डीएम साब को गुस्सा आया और जेल चले गए कई फर्जी टाइप पत्रकार! देखें वीडियो

यूपी के रायबरेली में एक मजेदार वाकया हुआ है. समाधान दिवस का अवसर था. जिलाधिकारी संजय कुमार खत्री और पुलिस अधीक्षक सुजाता सिंह मौके पर थीं. जनता रास्ते में थी. तभी एक कार से पांच छह फर्जी टाइप पत्रकार उतरे और लगे कैमरा चलाने-हिलाने. डीएम साब को गुस्सा आया. डीएम साहब ने इन पत्रकार टाइप दिखने वालों से बातचीत शुरू की तो लग गया कि ये सब फर्जी टाइप पत्रकार हैं… यानि ये किसी बड़े संस्थान से नहीं हैं. Continue reading

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टीओआई के राजशेखर झा बताएं, किसके कहने पर नजीब-आईएस वाली ख़बर प्‍लांट की थी?

जेएनयू के लापता छात्र नजीब के बारे में टाइम्‍स ऑफ इंडिया में इसके पत्रकार राजशेखर झा ने फर्जी खबर प्‍लांट की. इस खबर में बताया गया कि दिल्ली पुलिस ने जांच में पाया है कि नजीम यूट्यूब और गूगल पर आईएस (इस्लामिक स्टेट) के बारे में वीडियो आदि खोज देखा करता था, साथ ही वह आईएस की कार्यप्रणाली, विचारधारा, भर्ती आदि के बारे में अध्ययन करता था. खबर में बताया गया कि दिल्ली पुलिस ने नजीब की लैपटाप के जांच के बाद यह जानकारी हासिल की है. उधर, इस खबर के छपने के बाद दिल्ली पुलिस ने खंडन भेज दिया कि उसने ऐसी कोई जांच लैपटाप की नहीं की और न ही ऐसा कोई नतीजा निकला है.

फर्जी खबर की सच्‍चाई सामने आने के बाद सोशल मीडिया में टीओआई के राजशेखर झा के खिलाफ अभियान चला. फिर भी इस शख्स ने माफी नहीं मांगी. हां, जो उससे सवाल पूछता था उसे वह ट्विटर पर ब्‍लॉक किए जा रहा था. बाद में राजशेखर झा ने अपना फेसबुक एकाउंट बंद कर दिया. अपने ट्विटर एकाउंट की सेटिंग ऐसी कर ली कि केवल वेरिफाइड यूजर्स ही उसके एकाउंट तक पहुंच सकते थे.

नजीब को पुलिस अब तक खोज नहीं पाई है. पुलिस को खुद टाइम्‍स ऑफ इंडिया की खबर का खंडन देना पड़ा है. मान लीजिए कि नजीब (कोई और नाम सुविधा के लिए चुन सकते हैं) अगर मौजूद होता और इस अखबार में बिलकुल 21 मार्च वाली खबर छपती कि वह इस्‍लामिक स्‍टेट के बारे में गूगल और यूट्यूब पर खोजता था और उसके नेताओं के भाषण सुनता था, तब कैसा नज़ारा होता? दिल्‍ली पुलिस को उसे गिरफ्तार करने में घंटा भर भी नहीं लगता. उसके खिलाफ़ साक्ष्‍य गढ़ लिए जाते. एक खबर दूसरी खबरों का आधार बन जाती और बड़े-बड़े हर्फों में करार दिया जाता कि आइएस का दिल्‍ली मॉड्यूल जेएनयू से ऑपरेट करता था.

यह कितना खतरनाक हो सकता है, उसे बताने की ज़रूरत नहीं. हम दिल्‍ली के कश्‍मीरी पत्रकार इफ्तिखार गीलानी का हश्र देख चुके हैं जिस मामले में कई पत्रकारों ने गलत रिपोर्टिंग कर के आतंक के मामले में उन्‍हें जेल की हवा खिलवा दी थी. नीता शर्मा ने पुलिस की थ्यूरी के हिसाब से खबर प्‍लांट कर गीलानी को दोषी बना दिया था, जिसकी थर्ड डिग्री सज़ा गीलानी को भुगतनी पडी. इस पत्रकारिता जगत में गीलानी आज भी दिल्‍ली के आइएनएस बिल्डिंग वाले रुफी मार्ग इलाके में दिन-भर दौड़भाग करते पाए जाते हैं जबकि नीता शर्मा सर्वश्रेष्‍ठ रिपोर्टर का तमगा हासिल कर के अपने पाप से मुक्‍त हो चुकी हैं.

चकोलेबाज़ के नाम से एक ट्वीट आया है जिसमें गरीब मुसलमानों की जिंदगी बरबाद करने का आरोप कुछ पत्रकारों पर लगाया गया है. नीता शर्मा का भी उसमें नाम है. नीता शर्मा ने गीलानी की जिंदगी बरबाद की तो नजीब के मामले में टाइम्‍स ऑफ इंडिया के राजशेखर झा ने बहुत गंदा काम किया है.

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TOI MUST APOLOGISE FOR FALSE NAJEEB STORY

The Delhi Union of Journalists is shocked that a leading daily like the Times of India should have discredited itself by publishing a malicious and misleading report on the missing JNU student Najeeb. The DUJ demands that the TOI issue an immediate apology for maligning a boy who is ‘missing and unable to defend his reputation.

The TOI report alleged that Najeeb had been surfing the Internet for information on the Islamic State and ways to join it.  It claimed that he had watched many videos on the Islamic State and was “watching a video of the speech of an IS leader on the night of October 14, just before he had a scuffle with ABVP members…” The story by TOI reporter Rajshekhar Jha was published both on the front page and page three on March 21, 2017.

This kiteflying story was attributed to unnamed police sources and claimed the police had received “a report on the browsing history of Najeeb’s laptop from Google and YouTube”.  The following day Deputy Police Commissioner Madhur Verma denied that any report had been received from Google and YouTube and said “investigation conducted so far has not revealed anything to suggest that Najeeb had accessed any site relating to IS”. Special Commissioner of Police and Delhi police spokesperson Dependra Pathak also rubbished the TOI story in his statement to Hindustan Times.

It is apparent that the story was meant to discredit Najeeb and find an alibi for the Delhi Police’s inability to trace the missing boy. The story went into great detail on reported Police moves to search for him.

Jha’s clearly motivated story also went into allegations about Najeeb’s medical history, claiming he had been on drugs for obsessive compulsive disorder, sleeplessness, depression, fits, panic attacks and agoraphobia.  Najeeb’s family has previously denied that he was on such medication but the TOI chose to repeat all this in great detail.

The TOI published the false story on its front page with the heading “Najeeb saw IS videos, websites” on March 21, 2017 and another report on page three with a three-column bold headline “Najeeb searched for information on IS”.  However, the retraction it was forced to publish after criticism on social media was carried as a single column item on page 5 with the neutral headline, “Police deny Najeeb report” on March 22, 2017. This was merely a verbatim report of a statement by DCP Verma.

The Delhi Union of Journalists demands an apology by the TOI for its irresponsible and false reports. It also demands that the story be removed from its website immediately.

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पत्रकार महेंद्र अग्रवाल की चारसौबीसी : फर्जी अखबार ‘कूटचक्र’ के नाम विज्ञापन लेकर सरकार को लगाया चूना!

लखनऊ : भारत के समाचारपत्रों के पंजीयक के कार्यालय की वेबसाइट के अनुसार देश में हिंदी भाषा के समाचार पत्र-पत्रिकाओं के 52050 टाइटल पंजीकृत हैंl पत्रकारिता के क्षेत्र में कुछ ‘भेंड़ की खाल में छुपे भेड़ियों’ ने फर्जी समाचार पत्र-पत्रिकाओं के नाम पर सरकारी और प्राइवेट विज्ञापन लेने जैसे अनेकों गैरकानूनी काम फैला दिया है। इससे पत्रकारिता के क्षेत्र को भी बदनामी के दलदल में घसीटने का काम शुरू कर दिया हैl लखनऊ की समाजसेविका और आरटीआई कार्यकत्री उर्वशी शर्मा ने तथाकथित पत्रकारों द्वारा फर्जी अखबारों को खड़ा करके इन अखबारों के माध्यम से अपराध किये जाने का खुलासा किया है।

साथ ही भारत के समाचारपत्रों के पंजीयक द्वारा समाचार पत्र-पत्रिकाओं का पंजीकरण करने और भारत सरकार के विज्ञापन और दृश्य प्रचार निदेशालय द्वारा समाचार पत्र-पत्रिकाओं को विज्ञापन आवंटित करने की प्रणाली की ईमानदारी पर प्रश्नचिन्ह लगाकर इन संस्थाओं को भी कठघरे में खड़ा कर दिया हैl

मामला सोनभद्र का है जहाँ से प्रकाशित होने वाले हिंदी साप्ताहिक अखबार ‘कूटचक्र’ के फर्जी होने की बात एक पुलिस जांच से सामने आई हैl बताते चलें कि सोनभद्र के रहने वाले महेंद्र अग्रवाल का यह हिंदी साप्ताहिक समाचार पत्र बाकायदा भारत के समाचारपत्रों के पंजीयक के कार्यालय से पंजीकृत हैl समाचारपत्रों के पंजीयक की वेबसाइट के अनुसार इस अखबार के पब्लिशर, प्रिंटर, एडिटर और ओनर महेंद्र अग्रवाल हैं जिसका पता अनपरा, सोनभद्र, उत्तर प्रदेश हैl यह वेबसाइट सोनभद्र, उत्तर प्रदेश में ‘कूटचक्र’ के नाम से एक प्रिंटिंग प्रेस का होना भी बताती है जहाँ इस अखबार की छपाई की जाती हैl

उर्वशी को पता चला कि यह समाचार पत्र फर्जी और जेबी है जिसकी मात्र फाइल कॉपी लखनऊ के रहने वाले महेंद्र अग्रवाल द्वारा लखनऊ में ही छाप ली जाती है। कूटरचित प्रपत्र बनाकर सोनभद्र के फर्जी पते पर इस अखबार का पंजीकरण कराया गया है। फर्जी प्रिंटिंग प्रेस से इसका बड़ी संख्या में छपना दिखाकर सरकारी विज्ञापन लेकर सरकार के साथ धोखाधड़ी की जा रही है। लोगों को ब्लैकमेल करने का अपराध भी किया जा रहा है। उर्वशी ने सूबे के युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव द्वारा शुरू किये गए जनसुनवाई पोर्टल पर अपनी शिकायत दर्ज करा दी हैl

उर्वशी की शिकायत पर सोनभद्र के पुलिस अधीक्षक ने अनपरा थाने द्वारा जो स्थलीय जांच कराई है उसमें यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है कि सोनभद्र जिले में न तो ‘कूटचक्र’ नाम के किसी अखबार का कोई कार्यालय है, न प्रिंटिंग प्रेस है, न इस अखबार की कोई छपाई होती है। स्थानीय मीडिया को भी ऐसे किसी भी समाचारपत्र की कोई जानकारी नहीं हैl यह जांच आख्या थाना अनपरा जिला सोनभद्र के उपनिरीक्षक विनोद कुमार यादव ने बीते 21 नवम्बर को तैयार की है जिसके आधार पर अब उर्वशी ने महेंद्र अग्रवाल को फ्रॉड बताते हुए सोनभद्र के हिंदी साप्ताहिक समाचार पत्र ‘कूटचक्र’ को पूरी तरह से फर्जी अखबार बताया हैl

