पुन्य प्रसून जी, आपके बिना ‘आजतक’ सूना-सूना नजर आ रहा है

पुण्य प्रसून बाजपेयी के नाम एक दर्शक का खत….

पुन्य प्रसून बाजपेयी जी,

‘आज तक’ आपके बिना सूना सूना नजर  लग रहा है… रोजाना सुबह से रात तक बस एक ही प्रोग्राम का इंतजार रहता था, आपके ‘दस्तक’ का… बेबाक अंदाज, बेखौफ वर्णन, सच्चाई और निष्पक्षता से युक्त आपका कार्यक्रम जो सुनने-देखने के दौरान सीख-जान पाता था, उसे अब मिस कर रहा हूं… वो अब नहीं दिख रहा.. पत्रकारिता का अनुभव मुझे कम है, लेकिन इतना तो जानता हूं कि आप चाटुकारिता नहीं करते और इसी का हर्जाना आपको देना पड़ा…..

आप गुरू हो और शायद वो गुरू, जो अपने शिष्य को गिरने पर उठाता नहीं है…… बल्कि मेहनत करते हुए देखता है और उठते हुए देखना पसंद करता है…..सुना है आप एबीपी  न्यूज़ जा रहे हैं, लेकिन आपको एक बात की जानकारी दे दूं, कि मेरे घर में भी और आस पास के घरों में भी आपको सभी लोग जानते हैं.. जब रात के ठीक 10 बजते है, तो सभी ’10तक’ के इंतजार में टीवी के आगे बैठ जाते थे…

आपकी आवाज जब घर के किसी शख्स के कानों में जाती, तो वो खबर देखने के लिए आ जाते थे…. अब आप जहां भी जाएं, यकीनन आपके शो को देखने वाले आपको तलाश ही लेंगे… आपके कार्यक्रम की लोकप्रियता कम न होगी, चाहें आप जिस चैनल पर आएं… टीआरपी के दौड़ में पागल हुए जा रहे चैनलों के बीच आपका शो अपने समय, समाज, सत्ता और सरोकार को पूरी संवेदनशीलता के साथ सामने रखता है… उम्मीद है नई जगह भी आपकी टीआरपी उतनी ही आएगी, जितनी की आज तक में ’10तक’ के कार्यक्रम के जरिए आती थी….

धन्यवाद!

आपका एक प्रशंसक…

JP Sharma

jpsharma7723@gmail.com

मूल खबर….

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

LETTER TO RAMAN RAHEJA

शायद स्पोर्ट्स फ़्लैशेज़ के संस्थापक और सीईओ रमन रहेजा से बकाया पैसे के लिए मीडियाकर्मी ने लिखा पत्र… पढ़ें….

प्रिय रमन रहेजा,

मैं पिछले 10 महीनों से अपनी 32 दिनों की सैलरी और 7 महीने के कटे हुए TDS के पैसों के लिए न जाने कितना मेल और फ़ोन किया होगा, पर आप जैसे महान इंसान के पास समय कहां है जो फ़ोन या मेल चेक कर पाएं। यहां तक कि आपके एडमिन हेड लहिरी जी और एचआर पायल भी दुनिया के सबसे बड़े मीडिया हाउस में अपने कर्मचारियों के लिए इतने व्यस्त रहते हैं कि किसी को समय ही नहीं मिल पाता। इसलिए मैंने सोचा कि मुझ जैसे टटपूंजिए पत्रकारों की आवाज़ भड़ास के ज़रिए आपको एक चिट्ठी लिखी जाए, तब शायद आपकी नज़र भी इस चिट्ठी पर पड़ जाए।

रमन जी, मैं मानता हूं कि आप बहुत बड़े दिग्गज हैं जिसने कभी वर्ल्ड कबड्डी लीग की शुरुआत की थी, लिहाज़ा आपके लिए कुछ हज़ार या लाख रुपयों की क्या बिसात। लेकिन महोदय, हम जैसे छोटे पत्रकारों के लिए ये मेहनत की कमाई होती है और इससे ही हम अपने परिवार का पेट चला पाते हैं। अगर 32 दिनों की सैलरी आप 10 महीनों में भी न दें तो सोच सकते हैं हमारा क्या हाल होगा। उपर से आपके विश्वव्यापी संगठन में जितने महीने काम किए उसमें भी हर महीने TDS के नाम पर अच्छी ख़ासी रक़म काट कर मिलती थी और कहा गया कि ये TDS कट रहा है और सरकार को जमा कर दिया जाएगा, ताकि आप रिटर्न फ़ाइल में क्लेम कर सकें। लेकिन आप और आपके अकाउंट हेड बेचारे इतने व्यस्त रहते थे कि सरकार को भी जमा करने का समय नहीं मिल पाया। लेकिन सरकार थोड़े ही आपकी तरह व्यस्त रहती है उसने तो मुझपर ही धोखाधड़ी और झूठ का आरोप मढ़ दिया कि आप कहते हैं कि TDS कटता है लेकिन ऐसा तो कुछ नहीं है।

जब मैंने इन बातों को आपसे और आपकी एच आर, और एडमिन हेड लहिरी जी से साझा किया तो पहले तो मुझे तारीख़ पर तारीख़ मिली, लेकिन चूंकि मैं सैयद हुसैन हूं सनी देओल नहीं इसलिए धैर्य से ही काम लिया। पर अक्तूबर 2017 के बाद से फ़ोन उठाना भी आपकी ओर से बंद, मेल का भी कोई जवाब नहीं, मैं समझ गया कि आप लोग बड़े इंसान हैं और व्यस्त रहते हैं। चूंकि ये कंपनी बेहद बड़ी और दुनिया की उतकृष्ठ है लिहाज़ा सोशल मीडिया पर काफ़ी सक्रिय रहती है, आए दिन कंपनियों की उपलब्धियों की आसमान छूती फ़ेहरिस्त से लिंक्डइन से लेकर फ़ेसबुक और ट्विटर भरा पड़ा रहता था। मैं समझ गया था कि बड़े लोग इन्हीं जगहों पर व्यस्त रहते हैं इसलिए मैंने भी अपनी बात आपके कानों तक पहुंचाने के लिए सोशल मीडिया का सहारा लिया।

जिसका फ़ायदा भी हुआ, और वह ये कि मुझे जवाब आया और वह भी रमन जी आपका ही। मैं ख़ुश हुआ क्योंकि महोदय आपने मुझे न सिर्फ़ अपनी तरफ़ से बल्कि पुलिस का भी साथ दिलाने की बात कही। उनके मेल की स्क्रीन शॉट भी आप नीचे देख सकते हैं, जिसमें आप ने ही रमन जी लिखा था कि साइबर क्राइम का केस कर चुका हूं आप पर और अब पुलिस ही इस पर करेगी। रमन जी, दुनिया की कोई भी अदालत शायद ऐसी नहीं होगी जो कर्मचारी को अपना पैसा मांगने की बजाए सज़ा दे। बहरहाल, मैं मुंबई में हूं वरना लेबर कोर्ट का सहारा तो मैं भी ले सकता था।

महोदय, अगर यहां इस चिट्ठी पर नज़र पड़ी हो तो आपसे निवेदन है कि अपनी व्यस्तता में से थोड़ा सा समय निकालते हुए अब महीनों से चली आ रही परेशानी का समादान करें। क्योंकि कुछ ही दिनों में ये साल में बदल जाएगी, मैं तो छोटा मोटा पत्रकार हूं लिहाज़ा मेरी इतनी बिसात भी नहीं कि कुछ कर सकूं न ही मेरा कोई साथ देगा क्योंकि साथ देने वालों पर पैसा ख़र्च करने के लिए पैसे भी नहीं है। इसलिए आपसे ही गुज़ारिश है विश्वव्यापी संगठन के दिग्गज संस्थापक साहब कि अब मेरी मानसिक परेशानियों को समझिए, मैं नहीं चाहता कि लेबर कोर्ट मेरी परेशानियों में टांग अड़ाए वरना 32 दिन की सैलरी और 7 महीनों के TDS के साथ साथ वह इसमें ख़ामोख़ां मानसिक प्रताड़ना की भी मेहनत का इज़ाफ़ा कर देगा।

उम्मीद है कि इस प्लेटफ़ॉर्म के ज़रिए विश्वव्यापी मीडिया हाउस के सबसे व्यस्त लोगों में से एक तक ये चिट्ठी ज़रूर पहुंच जाएगी।

शुक्रिया

सैयद हुसैन

एक छोटा मोटा पत्रकार

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

भंसाली को स्वरा की चिट्ठी… आपकी फिल्म देखकर ख़ुद को मैंने महज एक योनि में सिमटता महसूस किया

प्रिय भंसाली साहब,

सबसे पहले आपको बधाई कि आप आखिरकार अपनी भव्य फिल्म ‘पद्मावत’- बिना ई की मात्रा और दीपिका पादुकोण की खूबसूरत कमर और संभवतः काटे गए 70 शॉटों के बगैर, रिलीज करने में कामयाब हो गए. आप इस बात के लिए भी बधाई के पात्र हैं कि आपकी फिल्म रिलीज भी हो गई और न किसी का सिर उसके धड़ से अलग हुआ, न किसी की नाक कटी. और आज के इस ‘सहिष्णु’ भारत में, जहां मीट को लेकर लोगों की हत्याएं हो जाती हैं और किसी आदिम मर्दाने गर्व की भावना का बदला लेने के लिए स्कूल जाते बच्चों को निशाना बनाया जाता है, उसके बीच आपकी फिल्म रिलीज हो सकी, यह अपने आप में बहुत बड़ी बात है. इसलिए आपको एक बार फिर से बधाई.

आप इसलिए भी बधाई के हकदार हैं, क्योंकि आपके सभी कलाकारों- प्रमुख और सहायक, ने गजब का अभिनय किया है. और बेशक, यह फिल्म किसी अतिभव्य, आश्चर्यचकित करनेवाले नजारे की तरह थी. लेकिन बात यह भी है कि हर चीज पर अपनी छाप छोड़ देनेवाले आपके जैसे शानदार फिल्म निर्देशक से यही उम्मीद की ही जाती है. बहरहाल सर, हम दोनों एक दूसरे को जानते हैं. मुझे नहीं पता कि आपको यह याद है या नहीं, लेकिन मैंने आपकी फिल्म गुजारिश  में एक छोटा सा किरदार निभाया था. ठीक-ठीक कहूं, तो उसमें मेरी भूमिका दो दृश्यों की थी. मुझे याद है कि मेरे संवादों को लेकर मेरी आपसे एक छोटी सी बातचीत हुई थी और आपने संवादों को लेकर मेरी राय पूछी थी.

मुझे याद है कि मैं एक महीने तक इस बात पर गर्व महसूस करती रही कि संजय लीला भंसाली ने मुझसे मेरी राय पूछी थी. मैंने एक दृश्य में आपको जूनियर कलाकारों को और दूसरे में जिमी जिब ऑपरेटर को शॉट की बारीकी के बारे में उत्तेजित होकर समझाते हुए देखा. और मुझे याद है, उस समय मेरे मन में ख्याल आया था- ‘वाह, यह आदमी अपनी फिल्म की छोटी सी छोटी बारीकी की वास्तव में परवाह करता है.’’ मैं आपसे काफी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकी थी.

मैं आपकी फिल्मों के उत्साही दर्शकों में से हूं और जिस तरह से आप अपनी हर फिल्म से अपने ही बनाए गए मानकों को और ऊपर उठाते हैं और जिस तरह से आपके समर्थ निर्देशन में सितारे जानदार, गहरे अभिनेताओं में तब्दील हो जाते हैं, वह बात मुझे आश्चर्यचकित करती है. यादगार प्रेम कहानी कैसी होनी चाहिए, इसको लेकर मेरे विचारों को गढ़ने में आपकी भूमिका रही है. मैं उस दिन का सपना देखा करती थी जब आप मुझे किसी फिल्म के मुख्य किरदार के तौर पर निर्देशित करेंगे. मैं आपकी फैन थी और फैन हूं.

और मैं आपको यह बताना चाहूंगी कि मैंने वास्तव में आपकी फिल्म के लिए लड़ाई लड़ी. उस समय जब इसे पद्मावती  से ही पुकारा जा रहा था. मैं बताना चाहूंगी कि मैंने लड़ाई के मैदान में तो नहीं लेकिन ट्विटर टाइमलाइन पर लड़ाई जरूर लड़ी, जहां ट्रॉल्स से मेरा झगड़ा हुआ, लेकिन फिर भी मै आपके लिए लड़ी. मैंने टीवी कैमरा के आगे वे बातें कहीं, जो मुझे लग रहा था कि आप 185 करोड़ रुपये फंसे होने के कारण नहीं कह पा रहे थे. यहां इसका प्रमाण हैः

और मैंने जो कहा, उस पर पूरी सच्चाई के साथ यकीन किया. मैंने पूरी सच्चाई के साथ यह यकीन किया कि और आज भी करती हूं कि इस देश के हर दूसरे व्यक्ति को वह कहानी कहने का हक है, जो वह कहना चाहता है और जिस तरह से कहना चाहता है. वह अपनी नायिका के पेट को जितना चाहे उघाड़ कर दिखा सकता है और ऐसा करते उन्हें अपने सेटों को जलाए जाने का, मारपीट किए जाने, अंगों को काटे जाने, जान जाने का डर नहीं सताएगा.

