राम मंदिर सुप्रीम कोर्ट से ही बनना है तो भाजपा किस मर्ज की दवा?

मोदी सरकार के कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले से ही राम मंदिर निर्माण का संवैधानिक रास्ता निकलेगा… अब सवाल यह है कि जब सुप्रीम कोर्ट से ही राम मंदिर बनना है तो फिर भाजपा, संघ या उससे जुड़े विहिप सहित तमाम संगठन किस मर्ज की दवा हैं और सालों से वे किस आधार पर ये दावे करते रहे कि कसम राम की खाते हैं मंदिर वहीं बनाएंगे..? विपक्ष में रहते भाजपा ने कभी भी संवैधानिक तरीके से राम मंदिर निर्माण की बात नहीं की, उलटा यह नारा लगाया जाता रहा कि दुनिया की कोई अदालत यह तय नहीं कर सकती कि भगवान राम का जन्म कहां हुआ और मंदिर निर्माण कोर्ट का नहीं, बल्कि आस्था का विषय है…

यह तो सबको पता है कि सुप्रीम कोर्ट का निर्णय सभी के लिए बाध्यकारी है और कांग्रेस सहित सभी राजनीतिक दलों को मान्य करना ही पड़ेगा… तो फिर भाजपा कैसे राम मंदिर निर्माण का साफा अपने माथे बंधवाएगी..? अभी उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव में भी राम मंदिर निर्माण की बात कही गई और इस चुनाव सहित कुल 14 मर्तबा अपने घोषणा-पत्रों में मंदिर निर्माण के दावे भाजपा कर चुकी है… अब भाजपा और उसके भक्तों की दलील यह भी रहती है कि धारा 370 सहित मंदिर का निर्माण तब होगा जब राज्यसभा सहित उत्तरप्रदेश में भाजपा को पर्याप्त सीटें मिल जाए। यानि न नौ मन तेल होगा और न राधा नाचेगी… जबकि विपक्ष में रहते ये तमाम बहाने याद नहीं थे…

आज भाजपा और संघ को स्पष्ट घोषणा करना चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट का निर्णय कुछ भी रहे मंदिर का निर्माण तो हर हाल में होकर रहेगा और इसकी तारीख और मंदिर निर्माण पूरा होने की घोषणा भी लगे हाथ कर देना चाहिए… जब शाहबानो प्रकरण में और अभी जल्लीकट्टू के मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के विपरित सरकारों ने अध्यादेशों के जरिए नियम-कानून ही बदल डाले, तो फिर राम मंदिर के निर्माण में क्यों नहीं इस तरह का अध्यादेश लाया जाता..? कुल मिलाकर भाजपा राम मंदिर के साथ-साथ अपने तमाम कोर इश्यू जिनमें धारा 370, सामान नागरिक संहिता पर एक्सपोज हो चुकी है… रामलला तो सालों से तम्बू में बैठे हैं और मंदिर बनाने वाले सत्ता के महलों में मस्ती छान रहे हैं…

राजेश ज्वेल
वरिष्ठ पत्रकार
jwellrajesh66@gmail.com

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मिस्टर ट्रम्प! पत्रकारिता के नियम हमारे हैं, आपके नहीं

अमेरिका फर्स्ट क्यों है… क्यों वह दुनिया का चौधरी कहलाता है और आर्थिक सम्पन्नता के मामले में भी अमेरिका तमाम मंदी के बावजूद सर्वोच्च क्यों बना हुआ है..? इन सवालों के जवाब ट्रम्पकाल की शुरुआत में ही बड़ी आसानी से खोजे जा सकते हैं… लोकतंत्र की खूबसूरती दमदार विपक्ष के रूप में ही देखने को मिलती है और अमेरिकी समाज ने बता दिया कि वह तंग दिल नहीं, बल्कि खुली सोच का हिमायती है… अमेरिका के 45वें राष्ट्रपति बने डोनाल्ड ट्रम्प  ने अपनी शपथ में मेक इन अमेरिका के नारे के साथ बाय अमेरिकन-हायर अमेरिकन की बात कही है… उनके शपथ ग्रहण समारोह का बहिष्कार जहां 60 डेमोक्रेटिक सांसदों ने किया तो जाने-माने हॉलीवुड अभिनेता रॉबर्ट डी नीरो  ने भी खुलेआम खिलाफत की…

जनता ने भी सड़कों पर उतरकर ट्रम्प का विरोध किया… मगर देश में किसी ने भी इन विरोधियों को देशद्रोही करार नहीं दिया… पक्ष और विपक्ष एक साथ नजर आए… न किसी तरह की झड़प, न कोई विवाद और न ही आमने-सामने की कटूता नजर आई… भारत में किसी फिल्म कलाकार या मीडिया द्वारा भी अगर कोई बात कह दी जाती है तो उसको लेकर बखेड़ा खड़ा हो जाता है और पाकिस्तान चले जाने की धमकी के साथ फिल्मों के बहिष्कार का सिलसिला शुरू हो जाता है… मगर ट्रम्प की खिलाफत करने वाले रॉबर्ट डी नीरो के लिए इस तरह की कोई बात अमेरिका में सुनाई नहीं दी… यहां तक कि वहां के जाने-माने मीडिया समूह ने भी डोनाल्ड ट्रम्प के शपथ भाषण की आलोचना करने से कोई परहेज नहीं किया… न्यूयॉर्क पोस्ट ने तो रंगमिजाजी के लिए चर्चित ट्रम्प के राष्ट्रपति बनने के बाद देश में एक नए माफिया युग की शुरुआत कहा, तो द न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा कि उनके ऐसे भाषण की उम्मीद किसी को नहीं थी…

ऐसा लगा मानों वे अमेरिका की नहीं किसी और ही देश की बात कर रहे थे… कुल मिलाकर बात समझने की यह है कि जब अमेरिका के राष्ट्रपति को वहां का एक आम या खास आदमी इस तरह लतिया सकता है तो हमारे देश में मुद्दों और तर्कों की बात कहने-सुनने की सहिष्णुता कहां चली गई..? देशद्रोही करार देने से लेकर पाकिस्तान चले जाने की बात बड़ी आसानी से विरोध करने वालों के लिए कह दी जाती है… उल्लेखनीय है कि डोनाल्ड ट्रम्प अपनी विवादित बातों और ट्वीट के लिए चर्चित रहे हैं और उनका मीडिया के साथ भी जमकर पंगा चल रहा है… यहां सलाम करना चाहिए अमेरिका के मीडिया को, जिसने डोनाल्ड ट्रम्प को शपथ लेने से पहले ही आइना दिखाते हुए एक कड़ा और मौजू पत्र लिखा… अमेरिका के साथ-साथ दुनियाभर के मीडियाकर्मियों को यह पत्र पढऩा चाहिए… क्योंकि मौजूदा वक्त में दुनियाभर का मीडिया ऐसी परिस्थितियों का सामना कर रहा है… अमेरिकन प्रेस कोर का यह पत्र दुनियाभर में अब चर्चित हो रहा है… एनडी टीवी के जाने-माने एंकर रवीश कुमार ने इसी पत्र के आधार पर एक बेहतरीन प्राइम टाइम भी 19 जनवरी को प्रस्तुत किया था, उसे भी यूट्यूब पर जाकर देखा जाना चाहिए… अमेरिकी राष्ट्रपति को लिखे इस पत्र का मजमून इस प्रकार है…

