होंने ग़लत फ़ैसला न सुनाया होता तो एक भ्रष्टाचारी महिला दोबारा सीएम न बन पाती और उसकी समाधि के लिए सरकारी ज़मीन न देनी पड़ती। इससे पता चलता है कि कुमारस्वामी ने कितना बड़ा अपराध किया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उनको कोई नोटिस जारी नहीं किया। सबसे अहम कि कुमारस्वामी पर भी भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं।

इसी तरह हिट ऐंड रन केस में अभिनेता सलमान ख़ान को 7 मई 2015 को निचली अदालत ने सज़ा सुनाई। आम आदमी को ज़मानत लेने में महीनों और साल का समय लग जाता है, लेकिन बॉम्बे हाई कोर्ट के जस्टिस अभय थिप्से ने सलमान ख़ान को कुछ घंटों के भीतर  बेल दे दी। इतना ही नहीं जब पूरा देश उम्मीद कर रहा था कि सलमान को शर्तिया सज़ा होगी, तब बॉम्बे हाईकोर्ट के जज जस्टिस एआर जोशी ने 10 दिसंबर 2015 को रिटायर होने से कुछ पहले दिए गए अपने फ़ैसले में सलमान को बरी कर दिया। इस फ़ैसले से सरकार ही नहीं देश का आम आदमी भी हैरान हुआ। साफ़ लगा कि अभिनेता ने न्यायपालिका को मैनेज कर लिया। जब जज ओपी मिश्रा रिश्वत ले सकते हैं तो हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट का जज भी रिश्वत ले सकता है, इस संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता। बहरहाल, सलमान को रिहा करने की राज्य सरकार की अपील अब दो साल से सुप्रीम कोर्ट के पास है। अगर सुप्रीम कोर्ट ने सलमान को सज़ा दे दी तो क्या जस्टिस एआर जोशी के ख़िलाफ कार्रवाई होगी, ज़ाहिर है नहीं, क्योंकि इस तरह की कोई व्यवस्था संविधान में नहीं हैं।

बहरहाल, अगर भ्रष्टाचार से जुड़े मामले पर जस्टिस कर्णन ने पीएम को पत्र लिखा तो अवमानना नोटिस देने से पहले कर्णन के आरोपों की गंभीरता और तथ्यपरकता की जांच होनी चाहिए थी। जिन पर कर्णन ने आरोप लगाया, उनका बाल भी बांका नहीं हुआ और आरोप लगाने वाले कर्णन को उनके आरोप ग़लत साबित होने से पहले ही जेल भेज दिया गया। न्यायपालिका के भीतर रहते हुए कोई उसकी व्यवस्था पर प्रश्न नहीं उठा सकता और उसके बाहर होने पर भी आलोचना नहीं कर सकता। वह अवमानना का विषय बन जाएगा। यह तो निरंकुशता हुई, जिसका समाधान जल्द से जल्द खोजा जाना चाहिए।

लेखक Hari Govind Vishwakarma से संपर्क 09920589624 के जरिए किया जा सकता है.

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Letter to Chief Justices of Indian High Courts for simplification of procedural laws to cut delays in judgments

To

All the Hon’ble

Chief Justices of Indian High Courts

Sir,

SIMPLIFICATION OF PROCEDURAL LAWS TO CUT DELAYS IN JUDGMENTS

I wish to invite your kind attention to the fact that it is pretended that the procedural laws of the land pose greatest challenge to timely justice to litigants.  The Code of Civil Procedure and Code of Criminal Procedure are the laws of Central Legislature and State Governments are also empowered to amend the codes according to their needs. Both the Codes are originally creation of British India.

AND SECTION- 122. OF Code of Civil Procedure goes on to say—Power of certain High Courts to make rules— High Courts not being the Court of a Judicial Commissioner may, from time to time after previous publication, make rules regulating their own procedure and the procedure of the Civil Courts subjects to their superintendence, and may be such rules annul, alter or add to all or any of the rules in the First Schedule.

LIKEWISE- Section 477 –of Code of Criminal Procedure says- Power of High Court to make rules

(1) Every High Court may, with the previous approval of the State Government, make rules—

(a) as to the persons who may be permitted to act as petition-writers in the Criminal Courts subordinate to it;

(b) regulating the issue of licences to such persons, the conduct of business by them, and the scale of fees to be charged by them.

(c) providing a penalty for a contravention of any of the rules so made and determining the authority by which such contravention may be investigated and the penalties imposed;

(d) any other matter which is required to be, may be, prescribed.

(2) All rules made under this section shall be published in the Official Gazette.

Accordingly it well within Authority and Competence of your kind honour to amend, and tailor both the codes to suit the need of the hour rather than to see for any other organ of Democracy for justice delayed.

Therefore it is my humble request that the undemocratic and anti-people provisions of the codes be identified, and necessary steps be taken in right direction to ensure justice to each and every body, within a reasonable period of time.

With regards,

Sincerely yours

Mani Ram Sharma

Chairman, Indian National Bar Association, Churu- Chapter

Nakul Niwas, Behind Roadways Depot

Sardarshahar- 331 403-7 District Churu (Raj)

maniramsharma@gmail.com                             

Dated: 12th Jun, 2017

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खोजोगे तो ऐसे भ्रष्ट जज हजार मिलेंगे

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ शाखा ने कमाल कर दिया। उसने एक जज को मुअत्तिल कर दिया। सरकारी नौकरों की मुअत्तिली की बात तो हम अक्सर सुनते ही रहते हैं लेकिन कोई जज मुअत्तिल कर दिया जाए, ऐसी बात पहली बार सुनने में आई है। इस जज को न तो शराब पीकर अदालत में बैठने के लिए मुअत्तिल किया गया है, न रिश्वत लेने के लिए और न ही कोई उटपटांग व्यवहार करने के लिए!

ओ.पी. मिश्रा नामक इस जज को इसलिए मुअत्तिल किया गया है कि उसने उप्र के एक पूर्व मंत्री गायत्री प्रजापति को जमानत पर छोड़ दिया था। प्रजापति आजकल जेल में है। उस पर कई अपराधिक मुकदमे तो चल ही रहे हैं लेकिन जज मिश्रा ने उसे बलात्कार के एक बहुत चर्चित मामले में जमानत दे दी थी। अमेठी से विधायक रहे इस प्रजापति पर आरोप है कि उसने और उसके दो साथियों ने एक औरत के साथ बलात्कार किया और बेटी के साथ भी जोर-जबर्दस्ती की।

यह मामला उस अदालत में चल रहा था, जिसका काम बच्चों को यौन-अपराधों से बचाना है। प्रजापति ने हलफनामा दायर करके कहा था कि उसके खिलाफ कोई भी अपराधिक मामला नहीं चल रहा, इसलिए उसे जमानत दी जाए। जज मिश्रा ने इस झूठे दावे को स्वीकार कर लिया और सारे मामलों से आंख मींचकर प्रजापति को जमानत दे दी। उस जमानत को उच्च न्यायालय ने रद्द कर दिया और प्रजापति अभी भी जेल में है लेकिन जज मिश्रा को मुअत्तिल करके उसने एक मिसाल कायम कर दी है।

सारे मामले की अब जांच होगी कि मिश्रा ने प्रजापति को जमानत किस आधार पर दी है। कोई आश्चर्य नहीं कि इस मामले में जबर्दस्त रिश्वतखोरी हुई हो या कोई अवांछित राजनीतिक हस्तक्षेप हुआ हो। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच बधाई की पात्र है कि उसने तत्काल सख्त कदम उठाया। जज मिश्रा सेवानिवृत्त होने वाले ही थे कि उन्हें यह दिन देखना पड़ा। किसी भी ईमानदार जज के लिए उसके जीवन में इससे बड़ा कलंकित दिन क्या होगा कि उसे जिस दिन सेवा-निवृत्त होना हो, उसे उसी दिन मुअत्तिली का आदेश मिल जाए।

लेखक वेद प्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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जजों की नियुक्ति के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट से जो लिस्ट सुप्रीम कोर्ट भेजी गई है, वह धांधलियों का पुलिंदा है!

इलाहाबाद हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति पर ‘चौथी दुनिया’ में छपी प्रभात रंजन दीन की ये बेबाक रिपोर्ट पढ़ें

जजों की नियुक्ति के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट से जो लिस्ट सुप्रीम कोर्ट भेजी गई है, वह धांधलियों का पुलिंदा है. जज अपने बेटों और नाते रिश्तेदारों को जज बना रहे हैं। और सरकार को उपकृत करने के लिए सत्ता के चहेते सरकारी वकीलों को भी जज बनाने की संस्तुति कर रहे हैं. न्यायाधीश का पद सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के प्रभावशाली जजों का खानदानी आसन बनता जा रहा है. जजों की नियुक्ति के लिए भेजी गई अद्यतन सूची में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के बेटे से लेकर कई प्रमुख न्यायाधीशों के बेटे और रिश्तेदार शामिल हैं.

नेताओं को भी खूब उपकृत किया जा रहा है. वरिष्ठ कानूनविद्, उत्तर प्रदेश भाजपा के वरिष्ठ नेता और पश्चिम बंगाल के मौजूदा राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी के बेटे नीरज त्रिपाठी, सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे वीएन खरे के बेटे सोमेश खरे, जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट और आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश व इलाहाबाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जज रहे सगीर अहमद के बेटे मोहम्मद अल्ताफ मंसूर समेत ऐसे दर्जनों नाम हैं, जिन्हें जज बनाने के लिए सिफारिश की गई है.

जजों की नियुक्ति के लिए की गई संस्तुति की जो सूची सुप्रीम कोर्ट में लंबित है, उसमें 73 नाम जजों के रिश्तेदारों के हैं और 24 नाम नेताओं के रिश्तेदारों के हैं. इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश का कार्यभार संभालने के पूर्व जो तकरीबन 50 नाम जजों की नियुक्ति के लिए भेजे उनमें भी अधिकांश लोग जजों के बेटे और रिश्तेदार हैं या सरकार के पैरवी-पुत्र सरकारी वकील हैं. अब जज बनने के लिए योग्यता ही हो गई है कि अभ्यर्थी जज या नेता का रिश्तेदार हो या सत्ता की नाक में घुसा हुआ सरकारी वकील. अन्य योग्य वकीलों ने तो जज बनने का सपना देखना भी बंद कर दिया है.

जब न्यायाधीश ही अपने नाते-रिश्तेदारों और सरकार के प्रतिनिधि-पुत्रों को जज नियुक्त करे तो संविधान का संरक्षण कैसे हो? यह कठोर तथ्य है जो सवाल बन कर संविधान पर चिपका हुआ है. यह पूरे देश में हो रहा है. जजों की नियुक्ति के लिए विभिन्न हाईकोर्टों से जो लिस्ट सुप्रीम कोर्ट भेजी जा रही हैं, उनमें अधिकांश लोग प्रभावशाली जजों के रिश्तेदार या सरकार के चहेते सरकारी अधिवक्ता हैं. वरिष्ठ वकीलों को जज बनाने के नाम पर न्यायपीठों में यह गैर-संवैधानिक और गैर-कानूनी कृत्य निर्बाध गति से चल रहा है, इसके खिलाफ सार्वजनिक मंच पर बोलने वाला कोई नहीं.

