क्या आरएसएस के किसी आदमी ने ब्रिटिश हुकूमत से लड़ाई नहीं लड़ी?

Urmilesh Urmil : ‘आप’ वाले बीच-बीच में तमाम तरह के ग़लत फैसले और मूर्खताएं भी करते रहते हैं पर धीरे-धीरे उनमें कुछ राजनीतिक-प्रौढ़ता भी आ रही है। दिल्ली विधानसभा की गैलरी में में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ लड़ने वाले अनेक महान् योद्धाओं और नेताओं के कुल 70 चित्र लगे हैं। उनमें एक चित्र महान् योद्धा टीपू सुल्तान का भी है।

इसे लगाने के विरुद्ध जब भाजपाई नेताओं ने आपत्ति जताई तो पार्टी प्रवक्ता सौरभ भारद्वाज ने भाजपा विधायकों-नेताओं से विनम्रतापूर्वक कहा, ‘ विधानसभा गैलरी में ब्रिटिश हुकूमत से लड़ने वाले योद्धाओं के चित्र लगते हैं। जनसंघ-आरएसएस-भाजपा जैसे संगठनों के ऐसे तत्कालीन कुछ योद्धाओं के नाम भेजिए, हम उनके चित्र भी लगवायेंगे!’ यह प्रस्ताव दिए कई दिन हो गए पर भाजपा वाले अभी तक ऐसे लोगों के नाम की सूची लेकर नहीं आ सके!

वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश उर्मिल की एफबी वॉल से.

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मोदी और तोगड़िया : ये जंग हिंदू चहरे के लिए है!

देश में इन दिनों एक सवाल सबके पास है कि प्रवीण तोगड़िया और बीजेपी सरकार के बीच आखिर तकरार है क्या? क्या वजह है कि तोगड़िया ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है और क्या वजह है कि वो ये कह रहे हैं कि एनकाउंटर की साजिश रची जा रही है। तो जरा लौटिए 2017 दिसंबर के महीने में, क्यों कि संघ से जुड़े सूत्र कहते हैं कि विश्व हिंदू परिषद जो कि संघ की अनुषांगिक शाखा है, इसके इतिहास में पहली बार अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के लिए चुनाव करवाए गए। इसकी सबसे बड़ी वजह ये थी कि संघ के भीतर ही दो खेमे बन गए थे। एक खेमा चंपत राय को अध्यक्ष के रूप में देखना चाहता है तो दूसरा खेमा प्रवीण तोगड़िया को अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष के रुप में देखना चाहता था। लिहाजा तय किया गया कि इसके लिए चुनाव करवाए जाएंगे।

विश्व हिंदू परिषद में ज्यादातर प्रचारक हैं। इनमें 40 फीसदी प्रचारक प्रवीण तोगड़िया के साथ हैं। इसके साथ ही सुब्रमण्यम स्वामी, आचार्य धर्मेंद्र, गोविंदाचार्य, रासबिहारी और महावीर जी भी तोगड़िया के पक्षधर हैं। दरअसल हमेशा नरेंद्र मोदी के साथ रहने वाले तोगड़िया पिछले कुछ समय से सरकार से खफा हैं, क्योंकि पिछले कुछ समय से तोगड़िया राम मंदिर, किसान और बेरोजगारी के मसले पर लगातार सरकार को अपने निशाने पर ले रहे हैं। सूत्र कहते हैं कि सत्ता और संघ के कई नेता नहीं चाहते थे कि प्रवीण तोगड़िया विश्व हिंदू परिषद की कमान संभालें। इसी विरोधाभास को खत्म करने के लिए चुनाव का रास्ता निकाला गया लेकिन इस चुनाव में कुछ ऐसा हुआ जिसकी कल्पना भी शायद संघ और मोदी सरकार ने कभी नहीं की थी।

सूत्र कहते हैं कि जब भुवनेश्वर में वोटिंग हुई तो करीब 60 फीसदी वोट प्रवीण तोगड़िया को मिले, जबकि संघ और मोदी सरकार चंपत राय को अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष के रुप में देखना चाहते थे, जो मौजूदा समय में अंतरराष्ट्रीय महामंत्री हैं। तमाम कोशिशों के बावजूद प्रवीण तोगड़िया को सबसे ज्यादा वोट मिले। संघ के भीतर हुई इस घटना ने सबको सकते में डाल दिया था क्योंकि ये कोई छोटी बात नहीं थी, जब सरकार ने अपने ही संगठन में मुंह की खायी थी। इसी के बाद प्रवीण तोगड़िया के बेहोश मिलने वाली घटना होती है, जिस पर प्रवीण तोड़िया कहते हैं- ‘मैं सुबह अपने कार्यालय में पूजा कर रहा था तभी वहां मेरा एक परिचित आता है जो मुझसे कहता है कि आप यहां से तुरंत निकल जाइए क्यों कि कुछ लोग आपके एनकाउंटर के लिए निकले हैं’।

Z+ सिक्यूरिटी वाले प्रवीण तोगड़िया वहां से समय रहते निकल जाते हैं, जिसके बाद वो बेहोशी की हालत में मिलते हैं।

इसी समय राहुल गांधी देश भर के मंदिरों में हिंदू वोटबैंक खंगाल रहे हैं।

11 घंटे बाद बेहोशी की हालत में मिले प्रवीण तोगड़िया से मिलने के लिए हार्दिक पटेल पहुंचते हैं और ये इल्जाम लगाते हैं कि ‘इस पूरी घटना के पीछे मोदी और शाह का हाथ है’।  यहां एक अहम तस्वीर देखने को मिली क्योंकि विरोधी खेमे के हार्दिक पटेल तो अस्पताल में हालचाल जानने पहुंचे लेकिन पुराने साथी नरेंद्र मोदी और बीजेपी का कोई भी नेता प्रवीण तोगड़िया से मिलने अस्पताल नहीं पहुंचा। अलबत्ता तोगड़िया के इतने बड़े आरोपों पर बीजेपी एकदम खामोश है। वैसे ये वही बीजेपी है जिसने राम मंदिर का सपना अशोक सिंघल और प्रवीण तोगड़िया के कंधे पर बैठकर देखा था और ये वही प्रवीण तोगड़िया हैं जिन्हें 1979 में महज 22 साल की उम्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों का मुख्य मार्गदर्शक बनाया गया था।

इसी घटना के ठीक 24 घंटे पहले सर संघ चालक मोहन भागवत ने ये कहा था कि ‘सत्ता कृत्रम चीज है, वो बदलती रहती है’। आप इस बात का क्या मतलब निकालते हैं। जरा जोर देंगे दिमाग पर तो तस्वीर साफ हो जाएगी कि ये शब्द किसके लिए कहे गए थे और इसका आशय क्या था। अब जरा एक और तस्वीर देख लीजिए। राम मंदिर का संकल्प लेने वाले प्रवीण तोगड़िया पिछले 22 सालों से अपने घर नहीं गए हैं। बेटी की शादी में भी वो इसलिए नहीं पहुंच पाए थे क्योंकि उस दिन वो धर्म जागरण कार्यक्रम में थे। डॉ. प्रवीण तोगड़िया देश के सबसे बड़े कैंसर सर्जन में शुमार होते हैं। उन्होंने अपने पैसे से एक कैंसर इंस्टीट्यूट खोला है, जहां के मुनाफे के रुपयों में से 1 लाख रुपए उनके घर खर्च को जाता है। बाकी पूरा पैसा सेवा के काम में इस्तेमाल होता है। इतना ही नहीं, जब भी पैसे की कमी होती है तो विदेश जाकर सर्जरी करते हैं और उससे कमाए पैसे को संघ और सेवा कार्यों में खर्च करते हैं।

इसी तस्वीर के समानांतर एक और तस्वीर देखिए। देश में स्वर्गीय अशोक सिंघल और स्वर्गीय बालाजी साहब ठाकरे के बाद अगर किसी नेता की छवि हिंदू नेता के तौर पर सबसे प्रभावशाली थी तो वो नाम डॉ. प्रवीण तोगड़िया का है। संघ से जुड़े सूत्र खुद इस बात का दावा करते हैंं कि गुजरात हिंसा के समय सबसे प्रभावशाली हिंदू नेता प्रवीण तोगड़िया ही थे। उस दौर में तोगड़िया ने ही लाल कृष्ण आडवाणी से बात की थी और हालातों की जानकारी दी थी। लेकिन इसके बाद जो कुछ भी हुआ उसकी कल्पना भी किसी ने नहीं की थी। यही वो दौर था जब देश के हिंदू वोटबैंक ने एक चेहरे पर अपनी मुहर लगाई थी। ये चेहरा था गुजरात के तत्कालीन सीएम नरेंद्र मोदी का। लेकिन हकीकत कुछ और ही थी जिससे आज भी पर्दा नहीं उठा है। देश जिस हिंदू चेहरे को स्वीकार रहा था उसके पीछे सबसे बड़ा योगदान तो प्रवीण तोगड़िया का था। काम तोगड़िया कर रहे थे और नाम मोदी का हो रहा था।  कई बार ये क्रेडिट था तो कई मायनों में इसे डिसक्रेडिट भी कहा गया, क्यों कि जिस रीयल हिंदू नेता की छवि को देश देख रहा था असल में उसका जमीन पर कुछ भी आधार था ही नहीं। करते तोगड़िया जा रहे थे लेकिन सीएम होने के नाते उसका पूरा श्रेय मोदी लेते जा रहे थे।