साथ ही, साधारण शब्दों में कहें, तो लोगों के पास फिल्म बनाने और उसे रिलीज करने की क्षमता बची रहनी चाहिए और बच्चों के सुरक्षित तरीके से स्कूल जाने पर कोई आंच नहीं आनी चाहिए. और मैं चाहती हूं कि आप यह जानें कि मैं सचमुच चाहती थी कि आपकी फिल्म को जबरदस्त कामयाबी मिले. यह बॉक्स ऑफिस पर कामयाबी के सारे रिकॉर्ड तोड़ दे. इस फिल्म की कमाई अपने आप में करणी सेना के आतंकवादियों और उससे सहानुभूति रखनेवालों के चेहरे पर किसी तमाचे की तरह होती. और इसलिए काफी उत्साह और काफी पूरी गर्मजोशी के साथ मैंने पद्मावत के पहले दिन के पहले शो का टिकट बुक कराया और अपने पूरे परिवार और कुक को साथ लेकर फिल्म को देखने गई.

शायद फिल्म के साथ इस जुड़ाव और इस सरोकार के कारण ही इसे देखने के बाद मैं सन्न रह गई. और शायद इसी कारण मैं आपको आजाद होकर लिखने का दुस्साहस कर रही हूं. मैं अपनी बात सीधे और संक्षेप में कहने की कोशिश करूंगी, वैसे तो कहने के लिए काफी कुछ है.

-सर, बलात्कार होने के बाद भी स्त्री के पास जिंदा रहने का अधिकार है.
-पतियों और उनकी यौनिकता के पुरुष रक्षकों, स्वामियों, नियंत्रकों… चाहे जिस रूप में आप पुरुष को देखना चाहें..की मृत्यु के बाद भी स्त्री को जीने का अधिकार है.
-पुरुष जीवित हों या न हों, स्त्रियों को इस तथ्य से स्वतंत्र होकर जीने का अधिकार है.
-स्त्री के पास जिंदा रहने और मासिक धर्म का अधिकार है.

यह वास्तव में काफी बुनियादी बात है. कुछ और बुनियादी बिंदु इस तरह हैं:

-स्त्रियां चलती-फिरती, बतियाती योनियां नहीं हैं.
-हां, स्त्रियां योनियां धारण करती हैं, मगर वे इससे कहीं ज्यादा हैं. इसलिए उनके पूरे जीवन को योनि से बाहर रखकर, उसे नियंत्रित करने, उसकी हिफाजत करने और उसका रख-रखाव करने से बाहर रखकर देखे जाने की जरूरत है. (हो सकता है कि 13वीं सदी में ऐसा होता रहा हो, लेकिन 21वीं सदी में ऐसे विचारों का अनुसरण करने की हमे कोई जरूरत नहीं है. और हमें इसका महिमामंडन तो निश्चित तौर पर नहीं करना चाहिए.)
-यह अच्छा होता अगर योनियों का सम्मान किया जाता, मगर अगर दुर्भाग्यपूर्ण तरीके से ऐसा न हो, तो भी स्त्रियां अपना जीवन जी सकती हैं. उन्हें सजा के तौर पर इस कारण मृत्यु देने की जरूरत नहीं है कि दूसरे व्यक्ति ने उसकी मर्जी के खिलाफ उसकी योनि का अपमान करने की जुर्रत की.
-योनि के बाहर भी जिंदगी है इसलिए बलात्कार के बाद भी एक जीवन हो सकता है. (मुझे मालूम है कि मैं यह दोहरा रही हूं, लेकिन इस पर जितना जोर दिया जाए, कम है.)
-सामान्य शब्दों में कहें, तो जीवन में योनि के अलावा भी काफी कुछ है.

आप यह सोच कर परेशान हो रहे होंगे कि आखिर मैं इस तरह से योनि में ही क्यों अटक गई हूं… क्योंकि सर, आपकी भव्य फिल्म को देखने के बाद मुझे योनि जैसा होने का एहसास हुआ. मुझे ऐसा लगा कि मैं महज एक योनि में सीमित कर दी गयी हूं. मुझे ऐसा लगा कि पिछले कई वर्षों में स्त्रियों और स्त्री आंदोलनों ने जो ‘छोटी-मोटी’ सफलताएं अर्जित की हैं, जैसे, वोट देने का अधिकार, संपत्ति के स्वामित्व का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, समान काम के लिए समान वेतन का अधिकार, मातृत्व अवकाश, विशाखा फैसला, बच्चे को गोद लेने का अधिकार, ये सारी सफलताएं निरर्थक थीं क्योंकि हम घूम फिर कर बुनियादी सवाल पर पहुंच गए हैं.

हम सब जीवन के अधिकार के बुनियादी सवाल पर पहुंच गए हैं. मुझे ऐसा लगा कि आपकी फिल्म ने हमें अंधकार युग के इस सवाल पर पहुंचा दिया है- क्या स्त्री- विधवा, बलत्कृत, युवा, बूढ़ी, गर्भवती, नाबालिग… को जिंदा रहने का अधिकार है? मैं यह समझती हूं कि जौहर और सती हमारे सामाजिक इतिहास का हिस्सा हैं. ये वास्तविकताएं हैं. मैं यह समझती हूं कि ये सनसनीखेज, डरावनी, नाटकीय घटनाएं हैं, जिन्हें भड़कीले और सम्मोहक दृश्यों में ढाला जा सकता है खासकर अगर इसे आपके जैसे सधे हुए फिल्मकार द्वारा परदे पर उतारा जाए. लेकिन, फिर 19वीं शताब्दी में हत्यारे श्वेत गिरोहों द्वारा अश्वेतों को पीट-पीटकर मार देने का दृश्य भी इसी तरह से सनसनीखेज, डरावनी और नाटकीय सामाजिक घटनाएं थीं. क्या इसका मतलब यह है कि किसी को नस्लवाद की कुरूप सच्चाई को ध्यान में रखे बगैर ही इस विषय पर फिल्म बना देनी चाहिए? या ऐसी फिल्म बना देनी चाहिए, जिसमें नस्लीय नफरत पर कोई टिप्पणी न हो? इससे भी खराब बात कि क्या किसी के गर्म खून, शुद्धता और शौर्य के प्रतीक के तौर पर पीट-पीटकर जान ले लेने को महिमामंडित करनेवाली कोई फिल्म बनानी चाहिए- मुझे नहीं पता है. मेरे लिए यह समझ से परे है कि आखिर कोईऐसे जघन्य अपराध को कैसे महिमामंडित कर सकता है?

सर, मेरा यह पक्का यकीन है कि आप इस बात से इत्तेफाक रखते होंगे कि सती और जौहर की प्रथा महिमामंडित किए जाने की चीजें नहीं हैं. यकीनन, आप इस बात से इत्तेफाक रखते होंगे कि प्रतिष्ठा, त्याग, शुद्धता के चाहे जिस आदिम विचार के कारण स्त्री और पुरुष ऐसी परंपराओं में शामिल होते हैं, मगर सती और जौहर- स्त्री खतने और आॅनर किलिंग की ही तरह गहरे तक पितृसत्तात्मक, स्त्री विरोधी और समस्या से भरे विचारों में डूबा हुआ है. यह वह मानसिकता है, जो यह मानती है कि किसी स्त्री का मूल्य उसके योनि में निहित है, जो यह मानती है कि अगर स्त्रियों पर किसी पुरुष मालिक का नियंत्रण नहीं है या उनके शरीरों को अगर किसी ऐसे पुरुष के स्पर्श या यहां तक कि नजरों से, जिसे समाज ने स्त्री पर स्वामित्व जताने या नियंत्रित करने का अधिकार नहीं दिया है, अपवित्र कर दिया गया हो, तो स्त्री जीवन मूल्यहीन है.

सती, जौहर, स्त्री खतना, ऑनर किलिंग आदि की प्रथाओं को महिमामंडित नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि ये सिर्फ स्त्री से समानता का अधिकार नहीं छीनती हैं, बल्कि, ये किसी स्त्री से उसका व्यक्तित्व भी छीन लेती हैं. वे स्त्रियों को मानवता से रिक्त कर देती हैं. वे स्त्रियों से जीवन का अधिकार छीन लेती हैं. और यह गलत है. हम यह मानकर चल सकते थे कि 2018 में इन बातों पर बात करने की भी जरूरत नहीं होनी चाहिए, लेकिन ऐसा लगता है, इसकी जरूरत बनी हुई है. यकीनन आप स्त्री खतना और ऑनर किलिंग का महिमामंडन करनेवाली फिल्म बनाने पर विचार नहीं करेंगे.

सर, आप कहेंगे कि मैं राई का पहाड़ बना रही हूं. आप कहना चाहेंगे कि मुझे फिल्म को इसके संदर्भ में देखना चाहिए. आप कहेंगे कि ये 13वीं सदी के लोगों के बारे में कहानी है. और 13वीं सदी में जीवन ऐसा ही था- बहुविवाह स्वीकृत था. मुसलमान जानवरों जैसे थे, जो मांस और स्त्री का भोग समान चाव से करते थे. और इज्जतदार महिलाएं खुशी-खुशी अपने पतियों की चिताओं में कूद जाया करती थीं और अगर वे पति के दाह-संस्कार में नहीं पहुंच पाती थीं, तो वे एक चिता तैयार करती थीं और इसमें छलांग लगा देती थीं. आप कहेंगे कि हकीकत में वे सामूहिक आत्महत्या के विचार को इतना पसंद करती थीं कि वे अपने दैनिक साज-श्रृंगार के दौरान इसके बारे में हंसते हुए बातें किया करती थीं. ऐसा संभव था, आप मुझसे कहेंगे.

नहीं सर, अपनी क्रूर प्रथाओं के साथ 13वीं सदी का राजस्थान बस उस महाकाव्य की ऐतिहासिक रंगमंच है, जिसका रूपांतरण आपने अपनी फिल्म पद्मावत में किया है. लेकिन, आपकी फिल्म का संदर्भ 21वीं सदी का भारत है; जहां देश की राजधानी में एक पांच साल की बच्ची का बच्ची के साथ चलती बस के भीतर सामूहिक दुष्कर्म किया गया. उसने अपने सम्मान के अपवित्र हो जाने के कारण खुदकुशी नहीं की. बल्कि सर वह अपने छह बलात्कारियों के साथ लड़ी. उसकी इस लड़ाई में इतनी ताकत थी, कि उनमें से एक दरिंदे ने एक लोहे की छड़ उसके गुप्तांग के भीतर घुसा दी. वह सड़क पर पड़ी मिली, जहां उसकी अंतड़ियां तक बाहर आ गई थीं. यह ब्यौरा देने के लिए मैं माफी चाहूंगी, लेकिन सर, आपकी फिल्म का वास्तविक ‘संदर्भ’ यही है.

आपकी फिल्म के रिलीज होने से एक सप्ताह पहले, एक 15 वर्षीय दलित लड़की के साथ हरियाणा के जींद में बर्बरतापूर्व सामूहिक दुष्कर्म किया गया. यह अपराध खौफनाक तरीके से निर्भया दुष्कर्म से मिलता-जुलता था. आपको यह भली-भंति पता है कि सती और स्त्री के साथ बलात्कार, एक ही मानसिकता के दो पहलू हैं. एक बलात्कारी, स्त्री को नियंत्रित करने के लिए, उस पर वर्चस्व स्थापित करने के लिए या उसके अस्तित्व को मिटा देने के लिए उसके जननांगों पर हमला करने और उसका अनादर करने, उसे क्षत-विक्षत कर देने की कोशिश करता है.

सती-जौहर पर अगर-मगर करनेवाला या उसका कोई समर्थक स्त्री के अस्तिव को ही पूरी तरह मिटा देने की कोशिश करता है, अगर उसके जननांगों का अनादर किया गया हो, या फिर वे उसके ‘वैध’ पुरुष मालिक के नियंत्रण में नहीं रह जाते. दोनों ही स्थितियों में प्रयास और विचार यही होता है कि किसी स्त्री को उसके जननांगों में ही सीमित कर दिया जाए. किसी भी कला का संदर्भ वह समय और स्थान होता है, जहां/जब उसका निर्माण और उपभोग किया जाता है. यही कारण है कि सामूहिक दुष्कर्म से पीड़ित यह भारत, बलात्कारों की अनदेखी करनेवाली मानसिकता, पीड़ित पर ही दोष मढ़नेवाला समाज ही आपकी फिल्म का असली संदर्भ है. सर, निश्चित तौर पर अपनी फिल्म में सती और जौहर की कोई आलोचना पेश कर सकते थे.