सार्वजनिक मंच पर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश तीरथ सिंह ठाकुर जजों की नियुक्ति को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समक्ष रो सकते हैं, लेकिन जजों की नियुक्तियों में जो धांधली मचा कर रखी गई है, उसके खिलाफ कोई नागरिक सार्वजनिक मंच पर रो भी नहीं सकता. इस रुदन और उस रुदन के मर्म अलग-अलग हैं. रिश्तेदारों और सरकारी वकीलों को जज बना कर आम आदमी के संवैधानिक अधिकार को कैसे संरक्षित-सुरक्षित रखा जा सकता है और ऐसे जज किसी आम आदमी को कैसा न्याय देते होंगे, लोग इसे समझ भी रहे हैं और भोग भी रहे हैं. देश की न्यायिक व्यवस्था की यही सड़ी हुई असलियत है.

इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने जजों की नियुक्ति के लिए जिन नामों की सिफारिश कर फाइनल लिस्ट सुप्रीम कोर्ट भेजी, उनमें से अधिकांश नाम मौजूदा जजों या प्रभावशाली रिटायर्ड जजों के बेटे, भांजे, साले, भतीजे या नाते रिश्तेदारों के हैं. बाकी लोग सत्ता सामर्थ्यवान सरकारी वकील हैं. चंद्रचूड़ यह लिस्ट भेज कर खुद भी सुप्रीम कोर्ट के जज होकर चले गए, लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट और लखनऊ पीठ के समक्ष यह सवाल छोड़ गए कि क्या जजों की कुर्सियां न्याधीशों के नाते-रिश्तेदारों और सत्ता-संरक्षित सरकारी वकीलों के लिए आरक्षित हैं? क्या उन अधिवक्ताओं को जज बनने का पारंपरिक अधिकार नहीं रहा जो कर्मठता से वकालत करते हुए पूरा जीवन गुजार देते हैं?

इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश द्वारा इलाहाबाद और लखनऊ पीठ के जिन वकीलों के नाम जज की नियुक्ति के लिए भेजे गए हैं उनमें मोहम्मद अल्ताफ मंसूर, संगीता चंद्रा, रजनीश कुमार, अब्दुल मोईन, उपेंद्र मिश्र, शिशिर जैन, मनीष मेहरोत्रा, आरएन तिलहरी, सीडी सिंह, सोमेश खरे, राजीव मिश्र, अजय भनोट, अशोक गुप्ता, राजीव गुप्ता, बीके सिंह जैसे लोगों के नाम उल्लेखनीय हैं. ये कुछ नाम उदाहरण के तौर पर हैं. फेहरिस्त लंबी है. इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की तरफ से तकरीबन 50 वकीलों के नाम सुप्रीम कोर्ट भेजे गए हैं, जिन्हें जज बनाए जाने की सिफारिश की गई है. इसमें 35 नाम इलाहाबाद हाईकोर्ट के और करीब 15 नाम हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के हैं.

जो नाम भेजे गए हैं उनमें से अधिकांश लोग विभिन्न जजों के रिश्तेदार और सरकारी पदों पर विराजमान वकील हैं. इनमें ओबीसी, अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का एक भी वकील शामिल नहीं है. ऐसे में, खबर के साथ-साथ यह भी जानते चलें कि इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के निर्माण से अब तक के 65 साल में एक भी अनुसूचित जाति का वकील जज नहीं बना. इसी तरह वैश्य, यादव या मौर्य जाति का भी कोई वकील कम से कम लखनऊ पीठ में आज तक जज नियुक्त नहीं हुआ. बहरहाल, ताजा लिस्ट के मुताबिक जो लोग जज बनने जा रहे हैं, उनके विभिन्न जजों से रिश्ते और सरकारी पदों के सत्ताई-छत्र का तफसील भी देखते चलिए.

इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज, जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट, आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और सुप्रीम कोर्ट के जज रहे सगीर अहमद के बेटे मोहम्मद अल्ताफ मंसूर को जज बनाए जाने की सिफारिश की गई है. अल्ताफ मंसूर उत्तर प्रदेश सरकार के मुख्य स्थायी अधिवक्ता (चीफ स्टैंडिंग काउंसिल) भी हैं. इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज रहे अब्दुल मतीन के सगे भाई अब्दुल मोईन को भी जज बनने योग्य पाया गया है. अब्दुल मोईन उत्तर प्रदेश सरकार के एडिशनल चीफ स्टैंडिंग काउंसिल हैं. इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज रहे ओपी श्रीवास्तव के बेटे रजनीश कुमार का नाम भी जज बनने वालों की सूची में शामिल है. रजनीश कुमार उत्तर प्रदेश सरकार के एडिशनल चीफ स्टैंडिंग काउंसिल भी हैं.

इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज रहे टीएस मिश्रा और केएन मिश्रा के भतीजे उपेंद्र मिश्रा को भी जज बनाने की सिफारिश की गई है. उपेंद्र मिश्रा इलाहाबाद हाईकोर्ट के सरकारी वकील हैं. पहले भी वे चीफ स्टैंडिंग काउंसिल रह चुके हैं. उपेंद्र मिश्र की एक योग्यता यह भी है कि वे बसपा नेता सतीश चंद्र मिश्रा के भाई हैं. इसी तरह हाईकोर्ट के जज रहे एचएन तिलहरी के बेटे आरएन तिलहरी और जस्टिस एसपी मेहरोत्रा के बेटे मनीष मेहरोत्रा को भी जज बनने लायक पाया गया है. इनके भी नाम लिस्ट में शामिल हैं. लखनऊ बेंच से जिन लोगों के नाम जज के लिए चुने गए, उनमें चीफ स्टैंडिंग काउंसिल (2) श्रीमती संगीता चंद्रा और राजकीय निर्माण निगम व सेतु निगम के सरकारी वकील शिशिर जैन के नाम भी शामिल हैं.

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे वीएन खरे के बेटे सोमेश खरे का नाम भी जज के लिए भेजा गया है. इसी तरह इलाहाबाद हाईकोर्ट के स्वनामधन्य जज रहे जगदीश भल्ला के भांजे अजय भनोट और न्यायाधीश रामप्रकाश मिश्र के बेटे राजीव मिश्र का नाम भी जजों के लिए अग्रसारित सूची में शामिल है. अंधेरगर्दी की स्थिति यह है कि हाईकोर्ट के जज रहे पीएस गुप्ता के बेटे अशोक गुप्ता और भांजे राजीव गुप्ता दोनों में ही जज बनने लायक योग्यता देखी गई और दोनों के नाम सुप्रीम कोर्ट भेज दिए गए. इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के सिटिंग जज एपी शाही के साले बीके सिंह का नाम भी अनुशंसित सूची में शामिल है. सुप्रीम कोर्ट में उत्तर प्रदेश सरकार के चीफ स्टैंडिग काउंसिल सीडी सिंह का नाम भी जजों के लिए चयनित सूची में शामिल है.

यह मामला अत्यंत गंभीर इसलिए भी है कि जजों की नियुक्ति की यह लिस्ट खुद इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने तैयार की और अपनी संस्तुति के साथ सुप्रीम कोर्ट भेजी. चंद्रचूड़ अब खुद सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीश हैं. उन्हें न्याय के साथ न्याय करने के लिए ही तरक्की देकर सुप्रीम कोर्ट ले जाया गया होगा. जजों की नियुक्ति के लिए भेजी गई संस्तुति ने उनकी न्यायिकता और उन्हें तरक्की देने के मापदंड की न्यायिकता दोनों को संदेह में डाला है. डीवाई चंद्रचूड़ सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे वाईवी चंद्रचूड़ के बेटे हैं.

वकीलों का यह सवाल वाजिब है कि क्या जजों की नियुक्ति के लिए किसी ताकतवर जज का रिश्तेदार होना या एडिशनल एडवोकेट जनरल, चीफ स्टैंडिंग काउंसिल या गवर्नमेंट एडवोकेट होना अनिवार्य योग्यता है? क्या सरकारी वकीलों (स्टेट लॉ अफसर) को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124 और 217 के तहत वकील माना जा सकता है? संविधान के ये दोनों अनुच्छेद कहते हैं कि जजों की नियुक्ति के लिए किसी वकील का हाईकोर्ट या कम से कम दो अदालतों में सक्रिय प्रैक्टिस का 10 साल का अनुभव होना अनिवार्य है. क्या इसकी प्रासंगिकता रह गई है? भेजी गई लिस्ट में ऐसे कई नाम हैं जिन्होंने कभी भी किसी आम नागरिक का मुकदमा नहीं लड़ा. काला कोट पहना और पहुंच के बूते सरकारी वकील हो गए, सरकार की नुमाइंदगी करते रहे और जज के लिए अपना नाम रिकमेंड करा लिया.

वर्ष 2000 में भी 13 जजों की नियुक्ति में धांधली का मामला उठा था, जिसमें आठ नाम विभिन्न जजों के रिश्तेदारों के थे. अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल में कानून मंत्री रहे राम जेठमलानी ने जजों की नियुक्ति के लिए देशभर के हाईकोर्ट से भेजी गई लिस्ट की जांच का आदेश दिया. जांच में पाया गया कि 159 सिफारिशों में से करीब 90 सिफारिशें विभिन्न जजों के बेटों या रिश्तेदारों के लिए की गई थीं. जांच के बाद अनियमितताओं की पुष्टि होने के बाद कानून मंत्रालय ने वह सूची खारिज कर दी थी.

जजों की नियुक्ति में जजों द्वारा ही धांधली किए जाने का मामला बाद में जनेश्वर मिश्र ने राज्यसभा में भी उठाया. इसके जवाब में तब कानून मंत्री का पद संभाल चुके अरुण जेटली ने सदन को आधिकारिक तौर पर बताया था कि औपचारिक जांच पड़ताल के बाद लिस्ट खारिज कर दी गई. उस खारिज लिस्ट में शुमार कई लोग बाद में जज बन गए और अब वे अपने रिश्तेदारों को जज बनाने में लगे हैं. इनमें जस्टिस अब्दुल मतीन और जस्टिस इम्तियाज मुर्तजा जैसे नाम उल्लेखनीय हैं. इम्तियाज मुर्तजा के पिता मुर्तजा हुसैन भी इलाहाबाद हाईकोर्ट में जज थे. अब्दुल मतीन के सगे भाई अब्दुल मोईन को जज बनाने के लिए संस्तुति सूची में शामिल कर लिया गया है.

इस प्रकरण की सबसे बड़ी विडंबना यह रही कि जजों की नियुक्ति में धांधली और भाई-भतीजावाद के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक पांडेय द्वारा दाखिल की गई याचिका खारिज कर दी गई थी और अशोक पांडेय पर 25 हजार का जुर्माना लगाया गया था. जबकि अशोक पांडेय द्वारा अदालत को दी गई लिस्ट के आधार पर ही केंद्रीय कानून मंत्रालय ने देशभर से आई ऐसी सिफारिशों की जांच कराई थी और जांच में धांधली की आधिकारिक पुष्टि होने पर जजों की नियुक्तियां खारिज कर दी थीं.