बकौल उर्वशी पुलिस जांच से यह प्रमाणित हो गया है कि महेंद्र अग्रवाल ने फर्जीवाड़े से कूटरचित अभिलेखों के आधार पर इस जेबी अखबार का सर्कुलेशन 25500 दिखाकर इस फर्जी अखबार के लिए भारत सरकार के विज्ञापन और दृश्य प्रचार निदेशालय से वित्तीय वर्ष 2015-16 में 3708 Rs. के और वित्तीय वर्ष 2016-17 में अब तक 7270Rs. के विज्ञापन हासिल करके सरकार के साथ वित्तीय धोखाधड़ी भी की हैl

उर्वशी के मुताबिक महेंद्र फर्जी अखबार कूटचक्र के नाम पर सरकारी और निजी क्षेत्र की कंपनियों, प्रतिष्ठानों आदि को ब्लैकमेल कर धनउगाही की जाती है। ब्लैकमेलिंग के पैसों से इस शातिर कथित पत्रकार ने न केवल लखनऊ के हजरतगंज जैसे पॉश इलाके में आवास बना रखा है अपितु गोमती पार नए लखनऊ की कई कॉलोनियों में फ्लैट भी ले रखे हैं जिनकी जांच आवश्यक है। उन्होंने 326-A, प्रिंस काम्प्लेक्स, हजरतगंज, लखनऊ निवासी  महेंद्र अग्रवाल के खिलाफ प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराकर कठोर विधिक कार्यवाही कराने और अखबार का पंजीकरण तत्काल समाप्त कर विज्ञापन की धनराशि की वसूली कराने की कार्यवाही कराने के लिए प्रार्थना पत्र पुलिस विभाग और सूचना विभाग के अधिकारियों को प्रेषित कर दिए हैंl

Urvashi Sharma
Social Activist
102, Narayan Tower, Opposite F block Idgah
Rajajipuram, Lucknow-226017, Uttar Pradesh,India
Contact 9369613513

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फर्जी इंस्टीट्यूट ‘राधा गोविंद इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी’ के खिलाफ एफआईआर का आदेश

उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद से बड़ी खबर। न्यायलय ने दिया फर्जी इंस्टीट्यूट के खिलाफ एफआईआर का आदेश। एक छात्र पारस ने अपनी शिकायत जिले के पुलिस अधीक्षक से लेकर मुख्यमंत्री तक की लेकिन विडंबना देखिए कि उसकी किसी ने नहीं सुनी। उसकी शिकायत थी कि वह जिस इंस्टीट्यूट में पढ़ रहा था वह फर्जी है। उसके अनुसार उस जैसे हजारों विद्यार्थियों का भविष्य बर्बाद किया जा रहा है। वह कहता रहा लेकिन सुनने वाला कौन था। आखिरकार उसने एक आरटीआई लगाई और फिर सच प्रामाणिक और लिखित तौर पर सामने आया। इसके बाद न्यायालय की शरण ली और जहां से इंस्टीट्यूट के खिलाफ मामला दर्ज करा सका।

मामला है राधा गोविंद इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी का जिस पर फर्जी इंस्टीट्यूट होने का आरोप है। अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट चंदौसी मुरादाबाद ने अपने आदेश में कहा कि प्रथम दृष्टया यह मामला संज्ञेय अपराध है और स्वीकार करने के योग्य है। न्यायालय ने थाना बनियाठेर को आदेशित करते हुए कहा किप्रार्थना पत्र अंतर्गत धारा 156 3 में वर्णित तथ्यों के आधार पर सुसंगत धाराओं में मामला दर्ज कर नियमानुसार विवेचना कराया जाना सुनिश्चित किया जाए। उक्त मामले के आरोपी हैं पवन कुमार शर्मा चेयरमैन मनोज तोमर, मैनेजिंग डायरेक्टर और आशीष कुमार डायरेक्टर। अब यह बात उठना लाजमी है कि एक इंस्टीट्यूट खुलेआम फर्जी रूप से चलता रहा और सारे जिम्मेदार मौन रहे। आखिर पारस की शिकायत क्यों नहीं सुनी गई और खुले आम फर्जी इंस्टीट्यूट कैसे चलता रहा?

वैसे भी तथ्यों के आधार पर यह गंभीर सवाल उठना लाजमी है। यह खुद को हापुड़ दिल्ली रोड पर स्थित मोनाड विश्वविद्यालय से संबद्ध घोषित कर रहा था लेकिन मोनाड विश्वविद्यालय ने लिखित में कहा कि उक्त परिसर के अतिरिक्त उसके कोई सम्बन्धित परिसर हैं ही नहीं। अगर आरोप सही है तो फिर राधा गोविन्द इंस्टीट्यूट ऑफ टैक्नोलॉजी निकट अकरोली चौराहा चंदौसी जिला सम्भल जैसे इंस्टrट्यूट, स्कूल, या फिर विश्वविद्यालय उत्तर प्रदेश में खुलेतौर पर हजारों छात्रों का भविष्य बर्बाद करते रहे और हमारी सरकार शिक्षा क्षेत्र में ‘पूरे होते वादे’ के विज्ञापनों से जनता को अपना बेसुरा राग सुनाती रही। क्या ऐसा ही संवरेगा हमारा आज? क्या ऐसे अपराध पूर्ण समाज से बनेगा हमारा कल? क्या यहीं है वह पूरे होते वादे? क्या यहीं है हमारा उत्तम प्रदेश उत्तर प्रदेश?

रामजी मिश्र ‘मित्र’ की रिपोर्ट.

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कथित पत्रकार ने ‘इंडिया टीवी’ के नाम पर आधा दर्जन सरपंचों से लाखों रुपये की ठगी कर ली

अपने आपको पत्रकार बताने वाले एक व्यक्ति ने इंडिया टीवी के नाम पर आधा दर्जन सरपंचों को ठग लिया. छत्तीसगढ़ में जांजगीर-चांपा से खबर है कि अपने आपको इंडिया टीवी का पत्रकार बताते हुए शातिर ठग ने पहले सचिवों तथा सरपंचों से उनके गांव के विकास कार्यों के बारे में जानकारी ली. फिर कुछ दिनों बाद वो वापस पहुंचकर समाचार के बदले पन्द्रह पंद्रह सौ रुपए की मांग करने लगा. पन्द्रह सौ रुपए का चेक दिए जाने पर उस शातिर ठग ने उसमें कूटरचना कर आधा दर्जन सरपंचों से लाखों रूपए ठग लिए. निर्माण कार्यों के लिए राशि निकलवाने बैंक पहुंचने पर सरपंचों को खाते में राशि नहीं होने पर ठगे जाने का अहसास हुआ जिसके बाद सरपंचों ने मामले की शिकायत जांजगीर थाने में की है.

ग्राम पंचायत हरदी हरि के सरपंच नारदप्रसाद कश्यप पिता लल्लूराम कश्यप ने बताया कि एक माह पूर्व एक व्यक्ति खुद को इंडिया टीवी का पत्रकार बताते हुए आया और गांव में हुए विकास कार्यों के बारे में इंटरव्यू लिया. फिर वहा सरपंच श्रीमती सुकबाई के पास पहुंचा तथा उससे भी गांव में हुए विकास कार्यों के संबंध में इंटरव्यू लिया. जाते समय समाचार चलने पर शुल्क लगने की बात कही. दो दिन बाद उसने समाचार के एवज में पन्द्रह सौ रूपए की मांग की. उस समय पैसा नहीं दिए जाने पर बाद में आने की बात कहकर वह चला गया.

20 जून 2016 को फिर आने पर सरपंच एवं सचिव ने अपने हस्ताक्षर कर उसे ग्रामीण बैंक शाखा जांजगीर का एक हजार पांच सौ रूपए का चेक क्रमांक 786269 पंचायत प्रस्ताव की कापी के साथ दे दिया. दो दिन बाद वापस गांव पहुंचकर ठग ने उस पंचायत प्रस्ताव के आधार पर बैंक से राशि नहीं निकलने की बात कहते हुए अपने हाथ से लिखकर लाए गए पंचायत प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने के लिए कहा जिस पर सरपंच एवं सचिव ने हस्ताक्षर कर दिए. 16 जुलाई को सांसद मद से ग्राम पंचायत हरदी हरि में बनवाए गए सीसी रोड का पैसा निकलवाने के लिए सरपंच एवं सचिव जब ग्रामीण बैंक की जांजगीर शाखा पहुंचे तो उन्हें अपने खाते में राशि नहीं होने और 6 लाख 1 हजार पांच सौ रूपए निकलवाए जाने की जानकारी हुई.

नवागढ़ सचिव संघ के अध्यक्ष भूपेन्द्र सिंह गहलौत ने बताया कि अपने आपको इंडिया टीवी का रिपोर्टर बताने वाले उस ठग के शिकार नवागढ़ ब्लाक के ही आधा दर्जन पंचायत के सरपंच हुए हैं. शातिर ठग ने सभी से 1 हजार 5 सौ रूपए का चेक लिया था जिसमें कूटरचना कर ग्राम पंचायत जगमहंत के खाते से 3 लाख 1 हजार 5 सौ, हरदी हरि के खाते से 6 लाख 1 हजार 5 सौ, पचेड़ा के खाते से 2 लाख 1 हजार 5 सौ, ग्राम पंचायत गौद के खाते से 91 हजार 5 सौ तथा दो अन्य पंचायतों के खाते से भी लाखों रुपये निकाल लिए.

इंडिया टीवी के नाम से जो बिल ठग ने सरपंचों को दी है उसे देखते ही उसके फर्जी होने का अहसास हो रहा है. बिल में इंडिया टीवी का मोनो अथवा लेटर पेट के स्थान पर सामान्य रूप से ही इंडिया टीवी लिखा है तथा उसके कार्यालय के रूप में भारत टाकीज, जुब्लेरी बिल्डिंग इन्द्रपुरी भोपाल मध्यप्रदेश का पता तथा प्रधान कार्यालय शाप नं.9, शिवाजी नगर, एलएमरोड, बोरीबली वेष्ट, लैन्डमार्क माउस प्रोयसर चर्च मुम्बई 400103 भारत लिखा हुआ है. बिल में दिए ईमेल एड्रेस सहित इसके नियम और शर्ते इसे संदेहास्पद बनाते हैं जिसमें कंपनी के नाम पर चेक बनाए जाने की जगह चेक अथवा ड्राफ्ट प्रतिनिधि या ब्यूरो चीफ के नाम से ही बनाए जाने की बातें लिखी है वहीं संवाददाता के नाम के स्थान पर आशीष तिवारी लिखा गया है. थाना प्रभारी जांजगीर बी.एस. खूंटिया ने बताया कि सरपंचों द्वारा ठगी का शिकार होने की लिखित शिकायत की गई है. मामले की जांच के बाद उचित कार्यवाही की जावेगी.

नीचे दी गई तस्वीर में थाने में शिकायत करने पहुंचे ठगी के शिकार सरंपच और सचिव दिख रहे हैं.

छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस के संपादक राजेश सिंह क्षत्री की रिपोर्ट.

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मोदी जी के पास डिग्री है तो सत्यमेव जयते के साथ ट्वीट क्यों नहीं कर दे रहे?