आप यह कहेंगे कि आपने फिल्म की शुरुआत में एक डिस्क्लेमर दिया था, जिसमें यह कहा गया था कि फिल्म सती या जौहर का समर्थन नही करती है. ये बात सही है, लेकिन आपने इसके बाद 2 घंटे 45 मिनट तक आप राजपूती आन-बान-शान, चिता में जल कर मर जाने का रास्ता चुननेवाली सम्माननीय राजपूत स्त्रियों के साहस का जयगीत सुनाते रहे. ये स्त्रियां अपने पतियों के अलावा किसी दुश्मन द्वारा छुए जाने, जो संयोग से मुस्लिम थे, की जगह चिता में जल कर मर जाने का रास्ता चुनती हैं. तीन बार से ज्यादा आपकी कहानी के अच्छे चरित्रों ने सती/जौहर को एक सम्मान के लायक विकल्प बताया.

आपकी नायिका, जो सुंदरता और बुद्धि का साक्षात उदाहरण है, अपने पति से जौहर करने की इजाजत मांगती है, क्योंकि वह उसकी इजाजत के बगैर यह भी नहीं कर सकती थी. इसके ठीक बाद, उसने सत्य और असत्य, धर्म और अधर्म के बीच युद्ध को लेकर एक लंबा भाषण दिया और सामूहिक सती को सत्य और धर्म के रास्ते के तौर पर पेश किया. और उसके बाद क्लाइमेक्स में, जिसे बेहद भव्य तरीके से फिल्माया गया है, देवी दुर्गा की तरह लाल रंग के कपड़ों में सजी सैकड़ों स्त्रियां जौहर की आग में छलांग लगा देती हैं.

दूसरी तरफ एक उन्मादी मुस्लिम मनोरोगी खलनायक उनकी ओर देखता रहता है और पीछे से एक फड़कता हुआ संगीत बजता है, जिसमें किसी राष्ट्रगान जैसी शक्ति है- इस दृश्य में दर्शकों को अचंभित कर देने और इस खेल का प्रशंसक बना देने की क्षमता थी. सर, अगर यह सती और जौहर का महिमामंडन करना नहीं है, तो मुझे सचमुच नहीं पता कि आखिर किस चीज को ऐसा कहा जाएगा?

मुझे आपकी फिल्म का क्लाइमेक्स देखते हुए, गर्भवती महिलाओं और छोटी बच्ची को आग में कूदते हुए देख काफी असहजता का अनुभव हुआ. मुझे लगता कि मेरा पूरा अस्तित्व ही गैरकानूनी है, क्योंकि अगर भगवान न करे, मेरे साथ कुछ गलत हो जाता है, तो मैं उस आग के गड्ढे से बाहर निकल आने के लिए कुछ भी करूंगी- भले ही इसका मतलब खिलजी जैसे राक्षस की हमेशा के लिए गुलाम बन कर रहना ही क्यों न हो. लेकिन, उस समय मुझे ऐसा लगा कि मृत्यु के ऊपर जीवन को चुनना मेरी गलती थी. मुझे लगा कि जीवन की इच्छा रखना गलत है. सर, यही तो सिनेमा की ताकत है.

सर, आपक सिनेमा खासतौर पर प्रेरणादायक, भावनाएं जगानेवाला और ताकतवर है. यह दर्शकों को भावुकता के ज्वार-भाटे में धकेल सकता है. यह सोच को प्रभावित कर सकता है और सर, यही कारण है कि आपको इस बात को लेकर पूरी तरह जिम्मेदार रहना चाहिए कि आप फिल्म में क्या कर रहे हैं और क्या कह रहे हैं. 1829 से 1861 के बीच कुछ सुधारवादी सोच रखनेवाले भारतीयों के समूह और ब्रिटिश प्रांतीय सरकारों और रजवाड़ों ने कई फैसलों के द्वारा सती-प्रथा को समाप्त किया और इसे अपराध घोषित किया. आजाद भारत में इंडियन सती प्रिवेंशन एक्ट (1988) ने सती में किसी तरह की मदद पहुंचाने, उसके लिए उकसाने और सती का किसी तरह से महिमामंडन करने को अपराध की श्रेणी में लाया.

आपके द्वारा बिना सोचे-विचारे इस स्त्री विरोधी आपराधिक प्रथा का जिस तरह से महिमामंडन किया गया है, उसके लिए आपको जवाब देना चाहिए. सर, टिकट खरीद कर आपकी फिल्म देखनेवाले दर्शक के तौर पर मुझे आपसे यह पूछने का अधिकार है कि आपने ऐसा कैसे और क्यों किया?  आपको यह बात भली-भांति पता होगी कि आधुनिक भारत में भी जौहर जैसे कृत्यों के ज्यादा ताजा उदाहरण मिलते हैं. भारत और पाकिस्तान के रक्त-रंजित विभाजन के दौरान करीब 75,000 औरतों के साथ बलात्कार, अपहरण किया गया, उन्हें ‘दूसरे’ धर्म के पुरुष द्वारा बलपूर्वक गर्भवती बनाया गया. उस दौर में स्त्रियों द्वारा स्वैच्छिक तरीके से या मदद देकर करवाई गई आत्महत्याओं की कई घटनाएं मिलती हैं. कुछ मामलों में ‘दूसरे’ धर्म के लोग स्त्रियों को छू पाएं, इससे पहले पतियों और पिताओं ने खुद अपनी पत्नियों और बेटियों का सिर कलम कर दिया.

पंजाब के थोआ खालसा में दंगे के भुक्तभोगी बीर बहादुर सिंह ने आत्महत्या करने के लिए औरतों के गांव के कुएं में कूदने के दृश्य का वर्णन किया था. उन्होंने बताया था कि किस तरह से आधे धंटे में वह कुआं पूरा भर गया था. जो औरतें ऊपर थीं, वे बच गईं. उनकी मां भी बचनेवालों में से थीं. सिंह ने उर्वशी बुटालिया की 1998 में प्रकाशित किताब, द अदर साइड ऑफ साइलेंस  में याद करते हुए कहा कि वे अपनी मां के जिंदा रह जाने को लेकर लज्जित थे. यह भारतीय इतिहास के सबसे काले अध्यायों में से एक है और इसे शर्म, डर, दुख, आत्मचिंतन, सहानुभूति, सतर्कता के साथ याद किए जाने की जरूरत है, बजाय इसका विचारहीन, सनसनीखेज महिमामंडन करने के.

विभाजन की ये दुखद कहानियां भी भले उतने प्रत्यक्ष रूप में न सही, लेकिन आपकी फिल्म पद्मावत का संदर्भ बनती हैं. भंसाली सर, मैं शांति से अपनी बात खत्म करना चाहूंगी; आपको आपकी इच्छा के अनुसार और फिल्में बनाने, उनकी शूटिंग करने और उन्हें रिलीज करने की शुभकामनाएं दूंगी. मैं चाहूंगी कि आप, आपके अभिनेता, प्रोड्यूसर, स्टूडियो और दर्शक धमकियों और उपद्रवों से महफूज रहें. मैं आपकी अभिव्यक्ति की आजादी के लिए ट्रॉल्स और टीवी टिप्पणीकारों से लड़ने का वादा करती हूं. लेकिन, मैं आपसे यह भी वादा करती हूं कि आप जनता के लिए जो कला रचेंगे, उसके बाबत सवाल पूछने से मैं नहीं चूकूंगी. इसके साथ ही हमें यह उम्मीद भी करनी चाहिए कि करणी सेना या मरणी सेना के किसी उन्मादी सदस्य के मन में सती प्रथा को अपराध की श्रेणी से हटाने की मांग करने का विचार न आये!

आपकी

स्वरा भास्कर


 इसे भी पढ़ें….

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

यूनियन बैंक ऑफ़ इंडिया से दुखी व्यक्ति ने पीएम को लिखा पत्र

मान्यवर,
सेवा में,
माननीय प्रधान मंत्री,
नई दिल्ली ।

विषय :- यूनियन बैंक ऑफ़ इंडिया की बिहारशरीफ शाखा के बैंककर्मियों द्वारा छह माह तक दौड़ाने के बाद भी मुद्रा लोन नहीं देने तथा स्वतंत्रता दिवस के मौके पर भी राष्ट्रीय ध्वज नहीं फहराए जाने के सम्बन्ध में।

मान्यवर,

निवेदन है कि बिहार के मुख्य मंत्री नीतीश कुमार के पैतृक जिला नालन्दा के मुख्यालय बिहारशरीफ में यूनियन बैंक ऑफ़ इंडिया की मुख्य शाखा है। इससे मात्र दो सौ मीटर की दूरी पर 65 वर्षों से अधिक पुरानी हिंदुस्तान जनरल स्टोर नामक मेरी दूकान अवस्थित है। पहले पिता जी दूकान चलाते थे और अब मैं चलता हूँ। मैंने दूकान के विस्तार के लिए तत्कालीन मैनेजर इंद्रजीत जी से 3 लाख रुपये लोन लेने के लिया मिला। उनके कहने पर मैंने उक्त बैंक में चालू खाता खुलवाया तथा इनकम टैक्स रिटर्न भर कर बैलेंस शीट भी प्रस्तुत किया। उन्होंने 25 अप्रैल 2017 को लोन से सम्बंधित मेरे कागजातों  को सम्बंधित बैंक पदाधिकारी को भेजा था। उनके बुलाने पर मैं 2 मई 2017 को पुनः उनसे मिला, तो उन्होंने बताया कि अभी आपकी फाइल मेरे पास नहीं लौट कर नहीं आई है। आप शाम को एक बार फिर बैंक आकर देख लीजियेगा। दुकानदारी की व्यस्तता के कारण मैं उस दिन न जाकर अगले दिन बैंक गया, तो पता चला कि अन्यत्र तबादला हो जाने के कारण मैनेजर इंद्रजीत जी,का विदाई समारोह हो चुका था।

दो-तीन दिन बैंक का चक्कर लगाने के बाद मेरी मुलाकात नए मैनेजर नीतेश रंजन जी से हुई। मैंने उन्हें पूरी बात बताई तथा 3 लाख रुपये लोन की मांग की। उन्होंने कहा कि उन्हें इसके लिए किसी से परमिशन की जरुरत नहीं है तथा एक करोड़ तक लोन देने का अधिकार है। हम लोन देंगे, पर अभी हमारे पास आदमी नहीं है। बाद में मिलिएगा। आठ-नौ बार मिलने के बाद उन्होंने बैंक की महिला लोन अफसर से मिलने को कहा। मैडम ने एक आवेदन तथा पैन कार्ड, आधार कार्ड तथा भारत सरकार द्वारा निर्गत उद्योग आधार कार्ड  की फोटो कॉपी जमा करवाई। बाद में मैडम ने कहा कि दूकान का वेरिफिकेशन करने  आएँगी। इसके बाद मैंने दूकान छोड़ कर अलग-अलग तिथियों में बैंक में मैडम से 12-13 बार मुलाकात की। उन्होंने हर बार यही कहा कि उन्हें छुट्टी नहीं मिल पा रही है। पर मैं उनसे मिलता रहा। इसी क्रम में मैडम ने एक दिन कहा कि आपके कागजात नहीं मिल रहे हैं, दुबारा दे दीजिये। मैंने मैडम को उसी दिन दूकान से लाकर पुनः कागजात दे दिया। उनका रटा-रटाया जवाब मिलता रहा कि दूकान देखने आएँगी। एक दिन अपनी पत्नी को दूकान पर बिठा कर मैं बैंक गया तो मैडम नहीं मिली। मैं मैनेजर से मिला। मैडम आईं, तो उन्होंने मैनेजर को बताया कि वे दूकान देखने गई थीं। मैनेजर ने कहा कि अभी विजिलेंस जांच चल रही हैं। अगले माह के प्रथम सप्ताह इन्हें लोन दे दीजियेगा। मैडम ने अपने टेबल पर मुझसे कहा कि आपकी दूकान देख ली हैं। घर भी देखने आऊंगी। मैं इंतजार करता रहा और वे नहीं आईं। निराश हो कर मैं एक दिन फिर बैंक जाकर मैडम से मिला, तो उन्होंने एक लाख का टर्म लोन देने की बात कही। मैंने कहा कि पूर्व मैनेजर ने सीसी लोन के लिए ही चालू खाता खुलवाया था, तो मैडम ने साफ कहा कि सीसी लोन नहीं दूंगी। मैंने कहा कि मुझे बैंक लोन चुकाना भी है। मैं घर का कागज़ात भी जमा करने को तैयार हूँ। मैडम ने कहा कि ठीक है, मैनेजर साहब से बात करुँगी। एक दिन फिर मैं मैडम से मिला, तो उन्होंने कहा कि टर्म लोन ही दूँगी। लगता है कि मैडम कमीशन के चक्कर में सीसी लोन नहीं दे रही हैं। घर देखने के क्रम में वे मेरे घर पर ही लेन-देन करने की नीयत होगी। अब सवाल है कि क्या मैडम ने सभी लोन देने वालों के घरों को जाकर देखा है?