अशोक पांडेय ने कहा कि जजों की नियुक्ति के लिए भेजी गई मौजूदा लिस्ट में बरती गई अनियमितताओं के खिलाफ उन्होंने फिर से याचिका दाखिल की और फिर हाईकोर्ट ने उस पर कोई गंभीरता नहीं दिखाई. अदालत ने एडवांस कॉस्ट के नाम पर 25 हजार रुपये जमा करने का निर्देश देते हुए कहा कि इसके बाद ही मामले पर सुनवाई की जाएगी. पांडेय चिंता जताते हैं कि संविधान और कानून से जुड़े इतने संवेदनशील मामले को 25 हजार रुपये के लिए अदालत ने लंबित रख दिया है. धांधली की यह सूची प्रधानमंत्री और कानून मंत्री को भेजने के बारे में अशोक पांडेय विचार कर रहे हैं, क्योंकि उनके द्वारा भेजी गई सूची पर ही तत्कालीन कानून मंत्रालय ने वर्ष 2000 में कार्रवाई की थी.

न्याय व्यवस्था को सत्ता-प्रभाव में लाने का चल रहा षडयंत्र

सरकारी वकीलों को जज बना कर पूरी न्यायिक व्यवस्था को शासनोन्मुखी करने का षडयंत्र चल रहा है. सीधे तौर पर नागरिकों से जुड़े वकीलों को जज बनाने की परंपरा बड़े ही शातिराना तरीके से नष्ट की जा रही है. कुछ ही अर्सा पहले अधिवक्ता कोटे से जो 10 वकील जज बनाए गए थे, उनमें से भी सात लोग राजीव शर्मा, एसएस चौहान, एसएन शुक्ला, शबीहुल हसनैन, अश्वनी कुमार सिंह, देवेंद्र कुमार अरोड़ा और देवेंद्र कुमार उपाध्याय उत्तर प्रदेश सरकार के वकील (स्टेट लॉ अफसर) थे. इनके अलावा रितुराज अवस्थी और अनिल कुमार केंद्र सरकार के लॉ अफसर थे.

वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में मान्यता देने में भी भीषण अनियमितता हो रही है. नागरिकों के मुकदमे लड़ने वाले वकीलों को लंबा अनुभव हो जाने के बावजूद उन्हें वरिष्ठ अधिवक्ता की मान्यता नहीं दी जाती, जबकि सरकारी वकीलों को बड़ी आसानी से वरिष्ठ वकील की मान्यता मिल जाती है. कुछ ही अर्सा पहले लखनऊ बेंच के चार वकीलों को वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में मान्यता दी गई, जिनमें चीफ स्टैंडिंग काउंसिल आईपी सिंह, एडिशनल एडवोकेट जनरल बुलबुल घोल्डियाल, केंद्र सरकार के स्टैंडिंग काउंसिल असित कुमार चतुर्वेदी और सार्वजनिक क्षेत्र के विभिन्न उपक्रमों और विश्वविद्यालयों के वकील शशि प्रताप सिंह शामिल हैं. लखनऊ में अनुभवी और विद्वान वकीलों की अच्छी खासी तादाद के बावजूद हाईकोर्ट को उनमें कोई वरिष्ठ अधिवक्ता बनने लायक नहीं दिखता. ऐसे रवैये के कारण वकीलों में आम लोगों के मुकदमे छोड़ कर सरकारी वकील बनने की होड़ लगी हुई है. सब इसके जुगाड़ में लगे हैं और इससे न्याय की मूलभूत अवधारणा बुरी तरह खंडित हो रही है.

जजी भी अपनी, धंधा भी अपना…

जजों के रिश्तेदार जज बन रहे हैं और जजों के रिश्तेदार उन्हीं के बूते अपनी वकालत का धंधा भी चमका रहे हैं. न्याय परिसर में दोनों तरफ से जजों के रिश्तेदारों का ही आधिपत्य कायम होता जा रहा है. जजों के बेटे और रिश्तेदारों की आलीशान वकालत का धंधा जजों की नियुक्ति वाली लिस्ट की तरह कोई चोरी-छिपी बात नहीं रही. यह बिल्कुल सार्वजनिक मामला है. आम लोग भी जजों के रिश्तेदार वकीलों के पास ही जाते हैं, जिन्हें फीस देने से न्याय मिलने की गारंटी हो जाती है.

जजों के रिश्तेदारों की उन्हीं के कोर्ट में वकालत करने की खबरें कई बार सुर्खियां बन चुकी हैं. हाईकोर्ट की दोनों पीठों के दर्जनों नामी-गिरामी जजों के बेटे और रिश्तेदार वहीं पर अपनी वकालत का धंधा चमकाते रहे हैं. इनमें जस्टिस अब्दुल मतीन के भाई अब्दुल मोईन, जस्टिस अभिनव उपाध्याय के बेटे रीतेश उपाध्याय, जस्टिस अनिल कुमार के पिता आरपी श्रीवास्तव, भाई अखिल श्रीवास्तव और बेटे अंकित श्रीवास्तव, जस्टिस बालकृष्ण नारायण के पिता ध्रुव नारायण और बेटा ए. नारायण, जस्टिस देवेंद्र प्रताप सिंह के बेटे विशेष सिंह, जस्टिस देवी प्रसाद सिंह के बेटे रवि सिंह, जस्टिस दिलीप गुप्ता की साली सुनीता अग्रवाल, जस्टिस इम्तियाज मुर्तजा के भाई रिशाद मुर्तजा और नदीम, जस्टिस कृष्ण मुरारी के साले उदय करण सक्सेना और चाचा जीएन वर्मा, जस्टिस प्रकाश कृष्ण के बेटे आशीष अग्रवाल, जस्टिस प्रकाशचंद्र वर्मा के बेटे ज्योतिर्जय वर्मा, जस्टिस राजमणि चौहान के बेटे सौरभ चौहान, जस्टिस राकेश शर्मा के बेटे शिवम शर्मा, जस्टिस रवींद्र सिंह के भाई अखिलेश सिंह, जस्टिस संजय मिश्र के भाई अखिलेश मिश्र, जस्टिस सत्यपूत मेहरोत्रा के बेटे निषांत मेहरोत्रा और भाई अनिल मेहरोत्रा, जस्टिस शशिकांत गुप्ता के बेटे रोहन गुप्ता, जस्टिस शिवकुमार सिंह के बेटे महेश नारायण और भाई बीके सिंह, जस्टिस श्रीकांत त्रिपाठी के बेटे प्रवीण त्रिपाठी, जस्टिस सत्येंद्र सिंह चौहान के बेटे राजीव चौहान, जस्टिस सुनील अम्बवानी की बिटिया मनीषा, जस्टिस सुरेंद्र सिंह के बेटे उमंग सिंह, जस्टिस वेद पाल के बेटे विवेक और अजय, जस्टिस विमलेश कुमार शुक्ला के भाई कमलेश शुक्ला, जस्टिस विनीत शरण के पिता एबी शरण और बेटे कार्तिक शरण, जस्टिस राकेश तिवारी के साले विनीत मिश्रा, जस्टिस वीरेंद्र कुमार दीक्षित के बेटे मनु दीक्षित, जस्टिस यतींद्र सिंह के पिता विकास चौधरी, भतीजा कुणाल और बहू मंजरी सिंह, जस्टिस सभाजीत यादव के बेटे पीपी यादव, जस्टिस अशोक कुमार रूपनवाल की बिटिया तनु, जस्टिस अमर शरण के भतीजे सिकंदर कोचर, जस्टिस अमरेश्वर प्रताप शाही के ससुर आरएन सिंह और साले गोविंद शरण, जस्टिस अशोक भूषण के भाई अनिल और बेटे आदर्श व जस्टिस राजेश कुमार अग्रवाल के भाई भरत अग्रवाल अपनी वकालत का धंधा अपने रिश्तेदार जजों के बूते ही चमकते रहे हैं.

लेखक प्रभात रंजन दीन वरिष्ठ पत्रकार और संपादक हैं. उनका यह लिखा चौथी दुनिया से साभार लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है.

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भास्कर कर्मियों की शिकायत पर हाइकोर्ट ने लेबर कोर्ट के जज अशोक जैन का तबादला किया

Sanjay Saini : भास्कर के कर्मचारियों की शिकायत पर हाइकोर्ट ने लेबर कोर्ट के जज अशोक जैन का तबादला किया। नए जज को लगाया। भास्कर प्रंबधन को नहीं मिली राहत। जज साहब ने आदेश से पहले ही बता दिया था। वो एम्पलाईज के केस करेंगे खारिज। भास्कर के एम्पलाईज में खुशी की लहर।

मजीठिया वेज बोर्ड की खुली लड़ाई लड़ रहे दैनिक भास्कर जयपुर में कार्यरत संजय सैनी के इस एफबी स्टेटस पर वरिष्ठ वकील परमानंद पांडेय की टिप्पणी यूं है….

Parmanand Pandey अगर लेबर कोर्ट के जज ने ऐसा कहा था तो निंदनीय है. हाईकोर्ट ने ठीक किया वरना लोगों का न्याय प्रक्रिया से विश्वास उठ जाएगा. भास्कर कर्मियों को बधाई.

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दिल्ली हाईकोर्ट में जज गीता मित्तल की सीजेआई से शिकायत- ‘लेटलतीफ हैं और काम में रुचि नहीं लेती’

 

(खबर पढ़ने के लिए उपरोक्त न्यूज कटिंग पर क्लिक कर दें)

नई दिल्ली। भारत के मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर से पीड़ित वादियों ने दिल्ली हाईकोर्ट के जज की शिकायत की है। इसमें कहा गया है कि जस्टिस गीता मित्तल मामलों की सुनवाई बहुत धीमी गति से कर रही हैं जिसकी वजह से उनके केस की सुनवाई में देरी हो रही है। पीड़ित वादियों ने दिल्ली हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति गीता मित्तल के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। अप्रैल माह में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों को एक पत्र पहुंचाया गया था जिसमें यह कहा गया था कि सैकड़ों लोगों के केस का न्यायमूर्ति गीता मित्तल की लेटलतीफी और उनके काम में रुचि न लेने की वजह से निस्तारण नहीं हो रहा है।

वादी राम प्रसाद ने आरोप लगाया है कि न्यायमूर्ति गीता मित्तल कोर्ट के काम में रूचि नहीं लेती हैं। वह कोर्ट को उतना समय भी नहीं देतीं, जितना देना चाहिए। कोर्ट में एक घंटे के लिए आती हैं और उसमें भी वह मामलों की सुनवाई न कर वकीलों और वादियों को सामाजिक व्याख्यान देने में गवां देती हैं। जब से वह जज बनी हैं उनके द्वारा निस्तारित मुकदमों की संख्या दिल्ली हाई कोर्ट के सभी जजों की अपेक्षा सबसे कम है। राम प्रसाद के अनुसार गीता मित्तल की काम में रूचि ने लेने की वजह से ही सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश से दखल देने की गुजारिश की है।

