सुभाष चंद्रा (जी मीडिया ग्रुप) और नवीन जिंदल (जिंदल ग्रुप) में समझौता हुआ, सुधीर चौधरी मुस्काए

बड़े लोगों यानि व्यापारियों के बीच झगड़ा लंबा नहीं चलता. वे थोड़े समय तक लड़ने के बाद धंधे का नुकसान देख फिर से हाथ मिला लेते हैं. जिस प्रकरण में सुधीर चौधरी तिहाड़ गए, सुभाष चंद्रा जेल जाते जाते बड़ी मुश्किल से बचे, उस मामले में अब समझौता हो गया है. Continue reading

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जी मीडिया का कारनामा : स्टिंग किया कोबरा पोस्ट ने, लीगल नोटिस भेजा भड़ास को

Yashwant Singh : ये जी ग्रुप वाले पूरे मूर्ख हैं क्या? स्टिंग किया कोबरा पोस्ट ने और लीगल नोटिस भेज रहे हैं भड़ास को. लगता है इनका कपार पूरा का पूरा फिर गया है. अरे भाई हम तो साभार छापे हैं भड़ास पर. मूल कंटेंट तो कोबरा पोस्ट का है. फिर काहें चले आए धमकाने… Continue reading

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रंगदार संपादक और राष्ट्रवादी शोर : टीवी जर्नलिज्म आजकल….

मोदी के राज में कानून का डंडा बहुत सेलेक्टिव होकर चलाया जा रहा है…

Nitin Thakur : एनडीटीवी प्रमोटर पर छापे के दौरान ‘ज़ी’ अजीब सी खुशी के साथ खबर चला रहा था. शायद उन्हें इस बात की शिकायत है कि जब उनकी इज्ज़त का जनाज़ा निकल रहा था तब उनका साथ किसी ने नहीं दिया. ज़ी का दर्द एक हद तक सही भी है. तब सभी ने चौधरी और अहलूवालिया का स्टिंग बिना ऐसे कुछ लिखे चलाया था कि “ये पत्रकारिता पर हमला है”. अब ज़ी हर बार जश्न मनाता है. जब एक दिन के एनडीटीवी बैन की खबर आई तो भी.. जब छापेमारी की खबर आई तो भी. उसे लगता होगा कि कुदरत ने आज उसे हंसने का मौका दिया है तो वो क्यों ना हंसे. बावजूद इसके सच बदल नहीं सकता कि उनका मामला खबर ना दिखाने के लिए संपादकों द्वारा रंगदारी की रकम तय करने का था और ये सब एक बिज़नेसमैन की वित्तीय अनियमितता का केस है जिसमें बैंक का कर्ज़ ना लौटाना प्रमुख है.

दोनों मामलों की गंभीरता की तुलना का कोई सवाल ही नहीं है. ज़ी के मामले में पत्रकारिता पर हमला तब माना जाता जब कैमरे पर जिंदल का आदमी खबर रोकने के पैसे तय करता और ज़ी के संपादक खुले आम कहते कि हम बिकनेवाले नहीं. वहां ऐसा कुछ नहीं था. हां, जब जिंदल ने स्टिंग सार्वजनिक कर दिया तब ज़रूर ज़ी ने कहा कि हम तो खुद मीडिया को खरीदने की इस चाल का पर्दाफाश करनेवाले थे. हालांकि ये कभी नहीं पता चला कि कैसे? सीबीआई ने विदेश से लौटते ही घंटों तक वर्तमान सांसद चंद्रा जी से पूछताछ की और उन्होंने सीबीआई की पूछताछ के तुरंत बाद अपने संपादकों की क्लास लेने वाले ढंग में बाइट भी दी. वो फिर अलग कहानी है कि कैसे संपादकों से मिलने के बाद चंद्रा जी हल्के पड़ते चले गए. सवाल आज भी कायम है कि क्यों?

खैर आगे चलकर संपादकों का ना सिर्फ प्रमोशन हुआ बल्कि एक को तो जनता में अपनी छवि चमकाने के लिए फ्री हैंड दिया गया कि वो अपने शो को भयानक राष्ट्रवादी बनाकर हीरो बन जाए. इसके लिए अलग से लोगों की भर्ती हुई. आज कर्मचारियों की पूरी फौज सारा दिन सिर्फ एक शो में चांद तारे जड़ने के लिए लगी रहती है. वो जानती है कि ये शो सिर्फ टीआरपी के लिए नहीं बनता. ये टीम की अनवरत मेहनत का परिणाम है कि आज कोई भी उस “रंगदार संपादक” की बात नहीं करता. अब सबको राष्ट्रवादी शोर ने बहरा कर दिया है. स्वयं चंद्रा जी ने अपनी पहचान स्थापित करने के लिए टीवी पर अमीर बनने के टिप्स बेचने शुरू किए.

कई साल तक उस बोरियत से भरपूर शो को चलाकर वो भी अंतत: करियर गुरू जैसी इमेज बनाने में कामयाब रहे. दोनों ही लोगों ने विश्वसनीयता के संकट से जूझते हुए टीवी का उपयोग अपने निजी छवि निर्माण में जिस तरह योजनाबद्ध ढंग से किया उस पर मैं कभी पीएचडी का शोध करना चाहूंगा. आज दोनों के पास अपना बचाव करने के लिए फैन्स का साथ है. यकीन ना हो तो फैन पेज देख आइए. संपादक जी के नाम से लगे होर्डिंग तो मैंने दिल्ली के पॉश इलाकों तक में पाए हैं. ये अभूतपूर्व है जब एक संपादक को कुछ लोग नेता की तरह प्रमोट कर रहे हैं.

अब तो कोई उनका स्टिंग कर दे तो पहले की तरह परेशानी नहीं होगी. वो उसे अपने स्तर से पत्रकारिता पर हमला कह कर या सीधा सीधा राष्ट्रवादी पत्रकारों पर हमला कह कर बच निकलेंगे. निजी हितों की लड़ाई को कैसे अभिव्यक्ति या विचार की लड़ाई में बदला जाए ये उसकी तैयारी है. क्रिकेट मैच का बायकॉट दरअसल अपने उसी खास रुझानवाले फैन को ये भरोसा दिलाने के लिए है कि जब सारे मीडिया के लिए देश से ऊपर क्रिकेट हो गया था तब हम अकेले भारतीय सेना का पराक्रम दिखा रहे थे. उससे उलट एनडीटीवी ऐसी कोई कोशिश कभी करता नहीं दिखा. उन्होंने सरकारों से सवाल पूछे. भले चैनल का प्रमोटर कोई वित्तीय खेल करता ही रहा हो तो भी चैनल के तेवर ने पत्रकारिता के बेसिक्स के साथ खिलवाड़ नहीं किया.