श्रीमान् नवनिर्वाचित राष्ट्रपति

आपके कार्यकाल के शुरू होने के अंतिम दिनों में हमने अभी ही साफ कर देना सही समझा कि हम आपके प्रशासन और अमेरिकी प्रेस के रिश्तों को कैसे देखते हैं. हम मानते हैं कि दोनों के रिश्तों में तनाव है. रिपोर्ट बताती है कि आपके प्रेस सचिव व्हाईट हाउस से मीडिया के दफ्तरों को बंद करने की सोच रहे हैं. आपने ख़ुद को कवर करने से कई न्यूज़ संगठनों को बैन किया है. आपने ट्विटर पर नाम लेकर पत्रकारों पर ताने कसे हैं, धमकाया है. अपने समर्थकों को भी ऐसा करने के लिए कहा है. आपने एक रिपोर्टर का यह कहकर मज़ाक उड़ाया है कि उसकी बातें इसलिए अच्छी नहीं लगी कि वह विकलांग है. हमारा संविधान प्रेस की आज़ादी का संरक्षक है. उसमें कहीं नहीं लिखा है कि राष्ट्रपति कब प्रेस कांफ्रेंस करें और प्रेस का सम्मान करें. प्रेस से संबंध रखने के नियम आपके होंगे. हमारा भी यही अधिकार है क्योंकि टीवी और अखबार में वो जगह हमारी है जहां आप प्रभावित करने का प्रयास करेंगे. वहां आप नहीं, हम तय करते हैं कि पाठक, श्रोता या दर्शक के लिए क्या अच्छा रहेगा. अपने प्रशासन तक रिपोर्टर की पहुंच समाप्त कर ग़लती करेंगे.

हम सूचना हासिल करने के तरह तरह के रास्ते खोजने में माहिर हैं. आपने अपने अभियान के दौरान जिन न्यूज़ संगठनों को बैन किया था उनकी कई रिपोर्ट बेहतरीन रही है. हम इस चुनौती को स्वीकार करते हैं. पत्रकारिता के नियम हमारे हैं, आपके नहीं हैं. हम चाहें तो आपके अधिकारियों से ऑफ द रिकॉर्ड बात करें या न करें. हम चाहें तो ऑफ द रिकॉर्ड ब्रीफिंग में आयें न आयें. अगर आप यह सोचते हैं कि रिपोर्टर को चुप करा देने या भगा देने से स्टोरी नहीं मिलेगी तो ग़लत हैं. हम आपका पक्ष लेने का प्रयास करेंगे. लेकिन हम सच्चाई को तोडऩे मरोडऩे वालों को जगह नहीं देंगे. वे जब भी ऐसा करेंगे हम उन्हें भगा देंगे. यह हमारा अधिकार है. हम आपके झूठ को नहीं दोहरायेंगे. आपकी बात छापेंगे लेकिन सच्चाई का पता करेंगे. आप और आपका स्टाफ व्हाइट हाउस में बैठा रहे, लेकिन अमेरिकी सरकार काफी फैली हुई है.

हम सरकार के चारों तरफ अपने रिपोर्टर तैनात कर देंगे. आपकी एजेंसियों में घुसा देंगे और नौकरशाहों से ख़बरें निकाल लायेंगे. हो सकता है कि आप अपने प्रशासनिक इमारत से आने वाली खबरों को रोक लें लेकिन हम आपकी नीतियों की समीक्षा करके दिखा देंगे. हम अपने लिए पहले से कहीं ज्यादा ऊंचे मानक कायम करेंगे. हम आपको इसका श्रेय देते हैं कि आपने मीडिया की गिरती साख को उभारा है. हमारे लिए भी यह जागने का समय है. हमें भी भरोसा हासिल करना होगा. हम इसे सही, साहसिक रिपोर्टिंग से हासिल कर लेंगे. अपनी गलतियों को मानेंगे और पेशेवर नैतिकता का पालन करेंगे. ज़्यादा से ज़्यादा आप आठ साल ही राष्ट्रपति के पद पर रह सकते हैं लेकिन हम तो तब से हैं जब से अमेरिकी गणतंत्र की स्थापना हुई है. इस महान लोकतंत्र में हमारी भूमिका हर दौर में सराही गई है. तलाशी गई है. आपने हमें मजबूर किया है कि हम अपने बारे में फिर से यह बुनियादी सवाल करें कि हम कौन हैं. हम किसलिए यहां हैं. हम आपके आभारी हैं. अपने कार्यकाल के आरंभ का लुत्फ उठाइये…

कोलम्बिया जर्नलिज्म रिव्यू ने अमेरिकन प्रेस कोर के इस पत्र को प्रकाशित किया है… यहां ये भी महत्वपूर्ण है कि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपना पद छोडऩे के 48 घंटे पहले व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बात करते हुए अंग्रेजी में एक वाक्य कहा… You are not supposed to be sycophants, you are supposed to be skeptics.यानि पत्रकारों को संदेहवादी या प्रश्नवादी होना चाहिए… श्री ओबामा ने  स्पष्ट कहा कि अमेरिका को पत्रकारों की जरूरत है… लोकतंत्र को पत्रकारों की जरूरत है… इसके विपरित अमेरिका के नए राष्ट्रपति ट्रम्प मीडिया के समक्ष इस तरह पेश आए जैसे उसका काम उनके कथनों को टाइप करना है, प्रश्न करना नहीं… अमेरिका में आम जनता के साथ-साथ प्रेस के संवैधानिक अधिकार भारत की तुलना में कई ज्यादा और बेहतर है… प्रेस की स्वतंत्रता की सूची में दुनिया के 180 देशों में से अमेरिका का स्थान 41वां है… पहले, दूसरे और तीसरे स्थानों पर फीनलैंड, नीदरलैंड और न्यूजीलैंड आते हैं… दुनिया के चौधरी यानि अमेरिकी राष्ट्रपति को आइना दिखाने वाले अमेरिकी पत्रकारों के संगठन अमेरिकन प्रेस कोर को वाकई लाख सलाम… जिसने भारत सहित दुनियाभर के मीडिया का माथा ऊँचा कर दिया…

राजेश ज्वेल
jwellrajesh66@gmail.com

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नोटबंदी : खाया-पीया कुछ नहीं, गिलास फोड़ा बारह आना

15 लाख करोड़ तक जमा हो गए बैंकों में, 97 प्रतिशत 1000 और 500 के खारिज किए नोट पहुंचे रिजर्व बैंक के पास, मात्र 47 हजार करोड़ ही बचे : खाया-पीया कुछ नहीं, गिलास फोड़ा बारह आना… ये कहावत मोदी सरकार की नोटबंदी पर पूरी तरह चरितार्थ होती है। खबरों की पुष्टि इन आंकड़ों से हो जाती है कि 30 दिसम्बर तक देशभर की बैंकों में 14.97 करोड़ रुपए मूल्य के 1000 और 500 के खारीज किए नोट जमा हो गए। नोटबंदी के वक्त रिजर्व बैंक ने वैसे तो साढ़े 14 लाख करोड़ के नोट चलन से बाहर करने का दावा किया था, जो बाद में बढ़कर 15.44 लाख करोड़ बताया गया। इस आंकड़े के मुताबिक भी मात्र 47 हजार करोड़ रुपए के नोट ही ऐसे रहे जो बैंकों में जमा नहीं हो पाए। हालांकि अभी भी कई लोग रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के बाहर अपने नोट बदलवाने के लिए खड़े हैं। इतना ही नहीं एक बड़ी राशि लोगों ने महंगा सोना खरीदने और प्रॉपर्टी सहित अन्य जगह खपा दी। इसका मतलब यह हुआ कि 97 प्रतिशत नोट जहां जमा हुए, वहीं बचे 3 प्रतिशत का भी बड़ा हिस्सा लोगों ने अपनी जुगाड़ के जरिए अलग-अलग तरीकों से खपा डाला।

