संजय गुप्ता समेत पूरी जागरण टीम गिरफ्तार न होने का मतलब चुनाव आयोग भी किसी दबाव में है!

Ram Janm Pathak : हेकड़ी, एक्जिट पोल और खानापूरी… चुनाव आयोग के स्पष्ट मनाही की जानकारी होने के बावजूद अगर दैनिक जागरण की आनलाइन साइट ने एक्जिट पोल छापने की हिमाकत की है तो यह सब अचानक या गलती से नहीं हुआ है, जैसा कि उसके स्वामी-संपादक संजय गुप्ता ने सफाई दी है। गुप्ता ने कहा कि यह ब्योरा विज्ञापन विभाग ने साइट पर डाल दिया। अपने बचाव में इससे ज्यादा कमजोर कोई दलील नहीं हो सकती। अखबार के बारे में थोड़ा -बहुत भी जानकारी रखने वाले जानते हैं कि समाचार संबंधी कोई भी सामग्री बिना संपादक की इजाजत के बगैर नहीं छप सकती।

जागरण ने जो किया, सो किया। चुनाव आयोग भी केवल प्रभारी संपादक को गिरफ्तार करके अपनी खानापूरी कर रहा है। इसमें जब तक स्वामी-संपादक संजय गुप्ता समेत पूरी टीम को गिरफ्तार नहीं किया जाता, तब यही समझा जाएगा कि चुनाव आयोग भी किसी दबाव में है और बस ऊपरी तौर पर निष्पक्ष दिखने की कोशिश कर रहा है। वैसे भी चुनाव आयोग इस बार अपनी कोई छाप नहीं छोड़ पा रहा है।

दैनिक जागरण का कारनामा पेड न्यूज जैसा भी लगता है, वर्ना विज्ञापन विभाग की इतनी मजाल नहीं है कि वह संपादकीय स्पेस पर कोई एकतरफा एक्जिट पोल छाप दे। असल में, जागरण की कार्य-संस्कृति ही न्यारी है। लंबे समय तक तो उसमें मालिक ही हर जगह संपादक होता था। मुख्य संपादक के तौर पर तो अब भी उसी का नाम जाता है। लेकिन, जब संस्करणों की संख्या बढ़ गई तो कुछ वैधानिक मजबूरियों की वजह से स्थानीय संपादकों के नाम दिए जाने लगे। उसमें भी संपादकीय विभाग के व्यक्ति का नाम कम ही दिया जाता था, तमाम जगहों पर मैनेजर टाइप के लोग ही संपादक भी होते रहे। बरेली-मुरादाबाद में तो चंद्रकांत त्रिपाठी नामक कथितरूप से एक अयोग्य और भ्रष्ट व्यक्ति लंबे समय तक संपादक बना रहा, जबकि उसी का नाम प्रबंधक के रूप में भी छपता था। उसकी कुल योग्यता मालिक को चिट्ठियां लिखने तक सीमित थीं।

हो सकता है कि गिरफ्तार शेखर त्रिपाठी, भी उसी कुल-परंपरा के हों। जागरण में समस्या यह है कि कोई स्वतंत्रचेता व्यक्ति संपादक हो ही नहीं सकता। मालिकों को गुलाम, झुका हुआ और जी-हजूर चाहिए। लेकिन, एक मरा हुआ, मतिमंद और चाटुकार संपादक किसी न किसी दिन नैया डुबाता ही है। अगर आज दैनिक जागरण ने पूरे देश में हिंदी पत्रकारिता की नाक कटाई है और दुनिया-जहान के सामने हिंदी पत्रकारों को अपमानित किया है तो इसके बीज इस संस्थान की कार्य-संस्कृति में पहले से मौजूद थे।

दुर्भाग्य यह है कि राजनीतिक दल भी ऐेसे लोगों को पोसते हैं। दैनिक जागरण के स्वामी-संपादक (स्वर्गीय) नरेंद्र मोहन को भाजपा ने राज्यसभा में भेजा तो उनके छोटे भाई महेंद्र मोहन को समाजवादी पार्टी ने। राजनीतिक दल अखबारों के मालिकों को अपने पोंछने की तरह इस्तेमाल करते हैं तो अखबार मालिक भी इससे कुछ फायदा चाहते हैं। जागरण पहला अखबार है, जिसने अभी मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिशें लागू नहीं की हैं तो सिर्फ इसलिए की भाजपा से उसकी सांठगांठ है और वह जानता है कि प्रधानमंत्रीजी अंत में उसकी मदद करेंगे। भले ही वह कर्मचारियों का खून ही क्यों न चूसता हो? पूरी पत्रकारिता में दैनिक जागरण अकेला ऐसा अखबार है जो आज भी नियम-कायदों की सबसे कम परवाह करता है, लेकिन किसी सरकार ने आज तक उस पर कोई कारर्वाई नहीं की।

लेकिन, इस बार तो जागरण ने जो किया है, वह हद ही है। कानून का डंडा मालिक-मुख्तार से लेकर सब पर चलना चाहिए। जागरण की हेकड़ी को तोड़ा जाना जरूरी है। गिरावट की सीमा यह भी रही कि इंडियन एक्सप्रेस समूह को छोड़कर इक्का-दुक्का अखबारों ने ही शेखर त्रिपाठी की गिरफ्तारी की खबर छापी, बाकी तमाम अखबार बिरादाराना हक ही निभाते रहे। सोचिए, हम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के कितने विराट स्वर्णिम युग में रह रहे हैं, जहां सबसे बड़ी पाबंदी अखबारवाले खुद ही अपने मुंह पर लगा कर बैठे हुए हैं। हद है। हर चीज की हद है।

कई अखबारों में वरिष्ठ पद पर काम कर चुके पत्रकार राम जन्म पाठक की एफबी वॉल से.

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यशवंत की जागरण कर्मियों को सलाह- संजय गुप्ता की गिरफ्तारी के लिए चुनाव आयुक्त को पत्र भेजो

Yashwant Singh : दैनिक जागरण का संपादक संजय गुप्ता है. यह मालिक भी है. यह सीईओ भी है. एग्जिट पोल वाली गलती में यह मुख्य अभियुक्त है. इस मामले में हर हाल में गिरफ्तारी होनी होती है और कोई लोअर कोर्ट भी इसमें कुछ नहीं कर सकता क्योंकि यह मसला सुप्रीम कोर्ट से एप्रूव्ड है, यानि एग्जिट पोल मध्य चुनाव में छापने की कोई गलती करता है तो उसे फौरन दौड़ा कर पकड़ लेना चाहिए. पर पेड न्यूज और दलाली का शहंशाह संजय गुप्ता अभी तक नहीं पकड़ा गया है.

संजय गुप्ता ने पिछले कुछ वर्षों में मजीठिया वेज बोर्ड के तहत सेलरी और बकाया मांगने वाले सैकड़ों लोगों को संस्थान से बाहर कर दिया. इन्हें और इनके परिजनों को भूखों मरने को मजबूर कर दिया. लगता है ईश्वर ने बदला लेने का मौका जागरण के उन पूर्व कर्मियों को दे दिया है जिनके पेट पर संजय गुप्ता ने लात मारा था. इन सभी साथियों को चुनाव आयोग को लेटर लिख कर एग्जिट पोल छापने के मुख्य अभियुक्त संजय गुप्ता को फौरन अरेस्ट करने की मांग करनी चाहिए.

लगातार चिट्ठी मेल भेजे जाने से चुनाव आयोग पर असर पड़ेगा. संजय गुप्ता बाहर क्यों? संजय गुप्ता को तो जेल में होना चाहिए. संजय गुप्ता दिखा रहा चुनाव आयोग को ठेंगा. गिरफ्तारी से बचने के लिए संजय गुप्ता ने पुलिस प्रशासन और सिस्टम को अपने अनुकूल किया. ऐसे वाक्य लिख लिख कर चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त को मेल करिए. लोहा गरम है. एक हथौड़ा भी काम कर सकता है. तो देर न करिए दोस्तों. चूकिए नहीं. फौरन आगे बढ़िए और शाम तक सौ पचास मेल तो करा ही दीजिए.

भड़ास के एडिटर यशवंत की एफबी वॉल से. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com

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सुप्रीम कोर्ट ने जागरण के मालिकों महेंद्र मोहन और संजय गुप्ता को तलब किया

मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को लागू न करने और सुप्रीम कोर्ट से लेकर कानून, न्याय, संविधान तक की भावनाओं की अनदेखी करने से नाराज सुप्रीम कोर्ट ने आज दैनिक जागरण के मालिकों महेंद्र मोहन गुप्ता और संजय गुप्ता को अगली सुनवाई पर, जो कि 25 अक्टूबर को होगी, कोर्ट में तलब किया है. आज सुप्रीम कोर्ट में मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को लागू न किए जाने को लेकर सैकड़ों मीडियाकर्मियों द्वारा दायर मानहानि याचिका पर सुनवाई हुई.

कोर्ट ने आज के दिन कई प्रदेशों के लेबर कमिश्नरों को बुला रखा था. कोर्ट ने सभी लेबर कमिश्नरों से कहा कि जिन जिन मीडियाकर्मी ने क्लेम लगाया है, उसमें वे लोग रिकवरी लगाएं और संबंधित व्यक्ति को न्याय दिलाएं. कोर्ट के इस आदेश के बाद अब श्रम विभाग का रुख बेहद सख्त होने वाला है क्योंकि पिछली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने लापरवाही बरतने पर उत्तराखंड के श्रमायुक्त के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया था.

सैकड़ों मीडियाकर्मियों की याचिका का प्रतिनिधित्व करते हुए एडवोकेट उमेश शर्मा ने आज सुप्रीम कोर्ट को बताया कि दैनिक जागरण की किसी भी यूनिट में किसी भी व्यक्ति को मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से न तो एरियर दिया गया है और न ही सेलरी दी जा रही है.

साथ ही दैनिक भास्कर समूह के बारे में भी विस्तार से बताया गया. आज सुप्रीम कोर्ट ने जागरण के मालिकों को कोर्ट में आने के लिए आदेश कर दिया है ताकि उनसे पूछा जा सके कि आखिर वो लोग क्यों नहीं कानून को मानते हैं. चर्चा है कि अगली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट भास्कर के मालिकों को तलब कर सकता है. फिलहाल इस सख्त आदेश से मीडियाकर्मियों में खुशी की लहर है.

कोर्ट में सुनवाई के दौरान मुंबई के पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट शशिकांत सिंह भी मौजूद थे. उन्होंने फोन करके बताया कि आज सुप्रीम कोर्ट ने जो सख्ती दिखाई है उससे वे लोग बहुत प्रसन्न है और उम्मीद करते हैं कि मालिकों की मोटी चर्बी अब पिघलेगी. सैकड़ों मीडियाकर्मियों को मजीठिया वेज बोर्ड से संबंधित अपने हक के लिए गाइड करने वाले पत्रकार शशिकांत सुप्रीम कोर्ट में हुई आज की सुनवाई की विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर रहे हैं जिसे जल्द भड़ास पर प्रकाशित किया जाएगा.

