दैनिक जागरण नोएडा के प्रबंधकों ने गायब कराया डेढ़ लाख रुपये का सामान!

मजीठिया मंच : दैनिक जागरण में चमचागीरी का आसान सा तरीका है मजीठिया वेतनमान का विरोध करो। इसी तरीके को अपना कर कई चमचे प्रबंधन के खास बन गए हैं और दैनिक जागरण को दोनों हाथों से लूट रहे हैं। प्रबंधन उन्‍हें ऐसा करने के लिए मौन सहमति दे रहा है। ताजा मामले की बात करें, तो हाल ही में प्रसार व्‍यवस्‍थापक कप्‍तान ने अखबार वेंडरों को बांटने के लिए डेढ़ लाख रुपये का सामान एक वाहन में लोड करके सोनीपत भेज दिया।

सोनीपत के एजेंट सैनी ने सामान यह कहकर लेने से इनकार कर दिया कि वह वेंडरों को गिफ्ट दीपावली से ठीक पहले बांटेंगे। उन्‍होंने सामान नोएडा वापस ले जाने के लिए कहा तो वाहन वाला सामान वापसी का भाड़ा मांगने लगा। यह जानकारी ट्रांसपोर्ट का काम काज देख रहे व्‍यक्ति को दी गई। उसने भाड़ा देने की बात मान ली और सामान नोएडा के लिए रवाना कर दिया गया। इसी बीच सर्कुलेशन मैनेजर के मन में यह बात आई कि क्‍यों न इस माल को खुर्दबुर्द कर दिया जाए। कप्‍तान के इशारे पर सामान खोड़ा के एक मकान में उतार दिया गया। वाहन चालक और दूसरे लोगों ने इस हरकत का विरोध किया तो जानकारी एक प्रबंधक को दी गई। फिर भी सामान नोएडा नहीं पहुंचा। सूत्र बता रहे हैं कि मैनेजर भी इन्‍हीं लोगों के साथ मिला हुआ है।

बता दें कि अब दैनिक जागरण में अयोग्‍य लोगों की टीम हावी है, जो मजीठिया विरोध के नाम पर दैनिक जागरण की गुणवत्‍ता लगातार गिरा रही है। यही वजह है कि अखबार की प्रसार संख्‍या दिनोंदिन गिर रही है। इसी पर नियंत्रण पाने के लिए प्रबंधन गिफ्ट का लालच देकर पाठकों को बांधे रखने का उपक्रम कर रहा है, लेकिन कंपनी के तथाकथित चमचे प्रबंधन की इस योजना को भी पलीता लगाने में लगे हैं। देखना यह होगा कि सीजीएम नीतेंद्र श्रीवास्‍तव कोई कार्रवाई करते हैं या वह भी चमचों को बहती गंगा में हाथ धोने देते हैं। इससे पहले भी प्रसार विभाग के घपले सामने आते रहे हैं। जम्‍मू, पंजाब और हरियाणा में गिफ्ट कूपन के नाम पर पाठकों को बेवकूफ बनाया जाता है। गिफ्ट महाप्रबंधकों के चहेते झाड़ ले जाते हैं और पाठक कूपन भर कर मूर्ख बन जाता है।

फेसबुक पर पत्रकार श्रीकांत सिंह द्वारा संचालित ‘मजीठिया मंच’ पेज से साभार.

उपरोक्त स्टेटस पर Rakesh Pandey की त्वरित टिप्पणी यूं है: ”जागरण के मालिकों के पास विज्ञापन से आई कमाई के नोट गिनने से फुर्सत नहीं है सरकुलेशन मैनेजर काकस बना कर संस्थान को चूना लगाने में जुटे है रोजाना हजारों कापियां रद्दी के भाव बिकवाकर मालिकों को झूठी सेल रिपोर्ट भेजी जा रही है सरकुलेशन का नेशनल हेड भी इसमें शामिल हो सकता है।”

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पत्रकार अभिषेक उपाध्याय ने बताई पंकज श्रीवास्तव टाइप क्रांतिकारियों की असलियत, आप भी पढ़ें….

(अभिषेक उपाध्याय)


Abhishek Upadhyay : बहुत शानदार काम किया। Well done Sumit Awasthi! Well done! सालों से सत्ता की चाटुकारिता करके नौकरी बचाने वाले नाकाबिल, अकर्मण्यों को आखिर रास्ता दिखा ही दिया। उस दिन की दोपहर मैं आईबीएन 7 के दफ्तर के बाहर ही था जब एक एक करके करीब 365 या उससे भी अधिक लोगों को आईबीएन नेटवर्क से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था। चैनल के अंबानी के हाथों में चले जाने के बावजूद बेहद ही मोटी सैलरी लेकर चैनल का खूंटा पकड़कर जमे हुए उस वक्त के क्रांतिकारी मैनेजिंग एडिटर खुद अपने कर कमलों से इस काम को अंजाम दे रहे थे। एक एक को लिफाफे पकड़ाए जा रहे थे।

मैं उस वक्त उज्जवल गांगुली से मिलने वहां गया था। आईबीएन 7 के कैमरा मैन उज्जवल गांगुली उर्फ दादा उर्फ ददवा मेरे बेहद ही अज़ीज़ मित्र हैं और वो भी उस लिस्ट में शामिल थे जो उस वक्त अंबानी के चैनल में शीर्ष पर बैठी क्रांतिकारियों की पौध ने अपने हाथों से तैयार की थी और जिसमें बेहद कम सैलरी पर सुबह से लेकर रात तक चैनल के वास्ते खटने वाले “बेचारे” पत्रकारों की भीड़ थी। अधिकतर वही निकाले वही गए जिनकी सैलरी कम थी, जो किसी मैनेजिंग एडिटर के “लॉयल” नही थे, जो चाटुकार नही थे, जो काम के अलावा किसी दूसरे मजहब के अनुयायी नही थे। बाकी वामपंथ के नाम पर दिन रात भकर-भौं करने वाले, लाखों की सैलरी उठाकर, मंहगी गाड़ियों से आफिस पहुंचकर आफिस में सिर्फ बौद्धिक उल्टियां करने वाले, रात को वोदका पीकर और केंटुकी फ्राइड का चिकन भकोसकर सर्वहारा के नाम पर लगभग आत्महत्या की स्थिति तक व्यथित हो जाने वाले, हिमाचल के तत्कालीन मुख्यमंत्री के बेटे अनुराग धूमल का अनंत प्रशस्ति गान करके, हिमाचल में शानदार होटल का लाइसेंस हथियाकर पत्रकारिता की दुकान सजाने वाले, सब के सब सुरक्षित थे। पूरा का पूरा “गैंग” सुरक्षित था। वेल डन सुमित अवस्थी! ये तो नैचुरल जस्टिस हुआ न! पोएटिक जस्टिस है ये तो! ये तो एक दिन होना ही था। अच्छा हुआ, ये आपके कर कमलों से हुआ। इतिहास याद रखेगा आपके इस योगदान को।

अच्छा! ये भी अदभुत है। क्रांतिकारिता की नई फैक्ट्री खुली है ये। चैनल को अंबानी खरीद ले। कोई फर्क नही। मोटी सैलरी उठाते रहो। बिना काम के ऐश करते रहो। चैनल में केजरीवाल का बैंड अरसे से बज रहा हो। कोई फर्क नही। बिग एम की तरह बजते रहो, बजाते रहो। सत्ता के तलुवे चाटते रहो। चैनल पर मोदी गान हो रहा है। होने दो। चैनल से भोले भाले मासूम कर्मी लात मारकर निकाले जा रहे हैं। पियो वोदका। और वोदका पीकर रात के 2.30 से 3.00 के बीच में, (जब पिशाब महसूस होने पर उठने का जी करे), तान लो मुठ्ठियां और कर दो मूत्र विसर्जन। मगर जब निज़ाम बदल जाए और नए संपादक से मामला “सेट” न हो जाए और जब ये तय हो जाए कि अब कटनी तय है तो उसी शाम एक मैसेज भेजो और खुद के क्रांतिकारी होने का मैग्नाकार्टा पेश कर दो। दरअसल ये सब मनुष्य नही, बल्कि प्रवृत्तियां हैं। कुंठा के मानस पुत्र हैं ये। इलाहाबादी हूं, इसलिए जब भी कुछ लिखता हूं, दुष्यंत कुमार अपने आप सामने खड़े हो जाते हैं। दुष्यंत ने ऐसी ही कुंठित प्रवृत्तियों के बारे में ये कहते हुए आगाह किया है कि-

“ये कुंठा का पुत्र
अभागा, मंगलनाशक
इसे उठाकर जो पालेगा
इसके हित जो कष्ट सहेगा
बुरा करेगा
प्राप्त सत्य के लिए
महाभारत का जब जब युद्ध छिड़ेगा
ये कुंठा का पुत्र हमेशा
कौरव दल की ओर रहेगा
और लड़ेगा।“

अव्वल तो इस बात के ही खिलाफ हूं कि जब समय खुद ही इन कुंठा पुत्रों को इनकी नियति की ओर भेज ही रहा है तो क्यों इस पर कलम तोड़ी जाए। मगर कल से आज तक कथित बड़े पत्रकारों के बीच जिस तरह का विधवा विलाप देख रहा हूं, लगा कि ऐसे तो नही चलने वाला है। ऐसे रो रही हैं कार्पोरेट पत्रकारिता के पैसो से अपनी अंटी गरम करके बौद्धिक उल्टियां करने वाली ये अतृप्त आत्माएं मानो गयी रात ही इनका सुहाग उजड़ गया हो। इस दौर में ये बहुत जरूरी है कि इस तरह के नकाबपोशों की पहचान हो। उसी कार्पोरेट पत्रकारिता के प्लेटफार्म से लाखों की सैलरी हर महीने उठाकर, और कार में फुल एसी चलाकर दफ्तर पहुंचने वाली ये आत्माएं रात ढ़लते ही हाथों को रगड़ते हुए बहुत कुछ टटोलती नजर आती हैं। बारी बारी से मंडी सज जाती हैं।

पहले चैनल पर मोदी का करिश्मा बेचो, स्वच्छ भारत अभियान बेचो। अपने मालिक के स्वच्छ भारत अभियान के ब्रैंड एंबैसडर होने की खबर बेचो। हाथो को टटोलो और उसे रगड़ते हुए कार्पोरेट पत्रकारिता का हर खंबा बेच डालो। और फिर रात ढलते ही, वोदका गटको और फिर शुरू हो जाओ। अबकी बारी फेस बुक पर आओ और गरीबों की भूख बेचो। विदर्भ के किसानो की आह बेचो। बुदेंलखंड के किसानो की आत्महत्या बेचो। आंसू बहाओ पत्रकारिता के पतन पर। रोओ कार्पोरेट पत्रकारिता के अंजाम पर। गरीबों, फटहालों की बदहाली की स्याही अपनी कलम में उड़ेलकर उसकी कूची बनाओ और फिर अपनी बौद्धिक छवि चमकाओ। सेमिनारों में जाओ। पोस्टर लगाओ। क्रांतिकारी बनो और इंटरव्यू को भी क्रांतिकारी बनाओ। मुझे लगता नही कि पत्रकारिता के दोगलेपन का इससे बड़ा भी कोई उदाहरण होगा।

आज रो रही हैं ये सारी की सारी पत्रकारिता की भोथरी तलवारें। कोई फर्क नही पड़ता कि जिस छत के नीचे आप काम कर रहे हों, जिस छत के एकाउंट सेक्शन से लाखों की सैलरी लेकर अपनी जेब गर्म कर रहे हों, उस छत के बारे में राम जेठमलानी से लेकर सुब्रहमण्यम स्वामी तक सभी खुले मंच पर ब्लैक मनी के घालमेल की कहानी बयां कर रहे हैं। वो भी एक नही दर्जनो बार। मय सबूत समेत। यहां तक इस मामले की आंच पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम तक पहुंच चुकी है। मगर आरोपों में घिरी इसी छत से लाखों की सैलरी और छप्पर फाड़ सुविधाएं उठाकर शुचिता और शुद्धता की बात करने वालों का विधवा विलाप यहां से भी सुनाई दे रहा है। यहां भी आईबीएन में हुई इस घटना की बाबत चुप्पी तोड़ने और साथ देने की हुंकार भरी जा रही है। खुद अपने ही संस्थान से कितने लोग और कितनी ही बार बिना किसी कसूर के छंटनी के नाम पर निकाल दिए गए, मगर ये बौद्धिक आत्माएं जोंक की तरह अपनी कुर्सी से चिपकी रहीं। मालूम पड़ा कि उस दौरान सांस की रफ्तार भी थोड़ी धीमी कर दी थी कि कहीं सांस की आवाज को लोग आह समझ बैठें और नौकरी पर खतरा आ जाए। यहां भी ग्रेटर कैलाश की सड़कों पर सरपट रफ्तार से बड़ी कार दौड़ाते हुए फेस बुक पर गरीबों का दर्द शरीर से मवाद की तरह बह निकलता है। ये सबकी सब दोगली आत्माएं ऐसा लगता है कि जैसे धर्मवीर भारती के अंधायुग के अश्वात्थामा से प्रेरित हों—
अंधा युग में अश्वत्थामा कहता है..