8 नवम्बर को जब नोटबंदी की घोषणा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने की, तब यह अनुमान लगाया गया था कि 4 से 5 लाख करोड़ रुपए ऐसे होंगे जो बैंकों में किसी सूरत में जमा नहीं हो सकेंगे। यानि इतना कालाधन पूरी तरह से कागज साबित हो जाएगा और रिजर्व बैंक को इतने रुपयों की देनदारी नहीं रहेगी और यह पैसा मोदी सरकार को प्रतिभूति के रूप में प्राप्त हो जाएगा। यही कारण है कि शुरुआत में मीडिया सहित मोदी भक्तों ने नोटबंदी का जोरदार समर्थन किया। हालांकि तब ही यह अंदेशा लगाया जा चुका था कि 30 दिसम्बर तक इसमें से अधिकांश पैसा जमा हो जाएगा और हुआ भी यही। नवम्बर अंत और दिसम्बर के पहले पखवाड़े तक ही लोगों ने अपने 1000 और 500 के नोट ठिकाने लगा दिए और हालत यह हुई कि बाद के 15 दिनों में तो कैश इन हैंड वालों को पुराने नोट ही प्रीमियम चुकाने के बावजूद हासिल नहीं हुए। नोटबंदी के वक्त मोदी सरकार और रिजर्व बैंक की ओर से दावा किया गया था कि लगभग साढ़े 14 लाख करोड़ के 1000 और 500 के नोट चलन से बाहर किए गए हैं। बाद में यह आंकड़ा बढ़कर 15.44 लाख करोड़ बताया गया। जब बैंकों में बड़ी मात्रा में पैसा जमा होने लगा तो 10 दिसम्बर के बाद रिजर्व बैंक ने अधिकृत रूप से आंकड़े जारी करना बंद कर दिए। यहां तक कि 31 दिसम्बर को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जो राष्ट्र के नाम संदेश दिया उसमें उन्होंने आधा बजट भाषण तो पढ़ दिया, मगर नोटबंदी का लेखा-जोखा प्रस्तुत ही नहीं किया।

आज तक रिजर्व बैंक ने अधिकृत रूप से यह नहीं बताया कि कुल कितने मूल्य के खारिज किए नोट उसके पास जमा हो चुके हैं। अभी आर्थिक मामलों की प्रतिष्ठित ब्लूमबर्ग न्यूज एजेंसी ने जरूर यह आंकड़ा जाहिर कर दिया है। उसकी रिपोर्ट के मुताबिक नोटबंदी के बीच यानि 30 दिसम्बर तक देशभर की बैंकों और डाक घरों में 97 प्रतिशत  1000 और 500 के नोट जमा हो गए थे। 15.44 लाख करोड़ में से 14.97 यानि 15 लाख करोड़ रुपए तक के नोट जमा हो गए। इसके हिसाब से सिर्फ 47 हजार करोड़ रुपए के नोट ही ऐसे बचे जो बैंकों में जमा नहीं हो सके हैं। पहले तो मोदी जी सहित वित्त मंत्री और रिजर्व बैंक ने स्पष्ट घोषणा की थी कि 30 दिसम्बर तक पुराने नोट बैंकों में जमा होंगे और उसके बाद 31 मार्च 2017 तक रिजर्व बैंक इन नोटों को बदलकर देगी, लेकिन रिजर्व बैंक ने 60 से अधिक नियमों में नोटबंदी के दौरान ही बदलाव किए और अभी भी सिलसिला जारी है, जिसके चलते 30 दिसम्बर के पूर्व यह निर्णय लिया कि सिर्फ एनआरआई या विदेश यात्रा पर गए लोग ही 31 मार्च तक अपने नोट बदलवा सकेंगे।

इस फैसले के कारण देश के ही कई लोग परेशान हो रहे हैं और कल भी मुंबई स्थित रिजर्व बैंक मुख्यालय के बाहर बड़ी संख्या में लोगों की भीड़ लगी रही, जिनमें सामान्य वर्ग के लोग ही रहे और एक महिला ने तो गुस्से में आकर अपने कपड़े तक उतार दिए। अभी 31 मार्च तक और भी बचे हुए पुराने नोट जमा होंगे। यानि नोटबंदी का पूरा अभियान ही बोगस साबित हो गया और शत-प्रतिशत ही नोट जमा हो गए या बचे हुए अन्य तरीकों से खपा दिए गए।

13 हजार करोड़ मप्र के डाकघरों में जमा

बैंकों के अलावा डाकघरों में भी ये पुराने नोट जमा किए गए और बदले में नए नोट भी बांटे। अभी तक बैंकों और डाकघरों के माध्यम से रिजर्व बैंक ने लगभग 8 लाख करोड़ रुपए मूल्य के नए और पुराने 50, 100 के नोट तथा सिक्के बंटवा दिए हैं। इंदौर सहित मध्यप्रदेश के डाकघरों में लगभग 13 हजार करोड़ रुपए के पुराने नोट जमा हुए हैं। 30 दिसम्बर तक मध्यप्रदेश के 43 मुख्य डाकघरों और 979 उप डाकघरों में यह राशि जमा हुई है। इंदौर में भी जीपीओ स्थित मुख्यालय के अलावा अन्य उप डाकघरों में भी 8 नवम्बर के बाद 30 दिसम्बर तक पुराने नोट जमा किए गए  और नए नोट भी लोगों को बांटे। डाकघरों में जमा हुई यह राशि स्टेट बैंक ऑफ इंडिया और सेंट्रल बैंक तथा बैंक ऑफ इंडिया के करंसी चेस्टों में जमा कराई गई। शुरुआत में 24 नवम्बर तक तो डाकघरों में नोट बदले गए और 25 नवम्बर से सिर्फ उन लोगों के नोट बदले और जमा किए जिनके खाते डाकघरों में खुले हुए हैं।

एसबीआई ने कर डाला पेटीएम को ब्लॉक

अभी जोर-शोर से पेटीएम द्वारा विज्ञापन दिए जा रहे हैं और शुरुआत में तो प्रधानमंत्री का भी इस्तेमाल विज्ञापनों में किया गया, जिसके लिए अच्छी-खासी आलोचना भी हुई। अभी तो पेटीएम के जरिए इंदौर में फिरौती मांगने का मामला भी सामने आ गया है। यह भी खुलासा हुआ कि पेटीएम में चीन की कम्पनी अलीबाबा का एक बड़ा हिस्सा है, लिहाजा उसके जरिए किया जाने वाला लेन-देन सुरक्षित और गोपनीय नहीं है। यही कारण है कि देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया यानि एसबीआई ने पेटीएम के अलावा ऐसे ही अन्य ई-वॉलेट्स को ब्लॉक कर दिया है, जिसमें एयरटेल मनी, मोबीक्वीक सहित अन्य ई-वॉलेट शामिल हैं। यानि जिनका खाता एसबीआई में है अब वे अपने खातों से सहित इन ब्लॉक किए ई-वॉलेट में राशि ट्रांसफर नहीं कर पाएंगे। अलबत्ता डेबिट और क्रेडिट कार्ड के जरिए ही उनकी राशि इन ई-वॉलेट्स में ट्रांसफर होगी। एसबीआई ने यह निर्णय सुरक्षा कारणों और साइबर अपराधों को रोकने के लिए की है।