अपडेटेड न्यूज (7-10-2016 को दिन में डेढ़ बजे प्रकाशित) ये है….

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क्या संजय गुप्ता की टांग टूट गई है?

Shrikant Singh : दैनिक जागरण के कर्मचारियों की बददुआ का असर देखिए.. सुना है कि संजय गुप्‍ता का पैर टूट गया है। समझ में नहीं आ रहा है कि इस पर दुखी हुआ जाए या खुश। हां चिंता जरूर हो रही है कि वह अपने पैरों पर चल कर जेल कैसे जा पाएंगे। शायद भगवान उनका साथ अब छोड़ने लगे हैं। दरअसल, जो मालिक अपने आश्रित कर्मचारियों का हक मारता है, उसकी यही दशा होती है। शनि महाराज ऐसे लोगों से तत्‍काल नाराज हो जाते हैं और पहले अपना प्रभाव पैर पर ही दिखाते हैं। शनि का प्रतिकूल प्रभाव दूर करने के लिए पैदल चलना जरूरी होता है, लेकिन शनि महाराज कोई बुड़बक थोड़े ही हैं। शायद इसीलिए वह पहला प्रहार पैरों पर ही करते हैं। सही गाना है-पैर ही जब साथ न दें तो मुसाफिर क्‍या करे।

शनि महाराज का अगला प्रहार धन और संपदा पर होता है। क्‍योंकि कोई व्‍यक्ति जिस धन और संपदा के घमंड में चूर हो जाता है और उसका इस्‍तेमाल अन्‍याय के लिए करने लगता है तो शनि महाराज वह धन संपदा ही छीन लेते हैं। शनि महाराज को दंडाधिकारी माना जाता है। एक ऐसी अदालत जहां संजय गुप्‍ता जैसे लोगों के दंद-फंद काम नहीं आते हैं। हालांकि शनि महाराज एकायक दंड नहीं देते हैं। पहले वह चेताते हैं, ठीक उसी प्रकार जैसे सुप्रीम कोर्ट के माननीय न्‍यायाधीश चेता रहे हैं और संजय गुप्‍ता सीधा रास्‍ता न चलकर अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे हैं।

आपको याद होगा कि संजय गुप्‍ता कश्‍मीर की बाढ़ में फंस गए थे और भगवान से जीवन की भीख मांग रहे थे। भगवान ने उन्‍हें जीवन तो दे दिया, लेकिन उन्‍होंने मजीठिया नहीं दिया, जिसके चक्‍कर में एक कर्मचारी को अपना जीवन गंवाना पड़ा। यह मामला तूल पकड़ने लगा है और 22 फरवरी को उसे सुप्रीम कोर्ट में उठाया जा रहा है। केस नंबर है-109। हरपाल सिंह व अन्‍य बनाम संजय गुप्‍ता व अन्‍य। संजय गुप्‍ता जी अभी भी समय है और संभल जाइए। न्‍याय की राह पर आ जाइए। वर्ना-सबकुछ लुटा के होश में आए तो क्‍या हुआ।

जो व्‍यक्ति शनि के प्रभाव में होता है, उसका साथ देने वाले की भी दुर्दशा होने लगती है। उसका उदाहरण हैं हमारे विश्‍व प्रसिद्ध पीएम नरेंद्र मोदी। संजय गुप्‍ता का साथ क्‍या दे दिए, बेचारे केंद्र की सत्‍ता हथियाने के बाद दिल्‍ली से हारना शुरू किए तो बिहार तक हारते चले गए। दुनिया के सबसे शक्तिशाली इंसान बराक ओबामा भी उनके किसी काम नहीं आ सके। इसी को कहते हैं-देवता-पित्‍तर सब झूठा। जब परमेश्‍वर रूठा। मोदी जी अब मुसीबत जी बन कर रह गए हैं। जेएनयू, जाट आरक्ष्‍ण की आग, विरोध और विद्रोह की आग। आग से कितना बचेंगे मोदी जी। गर्मी आ रही है और आग बहुत गरम होती है। उससे भी ज्‍यादा गरम होती है गरीब के पेट की आग। वह गरीब हो ही नहीं, सारी कायनात को जलाकर भस्‍म कर देती है। इसलिए मोदी जी गरीब पत्रकारों के पेट की आग को पहचानें। वह आपकी ही ओर बढ़ रही है। आप भी-सबकुछ जलाके होश में आएं तो क्‍या हुआ। जय हिंद। जय भारत।

दैनिक जागरण नोएडा में मुख्य उपसंपादक पद पर कार्यरत रहे पत्रकार श्रीकांत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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नरेंद्र मोदी की शह पाकर दैनिक जागरण के मालिक और सीईओ संजय गुप्‍ता अपराध की राह पर निकल पड़े हैं!

Fourth Pillar : अपराधियों, घोटालेबाजों और तस्‍करों को संरक्षण दे रहे हैं संजय गुप्‍ता… वाहन पर प्रेस लिखा देख कर पुलिस वाले सम्‍मान में वाहन को नहीं रोकते और उसकी जांच करना पत्रकारिता का अपमान समझते हैं। उन्‍हें लगता है कि इस वाहन में कोई गणेश शंकर विद्यार्थी बैठा होगा। पहले कमोवेश यह बात सही भी रही होगी, लेकिन सावधान। दैनिक जागरण के प्रेस लिखे वाहन में कोई अपराधी, घोटालेबाज अथवा तस्‍कर भी हो सकता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शह पाकर दैनिक जागरण के मालिक और सीईओ संजय गुप्‍ता अपराध की राह पर निकल पड़े हैं और वह अपराधियों, घोटालेबाजों और तस्‍करों को संरक्षण देने लगे हैं। मजीठिया मामले में उन पर हजारों लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में अवमानना का केस तो कर ही रखा है, उनकी कंपनी जागरण प्रकाशन लिमिटेड के प्रबंधकों पर हमला कराने और छिनैती कराने के मामले की जांच नोएडा, गौतमबुद्ध नगर के वरिष्‍ठ पुलिस अधीक्षक के कार्यालय में लंबित है। वह अखबार के प्रभाव का इस्‍तेमाल कर पुलिस, प्रशासन और यहां तक कि व्‍यवस्‍थापिका की आंखों में धूल झोंक रहे हैं।

उनके भ्रमजाल में देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी फंस गए हैं, जिससे अपराध की ताकत दिनोंदिन बढ़ रही है। मोदी जी को इसकी कीमत दिल्‍ली और बिहार के विधानसभा चुनावों में भाजपा की हार के रूप में चुकानी पड़ी है। खैर, मोदी जी को समझ कब आएगी, यह भगवान जानें, लेकिन जाने-अनजाने मोदी जी देश के एक बहुत बड़े अपराधी का साथ दे रहे हैं, जिसके हाथ मजीठिया लाभार्थी अतुल के खून से रंगे हैं।

संजय गुप्‍ता के दूसरे अपराधों की बात करें तो दैनिक जागरण की जम्‍मू यूनिट का जिक्र करना प्रासंगिक होगा। वहां के जीएम और संपादक का एक नजदीकी व्‍यक्ति जिसे दैनिक जागरण में नौकरी दी गई, ड्रग तस्‍करी में पकड़ा गया। बताया जाता है कि जम्‍मू यूनिट की एक महिला कर्मचारी का भाई है वह तस्‍कर। महिला कर्मचारी के साथ जम्‍मू के संपादक के अंतरंग रिश्‍ते बताए जाते हैं। संपादक पहले उस तस्‍कर को पुलिस से बचाता रहा, लेकिन जम्‍मू में आतंकियों की घुसपैठ बढ़ने पर पुलिस सख्‍त हुई और संपादक अपने चहेते तस्‍कर को पुलिस के शिकंजे से नहीं बचा पाया।

संजय गुप्‍ता के अपराधों की कड़ी में आइए कानपुर यूनिट चलते हैं, जहां कई फर्जी कंपनियां बनाकर कर्मचारियों को मजीठिया वेतनमान से वंचित किया जा रहा है। इस काम को अंजाम देने में दैनिक जागरण का आज्ञाकारी डाइरेक्‍टर सतीश मिश्रा लगा हुआ है। मीठा बोलने वाला सतीश मिश्रा कर्मचारियों को एनआरएचम घोटाले में झोंकता रहा है। इस क्रम में दैनिक जागरण के कुछ बंदे देश के इस बड़े घोटाले में फंस भी चुके हैं। याद रहे, यदि आप दैनिक जागरण पढ़ते हैं अथवा उसे विज्ञापन देते हैं तो जाने-अनजाने आप देश के एक सबल अपराधी संजय गुप्‍ता और उसके चचा महेंद्र मोहन गुप्‍ता को समाज विरोधी काम करने की संजीवनी दे रहे हैं। आप दैनिक जागरण अखबार को बाइकाट करेंगे तो उसके कर्मचारी अतुल सक्‍सेना की आत्‍मा को शांति मिलेगी।

दैनिक जागरण में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार श्रीकांत सिंह द्वारा संचालित फेसबुक पेज फोर्थ पिलर से साभार.