मौजूदा समय में जो क्लेश है या जो विवाद है, वो यही है कि असल में हिंदू चेहरा है कौन? प्रधानमंत्री मोदी ने देश के सामने खुद को हिंदू चेहरे के रूप में पेश किया। लेकिन अगर इसे समझना हो तो उदाहरण के तौर पर क्रिसिटोफर मार्लो और विलियम शेक्सपीयर को देखा जा सकता है। कहा जाता है कि विलियम शेक्सपीयर ने क्रिस्टोफर मार्लो को अपने घर में रख रखा था। वो उनको खाना, कपड़े और पैसे देते थे। इसके एवज में क्रिस्टोफर लिखते थे लेकिन विलियम शेक्सपीयर उसे अपने नाम से प्रकाशित करवाते थे। ठीक इसी तरह से जो कुछ भी होता था वो करते तो प्रवीण तोगड़िया थे लेकिन उसका फल या प्रतिफल नरेंद्र मोदी को मिलता था। बल्कि नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने में सबसे बड़ा सपोर्ट भी प्रवीण तोगड़िया का ही था लेकिन पिछले कुछ समय से तोगड़िया ने खिलाफत का रास्ता चुन लिया था। वो चाहते थे कि राम मंदिर पर संसद में कानून लाया जाए। बेरोजगारी और किसानों की समस्या को सिरे से नकारा ना जाए। इनसे निपटने के लिए रणनीति बनाई जाए। असल में जो हिंदू वोटबैंक के मसीहा थे वो प्रवीण तोगड़िया ही थे, इसलिए सत्ता को उनकी खिलाफत नागवार लगने लगी। अंदर ही अंदर ये डर सताने लगा कि कहीं तोगड़िया ही सबसे बड़ा चेहरा ना बन जाएं इसलिए उनको संगठन से बाहर रखे जाने का फैसला किया गया।

यहां सबसे ज्यादा भटकी हुई कांग्रेस थी। अगर कांग्रेस ने 2002 में आरोपों के कटघरे में मोदी की जगह प्रवीण तोगड़िया को रखा होता तो शायद आज ये तस्वीर खड़ी ही नहीं होती लेकिन कांग्रेस ने ऐसा नहीं किया। उसने हमेशा अपने निशाने पर मोदी को लिया। मोदी खुद भी इस बात को बार बार कहते हैं कि उन्होंने अपनी परेशानियों को अपने मौके में तब्दील किया है। असलियत भी यही है। ये बिल्कुल वैसा ही नजारा है जैसा अगर आप मोदी की तस्वीर को साफ करेंगे तो उसके अंदर से तोगड़िया की तस्वीर को निकलकर सामने आना होगा।

अनुराग सिंह
प्रोड्यूसर
सहारा समय
नोएडा
singh.or.anu@gmail.com

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भाजपा वालों के झूठ की उमर बस चंद मिनट ही है…

डॉ राकेश पाठक

असत्य और अर्ध सत्य की आधी रोटी पर दाल लेकर भागने वाले अब हर दिन लद्द पद्द औंधे मुंह गिर रहे हैं..लेकिन हद ये है कि बाज फिर भी नहीं आते। राहुल गांधी ने पार्टी अध्यक्ष के लिये नामांकन भरा तो भाई लोगों को पेट में मरोड़ उठी। मध्य प्रदेश में बीजेपी के मीडिया सेल  “जॉइंट मीडिया इंचार्ज” के सर्वेश तिवारी ने तुरंत फोटो शॉप की शरण गही और गांधी की फोटो की जगह किसी मुगल बादशाह की फोटो चैम्प दी। तिवारी ने अपनी फेसबुक वॉल और तमाम व्हाट्सएप्प ग्रुप्स में ये फ़र्ज़ी फोटो पटक दी और सवाल पूछा कि “राहुल गांधी की फोटो में कौन से महापुरुष दृष्टिगोचर हो रहे हैं..?

चंद मिनट में इस फ़र्ज़ी फोटो की कलई खुल गई। जाहिर है राहुल गांधी के नामांकन के समय पीछे किसी मुगल बादशाह की फोटो न थी न हो सकती थी। बीजेपी के इस फोटोशॉपिये सुरमा को अच्छी लानत मलामत सोशल मीडिया पर ही हो गयी। ये कोई पहला मौका नहीं है जबकि इस तरह के झूठ का शीराज़ा थोड़ी ही देर में न बिखर गया हो। अब तो हालात ये हो गयी है कि बीजेपी का आईटी सेल फोटो शॉप , कट पेस्ट का कारनामा करता है तो अगले कुछ मिनट में उसकी बखिया उधड़ जाती है। अगर आप पिछले चार पांच सालों पर नज़र डालें तो आसानी से साफ हो जाएगा कि उनके झूठ की उमर धीरे धीरे कम होती गयी है।

सन 2014 से पहले उनका झूठ कुछ महीनों ज़िंदा रहता था। जैसे नेहरू के गाज़ी खां का वंशज होने वाला मसाला। फिर 2015 में सुभाष चंद बोस के खिलाफ ब्रिटिश पीएम क्लीमेंट एटली को लिखी गई नेहरू की “फ़र्ज़ी” चिट्ठी कुछ घंटे जीवित रह पायी। 2016 में भी उनके परोसे गए झूठ कुछ घंटे से ज्यादा टिक नहीं पाए। और अब 2017 की इस उतरती सांझ में उनके झूठ चंद मिनट में ही दम तोड़ देते हैं। बीजेपी के आईटी सेल के राष्ट्रीय मुखिया अमित मालवीय हाल के दिनों लगभग हर पोस्ट पर चारों खाने चित्त गिरे। “नारियल के जूस” का मामला “आलू से सोने का जुमला” या नेहरू की अपनी सगी बहन को लाड़ करने वाली तस्वीरें अमित मालवीय का झूठ चार पाँच मिनट में ही काल कवलित हो गया।

और तो और प्रधान सेवक भी झूठ की सवारी गांठने में फिसल चुके हैं। अभी चार दिन पहले मोदी जी ने मोरबी की बाढ़ के समय इंदिरा गांधी द्वारा नाक पर रुमाल रखने का आरोप लगाया तो कुछ मिनट में “चित्रलेखा” पत्रिका की पूरी तस्वीर हक़ीक़त बयान करने को आ गयी। साफ दिख रहा था कि RSS कार्यकर्ता और प्रशासन के लोग भी नाक पर कपड़ा बांधे थे। लाशों और भीषण गंदगी के कारण प्रशासन ने बाकायदा निर्देश दिया था कि सब मास्क लगाएं।

ये बहुत थोड़े से नमूने हैं..बाक़ी आप याद कर लीजिए कि पिछले महीनों में इनके कितने झूठ ढेर हो चुके हैं।  दरअसल संघ और बीजेपी ने 2010- 11 के आसपास तमाम झूठ गढ़े और इतिहास से अनभिज्ञ नई पीढ़ी को परोस दिये। “व्हाटसएप्प और फेसबुक विश्वविद्यालय” में पली बढ़ी इस पीढ़ी ने सहज ही इस पर यकीन कर लिया। “सत्तर साल में कुछ नहीं हुआ” जैसे निराधार जुमले पर यकीन करते वक्त उसे यह भी नहीं दिखा कि जिस इंटरनेट और आधुनिक युग में वो जी रही है उस में कुछ ठहर कर सच जानना ज्यादा कठिन नहीं है।

सच ये है कि जब इस झूठ और फर्जीवाड़े की सुनामी आ रही थी तब कांग्रेस और उसके कर्ताधर्ता कम्बल ओढ़ कर घी पी रहे थे। खाये अघाये इन लोगों ने झूठ के खिलाफ कमर नहीं कसी तब समाज के स्वतंत्रचेता लोगों ने कमान अपने हाथ मे ले ली। अब जब आधी लड़ाई साधारण लोग जीत चुके तब जाकर कांग्रेस की नींद टूटी। ये सच है कि दिव्य स्पंदन उर्फ राम्या के कांग्रेस आईटी सेल का मुखिया बनने के बाद सोशल मीडिया पर बीजेपी और संघ को कड़ी चुनौती मिल रही है लेकिन असल पटखनी तो वे लोग दे रहे थे जिनका कांग्रेस से सीधा कोई लेना देना नहीं है। ऐसे लोग बस अपनी मर्ज़ी से फर्जीवाड़े और झूठ के खिलाफ लड़ रहे थे।

आखिर में सवाल उन भले और भोले लोगों से… क्या आपको लगता है कि कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने जा रहा व्यक्ति किसी मुगल बादशाह की तस्वीर अपने पीछे रखवायेगा? अगर आप इस तरह की तस्वीर पर यकीन कर उसे शेयर,फारवर्ड कर रहे थे तो माफ कीजिये झूठ परोसने वालों से ज्यादा मूर्ख आप ख़ुद हैं! वे तो जो हैं सो हइये हैं!