खिलवाड़ तब होता जब चैनल धीरे धीरे अपनी टोन डाउन करता ताकि उसके प्रमोटर को सरकार के कोप से किसी हद तक बचाया जा सके. इससे उलट वो टीआरपी में जितना पिछड़ा उसका तेवर ज़्यादा ही तल्ख होता गया. बैन का नोटिस भेजकर सरकार ने सोचा होगा कि चेतावनी देकर चैनल के सुर साध लेगी मगर रवीेश कुमार की काली स्क्रीन का मैसेज साफ था. चैनल बैन तो सरकार ने वापस लिया ही.. प्रतिरोध की बहार देखकर समझ आ गया कि भले ही मालिक पर हमला कर दो लेकिन चैनल से बचकर रहो. चैनल की लड़ाई जो चेहरा लड़ रहा है उसे देश के करोड़ों लोगों का भरोसा हासिल है. बीच में उसकी क्रेडिबिलिटी भी खत्म करने की साज़िश हुई. भाई पर छिछला सा आरोप लगा और ट्रोल रवीश को किया जाने लगा. उसके बाद सोशल मीडिया पर किसी रवीश की छोटी बहन को भी ट्रोल किया गया. ट्रोल करनेवालों को इस तथ्य से बहुत लेनादेना नहीं था कि रवीश की कोई बहन ही नहीं है. खैर.. दो चैनलों के पाप की तुलना से मीडिया का कोई भला नहीं होनेवाला.

मैंने ये लड़ाई पहली बार पाकिस्तानी चैनल्स पर देखी थी जहां एंकर खुलेआम ऑन एयर अपने प्रतियोगियों की खिंचाई करते हैं. भारत के चैनल इस मामले में बेहद अनुशासित रहे मगर पहली बार इस नियम को ज़ी ने ही तोड़ा. उसने ही सबसे पहले सेकुलर मीडिया जैसी बात कहके देश को समझाने की कोशिश की.. कि वो खुद बाकी सबसे अलग हैं और सेकुलर तो कतई नहीं हैं. उसने ये हरकत इतनी बार दोहराई कि एक बार तो चैनल के मालिक को ऑन एयर सफाई देनी पड़ी कि हम किसी पार्टी के साथ नहीं हैं. ये ऐतिहासिक सफाई वो तब दे रहे थे जब कुछ महीने पहले अपने ही चैनल पर एक पार्टी के लिए प्रचार करते और वोट मांगते दिखे थे. ज़ाहिर है उनकी सफाई कपिल की कॉमेडी की तरह मज़ेदार थी.

वैसे उनके विरोधी नवीन जिंदल तो और भी माशाअल्लाह निकले. उन्होंने ज़ी को घेरने के लिए एक चैनल ही खरीद डाला. ज़ी फिर भी किसी ज़माने में कभी शानदार पेशेवर चैनल था जिसने राजनीतिक खबरों को बेहद अच्छे ढंग से रखने में साख बनाई थी मगर जिंदल इस पेशे में सिर्फ इसीलिए उतरे क्योंकि उन्हें ज़ी के हमलों का जवाब उसी की भाषा में देना था. इस सबमें किस को कितना फायदा हुआ ये तो नहीं मालूम लेकिन पत्रकारिता का नुकसान बहुत हुआ. विरोधी चैनल को अपने खिलाफ खबर चलाने का कानूनी नोटिस भिजवाने वाला खेल ये दोनों खूब खेलते रहे हैं. भारतीय पत्रकारिता ने दो बिज़नेसमैन की लड़ाई में अपना इतना खून कब बहाया था याद नहीं. इतने बड़े मामले की जांच कहां तक पहुंची आज ये कोई नहीं जानता. वैसे मोदी सरकार को इनकी लड़ाई में कोई खास दिलचस्पी नहीं है.

कोल ब्लॉक की जिस जंग में दोनों के हाथ काले हुए उस पर अब कोई बात नहीं करता. सरकार के पास वक्त और ऊर्जा लगाने के लिए आज खुद का एक शत्रु है और फिलहाल उसका फोकस पूरी तरह उसी पर है. फोकस ना होता तो वो इतने छिछले आरोप में सीबीआई को कभी नहीं उतारती. प्राइवेट बैंक का कर्ज़ ना लौटाने का केस और उसमें भी एक ऐसे आदमी की शिकायत जो कभी इसी ग्रुप का खास रहा है सब कुछ ज़ाहिर करने के लिए काफी है. आरोप तो इतना कमज़ोर है कि जिसकी हद नहीं. प्रणय रॉय के पास कर्ज़ चुकाने के कागज़ात मौजूद हैं. अलबत्ता कागजों के सही गलत का फैसला बाद की बात है. अब लगे हाथ बता दूं कि जिस फेमा के उल्लंघन में चैनल की अक्सर खिंचाई होती है ठीक वही मामला एक अन्य मीडिया संस्थान पर भी है लेकिन उसे सरकार के एक बेहद शक्तिशाली मंत्री के बहुत करीबी होने का ज़बरदस्त फायदा मिल रहा है.

मोदी के राज में कानून का डंडा इतना सेलेक्टिव होकर चलेगा ये अंदाज़ा लगाना तब बेहद आसान हो गया था जब गुजरात की एजेंसियों ने सरकार बनने के बाद उन तीस्ता सीतलवाड़ पर औने पौने आरोप लगाए जिसने गुजरात दंगों के मामले में मोदी को सबसे ज़्यादा नुकसान पहुंचाया. आज जो हो रहा है वो सीबीआई से पहले भी कराया गया है. इस काम में अब उसे महारत हासिल है. खुद मोदी का वो वीडियो सोशल मीडिया पर मौजूद है जिसमें वो सीबीआई को कांग्रेस की कठपुतली बता रहे हैं.