“मैं यह तुम्हारा अश्वत्थामा
कायर अश्वत्थामा
शेष हूँ अभी तक
जैसे रोगी मुर्दे के
मुख में शेष रहता है
गन्दा कफ
बासी थूक
शेष हूँ अभी तक मैं..।”

वक्त बहुत निर्मम होता है। उसे आप अपने बौद्धिक आतंकवाद का शिकार नही बना सकते। वो जब पहचान लिखता है तो अश्वत्थामा की तरह से ही लिखता है। दरअसल ये सुविधाभोगी वामपंथियों की पौध है, जिनका ईमान इस तरह फुसफुसा और लिसलिसा है कि एक बार इनकी नौकरी पर आंच आने की नौबत हो, और अगर चरणों पर लोटने से भी रास्ता निकल जाए तो उसके लिए भी तैयार रहेंगे, ये भाई लोग। और जब सारे ही रास्ते बंद हो जाएँ तो एकाएक इनके भीतर का क्रांतिकारी सांप फन काढ़कर खड़ा हो जाएगा, मुठ्ठियां तानने की धमकियां देता हुए, हाथ रगड़ रगड़कर हवा में अपने ही चरित्र के वजन को टटोलता हुआ, ग्रेटर कैलाश की सड़कों पर कार के भीतर फुल एसी की मस्ती या फिर ब्लोअर के मस्ताने टंपरेचर में गुलाम अली को सुनते हुए, सोशल मीडिया पर रोता हुआ, गरीबों की आह महसूस करता हुआ। अगर इन कथित क्रांतिकारी पत्रकारों को दिसंबर-जनवरी की बस एक रात के लिए भारी कोहरे और नम जमीन के चारों और तने मुज़फ्फरनगर के दंगापीडि़तों या फिर कश्मीर के सैलाब पीड़ितों के एक चादर वाले फटे-चिथड़े टेंट में छोड़ दो, तो उसी रात इन्हें उल्टी और दस्त दोनो एक साथ हो जाएगा। इन्हें मुजफ्फरनगर के दंगा पीड़ितों के दर्द की बाबत भी फेसबुक पर कलम तोड़ने से पहले फुल स्पीड का ब्लोअर, रम के कुछ पैग और बंद गले का ओवरकोट चाहिए होगा, क्योंकि उसके बगैर तो उंगलियों से लेकर संवेदना तक सभी कुूछ जम जाएगा। खालिस बर्फ की तरह। आईबीएन 7 के स्टेट करेस्पांडेंट रहे और अपने बेहद अज़ीज़ गुरू सत्यवीर सिंह जो खुद इसी छंटनी का शिकार हुए थे, ने उसी दिन मुझे रात में फोन करके बोला था कि गुरु देखो आशुतोष ने अंबानी का बूट पहनकर हम सब के पेट पर लात मार दी। सत्यवीर सर, आज मैं कह रहा हूं कि, ये वक्त है। वक्त। ये पूरा का पूरा 360 डिग्री का राउंड लेता है, ये। ये एक चक्की है गुरू। चक्की। पिंसेगे तो सारे ही। कोई कल पिस गया। कोई आज पिस रहा है, और किसी की बारी आने ही वाली है।

दरअसल आज तो इनकी बात का दिन ही नही है। आज तो बात होनी चाहिए उन 365 कर्मचारियों की जो मोटी सैलरी पाकर बॉस की चाटुकारिता करने वाली इन्हीं कुंठित ताकतों की भेंट चढ़ गए। इनको इनकी नौकरी वापस होनी चाहिए। ये वे लोग हैं जो 15 हजार से लेकर 30 हजार महीने की सैलरी पर अपने परिवार का पेट पालते हैं। कुछ कुछ इससे भी कम पाते थे। बहुतों के बच्चों का स्कूल छिन गया। बहुतों के घर टूट गए। बहुत आज की तारीख में फ्री लांसिंस करके दर दर की ठोकरें खा रहे हैं। ये सब एक बड़ी कार्पोरेट साजिश की भेंट चढ़ गए और जिनके साजिशकर्ता आज एमपी से लेकर एमएलए बनने की जुगत में उन्हीं कार्पोरेट ताकतों को गरिया रहे हैं जिनकी रोटी खाकर अपने खून का रंग लाल से नीला कर लिया है। पर इनकी बात तो आज होती ही नही है। सुमित अवस्थी, अगर कचरा साफ करने की इस प्रक्रिया से जो धनराशि बचे, उससे कुछ ऐसे ही मेहतनकश मगर अभागे (अभागे इसलिए क्योंकि ये किसी मैनेजिंग एडिटर के नजदीकी नही हो सके) लोगों को आप नौकरी दे सकोगे तो इतिहास और भी बेहतर शक्ल में याद रखेगा आपको। फिलहाल Keep up. As of now you are the instrument of poetic justice!

अभिषेक उपाध्याय तेजतर्रार पत्रकार हैं. अमर उजाला से लेकर इंडिया टीवी तक की यात्रा में कई चैनलों अखबारों में वरिष्ठ पदों पर रहे. अभिषेक अपनी खोजी पत्रकारिता और विशेष खबरों के लिए जाने जाते हैं. उनका यह लिखा उनके फेसबुक वॉल से लिया गया है. उपरोक्त स्टेटस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं….

Yashwant Singh पंकज श्रीवास्तव नामक हिप्पोक्रेट पत्रकार की अवसरवादी फ़िक्सर क्रांतिकारिता पर एक और पोल खोलक पोस्ट। निर्दोष किस्म के मूर्ख, भावुक, अति उत्साही और कार्यकर्ता मानसिकता वाले कामरेडों अब तो आँख खोलो….

Vikas Mishra इसे कहते हैं जिगर… जो अभिषेक तुमने दिखाया है। सच कहा और डंके की चोट पर सच कहा।

Sandeep K. Mishra ..कईयों के कंठ इस इंतजार में अभी भी सूख रहे होंगे कि कब तलवार-ए-सुलेमानी से उनका सामना होगा।। हालांकि साहब मीडिया हित में कई चैनलों में ऐसे अभियान की जरूरत है।। जहां सेटिंग वाले डिस्को और काम वाले खिसको जैसे हालात से दो-चार हैं।।।।।

Vishal Singh लिखने के लिए साहस होना चाहिए.. आपको साहस को सलाम…

Rashid Rumi Well done Abhishek sir.pahle Well done sumit awasthi dekga to laga k aap sumit ki tarif kar rahe ho k usne pankaj ko nikala. Magar pura padha to dil khush ho gaya. Journalists ko ye corporate wale tawayef bana k rakha haia.. we r not doing what we taught in journalism. Weal should stand against it.

Suneel Mishra Vo sadak par bhagne vale patrkaro ka support kar rate hai, aur daru peeke baudhik pelne vale editors ko aaina dikha rahe hai. Nice post Abhishek Upadhyay bhai.

Anoop Tripathi बहुत खूबसूरत सच और जवाब दिया आपने

Imran Siddiqui Patrakarita ke naam par dalali ki dukan chala rahe hain. Inka zameer mar chuka hai. Abhishek bhai apne accha jawab diya hai. Hope the situation will b change one day.

Rajshree Singh I remember ….apne kaha tha ki aap IAS nahi banna chahte…kyu ap kishi ke dabav me kaam nahi karna chahte the….kya kahi azadi nahi hai sach bolne aur likhne ki

Abhishek Upadhyay Rajshree Singh पत्रकार बनने के अपने फैसले से बेहद ही खुश हूं जिंदगी में बहुत कम ही ऐसे फैसले हैं जिनके बारे में सोचकर अच्छा लगता है। ये उनमें से एक है। रही बात सच बोलने की आजादी की तो वो हर जगह है और कहीं नहीं है। हम सब अपनी अपनी सीमाओं में इसी आजादी को explore करते हैं। जो जितना अधिक explore कर लेता या सकता है, वो उतना ही जयी होता है।

Riyaz Hashmi धो डाला भाई, ये है खरी खरी।

Ashish Chaubey क्या करेंगे भईया ये लडाई ही चाटुकारिता बनाम पत्रकरिता की हो गई है…. जिसमें चाटुकारिता चरम पर है…. दलालों ने पत्रकारिता को नेपत्य में ढकेल देने की मानों कसम खा ली हो… लेकिन पत्रकारिता को दबा पाना इतना आसान भी नहीं जितना इन दलालों लगता है….

Latikesh Sharma आप ने जो लिखा है उसे जानते सभी है , लेकिन उसे लिखने के लिए दम चाहिये। आप में दम है और आप ने लिखा भी है , इसलिए आप के साहस को सलाम !

Baljeet Singh Adv अभिषेक आपको शायद याद होगा, बहराइच जनपद में लोकरीति दैनिक हुआ करता था, उसके हम लोगों ने बन्द कर दिया। कारण यह है कि चाटुकारिता वाली पत्रकारिता नहीं हो पायी और लोकरीति को बन्द करना पड़ गया। वर्तमान समय में नेता, अभिनेता और अधिकारियों को अपने मतलब की खबर छापने/दिखाने वाले ही पसन्द है, शेष उनके दुश्मन।

Rahul Ojha बहुत सुन्दर भाई क्या लिखा है पूरे कपडे उतार लिया आशुतोष के मज़ा आ गया ।

Rishi Raj दिक्कत यही है कि हमने अपने ही कौम के बीच खाई बना दी है ।आपसी रंजिश को कभी न कभी तो त्यागना होगा वरना बजते रहिये या फिर भजते रहिये सरकार

Rinku Chatterjee स्नेही अनुज आज दी को तुम्हारा मस्तक चूमने का मन हो रहा है। मेरे आशीर्वाद से उठे हाथ को अपने सर पे महसूस करो। मुझे नाज़ है तुम पे।

Krishna Dev क्या लिखते हो मित्र, ग़ज़ब ।

Kishor Joshi एकदम सटीक आभिषेक जी!!! कहते हैं ना कि- जब शहादत कला बन जाती है, तो शहीदों पे बड़ी हंसी आती है।

Rajanish Pandey “देखे है बहुत बाते बनाने वाले ,बाते वाले जनाब काम किधर करते” यही हाल था जनाब ‘ग्राउंड जीरो’ का।।

Ajay Pandey अभिषेक Boss आपसे शब्दश: सहमत हूं, खून का रंग कभी पानी नहीँ होता है, इंसान की मजबूरियां, गरीबी और लाचारी उसे पानी पर जीने को मज़बूर कर देती है। जिसके मन में दूसरे के लिए पीड़ा हो उसे मैं आम इंसान नहीं मानता हूं, आपके लिए दुआओं के हज़ारों हाथ उठेंगे।

Divakar Mishra Poori kadvi sachayi nikal kar rakh diye Abhishek Upadhyay jo shayad mere jaise bahut so log nahi jante the. Very well done..

आशुतोष बाजपेयी Bhai..kya badhia likhte ho! Maza aa gaya,, aapke jaise kuch log na ho to patrkarita se kab ka bharosa uth gaya hota

Abhishek Katiyar Sir.. Pahali bar maine itna lamba content read kiya hai kisi bhi post ka.. really aap bahut umda likhte hai.. itna bewak bilkul clear and i wish ke aapka ye outspoken attitude hamesha bana rahe.. U r simply superb Sir.. Heads off to you

Sudhanshu Tripathi शब्दशः सत्य कहा अभिषेक भाई। वक्त 360 डिग्री राउण्ड लेता है। सभी को इन्तहान देना पड़ता है। आज नहीं तो कल नम्बर तो सभी का आता है।

Abhishek Yadav Kya baat hai sirji, aapne to kaynaat hi dikha do aaj kal ki.