Sanjaya Kumar Singh : मोदी जी के पास डिग्री है तो सत्यमेव जयते के साथ ट्वीट क्यों नहीं कर दे रहे हैं। और नहीं कर रहे हैं तो भक्तों ने जैसे कन्हैया को नेता बनाया वैसे ही अरविन्द केजरीवाल की पार्टी को पंजाब चुनाव जीतने का मौका क्यों दे रहे हैं। भक्तों के उछलकूद का लाभ अरविन्द केजरीवाल को मिल रहा है। अलमारी में रखी डिग्री अंडा-बच्चा तो देती नहीं। ना बीमार होकर अस्पताल जाती है। आमलोगों की डिग्री तो पत्नी कहीं रख देगी, चूल्हा जला चुकी होगी या बच्चों के टिफिन पैक करके दे देगी। मोदी जी के साथ तो ये सब लफड़ा भी नहीं है। फिर इतनी देर?

डिग्री के मामले में अरविन्द केजरीवाल के दावे में दम लगता है। रही सही कसर चुप्पी से पूरी हो जा रही है। रेत में सिर छुपाने से काम नहीं चलता है। जितनी देर करेंगे उतने फंसेंगे। फिर इस्तीफा देने से कम में बात नहीं बनेगी। केजरीवाल को एक और श्रेय मिल जाएगा।

नरेन्द्र मोदी की डिग्री पर उठ रहे सवाल भाजपा के लिए बहुत मामूली हैं और सोनिया गांधी के रिश्वत लेने का मामला बहुत बड़ा। छप्पन ईंची सरकार की सीमा खुद तय हो रही है। ना सोनिया के खिलाफ कार्रवाई करेंगे ना मोदी पर आरोप का जवाब देंगे। आम आदमी पार्टी को तो अपना ही स्तर नहीं पता है। जय हो। यही हाल रहा तो देश की राजनीति में मजा ही नहीं रहेगा। एकदम गोबर हो जाएगी।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

Mukesh Kumar : इधर केजरीवाल बढ़-चढ़कर, ऐलानिया, खुल्लमखुल्ला, ताल ठोंकते हुए, डंके की चोट पर मोदी जी की डिग्रियों को फर्जी बता रहे हैंऔर उधर सरकार तथा बीजेपी दुबकी हुए है। वह चुप्पी धारण किए हुए है और इस कोशिश में है कि अगस्ता वेस्टलैंड के शोर-शराबे में केजरीवाल की आवाज़ दब जाए। लेकिन ऐसा होता नहीं है। दूसरे इससे संदेह और भी पक्के होते जा रहे हैं कि मोदी ने फर्ज़ी डिग्रियाँ हासिल कीं और देश को उल्लू बनाया। प्रधानमंत्री जैसे पद पर बैठे व्यक्ति के बारे में ऐसी राय बने ये न लोकतंत्र के लिए अच्छा है और न ही देश के लिए। ये उस हिंदुत्ववादी राजनीति पर भी कलंक होगा जो सदाचार को खुद की बपौती मानकर सबको दुषचरित्र साबित करने पर आमादा रहती है। इसलिए पार्टी और सरकार को सबूतों के साथ केजरीवाल के आरोपों का जवाब देना चाहिए, बल्कि उन पर क्रिमिनल डेफेमेशन का केस भी दायर कर देना चाहिए।

मोदीजी को दिल्ली सरकार और केजरीवाल टीम से निपटने की अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना चाहिए। उन्होंने उनको काम न करने देने की चालें चलकर फुरसतिया बना दिया। अब ये तो सबको पता ही है कि खाली दिमाग़ शैतान का घर होता है। यही वजह है कि वे अपना वक़्त उनको परेशान करने के नए नए तरीके खोजने में लगा रहे हैं। अब अगर मोदीजी और उपराज्यापाल साहब इस रणनीति को उलट दें तो केजरीवाल सरकार काम में उलझकर रह जाएगी और उसके पास इतना समय ही नहीं रहेगा कि आपके खिलाफ़ खुराफ़ात में ही लगे रहें।

ये दिल्ली यूनिवर्सिटी भी केजरीवाल एंड कंपनी के साथ साज़िश में शामिल है। ये जान-बूझकर पीएम और आपकी डिग्रियों के बारे में भ्रम की स्थिति बनाकर अफवाहों और दुष्प्रचार को हवा दे रही है। स्मृति जी वीसी को तुरंत बर्खास्त करिए और न माने तो विवि ही बंद कर दीजिए। और अभी तक आपने सूचना आयुक्त को क्यों छोड़ रखा है? उसे भी उसके किए की सज़ा दीजिए। आरटीआई क्या इसी के लिए बनाई गई है कि आप हर कोई पीएम को बदनाम करने के लिए उसका इस्तेमाल करता फिरे। कड़ा सबक सिखाइए सबको।

अब तो प्रधानमंत्री को अपनी डिग्रियां निकालकर इन स्यूडो सेकुलरिस्टों और आपवालों के मुँह पर मारकर दिखा देना चाहिए कि ये लोग उनके बारे में जो अनर्गल प्रचार करते रहते हैं वह कितना झूठा है, कितना दुराग्रहों से प्रेरित है। स्मृति ईरानी आप भी मत छोड़िए इन नामुरादों को। वैसे तो ये नरक में जाएंगे ही और इनको कीड़े भी पड़ेंगे मगर ज़रूरी है कि आप लोगों की उज्ज्वल छवि देशवासियों और दुनिया के सामने और भी निखर करआए। आखिर आप देश के दो महत्वपूर्ण पदों पर बैठी महान विभूतियाँ हैं और आप लोग देश का नया इतिहास लिख रहे हैं। आपसे देशभक्तों को कितनी आशाएं हैं। उन्हें आप पर कितना विश्वास है ये आपसे बेहतर भला कौन जानता है। वे आप पर उछाले जा रहे कीचड़ से बहुत आहत हैं और उद्वेलित भी हैं। अगर संविधान और कानून न होता इस देश में तो वे एक को भी न छोड़ते। उम्मीद है आप लोग उनकी उम्मीदों पर खरा उतरेंगे और विरोधियों को धूल चला देंगे। उन सबकी और मेरी भी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार के फेसबुक वॉल से.

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भास्कर डाट काम ने नेशनल सिक्युरिटी एडवाइजर अजित डोभाल का झूठा इंटरव्यू छापा

भास्कर डाट काम की जिस खबर पर बवाल मचा है, उसके बारे में कुछ तथ्य साझा करना चाहता हूं. भास्कर डाट काम ने नेशनल सिक्युरिटी एडवाइजर अजित डोभाल का झूठा इंटरव्यू छापा था. जिसका डोभाल ने तत्काल  खंडन कर दिया लेकिन भास्कर बेशर्मी से इंटरव्यू को अभी तक चलाये जा रहा है. कोई भी हिंदी मीडिया को गंभीरता से नहीं लेता उसका ये फायदा उठाते हैं. अगर यह इंटरव्यू किसी अंग्रेजी अखबार की साइट पर होता तो अब तक बवाल मच गया होता.

हकीकत यह है कि डोभाल साहब से कुछ मिनट की अनौपचारिक बातचीत में इस संवाददाता रोहिताश्व मिश्र ने सहमे अंदाज के एक दो सवाल पूछे उसके बाद पूरा इंटरव्यू मनगढ़ंत लिख के चला दिया. डोभाल साहब ने इस पर कारर्वाई करने को कहा है. इससे पहले भी यह संवाददाता पाकिस्तान जाकर दाउद के घर से खबर करने का झूठा दावा कर चुका है जबकि यह आज तक इंडिया से बाहर नहीं गया.

उस वक्त उसने जो खबर की थी वह कई महीने पहले एक्सप्रेस व हिंदू में छप चुकी थी. इंटरव्यू पढ़कर देखिये. क्या एनएसए इस भाषा में बात करता है. यह दसवीं पास पत्रकार की भाषा है. इस पत्रकार से ज्यादा तरस तो इस अखबार के मालिकों व संपादकों पर आता है जो ऐसे चोर व फर्जी पत्रकारों को अपने यहां जगह दिये हैं. इतना ही नहीं, एनएसए के खंडन के बाद उसे गाड़ी व सुरक्षा भी भास्कर प्रबंधन ने मुहैया करायी है. जय हो.

एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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उनकी डिग्रियां भी जाली हो सकती हैं मगर उन्हे शर्म क्यों नहीं आती !

क्यों नहीं सभी विधायकों, सांसदों, मंत्रियों व नौकरशाहों की डिग्रियों का सत्यापन करके देखा जाये? हो सकता है, काफी लोगों की डिग्री फर्जी निकले। कुछ तो नेता व मंत्रियों के फर्जी डिग्री के मामले आज कल चर्चा में भी है, यहां तक कि तमाम ऐसे लोग विदेशी डिग्री भी लिए फिरते हैं। लोक सेवा आयोग, इलाहाबाद के अध्यक्ष, अनिल यादव की डिग्री/मार्कशीट का सत्यापन कराया जाये, हो सकता है कि अवश्य फर्जी निकले ! आम आदमी क्या करे, उसे तो जेल में डालना आसान है, इन बड़ों को कौन पकड़े?

सियासतदानों की फर्जी डिग्री के मामले में उत्तर प्रदेश शायद देश में अव्वल आ सकता है। काफी नेताओं व नौकरशाहों को शायद जांच होने पर गद्दी छोड़नी पड़ जाए। आपराधिक मामलों की तो बात ही नहीं कहिये। सजायेअफ्ता नेता व नौकरशाह तमाम कुर्सियों पर जमे बैठे हैं, कौन हटाएगा ? तभी तो हम कहते हैं – ” ऐसे सब लोग …….. मस्त और जनता त्रस्त !

कुछ राजनेता हाई स्कूल/इंटरमीडिएट तक में अध्यापन किए होंगे परन्तु प्रोफेसर लिखते है। क्या ये सही है? प्रोफेसर का पद उच्च शिक्षा धारक काफी मशक्कत और सहायक प्रोफेसर के रूप में 26 साल के अनुभव, प्रोन्नति के बाद प्राप्त होता है । यहां तो कोई भी मंत्री/विधायक/सांसद झूठी शान बघारने के लिए अपने नाम के पहले प्रोफेसर साहब लिखे फिरता है। कोई शर्म नहीं आती उन्हें। प्रोफेसर का पद बड़ा उच्च व सम्मानजनक होता है। विदेशों में बड़ी इज्जत होती है । कुछ राजनेता मानद पीएचडी या डीलिट पा जाते हैं, Vice Chancellors की चमचागिरी की बदौलत।

कोई मेरी ‘मंत्री’ तोमर के प्रति सहानभूति नहीं है परन्तु यह कोई पहला या अंतिम मामला ऐसा नहीं। उत्तर प्रदेश में तो नक़ल माफिया/शिक्षा माफिया से जो डिग्री, जिस स्तर तथा जिस श्रेणी की फर्जी मार्कशीट या डिग्री लेना चाहो ले लो, बाज़ार खुला है, बोली लगाने वाला चाहिए। ट्रान्सफर/पोस्टिंग/प्रमोशन सबकी बोली लगती है यंहा तो।