एक चाय बिक्रेता को एक लाख का लोन दिया जाता है, वहीँ 65 वर्षों पुरानी दूकान को व्यापार विस्तार के लिए 3 लाख का सीसी लोन देने के लिए टहलाया जा रहा है। लगता यही है कि रिश्वत दो, नहीं तो बैंक का चक्कर लगा-लगा कर थक-हार कर घर बैठ जाओ! बैंक दलाल के मार्फत तुरंत लोन मिल जाता है। बैंक दलाल इतनी पैठ बना लेते हैं कि वे दिन भर बैंक में ही रहते हैं और लोग यही समझते हैं कि वे बैंक के ही स्टाफ हैं। सीसी टीवी कैमरा का फुटेज देखने से यह सच्चाई स्वयं उजागर हो जाएगी कि आखिर कौन बैंक का दलाल है?

मान्यवर! यूनियन बैंक बिहारशरीफ से हमारा सम्बन्ध करीब 35-36 वर्षों से रहा है। मेरे पिता जी के साथ हमारा संयुक्त खाता नं.887 है। 1983-84 के आस-पास मेरे पिता ने बैंक से 25 हजार का सीसी लोन लिया था। जरुरत नहीं रहने पर लोन लौटा दिया गया था। अच्छा बैंक,अच्छे लोग! मैं बचपन से ही बैंक परिसर में लगा यह स्लोगन पढ़ा करता था। मुझे वाकई उस दौर यह स्लोगन फिट लगता था। वही आज उक्त स्लोगन का मायना ही बदल सा गया है। अच्छे ग्राहक तो हैं, अच्छा बैंककर्मी नहीं। अब मामूली से मामूली काम के लिए बैंककर्मी ग्राहकों को कई दिन चक्कर लगवाते हैं। कोई चक्कर लगा रहा है, तो कोई खाता बंद करवा कर दूसरे बैंक में खाता खुलवा रहा है। आम तौर पर लोग निकट के बैंक में ही खाता खुलवाते हैं। पर बैंककर्मियों के रवैये से तंग आकर बैंक परिसर के मार्किट के ही एक दुकानदार ने अपना खाता बंद करवा लिया। इतना ही नहीं, उक्त दूकानदार को खाता बंद करवाने में एक हजार रुपये की हानि भी उठानी पड़ी।

मुझे भी बैंक के लेखाकार की मनमानी का शिकार होना पड़ा है। मैंने वांछित कागजातों के साथ केवाईसी फॉर्म भर कर 19 अप्रैल 2017 को चालू खाता खुलवाया। पर जब मैं अपराह्न एक बजे एटीएम फॉर्म जमा करने गया तो लेखाकार ने लंच के बाद आने को कहा। मैं लंच के बाद गया’ तो लेखाकार ने   कहा कि आपका केवाईसी फॉर्म नहीं भरा हुआ है। मैंने कहा कि मेरा नया खाता है और केवाईसी फॉर्म भर कर दिया हुआ है। उन्होंने कहा कि फिर से दीजिये। और फिर से भर कर दिया, तो कहा कि आज समय ख़त्म हो गया है कल दीजियेगा। ग्राहक इस टेबुल से उस टेबुल का चक्कर लगाते हैं, पर उनका काम नहीं होता है। बैंककर्मी और ग्राहक के बीच हॉट टॉक होनी आम बात हो गई है। बताया जाता है कि लेखाकार और ऋण पदाधिकारी दोनों स्थानीय हैं तथा ग्राहकों पर दबंगता दिखाने से जरा भी बाज नहीं आते हैं। सीसी टीवी फुटेज देखने से पता चल जायेगा कि बैंककर्मी ग्राहकों को कितना परेशान करते हैं!

माननीय! मेरा अनुरोध और सुझाव है कि वरीय पदाधिकारी की देख-रेख में बैंक परिसर में समय-समय पर ग्राहक मिलान समारोह का आयोजन करवाना चाहिए, ताकि आम ग्राहक अपनी परेशानी बता सकें।  बंद करवा चुके खाताधारकों से भी जानकारी ली जाय कि उन्होंने क्यों खाता बंद करवाया? बैंककर्मियों के रवैये के कारण बैंक की प्रतिष्ठा ख़राब हो रही है। आज भी इस बैंक में लम्बी लाईन लगकर पर्ची पर नंबर लेने के बाद ही काउंटर पर पैसा जमा हो पता है। मेरी जानकारी के अनुसार यह प्रथा अन्य बैंकों में समाप्त हो चुकी है। पर्ची भर कर सीधा काउंटर पर पैसा जमा होता है और तुरत खाते में जमा राशि की एंट्री हो जाती है।

इस बैंक में ग्राहक लाईन में लगे रहते हैं और बैंककर्मी काउंटर छोड़ कर इधर-उधर रहते हैं। और कोई ग्राहक जल्दी करने को कहता है, तो ये कर्मी रौब दिखाने से जरा भी परहेज नहीं करते हैं। यहाँ ना तो मैनेजर के गेट पर नेम प्लेट है और ना ही अन्य पदाधिकारी या बैंककर्मी के टेबुल पर ही नाम व पद का नेम प्लेट लगा है। इससे ग्राहकों को यह पता नहीं चल पाता है कि कौन सी टेबुल किसका है और उसका नाम क्या है? हर साल गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस के मौके पर बैंक की छत पर राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा फहराया जाता रहा है। पर इस बार 15 अगस्त 2017 को बैंक में झंडा नहीं फहराया गया। इसे बैंक मैनेजर की लापरवाही कहा जाये या लालफीताशाही? आस-पास के दुकानदारों से तथा सीसी टीवी फुटेज से सच्चाई सामने आ जाएगी। बताया जाता है कि बैंककर्मी अपनी कारगुजारियों पर पर्दा डालने के लिए समय-समय पर सीसी टीवी को बंद रखते हैं तथा कभी-कभी फुटेज से भी छेड़छाड़ करने से गुरेज नहीं करते हैं।

मान्यवर! केंद्र में भाजपा की सरकार है, परन्तु बैंककर्मी कांग्रेस सरकार की समयावली से ही देर चल रहे हैं। दलाल-बिचौलियों के मार्फ़त लोन तुरत लो। वरना जूते-चप्पल घिस जायेंगे, लोन नहीं मिलेगा। ऐसे में थक-हार कर लोग बैंक का चक्कर लगाना छोड़ देते हैं तथा महाजन-सूदखोरों से मोटी ब्याज पर पैसा लेकर अपना काम-धंधा चलाने को मजबूर हैं। मुझ जैसे आशावान व न्यायप्रिय लोगों को विश्वास है कि माननीय प्रधानमंत्री हकीकत जानते ही वह इस दिशा में स्वयं पहल करेंगे तथा समुचित जांच करवाकर मेरे जैसे जरूरतमंदों को बैंक से आसानी से लोन दिलवाने की कार्रवाई जरूर करेंगे! 

अतः आपसे सादर अनुरोध है कि मेरे उक्त मामले की यथोचित जांच करवाने तथा जल्द से जल्द लोन दिलवाने की कृपा करेंगे, ताकि मैं अपने व्यापार का आवश्यकतानुकूल विस्तार कर सकूँ। आशा ही नहीं, अपितु पूर्ण विश्वास है कि आप बहुत जल्द मेरी विनती पर कार्रवाई करेंगे।   

आपका विश्वासी

संजय कुमार

हिंदुस्तान जनरल स्टोर,
एम जी रोड, भरावपर,
बिहारशरीफ, नालंदा,
बिहार – 803101              
ईमेल- sanjayjisanju@gmail.com
मोबाइल नंबर-9608311251

प्रतिलिपि प्रेषित-
1. गवर्नर,  भारतीय रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया, मुंबई.
2. बैंकिंग लोकपाल.  पटना.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

प्रभात खबर देवघर संपादक के नाम खुला पत्र

संपादक जी!

मैं अपने इस पत्र की शुरुआत जॉन एलिया की इस पंक्ति कि ”बहुत से लोगों को पढ़ना चाहिए मगर वो लिख रहे हैं” के साथ करना चाहता हूँ। आपकी मौजूदगी, जानकारी और सहमति के साथ इन दिनों प्रभात खबर देवघर संस्करण जिस रास्ते की ओर चल रहा है, उस बाबत आपको यह पत्र लिखने के अलावा मेरे पास कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा है। बड़े लोग कहते है सबसे मुश्किल होता है सत्य की रक्षा करना और आज के समय में सबसे आसान होता है अपने आप को दलाल बना लेना।

सच्चाई, अधिकार, कर्तव्य, जागरूकता की बात करते करते अखबार कब धनपशुओं की दलाली करने लगा यह पत्रकारिता के छात्रों के लिए शोध का विषय हो सकता है। बहरहाल आप अपने आपको कहाँ पाते है इसका निर्णय का भी अधिकार आपको ही होना चाहिए। अभी की वर्तमान व्यवस्था को देखकर कुछ मौजूं सवाल है जिसे प्रभात खबर की समृद्ध पत्रकारिता को जिंदा रखने के लिए पूछे जाने जरूरी है।इन सवालों के जवाब की जरूरत नही बल्कि आप अपने मन को टटोल लें तो फिर से ये सवाल पूछना ना पड़े।

झारखंड के कृषि मंत्री रंधीर सिंह पर उन्हीं के विधानसभा क्षेत्र के एक मुखिया ने जातिसूचक शब्द लगाकर गाली गलौज करने संबंधित तहरीर सारठ थाने में दी। आपके संवाददाता द्वारा खबर भी अखबार में भी गयी।फिर देर रात मंत्री आपके कार्यालय पहुंचे और आपने खबर को ड्रॉप करने का निर्णय लिया।मंत्री से मिलने के बाद क्या हुआ जिसकी वजह से पत्रकारिता की हत्या हो गयी।

झारखण्ड के एक चर्चित बड़बोले सांसद के आदेशानुसार आपने लगातार यह फर्जी खबर छापी कि दुरंतो एक्सप्रेस का परिचालन अब जसीडीह होकर किया जाएगा। पत्रकारिता का प्रवेशी छात्र भी यह बता सकता है कि ट्रेन परिचालन संबंधित आधिकारिक जानकारी रेलवे द्वारा दी जाती है।परंतु आपने एक बड़बोले जनप्रतिनिधि को खुश करने के लिए फर्जी खबर लगातार प्लांट की।

झारखंड के एक मंत्री पर निजी सेना बनाने का आरोप लगा।आपको जानकारी दी गयी पर आप फिर उस मंत्री से मिले और नतीजा खबर फिर नहीं छपी।

बड़बोले सांसद का खुमार प्रभात खबर पर इस तरह छाया है कि अखबार ने सूखे जमीन पर पानी का नहर बना दिया और किसानों के चेहरे पर खुशी की लहर फैला दी।चापलूसी के चक्कर में किसी अन्य गांव के किसानों की तस्वीर छाप दी गयी। गांव के लोगों ने प्रभात खबर की प्रतियां जलाई और आपके विरुद्ध नारेबाजी की।पर सांसद के अंधभक्ति में आपने इसे हिकारत भरी नजरों से देखा।

एक सुप्रसिद्ध भजन कलाकार ने अपने देवघर यात्रा के दौरान जब आपके कार्यालय आने के अनुरोध को नम्रता से अस्वीकार कर दिया तब आपने उस कलाकार की खबर को अंडरप्ले कर दिया।

आप कहते है कि डीसी पावर हाउस होता है।इसलिए अखबार के लोगों को उस पावर हाउस से बचना चाहिए।पता नहीं आप क्या सोचकर पत्रकारिता में आये थे?प्रभात खबर पत्रकार हरिवंश के उसूलों पर चलने वाला अखबार रहा है और आपने इसे क्या समझा?

