रोडवेज बस के कंडक्टर का हरामीपना… देखें वीडियो

Yashwant Singh :  बीते साल बाइस दिसंबर को आगरा एक कार्यक्रम में शिरकत करने के लिए जा रहा था. नोएडा में सिटी सेंटर मेट्रो स्टेशन के पास स्थित रोडवेस बस अड्डे पर बड़ौत डिपो की एक बस पर बैठ गया. यह बस वाया यमुना एक्सप्रेसवे ले जाने वाली थी. बस चल दी और परी चौक से ठीक पहले खराब भी हो गई.

पूरी भरी हुई बस के यात्रियों को नीचे उतार कर कंडक्टर दूसरी बसों को रोक कर बिठाने लगा. एक तो बसें रुकती ही नहीं थीं, दूसरे हम जैसे कई लोग ऐसे थे जो बस की बजाय अब साझे में ओला करके आगरा जाना चाहते थे. सो हम लोगों ने रिफंड मांगना शुरू किया. कंडक्टर रिफंड के नाम पर भड़क जाए और पीछे से आ रही रोडवेज की दूसरी बसों में बैठ जाने की नसीहत दे. अपने एक मित्र रोडवेज अधिकारी से कंडक्टर की बात कराई तो कंडक्टर थोड़े औकात में आया और रिफंड कर दिया.

नोएडा बस अड्डे से परी चौक तक का किराया काटा, तीस रुपये. आगरा तक का कुल किराया लिया था- दो सौ साठ रुपये. तीस काटकर दो सौ तीस रुपये वापस लौटाया. पर बाकी जिन-जिन ने रिफंड लिया, सबको साठ रुपये काटकर लौटाया. हम तीन यात्री मिलकर ओला किए और आगरा चल दिए. लेकिन ओला स्टार्ट होने से ठीक पहले देखते हैं कि जो रोडवेस बस खराब थी, वह चल गई और उसे लेकर ड्राइवर कंडक्टर बैक टू पैवेलियन यानि नोएडा बस अड्डे चले गए. सवाल कई हैं–

-बस खराब थी तो चल कैसे गई… अगर चल सकती थी तो सभी को कम से कम आगे परी चौक तक ले जाना चाहिए था जिससे वहां से सबको कोई न कोई साधन आराम से मिल जाता.

-नोएडा बस अड्डे से परी चौक का किराया तीस रुपये था तो बाकी यात्रियों को रिफंड करने के दौरान साठ साठ रुपये क्यों किराया लिया…

-दर्जनों यात्रियों को जिसमें महिलाएं बच्चे बुजुर्ग तक थे, सड़क पर यूं छोड़ देना और उनके साथ बुरा व्यवहार करना, रिफंड न करना.. यह कहां का शिष्टाचार है…

उम्मीद है यूपी शासन से जुड़े लोग इस पर एक्शन लेंगे. रोडवेज बस और उसके बदमाश कंडक्टर की फोटो शेयर कर रहा हूं. साथ ही एक वीडियो का लिंक भी दे रहा हूं जिसे बस खराबी से लेकर ओला वाली कार पर सवार होकर आगरा जाने के दौरान तैयार किया था. बस खराब होने से हम जो तीन अपरिचित लोग एकजुट हुए, उनमें से एक Guru Sharan भाई तो अपने एफबी मित्र भी बन चुके हैं, दूसरा भाई स्टूडेंट था, उसका नाम याद नहीं आ रहा, हालांकि वह भी एफबी लिस्ट में मेरे कनेक्ट है… हम तीनों ने मिलकर ओला किया, फिर मैंने पूरे घटनाक्रम पर एक बातचीत रिकार्ड की. इस वार्ता में रोडवेज बस के कंडक्टर के हरामीपने की चर्चा है.

वीडियो लिंक ये है… https://youtu.be/_5jaC6VlPx4

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

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रामराजा का शहर ‘ओरछा’ यानि ऐतिहासिक आख्यानों वाला एक अदभुत स्थान (देखें वीडियो)

ओरछा वैसे तो मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ जिले का कस्बा है लेकिन यह यूपी के झांसी जिला मुख्यालय से मात्र 17 किलोमीटर की दूरी पर है. इस कस्बे में दर्जनों ऐतिहासिक आख्तानों के सजीव चिन्ह मिलते हैं. भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह विकास संवाद द्वारा आयोजित मीडिया कानक्लेव में शिरकत करने पहुंचे तो उन्होंने ओरछा के एक छोटे से हिस्से को शूट किया. ओरछा के लोग आज भी राम को अपना राजा मानते हैं इसीलिए यहां राम को रामराजा कहा जाता है और रामराजा को प्रतिदिन पुलिस विभाग गार्ड आफ आनर पेश करता है. संबंधित वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें :

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हिंदू राजाओं पर विजय के प्रतीक के रूप में निर्मित है कुतुब मीनार! (देखें वीडियो)

कुतुब मीनार भारत में दक्षिण दिल्ली शहर के महरौली में स्थित है. यह ईंट से बनी विश्व की सबसे ऊंची मीनार है. इसकी ऊँचाई 72.5 मीटर (237.86 फीट) और व्यास 14.3 मीटर है जो ऊपर जाकर शिखर पर 2.75 मीटर (9.02 फीट) हो जाता है. इसमें 379 सीढियां हैं. कहा जाता है कि दिल्‍ली के अंतिम हिन्‍दू शासक की हार के तत्‍काल बाद 1193 में कुतुबुद्दीन ऐबक ने कुतुब मीनार को बनवाया. कुतुब मीनार पुरातन दिल्ली शहर, ढिल्लिका के प्राचीन किले लालकोट के अवशेषों पर बनी है. ढिल्लिका अन्तिम हिन्दू राजाओं तोमर और चौहान की राजधानी थी.