“फर्स्ट एडवांटेज” नामक संस्था द्वारा सर्वे में बताया गया कि भारत में नौकरी पाने के लिए आवेदनकर्ताओं में 50% अभ्यर्थी फर्जी डिग्री/अनुभव प्रमाण पत्र/पहचान पत्र के साथ आते हैं। एक अनुमान के अनुसार भारत में 2500 फर्जी विश्वविद्यालय और 7500 नकली कंपनियां हैं। उत्तर प्रदेश इस मामले में सर्वाधिक खराब साख वाले राज्यों में से एक है। CBCID द्वारा हाल ही में 18 लखनऊ यूनिवर्सिटी के फर्जी डिग्री धारकों को BTC के एडमिशन के बाद पकड़ा गया। मुज़फ्फरनगर की एक अदालत ने लखनऊ विश्वविद्यालय के 9 अधिकारियों के खिलाफ इस मामले में गैर जमानती वारंट जारी किया।

मई 2015 में लखीमपुर खीरी में 29 फर्जी डिग्री धारक, शारीरिक शिक्षा प्रशिक्षकों को पकड़ा गया । इन्ही पदों के लिए 47 अभ्यर्थी BPED की फर्जी मार्क शीट तथा 45 फर्जी BA की डिग्री के साथ पकड़े गए। 2010 में मुजफ्फरनगर में District Institute of Education & Training (DIET) में 19 कर्मचारी लखनऊ विश्वविद्यालय की फर्जी डिग्री के साथ CBCID ने पकड़े। इलाहाबाद विश्वविद्यालय जो गुणवत्तापरक उच्च शिक्षा के लिए जाना जाता है, में भी चालू शैक्षणिक सत्र में ही कम से कम 129 फर्जी डिग्री के मामलों का पता चला है ।

मई १४, २०१४ को फर्जी तरीके से परिषदीय विद्यालय में नौकरी करने वाले एक शिक्षक की सेवा बीएसए ने समाप्त कर दी। पूर्व माध्यमिक विद्यालय शेखूपुर अजीत में तैनात सहायक अध्यापक की बीएड डिग्री फर्जी निकल आने पर बीएसए ने शिक्षक की सेवा खत्म कर दी।

जम्मू एवं कश्मीर उच्च न्यायालय में एक गुरुजी की काबिलियत को लेकर सवाल उठा तो जज मुजफ्फर हुसैन अतर ने बरोज बीते जुमा सुनवाई करते हुए हकीकत से खुद ही रूबरू होने का फैसला लिया और गुरुजी को खुली अदालत में ही गाय पर निबंध लिखने का हुक्म दे दिया। गुरुजी हक्का-बक्का और पसीने-पसीने हो गए। कहने लगे कि अदालत कक्ष के बाहर लिखने की इजाजत दी जाए। वह भी जज साहब ने कुबूल कर ली (शायद जज साहब को लगा हो.. अदालत में इसे घबराहट हो रही होगी)। दरअसल, मामला यह था कि शिक्षक मो. इमरान खान ने बोर्ड ऑफ हाइयर एजूकेशन दिल्ली, नागालैंड ओपन यूनिवर्सिटी से डिग्रियां ले रखी थीं जो मान्यता प्राप्त नहीं हैं। इन्हीं के आधार पर उसे शिक्षक की नौकरी दे दी गई, क्योंकि डिग्री में गुरुजी को उर्दू में 74, अंग्रेजी में 73, गणित में 66 अंक मिले थे यानी डिग्रियों के मुताबिक वो टॉपर हैं, सो नौकरी मिल गई। इसी पर एक याचिका प्रस्तुत की गई और यह सच्चाई सामने आई ।

सबसे सनसनीखेज मामला अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय का है , जंहा से कुख्यात आतंकवादी मोहम्मद आतिफ के कब्जे से अलीगढ़ विश्वविद्यालय की फर्जी स्नातक की डिग्री मिली । उत्तर प्रदेश में नकल माफिया की पोल तो ‘वास्ट’ नामक संस्था खोलती ही रहती है । उसके श्रोत हैं : http://indianexpress.com/…/fake-degree-row-delhi-court-den…/

http://timesofindia.indiatimes.com/…/articlesh…/47621423.cms

http://www.mapsofindia.com/…/educational-frauds-in-india-fa…

मास्साब की बीएड डिग्री फर्जी, बर्खास्त Tue, 14 Jan 2014 – पूर्व माध्यमिक विद्यालय शेखूपुर अजीत का प्रकरण – सात साल…

Posted by उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा समाचार on Monday, January 13, 2014

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फर्जी डिग्री व रिमाण्ड तो एक बहाना है… असल में कुछ और निशाना है…

दिल्ली के कानून मंत्री जीतेन्द्र सिंह तोमर की गिरफ्तारी ने कई विवाद खड़े कर दिए हैं। गिरफ्तारी की अन्दरूनी सच्चाई भले ही कुछ भी हो लेकिन देश हित में जीतेन्द्र सिंह तोमर की गिरफ्तारी ने सवालों की झड़ी लगा दी है। सवाल यह नहीं कि देश की राजधानी का कानून मंत्री खुद शिकंजे में है। सवाल यह भी नहीं कि डिग्री फर्जी है या नहीं। सवाल यह है कि गिरफ्तारी का जो तरीका अपनाया गया वह कितना जायज है। 

संविधान के अनुच्छेद 226ए 227 के तहत दिल्ली हाईकोर्ट में डिग्री को फर्जी घोषित कराने के लिए याचिका भी पहले से प्रस्तुत है ऐसे में दिल्ली पुलिस ने उसी मामले में दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 420ए 467ए468ए471 और 120 बी के तहत अलग से फौजदारी मुकदमा कायम किया है। चूंकि सिविल मामलों में धोखाधड़ी से जुड़े ऐसे मामलों का बारीकी से विवेचन किया जाता है जबकि फौजदारी मामलों अपनाई जाने वाली प्रक्रिया थोड़ी अलग है और संक्षिप्त है। सिविल नेचर के मामलों के अदालत मे चलते रहने के बावजूद उसी पर पुलिस फौजदारी प्रकरण कायम कर सकती है, इसको लेकर पुलिस ने जरूर कानून की बाध्यताओं को दृष्टिगत रखा है लेकिन सवाल फिर वही कि इसकी जरूरत क्यों पड़ गई। जाहिर है कि इस समय केन्द्र और दिल्ली सरकार के बीच प्रशासन संबंधी अधिकारों को लेकर तनातनी चल रही है। यहां हमें यह नहीं भूलना होगा कि अभी कुछ ही दिन पहले सलमान खान को सजा मिलने के कुछ ही घण्टों में उसी दिन हाईकोर्ट से जमानत मिली थी। तब भी कानून के उपयोग के साथ ही अमीर और गरीब को कानून का अपनी सुविधाए रुतबे और सम्पन्नता के हिसाब से उपयोग को लेकर अच्छी खासी बहस हुई थी।  

कुछ वैसे ही स्थिति लेकिन बदले परिदृश्य जीतेन्द्र सिंह तोमर के मामले में दिखे। यहां पुलिस द्वारा गिरफ्तारी को लेकर सवाल खड़े हो गए। इसके चलते इस बार बहस राजनैतिक प्रतिशोध को लेकर चल पड़ी है। जीतेन्द्र सिंह तोमर सम्मानित व्यक्ति तो हैं, वो विधायक हैं। मंत्री भी हैं। कहीं भाग भी नहीं रहे थे। उनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड भी नहीं है। फरार भी नहीं थे। फिर कैसी जल्दबाजी, जबकि वो खुद मामले में सहयोग कर रहे थे। सिविल प्रकृति का प्रकरण पहले से ही उच्च न्यायालय में विचाराधीन भी है। ऐसे में आनन फानन में गिरफ्तारी और मामला विशेष होने के बावजूद भी सौजन्यता के चलते दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष को भी हाथों हाथ जानकारी न देना खुद ही सवालों को जन्म देता है। ऐसा नहीं है कि दिल्ली पुलिस ने इस गिरफ्तारी की पटकथा जल्दबाजी में लिखी होगी। यदि ऐसा होता तो दिल्ली पुलिस की ओर से यह सफाई नहीं आती कि उसने दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष को बीती रात ही फैक्स कर जानकारी दे दी थी।

सबको पता है कि अभी न तो विधानसभा का सत्र ही चल रहा है न ही कोई जरूरी वजह ही है जिसके चलते अध्यक्ष का दफ्तर रात को भी खुला रहे जबकि फैक्स किए जाने वाला दिन छुट्टी यानी रविवार का भी था। इसी तरह से दिल्ली के मुख्यमंत्री को भी सौजन्यता आधारों पर उनके मंत्री की गिरफ्तारी की सूचना देनी थी। इस तरह की परंपरा रही है और माननीयों के मामले में इसे पहले भी अपनाया गया है। 

पुलिस ने 5 दिन की रिमाण्ड के लिए साकेत कोर्ट में यह आवेदन दिया है कि मुंगेर ले जाकर इनकी डिग्री की जांच करेंगे। पुलिस का तर्क हास्यास्पद है। डिग्री कई वर्ष पुरानी है। डिग्री की जांच मुंगेर में आरोपी के बिना भी हो सकती है। जांच में आरोपी की उपस्थिति की कोई आवश्यक्ता भी नहीं है। जांच दस्तावेज की होनी है न कि व्यक्ति की। न्यायालय ने भी उक्त आधार मानकर 4 दिन की पुलिस रिमाणड दी। यह न्यायालय अधिकारिता है।

इस देश में सर्वोच्च न्यायलय और विभिन्न उच्च न्यायालयों के कई ऐसे न्याय दृष्टांत हैं जो यह अवधारित करते हैं कि सिविल प्रकरण के लंबित के रहते उसी आधार पर क्रिमिनल प्रकरण आता है तो उसे रोक दिया जाए क्योंकि इसमें आरोपी को अपना बचाव उजागर करना पड़ता है और संविधान के तहत हर नागरिक को यह अधिकार और सुरक्षा प्राप्त है कि वह अपने बचाव को जब इच्छा पड़े तभी उजागर करे। 

इस प्रकरण का अंत चाहे जिस प्रकार से हो लेकिन इस संबंध में उपर्युक्त बिन्दुओं पर की गई विवेचना तथा माननीय सर्वोच्च न्यायालय के न्याय दृष्टांतों को दृष्टिगत रखते हुए स्थापित स्थिति से हटकर आरोपी को सजा देने के लिए क्या नई स्थिति का निर्माण किया जा सकेगा,  भारतीय लोकतंत्र यह जानने को आतुर है।

ऋतुपर्ण दवे से संपर्क : rituparndave@gmail.com

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तामझाम के साथ डाक बंगले पहुंचे जाली पत्रकार को सीओ ने बाहर निकाला

बदलापुर (जौनपुर): आईपीएस होने का रौब गांठते हुए पूरे पुलिसिया लाव-लश्कर के साथ डाक बंगले पहुंचे कथित पत्रकार को सीओ ने भेद खुलने पर बाहर का रास्ता दिखा दिया। वह अर्द्धसैनिक बल और लग्जरी वाहनों के काफिले के साथ पहुंचा था। एसडीएम ममता मालवीय ने बताया कि पूरे प्रकरण की जांच की जा रही है। 

उसके बार-बार बात बदलने पर अधिकारियों ने और सख्ती की तो उसने खुद को दिल्ली के एक अखबार का पत्रकार और बख्शा थाना क्षेत्र के एक गांव का निवासी बताया। वह पिता की तेरहवीं में शामिल होने आया था। इतना सुनते ही सीओ बदलापुर डीएन सिंह ने उसे डाक बंगले से बाहर निकाल दिया। जब उससे अधिकारियों की पूछताछ चल रही थी, तभी किसी अधिकारी से उसने फोन पर बात की। उधर से कोई अधिकारी बोल रहा था। उसके बाद पूछताछ कर रहे अधिकारी नरम पड़ गए। 