लेखक डॉ राकेश पाठक वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क rakeshpathak0077@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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पत्रकारों ने चलाया अभियान- मजीठिया नहीं तो भाजपा को वोट नहीं

कांग्रेस औऱ सपा के समर्थन में खड़े हुए कलम के सिपाही… लखनऊ। उत्तर प्रदेश के निकाय चुनाव में इस बार पत्रकारों की नाराजगी भाजपा के लिए भारी पड़ सकती है। पत्रकारों के मजीठिया वेज बोर्ड के मामले में सुप्रीम कोर्ट के 6 माह के टाइम बाउंड फैसला आने के बाद भी उत्तर प्रदेश का श्रम विभाग और श्रम न्यायालय पत्रकारों के प्रति सौतेला व्यवहार कर रहा है। अपनी जायज मांगों को पूरा न होता देख पत्रकारों ने भाजपा सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।

वर्तमान में उत्तर प्रदेश में करीब 50 हजार पत्रकार मजीठिया वेज बोर्ड की मांग कर रहे हैं। जिनमे क़रीब 5 हजार पत्रकार मजीठिया वेज बोर्ड की मांग के चलते प्रिंट मीडिया से निकाले जा चुके हैं। और उनमें से ज्यादातर पत्रकार अब इलेट्रॉनिक मीडिया की ओर रुख कर चुके है।

कैसे हो रहा विरोध
उत्तर प्रदेश के पत्रकारों ने ‘ भाजपा हराओ, मजीठिया पाओ’ नामक व्हाट्सएप ग्रुप तैयार किया है। लगातार 24 घंटे सक्रिय होकर इस ग्रुप में भाजपा हराने की रणनीति तैयार की जा रही है। इस ग्रुप में दैनिक जागरण, अमर उजाला, हिन्दुतान, टाइम्स ऑफ इंडिया, हिन्दुस्तान और हिन्दुतान टाइम्स समेत कई बड़े अखबार के  पत्रकार सदस्य हैं।

क्या है मामला
प्रिंट मीडिया में देश भर के पत्रकारों को मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वर्ष 2011 से वेतन मिलना था। देश भर के पत्रकार अपना वाजिब मेहनताना मांगते रहे लेकिन कंपनी मालिकों का दिल आज तक नहीं पसीजा। इसमें श्रम विभाग भी पूरी तरह अखबार मालिकों के साथ खड़ा दिखा। जिस पत्रकार ने मजीठिया वेज बोर्ड की मांग की उसे या तो नौकरी से निकल दिया गया या फिर इतना परेशान किया गया कि वह स्वतः नौकरी छोड़ने को मजबूर हो गया। उत्तर प्रदेश के करीब 50 हजार पत्रकारों ने अब अपनी मजीठिया वेज बोर्ड की मांग को लेकर भाजपा के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।

वरिष्ठ पत्रकारों ने सराहा
लखनऊ समेत पूरे प्रदेश भर के पत्रकारों ने पत्रकारों की इस पहल की सराहना की है। पत्रकारों के संगठन यूपी प्रेस क्लब, जर्नलिस्ट एसोसिएशन, उपजा, मानवाधिकार प्रेस संगठन,  मजीठिया समिति आदि सभी ने एक सुर में भाजपा के इस सौतेले व्यवहार की निंदा की है।

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बीजेपी ही क्यों नैतिकता की दुहाई दे?

Narendra Nath : इस हफ्ते तीन चुनाव हुए। महाराष्ट्र नगरपालिका। और आज गुरुदासपुर लोकसभा और केरल में विधानसभा उपचुनाव। महाराष्ट्र में कांग्रेस पहले से थी और इस बार और बड़े मार्जिन से जीती। गुरुदासपुर लोकसभा बीजेपी के पास थी और विनोद खन्ना यहां से 20 साल से एमपी थे। उनके मरने के बाद चुनाव हुआ। लेकिन सहानुभूति फैक्टर काम नहीं आया और रिकार्ड मतों से कांग्रेस जीत रही। केरल में जिस विधानसभा सीट पर उपचुनाव था वहां मुस्लिम वोट काफी थी। लेकिन बीजेपी ने लव जेहाद का बहुत बड़ा मुद्दा अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश की। लेकिन 2016 में वहां तीसरा स्थाान पाले वाली बीजेपी आज चौथे स्थान पर आ गयी। हाल में केरल में किस हाई वोल्टेज बीजेपी ने कैंपेन किया वह सब देख सकते हैं। वहीं इलाहबाद यूनिवर्सिसटी में भी कर देर रात एसपी ने चुनाव जीता।

अब इन परिणाम को समझें। कायदे से इसका बहुत खास महत्व नहीं है। यह निहायत लोकल टाइम चुनाव हैं जिसका कोई एक समग्र निहितार्थ नहीं निकाला जा सकता है। अगले महीने हिमाचल प्रदेश और गुजरात में चुनाव होंगे और फिर बीजेपी चुनाव जीत लेगी तो यह विपक्ष के लिएचार दिन की चांदनी वाली बात साबित हो जाएगी।

तो क्यों जीत रही है बीजेपी?

इसका भी उत्तर आज ही मिला। इधर जब बीजेपी गुरुदारसपुर लोकसभा चुनाव बुरी तरह हार रही थी तभी पार्टी हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस नेता सुखराम के पूरे परिवार को अपनी पार्टी में शामिल करने के लिए रेड कारपेट वेलकम दे रही थी। वही सुखराम, टेलीकॉम घोटाले वाले, जो मार्डन करप्शन के प्रतीक है। वही सुखराम जिनके घर करोड़ों का कैश मिलने के बाद बीजेपी ने कभी संसद का पूरा सत्र नहीं चलने नहीं दिया था। मतलब नैतिकता और किसी भी कीमत पर जीत के सवाल पर मोदी-शाह की टीम किसी भी कीमत पर जीत को तरजीह देते हैं। यही कारण है कि 2019 से पहले पश्चिम बंगाल में नारदा घोटाले वाले मुकुल राय, महाराष्ट्र में करप्शन के प्रतीक नारायण राणे भी बीजेपी की दहजीज पर खड़े हैं और उन्हें रेड कार्पेट वेलकम दिया जा रहा है।

फिर पूछेंगे कि इसमें गलत क्या है? राजनीतिक दल चुनाव नैतिकता नहीं जीत-हार के लिए लड़ते हैं। बीजेपी क्यों इससे पीछे हटे। दुरुस्त है। कांग्रेस और विपक्ष भी तो यही कर इतने दिनों सत्ता में रही।

यही सही जवाब है। बीजेपी ही क्यों नैतिकता की दुहाई दे? मेरे हिसाब से कुछ भी गलत नहीं है। पब्लिक के सामने सबकुछ है। बीजेपी भी छुपकर नहीं कर रही। और बीजेपी नेता मुगालते में भी नहीं है। कल जाकर उन्हें लालू,सुरेश कालमाड़ी या ए राजा से राजनीतिक मदद लेनी पड़े तो भी वह खुशी-खुशी लेंगे। राष्ट्रवाद के नाम पर लड़ने वाली पार्टी ने बुरहान बानी को शहीद बताने वाली पार्टी से सरकार बना रखी है ना? गोवा और नार्थ-ईस्ट में बीफ का सपोर्ट करती है ना? जीत के लिए साम-दाम-दंड-नीति की बदौलत पिछले कुछ सालों से अजेय है, इस पर कोई संदेह या विवाद नहीं है और छोटी-मोटी हार के बाद पार्टी खुद को करेक्ट करती रही है।

इन सबके बीच मेरी आपत्ति बस इन्हें अंधे सपोर्टरों से हैं जो राजनीति की असलियत पर आंख मूंदते हुए holier-than-thou की दुहाई देते हैं। हर विरोध करने वालों को करप्ट,एंटी नेशनल टाइप बोलते रहते हैं। मैं पुण्य और दूसरे पापी, मैं साधु दूसरे शैतान, का चोला ओढ़ा नायाब-नायाब तर्क देते हैं। बाबू मोशाय, यह राजनीति एक हमाम है और हम सब इसमें नंगे हैं। जॉनी, जिनके घर शीशे बने के होते हैं, दूसरों पर शीशा नहीं फेंका करते हैं।

टाइम्स आफ इंडिया में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार नरेंद्र नाथ की एफबी वॉल से.

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एनडीटीवी और एबीपी न्यूज के अलावा बाकी सभी अखबार-चैनल करवा चौथ व्रत पर हैं!