और भी ऐसे दर्जनों सवाल है जो आपसे पूछे जाने जरूरी है।किसी जनप्रतिनिधि की चाकरी आसान रास्ता है कठिन है पत्रकारिता धर्म की रक्षा करना।सांसद, मंत्री, विधायक सब जनता के समस्याओं के लिए हैं। अपने इस खुले पत्र का समापन मीडिया समीक्षक दिलीप मंडल के फेसबुक पोस्ट से करना चाहूंगा जहां वो लिखते हैं सुबह का अखबार है कभी पढ़ लिया कभी पराठा लपेट लिया और कभी कुत्ते का सुसु सुखाने के काम आ गया।

एक पाठक

Anant Jha

anantkumarjha@gmail.com

पढ़ें एंकर असित नाथ तिवारी का प्रधानमंत्री के नाम खुला पत्र… 

प्रधानमंत्री के नाम पहला खुला पत्र

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

‘भक्तों’ से जान का खतरा बताते हुए पीएम को लिखा गया रवीश कुमार का पत्र फेसबुक पर हुआ वायरल, आप भी पढ़ें

Ravish Kumar : भारत के प्रधानमंत्री को मेरा पत्र…

माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी,

आशा ही नहीं अपितु पूर्ण विश्वास है कि आप सकुशल होंगे। मैं हमेशा आपके स्वास्थ्य की मंगल कामना करता हूं। आप असीम ऊर्जा के धनी बने रहें, इसकी दुआ करता हूं। पत्र का प्रयोजन सीमित है। विदित है कि सोशल मीडिया के मंचों पर भाषाई शालीनता कुचली जा रही है। इसमें आपके नेतृत्व में चलने वाले संगठन के सदस्यों, समर्थकों के अलावा विरोधियों के संगठन और सदस्य भी शामिल हैं। इस विचलन और पतन में शामिल लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है।

दुख की बात है कि अभद्र भाषा और धमकी देने वाले कुछ लोगों को आप ट्वीटर पर फोलो करते हैं। सार्वजनिक रूप से उजागर होने, विवाद होने के बाद भी फोलो करते हैं। भारत के प्रधानमंत्री की सोहबत में ऐसे लोग हों, यह न तो आपको शोभा देता है और न ही आपके पद की गरिमा को। किन्हीं ख़ास योग्यताओं के कारण ही आप किसी को फोलो करते होंगे। मुझे पूरी उम्मीद है कि धमकाने, गाली देने और घोर सांप्रदायिक बातें करने को आप फोलो करने की योग्यता नहीं मानते होंगे।

आपकी व्यस्तता समझ सकता हूं मगर आपकी टीम यह सुनिश्चित कर सकती है कि आप ऐसे किसी शख्स को ट्वीटर पर फोलो न करें। ये लोग आपकी गरिमा को ठेस पहुंचा रहे हैं। भारत की जनता ने आपको असीम प्यार दिया है, कोई कमी रह गई हो, तो आप उससे मांग सकते हैं, वो खुशी खुशी दे देगी। मगर यह शोभा नहीं देता कि भारत के प्रधानमंत्री ऐसे लोगों को फोलो करें जो आलोचकों के जीवित होने पर दुख जताता हो।

आज जबसे altnews.in पर पढ़ा है कि ऊं धर्म रक्षति रक्षित: नाम के व्हाट्स ग्रुप में जो लोग मुझे कुछ महीनों से भद्दी गालियां दे रहे थे, धमकी दे रहे थे, सांप्रदायिक बातें कर रहे थे, मुझ जैसे सर्वोच्च देशभक्त व दूसरे पत्रकारों को आतंकवादी बता रहे थे, उनमें से कुछ को आप ट्वीटर पर फोलो करते हैं, मैं सहम गया हूं। प्रधानमंत्री जी, इस व्हाट्स अप ग्रुप में मुझे और कुछ पत्रकारों को लेकर जिस स्तरहीन भाषा का इस्तमाल किया गया वो अगर मैं पढ़ दूं तो सुनने वाले कान बंद कर लेंगे। मेरा दायित्व बनता है कि मैं अपनी सख़्त आलोचनाओं में भी आपका लिहाज़ करूं। महिला पत्रकारों के सम्मान में जिस भाषा का इस्तमाल किया गया है वो शर्मनाक है।

सोशल मीडिया पर आपके प्रति भी अभद्र भाषा का इस्तमाल किया जाता है। जिसका मुझे वाक़ई अफसोस है। लेकिन यहां मामला आपकी तरफ से ऐसे लोगों का है, जो मुझे जैसे अकेले पत्रकार को धमकियां देते रहे हैं। जब भी इस व्हाट्स अप ग्रुप से अलग होने का प्रयास किया, पकड़ इसे, भाग रहा है, मार इसे, टाइप की भाषा का इस्तमाल कर वापस जोड़ दिया गया।

राजनीति ने सोशल मीडिया और सड़क पर जो यह भीड़ तैयार की है, एक दिन समाज के लिए ख़ासकर महिलाओं के लिए बड़ी चुनौती बन जाएगी। इनकी गालियां महिला विरोधी होती हैं। इतनी सांप्रदायिक होती हैं कि आप तो बिल्कुल बर्दाश्त न करें। वैसे भी 2022 तक भारत से सांप्रदायिकता मिटा देना चाहते हैं। 15 अगस्त के आपके भाषण का भी इन पर प्रभाव नहीं पड़ा और वे हाल हाल तक मुझे धमकियां देते रहे हैं।

अब मेरा आपसे एक सवाल है। क्या आप वाक़ई नीरज दवे और निखिल दधीच को फोलो करते हैं? क्यों करते हैं? कुछ दिन पहले मैंने इनके व्हाट्स अप ग्रुप का कुछ स्क्रीन शाट अपने फेसबुक पेज @RavishKaPage पर ज़ाहिर कर दिया था। altnews.in के प्रतीक सिन्हा और नीलेश पुरोहित की पड़ताल बताती है कि ग्रुप का सदस्य नीरज दवे राजकोट का रहने वाला है और एक एक्सपोर्ट कंपनी का प्रबंध निदेशक है। नीरज दवे को आप फोलो करते हैं। जब मैंने लिखा कि इतनी अभद्र भाषा का इस्तमाल मत कीजिए तो लिखता है कि मुझे दुख है कि तू अभी तक जीवित है।

व्हाट्स अप ग्रुप का एक और सदस्य निखिल दधीच के बारे में कितना कुछ लिखा गया। पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या हुई तब निखिल दधीच ने उनके बारे में जो कहा, वो आप कभी पसंद नहीं करेंगे, ये और बात है कि आप उस शख़्स को अभी तक फोलो कर रहे हैं। अगर मेरी जानकारी सही है तो। हाल ही में बीजेपी के आई टी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने ग़लत तरीके से एडिट की हुई मेरे भाषण का वीडियो शेयर किया था। इससे भ्रम फैला। altnews.in ने उसे भी उजागर किया मगर अमित मालवीय ने अफसोस तक प्रकट नहीं किया।

पर सर, मुझे बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि ये निखिल दधीच मेरे मोबाइल फोन में आ बैठा है। घोर सांप्रदायिक व्हाट्स अप ग्रुप का सदस्य है जिससे मुझे ज़बरन जोड़ा जाता है। जहां मेरे बारे में हिंसक शब्दों का इस्तमाल किया जाता है। वाकई मैंने नहीं सोचा था कि इस ग्रुप के सदस्यों के तार आप तक पहुंचेंगे। काश altnews.in की यह पड़ताल ग़लत हो। निखिल दधीच की तो आपके कई मंत्रियों के साथ तस्वीरें हैं।

यही नहीं ऊं धर्म रक्षति रक्षित: ग्रुप के कई एडमिन हैं। कई एडमिन के नाम RSS, RSS-2 रखे गए हैं। एक एडमिन का नाम आकाश सोनी है। भारत की दूसरी महिला रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण जी, स्वास्थ्य मंत्री जे पी नड्डा जी और दिल्ली बीजेपी के अध्यक्ष मनोज तिवारी के साथ आकाश सोनी की तस्वीर है। तस्वीर किसी की भी किसी के साथ हो सकती है लेकिन यह तो किसी को धमकाने या सांप्रदायिक बातें करने का ग्रुप चलाता था। आपके बारे में कोई लिख देता है तो उसके व्हाट्स अप ग्रुप के एडमिन को गिरफ्तार कर लिया जाता है। मैंने ऐसी कई ख़बरें पढ़ी हैं।

क्या आकाश सोनी RSS का प्रमुख पदाधिकारी है? आकाश सोनी ने मेरे सहित अभिसार शर्मा, राजदीप सरदेसाई और बरखा दत्त के फोन नंबर को अपने पेज पर सार्वजनिक किया है। altnews.in की रिपोर्ट में यह बात बताई गई है।

पहले भी आपके नेतृत्व में चलने वाले संगठन के नेताओं ने मेरा नंबर सार्वजनिक किया है और धमकियां मिली हैं। मैं परेशान तो हुआ परंतु आपको पत्र लिखने नहीं बैठा। इस बार लिख रहा हूं क्योंकि मैं जानना चाहता हूं और आप भी पता करवाएं कि क्या इस व्हाट्स ग्रुप के लोग मेरी जान लेने की हद तक जा सकते हैं? क्या मेरी जान को ख़तरा है?
मैं एक सामान्य नागरिक हूं और अदना सा परंतु सजग पत्रकार हूं। जिसके बारे में आज कल हर दूसरा कहकर निकल जाता है कि जल्दी ही आपकी कृपा से सड़क पर आने वाला हूं। सोशल मीडिया पर पिछले दिनों इसका उत्सव भी मनाया गया कि अब मेरी नौकरी जाएगी। कइयों ने कहा और कहते हैं कि सरकार मेरे पीछे पड़ी है। हाल ही में हिन्दुस्तान टाइम्स के संपादक बॉबी घोष को आपकी नापसंदगी के कारण चलता कर दिया गया। इसकी ख़बर मैंने thewire.in में पढ़ी। कहते हैं कि अब मेरी बारी है। यह सब सुनकर हंसी तो आती है पर चिन्तित होता हूं। मुझे यकीन करने का जी नहीं करता कि भारत का एक सशक्त प्रधानमंत्री एक पत्रकार की नौकरी ले सकता है। तब लोग कहते हैं कि थोड़े दिनों की बात है, देख लेना, तुम्हारा इंतज़ाम हो गया है। ऐसा है क्या सर?

ऐसा होना मेरे लिए सौभाग्य की बात है। परंतु ऐसा मत होने दीजिएगा। मेरे लिए नहीं, भारत के महान लोकतंत्र की शान के लिए वरना लोग कहेंगे कि अगर मेरी आवाज़ अलग भी है, तल्ख़ भी है तो भी क्या इस महान लोकतंत्र में मेरे लिए कोई जगह नहीं बची है? एक पत्रकार की नौकरी लेने का इंतज़ाम प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री के स्तर से होगा? ऐसी अटकलों को मैं व्हाट्स अप ग्रुप में दी जाने वाली धमकियों से जोड़कर देखता हूं। अगर आप इन लोगों को फोलो नहीं करते तो मैं सही में यह पत्र नहीं लिखता।

मेरे पास अल्युमिनियम का एक बक्सा है जिसे लेकर दिल्ली आया था। इन 27 वर्षों में ईश्वर ने मुझे बहुत कुछ दिया मगर वो बक्सा आज भी है। मैं उस बक्से के साथ मोतिहारी लौट सकता हूं, लेकिन परिवार का दायित्व भी है। रोज़गार की चिन्ता किसे नहीं होती है। बड़े बड़े कलाकार सत्तर पचहत्तर साल के होकर विज्ञापन करते रहते हैं ताकि पैसे कमा सकें। जब इतने पैसे वालों को घर चलाने की चिन्ता होती है तो मैं कैसे उस चिन्ता से अलग हो सकता हूं। मुझे भी है।

आप मेरे बच्चों को तो सड़क पर नहीं देखना चाहेंगे। चाहेंगे ? मुझसे इतनी नफ़रत? मेरे बच्चे तब भी आपको दुआ देंगे। मुझे सड़क से प्यार है। मैं सड़क पर आकर भी सवाल करता रहूंगा। चंपारण आकर बापू ने यही तो मिसाल दी कि सत्ता कितनी बड़ी हो, जगह कितना भी अनजान हो, नैतिक बल से कोई भी उसके सामने खड़ा हो सकता है। मैं उस महान मिट्टी का छोटा सा अंश हूं।

मैं किसी को डराने के लिए सच नहीं बोलता। बापू कहते थे कि जिस सच में अहंकार आ जाए वो सच नहीं रह जाता। मैं ख़ुद को और अधिक विनम्र बनाने और अपने भीतर के अंतर्विरोधों को लेकर प्रायश्चित करने के लिए बोलता हूं। जब मैं बोल नहीं पाता, लिख नहीं पाता तब उस सच को लेकर जूझता रहता हूं। मैं अपनी तमाम कमज़ोरियों से आज़ाद होने के संघर्ष में ही वो बात कह देता हूं जिसे सुनकर लोग कहते हैं कि तुम्हें सरकार से डर नहीं लगता। मुझे अपनी कमज़ोरियों से डर लगता है। अपनी कमज़ोरियों से लड़ने के लिए ही बोलता हूं। लिखता हूं। कई बार हार जाता हूं। तब ख़ुद को यही दिलासा देता कि इस बार फेल हो गया, अगली बार पास होने की कोशिश करूंगा। सत्ता के सामने बोलना उस साहस का प्रदर्शन है जिसका अधिकार संविधान देता है और जिसके संरक्षक आप हैं।

मैं यह पत्र सार्वजनिक रूप से भी प्रकाशित कर रहा हूं और आपको डाक द्वारा भी भेज रहा हूं। अगर आप निखिल दधीज, नीरज दवे और आकाश सोनी को जानते हैं तो उनसे बस इतना पूछ लीजिए कि कहीं इनका या इनके किसी ग्रुप का मुझे मारने का प्लान तो नहीं है। altnews.in का लिंक भी संलग्न कर रहा हूं। पत्र लिखने के क्रम में अगर मैंने आपका अनादर किया हो, तो माफ़ी मांगना चाहूंगा।

आपका शुभचिंतक

रवीश कुमार

पत्रकार

एनडीटीवी इंडिया

रवीश कुमार का उपरोक्त पत्र फेसबुक पर लाखों की संख्या में शेयर, लाइक और कमेंट हासिल कर चुका है..