मामला 19 मई की रात करीब 11 बजे का है। पैरामिलिट्री फोर्स के 10-12 अंगरक्षकों के साथ कई वाहनों का काफिला लेकर एक पत्रकार डाक बंग्ले में दाखिल हुआ। चौकीदार से खुद को एडीजी स्तर का अधिकारी बताकर धौंस जमाने लगा। सुविधाओं को लेकर फटकार भी लगाई। बात बढ़ती गई तो एसडीएम और पुलिस भी पहुंच गई। वह तब तक वही रवैया अपनाता रहा। प्रशासन ने कड़ाई बरती तो उसका तेवर कुछ ढीला हुआ। उसने खुद को गृह मंत्रालय का अधिकारी बताते हुए गोपनीय मिशन पर आने की बात कही। 

 

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जब माननीय ही बांटे फर्जी डिग्री तो फिर रोकेगा कौन

बात सिर्फ दक्षिण कश्मीर के एक स्कूल शिक्षक मो. इमरान खान की नहीं है। जो गाय पर निबंध नहीं लिख पाए। इसे सरकारी स्कूलों पर तंज कहिए या व्यवस्था का दंश, हकीकत यही है कि हर जगह हर कहीं सरकारी स्कूल क्या हरेक विभाग में ऐसे नमूने देखने को मिल जाएंगे। अगर कायदे से जांच हुई तो देश भर में न जाने कितनें फर्जी नौकरशाहों पर गाज गिरेगी जो दुनिया में चौंकाने वाला बड़ा आंकड़ा होगा।  

जम्मू कश्मीर हाई कोर्ट में एक गुरूजी की काबिलियत को लेकर सवाल उठा तो जज मुजफ्फर हुसैन अतर ने बरोज बीते जुमा सुनवाई करते हुए हकीकत से खुद ही रूबरू होने का फैसला लिया और गुरूजी को गाय पर खुली अदालत में ही निबंध लिखने का हुक्म दे दिया। गुरूजी हक्का  बक्का और पसीने पसीने हो गए। कहने लगे कि कोर्ट रूम के बाहर लिखने की इजाजत दी जाए वह भी जज साहब ने कुबूल कर ली ; शायद जज साहब को लगा हो, कोर्ट में इसे घबराहट हो रही हो। 

कोर्ट के बाहर भी गुरूजी निबंध नहीं लिख पाए तो एक वरिष्ठ वकील से जज ने गुरूजी को अंग्रेजी से उर्दू में अनुवाद करने के लिए सरल पंक्ति देने को कहा। गुरूजी अनुवाद भी नहीं कर पाए और उसमें भी फेल। अब एक और बहाना गढ़ा कि वो गणित के शिक्षक हैं। जज साहब ने उनकी इस गुहार को भी मान लिया और चौथी कक्षा का एक सवाल हल करने को दे दिया। मगर गुरूजी वह भी नहीं कर पाए। जज साहब सारा माजरा समझ गए और तुरंत ही गुरूजी पर पुलिस एफआईआर दर्ज कराने का फैसला सुना दिया। दरअसल मामला यह था शिक्षक मो. इमरान खान ने बोर्ड ऑफ हायर एजूकेशन दिल्ली, नगालैण्ड ओपन यूनिवर्सिटी से डिग्रियां ले रखी थीं जो मान्यता प्राप्त नहीं हैं। इन्ही के आधार पर उसे शिक्षक की नौकरी दे दी गई क्योंकि डिग्री मे गुरूजी को उर्दू में 74ए अंग्रेजी में 73ए गणित में 66 अंक मिले थे यानी डिग्रियों के मुताबिक वो टॉपर हैं सो नौकरी मिल गई। इसी पर एक याचिका प्रस्तुत की गई और ये सच्चाई सामने आई। जज ने कहा अध्यापक के ज्ञान को समझा जा सकता है, सूबे के विद्यार्थियों का भविष्य क्या होगा, यह भी अंदाजा लगाया जा सकता है, सरकार एक पैनल गठित करे और गैर मान्यता प्राप्त शिक्षण संस्थाओं से जारी डिग्रियों की जांच करे। काश ऐसा ही आदेश पूरे देश के लिए हो जाए !

देश में फर्जी डिग्रियां बेचना एक उद्योग का रूप ले चुका है। पैसा लेकर डिग्रियों के बांटे जाने का खेल अच्छा खासा चल रहा है। अभी इसी 12 मई को ही यूनिवर्सिटी ग्रान्ट कमीशन ने देश की 21 फर्जी यूनिवर्सिटी की सूची जारी की है और साफ कहा है कि विद्यार्थी इनमें दाखिला न लें सभी की डिग्रियां अमान्य हैं। सीधा मतलब डिग्रियां फर्जी हैं और सब पैसे के लिए हो रहा है। इनमें सबसे ज्यादा 9 यूनिवर्सिटी उत्तर प्रदेश की हैं जो वाराणसी संस्कृत यूनिवर्सिटी, वाराणसी यूपी और जगतपुरी, दिल्ली महिला ग्राम विद्यापीठ, इलाहाबाद गांधी हिंदी विद्यापीठ, इलाहाबाद नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ इलेक्ट्रो कम्प्लेक्स होमियोपैथी, कानपुर नेताजी सुभाषचंद्र बोस यूनिवर्सिटी ; ओपन यूनिवर्सिटी अचलताल अलीगढ़, उप्र यूनिवर्सिटी मथुरा महाराणा प्रताप शिक्षा निकेतन यूनिवर्सिटी, प्रतापगढ़ इंद्रप्रस्थ शिक्षा परिषद, इंस्टीट्यूशनल एरिया खोड़ा माकनपुर नोएडाएगुरुकुल यूनिवर्सिटी वृंदावन मथुरा दूसरे नंबर दिल्ली आता है जिसकी 5 यूनिवर्सिटी हैं जिनके नाम कमर्शियल यूनिवर्सिटी लिमिटेड, दरियागंज यूनाइटेड नेशंस यूनिवर्सिटी, वोकेशन यूनिवर्सिटी, एडीआर.सेंट्रिक ज्यूरिडिकल यूनिवर्सिटी, एडीआर हाउस, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड इंजीनियरिंग हैं। 

मध्यप्रदेश की एक केसरवानी विद्यापीठ, जबलपुर कर्नाटक की एक बडागानवी सरकार वर्ल्ड ओपन यूनिवर्सिटी एजुकेशन सोसाइटी, बेलगाम केरल की एक सेंट जॉन कृष्णट्‌टम तमिलनाडु की एक डीडीबी संस्कृत यूनिवर्सिटीए पुत्तुर त्रिची पश्चिम बंगाल की इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ अल्टरनेटिव मेडिसिन कोलकाता और महाराष्ट्र की राजा अरेबिक यूनिवर्सिटी का नाम शामिल है। यूजीसी भी महज सूची जारी कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेता है।

ये तो केवल बानगी मात्र हैं जो जांच के बाद सामने हैं। हकीकत में देश भर में न जाने कितने लोग फर्जी डिग्रियों से बड़े बड़े ओहदे तक जा पहुंचे हैं जो एक जिन्दा दफन राज है। यूनिवर्सिटी ग्रान्ट कमीशन के दिशा निर्देशों के अनुसारए कोई भी प्राइवेट या डीम्ड यूनिवर्सिटी अपने राज्य के बाहर नियमित या डिस्टेंस मोड में डिग्री नहीं दे सकती है। लेकिन फिर भीए कई प्राइवेट यूनिवर्सिटी धड़ल्ले से राज्य के बाहर डिग्रियां बांट रही हैं और करोडों की अवैध कमाई का जरिया बनी हुई हैं। फर्जी डिग्री को लेकर दिल्ली के कानून मंत्री तक शक के दायरे में हैं और केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी भी खूब चर्चा में रहीं।

हैरानी वाली बात है कि बीएड और फिजियोथेरैपी जैसे नियमित रूप से पढ़े जाने वाले कोर्स भी डिस्टेंस मोड में चल रहे हैं। सवाल फिर वही कि क्या ये सब ठीक है तो फिर इनको रोका क्यों नहीं जा रहा है। अब जब तकनीक का जमाना है हम 3 जी से आगे 4 जी और 5 जी की उड़ान भरने ही वाले हैं और सारा सूचना तंत्र जेब में है तो फिर डिग्रियों के फर्जीवाड़े को उसी समय क्यों नहीं पकड़ा जा सकता जब नौकरी या रोजगार के पंजीयन के लिए अभ्यर्थी को दर्ज किया जाता है। 

यह कमीशन खोरी का अवैध खेल है जो सबको पता है। भारतीय दण्ड संहिता की धारा 144 और आपराधिक दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 188 के तहत फर्जीडिग्रियों को बांटने वाली संस्थाओं को बंद किया जा सकता है पर इसे करेगा कौन। यूं ही फर्जी डिग्रियां बंटती रहेंगी और देश के होनहार टेलेण्ट का  गला घुटता रहेगा। सवाल फिर भी अनुत्तरित लेकिन इसे रोकेगा कौन क्योंकि ज्यादातर शिक्षा माफिया बड़े बड़े माननीय जो बन गए हैं । भला हो अदालत जो मामला वहां तक पहुंच जाता है तो न चाहकर भी सच्चाई सामने आ ही जाती है।

लेखक पत्रकार एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार ऋतुपर्ण दवे से संपर्क : rituparndave@gmail.com

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अलवर में केबल ऑपरेटर धड़ल्ले से चला रहे फर्जी न्यूज़ चैनल

अलवर : राजस्थान के कई शहरों की तरह इस जिले में भी एटीएल न्यूज़, ए24 न्यूज़, एसटीवी, सीटीवी न्यूज़, माध्यम टीवी न्यूज़ ,सरीखे अवैध न्यूज टीवी चैनल पिछले कई सालों से बेरोकटोक चल रहे हैं। भारत सरकार द्वारा इन नामों से कोई लाइसेंस कभी जारी नहीं किया हुआ है, इसके बावजूद इन चैनलों के मालिकों और फर्जी पत्रकारों की पूरे अलवर में चांदी कट रही है। इसी की आड़ में ब्लैकमेलिंग और हफ्तावसूली का भी बोलबाला है। यहां के फर्जी पत्रकारों और केबल ऑपरेटर्स के पास सैन्य छावनी तक के कई महत्वपूर्ण वीडियो फुटेज होना देश की सुरक्षा के साथ खुला खिलवाड़ है। प्रशासन इस ओर से भी आंखें मूंदे हुए है। 

दरअसल, इन सभी चैनलों ने एक केबल ऑपरेटर का लायसेंस महज दिखावे के लिए ले रखा है। इसी की आड़ में इन्होंने अवैध पत्रकारिता की अपनी दुकान खोल रखी है। ये पत्रकारिता के नाम पर कहीं भी पहुंच जाते हैं और वहीं से शुरू हो जाता है ब्लेकमेलिंग और हफ्तावसूली का खेल। कोई इनके खिलाफ आवाज उठाता है तो उसको बदनाम कर दिया जाता है। चैनल की आड़ में इनके मालिकों की राजनेताओं, सरकारी अफसरों और बिल्डरों से गाढ़ी छन रही है। कहीं से कार्रवाई की सुगबुगाहट पर ये पुलिस अधिकारियों और प्रशासन पर भी दबाव बना लेते हैं।