Sheetal P Singh : सिर्फ एनडीटीवी और एबीपी न्यूज़ ही यह सूचना लोगों तकपहुंचा रहे हैं कि जय शाह की संपत्ति 16000 गुना बढ़ी| जबकि यह खुद जय शाह ने अपने रिटर्न में दाखिल किया है| बाकी सारे चैनल/ अखबारों के वेबपेज आज करवा चौथ के व्रत पर हैं!

Avinish Mishra : भक्तों की गुप्त डायरी से… मोटा भाई ने कोई घोटाला नहीं किया है.. मोटा भाई का संपत्ति तीन सौ गुणा नहीं बढ़ा है.. मोटा भाई के बेटे का बिजनेस 16000 गुणा नहीं बढ़ा है.. ये सब कोरी अफवाह है.. पार्टी को बदनाम करने कि साजिश है.. वामपंथी साजिश एक बार फिर नाकाम होंगे.. सुधर जाओ वामपंथियों.. दूध जैसे मोटा भाई पर दाग लगा रहे हो?? आई लव मोटा भाई.. आई लव जै भाई.. आई लव मोदी.. धन्यवाद!!

Dilip Khan : दो ही बातें हो सकती हैं। या तो जय शाह ने ईमानदारी से पैसे कमाए या फिर बेइमानी से। अगर ईमानदारी से कमाए तो जय शाह उद्यमियों का नायक हो सकता है। लेकिन सारे भक्त जिस तरह इस स्टोरी पर रिएक्ट कर रहे हैं, उससे ईमानदारी वाली बात ख़ुद ही ख़ारिज हो जा रही है। भक्त ख़ुद ही मिट्टी पलीद कर देते हैं वरना मैं तो शुरू से कह रहा कि जय शाह ने “दीन दयाल उपाध्याय पुत्रोन्नति योजना” के तहत पैसे कमाए। जय शाह जब उद्यमी बना तो कुछेक हज़ार रुपए से शुरुआत की। जय शाह को 2013-14 में 1,724 रुपए का घाटा हुआ। फिर जय शाह के पापा जिस पार्टी के अध्यक्ष थे, वो सत्ता में आ गई। जय शाह की कंपनी अगले ही साल साढ़े 80 करोड़ रुपए का व्यापार करने लग गई। ये देखकर पूरे देश में खुशहाली छा गई। अभूतपूर्व विकास देखकर लोगों ने रोटी की जगह केक खाना शुरू कर दिया। यूनेस्को ने इसे सर्वश्रेष्ठ विकास घोषित कर दिया। [आप चाहें तो जय शाह को विकास शब्द से रिप्लेस करके भी पढ़ सकते हैं]

वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी सिंह, अविनीश मिश्रा और दिलीप खान की एफबी वॉल से.

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बीजेपी अब मुसलमानों के लिये भी अछूत नहीं रह गई है!

अजय कुमार, लखनऊ

उत्तर प्रदेश विधान परिषद की सदस्यता से इस्तीफा दे चुके पूर्व सपा नेता यशवंत सिंह, बुक्कल नवाब और बसपा के ठाकुर जयवीर सिंह ने अंतत कुछ घंटों की देरी से भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर ही ली। सदस्यता ग्र्रहण करते समय तीनों ही नेताओं ने अपनी पूर्व की पार्टियों पर तमाम आरोप लगाते हुए उसे कटघरे में खड़ा किया तो भाजपा को सबसे बेहतर बताया। सपा नेता यशवंत सिंह और बसपा नेता जयवीर सिंह के बीजेपी की सदस्यता ग्रहण करने से तो किसी को कोई खास हैरानी नहीं हुई, लेकिन कल तक सपा का मुस्लिम चेहरा समझे जाने वाले बुक्कल नबाव का बीजेपी ज्वाइन करना चौंकाने वाला घटनाक्रम रहा। इससे बीजेपी को कितना फायदा होगा यह तो भविष्य की गोद में छिपा होगा, मगर इतना जरूर है कि बुक्कल के बीजेपी में आने से जनता के बीच एक मैसेज तो गया ही कि बीजेपी अब मुसलमानों के लिये भी अछूत नहीं रह गई है।

मुसलमानों के बीच से भी ऐसे लोंग सामने आने लगे हैं जिनकी नजर में बीजेपी साम्प्रदायिक पार्टी नहीं रह गई है। उससे मुसलमानों को कोई खतरा नहीं है। हो सकता है कि आने वाले दिनों में कुछ और मुस्लिम चेहरे भी बीजेपी की ओर रूख करें। इस क्रम में बसपा से हाल में निकाले गये एक बड़े़ मुस्लिम नेता का भी नाम लिया जा रहा है।

अपनी-अपनी पार्टी से बगावत करके भाजपा की सदस्यता ग्रहण करने वालें नेताओं की अहमियत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष व उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य व उप-मुख्यमंत्री डा. दिनेश शर्मा की मौजूदगी में तीनों नेताओं ने भाजपा की सदस्यता ग्रहण की। भाजपा के रीति-नीति व सिद्धान्तों में आस्था जताई। इस मौके पर उत्तर प्रदेश अध्यक्ष केशव मौर्य ने कहा, भाजपा हर उस व्यक्ति का स्वागत करेगी जो अच्छा काम करते हैं। निश्चित ही इससे बीजेपी का विधान परिषद में तो संख्या बल बढ़ेगा ही। इसके अलावा बीजेपी के कई उन दिग्गजों की भी राह आसान हो जायेगी, जिन्हें आलाकमान द्वारा बैक डोर से माननीय बनाने के प्रयास किये जा रहे थे।   

बहरहाल, नेताओं के पाला बदलने का पूरा घटनाक्रम काफी रोमाचंक और गोपनीय तरीके से अंजाम तक पहुंचा। गत दिनों भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह तीन दिवसीय (29 से 31 जुलाई तक) उत्तर प्रदेश दौरे पर लखनऊ पहुंच भी नहीं पाये थे और यूपी की सियाासत में बिना किसी सुगबुगाहट के भूचाल आ गया था। 29 जुलाई को शाह के लखनऊ पहुंचने से पूर्व ही सपा के दो और बसपा के एक एमएलसी ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया तो सपा-बसपा में टूट ने उन राजनैतिक पंडितों की नींद उड़ा दी जो अपने आप को सियासत की दुनिया का बड़ा खिलाड़ी समझते थे। सपा-बसपा आलाकमान को तो खबर नहीं लगी ही, मीडिया भी इस टूट से सन्न रह गया।

अमित शाह के दौर से पूर्व समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव के करीबी कहे जाने वाले और लखनऊ में अवैध निर्माण तथा गलत तरीके से करोड़ो रूपये की सरकारी जमीन पर मालिकाना हक जता कर सपा सरकार से मुआवजा लेने के आरोपी बुक्कल नवाब और निर्दलीय विधायक रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया के करीबी सपा एमएलसी यशवंत सिंह सहित बसपा एमएलसी जयवीर सिंह के इस्तीफ्रे की बात सामने आई थी। उक्त नेताओं के विधान परिषद से इस्तीफों से परिषद में तीन सीटें खाली हों गई हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, उप मुख्यमंत्री दिनेश शर्मा, मंत्री स्वतंत्र देव, मोहसिन रजा और उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या  को 19 सितंबर से पहले विधान मंडल की सदस्यता लेनी है। उनके लिये यह इस्तीफे अच्छी संभावना पैदा करते हैं।

उधर, सपा-बसपा में टूट दोनों दलों के लिये करारा झटका और कांग्रेस के लिये गुजरात के बाद यूपी में भी खतरे की घंटी है। इस्तीफा देने वाले सभी नेताओं ने मोदी और योगी की तारीफ के कसीदे पढ़कर यह जगजाहिर कर दिया था कि वह सब जल्द ही भगवा रंग में रंग जायेंगें और ऐसा ही हुआ। समाजवादी पार्टी में यह टूट उस समय आई है,जब अखिलेश चारों तरफ से घिरे हुए थे। बाप-चचा से उनकी अनबन जगजाहिर है तो पार्टी के कई पुराने नेताओं को भी अखिलेश की सियासत समझ में नहीं आ रही है। अखिलेश द्वारा पिता मुलायम को हासिये पर डालने के बाद सपा से पूर्व में भी कई नेतओं अम्बिका चौधरी जैसे नेताओं का भी मोहभंग हो चुका है। अंबिका चौधरी के सपा छोड़ने पर मुलायम सिंह भी बेहद दुखी हुए थे और पार्टी में उनके योगदान की सार्वजनिक मंच से सराहना भी की थी। दो नेताओं के बीजेपी में जानें की खबर से शिवपाल यादव भी अखिलेश के खिलाफ उग्र हो गये है। यह और बात है कि ऐन समय पर शिवपाल की तेजी के चलते एमएलसी मधुकर जेटली को इस्तीफा देने से रोक लिया गया। 