Alok Bhardwaj Es bat ko uchit forum me uthaya jaye maine pankaj ji bhi post padi thi …….bahut badi safai ki jarurat hi media me..nahi ek din aisa hoga jaise europe me church ki bhumika thi waise hi media khaskar e media ki yaha hogi

Abhishek Upadhyay दरअसल ये किसी सिद्धांत विद्धांत की लड़ाई नही, बल्कि खालिस सेटिंग गेटिंग की लड़ाई है जिसे बौद्धिकता की चासनी से सानकर सुशोभित कर दिया गया है, महज क्षुद्र स्वार्थ की खातिर।

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मित्ररंजन भाई, आपने पागुरप्रेमी पंकज परवेज का पुख्ता बचाव किया है

: पंकज परवेज का विलाप और किसी की जीत के जश्न का सवाल : किसी मित्ररंजन भाई ने अपने मित्र पंकज परवेज मामले पर जोरदार बचाव किया है। बचाव में घिसे हुए वामपंथी रेटॉरिक और शाप देने वाले अंदाज में परवेज भाई के चेहरे से नकाब खींचने वालों की लानत मलामत की गई है। लेकिन परवेज भाई की पवित्र और पाक क्षवि पर सवाल उठाने वाले लोगों को भाजपाई और संघी कहने का उनका अंदाज उस लिथड़ी हुई रजाई की तरह हो गया है जिसकी रुई की कई सालों से धुनाई नही की गई है। पार्टी और संगठन में असहमति और आलोचना पर संघी होने का ठप्पा लगा देने की रवायत बहुत पुरानी रही है। लेकिन दुर्वासा शैली में कोसने और गरियाने के बावजूद इस संगठन और पीछे की पार्टी का स्वास्थ्य दिनोंदिन खराब होता जा रहा है। लेकिन कॉमरेड लोग हैं कि मुट्ठी तानने / मारने में मशगूल हैं।

पंकज परवेज ने फेलोशिप के पैसों से अपने दलिद्दर साथियों को पाला। उन पैसों से  भुखनंगों को दाल-भात भकोसने का इंतजाम किया, उनके लिए किताबें खरीदीं। घर पर अकूत संपत्ति होने के बावजूद पत्रकारिता करने के लिए अमर उजाला में दो कौड़ी की नौकरी की। 17 सालों तक संघर्ष किया और फिर दो लाख रुपये के छोटे से पैकेज पर पहुंचे। संघर्ष के दिनों में सपत्नीक मित्ररंजन भाई के घर पर बारहा हाजिरी लगाई। क्या इतना काफी नहीं है परवेज भाई को ‘लाल-रत्न’ घोषित कर देने के लिए ? कमाल करते हैं थेथर लोग। परवेज भाई पर तोहमत लगा रहे हैं कि किसी को नौकरी क्यों नहीं दिलवाई। ऐसे चिरकुट अपने करियर में ताउम्र प्याज छीलते रहे तो क्या इसके लिए परवेज भाई या संगठन जिम्मेदार है? अपनी ‘काहिली’ और ‘गतिशीलता’ में कमी के चलते उपजी दुश्वारियों का ठीकरा संगठन के सिर फोड़ लेने से ऐसे फरचट और चित्थड़ लोग क्या खुद अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त हो जाएंगे?….गजब…जियो रजा बनारस..मजा आ गया।

परवेज भाई पर उठी हर उंगली पार्टी और संगठन पर उठी उंगली है, लिहाजा सभी चिलमचट्टू कामरेडों को चेतावनी दी जाती है कि अब अगर किसी ने परवेज भाई के कुर्ते की लंबाई एक बिलांग भी छोटी करने की कोशिश की तो उनको ‘मोदी आर्मी का सिपाही’ घोषित कर उनका श्राद्ध कर दिया जाएगा। फिर आप अखिलेंद्र प्रताप सिंह और लालबहादुर सिंह की तरह न घर के रहेंगे न घाट के। माना कि हमने संगठन के लिए ढपली बजाने के काम में आपको जोत दिया। माना कि आप दिन रात संगठन के लिए दरी-कनात बिछाते रहे और हमलोग उस पर जमकर प्रवचन भी करते रहे तो इसमें हमारा क्या दोष है। मजदूर मक्खी अगर रानी मक्खी बनने की कोशिश करेगी तो मक्खियों की वंशवेल कैसे बढेगी। मजदूर कामरेड अगर मालिक कामरेड बनने की कोशिश करेगा तब तो चल चुका संगठन। डिसीप्लीन सीखिए कामरेड…डिसीप्लीन।

‘डेमोक्रेटिक सेंट्रलिज्म’ सवाल खड़ा करने वाला दुष्ट है, पापी है, खल है। ऐसे खलों की खाल से खंजड़ी बजाना पार्टी और संगठन का बुनियादी उसूल है। संगठन के पूज्यनीय साथियो में से एक ‘साथी शिरोमणि पंकज परवेज’ पर की गई टीका टिप्पणी से पार्टी और संगठन की आस्था पर चोट पहुंचती है। जनमानस में रची बसी उनकी छवि को धुलिसात करने पर संगठन ऐसे गरीब, टुटपूंजिया,  भगोड़े और अल्पज्ञ साथियों की दुर्दशा पर संतोष प्रकट करता है और अपने हरेक महामंडलेश्वर से प्रार्थना करता है कि उक्त श्रेणी के साथियों के साथ किसी प्रकार का कोई स्नेह न जताया जाए। जिस भी महामंडलेश्वर ने अपनी अभूतपूर्व ‘गतिशीलता’ से (येन केन प्रकारेण) किसी लाले की दुकान में कुर्सी हथिया ली है वो लाला के आगे लहालोट होकर कुर्सी से चिपक कर बैठे रहें और यदा कदा अपनी सहूलियत से संगठन के पक्ष में ‘मुखपोथी’ का पारायण करते रहें। इस दरम्यान उनका संगठन से पूर्व में जुड़े किसी भी किस्म के चिरकुट साथी से मेलजोल अपेक्षित नहीं है। अपितु स्पृहणीय तो यह होगा कि ऐसे गतिशील और जुगाड़ू साथी अपने आस-पास किसी नौकर श्रेणी के कामरेड को तो बिल्कुल भी न फटकने दें जिनकी संगत से उनकी प्रतिष्ठा धूमिल होती है। ध्यान रहे ऐसे नौकर कामरेडों की जरूरत सिर्फ उस वक्त के लिए है जब स्टार साथी किसी मुसीबत में फंस जाएं। मुसीबत के वक्त बस आपको अपनी मुट्ठी को मीडिया की मुड़ेर पर टांग देना होगा। फिर देखिएगा कैसे रुदालियों का रेवड़ सियापा करते हुए आपके पृष्ठ भाग के भगंदर पर भौकाल काट देगा।

मित्ररंजन भाई आपने पागुरप्रेमी पंकज परवेज का पुख्ता बचाव किया है। लेकिन साथी, भकरभांय में वाममार्ग के वचनामृत वमन से आगे जहां और भी है। आपको पंकज परवेज पर प्रहार करने वालों की सोच पर तरस आता है कि संगठन को ये लोग प्लेसमेंट एजेंसी समझते रहे। मित्ररंजन भाई आप जिस दो कौड़ी के एनजीओ के जुगाड़ में लगे हैं वहां से आप इससे आगे सोच नहीं सकते, हम इस बात को समझते हैं। मित्र पहली बात तो ये कि आपने जिस टिप्पणी करने वाले का परिचय पूछा है वो मैं हूं। और दूसरी बात ये कि मैं कभी आपके प्यारे मित्र पंकज परवेज से नौकरी मांगने नहीं गया और ना उनको पैरवी करने के लिए कभी फोन किया। मैं अपने खुद के व्यवसाय से अपना जीवन जी रहा हूं। लेकिन मैं आज भी उन सच्चे साथियों की संगत में रहना पसंद करता हूं, जिन्हें मैने बेहद सुलझा और स्वाभिमानी पाया। उन लोगों से पंकज जैसे न जाने कितने पेंदी रहित पाखंडियों की कारगुजारियों के बारे में खबरें मिलती रहती हैं। कि कैसे फलां उस भगवा चड्ढी के सामने लंगोट उतारकर लोट लगा रहा है, कैसे ढिमाका उस कुक्कड़खोर कनकौए कांग्रेसी की कदमबोशी में झुका हुआ है। कुल जमा ये कि कामरेड लोग कंबल ओढ़कर घी पी रहे हैं और फेसबुक पर क्रांति पेल रहे हैं। कोई हर्ज नहीं है लगे रहिए, छककर छानिये फूंकिए लेकिन भाई जब पेंदे पर लात पड़की है तो “साथियों साथो दो” का नारा क्यो ?

लेखक के. गोपाल से संपर्क anujjoshi1969@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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पंकज श्रीवास्तव ने अपनी पत्नी के जरिए भड़ास के खिलाफ मोर्चा खुलवाया

Manisha Srivastava : यशवंत और उसकी भड़ास ! बरदाश्त की भी एक सीमा होती है। भड़ास का मॉडरेटर यशवंतसिंह जिस तरह मेरे पति पंकज श्रीवास्तव के खिलाफ घृणित अभियान चला रहा है, उसके बाद मेरे लिए चुप रहना मुश्किल है। हाँलाकि पंकज उसके ख़िलाफ एक शब्द न बोल रहे हैं और न ही लिख रहे हैं, पर चूंकि यशवंत ने उन्हें परेशान न करने का अपना वादा तोड़ दिया है, इसलिए उसे आईना दिखाना ज़रूरी है। खासतौर पर जब पंकज पूंजी की पत्रकारिता पर पड़े नकाब को नोचने में जुटे हैं और इसकी कोई भी कीमत चुकाने के लिए तैयार हैं।

ये वही यशवंत है जो पंकज को इलाहाबाद विश्वविद्यालय से लेकर लंबे पत्रकारीय जीवन में अपना बड़ा भाई, गार्जियन यहां तक कि आदर्श मानता था। जब पंकज सड़क पर खड़े होकर ढफली बजाते हुए क्रांति के गीत गाते थे तो वह पीछे कोरस में रहता था। लेकिन करीब सात साल पहले दिल्ली में जब उसने एक दलित कॉमरेड की बेटी के साथ रेप की कोशिश की और हवालात पहुंचा तो पंकज ने उससे बात करना बंद कर दिया। उसकी तमाम कोशिशों के बावजूद यशवंत पंकज की जिंदगी ही नहीं, फोन में भी दाखिल नहीं हो पाया। 

पंकज का जन्मदिन 3 जुलाई है। 2011 की 7 जुलाई को फेसबुक के मैसेजबाक्स में यशवंत ने बधाई लिखी तो उन्होंने भी शुक्रिया कहने की औपचारिकता निभा दी। 8जुलाई को यशवंत ने बात आगे बढ़ाने की कोशिश की तो क्या हुआ, आप लोग खुद पढ़ लें। आप को पता चल जाएगा कि यशवंत किस चीज की भड़ास निकाल रहे हैं–


Conversation started 7 जुलाई 2011
Yashwant Singh
07-07-2011 09:59 अपराह्न
Yashwant Singh
जन्मदिन की बधाई पंकज भाई.
Pankaj Srivastava
07-07-2011 10:00 अपराह्न
Pankaj Srivastava
शुक्रिया..
8 जुलाई 2011
Yashwant Singh
08-07-2011 09:25 पूर्वाह्न
Yashwant Singh
लगत ह जवाब देवे में बड़ा मेहनत पड़ गईल है… न एक शब्द एधर न एक शब्द ओधर… सिरफ… शुक्रिया… दस बीस साल में तोहूं मरबा और हमहूं… त तोहार अंइठनवा भी साथ चल जाई…. बुझला बाबू…. चला, हमहूं तोहरे शुक्रिया खातिर शुक्रिया बोल देत हंई….
Pankaj Srivastava
08-07-2011 09:33 पूर्वाह्न
Pankaj Srivastava
कभी सोचना कि इस ऐंठन की वजह क्या है…हम लोगों की एकता का आधार कुछ मूल्य और विचार थे…जब वही नहीं रहे तो फिर किसी रिश्ते का मतलब क्या है……वैसे, ज्ञानदान का शुक्रिया…पर मैं अपने लिए दस-बीस नहीं, दो चार साल की भी गारंटी करने में असमर्थ हूं। बाकी तुम जियो हजारों साल… फूलो-फलो…
Yashwant Singh
08-07-2011 12:18 अपराह्न
Yashwant Singh
हम लोगों की एकता का आधार कुछ मूल्य और विचार थे…..
ठीक से अंदर देखना पंकज भाई, ये मूल्य व विचार किसने ज्यादा बचा रखे हैं, कौन इस पर ज्यादा जी रहा है, कर रहा है, लड़ रहा है, चल रहा है…
और, जो वाकई कुछ मूल्य व विचार पर चलता है वह विनम्र होता है, झुकता है, प्यारा होता है, ऐंठता नहीं है, गुमान नहीं पालता है….
वैसे, इस देश में हर किसी को मुगालते पालकर खुश होने का अधिकार है…. आप श्रेष्ठ बने रहें, आपकी श्रेष्ठता आपको मुबारक…
Pankaj Srivastava
08-07-2011 01:38 अपराह्न
Pankaj Srivastava
मैंने ये कब कहा कि मैंने मूल्यों को बचा रखा है। मुझे ये मानने में कोई दिक्कत नहीं कि तुम ज्यादा साहसी और रचनात्मक हो। जो अराजकताएं हैं, वो पहले भी थीं तुममे, जिनके बावजूद मैंने तुम्हें छोटे भाई जैसा मान दिया था। पर हुआ ये कि तुम्हारी याद आते ही मेरी आंख के सामने उस साथी का चेहरा नाचने लगता है। …इसलिए ये भरोसा टूटने का मामला है। वैसे भी भाई जब अलग राह पर चले जाते हैं तो दोस्त नहीं रह जाते। मैं तुम्हारे साथ सहज नहीं रह पाता। बात बस इतनी है। वैसे मेरी शुभकामनाएं हमेशा तुम्हारे साथ हैं।…पता नहीं क्यों मैं निकट के लोगों में कुछ बेहद बुनियादी किस्म की ईमानदारी चाहता हूं। इस कसौटी पर खुद को भी हमेशा कसता रहता हूं। ….वैसे, अब बहस नहीं करना चाहूंगा। जो किया, उसके लिए भी तुम्हारी जिद ही जिम्मेदार है। यही तुम्हारी ताकत है…
9 जुलाई 2011
Yashwant Singh
09-07-2011 11:39 पूर्वाह्न
Yashwant Singh
मैं अपने को अपनी संपूर्ण बुराइयों और अराजकताओं के साथ खूब प्यार करता हूं और गर्व करता हूं. गुण-अवगुण, अच्छा-बुरा, ईमानदारी-बेईमानी….. सब बाद में सोचता हूं, पहले जीवन जीता हूं….. और जीवन खांचों से परे होता है…. संपूर्णता में होता है…. जिसमें अच्छा-बुरा अलग अलग नहीं, वैकल्पिक नहीं बल्कि एक साथ होते हैं…. हर अच्छे में बुरा होता है और हर बुरे में अच्छा…. यही ईमानदारी और बेईमानी भी है…. कई बार कोई अपनी ईमानदारी को परिभाषित नहीं कर पाता सो वह बेईमान बन जाता है और कई बार बेईमान अच्छी परिभाषा गढ़कर अपने को ईमानदार घोषित कर देता है… भारतीय राजतंत्र, व्यवस्था, जीवनचर्या में हम आप रोज यह सब देखते रहते हैं…. रही किसी एक प्रकरण की बात तो मैं अपने जीवन से जुड़े सभी प्रकरणों विवादों में खुद को मुख्य आरोपी मानता हूं…. और ऐसा करके मैं कोई महान या नीच नहीं बन रहा बल्कि गल्तियां करते सीखते आगे बढ़ते खुद को ज्यादा समृद्ध और सहज पाता हूं….
पर मुझे आपसे कल भी प्यार था, आज भी है, आगे भी रहेगा… मैं अपने किसी दोस्त, करीबी, जानकार को इसलिए नहीं त्याग सकता कि वह कभी बुरा हो गया था.. बल्कि उसके बुरे होने के चलते आए मुश्किल क्षणों में उसके साथ मैं और मजबूती से खड़ा होता हूं…. और ऐसा करके एक आदमी को टूटने व डिप्रेस्ड होकर खत्म होने से बचा पाता हूं और उसे सीखकर आगे जाने को प्रेरित कर पाता हूं…. शायद, अपने निजी अनुभवों के कारण मैं कथित बुरे लोगों के पक्ष में ज्यादा खड़े होने लगा हूं, खुलेआम स्टैंड लेकर,,, क्योंकि मुझमें उनमें अच्छा बनने की सबसे ज्यादा संभावना दिखती है…. किताबी अच्छा बुरा पढ़कर अगर लोग अच्छा बुरा हो रहे होते तो दुनिया का नक्शा जाने क्या होता… खैर..
आपसे मैं इतना क्यों बात कर रहा हूं, मुझे खुद नहीं पता. लेकिन यह ठीक हो रहा है कि जीते जी संवाद हो रहा है हम लोगों का.. पता है, मैंने हमेशा आपको सिर पर हाथ रखने वाले गार्जियन की तरह जिया और पाया है,,, और वो रूप जब दिल्ली में न देखा तो मैं अपने हक के लिए आपके प्रति बदतमीज हो गया…. पर बाद में मुझे लगा कि मैं ऐसी जिद क्यों पाले हूं.. समय बदलने के साथ लोगों की पोजीशन बदलने लगती है… और मैं उसी पोजीशन की मांग कर रहा था…. खैर, दिल तो बच्चा है जी… आपने जो मेरी तारीफ की है, उसके लिए दिल से आभार कहता हूं, सच में, मुझे उम्मीद नहीं थी कि आपको मेरे में कुछ अच्छाई भी बची मिलेगी… अब मैं अपनी ‘ताकत’ का नाजायज इस्तेमाल नहीं करूंगा…. क्योंकि जब देने वाला देना नहीं चाहता तो मांगने वालों की क्या… बहुत मारे मारे मांगते फिरते रहते हैं….
जय हिंद साथी, लव यू, जहां रहें खुश रहे, प्रसन्न रहें
अब आपको कभी किसी तरह परेशान न करूंगा….
या हू…..


रही आईबीएन7 से निकाले गए 365 लोगों की बात तो उनकी लड़ाई कौन लड़ सकता है जो अपनी लड़ाई के लिये हथियार उठाना तो दूर खड़े भी नहीं हो सकते। मैंने खुद कहा था कि क्या ये लोग कोर्ट जायेंगे तब उन्होंने बताया कि कोई नहीं जा रहा लोगों ने दस लाख तक मुआवज़ा लिया है और नौकरी दिलाने में उनका मदद की गई ज्यातर को मिल भी गई। यहाँ तक कि जब ibn7के आगे प्रदर्शन हुआ उसमें कोई एक व्यक्ति भी निकाले गये लोगों में से नहीं था।

पंकज श्रीवास्तव की पत्नी मनीषा श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से. उपरोक्त स्टेटस पर यशवंत ने जो कुछ कमेंट के रूप में लिखा है, वह इस प्रकार है…

Yashwant Singh : यशवंत सिंह मुर्दाबाद। पंकज भैया अमर रहे। किसी के निजी चैट को सार्वजनिक करके कौन सी नैतिक्ता का परिचय दे रहीं हैं मनीषा सिंह। जाहिर है। पंकज से हुयी चैट को उनकी सहमति से ही आपने छापा होगा यहाँ। मतलब ये कि पंकज चुप निःशब्द नहीं हैं यशवंत को लेकर। वैसे, chat में मैंने क्या सुन्दर सुन्दर लिखा है। इसी को ध्यान से पढ़ लिए होते तो समझ में आ जाता कि इसमें भी पंकज को आइना दिखाया है। अच्छा किया आपने पढ़ाकर। ये सब भी शातिराना और मक्कारी का ही खेल है। पंकज को भी नौकरी दिला देंगे सुमित अवस्थी। काहें हाय हाय कर रही हैं। जब 365 लोग निकाले गए तब बड़ी ‪पूंजी‬ का ‪खेल नहीं दिखा‬। अब एक पंकज की पूर्व निर्धारित बर्खास्तगी से क्रान्ति और देश पे संकट दिखने लगा। चूमने की कोशिश करने के आरोप से ‘कामरेड्स’ के ठीक से पैरवी ना करने के कारण बरी कर दिया गया कोर्ट द्वारा। इस पर कई बार लिख भी चुका हूँ। अब क्या करूँ, कहो तो मैं जान दे दूँ? मुझे मालूम है इस आरोप की आड़ लेकर लोग बार बार असली मुद्दे को डाइवर्ट करने-कराने की कोशिश करते हैं। पंकज की फ़िक्सर और अवसरवादी क्रांतिकारिता निजी हमला नहीं, एक मीडिया ट्रेंड है। ऐसे ट्रेंड्स पर प्रहार होता रहेगा। 4 साल पुराना chat अब तक save रखकर और मेरी बिना सहमति के सार्वजनिक करके यह तो बता ही दिया कि आप लोग कितने नैतिक हैं और यह भी कि chat के वादानुसार मैंने 4 साल तक और अभी तक पंकज को निजी तौर पर परेशान नहीं किया। जनहित के मुद्दे पर बात होगी, चाहें उससे पंकज जुड़े हों या पीएम. जय हिन्द साथियों, दुश्मनों.

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“सूत न कपास जुलाहे में लट्ठम-लट्ठा”

“सूत न कपास जुलाहे में लट्ठम-लट्ठा” ये बात जाहिर होती है पत्रकारिता बचाने के नाम पर लड़ाई करने वालों के सोशल मीडिया स्वांग से| अभी हाल का ही मामला ले लीजिये एक भड़ास4मीडिया के यशवंत सिंह हैं ने आईबीएन 7 के पंकज श्रीवास्तव मामले में जिस बचपने का परिचय दिया है उससे तो यही लगता है कि चैनलों और दूसरे मीडिया संस्थानों के भीतर की खबरों को भड़ास पर दिखा के यशवंत मीडिया के नामचीन मठाधीशों में शामिल तो हो गए लेकिन भड़ास से सिर्फ उनके व्यक्तिगत संबंधों और संपर्कों के सिवा और कुछ नहीं निकला| लेकिन अगर ये अनुमान लगाया जाए कि इससे देश दुनिया समाज और खुद पत्रकारिता पर फर्क क्या पड़ा तो नतीजा ढ़ाक के तीन पात ही नज़र आता है|

भड़ास के जानकार कहते हैं वेबसाइट पर मीडिया घरानों को धमका के फजीहत करने का काम होता है| कार्पोरेटी शह-मात के खेल में यशवंत पुराने महारथी हैं| लगभग तीन साल पहले लखनऊ दैनिक जागरण के राजू मिश्र से मिला तो उन्होंने बताया कि यशवंत ने दारू पी के अख़बार के मैनेजमेंट से झगडा कर लिया था| यशवंत अपना वेतन लेकर निकले और मीडिया में व्याप्त भ्रष्टाचार के लिए लिखना शुरू कर दिया| मेरे लिए भड़ास का पहला परिचय यही था जिसके बाद मुझे लगा कि कुछ भी हो यशवंत में कुछ तो करेंट है ही| इसीलिए यशवंत की कहानी बता के जब राजू भाई ने पूछा था कि पत्रकारिता करना चाहते हो क्या? तब मेरा सवाल यही था की पत्रकारिता के नाम पर नैतिक मूल्यों और सामाजिक सरोकारों की अनदेखी करके जैसा कारपोरेटीकरण हो रहा है उससे मीडिया और समाज की खैरख्वाही कैसे कर पायेगा?

इस मुलाकात के बाद गुजरे इतने सालों में मीडिया के बहुत से फोरमों में उठना-बैठना हुआ| पत्रकारों के फोरमों का जो हाल है उसको कुछ यूँ समझना बेहतर होगा कि चिराग के तले ही नहीं बल्ब, ट्यूब लाईट सीएफएल तले भी अँधेरा होता ही है| ज्यादातर मामलों में हुई आपसी कहा सुनी का कोई खास मतलब नहीं बनता| व्यवस्था और बड़के घाघ भले ही कहीं प्रभावित न हों लेकिन छूंछे मूल्यों के नाम पर आपसी संबंधों की अर्थी जरुर निकल जाती है| कोई भ्रष्टाचार से ही भ्रष्टाचार को ख़त्म करने का फलसफा लेकर बहस में उलझा हुआ नज़र आता है| कहीं पत्रकारों का अहं यानि ईगो देश-दुनिया पर बोझ जैसा जान पड़ने लगता है तो कहीं नासमझी ही अंतिम सत्य लगता है|

बहुत ज्यादा तो कुछ नहीं पर कुल मिला के यही जान पाया हूँ कि सिद्धांतों, वाद-विवादों और बहसों के बीच अगर कमी है तो आपसदारी की| सोशल मीडिया में व्यक्तिगत विवादों को भी लोग चटकारे ले-ले कर पढ़ते हैं| पंकज- मनीषा श्रीवास्तव और यशवंत सिंह के मामले में सिर्फ यही सलाह है कि कहीं आमने सामने बैठ के आपसी समझदारी से मसले को निपटा लीजिये| बेहतर तो यही रहेगा कि व्यक्तिगत मामलों को सिद्धांतों का मुलम्मा चढ़ा के देश दुनिया बचाने का स्वांग न किया जाय| अगर “सिद्धांतों से संतुष्टि” है तो “एकता में शक्ति” फैसला आपको करना है| मेरा सुझाव तो यही है कि एक बनो-नेक बनो तभी लोग साथ देंगे|

| ऐसे मसलों में बाबा नागार्जुन की ये कविता जीवंत नज़र आती है ….

पाँच पूत भारतमाता के, दुश्मन था खूँखार,
गोली खाकर एक मर गया, बाक़ी रह गए चार|

चार पूत भारतमाता के, चारों चतुर-प्रवीन,
देश-निकाला मिला एक को, बाक़ी रह गए तीन|

तीन पूत भारतमाता के, लड़ने लग गए वो,
अलग हो गया उधर एक, अब बाक़ी बच गए दो|

दो बेटे भारतमाता के, छोड़ पुरानी टेक,
चिपक गया है एक गद्दी से, बाक़ी बच गया एक|

एक पूत भारतमाता का, कन्धे पर है झण्डा,
पुलिस पकड कर जेल ले गई, बाकी बच गया अण्डा|

Rakesh Mishra

9313401818, 9044134164
सत्यमेव जयते
http://punarnavbharat.wordpress.com/

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पंकज जी की बर्खास्तगी का उत्सव मनाने वाले भाइयों, गुजारिश है कि साथ में भाजपाई एजेंडों की जीत का जश्न भी मनाते जाइए!

: आईबीएन सेवन से पंकज श्रीवास्तव की बर्खास्तगी को लेकर मीडिया में चल रही बतकही के बीच :  ”बंद हैं तो और भी खोजेंगे हम, रास्ते हैं कम नहीं तादाद में” …ये पंक्तियाँ ही कहीं गूँज रही थीं पंकज भाई की बर्खास्तगी की खबर के बाद। … बनारस आने के बाद न जाने कितनी बार उनके साथ इन पंक्तियों को दुहराया होगा। …”हम लोग कोरस वाले थे दरअसल” .… इरफ़ान भाई के ब्लॉग पर आज उसी आवाज को फिर से सुनना बढ़िया लगा. कल प्रेस क्लब में थोड़ी देर के लिए मुलाकात भी हुई कई लोगों से.…

कई सन्दर्भों में पुराने दिनों की याद आई। विश्वविद्यालय में आने और छात्र राजनीति में शामिल होने के बाद सामाजिक-राजनीतिक बदलाव के सपने संजोये, नव-स्फूर्ति और ऊर्जा से भरे हम किसी ऐसी राह पर चल रहे थे जिसके पड़ावों-मुकामों के बारे में ठीक-ठीक मालूम तो न था लेकिन ये जरूर था कि एक बेहतर समाज को गढने की दिशा में अपनी भूमिका जरूर समझ में आती थी…लोग कई बार कहते थे कि तुमलोग छात्र हो, यहां पढने आए हो राजनीति करने नहीं … लेकिन हम कहते कि हमारा नारा भी तो यही है … लडो पढाई करने को, पढो समाज बदलने को, यह सबके लिए मुकम्मल गुणवत्तापूर्ण शिक्षा ग्रहण करने का अधिकार हासिल करने और प्रगतिशील, वैज्ञानिक एवं समता के मूल्यों पर आधारित समाज को रचने की जद्दोजहद थी। हममें से अधिकांश इसी भावना के तहत छात्र राजनीति में स्वतःस्फूर्त तरीके से सक्रिय हुए थे। और आज तक भी मुझे ये बात नहीं समझ में आई कि कोई भी पढाई-लिखाई करने वाला सचेतन, संवेदनशील मनुष्य बाकी समाज के दुख-दर्द से कटकर कैसे रह सकता है? खैर, समय के साथ लोगों की भूमिकाएं और प्राथमिकताएं भी बदलीं और जिंदगी जीने की जद्दोजहद में लोगों ने पार्टी होलटाइमरी से लेकर नौकरी के विभिन्न रास्ते अख्तियार कर लिए। लेकिन, जिन लोगों ने नौकरियां कर लीं क्या उन सबके एक खास समय के योगदान को भुला दिया जाना चाहिए?

बहरहाल, मैं ये बातें सिर्फ इस संदर्भ में कह रहा हूं कि पिछले 2 दिनों से कई लोग ”भड़ास” निकालने में लगे हुए हैं कि पंकज ने कभी अपने से नीचे वालों के लिए आवाज नहीं उठाई पर आज खुद निकाले जाने पर विलाप कर रहे हैं। कोई कह रहा है कि वे एक ”डील” के हिस्सा हैं जिसके तहत ये सब किया गया तो कोई कह रहा है कि उन्होंने काफी माल इकट्ठा कर रखा है और अब प्रेस वार्ता के जरिये खुद को शहीद घोषित कर रहे हैं। यह भी कहा जा रहा है कि वे बिलकुल नाकारा हो गये थे और सिर्फ फेसबुक और बातों में वक्त गुजारते थे जिसकी सजा पहले संजीव पालीवाल को और अब पंकज को मिली। मुझे नहीं मालूम कि एक चैनल के मुलाजिम के बतौर खुद पंकज जी की हैसियत किसी को निकालने-रखने में कितनी रही होगी। 1997 में सांगठनिक जिम्मेदारियों व सक्रिय राजनीती से मुक्त होने के बाद, अपनी पैतृक संपत्ति के बल पर कुछ करने के आसान रास्ते और घर से बुलावे के बावजूद उन्होंने मुसीबतों से भरी कठिन डगर चुनी थी. अमर उजाला में छोटी-सी नौकरी मिलने के बाद उत्साह से लबरेज पंकज-मनीषा का बनारस में साकेत नगर स्थित हमारे छोटे-से ठिकाने पर उनका आना आज भी याद है. मुफलिसी के दौर में अमर उजाला की दो हजार की नौकरी पकडने से लेकर तकरीबन 17 साल बाद अब आइबीएन सेवन के लाख रूपये के पैकेज तक पहुंचने में उन्होंने क्या गैर-वाजिब समझौते किये होंगे ये भी नहीं मालूम। लेकिन नौकरी करने के लिए कुछ समझौते जरूरी होते हैं ये सबको पता है जो विभिन्न नौकरियों में लगे हैं। समझौते किस हद तक ये एक अलग, किंतु जरूरी मसला है। यह भी शोध का विषय है कि अखबारी पत्रकारिता से चैनल पत्रकारिता में आने के क्रम में विगत १७ बरस में आज लाख रूपये माहवार की नौकरी तक पहुंचना क्या बहुत ज्यादा है। और क्या पंकज अपने पेशागत प्रभावों का उपयोग कर, राजनीतिक दांव-पेंच खेल कर, चैनल की तनख्वाह से इतर पैसे उगाहने का काम भी कर रहे थे जो उनके पास काफी माल-मत्ता इकट्ठा हो जाने पर मुहर लगाता हो। कम-से-कम मेरी जानकारी में तो नहीं है।

कुछ लोगों की अदालत में ये भी आरोप है उनपर कि उन्होंने कई कामरेडों की जिंदगियां बर्बाद कर दीं और उन्हें नौकरी दिलाने में मदद न कर सके। और ये कि उनसे काबिल कई कामरेड छोटे-छोटे काम करते हुए जिंदगी गुजार रहे हैं। ये एक अहम सवाल है मेरे हिसाब से। जरा बताइए कि क्या उन कामरेडों के पास अपनी कोई दृष्टि, सोच-समझ नहीं थी या किसी कमांडर के कहने पर लाचार-मजबूर सेना की तरह सबकुछ छोड़कर सामाजिक-राजनीतिक बदलाव की कार्रवाइयों में कूद गये थे, ये सोच कर कि कम्युनिस्ट संगठन और पार्टी का नेतृत्व उनकी रोजी-रोटी व भविष्य का प्रबंध करेगा जबकि पार्टी अपने संसाधन जुटाने के सवाल आज तक हल न कर पाई हो और आम तौर पर वो जनसाधारण के चंदों से ही चलती हो। उन कॉमरेडों के खुद के सपने क्या थे? क्या उस वक्त वे खुद भी सामाजिक बदलाव की राजनीति का हिस्सा नहीं बनना चाहते थे जिसके पीछे उनके आदर्शवादी मूल्य रहे हों या सांस्कृतिक-राजनीतिक परिदृश्य पर अपनी पहचान बनाने की इच्छा। मुझे वाकई याद नहीं आ रहा कि पंकज ने किसी छात्र को छलावे में लेकर अपनी राजनीति की हो। उनकी छवि एक सौम्य, मृदुभाषी, सांस्कृतिक नेता की ही तरह थी जो मन के तारों को झकझोर देने वाली बुलंद आवाज में क्रांतिकारी गीत सुनाता था, कवितायेँ लिखता-पढता था, फिर राजनीती की बात करता था।  सबसे बड़ी बात कि वो अपने साथियों की परेशानियों का हमेशा ख्याल रखता था. उनके फ़ेलोशिप/वजीफे की रकम आने की खुशी और इंतजार उनसे ज्यादा साथियों को हुआ करती थी.उनके साथ रहने पर मनमानी किताबें खरीदी जा सकती थीं, बढ़िया खाना खाया जा सकता था और शायद न रहने पर साथियों की फीस भी भरी जा सकती थी. ये वो दिन थे.

तो  फिर उन पर लगाए जाने वाले ये आरोप किस कामरेड के हैं भाई? अगर हम अपने करियर में कोई अपेक्षित मुकाम हासिल न कर सके तो क्या हमारी आर्थिक दुर्दशा/बेहतरी के लिए पार्टी या संगठन जिम्मेदार है? क्या ऐसे कामरेडों ने यूपीएससी / एसएससी / बैंकिंग / सीए / पत्रकार / शिक्षक / प्रोफेसर बनने के ध्येय से कोचिंग लेने के लिए संगठन ज्वाइन किया था? तब तो वाकई ऐसे कामरेडों की समझ और दृष्टि पर तरस आता है। जो लोग अपने नेतृत्वकर्ता साथियों और संगठन को प्लेसमेंट एजेंसी की तरह देखते हैं उनके लिए ये बात सही हो सकती है लेकिन तब क्या उस दृष्टि का समर्थन हम भी करने लगेंगे? संगठन और पार्टी के भीतर कई कमियां हो सकती हैं जिनकी चर्चा होनी चाहिए, उन्हें सुधारा जाना चाहिए लेकिन अपनी काहिली, गतिशीलता में कमी, क्षमता का ठीक इस्तेमाल न कर पाने या अन्य परिस्थितिजन्य परिणामों के कारण उपजी जिंदगी की दुश्वारियों का ठीकरा संगठन या व्यक्तियों पर फोडकर हमें खुद सारी जिम्मेदारियों से ‘मुक्त’ हो जाना चाहिए।

असल सवाल ये है कि क्या पंकज वाकई नाकारा हो गये थे या चैनल की भाजपा समर्थक नीतियों व लाबी के वर्चस्च की खिलाफत के लिए उन्हें निकालना प्रबंधन की मजबूरी बन गई थी। 1992 में बाबरी मस्जिद ढहाकर और हिंदू-मुस्लिम नफरत की सियासत में समाज को झोंककर देश की राजनीति में अपना कद बढाने वाली सांप्रदायिक शक्तियों के नये उभार के इस स्वर्णिम दौर में दक्षिणपंथी राजनीति के खिलाफ सोशल मीडिया में आ रही पंकज की टीपें, उनकी कविताएं, उनका तल्ख स्वर क्या उनके दिनों-दिन नाकारा होते जाने के सबूत हैं? और उनके नाकारा होने की शुरुआत क्या अचानक से 16 मई, 2014 के बाद शुरू हो गई? ये सवाल उठाने वाले किसकी राजनीति का पक्षपोषण कर रहे हैं? दक्षिणपंथियों का या करवट बदल कर अपने राजनीतिक आकाओं की गोद में बैठने वाले कारपोरेट प्रबंधन का? इसमें कोई शक नहीं कि आईबीएन से निकाले गये तमाम पत्रकारों, कलमकर्मियों का मसला बेहद अहम था और है।  आइबीएन ही क्यों ऐसी हर छंटनी का विरोध होना चाहिए। लेकिन, पत्रकारिता संस्थानों व मीडिया के भीतर लगातार बढते जा रहे तानाशाही के दौर में अगर इस अवसर का उपयोग कतिपय कारणों से  कुछ कलमवीर अपनी व्यक्तिगत खुन्नस निकालने में करना चाहते हैं तो संकेत खतरनाक हैं। ये हद-से-हद यही साबित करता है कि दक्षिणपंथ अपने राजनीतिक एजेंडे में सफलता की राह पर है- घरवापसी, दंगों, स्वच्छता अभियान व श्रम-कानून में सुधारों जैसे उछाले गए भ्रामक एजेंडों की तरह। तो पंकज जी की बर्खास्तगी का उत्सव मनाने वाले भाइयो, गुजारिश है कि साथ में भाजपाई एजेंडों की जीत का जश्न भी मनाते जाइए।

लेखक मित्ररंजन कामरेड रह चुके हैं और इन दिनों एक एनजीओ से जुड़े हुए हैं. उनसे संपर्क mitraaranjan@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.


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एसएमएस, इस्तीफा, सोशल मीडिया, प्रेस कांफ्रेंस और प्रेस रिलीज… हिप्पोक्रेसी जारी आहे….

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एसएमएस, इस्तीफा, सोशल मीडिया, प्रेस कांफ्रेंस और प्रेस रिलीज… हिप्पोक्रेसी जारी आहे….

आईबीएन7 में एसोसिएट एडिटर रहे पंकज श्रीवास्तव वर्षों से इस चैनल में काम करते हुए चुप रहे. सैकड़ों लोग निकाले गए. चुप रहे. कई बार फिल्म सिटी में जुलूस निकले. चुप रहे. फिल्म सिटी में लोग अपने हक के लिए लड़ रहे, न्यूज रूम में कब्जा करके. चुप रहे. दर्जनों कार्यक्रमों, सेमिनारों, संगोष्ठियों में बुलाया गया. चुप रहे. पर जब छंटनी की लाठी उनके सिर पर पड़ने ही वाली थी कि बोल पड़े. यूं ही नहीं, अचानक नहीं, प्लानिंग के साथ बोल पड़े. समझदार क्रांतिकारी प्लानिंग के साथ बोलता है, या फिर लगातार चुप रहता है. लाभ जिस तरीके से मिलता हो लो, ये फंडा होता है ऐसे क्रांतिकारियों का.

पंकज को अचानक आईबीएन7 में अंबानी का राज दिख पड़ा. पंकज को अचानक आईबीएन7 में केजरीवाल के प्रति अन्याय होता दिख पड़ा. ये सब इसलिए कि उनके सिर पर छंटनी की तलवार लटकी थी, नाकारापन और अकर्मण्यता की वजह से. सो, इन पंकज ने पहले ‘आप’ नेता आशुतोष से संपर्क साधा, जो आईबीएन7 के मैनेजिंग एडिटर रह चुके हैं और इन्हीं के जमाने में पंकज श्रीवास्तव भर्ती किए गए थे आईबीएन7 में. आशुतोष से लंबी डिसकशन के बाद एक प्लाट, एक स्टोरी, एक ड्रामा तैयार हुआ. और, एक रोज उस पर अमल कर दिया गया.

पंकज ने अपने बॉस सुमित अवस्थी को एसएमएस किया.

केजरीवाल के प्रति खबरों में अन्याय हो रहा है.

बॉस ने एचआर को कहा और एचआर ने बर्खास्तगी का लेटर थोड़ा समय से पहले ही पकड़ा दिया.

पंकज ने सोशल मीडिया का दामन थामा और बर्खास्तगी को शहादत में तब्दील करने के लिए शब्द वाण छोड़े.

‘आप’ के नेट वीरों ने धड़ाधड़ शेयर लाइक रीट्वीट किए. बात फैलने लगी.

पंकज ने अन्याय के खिलाफ और सरोकार के पक्ष में प्रेस कांफ्रेंस करने का ऐलान किया.

प्रेस कांफ्रेंस को ‘आप’ वालों ने कुछ यूं अदृश्य तरीके से मैनेज किया कि मीडिया जुट गई.

पंकज ने भाषण दिया. मीडिया वाले सुनते रहे.

और अंत में, पंकज एंड ‘हिडेन टीम’ ने सुगठित-सुव्यवस्थित क्रांतिकारी प्रेस रिलीज जारी की है.

आप भी पढ़िए ….. और, याद रखिएगा कि पंकज आगे सिर्फ ढपली, रिवोल्यूशनरी गाने, क्रांति की ही बातें करेंगे क्योंकि उन्होंने चुप्पी के चादर में वर्षों तक मौन साधना करके लाखों इकट्ठा कर लिए हैं, सो आगे की ज़िंदगी में पापी पेट पर कोई संकट नहीं है. हां, कोई भोला भाला जरूर इनके गीत संगीत और भाषण के चक्कर में पड़कर अपने करियर को बर्बाद कर सकता है और बहुत देर बाद समझ में आने पर पश्चाताप करता मिलेगा, ”जब चिड़िया चुग गई खेत तो फिर पछताए क्या होत है” वाले अंदाज में…

Press Release

New Delhi : IBN7 Associated Editor Pankaj Srivastava Sacked For Raising Voice Against Bias in Delhi Election Coverage. Will challenge termination in court, says Pankaj. 22, January, 2015, New Delhi: In a sudden, unprovoked and illegal move the management of IBN7 the Hindi News Channel owned by Network 18 has terminated the services of Associate Editor, Pankaj Srivastava on 21 January, 2015. The termination notice was abruptly served to Pankaj by Deputy General Manager, HR, Mayank Bhatnagar at 10 PM last night. The notice mentions that “services are hereby terminated with immediate effect”.

This termination was followed after a text message by Pankaj to Deputy Managing Editor Sumit Awasthi. The message stated —“ Aiysa lagata hai ki hum AAP ko harwaney mein jute hain yeh theek nahi hai, logo ka kehna hai ki Satish Uppdhyay ke bhai Umesh hamarey editor hain isliye aisa hai..ye patrakaron ke usoolon ke khilaaf hai, Pankaj Srivastava” (It seems that we have joined campaign to defeat AAP, this is unfair. Many people believe that this is happening because Umesh our Editor is brother of Satish Upadhyay. This goes against journalistic principles, Pankaj Srivastava). This mobile text message was sent by Pankaj at 8:48 from his official mobile number.

Pankaj has been raising the issue of unfair and unequal coverage of Delhi Assemble Elections. He has on number of occasions approached editors and tried to persuade that the practice of complete black out of Aam Admi Party is unethical and goes against established norms of journalistic propriety. Majority of journalists working with IBN 7 and CNN-IBN are not comfortable with internal censorship on many issues – particularly relating to Aam Admi Party and its convenor Arvind Kejriwal who is also Chief Ministerial candidate of the party. These issues were raised number of times during editorial meetings.

A series of programmes like “Kiran Ka Karsihma” to highlight the BJP’s CM Candidate are being telecast in the channel are debated and criticised internally.

Reacting of his abrupt termination Pankaj says,” Considering the fact that Network 18 is one of the biggest media network in world’s biggest democracy it is a serious concern that journalistic ethics are blatantly compromised.”
Known for his stand on social issues and standing for what is right, Pankaj is all set take the issue a step ahead. He is taking legal advice and within due course of time, he will challenge his unfair and uncalled termination in the court of law.

A brief profile of Dr Pankaj Srivastava— Pankaj started his journalistic journey in 1997 as a trainee reporter with Amar Ujala in Kanpur. He was later transferred to the state bureau at Lucknow. He joined Star News in January, 2003Later on he handled a senior profile of bureau-incharge of UP for Star News. In 2007 he moved to Delhi and was member of the core team which launched “Samay” channel. After a brief stint with Samay, Pankaj joined IBN7 on March 10th2008. As far academic qualification is concerned he is D-Phil in History from prestigious Allahabad University.


पूरे मामले को समझने के लिए इस पोस्ट को पढ़ें…

आईबीएन7 में कचरा हटाओ अभियान जारी, अबकी पंकज श्रीवास्तव हुए बर्खास्त

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पंकज श्रीवास्तव की प्रेस कांफ्रेंस के लिए केजरीवाल ने जुटा दी मीडिया वालों की भीड़!

अगर फिक्सिंग होती है तो हर कदम पर दिखने लगती है. नाकारापन और अकर्मण्यता के आरोपों में आईबीएन7 से निकाले गए पंकज श्रीवास्तव ने तयशुदा रणनीति के तहत अपने संपादक को एक मैसेज भेजा. उस मैसेज का स्क्रीनशाट लिया. उसे क्रांतिकारी भाषण के साथ फेसबुक पर लगा दिया. ‘आप’ वालों ने फेसबुक और ट्विटर पर पंकज को शहीद बताते हुए उनके मसले को वायरल करना शुरू किया. ‘आप’ नेता आशुतोष, जो कभी आईबीएन7 के मैनेजिंग एडिटर रह चुके हैं, ने पंकज के मसले को जोरशोर से सोशल मीडिया पर उठाया.

पंकज ने आज चार बजे प्रेस क्लब आफ इंडिया में प्रेस कांफ्रेंस करने की घोषणा की. इसके पहले केजरीवाल ने आज दिन में दो बजे प्रेस क्लब आफ इंडिया में प्रेस कांफ्रेंस करने की घोषणा की थी. लेकिन केजरीवाल ने ऐन वक्त, जब मीडिया के लोग प्रेस क्लब में जुट गए थे, अपनी प्रेस कांफ्रेंस रद्द कर दी. इस तरह सारे मीडिया वालों के सामने पंकज श्रीवास्तव नमूदार हुए. आशुतोष भी आ गए. इनने अपनी-अपनी भड़ास निकाली. लंबे लंबे सिद्धांत पेले. देखते जाइए, चुनाव भर शहीद बनते घूमने के बाद पंकज श्रीवास्तव चुनाव बाद आम आदमी पार्टी के साथ सक्रिय हो जाएंगे और 2017 के यूपी विधानसभा इलेक्शन में विधायक का चुनाव लड़ जाएंगे.

इस मामले पर अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारवादी अविनाश पांडेय समर उर्फ समर अनार्या ने फेसबुक पर कुछ लिखा है, जो इस तरह है….

Samar Anarya : आप नेता आशुतोष आईबीएन7 से पंकज श्रीवास्तव भाई की बर्खास्तगी पर मार लालपीले हो रहे हैं. बाकी इनके अपने मैनेजर काल में 200 (पूरे समूह से 350) लोग निकाले गए थे तब भाई कुछ नहीं बोले थे! इधर वाली जनता अभी मोदिया नहीं हुई है आशुतोष भाई.

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Samar Anarya : पंकज श्रीवास्तव की आईबीएन 7 के एसो.एडिटर पद से बर्खास्तगी दुखद है, पर न जाने क्यों इसी आईबीएन 7 (और नेटवर्क 7 समूह के बाकी चैनलों) से अगस्त 2013 में 320 से ज्यादा पत्रकारों को एक साथ निकाल दिया जाना याद आ गया.(अब) आप नेता आशुतोष के गुस्से भरे ट्वीट देखते हुए उनका इतनी बड़ी छंटनी के बाद सड़क पर आ गये पत्रकारों के बीच ऐम्बीअन्स मॉल में मद्रास कैफ़े का ‘प्रीव्यू’ देखना भी. ये मुट्ठियाँ तब भिंची होतीं तो शायद बात यहाँ तक न पंहुचती. अपने ऊपर न होने तक हमलों पर भी क्रांतिकारिता जागती तो बात यहाँ तक न पंहुचती, शायद. खैर, जब भी शुरू हो, लड़ाई में साथ देना बनता है. पर बहुत कुछ याद रख के. उस दौर के दो स्टेटस लगा रहा हूँ. ताकि सनद रहे वाले अंदाज में-
https://www.facebook.com/samar79/posts/10201740504700560
https://www.facebook.com/samar79/posts/10201728758446911

पूरी कहानी जानने के लिए इस मूल पोस्ट को पढ़ें….

आईबीएन7 में कचरा हटाओ अभियान जारी, अबकी पंकज श्रीवास्तव हुए बर्खास्त

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तब पंकज श्रीवास्तव की तनी हुई मुट्ठियां लाखों के पैकेज में विश्राम कर रही थीं!

(दयानंद पांडेय)


Dayanand Pandey : पत्रकारिता में गीदड़ों और रंगे सियारों की जैसे भरमार है। एक ढूंढो हज़ार मिलते हैं। जब लोगों की नौकरियां जाती हैं या ये खा जाते हैं तब तक तो ठीक रहता है। लोगों के पेट पर लात पड़ती रहती है और इन की कामरेडशिप जैसे रजाई में सो रही होती है। लेकिन प्रबंधन जब इन की ही पिछाड़ी पर जूता मारता है तो इन का राणा प्रताप जैसे जाग जाता है।

देखिए कि आईबीएन सेवेन के पंकज श्रीवास्तव कैसे तो अपनी मुट्ठी तानने का सुखद एहसास घोल रहे हैं। लेकिन जब अभी बीते साल ही जब सैकड़ो लोग आईबीएन सेवेन से एक साथ निकाल दिए गए थे तब इनकी यह तनी हुई मुट्ठियां इन के लाखों के पैकेज में विश्राम कर रही थीं। कमाल है! ऐसे हिप्पोक्रेसी के मार पर कौन न कुर्बान हो जाए! पढ़िए ये क्या लिख रहे हैं अपने फेसबुक वॉल पर…

”बहरहाल मेरे सामने इस्तीफा देकर चुपचाप निकल जाने का विकल्प भी रखा गया था। यह भी कहा गया कि दूसरी जगह नौकरी दिलाने में मदद की जाएगी। लेकिन मैंने कानूनी लड़ाई का मन बनाया ताकि तय हो जाये कि मीडिया कंपनियाँ मनमाने तरीके से पत्रकारों को नहीं निकाल सकतीं। इस लड़ाई में मुझे आप सबका साथ चाहिये। नैतिक भी और भौतिक भी। बहुत दिनों बाद ‘मुक्ति’ को महसूस कर रहा हूं। लग रहा है कि इलाहाबाद विश्वविदयालय की युनिवर्सिटी रोड पर फिर मुठ्ठी ताने खड़ा हूँ।”

भड़ास पर भी इनकी असलियत पढिए… यहां क्लिक करिए…

https://bhadas4media.com/edhar-udhar/3407-kachra-pankaj

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार दयानंद पांडेय के फेसबुक वॉल से.


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आशुतोष से फिक्सिंग के बाद ‘बागी’ बने पंकज श्रीवास्तव, 2017 में ‘आप’ के टिकट से यूपी में लड़ेंगे चुनाव!

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पेंदी रहित पंकज परवेज उर्फ पंकज श्रीवास्तव के विलाप के पीछे की कुछ कहानियां

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पेंदी रहित पंकज परवेज उर्फ पंकज श्रीवास्तव के विलाप के पीछे की कुछ कहानियां

साथ मिलेगा…भरपूर मिलेगा पंकज श्रीवास्तव उर्फ ‘पंकज परवेज’। आप बस जाकर मुट्ठी ताने रहिए मुट्ठीगंज में….सॉरी कर्नलगंज में। सुना है आप सीपीआई-एमएल (लिबरेशन) में होल टाइमर थे। कब थे ये तो नहीं पता लेकिन “लाल फरेरे तेरी कसम, इस जुल्म का बदला हम लेंगे”…। लेकिन परवेज भाई अभी तो कुछ ही महीनों पहले आपने फेसबुक पर अपना नाम बदल लिया था, पंकज श्रीवास्तव से ‘श्रीवास्तव’ हटाकर ‘परवेज’ रख लिया था। आज देख रहा हूं कि बर्खास्तगी विलाप में आप ‘परवेज’ नाम को हटाकर दोबारा ‘वास्तव में श्री’ हो गए हैं। खैर मजाक छोड़िए अब तो हम आपको परवेज भाई ही कहेंगे।

लेकिन परवेज भाई हम आपकी कातर पुकार सुनकर मदद को दौड़े उससे पहले कुछ सवाल हैं जिनका जवाब अगर आप दे सकें तो कुछ गलतफहमियां दूर हो जाएं। पहला सवाल तो ये कि आपके ही वामपंथी छात्र संगठन के लिए अपना भविष्य चौपट कर देने वाले लोग लगातार आईबीएन-7 और तमाम दूसरे चैनलों में प्रताड़ना और छंटनी के शिकार हुए तब आपने क्या उनका साथ दिया ? आप ही के समकालीन और ‘आईसा’ में अपनी ऐसी-तैसी कराने वाले अधेड़ होते नौजवानों ने नौकरी पाने के लिए आपसे मदद की गुजारिश की, लेकिन आपने मदद तो दूर उनका फोन भी उठाना गंवारा नहीं समझा। माना कि नौकरी के लिए सिफारिश करना आपके सैद्धांतिक तेवर के खिलाफ था, तो क्या आपने अपने संस्थान में रिक्रूटमेंट के लिए परमस्वार्थी, आत्मकेंद्रित, कौवारोरकला निपुण चूतरचालाक आशुतोष जी के साथ मिलकर कोई पारदर्शी सिस्टम बनाया ? क्या आपने खुद पैरवी के जरिए अमर उजाला, स्टार न्यूज और आईबीएन-7 में जगह नहीं हथियाई ? कहिए तो नाम बता दूं…लेकिन जाने दीजिए आपके चक्कर में उन भले लोगों की इज्जत का कीमा क्यों बनाया जाय।

पंकज भाई न जाने कितने लोग आए दिन मक्कारों की मंडी मीडिया में नौकरी से निकाले जाते हैं। कई लोग तो सच में सीपीआई-एमएल में होलटाइमर रह चुके हैं लेकिन वो लोग इस कदर बर्खास्तगी विलाप तो नहीं करते। मैंने देखा है उन लोगों को भूखे रहकर दिन गुजारते लेकिन क्या मजाल कि दीनता उनके पास फटक भी जाए। क्या मजाल कि मजबूरी उन्हें किसी के सामने घुटने टेकने पर मजबूर कर सके। आपको नहीं पता लेकिन आपसे बहुत काबिल कई कॉमरेड अनुवाद और घोस्ट राइटिंग जैसे दोयम दर्जे के काम करते हुए इसी दिल्ली में गुजर-बसर कर रहे हैं। वही लोग जिनका बौद्धिक पंगु पालीवाल, अकर्मण्य-अहंकारी आशुतोष और पेंदी रहित पंकज परवेज ने अनुराग जैसे अंधभक्तों को शिखंडी बनाकर बध कर डाला। लेकिन वो लोग तो नहीं गए प्रेस क्लब के दरवाजे पर पेट्रोल की शीशी लेकर ‘आत्मदाद’ लेने।

शर्म कीजिए पंकज भाई सात-आठ सालों में ठीक-ठाक मालमत्ता बना लिया हैं, काहे नौटंकी कर पब्लिक के सामने खुद को नंगा कर रहे हैं। होलटाइमर रहे हैं और अब कोई आर्थिक संकट भी नहीं है, तो क्यों नहीं किसी कायदे के काम में लग जाते। आप कह रहे हैं कि मित्रों की प्रतिक्रिया देखकर हौसला बढ़ा है। कमाल करते हैं अपने चैनल के चेहरे पर ‘हौसला’ चिपकाकर उसका हौसला तो पस्त कर दिया और अब चले हैं खुद का हौसला बढ़ाने। 

लेखक के. गोपाल से संपर्क anujjoshi1969@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.


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आशुतोष से फिक्सिंग के बाद ‘बागी’ बने पंकज श्रीवास्तव, 2017 में ‘आप’ के टिकट से यूपी में लड़ेंगे चुनाव!

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तब पंकज श्रीवास्तव की तनी हुई मुट्ठियां लाखों के पैकेज में विश्राम कर रही थीं!

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आशुतोष से फिक्सिंग के बाद ‘बागी’ बने पंकज श्रीवास्तव, 2017 में ‘आप’ के टिकट से यूपी में लड़ेंगे चुनाव!

एसोसिएट एडिटर पंकज श्रीवास्तव को नान-परफारमेंस में खुद की बर्खास्तगी का एहसास पहले से था. इसी कारण उन्होंने कभी आईबीएन7 के मैनेजिंग एडिटर रहे और आजकल ‘आप’ के खास नेता बने घूम रहे आशुतोष से संपर्क साधा. आशुतोष के जमाने में ही पंकज श्रीवास्तव की भर्ती हुई थी. आशुतोष और पंकज की डील हुई. इसी डील के तहत यह तय हुआ कि ऐन चरम चुनावी प्रक्रिया के बीच पंकज श्रीवास्तव अपने नए मैनेजिंग एडिटर सुमित अवस्थी को ‘आप’ और केजरीवाल को लेकर एक मैसेज करेंगे. सबको पता है कि टीवी में इस तरह के आंतरिक मैसेज का अंजाम क्या होता है. पंकज श्रीवास्तव को समय से पहले यानि चुनाव बाद तय बर्खास्तगी से पहले ही बर्खास्त कर दिया गया.

पंकज ने बर्खास्त होते ही पहले से तय रणनीति के तहत सुमित अवस्थी को भेजे गए मैसेज का स्क्रीनशाट फेसबुक पर लगा दिया और साथ ही बेहद क्रांतिकारी जोशीला भाषण लिख डाला. जो पंकज श्रीवास्तव अपने फेसबुक वॉल पर किसी भी पोस्ट के लिए अपने फ्रेंड्सलिस्ट से बाहर के लोगों के लिए कमेंट बाक्स बंद रखते हों, उन पंकज श्रीवास्तव की ये क्रांतिकारी पोस्ट देखते ही देखते सैकड़ों बाहर शेयर हो गई. इसके पीछे ‘आप’ नेता आशुतोष का हाथ था. उनके इशारे पर ‘आप’ की आईटी विंग ने धड़ाधड़ शेयर करना शुरू कर दिया.

पंकज श्रीवास्तव के मसले पर ‘आप’ नेता आशुतोष ने खेलना शुरू कर दिया, ट्विटर के जरिए, ताकि इस बर्खास्तगी का फायदा ‘आप’ को मिल सके और ‘भाजपा’ को डैमेज किया जा सके. आशुतोष ने जो फटाफट तीन ट्वीट किए हैं पंकज के मसले पर, उससे साफ जाहिर होता है कि उन्हें सब कुछ पता था और सब कुछ उनकी सहमति से हुआ.  आशुतोष के ट्वीट को आम आदमी पार्टी की तरफ से रीट्वीट किया गया और देखते ही देखते पूरा मामला वायरल हो गया. आशुतोष के तीन ट्वीट इस तरह हैं…

ashutosh ‏@ashutosh83B
IBN7 is owned by Reliance. Sacking of Pankaj shows BJP and Reliance can go to any extent to stop AAP in Delhi .

ashutosh ‏@ashutosh83B
Pankaj wrote an SMS to his editor at 8pm, his services was terminated by 1030. Editor Umesh Upadhaya is brother of Satish Upadhaya , cont..

ashutosh ‏@ashutosh83B
Pankaj Srivastav, associate Editor in IBN7 was sacked because he objected blackout of AAP and Kejriwal on channel . Cont…

चर्चा है कि पंकज श्रीवास्तव की आशुतोष से जो डील हुई है, उसके तहत पंकज 2017 के यूपी के विधानसभा चुनाव में अपने गृह जनपद रायबरेली से ‘आप’ पार्टी के टिकट पर विधायक का चुनाव लड़ेंगे. इसी की पृष्ठभूमि के तहत पंकज को दिल्ली चुनाव से ठीक पहले शहीद की तरह पेश करने का फैसला लिया गया. अब जो कुछ हो रहा है उसी के तहत हो रहा है. पंकज श्रीवास्तव पहले से तय एजेंडे के तहत अब दिल्ली प्रेस क्लब में प्रेस कांफ्रेंस करने जा रहे हैं और आम आदमी पार्टी इस प्रेस कांफ्रेंस व इस मामले को तूल पकड़ाने की तैयारी कर रही है. पंकज पूरे चुनाव तक यूं ही खुद को शहीद बनाकर घूमते बोलते बतियाते दिखेंगे.

ज्ञात हो कि जब आईबीएन7 में सैकड़ों कर्मचारियों को निकाला गया तब न तो आशुतोष एक शब्द बोले थे और न ही पंकज श्रीवास्तव. तब दोनों ही लाखों की सेलरी और अपनी अपनी कुर्सी के कारण चुप बैठे रहे. जब आईबीएन7 को अंबानी ने खरीद लिया तब भी पंकज श्रीवास्तव चुप बैठे रहे थे. एंकर तनु शर्मा के मसले पर जब फिल्म सिटी में प्रदर्शन हुआ तो पंकज श्रीवास्तव को इसमें शरीक होने के लिए इनकी कम्युनिस्ट पार्टी के साथियों ने मैसेज भेजा था, तब भी पंकज श्रीवास्तव आफिस से बाहर नहीं निकले थे. अब जब उनका आगे का करियर (राजनीति में) सेट हो गया है तो एक बार फिर हुंकार भरकर क्रांतिकारी बन गए हैं. क्या यह क्रांतिकारिता की फिक्सिंग नहीं है. जब इच्छा करे तब करियरिस्ट बनकर क्रांति पर चुप्पी साधे रहो और जब मौका अवसर दिखे राजनीति में पांव जमाने की तो क्रांतिकारी बनकर हुंकार भरने लगो. अंततः है तो मामला करियर और पापी पेट का ही.

इस पूरे मामले पर युवा और तेजतर्रार पत्रकार राहुल पांडेय कहते हैं: ”जब शहादत कला बन जाती है तो शहीदों पे बड़ी हंसी आती है।”

आईबीएन7 में काम कर चुके Kishor Joshi कहते हैं: ”दुःख तब होता है जब अपने पर आ पड़ती है, आपने तो एकतरफा खबरों को दिखाने का मुद्दा उठाया और चैनल को वो गलत लगान और suspend कर दिया लेकिन कभी सोचा जब 300 लोग बिना गलती के एक साथ निकाले गए थे तब आपने कुछ कहा या विरोध जताया? अब जब अपने पर आ पड़ी तो आप शहीद का श्रेय लेने में चूक नहीं रहे हैं।”

अन्य जानकारियों के लिए इस मामले की मूल खबर को पढ़ सकते हैं, जिसका शीर्षक नीचे है…

आईबीएन7 में कचरा हटाओ अभियान जारी, अबकी पंकज श्रीवास्तव हुए बर्खास्त

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आईबीएन7 में कचरा हटाओ अभियान जारी, अबकी पंकज श्रीवास्तव हुए बर्खास्त

आईबीएन7 न्यूज चैनल में कचरा हटाओ अभियान जोरों से जारी है. कई सालों से लाखों रुपये की सेलरी लेकर कुंडली मारे बैठे पत्रकार पंकज श्रीवास्तव को प्रबंधन ने बर्खास्त कर दिया है. पंकज श्रीवास्तव को संजीव पालीवाल की टीम का प्रमुख सदस्य बताया जाता है. चैनल का प्रबंधन नए हाथों में आने के बाद पुरानी टीम के लोगों को परफार्म करने के लिए छह महीने का वक्त दिया गया लेकिन पुराने लोगों ने ऐसा कुछ भी नहीं किया जिससे चैनल की साख छवि रेटिंग सुधर सके. इस कारण सबसे पहले संजीव पालीवाल पर गाज गिराई गई. उसके बाद से ही कयास लगाया जा रहा था कि पंकज श्रीवास्तव भी जल्द नपेंगे. इस बारे में भड़ास ने पहले ही इशारों इशारों में संभावना जता दी थी.

पंकज श्रीवास्तव कामरेड रहे हैं. सीपीआईएमल लिबरेशन ग्रुप के लंबे समय तक होलटाइमर रहे हैं. साथ ही काफी समय तक थिएटर वगैरह भी किया. आईबीएन7 में काफी समय से हैं ये. इसके पहले ये स्टार न्यूज और अमर उजाला अखबार में काम कर चुके हैं. चैनल से जुड़े एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि पंकज श्रीवास्तव का परफारमेंस शून्य था. केवल आफिस आना और बातों के जरिए टाइम पास करते हुए घर चले जाना इनका रुटीन बन गया था. काहिली और कामचोरी का माहौल खत्म करने के लिए प्रबंधन को सख्त निर्णय लेना पड़ा. इस फैसले से बाकी नाकारा लोगों में ये संदेश जाएगा कि परफार्म करो या फिर बर्खास्तगी के लिए तैयार रहो.

उधर, पंकज श्रीवास्तव हटाए जाने के बाद अपनी गल्ती से उंगली कट जाने पर बहता खून दिखाकर शहीद बताने वाली मुद्रा में आ गए हैं. उन्होंने फेसबुक पर खुद को आईबीएन7 से हटाए जाने को लेकर अपना पक्ष बेहद बौद्धिक, सैद्धांतिक और आकर्षक पैकेजिंग के साथ पेश किया है. असल में पंकज को पहले से अंदाजा था कि उनके जाने के दिन आ गए हैं. लेकिन बजाय खुद छोड़ देने के, वे खुद के हटाए जाने का इंतजार करते रहे. ऐसा किस लोभ में करते रहे, ये तो वही जानें लेकिन वे खुद को मानसिक रूप से तैयार कर चुके थे कि जब हटाए जाएंगे तो इनटरनल पत्राचार को सार्वजनिक कर और पूरे मामले को वैचारिक रंग देकर अपने को शहीद कहलवाएंगे. तभी तो बर्खास्तगी के बाद मुट्ठी ताने वाली भाषा वे लिखने लगे हैं.

पंकज की मुट्ठी तब नहीं तनी जब आईबीएन7 में सैकड़ों लोगों का कत्लेआम किया गया. तब उन्हें मुट्ठी की जगह कुर्सी पसंद थी. एक शब्द न कहीं लिखा न कहीं बोला. छंटनी के शिकार लोगों ने आईबीएन7 के सामने धरना प्रदर्शन किया, उस तक में यह ढोंगी शख्स पंकज श्रीवास्तव कहीं नजर नहीं आया. जब आईबीएन7 को अंबानी ने खरीद लिया तब भी पंकज श्रीवास्तव की मुट्ठी नहीं तनी. ऐसे दर्जनों सरोकारी प्रसंग इस चैनल के भीतर हुए हैं जहां किसी भी संवेदनशील और कामरेड किस्म के व्यक्ति को अपनी पक्षधरता खुलकर दिखानी जतानी चाहिए थी लेकिन पंकज श्रीवास्तव तब लाखों की सेलरी के कारण चुप रह गए.

अब जब उन्हें फाइनली बर्खास्त कर दिया गया है नान-परफारमेंस में तो केजरीवाल और ‘आप’ को ढाल बनाकर खुद को फिर से महान क्रांतिकारी बताने पेश करने में जुट गए हैं. समझदार किस्म के कामरेड ऐसा ही करते हैं. वर्षो बरस कंबल ओढ़कर घी पीते हैं और एक दिन अचानक खुद को भूखा प्यासा घोषित करते हुए खुद को सर्वहारा के मसीहा के रूप में पेश करने लगते हैं. पंकज के साथ ऐसा ही हो रहा है. ऐसा ही कुछ करके अवसरवादी आशुतोष आम आदमी पार्टी का नेता बन गया. ऐसा ही कुछ करके ढोंगी पंकज श्रीवास्तव भी आम आदमी पार्टी का नया नेता बन सकता है. दुनिया में अवसरवादियों और ढोंगियों के लिए हजार मौके हैं. नाकारापन के कारण निकाले जाने के बाद पंकज कुछ वैसी ही बयानबाजी कर रहे हैं जैसे कोई नेता किसी पार्टी से निकाल दिया जाए तो अचानक उसे पार्टी में ढेर सारी बुराई नजर आने लगे और पार्टी के नेताओं को नंगा करने के लिए एक के बाद एक बयान जारी करने लगे. ऐसे अमर सिंहों का हश्र सबने देखा है. ऐसे लोगों के कहे को कोई सीरियसली नहीं लेता. सब कुछ समय की मिट्टी तले दफन हो जाता है. आइए आप खुद पढ़िए, हटाए जाने के बाद पंकज खुद की बर्खास्तगी को किस एंगल से पेश कर रहे हैं…


Pankaj Srivastava : और मैं आईबीएन 7 के एसो.एडिटर पद से बर्खास्त हुआ !!! सात साल बाद अचानक सच बोलना गुनाह हो गया !!!! कल शाम आईबीएन 7 के डिप्टी मैनेजिंग एडिटर सुमित अवस्थी को दो मोबाइल संदेश भेजे। इरादा उन्हें बताना था कि चैनल केजरीवाल के खिलाफ पक्षपाती खबरें दिखा रहा है, जो पत्रकारिता के बुनियादी उसूलों के खिलाफ है। बतौर एसो.एडिटर संपादकीय बैठकों में भी यह बात उठाता रहता था, लेकिन हर तरफ से ‘किरन का करिश्मा’ दिखाने का निर्देश था।दिल्ली बीजेपी अध्यक्ष सतीश उपाध्याय पर बिजली मीटर लगाने को लेकर लगे आरोपों और उनकी कंपनी में उनके भाई उमेश उपाध्याय की भागीदारी के खुलासे के बाद हालात और खराब हो गये।

उमेश उपाध्याय आईबीएन 7 के संपादकीय प्रमुख हैं। मेरी बेचैनी बढ़ रही थी। मैंने सुमित को यह सोचकर एसएमएस किया कि वे पहले इस कंपनी में रिपोर्टर बतौर काम कर चुके हैं, मेरी पीड़ा समझेंगे। लेकिन इसके डेढ़ घंटे मुझे तुरंत प्रभाव से बर्खास्त कर दिया गया। नियमत: ऐसे मामलों में एक महीने का नोटिस और ‘शो काॅज़’ देना जरूरी है। पिछले साल मुकेश अंबानी की कंपनी के नेटवर्क 18 के मालिक बनने के बाद 7 जुलाई को ‘टाउन हाॅल’ आयोजित किया गया था (आईबीएन 7 और सीएनएन आईबीएन के सभी कर्मचरियों की आम सभा) तो मैंने कामकाज में आजादी का सवाल उठाया था। तब सार्वजनिक आश्वासन दिया गया था कि पत्रकारिता के पेशेगत मूल्यों को बरकरार रखा जाएगा। दुर्भाग्य से मैने इस पर यकीन कर लिया था।

बहरहाल मेरे सामने इस्तीफा देकर चुपचाप निकल जाने का विकल्प भी रखा गया था।यह भी कहा गया कि दूसरी जगह नौकरी दिलाने में मदद की जाएगी। लेकिन मैंने कानूनी लड़ाई का मन बनाया ताकि तय हो जाये कि मीडिया कंपनियाँ मनमाने तरीके से पत्रकारों को नहीं निकाल सकतीं । इस लड़ाई में मुझे आप सबका साथ चाहिये। नैतिक भी और भौतिक भी। बहुत दिनों बाद ‘मुक्ति’ को महसूस कर रहा हूं। लग रहा है कि इलाहाबाद विश्वविदयालय की युनिवर्सिटी रोड पर फिर मुठ्ठी ताने खड़ा हूँ।


पंकज श्रीवास्तव के उपरोक्त ‘क्रांतिकारी’ स्टेटस पर भावुक हृदय और इन्नोसेंट लोगों ने खूब ‘लाल सलाम, लाल सलाम’ किया है लेकिन कुछ ऐसे भी लोगों ने कमेंट किया है जिन्हें नौकरी से निकाले जाने के बाद क्रांति याद आने के निहितार्थ पता हैं… इन्हीं में से एक वरिष्ठ पत्रकार सुमंत भट्टाचार्या का कमेंट पढ़िए….

Sumant Bhattacharya बधाई, लेकिन ना कहने में बहुत देर कर दी मित्र। यदि ल़ड़ाई निकाले जाने की है तो मामला बेहद निजी हो जाएगा। और यदि लड़ाई पत्रकारिता की शुचिता की है तो सोचा जा सकता है।


आगे की कथाएं पढ़िए, आखिर क्यों बागी बनने को राजी हुए परम करियरिस्ट पंकज श्रीवास्तव और इनके व्यक्तित्व का सच क्या है…

आशुतोष से फिक्सिंग के बाद ‘बागी’ बने पंकज श्रीवास्तव, 2017 में ‘आप’ के टिकट से यूपी में लड़ेंगे चुनाव!

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तब पंकज श्रीवास्तव की तनी हुई मुट्ठियां लाखों के पैकेज में विश्राम कर रही थीं!

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पेंदी रहित पंकज परवेज उर्फ पंकज श्रीवास्तव के विलाप के पीछे की कुछ कहानियां

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पंकज श्रीवास्तव की प्रेस कांफ्रेंस के लिए केजरीवाल ने जुटा दी मीडिया वालों की भीड़!


पढ़िए, भड़ास ने पहले ही संजीव पालीवाल के चेलों (खासकर कामरेड और थिएटर बैकग्राउंड वाले पंकज श्रीवास्तव) को हटाए जाने की घोषणा कर दी थी…

संजीव पालीवाल की आईबीएन7 से छुट्टी, इनके मोटी सेलरी वाले नाकारा चेले भी जाएंगे

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