पत्रकारों ने चलाया अभियान- मजीठिया नहीं तो भाजपा को वोट नहीं

कांग्रेस औऱ सपा के समर्थन में खड़े हुए कलम के सिपाही… लखनऊ। उत्तर प्रदेश के निकाय चुनाव में इस बार पत्रकारों की नाराजगी भाजपा के लिए भारी पड़ सकती है। पत्रकारों के मजीठिया वेज बोर्ड के मामले में सुप्रीम कोर्ट के 6 माह के टाइम बाउंड फैसला आने के बाद भी उत्तर प्रदेश का श्रम विभाग और श्रम न्यायालय पत्रकारों के प्रति सौतेला व्यवहार कर रहा है। अपनी जायज मांगों को पूरा न होता देख पत्रकारों ने भाजपा सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।

वर्तमान में उत्तर प्रदेश में करीब 50 हजार पत्रकार मजीठिया वेज बोर्ड की मांग कर रहे हैं। जिनमे क़रीब 5 हजार पत्रकार मजीठिया वेज बोर्ड की मांग के चलते प्रिंट मीडिया से निकाले जा चुके हैं। और उनमें से ज्यादातर पत्रकार अब इलेट्रॉनिक मीडिया की ओर रुख कर चुके है।

कैसे हो रहा विरोध
उत्तर प्रदेश के पत्रकारों ने ‘ भाजपा हराओ, मजीठिया पाओ’ नामक व्हाट्सएप ग्रुप तैयार किया है। लगातार 24 घंटे सक्रिय होकर इस ग्रुप में भाजपा हराने की रणनीति तैयार की जा रही है। इस ग्रुप में दैनिक जागरण, अमर उजाला, हिन्दुतान, टाइम्स ऑफ इंडिया, हिन्दुस्तान और हिन्दुतान टाइम्स समेत कई बड़े अखबार के  पत्रकार सदस्य हैं।

क्या है मामला
प्रिंट मीडिया में देश भर के पत्रकारों को मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वर्ष 2011 से वेतन मिलना था। देश भर के पत्रकार अपना वाजिब मेहनताना मांगते रहे लेकिन कंपनी मालिकों का दिल आज तक नहीं पसीजा। इसमें श्रम विभाग भी पूरी तरह अखबार मालिकों के साथ खड़ा दिखा। जिस पत्रकार ने मजीठिया वेज बोर्ड की मांग की उसे या तो नौकरी से निकल दिया गया या फिर इतना परेशान किया गया कि वह स्वतः नौकरी छोड़ने को मजबूर हो गया। उत्तर प्रदेश के करीब 50 हजार पत्रकारों ने अब अपनी मजीठिया वेज बोर्ड की मांग को लेकर भाजपा के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।

वरिष्ठ पत्रकारों ने सराहा
लखनऊ समेत पूरे प्रदेश भर के पत्रकारों ने पत्रकारों की इस पहल की सराहना की है। पत्रकारों के संगठन यूपी प्रेस क्लब, जर्नलिस्ट एसोसिएशन, उपजा, मानवाधिकार प्रेस संगठन,  मजीठिया समिति आदि सभी ने एक सुर में भाजपा के इस सौतेले व्यवहार की निंदा की है।

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‘भारत समाचार’ चैनल की भविष्यवाणी सच साबित हुई, महेंद्रनाथ पांडेय बने भाजपा यूपी के प्रदेश अध्यक्ष

दो रोज पहले भारत समाचार चैनल पर एडिटर इन चीफ ब्रजेश मिश्रा के नेतृत्व में हुई एक महाबहस में बताया गया कि सबसे ज्यादा चांस महेंद्र नाथ पांडेय के भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बनने का है. इस महाबहस में वरिष्ठ पत्रकार हेमंत तिवारी ने महेंद्र नाथ पांडेय को नया अध्यक्ष बनाए जाने के पीछे बड़ा कारण बताया कि यूपी में अपनी उपेक्षा से ब्राह्मण बहुत नाराज हैं, खासकर पूर्वांचल में. लोकसभा के 2019 में होने वाले चुनाव के लिए ब्राह्मणों को अपने साथ जोड़ कर रखना भाजपा के लिए बड़ी चुनौती है. यही वजह है कि भाजपा नेतृत्व किसी ठीकठाक ब्राह्मण नेता पर दांव लगा सकता है.

भारत समाचार चैनल के एडिटर इन चीफ ब्रजेश मिश्र के नेतृत्व में हुई इस बहस का विषय था- यूपी में भाजपा की कमान किसके हाथ?. कई नामों पर विचार विमर्श और चर्चा के बाद महाबहस से यही निकल कर आया कि महेंद्र नाथ पांडेय पर भाजपा का शीर्ष नेतृत्व दांव लगाने जा रहा है. आज हुआ भी यही. सारे समीकरण ध्वस्त करते हुए भाजपा नेतृत्व ने महेन्द्र पांडेय के नाम पर मुहर लगाकर उन्हें उत्तर प्रदेश भाजपा का नया प्रदेश अघयक्ष बना दिया. महेंद्र नाथ पांडेय चंदौली के सांसद हैं. महेन्द्र पांडेय के यूपी भाजपा का नया अध्यक्ष बनने से पूर्वांचल के लोग काफी खुश हैं. गोरखपुर से सीएम और चंदौली से प्रदेश अध्यक्ष देकर पूर्वी उत्तर प्रदेश का इलाका इन दिनों राजनीति और सत्ता में छाया हुआ है.

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यूपी में बीजेपी की सियासी बेचैनी : अखिलेश, माया और राहुल मिल कर दे सकते हैं मात!

संजय सक्सेना, लखनऊ

उत्तर प्रदेश में बीजेपी लगातार जीत का परचम फहराती जा रही है। यूपी में उसकी सफलता का ग्राफ शिखर पर है, लेकिन शिखर पर पहुंच कर भी बीजेपी एक ‘शून्य’ को लेकर बेचैन नजर आ रही है। उसे चुनावी रण में हार का अंजाना सा डर सता रहा है। इस डर के पीछे खड़ी है अखिलेश-माया और राहुल की तिकड़ी, जो फिलहाल तो अलग-अलग दलों से सियासत कर रहे हैं, मगर मोदी के विजय रथ को रोकने के लिये तीनों को हाथ मिलाने से जरा भी गुरेज नहीं है। बीजेपी का डर लखनऊ से लेकर इलाहाबाद तक में साफ नअर आता है। असल में 2014 के लोकसभा चुवाव मे मिली शानदार जीत का ‘टैम्पो’ बीजेपी 2019 तक बनाये रखना चाहती है।

यह तभी हो सकता है जब बीजेपी के किसी सांसद के इस्तीफे की वजह से बीजेपी को उप-चुनाव का सामना न करना पड़ जायें। बात यहां यूपी के उप-मुख्यमंत्री और फूलपुर से सांसद केशव प्रसाद मौर्या की हो रही है। मौर्या को अगर डिप्टी सीएम बने रहना है तो छह माह के भीतर (नियुक्ति के समय से) उन्हें विधान सभा या विधान परिषद का सदस्य बनना पड़ेगा। इसके लिये सबसे पहले केशव को संासदी छोड़ना पड़ेगी। सांसदी छोड़ेगें तो जिस (फूलपुर) लोकसभा सीट का केशव प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, वहा चुनाव भी होगा और चुनाव में बीजेपी को जीत नहीं हासिल हुई तो विपक्षी ऐसा माहौल बना देंगे मानों यूपी में बीजेपी शिखर से शून्य पर पहुंच गई है। बात यहीं तक सीमित नहीं रहेगी। मोदी ने यूपी में जो चमत्कार किया था, उस पर भी सवाल खड़े होंगे? ऐसे में पूरे देश में गलत संदेश जायेगा, जिसका असर 2019 के लोकसभा चुनाव तक पर पड़ सकता है।

फूलपुर लोकसभा चुनाव के पुराने नतीजे भी बीजेपी में भय पैदा कर रहे हैं। फूलपुर संसदीय सीट से तीन बार पंडित जवाहर लाल नेहरू, दो बार विजय लक्ष्मी पंडित से लेकर पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह तक चुनाव जीत चुके हैं। 1952 से लेकर 2009 तक बीजेपी का यहां कभी खाता नहीं खुला। 2009 के लोकसभा चुनाव में तो यहां से बीजेपी को पांयवें नबर पर ही संतोष करना पड़ा था और उसे मात्र 8.12 प्रतिशत वोट ही मिले थे। यहां तो कभी राम लहर तक का असर नहीं दिखा। हॉ, 2014 के चुनाव में जरूर चमत्कारिक रूप से मोदी लहर में यह सीट बीजेपी की झोली में आ गई थी। इसी लिये यह कयास लगाये जा रहे हैं कि बीजेपी आलाकमान केशव को सासदी से इस्तीफा दिलाने की बजाये उन्हें डिप्टी सीएम के पद से इस्तीफा दिलाकर दिल्ली में कहीं समायोजित कर सकती है।

वैसे, तमाम कयासों के बीच कहा यह भी जा रहा है कि बीजेपी की चिंता बेकार की नहीं है। असल में यहां चुनाव की नौबत आती है तो गैर भाजपाई दल यहां अपना संयुक्त प्रत्याशी उतार सकती है। फूलपुर संसदीय सीट पर चुनाव की नौबत आती है तो बसपा सुप्रीमों मायावती भी विपक्ष की संयुक्त प्रत्याशी बन सकती हैं। मायावती के राज्यसभा से इस्तीफे को भी इसी से जोड़कर देखा जा रहा है। वह लोकसभा पहुंच कर मोदी को दलितों सहित सामाजिक समरसता के तमाम मुद्दों पर आमने-सामने खड़े होकर घेरना चाहती हैं, जिसका सीधी असर यूपी की भविष्य की सियासत पर पड़ेगा। कुछ लोग इससे इतर यह भी तर्क दे रहे है कि बीजेपी आलाकमान योगी को पूरी स्वतंत्रता से काम करने की छूट देने का विचार कर रही है। मगर इसके लिये वह पिछड़ा वोट बैंक को नाराज नहीं करना चाहता है। पार्टी नेतृत्व का केशव पर भरोसा और पिछड़े वर्ग से होने के नाते भी उनके दिल्ली जाने की खबरों को बल मिलता दिख रहा है।

केशव प्रसाद के भविष्य को लेकर एक-दो दिन में तस्वीर साफ हो जाएगी। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह 29 जुलाई को तीन दिवसीय प्रवास पर लखनऊ आ रहे हैं। वह अपने प्रवास के दौरान एक तरफ सरकार और संगठन के बीच समन्वय बैठाने की कोशिश करेंगे तो दूसरी तरफ 2019 के लोकसभा चुनाव के अभियान की बुनियाद भी रखेंगे। शाह पहली बार तीन दिन के प्रवास पर आ रहे है। इसके कई संकेत हैं। तीन दिन में शाह 25 बैठकें करेंगे। बताते चलें की हाल में पीएम मोदी से मुलाकात के दौरान सांसदों ने योगी के मंत्रियों की शिकायत की थी। मोदी ने इसे काफी गंभीरता से लिया थां। इसका प्रभाव भी शाह के दौरे पर दिखाई पड़ सकता है।

उधर, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के चुनाव को लेकर यही संभावना जताई जा रही है कि वह अपने संसदीय क्षेत्र गोरखपुर में ही विधानसभा की किसी सीट से चुनाव लड़ेंगे। दूसरे डिप्टी सीएम डॉ. दिनेश शर्मा को विधान परिषद भेजा जा सकता है। इस समय योगी, मौर्य और डॉ.शर्मा सहित परिवहन राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार स्वतंत्र देव सिंह और वक्फ व विज्ञान प्रौद्योगिकी राज्यमंत्री मोहसीन रजा भी विधानमंडल के किसी सदन के सदस्य नहीं है।

योगी और मौर्य की सांसदी फिलहाल उप-राष्ट्रपति चुनाव तक तो बरकरार रहेगी ही, लेकिन 19 सितंबर से पहले दोंनो को विधानमंडल के किसी सदन की सदस्यता लेनी ही पड़ेगी, लेकिन विधान सभा और विधान परिषद की मौजूदा स्थिति को देखते हुए वर्तमान सदस्यों से त्याग पत्र दिलाए बिना इन सबके समायोजन की स्थिति दिखाई नहीं दे रही। भाजपा विधायक मथुरा पाल और सपा एमएलसी बनवारी यादव के निधन के चलते हालांकि विधानसभा और विधान परिषद में एक- एक स्थान रिक्त है, पर इन सीटों की स्थिति देखते हुए यहां से मुख्यमंत्री, उप मुख्यमंत्री या राज्यमंत्रियों मंे किसी को लड़ाने की संभावना दूर- दूर तक नहीं दिखती। ऐसे में संभावना यही है कि भाजपा नई सीटें खाली कारकर इन सबका समायोजन कराएगी।

अखिलेश की चुटकी
केशव के दिल्ली भेजे जाने की चर्चा के बीच सपा अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने चुटकी लेते हुए कहा कि अभी तो तीनों मिले नहीं, फिर क्यों घबरा गए। अखिलेश ने केशव प्रसाद मौर्य का नाम लिए बगैर कहा,सुना हैं कि आप लोग किसी को दिल्ली भेज रहे है। अभी तो समझौता नहीं हुआ है फिर क्यों घबरा गए। अगर हम तीनों (सपा, बसपा व कांग्रेस) एक हो जाएं तो आप कहां ठहरोगे, यह आप समझ सकते हो।

लेखक संजय सक्सेना लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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गोरखपुर लोकसभा सीट से बीजेपी शलभ मणि त्रिपाठी को देगी टिकट!