इस मीनार के निर्माण उद्देश्य के बारे में कहा जाता है कि यह कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद से अजान देने, निरीक्षण एवं सुरक्षा करने या इस्लाम की दिल्ली पर विजय के प्रतीक रूप में बनी. कुछ पुरातत्व शास्त्रियों का मत है कि इसका नाम प्रथम तुर्की सुल्तान कुतुबुद्दीन ऐबक के नाम पर पडा. वहीं कुछ यह मानते हैं कि इसका नाम बग़दाद के प्रसिद्ध सन्त कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी के नाम पर है, जो भारत में वास करने आये थे. इल्तुतमिश उनका बहुत आदर करता था, इसलिये कुतुब मीनार को यह नाम दिया गया.

इसके शिलालेख के अनुसार, इसकी मरम्मत फ़िरोज शाह तुगलक ने (1351–88) और सिकंदर लोधी ने (1489–1517) करवाई. मेजर आर.स्मिथ ने इसका जीर्णोद्धार 1829 में करवाया था. मीनार के निकट भारत की पहली क्‍वातुल-इस्‍लाम मस्जिद है. कहा जाता है कि यह 27 हिन्‍दू मंदिरों को तोड़कर इसके अवशेषों से निर्मित की गई है. इस मस्जिद के प्रांगण में एक 7 मीटर ऊँचा लौह-स्‍तंभ है. यह कहा जाता है कि यदि आप इसके पीछे पीठ लगाकर इसे घेराबंद करते हो जो आपकी इच्‍छा होगी पूरी हो जाएगी.

कुतुबमीनार का निर्माण विवादपूर्ण है. कुछ मानते हैं कि इसे विजय की मीनार के रूप में भारत में मुस्लिम शासन की शुरुआत के रूप में देखा जाता है. कुछ मानते हैं कि इसका निर्माण मुअज्जिन के लिए अजान देने के लिए किया गया है. अफ़गानिस्तान में स्थित, जाम की मीनार से प्रेरित एवं उससे आगे निकलने की इच्छा से, दिल्ली के प्रथम मुस्लिम शासक कुतुबुद्दीन ऐबक, ने कुतुब मीनार का निर्माण सन 1193 में आरम्भ करवाया. मीनार के चारों ओर बने अहाते में भारतीय कला के कई उत्कृष्ट नमूने हैं, जिनमें से अनेक इसके निर्माण काल सन 1193 या पूर्व के हैं. यह परिसर यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर के रूप में स्वीकृत किया गया है.

वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें…

https://www.youtube.com/watch?v=dREDn-zicZ8

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नैनीताल बुला रहा आपको, 25 से 31 दिसंबर तक विंटर कार्निवाल में स्वागत है…

नैनीताल : अगर आप मैदानी इलाकों के कोहरे और ठिठुरन भरी ठंड से निजात पाना चाहते हैं तो सरोवर नगरी नैनीताल का रुख कर सकते हैं। अगर आप चाहें नैनीताल में दिसंबर के आखिरी हफ्ते में चुंबन भरी ठंड के बीच गुनगुनी घूप के साथ तमाम सांस्कृतिक, खेलकूद और साहसिक गतिविधियों का भी लुत्फ़ उठा सकते हैं। यहाँ आने वाली 25 से 31 दिसम्बर तक भव्य एवं आकर्षक “नैनीताल विंटर कार्निवाल” का आयोजन होने जा रहा है। नैनीताल विंटर कार्निवाल में सैलानियों की रुचियों के मद्देनजर विभिन्न किस्म के कार्यक्रम निर्धारित किए गए हैं। इसमें सांस्कृतिक कार्यक्रम, नुक्कड़ नाटकों के अलावा माउन्टेन, बाइकिंग, फैन्सी ड्रेस, मैराथन, ट्रैकिंग, ग्राफिक पेटिंग, फोटोग्राफी, फूड फैस्टिबल, थियेटर प्ले, लघु फिल्म, बच्चो की पेंटिंग, फिसिंग, पतंग, बेबी शो, फैन्सी ड्रेस आदि तमाम प्रतियोगिताएं शामिल हैं।

नैनीताल विंटर कार्निवाल का आयोजन जिलाधिकारी दीपक रावत की पहल पर प्रशासन कर रहा है। इसमें सामाजिक ,सांस्कृतिक और खेलकूद से जुडी अनेक संस्थाएं सहयोग कर रही हैं। जिलाधिकारी दीपक रावत के मुताबिक 25 दिसंबर को विंटर कार्निवाल की शुरुआत  भव्य व आकार्षिक झांकी के साथ होगा।  जिसमें उत्तराखंड के साथ समूचे देश की सांस्कृतिक विरासत दिखाई देगी। झांकी में रंग -बिरंगी सांस्कृतिक झांकियां, उत्तराखण्ड के मशहूर छोलिया एवं पाण्डव नृत्य, होली, बग्वाल, हिलजात्रा, नन्दादेवी, नन्दा राजजात के साथ ही स्कूली बच्चे पारंपरिक पोशाकों में नजर आएंगे। पीएसीऔर  आर्मी बैण्ड भी झांकी में शामिल होगें।