आज देश किस आधार पर मान ले कि वो प्रधानमंत्री का तोता नहीं है? मीडिया के उस खेमे से उनकी खुन्नस यूं भी पूरानी है जो अक्सर उनसे गुजरात दंगों पर सवाल करता रहा है. वो तो लाल किले तक से मीडिया को पाठ पढ़ा चुके हैं. उनके लिए मीडिया को उसकी हैसियत दिखाना कितना ज़रूरी है ये इसी बात से समझिए कि तीन साल गुज़र गए उन्होंने कभी खुलकर प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की.. अलबत्ता संपादकों से अलग मिलकर निर्देश और सलाह देते रहते हैं. आज सत्ता उनके पास है और उसके साथ सीबीआई दहेज की तरह मिलती है. अब ये प्रधानमंत्री के विवेक पर है कि वो सीबीआई का इस्तेमाल व्यापमं जैसे बड़े घोटालों में कायदे से करते हैं या फिर अपने पूर्ववर्तियों की तरह विरोधियों को निपटाने और ब्लैकमेल करने में करते हैं. देश उन्हें देख रहा है.. वो कहां देख रहे हैं??

फेसबुक के चर्चित युवा लेखक नितिन ठाकुर की एफबी वॉल से.

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सौ करोड़ की उगाही वाली सीडी में सुधीर चौधरी और समीर अहलूवालिया की ही आवाज

सुधीर चौधरी और समीर अहलूवालिया के वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट में मान लिया है कि स्टिंग वाले वीडियो में सुधीर और समीर की ही आवाज है. इससे पूर्व सांसद नवीन जिंदल की कंपनी से 100 करोड़ रुपये की उगाही के आरोपी ज़ी न्यूज़ के संपादक सुधीर चौधरी और ज़ी बिज़नेस के संपादक सीईओ समीर अहलूवालिया की परेशानी बढ़ सकती है. फोरेंसिक जांच प्रयोगशाला सीएफएल ने स्टिंग ऑपरेशन की सीडी में चौधरी और अहलूवालिया की आवाज सही पाई है. उनके वकीलों, विजय अग्रवाल और अमन लेखी ने भी सीबीआई कोर्ट में स्वीकार किया कि इस मामले से जुड़े वीडियो में उनके मुवक्किलों की ही आवाज़ है.

संभव है कि ज़मानत पर रिहा सुधीर चौधरी और समीर अहलूवालिया दोनों की जमानत रद्द हो सकती है और उन्हें फिर से जेल जाना पड़ सकता है. वहीं, कुछ दिन पहले आवाज़ का नमूना देने में आनाकानी कर रहे सुधीर चौधरी और समीर अहलूवालिया को कड़ी फटकार लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दोबारा जेल भेजने की चेतावनी दी थी. साथ ही यह भी कहा था कि वॉयस सैंपल का टेक्स्ट क्या होगा, ये मुलज़िम से नहीं जांच अधिकारी से तय होगा.

कुरुक्षेत्र के पूर्व सांसद नवीन जिंदल ने 2012 में ज़ी न्यूज़ पर आरोप लगाया था कि चैनल ने उनसे खबर न दिखाने के एवज में 100 करोड़ रुपये की मांग की थी. जिंदल के अनुसार चैनल ने कोयला घोटाले में जिंदल के शामिल होने से जुड़ी खबर न चलाने के लिए फिरौती के तौर पर ये रकम मांगी थी. जिंदल ने स्टिंग ऑपरेशन की खबर की सीडी जारी करते हुए कहा था,  “जी न्यूज के संपादक सुधीर चौधरी और जी बिजनेस के संपादक समीर अहलूवालिया ने हमारी टीम से कहा कि वे तब तक हमारे खिलाफ नकारात्मक खबरें दिखाते रहेंगे, जब तक कि हम उन्हें 100 रुपए का विज्ञापन देने पर सहमति नहीं जताते.”

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सुधीर चौधरी ने कुमार विश्वास को ‘कामुक कविराज’ कहा तो कुमार ने सुधीर को ‘तिहाड़ी’ करार दिया!

ट्विटर पर जी न्यूज के संपादक सुधीर चौधरी और कवि व ‘आप’ के नेता कुमार विश्वास के बीच जबरदस्त आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल रहा है. सुधीर चौधरी ने कुमार विश्वास को एक ट्वीट में ‘कामुक कविराज’ कहा तो कुमार विश्वास ने सुधीर चौधरी को ‘तिहाड़ी’ करार देते हुए पूछा कि उन्हें उनके घर के किस सदस्य ने कामुक जैसी गोपनीय जानकारी दी है. दोनों के आरोप-प्रत्यारोप संबंधी ट्वीट का स्क्रीनशाट यूं है…

ज्ञात हो कि सुधीर चौधरी तिहाड़ जेल की यात्रा कर आए हैं इसलिए उन्हें तिहाड़ी कहकर कुमार विश्वास ने चिढ़ाया. उधर, सुधीर चौधरी ने जी न्यूज पर कुमार विश्वास पर लगे आरोपों को लगातार दिखाकर उन्हें ‘कामुक कविराज’ साबित करने की कोशिश की. इस आरोप प्रत्यारोप में कुमार विश्वास ने फोकस न्यूज पर चली वो क्लिप शेयर कर दी जिसमें सुधीर चौधरी और समीर अहलूवालिया की जमानत रद्द करने को लेकर कोर्ट ने पूछा है. वीडियो लिंक यूं है: https://www.youtube.com/watch?v=rSJsNYP8zNU

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ये पत्रकारिता है और “चौधरी” पत्रकार हैं!

Sheetal P Singh : क़रीब दो तीन बरस पहले जी न्यूज़ ने हफ़्तों कोयला घोटाले और उसमें जिन्दल ग्रुप की मिली भगत पर नान स्टाप कवरेज दी थी। आपको मालूम ही है कि बाद में एक स्टिंग सामने आया था जिससे पता चला था कि सुधीर चौधरी समेत जी न्यूज़ के आला अधिकारी और जी के मालिक सुभाष चन्द्रा नवीन जिन्दल से समाचार रोकने के लिये १०० करोड़ की राशि माँग रहे थे। उसमें मुक़दमा दर्ज हुआ। चौधरी लम्बे समय जेल में रहे, सुभाष चन्द्रा अग्रिम ज़मानत पर बचे और मुक़दमा जारी है।