मुख्य न्यायाधीश से मांग की गई है कि श्री ठाकुर, न्यायमूर्ति गीता मित्तल के लिए सुनिश्चित करें कि वह कोर्ट में कम से कम पांच घंटे बैठें और मुकदमों के निस्तारण में रूचि लें। पत्र में यह भी लिखा गया है कि जनवरी माह में न्यायमूर्ति गीता की अध्यक्षता में उनकी बेंच ने मात्र 9 मामलों का निस्तारण किया है, जिसमें दो मामले डिसमिस हो गए थे। दो साधारण मामले थे जिनकी सुनवाई की गई। न्यायमूर्ति गीता द्वारा जिन चार मामलों की सुनवाई की गई उनमें एक 10 पेज का, दूसरा 4 पेज का, तीसरा 11 पेज का और चौथा 33 पेज का था। जिन दो मामलों को आदेश देकर निस्तारित किए गए वह दो तीन पेज में ही सिमटे हैं।

कुल मिलाकर पूरे महीने में उन्होंने 63 पेज लिखवाया है। पत्र में यह भी लिखा गया है कि फरवरी माह में मात्र 7 मामलों की निस्तारण हुआ। न्यायमूर्ति गीता द्वारा दिए गए 5 जजमेंट और एक आर्डर का ब्योरा 48 पेज में है। पत्र में जो भी ब्योरा दिया गया है वह दिल्ली हाईकोर्ट की वेबसाइट पर है।

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जिला जज ने हाई कोर्ट से मांगी जून की छुट्टियों में न्यायिक कार्य करने की अनुमति

भारत के मुख्य न्यायाधीश की भावुक अपील पर लिया ऐतिहासिक फैसला

भारत वर्ष में यह अपनी तरह का पहला मामला है जिसमें भदोही जिले के जनपद न्यायाधीश कमल किशोर शर्मा ने उच्च न्यायलय इलाहाबाद से जून की छुट्टियों में भी सिविल कोर्ट्स को खोलने और  काम करने की अनुमति मांगी है जिससे न्यायलय में लंबित पड़े मुकदमों को निपटाया जा सके। इस आशय का एक पत्र लिख कर लोक हित में न्यायिक कार्य करने की अनुमति इलाहाबाद हाई कोर्ट से मांगी है। रजिस्ट्रार जनरल इलाहाबाद हाई कोर्ट को पत्र लिखकर उन्होंने जून की पूरी छुटियों में न्यायिक कार्य करने की अनुमति मांगी है।

उल्लेखनीय है कि भारत के मुख्य न्यायाधीश ने कुछ दिन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने भावुक होकर और लगभग रोते हुए न्यायालयों में लंबित केसों को निपटाने को जजों की नियुक्त करने  की अपील की थी। इसी से प्रभावित होकर इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायाधीशों ने जून की आधी छुट्टियों में काम करने की घोषणा की थी। मुख्य न्यायाधीश की इसी मार्मिक अपील से प्रभावित होकर भदोही के जिला जज कमल किशोर शर्मा ने एक कदम और आगे बढ़ाते हुए ऐतिहासिक फैसला लिया है। इसके लिए उन्होंने खुद आदेश भी किया है परन्तु इसके लिए इलाहाबाद हाई कोर्ट की अनुमति आवश्यक है। जिला जज ने बार एसोसिएशन ऑफ़ भदोही और भदोही के अन्य न्यायाधीशों से भी उनके इस काम में सहयोग करने की अपील की है।

भदोही के जनपद न्यायाधीश कमल किशोर शर्मा ने एटा जिले के जनपद न्यायाधीश पद से भदोही स्थानांतरित होकर पहले ही दिन आज 3 मई 2016 को ऐसा एतिहासिक निर्णय देकर भारतीय न्यायपालिका को भी गौरवान्वित किया है। भारत में न्यायालयों में करोड़ों केसों के लंबित होने के कारण केसों की पेंडेंसी बढ़ती ही जा रही है और ऐसे में केसों का निस्तारण कई कई दशकों तक नहीं हो पा रहा है। ऐसे में पीड़ित को न्याय पाने में दशकों लग जाते हैं और कभी कभी तो पीड़ित की जिंदगी में निर्णय न हो पाने से जस्टिस डिलेड इस जस्टिस डिनाइड की कहावत लागू हो जाती है। ऐसे में पूरे भारत में फ़ास्ट ट्रेक कोर्ट्स संचालित कर के और स्पीडी जस्टिस अभियान चलाकर त्वरित न्याय दिलाने की मुहिम चल रही है।

राकेश भदौरिया
पत्रकार
एटा / कासगंज
मो. ९४५६०३७३४६

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पंजाब केसरी के मालिक विजय चोपड़ा को जज ने दिखाई औकात, कोर्ट रूम से बाहर निकाला

मीडिया के मालिकों की ऐंठन को ठीक करने का काम कई ईमानदार किस्म के न्यायाधीश कर डालते हैं. ऐसा ही एक मामला पंजाब के होशियारपुर का है. यहां गलत खबर छापने के एक मामले में निजी पेशी हेतु आए पंजाब केसरी के मालिक विजय चोपड़ा सीधे कोर्ट रूम में घुस गए. तब जज ने उन्हें फटकारते हुए कोर्ट रूम के बाहर जाने को कहा और आवाज लगने पर ही अंदर आने के आदेश दिए.

बेचारे विजय चोपड़ा. मीडिया मालिक की ऐंठ धरी की धरी रह गई. वे पहले कोर्ट रूप के अंदर गए, डांट खाकर बाहर आए. और, लास्ट में आवाज लगने पर फिर अंदर आए. इस पूरे मामले की खबर पंजाब के एक अखबार दैनिक सवेरा ने विस्तार से प्रकाशित की है. असल में पंजाब केसरी की ब्लैकमेलिंग पत्रकारिता के खिलाफ ही दैनिक सवेरा अखबार अस्तित्व में आया और यह अखबार पंजाब केसरी से संबंधित कोई भी खबर प्रमुखता से प्रकाशित करने से चूकता नहीं है.

दैनिक सवेरा में प्रकाशित खबर की कटिंग पढ़ने के लिए अगले पेज पर जाने हेतु नीचे क्लिक करें>

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मजीठिया पर फैसले की डेट करीब आते ही सुप्रीम कोर्ट के जजों पर उमड़ रहा मीडिया मालिकों का प्रेम

जैसे-जैसे सुप्रीम कोर्ट में मजीठिया मामले पर अंतिम सुनवाई की तिथित नजदीक आती जा रही है, मीडिया मालिकों सर्वोच्च अदालत के जजों के लिए प्रेम उमड़ता जा रहा है।  पिछले दिनो सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति एनवी रमण इनाडु समाचार पत्र के मालिक रामोजी राव के घर अतिथि बन कर पहुंचे थे। अब राजस्थान पत्रिका के मालिक गुलाब कोठारी सुप्रीम कोर्ट के जज अरुण मिश्रा के साथ एक मीडिया सेमीनार को सम्बोधित करने वाले हैं।  

इस सेमीनार का आयोजन वकीलों की संस्था  बार कौन्सिल ऑफ राजस्थान ने 17 -18 अप्रैल को जयपुर मैं किया है। अरुण मिश्रा भी सीनियर जज रंजन गोगई के साथ सुप्रीम कोर्ट की  उस बैंच में शामिल रहे हैं, जिसने सुप्रीम कोर्ट में मजीठिया वेतनमान बोर्ड्स की सिफारिशों और सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागू न करने के खिलाफ याचिका की सुनवाई की थी. 

राजस्थान पत्रिका के मालिक गुलाब कोठारी के खिलाफ पत्रकारों ने सुप्रीम कोर्ट मैं अवमानना की याचिका दायर की है। इस पर सुनवाई चल रही है। अगली तारीख 28 अप्रैल है। गुलाब कोठारी इन दिनो सुप्रीम कोर्ट के जजों के नजदीक रहने का कोई भी मौका तलाशते रहते हैं।  उन्होंने केसीजे अवार्ड समारोह मैं भी सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस आर एम लोढ़ा को बुलाया था। कोठारी को लग रहा है कि ऐसा करके वे जेल जाने से बच जाएंगे। पत्रकारों ने इस तरह के निमंत्रणों की जानकारी सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को दे दी है। 

सुप्रीम कोर्ट के जज इनाडु अखबार के मालिक के समारोह में शामिल

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अजमेर में ट्रेनिंग ले रहे हैं देश के प्रथम नेत्रबाधित न्यायाधीश

अजमेर : बहुत शीघ्र आप एक ऐसी अदालत देखेंगे, जिसके न्यायाधीश नेत्र बाधित होंगे। यहां इन दिनो ब्रम्हानंद शर्मा जज की ट्रेनिंग ले रहे हैं। वह देश के संभवतः पहले नेत्रबाधित न्यायाधीश बनने जा रहे हैं। उनका चयन पिछले दिनों ही राजस्थान न्यायिक सेवा में हुआ है। ब्रम्हानंद उस आखिरी बैच के हैं, जिन्हें राजस्थान लोक सेवा आयोग ने चुना है। अब राजस्थान हाईकोर्ट मजिस्ट्रेटों की भर्ती करेगा।

भीलवाड़ा जिले के आसींद के रहने वाले ब्रम्हानंद शर्मा न्यायाधीश पद के लिए चयनित होने से पहले एक साल भीलवाड़ा कलेक्ट्रेट और उसके बाद करीब सालभर सार्वजनिक निर्माण विभाग में कनिष्ठ लिपिक रहे हैं। 7 अगस्त, 1973 को जन्मे ब्रम्हानंद शर्मा आयु की दृष्टि से अपने बैच में सबसे बड़े ही नहीं, जज्बा भी सबसे अधिक रखते हैं, वह अब ये साबित करने के मोहताज नहीं हैं। 

द्वितीय श्रेणी से सेवानिवृत्त शिक्षक रामस्वरूप शर्मा के बेटे ब्रम्हानंद की ज्यादातर पढ़ाई भीलवाड़ा में हुई। समाज शास्त्र में एमए के बाद उन्होंने भीलवाड़ा के राजकीय विधि महाविद्यालय से एलएलबी भी की। ब्रम्हानंद की पढ़ाई अभी छूटी नहीं है। वे वर्द्धमान महावीर खुला विश्वविद्यालय से बिजनेस मैनेजमेंट में एलएलएम भी कर रहे हैं।

ब्रम्हानंद बताते हैं कि उनके पास एक सॉफ्टवेयर है, जिसमें लिखी या टाइप की  हुई सामग्री को स्कैन कर कम्प्यूटर में अपलोड कर दिया जाता है। सॉफ्टवेयर उस सामग्री को आवाज में बदल देता है। इस तरह वह सुनकर मुकदमे की पूरी फाइल समझ लेंगे। पढ़ाई और परीक्षा की तैयारी भी तो इसी तरह की है। उनका मानना है कि भविष्य में आने वाले ई-कोर्ट उनके लिए वरदान साबित होंगे। 

ये संयोग ही कहा जाएगा कि ब्रम्हानंद शर्मा के रूप में पहले नेत्रबाधित न्यायाधीश अजमेर की उसी अदालत परिसर में हैं, जहां आजादी के पहले देश के पहले नेत्रहीन वकील मुकुट बिहारी लाल भार्गव वकालत किया करते थे। भार्गव देश की संविधान निर्मात्री सभा के एक मात्र नेत्रहीन सदस्य थे और पहली भारतीय संसद के पहले नेत्रहीन सदस्य थे। वे अजमेर के पहले लोकसभा सदस्य चुने गए थे। भार्गव ब्रिटिशकाल में हाईकोर्ट का दर्जा रखने वाली अजमेर-मेरवाड़ा यूनियन प्रोविन्स के ज्यूडिशियल कमिश्नर की अदालत, लंदन की प्रिवी कौंसिल और आजादी के बाद सुप्रीम कोर्ट में भी वकालत किए थे।  

लेखक राजेंद्र हाड़ा अजमरे के जाने-माने वकील और पत्रकार हैं. उनसे संपर्क ”राजेंद्र हाड़ा, 860/8, भगवान गंज, अजमेर- 305 001” या 09829270160 व 09549155160 या rajendara_hada@yahoo.co.in के जरिए किया जा सकता है.

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भास्कर ने शोलापुर से रांची तबादला किया तो हेमंत कोर्ट से स्टे ले आए

भास्कर समूह डीबी कार्प को उसके इंप्लाई हेमंत चौधरी ने तगड़ा सबक सिखाया है. मजीठिया वेज बोर्ड के लिए सुप्रीम कोर्ट जाने वाले भास्कर के मीडियाकर्मी हेमंत चौधरी को प्रबंधन ने प्रताड़ित करना शुरू कर दिया था. सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट उमेश शर्मा के माध्यम से मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर अवमानना याचिका लगाने वाले हेमंत चौधरी का पिछले दिनों भास्कर प्रबंधन ने शोलापुर से रांची तबादला कर दिया.

यह तबादला परेशान करने की नीयत से किया गया था ताकि वह मजबूरन दूर जाकर नौकरी करने की जगह नौकरी से इस्तीफा दे दें या फिर प्रबंधन के कदमों में झुक जाएं और याचिका वापस ले लें. पर हेमंत चौधरी ने झुकने की जगह लड़ना पसंद किया. उन्होंने एडवोकेट उमेश शर्मा की सलाह के बाद एक स्थानीय वकील से स्टे के लिए याचिका तैयार कराई व कोर्ट में लगा दिया. उन्होंने याचिका में सुप्रीम कोर्ट में केस लगाए जाने और केस लगाने पर प्रताड़ित करने के मकसद से तबादला किए जाने का उल्लेख किया. हेमंत ने महाराष्ट्र के इंडस्ट्रियल कोर्ट में याचिका दायर कराई. कोर्ट ने पूरे मामले का गहराई से अध्ययन करने के बाद उनके ट्रांसफर पर स्टे आर्डर दे दिया यानि उनके तबादले पर रोक लग गई है.

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RECOMMENDATIONS TO PM AND CJI FOR REFORMS IN LEGAL SYSTEM IN INDIA

3.4.2015
Hon’ble Mr. Narendra Modi,
Prime Minister of India
New Delhi.

Hon’ble Mr. Justice H.L.Dattu,
Chief Justice of India,
New Delhi.

SUB : RECOMMENDATIONS FOR REFORMS IN LEGAL SYSTEM IN INDIA

Hon’ble Prime Minister and Hon’ble Chief Justice,

The People of India and in particular the legal fraternity have high hopes and aspirations from the Prime Minister who is leading a single party government which was formed for the first time in thirty years and the Chief Justice of India who has had a distinguished judicial tenure contributing to a fair and efficient administration of justice. We demand the following reforms from your goodself:

1.   There should be financial independence of the Judiciary at all levels. There is an immediate need for improvement of infrastructure of the judiciary. Lack of it also results in delay in disposal of cases. Presently, the Judiciary has to look for approvals of the State for financial support. This is infraction of the basic structure of the Constitution of India which provides for independence of judiciary.

2.   In the National Judicial Appointments Commission, the two “eminent personalities” are to be nominated by a committee comprising of the Prime Minister, Chief Justice of India and Leader of Opposition in the Lok Sabha. It is suggested that the eminent personalities should not be lawyers, or relatives of any Judge or practising lawyer. This is required so that the nominated members can work impartially, without any bias and influence of any kind. Implementation of the proverb that ‘Justice should not only be done but should manifestly and undoubtedly be seen to be done’ must promptly be ensured.

3.   There should be proportionate representation, on the basis of population, of all States at the Supreme Court. It has been observed that presently there are three judges from State of Maharashtra (110 million population) and only one from the State of Uttar Pradesh (200 million population), even though the population of State of Uttar Pradesh is nearly two times of the population of State of Maharashtra. There is only one judge from each state of Bihar (100 million population), West Bengal (90 million population), Gujarat (60 million population). There is no judge from Rajasthan (68 million population), Chattisgarh (25 million population) or Himachal Pradesh (6 million population).

4.   No retired Judge should be appointed in any Tribunal or Commission. Only sitting Judges should be appointed to such posts. To enable appointment of sitting judges in the Tribunals and Commissions, the sanctioned posts of judges should be increased suitably. The age of retirement of the Judges should also be increased in the following manner:

From 65 years to 68 years of age in case of the Judges of the Supreme Court.

From 62 years to 65 years of age in case of the Judges of High Courts.

To 62 years of age in case of the Judges of District Courts.

5.   Promotion of Judges from the District Courts to the High Court and from the High Courts to the Supreme Court should be done only on the basis of seniority. If any Judge is not found suitable of being promoted to the higher Court, that judge should not be allowed to continue as a Judge and should be removed from his position.

6.   There should be four benches of the Supreme Court across India i.e., in East, West, North-East and South. It will aid in implementing the policy of the government to provide justice at doorstep of litigant. Judges of the Supreme Court whose relatives are practising in the Supreme Court may be posted at a bench where the relative is not practicing. This shall ensure an unbiased judicial system.

7.   The system of appointing the Chief Justice of any particular High Court from another State should also be put to an end. It has been observed that the Chief Justices of High Courts coming from other States do not make just and proper administrative decisions as they are usually unaware of the local and social affairs of the Bar, and of the ability and reputation of the local lawyers. They have to be totally reliant on the local Judges of the particular High Court.

8.   All court proceedings should be videographed. The video recording of a case should be preserved in the judicial file of the case. Judges, lawyers and litigants, who are all part of the judicial system, will then take the court proceedings more seriously and sincerely. There will be greater transparency and it will curb filing of false complaints against judges and lawyers. It will also deter the lawyers from baselessly arguing before appellate Courts that a particular point was argued before the Court but was not discussed by it in its decision. It will also lead to reduction in filing of false and frivolous appeals.

9.   There should be live broadcast of the proceedings of all Courts on the website of that court. Persons interested in cases can watch the proceedings without visiting court complexes.

10.  There should be appointment of local lawyers as adhoc judges in the district courts done by the inspecting high court judge of the district in consultation with the District and Session Judge, since the appointment procedure of regular judges is long-drawn and time consuming.

11.  To be eligible to practice as a lawyer, judicial clerkship of one year should be made mandatory. The judicial clerks should be made a payment of Rs. 25,000 per month. This will not only train them to be successful lawyers but also assist judges in their work.

We are of the view that for the reforms in the judicial system to be effective, it is imperative that all reforms are brought in force at the same time and not one after another.

We assure you, that if our above said suggestions are accepted, the image of India would be enhanced in the mind of  people of this country, but also the in the mind of foreign investors.

With regards,

Yours faithfully,
(Dr. Adish C Aggarwala)
Chairman, All India Bar Association
Mobile :+(91) 9958177904, 9868510674

CC : Hon’ble Mr. D.V. Sadananda Gowda, Minister of Law &
Justice;
Hon’ble Judges of Supreme Court of India;           
Hon’ble Chief Justice of all High Courts in India;
Hon’ble Judges of all High Courts in India

for kind consideration.
Dr. Adish C. Aggarwala, Senior Advocate
President, International Council of Jurists (www.internationaljurists.org)
President, International Commission of Writers (www.internationalwriters.org)
Chairman, All India Bar Association (allindiabar.org)
Chairman, India Legal Information Institute (www.indlii.org)
Special Counsel for Government of India (www.lawmin.nic.in)
Advisor, Adish Aggarwala Law Chambers (www.aalc.com)
Ex. Vice-Chairman, Bar Council of India (www.barcouncilofndia.org)
Ex. Chairman, Bar Council of Delhi (www.delhibarcouncil.com)
Ex. Senior Additional Advocate General of Govt. of Haryana (www.haryana.gov.in)
Ex. Additional Advocate General of Govt. of Punjab (www.punjabgovt.gov.in)
Ex. Additional Advocate General of Govt. of Uttar Pradesh (www.up.nic.in)
Ex. Additional Advocate General of Govt. of Tamil Nadu (www.tn.gov.in)
Ex. Vice-President, Supreme Court Bar Association (www.scbaindia.org)
email: adishaggarwala@yahoo.com, international.jurists6@gmail.com
UK Tele:  +(44) 20-81335686
UK Fax :  +(44) 20-77991687
UK Mobile:  +(44) 785 4740880
India Mobile : +(91) 9868510674, 9910063501, 9958177904
Skype ID : adishcaggarwala
adishaggarwala13@gmail.com

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NDTV’s involvement in 2G scam: Former CJI asks for CBI probe

India Rejuvenation Initiative, a committee led by former Chief Justice of India R.C. Lahoti has asked Prime Minister Narendra Modi for a CBI probe into NDTV’s involvement in the 2G scam. India Rejuvenation Initiative is an Indian anti-corruption organization formed by a group of retired and serving bureaucrat.

Its important objectives are:

To interact with and support honest civil servants, whistleblowers.

To mobilize public opinion for ensuring that public representatives remain accountable.

To scrutinize public policies for flaws which contribute to corruption or protect vested interests.

Promotion and strengthening of decentralized governance.

Do regular interaction with the youth.

One of the members ex-Chief Justice of India Justice R.C. Lahoti in July 2010, protested the ineffectiveness of the CVC in protecting whistleblowers. With its strong presence in many states, it has emerged as a front runner organization to bring back probity in public life.

(साभार- Scribd)

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If you want to be judge, please do not have a live in relationship : Markandey Katju

Markandey Katju : Live in Relationship as a disqualification for Judgeship! I was Acting Chief Justice of Allahabad High Court, and Chief Justice of Madras and Delhi High Courts. In these High Courts I had to recommend names of lawyers for appointment as Judges of the High Court. In one of these 3 High Courts (I will not mention which, to avoid identification of the persons concerned) I got a good impression of a certain middle aged male lawyer who appeared several times before me, and always argued his cases well.