अलवर के एक वकील ने कुछ जागरूक नागरिकों के सहयोग से कितनी ही बार शासन स्तर तक पत्राचार किया लेकिन किसी भी उच्चाधिकारी ने राजनेताओं के दबाव में संज्ञान नहीं लिया। जब भी पुलिस इन्क्वारी करती है, तो चैनल चलाने वाले खुद को केबल ऑपरेटर बताने लगते हैं। केबल टीवी एक्ट की धारा 2जी के अंतर्गत यह स्थानीय टीवी चैनल चलाए जा रहे हैं। उल्लेखनीय है कि केबल ऑपरेटर को उपभोक्ताओं की लिस्ट पोस्ट आफिस को देनी पड़ती है। ये तो उस व्यवस्था का भी अनुपालन नहीं कर रहे हैं। 

नियमतः केबल ऑपरेटर स्थानीय स्तर पर केवल फिल्म, चित्रहार, विज्ञापन आदि का प्रसारण कर सकता है और यह सब भी प्रोग्रामिंग कोड के हिसाब से होना चाहिए। साथ ही, इस प्रकार के प्रोग्राम चलाने के लिए कॉपी राइट होना चाहिए। इस प्रकार के समस्त प्रोग्राम सिनेमेटोग्राफी एक्ट के तहत सीबीएफसी यानी सेंसर र्बोड से अधिकृत होने चाहिए। कोई अगर सिनेमाघरो में राष्ट्रगीत भी प्रसारित करता है तो सबसे पहले सेंसर र्बोड का सर्टिफिकेट लेना होता है। केबल एक्ट की धारा 2 जी में साफ तौर पर लिखा है क़ि केबल ऑपरेटर द्वारा चलाये गये सारे प्रोग्राम प्रोग्रामिंग एवं एडवर्टायजिंग कोड का पालन करेंगे।

न्यूज चैनल चलाने के लिए भी 20 करोड़ से ज्यादा की नेट वर्थ होनी चाहिए। इतना ही नहीं, इसके लिये विभिन्न सरकारी डिपार्टमेंट्स जलसेना, थलसेना, वायुसेना, रक्षा मंत्रालय, सीबीआई, विजिलेंस डिपार्टमेंट, पुलिस विभाग से कई तरह की एनओसी यानि अनापत्ति प्रमाणपत्र भी लेना पड़ता है। इतने महत्वपूर्ण मंत्रालयों, विभागों और सैन्य प्रतिष्ठानों की हदें भी शायद अलवर के बाहर खत्म हो जाती हैं। तभी तो यहां किसी को भी टीवी चैनल चलाने की छूट मिली हुई है। मात्र 500 रुपये भरकर केबल टीवी ऑपरेटर का लायसेंस पोस्ट ऑफिस से लेना पड़ता है। फिर किसी एमएसओ को सालाना कुछ रिश्वत देकर इस प्रकार के फर्जी टीवी न्यूज चैनल धड़ल्ले से शुरु कर दिये जाते हैं। 

भारत सरकार के एक आदेश नम्बर एफ/1/2007-बीसी.ईई, जो कि दिंनाक 19 फरवरी 2008 को जारी किया गया था, में साफ लिखा गया है कि केबल ऑपरेटर अगर न्यूज चलाते हैं तो सिर्फ अपने एरिया की इर्न्फोमेशन दे सकते हैं। इन चैनलो को स्थानीय स्तर पर संरक्षण जिला सूचना एवं जनसंपर्क अधिकारी से मिला हुआ है। सूचना अधिकारी मुख्यमंत्री तक की मीटिंग में इन फर्जी पत्रकारों को तजरीह देने से नहीं चूकते हैं। इनको सरकारी खर्चे पर विजिट कराते हैं। डिफेंस जैसे प्रतिष्ठानों में इन अवैध चैनलों के कैमरामैन व पत्रकार जाते रहते हैं। ये मंत्रियों एवं अधिकारियों का इन्टरव्यू लेते हैं। 

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित

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फर्जी IAS ट्रेनी केस: नौकरी नहीं, परस्पर सम्बन्ध दिखते हैं कारण

लखनऊ : आईपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर और सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर ने आईजी गढ़वाल रेंज संजय गुंज्याल से रूबी चौधरी केस में गहराई से जांच करने का अनुरोध किया है.

उन्होंने कहा है कि यह केस मात्र रूबी और गार्ड के वश का नहीं है. यहाँ तक कि सौरभ जैन भी अकेले इसे बिना आईएएस एकेडेमी के निदेशक के संज्ञान में आये नहीं कर सकते थे. उन्होंने इसे प्रथमद्रष्ट्या नौकरी के लिए पैसे लेने की जगह परस्पर संबंधों के जोड़ कर देखे जाने का अनुरोध किया है. साथ ही उन्होंने संस्थान की छवि के दृष्टिगत सचिव, डीओपीटी, भारत सरकार से इस प्रकरण की खुली जांच कराते हुए उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक करने का अनुरोध किया है.

समाचार अंग्रेजी में पढ़ें –  

Fake IAS trainee case:  related with mutual relations, not job

IPS officer Amitabh Thakur and social activist Dr Nutan Thakur have requested IG Garhwal Range Sanjay Gunjyal to get the Ruby Chaudhary fake IAS case enquired deeply.

They said this case could not have been committed solely by Ruby or the Guard. Even Saurabh Jain could not have done this without the matter coming in the knowledge of Academy Director. They suggested to look the matter as being related to mutual relations between Saurabh and Ruby, instead of Ruby’s allegations of taking money for job.

They have also requested Secretary, DOPT, Government of India to constitute an open enquiry in the matter and make its report public, in the interest of the Academy’s prestige.

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Tehelka scribe refuses to reveal source in sensational fake encounter case

IMPHAL : The star witness of the sensational July 23 Kwairamband Keithel fake encounter case, Teresa Rehman of the `Tahelka Magazine`, refused to reveal the identity of her sources citing security problem besides terming it unethical. Teresa Rehman, who filed the news reports of the July 23 incident along with a number of pictures as evidence, gave her statement before the court Chief Judicial Magistrate, Kamrup (Metro) Guwahati, D Thakuriaa on January 6 as prosecution witness number 66.

In her statement, she confirm to have filed the article `Murder in plain sight` appeared at the Tehelka Magazine (dated 8.08.09) about the murder of Sanjit by Manipur police commandos on July 23. She said that the article was written on the basis of the reports and photographs received on her e-mail ID adding that she did not know the person who took the photographs.

Rehman revealed that she collected the information to write the articles from various sources including Rakesh Meihoubam, the legal advisor of the mother of deceased Sanjit. According to her it was from Rakesh she came to know that the deceased Sanjit was a former member of the outlawed group. She further revealed that she was told that Sanjit was earlier arrested by the Police and got bail and was living as free man before he was killed in the sensational fake encounter case.

`I did not visit Imphal for the preparation of my article and I had not received any video footage of the incident,` claimed Rehman.

Soon after the receipt of the photographs through her e-mail ID she reportedly forwarded the same to her then editor in chief, Tarun Tejpal. Subsequently, she received instruction from Delhi office to go ahead and prepare the article. However, she clarified that she did not tamper with the photographs. She further maintained that she no longer has the photographs with her after forwarding the same to the Tehelka weekly magazine office, the photographs became the property of Tehelka Weekly Magazine.

`I am not ready to reveal the names of my source for fear their lives will be at risk and further it will be unethical on my part on revealed my sources`, said Rehman.

It may be recalled that Teresa Rehman was summoned to physically appear before the district and session Judge Manipur East. However, she was later granted permission on December 6 last to give her statement at a designated special court of CBI Guwahati by the concerned court following her plea to make the appearance in Guwahati citing security reason.

Meanwhile, the cross examination of witness of the case was also held today before the district and session Judge Manipur East. Advocate Rakesh Singh Meihoubam, the legal advisor of Sanjit`™s mother appeared before the court as prosecution (no.67). In his statement, the advocate revealed that he did not know Teresa Rehman before the BT road incident.

He came to know with Rehman through Babloo Loitongbam, a fellow activist, who told him that Rehman wanted to talk to her over phone. Meihoubam further revealed that he talked to Rehman twice after the death of Sanjit wherein she inquired about the status of Sanjit before his death. Accordingly, he mentioned that Sanjit was earlier arrested by Manipur police and was later released on bail but clarified that he was not the counsel in the criminal case involving the deceased.

He was approached by the deceased mother for filing a writ petition before the then Guwahati high court only after her son was killed. Subsequently, Meihoubam claimed that he filed the petition after receiving the copy of the magazine from Rehman who sent him a copy following his request.

साभार- Imphal Free Press

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इंडिया न्यूज के बस्ती जिले के रिपोर्टर सतीश श्रीवास्तव सहित पांच लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज

बस्ती। नगर थाना क्षेत्र के पोखरनी गांव में धर्मांतरण के नाम पर चैनल की टीआरपी बढ़ाने को लेकर दिखाई गई खबर को जिला प्रशासन ने संज्ञान लिया. जांच कराने पर खबर और प्रकरण फर्जी पाया गया. इसको लेकर जिला प्रशासन ने कड़ा कदम उठाते हुए आपसी सौहार्द बिगाड़ने के मामले में इंडिया न्यूज के रिपोर्टर सतीश श्रीवास्तव सहित पांच लोगों के खिलाफ गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज करा दिया.

मामला 19 दिसंबर 2014 का है जब बस्ती जिले में तैनात इंडिया न्यूज के रिपोर्टर सतीश श्रीवास्तव अपने चैनल की टीआरपी बढ़ाने के लिए नगर थाना क्षेत्र के पोखरनी गांव के निवासी संतोष कुमार पुत्र राम लखन चमार और गांव के ही विश्वनाथ पुत्र रामचेत के घर पहुंचे और वहां पर मौजूद घर की महिलाओं से पूछा कि तुम लोगों ने मुस्लिम धर्म क्यों अपना लिया है। इस पर महिलाओं ने बताया कि नहीं, हम हिन्दू ही हैं लेकिन हम मजार पर जाकर अपनी आस्था प्रकट करते हैं. इन सभी बात को इंडिया न्यूज के पत्रकार सतीश श्रीवास्तव ने रिकार्ड कर लिया. फिर इसे तोड़मरोड़ कर मजहबी रंग देकर अपने चैनल पर प्रसारित करा दिया.

धर्मांतरण की खबर फ्लैश होते ही जिला प्रशासन के हाथपांव फूल गए और आनन फानन में पोखरनी गांव में जिले के आलाधिकारी पंहुचे. पूरे मामले की जानकारी ली. उन्हें पता चला कि चैनल की टीआरपी बढ़ाने के लिए फर्जी तरीके से खबर को तोड़मरोड़ कर चलाया गया इससे समाज का सौहार्द बिगड़ सकता था. दो समुदायों के बीच कोई भी बड़ी घटना घट सकती थी. वहीं इस झूठी खबर का असर ये हुआ कि हिंदू युवा संगठन ने बाजार बंद कराया. बाद में महिला के पति संतोष की तहरीर पर पुलिस ने इंडिया न्यूज के बस्ती रिपोर्टर सतीश श्रीवास्तव सहित पांच लोगों पर मु0अ0सं0 1436/14 धारा 147, 295ए, 506, व अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति का मुकदमा दर्ज करके पूरे मामले की जांच सीओ कलवारी को सौंप दी है. इस संबध में विवेचक सीओ कलवारी प्रभंस राम ने बताया कि प्रथम दृष्टया आरोप सही है. विवेचना की जा रही है. सारे तथ्यों को इक्ठ्ठा कर कार्यवाही की जाएगी.