जिलाधिकारी के मुताबिक विंटर कार्निवाल में पहली रोज शाम को  6 बजे नैनी झील में दीपदान होगा। इसके बाद मुख्य मंच पर नुपुर पंत, गौरव पाण्डे, माया उपध्याय के गायन और उत्तराखण्ड स्टार नाईट का आयोजन किया जायेगा। 26 दिसम्बर को प्रातः 10 बजे से 02 बजे तक डांस प्रतियोगिता, सुरेश कुशवाह एण्ड पार्टी, उत्तर मध्य सांस्कृतिक कला केन्द्र की प्रस्तुति के साथ ही खुशी जोशी व गोविन्द दिगारी का गायन, दीपा नगरकोटी की प्रस्तुति के बाद शाम  6 बजे से इण्डो-फ्यूजन बैण्ड व उत्तराखण्ड स्टार नाईट में प्रीतम भरतवाण का गायन होगा। 27 दिसम्बर को सुबह 11 बजे से शाम 4 बजे विभिन्न सांस्कृतिक दलों के कार्यक्रमों के आयोजन के साथ ही शाम 5 बजे से 6 हास्य  कलाकारों की प्रस्तुति और  मैगा स्टार नाईट में पलक मुच्छल का गायन होगा। जिलाधिकारी  दीपक रावतके मुताबिक विंटर  कार्निवाल के दौरान  नैनीताल को बिजली की मालाओं  से सजाया जायेगा। सैलानी अपनी सुविधानुसार दिन में और शाम को भी सांस्कृतिक कार्यक्रमों  का लुत्फ़ उठा सकेंगे। कार्यक्रम के दौरान यॉट एवं नाव रेस प्रतियोगिताएं होंगी। फोटोग्राफी प्रतियोगिता भी आयोजित की जायेगी।

प्रयाग पाण्डे
नैनीताल

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दो दिनी अलीगढ़ यात्रा : जिया, मनोज, प्रतीक जैसे दोस्तों से मुलाकात और विनय ओसवाल के घर हर्ष देव जी का साक्षात्कार

पिछले दिनों अलीगढ़ जाना हुआ. वहां के छात्रनेता और पत्रकार ज़ियाउर्रहमान ने अपनी पत्रिका ‘व्यवस्था दर्पण’ के एक साल पूरे होने पर आईटीएम कालेज में मीडिया की दशा दिशा पर एक सेमिनार रखा था. सेमिनार में सैकड़ों इंजीनियरिंग और एमबीए छात्रों समेत शहर के विशिष्ट जन मौजूद थे. आयोजन में शिरकत कर और युवाओं से बातचीत कर समझ में आया कि आज का युवा देश और मीडिया की वर्तमान हालत से खुश नहीं है. हर तरफ जो स्वार्थ और पैसे का खेल चल रहा है, वह सबके लिए दुखदायी है. इससे आम जन की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं. सेमिनार में मैंने खासतौर पर मीडिया में आए भयंकर पतन और न्यू मीडिया के चलते आ रहे सकारात्मक बदलावों पर चर्चा की. बड़े मीडिया घरानों के कारपोरेटीकरण, मीडिया में काले धन, मीडिया में करप्शन जैसे कई मामलों का जिक्र उदाहरण सहित किया. 

अलीगढ़ शहर में पहली बार गया था. वहां शहर में सेंट्रल प्वाइंट स्थित मीनार होटल में मुझे ठहराया गया था. प्रोग्राम के बाद अलीगढ़ के जाने माने फोटो जर्नलिस्ट मनोज अलीगढ़ी के साथ अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) देखने के लिए निकला. मनोज ने एक बेहतरीन गाइड की तरह अपनी कार में बिठाकर न सिर्फ एएमयू घुमाया बल्कि शहर के चर्चित स्थलों, इमारतों, सड़कों आदि से भी परिचय कराया. मनोज अलीगढ़ी इन दिनों आगरा के ऐतिहासिक स्थलों पर काम कर रहे हैं और उनकी फोटो स्टोरी अमर उजाला में प्रकाशित हो रही है. साथ ही उनके चर्चित फोटो अन्य दूसरे बड़े स्थानीय और राष्ट्रीय अखबारों में छपते रहते हैं. मनोज अलीगढी का फोटोग्राफी के प्रति जुनून देखने लायक था. वे हर पल कुछ नया करने, कुछ नया क्लिक करने, कुछ नया रचने के बारे में सोचते रहते हैं.