He had a very good knowledge of law and was very competent and courteous. I was thinking of getting his name recommended for Judgeship of the High Court. However, at that time a senior colleague of mine spoke to me alone and advised me not to do so. I asked him why? He said it was because that male lawyer was having a live in relationship with a lady lawyer to whom he was not married. They were often seen openly going to parties, functions and restaurants together. Due to this advice I dropped the idea of recommending the name of that lawyer for Judgeship of the High Court.

Many people with whom I discussed this afterwards (without disclosing any names) thought that what I did was not right. After all, live in relationship is a private affair, and if the person concerned was competent, why should he not be appointed as a Judge? My reply was that while I myself am fairly modern, Indian society is largely still conservative, and largely still does not approve of live in relationship, though it is not illegal.. While lawyers can have live in relationship, it is as yet not ethically permissible to Judges. So if you want to be judge, please do not have a live in relationship.

रिटायर न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू के फेसबुक वॉल से.

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लाला लाजपत राय को भाजपाई पटका पहनाने के मामले में कोर्ट ने किरण बेदी के खिलाफ कार्रवाई का ब्योरा मांगा

किरण बेदी अपनी मूर्खताओं, झूठ, बड़बोलापन और अवसरवाद के कारण बुरी तरह घिरती फंसती जा रही है. पिछले दिनों नामांकन से पहले किरण बेदी ने स्वतंत्रता सेनानी लाला लाजपत राय की प्रतिमा को भगवा-भाजपाई पटका पहना दिया. इस घटनाक्रम की तस्वीरों के साथ एक कारोबारी सुरेश खंडेलवाल ने दिल्ली हाईकोर्ट के जाने-माने वकील हिमाल अख्तर के माध्यम से किरण बेदी को कानूनी नोटिस भिजवाया फिर कोर्ट में मुकदमा कर दिया. इनका कहना है कि लाला लाजपत राय किसी पार्टी के प्रापर्टी नहीं बल्कि पूरे देश के नेता रहे हैं. ऐसे में किसी एक पार्टी का बैनर उनके गले में टांग देना उनका अपमान है.

इस मामले में दायर मुकदमें को संज्ञान लेने हुए आज कोर्ट ने पुलिस को किरण बेदी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई के संबंधि में पूछा है कि पुलिस ने क्या क्या किया है अब तक, इस बारे में रिपोर्ट पेश करे. सुनवाई की अगली तारीख 18 फरवरी है. उपर कोर्ट का आदेश है. नीचे पूरे मामले से संबंधित तस्वीर, अखबारी कटिंग, कंप्लेन और लीगल नोटिस का प्रकाशन किया जा रहा है. इस मामले में किसी अन्य जानकारी के लिए वरिष्ठ वकील हिमाल अख्तर से संपर्क उनके मोबाइल नंबर 09810456889 के जरिए किया जा सकता है.

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‘फरिश्‍ता’ के लेखक ने फिल्‍म ‘पीके’ पर किया साहित्‍य चोरी का मुकदमा

‘‘मैंने 1 जनवरी, 2015 को पीके फिल्‍म देखी तो मैं हैरान हो गया। पीके फिल्‍म मेरे उपन्‍यास फरिश्‍ता की कट /कॉपी /पेस्‍ट है।’’ –कपिल ईसापुरी

अपने इन शब्‍दों में लेखक कपिल ईसापुरी काफी मर्माहत दिखते हैं। प्रेस कॉन्‍फेरेंस कर अपना दर्द बयान करते हैं। लेकिन मीडिया में एक कहावत बहुत प्रसिद्ध है- लिखता कोई है, दिखता कोई और है, बिकता कोई और है। इस कहावत का व्‍यावहारिक रूप प्रसिद्ध लेखक निर्देशक बी आर इसारा विविध भारती को दिए एक साक्षात्‍कार में इस प्रकार समझाते हैं- ‘‘कम चर्चित साहित्‍यकारों के साहित्‍य की चोरी फिल्‍मी दुनिया में खूब होती है। जब मैं फिल्‍मी दुनिया में आया था। मुझसे कम चर्चित उर्दू साहित्‍यकारों का साहित्‍य पढ़वाया जाता और उसको तोड-मरोड़ कर इस्‍तेमाल कर कर लिया जाता।’’

इस तरह की साहित्‍यिक चोरी बड़े-बड़े लेखक, निर्देशक और निर्माता तक करते हैं। हाल में आयी ब्‍लॉकबलस्‍टर फिल्‍म पीके पर भी उपन्‍यासकार कपिल ईसापुरी ने अपने उपन्‍यास ‘फरिश्ता’ से कन्टेंट चुराने का आरोप लगाया है। एक लेखक के लिए उसके साहित्‍य की चोरी सबसे बड़ी क्षति ही नहीं, बल्‍कि उसके लिए अहसनीय दर्द होता है। उसके विचारों की चोरी उसके लिए संवैधानिक अधिकारों का हनन होता है। ‘‘मैंने चार जनवरी को फिल्‍म लेखक संघ, मुबई में ईमेल से शिकायत दर्ज की। लेकिन वहां से पांच जनवरी को मुझे ईमेल से नकारात्‍मक उत्‍तर मिला। फिर मैंने कोर्ट में जाने का फैसला किया’’ 

दिल्‍ली हाई कोर्ट में याचिका दायर कर कपिल ईसापुरी ने आरोप लगाया है कि उनके उपन्‍यास ‘फरिश्‍ता’ से कन्टेंट चुराया गया है। ‘‘साल 2013 में छपे अपने उपन्यास ‘फरिश्‍ता’ में मैंने तथाकथित धर्मगुरुओं की अंधभक्ति की आलोचना की है। मैंने उपन्‍यास में इस बात विशेष जोर दिया है कि धर्म का पेशा प्राकृतिक नहीं बल्कि मानव निर्मित और कृत्रिम है।’’ किसी साहित्‍यिक कृति का मूल विचार चुराकर केवल भाषा और शैली बदलकर एक नया साहित्‍य गढ़ने का धंधा शातिर लोग अक्‍सर करते रहते हैं।

‘‘फिल्म के जरिए उठाए गए विभिन्न मुद्दे मेरी किताब में से कॉपी किए गए हैं। उपन्यास में कई और भी ऐसे दृश्‍य  हैं, जिनमें मामूली बदलाव और अनावश्‍यक परिवर्तन करके पीके में इस्‍तेमाल किया गया है।’’

वकील ज्योतिका कालरा की मदद से दायर की गई याचिका में लेखक ने पीके फिल्‍म के निर्माता विधु विनोद चोपड़ा, निर्देशक राज कुमार हिरानी, स्क्रिप्ट राइटर अभिजीत जोशी और अभिनेता आमिर खान को कठघरे में खड़ा किया है। अपने उपन्‍यास से सत्रह दृश्‍य चुराने का आरोप लगाया है। जिसमें दृश्‍य, संवाद और विषयवस्‍तु शामिल है।                                                  

जस्‍टिस नाजमी वजीरी ने फिल्म के निर्माता विधु विनोच चोपड़ा, निर्देशक राज कुमार हिरानी, उनकी फिल्‍म निमार्ण कंपनी, पटकथा लेखक अभिजीत जोशी और अभिनेता आमीर खान से 16 अप्रैल से पहले दिल्‍ली हाई कोर्ट के जॉइंट रजिस्ट्रार के सामने अपना पक्ष रखने को कहा है।  लगभग 600 करोड़ कमाने वाली पीके के निर्माताओं से लेखक ने एक करोड़ रुपये के मुआवजे के साथ-साथ अपने काम के लिए श्रेय की भी मांग की है। कपिल ईसापुरी ने इंजिनियरिंग और पत्रकारिता की पढ़ाई की है।   

अमलेश प्रसाद की रिपोर्ट.

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दिल्ली की भरी कोर्ट में जज को 50 वकीलों ने धमकाया

दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट में करीब 50 वकीलों ने जज को धमकाया और सुनवाई करने से रोका। जज ने वाकया आर्डर में लिखकर जिला जज को कॉपी भेजी है। दिल्ली एवं जिला क्रिकेट संघ (डीडीसीए) के आपसी विवाद पर डाली गई एक याचिका की सुनवाई के दौरान डीडीसीए के कोषाध्यक्ष रविन्द्र मनचन्दा की तरफ से जिला बार संघ ने ये हंगामा किया।

मनचन्दा पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के ओएसडी रहे हैं और आरोप है कि इनके इशारे पर ही वकीलों ने कोर्ट में ये हंगामा किया। जज ने अपने आर्डर में सब कुछ विस्तार से लिखा है। इसे पढ़ने पर पूरा माज़रा स्पष्ट हो जाता है। चर्चा है कि ये आर्डर मीडिया के सामने भी लाया जा चुका है लेकिन कुछ प्रभावशाली लोगों ने मीडिया को भी मैनेज कर लिया है। आर्डर की कापी भड़ास के पास है जिसे यहां प्रकाशित किया गया है।

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दूरदर्शन ने फिर से ओम थानवी को बुलाना शुरू कर दिया

Om Thanvi : मुद्दत बाद आज दूरदर्शन के कार्यक्रम में गया। चुनाव के नतीजों पर चर्चा थी। बीच में पहले भी कई बार बुलावा आया, पर मना करता रहा। आज तो और चैनलों पर भी जाना था। फिर भी अधिक इसरार पर हो आया। जाकर कहा तो वही जो सोचता हूँ! बहरहाल, पता चला कि कोई सरकारी निर्णय बुलाने न-बुलाने को लेकर नहीं रहा, कोई अधिकारी समाचार प्रभाग में आईं जो अपने किसी लाभ के लिए नई सरकार को इस तरह खुश करने की जुगत में थीं कि भाजपा या नरेंद्र मोदी के आलोचकों को वहां न फटकने दें!