चौधरी इसके पहले एक Orchestrated sting में एक शिक्षिका को वेश्यावृत्ति की किंगपिन बतलाने की फ़र्ज़ी कोशिश के अपराध के मुख्य नियंता पाये गये थे पर वह चैनल कोई दूसरा था। अब उसी तरह का अभियान दौसा के किसान गजेन्द्र सिंह की आत्महत्या पर उन्होंने ले लिया लगता है। बीजेपी ने सुभाष चन्द्रा को उ०प्र० से राज्यसभा देने का वादा किया हुआ है। यह नहीं पता कि उसमें कोई प्रतिद्वन्द्वी आ गया या कुछ उससे ज़्यादा की इच्छा या महज़ TRP पर अभियान असामान्य है।

इस अभियान में मरहूम गजेन्द्र के परिवारजन व रिश्तेदारों को जी न्यूज़ के रिपोर्टर coax करके मनमाफिक शब्द/वाक्य हासिल करने की कोशिश करते लगते हैं। थीम यह है कि गजेन्द्र के फ़सली नुक़सान से प्रभावित होने की बात को गोल कर दिया जाय, बताया जाय कि वह साफ़ा बाँध कर ही बहुत कमा लेते थे, सो फ़सल के ख़राब होने का कोई असर न था। दूसरे उन्हे सिसोदिया ने फ़ोन कर बुलाया था और वे सिसोदिया के संपर्क में थे और अन्त में इस घटना की ज़िम्मेदारी केजरीवाल की है। न राजस्थान सरकार की मुख्यमंत्री का नाम न मोदी के ज़मीन हड़प क़ानून की बात न ओलावृष्टि से फ़सल की बर्बादी! ये पत्रकारिता है और “चौधरी” पत्रकार हैं!

वरिष्ठ पत्रकार और उद्यमी शीतल पी. सिंह के फेसबुक वॉल से.

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नवीन जिंदल ने जो टीम फोकस में बनाई है वो सारी कि सारी ज़ी न्यूज से उठाई गई है

यशवंत भाई नमस्कार… मैं फोकस टीवी में काम करता हूं… पिछले कुछ समय से हमारे ऊपर सिर्फ ज़ी और सुभाष चंद्रा के खिलाफ खबरें दिखाने का भारी दबाव है…. हम जो खबर बाकी चैनलों पर चल रही हैं उसको दिखाने जाते हैं तो ज़ी के खिलाफ कुछ करने को कहा जाता है… इस चैनल में पत्रकारिता का मजाक बना दिया है। अपना दुख एक खबर के तौर पर लिखा है… उचित समझे तो छाप देना…

कांग्रेस के सांसद के चैनल फोकस पर सिर्फ सुभाष चंद्रा

कांग्रेस के पूर्व सांसद और उद्योगपति नवीन जिंदल का चैनल फोकस टीवी इन दिनों 24 घंटे में से कम से कम 5 घंटे सिर्फ और सिर्फ ज़ी न्यूज और सुभाष चंद्रा के खिलाफ ही दिखा रहा है । पिछले पूरे हफ्ते इस चैनल पर सुभाष चंद्रा ही छाए रहे। अब इनको कौन समझाए कि अपने निजी मामलों को साधने के लिए चैनल तो ले लिया है। लेकिन चैनल अपनी ख़बरों से जाने जाते हैं, न कि किसी के खिलाफ प्रोपेगेंडा करके। बड़ी बात ये है कि नवीन जिंदल ने जो टीम फोकस में बनाई है वो सारी कि सारी ज़ी न्यूज से उठाई गई है। चाहे वो दिव्या वर्मा हो या फिर ए जी नायर या फिर एसआईटी हेड कुलदीप सिंह। अब ऐसे में ये चैनल कितना आगे बढ़ पाएगा इसपर तो संश्य है ही। लेकिन पत्रकारिता के सारे नियम कायदे इस चैनल ने पाताल में डाल दिए हैं। इन लोगों को कोई तो समझाओ कि मालिक का कहना तो मानो लेकिन चैनल को ऐसा न बना दो कि लोग हंसे कि देखो वो चैनल वाले आ गए जो सिर्फ सुभाष चंद्रा के खिलाफ ही खबरें दिखाते हैं।

एक पत्रकार…

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जी न्यूज मेरी इज्जत के साथ खेल रहा है : जिंदल

जी न्यूज चैनल के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए सांसद व जिंदल स्टील एंड पॉवर लिमिटेड के चेयरमैन नवीन जिंदल ने बृहस्पतिवार को पुलिस आयुक्त भीमसेन बस्सी से मुलाकात की। करीब 20 मिनट की मुलाकात में जिंदल ने बस्सी को सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की प्रति भी सौंपी, जिसमें दिल्ली पुलिस को जांच आगे बढ़ाने को कहा गया है। जिंदल का आरोप है कि कोल ब्लाक आवंटन घोटाला मामले में जी न्यूज ने जानबूझकर लगातार उनके खिलाफ गलत खबरे प्रसारित कर उनकी छवि खराब की।

कांग्रेस सांसद नवीन जिंदल दोपहर करीब 12 बजे पुलिस मुख्यालय पहुंचे। वहां उन्होंने भीमसेन बस्सी से और क्राइम ब्रांच के विशेष आयुक्त ताज हसन से मुलाकात की। पत्रकारों से बातचीत में नवीन जिंदल ने कहा कि जी न्यू उनकी इज्जत के साथ खिलवाड़ कर रहा है। पुलिस आयुक्त से मिलकर कार्रवाई में तेजी लाने का अनुरोध किया है। मामले में पुलिस पूरक आरोप पत्र दाखिल करेगी। बस्सी ने पत्रकारों को बताया कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को वह पहले पढ़ेंगे, उसके बाद आरोपियों के खिलाफ उचित कार्रवाई की जाएगी। पूरक आरोप पत्र के बारे में उन्होंने कुछ भी कहने से इन्कार कर दिया। गौरतलब है कि इससे पूर्व 8 अप्रैल को नवीन जिंदल ने पुलिस आयुक्त से मुलाकात कर मामले में कार्रवाई की मांग की थी। उस दौरान जी न्यूज व जी बिजनेस के संपादकों के खिलाफ पुलिस ने आरोप पत्र दाखिल नहीं किया था।