Vikas Mishra : योगी आदित्यनाथ तो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बन गए। अब सवाल ये उठ रहा है कि गोरखपुर से सांसद कौन बनेगा। दरअसल सवाल ये उठना चाहिए था कि गोरखपुर से सांसद के उपचुनाव में बीजेपी का प्रत्याशी कौन होगा, लेकिन ये सवाल इस नाते नहीं उठ रहा, क्योंकि गोरखपुर में योगी के उत्तराधिकारी की जीत पक्की है। मेरी राय में तो बीजेपी को गोरखपुर लोकसभा सीट से शलभ मणि त्रिपाठी Shalabh Mani Tripathi को टिकट देना चाहिए। इसकी वजहें भी हैं।

शलभ योगी की तरह तेज तर्रार हैं, जरूरत पड़ने पर कड़क तो जरूरत पड़ने पर नरम हैं। पत्रकारों के बीच प्रचलित तमाम व्यसनों से शलभ कोसों दूर हैं। योगी और शलभ के बीच उम्र का फासला भी बहुत ज्यादा नहीं होगा, शलभ तीन-चार साल छोटे होंगे। योगी गोरखपुर के युवा सांसद रहे तो गोरखपुर को युवा सांसद ही मिलना चाहिए। शलभ मणि नेटवर्क 18 में एक दशक से ज्यादा वक्त तक उत्तर प्रदेश के प्रभारी रहे हैं। पूरे प्रदेश को जानते हैं। गोरखपुर के रहने वाले हैं, तो गोरखपुर को क्या चाहिए, उसे अच्छी तरह समझते हैं। उच्च शिक्षा प्राप्त हैं।

हाल ही में शलभ ने पत्रकारिता की पारी घोषित करके सियासत की दुनिया में नई पारी बीजेपी के साथ शुरू की है। इतिहास गवाह है कि तमाम पत्रकार अच्छे राजनेता साबित हुए हैं। अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर एमजे अकबर तक पत्रकारों के अच्छे राजनेता बनने की नजीर भी है। इसीलिए मेरी नजर में गोरखपुर लोकसभा सीट से शलभ मणि त्रिपाठी बेहतरीन उम्मीदवार हैं।

शलभ को मैं व्यक्तिगत रूप से भी जानता हूं। वो ऐसी जगह, ऐसे पद-पोजीशन में रहे, जहां दिमाग खराब हो जाने की गुंजाइश बहुत ज्यादा होती है, लेकिन शलभ हमेशा वैसे बने रहे, जैसे वो 12 साल पहले थे। उतने ही सभ्य, उतने ही विनम्र, उतने ही सौम्य और चेहरे पर उतनी ही मुस्कान। बड़ों को सम्मान, छोटों को स्नेह और हमउम्रों को सहयोग देने में शलभ ने कभी कोताही नहीं की। इसी नाते मेरी नजर में शलभ गोरखपुर से सांसद बनने के लिए सर्वथा योग्य हैं। गोरखपुर और आसपास के लोगों से मैं जानना चाहता हूं कि सांसदी के लिए शलभ मणि की उम्मीदवारी की दावेदारी पर उनकी क्या राय है..?

आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत और गोरखपुर के निवासी विकास मिश्र की एफबी वॉल से. उपरोक्त पोस्ट पर शलभ मणि त्रिपाठी का जो कमेंट आया है, वह इस प्रकार है…

Shalabh Mani Tripathi बहुत देर तक सोचता रहा लिखूँ या ना लिखूँ, कुछ कहूँ या ना कहूँ, पर लगा कि विकास भइया ने इतनी बडी बहस छेड़ दी है तो ख़ामोश रहना भी मुनासिब नहीं होगा……… विकास भइया आपकी इस पोस्ट के एक एक शब्द से मेरे लिए आपका अथाह प्यार टपक रहा है, और ऐसा ही प्यार-लगाव उन सभी दोस्तों की प्रतिक्रियाओं में भी साफ़ दिख रहा है जो विकास भइया की इस पोस्ट के पक्षधर हैं……मैं आप सबके प्यार से सच में अभिभूत हूं, पर सच तो यही है कि गोरखपुर की जिस लोकसभा सीट की गरिमा आदरणीय योगी जी ने देश और दुनिया में बढ़ाई है, मैं ख़ुद को उस सीट के क़ाबिल नहीं पाता, मुझे अभी बहुत काम करना है, बहुत कुछ सीखना है, मुझसे ज़्यादा क़ाबिल, कर्मठ और बेहतर लोग हैं गोरखपुर में इस सीट के लायक, मैं सौभाग्यशाली हूँ कि आप सबका इतना स्नेह और भरोसा है मुझ पर, और मेरा सबसे बड़ा दायित्व है इसे हमेशा बरक़रार रखना, इसीलिए आप सभी का हृदय से आभार जताते हुए उन सभी को प्रणाम करता हूँ जिन्होंने मेरा हौसला बढ़ाया या फिर मेरी कमियाँ बता कर भी, खुद को और बेहतर बनाने की मेरी मुहिम में अपना महती योगदान दिया, आप सबके प्यार का हमेशा आकांक्षी रहूंगा, धन्यवाद. 

Vikas Mishra मैंने इसी सौम्यता का जिक्र अपनी पोस्ट में किया था Shalabh Mani Tripathi । आज जहां तुम हो, बेशक वहां से वैसा दिखता होगा, जहां की बात कर रहे हो, लेकिन मैं जहां पर हूं, वहां से देखता हूं तो वैसा दिखता है, जैसा मैंने अपनी पोस्ट में लिखा है। मैं सिर्फ ये कहना चाहता हूं कि जैसे टीवी 18 ग्रुप ने तुम्हारी पूरी प्रतिभा का उपयोग किया, बीजेपी भी तुम्हारे पूरे टैलेंट, कमिटमेंट और उत्तर प्रदेश में डेढ़ दशक की पत्रकारिता के अनुभव का पूरा इस्तेमाल करे। मैं बतौर पत्रकार किसी पार्टी का पक्षधर नहीं हो सकता, लेकिन व्यक्तिगत रूप से जो मेरे करीब है, उसकी उन्नति तो हमेशा चाहता हूं। मुझे यकीन है कि जो भी जिम्मेदारी तुम्हें मिलेगी, तुम साबित करोगे कि इसके लिए तुमसे बेहतर कोई और नहीं था।

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भाजपा : वैचारिक हीनग्रंथि से मुक्ति का समय

उत्तर प्रदेश अरसे बाद एक ऐसे मुख्यमंत्री से रूबरू है, जिसे राजनीति के मैदान में बहुत गंभीरता से नहीं लिया जा रहा था। उनके बारे में यह ख्यात था कि वे एक खास वर्ग की राजनीति करते हैं और भारतीय जनता पार्टी भी उनकी राजनीतिक शैली से पूरी तरह सहमत नहीं है। लेकिन उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में भारी विजय के बाद भाजपा ने जिस तरह का भरोसा जताते हुए राज्य का ताज योगी आदित्यनाथ को पहनाया है, उससे पता चलता है कि ‘अपनी राजनीति’ के प्रति भाजपा का आत्मदैन्य कम हो रहा है।

भाजपा का आज तक का ट्रैक हिंदुत्व का वैचारिक और राजनीतिक इस्तेमाल कर सत्ता में आने का रहा है। देश की राजनीति में चल रहे विमर्श में भाजपा बड़ी चतुराई से इस कार्ड का इस्तेमाल तो करती थी, किंतु उसके नेतृत्व में इसे लेकर एक हिचक बनी रहती थी। वो हिचक अटल जी से लेकर आडवानी तक हर दौर में दिखी है। भाजपा का हर नेता सत्ता पाने के बाद यह साबित करने में लगा रहता है वह अन्य दलों के नेताओं के कम सेकुलर नहीं है।

उत्तर प्रदेश की ‘आदित्यनाथ परिघटना’ दरअसल भाजपा की वैचारिक हीनग्रंथि से मुक्ति को स्थापित करती नजर आती है। नरेंद्र मोदी के राज्यारोहण के बाद योगी आदित्यनाथ का उदय भारतीय राजनीति में एक अलग किस्म की राजनीति की स्वीकृति का प्रतीक है। एक धर्मप्राण देश में धार्मिक प्रतीकों, भगवा रंग, सन्यासियों के प्रति जैसी विरक्ति मुख्यधारा की राजनीति में दिखती थी, वह अन्यत्र दुर्लभ है। भाजपा जैसे दल भी इस सेकुलर विकार से कम ग्रस्त न थे। धर्म और धर्माचार्यों का इस्तेमाल, धार्मिक आस्था का दोहन और सत्ता पाते ही सभी धार्मिक प्रतीकों से मुक्ति लेकर सारी राजनीति सिर्फ तुष्टीकरण में लग जाती थी। प्रधानमंत्रियों समेत जाने कितने सत्ताधीशों के ताज जामा मस्जिद में झुके होगें, लेकिन हिंदुत्व के प्रति उनकी हिचक निरंतर थी। 

यह भी कम आश्चर्यजनक नहीं की एक समय में दीनदयाल जी उदार थे, तो अटलजी और बलराज मधोक अपनी वक्रता के चलते उग्र नेता माने जाते थे। अटलजी का दौर आया तो लालकृष्ण आडवाणी उग्र कहे जाने लगे, फिर एक समय ऐसा भी आया जब आडवानी उदार हो गए और नरेंद्र मोदी उग्र मान जाने लगे। आज की व्याख्याएं सुनें- नरेंद्र मोदी उदार हो गए हैं और योगी आदित्यनाथ उग्र  माने जाने लगे हैं। यह मीडिया, बौद्धिकों की अपनी रोज बनाई जाती व्याख्याएं हैं। लेकिन सच यह है कि अटल, मधोक, आडवानी, मोदी या आदित्यनाथ कोई अलग-अलग लोग नहीं है। एक विचार के प्रति समर्पित राष्ट्रनायकों की सूची है यह। इसमें कोई कम जा ज्यादा उदार या कठोर नहीं है। किंतु भारतीय राजनीति का विमर्श  ऐसा है जिसमें वास्तविकता से अधिक ड्रामे पर भरोसा है। भारतीय राजनेता की मजबूरी है कि वह टोपी पहने, रोजा भले न रखे किंतु इफ्तार की दावतें दे। आप ध्यान दें सरकारी स्तर पर यह प्रहसन लंबे समय से जारी है। भाजपा भी इसी राजनीतिक क्षेत्र में काम करती है। उसमें भी इस तरह के रोग हैं। वह भी राष्ट्रनीति के साथ थोड़े तुष्टिकरण को गलत नहीं मानती। जबकि उसका अपना नारा रहा है सबको न्याय, तुष्टिकरण किसी का नहीं। उसका एक नारा यह भी रहा है-“राम, रोटी और इंसाफ। ”