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

अनराग द्वारी ने बीबीसी ज्वाइन करने से ठीक पहले एनडीटीवी के साथियों के नाम ये अदभुत पत्र लिखा

Anurag Dwary : नवसंवत्सर — एनडीटीवी परिवार ने 10 साल मुझे मेरे गुण-दोष के साथ पाला-पोसा, अब नये सफर की शुरुआत होगी बीबीसी के साथ … साथियों के लिये मेरे आख़िरी मेल का हिस्सा जो संस्थान में शायद इसे ना पढ़ पाएं हों … जो दोस्त फेसबुक से साथ जुड़े हैं उनकी शुभकामनाओं के लिये भी …

1 अगस्त मेरे लिये सिर्फ एक तारीख़ नहीं … मेरे सफर के एक सफहे का बंद होकर, दूसरे सफहे की शुरूआत है … हम सब जानते हैं, इस वक्त इसकी ज़रूरत है हम जैसे लोगों को जिनके लिये कलम एक ज़रिया है … जिसे हमने चुना लेकिन कई बार किस्सागोई के बीच कुछ ऐसे किऱदार होते हैं जिनके चेहरे देखकर आप फैसला लेते हैं कि थोड़ा रूकना होगा, मुड़ना होगा … ताकी चूल्हे की आंच ठंडी ना हो … बहरहाल … पाकिस्तान के हबीब जालिब मेरे सबसे पसंदीदा शायर हैं ( वैसे उन्हें पाकिस्तानी ना कहूं तो भी चलेगा, क्योंकि वो हम जैसे कइयों के दिल में धड़कते हैं) … बस यूं ही उनका ज़िक्र याद आ गया… मुशीर में वो लिखते हैं …

………………………………….

मैंने उससे ये कहा

ये जो दस करोड़ हैं, जेहल का निचोड़ हैं, इनकी फ़िक्र सो गई हर उम्मीद की किस, ज़ुल्मतों में खो गई
ये खबर दुरुस्त है, इनकी मौत हो गई, बे शऊर लोग हैं, ज़िन्दगी का रोग हैं और तेरे पास है, इनके दर्द की दवा ….

जिनको था ज़बां पे नाज़, चुप हैं वो ज़बां दराज़, चैन है समाज में
वे मिसाल फ़र्क है, कल में और आज में,अपने खर्च पर हैं क़ैद, लोग तेरे राज में

मैंने उससे ये कहा

हर वज़ीर हर सफ़ीर, बेनज़ीर है मुशीर, वाह क्या जवाब है, तेरे जेहन की क़सम
खूब इंतेख़ाब है,जागती है अफसरी, क़ौम महवे खाब है, ये तेरा वज़ीर खाँ दे रहा है जो बयाँ … पढ़ के इनको हर कोई, कह रहा है मरहबा

मैंने उससे ये कहा….
…………………………………

हमारी ताक़त उन्हीं वज़ीरों की मुखालिफत है, लोग शायद इसे विचारधारा से जोड़ें लेकिन मैं जानता हूं ये सच नहीं … ये इसलिये लिखा क्योंकि अपने चैनल की यही खूबी मुझे इस परिवार में खींच लाई … कई बार कुछ वजहों से जाने की सोची लेकिन जेब पर सोच भारी पड़ी … लेकिन जैसा पहले लिखा … चूल्हे की आंच थोड़ा रूकने को मजबूर कर देती है… बहरहाल मुमकिन नहीं था कहीं और सोचता कि वंदेमातरम के संगीतमय सफर पर आधे घंटे का कार्यक्रम कर लूं, गंजेपन पर कुछ सोच लूं ( यक़ीन मानिये जब 2007 में आया था तो मैं गंजा नहीं था, भेंडी बाज़ार घराने पर कुछ करने की इजाज़त मिल जाए।

मनीष सर ने डेस्क से धक्का मारना शुरू कर दिया … बोला था डेस्क पर लेकर आया हूं … लेकिन वो टून इन वन बनाने लगे … जिस आदमी की ख़बरों को लेकर ऊर्जा सुबह 4 से रात 4 तक रहे उनसे क्या मज़ाल की मैं उलझ जाऊं … लिहाज़ा करना पड़ा … कुछ परिस्थिति कुछ हौसला-अफज़ाई एक बार पूरी तरह से रिपोर्टिंग में ले आई … संजय सर से डर लगता था लेकिन मनीष जी के साथ अपना स्पेस था… रिपोर्टर की नब्ज़ समझने में वो बेमिसाल हैं …

कमाल के कैमरा साथी मिले — मुंबई में सुहास, आनंद सर,प्रवीण,राजेन्द्र,,दिल्ली में प्रेम सिंह, भोपाल में रिज़वान भाई ने सिखाया कैसे मोबाइल से अच्छे शॉट्स बना सकते हैं … 3 महीने में रिज़वान से रिश्ते पारिवारिक हो गये … सर, यक़ीन मानें हमारे कैमरा साथियों से अच्छे शायद ही कहीं मिलें …टीवी रिपोर्टर अपने कैमरा सहयोगी के बग़ैर कुछ नहीं … कैमरा टीम ने शब्दश: एक नयी नज़र दी…

एडिटर्स में चाहे फैय्याज़ सर हों, अचिंत्य, राव सर, राजेन्द्र, कमाल था … हमारे प्रोड्यूसर मल्लिका, आशीष, गणेश, स्वरोलीपी, संकल्प, विपुल, आलाप, श्वेता, सम्मी, योगेश, कामाक्षी सबने मुझे बहुत सहा … ख़ासकर गणेशभाई … जो कभी नाराज़ नहीं होता …संयम के साथ सहूलियत दी काम करने की … हमारे प्रोड्यूसर और एडिटर्स ने बेहतरीन एडिट से हर कहानी को कहा …

मुंबई के सारे साथी … अभिषेक सर जो मेरे मुकाम के गवाह-सहयोगी रहे … कई बार गुस्से-झगड़े-प्यार के अपने हिस्सों के साथ, अजेय (गज़ब की ऊर्जा और कॉर्डिनेशन मित्र … तुम अद्भुत हो), उल्लास सर (सर आप हमेशा बड़े भाई सरीखे रहे … ख़बर को लेकर आपकी आंखों की चमक गज़ब थी), सुनील जी (इनकी ऊर्जा और जज़्बा उफ … सबको प्रेरणा देती है), काथे जी (ऊफ आपकी दलीलें और ज्ञान … बहुत बढ़िया), विजय जी, सांतिया, पूजा, दीप्ति जी, धरम, शैलू, केतन, योगेश, तेजस, सौरभ (दादा तुम थोड़ा नॉनवेज कम खाया करो … और थोड़ा आराम भी करो) , प्रसाद राममूर्ति, योगेश पवार, संचिका, महक, विवेक, आनंदी, मयूरी, अनंत, संजय, रवि तिवारी (आपका वॉयस ओवर, बेमिसाल और हर दिन झोले में एक ख़बर … वाह), अवधेश, अतुल, जाधव, शिंदे सर, भरत, विनायक भाई, विशाल भोसले (भाई अपन तीनों की शाम की चर्चा मिस करता हूं, और सरजी के कमेंट्स … क्या कहने) ….मुंबई ब्यूरो का हर एक एक सहकर्मी दही-हांडी जैसा एक दूसरे से जुड़ा रहा … हमेशा!

दिल्ली इनपुट पर … मनहर जी (अब हमसे न्यूज़ लिस्ट नहीं मांग पाएंगे आप) , रजनीश सर (बहुत पुराना साथ है आपके सवाल नई जिज्ञासा पैदा करते हैं, स्टोरी निखारते हैं) , नदीम जी (ओफफ अब आप शनिवार को किसके साथ गप्पा मारेंगे) , जसबीर (आप कभी कभार गुस्सा हो जाया करो), शैलेन्द्र भाई (आप बहुत सहज हैं, कितनी बातें साझा की हम दोनों ने … दिल्ली में बग़ैर फोन बातें करेंगे), आकाश, अदिति जी (धर्म से लेकर सियासत, कितनी चर्चा हुई आपसे), पिनाकी (भाई थोड़ा हंस के स्टोरी मांग लो … डर लग जाता है)) , सृजन, गौरी (भोपाल में हर सुबह पहला फोन आपका)…

रिपोर्टर और डेस्क में एक अघोषित द्वंद हमेशा रहता है … लेकिन यक़ीन मानें इतने सीमित संसाधनों में हमारी डेस्क कमाल की है, बेहद कमाल … मैं दोनों तरफ रहा इसलिये कह सकता हूं … अजय सर, प्रियदर्शन जी, दीपक जी, सुशील सर, भारत, मिहिर, बसंत, प्रीतीश, जया, अमित ( जिसने मुझे हर सप्ताहांत बहुत बर्दाश्त किया अपनी मुस्कान के साथ), अदिति, पार्थ सर, सीपी सर, विभा, आनंद पटेल, सत्येंद्र सर … बहुत कुछ सीखा इनसे … खट्टे-मीठे अनुभव रहे … जब झुंझलाया, नाराज़ हुआ अपने परिवार से साझा कर लिया … अजय सर को फोन कर लिया , प्रियदर्शन सर से भाषा सीख ली.. सुशील सर से सहजता साझा कर ली ….

दिल्ली से लेकर पूरे देश में हमारे साथी रिपोर्टर — हृदयेश भाई, किशलय सर, नेहाल भाई, राजीव सेना वाले, अहमदाबाद वाले भी , अखिलेश सर, हिमांशु, मुकेश, उमा, शारिक़,शरद, परिमल, रवीश – दिल्ली वाले, सौरभ, आशीष भार्गव ( भाई कमाल की रफ्तार से वेब कॉपी फाइल करता है, इस कला के हम सब कायल हैं), अजय सिंह, हरिवंश भाई, कमाल सर, शारिक़ भाई, नीता … सबका सहयोग मिला … सबका शुक्रगुज़ार हूं …

खेल डेस्क पर संजय सर, विमल भाई, प्रदीप, महावीर, अफशां, कुणाल,सौमित, निखिल, रीका, गौरिका, यश जैसे पुराने सहयोगियों का साथ बने रहा… ओलंपिक स्पोर्ट्स में विमल भाई का शायद ही कोई सानी हो … प्रशांत सिसौदिया सर इतनी पुरानी और नई जानकारी फिल्मों पर किताब लिख दो सर, पूजा, सूर्या, सुमित, मेरा साथी इक़बाल ( भाई सेवई लेकर आना, विजय सर — मुझे लगता है जिस अथॉरिटी के साथ विजय सर फिल्मों की समीक्षा करते थे वो मिलना मुश्किल है …

बाबा, विनोद दुआ सर सबने परखा … मौक़े दिये … देर रात तक बाबा खेल चैनल देखते हैं, अपनी फुटबॉल की जानकारी गोल है इसलिये हमने खेल से भागने में भलाई समझी … सुनील सर, लगभग 15 सालों से आपके साथ हूं … एक अपनापन है जिससे रात-सवेरे … दुख-सुख में कभी भी आपको फोन लगा लेता हूं … करता रहूंगा … जो दो नज़रिया आप देते हैं उससे नज़रिया खुल जाता है … वैसे हर क्षेत्र में आपके ज्ञान से थोड़ा डर भी लगता है … इसलिये सारी गिरह खोलकर आपसे जिरह की हिम्मत मिलती है …

रवीश सर आपने जैसे फेयरवेल दिया … वैसा कम ही लोगों को मिल पाता है…

शोर-शराबे के इस दौर में सुकून की अपनी कीमत है … लेकिन ऐसा सुकून जिसमें फिक्र है … सोच है … शुक्रिया उस सोच में मुझे स्पेस देने … एक राज़ की बात है मंदसौर में आपके नाम ने उन्मादी भीड़ से पिटने से बचा लिया..

ऑनिन सर, बहस के लिये-ज़रूरत के लिये-समझने के लिये-सीखने के लिये आपसे कई बार वक्त लिया …हर बात का अपना विस्तार … वैचारिकता को लेकर भी .. शायद ही अपने संपादक से ऐसे बहस की गुंजाइश वो भी टेलिफोन पर मिल पाए, आपके साथ ही मुमकिन था …. सबसे अहम देश भर में हमारी स्थानीय साथी, ख़ासकर महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ … कमाल है इनमें भी … सालों से हमारे साथ जुड़े हैं … सिर्फ प्रेम की वजह से … इनकी ईमानदारी और सहजता अद्भुत है … ये इस परिवार की सबसे अहम कड़ी हैं….

हमारे वेब डेस्क के साथी आपने ख़बरों को नई उम्र दी … सालों बाद बाईलाइन मिलने लगी … मज़ा आया… कई पुराने साथी इस फेहरिस्त में शामिल है, लेकिन चैनल का हिस्सा नहीं .. दुख हुआ, गुस्सा आया … लगा-लगता है उन्हें कुछ और ज़रियों से रोका-बचाया जा सकता था … लेकिन पूंजीवादी व्यवस्था के अपने दायरे होते हैं और ये सोचना खुशफ़हमी होगी कि हम उसका हिस्सा नहीं हैं… बहरहाल … इसपर बहस फिर कभी लेकिन इसको अछूता छोड़ना मेरी फितरत के ख़िलाफ रहता..