दरअसल, पुराने समाजवादियों को मलाल इस बात का है कि सत्ता गंवाने के बाद अखिलेश अभी तक न तो कोई आंदोलन खड़ा कर पायें हैं और न भविष्य की सियासत अपने दम पर आगे ले जाने की हिम्मत जुटा पा रहे हैं, जबकि ऐसी ही विषम परिस्थितियों से मुलायम सिंह यादव कई बार पार्टी को उबार कर बाहर ले जाने में सक्षम रहे थे। 1991 में राम लहर में सपा का बुरी तरह से सफाया हो गया था, उसके पास मात्र 04 सांसद और 19 विचाायक बचे थे, लेकिन मुलायम की नेतृत्व क्षमता पर कभी किसी ने इस तरह से उंगली नहीं उठाई थी, जैसी आज अखिलेश पर उठाई जा रही है। मुलायम सिंह और चचा शिवपाल से बेअदबी के बाद चीन के पक्ष में अखिलेश के हाल के बयान को पार्टी के कई दिग्गज उनकी अपरिपक्त्ता से जोड़ कर देख रहे हैं। सपा नेताओं के अचानक पार्टी छोड़ने को लेकर पार्टी के वरिष्ठ नेता और सांसद नरेश अग्रवाल भले ही कह दहे हों कि कुछ लोग होते हैं मौकापरस्त, फायदे के लिए बदल लेते हैं पाला। इससे पार्टी पर असर नहीं पड़ने वाला है,लेकिन यह पूरी हकीकत नहीं है। सपा के पास कुछ खास बचा नहीं है और उसमें से भी कुछ इधर-उधर हो जायेगा तो फर्क तो पड़ेगा ही। सपा के मुख्य प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी इसका दोष केवल बीजेपी के ही मत्थे मढ़ रहे थे। उनका कहना था कि बीजेपी अच्छी सियासत नहीं कर रही है।

बात बहुजन समाज पार्टी में टूट की कि जाये तो पार्टी में टूट का पुराना इतिहास रहा है। आज की तारीख में बसपा में कोई ऐसा नेता नहीं बचा है जिसका इतिहास कांशीराम के साथ बसपा मूवमेंट से जुड़ा रहा हो। विधान सभा चुनाव के समय तो बसपा में इस्तीफों की बाढ़ ही आ गई थी। स्वामी प्रसाद मौर्य, बृजेश पाठक से लेकर पार्टी छोड़ने वालों की लम्बी लिस्ट थी। इससे पहले भी एक बार बीएसपी में जबर्दस्त फाड़ हुआ था,जब बीजेपी-बसपा गठबंधन की सरकार चल रही थी। उस समय पहले मायावती छहः माह के लिये मुख्यमंत्री बनीं थी, लेकिन जब छहः महीने बाद बीजेपी को सत्ता सौंपने की बारी आई तो मायावती ने हाथ खड़े कर लिये। इसके बाद  बड़ी संख्या में विधायकों ने बसपा छोड़ कर कल्याण सिंह सरकार को समर्थन दिया था,जिसके बल पर वह सरकार बनाने मे सफल रहे थे।

कांग्रेस ने पूरे घटनाक्रम को अलोकतांत्रिक बताते हुए कहा कि बीजेपी के दिग्गज नेता और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, डिप्टी सीएम दिनेश शर्मा और केशव प्रसाद मौर्या चुनाव लड़कर विधायक बनने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं, इसी लिये बैक डोर से विधायक बनने के लिये यह सब कारनामा हो रहा है। उधर, बीजेपी ने इन इस्तीफों का बीजेपी से संबंध होने से इंकार किया. पार्टी नेता और यूपी सरकार में मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह ने कहा कि इन इस्तीफों के बारे में अखिलेश यादव ही जवाब दे सकते हैं ये उनकी पार्टी का अंदरूनी मामला है।

दरअसल, सपा और बीएसपी में लगी यह सेंधमारी एक दिन का खेल नहीं थां। महीनों से इसके लिये प्रयास चल रहे थे। यह और बाद है कि संगठन से अधिक अन्य बातों पर गंभीर रहने वाले सपा-बसपा आलाकमान की नजर इधर गई ही नहीं। इसके पहले भी राष्ट्रपति चुनाव में एनडीए के उम्मीदवार के पक्ष में दोनों ही पार्टियों के कई विधायकों ने पार्टी लाइन के इतर मतदान किया था। गौर करने वाली बात यह भी है कि यूपी विधान सभा चुनाव के पहले जिस तरह से स्वामी प्रसाद मौर्य ने पार्टी छोड़ी उसके बाद से ही मायावती के राजनैतिक भविष्य पर सवाल उठने लगे थे। वहीं सपा की कमान अखिलेश यादव के हाथ में आने के बाद से ही लगातार इसमें चूक दिख रही है।

टूट के संबंध में बीजेपी भले ही बार-बार कह रही हो कि सपा के दो और बीएसपी के एक एमएलसी के इस्तीफे के पीछे उसका कोई हाथ नहीं है, लेकिन इस पर विश्वास नहीं किया जा सकता है।  सूत्रों की मानें तो तीनों एमएलसी से लम्बे समय से बीजेपी के लोग संपर्क बनाये हुए थे। यह विधायक बार-बार सार्वजनिक और गुपचुप तौर पर बीजेपी नेताओं से मिलते रहते थे। बावजूद इसके न तो इसकी भनक सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव को लगी और न ही बीएसपी सुप्रियों मायावती को। अगर दोनों को वक्त पर भनक लग जाती तो इन एमएलसी पर पार्टी सख्त ऐक्शन ले सकती थी। मायावती इसके पहले पार्टी से बगावत में लगे विधायकों-नेताओं को बाहर का रास्ता दिखा चुकी हैं।

लब्बोलुआब यह है कि सियासी बाजार मे बीजेयी का भाव सबसे अच्छा नजर आ रहा है। 2019 के लोकसभा चुनाव तक यही ट्रेंड बरकरार रहने की उम्मीद है। अगर बसपा-सपा और कांग्रेस एक ही छतरी के नीचे आ जाये तो तब जरूर हालात कुछ बदल सकते हैं। फिलहाल बिखरा विपक्ष किसी भी तरह से मोदी और बीजेपी का सामना करने की हैसियत में नहीं है।

लेखक अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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देश को ‘कांग्रेस मुक्त’ करने के मायने

श्रीगंगानगर। कांग्रेस मुक्त भारत। कांग्रेस मुक्त देश। बीजेपी के महापुरुष नरेंद्र मोदी के ये शब्द लगभग 3 साल से मेरे कानों मेँ गूंज रहे हैं। अकेले मेरे ही नहीं और भी ना जाने कितने करोड़ देश वासियों के कानों मेँ होंगे ये शब्द। किसी के कानों मेँ मिठास घोल रहे होंगे और किसी के जहर। इन शब्दों का मायने ना जानने वालों के लिए ये शब्द गुड़ है और जो समझ रहे हैं उनके लिए कड़वाहट है। चिंता भी है  साथ मेँ चिंतन भी।

देश को कांग्रेस मुक्त बनाना है… भारत को कांग्रेस से मुक्त करने का सपना है…. इन शब्दों को राष्ट्रप्रेम, राष्ट्रभक्ति के साथ इस प्रकार से जोड़ दिया गया कि यूं लगने लगा जैसे फिर किसी ने अंग्रेज़ो भारत छोड़ो का नारा बुलंद किया हो। देश  मेँ ना जाने कितनी राजनीतिक पार्टियां हैं। मगर देश को मुक्त केवल कांग्रेस से करना है। क्यों? क्योंकि मोदी जी कांग्रेस का अर्थ जानते हैं ! मोदी जी समझते हैं कि कांग्रेस क्या है! कांग्रेस के रहने के परिणाम से भी मोदी जी अंजान नहीं। मोदी जी के नेतृत्व वाली बीजेपी कांग्रेस से डरती है। मोदी जी जानते हैं कि मात्र कांग्रेस ही ऐसी पार्टी है जिसका भारत के हर गली कूचे मेँ प्रभाव है। जिसका नाम है।

यही एक पार्टी है जो किसी दिन उनकी सरकार को, बीजेपी को सत्ता से बाहर करने की क्षमता रखती है। कांग्रेस ही है जिसमें गिर गिर के उठ जाने की अपार क्षमता है। कांग्रेस के अतिरिक्त कोई और चुनौती है ही नहीं। जब चुनौती देने वाला ही कोई नहीं रहेगा तब अपना राज, केवल और केवल अपना राज। कुछ भी करो, कोई विरोध नहीं। कुछ भी करो, कोई बोलने वाला नहीं। और, जब सरकार की नीतियों, निर्णयों का विरोध करने वाला ही ना रहे तो फिर लोकतन्त्र खतरे मेँ पड़ जाता है। शासक मनमर्जी करता है। क्योंकि उसे किसी राजनीतिक विरोध की चिंता ही नहीं रहती। पब्लिक का विरोध अर्थ हीन हो जाता है। मोदी जी जानते हैं कि जब बीजेपी 30 साल बाद 2 सीटों से यहां तक आ सकती है तो कांग्रेस क्यों नहीं?