लंबे समय के बाद भाजपा में अपनी वैचारिक लाइन को लेकर गर्व का बोध दिख रहा है। असरे बाद वे भारतीय राजनीति के सेकुलर संक्रमण से मुक्त होकर अपनी वैचारिक भूमि पर गरिमा के साथ खड़े दिख रहे हैं। समझौतों और आत्मसमर्पण की मुद्राओं के बजाए उनमें अपनी वैचारिक भूमि के प्रति हीनताग्रंथि के भाव कम हुए हैं। अब वे अन्य दलों की नकल के बजाए एक वैचारिक लाइन लेते हुए दिख रहे हैं। दिखावटी सेकुलरिज्म के बजाए वास्तविक राष्ट्रीयता के उनमें दर्शन हो रहे हैं। मोदी जब एक सौ पचीस करोड़ हिंदुस्तानियों की बात करते हैं तो बात अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक से ऊपर चली जाती है। यहां देश सम्मानित होता है, एक नई राजनीति का प्रारंभ दिखता है। एक भगवाधारी सन्यासी जब मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठता है तो वह एक नया संदेश देता है। वह संदेश त्याग का है, परिवारवाद के विरोध का है, तुष्टिकरण के विरोध का है, सबको न्याय का है।

आजादी के बाद के सत्तर सालों में देश की राजनीति का विमर्श भारतीयता और उसकी जड़ों की तरफ लौटने के बजाए घोर पश्चिमी और वामपंथी रह गया था। जबकि बेहतर होता कि आजादी के बाद हम अपनी ज्ञान परंपरा की और लौटते और अपनी जड़ों को मजबूत बनाते। किंतु सत्ता,शिक्षा, समाज और राजनीति में हमने पश्चिमी तो, कहीं वामपंथी विचारों के आधार पर चीजें खड़ी कीं। इसके कारण हमारा अपने समाज से ही रिश्ता कटता चला गया। सत्ता और जनता की दूरी और बढ़ गयी। सत्ता दाता बन बैठी और जनता याचक।  सेवक मालिक बन गए। ऐसे में लोकतंत्र एक छद्म लोकतंत्र बन गया। यह लोकतंत्र की विफलता ही है कि हम सत्तर साल के बाद सड़कें बना रहे हैं। यह लोकतंत्र की विफलता ही है कि हमारे अपने नौजवानों ने भारतीय राज्य के खिलाफ बंदूकें उठा रखी हैं। लोकतंत्र की विफलता की ये कहानियां सर्वत्र बिखरी पड़ी हैं। राजनीतिक तंत्र के प्रति उठा भरोसा भी साधारण नहीं है।

बावजूद इसके 2014 के लोकसभा चुनाव के परिणाम एक उम्मीद का अवतरण भी हैं। वे आशाओं, उम्मीदों से उपजे परिणाम हैं। नरेंद्र मोदी, आदित्यनाथ इन्हीं उम्मीदों  के चेहरे हैं। दोनों अंग्रेजी नहीं बोलते। दोनों जन-मन-गण के प्रतिनिधि है। यह भारतीय राजनीति का बदलता हुआ चेहरा है। क्या सच में भारत खुद को पहचान रहा है ? वह जातियों, पंथों, क्षेत्रों की पहचान से अलग एक बड़ी पहचान से जुड़ रहा है- वह पहचान है भारतीय होना, राष्ट्रीय होना। एक समय में राजनीति हमें नाउम्मीद करती हुयी नजर आती थी। बदले समय में वह उम्मीद जगा रही है। कुछ चेहरे ऐसे हैं जो भरोसा जगाते हैं। एक आकांक्षावान भारत बनता हुआ दिखता है। यह आकांक्षाएं राजनीति दलों के एजेंडे से जुड़ पाएं तो देश जल्दी और बेहतर बनेगा। राजनीतिक विमर्श और जनविमर्श को साथ लाने की कवायद हमें करनी ही होगी। जल्दी बहुत जल्दी। यह जितना और जितना जल्दी होगा भारत अपने भाग्य पर इठलाता दिखेगा।

(लेखक संजय द्विवेदी राजनीतिक विश्वेषक हैं)

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लखनऊ के पत्रकार कबाब और रोगन जोश खाते थे इसलिए पांच कालीदास मार्ग का शुद्धीकरण जरूरी!

Ambrish Kumar : लोगों को पता नहीं होगा अखिलेश यादव पांच कालीदास में नहीं रहते थे. मायावती रहती थीं. पर दोनों के दौर में पत्रकारों के चक्कर में प्रेस कांफ्रेंस के बाद खाने में कई बार कबाब से लेकर रोगन जोश तक परोसा जाता था. ऐसे में किसी संन्यासी के प्रवेश से पहले शुद्धिकरण तो जरूरी है. शम्भुनाथ शुक्ल का सुझाव भी ठीक है कि आसपास के सभी रिहाइसी इलाकों को गोबर और गोमूत्र से शुद्ध किया जाना चाहिए. वैसे सारे अतिथि गृह भी इसमें शामिल किये जाएं.

यूपी के वरिष्ठ पत्रकार अंबरीश कुमार की एफबी वॉल से. उपरोक्त स्टेटस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं…

Amitaabh Srivastava मांसाहार के बाद शुद्धिकरण वाले तर्क से तो चौक अमीनाबाद नखास और अकबरी गेट जैसी जगहों पर गंगाजल के टैंकर रोज़ाना भिजवाने पड़ेंगे कई महीनों तक। हालांकि मुख्यमंत्री जी के निवास से ये सब दूर हैं लेकिन फिर भी माहौल में शुद्धता, साफ सफाई तो रहनी ही चाहिए। टुंडे कबाबी के यहां अब शायद करमकल्ले की टिकिया मिलने लगे शुद्धिकरण के inagural offer के तौर पर।

Pavan Kumar Yadav Sir JI a Jo bjp ke lakho karykarta hai Jo meet bhakosate hai kya unka bhi shudhi karan hoga

Ambrish Kumar व्यापक शुद्धिकरण कार्यक्रम हेतु मीडिया के वरिष्ठ पत्रकारों की मदद ली जानी चाहिए Shambhunath Nath

Shambhunath Nath अब अपन तो अदना-से पत्रकार। न लीपने के न पोतने के। और यूँ भी मैं तो प्याज़-लाहशुन तक नहीं खाता सो अपन क्या कहें।

Ambrish Kumar आप संपादक रहे हैं, इस समय तो गोरखपुर के स्टिंगर भी प्रभावशाली माने जा रहे हैं. अपने वाले ने भी पूछा था- भाई साहब,महाराज से कुछ कहना हो तो बताएं. दस साल से ज्यादा का साथ है.

Amitaabh Srivastava लखनऊ के खान पान में तो वैसे भी इस तरह के व्यंजनों का चलन रहा है जो होते शाकाहारी हैं लेकिन उनका ज़ायका मांसाहार को भी मात करता है. मिसाल के तौर पर ज़मीकंद और कटहल के कबाब – कई बार गोश्त से फर्क बताना मुश्किल हो सकता है. अब्दुल हलीम शहर की किताब ‘गुजिश्ता लखनऊ’ में लखनऊ के दिलचस्प खान पान का विस्तार से ज़िक्र मिलता है. राज्य सरकार के संस्कृति विभाग को नयी सरकार और उसके मुखिया को ये सब भी बताना चाहिए. आखिरकार संस्कृति कुल मिला कर राजनीति का ही हिस्सा है.

Deepu Naseer मुलायम शाकाहारी हैं, अखिलेश भी हैं क्या? अटल जी नॉनवेज के शौक़ीन थे, मोदी शाक़ाहारी हैं.. 7RCR का शुद्धिकरण हुआ था क्या?

Shriram Sen घृणा पाप से करो पापी से नही

Sushil Kaul आपने जानकारी दी तो पता चला कि बहन मायावती जी पांच कालीदास मार्ग में रहतीं, हम भी जब अपने नये मकान मे हमने भी वही किया था, जो योगी जी कर रहे, आपकी जानकारी से शुद्धीकरण का महत्त्व अब समझ आ रहा है। हाँ एक बात है, पत्रकार जो शाकाहारी के साथ-साथ मांसाहारी हैं, उनके लिए अलग भवन की व्यवस्था करनी पड़ेगी।

Santosh Singh भाई उनका घर है जो मर्जी करें दूसरों को क्या?

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नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश में अपने लिए एक भस्मासुर चुन लिया है : दयानंद पांडेय

Dayanand Pandey : जो लोग महंथ आदित्यनाथ को जानते हैं , वह जानते हैं कि नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश में अपने लिए एक भस्मासुर चुन लिया है।

Nadim S. Akhter : उमा भारती से योगी आदित्यनाथ की तुलना ठीक नहीं। उमा जी बीजेपी की त्रिमूर्ति की प्रिय थीं, मंदिर आंदोलन से जुड़ी थीं और तब बीजेपी सत्ता में आने के लिए संघर्ष कर रही थी। उनका बीजेपी से रूठने-मनाने का दिल वाला रिश्ता है। उन्होंने सार्वजनिक रूप से अपने चरम पर आसीन आडवाणी जी का सार्वजनिक तिरस्कार किया, बीजेपी से अलग होकर अपनी पार्टी बनाई, अपनी जिद में थका देने वाली पदयात्रा की, फिर पार्टी में लौटीं और आज केंद्र में मंत्री हैं।

योगी आदित्यनाथ दूसरी मिट्टी के बने हैं। उमा जी का युग और था, ये युग कुछ और है। और मुझे ये कहने में तनिक भी संकोच नहीं कि योगी आदित्यनाथ, अखिलेश यादव से अच्छा यूपी चला के दिखा देंगे। मुज़फ्फरनगर अखिलेश की सरपरस्ती में ही हुआ था और बाबरी मस्जिद कांग्रेसी नरसिम्हा राव के शासन में गिराई गई थी।

Yusuf Ansari : योगी आदित्यनाथ को यूपी का मुख्यमंत्री बनाया जाना चुनावी नतीजों के बाद दिए गए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण में कही गई बाते से मेल नहीं खाता। प्रधानमंत्री ने कहा था जब पेड़ फलदार हो जाता है तो वो झुक जाता है। अब भाजपा के नरम होने का वक्त आ गया है। लगता है कि 325 फूल खिलने के बाद पेड़ और तन कर खड़ा हो गया है। इसका दूसरा पहलू ये है कि मोदी ने दूर की कौड़ी चली है।

योगी अगर सत्ता से बाहर रहते तो अपने हिंदुत्व के एजेंडे को लेकर आए दिन बवाल मचा सकते थे। लिहाज़ा मोदी ने योगी को सत्ता की कमान देकर इस फायर ब्रांड नेता को संविधान और कानून के दायरे में बांध दिया है। मोदी ने योगी को “सबका साथ, सबका विकास” का अपना एजेंडा लागू करके दिखाने की बड़ी चुनौती दे दी है। देश का प्रधानमंत्री हो या प्रदेश का मुख्यमंत्री काम सभी को संविधान के दायरे में ही रह कर करना है। लिहाजा योगी के मुख्यमंत्री बनने पर किसी को डरना चाहिए।

अभी तो योगी को नेता चुना गया है। अभी तो शपथ होगी। सरकरी का एजेंडा सामने आएगा। तब कहीं जाकर पता चलेगा कि मोदी के चहेते योगी सचमुच विकास के रास्ते पर आगे बढ़ेंगे या फिर सांप्रदायिक ताक़ते विकास के चोले में छिप कर यूपी को ठीक उसी तरह विनाश के रास्ते पर ले जाएंगी जैसे तालिबानी सोच ने अफगानिस्तान और पाकिस्तान को बर्बाद करके दिया है। आखिर मोदी जी ने खुद कहा है कि सरकार बनती भले ही बहुमत से हो लेकिन चलती सर्वमत से है। ये देखना दिलचस्प होगा कि प्रचंड बहुमत वाली इस सरकार के फायरब्रांड मुखिया सर्वमत कैसे बनाते है।

पत्रकार त्रयी दयानंद पांडेय, नदीम एस. अख्तर और युसूफ अंसारी की एफबी वॉल से.