हम कम हैं, लेकिन सच मानें हममें दम है …. पूरा देश घूमते फर्ज़ी आंकड़ों के बावजूद … पाश की तरह … हम सबके लिये …

मैं घास हूँ
मैं आपके हर किए-धरे पर उग आऊँगा …
बम फेंक दो चाहे विश्‍वविद्यालय पर
बना दो होस्‍टल को मलबे का ढेर
सुहागा फिरा दो भले ही हमारी झोपड़ियों पर

मेरा क्‍या करोगे
मैं तो घास हूँ हर चीज़ पर उग आऊँगा ….

इस मेल में यक़ीनन … मेरे बेहद करीबियों के नाम छूटे होंगे …
कई बार ज़ेहन, आंखें, की-बोर्ड के साथ तालमेल नहीं रख पातीं …
माफ़ी, चेहरों का हुजूम आंखों के धुंधलके में सिनेमाई रील सा आकर गुज़र जाता है…

एनडीटीवी को अलविदा कह बीबीसी ज्वाइन करने के ठीक पहले पत्रकार अनराग द्वारी द्वारा लिखा गया उपरोक्त पत्र उनके एफबी वॉल से साभार लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है.

अब इसके आगे की कथा पढ़िए, अनुराग द्वारी के साथी अजय कुमार की कलम से…

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

दैनिक भास्कर ने अपने कर्मियों से कहा- ”10 लाख नए पाठक जोड़ने हैं, प्रति पाठक 150 रुपये मिलेंगे!”

दैनिक भास्कर ग्रुप ने ऑफिशियल लेटर जारी कर अपने कर्मियों को इस साल 10 लाख नये पाठक जोड़ने का टारगेट बताया है और इसके लिए उसने अपने कर्मियों को ऑफर दिया है कि वे नये पाठक जुड़वायें जिसके लिए उन्हें प्रति पाठक 150 रुपये का कमीशन या प्रोत्साहन राशि मिलेगी। बहरहाल इस ऑफर के बाद कुछ कर्मी यह सोच रहे हैं कि क्या अब पत्रकारिता “टारगेट जॉब” तो नहीं बन जायेगी? हो सकता है कस्टमर न लाने वालों का इंक्रीमेंट/प्रमोशन भी कंपनी रोक दे।

खैर खुद का प्रचार प्रसार विस्तार करने का हक हर ब्रांड को होता है लेकिन, 1 साल में 10 लाख पाठक जोड़ने जैसा बड़ा टारगेट बनाने वाला और खुद को देश का नम्बर 1 अखबार कहने वाले भास्कर ग्रुप ने ऑफिशियल लैटर में खुद को करीब 10 हजार कर्मियों की कंपनी होने का दावा किया है। साथ ही लेटर में विश्व का चौथा सबसे अधिक प्रसार संख्या वाला अखबार भी बताया है। तो फिर अपने कर्मियों को पर्याप्त सेलरी या मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ देने की बात उठने पर भास्कर की यही “ब्रांड वैल्यू” कम कैसे हो जाती है, यह सोचने वाली बात है।

आशीष चौकसे
पत्रकार और ब्लॉगर
ashishchouksey0019@gmail.com

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

आइसा छात्र नेता नितिन राज ने जेल से भेजा पत्र- ‘रिश्वत देकर रिहाई कतई कुबूल नहीं’

सरकारों का कोई भी दमन और उनके भ्रष्टतंत्र की कोई भी बेशर्मी और बेहयाई क्रांतिकारी नौजवानों के मंसूबों को तोड़ नहीं सकती……

साथियों,

आज शायद भारतीय छात्र आन्दोलन अपने इतिहास के सबसे दमनात्मक दौर से गुजर रहा है, जहाँ छात्रों को अपनी लोकतान्त्रिक माँगो को लेकर की गई छात्र आन्दोलन की सामान्य कार्यवाही के लिए भी राजसत्ता के इशारे पर महीनों के लिए जेल में डाल दिया जा रहा है. छात्र आन्दोलन से घबराई योगी सरकार, जो कि इसे किसी भी शर्त पर कुचल देना चाहती है, हमें इतने दिनों तक जेल में रख कर हमारे मनोबल को तोड़ने की कोशिश कर रही है. लेकिन हम क्रान्तिकारी परम्परा के वाहक हैं हमारे आदर्श भगतसिंह और चंदू हैं, सावरकर नहीं, जो जेल के भय से माफ़ीनामा लिखकर छूटे और अंग्रेजों की दलाली में लग गए. हमें अगर और दिनों तक जेल में रहना पड़ा तब भी हम कमजोर पड़ने वाले नहीं हैं.

कल जब हमारे साथ के सभी आन्दोलनकारी साथियों की रिहाई हो गई और मेरी नही हुई तो पहले कुछ कष्ट हुआ लेकिन जब से पता चला कि मेरी रिहाई BKT थाने में हमारे साथियों द्वारा रिश्वत देने से इंकार करने के चलते रुकी है तब मुझे जानकर ख़ुशी हुई. यदि रिश्वत देकर मेरी रिहाई कल हो गई होती तो मैं छूट तो जाता परन्तु वो भ्रष्टाचार के खिलाफ आन्दोलन, जिसके चलते मैं जेल में आया, शायद हार जाता. जो कि इस आन्दोलन की मुख्य अंतरवस्तु को ही भटका देता. मुझे गर्व है कि मैं भ्रष्टाचार के खिलाफ सही मायने में लड़ रहा हूँ और अपने सिद्धांतों के साथ खड़ा हूँ भले ही मुझे इसके लिए अधिक दिनों तक जेल में क्यों न रहना पड रहा हो. जेल में मैं बस हमारे प्रिय छात्रनेता चंद्रशेखर प्रसाद (चंदू) के शब्दों “ यह मेरी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा है कि मैं चे ग्वेरा की तरह जियूँ और भगतसिंह की तरह मरुँ”, को याद करके खुद को राजसत्ता के दमन से ज्यादा मजबूत पाता हूँ और लड़ने की एक नई उर्जा प्राप्त करता हूँ. 

आज पूरे देश में जिस तरीके से कार्पोरेट फासीवादी ताकतों की सत्ता स्थापित है उसमें लगातार दलितों, अल्पसंख्यकों, महिलाओं व अन्य वंचित तबकों पर हमले बढ़ रहे हैं. पूरे देश में एक ऐसी भीड़ पैदा की जा रही है जो सिर्फ अफवाह के चलते किसी की भी हत्या कर दे रही है. हमारे किसान जब अपने अधिकारों की मांग करते हैं तो उन्हें गोली से उड़ा दिया जा रहा है. अगर छात्र नौजवान शिक्षा और रोजगार की बात करता है तो उसे जेल में ठूंस दिया जा रहा है, जो भी सरकार पर सवाल उठाता है उसे देशद्रोही करार दिया जाता है. इस भयानक दौर में मैं देश के सभी छात्र नौजवानों से अपील करता हूँ कि भगत सिंह के क्रांतिकारी विचारों से प्रेरणा लेते हुए समाज के सभी उत्पीडित तबकों को गोलबंद कर इन जनविरोधी, लोकतंत्र विरोधी सरकारों को उखाड़ फेकने की जिम्मेदारी लें. ये काम सिर्फ छात्र नौजवान ही कर सकते हैं.

अंत में मैं फिर इन सरकारों से कहना चाहता हूँ कि तुम्हारा कोई भी दमन और तुम्हारे भ्रष्टतंत्र की कोई भी बेशर्मी और बेहयाई क्रांतिकारी नौजवानों के मंसूबों को तोड़ नहीं सकती. 

इंकलाब जिंदाबाद!!

द्वारा-

नितिन राज
छात्र नेता
आइसा
लखनऊ

उपरोक्त पत्र की ओरीजनल प्रति यूं है…

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

बजरंद दल वाले स्टिंग पर वीएचपी ने रिपब्लिक टीवी के संपादक अरनब गोस्वामी को लिखा पत्र, पढ़ें

To,
Mr Arnab Goswami
Republic TV
Mumbai

Sub: Contents shown on Republic TV  with the intention to malign Bajrang Dal’s image.

Dear Arnab,

This has reference to the fake sting operation telecasted on your news channel ‘Republic Tv’ under the caption of ‘Hindu Fringe Exposed’ on 5th June 2017 with prime time debate No. 2 at 10.10 PM ( https://www.youtube.com/watch?v=f-8rMhrNk-c ) and its repeat telecasts thereafter, with a sole intent to defame, malign and tarnish the image of our youth wing ‘Bajrang Dal’. Your channel Republic Tv, under the garb of ‘sting’ has attempted to portray our dedicated self-less nationalist cadres in bad light.

An individual’s quote / bite has been depicted as the bite of Bajrang Dal leader, is absolutely wrong, baseless and uncalled for since, he is not the leader of Bajrang Dal. The incidents telecasted in the name of sting dates back to many years, having no connection whatsoever with Bajrang Dal and a part of telecast shown as sting was actually an interview (not sting). Fights and acts of violence telecasted on the channel have nothing to do with the Bajrang Dal and its cadres.

The language used by yourself, your reporters & some panelists in the aforesaid telecast against ‘Bajrang Dal’ is highly objectionable, condemnable, derogatory & humiliating in nature and it clearly exposes you as yet another ‘subversive force’ working on an agenda against the Nationalistic people/organizations of this country. You have willfully accused Hindu organizations of distorting facts to suit your agenda and have always ridiculed the Hindutva movement/organizations, desperately trying to impose your degenerated notions upon the viewers, claiming yourself to be self-appointed champion of progressivism, modernity, equality and liberty.

You have time and again condemned all those cadres/groups/organizations as ‘regressive’ who work for preserving Hindu Culture, something which is actually highly unethical, immoral on your part and dangerous for the democracy and the credibility of journalism. We also noticed that your reporter also tried to portray Bajrang Dal using the term ‘immoral police’, etc. and showing violent images which didn’t involve ‘Bajrang Dal’ cadres.

The propaganda that you intend to promote through your channel shall not be allowed at the cost of the reputation of our cadres like Bajrang Dal, who have earned it through lot of sacrifice. We know what motivates you and your promoters, who by such irresponsible reporting (yellow journalism) are bringing the fourth estate into disrepute and let us remind you that Bajrang Dal or any of its Cadre is not working for earning fame or monetary gains like you and your channel.

Our youths are determined, committed & law abiding people with specific intent of protecting the culture, traditions & Dharma and committed towards SEVA / SURAKSHA & SANSKAR for our motherland Bharat, something we doubt that people motivated by TRPs with shallow knowledge of its glorious cultural legacy would understand.

It has been noticed in the past also that you have attempted to ridicule, malign the Hindu organizations, their movement and acts of valor without any justifiable cause and it appears that you take pride in using derogatory remarks against Nationalistic people / organizations, as a measure of securing your ‘secular’ credentials. You and your channel’s conduct of airing such false, defamatory, malicious content on your channel against Bajrang Dal and its cadres is unethical, unwarranted & clearly misuse of the right to expression which has crossed all limits of professional journalism. We also seek an unconditional apology from you and your channel ‘Republic Tv’ at the earliest failing which we reserve our right to take appropriate legal action against you and your channel as per law.

Thanking you
Dr. Surendra Kumar Jain
(Int’l Joint Gen Secretary)
Vishwa Hindu Parishad

CC NEWS BROADCASTING STANDARDS AUTHORITY

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

पत्रकार राजीव रंजन नाग की सामंती मानसिकता और घटिया हरकत से नाराज विपिन धूलिया ने लिखा खुला पत्र, पढ़ें

Mr. Rajiv Ranjan Nag

President

Press Association, New Delhi

Lounge, P.I.B., Shastri Bhavan, New Delhi

Dear Friend

As a senior member and old voter and as a working journalist for over three decades, I was shocked and pained when you told me that you will not renew my membership for the Press Association, New Delhi. While finalizing the voters list last month you deleted many names of senior voters and also denied new membership. There are more than 4000 accredited correspondents. But your members are less than 400. This means 90% are out of the Press Association list. Thus you sought to manipulate voters list to secure your re-election. This smacks of your feudal mindset. The Association is not your fiefdom.

I can easily gauge your chagrin. I have been persuading you for long that you must, as secretary, recover the legal status of the Press Association. You refused to pay any attention. Now see what happened due to your lethargy. The Press Association has lost its status as a legal entity. The Registrar of Societies, NCT of Delhi Government, has terminated our Registration, only because you repeatedly failed to file before him the statutory annual returns. An official statement (in reply to an RTI query) from the NCT-Delhi government confirms this.

You know very well that under Rule 4 of the Societies Registration Act, 1860, the registered society has to file in every January its annual returns, which include the audited accounts (approved by the general body), minutes of all meetings, list of managing  / governing body members etc. The designated authority of the Delhi Government says that you have not filed even a single paper all these years to update/renew the registration number: S-2887. When you got into the Press Council for the second consecutive term in 2014, you knew that you were committing an illegality by seeking nomination from an organization dead under the statute. Still you did nothing to rectify the error. For your information the reply under an RTI query from the Delhi Registrar of Societies is enclosed.