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संजय गुप्ता यानि स्वतंत्रता का दुश्मन

Shrikant Singh : देश के इस दुश्‍मन को अच्‍छी तरह पहचान लें… दोस्‍तो, देश के दुश्‍मनों से लड़ने से कहीं ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण उन्‍हें पहचानना है। सीमापार के दुश्‍मनों से कहीं अधिक खतरनाक दुश्‍मन देश के अंदर हैं। आप उन्‍हें पहचान गए तो समझिए हमारी जीत पक्‍की। हम आपका ध्‍यान देश के एक ऐसे दुश्‍मन की ओर दिलाना चाहते हैं, जो पुलिस, प्रशासन, देश की न्‍यायपालिका और यहां तक कि देश की व्‍यवस्‍था तक को प्रभावित कर अपनी मुनाफाखोरी के जरिये इस देश को लूट रहा है। आप पहचान गए होंगे। हम दैनिक जागरण प्रबंधन की बात कर रहे हैं। आज 26 जनवरी है। गणतंत्र दिवस। इस दिन एक वाकया याद आ रहा है।

पहले दैनिक जागरण में स्‍वतंत्रता दिवस को सेलीब्रेट किया जाता था, लेकिन अब 26 जनवरी को सेलीब्रेट किया जाता है। इसके पीछे जन्‍मजात महान पत्रकार संजय गुप्‍ता ने तर्क दिया था कि अब इस देश को स्‍वतंत्रता की जरूरत नहीं है। अब जरूरत है तो नियमों पर चलने की। चूंकि 26 जनवरी को भारतीय संविधान को अंगीकार किया गया था, इसलिए उन्‍होंने इसे नियमों का दिवस मानकर सेलीब्रेट कराना शुरू करा दिया। अब इंसान हर चीज को अपने फायदे के लिए किस प्रकार परिभाषित कर लेता है, उसका उदाहरण संजय गुप्‍ता से बड़ा और कौन हो सकता है। उन्‍होंने स्‍वतंत्रता का अर्थ अपने कर्मचारियों की स्‍वतंत्रता से लगाया और अपने मैनेजर, संपादक से लेकर चपरासी तक की स्‍वतंत्रता छीननी शुरू कर दी।

नियमों का अर्थ उनकी नजर में संविधान के नियम नहीं, बल्कि दैनिक जागरण प्रबंधन की ओर से थोपे जाने वाले संविधान विरोधी नियम थे। अब अपने चापलूसों के साथ बैठकर वह जो नियम बना देते हैं, उसका पालन करना दैनिक जागरण परिवार के हर सदस्‍य की मजबूरी बन जाता है। जो इस मजबूरी को ढोने से तोबा करने को मजबूर हो जाता है, उसे बाहर का रास्‍ता दिखा दिया जाता है। इसके भुक्‍तभोगी दैनिक जागरण के तमाम कर्मचारी हैं, जिनमें से सैकड़ों संघर्ष के लिए सड़क पर उतर आए हैं। राहत की बात यह है कि कल उत्‍तर प्रदेश सरकार ने एक हेल्‍पलाइन जारी की, जहां शिकायत कर आप दैनिक जागरण प्रबंधन को यह बता सकते हैं कि साहब नियम यह नहीं यह है। मेरी इस देश के पाठकों, विज्ञापनदाताओं और अभिकर्ताओं से गुजारिश है कि देश के इस दुश्‍मन को जितनी जल्‍दी हो सके सबक सिखाएं। नहीं तो बहुत देर हो जाएगी और यह मुनाफाखोर इस देश को पूरी तरह से लूट चुका होगा। अपना खयाल रखें। आज का दिन आपके लिए शुभ हो। गणतंत्र दिवस की हार्दिक बधाई।

दैनिक जागरण में मुख्य उपसंपादक पद पर कार्यरत क्रांतिकारी पत्रकार श्रीकांत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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दैनिक जागरण कर्मियों ने अपने मालिक और संपादक संजय गुप्ता के आवास के बाहर प्रदर्शन कर अपना हक मांगा

नई दिल्ली। मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को लागू करने की मांग कर रहे दैनिक जागरण के कर्मचारियों ने बुधवार को अखबार के मालिक संजय गुप्ता के न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी स्थित आवास के बाहर जोरदार प्रदर्शन किया। इस दौरान कर्मचारियों ने महारानी बाग से लेकर न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी तक जुलूस निकाला और संजय गुप्ता के खिलाफ जोरदार नारेबाजी की।

कर्मचारी प्रतिनिधियों ने स्थानीय पुलिस प्रशासन को ज्ञापन सौंपकर बताया कि दैनिक जागरण के मालिक माननीय उच्चतम न्यायालय के आदेश को मानने को तैयार नहीं हैं। संजय गुप्ता पर माननीय न्यायालय की अवमानना का मुकदमा चल रहा है। इस दौरान वहां उपस्थित लोगों को दैनिक जागरण की ओर से 350 से अधिक कर्मचारियों को अपना हक़ मांगने पर संस्थान से बाहर करने की भी जानकारी दी गई।

कर्मचारियों का कहना है कि वे मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को लागू करने की मांग को लेकर संघर्ष और तेज करेंगे। गौरतलब है कि दैनिक जागरण ने गुंडागर्दी करते हुए मजीठिया की मांग कर रहे 350 से अधिक कर्मचारियों को निलंबित व बर्खास्त कर दिया है। कर्मचारी न्याय की मांग को लेकर दिल्ली से लेकर नोएडा की सड़कों पर लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं। कर्मचारियों का कहना है कि वे अपना हक़ लेकर रहेंगे और मालिकों और उनके चमचों को मेहनतकशों की बद्दुआएं जरूर लगेंगी।

अगली स्लाइड में पढ़ें>> दैनिक जागरण के कर्मचारियों ने नोएडा में अर्धनग्न होकर किया प्रदर्शन, निकाला जुलूस” नीचे लिखे Next पर क्लिक करें>>

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प्रतिमा भार्गव केस में प्रेस काउंसिल ने दैनिक जागरण और आई-नेक्स्ट को दोषी ठहराते हुए लताड़ा, …लेकिन बेशर्मों को शर्म कहां!

आगरा की रहने वाली प्रतिमा भार्गव ने मीडिया के खिलाफ एक बड़ी लड़ाई जीत ली है. लेकिन दुख इस बात का है कि बेशर्म मीडिया वाले इस खबर को कतई नहीं छापेंगे. अगर इनमें थोड़ी भी नैतिकता होती तो प्रेस काउंसिल आफ इंडिया के इस फैसले को न सिर्फ प्रकाशित करते बल्कि खुद के पतने पर चिंता जताते, विमर्श करते. प्रतिमा भार्गव के खिलाफ एक फर्जी खबर दैनिक जागरण आगरा और आई-नेक्स्ट आगरा ने प्रमुखता से प्रकाशित किया. अनाप-शनाप आरोप लगाए.

प्रतिमा से कोई पक्ष नहीं लिया गया. खबर छपने के बाद जब प्रतिमा ने अपना पक्ष छपवाना चाहा तो दैनिक जागरण और आई-नेक्स्ट के संपादकों ने इनकार कर दिया. प्रतिमा ने लीगल नोटिस भेजा अखबार को तो इसकी भी परवाह नहीं की. अंत में थक हारकर प्रतिमा ने प्रेस काउंसिल आफ इंडिया में केस किया और वकीलों के साथ प्रजेंट हुई. अपनी पूरी बात बताई. प्रेस काउंसिल ने कई बार दैनिक जागरण और आई-नेक्स्ट के संपादकों को बुलाया लेकिन ये लोग नहीं आए.

अब जाकर प्रेस काउंसिल ने आदेश किया है कि दैनिक जागरण और आई-नेक्स्ट ने प्रतिमा भार्गव के मामले में पत्रकारिता के मानकों का उल्लंघन किया है. इस बाबत उचित कार्रवाई के लिए RNI एवं DAVP को आर्डर की पूरी कापी प्रेषित की है. साथ ही आदेश की कापी दैनिक जागरण और आई-नेक्स्ट के संपादकों-मालिकों को भी रवाना कर दिया है. क्या दैनिक जागरण का संपादक संजय गुप्ता और आई-नेक्स्ट का संपादक आलोक सांवल इस फैसले को अपने अखबार में छाप सकेंगे? क्या इनमें तनिक भी पत्रकारीय नैतिकता और सरोकार शेष है? क्या ये एक पीड़ित महिला ने सिस्टम के नियम-कानून को मानते हुए जो न्याय की लड़ाई लड़ी है और उसमें जीत हासिल की है, उसका सम्मान करते हुए माफीनामा प्रकाशित करेंगे व उसकी खराब हुई छवि को दुरुस्त करने के लिए प्रयास करेंगे?

शायद नहीं. इसलिए क्योंकि इसी को कहते हैं कारपोरेट जर्नलिज्म, जहां सरोकार से ज्यादा बड़ा होता है पैसा. जहां पत्रकारिता के मूल्यों से ज्यादा बड़ा होता है धन का अहंकार. जहां आम जन की पीड़ा से ज्यादा बड़ी चीज होती है अपनी खोखली इज्जत. प्रतिमा ने जो लड़ाई लड़ी है और उसमें जीत हासिल की है, उसके लिए वह न सिर्फ सराहना की पात्र हैं बल्कि हम सबका उन्हें एक सैल्यूट भी देना बनता है. अब आप सब सजेस्ट करें कि आगे प्रतिमा को क्या करना चाहिए.

क्या उन्हें दिल्ली आकर पूरे मामले पर प्रेस कांफ्रेंस करना चाहिए? क्या उन्हें सुप्रीम कोर्ट में इस बात के लिए केस करना चाहिए कि अगर ये दोषी अखबार माफीनामा नहीं छापते हैं तो कोई पीड़ित क्या करे? आप सभी अपनी राय दें, सुझाव दें क्योंकि ये कोई एक प्रतिमा का मामला नहीं है. ऐसे केस हजारों की संख्या में हैं लेकिन लोग लड़ते नहीं, देर तक अड़े नहीं रह पाते, लड़ाई को हर स्टेज तक नहीं ले जा पाते. प्रतिमा ने ऐसा किया और इसमें उनका काफी समय व धन लगा, लेकिन उन्होंने अपने पक्ष में न्याय हासिल किया. अब उन्हें आगे भी लड़ाई इस मसले पर लड़नी चाहिए तो कैसे लड़ें, कहां लड़ें या अब घर बैठ जाएं?

कहने वाले ये भी कहते हैं कि संजय गुप्ता और आलोक सांवल दरअसल संपादक हैं ही नहीं, इसलिए इनकी चमड़ी पर कोई असर नहीं पड़ता. संजय गुप्ता चूंकि नरेंद्र मोहन के बेटे हैं इसलिए जन्मना मालिक होने के कारण उन्हें संपादक पद दे दिया गया, पारिवारिक गिफ्ट के रूप में. आलोक सांवल मार्केटिंग और ब्रांडिंग का आदमी रहा है, साथ ही गुप्ताज का प्रियपात्र भी, इसलिए उसे थमा दिया गया आई-नेक्स्ट का संपादक पद.

यही कारण है कि इनमें संपादकों वाली संवेदनशीलता और सरोकार कतई नहीं हैं. ये सिर्फ अपनी कंपनी का बिजनेस इंट्रेस्ट देखते हैं और अखबार का प्रसार अधिकतम बना रहे, इसकी चिंता करते हैं. इनके पहाड़ जैसे अवैध साम्राज्य के नीचे हजार दो हजार आम जन दम तोड़ दें तो इनको क्या फरक पड़ने वाला है. खैर, न्याय सबका होता है, सिस्टम नहीं करेगा तो प्रकृित करेगी. वक्त जरूर लग सकता है लेकिन प्राकृतिक न्याय का सामना तो करना ही पड़ेगा. जिस कदर ये महिला प्रतिमा भार्गव पेरशान हुई है, उससे कम परेशानियां ये दोनों शख्स न झेलेंगे, ये तय है, मसला चाहे जो रहे. जै जै. 

-यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया


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पत्रकार श्रीकांत सिंह ने जागरण वालों पर यूं मारी पिचकारी, देखें वीडियो

दैनिक जागरण नोएडा से जुड़े हुए वरिष्ठ पत्रकार श्रीकांत सिंह काफी समय से बगावती मूड में हैं. इन्होंने मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से अपना एरियर व सेलरी पाने के लिए मुहिम छेड़ रखी है. साथ ही दर्जनों कर्मचारियों को इस मुहिम से जोड़ रखा है. पिछले दिनों नाराज प्रबंधन ने श्रीकांत का तबादला जम्मू कर दिया. बाद में वे नोएडा बुलाए गए लेकिन उन्हें आफिस में नहीं घुसने दिया गया. साथ ही जागरण के गार्डों ने उनसे मारपीट व छिनैती की. इस पूरे मामले को लेकर वे लेबर आफिस गए लेकिन उनका आरोप है कि अफसर ने सेटिंग करके रिपोर्ट जागरण के पक्ष में दे दी है.

श्रीकांत सिंह ने पूरे मामले को लेकर होली के दिन जागरण पर पिचकारी मारी है. अपने क्रिएटिव अंदाज में उन्होंने विजुवल्स के साथ होरी गीत को यूट्यूब पर लोड किया है. उनके होरी गीत की एक बानगी देखिए…

संजय गुप्ता का दिल भर आया
विष्णु त्रिपाठी देखो मुंहकी खाया
ओम वर्मा हड़के
रंग बरसे
भीगे कर्मचारी
रंग बरसे

पूरे वीडियो को देखने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें…

https://www.youtube.com/watch?v=_NfFADVM9zQ

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भारतीय टीवी न्यूज इंडस्ट्री में बड़ा और नया प्रयोग करने जा रहे हैं दीपक शर्मा समेत दस बड़े पत्रकार

(आजतक न्यूज चैनल को अलविदा कहने के बाद एक नए प्रयोग में जुटे हैं दीपक शर्मा)


भारतीय मीडिया ओवरआल पूंजी की रखैल है, इसीलिए इसे अब कारपोरेट और करप्ट मीडिया कहते हैं. जन सरोकार और सत्ता पर अंकुश के नाम संचालित होने वाली मीडिया असलियत में जन विरोधी और सत्ता के दलाल के रूप में पतित हो जाती है. यही कारण है कि रजत शर्मा हों या अरुण पुरी, अवीक सरकार हों या सुभाष चंद्रा, संजय गुप्ता हों या रमेश चंद्र अग्रवाल, टीओआई वाले जैन बंधु हों या एचटी वाली शोभना भरतिया, ये सब या इनके पिता-दादा देखते ही देखते खाकपति से खरबपति बन गए हैं, क्योंकि इन लोगों ने और इनके पुरखों ने मीडिया को मनी मेकिंग मीडियम में तब्दील कर दिया है. इन लोगों ने अंबानी और अडानी से डील कर लिया. इन लोगों ने सत्ता के सुप्रीम खलनायकों को बचाते हुए उन्हें संरक्षित करना शुरू कर दिया.

इन लोगों ने जनता के हितों को पूंजी, सत्ता और ताकत के आगे नीलाम कर दिया. नतीजा, परिणति, अंततः कुछ ऐसा हुआ कि देश में करप्शन, लूटमार, झूठ, दलाली का बोलबाला हो गया और बेसिक मोरल वैल्यूज खत्म हो गए. इसी सबको लेकर कुछ पत्रकारों ने सोचा कि जनता का कोई ऐसा मीडिया हाउस क्यों न बनाया जाए जो अंबानी और अडानी के लूटमार पर खुलासा तो करे ही, करप्ट और कार्पोरेट मीडिया के खलनायकों के चेहरे को भी सामने लाए. ऐसा सपना बहुतों ने बहुत बार देखा लेकिन कभी इस पर अमल नहीं हो पाया क्योंकि मीडिया को संचालित करने के लिए जिस न्यूनतम पूंजी की जरूरत पड़ती है, वह पू्ंजी लगाए कौन. पर सपने मरते नहीं. दौर बदलता है, तकनीक बदलती है तो सपने देखने के तौर-तरीके और स्वप्नदर्शी भी बदल जाते हैं.

इस बदले और परम बाजारू दौर में अब फिर कुछ अच्छे और सच्चे पत्रकारों के मन में पुराने सपने नए रूप में अंखुवाए हैं. इनने मिलकर एक जनता का मीडिया हाउस बनाने का फैसला लिया है. दस बड़े टीवी और प्रिंट पत्रकारों ने मिलकर जो सपना देखा है, उसे मूर्त रूप देने का काम बहुत तेजी से किया जा रहा है. आजतक न्यूज चैनल से इस्तीफा देने वाले चर्चित पत्रकार दीपक शर्मा इस काम में जोर शोर से लगे हैं. अमिताभ श्रीवास्तव भी इसके हिस्से हैं. एक तरफ चिटफंडियों और बिल्डरों के न्यूज चैनल हैं जो विशुद्ध रूप से सत्ता पर दबाव और दलाली के लिए लांच किए गए हैं तो दूसरी तरफ जनता की मीडिया के नाम पर धन बनाने की मशीन तैयार कर देने वाले मीडिया मालिक हैं. इनके बीच में जो एक बड़ा स्पेश जनपक्षधर मीडिया हाउस का है, वह लगातार खाली ही रहा है.

हां, इस बदले नए दौर में न्यू मीडिया ने काफी हद तक जन मीडिया का रूप धरा है लेकिन इसकी अपनी सीमाएं हैं. इन सीमाओं को लांघने का तय किया है दस पत्रकारों ने. एक नेशनल सैटेलाइट न्यूज चैनल जल्द लांच होने जा रहा है. यह चैनल मुनाफे के दर्शन पर आधारित नहीं होगा. यह सहकारिता के मॉडल पर होगा. नो प्राफिट नो लॉस. काम तेजी से चल रहा है. लग रहा है कि मीडिया में भी एक क्रांति की शुरुआत होने वाली है. लग रहा है मीडिया के जरिए मालामाल और दलाल हो चुके लोगों के चेहरों से नकाब खींचने का दौर शुरू होने वाला है. आइए, इस नए प्रयोग का स्वागत करें. आइए, भड़ास के सैटेलाइट वर्जन का स्वागत करें. आइए, बेबाकी और साहस की असली पत्रकारिता का स्वागत करें.

लेखक यशवंत भड़ास4मीडिया डॉट कॉम के संपादक हैं. संपर्क: 09999966466


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दैनिक जागरण नोएडा हड़ताल : देखिए और पढ़िए जीत के इस निशान को, सलाम करिए मीडियाकर्मियों की एकजुटता को

जो मालिक, जो प्रबंधन, जो प्रबंधक, जो संपादक आपको प्रताड़ित करता है, काम पर आने से रोकता है, तनख्वाह नहीं बढ़ाता है, बिना कारण ट्रांसफर करने से लेकर इस्तीफा लिखवा लेता है, वही मालिक प्रबंधन प्रबंधक संपादक जब आप एकजुट हो जाते हैं तो हारे हुए कुक्कुर की तरह पूंछ अपने पीछे घुसा लेता है और पराजित फौज की तरह कान पकड़कर गल्ती मानते हुए थूक कर चाटता है. जी हां. दैनिक जागरण नोएडा में पिछले दिनों हुई हड़ताल इसका प्रमाण है. कर्मचारियों की जबरदस्त एकजुटता, काम का बहिष्कार कर आफिस से बाहर निकल कर नारेबाजी करना और मैनेजरों के लालीपॉप को ठुकरा देना दैनिक जागरण के परम शोषक किस्म के मालिक संजय गुप्ता को मजबूर कर गया कि वह कर्मचारियों की हर मांग को मानें.

जब संजय गुप्ता ने लिखित तौर पर मांग मानने की बात कही, मजीठिया मांगने के कारण उत्पीड़ित करते हुए ट्रांसफर किए गए लोगों से भूल सुधार करते हुए ट्रांसफर रद करने की बात कही तो कर्मचारी शांत हुए व काम पर लौटे.

ये लेटर असल में मीडियाकर्मियों की एकजुट ताकत के भय से पैदा असर का प्रतीक है. आप अलग अलग रहोगे, अलग अलग अपना भविष्य तलाशोगे, अलग अलग अपना करियर बनाओगे तो आपको एक एक कर मालिकों मैनेजरों द्वारा मार दिया जाएगा, नष्ट कर दिया जाएगा. जब एकजुट रहोगे, एकजुट होकर अपनी ताकत के साथ अपने मुद्दों पर भिड़ोगे तो इन्हीं मैनेजरों-मालिकों को झुका पाओगे और अपनी शर्त के साथ नौकरी कर पाओगे.

ये मालिक और मैनेजर हम मीडियाकर्मियों को अपना गुलाम, अपना दास, अपना सेवक, अपना धंधेबाज, अपना बाडीगार्ड, अपना चेला, अपना चिंटू, अपना मेठ बनाकर रखना चाहते हैं. जबकि भारत की शासन व्यवस्था में मीडियाकर्मियों को कई अतिरिक्त अधिकारों से लैस किया गया है. ये मालिक उन अधिकारों को नहीं देना चाहते. ये नहीं चाहते कि हम आप समृद्ध हो सकें, तार्किक हो सकें, लोकतांत्रिक हो सकें. ये अपने पर निर्भर रखना चाहते हैं. इसी कारण कम से कम सेलरी देकर आपको मजबूर बनाए रखना चाहते हैं. भारत सरकार ने बहुत पहले से व्यवस्था की हुई है कि वेज बोर्डों के जरिए मीडियाकर्मियों की आजादी को बरकरार रखा जा सके. आप तभी आजाद रह पाएंगे जब आप आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हों. लेकिन सैकड़ों करोड़ मुनाफा कमाने वाले मीडिया मालिक किसी भी दशा में वेज बोर्ड न देना चाहते हैं और न देने की मंशा रखते हैं. सुप्रीम कोर्ट तक से इन्हें डर नहीं लगता. अब गेंद हमारे आपके पाले में है. आपको हमको संगठित होना पड़ेगा और गुंडई करने वाले मालिकों मैनेजरों को सबक सिखाना पड़ेगा. कहीं किसी यूनिट में अगर किसी भी मीडियाकर्मी को मजीठिया वेज बोर्ड मांगने के कारण परेशान किया जाता है तो सभी को मिलकर काम ठपकर गेट से बाहर आ जाना चाहिए ताकि मालिकों मैनेजरों को औकात पर लाया जा सके. दैनिक जागरण नोएडा ने रास्ता दिखा दिया है. 

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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संजय गुप्ता को रात भर नींद नहीं आई, जागरण कर्मियों में खुशी की लहर

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मीडियाकर्मियों को अपनी कमर कसकर रहना होगा, मालिकान के खिलाफ निर्णायक लड़ाई का समय करीब आ रहा है…

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संजय गुप्ता को रात भर नींद नहीं आई, जागरण कर्मियों में खुशी की लहर

बहुत दिनों बाद ऐसा हुआ. इसे पहले ही हो जाना चाहिए था. डिपार्टमेंट का कोई भेद नहीं था. सब एक थे. सब मीडियाकर्मी थे. सब सड़क पर थे. सबकी एक मांग थी. मजीठिया वेज बोर्ड खुलकर मांगने और सुप्रीम कोर्ट जाने वाले जिन-जिन साथियों को दैनिक जागरण प्रबंधन ने परेशान किया, ट्रांसफर किया, धमकाया, इस्तीफा देने के लिए दबाव बनाया, उन-उन साथियों के खिलाफ हुई दंडात्मक कार्रवाई तुरंत वापस लो और आगे ऐसा न करने का लिखित आश्वासन दो.

अखबार छपने का वक्त हो चुका था लेकिन दैनिक जागरण नोएडा के कर्मी सड़क पर थे. आफिस से बाहर. सारा कामकाज ठप था. पांच-दस चिंटू टाइप लोग काम पर लगे थे, जो खुद को स्वाभिमानी मनुष्य कम, दास प्रथा वाले समय का दास ज्यादा समझते हैं. करीब तीन-चार सौ कर्मियों के सड़क पर आ जाने से दैनिक जागरण नोएडा के मालिक संजय गुप्ता के आंखों की नींद चली गई. वे जहां थे, वहीं चौकन्ने हो गए. आफिस से हाटलाइन से जुड़ गए. मैनेजरों को तुरंत हड़ताल खत्म कराने के लिए कहने लगे. मैनेजर अंदर बाहर यानि कभी हड़ताली कर्मियों से बात करने आते तो कभी अंदर जाकर संजय गुप्ता को रिपोर्ट बताते. देखते ही देखते कई न्यूज पोर्टलों, न्यूज चैनलों और अखबारों के लोग इस हड़ताल को कवर करने पहुंच गए. यह नई परिघटना थी. अखबार के हड़ताली कर्मियों की खबर को भी कवर किया जाने लगा है. यह न्यू मीडिया का प्रताप है. यह बदलते दौर और बदलती तकनीक का कमाल है. भड़ास पर खबर फ्लैश होते ही देश भर के लोगों के फोन दैनिक जागरण नोएडा में काम करने वालों के मोबाइल पर घनघनाने लगे.

मैनेजरों की एक न चली. साले लालीपाप वापस कर दिए गए. मीडियाकर्मी अपनी मांग पर अड़े रहे. नोएडा के हड़ताल की आग हिसार यूनिट तक पहुंच गई. वहां भी मीडियाकर्मी काम ठप कर चुके थे. संजय गुप्ता के हाथ-पांव फूलने लगे. खुद को बहुत काबिल, विद्वान और बड़ा आदमी समझने वाला संजय गुप्ता इस रात लाचार था. दिल्ली चुनाव और नतीजों को लेकर अनुमान संबंधी खबरें छापी जानी थी. रविवार का एडिशन था. इस रोज बहुत ज्यादा अखबार बिकता है. अगर अखबार मार्केट में न आया तो जागरण की थूथू होने लगेगी, दूसरे अखबारों की चांदी हो जाएगी. ऐसे में किसी भी तरह हड़ताल को खत्म करना था. परम कंजूस और शोषक किस्म का आदमी संजय गुप्ता अंतत: समर्पण की मुद्रा में आ गया. दैनिक जागरण का मालिक संजय गुप्ता मीडियाकर्मियों की ताकत के आगे झुक गया. सभी तबादले और दंडात्मक कार्रवाई वापस करने की बात मान ली. आगे भी परेशान ना करने का वादा किया. मजीठिया वेज बोर्ड के लिए जो लोग सुप्रीम कोर्ट गए हैं, उनको भी नहीं छेड़ने का आश्वासन दिया. यह सब लिखित रूप में किया.

यह बात जब हड़ताली कर्मियों को बताई गई तो उन्होंने आपस में विचार विमर्श किया और इस वादे के साथ हड़ताल समाप्त करने का फैसला लिया कि अगर मालिकों ने फिर कभी किसी को परेशान किया तो ऐसे ही सभी साथी हड़ताल कर आफिस से बाहर आ जाएंगे. यह बहुत बड़ी परिघटना थी. बहुत दिनों बाद ऐसी एकजुटता दिखी. अगर यही एकजुटता शुरू से रही होती तो इन मालिकों की औकात न होती कि वे सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से सेलरी न दें. देर आए दुरुस्त आए साथियों. यही भावना बनाए रखिए. मालिकों, मैनेजरों और संपादकों के लग्गू-भग्गू व चिंटू दस-पांच ही होते हैं और इनकी कोई औकात नहीं होती कि वे आप लोगों की एकजुटता में फूट डाल दें. ये हड़ताल बाकी मीडिया हाउसों के कर्मियों के लिए भी नजीर है. आप सब एक हो गए तो आप लोगों का खून पी पी कर मोटे बड़े हो गए इन मीडिया मालिकों को औकात में आना पड़ेगा. जिस तरह संजय गुप्ता को उनके मीडियाकर्मियों की हड़ताल के कारण रात भर नींद नहीं आई और अपने एकजुट व गुस्साए कर्मियों के आगे सरेंडर करना पड़ा, उसी तरह दूसरे मीडिया हाउसों के मालिकों के साथ भी यही होना है.

हड़ताल स्थल पर मोबाइल कैमरे के जरिए शूट किया गया वीडियो देखें: https://www.youtube.com/watch?v=EA32dSYnbgY

हड़ताल स्थल से लौटे भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की रिपोर्ट.

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संजय गुप्‍ता के लिखित आश्‍वासन पर काम पर लौटे हड़ताली जागरणकर्मी

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लिखित आश्‍वासन के बाद काम पर लौटे हड़ताली जागरणकर्मी

(दैनिक जागरण, नोएडा के कर्मियों द्वारा हड़ताल की जानकारी मिलने पर जनपक्षधर पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव कैमरे समेत मौके पर पहुंचे और फोटोग्राफी में जुट गए)


अरसे से अपने पत्रकारों, कर्मचारियों को अपना दास समझने वाले दैनिक जागरण समूह के मालिकों पहली बार सामूहिक शक्ति के सामने झुकना पड़ा है. दैनिक जागरण के मीडिया कर्मचारी इस मीडिया हाउस के समूह संपादक व सीर्इओ संजय गुप्‍ता के लिखित आश्‍वासन के बाद ही हड़ताल समाप्‍त करने को राजी हुए और काम पर वापस लौटे. मैनेजर टाइप लोगों के लालीपाप थमाकर हड़ताल खत्म कराने के तमाम प्रयास फेल होने के बाद संजय गुप्‍ता को मजबूरी में लिखित आश्‍वासन देकर मामला सुलझाना पड़ा. बताया जा रहा है कि दिल्‍ली चुनाव के चलते गुप्‍ता एंड कंपनी ने तात्‍कालिक तौर पर यह रास्‍ता अपनाया है और किसी को परेशान न करने का लिखित वादा किया है.  

संजय गुप्‍ता ने लिखित तौर पर आश्‍वासन दिया है कि वे मजीठिया वेज बोर्ड की मांग को लेकर दूसरे यूनिटों में ट्रांसफर किए गए लोगों को उनकी मंशा के अनुरूप यूनिटों में भेजा जाएगा. हड़ताल में शामिल किसी कर्मचारी को किसी भी कीमत पर परेशान नहीं किया जाएगा. साथ ही मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर जो कर्मचारी सुप्रीम कोर्ट या अन्‍य कोर्ट गए हैं, उनके साथ कोई दुर्व्‍यवहार नहीं होगा, उन्‍हें निकाला नहीं जाएगा. संजय गुप्‍ता के इन तमाम आश्‍वासनों के बाद नोएडा समेत हिसार के कर्मचारी भी काम पर लौट गए हैं. 

बताया जा रहा है कि कर्मचारियों ने ऐसे मौके पर हड़ताल कर दिया था कि प्रबंधन को न तो उगलते बन रहा था और न निगलते. दिल्‍ली चुनाव होने के चलते मालिकों की सांस फूलने लगी थी. वे किसी भी कीमत पर हड़ताल खत्‍म कराकर अखबार प्रकाशित करवाने में जुटे हुए थे. संजय गुप्‍ता के आश्‍वासन तथा वरिष्‍ठों के हाथ-पांव जोड़ने के बाद कर्मचारी काम पर वापस लौटे हैं. हालांकि संभावना जताई जा रही है कि कर्मचारियों की एकता से डरा प्रबंधन अभी भले ही कुछ ना करे, लेकिन धीरे-धीरे वाले इन्‍हें प्रताडि़त कर सकता है. 

हड़ताल स्थल पर मोबाइल कैमरे के जरिए शूट किया गया वीडियो देखें: https://www.youtube.com/watch?v=EA32dSYnbgY

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दैनिक जागरण, नोएडा के हड़ताल की आंच हिसार तक पहुंची

दैनिक जागरण, नोएडा में कर्मचारी सड़कों पर उतर गए हैं. प्रबंधन की दमनकारी और शोषणकारी नीतियों के खिलाफ कर्मचारियों का सालों से दबा गुस्‍सा अब छलक कर बाहर आ गया है. मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर एक संपादकीय कर्मचारी का तबादला किए जाने के बाद सारे विभागों के कर्मचारी एकजुट होकर हड़ताल पर चले गए हैं. मौके पर प्रबंधन के लोग भी पहुंच गए हैं, लेकिन कर्मचारी कोई बात सुनने को तैयार नहीं हैं. प्रबंधन ने सुरक्षा के मद्देनजर पुलिस बल को बुला लिया है, लेकिन प्रबंधन के शह पर सही गलत करने वाली नोएडा पुलिस की हिम्‍मत भी कर्मचारियों से उलझने की नहीं हो रही है. 

कई सौ कर्मचारी सड़कों पर उतर गए हैं. ये लोग मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से वेतन नहीं दिए जाने और कर्मचारियों को प्रताडि़त करने के लिए तमाम तरह के प्रयास किए जाने से नाराज थे. प्रबंधन के कुछ एक खास लोगों को छोड़कर सभी कर्मचारी हड़ताल में शामिल हो गए हैं. नोएडा की हड़ताल का असर हरियाणा की हिसार यूनिट तक भी पहुंच गया है. हिसार यूनिट के जागरण कर्मचारी भी प्रबंधन के खिलाफ हड़ताल पर उतर गए हैं. माना जा रहा है कि सूचना मिलने के साथ जागरण समूह के अन्‍य यूनिटों के कर्मचारी भी प्रबंधन की हरामखोरी के खिलाफ सड़कों पर उतर जाएंगे. 