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पत्रकार पुष्य मित्र ने योगी आदित्यनाथ की तुलना शहाबुद्दीन से कर डाली

Pushya Mitra : दिलचस्प है कि कुछ महीने पहले कुछ लोग शहाबुद्दीन की तारीफ जिस अंदाज में करते थे, आज कुछ दूसरे लोग योगी आदित्यनाथ की तारीफ उसी अंदाज में कर रहे हैं। गुंडई से किसी को परहेज नहीं है, बस गुंडा अपना होना चाहिये।

बिहार में प्रभात खबर अखबार में वरिष्ठ पद पर कार्यरत पत्रकार पुष्य मित्र के उपरोक्त एफबी पोस्ट पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं….

Chitra Agrawal : आप शहाबुद्दीन और आदित्यनाथ की तुलना कैसे कर सकते हैं? और गुंडा जैसे शब्द? दोनों में कोई समानता, कोई तुलना नहीं। हां हिन्दुत्ववाद के मुद्दे पर आप उसे नापसंद कर सकते हैं लेकिन इसका यह अर्थ कतई नहीं कि उन्हें शहाबुद्दीन के साथ खड़ा कर दिया जाए। शहाबुद्दीन के कारनामों के बारे में तो खुद आपने इतना लिखा है लेकिन योगी आदित्यनाथ का एक भी ऐसा काम नहीं है। हां यह ज़रूर है कि वो अपने फायरी विचारों के कारण कट्टरवादी नेता समझे जाते हैं लेकिन आजतक एक भी दंगे करवाने, लोगों के साथ बुरा करने या किसी क्राइम में .योगी आदित्यनाथ का नाम नहीं आया है… और गुंडा अपना होना चाहिए…कैसी भाषा है यह? सच में… क्या आपको ऐसा वाकई लगता है…। दरअसल दूसरों के विचारों, पसंद, नापसंद के प्रति खुलापन होना चाहिए। आप के विचार आपके अपने हैं लेकिन दूसरों के भी अपने स्वतंत्र विचार हैं, अगर उनका आपसे इत्तिफाक नहीं है तो इसका मतलब यह कतई नहीं है कि आप उसे जज कर सकते हैं या उसकी पसंद को गुंडे का नाम दे सकते हैं।

Pushya Mitra मेरी नजर में दोनों गुंडे हैं। इनका देश में और मानवता की भावना में कोई भरोसा नहीं है।

Chitra Agrawal फिर आपमें और उन न्यूज़ चैनल के अन्य पत्रकारों में क्या फर्क है जो अपनी राय के आधार पर लोगों को जज करते हैं और बिना सही बात जाने उनको प्री कन्सीव्ड नोशन्स के आधार पर कतारों में खड़ा कर देते हैं।

Pushya Mitra आप सोच सकती हैं। मगर मेरे लिये अपना सच ही महत्वपूर्ण है। मैं गलत को गलत कहना कभी नहीं छोड़ूंगा

Chitra Agrawal एक बात और जैसा कि आपने खुद अपनी पोस्ट में मोदी जी के लिए लिखा था कि जब तक मोदी के विरोधी रहेंगे वो और मज़बूत, और ज्यादा मज़बूत होंगे, ज़रा सोचिए अब वैसा ही कुछ आप योगी आदित्यनाथ के साथ कर रहे हैं। लोग उन्हें जितना नीचे गिराएंगे, दरअसल में उनकी छवि उतनी ही करिश्माई बनेगी।

Pushya Mitra इस चक्कर में मैं एक दंगाई मानसिकता के व्यक्ति का समर्थन नहीं कर सकता।

Jai Kumar Singh पुष्य मित्रा जी आपके शब्दों में अजीब सी बू आती है! एक पत्रकार के लिए अशोभनीय है। योगी आदित्यनाथ जी को जनता ने बहुमत से चुनाव किया है। आपकी गाली योगी के लिए नहीं वरन जनता को है। खास विचारधारा के साथ पत्रकारिता छोड़ दें। धन्यवाद!

हिमांशु कुमार घिल्डियाल ऐसे तथाकथित बुद्धिजीवी पूर्वाग्रही पत्रकार ही पत्रकारिता को बदनाम करते हैं। यही कारण है कि सोशल मीडिया के आने के बाद इनकी प्रासांगिकता और विश्वसनीयता ही ख़त्म हो गई है तथा इन पर आम आदमी भरोसा ही नहीं कर पाता है। ये सही खबर को छुपा कर, छापने की कीमत मांग कर,तोड़ मरोड़ कर तथा एक निश्चित एजेंडे पर चलकर अपने ऐशो आराम का सामान जुटाते हैं। अब तक की सभी सरकारों ने इस तथाकथित चौथे स्तम्भ को रीढ़ विहीन कर दिया है।

Ajay KS पुष्यमित्र जी आज आपका पाला पक्के टाइप के भक्तों से पड़ा है। बिरहिनि के खोंता में हाथ दाल दिए हैं।  फिर भी डंटे रहिये ।

Sumit Choudhary आपको योगी को समझने के लिए गोरखपुर जाना पड़ेगा। कहीं आप भी योगी को वैसा ही तो नहीं समझ रहे जैसा मोदी को गुजरात दंगे के बाद समझा गया था।

Anand Sharma कहीँ आप त्वरित अतिवादी प्रतिक्रिया तो नहीँ दे रहे शाहाबुद्दीन और योगी को एक प्लेटफ़ॉर्म पर खड़ा कर……मैं योगी को सम्पूर्णता से जानना चाहता हूँ

Pushya Mitra आप एक बुरे व्यक्ति में अच्छाई तलाशना चाह रहे हैं। आप योगी को इसलिये मौका देना चाहते हैं क्योंकि अगर वह बुरा भी हुआ तो आपका हमारा नुकसान नहीं करेगा।

Jai Kumar Singh क्या बुराई है बतायें। हिंदू होना गुनाह है और हिंदुत्व की बातें अपराध है ? उन्होंने कब और कहां दूसरे धर्म के लोगों को गाली दी है?

Praveen Jha योगी-ओवैसी का भेद निकालिए। शहाबुद्दीन जी तो जेल में ही रहते हैं।

Pushya Mitra मैं साम्राज्य के मामले में कह रहा हूँ। बाकी योगी की तुलना छोटे ओबैसी से हो सकती है। बड़ा भाई पढ़ा-लिखा समझदार है।

Praveen Jha यह अवश्यंभावी था। इसमें बित्ता भी शक नहीं था। पाँच बार लगातार सांसद रहे। यूपी में उनसे बड़े कद का कोई नेता नहीं। हिंदुत्व एजेंडा के पूरे भारतवर्ष में सबसे बड़े नेता हैं योगी (आडवाणी जी और मोदीजी के बाद)। इतनी बड़ी बहुमत में किसी ऐरू-गैरू के चुनाव का मतलब ही नहीं।  बाकी, योगीजी का एक और पहलू है, उस पर फिर कभी। वो मुलायम जी के खास रहे हैं, और बैकग्राउंड इमेज अलग रखी है। बड़े टैक्टिकल आदमी हैं। मुझे पक्का यकीन था, उनके नतीजे के बाद वाले दो मिनट के भाषण से ही।

Shubam Kuamar Rai योगी और शहाबुद्यीन की तुलना करना मानसिक दिवालीएपन की निशानी है

Dharmendra Pandey योगी जनता की चुनी हुई सरकार के सदस्य और जननेता हैं तथा लोकतंत्र की अपनी मर्यादा है। शहाबुद्दीन अदालत द्वारा दोष सिद्ध व्यक्ति हैं पर योगी के साथ ऐसा कुछ नहीं है।  दोष देने वाले तो उच्चतम न्यायालय द्वारा बरी मोदी को भी बहुत कुछ कहते हैं पर एक पत्रकार की हैसियत से बस इतना ही कहना चाहूंगा कि जब तक व्यक्ति न्यायपालिका द्वारा दोषी न पाया जाए तब तक खुद ही व्यक्तिगत आकलन के आधार पर कोई कटु शब्द प्रयोग न करें। यही नियम राष्ट्रदोह के आरोप में गिरफ्तार किए जाने वाले व्यक्ति पर भी लागू होता है, जबकि उस गुनाह पर खिलाफ का अदालती फैसला न आया हो।

Indu Bhushan शाहबुद्दीन से योगी की तुलना करके आपने हाईट ही कर दिया। योगी पर आज आपका लगातार कई पोस्ट पढ़कर आपकी मानसिक स्थिति के बारे में ही सोचता रहा हूँ। सर पानी पीजिये और आराम कीजिये।

Abhay Dubey तिहाड की बैरक और लखनऊ की गद्दी मे कुछ तो अंतर होगा?

Satyendra Singh आपके तर्क के हिसाब से भगवान श्री राम भी और देश के सीमा प्रहरी या सैनिक भी “गुंडो” की श्रेणी मे आयेंगे, क्योकि वे भी नर संहारक हैं! धन्य हैं आपकी मानसिकता और पत्रकारिता ।

Naresh Jha बेटा बिहार में रहते रहते लालू वाला बुद्धि हो गया है का। कुछ दिन आराम क्यों नहीं कर लेते। पत्रकार का कमी है क्या। एक से एक नमूने हैं।

Girish Pandey आप जैसे गंभीर आदमी को सुनी सनाई बात पर टिप्पड़ी नही करनी चाहिए।

Navin Kr Roy आप पत्रकार हो सकते हो पर यह जरूरी नही कि आप बुद्धिजीवी भी हो। जैसे कोई डिग्रीधारी हो सकता है,पर जरूरी नही कि शिक्षित भी हो। पता नहीं क्यों अधिकाँश पत्रकार अपने आप को राष्ट्रीय कर्णधार क्यों समझने लगते हैं। अखबारों में खबर लिखो भाई, तुम्हारी सोच और ज्ञान की सीमा इससे अधिक नही है। जैसे ही तुमने शहाबुद्दीन से योगी जी की तुलना की, वैसे ही तुम्हारे ज्ञान की सीमा का पता चल गया।

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योगी आदित्यनाथ को उदय प्रकाश की कई कहानियां और कविताएं याद हैं!

Satyendra PS : महंत आदित्यनाथ। शपथ ग्रहण के बाद यूपी के मुख्यमंत्री हो जाएंगे। यूपी के मुख्यमंत्री से मतलब मिनी प्रधानमंत्री। नरेंद्र मोदी द्वारा महंत को मुख्यमंत्री बनाना वास्तव में बहुत साहसिक कार्य है। इस साहस के लिए कॉमरेड मोदी को लाल सलाम। आदित्यनाथ उस दौर के हैं जो पीढ़ी Uday Prakash की पीली छतरी वाली लड़की पढ़कर बढ़ रही थी। मेरे लिए तो खुशी की बात है कि आदित्यनाथ भी उदय प्रकाश के न सिर्फ अच्छे पाठक रहे हैं, बल्कि उनको कई कहानियां और कविताएं याद थीं। साथ ही यह भी खुशी है कि लंबे समय से शीर्ष राजनीति से वंचित गोरखपुर को फिर एक शीर्ष नेता मिला है। उम्मीद की जाए कि उस इलाके की तकदीर और तस्वीर बदलेगी।

उदय प्रकाश जब गोरखपुर में अपने रिश्तेदार की याद में आयोजित कार्यक्रम में गए थे और आदित्यनाथ के साथ मंच साझा किया था तो उस समय बड़ा बवाल हुआ था। आदित्यनाथ ने उदय प्रकाश की कहानियों व कविताओं का कई मौकों पर उल्लेख किया। इसके चलते उदय प्रकाश को दक्षिणपंथी और जाने क्या क्या घोषित किया गया था। कथित और असली तमाम मतलब ढाई सौ से ऊपर वामपंथियों ने हस्ताक्षर अभियान चलाया था कि उन्होंने कैसे योगी के साथ मंच साझा किया? उदय प्रकाश को खूब गरियाया गया…

है न मजेदार!!