जिस युवा और उत्साही पत्रकार ज़ियाउर्रहमान उर्फ ज़िया ने मीडिया पर केंद्रित सेमिनार का आयोजन किया था, वे खुद अपने आप में एक संस्थान की तरह दिखे. छोटी उम्र में उन्होंने छात्र राजनीति और पत्रकारिता के क्षेत्र में जिस सक्रिय नेतृत्वकारी भूमिका में काम किया, वह सराहनीय है. बेहद कम उम्र से ही वह अपने आसपास के अंतरविरोधों और उलटबांसियों से दो-दो हाथ करते हुए आज अनुभवों का पिटारा अपने पास रखे हैं. इस आयोजन में उन्होंने बहुत सारे बड़े लोगों, नेताओं, मंत्रियों, अफसरों आदि को बुलाया था लेकिन उनमें से कोई नहीं आया. ज़ियाउर्रहमान ने मंच से कहा कि इस आयोजन ने उनको बहुत सारे सबक दिए हैं. जिया की सक्रियता के कारण उनके ढेर सारे विरोधी भी अलीगढ़ में पैदा हो गए हैं जिनने कार्यक्रम असफल करने की पूरी कोशिश की लेकिन हुआ उल्टा. प्रोग्राम जबरदस्त रूप से सफल रहा. हां, जिन जिन ने आने का वादा किया था और उनके नाम होर्डिंग्स बैनर पर छापे गए थे, उनके न आने से जिया को थोड़ा झटका तो जरूर लगा दिख रहा था. पर वह इस अनुभव का इस्तेमाल आगे के जीवन, आयोजन में करने को तत्पर दिख रहे थे. वो कहते हैं न कि कोई भी युवा अपने जोश जज्बे के कारण समय के साथ व्यावहारिक पहलुओं-अनुभवों से वाकिफ होता जाता है और इस प्रकार पहले से ज्यादा मेच्योर होता जाता है.

बुके देकर सम्मानित करते सीनियर फोटो जर्नलिस्ट मनोज अलीगढ़ी

तस्वीर में सबसे बाएं सोशल मीडिया के चर्चित चेहरे वसीम अकरम त्यागी दिख रहे हैं और कार्यक्रम के आयोजक जियाउर्रहमान खड़े होकर श्रोताओं की तरफ जाने को उन्मुख दिख रहे हैं.

तस्वीर में खचाखच भरा हाल दिख रहा है और कार्यक्रम आयोजक जियाउर्रहमान खड़े कुछ चिंतन मनन करते दिख रहे हैं. 

सबसे दाएं गोरखपुर से आए पत्रकार साथी राशिद और बाएं से दूसरे एडवोकेट प्रतीक चौधरी संग कार्यक्रम की याद सहेजने के वास्ते फोटोग्राफी. 

जिया के एक साथी हैं एडवोकेट प्रतीक चौधरी. वकालत के क्षेत्र में प्रतीक ने अपने जन सरोकारी रवैये के कारण कम समय में अच्छा खासा नाम कमाया है. उन्होंने गरीबों को न्याय दिलाने के वास्ते तरह तरह से लड़ाई छेड़ रखी है और उनके साथ बहुत सारे लोग कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहते हैं. प्रतीक ने अलीगढ़ शहर में प्रदूषण से लेकर पुलिस उत्पीड़न तक के मामलों में लंबी लड़ाई लड़ी और उद्यमियों, अफसरों, नेताओं को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया.

कार्यक्रम के अगले दिन अलीगढ़ निवासी वरिष्ठ पत्रकार विनय ओसवाल जी के घर दोपहर के खाने पर जाने का कार्यक्रम बना. मैं, जिया और प्रतीक एक एक कर विनय ओसवाल जी के घर पहुंचने लगे. विनय ओसवाल जी नवभारत टाइम्स में लंबे समय तक हाथरस के संवाददाता रहे. उन्होंने पत्रकारिता को कभी कमाई का जरिया नहीं बनाया. पैसे कमाने के लिए उन्होंने बतौर उद्यमी कई काम शुरू किए और आज वह अपनी फैक्ट्रीज का संचालन करके पूरे परिवार को सम्मानजनक जीवन दे सके हैं. वे अब फिर पत्रकारिता क्षेत्र में सक्रिय हो गए हैं. ब्लाग, वेब, सोशल मीडिया के माध्यम से वह खरी खरी बात कहने लिखने लगे हैं.

विनय ओसवाल जी ने बताया कि उनके घर पर थोड़ी ही देर में नवभारत टाइम्स दिल्ली में कई दशक तक वरिष्ठ पत्रकार के रूप में कार्यरत रहे हर्षदेव जी आने वाले हैं. हर्षदेव जी का नाम तो मैंने सुन रखा था लेकिन उनसे मुलाकात नहीं हुई थी. जब वो आए तो तुरंत उनका एक वीडियो इंटरव्यू किया, जिसे आप इस लिंक https://www.youtube.com/watch?v=LGArckWHAIU पर क्लिक करके देख सुन सकते हैं.

विनय ओसवाल जी (दाएं) के अलीगढ़ स्थित आवास पर वरिष्ठ पत्रकार हर्ष देव (बीच में) के साथ दोपहर का भोजन.

विनय ओसवाल ने सभी लोगों को दोपहर के भोजन में उत्तर और दक्षिण भारतीय व्यंजन परोसकर दिल जीत लिया. सबने तबीयत से खाया और विनय ओसवाल जी की सेवा भावना और आतिथ्य की सराहना की. मेरे लिए अलीगढ़ की दो दिन की यात्रा यादगार रही. कई नए साथी मिले. कई नए किस्म के अनुभव हुए. लगा कि दुनिया में अच्छे लोग हैं, बस वे बिखरे हैं, उनकी अखिल भारतीय या प्रादेशिक स्तर पर कोई यूनिटी नहीं है. यह भी समझ आया कि उत्तर प्रदेश की राजनीति अगले पांच दस सालों में बड़े बदलाव से गुजरेगी क्योंकि युवाओं के बीच से ऐसे ऐसे लोग सामने आ रहे हैं जो बिना भय खौफ सच कहने और सच को जीने का साहस रखते हैं. थैंक्यू दोस्तों, दो दिन की अलीगढ़ यात्रा के दौरान आप सबने मेरा दिल जीत लिया.