कोल आवंटन घोटाला मामले में जी न्यूज में अपने खिलाफ कई दिनों तक खबरें दिखाए जाने पर पिछले साल नवीन जिंदल ने पुलिस आयुक्त से मिलकर चैनल के दो संपादकों सुधीर चौधरी व समीर अहलुवालिया के खिलाफ सरकारी दस्तावेजों से छेड़छाड़ करने संबंधी शिकायत की थी। क्राइम ब्रांच ने मामला दर्ज कर दोनों संपादकों को गिरफ्तार भी किया था, लेकिन बाद में उन्हें जमानत मिल गई। जिंदल ने अपने दावे के पक्ष में एक स्टिंग भी सौंपा था। इसमें दिखाया गया कि दोनों संपादक कैसे उनसे खबरें न प्रसारित करने की एवज में 10 करोड़ रुपये की मांग कर रहे हैं। जी न्यूज के खिलाफ दर्ज मामले में क्राइम ब्रांच ने जो आरोप पत्र दायर किया था, उस पर मुख्य महानगर दंडाधिकारी अदालत (सीएमएम कोर्ट) ने 4-5 तथ्यों पर सवाल उठाते हुए जवाब देने का आदेश दिया था। इस पर दिल्ली पुलिस सेशन कोर्ट चली गई। सेशन कोर्ट ने मुख्य महानगर दंडाधिकारी कोर्ट को अपने दायरे में रहकर पहले मामले में संज्ञान लेने का आदेश दिया। इसी दौरान आरोपी संपादकों ने दिल्ली उच्च न्यायालय में पुलिस कार्रवाई के खिलाफ याचिका दायर की। उच्च न्यायालय ने सेशन कोर्ट के फैसले को सही ठहराया। इसके बाद आरोपी सुप्रीम कोर्ट चले गए। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि पहले दिल्ली पुलिस मामले में निष्पक्ष जांच करे फिर पूरक आरोप पत्र दायर कर कार्रवाई करे। बता दें कि इस मामले में जी न्यूज समूह के मालिक तथा उनके बेटे से भी पूछताछ की गई थी।

नवीन जिंदल ने लिखा पुलिस आयुक्त को पत्र

जिंदल स्टील एंड पावर लिमिटेड के चेयरमैन नवीन जिंदल ने जी न्यूज उगाही मामले में सुप्रीम कोर्ट के 10 नवम्बर के आदेश का हवाला देते हुए जल्द पूरक आरोपपत्र दाखिल करने का अनुरोध करते हुए पुलिस कमिश्नर को पत्र लिखा है। जिंदल ने पुलिस आयुक्त भीमसेन बस्सी को पत्र लिखकर अनुरोध किया है कि वह दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा में दर्ज मामलों की जांच आगे बढ़ाते हुए पूरक आरोप पत्र दाखिल करवाएं। पत्र में नवीन जिंदल ने कहा कि 2012 में दर्ज प्राथमिकी के तहत जी न्यूज के मालिक सुभाष चंद्रा, संपादक सुधीर चौधरी व समीर अहलूवालिया के खिलाफ पटियाला हाऊस स्थित मुख्य महानगरीय मैजिस्ट्रेट की अदालत में आरोपपत्र दाखिल कर चुकी है।  अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश धर्मेश शर्मा ने 6 जनवरी 2014 को आपराधिक पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई करते हुए इस आरोपपत्र की वैधता व प्रामाणिकता पर अपनी मुहर लगाई एवं मुख्य महानगरीय मैजिस्ट्रेट की अदालत द्वारा की गई प्रतिकूल टिप्पणियां रद्द कर दीं।

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मित्रों, मैं पिछले 4-5 दिनों से डा. सुभाष चन्द्रा जी से परेशान हूं

Vijay Yadav :  मित्रों, मैं पिछले 4-5 दिनों से डा. सुभाष चन्द्रा जी से परेशान हूं। सुभाष जी एस्सेल ग्रुप के चेयरमैन हैं। दरअसल हमने अपने घर पर जो टीवी छतरी (डिश टीवी) लगाया है, वह इन्हीं की कंपनी का है, जिसका एकाउंट नंबर 01518442110 है। करीब दो साल से मैं डा. साहब की सुविधा हर महीने 220 रुपये चुका कर ले रहा हूं। हाल ही में उन्होंने 220 को 230 रुपये कर दिया। हमने मान लिया डा. चन्द्रा जी हाल ही में हरियाणा में नवीन जिंदल के खिलाफ लड़कर लौटे हैं, खर्चा बढ़ गया होगा। हमने उन्हें 10 रुपये अतिरिक्त बढाकर देना स्वीकार कर लिया।

भाई हद तो तब हो गई, जब उन्होंने पैसे बढ़ाने के बाद भी कुछ चैनल बंद कर दिए, जिसमें सब टीवी भी शामिल था। जब उनके कर्मचारी से फोन पर बात हुई तो, उसने कहा कि, आपको पांच रुपये और देने होंगे। फिलहाल डा. सुभाष चन्द्रा जी को प्रतिमाह 10+5 रुपये अतिरिक्त देकर हमने समझौता कर लिया है। सुभाष चंद्रा जी पहले इतने जिद्दी नहीं थे कि पांच रुपये के लिए चैनल बंद कर दें। जबसे अपने चैनलों पर (डा. सुभाष चंद्रा शो) धंधे का फंडा युवाओं को सिखाने लगे हैं, तभी से ऐसा हो रहा है। पता नहीं यह उनके नए व्यापार का फंडा है या माननीय प्रधानसेवक जी की संगत का असर। पिछले महीने उनका एक टेक्नीशियन एंटीना रिपेयर करने के बाद 465 रुपये लेकर गया, जिसकी रसीद तक नहीं दी। इस 465 में 12 प्रतिशत का सरकारी सेवा शुल्क भी शामिल था। पता नहीं सेवा शुल्क उन्होंने सरकारी खजाने में जमा किया की नहीं या उसे भी हरियाणा चुनाव में लगा दिया।

मुंबई के पत्रकार विजय यादव के फेसबुक वॉल से.

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जी न्यूज पर एक बेशर्म विज्ञापन से भारतीय मीडिया का घोर अपमान

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मीडिया की भाषा और मीडिया की साख : ‘सुभाष चंद्रा गाली-गलौज कर रहा है’ बनाम ‘नवीन जिंदल अपराधी है’

अब सार्वजनिक जीवन में भाषा की मर्यादा का कोई मतलब ही नहीं रहा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनाव प्रचार अभियान में जिस भाषा-शैली का इस्तेमाल किया, वैसी भाषा-शैली का इस्तेमाल इससे पहले किसी भी प्रधानमंत्री ने नहीं किया. खासकर, राजनीति में अपने साथियों के चुनाव क्षेत्र में भले ही वे किसी भी पार्टी के राजनेता रहे हों, इस तरह की भाषा-शैली का इस्तेमाल पहले किसी प्रधानमंत्री ने नहीं किया.हमें यह मानना चाहिए कि केंद्र में नई सत्ता के आने के बाद नई भाषा और नई शब्दावली का भी अभ्यस्त हो जाना पड़ेगा.