Om Thanvi : रजत शर्मा की अदालत को इक्कीस साल हो गए, उन्हें बधाई। उनके जलसे के वक्त बाहर था, अभी उसकी रेकार्डिंग देखने को मिली चैनल पर। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, नेता-अभिनेता सब नामी लोग थे। मजेदार अदालत होती है, आयोजन भी मनोरंजक था। रजत शर्मा अच्छा बोले। दिल से। नरेंद्र मोदी भी, जो बहुत सहज और ईमानदार थे: बोले चुनाव के दौर में हुई बातचीत उनके लिए बहुत मददगार रही। बहरहाल, रजत ने सबको याद किया, मगर अपने कार्यक्रम की तीसरी अहम कड़ी जजों का जिक्र करना शायद भूल गए। आप जानते हैं वहां जनता सामने होती है और इधर ‘वकील’ और ‘मुजरिम’ के बाद तीसरा बड़ा पात्र ‘जज’ होता है, जो बेचारा घंटे भर से ज्यादा की जिरह सुनते-सुनते कान खुजाने लगता है। आठ-दस बार मैं ही ‘जज’ की नाटकीय भूमिका कर आया हूँ – अन्ना हजारे, अरविन्द केजरीवाल, शरद यादव, लालू प्रसाद यादव, फ़ारुख़ अब्दुल्ला, शत्रुघ्न सिन्हा … सिन्हा ने तो मेरे ‘फैसले’ (कि अब नेतागीरी में अभिनेता का अंदाज छोड़ो!) की तत्कालीन उपराष्ट्रपति भैरोंसिंह शेखावत से दोस्ताना शिकायत कर डाली थी! जो हो, हिंदी टीवी संसार में मनोरंजन भरी गुफ्तगू के इस लम्बे और बेहद सफल सिलसिले की रजत शर्मा को बधाई! मैंने महज ‘लंबी अवधि’ के कार्यक्रम और उसकी ‘सफलता’ की बधाई दी है। सफलता में क्या शक जो पूरा चैनल ही खड़ा हो गया। बाकी रजत शर्मा की राजनीति, रणनीति क्या रहती है हम सब जानते हैं। चैनल के ‘योगदान’ पर मैं पहले लिख चुका हूँ। अब वहां जाता भी नहीं हूँ। अदालत के लिए मनोरंजन शब्द एकाधिक बार जान-बूझ कर लिखा है। पीछे की बात नरेंद्र मोदी की टिप्पणी में ही उजागर है। मनोरंजन के साथ इस ‘खेल’ के लिए भी अदालत को जब-तब देखता हूँ – भले अब वहां जाने से सदा इनकार करता हूँ और करता रहूँगा। खासकर अपने मित्र ख़ुर्शीद अनवर पर चैनल की गैर-जिम्मेदार भूमिका देखने के बाद मन और भी क्षुब्ध रहा है। फिर भी कार्यक्रम देखा तो बधाई दे दी, इसे बस अपनी दरियादिली समझिए। जज के नाते तो कभी फिक्स नहीं अनुभव किया। कभी फैसले से खेल बिगाड़ भी आया। बाकी फिक्सिंग या प्रयोजन विशेष में स्वैच्छिक प्रस्तुति को देखकर ही समझा जा सकता है। जज कौन हो यह भी तो आखिर वही तय करते हैं। जजी में कोई दखल नहीं होता। पर जज तय तो वही करते हैं। कभी-कभी “मुजरिम” भी कर लेता है। हरियाणा के एक मुख्यमंत्री अपनी पसंद का जज चंडीगढ़ से लिवा लाए थे, यह मैं निजी तौर पर जानता हूँ – मुख्यमंत्रीजी ने खुद बताया था।

वरिष्ठ पत्रकार और जनसत्ता अखबार के संपादक ओम थानवी के फेसबुक वॉल से.

मूल पोस्ट…

मोदी राज आने के बाद ओम थानवी को परिचर्चा के लिए नहीं बुलाता दूरदर्शन

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जस्टिस मार्कंडेय काटजू का मजाकिया बयान हाईकोर्ट के जज साहब पर भारी पड़ गया!

Markandey Katju : In a divorce case I was hearing in the Supreme Court I said orally in lighter vein “If you want happiness in life do whatever your wife tells you to do. If she tells you to turn your head to the left, turn it left. If she tells you to turn it right, turn in right. Don’t ask the reason. Just do it.”

In the evening I saw this statement being flashed on many T.V. screens, and the next day in the newspapers. There was a lot of discussion on it thereafter among people, and in the media.

An Allahabad High Court Judge, who is well known to me, telephoned me the next day complaining that his wife, who was ordinarily very obedient to him, has revolted, saying that you are only a High Court Judge, but this ruling has come from the Supreme Court, and now you have to listen to me.

A senior Supreme Court lawyer (who is my friend, and a former Acting Chief Justice of Patna High Court) said in my Court “Aapne har ghar mein jhagda karwa diya”

This is the danger of speaking in lighter vein!

चर्चित जज रहे और इन दिनों प्रेस काउंसिल आफ इंडिया के चेयरमैन के रूप में कार्यरत मार्कंडेय काटजू के फेसबुक वॉल से.

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हाईकोर्ट जज ने लीगल मैग्जीन छापने वाले विनय राय और राजश्री राय समेत पूरे संपादकीय व प्रकाशन स्टाफ को भेजा लीगल नोटिस

राजश्री राय और विनय राय एक मैग्जीन निकालते हैं. लीगल मामले की इस मैग्जीन में दिल्ली हाईकोर्ट के एक जज के बेटे के खिलाफ खबर छापी गई. जज ने इसे संज्ञान लिया और खबर को पूरी तरह गलत, निराधार और बेहूदा बताते हुए मैग्जीन के समस्त स्टाफ को लीगल नोटिस भेजा है. दिल्ली पुलिस कमिश्नर को आदेश दिया है कि मैग्जीन को जब्त कर लिया जाए और इसके वितरण को रोका जाए. अपने आठ पेज के आदेश में जज ने झूठी स्टोरी को लेकर अपनी सफाई देते हुए न्यायपालिका की गरिमा का हवाला दिया है और कहा है कि मनगढ़ंत खबर छापकर उनकी और उनके परिवार की छवि तो धूमिल किया जा रहा है.

मैग्जीन का प्रकाशन ई एन कम्युनिकेशन प्राइवेट लिमिटेड नामक कंपनी के बैनर तले होता है जिसके डायरेक्टर विनय राय हैं और मैनेजिंग डायरेक्टर राजश्री राय हैं. मैग्जीन के प्रधान संपादक इंद्रजीत बधवार, मैनेजिंग एडिटर रमेश मेनन, डिप्टी मैनेजिंग एडिटर शोभा जान, सीनियर एडिटर विश्वास कुमार, कांट्रीब्यूटिंग एडिटर गिरीश निकम, एसोसिएट एडिटर मेहा माथुर, डिप्टी एडिटर प्रबीर बिश्वास, असिस्टेंट एडिटर सोमी दास, सब एडिटर आर पार्वती, फोटोग्राफर अनिल शाक्य हैं. इन सभी लोगों को लीगल नोटिस जज की तरफ से भेजा गया है. साथ ही मैग्जीन को प्रकाशित करने वाले राजू सरीन और ग्राफिक्स आदि के काम देखने वाली कंपनी को भी लीगल नोटिस भेजा गया है. जज ने इन सभी को कोर्ट के आपराधिक अवमानना का दोषी बताया है.

पूरी खबर टाइम्स आफ इंडिया में प्रकाशित हुई है, जो इस प्रकार है….

HC judge slaps contempt charge against legal magazine

Dhananjay Mahapatra, TNN, Oct 27, 2014

NEW DELHI: Taking strong exception to a legal news magazine’s “mischievous and outrageous allegations” against his son, a Delhi high court judge has initiated contempt proceedings against the entire editorial staff of the periodical and gagged both print and electronic media from circulating the ‘false’ story.

In his October 10 order, the judge said: “On enquiry from my son, I have been informed that the club has been given licence by the company (sic) in favour of M/s Enriched Reality Developers Pvt Ltd vide licence deed dated March 6, 2014 and my son is in no way connected with the said club in any capacity or in any manner whatsoever.”

The magazine had alleged that because the judge’s son had a stake in the said club, it operated beyond the scheduled closure time in the night without inviting any penal action from police.

In the order, the judge said: “In the light of the above, I am of the considered view that the publishing house namely E N Communication Pvt Ltd, Rajashri Rai (managing director) for E N Communications Pvt Ltd, Vinay Rai (director), Inderjit Badhwar (editor-in-chief), Ramesh Menon (managing editor), Shonha John (deputy managing editor), Vishwas Kumar (senior editor), Girish Nikam (contributing editor), Meha Mathur (associate editor), Prabir Biswas (deputy editor), Somi Das (assistant editor), R Parvathy (sub-editor), Anil Shakya (photographer), Cirrus Graphics Pvt ltd and Raju Sarin (publisher) have committed gross criminal contempt of court.

“Accordingly, I issue notices to all the aforesaid persons… Since I have issued notices of criminal contempt against the noticee (respondents), the matter shall be placed before the roster bench dealing with criminal contempt after obtaining orders from the Chief Justice.”

“With a view to prevent any further onslaught on my image and the image of judiciary, I direct the respondents to stop publishing and circulating the said edition forthwith”, he said.

“I also direct the commissioner of police to immediately seize and confiscate the entire stock of this edition from all offices of the aforesaid publishing house whether located in Delhi or elsewhere as per the information given in the magazine itself and from the printing press of Cirrus Graphics Pvt Ltd, publishers on behalf of E N Communications Pvt Ltd,” he ordered.

“I also direct that no news containing this matter shall be published, appear, transmitted, communicated or aired in any manner or whatsoever in the print media or the electronic media or worldwide web/internet, emails, blogs and etc,” he said.

On the content of the report in the magazine, the judge said: “It is beyond my comprehension to gauge as to what objectives and at whose motivation and agenda such a scandalous, defamatory article has been published, but that there is no doubt in my mind that one of the objective appears to be to damage, discredit me and my family and above all to bring into disrepute the judiciary as a whole for some ulterior motives. Such an irresponsible, reckless and contemptuous article is bound to shatter the faith of the common man in the administration of justice,” he said in his eight-page order.

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एक करोड़ नहीं दिया तो हाई कोर्ट जज नहीं बने?

भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश आर एम लोढ़ा द्वारा कोलेजियम व्यवस्था की जबरदस्त वकालत करने के सन्दर्भ में आईपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर ने नए मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिख कर न्यायिक नियुक्ति प्रक्रिया में अपेक्षित पारदर्शिता लाने का निवेदन किया है ताकि प्रत्येक व्यक्ति यह जान सके कि दूसरों की तुलना में किसी एक की नियुक्ति क्यों हुई है. कोलेजियम व्यवस्था के मौजूदा अपारदर्शी ढंग के खतरों को दर्शाने के लिए उन्होंने सुरेन्द्र कुमार श्रीवास्तव, तत्कालीन जिला जज, भदोही का उदाहरण प्रस्तुत किया है जिनसे हाई कोर्ट में प्रोन्नति हेतु कोलेजियम के एक सदस्य द्वारा कथित रूप से एक करोड़ रुपये मांगे गए थे. यह घटना अक्टूबर 2011 से फ़रवरी 2012 के दौरान की थी.

श्री ठाकुर के अनुसार जिला जज के सगे छोटे भाई प्रमोद श्रीवास्तव, जो उस समय उनके साथ रूल्स एवं मैनुअल्स कार्यालय लखनऊ में तैनात थे, ने उन्हें समय-समय पर इस मांग, उनके भाई द्वारा इसे पूरा करने के भरपूर प्रयास तथा मांग और उनके द्वारा जमा की जा सकी धनराशि में भारी अंतर के कारण उनके असफल होने के बारे में विस्तार से बताया था. श्री ठाकुर ने अपने पत्र में कहा है कि अब अवकाशप्राप्त श्री श्रीवास्तव कभी हाई कोर्ट जज नहीं बन सके थे. इन तथ्यों को प्रस्तुत करते हुए उन्होंने मुख्य न्यायाधीश से इन्हें सत्यापित कराये जाने और न्यायिक नियुक्ति प्रणाली में पर्याप्त पारदर्शिता लाने की प्रार्थना की है ताकि भविष्य में ऐसे किसी कथित दुरुपयोग की सम्भावना समाप्त हो जाये.