एएमयू के मुख्य द्वार पर यशवंत. तस्वीर : मनोज अलीगढ़ी

लेखक यशवंत भड़ास4मीडिया के एडिटर हैं. उनसे संपर्क yashwant@bhadas4media.com के जरिए किया जा सकता है.


आयोजन में किन किन का हुआ सम्मान, किसने क्या कहा, संबंधित अन्य तस्वीरें देखने पढ़ने के लिए नीचे क्लिक कर अगले पेज पर जाएं…

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अगर आप दिल्ली में हैं या दिल्ली गए हुए हैं तो हौज खास विलेज में ये मकबरे वाली जगह घूम आइए (देखें वीडियो)

Yashawnt Singh : दिल्ली में हौज खास विलेज नामक जगह है. कभी यह दिल्ली के दूसरे शहर सीरी में हुआ करता था, ऐसा हौज खास जाने पर बाहर लगी पट्टिका को पढ़ने से पता चलता है. आज हौज खास दिल्ली का हिस्सा बन चुका है. यहां लगी पट्टिका पर लिखा है-

 

हौज-ए-अलाई
(हौज-खास)
दिल्ली के दूसरे शहर सीरी में निर्मित हौज-ए-अलाई का निर्माण अलाउद्दीन खलजी (सन 1296-1316) ने करवाया।
Hauz-I-Alai
(Hauz-Khas)
Hauz-I-Alai was constructed in Siri, The Second City of Delhi By Alaud-Din-Khalji (A.D. 1296-1316)”.

इसी में फिरोज शाह का मकबरा है. Feroz Shah’s Tomb. इस बारे में लगी पट्टिका से पता चलता है कि–

”फिरोज शाह ने अपने मरने से पहले अपना मकबरा और इससे सटा मदरसा बनवा दिया था. पट्टिका के मुताबिक फिरोज शाह की मृत्यु 1388 ईस्वी में हुई. उन्होंने अपना मकबरा और मदरसा 1350 के दशक में लगभग एक ही समय में बनवाया था. इस वर्गाकार मकबरे की माप 13.5 मीटर है और यह वहां स्थित है जहां मदरसे के दोनों हिस्सों का संगम होता है. इस मकबरे के गंबुद का शीर्ष पूरे परिसर में सबसे उंचा है. दक्षिणी प्रवेश द्वार के उपर अंकित लेख से यह जानकारी मिलती है कि इस इमारत की मरम्त सन 1508 ईस्वी में बादशाह सिकंदर लोदी के आदेशानुसार करवाई गई थी. कक्ष के बीचोंबीच बनी कब्र फिरोज शाह की है जबकि संगमरमर की अन्य कब्रें संभवत: उनके पुत्र और पोते की रही होगी.” 

ये तो हुई अतीत की बात. आज ये जगह दिल्ली के नौजवान दिलवालों के लिए आरक्षित सी लगती है. हर तरफ प्रेमी युगल यहां विराजमान है. ठसाठस भरी और चिल्ली-पों मचाती दिल्ली में यह जगह थोड़ी रुमानियत से तो भर ही देती है इसलिए यहां एक बार जाना और देखना बनता है. नीचे झील और उसका किनारा भी जाने देखने का प्रबल आकर्षण है. यहां एंट्री फ्री है.

इस जगह पर आप नहीं गए हैं तो कोई बात नहीं. जब समय मिले तब जाइए लेकिन फिलहाल मैं दो वीडियो वहां से लाइव तैयार कर लाया हूं. इसके जरिए हौज खास को काफी कुछ आप देख समझ सकते हैं.

वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें :

(1) Hauz-Khas and Feroz Shah’s Tomb दिल्ली में हौज खास और इसमें फिरोज शाह का मकबरा देखिए https://www.youtube.com/watch?v=04n8f3LSp6w
(2) Hauz-Khas and Feroz Shah’s Tomb दिल्ली में हौज खास और इसमें फिरोज शाह का मकबरा देखिए https://www.youtube.com/watch?v=ybwoS04OtK8

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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जिंदगी ओएलएक्स ओला से लेकर ब्ला ब्ला तक…. तो गाइए, झिंगालाला… झिंगालाला…

Yashwant Singh : जिंदगी ओला ओएलएक्स से लेकर ब्ला ब्ला तक हो गई है.. कार बेचने के बाद पैदल होने का जो अदभुत अकल्पनीय सुख उठा रहा हूं, उसे शेयर करने का मन नहीं कर रहा है लेकिन कर ही देता हूं क्योंकि अपनी फिलासफी जोत से जोत जलाए रखने वाली रही है. दिल्ली नोएडा मेट्रो से आने-जाने में क्या खूब सुकून मिलता है. इतनी सस्ती और इतनी द्रुतगामी सेवा दिल्ली में कोई दूसरी नहीं. द्रुतगामी इसलिए कि दिल्ली की सड़कों पर कार के सागर में फंस कर चींटी माफिक खिसक रहे कार मालिकों के दयनीय चेहरे देखकर यही लगता है कि सबसे द्रुतगामी अपनी मेट्रो रानी.