5 हजार करोड़ का तो सोना ही खरीद लिया

अभी आयकर विभाग के अलावा प्रवर्तन निदेशालय देशभर में नोटबंदी के दौरान बिके सोने की जांच-पड़ताल में जुटा है। 500 से अधिक बड़े ज्वेलर्स के ठिकानों पर तो जांच-पड़ताल भी की गई और एक अनुमान के मुताबिक 5 हजार करोड़ से अधिक मूल्य का लोगों ने सोना खरीद लिया। इंदौर में ही 400 किलो से अधिक सोना खरीदे जाने की जानकारी सामने आई थी। 30 हजार रुपए प्रति तोले का सोना लोगों ने हड़बड़ी में 55 हजार रुपए प्रति तोले तक खरीद लिया और वे अब पछता रहे हैं। अभी जो आंकड़े सामने आए, जिसमें बताया गया कि 14.97 लाख करोड़ रुपए बैंकों में जमा हो गए और सिर्फ 47 हजार करोड़ ही बचे, जबकि इसमें से भी एक बड़ा हिस्सा लोगों ने सोना खरीदने के अलावा प्रॉपर्टी में डालने और अन्य तरीकों से इस्तेमाल कर लिया, जिसके मुताबिक यह कहा जा सकता है कि 2 प्रतिशत भी कालाधन कागज नहीं हो पाया।

(लेखक राजेश ज्वैल इंदौर के सांध्य दैनिक अग्निबाण में विशेष संवाददाता के रूप में कार्यरत् और 30 साल से हिन्दी पत्रकारिता में संलग्न एवं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया पर भी लगातार सक्रिय)

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लचर ‘द एण्ड’ के साथ ‘नोटबंदी’ की फिल्म फ्लॉप…

नोटबंदी की जिस फिल्म का 8 नवम्बर को मोदी जी ने धूम धड़ाके के साथ रात 8 बजे प्रदर्शन किया था उसके टाइटल तो बड़े आकर्षक थे… फिल्म जैसे-जैसे आगे बढ़ी तो उसकी पटकथा में तमाम झोल नजर आने लगे। फिल्म के जो सितारे थे वह थोड़े ही दिन बाद खलनायकों में तब्दील हो गए। सोशल मीडिया के भक्तों ने बैंकों के अधिकारियों और कर्मचारियों को सितारा बताते हुए उनकी तुलना सरहद पर खड़े जवानों की ड्यूटी से कर डाली। यह बात अलग है कि बैंकों के ये सितारे बाद में गब्बर सिंह निकले, जिन्होंने पिछले दरवाजे से काले कुबेर रूपी मोगेम्बो से सांठगांठ कर कतार में लगे तमाम मिस्टर इंडियाओं को मूर्ख बना दिया और परवारे ही नए नोट बैंकों से लेकर एटीएम से गायब होकर काले कुबेरों के पास जमा हो गए।

नोटबंदी की फिल्म इन्टरवल तक आते-आते ही अनाड़ी निर्देशक जेटली जी के हाथों हाफने लगे थी… क्लाईमैक्स में तो निर्देशक ही गायब हो गए और निर्माता यानि मोदीजी ने ही द एण्ड कर डाला, लेकिन यह भी टोटल फ्लॉप साबित हुआ… जनता को उम्मीद थी कि उसकी 50 दिन की तपस्या का चित्रण द एण्ड में नजर आएगा, मगर मोदी जी ने नोटबंदी की इस फिल्म में विषय के अनुरूप द एण्ड करने की बजाय बोरिंग बजट भाषण पेश कर दिया… एक्शन के हल्ले के साथ शुरू हुई नोटबंदी की यह फिल्म कॉमेडी के साथ-साथ  तमाम खामियों की ड्रामेबाजी में बदल गई… फिल्म के सहप्रोडयूसर रिजर्व बैंक की भूमिका तो अत्यंत दयनीय नजर आई। दरअसल इस फिल्म की कहानी से लेकर पटकथा में शुरू से ही झोल रहे, जिसका खामियाजा कतार में लगी आम जनता को भुगतना पड़ा।

बीच-बीच में प्रोड्यूसर महोदय लिजलिजे और भावुक संवादों के जरिए तालियाँ तो पिटवाते रहे, मगर द एण्ड में जाकर गच्चा खा गए। होना तो यह था कि जिस तरह हिन्दी फिल्मों में नायक जोरदार तरीके से खलनायकों की कुटाई करता है, वैसी ही धुलाई काले कुबेरों की नोटबंदी की फिल्म के द एण्ड में दिखना चाहिए थी, लेकिन 94 प्रतिशत पैसा बैंकों में जमा होने के चलते ही नोटबंदी की फिल्म पीट गई, इसलिए उसका लेखा-जोखा मोदी जी प्रस्तुत नहीं कर पाए। उन्हें जनता को बताना था कि इन 54 दिनों में कितना कालाधन उनकी सरकार ने पकड़ा और कुल कितना पैसा बैंकों में जमा हुआ। जानकारों का यह भी कहना है कि 15 लाख करोड़ रुपए से अधिक की राशि बैंकों में जमा हो चुकी है, जिसमें जाली नोट भी शामिल हैं। जन-धन से लेकर बचत, चालू और तमाम खातों की जानकारी भी मोदी जी को देश के सामने रखना थी, मगर हालत यह है कि पिछले 20 दिनों से रिजर्व बैंक ने ही कोई आंकड़े जारी नहीं किए और सब मुंह पर पट्टी बांधे बैठे हैं। जनता-जनार्दन को यह तो बताया जाए कि नोटबंदी से भारत सरकार को भी आखिरकार हासिल क्या हुआ..?

ईमानदार लोगों ने बैंकों में जो अपना पैसा कतारों में खड़े होकर जमा कराया उसे वह कब तक और किस तरह प्राप्त कर सकेगी इसकी भी कोई स्पष्ट जानकारी फिलहाल नहीं है। बेनामी सम्पत्तियों के हमले का भी बड़ा हल्ला था, उसका भी कोई फरमान 31 दिसम्बर के राष्ट्र के नाम संदेश में नजर नहीं आया। कम से कम मोदी जी यही घोषणा कर देते थे कि जिस तरह ईमानदार जनता ने कालेधन और भ्रष्टाचार के मामले में उनकी सरकार का साथ दिया ऐसे में सरकार में बैठी उनकी पार्टी भाजपा भी कैशलेस हो रही है। मोदी जी कहते कि 1 जनवरी 2017 से भाजपा 1 रुपए का भी चंदा नकद नहीं लेगी और चाय वाले और ठेले वाले की तर्ज पर भाजपा ई-वॉलेट या ऑनलाइन ही चंदा स्वीकार करेगी। इससे कांग्रेस सहित सारे विपक्षी राजनीतिक दल एक्सपोज हो जाते और मोदी जी की फिर वाहवाही हो जाती, मगर मोदी जी इस मामले में भी सभी दलों की आड़ ले रहे हैं। जब उन्होंने नोटबंदी बिना किसी की राय लिए लागू कर दी, तो भाजपा को कैशलेस करने में सर्वदलीय राय का नाटक क्यों किया जा रहा है..? कुल मिलाकर नोटबंदी की यह फिल्म अपने लचर द एण्ड के साथ अत्यंत फ्लॉप साबित रही। इससे तो मुलायम और अखिलेश की नूराकुश्ती का ड्रामा अधिक मसालेदार नजर आया, जो भरपूर टीआरपी भी बटोर रही है…

लेखक राजेश ज्वेल इंदौर के सांध्य दैनिक अग्निबाण में विशेष संवाददाता के रूप में कार्यरत् और 30 साल से हिन्दी पत्रकारिता में संलग्न एवं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया पर भी लगातार सक्रिय. संपर्क : 9827020830

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‘दंगल’ बनाम ‘नोटबंदी’ : मूर्ख भक्तों को कोई कैसै समझाए….

सोशल मीडिया पर ऐसे लोगों की जमात ज्यादा है, जिन्हें मुद्दों की समझ कम है… या तो वे आंखों पर पट्टी बांधकर भक्तगिरी में लिप्त हैं और इसी तरह की पोस्टों को कॉपी कर-करके माथा पकाते हैं… जिस विषय से संबंधित बात है उस पर तर्क देने की बजाय बे सिर-पैर की पोस्ट डाली जाती है। अभी आमिर खान की फिल्म दंगल को लेकर ही ऐसी ही घासलेटी और बकवास पोस्ट पढऩे को मिल रही है। शाहरुख खान के साथ आमिर खान का भी विरोध असहिष्णुता के मामले में किया गया और धमकी भी दी गई कि उनकी फिल्मों को प्रदर्शित नहीं होने दिया जाएगा। शाहरुख खान की कमजोर फिल्म दिलवाने ने भी ठीकठाक बिजनेस किया और भक्तों ने इसे भी फ्लॉप बता दिया। अभी आमिर खान की फिल्म दंगल रिलीज होने से पहले कई प्रमुख नेताओं ने सोशल मीडिया पर ही सबक सिखाने की बात कही, लेकिन सिनेमाघरों के सामने उनका छाती-माथा कूटन नजर नहीं आया।

पता नहीं किस दड़बे में ये बयान बहादुर नेता जा दुबके और दंगल न सिर्फ धूमधाम से रिलीज हुई, बल्कि सुपर-डुपर हिट भी साबित हो रही है। यहां तक कि हरियाणा और छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार ने तो इस फिल्म को टैक्स फ्री भी कर दिया और इस पार्टी से जुड़े लोग आमिर को सबक सिखाते हुए फिल्म फ्लॉप करवाने के दावे कर रहे थे। ये भी एक तरह का यूटर्न तो है ही, साथ ही पाखंड भी। अब एक घासलेटी पोस्ट जरूर इस संबंध में सोशल मीडिया में चलने लगी। इस पोस्ट में कहा जा रहा है कि दंगल ने 3 दिन में ही 100 करोड़ रुपए कमा लिए, तो नोटबंदी का असर कहां है..? इस पोस्ट में यह भी कहा कि पहले लोग बैंकों की लाइन में मर रहे थे, उनका काम-धंधा चौपट हो गया। श्रमिकों को मजदूरी नहीं मिली। अब उन्होंने फिल्म देखने के लिए नकदी भी जुटा ली और नेट बैंकिंग भी सीख गए।

अब इन पोस्टों को भेजने वाले दिमाग से पैदल लोगों को किस तरह समझाया जाए कि वे असल भारत को जानते और समझते ही नहीं हैं… आमिर खान की दंगल ने जो 100 करोड़ रुपए कमाए वो कोई ठेले वाले, मजदूर, घर में काम करने वाली बाई, साग-भाजी बेचने वाले ने नहीं खर्च किए हैं… इन महामूर्खों को यह तथ्य ही पता नहीं है कि मल्टीफ्लेक्स में फिल्म देखने वाली ऑडियंस यानि उनका दर्शक वर्ग अलग ही है, जो नोटबंदी के पहले भी ऑनलाइन ही अधिकांश टिकट बुक कराता था और इस वर्ग में से अधिकांश को वैसे भी न तो बैंकों की लाइन में लगना पड़ा और न ही एटीएम के सामने… ये वो वर्ग है जिनका कालाधन घर बैठे ही भ्रष्ट बैंक मैनेजरों ने सफेद कर दिया… इसके अलावा बड़ी संख्या में नौकरीपेशा लोग भी फिल्म देखते हैं, जिन्हें नोटबंदी से कोई फर्क इसलिए नहीं पड़ा, क्योंकि उनका वेतन पहले से ही बैंकों में जमा होता रहा है और वे या तो एटीएम से पैसे जरूरत के मुताबिक निकालते हैं या फिर डेबिट अथवा क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल करते हैं।

देश की आबादी 125 करोड़ से ज्यादा है और अगर दंगल में 3 दिन में 100 करोड़ कमा लिए और प्रति व्यक्ति मात्र 100 रुपए की औसत टिकट का खर्चा भी जोड़ा जाए तो मात्र  1 लाख लोग ही होते हैं। अगर इन 1 लाख या ऐसे 10-20 लाख लोगों से ही अतुल्य भारत की तस्वीर बनाई जाए तो यह तो मूर्खता का प्रदर्शन ही कहलाएगा। ऐसी पोस्ट भेजने वाले अपने घर की काम वाली बाई, बिल्डिंग के चौकीदार, गली-मोहल्ले के किराने वाले, ठेले वाले, मजदूर या साग-भाजी बेचने वाले से जरूरत पूछ लें कि क्या उन्होंने 200 रुपए की टिकट खरीदकर दंगल देखी..? (इस तरह का तबका ही नोटबंदी से अधिक त्रस्त हुआ है) संभव है कि यह फिल्म आने वाले दिनों में 500 करोड़ रुपए भी कमा ले, तो इसका देश के उन 124 करोड़ से अधिक लोगों से क्या लेना-देना..? पूरे देश में 1 करोड़ लोग भी सिनेमाघर जाकर ये फिल्म नहीं देख पाएंगे… अभी क्रिसमस पर ही तमाम शॉपिंग मॉलों में पांव रखने की जगह नहीं मिली और होटलों से लेकर पर्यटन स्थलों पर भी भीड़ है, मगर यह फर्क इंडिया और भारत को समझने वाले ही बेहतर तरीके से जान सकते हैं…

लेखक Rajesh Jwell इंदौर के सांध्य दैनिक अग्निबाण में विशेष संवाददाता के रूप में कार्यरत और 30 साल से हिन्दी पत्रकारिता में संलग्न एवं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया पर भी लगातार सक्रिय. संपर्क : jwellrajesh66@gmail.com , 9827020830   

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‘आप’ बन सकती है मप्र में नकारा कांग्रेस का विकल्प!