Mr.Nag, I need not tell you, a seasoned organization man, that if a registered society loses its legal status, upon the lapse of registration, it loses recognition of the statutory bodies like the Press Council, CPAC (P.I.B.) and also the right to operate the Bank account and occupy government-allotted office place.

A registered society must have a registered office for communication, including legal notice. The Registrar of Societies in reply to the RTI query has said that the Press Association has not given any address. Only the Lounge of the P.I.B. is mentioned as its office. How can a public/Government place be a registered office of a private society? Moreover, the objective (c) in your constitution underlines the need to maintain “Independence of the Press”. Can you do this from the P.I.B. lounge?

You became smug after you got into the Press Council for the second consecutive term in 2014. You and your cohorts had wilfully destroyed a noble and democratic tradition of the Press Council. The scrutiny sub-committee always had as its members the nominees of the University Grants Commission, Sahitya Akademi and the Chairman Bar Council of India. The Chairman of the Press Council, (a retired Supreme Court judge) was its president.

These unattached members used to examine each and every claim honestly and dispassionately. But you and your partners forced yourself on the Council and gatecrashed into the scrutiny sub-committee. Thus you settled your intra-organisational scores with fellow media bodies. You even went to the extreme in the Press Council meeting on 17th January 2017 when you forced the Chairman and Secretary to leave the hall. And then you got yourself included in the new scrutiny sub-committee for the 13th term of 2017-20. You have thus denigrated the entire Press Council of India for your own selfish purpose.

As you were judge of your own claim application in the scrutiny sub-committee, you thought you can repeat your illegal acts without being noticed. The consequence is that now the Delhi High Court is examining the whole matter. A judgment is awaited soon on the 12th Press Council which ends in October 2017, eight months more.

(Your fraudulent nomination is challenged in this writ petition No:3384/2014.)   

You were complacent that by getting your manufactured documents, attested by the Notary Public (in November 2016), you can legitimise your fake submissions to the 13th Press Council. Your lawyer will tell you that a Notary Public attests what you (Deponent) tell him. A Notary has no machinery to verify what you tell him. The simple issue, you must know, is who is legally authentic: the designated authority like the Registrar of Societies of Delhi-NCT Government, or a private vakeel, nominated just for two years as a Notary. The Notary will even attest if you tell him that you are the Chief Editor of the Washington Post in Delhi.

You know that a false Affidavit invites penal action for perjury, forgery, fraud and impersonation. Already lawyer Parmanand Pandey has during the last two years had convinced the Delhi High Court that the Press Association was dead.

You have seen how another fraternal body, the Indian Journalists Union, a registered Trade Union, has been since 2011 battling in the Patiala House District Court. The IJU factions are led by Mr. Suresh Aukhori and Mr. K.B. Pandit versus Mr. S.N. Sinha and Mr. D. Amar. The Registrar of Trade Unions, Canning Lane, New Delhi, has received in 2016, the annual returns from both the groups but he has not recorded in his official register either Suresh Aukhori or S.N. Sinha as IJU President.

The I.J.U. is no more a legal entity as per Section 28 (2) of the Indian Trade Unions Act, 1926. The membership of the Press Association includes members of the Indian Journalists Union, the National Union of Journalists (I), the Indian Federation of Working Journalists (IFWJ) etc. But you acted on your own very arbitrarily by openly aligning with the I.J.U. (Mr. S.N. Sinha faction) in the Press Council nominations. Thus you destroyed the basic neutrality of the Press Association in intra-union rivalries of the journalist trade unions.

Mr.Nag, the Press Council has asked applicants to submit detailed lists of their members, residing in 12 states with their surname first, residential addresses etc. You have shown that the Press Association members live in 12 states. How can it be? Your constitution says that only those accredited to the P.I.B. alone can become its members. The P.I.B. rule No:6.2 says : ( pib.in/prs/ accreditionguidelines.pdf ) “Accreditation will be granted only to those residing in Delhi or its periphery”. So how do you reconcile this contradiction? The Press Association has been trotting an argument that its members work for various newspapers of different states, though living in Delhi, so it has an all-India character. This is plainly ridiculous. The Press Association nominees belong to Section 5(3)(a) of the Press Council Act, 1978, for the working journalists. Newspapers come under Section 5(3)(b) owners/managers of newspapers.

I wait for your action.

Yours sincerely

Vipin Dhuliya
9818627033

N.B.: I am circulating this letter among our members because it concerns the entire Association. Thanks.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

अमेरिका से काटजू ने मोदी को लिखा पत्र- ‘न विकास हुआ, न अच्छे दिन आए’

To

The Hon’ble Shri Narendra Modi

Prime Minister of India

Dear Modiji,

I would have liked to personally deliver this letter to you, but unfortunately ( or fortunately ) I am presently in America, and likely to be here for some time. So I am posting it on fb, with the hope that someone will forward it to you.

Modiji, The whole country was delighted when at the time you became Prime Minister in May 2014 you promised ‘vikas’ (development) and ‘achche din’ ( good days ), and we all thought that under your brilliant leadership India will now soon become a land of milk and honey.

But Modiji, pardon me for saying so, even after almost 3 years of your rule, I am neither seeing vikas nor achche din, rather I am seeing mandi, girawat, berozgari and bure din.

Maybe that is the fault of my faltering and weakening eyesight. After all, I am an old man, and may be having cataract in the eyes.
But what I hear is this :

1. The unemployment situation, which was already bad during the UPA regime, has worsened under your rule. 1 crore ( i,e. 10 million or 100 lac ) youth are entering the job market in India every year, but only 1.4 lac jobs are being created in the organized sector of the Indian economy annually. What do the remaining youth do? They become hawkers, street vendors, bouncers, stringers, criminals or suicides. Are these ‘achche din’ according to you?

2. Modiji, the Indian youth voted en masse for you in the May, 2014 Lok Sabha elections, because they were captivated by your magic slogan ‘vikas’, which was understood to have meant that now tens of thousands of factories will be set up, and millions of jobs will be created for the youth.

But, Modiji, jobs are created when the economy is expanding. The Indian economy is stagnant, and in fact has gone into recession under your rule ( thanks to doles to your alleged big business cronies and scatterbrained schemes like demonetization, which have created havoc ). Even many of the existing jobs in India have been lost. Where then is the vikas?

3. As regards ‘achche din’, the situation is that lately prices of LPG, petrol, diesel, milk, etc have been hiked.

Modiji, achche din chhodiye, ab kamar tod mehngai hai. Kisan atma hatya kar rahen hain. Bharat ke 50% bachche kuposhit (malnourished) hain. Gharib janta ko swastha labh naseeb nahin hai. Achchi shiksha durlabh hai.

Modiji, kuch kariye na, desh ‘traahi maam, traahi maam’ kar raha hai, magar ap Badshah Nero ki tarah sarangi baja rahe hain.
Saare desh ko apka hi hai sahara, gharib parwar, paikar-e-insaaf, mai baap. Humari naiya ke ap hi hain khiwaiyan

Hari Om

Your humble servant

Markandey Katju

(former Judge, Supreme Court of India)

2.3.2017, Fremont, California, USA

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

इंडिया टीवी के पत्रकार अभिषेक उपाध्याय के नाम खुला ख़त…

जमशेद क़मर सिद्दीक़ी


प्रिय अभिषेक उपाध्याय

बीते एक हफ्ते में आपने फेसबुक पर जो कुंठा ज़ाहिर की है, उससे अब घिन आने लगी है। सुना है आपने खाना-पीना छोड़ दिया है। खुद को संभालिये, आप ‘वो’ नहीं बन सकते इस सच को जितनी जल्दी स्वीकार लेंगे आपको आराम हो जाएगा। लकीर को मिटाकर बड़ा नहीं बन सकते आप, आपको बड़ी लकीर खींचना सीखना होगा, अपने सीनियर्स से सीखिये उन पर कीचड़ मत उछालिये। हालांकि इस मामले में आपकी चुस्ती देखकर मुझे अच्छा भी लग रहा है, ऐसा लग रहा है जैसे ‘स्वर्ग की सीढ़ियां’, ‘नाग-नागिन का डांस’ और ‘क्या एलियंस गाय का दूध पीते हैं’ जैसी स्टोरीज़ में अब आपकी दिलचस्पी कम हो गई है। ये अच्छा संकेत है, मुबारकबाद।

आपकी हालिया पोस्ट पढ़कर महसूस हो रहा है जैसे पत्रकारिता की दुनिया में एक नए नारीवादी पत्रकार ने जन्म लिया है, जो महिला के एक आरोप भर से इतना आहत है कि खाना पीना छोड़ दिया है, सड़क पर बदहवास होकर दाएं-बाएं भाग रहा है, लेकिन फिर मैं ये सोचकर उदास हो जाता हूं कि काश ये क्रांति की ज्वाला थोड़ा पहले जल गई होती तो उस दोपहर आपको प्रेस क्लब में आपके आका रजत शर्मा के लिए किसी बाउंसर की तरह बर्ताव करते न देखता, जिन पर और जिनकी पत्नी पर इंडिया टीवी की एंकर ने गंभीर आरोप लगाए थे।

आरोप भी वही थे जो अब आपको ना काबिले बर्दाश्त लग रहे हैं। वो एंकर मेरी सहकर्मी भी रह चुकी हैं इसलिए मैं समझता हूं कि वो किस पीड़ा से गुज़री थीं जब उन्होंने फेसबुक पर अपना सुसाइड नोट लगाया था। इंडिया टीवी पर तब उस ख़बर के न चलने पर आपने छाती नहीं पीटी थी। काश आपका नारीवाद तब अपने मालिक के नमक का हक अदा करने न गया होता तो कितना अच्छा होता, वैसे मैं आपको एक सुझाव देना चाहता हूं आप नारीवाद के झंडाबरदार के तौर पर अपना नाम दर्ज कराना चाहते हैं तो कराइये लेकिन उससे पहले अपने अंदर के जातिवाद के मैल को साफ कीजिए। आपकी हालिया पोस्ट में आप रवीश कुमार को ये कहकर टारगेट कर रहे हैं कि वो रवीश पांडेय है तो पांडेय क्यों नहीं लगाते? पढ़ाई-लिखाई सब बेच खाई है क्या? ये भी कोई गुनाह है?

मेरा दरख्वास्त है आपसे कि फैज़, दुष्यंत कुमार और बाबा नागर्जुन का नाम बार-बार लेने से परहेज़ कीजिए उनकी आत्माएं तड़पती होंगी। ओम थान्वी जैसे वरिष्ठ पत्रकार के शरीर का मज़ाक उड़ाते हुए उन्हें थुलथुल थान्वी लिखते हुए आपको शर्म आई होगी या नहीं, इस पर अलग से बात की जा सकती है लेकिन हां, कभी अकेले में आइने के सामने खड़े होकर खुद से पूछिएगा कि जिस पत्रकारिता के उसूलों की फिक्र में आप दुबले हुए जा रहे हैं वो तब कहां गए थे जब क़मर वहीद नकवी साहब ने आपके संस्थान से इसलिए इस्तीफा दे दिया था क्योंकि आप प्रधानमंत्री का पेड इंटरव्यू चला रहे थे? तब वो मशालें कहां छुपा दी थी आपने जिन्हें अब झाड़-पोंछ कर सुलगा रहे हैं।

मैं मानता हूं आपके लिए नौकरी बड़ी चीज़ है, घर-परिवार की ज़िम्मेदारी है, मकान की किश्तें हैं, बच्चों की स्कूल फीस है लेकिन फिर भी आपको इतनी हिम्मत तो दिखानी चाहिए थी कि एक बार अपने मालिक से पूछते “सर, आपको ‘कला और साहित्य’ में पद्म भूषण तो मिला है लेकिन कला-साहित्य में आपका क्या योगदान है?” मानता हूं डर लगता होगा आपको, लेकिन सारी दिलेरी सिर्फ अपनी कुंठा निकालने के लिए दिखाना ग़लत है, धोखेबाज़ी है। आपकी घटिया और दो कोड़ी की फूहड़ कविताएं अक्सर फेसबुक पर देखते हुए नज़रअंदाज़ करता था लेकिन अब आप पोस्ट से भी गंदगी फैला रहे हैं इसलिए लिखना पड़ा। उम्मीद है आप खाना-पीना वापस खाना शुरू कर देंगे, इतनी नाराज़गी ठीक नहीं है।

अपना ख्याल रखें
जमशेद क़मर सिद्दीक़ी

विभिन्न टीवी चैनलों में काम कर चुके जमशेद कमर सिद्दीक़ी फिलहाल ‘गाँव कनेक्शन’ में स्पेशल कॉरसपोंडेट हैं। वो रेड एफएम के लिए कहानियां भी लिखते हैं। इनसे jamshed@gaonconnection.com पर संपर्क किया जा सकता है।

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें: