रिलायंस जियो उतरा ठगी पर, बढ़ते कंपटीशन के चलते झूठ बोलकर धोखे से करवा रहे रिचार्ज!

रिलायंस जियो भले ही पैसे के दम पर मीडिया के द्वारा अपनी पॉजिटिव पब्लिसिटी करवा रहा हो लेकिन हकीकत यह है, कि यह कम्पनी फ़्रॉड कर रही है। इसके पीछे की वजह है 4G इंटरनेट में बढ़ता कॉम्पटीशन। इसके चलते रिलायंस स्टोर वाले ग्राहकों से झूठ बोलकर रिचार्ज करवा रहे हैं। दरअसल अन्य मोबाइल कंपनियों ने भी 4G इंटरनेट के बेहतरीन प्लान निकाले हैं। जिसके चलते जियो को कड़ी टक्कर मिल रही है।

गौरतलब है कि जियो लगातार अपने प्लान में फेरबदल कर रहा है। कभी यह 28 दिन की वैलिडिटी कर देता है, कभी 56 दिन की तो कभी 84 दिनों की। ऐसे में कस्टमर उन कम्पनियों की तरफ आकर्षित होता है जिनका प्लान जियो से बेहतर है। इसी के चलते रिलायंस केयर या स्टोर वाले झूठ बोलकर अधिक वैलिडिटी बताकर रिचार्ज करवा रहे हैं जिसका पता कस्टमर को रिचार्ज होने के बाद चलता है।

इंदौर में सामने आया ये मामला

जियो ग्रुप की ठगी का मामला इंदौर में सामने आया है। जहां ओल्ड पलासिया स्थित जियो सेंटर (केयर) के मैनेजर राहुल गुप्ता ने कस्टमर को 84 दिन की वैलिडिटी बताकर 509 से रिचार्ज करवा लिया। बाद में कस्टमर को केवल 56 दिन की ही वैलिडिटी मिली। यानी कुल घाटा देखा जाये तो जियो के ही प्लान के मुताबिक 28 दिन और 56GB 4G डाटा की प्राईज 2000 रुपये के करीब होती है। इसकी शिकायत करने पर राहुल गुप्ता ने सॉरी गलती हो गई कह कर पल्ला झाड़ लिया। इस ठगी पर जियो ग्रुप द्वारा कोई एक्शन न लेना कम्पनी के फरेब के इरादे को जाहिर करता है।

आशीष चौकसे
पत्रकार, राजनीतिक विश्लेषक और ब्लॉगर
ashishchouksey0019@gmail.com

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मुकेश अंबानी अपने छोटे भाई अनिल अंबानी के कारोबार को लील गए!

तकनीक के तेवर रिश्तों को तहस नहस कर रहे हैं। मुकेश अंबाजी और अनिल अंबानी को ही देख लीजिए। दोनों भाई हैं। सगे भाई। धीरूभाई अंबानी के स्वर्ग सिधारते ही रिश्तों में दूरियां आ गई थी, और दोनों मन से बहुत दूर हो गए। फिर मोबाइल फोन के जिस धंधे में अनिल अंबानी थे, उसी मोबाइल की दुनिया में कदम रखते ही मुकेश अंबानी ऐसा भूचाल ले आए कि उनके स्मार्टफोन और फ्री डेटा से अनिल अंबानी की दुनिया न केवल हिलने लगी, बल्कि गश खाकर धराशायी हो गई। इन दिनों अनिल अंबानी की नींद उड़ी हुई है। वे धंधा समेटने की फिराक में है। वैसे भी वे कोई मुनाफे का धंधा नहीं कर रहे हैं। भारी कर्ज का बोझ उनके सर पर है और बहुत आसानी से इससे उबरने की फिलहाल कोई गुंजाइश नहीं है।

मुकेश अंबानी अपने रिलायंस जियो के जरिए मोबाइल की दुनिया में तूफान खड़ा किए हुए है, तो अनिल अंबानी के रिलायंस कम्यूनिकेशन (आरकॉम) की नैया उस तूफान में हिचकोले खा रही है। वैसे, यह कहने को हर कोई आजाद है कि मुकेश अंबानी को ऐसा नहीं करना चाहिए था। भाई द्वारा भाई की मदद करने के विषय पर बहुत साल पहले एक फिल्म आई थी, नाम था – भाई हो तो ऐसा। लेकिन लेकिन इस उल्टी गंगा को देखकर यही तथ्य अब सवाल की मुद्रा में हमारे देश में पूछा जा रहा है कि – भाई हो तो ऐसा ऐसा ? मुकेश अंबानी के जियो के आते ही तीन महीने में ही अनिल की कंपनी को कुल एक हजार करोड़ का नुकसान हुआ है। जी हां, एक हजार करोड़। हमारे हिंदुस्तान की सवा सौ करोड़ जनता में से एक सौ चौबीस करोड़ लोगों को अगर यह पूछा जाए कि एक करोड़ में कितने शून्य होते हैं, तो वे बता भी नहीं पाएंगे। मगर, यहां तो मामला एक हजार करोड़ के नुकसान का है।

रिलायंस जियो की लांचिंग से हालांकि सभी टेलिकॉम आपरेटर की कमाई को जबरदस्त झटका लगा है। लेकिन अनिल अंबानी के आरकॉम पर जियो ने कुछ ज्यादा ही करारी चोट की है। मुकेश अंबानी के मोबाइल फोन और इंटरनेट की कदम रखते ही अनिल अंबानी की हालत खराब है। अनिल परेशान हैं। आरकॉम के आंकड़ों को देखकर डरावनी तस्वीर सामने आ रही है। बड़ी संख्या में इनिल अंबानी के ग्राहक आरकॉम छोड़कर जियो सहित दूसरे ऑपरेटरों की सर्विस ले रहे हैं। हालांकि एयरटेल, वोडाफोन और आइडिया कुछ हद तक अपने ग्राहकों को सहेजने में सफल रहे हैं। लेकिन आरकॉम को अपने डेटा ग्राहकों के मामले में भी बहुत बड़ा नुकसान उठाना पड़ा है। एक साल पहले आरकॉम के पास 38.9 मिलियन ग्राहक थे। लेकिन 2017 की आखिरी तिमाही में उसके पास सिर्फ 28.3 मिलियन ग्राहक बचे हैं। मतलब, करीब 10 मिलियन ग्राहक उन्हें छोड़ गए हैं।

देश के बड़े कर्जदारों में अनिल अंबानी का नाम लगातार शिखर की ओर बढ़ रहा हैं। वे लगातार कर्ज के बोझ तले दबते जा रहे हैं और हालात यह हैं कि जिनकी उनकी सकल संपत्ति है, उससे ज्यादा उन पर कर्ज है। अनिल अंबानी की रिलायंस को उधार देने वालों की नींद उड़ी हुई है और इस कंपनी में जिन्होंने निवेश किया है, वे भी परेशान हैं। मार्च 2017 के जाते जाते अनिल अंबानी की कंपनी आरकॉम कुल 45 हजार 733 करोड़ रुपये के कर्ज के बोझ तले आ गई है। अनिल अंबानी की आरकॉम का भविष्य कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा है। बीते साल की आखरी तिमाही के नतीजों में कंपनी में रेवेन्यू तो बड़ी मात्रा में घटी ही है, आरकॉम के नेट प्रॉफिट में भी बहुत बड़ी गिरावट आई है। आंकड़ों पर नजर डालें, तो सन 2017 में जनवरी – मार्च की तिमाही में कंपनी को कुल 948 करोड़ रुपये का घाटा झेलना पड़ा है। मतलब करीब एक हजार करोड़ का घाटा। मतलब साफ है कि आनेवाले दिनों में अनिल अंबानी की तरफ से कोई बड़ी खबर सुनने को मिल सकती है। 

छोटे भाई अनिल अंबानी कर्जे के इस बोझ को कम करने का मन बना चुके हैं। इसके लिए वे अपना मोबाइल टॉवर का कारोबार बेचने की तैयारी में हैं। आरकॉम के मोबाइल टॉवर कारोबार की कुल कीमत करीब 25 हजार करोड़ रुपये मानी जा रही है। ब्रूकफील्ड नाम की कंपनी इसके लिए तैयार भी है। अनिल अंबानी आश्वस्त हैं कि इसके अलावा थोड़ी बहुत रकम उन्हें अपनी कंपनी के एयरसेल के साथ मर्जर से भी मिल ही जाएगी। सो, वे इस संकट से पार पा लेंगे। लेकिन फिर भी रिलायंस को उधार देने वालों की नींद उड़ी हुई है और अनिल अंबानी की कंपनी में निवेश करनेवालों को अपने भविष्य पर संकट दिख रहा है।

बीते एक साल के दौरान शेयर मार्केट में रिलायंस कंम्यूनिकेशन के शेयर लगभद 40 फीसदी टूट चुके हैं। बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज में उनके शेयर काफी नीचे उतर गए हैं। नैशनल स्टॉक एक्सचेंज पर भी कंपनी का शेयर 20 फीसदी से अधिक कमजोर हुए। मुकेश अंबानी की रिलायंस जियो की आक्रामक मार्केटिंग और बेहद कम कीमत रखने की नीति के कारण छोटे भाई अनिल अंबानी की कंपनी रिलायंस कम्युनिकेशंस को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है। यह सब इसलिए हैं क्योंकि धंधे में कोई किसी का भाई नहीं होता।

लेखक निरंजन परिहार मुंबई के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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हिंदुस्तान टाइम्स प्रबंधन रिलायंस से डील को लेकर अपना पक्ष क्यों नहीं रख रहा?

शोभना भरतिया के स्वामित्व वाले हिंदुस्तान टाइम्स के मिंट और दिल्ली एडिशन के रिलायंस के मुकेश अम्बानी को बेचे जाने से सम्बंधित डील को लेकर तरह तरह की चर्चाएं हैं. हर कोई ये जानना चाहता है कि क्या वाकई हिंदुस्तान टाइम्स प्रबंधन और रिलायंस के बीच कोई डील हुयी है? हिंदुस्तान टाइम्स प्रबंधन इस पर कुछ बोल नहीं रहा है और ना ही अपना पक्ष रख रहा है। ना ही इस खबर का खंडन किया जा रहा है। यानि कुछ न कुछ तो शोभना भरतिया और रिलायंस के बीच खिचड़ी पकी है।

हिंदुस्तान के एक संपादक ने अपना पक्ष एक ह्वाट्स ग्रुप में रखा भी लेकिन सिर्फ इस मुद्दे पर कि पांच हजार करोड़ में नहीं बिका यह समूह। आप भी पढ़िए इनका पक्ष…

”हिंदुस्तान टाइम्स मीडिया ग्रुप (एचटी मीडिया और एचएमवीएल) दोनों करीब 65 हजार करोड़ की कंपनियां हैं। इसकी ब्रांड वैल्यु देश के किसी भी मीडिया हाउस के मुकाबले सबसे ज्यादा है। इंटरनेशनल मार्केट में भी एचटी ग्रुप की अच्छी पकड़ है हर साल का रेवेन्यू भी बेहतरीन है। शेयर वैल्यु भी अच्छी है। एचटी मीडिया में मार्केट कैपिटल 1972.54 करोड़ और सालाना रेवेन्यु 2497.73 करोड़ तथा शेयर 85.25 रुपये है। एचएमवीएल में मार्केट कैपिटल 2,007.32 करोड़, रेवेन्यु 926.48 करोड़ सालाना और शेयर 276.90 रुपये है। ऐसी कंपनी क्या 5 हजार करोड़ रुपये में बेची जा सकती है? झूठा प्रचार करने वालों पर तरस आती है।”

धन्यवाद संपादकजी, आपने अपनी बात तो रखी। ये सही बात हो सकती है तो हिंदुस्तान टाइम्स या आप साफ़ साफ़ क्यों नहीं लिखते कि हिंदुस्तान टाइम्स नहीं बिका है और ये खबर पूरी तरह गलत है। या ये क्यों नहीं बताते कि हिंदुस्तान टाइम्स अगर बिका है तो कितने में बिका है। क्या क्या बेचा गया है। सिर्फ प्रिंट राइट्स बिके हैं या कैपिटल भी बिका है। साथ ही हिंदुस्तान टाइम्स प्रबंधन अगर अपना ये भी पक्ष रख देता कि हिंदुस्तान टाइम्स बिका है या हिंदुस्तान हिंदी भी और कितने एडिशन बेचे गए हैं तो बात साफ हो जाती।

अगर कुछ एडिशन बेचे गए हैं तो कहां कहां के एडिशन बेचे गये हैं। ये सारी सच्चाई तो हिंदुस्तान टाइम्स प्रबंधन ही जानता है और देश के अपने करोड़ो पाठकों और हजारों कर्मियों तक ये सच्चाई हिंदुस्तान टाइम्स ही पहुंचा पायेगा। उम्मीद है हिंदुस्तान टाइम्स इस पर अपना पक्ष रखेगा ताकि भ्रम की स्थिति दूर हो।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आर टी आई एक्सपर्ट
मुंबई
9322411335
shashikantsingh2@gmail.com

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एबीपी न्यूज के पतन के कारण जी न्यूज नंबर तीन पर पहुंचा

साल 2017 के दूसरे हफ्ते की टीआरपी में जी न्यूज नंबर तीन पर पहुंच गया है. ऐसा एबीपी न्यूज चैनल की टीआरपी में भयंकर गिरावट के कारण हुआ है. न्यूज24 लगातार अच्छा प्रदर्शन कर रहा है और यह चैनल अब इंडिया न्यूज के काफी नजदीक पहुंच चुका है. इंडिया न्यूज की टीआरपी में भी सुधार है.

बुरा हाल न्यूज18 इंडिया का है जो पहले आईबीएन7 के नाम से जाना जाता था. लाख मेहनत करने के बावजूद अंबानी का यह चैनल उठ नहीं पा रहा है. यह अभी भी टाप टेन में नीचे से तीसरे स्थान पर है. यानि इसकी असल जगह नंबर सात है जो लगातार कायम है. देखें दूसरे सप्ताह के टीआरपी के आंकड़े…

Weekly Relative Share: Source: BARC, HSM, TG:CS15+,TB:0600Hrs to 2400Hrs, Wk 2′ 2017
Aaj Tak 17.0 up 0.1 
India TV 14.1 dn 0.2
Zee News 12.9 up 0.1 
ABP News 12.7 dn 1.4
India News 10.2 up 0.5
News 24 9.5 up 0.6
News Nation 8.9 up 0.4
News18 India 7.9 up 0.4
Tez 2.5 dn 0.2
NDTV India 2.4 same 
DD News 1.8 dn 0.2

TG: CSAB Male 22+
Aaj Tak 15.8 dn 0.3
India TV 14.9 dn 0.3
Zee News 13.3 up 0.1
ABP News 12.9 dn 1.2
News Nation 9.1 up 0.6
News18 India 8.9 up 0.5
India News 8.9 up 0.5
News 24 8.8 up 0.6
NDTV India 3.0 dn 0.1
Tez 2.7 dn 0.1
DD News 1.8 dn 0.2

इन्हें भी पढ़ें…

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मोदी जी बेचेंगे मुकेश अंबानी के ‘जियो’ सिम!

Sheetal P Singh : मुकेश अंबानी ने अपनी कंपनी के “ब्रांड एंबेसडर” की घोषणा कर दी! श्री मोदी जी उनका “जियो” सिम बेचेंगे! टाइम्स आफ इंडिया के प्रथम पेज पर फ़ुल स्क्रीन सुशोभित हैं! सुबह वे रिलायंस के विज्ञापन में थे, शाम रिलायंस के चैनल पर साक्षात।

Yashwant Singh : 2 September 2016. आज राष्ट्रीय शर्म दिवस है. बूझे क्यों? हमारे देश का पीएम देश के सबसे बड़े कारपोरेट लुटेरे का प्रोडक्ट बेच रहा है. डील कितने की है? अब ना कहना भक्तों कि ना खाऊंगा ना खाने दूंगा. अब कहना- जमकर खाऊंगा, खुलकर खाऊंगा, डकार भी नहीं लूंगा. शेम शेम.

Priyabhanshu Ranjan : आपने अब तक तो सिर्फ ये देखा था कि मुकेश अंबानी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कंधे पर हाथ रखकर बात करते हैं।  अब ये भी देख लें कि अंबानी अपनी कंपनी का प्रॅाडक्ट लॅांच करने के लिए प्रधानमंत्री का भी इस्तेमाल करने लगे हैं! मुझे पता है कि मोदी सरकार को इस विज्ञापन से कोई दिक्कत नहीं होगी, क्योंकि मोदी जी को प्रधानमंत्री पद की गरिमा का ख्याल ही कहां है। इस विज्ञापन में Crony Capitalism की साफ झलक दिखाई दे रही है!

Sandeep Verma : रिलायंस जियो द्वारा सस्ते इंटरनेट पैक के आफर ने बाजार में जो खलबली मचाई है ,उसको समझने के लिए थोड़ा पीछे जाना होगा . एक समय था जब सरकारी फोन कनेक्शन के लिए लम्बी लाइन और जुगाड़ के साथ लाईन मैन को रिश्वत तक देनी पड़ती थी. यह सरकारी कम्पनी की मोनोपोली की वजह से कम्पनी द्वारा ठगी जैसा कुछ था . फिर दौर आया मोबाईल कम्पनियों का और लैंडलाईन फोन का जनाजा उठ गया . बेहद महंगी सेवा बेचकर ठगी जैसा कर रही सरकारी कम्पनी को अचानक नुक्सान होने लगा . सरकार में बैठे लोगों ने प्राईवेट कम्पनियों से रिश्वत ले लेकर सरकारी कम्पनी को नुक्सान पहुचाकर उनकी अतिरिक्त मदद की. अब आते है जियो पर. प्राईवेट कम्पनियों ने कार्टेल यानी गिरोह बनाकर ग्राहकों को लूटना शूरू कर दिया .इसी गिरोहबंदी की वजह से भारत में इंटरनेट का रेट दुनिया में सबसे अधिक और स्पीड सबसे घटिया है. अजीब बात यह रही कि वोडाफोन जैसी विदेशी कम्पनी तक जनता को लूटने की इस गिरोह बंदी में शामिल हो गयी . मुकेश अम्बानी ने जियो के फ्री टेस्ट लांच के नाम पर ग्राहक छीनने का जो अभियान चलाया है, वह एयरटेल और वोडाफोन जैसी अब तक ठगी कर रही कम्पनियों के लिए सजा जैसा है . जैसी सजा सरकारी बीएसएनएल ने पायी वैसी ही सजा एयरटेल और वोडाफोन जैसी कम्पनियों को मिलने वाली है. यह अलग बात है अगले राऊंड में रिलायंस जियो ,एयरटेल और वोडाफोन सहित सभी कम्पनियां मिलकर गिरोहबंदी करके ग्राहकों को वैसे ही लूटना शुरू कर देंगी जिस तरह अभी तक कर रही थी. इसलिए अगर कुछ फ्री मिल रहा है तो आज भले ही लूट लें ,मगर अगले दौर में महंगा खरीदने के लिए तैयार भी रहिये. एयरटेल और वोडाफोन जैसी स्थापित कम्पनियां चाहे तो वे भी अगले छः महीने तक मुफ्त सेवा कार्यक्रम चलाकर भारतीय ग्राहकों को रोटी कपडा ना सही ,डेटागिरी करके कुछ दिन ही सही अच्छे दिन का मजा ले लेने दें.

सौजन्य : फेसबुक

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रिलायंस=सरकार? सरकार=रिलायंस?

एक प्राइवेट कंपनी एक नया प्रोजेक्ट शुरू करती है. पूरे देश में इंटरनेट और मोबाइल सर्विस के सस्ते प्लान लाती है, अरबों का निवेश करती है. उसके अपने कंपटीटर हैं. ‘जियो’ मुकेश अंबानी अब टेलीसर्विस किंग बनना चाहते हैं. ‘कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी’ (CSR) के तहत बातें छौंकी जाती हैं, लेकिन हर कंपनी का एक ही मकसद है, मैक्सिमम मुनाफा पीटना. फिर बाजार के इस खेल में प्रधानमंत्री किस तरह फिट होते हैं? अपने मुनाफे के लिए कोई उनकी तस्वीर का इस्तेमाल कैसे कर सकता है?

क्या भारत की निर्वाचित सरकार और रिलायंस नाम की एक कंपनी, एक ही सिक्के के दो पहलू हैं? वैसे सरकार एक बिल ला रही है, जिसके मुताबिक अगर सेलिब्रिटी अपने विज्ञापनों में झूठे दावे करेंगे तो वे भी कानूनी कार्रवाई के पात्र होंगे. रिलायंस का जियो अपने दावे पर खरा नहीं उतरा तो क्या केंद्र सरकार अपने प्रधानमंत्री के खिलाफ केस करेगी?

कुछ लोग इसे ‘डिजिटल इंडिया’ के हवाले से जायज ठहराना चाहेंगे. लेकिन फिर एयरटेल, वोडाफोन और आइडिया जैसी कंपनियों ने किसकी भैंस खोल ली है? उनके भावी 4जी प्लान ‘डिजिटल भारत’ के सपने के उलट हैं क्या? फिर मोदी खुलकर विज्ञापन बाजार में आ जाएं और हर तरह की कंपनियों का विज्ञापन करें. बल्कि महंगाई का जमाना है, हर कंपनी के प्रचार के लिए उनसे एक निश्चित मेहनताना लें. फिल्मी सितारों की तरह. कल को मैं जांघिया का धंधा शुरू करूं और इसे देश की किसी स्वास्थ्य योजना से जोड़कर पेश करूं तो क्या मुझे मोदी की तस्वीर से प्रचार करने की इजाजत होगी?

Pushp Sharma

(Senior Journalist)

pushpsharma@gmail.com

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सुनिए, रिलायंस के कार्यकर्ता उमेश उपाध्याय छात्रों को क्या सिखा रहे ‘4जी पत्रकारिता’ के बारे में

डाटा और तकनीक संपन्न होगी भविष्य की पत्रकारिता : उमेश उपाध्याय, पंजाब विश्वविद्यालय में स्व. श्री विजय सहगल स्मृति व्याख्यान, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल और पंजाब विश्वविद्यालय, चण्डीगढ़ के स्कूल ऑफ कम्युनिकेशन स्टडीज का संयुक्त आयोजन

चंडीगढ़। जनसंचार का जमाना अब थोड़ा पीछे रह रहा है। अब प्रतियोगिता कंट्रोल्ड कम्युनिकेशन बनाम मास कम्युनिकेशन हो गई है। अब तक हम कंटेंट को किंग कहते थे। लेकिन मुझे लगता है कि संभवतः डाटा और डाटा माइनिंग अब किंग होगा। अभी अखबार में संपादक अच्छा लिखने वाले और न्यूज चैनल के संपादक अक्सर अच्छा बोलने वाले होते हैं। लेकिन आज से 10 साल बाद के न्यूज रूम की कल्पना करें तो मुझे लगता है वे डाटा और तकनीक संपन्न होंगे। अब दुनिया के बड़े मीडिया संस्थानों की पात्रता है कि जिनको गणित और सांख्यिकी नहीं आती है वे मीडिया में न आएं।

ये विचार वरिष्ठ पत्रकार एवं रिलायंस इंडस्ट्रीज लि. मुम्बई के प्रेसिडेंट एंड मीडिया डायरेक्टर उमेश उपाध्याय ने ‘4G पत्रकारिता’ विषय पर पंजाब विश्वविद्यालय के आईसीएसएसआर सभागार में आयोजित एक विशेष व्याख्यान में व्यक्त किये। इस विशेष व्याख्यान का आयोजन प्रख्यात पत्रकार एवं दैनिक ट्रिब्यून के पूर्व संपादक स्वर्गीय श्री विजय सहगल की पुण्य स्मृति में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल और पंजाब विश्वविद्यालय, चण्डीगढ़ के स्कूल ऑफ कम्युनिकेशन स्टडीज के संयुक्त तत्त्वावधान में किया गया।

उमेश उपाध्याय ने कहा कि ‘4-जी पत्रकारिता’ के रूप में एक नया शब्द प्रो. बृजकिशोर कुठियाला ने दिया है जिसका आने वाले दिनों में जनसामान्य में व्यापक प्रयोग होगा। पहले दो विश्व युद्ध जमीन, अधिकार और शक्ति के लिए लड़े गये, जबकि तीसरा विश्वयुद्ध दिमाग पर नियंत्रण करने के लिए लड़ा जाएगा। जिसकी शुरुआत हो चुकी है। सीमाओं पर युद्ध लड़ने अब लगभग बंद हो गये हैं और अब युद्ध प्रौद्योगिकी के माध्यम से लड़े जा रहे हैं। लोगों के मन को कैसे कंट्रोल किया जाए और अपने हाथ में लिया जाए इसमें करनीक का बहुत प्रयोग हो रहा है। सारी लड़ाई मन और विचार के कंट्रोल की है। आईएसआईएस भी टेक्नोलॉजी के माध्यम के विभिन्न प्रकार के दिमागों को कंट्रोल करने की कोशिश कर रहा है।

टीवी और अखबार में आप अपनी पहुंच को नियंत्रित नहीं कर सकते लेकिन वर्तमान संचार प्रौद्योगिकी इसे नियंत्रित कर सकती है।  आज ज्यादा से ज्यादा इंटरनेट मोबाइल पर प्रयोग किया जा रहा है। यह सब हमारी पत्रकारिता को प्रभावित कर रहे हैं। 4जी हाई स्पीड कनेक्टिविटि अब हर जगह अपलब्ध हो रही है। हर घर को कार, बस को जोड़ती है। पढ़ना धीरे-धीरे कम हो रहा है। अब विजुअल की ओर ज्यादा ध्यान है। अब दुनिया में पत्रकारिता में हो रहे नये प्रयोगों में वीडियो न्यूज का चलन बढ़ रहा है। इसलिए वीडियो न्यूज की उपलब्धता बढ़ रही है। हमें टेलीवीजन की पत्रकारिता करनी होती है तो ओबी वैन के साथ बहुत कैमरा, माइक और बहुत से उपकरण के साथ प्रसारण करना होता है। जबकि एक मोबाइल फोन अब ओबी वैन, स्टूडियो, एडिटिंग टेबल, वीडियो कैमरा, माइक सब कुछ है जिसके लिए किन्हीं विशेष उपकरणों की आवश्यकता नहीं पड़ती। 4-जी तकनीक से इसका व्यापक और प्रभावशाली प्रयोग संभव हो रहा है।

हमारी आज की पत्रकारिता एक तरफा संचार है। जबकि इसमें दो तरफा संचार है। इसका सबसे ज्यादा असर टीवी पत्रकारिता पर पड़ने वाला है। प्राइम टाइम खत्म हो जाएगा और आप अपनी सुविधानुसार समाचार देख सकेंगे।  स्मृति व्याख्यान कार्यक्रम की अध्यक्षता सीईसी-यूजीसी के निदेश प्रो. राजवीर सिंह ने श्री विजय सहगल को स्मरण करते हुए कहा कि 16 जुलाई को उनका जन्मदिन हमें ऐसे ही रचनात्मक ढंग से मनाना चाहिए। श्री सहगल की पत्रकारिता के साथ-साथ साहित्य सृजन में भी विशेष रुचि थी। उनमें एक अच्छे शिक्षक और जनसंपर्क कर्ता के गुण भी थे। श्री राजबीर ने कहा कि आज के मीडिया शिक्षण संस्थानों में भी सूचना प्रौद्योगिकी के साथ ही पाठ्यक्रमों को समय की आवश्यकता के अनुसार अद्यतन किया जा रहा है। 

इससे पूर्व वरिष्ठ पत्रकार अशोक मलिक ने श्री विजय सहगल के व्यक्तित्व वं कृतित्व पर प्रकाश डाला। पंजाब विश्वविद्यालय, चण्डीगढ़ के स्कूल ऑफ कम्युनिकेशन स्टडीज के चेयरमैन प्रो. जयंत पातेकर ने आभार प्रकट किया। मंच संचालन वरिष्ठ पत्रकार श्री दीपक वशिष्ठ ने किया। इस अवसर पर श्री विजय सहगल की धर्मपत्नी श्रीमती शशि सहगल और उनके परिजन, दैनिक ट्रिब्यून के पूर्व संपादक राधेश्याम शर्मा, वर्तमान संपादक नरेश कौशल, पंजाब विश्वविद्यालय के प्राध्यापक और शोधार्थियों के अलावा इंडियन मीडिया सेंटर और पंचनंद शोध संस्थान, चंडीगढ़ के सदस्य भी सम्मिलित हुए।

सुरेन्द्र पॉल
सहायक प्राध्यापक,
मा.च.रा.प.एवं.सं.विवि. भोपाल
9993109267
प्रेस विज्ञप्ति

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ई-कचरे में तब्दील हो जाएंगे रिलायंस के 50 लाख मोबाइल!

सीडीएमए सिम बंद होने से डब्बा हो रहे हैं रिलायंस मोबाइल, 4 जी के लिये नये मोबाइल खरीदने पर ग्राहकों का डबल नुकसान

4जी नेट की तकनीक लेकर आ रहे रिलायंस कम्यूनिकेशन ने मोबाइल मार्केट में हलचल मचा रखी है लेकिन उससे भी ज्यादा परेशान उसके वे ग्राहक हो रहे हैं जो अभी तक रिलायंस सीडीएमए सेवा का उपयोग कर रहे थे। कम्पनी अपने 50 लाख से ज्यादा सीडीएमए ग्राहकों की सिम को 4 जी में अपग्रेड कर रही है। इसके चलते इसके ग्राहकों को जहाँ नया मोबायल खरीदना पड़ रहा है वहीं उनके पुराने सीडीएमए मोबाइल डब्बों में तब्दील हो रहे हैं। इन मोबाइल में कोई भी जीएसएम सिम प्रयोग में नहीं लायी सकती है।

ग्राहकों के सामने दूसरी कम्पनियों की सीडीएमए सेवा उपयोग के भी ज्यादा विकल्प मौजूद नहीं हैं। अभी टाटा इंडिकॉम, एमटीएस के साथ कहीं-कहीं बीएसएनएल, एमटीएनएल ही सीडीएमए सेवा दे रहे हैं, इनमें भी जल्द ही इस सेवा के बंद होने के आसार हैं। बाकि रिलायंस के बहुत सारे मोबाइल में केवल रिलायंस की ही सिम प्रयोग में लायी जा सकती है। एैसे में सीडीएमए सिम ऑपरेट कर रहे यह रिलायंस मोबाइल केवल ई-कचरा बनकर रह जायें तो कोई आश्चर्य नहीं है।

कम्पनी ने नहीं किया किसी योजना का खुलासा

रिलायंस ने सीडीएमए सेवा बंद करने के चलते बेकार हुये मोबाइल सेट्स को लेकर अभी किसी योजना का खुलासा नहीं किया है। फिलहाल इसमें ग्राहकों का भारी नुकसान हो रहा है। उन्हें ना चाहते हुये भी दूसरा जीएसएम मोबाइल खरीदना पड़ रहा है। अपुष्ट सूत्रों का कहना है कि कम्पनी किसी एैक्सचैंज ऑफर के तहत अपने सीडीएमए मोबाइल को लेकर अपने ग्राहकों को राहत दे सकती है।

बीएसएनएल ने बदले हैं अपने सीडीएमए सेट्स

हॉल ही में झारखण्ड में बीएसएनएल ने अपनी सीडीएमए सेवा बंद करने से पहले अपने ग्राहकों के मोबाइल फोन मुफ्त में बदलकर दिये हैं। जानकारों का कहना है कि इन बेकार सेटों का उचित प्रकार से नष्ट होना पर्यावरण हित में जरूरी है। प्रयोग में ना आने के चलते यह ई-प्रदूषण बढ़ाने में सहायक होंगे। कम्पनी ही इनका उचित निपटान कर सकती है।

उपभोक्ता पूछ रहे हैं पुराने फोन का क्या करें?

एक वेबसाईट पर रिलायंस सेवा के बारे में लिखी अपनी पीड़ा में मुंबई के एक कस्टमर ने कहा कि रिलायंस के अपने बेसिक फोन पर भी सीडीएमए सेवा बंद करने से उसका फोन डिब्बा बन गया है। कम्पनी 1800 रूपये में नया फोन दे रही है अब वह इस फोन का क्या करें। उसके नुकसान की भरपाई कौन करेगा । एक उपभोक्ता का प्रश्न था कि किसी सेवा को बन्द करने के चलते होने वाली असुविधा व नुकसान के लिये क्या कम्पनी की कोई जिम्मेदारी नहीं है। हमने केवल रिलायंस के लिये छः माह पहले महंगा एचसीटी का सीडीएम मोबायल सेट खरीदा है अब यह सिम बंद होने से वह कूड़ा बन जायेगा। ऐसे में इस फोन का क्या करें।

ई-कचरे से बचना जरूरी

संयुक्त राष्ट की संस्था ग्लोबल ई-वेस्ट मॉनीटर 2014 के अनुसार भारत ई-कचरा पैदा करने वाला विश्व में पाँचवा सबसे बड़ा देश है। 2015 के आकड़ों के अनुसार भारत में इलेक्ट्रानिक्स एवं इलेक्ट्रिकल्स आदि का 17 लाख टन ई-कचरा निकला था। इसमें 5 प्रतिशत कम्पयूटर उपकरण एवं मोबाइल आदि का ई-कचरा शामिल था। रिलायंस के माजूदा कनैक्शन ग्राहक संख्या 11 करोड़ के करीब है। उसमें सबसे पुराने जुड़े हुये सीडीएमए ग्राहक 50 लाख से ज्यादा हैं। ऐसे में 50 लाख से ज्यादा मोबायल सैट ई-कचरा बन जायगें। उचित निपटान ना होने से यह पर्यावरण के लिये नुकसानदेय साबित हो सकते हैं। गौरतलब है कि इनमें सिलीकॉन, केडमियम, सीसा, क्रोमियम, पारा व निकल जैसी भारी धातुओं का उपयोग किया जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार पर्यावरण में असावधानी व लापरवाही से इस कचरे को फेंका जाता है, तो इनसे निकलने वाले रेडिएशन शरीर के लिए घातक होते हैं। इनके प्रभाव से मानव शरीर के महत्वपूर्ण अंग प्रभावित होते हैं। कैंसर, तंत्रिका व स्नायु तंत्र पर भी असर हो सकता है।

लेखक जगदीश वर्मा ‘समन्दर’ से संपर्क metromedia111@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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Reliance Fresh doing Fraud with Consumers, charged more than MRP

Reliance Fresh charged more than MRP (Appx 10% Extra Charged)

Dear Yashwant Singh Jee,

My Namarskar to you. Hope you are & doing well.

I am informing the message to you to publish & aware to the peoples through your website that how  Reliance Fresh (Reliance Retails Ltd) doing fraud & charging extra from the MRP. I have attached the Copy of proof where mentioned Retails Price Rs.32/ on product, But in Bill they have taken Rs.35/-. (Appx 10% Extra).

Its a small item only, But since a long time we have been purchasing the products from Reliance, it count not give guarantee they would take right price. Even now a day they are may be taking more price than MRP. We all should aware this matter.  We should once check before purchasing any thing from Reliance Fresh. 

Matter:-

I Purchased Two Pack EGG from Reliance Fresh (Reliance Retail Ltd) which rate was Rs.32/-, But They charged Rs.35/.  Its Rs. 3/- extra from MRP i.e appx 10% extra from MRP.  You can find how Reliance doing Fraud with Consumers. I think they might taken extra amount some more items in past year back. It should be inquiry properly.

Yours truely

Gajendra Kabat

Journalist

Bhubaneswar, Odisha

gajendrakabat@gmail.com

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नेटवर्क18 से रिलायंस वाले 3.1% इक्विटी हिस्सेदारी निकालेंगे

मुंबई से खबर है कि रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (आरआईएल) ने नेटवर्क18 मीडिया एंड इंवेस्टमेंट लिमिटेड में से अपनी 3.1 प्रतिशत इक्विटी हिस्सेदारी निकालने का फैसला किया है. इससे उसे 200 करोड़ रुपए मिलने का अनुमान है. ऐसा सेबी के उस नियम की पालना के लिए किया जा रहा है जिसके तहत किसी भी लिस्टेड कंपनी में पब्लिक शेयर न्यूनतम 25 प्रतिशत होनी चाहिए. या यूं कहें लिस्टेड कंपनी में प्रवर्तकों की इक्विटी हिस्सेदारी 75 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती. आरआईएल ने पिछले साल इंडिपेंडेंट मीडिया ट्रस्ट (आईएमटी) बनाकर 4000 करोड़ रुपए में नेटवर्क18 को खरीद लिया था.

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रिलायंस जिओ मीडिया को टीवी कंटेंट डिस्‍ट्रीब्‍यूशन के लिए मिली प्रोवीजनल मंजूरी

रिलायंस इंडस्‍ट्रीज लिमिटेड (आरआईएल) ने सोमवार को कहा कि उसकी सब्सिडियरी रिलायंस जिओ मीडिया को संपूर्ण भारत में डिजीटल केबल टीवी क्षेत्र में मल्‍टी सर्विस ऑपरेटर के तौर पर काम करने के लिए सरकार से प्रोवीजनल रजिस्‍ट्रेशन हासिल हो चुका है।

बीएसई को दी गई सूचना में कहा गया है कि रिलायंस इंडस्‍ट्रीज लिमिटेड की सब्सिडियरी रिलायंस जिओ प्राइवेट लिमिटेड को पूरे देश में डिजीटल एड्रेसएबल सिस्‍टम (डीएएस) में मल्‍टी सर्विस ऑपरेटर (एमएसओ) के तौर पर काम करने के लिए सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से प्रोवीजनल रजिस्‍ट्रेशन हासिल हो चुका है।

एमएसओ एक केबल ऑपरेटर होता है, जो एक ब्रॉडकास्‍टर से प्रोग्रामिंग सर्विसेस हासिल करता है और उसे या तो मल्‍टीपल सब्‍‍सक्राइबर या फि‍र एक या अधिक लोकल केबल ऑपरेटर के जरिये ट्रांसमिट करता है। आरआईएल अपने जिओ ब्रांड को इंटीग्रेटेड बिजनेस क्षमता के तौर पर विकसित कर रहा है,‍ जिसमें टेलीकॉम, हाई स्‍पीड डाटा, डिजीटल कॉमर्स, मीडिया और पेमेंट सर्विसेस का मिश्रण होगा।

इस मंजूरी के साथ, रिलायंस जिओ अब हेथवे, आईएमसीएल, सिटी केबल नेटवर्क और डेन नेटवर्क्‍स से प्रतिस्‍पर्द्धा कर पाएगी और यह अपने मीडिया कंटेक्‍ट को केबल टेलीविजन पर भी स्‍वयं डिस्‍ट्रीब्‍यूट कर सकेगी। कंपनी ने मीडिया हाउस नेटवर्क18 का अधिग्रहण किया है, जिसके 17 न्‍यूज चैनल और 8 भाषाओं में 14 एंटरटेनमेंट चैनल हैं। इसके अलावा इसके पास कई इंटरनेट आधरित बिजनेस भी हैं।

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आईबीएन7 और ईटीवी वालों ने स्ट्रिंगरों को वेंडर बना डाला! (देखें फार्म)

अंबानी ने चैनल खरीद लिया तो जाहिर है वह एक तीर से कई निशाने साधेंगे. साध भी रहे हैं. मीडिया हाउस को मुनाफे की फैक्ट्री में तब्दील करेंगे. मीडिया हाउस के जरिए सत्ता की दलाली कर अपने दूसरे धंधों को चमकाएंगे. मीडिया हाउस के जरिए पूरे देश में रिलायंस विरोधी माहौल खत्म कराने और रिलायंस पक्षधर दलाली को तेज कराने का काम कराएंगे. इस कड़ी में वे नहीं चाहते कि जिले से लेकर ब्लाक स्तर के पत्रकार कभी कोई आवाज उठा दें या रिलायंस की पोल खोल दें या बागी बन जाएं. इसलिए रिलायंस वाले खूब विचार विमर्श करने के बाद स्ट्रिंगरों को वेंडर में तब्दील कर रहे हैं. यानि जिले स्तर का आईबीएन7 और ईटीवी का स्ट्रिंगर अब वेंडर कहलाएगा और इस बाबत दिए गए फार्मेट पर हस्ताक्षर कर अपने डिटेल कंपनी को सौंप देगा.

इस वेंडरशिप के जरिए रिलायंस की योजना यह है कि जिले स्तरीय पत्रकार को वेंडर बनाकर उससे कंटेंट डिलीवर कराने के नाम पर समझौता करा लिया जाएगा. इस समझौते में कई अन्य पेंच भी हैं. लेकिन अंततः यह पूरा समझौता पत्रकारिता के बुनियादी नियमों के खिलाफ है. अब स्ट्रिंगर अपने को कंपनी चैनल का आदमी नहीं बता पाएगा. उसकी अपनी खुद की सारी जिम्मेदारी होगी. वह बस कंटेंट देगा और बदले में पैसे लेगा. इसके अलावा वह कहीं कोई क्लेम दावा नहीं कर सकता. आईबीएन7 और ईटीवी के स्ट्रिंगरों में इस बात की नाराजगी है कि अब तो उन्हें कंपनी वाले स्ट्रिंगर भी नहीं रहने दे रहे, वेंडर बना दिया है, जिसका पत्रकारिता से कोई मतलब नहीं है. सूत्रों का कहना है कि रिलायंस वाले पत्रकारों को वेंडर बनाने का काम सिर्फ आईबीएन7 और ईटीवी में ही नहीं कर रहे हैं बल्कि कंपनी के दूसरे न्यूज चैनलों में भी कर रहे हैं.

आईबीएन7, सीएनएन-आईबीएन और ईटीवी को जिस ढंग से इन दिनों चलाया जा रहा है, उससे अब सबको पता चल गया है कि आखिर कारपोरेट के चंगुल में आने पर पत्रकारिता का क्या हाल होता है. उमेश उपाध्याय जो कभी पीआर का काम देखा करते थे, इन दिनों कंटेंट हेड के बतौर चैनलों में डंडा चला रहे हैं. इनके भाई सतीश उपाध्याय बीजेपी के दिल्ली अध्यक्ष हैं. इन दोनों के बारे में कहा जाता है कि ये अंबानी के इशारे पर काम करने वाले हैं. अंबानी की लूट के खिलाफ आवाज उठाने वाले केजरीवाल व इनकी पार्टी के बारे में कोई भी सकारात्मक खबर, बाइट दिखाने पर चैनल में पाबंदी है. इस तरह ये मीडिया हाउस देखते ही देखते सत्ता तंत्र और मुनाफा तंत्र का औजार बन गया है. इसमें अब वही लोग काम करने के लिए बचे रहेंगे जिन्हें पत्रकारिता से नहीं बल्कि पैसा से मतलब है.

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मुकेश अंबानी खरीदेंगे अंतरराष्ट्रीय बिजनेस अखबार ‘फायनेंशियल टाइम्स’!

मुकेश अंबानी ने ईटीवी, आईबीएन7, सीएनएन-आईबीएन समेत कई चैनलों-मीडिया कंपनियों को खरीदने के बाद अब अंतरराष्ट्रीय मीडिया का मोलभाव करना शुरू कर दिया है. ताजी सूचना के मुताबिक उनकी नजर अंतरराष्ट्रीय बिजनेस अखबार ‘फायनेंशियल टाइम्स’ पर है. भारत के साथ विदेशों में भी अपना मीडिया साम्राज्य फैलाने को लेकर लालयित अंबानी के एक प्रतिनिधि ने पियरसन समूह से संपर्क साधा है. अंतरराष्ट्रीय बिजनेस अखबार फायनेंशियल टाइम्स को प्रकाशित करने वाली कंपनी का नाम पियरसन समूह है. 

नेटवर्क 18 और ईटीवी पर कब्जा करने के बाद मुकेश अंबानी की नई सक्रियता चौंकाने वाली है. वह दुनिया के सबसे बड़े मीडिया मुगल बनने की आकांक्षा पाले हैं. ज्ञात हो कि एक जमाने में द संडे आर्ब्जवर और द आर्ब्जवर ऑफ बिजनेस एंड पॉलीटिक्स में भी रिलायंस समूह की हिस्सेदारी रही है लेकिन इन दोनों का प्रकाशन वर्ष 2000 में बंद हो गया था. इसी के साथ उस जमाने में मीडिया में आने की रिलायंस की कोशिशों ने दम तोड़ दिया था. ये कोशिशें नए सिरे से परवान चढ़ाई है धीरूभाई अंबानी के बेटे मुकेश अंबानी ने. फायनेंशियल टाइम्स करीब 120 साल पुरान बिजनेस अखबार है. 1957 में इस अखबार का पियरसन ने टेकओवर किया था. वर्ष 2012 में फायनेंशियल टाइम्स और उसके डिजिटल कारोबार की कुल कीमत 98.3 अरब रुपए थी.

फायनेंशियल टाइम्स के बिकने की खबर वर्ष 2012 में भी आई थी पर कंपनी के सीईओ मारजोरी स्कॉरडीनो ने इस खबर को गलत बताया था. लंदन स्थित पियरसन समूह के पास फायनेंशियल टाइम्स कुल स्वामित्व होने के साथ-साथ जानीमानी पत्रिका द इकॉनामिस्ट में 50 फीसदी और पेंग्विन रेंडम हाऊस में 47 फीसदी हिस्सेदारी है. वर्ष 2013-14 में फायनेंशियल टाइम्स का पीयरसन समूह के कुल बिजनेस में 8 फीसदी का योगदान था. 2013-14 में फायनेंशियल टाइम्स ने 449 मिलियन पौंड का कारोबार किया था. कंपनी को 55 मिलियन पौंड का फायदा भी हुआ था.

ज्ञात हो कि मुकेश अंबानी ने नेटवर्क18 और टीवी18 ब्रॉडकास्टर्स का इस वर्ष के शुरुआत में अधिग्रहण किया था. इसके तहत समाचार चैनल सीएनबीसी टीवी 18, सीएनएन-आईबीएन, आईबीएन लोकमत और आईबीएन 7 के साथ-साथ एंटरटेनमेंट चैनल कलर्स, कॉमेडी सेंट्रल, एमटीवी अंबानी के नियंत्रण में हैं.

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दिल्ली में रिलायंस की बिजली कंपनियां दंगाई हो गई हैं

Sanjay Tiwari : दिल्ली में रिलायंस की बिजली कंपनियां दंगाई हो गई हैं. जबसे यह नयी सरकार बनी है तबसे उनके हौसले कुछ ज्यादा ही बुलंद हैं. महीने के महीने बिल और दस दिन की देर हो जाए गुण्डे जैसे बिजली कर्मचारी दरवाजे पर. बिल भरो नहीं तो बिजली काट देंगे.

दिल्ली में अभी तक दो महीने का बिल एकसाथ आता था और एक बिल (दो महीने) का ग्रेस पीरियड होता था जमा करने के लिए. तब इतनी मुश्किल नहीं थी. लेकिन लगता है अब बिजली कंपनियों के मुंह मनमानी मुनाफाखोरी का खून लग चुका है! शायद इसीलिए उनके कर्मचारी खून बटोरने के लिए पूरी दिल्ली में यमदूत बने घूम रहे हैं.

वेब जर्नलिस्ट संजय तिवारी के फेसबुक वॉल से.

आपको भी कुछ कहना-बताना है? हां… तो bhadas4media@gmail.com पर मेल करें.

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रिलायंस कथा : जानिए पर्दे के पीछे का सारा खेल…

कभी आपने सोचा है कि क्यों आप अभी गैस के लिए 4.2$ दे रहे हैं? गैस के कुएं अम्बानी को कैसे मिला? सरकार ने क्या किया? क्या है KG बेसिन? नहीं ना! तो आईए अब जान लीजिए… क्योंकि यह गैस आपको और रूलाने वाला है. आपके घरेलू बजट पर ज़बरदस्त डाका डालने वाला है…

KG D6 बेसिन आखिर है क्या बला?

दरअसल, KG का तात्पर्य कृष्णा गोदावरी बेसिन से है, जो आंध्र प्रदेश के तटीय क्षेत्र में कृष्णा और गोदावरी नदी किनारे करीब 50000 स्क्वायर किलोमीटर में फैला है. इन किनारों में एक जगह है, जिसे धीरुभाई-6 कहते हैं, यानी D6… यहीं पर रिलायंस इंडस्ट्री ने देश के सबसे बड़े गैस के भण्डार का पता लगाया.

सरकारी आंकड़ों की मानें तो 50000 में से 7645 स्क्वायर किलोमीटर के एरिया, जहां गैस का पता लगा, उस जगह को KG-DWN-98/1 कहा गया है.

जानिए पर्दे के पीछे का सारा खेल…

1991 में भारत सरकार ने भारतीय निजी कंपनियों और विदेशी कंपनियों के साथ एक हाइड्रोकार्बन एक्सप्लोरेशन एंड प्रोडक्शन (E&P) का काम शुरू किया. इसके तहत छोटे-छोटे ब्लॉक्स दिए गए कंपनियों को तेल और गैस के उत्पादन के लिए. पर 1999 में न्यू एक्सप्लोरेशन एंड लाइसेंसिंग पालिसी (NELP) लाई गयी भारत सरकार द्वारा, जिससे सारे छोटे-छोटे ब्लॉक्स, जो अलग-अलग कंपनियों को दिए जा रहे थे, उसे बंद करके एक बड़ा ब्लाक जिसे धीरुभाई-6 D6 कहा गया, वो रिलायंस को दे दिया गया. अर्थात पॉलिसी बदली गयी, जिससे कई कम्पनियां इस काम में ना लगे और एक बड़ी कंपनी सारे बेसिन का गैस तेल आदि का उत्पादन करे.

अब सवाल ये है कि बेसिन तो रिलायंस को दे दिया गया, पर क्या सरकार का उस पर नियंत्रण है कि नहीं? क्योंकि कोई भी प्राकृतिक सम्पदा देश के जनता की होती है. इसीलिए सरकार इस एक्सप्लोरेशन और प्रोडक्शन को मॉनिटर करती है. अब किसी भी प्राकृतिक सम्पदा को निजी कंपनी कैसे निकालती और बेचती है, इसे मॉनिटर करने के लिए सरकार ने प्रोडक्शन शेयरिंग कॉन्ट्रैक्ट (PSC) के तहत निजी कंपनियों के साथ समझौता करती है.

PSC दरअसल एक कॉन्ट्रैक्ट ही है, जिसमें खरीदार और बेचने वाली पार्टी के लिए नियम कानून तय किये गए हैं. इसमें ये बताया गया है कि प्राकृतिक सम्पदा की खोज करने से लेकर उस सम्पदा को निकाल कर बेचने तक कौन-कौन से प्रक्रियाओं को फॉलो करना है… साथ ही इस कॉन्ट्रैक्ट में मुनाफे का बंटवारा कैसे होगा… इसकी भी एक प्रक्रिया है. इस कॉन्ट्रैक्ट का उल्लंघन न हो, इस बात को तय करता है डायरेक्टरेट जनरल ऑफ़ हाइड्रोकार्बन (DGH).

इसी तरह का एक PAC यानी कॉन्ट्रैक्ट रिलायंस और भारत सरकार के बीच साईन किया गया. इस पुरे डील में रिलायंस की ही एक पार्टनर ‘निको रिसोर्सेस’ भी शामिल थी, जिसका हिस्सा 10% था. यहाँ मैं आपको बताता चलूं कि ये उस समय की बात है, जब रिलायंस का बंटवारा नहीं हुआ था.

लेकिन इससे पहले कि KG D-6 बेसिन से उत्पादन शुरू हो पाता, दोनों भाइयों के बीच बंटवारा हो गया, जिसमें गैस का सारा बिज़नेस मुकेश अम्बानी के हिस्से आया. मज़े की बात ये है कि दोनों भाई जिस गैस के लिए झगड़ रहे थे, ये पूरी सम्पदा देश और उसके लोगों की थी न कि इन दोनों भाइयों की… फिर भी इन्होंने बेसिन का आपस में बंटवारा कर लिया. हालांकि PAC के कॉन्ट्रैक्ट में लिखा पहला वाक्य कहता है कि ‘by virtue of article 297 of constitutionof india,Petroleum is a natural statein the territorial waters and the continentap shelf of India is vested with the union of India’

यानी मोटे तौर पर देखा जाए तो ‘भारतीय संविधान की धारा-297 के अनुसार भारत अधिकृत समुन्द्र में पाया गया पेट्रोलियम भारत की सम्पदा है.’

जून 2004 में NTPC को 2600 मेगावाट अपने दो पॉवर प्लांट (कवास और गंधार में मौजूद है) के लिए गैस की ज़रुरत थी. इसके लिए NTPC ने बोली लगवाई. इस बोली में रिलायंस ने NTPC को 17 साल तक 2.34$ के हिसाब से 132 ट्रिलियन यूनिट गैस देने का ठेका लिया. इसी ठेके के आधार पर 2005 में बंटवारे के समय अनिल अम्बानी ने अपना दावा ठोंका और गैस सम्पदा का एक बड़ा हिस्सा RNRL के नाम से अपने पास रख लिया. ये कह कर कि क्योंकि NTPC को 17 साल तक 2.34$ के हिसाब से गैस देने का ठेका उनके पास है, इसीलिए इस गैस को निकालने के लिए उन्हें भी गैस का कुआं तो चाहिए ही. अपने पिता की संपत्ति का बंटवारा करते हुए दोनों भाइयों ने देश की अनमोल सम्पदा गैस का भी बंटवारा कर लिया और इस बात को सालों तक दबा के रखा गया. जबकि सुप्रीम कोर्ट ने एक आदेश में स्पष्ट तौर पर कहा है “भारत सरकार गैस के उत्पादन से लेकर गैस के उपभोक्ता के पास पहुंचने तक उसकी मालिक है. कंपनियों को अपना मतभेद और बंटवारा सरकार के पॉलिसी के तहत करना चाहिए.”

अब यहां सरकार पर ऊंगली उठती है. किसी मंत्रालय ने और न किसी मंत्री ने इस गैस के बंटवारे पर कुछ कहा. वो गैस जो देश की संपदा थी, अम्बानी परिवार की नहीं, फिर भी सरकार आँख मूंद कर धृतराष्ट्र की तरह भारतीय संपदा को लुटते देखती रही. प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह ने दबे स्वर में बस ये कह कर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया कि दोनों भाई देश के हितों को ध्यान में रखते हुए झगड़ा न करें और सभी मतभेदों को जल्दी सुलझाएं.

लेकिन दिलचस्प मोड़ अभी आना बाकी है. बंटवारा होते ही रिलायंस ने NTPC को 2.34$ के हिसाब से गैस देने से मना कर दिया. जिस NTPC के ठेके के नाम पर अनिल अम्बानी ने RNRL के नाम से देश के कुएं के भण्डार का बहुत बड़ा हिस्सा अपने नाम कर लिया, उस हिस्से के अपने पास आते ही रिलायंस इंडस्ट्रीज ने NTPC के उस ठेके पर ही साईन करने से मना कर दिया. मतलब अनिल अम्बानी को गैस के कुएं का हिस्सा भी मिल गया और अब उसे NTPC को भी गैस नहीं देना था सारा गैस उनके पास.

NTPC ने रिलायंस को मुंबई कोर्ट में 20 दिसंबर 2005 में घसीटा, लेकिन वो केस आज 9 साल बाद भी ख़त्म नहीं हो पाया है. NTPC जैसी संस्था के साथ इतने बड़े धोके के बावजूद सरकार का मुंह में दही जमा के चुप बैठे रहना, अपने आप में एक अलग कहानी है.

2007 में जब NTPC और रिलायंस का झगड़ा कोर्ट में चल ही रहा रहा था, तब सरकार ने इस मामले को एमपावर्ड ग्रुप ऑफ़ मिनिस्टर्स (EGOM) के सुपुर्द कर दिया, जिसकी अध्यक्षता अभी के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी खुद कर रहे थे, जो उस समय वित्त मंत्री थे. EGOM ने 2.34$ की दर को बढ़ा कर 4.2$ कर देने का फैसला किया.

यहां सबसे मज़े की बात ये है कि ये सारा दाम बढ़ाने-घटाने कोर्ट कचहरी आदि का खेल तब हो रहा था, जब KG बेसिन से ज़रा सी भी गैस नहीं निकाली जा रही थी. बेसिन अब तक बंद था. लेकिन जैसे ही दाम 4.2$ किया गया, रिलायंस ने इस मौके को तुरंत लपक लिया. बयान दिया गया कि सरकार द्वारा गठित EGOM द्वारा तय किये गए दाम से कम में गैस सप्लाई नहीं किया जाएगा चाहे वो NTPC हो या कोई और.

अब सवाल यह है कि प्रणब मुखर्जी इस 4.2$ के आंकड़े पर पंहुचे कैसे? दरअसल, ये रिलायंस का ही एक फार्मूला था, जिसके तहत उन कंपनियों को एक दाम बताने को कहा गया. जो रिलायंस से गैस लेना चाहते थे. रिलायंस ने उन्हें 4.54$ और 4.75$ के बीच एक दाम बताने को कहा और इन कंपनियों के दाम बताने के बाद रिलायंस ने EGOM को दाम 4.59$ कर देने को कहा, जिसे बाद में रिलायंस ने कम करके 4.3$ कर दिया. इसके बाद प्रणब मुखर्जी ने इसमें मामूली कटौती करके 4.2$ कर दिया और अपनी पीठ थपथपाई कि न उसकी चली, न इसकी चलेगी, चलेगी तो सिर्फ हमारी ही चलेगी.

इन सभी उठाये गए क़दमों पर भारत सरकार के ही पॉवर एंड एनर्जी विंग के प्रिंसिपल एडवाइजर सूर्या पी सेठी ने तत्कालीन कैबिनेट के सेक्रेटरी के साथ सवाल उठाया, जिसे नज़रंदाज़ कर दिया गया. सूर्या पी. सेठी का कहना था कि विश्व में कहीं भी गैस की कीमत 1.43$ से ज्यादा नहीं है, फिर अपने ही देश के कुएं से लोग 4.2$ में गैस क्यों लें?

2011 की कैग की रिपोर्ट के अनुसार बिना कोई कुआँ खोदे रिलायंस पेट्रोलियम मिलने के दावे करती रही. मतलब खुद रिलायंस को नहीं पता था कि कितना गैस कितने कुओं में है. रिलायंस को केवल 25% हिस्से पर काम करना था, लेकिन PSC के कॉन्ट्रैक्ट के खिलाफ जाकर रिलायंस ने समूचे बेसिन में काम शुरू कर दिया था और सरकार ने इसमें कोई टोका टाकी तक नहीं की.

रिलायंस के कहने पर 4.2$ चुकाने वाले देश की ये जनता अपने ही कुओं से महंगा गैस ले रही है. और अब भाजपा सरकार इसे बढ़ाकर 8$ करने जा रही है. इससे महंगाई बेतहाशा बढ़ेगी. अपने ही लोगों को गैस 8$ में जबकि बंगलादेश को यही गैस करीब 2$ में दिया जाता है. इस 8$ के पीछे की मंशा क्या है? और किस कारण इसे दोगुना किया जा रहा है, कोई बताने को तैयार नहीं है? कहा जा रहा है कि अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में महंगा है, पर यह बात गलत है. फिर 4.2$ कंपनियों से पूछ कर क्यों किये, जब दुनिया केवल 1.43$ में बेच रही थी?

ये कई ऐसे सवाल हैं जिससे बचने के लिए नेता, पत्रकार, टीवी चैनल और ना जाने क्या-क्या खरीद लिए जाते हैं. और जनता है कि दाम चुकाते-चुकाते थक जाती है. सो कॉल्ड युवाओं से ज़रा पूछिये कितना जानते है इस बारे में वो? बस युवा शक्ति का डंका पीटने से कुछ नहीं होता. शक्ल बनाने में व्यस्त युवाओं को अपने अक्ल पर काम करने की ज़रूरत है…

Rakesh Mishra

National General Secretary

Pravasi Bhalai Sangathan

9313401818, 9044134164

सत्यमेव जयते

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