बस, इस डर ने मोदी जी और उनके खास दो चार नेताओं ने कांग्रेस मुक्त भारत का नारा इस प्रकार से उछाला कि यह देश प्रेम का प्रतीक हो गया। राष्ट्रवाद की पहचान बन गया। असल मेँ कांग्रेस मुक्त भारत का अर्थ है, विपक्ष का ना रहना। हालांकि लगभग हर स्टेट मेँ राजनीतिक पार्टी है, लेकिन मोदी जी और आज की बीजेपी ने कभी भारत को उनसे मुक्त करने का नारा नहीं दिया। जरूरत भी नहीं है, क्योंकि उनके साथ तो सत्ता का बंटवारा कर उनको अपने साथ लिया जा सकता है। किसी से विचार मिले ना मिले कोई खास बात नहीं। सिद्धांतों मेँ जमीन-आसमान का अंतर है, तब भी चलेगा।

सत्ता का सवाल है। उसे पाने और फिर उसे बनाए रखने की बात है। छोटे छोटे दलों की औकात ही कितनी है! सत्ता के लालच मेँ वे बीजेपी के साथ आने मेँ क्यों हिचकिचाएंगी। कश्मीर और अब बिहार इसके उदाहरण है। जब छोटे दलों को सत्ता का टुकड़ा मिल गया तो वे उसी मेँ मस्त हो जाएंगे और कांग्रेस रहेगी नहीं, तब! तब देश मेँ एक मात्र बीजेपी। बीजेपी मेँ एक मात्र मोदी जी और उनके अमित शाह। बीजेपी के अटल बिहारी वाजपेयी ने कभी नहीं कहा कि देश को कांग्रेस से मुक्त करना है। जे पी नारायण ने भी ऐसा तो नहीं कहा होगा। चूंकि कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी है, इसलिए उसको मार दो, उसके बाद राज अपना ही अपना।

असली लोकतन्त्र उसी देश मेँ है जहां विपक्ष मजबूत हो। लोकतन्त्र वहीं समृद्ध होता है जहां पक्ष के साथ साथ विपक्ष भी ताकतवर  हो। सत्ता के कामों का विश्लेषण करने वाला हो। उसको रोकने और टोकने वाला हो। परंतु मोदी जी एंड कंपनी ने राजनीति की परिभाषा ही बदल ही। बड़े विरोधी को खत्म कर दो, छोटे मोटे तो खुद शरणागत हो जाएंगे दंडवत करते हुए। कांग्रेसियों से कोई परहेज नहीं, बस देश को कांग्रेस मुक्त करना है। ताकि मोदी जी एंड कंपनी निष्कंटक राज कर सके। लोकतन्त्र ! जब राजनीति की नई परिभाषा गढ़ दी गई है तब लोकतन्त्र की परिभाषा भी तो बदलेगी ही। दो लाइन पढ़ो-

बिहार ने हरयाणा को साफ कर दिया
नितीश ने गिरगिट को मात कर दिया।

लेखक गोविंद गोयल श्रीगंगानगर (राजस्थान) के वरिष्ठ पत्रकार हैं. इनसे संपर्क gg.ganganagar@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

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अमित शाह की संपत्ति और स्मृति इरानी की डिग्री वाली खबरें टीओआई और डीएनए से गायब!

Priyabhanshu Ranjan : स्मृति ईरानी भी कमाल हैं। 2004 के लोकसभा चुनाव के वक्त अपने हलफनामे में अपनी शैक्षणिक योग्यता B.A बताती हैं। 2017 के राज्यसभा चुनाव में अपने हलफनामे में खुद को B. Com. Part 1 बताती हैं। 2011 के राज्यसभा चुनाव और 2014 के लोकसभा चुनाव में भी उन्होंने खुद को B. Com. Part 1 ही बताया था। बड़ी हैरानी की बात है कि 2004 में खुद को B.A बताने वाली स्मृति जी 2011, 2014 और 2017 में खुद को B. Com. Part 1 बताती हैं।

इससे भी बड़ी हैरानी की बात ये है कि इतने साल के बाद भी B. Com पूरा नहीं कर सकी हैं। खैर, आपको असल में बताना ये था कि ‘अमित शाह की संपत्ति में 5 साल में 300 फीसदी इजाफा’ वाली खबर की तरह स्मृति ईरानी के हलफनामे में झोल वाली खबर भी न्यूज वेबसाइटों ने हटा ली है। अब सोचना आपको है कि ये खबरें आखिर किसके दबाव में हटाई जा रही हैं। इसी मुद्दे पर द वॉयर ने एक खबर की है। नीचे तस्वीर में स्मृति ईरानी की ओर से 2004 में दायर हलफनामे की प्रति है।

पीटीआई में कार्यरत प्रतिभाशाली पत्रकार प्रियभांशु रंजन की एफबी वॉल से.

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मंत्रीजी की इस एक फोटो से भाजपा की हो रही भरपूर किरकिरी

Yashwant Singh : भारी बारिश में खुद पर छाता तनवा कर पौधे को पानी देने में जुटे हैं मंत्री जी. सही पकड़ा आपने. ऐसा काम भाजपाई नेता ही कर सकते हैं. वैसे, पहले ऐसे अजब गजब काम करने वाले नमूने कांग्रेस में बहुतायत में पाये जाते थे. लेकिन जबसे बीजेपी ने खुद को कांग्रेस बना लिया है, तबसे सारे नमूने इधर शिफ्ट हो गए हैं. ये तस्वीर अपने देश के राजकाज और नीति-नियमों की सुंदर व्याख्या करने में सफल है. ध्यान से फोटो देखिए और थोड़ा खुलकर हंस लीजिए, सेहत पर असर पाजिटिव होगा. आनंदित करने वाले इस शानदार दृश्य को मुहैया कराने के लिए नेता जी और बीजेपी का आभार.

Asad Zaidi : Irresistible! Here is CP Singh, Urban Develeopment and Transport Minister of the BJP ruled Jharkhand, watering plants in heavy rain, with CRPF providing the umbrella cover. अतुलनीय भारत… भाजपा शासित झारखंड। शहरी विकास व यातायात मंत्री सी पी सिंह भारी बारिश में पौधों को पानी देते हुए। छाता सेवा : सीआरपीएफ़।

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह और कवि-पत्रकार असद ज़ैदी की एफबी वॉल से.

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आडवाणी पर राम का कोप हुआ, और कुछ नहीं….!

अनेहस शाश्वत (वरिष्ठ पत्रकार, लखनऊ)


हो सकता है आर एस एस बहुत ही देशभक्त और काबिल लोगों का संगठन हो, लेकिन इतना तय है यह एक बंद सा संगठन है, जिसके बारे में जानकारी बहुत स्पष्ट नहीं है. जो लोग इससे जुड़े हैं वे ही इसके बारे में कायदे से जानते हैं. आडवाणी लम्बे समय तक संगठन के शीर्ष पर रहे इसलिए मानना चाहिए कि संगठन के उद्देश्यों से वे पूरी तरह वाकिफ़ रहे होंगे.

आडवाणीजी के बारे में जितनी जानकारी सार्वजनिक है उसके मुताबिक वो खासे पढ़े-लिखे सज्जन हैं और भाजपा को शासक दल बनाने में उनका सबसे ज्यादा योगदान है, अटल बिहारी वाजपाई से भी ज्यादा. इस पृष्ठभूमि के हिसाब से कहा जा सकता है कि राम मंदिर आन्दोलन के लिए संघ और भाजपा की जो भी योजना रही होगी आडवाणीजी को मालूम रही होगी.         

राजीव गाँधी प्रधान मंत्री थे और राम मंदिर आन्दोलन जोर पकड़ने लगा था, राजनीति के कई जानकारों का कहना है मूलतः ये आन्दोलन कांग्रेस का था, जिसे भाजपा ने झपट लिया. बहरहाल सच जो भी रहा हो लेकिन भाजपा के हाथों में राम मंदिर आन्दोलन की कमान पूरी तरह से आ गई और इसके मुख्य शिल्पी बनकर उभरे लाल कृष्ण आडवाणी. उन्होंने आन्दोलन सफल हो इसके लिए कोई कसर नहीं छोड़ी,रथयात्रा निकाली और वी पी सिंह की सरकार भी कुर्बान कर दी.