बस्ती से राजकुमार की रिपोर्ट. 

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भय दिखाकर वसूली करने वाले इस फर्जी पत्रकार की शक्ल याद रखिए, ये न तो दैनिक जागरण में है और न के. न्यूज में

सेवा में,
प्रभारी, साइबर सेल,
हजरतगंज,
जनपद लखनऊ

विषय- कथित पत्रकार रणजीत सिंह राठौड़, जनपद लखनऊ विषयक

महोदय,

कृपया निवेदन है कि मुझे कतिपय विश्वस्त सूत्रों द्वारा यह बताया गया कि रणजीत सिंह राठौड़ नाम के एक व्यक्ति स्वयं को पत्रकार बता कर ना सिर्फ तमाम लोगों पर गलत-सही रौब दिखा रहा है बल्कि वह इसके जरिये कई सरकारी कर्मियों को भय दिखा कर उनसे वसूली भी कर रहा है. मुझे जब इस बारे में विश्वास हो गया कि ये शख्स फर्जी है, तो इस प्रकरण में कार्यवाही कराने के लिए आवेदन कर रहा हूं.

फर्जी पत्रकार ने अपने फेसबुक वॉल पर खुद की यही फोटो डाल रखी है

सूत्रों द्वारा मुझे उस व्यक्ति का Ranjeet Singh Rathour नाम से फेसबुक एकाउंट (वेबलिंक https://www.facebook.com/ranjeet.singhrathour.92 ) भेजा गया जिस पर उसका पता लखनऊ का और मूल निवास लखीमपुर खीरी का बताया गया. इस एकाउंट में उसने खुद को crime reporter in samajwadi party and dainik jagran बताया है.  इसके अलावा इस फेसबुक एकाउंट में उसने खुद को न्यूज़ चैनल का भी पत्रकार बताते हुए एक फोटो लगा रखा है. फोटो उपर प्रकाशित है.

मैंने इस सम्बन्ध में दैनिक जागरण लखनऊ के जिम्मेदार पदाधिकारियों से बात की तो उन्होंने बताया कि उन्होंने भी सुन रखा है कि इस नाम का कोई आदमी उनके अख़बार का पत्रकार बन गलत काम कर रहा है. उन्होंने स्पष्ट किया कि इस आदमी का उनके अख़बार से कोई रिश्ता नहीं है पर वह फर्जी रूप से स्वयं को इस अख़बार का पत्रकार बता कर गलत काम कर रहा है.

मैंने के-न्यूज़ के भी जिम्मेदार लोगों से इस बारे में बात किया तो उन्होंने भी बताया कि उन्हें भी एक आदमी द्वारा के-न्यूज़ की आईडी लगा कर घुमने और गलत काम करने की शिकायत मिली है. उन्होंने मुझे व्हाट्सएप पर उस आदमी की फोटो भेजी जो हूबहू इसी आदमी श्री रणजीत सिंह राठौड़ की थी.

उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट होता है कि यह आदमी फर्जी रूप से स्वयं को दैनिक जागरण और के-न्यूज़ और शायद अन्य अख़बारों का पत्रकार बता कर इसके जरिये समाज में गलत काम कर रहा है. वह इसके लिए फेसबुक का भी अनुचित प्रयोग कर रहा है.

अतः आपसे निवेदन है कि कृपया इस व्यक्ति द्वारा इन्टरनेट और भौतिक जगत में स्वयं को गलत ढंग से पत्रकार बता कर लोगों को ठगने, गलत रौब दिखाने, इसके माध्यम से विधि-विरुद्ध कार्य करने आदि के मामले में रिपोर्ट दर्ज कर अग्रिम कार्यवाही करने की कृपा करें. निवेदन करूँगा कि यह कार्य व्यापक जनहित का है, जिसमे एक व्यक्ति द्वारा पत्रकारिता जैसे गंभीर कार्य को अनुचित, अनैतिक और अवैध हितों के लिए प्रयोग किया जा रहा है, अतः इस शिकायत पर प्राथमिकता देने की कृपा करें.

पत्रांक संख्या- AT/Comp/37/14 
दिनांक –    24/12/2014                                                                  
(अमिताभ ठाकुर)
5/426, विराम खंड,
गोमती नगर, लखनऊ
094155-34526

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मनोरंजन टीवी के फर्जीवाड़ा ‘चेहरा पहचानो इनाम जीतो’ का एक शिकार मैं भी हूं

विषय : Fraud of Manoranjan TV

निदेशक
मनोरंजन टीवी
आदरणीय सर

आपके चैनल Manoranjan TV पर आने वाले ‘चेहरा पहचानो इनाम जीतो’ विज्ञापन के जरिए लोगों को पागल बनाने का काम किया जाता है. इसका एक शिकार मैं भी हुआ हूं. मेरे पास आज दिनांक 09 दिसंबर को फोन आया कि आपको 12 लाख 50 हजार रुपए इनाम में मिलने वाला है. इसे पाने के लिए मेरे से अभी तक इनाम देने वालों ने 86 हजार रुपए तक वसूल लिए हैं.

जब मैंने पैसे वापस करने के लिए कहा तो भी इन्होंने कहा कि इसके लिए 14 हजार रुपए और एकाउंट में डाल दो. आपसे निवेदन है कि आप इस संदर्भ में मदद करने की कृपया करें ताकि मुझ गरीब को न्याय मिल सके. मैं आपको वह मोबाइल नंबर दे रहा हूं जिसके जरिए मुझे लगातार फोन किया गया और पैसे मांगे गए. वह नंबर 08969362566 है.

सतीश चन्द शर्मा
कोटपूतली जयपुर राजस्थान
M. 09314090617
satishsharma.pa@gmail.com

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सहारा समूह ने 17,000 करोड़ रुपये की मनी लांड्रिंग के लिए फर्जी इनवेस्टर बनाए!

एक बड़ी सूचना प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के सूत्रों के हवाले से आ रही है कि सहारा समूह ने मनी लांड्रिंग के लिए ढेर सारे फर्जी निवेशक बनाए. इस आशंका / आरोप की जांच के लिए सेबी ने कहा था जिसके बाद प्रवर्तन निदेशालय सक्रिय हो गया है. सेबी ने ईडी को फर्जी निवेशकों के बारे में अपने पास मौजूद समस्त जानकारी दे दी है. सेबी ने सहारा मामले में जांच की रिपोर्ट भी ईडी को सौंप दी है. सेबी रिपोर्ट के आधार पर पीएमएलए कानून के उल्लघंन का मामला बनाएगी.  ईडी जानबूझ कर बनाए गए फर्जी निवेशकों की जांच कर रहा है.

सहारा समूह ने अपनी तरफ से सेबी को निवेशकों के बारे में जो जानकारी दी थी, वह गलत निकली है. सेबी को 20,000 करोड़ रुपये में से करीब 17,000 करोड़ रुपये की मनी लांड्रिंग का शक है. इस मामले में उत्तरप्रदेश के एक बड़े राजनेता की भूमिका की भी जांच होगी. पूरे खेल के खुलासे के लिए प्रवर्तन निदेशालय की एक टीम जल्द ही सुब्रत रॉय से तिहाड़ जेल में पूछताछ कर सकती है.  ईडी ने सहारा के खिलाफ ईसीआईआर (एनफोर्समेंट केस इंवेस्टिगेशन रिपोर्ट) दाखिल कर दिया है. उधर, सहारा का कहना है प्रवर्तन निदेशालय इस मामले की जांच नहीं कर सकता क्योंकि सेबी की जांच फिलहाल जारी है.

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हिन्दी दैनिक जन माध्यम के मुख्य सम्पादक और पूर्व आईपीएस मंजूर अहमद का फर्जीवाड़ा

: जन माध्यम के तीन संस्करण चलाते हैं मंजूर अहमद : दूसरे की जमीन को अपने गुर्गे के जरिए बेचा, खुद बने गवाह : ताला तोड़कर अपने पुत्र के मकान पर भी कराया कब्जा, पुलिस नहीं कर रही मुकदमा दर्ज : लखनऊ, पटना व मेरठ से प्रकाशित होने वाले हिन्दी दैनिक समाचार पत्र जन माध्यम मुख्य सम्पादक, 1967 बैच के सेवानिवृत्त आई0पी0एस0 अधिकारी एवं लखनऊ के पूर्व मेयर एवं विधायक प्रत्याशी प्रो0 मंजूर अहमद पर अपने गुर्गे के जरिए दूसरे की जमीन को बेचने व खुद गवाह बनने का सनसनीखेज मामला प्रकाश में आया है। प्रो0 मंजूर अहमद के इस फर्जीवाड़े का खुलासा खुद उनके पुत्र जमाल अहमद ने किया।

जमाल अहमद ने बताया कि अपनी नौकरी के दौरान मंजूर अहमद ने अरबों रूपयों की नामी-बेनामी सम्पत्ति बनाई है। लखनऊ के नजदीक जनपद बाराबंकी, कुर्सी रोड के ग्राम गुग्गौर में मंजूर अहमद ने अपने सगे भांजे मों0 निजामुद्दीन पुत्र एनुलहक निवासी खालिसपुर जिला सीवान बिहार, जो ड्रग्स बेचने का धंधा करते थे, कई साल तिहाड़ जेल में बंद रहे, के नाम ग्राम गुग्गौर में गाटा सं0 385 क्षेत्रफल 1.481 हेक्टेयर भूमि खरीदी। मों0 निजामुद्दीन का लोकल पता सी-189, इन्दिरानगर लखनऊ यानि मंजूर अहमद के अपने घर का पता लिखाया। इसी बेशकीमती करोड़ों-अरबों  की जमीन पर अब प्लाटिंग की जा रही है। इस जमीन को दिनांक 27.08.2013 को बही सं0 1, जिल्द सं0 3099, पृष्ठ सं0 347 से 400 क्रमांक 5881 पर रजिस्टर्ड किया गया है।

श्री मंजूर अहमद ने इस जमीन को धोखे से बेचा है एवं जालसाजी की है, जिस व्यक्ति को मंजूर अहमद ने मों0 निजामुद्दीन निवासी बिहार बताया है, वह कोई बहुरूपीया है एवं मंजूर अहमद का गुर्गा है, क्योंकि रजिस्ट्री में गवाह मंजूर अहमद स्वयं हैं। मों0 निजामुद्दीन ने स्वयं रजिस्ट्री नहीं की है, बल्कि उनके नाम से किसी फर्जी आदमी को खड़ा करके रजिस्ट्री की गई है। उप निबंधक कार्यालय में इस फर्जी निजामुद्दीन की डिजिटल फोटो व डिजिटल अंगूठे के निशान मौजूद हैं।  जमाल अहमद ने बताया कि उनके पिता ने तीन शादियां की एवं तीनों पत्नियां जीवित हैं, वह उनकी पहली पत्नी के पुत्र हैं। जमाल ने बताया कि उनके सगे नाना स्व0 खुर्शीद मुस्तफा जुबैरी बिहार कैडर के 1953 बैच के आई0ए0एस0 अधिकारी थे, उनकी मौत एक किराए के मकान में हुई थी, आज भी उनकी नानी, मां एवं उनकी अविवाहित बहन किराए के मकान (गौतम कालोनी, आशियाना नगर फेस-2, पटना) में ही रहते हैं।