दो बड़े व्यापारिक घराने टेलीविजन चैनलों के माध्यम से लड़ रहे हैं. जी न्यूज के प्रमुख सुभाष चंद्रा और मशहूर उद्योगपति नवीन जिंदल कभी आपस में बहुत गहरे दोस्त हुआ करते थे और दोनों का परिवार दोस्ती की मिसाल माना जाता था. आज दोनों आमने-सामने खड़े हैं. कारणों की तह में जाने का कोई मतलब नहीं है. इन दोनों घरानों के दो टेलीविजन चैनल हैं. एक जी मीडिया के रूप में देश के सबसे बड़े मीडिया समूह का स्वामित्व रखता है और दूसरे ने एक नए टेलीविजन में निवेश करके उसके ऊपर अपना आधिपत्य कर लिया है. इस चुनाव में इन दोनों टेलीविजन चैनलों ने भाषा की मर्यादा समाप्त कर दी है. सुभाष चंद्रा गाली-गलौज कर रहा है, सुभाष चंद्रा गुंडागर्दी कर रहा है, सुभाष चंद्रा लोगों को धमका रहा है, जैसी सभ्यता के स्तर से नीचे उतरी भाषा का इस्तेमाल सुभाष चंद्रा के लिए फोकस टीवी ने किया. सुभाष चंद्रा के चैनल जी मीडिया ने भी तुर्की-ब-तुर्की, नवीन जिंदल कोयला घोटाले का आरोपी है, नवीन जिंदल अपराधी है, नवीन जिंदल गले में कांग्रेस का चुनाव चिन्ह लगा मफलर डालकर घूम रहा है, जैसी भाषा का इस्तेमाल किया. इससे थोड़ी-सी और नीचे गिरी भाषा-शैली का भी इस्तेमाल हुआ. दोनों टेलीविजन चैनल इस भाषा युद्ध में एक-दूसरे को नीचा दिखाने और अपने-अपने घरानों का प्रतिनिधित्व करने में बस एक महत्वपूर्ण बात भूल गए.

वह महत्वपूर्ण बात मीडिया की अपनी साख है. हम जब टेलीविजन या अख़बार में होते हैं, तो लोग हमारे ऊपर वैसे ही विश्‍वास करते हैं, जैसे वे किसी न्यायाधीश के ऊपर विश्‍वास करते हैं. आज भी मीडिया के ऊपर, वह चाहे प्रिंट हो या टेलीविजन चैनल हों, देश के अधिकांश लोग बिना किसी तर्क के उनकी कही हुई बातों पर विश्‍वास कर लेते हैं. यह साख अभी मीडिया की ख़त्म नहीं हुई है. हालांकि, बहुत सारे लोगों के मन में ख़बरों के दिखाने के तरीके को लेकर शंकाएं उत्पन्न हो गई हैं और वे मीडिया के एक हिस्से को मनोरंजन का पर्याय भी मानने लगे हैं. पर इसके बावजूद साख अभी ख़त्म नहीं हुई है.

ये दोनों टेलीविजन समूह इस बात को भूल गए कि उनकी इस असभ्य अंत्याक्षरी में इन दोनों का कोई नुक़सान नहीं होने वाला, क्योंकि दोनों ही धन में और ताकत में एक-दूसरे का कुछ नहीं बिगाड़ पाएंगे. अगर कुछ बिगड़ेगा, तो मीडिया का बिगड़ेगा. और मीडिया का मतलब स़िर्फ जी और फोकस से जुड़े हुए या उनके दर्शकों का नहीं, बल्कि उन सारे लोगों का, जो मीडिया में काम करते हैं.

जब दो लोग एक-दूसरे पर आरोप लगाते हैं, तो न केवल राजनीतिक दल, बल्कि जनता भी इसे एक तमाशा मान लेती है. और उस तमाशे में सारे पत्रकार, वे चाहे किसी भी विधा से जुड़े हों, एक हास्यास्पद भूमिका में जोकरों की तरह खड़े दिखाई देते हैं.वैसे ही मीडिया की साख समाप्त हो रही है. मीडिया खुद अपनी साख समाप्त कर रहा है. ऐसे में अगर टेलीविजन चैनल और अख़बारों के माध्यम से आपसी युद्ध सार्वजनिक चर्चा का विषय बन जाए, तो इससे दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति दूसरी नहीं हो सकती.

मेरी चिंता सुभाष चंद्रा और नवीन जिंदल में नहीं है. मेरी चिंता मीडिया में है. और मैं इन दोनों (सुभाष चंद्रा और नवीन जिंदल) से विनम्र अनुरोध करना चाहता हूं कि आप दोनों लड़ें, आपके पास लड़ने के बहुत सारे माध्यम हैं. उसमें टेलीविजन चैनलों और अख़बारों को, जो आपके पैसे की वजह से चलते हैं, उन्हें न घसीटें. क्योंकि, जब आप अपने टेलीविजन चैनलों और अख़बारों को घसीटते हैं, तो आप पत्रकारिता को वहां खड़ा कर देते हैं, जहां पत्रकारिता अपनी साख खो देती है और पत्रकारिता हास्यास्पद नाटक मंडली का प्रहसन बन जाती है. लोग भले अपने मुंह से कुछ न कहें, लेकिन लोग इसे अपने दिल से उतार देते हैं.