आख़िरकार नरसिंह राव के ज़माने में मस्जिद गिरा दी गई और अस्थाई राम मंदिर बनने के साथ राम मंदिर आन्दोलन का एक चरण पूरा हुआ. इस पूरे आन्दोलन में दो बातें हुईं एक तो भ्रम का घटाटोप बना दूसरे यह बात सामने आई कि राम मंदिर आन्दोलन भाजपा को राष्ट्रव्यापी दल बनाने में असफल रहा. यह बात सामने आते ही भाजपा और उसके तत्कालीन शिल्पी आडवाणी ने राम मंदिर को उसके हाल पर छोड़ा और भाजपा को फैलाने के दूसरे आजमूदा उपायों पर अमल शुरू किया.

नतीजे में अटलजी के प्रधानमंत्रित्व में पहली गठबंधन सरकार बनी. यहाँ यह बात ध्यान देने योग्य है कि राम मंदिर आन्दोलन के बारे में आम जनता की चाहे जो धारणा रही हो, संघ के शिल्पी होने के नाते आडवाणी तो जानते ही रहे होंगे कि भगवान राम भाजपा के सत्ता संधान के प्रयोग में निमित्त मात्र थे, उनके मंदिर के लिए कोई प्रतिबद्धता नहीं थी. बहरहाल लगता है, इसी समय से धीर – गंभीर भगवान राम, मंदिर आन्दोलन के मुख्य शिल्पी आडवाणी से कुपित हो गए.

नतीजे में उन आडवाणी, को जिन्होंने भाजपा को राष्ट्रव्यापी शासक दल बनाया, उनकी पार्टी ने ही कौड़ी का तीन कर दिया. वैसे भी यह तो होना ही था. शासक पार्टी भावनाएं नहीं देखती. वह सत्ता में बने रहने के लिए ही काम करती है. ऐसे में राष्ट्रपति पद के लिए  आडवाणी के बजाये दलित राम नाथ कोविंद आज के दौर में बेहतर प्रत्याशी हैं. यह सब जो हुआ सो हुआ लेकिन यह भी होगा कि संघ, भाजपा और नरेन्द्र मोदी की कृतघ्नता इतिहास में हमेशा याद रखी जाएगी, राष्ट्रहित की आड़ में ये तीनो चाहे जो भी दुहाई दें.   

लेखक अनेहस शाश्वत सुल्तानपुर के निवासी हैं और उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं. मेरठ, बनारस, लखनऊ, सतना समेत कई शहरों में विभिन्न अखबारों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. घुमक्कड़ी, यायावरी, किस्सागोई और आरामतलबी इनके स्वभाव में हैं. इन दिनों वे लखनऊ में रहकर जीवन की आंतरिक यात्रा के कई प्रयोगों से दो-चार हो रहे हैं. उनसे संपर्क 9453633502 के जरिए किया जा सकता है. शाश्वतजी का लिखा ये भी पढ़ सकते हैं…

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‘एनडीटीवी 24×7’ की एंकर ने लाइव डिबेट में भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा को शो से जाने के लिए कह दिया

Vineet Kumar : ये संबित पात्रा का अपमान नहीं, टीवी में भाषा की तमीज बचाने की कोशिश है… कल रात के शो में निधि राजदान (NDTV 24X7) ने बीजेपी प्रवक्ता और न्यूज चैनल पैनल के चर्चित चेहरे में से एक संबित पात्रा से सवाल किया. सवाल का जवाब देने के बजाय संबित ने कहा कि ये एनडीटीवी का एजेंडा है, चैनल एजेंडे पर काम करता है. निधि राजदान को ये बात इतनी नागवार गुजरी कि उसके बाद आखिर-आखिर तक सिर्फ एक ही बात दोहराती रही- ”प्लीज, आप इस शो से जा सकते हैं. आप प्लीज ये शो छोड़कर चले जाएं. ये क्या बात हुई कि आपसे कोई सवाल करे तो आपको वो एजेंडा लगने लग जाए.”

संबित इसके बावजूद शो में बने रहे और कहा कि वो चैनल को एक्सपोज करेंगे, निधि ने आगे जोड़ा- ”आपको दूरदर्शन की तरह जो चैनल ग्लोरिफाय करके दिखाते हो, वहीं जाएं, एनडीटीवी पर मत ही आएं.”

इस पूरी घटना के कई पाठ हो सकते हैं. इसे संबित पात्रा सहित देश की सबसे बड़ी पार्टी का अपमान के साथ जोड़कर देखा जा सकता है. दूसरी तरफ निधि राजदान की बतौर एक एंकर ताकत का भी अंदाजा लगाया जा सकता है. उनकी हीरोईक प्रेजेंस को सिलेब्रेट किया जा सकता है और विरोधी पार्टी के लोग रात से ही शुरु हो गए हैं. ये भी कहा जा सकता है कि एक एंकर जब अपने काम को ठीक-ठीक समझ पाए तो वो बहस के नाम पर कुछ भी बोलने नहीं दे सकते. लेकिन इन बहुस्तरीय पाठ के बीच जो सबसे जरुरी चीज है कि निधि राजदान ने जिस अंदाज में संबित पात्रा को शो से जाने कहा और एजेंड़े शब्द पर आपत्ति दर्ज की, वो इस बात की मिसाल है कि टीवी में तेजी से खत्म होती भाषा के बीच उसे बचाने की जद्दोजहद और तमीज बनाए रखने की कोशिश है. तथ्य के बदले पर्सेप्शन या धारणा, सहमति-असहमति के बजाय खुली चुनौती और देख लेंगे के अंदाज में जो नुरा कुश्ती चलती रहती है, उससे अलग निधि का इस तरह टोका जाना इस बात का संकेत है कि आप कहने के नाम पर कुछ भी नहीं कह सकते.

व्यावसायिक स्तर पर एनडीटीवी ग्रुप के अपने कई पेंच हो सकते हैं और उन्हें वैधानिक स्तर पर चुनौती मिलती रही है लेकिन एक एंकर जब सतर्कता से अपने पैनलिस्ट को पर्सेप्शन बनाने से रोकते हैं तो इसका एक अर्थ ये भी है कि वो अपने चैनल ब्रांड को लेकर कॉन्शस है. उन्हें पता है कि जब एजेंडा शब्द को पचा लिया जाएगा तो इसकी ब्रांड वैल्यू पर बुरा असर पड़ेगा. इसे सुनकर रह जाना खुद की क्रेडिबिलिटी पर बड़ा सवाल है.

आज जबकि हर दूसरे-तीसरे चैनल के एंकर ब्रांडिंग और वीरगाथा काल में फर्क करना तेजी से भूलते जा रहे हों, निधि राजदान का ये हस्तक्षेप टीवी में भाषा की तेजी से खत्म होती तमीज की तरफ इशारा है. एक मीडिया छात्र के नाते हमें इस सिरे से भी सोचना होगा कि एक तरफ जब एंकर खुद बेलगाम होते जा रहे हों, वो खुद ऐसे शब्दों का प्रयोग करते आए हों जिन्हें सुनकर आपकी उम्मीदें घुट-घुटकर दम तोड़ दे रही हों, निधि राजदान का ये अंदाज न्यूज चैनल की एक दूसरी परंपरा जो तेजी से खत्म होती जा रही है, याद करने की बेचैनी है, उसे बचाए रखने की कोशिश है.

आनेवाले समय में बहुत संभव है संबित सहित पूरी तरह उनकी पार्टी भी इस चैनल का बायकॉट कर दे लेकिन इससे पहले इस वीडियो से गुजरा जाएं तो आप इस बात से असहमत नहीं हो सकेंगे कि भाषा की ध्वस्त परिस्थिति में एक एंकर ऐसा करके दरअसल खुद को, अपने पेशे की गरिमा बचाने की कोशिश कर रही हैं. अपने सालों की उस मेहनत को जो नौकरी से कहीं आगे की चीज हैं. एक मीडियाकर्मी यदि भाषा के स्तर पर समझौते कर लेता है तो इसका मतलब है कि बाकी का उसका पूरा काम व्याकरण ठीक करते रहने में निकल जाएगा. भाषा व्याकरण से कहीं आगे एक बेहतर समाज की परिकल्पना है.

वीडियो के लिए चटकाएं.

https://www.youtube.com/watch?v=mhSKGOEHM9A

मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार की एफबी वॉल से.