To,
The Hon’ble Chief Justice of India,
Supreme Court of India,
New Delhi- 110001

Subject- Presenting certain facts and a particular incidence related with the Collegium system of appointment of Judges

Sir,

I am Amitabh Thakur, an IPS Officer of UP Cadre. I also work in the field of transparency and accountability in public life on my personal level. I am writing this letter to Your Lordship in my personal capacity as a citizen of this Nation to bring forth certain extremely important points to your kind notice.

Recently outgoing Chief Justice of India Hon’ble Sri R M Lodha is said to have strongly defended the collegium system of appointment of judges, saying any other mode of appointment may impact on the independence of judiciary. As per the PTI report published in various newspapers, he is said to have said that “judges are best equipped to judge the suitability of candidates before appointment” and-“I feel and it is my view that if appointment to higher or superior judiciary is made through other institution or body where persons other than judges are involved, it may impact the independence of judiciary. That is my view”. He also said- “My view on the issue is Judges are best equipped to adjudge the suitability of a person or candidate as the judges of the superior court because as judges we know all about their court craft, behaviour, skill, legal knowledge and other aspects. So there cannot be a better equipped person than a judge who watches them.”

I do agree with the statements made by Hon’ble Sri Lodha on the larger context that higher judiciary must play an important and pivotal role in appointment of judges because as aptly stated, functioning judges have a much better opportunity and chance to know all about the court craft, behaviour, skill, legal knowledge and other aspects of the prospective judges.

But as a citizen of this nation, I hold equally strong views that the Collegium system got into criticism because it lacked two basic concepts of good governance- transparency and accountability, which led the law-making authority, the Parliament of India, to come up with the National Judicial Appointments Commission Bill, 2014. The way the functioning and decisions of the Collegium system were kept closely guarded secret had definite possibilities of being misused. This must have been the reason for the Department-related Parliamentary Standing Committee on Personnel, Public Grievances, Law and Justice, formed to study the Judicial Appointments Commission Bill, 2013 to say-“13. The present process adopted by the collegium of judges is beset with its own problem of opacity and non-accountability”, “16. The Committee also came across with the suggestions where some of the witnesses had expressed that the collegium was not transparent and accountability was not inbuilt” and “The present collegium which has been evolved through judicial decisions in 90s has received criticism especially from retired Chief Justices and judges for failing to attract outstanding people in legal fraternity to the Bench of higher judiciary” 

The appointment process through the Collegium system is so secret that most of the people never come to know of its happening but when posted at Lucknow as SP, Rules and Manuals, UP between October 2011 and August 2013, I personally came to know of a small part of its supposed misuse through Sri Pramod Srivastava, who was the Head Clerk in the Rules and Manuals office.

During my posting there, one day Sri Srivastava came to me and said that he wanted to go out with his elder brother who was District Judge, Bhadohi at that time. I gave Sri Srivastava permission to go out. When he came back, he was visibly chirpy. On his own, he started telling me that his brother’s name was also being considered for the post of High Court Judge for which he had to give money to a member of the High Court Collegium. He told me that he had gone with his brother to accompany him as a support person because his brother, the District Judge, had to arrange and move with huge amount of money. He told me that he had accompanied his brother in the car to the Collegium member’s house which to the best of my remembrance, he told as being either in Raj Bhawan Colony or somewhere in Gomtinagar in Lucknow.  He told me that elevation to the post of High Court Judge was such a giant leap in stature that despite being personally against the idea of giving money for such promotion, his brother was being forced to adopt this route due to societal pressure.

Since I had nothing personally to do with the matter and at that given time, I could not even dare to think of intervening in that matter in any possible manner considering the fact that at that time, like everyone else, I also regarded the member of Higher judiciary as being extremely powerful and completely invincible. Hence I kept the matter with myself.

The next day Sri Srivastava again sought permission to go out which I granted him. This time when he came back, he was rather somber. When asked he told me that some hiccups had developed in the matter and the deal was not getting forged because of the huge gap between the money being asked and the money his elder brother was able to manage. He told me that his brother could manage certain amount he had been previously told through great efforts, including taking loans from different quarters. Now the increased demand was beyond his capacity and he was thinking of dropping the idea of continuing in this race.

I don’t remember the exact amount of money being talked in the deal which to the best of my remembrance was Rs. One crore, while all that the District Judge was being able to manage through all possible means was a much lesser amount.

I remained interested in knowing the outcome and kept Sri Pramod Srivastava asking about what happened in his brother’s case but he seemed to be losing interest in the matter very fast and whenever I asked him about this matter, he would only talk of destiny. Later I also forgot the matter and remember it suddenly yesterday (27/09/2014) when I read the statements of the outgoing Chief Justice of India about the inevitability of the Collegium system.

Since I had lost his contact number and had never known the exact name of Sri Srivastava’s elder brother, I contacted a colleague from Rules and Manuals office through whom I got to know that the Judge’s name was Sri S K Srivastava and he was now posted at Chitrakoot. I personally talked to Sri Pramod Srivastava on his phone number 094528-24386 at around 1 PM on 27/09/2014 specifically about his brother. I asked him what happened to his brother’s elevation to the High Court to which Sri Srivasatava told me that it never materialized and his brother has retired as a District Judge. I talked of the money matter he discussed with me at that time, to which Sri Srivastava seemed least interested and he barely said that yes, those things had come up at that time but now it is an old issue and has lost all the relevance. He told me that now his brother was posted in some Forum in Chitrakoot but he did not know more details about his posting. He also told me that presently he and his brother were not on good terms because of some family matter.

I searched the website of Bhadohi District Court (http://districtcourts.nic.in/ecourts/Allahabad/Bhadohi/Bhadohi.php ) to find that at Serial No 14 is placed Sri Surendra Kumar Srivastava who remained its District and Session Judge between 03/05/2011 and 29/02/2012. I remained SP, Rules and Manuals between 12/10/2011 and 27/08/2013. Hence the incidence being narrated must have taken place between 12/10/2011 and 29/02/2012, though I don’t remember the exact date.

I make it very clear before Your Lordship that every word I have written here is true to the best of my knowledge and remembrance and I can be held squarely liable for each of my words, which I state with utmost responsibility. Simultaneously, I also accept that whatever I have written here are based solely on the words of Sri Pramod Srivastava but I do tend to completely believe in his words because I still remember the tenor and authenticity of his voice all through the episode. I fully remember the genuineness of his happiness and sense of pride on the first day when he saw his brother’s elevation as High Court Judge so very near. I equally remember the helplessness and dejection of his voice and mannerisms when he felt the elevation sliding from his brother’s hand because of his inability to provide the money being demanded. These human emotions, these gestures and mannerisms were so natural and spontaneous that I can never doubt their authenticity till the end of my life. At the same time, it is also true that I never had any talks with his brother, nor did Sri Srivastava ever tell me the name of the member of the Collegium. Hence, every other possibility, including Sri Pramod Srivastava telling me a concocted story (though its possibility being very remote), some middleman using this situation without the concurrence or knowledge of the member of the Collegium etc cannot be completely ruled out.

I present all the above facts for Your Lordship’s kind consideration and personal deliberation in larger public interest to take whatsoever appropriate steps Your Lordship may think appropriate in the background of the stated facts and circumstances, including an enquiry into the alleged incidence, if thought purposeful for making the entire judicial selection process even more accountable and transparent and to overcome any malaise or improprieties that may have cropped in, knowingly or unknowingly, in the process.

Simultaneously I also pray before Your Lordship to introduce at your end the principle of transparency in the judicial selection process, whether undertaken through the present Collegium system or through the proposed National Judicial Appointment Commission in the future, because as the Judicial maxim goes-“Justice shall not only be done, it shall seem to be done” and hence introducing transparency and making everyone know why a particular person got selected as a Hon’ble High Court or Hon’ble Supreme Court Judge in advantage to everyone person allegedly or supposedly in the fray, will only help strengthen the people’s confidence in this selection process, thereby further enhancing the credibility of the Higher Judiciary.

I am willing to undertake an unconditional apology if there is anything in this letter which Your Lordship feels improper because the purpose of writing this letter is not to hurt any person’s or authority’s feelings but only to help in the betterment of the system.

Lt No- AT/Collegium/01                                                                           
Dated- 28/09/2014                                                                                               Regards
Yours

Amitabh Thakur),
                                                                                                                5/426, Viram Khand,
                                                                                                                Gomti Nagar,
                                                                                                                Lucknow
                                                                                                                # 94155-34526
                                                                                                                amitabhthakurlko@gmail.com

Judges are better equipped to appoint judges: Outgoing CJI R M Lodha

PTI Sep 26, 2014

NEW DELHI: In a parting shot, outgoing Chief Justice of India R M Lodha today strongly defended the collegium system of appointment of judges, saying any other mode of appointment may impact on the independence of judiciary.

He said judges are best equipped to judge the suitability of candidates before appointment.

“I feel and it is my view that if appointment to higher or superior judiciary is made through other institution or body where persons other than judges are involved, it may impact the independence of judiciary. That is my view,” Justice Lodha said while interacting with reporters a day before he demits the office as CJI.

“My view on the issue is Judges are best equipped to adjudge the suitability of a person or candidate as the judges of the superior court because as judges we know all about their court craft, behaviour, skill, legal knowledge and other aspects. So there cannot be a better equipped person than a judge who watches them,” he said.

Justice Lodha strongly recommended that there should be two years “cooling off” period before a retired CJI and judges of higher judiciary take up any constitutional post or government assignment.

“This is again a very personal view. I hold the view that the CJI, judges of the Supreme Court, Chief Justice of High Courts and judges of High Courts should not accept any constitutional position or assignment with government. There should be a cooling off period of two years,” he said.

However, he clarified that because of requirement of appointments in some tribunals and quasi-judicial bodies, statutes require the appointment of judges and that has to continue unless the Acts or statutes are amended or some other method is to be found.

Justice Lodha brushed aside the suggestion that he is in the fray to become country’s first Lokpal.

“It is absolutely wrong” was his terse reply to a question. He said first priority for him was “to enjoy freedom” from the work which he devoted for over 21 years.

He made it clear that he will not take any constitutional post or government assignment and “spend time on himself”.

When asked whether he has the same opinion that CBI is a “caged parrot”, Justice Lodha avoided direct answer and said “a judge is not a caged parrot but looks for freedom and I am getting freedom”.

Responding to a question on whether he faced any political pressure during his tenure at the apex court, Justice Lodha said, “You call it a divine blessing during 21 years and nine months of my career never ever any sort of such thing directly or indirectly or in whatever form happened. I was never approached or recall anything which interfered in my judicial work”.

Further, he said criticism about judiciary encroaching upon the domain of executive has to be taken in the right spirit as “for a strong democracy it is very good that you have a strong executive and some friction is a good sign of democracy”.

He said that it is good if “we have strong legislature, executive and judiciary” and different organs should not encroach into the domains of others.
He said that there is zero tolerance on allegation of sexual harassment within judiciary and there is a mechanism in place to deal with such cases.

He, however, accepted that the mechanism to deal with allegation against judges is not visible to be seen but it is working and “even one is not accepted”.

However, the CJI expressed his sadness that lawyers bodies and many others could not understand properly his suggestion for making the courts functional throughout 365 days. He said modalities could have been worked out by seeing examples in other sectors like medical etc.

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