हड़ताल की सूचना मिलते ही दैनिक जागरण के मालिक और संपादक संजय गुप्ता के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगी हैं. वे हड़ताल की जानकारी मिलने के बाद सारे कार्यक्रम स्थगित कर किसी तरह हड़ताल तुड़वाने की कोशिशों में जुट गए हैं और कर्मचारियों में फूट डलवाने के लिए अपने चेले टाइप के मैनेजर नीतेंद्र को लगा दिया है. इस मैनेजर की सारी कोशिशें बेकार हो रही हैं. कर्मचारी प्रबंधन की कोई बात सुनने को तैयार नहीं हैं. उनकी मांग है कि मजीठिया मांगने वालों का तबादला रद्द करने के साथ सभी को वेज बोर्ड के हिसाब से सैलरी देने की लिखित घो‍षणा की जाए. साथ ही कर्मचारियों को हटाने या अन्‍यत्र भेजे जाने की कोशिश ना की जाए. 

कर्मचारियों की नाराजगी इस बात को लेकर है कि उनकी मेहनत से प्रबंधन अरबों रूपए कमाता है और जब उनका हक देने की बारी आती है तो उन्‍हें तरह तरह से प्रताड़ित किया जाने लगता है. वैसे भी जागरण कर्मचारियों की सैलरी अन्‍य बड़े अखबारों की सैलरी से काफी कम है. संभावना जताई जा रही है कि कर्मचारी बिना अपनी मांगों के हड़ताल किसी भी कीमत पर खत्‍म नहीं करने वाले हैं. कई अन्य पत्रकार भी मौके पर मौजूद हैं. भड़ास के संपादक यशवंत सिंह समेत पत्रकार राजीव शर्मा, अभिषेक श्रीवास्तव, पंकज श्रीवास्तव, प्रशांत टंडन आदि हड़ताली जागरण कर्मियों के समर्थन में मौके पर डटे हुए हैं.

हड़ताल स्थल पर मोबाइल कैमरे के जरिए शूट किया गया वीडियो देखें: https://www.youtube.com/watch?v=EA32dSYnbgY

अंत में क्या हुआ, जानने के लिए इसे पढ़ें…

संजय गुप्ता को रात भर नींद नहीं आई, जागरण कर्मियों में खुशी की लहर

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दैनिक जागरण के मालिकों ने नरेंद्र मोदी से की मुलाकात, जागरणकर्मियों का चेहरा हुआ उदास

खबर है कि दैनिक जागरण के मालिकों की टीम ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात कर उन्हें पीएम राहत कोष के लिए चार करोड़ रुपये का चेक सौंपा. साथ ही सबने प्रधानमंत्री के साथ फोटो खिंचवाई. दैनिक जागरण के CMD महेंद मोहन गुप्त, प्रधान संपादक और CEO संजय गुप्त समेत कई गुप्ताज और इनके वरिष्ठ पत्रकार प्रशांत मिश्र तस्वीर में दिख रहे हैं, मुस्कराते. पर निराशा जागरण कर्मियों के चेहरे पर छा गई है.

इस तस्वीर के पीछे की असली खबर ये है कि दैनिक जागरण में कार्यरत पत्रकारों और गैर-पत्रकारों को मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से वेतन दिलाने की मुहिम को झटका लगेगा और सरकारी अफसर डर के मारे प्रबंधन के खिलाफ कोई कार्रवाई करने से हिचकेंगे. भला उन मालिकों के खिलाफ कौन अफसर एक्शन लेगा जो पीएम के साथ फोटो खिंचवाए हों. अब सारा दारोमदार सुप्रीम कोर्ट पर है. अगर सुप्रीम कोर्ट ने सख्ती से जागरण प्रबंधन को रगड़ा तो मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से वेतन देंगे अन्यथा जागरण के कर्मी रोते रहेंगे.

दैनिक जागरण में कार्यरत एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र और तस्वीर पर आधारित.

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उसके बाद संजय गुप्ता बेईमानी पर उतर आया….

गुजरात के अहमदाबाद से अप्रैल 2013 में शुरू हुआ हिंदी न्यूज़ चैनल ‘जानो दुनिया’ आखिरकार बंद हो गया। करीब 250 लोगों की जिंदगी लगभग बर्बाद कर गया। इस चैनल के मालिक और गुजरात सरकार में आईएएस रह चुके संजय गुप्ता एशो आराम की जिंदगी बिता रहे हैं। चैनल बहुत ही शोर शराबे के साथ शुरू हुआ लेकिन जैसे-जैसे दिन गुजरते गए, संजय गुप्ता के इरादे सबके सामने आने लगे। शुरुआत के दो तीन महीने तक तो सबको हर महीने वेतन दिया गया। उसके बाद संजय गुप्ता बेईमानी पर उतर आया।

चैनल में काम कर रहे लोगों से कहा गया कि बिज़नेस नहीं आ रहा है, इसलिए वेतन मिलने में देरी हो जाएगी। बेचारे पत्रकार, खबरे लाते रहे, दिखाते रहे लेकिन संजय गुप्ता न्यूज़ चैनल को भी अपने होटल के व्यापार की तरह देख रहे थे। उन्हें सिर्फ मुनाफा चाहिए था। समझदर पत्रकारों ने चार से पांच महीने में ही संजय गुप्ता और उनके चैनल से किनारा कर लिया। लेकिन कुछ पत्रकार साथी सब कुछ सही होने की उम्मीद में वहां टिके रहे।

धीरे धीरे चैनल प्रबंधन और भी घटिया तरीके पर उतर आया। पत्रकारों को दो से तीन महीने का वेतन नहीं दिया गया। पैसे मांगने पर त्यागपत्र मांग लिया जाता।  आखिर में तीस लोग मिल कर चैनल चलते रहे। आखिरी दो महीनो में चैनल की लाइट भी काट दी गई क्योंकि हजारों करोड़ की संपत्ति का मालिक संजय गुप्ता बिजली बिल भी नहीं चुकाना चाहता था। चैनल की इस मनमानी से परेशान होकर जब बचे हुए कर्मचारियों ने पैसे मांगे तो संजय गुप्ता ने कर्मचारियों को बहार निकलवाकर तालाबंदी कर दी। संजय गुप्ता सभी  कर्मचारियों का तीन से चार महीने का वेतन हजम कर गया। इतना ही नहीं, बिना कुछ नोटिस दिए चैनल बंद कर दिया। एक तो चार महीने की पगार पहले से ही संजय गुप्ता दबा के बैठा था, ऊपर से बेरोजगारी।

आज आलम ये है कि एक महीने में पंद्रह मीडिया दफ्तरों के चक्कर काट आया हूं लेकिन कहीं भी नौकरी नहीं मिली। उल्टा ‘जानो दुनिया’ के नाम से उंचे पदों पर बैठे लोग व्यंग्य करते। जानो दुनिया ने पत्रकारों से पैसा और रोजगार तो छीन ही लिया, कितने ही परिवारों में कलह तक करा दिया। मेरे एक मित्र का रिश्ता तक टूट गया क्योंकि बेरोजगार पत्रकार को कौन लड़की देगा। इस सबके बावजूद भी संजय गुप्ता खुलेआम पूरे देश में अपना कारोबार चला रहा है। मानसिक तौर पर हम जो दंश झेल रहे है उसका हर्जाना कौन देगा। सरकार कब तक ऐसे लोगो को चैनल चलाने के लायसेंस देती रहेगी। फिलहाल तो यही कहूंगा कि हे मोदी जी, आपके गुजरात में आकर बहुत दुख पाया।

अहमदाबाद से पत्रकार सीजे की रिपोर्ट.

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ब्रेकिंग न्यूज… सुधीर चौधरी की सेल्फी… ब्रेकिंग न्यूज… दीपक चौरसिया का हालचाल …

मैं आज के दिन को मीडिया के लिहाज से शर्मनाक दिन कहूंगा. पत्रकारिता के छात्रों को कभी पढ़ाया जाएगा कि 25 अक्टूबर 2014 के दिन एक बार फिर भारतीय राजनीति के आगे पत्रकारिता चरणों में लोट गई. धनिकों की सत्ता भारी पड़ गई जनता की आवाज पर. कभी इंदिरा ने भय और आतंक के बल पर मीडिया को रेंगने को मजबूर कर दिया था. आज मोदी ने अपनी ‘रणनीति’ के दम पर मीडिया को छिछोरा साबित कर दिया. दिवाली मिलन के बहाने मीडिया के मालिकों, संपादकों और रिपोर्टरों के एक आयोजन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आए. देश, विदेश, समाज और नीतियों पर कोई बातचीत नहीं हुई. सिर्फ मोदी बोले. कलम को झाड़ू में तब्दील हो जाने की बात कही. और, फिर सबसे मिलने लगे. जिन मसलों, मुद्दों, नारों, आश्वासनों, बातों, घोषणापत्रों, दावों के नाम पर सत्ता में आए उसमें से किसी एक पर भी कोई बात नहीं की.

सुधीर चौधरी सेल्फी बनाने लगे. दीपक चौरसिया हालचाल बतियाने लगे. रिपोर्टरों में तो जैसे होड़ मच गई सेल्फी बनाने और फोटो खिंचाने की. इस पूरी कवायद के दौरान कोई पत्रकार ऐसा नहीं निकला जिसने मोदी से जनता का पत्रकार बनकर जनहित-देशहित के मुद्दों पर सवाल कर सके. सब गदगद थे. सब पीएम के बगल में होने की तस्वीर के लिए मचल रहे थे. जिनकी सेल्फी बन गई, उन्होंने शायद पत्रकारिता का आठवां द्वार भेद लिया था. जिनकी नहीं बन पाई, वो थोड़े फ्रस्ट्रेट से दिखे. जबसे नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने हैं, एक बार भी पूरी मीडिया के सामने नहीं आए और न ही सवाल जवाब का दौर किया. शायद इससे पोल खुलने, ब्रांडिंग खराब होने का डर था. इसीलिए नया तरीका निकाला गया. ओबलाइज करने का. पीएम के साथ फोटो खिंचाने भर से ओबलाइज हो जाने वाली भारतीय मीडिया और भारतीय पत्रकार शायद यह आज न सोच पाएं कि उन्होंने कितना बड़ा पाप कर डाला लेकिन उन्हें इतिहास माफ नहीं करेगा.