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भाजपा के पक्ष में प्रायोजित तरीके से लिखने वाले प्रदीप सिंह कोई अकेले पत्रकार नहीं हैं

संजय कुमार सिंह, वरिष्ठ पत्रकार

Sanjaya Kumar Singh : चुनाव जीतने की भाजपाई चालें, मीडिया और मीडिया वाले… उत्तर प्रदेश चुनाव जीतने के लिए भारतीय जनता पार्टी ने अपने सारे घोड़े खोल दिए हैं। भक्त, सेवक, कार्यकर्ता, प्रचारक सब अपनी सेवा भक्ति-भाव से मुहैया करा रहे हैं। इसमें ना कुछ बुरा है ना गलत। बस मीडिया और मीडिया वालों की भूमिका देखने लायक है। नए और मीडिया को बाहर से देखने वालों को शायद स्थिति की गंभीरता समझ न आए पर जिस ढंग से पत्रकारों का स्वयंसेवक दल भाजपा के पक्ष में लगा हुआ है वह देश के भविष्य के लिए अच्छा नहीं है। कहने की जरूरत नहीं है कि भाजपा एक सांप्रादियक पार्टी है जो लोकतांत्रिक व्यवस्था का पालन मजबूरी में ही करती है।

नरेन्द्र मोदी को जिन स्थितियों में जिस तरह प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया गया और उसके बाद जीतने पर उन्होंने जो सब किया, जो कार्यशैली रही वह काफी हद तक तानाशाह वाली है। इसे उनकी घोषित-अघोषित, दिखने वाली और न दिखने वाली अच्छाइयों के बदले तूल न दिया जाए यह तो समझ में आता है। पर अपेक्षित लाभ न होने पर भी नरेन्द्र मोदी और आज की भाजपा का समर्थन भारत जो इंडिया बन रहा था उसे हिन्दुस्तान बनाने का समर्थन करना है। मीडिया का काम आम लोगों को इस बारे में बताना और इंडिया से हिन्दुस्तान बनने के नफा-नुकसान पर चर्चा करना है पर मीडिया के एक बड़े हिस्से ने तय कर लिया हो उग्र हिन्दुत्व ही देशहित है।

मीडिया पैसे के लिए और दबाव में ऐसा करे – तो बात समझ में आती है। उसे रोकने के लिए भी दबाव बनाया जा सकता है। पाठकों को बताया जा सकता है और उम्मीद की जा सकती है कि जनता चीजों को समझेगी तो मीडिया से ऐसे प्रभावित नहीं होगी जैसे आमतौर पर हो सकती है। लेकिन स्थिति उससे विकट है। मीडिया के लोग खुलकर भाजपा का समर्थन कर रहे हैं। कुतर्क कर रहे हैं और स्वीकार कर रहे हैं वे तथाकथित राष्ट्रवादी, देशभक्ति वाली और हिन्दुत्व की पत्रकारिता कर रहे हैं। जो पुराने लोग संघ समर्थक पत्रकार माने जाते हैं उन्हें भी अब घोषित रूप से समर्थन करने में हिचक नहीं है।

इसी क्रम में आज वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह ने आज जागरण में प्रकाशित अपने लेख, “उत्तर प्रदेश की चुनावी हवा” का लिंक फेसबुक पर साझा किया है। पूरा लेख क्या होगा इसका अंदाजा है इसलिए पढ़ा नहीं और जो अंश हाइलाइट किया गया है उसे पढ़ने के बाद समझ में आ जाता है कि लेखक कहना क्या चाहता है। संबंधित अंश है, “यदि भाजपा मोदी के प्रचि वंचित तबकों के आदर भाव को वोट में बदल लेती है तो चुनाव जातीय समीकरणों से परे जा सकता है।” प्रदीप सिंह फेसबुक पर सक्रिय नहीं है। इस लेख से पहले उनका जो लेख उनकी वाल पर दिख रहा है वह 2 दिसंबर का है। आज 23 फरवरी को एक लेख का लिंक देने भर से यह आरोप लगाना उचित नहीं है कि वे भाजपा का प्रचार कर रहे हैं। पर दो दिंसबर की उनकी पोस्ट है, “राज्यसभा में हंगामा और नारेबाजी कर रहे सदस्यों से सभापति हामिद अंसारी ने पूछा ये नारे सड़कों पर क्यों नहीं लग रहे? सवाल तो बड़ा वाजिब है। पर अभी तक कोई जवाब आया नहीं है।” इसे 17 लोगों ने शेयर किया है।

दो दिसंबर को ही उनकी एक और पोस्ट है जो एक दिसंबर को जागरण में ही प्रकाशित उनके लेख का लिंक है या उसे साझा किया गया है। इससे पहले उनकी पोस्ट 6 अक्तूबर की है। यह भी जागरण में प्रकाशित उनके लेख का लिंक है। लेख का शीर्षक है, “कुतर्कों के नए देवता” और यह सर्जिकल स्ट्राइक पर है। इसकी शुरुआत इस तरह होती है, “कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना। फिल्म अमर प्रेम का यह गाना भारतीय नेताओं पर सटीक बैठता है। नेता किसी घटना, बयान या भाषण पर प्रतिक्रिया देने से पहले यह सोचता है कि जो हुआ है उसका फायदा किसे होगा। फायदा अपने विरोधी को होता दिखे तो वह विरोध में किसी हद तक जाने को तैयार रहता है। इस मामले में अमूमन फौज को अपवाद माना जाता था, लेकिन अब नहीं। यह नरेंद्र मोदी का सत्ता काल है।” इस पोस्ट में लिखा है, “मित्रों लम्बे अंतराल के बाद आपसे मुखातिब हो रहा हूं। दैनिक जागरण के आज के संस्करण में सम्पादकीय पेज पर छपा मेरा लेख आपकी सेवा में पेश है।”

इससे पहले की पोस्ट सात जुलाई की है जो उन्होंने किसी और का लिखा साझा किया है और अंग्रेजी में है। यह पोस्ट राजनीतिक नहीं है। प्रदीप सिंह का रुझान भाजपा की तरफ है, यह कोई नई बात नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि वे इनदिनों अपने सामान्य कार्य से अलग जागरण में लिख रहे हैं उसे फेसबुक पर साझा कर रहे हैं और जागरण उनके नाम के साथ उनकी ई-मेल आईडी नहीं, response@jagran.com छाप रहा है। क्या यह पेड न्यूज या प्रायोजित लेख है? कहने की जरूरत नहीं है कि Pradeep Singh अकेले ऐसे पत्रकार नहीं हैं।

जनसत्ता अखबार में लंबे समय तक कार्यरत रहे और इन दिनों सोशल मीडिया पर बेबाक लेखन के लिए चर्चित वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से यह मीडिया विश्लेषण लिया गया है. संजय से संपर्क anuvaad@hotmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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राम मंदिर सुप्रीम कोर्ट से ही बनना है तो भाजपा किस मर्ज की दवा?

मोदी सरकार के कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले से ही राम मंदिर निर्माण का संवैधानिक रास्ता निकलेगा… अब सवाल यह है कि जब सुप्रीम कोर्ट से ही राम मंदिर बनना है तो फिर भाजपा, संघ या उससे जुड़े विहिप सहित तमाम संगठन किस मर्ज की दवा हैं और सालों से वे किस आधार पर ये दावे करते रहे कि कसम राम की खाते हैं मंदिर वहीं बनाएंगे..? विपक्ष में रहते भाजपा ने कभी भी संवैधानिक तरीके से राम मंदिर निर्माण की बात नहीं की, उलटा यह नारा लगाया जाता रहा कि दुनिया की कोई अदालत यह तय नहीं कर सकती कि भगवान राम का जन्म कहां हुआ और मंदिर निर्माण कोर्ट का नहीं, बल्कि आस्था का विषय है…

यह तो सबको पता है कि सुप्रीम कोर्ट का निर्णय सभी के लिए बाध्यकारी है और कांग्रेस सहित सभी राजनीतिक दलों को मान्य करना ही पड़ेगा… तो फिर भाजपा कैसे राम मंदिर निर्माण का साफा अपने माथे बंधवाएगी..? अभी उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव में भी राम मंदिर निर्माण की बात कही गई और इस चुनाव सहित कुल 14 मर्तबा अपने घोषणा-पत्रों में मंदिर निर्माण के दावे भाजपा कर चुकी है… अब भाजपा और उसके भक्तों की दलील यह भी रहती है कि धारा 370 सहित मंदिर का निर्माण तब होगा जब राज्यसभा सहित उत्तरप्रदेश में भाजपा को पर्याप्त सीटें मिल जाए। यानि न नौ मन तेल होगा और न राधा नाचेगी… जबकि विपक्ष में रहते ये तमाम बहाने याद नहीं थे…

आज भाजपा और संघ को स्पष्ट घोषणा करना चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट का निर्णय कुछ भी रहे मंदिर का निर्माण तो हर हाल में होकर रहेगा और इसकी तारीख और मंदिर निर्माण पूरा होने की घोषणा भी लगे हाथ कर देना चाहिए… जब शाहबानो प्रकरण में और अभी जल्लीकट्टू के मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के विपरित सरकारों ने अध्यादेशों के जरिए नियम-कानून ही बदल डाले, तो फिर राम मंदिर के निर्माण में क्यों नहीं इस तरह का अध्यादेश लाया जाता..? कुल मिलाकर भाजपा राम मंदिर के साथ-साथ अपने तमाम कोर इश्यू जिनमें धारा 370, सामान नागरिक संहिता पर एक्सपोज हो चुकी है… रामलला तो सालों से तम्बू में बैठे हैं और मंदिर बनाने वाले सत्ता के महलों में मस्ती छान रहे हैं…

राजेश ज्वेल
वरिष्ठ पत्रकार
jwellrajesh66@gmail.com

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