महंत आदित्यनाथ को दक्खिन टोले के धुर आलोचक की ओर से ढेरों शुभकामनाएं। उम्मीद है कि वह पूर्वांचल की गरीबी मिटाने और पूरे प्रदेश को एक बेहतर मुकाम देने में सफल होंगे और भाजपा को मिले प्रचंड जनादेश का लाभ उठाते हुए जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरेंगे।

बिजनेस स्टैंडर्ड हिंदी, दिल्ली में कार्यरत पत्रकार सत्येंद्र प्रताप सिंह की एफबी वॉल से. इस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं…

Saurabh Pandey उसी ‘बदनामी’ के कारण सम्मान वापसी का कु/सु चक्र रचा और चला गया था। उसे भी नयनतारा हथिया ली थी..

Satyendra PS जिन लोगों ने हस्ताक्षर अभियान चलाए थे, वह साहित्य क्षेत्र की एक गिरोह है. उनको कोई गलतफहमी नहीं थी. उदय़ जी ने कलबुर्गी की हत्या के विरोध में साहित्य अकादमी लौटाया तब भी बाकायदा इस गिरोह के कुछ सदस्यों ने अभियान चलाता था। लेकिन जो लोग गिरोहबंदी से हटकर उदय जी को व्यक्तिगत जानते हैं, वह उनकी भावनाओं को समझते हैं.

Saurabh Pandey सम्मान लौटाने वाले पहले लेखक कवि उदय प्रकाश ही थे। चाहे जिस नाम से लौटाए हों। वो योगी के साथ मंच साझा करने का प्रायश्चित ही था। बाद में ये दूसरे रूप में प्रचार पा गया

Satyendra PS मुझे उस समय का आपका स्टैंड नहीं पता था Saurabh Pandey जी। अभी भी मैं गैर साहित्यिक आदमी हूं. साहित्य थोड़ा बहुत समझ मे आ भी जाए तो कविता फविता तो बिल्कुल समझ में नहीं आती है। बकिया हमें आज तक समझ में न आया कि उदय जी का अपने रिश्तेदार की बरखी में जाना बुरा था, या योगी आदित्यनाथ वहां आए थे, वह बुरा था। या आदित्यनाथ का उदय प्रकाश के लेखन का प्रशंसक होना वामपंथी बंधुओं को नागवार गुजरा था. साहित्यकार और वामपंथी लोगों को दर्द किधर से उठा था. यह आज तक समझ में न आया.

Satyendra PS मने हम अपने वामपंथी साथियों से जानना चाहेंगे कि पुरस्कार लौटाना अगर उदय जी का प्रायश्चित था तो वह पूरी तरह पाप मुक्त हुए हैं या उनको काशी ले जाया जाए। अब वामपंथी भाइयों के इतना चिढ़ने और दक्खिन टोला वाले भाइयो के उदय प्रकाश का प्रशंसक होने से कुछ कुछ हम्मै भी संदेह होता है. दक्खिन टोला वाले तमाम लोग उदय प्रकाश की कहानियों के प्रशंसक हैं. एक रोज मैंने कहा कि आप अपने किताब के पहले पेज पर डिस्क्लेमर छपवाइए कि दक्खिन टोले वाले लोग इस किताब को न पढ़ें, लेकिन उदय जी कहते हैं कि किसी को पढ़ने से रोकना कहां का न्याव है.

Amit Pandey वो सिर्फ लेखक हैं। कोई भी पंथी नहीं हैं।

Satyendra PS मुझे भी कुछ ऐसा लगता है अमित जी. लेकिन साहित्यकार लोग जब कुछ कुछ कहते हैं तो कुछ कुछ गड़बड़ लगने लगता है अचानक. और आप शायद इससे वाकिफ नहीं हैं. आदित्यनाथ से मंच साझा करने के कारण उनके खिलाफ जबरदस्त अभियान चलाया गया। उसके कई साल बाद जब उन्होंने कलबुर्गी की हत्या के विरोध में पुरस्कार लौटाने की घोषणा की तो वामपंथी भाई लोगों ने नए सिरे से अभियान चलाया कि आदित्यनाथ के साथ बैठक र उन्होंने जो पाप किया था, पुरस्कार लौटाकर उसका प्रायश्चित कर रहे हैं.

Shashi Bhooshan आप पत्रकार हैं। भूत भले न जानें भविष्य बेहतर समझते हैं। अब सम्मान के लायक अवस्था में भी पहुँच चुके हैं। लेकिन जाने क्यों मुझे लगता है आपने यह संस्मरण लिखकर अच्छा नहीं किया। या पता नहीं आपने यह संस्मरण लिखने का इंतज़ार ही किया हो। कुछ भी हो सकता है। आज आदमी अपनी विवेचना के साथ कहीं तक जा सकता है।

Bhoot Nath भाय जी योगी से नाल जोड़नी है तो सीधे जोड़िये. उदय को बहाना मत बनाइये. बाकी आपने यह मजेदार कहा कि योगी को उदय प्रकाश की कहानियां याद हैं? किसने बताया योगी ने? गजब है भई. वैसे देश में बढ़ती सांप्रदायिकता व फासीवाद के लिए चिंतित उदय जी ने कुछ लिखा की नहीं योगी भाई के सीएम बनने पर!

Satyendra PS महंत आदित्यनाथ का मुख्यमंत्री बनना यूपी के इतिहास की एक अनोखी परिघटना है Shashi Bhooshan ji. उदय जी का उनके साथ मंच साझा करने के बाद उठे तूफान को भी अनोखा माना जा सकता है। वह क्यों हुआ कैसे हुआ किसने किया कैसे गिरोहबंदी हुई सब कुछ अजीब था। उस पर चर्चा एक स्वाभाविक सी बात है।

Satyendra PS योगी को उदय प्रकाश की कहानियां याद थीं, यह लिखा मैंने Bhoot Nath ji. अब का पता नहीं। यह उन दिनों छपी खबरों से और अपने वामपंथी साथियों की सुलगन से पता चला था, वरना आदित्यनाथ को मैं साइंस का विद्यार्थी ही मानता था जो कुसंगत में पड़ गया हो। मेरा ऑब्जर्वेशन रहा है कि साइंस स्ट्रीम वाले कट्टर होते हैं चाहे वह वामी हो या दक्खिन टोले का। नाल जोड़ने वाली बात आपने बहुत महत्त्वपूर्ण कही। गोरखपुर में मैंने बमुश्किल 6 माह काम किया है और उस दौरान 10 मुलाकातें हुई होंगी। वो भी प्रोफेशनल। दिल्ली में आने के बाद मैं अपने काम में लग गया। वो अपने काम में लगे ही थे। दूसरे तरीके से जरूर नाल जुड़ा हुआ है। गोरखपुर में मेरे 90% रिश्तेदार, परिजन आदित्यनाथ से जुड़े हैं। सब अब बम बम हैं। उस साइड से मैं चाहकर भी कभी नाल तोड़ न पाया!

Satyendra PS हम तो यही उम्मीद करेंगे कि वो अच्छा काम करें। बाकिया नरेंद्र मोदी ने 3 साल में फेंकने के अलावा देश में कुछ भी नही किया। उनके 5 काम भी नही गिनाए जा सकते जो उनकी सरकार के हों और उसका कोई इम्पैक्ट देश या पब्लिक पर सकारात्म क पड़ा हो। बनारस वाले 3 साल से काशी को क्योटो बनने के इन्तजार में हैं। हां, गोरखपुर वालों को उम्मीद है। महज डेढ़ साल के लिए गोरखपुर से वीर बहादुर सिंह सीएम बने थे और उतने ही समय में गोरखपुर जितना चमका था उतना ही आज भी चमक रहा है। कुछ चमक नष्ट भी हुई है। रामगढ़ ताल, नेहरू पार्क, तारा मंडल, इंदिरा पार्क जो भी खूबसूरत दिखे वह सिंह की योजनाएं थीं। हम तो उम्मीद करेंगे कि आदित्यनाथ गोरखपुर मंडल को टूरिस्ट हब के रूप में डेवलप करें जिसमे देशी विदेशी पर्यटक गोरखपुर में ठहरें। वहां रामगढ़ ताल में दिन भर बोटिंग, उसके अगले बगल विकसित दिव्य मार्केट में लोकल शॉपिंग करें। बखिरा झील में एक दिन प्रवासी पक्षियों को देखने में बिताने के साथ नौकायन और बोट में कुछ नाइट स्टे टाइप करें। वहां से लुम्बिनी घूमने जाएं। लुम्बिनी से पोखरा नेपाल के हिल स्टेशन का आनन्द लें। और गोरखपुर लौटकर आएं तो बुद्ध स्थल कुशीनगर में एक दिन बिताकर घर के लिए फ्लाइट पकड़ें। यह पूरी तरह 5 दिन का पॅकेज हो सकता है जो गोरखपुर मंडल की तस्वीर बदल देगा। यह इंफ्रा डेवलप में महज 6 महीने लगेंगे। साथ ही गोरखपुर के लिए अब सस्ती विमान सेवा भी शुरू हो जाएगी जिससे आफ सीजन में फ्लाइट से हम लोग भी घर जा सकेंगे। रेल तो प्रभु जी खा ही गए 2 साल में। हम तो अच्छे की ही उम्मीद करेंगे। हेल्थ, एजुकेशन में भी बहुत कुछ साल भर में करके पूर्वांचल को डेवलपमेंट मॉडल बनाया जा सकता है।

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योगी का आना हिंदुओं में लिबरल स्‍पेस का जाना है!

Abhishek Srivastava : अब योगी के बारे में कुछ बातें। मैं मानता हूं कि योगी आदित्‍यनाथ भाजपा के लिए बिलकुल सही चुनाव हैं। योगी को चुनकर भाजपा ने जनादेश को सम्‍मान दिया है। भाजपा के राजनीतिक एजेंडे के लिहाज से भी यह उपयुक्‍त चुनाव है। तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं योगी के चयन को लेकर आ रही हैं। कई जगह पढ़ा कि कुछ लोगों के मुताबिक वे भाजपा के लिए भस्‍मासुर साबित होंगे। ऐसे लोग योगी को जानने का दावा करते हैं। मुझे लगता है अभी वह वक्‍त नहीं आया कि हम योगी की तरफ़ खड़े होकर उनके चुनाव का विश्‍लेषण करें।

मेरा मानना है कि अब भी मोदी, आरएसएस और भाजपा की ओर खड़े रह कर ही योगी पर बात होनी चाहिए। जो लोग मोदी को जानते हैं, वे यह चूक न करें कि भस्‍मासुर वाली बात मोदी खुद समझ नहीं रहे होंगे। आखिर मोदी जैसा ताकतवर नेता अपने लिए भस्‍मासुर को क्‍यों खड़ा करेगा भला? मामला यह है ही नहीं। जबरन दोनों के बीच अंतर्विरोध को दिखाकर खामख़याली न पालिए। फि़लहाल, मोदी, योगी, संघ और भाजपा के बीच कोई अंतर्विरोध नहीं है। हां, आखिरी वक्‍त में मनोज सिन्‍हा का नाम क्‍यों और कैसे कटा, उस पर बात बेशक की जानी चाहिए।