जमाल ने बताया कि मंजूर अहमद अपनी हवस के चलते गैंग बनाकर आदतन अपराध करते हैं। दूसरे की सम्पत्ति पर कब्जा करना, व्यवधान डालना इनकी आदत है। जमाल ने बताया कि उनके मकान 1/140 विश्वास खण्ड, गोमती नगर, लखनऊ पर भी मंजूर अहमद की नीयत खराब है। मकान का ताला तोड़कर श्री मंजूर अहमद, श्री यूसुफ अयूब व अन्य लोगों ने कब्जा कर लिया, जिसके खिलाफ वह लगातार दिनांक 14.05.2014 से एफ़0आई0आर0 दर्ज कराने का प्रयास कर रहा है।

इसी क्रम में उन्होंने दिनांक 28.10.2014 को महामहिम राज्यपाल महोदय, से मिलकर न्याय की गुहार लगाई थी। महामहिम जी ने अपने ए0डी0सी0 श्री गौरव सिंह, आई0पी0एस0 के माध्यम से एस0एस0पी0 लखनऊ को फोन कराकर जमाल के साथ न्याय करने के लिए कहा था। एस0एस0पी0 लखनऊ ने दिनांक 31.10.2014 को थानाध्यक्ष गोमती नगर, जहीर खान को फोन पर निर्देश दिए कि प्रकरण में एफ़0आई0आर0 दर्ज की जाए। थानाध्यक्ष गोमतीनगर ने उनके प्रार्थना पत्र को देखते ही कहा कि मंजूर साहब तो अच्छे अधिकारी रहे हैं, एफ़0आई0आर0 दर्ज होने से साहब की बड़ी बदनामी हो जाएगी। थानाध्यक्ष ने कहा कि वह एस0एस0पी0 साहब से बात कर लेंगे। एफ़0आई0आर0 दर्ज नहीं होने पर ही जमाल ने दिनांक 03.11.2014 को मुख्य सचिव उ0प्र0 से मुलाकात की, जिस पर उन्होंने प्रमुख सचिव गृह को कार्यवाही के निर्देश दिए। प्रकरण पर प्रमुख सचिव गृह ने स्वयं दिनांक 03.11.2014 को ही एस0एस0पी0 लखनऊ से वार्ता कर उनको न्याय देने की बात कही।

जमाल ने बताया कि अभी तक एफ0आई0आर0 इसलिए दर्ज नहीं हो सकी क्योंकि  उनके पिता मंजूर अहमद, आई0पी0एस0, ए0डी0जी0 उ0प्र0 के पद से रिटायर अधिकारी हैं, मंजूर अहमद लखनऊ से मेयर एवं विधायक का चुनाव लड़ चुके हैं, कई विश्व विद्यालयों के कुलपति रह चुके हैं एवं वर्तमान में शुभार्ती वि0वि0 मेरठ के कुलपति हैं। उनके पिता के खास गुर्गे यूसुफ थाना क्षेत्र गोमतीनगर लखनऊ में ही जीरो डिग्री बार, रेस्टोरेन्ट व डिस्कोथेक चलाते है। इनकी दबंग छवि व बार आदि के चलते स्थानीय पुलिस से उनके अच्छे संबंध जगजाहिर हैं।

मंजूर अहमद किस हद तक सम्पत्ति के भूखे हैं, इसका अंदाजा इसी से होता है कि इन्होंने अपनी एक कोठी शेरवानी नगर, मडि़यांव, लखनऊ से ठीक सटे एक प्लाट दस हजार वर्ग फीट पर लिखा दिया कि प्लाट बिकाऊ नहीं है, ताकि लोग विवादित समझकर प्लाट न खरीदें। इनके पास एक मकान बी-102, वसुन्धरा इन्क्लेव दिल्ली में है। सी-189, इन्दिरा नगर, लखनऊ में मकान है, इसके अलावा कई सम्पत्तियां हैं। मंजूर अहमद के खास गुर्गे यूसुफ के पास लखनऊ में ही करोड़ों रुपये की अपनी सम्पत्ति है। यूसुफ का लखनऊ में ही नाका क्षेत्र में जस्ट 9 इन नाम का होटल, गोमतीनगर, लखनऊ में जीरो डिग्री बार व रेस्टोरेन्ट है, अपना स्वयं का मकान 107 गुरू गोविन्द सिंह मार्ग, लालकुआं, लखनऊ के साथ ही और भी कई सम्पत्तियां हैं। साथ ही यूसुफ लगभग पांच कम्पनियों के मालिक भी हैं।   जमाल ने बताया कि वह पुनः दिनांक 08.11.2014 को एस0एस0पी0 से मिले तो एस0एस0पी0 ने पूरे मामले को समझने के बावजूद कहा कि प्रकरण सिविल नेचर का है, वह जांच करवा लेंगे, जबकि सबको पता है कि ताला तोड़कर जबरन कब्जा किया गया है।  जमाल के अधिवक्ता विनोद कुमार ने एस0एस0पी0 से मांग की है कि तत्काल एफ0आई0आर0 दर्ज करके जमाल के साथ न्यायोचित कार्यवाही की जाए।

दिनांक 15.11.2014

(जमाल अहमद)
पुत्र श्री मंजूर अहमद
निवासी- 1/140, विश्वास खण्ड,
गोमतीनगर, लखनऊ
09654871990 (मो0)

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इंडिया टुडे वालों के फर्जी सर्वे की खुली पोल, केजरीवाल ने पूछा- क्या यही है पत्रकारिता?

इंडिया टुडे समूह के फर्जी सर्वे और घटिया पत्रकारिता से अरविंद केजरीवाल नाराज हैं. अरविंद केजरीवाल ने अपने ट्विटर अकाउंट पर ट्टवीट करके लोगों से पूछा है कि क्या इसे ही पत्रकारिता कहते हैं? साथ ही केजरीवाल ने एक वीडियो लिंक दिया है जिसमें इंडिया टुडे के फर्जी सर्वे की असलियत बताई गई है. अरविंद केजरीवाल के पेज पर शेयर किए गए लिंक से यू-ट्यूब पेज पर जाने पर एक वीडियो मिलता है. इस वीडियो में दिखाया गया है ‌कि देश का नामी इंडिया टुडे ग्रुप द्वारा न्यूजफिल्क्स डाट काम नामक एक वेबसाइट के जरिए एक सर्वे कराया रहा है जिसमें लोगों से पूछा गया है कि वह केजरीवाल को कितना नापसंद करते हैं और ये कि क्या आप केजरीवाल को दोबारा मौका देंगे?

चौंकाने वाली बात ये है जैसे ही इस सर्वे में आप भाग लेते हैं आपसे एक एक कर सात सवाल पूछे जाते हैं लेकिन कोई भी सवाल केजरीवाल से जुड़ा हुआ नहीं होता. लेकिन जब रिजल्ट बताया जाता है तो कहा जाता है कि आपने केजरीवाल को नापसंद कर दिया है. सवालों का जवाब देते हुए जब आप आगे बढ़ते हैं तो आपको शाहरूख खान की पसंदीदा फिल्म से लेकर आपके फेवरेट स्वतंत्रता सेनानी के बारे में पूछा जाता है. अंत में सर्वे आपको बताता है कि आप केजरीवाल को पसंद नहीं करते हैं.

शेयर किए गए वीडियो में दिखाया गया है कि देश का नामी मीडिया ग्रुप इंडिया टुडे फर्जी सर्वे कराकर अरविंद केजरीवाल को नापसंद करने वालों की संख्या के बारे में बता रहा है. साथ ही इस वीडियो के अंत में बताया गया है कि कैसे केजरीवाल पर भरोसा करने पर दिल्ली की जनता को निराशा हाथ लगी. इस वीडियो में बताया गया है कि सर्वे में शामिल होने वाले से कुल सात सवाल पूछे जाते हैं लेकिन उनमें से कोई भी सवाल न तो केजरीवाल से संबंधित हैं और न ही उनका कोई संबंध देश या दिल्ली की राजनीतिक व्यवस्‍था से है.

अरविंद केजरीवाल का ट्वीट और सर्वे के डिटेल के बारे में वीडियो लिंक यूं है….

Arvind Kejriwal       

✔ @ArvindKejriwal

Is this journalism? I am shocked:

https://www.youtube.com/watch?v=trx4YevdcpE

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ईटीवी का पत्रकार बताकर उगाही करने वाला शख्स धरा गया

मध्यप्रदेश के मंडला जिले में पंचायत सचिव से रंगदारी मांगते एक फर्जी पत्रकार को पुलिस ने गिरफ्तार किया है. कथित पत्रकार का नाम अमित मिश्रा है जो रीवा जिले के मऊगंज का निवासी है. पंचायत सचिव के अनुसार ये फर्जी पत्रकार अपने आपको ईटीवी न्यूज का संवाददाता बतलाकर पत्रकारिता का धौंस दिखा तीन हजार रुपयों की मांग कर रहा था.

इतना ही नहीं, कथित पत्रकार पंचायत सचिव को तीन अलग अलग पंचायतों से रंगदारी में मिले पांच पांच हजार के चेक दिखलाकर झांसे में लेने की कोशिश कर रहा था. शिकायतकर्ता ने सुनियोजित तरीके से रुपये देने के नाम पर फर्जी पत्रकार को बुलाया और पुलिस के हवाले कर दिया. बहरहाल पुलिस कथित पत्रकार से गहन पूछताछ में जुटी है. पुलिस की मानें तो आरोपी पत्रकार द्वारा लगातार भ्रामक जानकारियां दी जा रही है.

विजय तिवारी की रिपोर्ट.

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दैनिक भास्कर के धर्मेंद्र अत्री गिरफ्तार, गलत दस्तावेजों से पासपोर्ट बनाने का आरोप

दैनिक भास्कर में वरिष्ठ पद पर कार्यरत धर्मेंद्र अत्री के बारे में खबर मिल रही है कि उन्हें पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है. अत्री पर पासपोर्ट को लेकर गलतबयानी करने का आरोप है. उनके खिलाफ पासपोर्ट एक्ट के सेक्शन 12 के तहत जालंधर के बारादरी पुलिस स्टेशन में मामला दर्ज है. इसके पहले छह अक्टूबर को जालंधर सेशन कोर्ट ने उनकी जमानत की याचिका खारिज कर दी थी.

धर्मेंद्र अत्री के खिलाफ एफआईआर मजिस्ट्रेट के आदेश पर इसी साल 15 मई को दर्ज हुआ था. इस मामले में राजेश कपिल उस वक्त कोर्ट गए थे जब पुलिस ने रिपोर्ट लिखने से मना कर दिया था. धर्मेंद्र अत्री ने जालंधर से गलत दस्तावेजों के सहारे अपना पासपोर्ट बनवाया था. राजेश कपिल की कंप्लेन के बाद जालंधर पुलिस ने अत्री के पासपोर्ट को जब्त कर लिया. प्रकरण के विवेचक वीर सिंह हैं.

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