लोकतंत्र में सशक्त विपक्ष का होना अत्यंत जरूरी है। इसमें कोई शक नहीं कि भाजपा ने विपक्ष की भूमिका दमदार तरीके से निभाई। इसी कारण सत्ता में आने के बाद भी वह कई मर्तबा विपक्ष की भूमिका अदा करती नजर आती है। एक लम्बे समय तक यह धारणा भी रही कि कांग्रेस सरकार चलाने वाली पार्टी और भाजपा विपक्ष की पार्टी है। यही कारण है कि भाजपा का अदना-सा नेता और कार्यकर्ता भी भाषणवीर होता है और कांग्रेस कभी भी दमदारी से विपक्ष की भूमिका अदा नहीं कर सकी। पिछले आम चुनाव में कांग्रेस की बुरी दुर्गति हुई और उसके बाद अधिकांश राज्यों के चुनावों में भी कांग्रेस को हार का मुंह देखना पड़ा।

दरअसल कांग्रेस को अपने महाभ्रष्टाचार और पापों की सजा ही जनता ने दी और मोदी जी के नेतृत्व में भाजपा ने इसे जबरदस्त तरीके से भुनाया भी। अभी भी केन्द्र में विपक्ष के रूप में कांग्रेस की भूमिका अत्यंत ही दयनीय और लचर नजर आती है। एक तरफ मोदी जी खम ठोंककर और चिल्ला-चिल्लाकर अपनी बात आम जनता के गले उतारने में सफल रहते हैं, वहीं दूसरी तरफ इसमें तमाम लोचे होने के बावजूद कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी उतने प्रभावी तरीके से अपनी बात नहीं कह पाते, जिसके कारण जनता के साथ उनका सम्प्रेषण भी स्थापित नहीं हो पाता है, जो मोदी जी बड़ी आसानी से कर लेते हैं। राहुल की तुलना में अरविन्द केजरीवाल अवश्य मुद्दों को सही तरीके से उठाते हैं और तथ्यात्मक बात भी करते हैं।

अब यह बात अलग है कि मीडिया से लेकर सोशल मीडिया पर और भाजपा सहित उनसे जुड़े संगठनों ने केजरीवाल की छवि विदूषक की बना दी, जबकि ये केजरीवाल की ही ताकत रही कि जब मोदी जी की लोकप्रियता चरम पर थी, उस वक्त उन्होंने नई दिल्ली के चुनाव में भाजपा को करारी शिकस्त दी, क्योंकि उन्होंने आम जनता से जुड़े मुद्दों को जोरदार तरीकों से उठाया, जिनमें सड़क, बिजली, पानी से लेकर भ्रष्टाचार प्रमुख रहा। गुजरात, गोवा से लेकर पंजाब तक केजरीवाल ने कांग्रेस या अन्य पुरानी पार्टियों की तुलना में विपक्ष के रूप में अपनी उपस्थिति अधिक दमदारी से दर्ज करवाई है। क्या मध्यप्रदेश में भी आप पार्टी का कोई भविष्य हो सकता है?

यह सवाल दरअसल इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि विगत 13 सालों में मध्यप्रदेश की राजनीति में विपक्ष अत्यंत ही नकारा और निकम्मा साबित हुआ है। इसमें कोई शक नहीं कि शिवराज सरकार ने विकास कार्यों के अलावा समाज के अंतिम पंक्ति के लोगों के लिए कई अच्छी योजनाएं लागू की है। मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान की विश्वसनीयता जनता के बीच इसीलिए आज भी कायम है और लोग उन्हें भला मानुष समझते हुए काफी हद तक ईमानदार भी मानते हैं। बावजूद इसके शासन-प्रशासन में कई तरह की गड़बडिय़ां हैं और व्यापमं जैसे महाघोटाले भी सामने आते रहे हैं।

मध्यप्रदेश की कांग्रेस आपसी सिरफुटव्वल और टांग खिंचाई से ही नहीं ऊभर पाई है, जिसके परिणाम स्वरूप हर चुनाव में भाजपा को शानदार सफलता मिलती रही है। मगर देश की तरह मध्यप्रदेश को भी एक सशक्त विपक्ष की निहायत जरूरत है। भोपाल में अरविन्द केजरीवाल की रैली और उसमें उमड़ी भीड़ से क्या यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि आप पार्टी के लिए मध्यप्रदेश भी एक बेहतर मैदान हो सकता है, क्योंकि विपक्ष यानि कांग्रेस ने एक तरह से मैदान ही छोड़ रखा है। भाजपा के लिए तो फिलहाल मध्यप्रदेश में आप पार्टी बड़ी चुनौती तो नहीं साबित होगी, मगर नकारा कांग्रेस की जगह प्रमुख विपक्षी पार्टी का रोल जरूर बेहतर तरीके से अदा कर सकती है।

लेखक राजेश ज्वेल इंदौर के सांध्य दैनिक अग्निबाण में विशेष संवाददाता के रूप में कार्यरत् हैं और 30 साल से हिन्दी पत्रकारिता में संलग्न हैं. वे विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया पर भी लगातार सक्रिय हैं. उनसे संपर्क 9827020830 के जरिए किया जा सकता है.

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पानी और पर्यावरण के लिए लड़ने वाले संत पुरुष अनुपम मिश्र नहीं रहे

आज सुबह व्हाट्सएप पर सुप्रभात संदेशों के साथ एक दु:खद संदेश यह भी मिला कि जाने-माने पर्यावरणविद् और गांधीवादी अनुपम मिश्र नहीं रहे… जिस देश में चारों तरफ पाखंड और बनावटीपन का बोलबाला हो वहां पर एक   शुद्ध खांटी और खरे अनुपम मिश्र का होना कई मायने रखता है। सोशल मीडिया से ही अधकचरी शिक्षित हो रही युवा पीढ़ी अनुुपम मिश्र को शायद ही जानती होगी। देश में आज-कल ‘फकीरी’ के भी बड़े चर्चे हैं। लाखों का सूट पहनने और दिन में चार बार डिजाइनर ड्रेस पहनने वाले भी ‘फकीर’ कहलाने लगे हैं, मगर असली फकीरी अनुपम मिश्र जैसे असल गांधीवादी ही दिखा सकते हैं। उनका अपना कोई घर तक नहीं था और वे गांधी शांति फाउंडेशन नई दिल्ली के परिसर में ही रहते थे।

आज सुबह अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान एम्स में उन्होंने अंतिम सांस ली, उनकी उम्र 68 वर्ष की थी। अनुपम मिश्र पिछले एक साल से कैंसर से पीडि़त थे। अब यह भी सोच और शोध का विषय है कि अनुपम मिश्र जैसे सीधे-सरल व्यक्ति को भी कैंसर जैसी बीमारी आखिर क्यों चपेट में ले लेती है..? अनुपम मिश्र का एक परिचय यह भी है कि उनके पिता स्व. भवानीप्रसाद मिश्र प्रख्यात कवि रहे हैं। मैं गीत बेचता हूं… जैसी कई उनकी कविताएँ मंचों पर काफी लोकप्रिय रही है। अनुपम मिश्र शुद्ध गांधीवादी तो रहे, वहीं पर्यावरण और पानी के लिए उन्होंने अद्भुत काम किए। दस्यु अन्मुलन आंदोलन के अलावा भाषा पर भी उन्होंने बहुत काम किया।