मुझे नहीं मालूम, ये दोनों महान व्यक्ति, सुभाष चंद्रा और नवीन जिंदल हमारे इस छोटे-से अनुरोध को स्वीकार करेंगे या नहीं. लेकिन अगर वे स्वीकार करेंगे, तो न केवल अपने चैनलों और अख़बारों में काम करने वाले पत्रकारों पर कृपा करेंगे, बल्कि पत्रकारिता के पेशे में लगे हुए तमाम उन लोगों पर भी उपकार करेंगे, जो अपनी जान हथेली पर रखकर अभी भी सच की तलाश में जुटे हुए हैं. क्योंकि, जो चीजें आज हो रही हैं, वे दीमक की तरह हैं. और दीमक जब कहीं लग जाती है, तो वह किसी को नहीं छोड़ती. कोशिश करनी चाहिए कि पत्रकारिता के पेशे में दीमक न लगे, क्योंकि पत्रकारिता का पेशा लोकतंत्र की सलामती के लिए बहुत अहम स्थान रखता है. इसलिए आख़िर में श्री सुभाष चंद्रा और श्री नवीन जिंदल से एक बार फिर अनुरोध है कि वे अपना युद्ध लड़ें, जिस स्तर पर चाहें लड़ें, जितना चाहें एक-दूसरे को ऩुकसान पहुंचाएं, उनकी मर्जी. बस अपने टेलीविजन चैनलों और अख़बारों को इस युद्ध से दूर रखें, तो उनकी पत्रकारिता के ऊपर और दूसरे शब्दों में, लोकतंत्र के ऊपर बहुत बड़ी कृपा होगी.

लेखक संतोष भारतीय वरिष्ठ पत्रकार और ‘चौथी दुनिया’ अखबार के प्रधान संपादक हैं. उपरोक्त आलेख चौथी दुनिया में प्रकाशित हो चुका है. वहीं से साभार लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है.

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सुभाष चंद्रा, समीर अहलूवालिया, सुधीर चौधरी, रुबिका लियाकत पर सावित्री जिंदल ने लगाए गंभीर आरोप

भारत की सबसे अमीर महिलाओं में से एक सावित्री जिंदल ने जी ग्रुप के मालिक सुभाष चंद्रा और जी न्यूज के सीईओ समीर अहलुवालिया पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने जी न्यूज पर आरोप लगाया है कि इस चैनल ने जानबूझकर ऐसी खबरें दिखाई जिनसे उनकी और उनके परिवार की छवि को खराब किया जा सके। 64 वर्षीय सावित्री जिंदल ने इलेक्‍शन क‌मीशन से शिकायत करते हुए कहा है कि जी न्यूज लगातार चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन कर रहा है। अपनी शिकायत में उन्होंने सुभाष चंद्रा, हिसार से बीजेपी उम्मीदवार कमल गुप्ता, सीईओ समीर अहलुवालिया और जी न्यूज के एडिटर सुधीर चौधरी के साथ टीवी एंकर रुबिका लियाकत का भी नाम लिखा है। अपनी शिकायत में जिंदल ने कहा है कि सुभाष चंद्रा ने अपने चैनल पर उनके और उनके परिवार के बारे में आधारहीन और अपमानजनक बातें कहीं हैं। सावित्री जिंदल का आरोप है कि यह सब उन्होंने भाजपा उम्मीदवार कमल गुप्ता के कहने पर किया।

सावित्री जिंदल का आरोप है कि चार से छह अक्टूबर के बीच गलत और भ्रमित करने वाली जानकारी के आधार पर चैनल ने कार्यक्रम प्रसारित किया जिसके लिए सुभाष चंद्रा के साथ समीर अहलुवालिया, सुधीर चौधरी, रुबिका और लियाकत जिम्मेदार हैं। सावित्री का आरोप है कि उनके राजनीतिक विरोधी कमल गुप्ता ने यह गलत जानकारी प्रिंट मीडिया तक भी पहुंचाई साथ ही अफवाह फैलाने की कोशिश की गई कि जिंदल परिवार भ्रष्ट है। उनका कहना है कि इलियट क्लब की जमीन कभी भी नवीन जिंदल के नाम नहीं रही। लेकिन इस गलत जानकारी पर आधारित खबर को लगातार प्रसारित किया जाता रहा। जबकि यह जमीन अभी भी हरियाणा सरकार के कब्जे में है। अपनी शिकायत में उन्होंने बताया है कि 2005 में उनके पति ओपी जिंदल की दुर्घटना में मौत के बाद हरियाणा सरकार ने उनके सम्मान में पार्क के निर्माण का फैसला किया ‌था।

सरकार ने ओपी जिंदल फाउंडेशन से भी इस पार्क के विकास के लिए मदद मांगी। ट्रस्ट ने पार्क में मनोरंजन और योगा केंद्र के निर्माण के लिए लगभग ग्यारह करोड़ रूपये खर्च किए। उनका कहना है कि जिंदल परिवार इससे पहले भी विकास के काम करता रहा है। ऐसे में उनके परिवार पर इस तरह का आरोप लगाना बेहद गलत है। गौरतलब है कि सावित्री जिंदल के पति ओपी जिंदल हरियाणा सरकार में कैबिनेट मंत्री रह चुके थे। 2005 में एक हेलीकाप्टर दुर्घटना मे उनकी मौत हो गई। सावित्री जिंदल 2005 और 2009 में हिसार से कांग्रेस विधायक रह चुकी हैं। बता दें कि सावित्री जिंदल के पति ने ओपी जिंदल ग्रुप की स्‍थापना की थी। इस ग्रुप के संस्‍थापक की पत्नी सावित्री जिंदल 9.5 अरब डॉलर की संपत्ति के साथ दुनिया की सबसे रईस लोगों की सूची में शामिल हैं। जिंदल ग्रुप स्टील और बिजली उत्पादन से जुड़ा हुआ है। फोर्ब्स द्वारा सितंबर 2014 में जारी सूची के अनुसार टॉप 100 भारतीय अरबपतियों में सावित्री ‌जिंदल का 12वां स्थान है।

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राजदीप सरदेसाई के धतकरम के बहाने अपने दाग और जी न्यूज के पाप धोने में जुटे सुधीर चौधरी

सौ चूहे खा के बिल्ली चली हज को… जी न्यूज पर पत्रकारिता की रक्षा के बहाने हाथापाई प्रकरण को मुद्दा बनाकर राजदीप सरदेसाई को घंटे भर तक पाठ पढ़ाते सुधीर चौधरी को देख यही मुंह से निकल गया.. सोचा, फेसबुक पर लिखूंगा. लेकिन जब फेसबुक पर आया तो देखा धरती वीरों से खाली नहीं है. युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार ने सुधीर चौधरी की असलियत बताते हुए दे दनादन पोस्टें लिख मारी हैं. विनीत की सारी पोस्ट्स इकट्ठी कर भड़ास पर प्रकाशित कर दिया. ये लिंक http://goo.gl/7i2JRy देखें. ट्विटर पर पहुंचा तो देखा राजदीप ने सुधीर चौधरी पर सिर्फ दो लाइनें लिख कर तगड़ा पलटवार किया हुआ है. राजदीप ने रिश्वत मांगने पर जेल की हवा खाने वाला संपादक और सुपारी पत्रकार जैसे तमगों से सुधीर चौधरी को नवाजा था..