जी न्यूज पर ब्रेकिंग न्यूज चलने लगी. एडिटर इन चीफ सुधीर चौधरी ने पीएम के साथ सेल्फी बनाई. इंडिया न्यूज पर ब्रेकिंग न्यूज चलने लगी. एडिटर इन चीफ दीपक चौरसिया का प्रधानमंत्री ने हालचाल पूछा. महंगाई, बेरोजगारी और बदहाली से कराह रही देश की जनता का हालचाल यहां से गायब था. दिवाली की पूर्व संध्या पर सुसाइड करने वाले विदर्भ के छह किसानों की भयानक ‘सेल्फी’ किसी के सामने नहीं थी. सबके सब प्रधानमंत्री से मिलने मात्र से ही मुस्करा-इतरा रहे थे, खुद को धन्य समझ रहे थे.

रजत शर्माओं और संजय गुप्ताओं जैसे मीडिया मालिकों के लिए पत्रकारिता पहले से ही मोदी परस्ती रही है, आज भी है, कल भी रहेगी. इनके यहां काम करने वालों से हम उम्मीद नहीं कर सकते थे कि वो कोई सवाल करेंगे. खासकर तब जब ये और इन जैसे मीडिया मालिक खुद उपस्थित रहे हों आयोजन में. सुभाष चंद्राओं ने तो पहले ही भाजपा का दामन थाम रखा है और अपने चैनल को मोदी मय बनाकर पार्टी परस्त राष्ट्रीय पत्रकारिता का नया माडल पेश किया है. अंबानियों के आईबीएन7 और ईटीवी जैसे न्यूज चैनलों के संपादकों से सत्ता से इतर की पत्रकारिता की हम उम्मीद ही नहीं कर सकते हैं. कुल मिलाकर पहले से ही कारपोरेट, सत्ता, पावर ब्रोकरों और राजनेताओं की गोद में जा बैठी बड़ी पूंजी की पत्रकारिता ने आज के दिन पूरी तरह से खुद को नंगा करके दिखा दिया कि पत्रकारिता मतलब सालाना टर्नओवर को बढ़ाना है और इसके लिए बेहद जरूरी है कि सत्ता और सिस्टम को पटाना है. होड़ इस बात में थी कि मोदी ने किसको कितना वक्त दिया. मोदी ने कहा कि हम आगे भी इसी तरह मिलते जुलते रहेंगे. तस्वीर साफ है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कभी कोई कड़ा बड़ा सवाल नहीं पूछा जा सकेगा. वो जो तय करेंगे, वही हर जगह दिखेगा, हर जगह छपेगा. वो जो इवेंट प्लान करेंगे, वही देश का मेगा इवेंट होगा, बाकी कुछ नहीं.

ब्लैकमेलिंग में फंसे सुधीर चौधरियों और फिक्सर पत्रकार दीपक चौरसियाओं से हमें आपको पहले भी उम्मीद न थी कि ये जन हित के लिए पत्रकारिता करेंगे. दुखद ये है कि पत्रकारिता की पूरी की पूरी नई पीढ़ी ने इन्हीं निगेटिव ट्रेंड्स को अपना सुपर आदर्श मान लिया है और ऐसा करने बनने की ओर तेजी से अग्रसर हैं. यह खतरनाक ट्रेंड बता रहा है कि अब मीडिया में भी दो तरह की मीडिया है. एक दलाल उर्फ पेड उर्फ कार्पोरेट उर्फ करप्ट मीडिया और दूसरा गरीब उर्फ जनता का मीडिया. ये जनता का मीडिया ही न्यू मीडिया और असली मीडिया है. जैसे सिनेमा के बड़े परदे के जरिए आप देश से महंगाई भ्रष्टाचार खत्म नहीं कर सकते, उसी तरह टीवी के छोटे परदे के जरिए अब आप किसी बदलाव या खुलासे या जन पत्रकारिता का स्वाद नहीं चख सकते. दैत्याकार अखबारों जो देश के सैकड़ों जगहों से एक साथ छपते हैं, उनसे भी आप पूंजी परस्ती से इतर किसी रीयल जर्नलिज्म की उम्मीद नहीं कर सकते क्योंकि इनके बड़े हित बड़े नेताओं और बड़े सत्ताधारियों से बंधे-बिंधे हैं. दैनिक जागरण वाले अपने मालिकों को राज्यसभा में भेजने के लिए अखबार गिरवी रख देते हैं तो दैनिक भास्कर वाले कोल ब्लाक व पावर प्रोजेक्ट पाने के लिए सत्ताओं से डील कर अखबार उनके हवाले कर देते हैं.

ऐसे खतरनाक और मुश्किल दौर में न्यू मीडिया की जिम्मेदारी बढ़ जाती है. न्यू वेब में वेब मीडिया शामिल है. सोशल मीडिया समाहित है. न्यूज पोर्टल और ब्लाग भी हैं. मोबाइल भी इसी का हिस्सा है. इन्हें दोहरी जिम्मेदारी निभानी पड़ेगी. कार्पोरेट मीडिया, जिसका दूसरा नाम अब करप्ट मीडिया या पेड मीडिया हो गया है, इसको एक्सपोज करते रहना होगा. साथ ही, देश के सामने खड़े असल मुद्दों पर जनता की तरफ से बोलना लिखना पड़ेगा. अब पत्रकारिता को तथाकथित महान पत्रकारों-संपादकों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता. ये सब बिक चुके हैं. ये सब चारण हो गए हैं. ये सब कंपनी की लायजनिंग फिट रखने और बिजनेस बढ़ाने के प्रतिनिधि हो गए हैं. इतिहास बताता है कि इंदिरा ने मीडिया से झुकने को कहा था तो मीडिया वाले रेंगेने लगे थे. अब कहा जाएगा कि मोदी ने मीडिया को मिलन के बहाने संवाद के लिए कहा तो मीडिया वाले सेल्फी बनाने में जुट गए.

फेसबुक पर वरिष्ठ और युवा कई जनपक्षधर पत्रकार साथियों ने मीडिया की इस घिनौनी और चीप हरकत का तीखा विरोध किया है. वरिष्ठ पत्रकार और जनसत्ता अखबार के संपादक Om Thanvi लिखते हैं :  ”जियो मेरे पत्रकार शेरो! क्या इज्जत कमाई है, क्या सेल्फियाँ चटकाई हैं!

फेसबुक पर एक्टिव जन पत्रकार Dhananjay Singh बताते हैं एक किस्सा : ”एस.सहाय जी स्टेट्समैन के संपादक हुआ करते थे,उनके पास इंदिरा जी के यहाँ से कोई आया सूट का कपड़ा लेकर की खास आपके लिए प्रधानमंत्री ने भेजा है,साथ में टेलर का पता भी था.उन्होंने धन्यवाद के साथ उसे लौटा दिया.कुछ समय बाद प्रधानमंत्री ने बंगले पर संपादकों को डिनर दिया.सहाय जी के अलावा बाकी सभी क्रांतिकारी संपादक एक जैसे सूट में थे…सब एक दूसरे की तरफ फटी आँखों से देखने लगे … इंदिरा जी का अलग ही स्टाइल था……. समय बदला है अब तो खुद ही सब दंडवत हुए जा रहे हैं….. हाँ सहाय जी के घर रघु राय की उतारी एक तस्वीर दिखती थी की संसद की सीढ़ियों के पास एक भिखारी कटोरा लेकर खड़ा है (शायद तब सिक्योरिटी इतनी नहीं रही होगी)………… सहाय जी के पास अंतिम समय में खटारा फिएट थी और वो अपने बच्चों के लिए भी ‘कुछ भी’ छोड़ कर नहीं गए.

कई मीडिया हाउसों में काम कर चुके आध्यात्मिक पत्रकार Mukesh Yadav लिखते हैं: ”सवाल पूछने की बजाय पीएम साब के साथ सेल्फी लेने के लिए पत्रकारों, संपादकों में होड़ मची है!! शर्मनाक! धिक्कार! निराशा हुई! सवाल के लिए किसकी आज्ञा चाहिए जनाब?

सोशल एक्टिविस्ट और युवा पत्रकार Mohammad Anas कहते हैं: ”लोकतंत्र में संवाद कभी एक तरफा नहीं होता। एक ही आदमी बोले बाकि सब सुने। साफ दिख गया लोकशाही का तानाशाही में कन्वर्जन। मनमोहन ने एक बार संपादकों को बुलाया था, सवाल जवाब हुए थे। कुछ चटुकारों और दलालों ने पत्रकारिता को भक्तिकाल की कविता बना डाला है। वरना करप्टों, झूठों और जनविरोधियों के लिए पत्रकार आज भी खौफ़ का दूसरा नाम है।

कई अखबारों में काम कर चुके जोशीले पत्रकार Rahul Pandey सोशल मीडिया पर लिखते हैं :

आज पत्रकारों के सेल्‍फी समारोह के बाद पि‍छले साल का कहा मौजूं है… आप भी गौर फरमाएं

पत्रकार नहीं बनि‍या हैं
चार आने की धनि‍या हैं।
खबर लाएं बाजार से
करैं वसूली प्‍यार से
लौंडा नाच नचनि‍या हैं
पत्रकार नहीं, ये बनि‍या हैं।
चार आने की धनि‍या हैं।

करैं दलाली भरकर जेब
जेब में इनकी सारे ऐब
दफ्तर पहुंचके पकड़ैं पैर
जय हो सुनके होवैं शेर
नेता की रखैल रनि‍या हैं,
पत्रकार नहीं ये बनि‍या हैं,
चार आने की धनि‍या हैं।

वरिष्ठ अंग्रेजी पत्रकार Vinod Sharma लिखते हैं : ”Facebook flooded with selfies of media persons with our PM. A day to rejoice? Or reflect?

कई अखबारों में काम कर चुके पत्रकार Ashish Maharishi लिखते हैं :  ”हे मेरे देश के महान न्‍यूज चैनलों और उसके कथित संपादकों, प्रधानमंत्री ने आपको झुकने के लिए कहा तो आप रेंगने लगे। क्‍या देश में मोदी के अलावा कोई न्‍यूज नहीं है। ये पब्‍लिक है, सब जानती है…हमें पता है कि मोदी की न्‍यूज के बदले आपको क्‍या मिला है….

वरिष्ठ पत्रकार Arun Khare लिखते हैं :  ”मीडिया ने कलम को झाड़ू में बदल दिया –मोदी । मोदी जी आपने इस सच से इतनी जल्दी परदा क्यों उठा दिया । कुछ दिन तो मुगालते में रहने देते देश को।

फेसबुक पर एक्टिव जन पत्रकार Dharmendra Gupta लिखते हैं : ”जिस तरह से मीडिया के चम्पादक आज मोदी के साथ सेल्फी खिंचवा कर के उस को ब्रेकिंग न्यूज बना रहे है उस से लगता है की अब लड़ाई भ्रष्ट राजनीतिको के साथ भ्रस्ट मीडिया के खिलाफ भी लड़नी होगी.