जल संरक्षण पर उनकी लिखी किताब ‘आज भी खरे हैं तालाब’ तो एक नायाब दस्तावेज है। इस किताब को कितनी भी बार पढ़ लो, मगर मन नहीं भरता। गर्मियों के दिनों में जब पूरा देश पानी की किल्लत महसूस करता है और उस दौरान जब कुएं, बावड़ी और तालाब याद आते हैं तब अनुपम मिश्र की ये किताब सबको याद आती है। इस किताब की लाखों प्रतियाँ बिक गईं और कई भाषाओं में इसका अनुवाद भी हुआ, मगर इस किताब की भी कोई कमाई अनुपम मिश्र ने नहीं ली और इसका इस्तेमाल करने की अनुमति भी उन्होंने सबको दे दी। ‘हमारा पर्यावरण’ और ‘राजस्थान की रजत बूंदें’ जैसी किताबें भी उनकी खासी चर्चित रही।

‘आज भी खरे हैं तालाब’ जैसी किताब हमारे नीति-नियंताओं के लिए आई ओपनर का काम करती है। देश के प्रमुख तालाबों और उनके निर्माण की प्रक्रिया को अत्यंत सुंदर भाषा शैली में अनुपम मिश्र ने प्रस्तुत किया है। इस किताब में इंदौर के यशवंत सागर और बिलावली तालाब तक का उल्लेख है। जिस वक्त अनुपम मिश्र ने देश में पर्यावरण पर काम शुरू किया तब सरकार में पर्यावरण नाम का कोई विभाग तक नहीं होता था। यह बात अलग है कि पर्यावरण मंत्रालय से लेकर राज्य सरकारों के प्रदूषण नियंत्रण मंडल जैसे विभागों ने भ्रष्टाचार का प्रदूषण ही अधिक फैलाया। बहरहाल, अनुपम मिश्र नहीं रहे यह खबर नि:संदेह मायूस करने वाली है। इस गांधीवादी और पर्यावरणविद और पानी के लिए लडऩे वाले असल ‘फकीर’ को विनम्र शृद्धांजलि!

लेखक राजेश ज्वेल इंदौर के सांध्य दैनिक अग्निबाण में विशेष संवाददाता के रूप में कार्यरत् और 30 साल से हिन्दी पत्रकारिता में संलग्न एवं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया पर भी लगातार सक्रिय. संपर्क : 9827020830

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मोदी जी, आप 8 नवम्बर को सही थे या अब 29 नवम्बर को?

कालेधन के रद्दी कागज को नोटों के रूप में फिर जिंदा क्यों किया… प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी आपने कालेधन के खिलाफ जो सर्जिकल स्ट्राइक की उसे देश की अधिकांश जनता ने तमाम दिक्कतों के बावजूद सराहा। 8 नवम्बर को रात 8 बजे आपने देश के नाम अपने संदेश में नोटबंदी की घोषणा करते हुए कहा कि आज आधी रात यानि 12 बजे के बाद 1000 और 500 रुपए के चल रहे नोट अवैध हो जाएंगे। इससे ईमानदार जनता, कारोबारी, करदाता, गृहणियां कतई न घबराए और वे अपने पुराने नोट दो दिन बाद से 30 दिसम्बर तक बैंकों और डाक घरों में जाकर जमा कर दें और बदले में 500 और 2000 के नए नोट पा लें।

अपने इस संदेश में आपने यह भी स्पष्ट कहा था कि काले कुबेरों को पर्याप्त अवसर दिए गए और उनके लिए आय घोषणा योजना भी लाई गई, जिसमें कालेधन के खुलासा पर 45 प्रतिशत टैक्स जमा कर बचे 55 प्रतिशत धन को सफेद किया गया। अब सारी मोहलत समाप्त हो गई है और आधी रात से काले कुबेरों का आजादी के बाद से जमा कालाधन कागज के रद्दी टुकड़ों में तब्दील हो जाएगा। 8 नवम्बर के इस संदेश के बाद मोदी जी आपने उत्तरप्रदेश के गाजीपुर में आम सभा को संबोधित करते हुए देश की जनता से 50 दिन मांगे और उस वक्त भी आपने चिल्ला-चिल्लाकर कहा कि कालेधन के कुबेर अपने रद्दी हुए नोट नदियों में बहा रहे हैं और अगर गलत तरीके से कालेधन को सफेद करने के प्रयास किए तो आजादी के बाद से खातों की जांच कराऊंगा।

सोशल मीडिया से लेकर आपकी पार्टी और उनसे जुड़े समर्थकों यानि भक्तों ने इस कदम को ऐतिहासिक बताया और अपनी पोस्ट में स्पष्ट लिखा कि कालेधन वालों को पर्याप्त अवसर दे दिए थे और वे फिर भी नहीं सुधरे तो उसमें अब मोदी जी का कोई कसूर नहीं, अब उनका कालाधन पूरा नष्ट होना ही चाहिए। कतार में पिछले 20 दिनों से खड़ी देश की  जनता ने भी तमाम दिक्कतों के बावजूद इस फैसले को स्वीकार किया कि चलो, देश बदल रहा है… जनता ने अपने सफेद धन को पाने के लिए कई घंटों और दिनों तक ये मशक्कत की है, मगर उनकी इस कुर्बानी पर उस वक्त कुठाराघात हो गया जब संसद में नया आयकर संशोधन विधेयक लाया गया और मनी बिल के रूप में उसे बहुमत के आधार पर मंजूर भी कर डाला। इसमें यह प्रावधान किया गया कि अभी कालाधन रखने वाला 50 प्रतिशत टैक्स जमा कर अपना शेष बचा 50 प्रतिशत कालाधन दो किश्तों में सफेद धन के रूप में प्राप्त कर लेगा। 25 प्रतिशत की पहली किश्त उसे अभी और शेष 25 प्रतिशत की 4 साल बाद मिलेगी।

अब देश की जनता का लाख टके का सवाल यह है कि जो कालाधन शत-प्रतिशत कागज की रद्दी में नोटबंदी के साथ ही तब्दील हो गया था, उसी रद्दी को वापस नोटों में क्यों बदल दिया गया..? मान लो जिसके एक करोड़ रुपए रद्दी हो रहे थे उसे अभी 25 लाख और शेष 25 लाख बिना ब्याज के 4 साल बाद भी मिले तो उसका तो फायदा ही हो गया। यानि देश को लूटते रहो और आधा हिस्सा देकर छूट जाओ… अब मोदी जी कृपया देश की जनता को यह समझाएं कि आप 8 तारीख तो सही थे, जब कालाधन को कागज की रद्दी कर दिया था या फिर 29 नवम्बर को सही हो, जब इस रद्दी में से 50 प्रतिशत नोटों को फिर जिंदा कर दिया..? नोटबंदी की घोषणा के साथ ही काले कुबेरों ने अपने कालेधन को खपाने के लिए ताबड़तोड़ सोना खरीदा और 40 से 50 प्रतिशत अधिक कीमत भी चुकाई। इतना ही नहीं इन कालेधन वालों ने प्रॉपर्टी के अलावा बचत खातों और गरीबों के जन-धन खातों में भी अपना कालाधन भर डाला।