उबेर और ओला की जंग के कारण अक्सर सौ से लेकर ढाई सौ रुपये तक के राइड कूपन फ्री मिलते रहते हैं और इनकी रुटीन की एसी कार राइड भी 5 रुपये प्रति किलोमीटर पड़ रही है. न ड्राइवर रखने का झंझट, न तनखा देने की चिंता, न मेंटनेंस की प्राब्लम और न सफाई रखरखाव का कोई सरोकार. खुद की कार न होते हुए भी हम तो कार वाले अब भी बने हुए हैं, पूरे ताव से. हिंहा से हुंहा तक कार ही कार, सिर्फ मोबाइल के एक बटन से कार हाजिर. दिल्ली शहर के बाहर हरिद्वार गया कुछ एकांत साधना करने, गंगा तट किनारे, तो ब्ला ब्ला कार पर एकाउंट बनाया और लगा तलाशने. कई जने मिल गए हरिद्वार जाने वाले. चुना मेरठ तक जा रहे एक साथी को. सोचा मेरठ में जर्नी ब्रेक कर अगले रोज हरिद्वार के लिए मेरठ से ब्ला ब्ला कार के सहारे निकल लूंगा. हुआ भी यही.

ब्ला ब्ला कार का कांसेप्ट है कि आपकी कार है तो आप ब्ला ब्ला कार डाट काम पर अपनी अगली यात्रा के बारे में डाल देते हैं कि फलां तारीख को फलां जगह से फलां जगह तक जा रहा हूं और मेरी कार में दो सीटें खाली हैं, इतने रुपये किराये देकर कोई भी चल सकता है, तो कोई कोई बे-कार मेरे जैसा आदमी मिल सकता है. कोई का मतलब ये है कि जो ब्ला ब्ला कार पर एकाउंट बनाए हुए हो और अपने को हर तरह से वेरीफाइ (मोबाइल नंबर, फेसबुक एकाउंट, आधार कार्ड आदि) कराए हुए है. ऐसे लोग ही राइड शेयर कर करा सकते हैं.

इसी तर्ज पर नोएडा के साफ्टवेयर इंजीनियर संदीप वाधवा की कार का साथ मिला और 120 रुपये देकर एसी कार का आनंद लेते, इन नए मिले / बने साथी से बतियाते गपियाते मेरठ जा पहुंचा. और हां, इनकी इजाजत लेकर बैग में रखा एक बीयर केन खोल लिया, सो यात्रा का आनंद डबल हुआ. मेरठ एक रात रुक कर अगले रोज हरिद्वार निकल गया, ब्ला ब्ला कार पर मेरठ हरिद्वार जाने वाली एक दूसरी कार को एप्रोच कर शेयर कर लिया. बता दें कि ब्ला ब्ला कार नान प्राफिट आर्गेनाइजेशन है और इसकी कोशिश पर्यावरण व फ्यूल बचाने और सामूहिकता-सामाजिकता की भावना डेवलप करने की है.

वाधवा जी की कार से जब मेरठ जा रहा था तो उनने बताया कि वे अक्सर नोएडा मेरठ आते जाते रहते हैं और अब तक आठ लोगों ने ब्ला ब्ला कार डाट काम के जरिए उनकी कार शेयर की है. सभी आठों लोग एक से बढ़कर एक उम्दा विचारों वाले मिले.. { इतना सुनकर मैंने अपनी पीठ चुपचाप ठोंक ली क्योंकि उनने मुझे भी उम्दा कैटगरी में रखा था, यह दुबारा उनसे पूछ कनफर्म करने के बाद किया 🙂 } उनने बताया कि हर बार की कार शेयर यात्रा बेहद आनंददायक रही, साथ ही कार तेल खर्च भी निकाल लिया.

तो साथियों, ओएलएक्स पर मेरा कार बेचना सफल रहा. लंबे समय तक कार के भीतर बैठकर दुनिया और जिंदगी को देखता रहा. अब सड़क पर आकर कार वालों से लेकर बेकार वालों तक को देखने समझने का फिर से मौका मिल रहा है और यह बड़ा आनंददायक है. हम जैसों के जीवन में रुटीन तोड़ना ही सबसे आनंददायक होता है, एक सा कुछ भी बोर करने लगता है. सो, तकनीक के इस दौर में पर्यटन के लिए कारों साधनों की कमी नहीं है, यह कार बेचने के बाद ज्यादा समझ में आया, बस, आपके ज्ञान चक्षु खुले रहने चाहिए.

ये सेल्फी साफ्टवेयर इंजीनियर वाधवा साहब के साथ तब की है जब उनने मुझे मेरठ पहुंचाया. मैं उन्हें 120 रुपये दे रहा था जो उनने ब्ला ब्ला कार पर मेंशन किया था कार शेयर का किराया, तो पहले वो लेने को राजी नहीं हो रहे थे लेकिन जब मैंने ब्ला ब्ला कार कांसेप्ट को जिंदा रखने के लिए कार तेल खर्च साझा करने की दुहाई दी तो वो मान गए. उनको 120 रुपये की जगह दो सौ रुपये दिए और कहा कि 80 रुपए ब्ला ब्ला कार वाले एनजीओ को मेरी तरफ से डोनेट कर दीजिएगा, इस नोबल कांसेप्ट के लिए. वाधवा जी मेरे फेसबुक फ्रेंड बन चुके हैं. इस तरह से एक नए और भ्रमणकारी मित्र से दोस्ती हो गई है.

अभी मैं नोएडा से बनारस के लिए ब्ला ब्ला कार पर एक साथी की तलाश की है. अब बताइए, फेसबुक पर कितने लोग नोएडा से बनारस कार से जाने वाले मिलेंगे और इसकी सूचना शेयर करेंगे? आपको ब्ला ब्ला पर दिल्ली से कोलकाता या गोवा तक कार से जाने वाले मिल जाएंगे. तो इस कानसेप्ट को प्रमोट करना चाहिए. हर कार मालिक को इससे जुड़ना चाहिए ताकि वो अगर उनकी कार में सीट कोई खाली हो तो किसी नए साथी को इच्छित किराया लेकर बिठा लें, और इस प्रकार अपने बढ़े हुए अहंकार रूपी बीपी को नार्मल कर चेहरे पर मुस्कान ला सकें. 🙂

एक रिकमेंडेशन आपके लिए. कभी कौशांबी मेट्रो स्टेशन के ठीक नीचे मेट्रो स्टेशन कैंपस में ही श्री रथ्नम साउथ इंडियन रेस्टोरेंट में जाइए. कार वालों के लिए पार्किंग की पर्याप्त जगह रेस्टों के ठीक सामने ही है. इस रेस्टोरेंट में पालक स्पेशल डोसा खाइए. आनंद आ जाएगा. रेस्टोरेंट में उपर नीचे इतनी जगह है, इतना साफ सुथरा सब कुछ है कि यहां घंटों मीटिंग करने या गपियाने का अलग ही आनंद है. इसी रेस्टो से सटा मैक्डी भी है जहां बर्गरबाज युवाओं युवतियों की अच्छी खासी भीड़ होती है. और हां, ठीक बगल में वेव सिनेमा है, फिलिम देखने का मूड भी फौरन बना सकते हैं. इतना प्लान करके जीना भी क्या जीना. फिलिम तो अचानक देख लेना चाहिए, या यूं कहिए दौड़ा कर देख लेना चाहिए, न तो देखने के लिए प्लानिंग करने के वास्ते दिमाग लगाने की जरूरत और न देखते हुए ही.

तो भइया, तकनालजी के कारण ओला ओएलक्स उबेर मेट्रो से जिंदगी ब्ला ब्ला हो गई है… ऐसे में हो जाए… झिंगा लाला… झिंगा लाला…

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com


मूल पोस्ट…

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दुबई की यात्रा पर गए हुए हैं अमर उजाला के 10 संपादक

अमर उजाला ने अपने दस संपादकों को दुबई की यात्रा पर भेजा है. ये संपादक हैं- इंदु शेखर पंचोली (लखनऊ), प्रभात सिंह (गोरखपुर), अजित वडरनेकर (वाराणसी), विजय त्रिपाठी (कानपुर), राजीव सिंह (मेरठ), भूपेंद्र (दिल्ली), संजय अभिज्ञान (चंडीगढ़), वीरेंद्र आर्य (रोहतक) और नीरजकांत राही (मुरादाबाद). अमर उजाला ने संपादकों को विदेश टूर पर भेजने का काम पहली बार किया है.

बताया जा रहा है कि इन संपादकों ने कंटेंट और सरकुलेशन के मोर्चे पर अच्छा काम किया है. इन्हें जो टारगेट दिया गया था, उसे पूरा किया. एबीसी के ताजे आंकड़े लक्ष्य के अनुकूल रहे. इस कारण प्रबंधन ने पुरस्कार के बतौर इन्हें भ्रमण पर भेजा है. वहीं, विघ्नसंतोषियों ने खबर उड़ाई है कि उन लोगों को विदेश टूर पर भेजा गया है जिन्होंने पुराने लोगों को निकालने और मजीठिया वेज बोर्ड के आग को ठंढा करने का काम भरपूर मात्रा में किया है.

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यूपी सीएम अखिलेश ने महज मौजमस्ती के लिए सरकारी पैसे पर विदेश टूर किया!

सरकारी खर्चों पर किए गये विदेश दौरों के बाद उन दौरों के दौरान सीखी गयी बातों को लेकर रिपोर्ट तैयार करना और उस पर अमल करना एक सामान्य प्रक्रिया है परंतु यूपी सीएम के सरकारी विदेश दौरे इस सामान्य प्रक्रिया से छूट प्राप्त श्रेणी में आते हैं. यह खुलासा लखनऊ निवासी सामाजिक कार्यकर्ता और इंजीनियर संजय शर्मा की एक आरटीआई से हुआ है। दरअसल, संजय की आरटीआई के जवाब में उत्तर प्रदेश के गोपन विभाग के विशेष सचिव एवं जन सूचना अधिकारी कृष्ण गोपाल ओर से जो उत्तर मिला है, उसने अखिलेश के विदेश दौरों की पोल खोल दी है.