मोदीजी का तात्‍कालिक एजेंडा यह है कि 2019 तक अबकी मिले हिंदू वोटों को कंसोलिडेट रखा जाए और कोई नुकसान न होने पाए। केशव मौर्या और शर्मा इसमें सहायक होंगे। दीर्घकालिक एजेंडा मेरी समझ से दक्षिणपंथी राजनीति का एक लंबा खिलाड़ी तैयार करना है जो 2024 में मोदीजी का उपयुक्‍त उत्‍तराधिकारी बन सके। मोदीजी जानते हैं कि वे बालासाहेब ठाकरे नहीं हो सकते। अगर वैसा बनने की कोशिश करेंगे तो जो इमारत खड़ी कर रहे हैं वह उनके बाद ढह जाएगी। योगी इस लिहाज से मोदी के सक्‍सेसर हैं और योगी खुद इस बात को समझते होंगे।

इसीलिए योगी गरम दिमाग से कोई काम नहीं करेंगे, मुझे भरोसा है। वे मोदी के विकास और न्‍यू इंडिया के आड़े कम से कम 2019 तक नहीं आएंगे क्‍योंकि इसी में उनकी भी भलाई है। हां, योगी के सामने एक चुनौती अवश्‍य होगी- गोरखनाथ मठ की समावेशी परंपरा के साथ हिंदुत्‍व की राजनीति का संतुलन बैठाना। मुझे लगता है कि अगर योगी का सामाजिक काम पहले की तरह चलता रहा, तो वे बड़ी आसानी से एक राज्‍य के प्रमुख के बतौर और एक मठ के महंत के बतौर अपनी दो अलहदा भूमिकाओं को खे ले जाएंगे। मुझे फिलहाल कहीं कोई लोचा नज़र नहीं आ रहा है योगी के चुनाव में। यह नरम हिंदू वोटरों को कट्टर हिंदुत्‍व समर्थक बनाकर एकजुट करने का एजेंडा है। योगी का आना हिंदुओं में लिबरल स्‍पेस का जाना है। असल लड़ाई यहां है। बशर्ते कोई लड़ सके।

पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव की एफबी वॉल से. उपरोक्त स्टेटस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं…

Akhilesh Singh योगी ..मोदी-2.0 होंगे…जैसे मोदी ..अटल-2.0 हुए थे …और वैसा ही गुणात्मक कंटिनुअम भी होगा …

विभांशु केशव इस मुद्दे पर लड़ेंगे तो जो कट्टर हो चुके हैं वो और कट्टर होते जायेंगे और फेसबुक व्हाट्स एप पर दौड़ने वाले मन्त्रों के सहारे दूसरों को भी कट्टर बनाते जायेंगे। केंद्र से लेकर राज्य सरकारों ने जो वादे किए हैं उन पर लड़ाई हो सकती है तब शायद जनता भी साथ खड़ी हो। जनता और कुछ विश्वविद्यालयों के अतिरिक्त युवाओं के वैचारिक स्तर का पता लगा लेना चाहिये

Abhishek Srivastava फ़ोन पर बात करेंगे। यहाँ समझाने में बहुत लिखना पड़ेगा।

Majid Ali Khan अभिषेक जी क्या हिंदुत्व की संतृप्ति के लिए अहमदाबाद को दोहराए जाने की संभावना उत्तर प्रदेश में कहीं नज़र आ रही है या नहीं कुछ रौशनी डालें, यानी मुसलमानों का कुछ दिन खुलकर कत्लेआम हो और हिंदुत्ववादी वोटर संतुष्ट हो जाए और अपने आप को विजयी समझ कर शांति से रहता रहे

Abhishek Srivastava कुछ भी हो सकता है होने को तो, लेकिन हमें ऐसा लगता नहीं है कि कुछ दुर्दांत होगा। मने लगने का मामला है। अगर ज़रूरत लगेगी उन्हें तो उसे वे पूरी करेंगे। चूंकि ऐसा कुछ किये बगैर ही प्रचंड बहुमत है, तो हिन्दू वोटर आलरेडी संतुष्ट है। योगी के cm बनने से अब वो चैन की नींद सोयेगा की रामराज आ गया।

Poojāditya Nāth मुझे लगता है कि बाबा को साल भर में निपटा दिया जाएगा। मतलब राजनीतिक अंत हो जाएगा ताकि ये ज़्यादा फड़फड़ाए नहीं।

Abhishek Srivastava बाबा कौन है अगर आप समझते हैं तो ऐसा नहीं कहेंगे।

Akhilesh Pratap Singh सही है….लेकिन योगी के आने से पहले हिंदुओं में लिबरल स्पेस का घटना शुरू हो चुका है और केवल गोरखनाथ मठ की छवि की बात करें तो उसकी कथित लिबरल छवि की पोल अवैद्यनाथ के जमाने में ही खुल चुकी थी….बाकी ” समाजसेवी और शिक्षा प्रेमी ” तो मुख्तार अंसारी भी हैं और रघुराज प्रताप सिंह भी…..यह बात बिल्कुल सही है कि मोदी और योगी में अंतर्विरोध खोजना बेमतलब है……

Abhishek Srivastava मामला मठ की छवि का उतना नहीं है जितना मठ की परंपरा और छवि के बीच टकराव का है। हम मठ की परंपरा पर ज़ोर दें तो छवि बिगाड़ने वालों को नंगा कर सकते हैं, साथ ही हिंदू लिबरल स्‍पेस को भी बचा सकते हैं। दिक्‍कत यह है कि इस एंगिल से बात करने को कोई तैयार नहीं।

Akhilesh Pratap Singh अब कहां परंपरा…अब तो हिंदू का मतलब बीजेपी-आरएसएस समर्थक कमोबेश मान लिया गया है…यही बिल्ला हटाए न हट रहा….जबकि हिंदू वह है नहीं, जिसका ढोल पीट रहे हैं सब लोग…बहुत विनम्रता और धीरज की जरूरत है मनाने के लिए और मानने के लिए….लेकिन शोर इतना है और हर तरफ से शोर है कि हिंदू के बारे में बात करना बीजेपी के बारे में बात करना मान लिया जा रहा है…..डेडली साउंड मिक्सिंग

Abhishek Srivastava यह बिल्‍ला हटाने के लिए काम कौन कर रहा है? एक नाम गिनवाइए। दरअसल बुनियादी लड़ाई यहां है जहां से आप संघ को नाथ सकते हैं, लेकिन हमारे यहां लड़ने वालों को हिंदू और धर्म से ही परहेज है तो अल्‍ला खैर करे।

Akhilesh Pratap Singh लड़ने वालों को हिंदू और धर्म से परहेज है … 🙂

Abhishek Srivastava मजाक नहीं कर रहे, सीरियस हैं। क्‍यों नहीं कोई जाकर बताता जनता को कि हिंदू नाम की चिडि़या वेदों में नहीं है। कहीं नहीं है। जो है सनातन है। इनके हिंदुत्‍व के बरक्‍स सनातन धर्म को खड़ा करिए फिर देखिए कैसी हवा निकलती है।

Akhilesh Pratap Singh मजाक नहीं कर रहा….आप ठीक कह रहे हैं…लेकिन यह ऐसा प्रोजेकट है, जिसके लिए अपार धीरज की जरूरत है…चुनावी चिंता के पार जाने वाली नजर की…गांधी…गांधी…गांधी

Jaya Nigam योगी, मोदी के सक्सेसर हैं, 2024 के लिये, यह कैसे ?

Abhishek Srivastava वो ऐसे कि ऐसे के पीछे ऐसा ही होता है।

Shashank Dwivedi मनोज सिन्हा का पत्ता क्यों कटा?

Abhishek Srivastava राजनाथ सिंह से पूछिए

K Kumar योगी से योगी उनके समर्थक रोटी कपड़ा और मकान से पहले मंदिर की उम्मीद कर रहे हैं दादा। ऐसे में यदि योगी मोदी की राजनीति करेंगे तो उनका बेस खिसकेगा और योगी, योगी की राजनीति करते हैं तो मोदी धराशायी हो सकते हैं। बस अपना एक यह भी थीसिस है।

अभिषेक श्रीवास्तव का लिखा यह भी पढ़ सकते हैं….

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अनुशासन के मामले में लखनऊ का सचिवालय अब गोरखनाथ मठ की फ्रेंचाइज़ी बन जाएगा : अभिषेक श्रीवास्तव

Abhishek Srivastava : ‘उत्‍सव के नाम पर उपद्रव नहीं होना चाहिए’ – बतौर भावी मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ का यह पहला निर्देश प्रशासन के लिए आया है। रामगोपाल वर्मा की फिल्‍म ‘रक्‍तचरित्र-1’ का आखिरी सीक्‍वेंस याद करिए जब मुख्‍यमंत्री बनने के बाद रवि ने सभी बाहुबलियों को अपने घर खाने पर बुलाकर ज्ञान दिया था कि जंगल का राजा केवल एक होता है और राजा चूंकि वो है, इसलिए बाकी जानवर अब हुंकारना बंद कर दें। इस हिसाब से सोचिए तो उम्‍मीद बनती है कि अगला निर्देश मुख्‍यमंत्री पद पर शपथ ग्रहण के बाद उन लोगों के लिए आएगा जो प्रशासन को अपनी जेब में रखने का शौक पालते हैं यानी गुंडे, बदमाश और माफिया।

उत्‍तर प्रदेश नाम के जंगल में अब पशुता केंद्रीकृत होगी। इससे आम आदमी को थो़ड़ा राहत बेशक़ मिलेगी। गुजरात के सूरत में कुछ साल रहकर आया मेरा साला कल बता रहा था कि वहां अपराध, छिनैती, गुंडई बिलकुल गायब है और जनता चैन से रहती है। अपने काम से काम रखती है। यूपी की राजनीतिक सत्‍ता में धर्म और बाहुबल का यह विलय यूपी को गुजरात बनाएगा। यह एक भी मुसलमान को टिकट दिए बगैर केवल हिंदू वोटों से बहुमत की सरकार बनाने का स्‍वाभाविक विस्‍तार है। योगी अगर कुछ न करें, तो भी उनका नाम और चेहरा काफ़ी होगा। अनुशासन के मामले में लखनऊ का सचिवालय अब गोरखनाथ मठ की फ्रेंचाइज़ी बन जाएगा।

योगी एक साथ तीन चीज़ों की नुमाइंदगी करेंगे- राज्‍य के राजपूत-भूमिहार नेतृत्‍व बहुल धार्मिक मठों की; मज़बूत स्‍टेट की; और वर्ण व्‍यवस्‍था के मुताबिक रक्षक-धर्म की (आंतरिक और बाहरी खतरों से)। सवाल है कि विरोधी दल इस स्थिति से कैसे निपटेंगे? अगर जनता को ताकतवर स्‍टेट, योद्धा जाति से आने वाला सिपहसालार और धार्मिक मठों का रहनुमा तीनों चीज़ें एक पैकेज डील में मिल रही हैं, तो जनता स्‍टेट को कमज़ोर करने वालों को चारा क्‍यों डालेगी? कांग्रेस, सपा, बसपा, वाम, लिबरल, नागरिक समाज, एनजीओ, समाजवादी- किसी के पास इस फॉर्मूले की काट हो तो बताए।

तेजतर्रार पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट अभिषेक श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.

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यूपी के नये सीएम के एलान के साथ कई थ्योरियों ने जन्म ले लिया है : पुण्य प्रसून बाजपेयी

Punya Prasun Bajpai : शाह को शह देकर योगी के आसरे संघ का राजनीतिक प्रयोग…. ये बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह को संघ की शह-मात है। ये नरेन्द्र मोदी की कट्टर हिन्दुत्व को शह-मात है। ये मुस्लिम तुष्टीकरण राजनीति में फंसी सेक्यूलर राजनीति को संघ की सियासी समझ की शह-मात है। ये मोदी का हिन्दुत्व राजनीति के एसिड टेस्ट का एलान है। ये संघ का भगवा के आसरे विकास करने के एसिट टेस्ट का एलान है। ये हिन्दुत्व सोच तले कांग्रेस को शह मात का खेल है, जिसमें जिसमें योगी आदित्यनाथ के जरीये विकास और करप्शन फ्री हालात पैदा कर चुनौती देने का एलान है कि विपक्ष खुद को हिन्दू विरोधी माने या फिर संघ के हिन्दुत्व को मान्यता दे।

यूपी के नये सीएम के एलान के साथ कई थ्योरियों ने जन्म तो ले ही लिया है। हर थ्योरी पहली बार उस पारंपरिक राजनीति से टकरा रही है, जिसे अभी तक प्रोफेशनल माना गया। लेकिन योगी आदित्यनाथ के जरीये राजनीतिक बदलाव की सोच पहली बार उसी राजनीति को शह मात दे गई जिसके दायरे में लगातार बीजेपी के कांग्रेसीकरण होने से संघ परेशान था। संघ के भीतर सावरकर थ्योरी से हेडगेवार थ्योरी टकराने की आहट से बीजेपी परेशान रहती थी। तो जरा योगी आदित्यनाथ के जरीये इस सिलसिले को समझें कि आखिर बीजेपी अध्यक्ष ने ही सबसे पहले गवर्नेंस के नाम पर केन्द्रीय मंत्री मनोज सिन्हा के नाम पर मुहर लगायी।

संघ के पास सहमति के लिये मनोज सिन्हा का नाम भेजा। ये मान कर भेजा कि संघ मनोज सिन्हा के नाम पर अपना मूक ठप्पा लगा देगा क्योंकि संघ राजनीतिक फैसलों में दखल नहीं देता। लेकिन इस हकीकत को अमित शाह भी समझ नहीं पाये कि जिस तरह की सोशल इंजीनियरिंग का चुनावी प्रयोग यूपी में बीते तीन बरस के दौर में शामिल हुये बाहरी यानी दूसरे दलों से आये करीब सौ से ज्यादा नेताओं को बीजेपी का टिकट दिया गया और यूपी के आठ प्रांत प्रचारकों से लेकर दो क्षेत्रवार प्रचारको की भी नहीं सुनी गई उसके बावजूद स्वयंसेवक यूपी में बीजेपी की जीत के लिये जुटा रहा तो उसके पीछे कहीं ना कहीं संघ और सरकार के बीच पुल का काम कर रहे संघ के कृष्ण गोपाल की ही सक्रियता रही, जिससे उन्होंने राजनीतिक तौर पर स्वयंसेवकों को मथा और चुनावी जीत के लिये जमीनी स्तर पर विहिप से लेकर साधु-संतों और स्वयंसेवकों को जीत के लिये गाव गांव में तैयार किया।

ऐसे में मनोज सिन्हा के जरीये दिल्ली से यूपी को चलाने की जो सोच प्रोफनल्स राजनेताओं के तौर पर बीजेपी में जागी उस शह-मात के जरीये संघ ने योगी आदित्यनाथ का नाम सीधे रखकर साफ संकेत दे दिये सफलता संघ की सोच की है। और जनादेश जब संघ से निकले नेताओं की सोच में ढल रहा है तो फिर संकेत की राजनीति के आसरे आगे नहीं बढा जा सकता है और यूपी के जो तीन सवाल कानून व्यवस्था, करप्शन और मुस्लिम तुष्टिकरण के आसरे चल रहे है, उसे हिन्दुत्व के बैनर तले ही साधना होगा। अमित शाह के प्रस्ताव को संघ ने खारिज किया तो मोदी संघ के साथ इसलिये खड़े हो गये क्योंकि मंदिर से लेकर गौ हत्या और मुस्लिम तुष्टीकरण से लेकर असमान विकास की सोच को लेकर जो सवाल कभी विहिप तो कभी संघ के दूसरे संगठन या फिर सांसद के तौर पर साक्षी महाराज या मनोरंजन ज्योति उठाते रहे उन पर खुद ब खुद रोक आदित्यनाथ के आते ही लग जायेगी या फिर झटके में हिन्दुत्व के कटघरे से बाहर मोदी हर किसी को दिखायी देने लगेंगे।

इसी के सामानांतर जब ये सवाल उठेंगे कि मुस्लिम तो हिन्दु हो नहीं सकता लेकिन दलित या अन्य पिछड़ा तबका तो हिंदू है तो फिर उसके पिछडे़पन का इलाज कैसे होगा। तो विकास के दायरे में केशव प्रसाद मोर्य को डिप्टी सीएम बनाकर उसी राजनीति को हिन्दुत्व के आसरे साधा जायेगा जैसा राम मंदिऱ का शीला पूजन एक दलित से कराया गया था। यानी हिन्दुत्व के उग्र तेवर उंची नहीं पिछडी जातियों के जरिये उभारा जायेगा।

जो सवाल आरएसएस के भीतर सवारकर बनाम हेडगेवार के हिन्दुत्व को लेकर उग्र और मुलायम सोच तले बहस के तौर पर लगातार चलती रही उसपर भी विराम लगा जायेगा क्योंकि योगी आदित्यनाथ की पहचान तो हिन्दु महासभा से जुडी रही है। एक वक्त कट्टर हिन्दुत्व के आसरे ही योगी आदित्यनाथ ने बीजेपी की राजनीति को चुनौती अलग पार्टी बनाकर दी थी। 50 के दशक में तो गोरखपुर मंदिर तक नानाजी देशमुख को इसलिये छोड़ना पडा था क्योकि तब गोरखपुर मंदिर में हिन्दू महासभा के स्वामी दिग्विजय से वैचारिक टकराव हो गया था और तभी से ये माना जाता रहा कि हिन्दुत्व को लेकर जो सोच सावरकर की रही उससे बचते बचाते हुये ही संघ ने खुद का विस्तार किया। लेकिन राम मंदिर का सवाल जब जब संघ के भीतर उठा तब तब उसके रास्ते को लेकर सावरकर गुट के निशाने पर बीजेपी भी आई।

यानी मोदी की योगी आदित्यनाथ के नाम पर सहमति कही ना कही सरसंघचालक मोहन भागवत को भी शह मात है। इन तमाम राजनीतिक धाराओं का सच ये भी है कि जिस तरह मोदी-संघ ने यूपी की राजनीति को जनादेश से लेकर विचार के तौर पर झटके में बदल दिया है उसमें अगर कोई सामान्य तौर पर ये मान रहा है कि पिछड़ी जातियों की राजनीति या मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति में उभार आ जायेगा। तो फिलहाल कहा जा सकता है कि ये भूल होगी। लेकिन इतिहास के गर्त में क्या छुपा है और आने वाला वक्त कैसे यूपी को सियासी प्रयोगशाला बनाकर मथेगा, इसका इंतजार हर किसी को करना ही होगा क्योंकि यूपी सिर्फ सबसे बड़ा सूबा भर नहीं है बल्कि ये संघ की ऐसी प्रयोगशाला है जिसमें तपकर या तो देश की राजनीति बदलेगी या फिर हिन्दुत्व की राजनीति को मान्यता मिलेगी।

आजतक में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी की एफबी वॉल से.

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ये योगी जो आज यूपी के CM बने हुए हैं, ये ‘आपकी’ ही देन हैं, प्रभु! : अभिषेक उपाध्याय

Abhishek Upadhyay : योगी आदित्यनाथ को शपथ लेने से पहले इस देश के कथित सेक्युलरों का, कथित बुद्धिजीवियों का जमकर शुक्रिया अदा करना चाहिए। ये है प्रतिक्रियावाद की ताकत। योगी क्यों CM बने? पांच बार से गोरखपुर का सांसद होने के बावजूद गोरखपुर बुरी तरह खस्ताहाल है। गोरखपुर की सड़कें……. हे राम….। शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली….. सब का सब भगवान भरोसे। राप्ती की बाढ़ आज भी पूर्वांचल का काल है। हर साल सैकड़ों नौनिहाल इंसेफेलाइटिस यानि मस्तिष्क ज्वर के चलते अकाल मौत मर जाते हैं। हर साल……..। फिर भी, न कोई शोर। न कोई सुनवाई। न कोई इलाज।

पर अचरज की बात है कि इन आधारों पर कभी योगी का मूल्यांकन किया ही नहीं गया। इन सेक्युलरों की नज़र में योगी का मतलब सिर्फ हिन्दू…हिन्दू…और हिन्दू है। साल दर साल योगी के नाम पर सिर्फ हिन्दू…हिन्दू…हिन्दू… का हव्वा खड़ा करते इन “पुरूस्कार वापसी टाइप” बुद्धिजीवियों ने योगी को देश के सबसे बड़े हिन्दू हृदय सम्राट की कतार में खड़ा कर दिया। योगी ने असल जिंदगी में एक चींटी भी न मारी होगी पर इन महान आत्माओं ने उन्हें मुसलमानों के खिलाफ सबसे बड़ा खतरा साबित कर दिया। योगी के ख़िलाफ़ तमाम बातों के बीच ये एक बहुत बड़ी सच्चाई है कि गोरखनाथ मंदिर के चिकित्सालय में सस्ते पैसों पर इलाज कराने वालों में अच्छी खासी संख्या मुसलमानो की भी है। पर ये बात कहते हुए सेक्युलरों की जीभ जल जाएगी क्योंकि फिर हिन्दू-मुसलमान का गणित कहां सेट होगा? फिर योगी को सबसे बड़ा खतरा कैसे बताया जाएगा?

तो ये योगी जो आज यूपी के CM बने हुए हैं, ये आपकी ही देन हैं, प्रभु। आपने ही इनका कद इतना बड़ा, इतना विकराल बना दिया है। आपने ही इन्हें हिन्दू हृदय का ऐसा सम्राट बना दिया है कि हिन्दू अपनी रोजमर्रा की सारी तक़लीफ़ें, सारा दर्द, सारी वादाखिलाफी भूलकर भी अपने “मसीहा” के नाम पर हिंदुत्व की मुहर मार आता है। आपको मुबारक हो आपका बनाया ये CM। आज दोपहर इनका शपथ ग्रहण है। वक़्त निकालकर चले आइयेगा। थोड़ी तालियों पर आपका भी हक़ बनता है हुजूर!

इंडिया टीवी में वरिष्ठ पद पर कार्यरत तेजतर्रार पत्रकार अभिषेक उपाध्याय की एफबी वॉल से.

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यूपी में भ्रष्ट नौकरशाहों का गैंग भाजपा राज में भी मलाई चाटने-चटाने के लिए तैयार : सूर्य प्रताप सिंह

Surya Pratap Singh : उत्तर प्रदेश की ‘नौकरशाही के भ्रष्ट चेहरे’ अपनी पसंद के मुख्यमंत्री व मंत्री बनवाने में लगे! उत्तर प्रदेश में कुछ नौकरशाहों की ‘भ्रष्ट लेकिन धनाढ़्य’ गैंग (CAUCUS) की आज ये हिम्मत / हस्ती है कि दिल्ली से लेकर नागपुर तक अपने पसंद के मुख्यमंत्री व मंत्री बनवाने के किए पैरवी में लगे हैं…. पिछली दो सरकारों में जिस नौकरशाह गैंग की तूती बोलती थी वे ‘पैसे व रसूक़’ के बल पर ‘मलाई चाटने व चटाने’ के लिए फिर से तैयार हैं…

सम्भावित नामों में १-२ चेहरे इसी गैंग की पसंद है…. इस गैंग के दो सदस्य उत्तर प्रदेश में शपथ ग्रहण समारोह की व्यवस्था में भी लगे व भाजपा नेताओं की चमचागिरी करते समारोह स्थल पर देखे गए… मित्रों, शायद आप में से कुछ लोग जिन्हें इस गैंग की ताक़त का अहसास नहीं है, मेरी बात पर विश्वास नहीं कर रहे…. विश्वास करें! मेरी जानकारी अत्यंत सटीक है …

उत्तर प्रदेश के भावी मुख्यमंत्री का चयन ‘नौकरशाही की चयन समिति’ ने किया…. नाम लगभग तय! उ० प्र० के मुख्यमंत्री के चयन में उत्तर प्रदेश के दिल्ली में तैनात ३ बड़े अधिकारियों की अहम भूमिका मानी जा रही है …लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि का मतलब अब जनता की पसंद नहीं बल्कि जो नौकरशाही को पसंद हो, वही भविष्य में बनेगा उ०प्र० का मुख्यमंत्री….इन ३ नौकरशाहों में से दो के उ० प्र० की पूर्व की दो सरकारों (सपा व बसपा) में नॉएडा में तैनात रहे बड़े अधिकारियों (जिन्होंने भ्रष्ट इंजीनियर यादव सिंह को बचाया है) व उत्तर प्रदेश के पूर्व सरकार के महा बदनाम बड़े लंबे-२ से भ्रष्ट IAS से भी गरमा-गरम सम्बंध बताए जा रहे हैं….