संपादक और साहित्यकार गिरीश पंकज इन हालात पर एक कविता कुछ यूं लिखते हैं :

पत्रकारिता का सेल्फ़ीकरण
———–
कई बार सोचता हूँ
बिलकुल सही समय पर
मर गए पत्रकारिता के पुरोधा,
नहीं रहे तिलक और गांधी,
नहीं रहे बाबूराव विष्णु पराड़कर
गणेश शंकर विद्यार्थी भी
हो गए शहीद
राजेंद्र माथुर और प्रभाष जोशी
का भी हो गया अवसान।
आज ये ज़िंदा होते तो
खुद पर ही शर्मिन्दा होते
पत्रकारिता की झुकी कमर
और लिजलिजी काया देख कर
शोक मनाते
शायद जीते जी मर जाते
सुना है कि दिल्ली में
‘सेल्फिश’ पत्रकारिता अब
‘सेल्फ़ी ‘ तक आ गयी है
हमारी खुदगर्ज़ी
हमको ही खा गयी है

जो भक्त लोग हैं, उन्हें मोदी की हर स्टाइल पसंद है. वे मोदी की कभी बुराई नहीं करते और मीडिया की कभी तारीफ नहीं करते. इन्हें ऐसी ही चारण मीडिया चाहिए, जिसे गरिया सकें, दुत्कार सकें और लालच का टुकड़ा फेंक कर अपने अनुकूल बना सकें. सवाल उन लोगों का है जो आम जन के प्रतिनिधि के बतौर मीडिया में आए हैं. जिन्होंने पत्रकारिता के नियम-कानून पढ़े हैं और मीडिया की गरिमा को पूरे जीवन ध्यान में रखकर पत्रकारिता की. क्या ये लोग इस हालात पर बोलेंगे या मीडिया बाजार के खरबों के मार्केट में अपना निजी शेयर तलाशने के वास्ते रणनीतिक चुप्पी साधे रहेंगे. दोस्तों, जब-जब सत्ता सिस्टम के लालचों या भयों के कारण मीडिया मौन हुई या पथ से विचलित हुई, तब तब देश में हाहाकार मचा और जनता बेहाल हुई. आज फिर वही दौर दिख रहा है. ऐसे में बहुत जरूरी है कि हम सब वह कहें, वह बोलें जो अपनी आत्मा कहती है. अन्यथा रामनामी बेचने और रंडियों की दलाली करने में कोई फर्क नहीं क्योंकि पैसा तो दोनों से ही मिलता है और दोनों ही धंधा है. असल बात विचार, सरोकार, तेवर, नजरिया, आत्मसम्मान और आत्मस्वाभिमान है. जिस दिन आपने खुद को बाजार और पूंजी के हवाले कर दिया, उस दिन आत्मा तो मर ही गई. फिर आप खुद की लाश ढोकर भले इनसे उनसे मिलते रहें, यहां वहां टहलते रहें, पर कहा यही जाएगा कि ”मिस्टर एक्स, आप बेसिकली हरामजादे किस्म के दलाल हैं, पत्रकारिता में तो आप सिर्फ इसलिए हैं ताकि आप अपनी हरमजदई और दलाली को धार दे सकें”.

शायद मैं कुछ ज्यादा भावुक और आवेश में हो रहा हूं. लेकिन यह भावुकता और आवेश ही तो अपन लोगों को पत्रकारिता में ले आई. ये भावुकता और आवेश ही तो अपन लोगों को कारपोरेट और करप्ट मीडिया में देर तक टिका नहीं पाई. यह भावुकता और आवेश ही तो http://Bhadas4Media.com जैसा बेबाक पोर्टल शुरू करने को मजबूर कर गया और इस न्यू मीडिया के मंच के जरिए सच को पूरे ताकत और पूरे जोर के साथ सच कहने को बाध्य करता रहा जिसके नतीजतन अपन को और अपन जैसों को जेल थाना पुलिस कोर्ट कचहरी तक के चक्कर लगाने पड़े और अब भी यह सब क्रम जारी है. शरीर एक बार ही ठंढा होता है. जब सांसें थम जाती हैं. उसके पहले अगर न भावुकता है और न ही आवेश तो समझो जीते जी शरीर ठंढा हो गया और मर गए. मुझे याद आ रहे हैं पत्रकार जरनैल सिंह. सिख हत्याकांड को लेकर सवाल-जवाब के क्रम में जब तत्कालीन गृहमंत्री चिदंबरम ने लीपापोती भरा बयान दिया तो तुरंत जूता उछाल कर अपना प्रतिरोध दर्ज कराया. जरनैल सिंह अब किसी दैनिक जागरण जैसे धंधेबाज अखबार के मोहताज नहीं हैं. उनकी अपनी एक शख्सियत है. उन्होंने किताब लिखी, चुनाव लड़े, दुनिया भर में घूमे और सम्मान पाया. मतलब साफ है कि जब हम अपने दिल की बात सुनते हैं और उसके हिसाब से करते हैं तो भले तात्कालिक हालात मुश्किल नजर आए, पर आगे आपकी अपनी एक दुनिया, अपना व्यक्तित्व और अपनी विचारधारा होती है.

करप्ट और कार्पोरेट पत्रकारिता के इस दौर में पत्रकार की लंबाई चौड़ाई सिर्फ टीवी स्क्रीन तक पर ही दिखती है. उसके बाहर वह लोगों के दिलों में बौना है. लोगों के दिलों से गायब है. उनका कोई नामलेवा नहीं है. अरबों खरबों कमा चुके पत्रकारों से हम पत्रकारिता की उम्मीद नहीं कर सकते और यह नाउम्मीदी आज पूरी तरह दिखी मोदी के मीडिया से दिवाली मिलन समारोह में. बड़ी पूंजी वाली करप्ट और कार्पोरेट पत्रकारिता के बैनर तले कलम-मुंह चला रहे पत्रकारों से हम उम्मीद नहीं कर सकते कि वह अपनी लंबी-चौड़ी सेलरी को त्यागने का मोह खत्म कर सके. इसी कारण इनकी ‘सेल्फी पत्रकारिता’ आज दिखी मोदी के मीडिया मिलन समारोह में.

आज राजनीति जीत गई और मीडिया हार गया. आज पीआर एजेंसीज का दिमाग सफल रहा और पत्रकारिता के धुरंधर बौने नजर आए. आइए, मीडिया के आज के काले दिन पर हम सब शोक मनाएं और कुछ मिनट का मौन रखकर दलाल, धंधेबाज और सत्ता परस्त पत्रकारों की मर चुकी आत्मा को श्रद्धांजलि दे दें.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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जानो दुनिया न्यूज़ चैनल का भूतपूर्व आईएएस मालिक पत्रकारों को ओछा और दो कौड़ी का समझता है

IAS sanjay

जानो दुनिया के मालिक भूतपूर्व आईएएस अधिकारी संजय गुप्ता

Naresh Soni: अहमदाबाद से एक बेहद बुरी खबर आई कि जानो दुनिया न्यूज़ चैनल बंद हो गया है… कुछ महीनों तक मैं भी इस चैनल से जुड़ा रहा, लेकिन यहां की अव्यवस्था देखकर काफी पहले मैंने किनारा करना सही समझा.. अब जो लोग वहां रह गए, क्या आप सब उनकी मदद के लिए आगे आएंगे?

क्या कोई चैनल इस खबर को भी दिखा पाएगा.. कि कैसे एक न्यूज चैनल का आईएएस मालिक अपने रसूख के आगे पत्रकारों को इतना निर्जीव और ओछा समझने लगता है कि पहले 4-4 महीने की देरी से सैलरी देता है, और बाद में सबको जबरन ऑफिस से निकालकर ऑफिस पर ताला जड़ देता है।

शर्म करो संजय गुप्ता.. लानत है तुम पर।

जानो दुनिया में पहले काम कर चुके सभी दोस्तों से अपील है कि ज़रा संजय गुप्ता की याद में दो-दो शब्द कहें.. और उन्हें Get Well Soon का गांधीगिरी टाइप मैसेज भी जरूर दें। आप अपने संदेश नीचे दिए गए लिंक पर सीधे उन तक भी पहुंचा सकते हैं, लेकिन गुज़ारिश यही है कि संदेश की एक कॉपी यहां भी साझा करें.. जो उनसे पीड़ित है उन्हें बल मिलेगा।

संजय गुप्ता: http://sanjayrgupta.com/sanjay-gupta-news/
       https://www.facebook.com/sanjaygupta196?fref=ts

कमेंट्स

Naushad Vanvi मैं नौसाद करसनभाई वानवी…जानो दुनिया का सबसे पुराना और सबसे ज्यादा जिकने वाला एम्प्लॉइ….मि. गुप्ता ने तैनल क्यों शुरू की वो ही आज तक समझ नहीं आया मुझे….उनके पास बेस्ट स्टाफ था….नरेश सोनी…अरविन्द नाथ झा….नीरज कुमार….राजीव शर्मा उल्लास दास और कई सारे एडिटोरियल टीम….और बेस्ट टेकनिकल टीम…..कोई भी बिज़नेस एक दो दिन में पैसे कमा कर नहीं देती…. थोड़ा ध्यान देना पड़ता है….इतने अच्छे स्टाफ की कदर तो नहीं की ऊपर से अपने चैनल का भी ध्यान दिया नहीं…..जो अच्छे लोग थे वो सांच समझ कर चले गए अपने कैरियर को आगे बढ़ाने…..जो कुछ बाकी थे वो एक औऱ ट्राई में थे कि इसकी डूबती नैय्या को आगे ले जाएंगे….पर कंपनी ने उनके साथ और पुराने लोगों के कैरियर के साथ खिलवाड़ के अलावा कुछ नहीं किया…..

Khushdeep Sehgal दोस्तों, याद करिए पिछले साल हमने नवरात्र के नौ दिन कितनी मेहनत की थी…शुभ नवरात्र के नाम से ‘जानो दुनिया’ के लिए कितना बढ़िया कार्यक्रम तैयार किया था…संयोग कहिए या दुर्योग, इस बार नवरात्र में ही जानो दुनिया पर तालाबंदी का दुखद समाचार सामने आया…आखिर कब तक सहने की हद होती है…मैंने एक दो बार संजय गुप्ता से बात होने पर उन्हें देवी का संदेश समझने के लिए कहा था…वो नहीं समझे…अगर इस बार भी नहीं समझे और फिर कोई खेल करने की कोशिश की तो इतनी बददुआएं लेने पर वो कभी पनप नहीं सकेंगे…आखिर ऊपर वाले का भी कोई न्याय होता है…मेरी अब भी उनके लिए प्रार्थना है..GET WELL SOON…See

Abhishek Roy सबकुछ यहीं मिलना है…मैं ऊपरवाले से सजा कम करने की अपील करता हूं…और हां…#GetWellSoon

 

जानो दुनिया में काम कर चुके नरेश सोनी के पेसबुक वॉल से।

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