संजय ने बताया कि साल 2013 में अखिलेश अपने 12 सदस्यीय शिष्टमंडल के साथ हावर्ड यूनिवर्सिटी के एनुअल सिंपोसियम में भाग लेने यूएसए गये थे. आज़म ख़ान की तलाशी के कारण यह दौरा विवादित हो गया और अखिलेश कार्यक्रम में शिरकत किए बिना ही लौट आए थे. अब इस आरटीआई जबाब से यह सामने आ रहा है कि इस दौरे पर गये 11 लोगों का खर्चा राज्य सरकार ने उठाया और एक सदस्य विजय कुमार यादव अपने खर्चे पर अखिलेश के साथ शायद अपने निजी हित साधने यूएसए गये थे. इस विदेश यात्रा की कोई रिपोर्ट प्रदेश सरकार को नहीं दी गयी है. संजय का मानना है कि हावर्ड यूनिवर्सिटी के एनुअल सिँपोसियम में भाग लेने यूएसए गये अखिलेश समेत 12 सदस्यीय शिष्टमंडल के इस विवादित दौरे से प्रदेश को कोई लाभ नहीं हुआ है.

अपनी आरटीआई से सरकार की कार्यप्रणाली को प्रायः कटघरे में खड़ा करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता संजय कहते हैं कि बीते साल में अखिलेश अपने 07 सदस्यीय शिष्टमंडल के साथ नीदरलेंड में पुष्प बाजार के भ्रमण, दुग्ध, फल एवं शाक-सब्जी की आधुनिक तकनीक के अध्ययन के लिए गये थे.अब इस आरटीआई जबाब से यह सामने आ रहा है कि इस दौरे पर गये सभी 07 लोगों का खर्चा राज्य सरकार ने उठाया और यह भी कि इन 07 लोगों में से कोई भी पुष्प, दुग्ध ,फल , शाक-सब्जी के  क्षेत्र का विशेषग्य नही था. इस विदेश यात्रा की भी कोई रिपोर्ट प्रदेश सरकार को नही दी गयी है. संजय का मानना है कि नीदरलेंड  गये अखिलेश समेत 07 सदस्यीय शिष्टमंडल के इस दौरे से प्रदेश को पुष्प, दुग्ध ,फल , शाक-सब्जी के क्षेत्र में कोई भी लाभ नही हुआ है.

संजय ने यह जानकारी हासिल करने के लिए पिछले वर्ष 10 फरवरी को मुख्य सचिव के कार्यालय में एक आरटीआई दायर की थी। आरटीआई अधिनियम के अंतर्गत हालांकि, 30 दिनों में ही सूचना देने की अनिवार्यता है, लेकिन  उत्तर प्रदेश के गोपन विभाग की उदासीनता के चलते संजय को यह अधूरी सूचना  गोपन विभाग द्वारा 11 महीने बाद दी गई है। अभी संजय को इन यात्राओं पर हुए खर्चों की जानकारी नही दी गयी है और उत्तर प्रदेश के गोपन विभाग के विशेष सचिव एवं जन सूचना अधिकारी कृष्ण गोपाल ने आरटीआई आवेदन का यह भाग अभी-अभी सचिवालय प्रशासन विभाग को भेजा है.

इन विदेश यात्राओं की  कोई रिपोर्ट प्रदेश सरकार को नही दिए जाने के संबंध में उत्तर प्रदेश के गोपन विभाग के विशेष सचिव एवं जन सूचना अधिकारी कृष्ण गोपाल ने कहा है कि विदेश यात्राओं के उपरांत राज्य सरकार को रिपोर्ट प्रस्तुत किए जाने की कोई व्यवस्था का प्रविधान नही है किंतु संजय इससे असहमत  हैं और कहते हैं कि सभी लोकसेवकों के द्वारा  सरकारी खर्चों पर किए गये विदेश दौरों के बाद उन दौरों के दौरान सीखी गयी बातों को लेकर एक रिपोर्ट तैयार कर उस पर अमल किया जाना एक सामान्य प्रक्रिया है और लोकसेवक होने के कारण  यूपी सीएम के सरकारी विदेश दौरे इस सामान्य प्रक्रिया से छूट प्राप्त श्रेणी में नही हो सकते हैं.

संजय ने सवाल उठाया है कि जब राजनेताओं के विदेशी दौरों के बाद उनकी कोई जवाबदेही ही नही निर्धारित है तो जनता के पैसों से किए गये ये विदेशी दौरे क्या महज मौजमस्ती के लिए और अपने चहेते नौकरशाहों और मंत्रियों को उपकृत करने के लिए किए जाते हैं? लोक जीवन में पारदर्शिता संवर्धन, जबाबदेही निर्धारण और आमजन के मानवाधिकारों के संरक्षण के हितार्थ  जमीनी स्तर पर कार्यशील संस्था ‘तहरीर’ के संस्थापक संजय ने इस संबंध में सूचना आयोग की सुनवाई में अपना पक्ष रखने के साथ-साथ देश के प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और सूबे के राज्यपाल और मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर राजनेताओं के विदेशी दौरों के बाद उनकी कोई जबाबदेही निर्धारित किए जाने की माँग करने और अपनी इस मुहिम की सफलता के लिए आवश्यकता होने पर न्यायालय जाने की बात कही है.

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