इन नौकरशाहों की टोली ने CM पद के कई ‘लोकप्रिय’ दावेदारों की छुट्टी करा दी….. तीन तिगाड़ा काम बिगाड़ा ….शायद इनमें से कई के साथ इन भ्रष्ट नौकरशाहों की दाल नहीं गलती…. अब ईश्वर से यही प्रार्थना है कि उ०प्र० का आने वाला मुख्यमंत्री Proxy CM सिद्ध न हो…..

यूपी के चर्चित आईएएस अधिकारी रहे और अब भाजपा नेता के रूप में सक्रिय सूर्य प्रताप सिंह की एफबी वॉल से.

सूर्य प्रताप का लिखा ये भी पढ़ें…

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‘आजतक’ निष्पक्ष है तो भाजपा की जबरदस्त जीत पर इस चैनल के न्यूज रूम में क्यों बंटी मिठाई? (देखें वीडियो)

Mayank Saxena : इस वीडियो में एक समाचार चैनल है, एक पत्रकार है; जिसको निष्पक्ष होना चाहिए…वह जाहिल एक राजनैतिक दल के जीतने पर कभी बेहद पवित्र और निष्पक्ष रही न्यूज रूम जैसी जगह पर मिठाई बांट रहा है…एक पत्रकार जिसका निष्पक्ष होने का दावा है; जिसको संघी गुंडों ने क्या-क्या न कहा, बेशर्मी से कैमरा पर मिठाई खा कर, अमित शाह को अपनी निष्ठा की दुहाई दे रहा है…10 और पत्रकार ताली बजा रहे हैं…और बजाय अपने न्यूज़रूम में मिठाई बांट रहे इस पत्रकार को नौकरी पर रखने के लिए शर्मिंदा होने के; चैनल इस वीडियो को गर्व से अपनी वेबसाइट पर प्रकाशित कर रहा है।

ये पत्रकारिता का ऐतिहासिक युग है, अभी आप एक राजनैतिक दल के प्रति दंडवत हो जाने के लिए; पत्रकारों को सर पर बिठाये हैं। एक विशेष दल के समर्थक पत्रकारों को ही देशभक्त मान रहे हैं। बाद में आप इस युग को याद करेंगे, रोते हुए…कि वो जो इस दौर में भी सर उठाये और रीढ़ सीधी करे खड़े थे…आपने उनको गाली दी और धीरे-धीरे परिदृश्य से ही बाहर कर दिया। न सदन में विपक्ष बचा और न ही पत्रकारिता में…ये ऐतेहासिक युग के तौर पर याद किया जाएगा, क्योंकि तब आपको बचाने वाला कोई नहीं होगा। सिर्फ ये मिठाई बांटने वाले पत्रकार होंगे…दरअसल तब मिठाई खाने वाले पत्रकार भी नहीं बचेंगे…जो बचेंगे, उनको ज़बरन मिठाई खानी पड़ेगी!!

रामराज्य मुबारक़ हो, पत्रकारिता का भस्मासुर युग मुबारक़ हो!!!

वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें :

https://www.youtube.com/watch?v=rH__gndxcFA

युवा पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट मयंक सक्सेना की एफबी वॉल से… उपरोक्त स्टेटस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं….

Shahid Khan : I did not find anything wrong in this video particularly Rajdeep conduct. Please note Rajdeep is just an employee any by accepting laddo he has shown he has big heart. Anjana om kashyap conduct is questionable.

Pashupati Jha : खुशियां मानते हुए आधुनिक पॉलीटिक्स की आधुनिक परिभाषा भी बता रहे हैं। Politics is about messaging…..it’s about road shows…it’s about social media…it’s about sending out simple messages.

Kashyap Kishor Mishra : एक पत्रकार को निष्पक्ष होना चाहिए पर निष्पक्षता की सान भी तो निरपेक्ष हो, यदि दक्षिणपंथी राजनितिक रूझान का प्रदर्शन जाहिल हरकत है तो एक पत्रकार का अपना वामपंथी रूझान प्रदर्शित करना भी उतनी ही जाहिल हरकत है

Mayank Saxena : न्यूज़रूम में या ऑन ड्यूटी कैसा भी रुझान प्रकट करना ग़लत है। लेकिन आप अगर पत्रकार के तौर पर साम्प्रदायिकता के विरोध की बात कर रहे हैं या बिना वजह इसमें वाम को घसीटने की प्रवृत्ति के कारण ये लिख रहे हैं, तो आप भी जानते हैं कि आप क्या कर रहे हैं। ज़रा दिखाइए कि कब किस वामपंथी पत्रकार ने ऐसे लड्डू बांटे हैं, टीवी पर खड़े हो कर वाम का समर्थन किया है?

Shakti Singh Bhabor : राजदीप सरदेसाई पक्का जाति समर्थक है। प्रभु, पर्रिकर, गडकरी, जावडेकर के मंत्री बनने पर इन्होंने ट्वीट कर कहा था कि अब सरकार सही हाथो में है।

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अखिलेश यादव को मेरी आह लग गई : नूतन ठाकुर

Nutan Thakur : मैंने 18 दिसंबर 2016 को लिखा था-

“मुख्यमंत्री अखिलेश यादव सत्ता में होने के नाते अभी अपनी जितनी भी तारीफ कर लें, पर उन्हें मेरी आह जरूर लगेगी. उन्होंने मेरे पति के खिलाफ लगातार फर्जी आधार पर कार्रवाई की. ईश्वर उन्हें इस बात का दंड अवश्य देगा.” मैंने कहा था-“अखिलेश के आगे पीछे घूम रहे जो अफसर मेरे पति को प्रताड़ित कर रहे हैं, कल सत्ता जाने के बाद वे कहीं नजर नहीं आएंगे. तब अखिलेश को अपने किये पर पछतावा होगा.”

आज मुझे अपनी कही हुई बात फिर याद आ गयी. अब सामने आयेंगे अखिलेश के भ्रष्टाचार के एक एक कारनामे…

यूपी के चर्चित आईजी अमिताभ ठाकुर की पत्नी और एडवोकेट नूतन ठाकुर की एफबी वॉल से.

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अखिलेश यादव को चेग्‍वारा बताने वाले ‘सोशलिस्‍ट फैक्‍टर’ के संपादक फ्रैंक हुजूर का अब क्या होगा!

Abhishek Srivastava : पेड़े कटहर ओठे तेल…! अभी मुख्‍यमंत्री तय हुआ नहीं और जनता सेटिंग-गेटिंग में जुट गई। लखनऊ में मार मची है पत्रकारों की। कोई मनोज सिन्‍हा की उम्‍मीद में डेरा डाले हैं तो कोई राजनाथ रामबदन का बगलगीर होने की फि़राक़ में है। किसी को ज़मीन छ़ुड़वानी है, किसी को ज़मीन लिखवानी है, किसी को विज्ञापन लेना है, किसी को ठेका चाहिए, कोई गैस एजेंसी और पेट्रोल पंप का मारा है तो कोई अपने स्‍कूल की मान्‍यता के लिए छटपटा रहा है।

सबसे मज़ेदार हालत उन पत्रकारों-संपादकों की है जो साइकिल से चल रहे थे और मुलायम समाजवाद का झंडा ढो रहे थे। समाजवाद पार्ट टू में इन सब ने अखिलेश का दाम थाम लिया था। लगातार अपनी पत्र-पत्रिकाओं से गठबंधन की जीत की मुनादी करते रहे लेकिन कोई दवा काम न आई। अब ये सभी अपने पुराने संघी रिश्‍तों को खंगाल रहे हैं। शुक्रवार की नमाज़ सोमवार की शिव चर्चा में बदल गई है। बहनजी के इर्द-गिर्द तो वैसे भी पत्रकार कम ही रहते हैं। उनके लाभार्थी भी शायद मीडिया में खोजे न मिलें। फिर भी जिन्‍होंने उनकी जीत की भविष्‍यवाणी की थी, वे सबसे अक्‍खड़ निकले। सब ईवीएम पर लपटे हुए हैं और किसी ने भी अपना ईमान नहीं बेचा है। एक यही अच्‍छी बात है।

एक और अच्‍छी बात यह है कि कुछ मित्रों ने लाभ तो लिया यूपी सरकार से लेकिन मंच पर बैठाया केंद्र सरकार के लोगों को, इसलिए वे पांच साल और आराम से काटेंगे। अपने मीडिया में छोटे-छोटे हेमंत तिवारी बहुत भरे पड़े हैं जो हर जगह एडजस्‍ट कर लेते हैं। जाति नहीं तो क्षेत्र ही सही, कोई भी वाद हो। फिलहाल मुझे गुलाबी कोट वाले फ्रैंक हुजूर की याद आ रही है। मुलायम को फिदेल और अखिलेश को चे ग्‍वारा बताने वाले सोशलिस्‍ट फैक्‍टर का क्‍या हुआ भाई? लखनऊ से कोई ख़बर दे।

मीडिया विश्लेषक अभिषेक श्रीवास्तव की एफबी वॉल से. उपरोक्त स्टेटस पर आए ढेर सारे कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार है….

अजात अभिषेक : हुजूर फर्जी डाटा के भरोसे अखिलेश को कोर्ट में बेइज्जत कराने वाले थे लेकिन शायद किसी समझदार आदमी ने सही समय पर अखिलेश को ऐसा करने से रोक दिया।

Vishnu Narayan : ई फैक्टर त बम्मई तक पहुंच जाता है…

Majid Ali Khan : अब फुर्सत में बिल्लियों से खेलेंगे हुज़ूर भाई

Abhishek Srivastava : बिल्‍ली शेर की मौसी है और शेरवा का राज आ गया है। वो भी फटकने नहीं देगी फ्रैंक यादव को।

Majid Ali Khan : फ्रैंक भाई ने बहुत सारी बिल्लियां पाली हुई थी, मैं गया हूं उनके रिहाइश पर दिलकुशा कालोनी में

Abhishek Srivastava : अब सारी बिल्लियां अपने भांजे के यहां भाग जाएंगी कालिदास मार्ग

नवनीत चतुर्वेदी : वाह, अभिषेक जी गजब लिखहड़ है आप, एक ठो यशभारती देना चाहिए आपको, कसम से हम दे देते यदि देना हाथ में होता तो। लिखते रहिये..

Abhishek Srivastava : आप खाली बात करते हैं महराज। यश भारती तो दूर, अपने प्रोग्राम में एक बार भी नहीं बुलाए जो आपके हाथ में है। महीने का कुछ खर्चा ही निकाल देते इसी बहाने।

Manoj Pandey : यशभारती लायक बता कर नई सरकार को ईशारा किया जा रहा है अभिषेक भाई…..नवनीत जी चिन्हावत हवे…

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यूपी में भाजपा विधायक ने सीओ को धमकाया

यूपी में भारी बहुमत पाने वाली भाजपा की छवि पर पलीता लगाने का काम उसके कुछ नए बने विधायकों ने शुरू कर दिया है. सत्ता के नशे में चूर इन विधायक महोदय को मर्यादा का खयाल नहीं है. इस आडियो में सुनिए एक भाजपा विधायक (सवायजपुर, हरदोई) की सीओ (शाहाबाद, हरदोई) से बातचीत. लोग इस टेप को सुनकर कहने लगे हैं कि लगता है यूपी के अच्छे दिन आ गए हैं… टेप सुनने के लिए नीचे क्लिक करें :

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