जी न्यूज के सुधीर चौधरी और जी बिजनेस के समीर अहलूवालिया द्वारा जिंदल समूह के नवीन जिंदल से कोल ब्लाक धांधली प्रकरण की खबर रोकने के एवज में करोड़ों रुपये मांगने से संबंंधित स्टिंग की खबर को सबसे पहले भड़ास ने पब्लिश किया था (देखें http://goo.gl/x5y9Bz ) . उसके बाद इंडियन एक्सप्रेस समेत दूसरे मीडिया हाउसेज ने खबर को तब उठाया जब दिल्ली पुलिस ने नवीन जिंदल की लिखित शिकायत और प्रमाण के रूप में सौंपी गई स्टिंग की सीडी को देखकर एफआईआर दर्ज कर ली. फिर तो ये प्रकरण बड़ा मुद्दा बन गया और चारों तरफ पत्रकारिता के पतन की कहानी पर चर्चा होने लगी. सुधीर और समीर तिहाड़ जेल भेजे गए. इनके आका सुभाष चंद्रा पर गिरफ्तारी की तलवार लटकने लगी, लेकिन वो जेल जाने से बच पाने की एलीट तिकड़म भिड़ाने में कामयाब हो गए.

उन दिनों राजदीप सरदेसाई ने भी सीएनएन-आईबीएन और आईबीएन7 पर सुधीर चौधरी के ब्लैकमेलिंग में जेल जाने के बहाने पत्रकारिता के पतन पर गहरा आंसू बहाया था. अब समय का पहिया जब काफी चल चुका है तब राजदीप सरदेसाई अपनी गालीगलौज व हाथापाई वाली हरकत के कारण सबके निशाने पर हैं और इनकी करतूत के चलते पत्रकारिता की हालत पर दुखी होकर टपाटप आंसू बहा रहे हैं सुधीर चौधरी. सोचिए जरा. इस देश के आम आदमी को मीडिया का संपूर्ण सच भला कैसे समझ में आएगा क्योंकि उसे कभी राजदीप सरदेसाई में सच्चा पत्रकार दिखता होगा तो कभी सुधीर चौधरी पत्रकारिता के हनुमान जी लगते होंगे.

इस विचित्र और घनघोर बाजारू दुनिया में दरअसल जनता के लिए सच जैसी पक्षधरता / चीज पर कोई मीडिया वीडिया काम नहीं कर रहा. सब अपने अपने एजेंडे, अपने अपने राग द्वेष, अपने अपने मतलब पर काम कर रहे हैं और इसे जन पत्रकारिता का नाम दे रहे हैं. ब्लैकमेलिंग में फंसे सुधीर चौधरी हों या हाथापाई-गालीगलौज करने वाले राजदीप सरदेसाई. इन जैसों ने असल में केवल खुद की ब्रांडिंग की है और अपनी ब्रांडिंग के जरिेए अपने लालाओं और अपनी तिजोरियां भरी हैं. क्या गलत है, क्या सही है, इस पर हम लोग भले तात्कालिकता / भावुकता के शिकार होकर फेसबुक-ट्विटर पर एक दूसरे का सिर फोड़ रहे हों, एक दूसरे को समझा ले जाने या निपटा देने में जुटे हुए हों लेकिन सच्चाई यही है कि अंततः राजदीप, सुधीर, हम, आप… हर कोई अपनी सुरक्षा, अपने हित, अपने दांव, अपने करियर, अपनी जय-जय में जुटा हुआ है और जो फिसल जा रहा है वह हर हर गंगे कहते हुए खड़ा होने की कोशिश मेें जुट जा रहा है.

देखिए इन्हीं मोदी महोदय को. गुजरात के दंगों के दाग से ‘मुक्त’ होकर विश्व नायक बनने की ओर चल पड़े हैं. इनकी बातें सुन सुन कर अब तो मुझको भी लगने लगा है कि सच में भारत को बहुत दिनों बाद कोई कायदे का नेता मिला है जो देश को एकजुट कर, एक सूत्र में पिरोकर बहुत आगे ले जाएगा… लेकिन जब मोदी की विचारधारा, मोदी के भक्तों, मोदी के अतीत को देखता हूं तो सारा उत्साह ठंढा पड़ जाता है क्योंकि ये लोग अपने हित के लिए कुछ भी, जी हां, कुछ भी, बुरा से बुरा तक कर डालते हैं. पर, समय और हालात, दो ऐसी चीज हैं भाइयों कि इनके कारण बुरे से बुरे को अच्छे से अच्छा में तब्दील होते देखा जा सकता है और अच्छे से अच्छा को बुरे से बुरा बताया जा सकता है. ऐसे ही हालात में मिर्जा ग़ालिब साहब ने कहा होगा…

रहिये अब ऐसी जगह चलकर जहाँ कोई न हो
हमसुख़न कोई न हो और हमज़बाँ कोई न हो

बेदर-ओ-दीवार सा इक घर बनाया चाहिये
कोई हमसाया न हो और पासबाँ कोई न हो

पड़िये गर बीमार तो कोई न हो तीमारदार
और अगर मर जाईये तो नौहाख़्वाँ कोई न हो

और अंत में… जाते-जाते…

जी न्यूज के सुधीर चौधरी और जी बिजनेस के समीर अहलूवालिया के स्टिंग की वो सीडी जरूर देखिए जिसकी खबर भड़ास पर आने के बाद तहलका मचा और बाद में इन दोनों संपादकों को ब्लैकमेलिंग के आरोप में जेल जाना पड़ा… आज यही सुधीर साहब देश को जी न्यूज पर राजदीप सरदेसाई के धतकरम के बहाने सच्ची-अच्छी पत्रकारिता सिखा रहे थे… इस लिंक पर क्लिक करें… http://goo.gl/N96BR8

बाकी, सुधीर चौधरी और जी न्यूज की संपूर्ण कथा इस लिंक में है… http://goo.gl/6k7p41

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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