भाजपा और उनसे जुड़े समर्थक यह दलील दे रहे हैं कि इससे सरकार को फायदा ही होगा, जबकि हकीकत यह है कि इसमें सरकार को 50 प्रतिशत का सीधा नुकसान हो रहा है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया जितने नोट छापती है उतनी करंसी का मूल्य वह चुकाने के लिए प्रतिबद्ध रहती है। अभी 4 से 5 लाख करोड़ कालाधन 30 दिसम्बर तक बैंकों में जमा न हो पाने का अनुमान लगाया जा रहा था। इसका मतलब यह हुआ कि 4 से 5 लाख करोड़ रुपए की यह बड़ी राशि अंतत: भारत सरकार को ही प्राप्त होती, जिसका उपयोग गरीबों के कल्याण में कर दिया जाता। अब इस राशि में से आधी रात अगर आपने 50 प्रतिशत टैक्स भरवाकर सफेद कर दी तो इतना नुकसान तो भारत सरकार को हो गया और बदले में कालेधन वाले को आधी राशि फिर से प्राप्त हो गई, जिससे यह संदेश भी जाएगा कि भ्रष्टाचार करते रहो। सरकारें इसी तरह की छूटें देती रहेंगी। अगर किसी ने हत्या की है तो उसकी सजा उम्रकैद या फांसी ही होती है…

इसी तरह भ्रष्टाचार करने वाले को भी तभी कड़ी सजा मिलेगी, जब उसका शत-प्रतिशत कालाधन नष्ट हो जाए। अभी नोटबंदी के साथ यह दलील भी दी गई कि इससे जाली नोट, नक्सलवादियों तथा आतंकवादियों के पास जमा करोड़ों रुपए भी रद्दी हो जाएंगे। अब 50 प्रतिशत छूट के चलते नक्सलवादी और आतंकवादी भी अपने पुराने नोट बदलवा लेंगे। किसी भी नोट पर किसी का नाम नहीं लिखा होता है और जिन नेटवर्क के जरिए इन आतंकवादियों और नक्सलियों को पैसा पहुंचता है उसी नेटवर्क के जरिए पुराने नोटों को बैंकों में जमा कर 25 प्रतिशत राशि अभी और 25 प्रतिशत राशि 4 साल बाद ये तत्व भी हासिल कर लेंगे।

लेखक राजेश ज्वेल इंदौर के सांध्य दैनिक अग्निबाण में विशेष संवाददाता के रूप में कार्यरत हैं. संपर्क : 9827020830

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मोदी के फैसले से आर्थिक आपातकाल, देशभर में हाहाकार

40 प्रतिशत से ज्यादा कालेधन का है बाजार में चलन, सभी तरह का कारोबार पड़ा ठप

राजेश ज्वेल

इंदौर। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मास्टर स्ट्रोक ने जहां आम आदमी को फिलहाल पसंद किया वहीं तमाम कारोबारी माथा पकड़कर बैठे हैं। 500-1000 रुपए के नोट बंद करने की घोषणा के साथ ही देशभर में हाहाकार मच गया और आर्थिक आपातकाल से हालात हो गए, क्योंकि साग-सब्जी वाला भी 500 रुपए का नोट लेने से इनकार कर रहा है और आज से तो वैसे भी ये बड़े नोट कागज के टुकड़े साबित हो गए हैं। देश की 40 प्रतिशत से ज्यादा इकॉनोमी कालेधन से ही चलती रही है। लिहाजा एकाएक इस पर ब्रेक लगा देने से हर तरह का कारोबार ठप पड़ जाएगा।

इसमें कोई शक नहीं कि कालेधन के केंसर ने देश को खोखला करना शुरू कर दिया, लेकिन आजादी के बाद से अभी तक बाजार में कालेधन का ही बोलबाला रहा है। जानकार लाख तर्क दें कि 500 और 1000 रुपए के नोट पहली मर्तबा बंद नहीं हुए हैं और इसके पहले की केन्द्र सरकार भी बड़े नोट बंद कर चुकी है। 38 साल पहले प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने 1978 में 1000 रुपए के नोट बंद किए थे, मगर मैदानी हकीकत यह है कि नि 38 सालों में जहां देश ने जबरदस्त तरक्की की, वहीं कालेधन का प्रतिशत कई गुना बढ़ गया।

रियल इस्टेट में सबसे ज्यादा कालाधन खपा और उसी का परिणाम यह है कि आज इंदौर सहित देशभर में जो बड़ी-बड़ी चमचमाती बिल्डिंगें आधुनिकता और विकास का प्रतीक है, उनकी नीवों में कालाधन ही भरा गया है। 38 साल पहले 1000 रुपए के नोट बंद करने से इतना हाहाकार नहीं मचा, जितना अब मचा है, क्योंकि इन वर्षों में 40 प्रतिशत से अधिक बाजार कालेधन से ही चलने लगा है। एक मामूली ठेले-गुमटी लगाने वाले से लेकर किसानों का भी पूरा कामकाज नकद में ही होता है। यहां तक कि गली-मोहल्ले की किराना दुकानों से लेकर बड़े-बड़े शोरुमों में होने वाली खरीददारी नकद ही की जाती है। अब देश में जो आर्थिक आपातकाल के हालात निर्मित हो गए हैं उससे सभी तरह का कारोबार ठप पड़ जाएगा, क्योंकि लोग जब खरीदी ही नहीं करेंगे तो धंधा कैसे चलेगा और इसका असर अंतत: बड़े लोगों पर तो पड़ेगा ही, वहीं इससे जुड़े आम आदमी पर भी असर होगा।

आने वाले दिनों में ही इस आर्थिक आपातकाल के असर बाजार में दिखने लगेंगे और जो जगमग इंदौर जैसे बड़े शहरों में नजर आती है वह भी घट जाएगी, क्योंकि आज बड़ी-बड़ी होटल में खाना खाने से लेकर मल्टी फ्लेक्स सिनेमा में जाने और बड़े-बड़े शोरुमों में खरीददारी करने के साथ-साथ पूरी जीवनशैली  जो आधुनिक हो गई है उसमें 40 प्रतिशत से ज्यादा कालेधन का इस्तेमाल ही किया जाता है और यह सब ठप हो जाने के कारण इनसे जुड़े लोग बुरी तरह के प्रभावित होंगे।

गरीब और मध्यम वर्ग पर भी बड़ा असर
आज भले ही गरीब और मध्यम वर्ग इस बात को सोचकर खुश हो रहा है कि बड़े लोगों के काम लग गए। अच्छा हुआ उनके पास 1000 और 500 रुपए के नोट नहीं रहे और इस तरह के तमाम संदेश व्हाट्सएप पर धड़ल्ले से आ भी रहे हैं, लेकिन इसका दूसरा पहलू यह भी है कि बाजार में चल रहे इस कालेधन का लाभ गरीब और आम आदमी मध्यम वर्ग तक पहुंचता है। मालिक के पास अगर पैसा होगा और वह उसे खर्च कर सकेगा तो इसका लाभ उसके ड्राइवर से लेकर घर के नौकर या दफ्तर में काम करने वाले कर्मचारी तक को मिलता है। अब अगर कालाधन बंद हो गया तो छोटे लोगों को जो लाभ मिलता है वे उससे भी वंचित हो जाएंगे। जब बाजार में धंधे-पानी ही चौपट होंगे तो उससे नीचला तबका भी प्रभावित तो होगा ही।

इंदौर की मंडी में भी कामकाज रहा ठप
आज सुबह ही इंदौर की अनाज मंडी से लेकर सब्जी और फल-फ्रूट मंडी चोईथराम मंडी में ही कामकाज ठप हो गया। 80 प्रतिशत से ज्यादा कारोबारी हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे, क्योंकि अधिकांश खरीददारों के पास हजार और 500 रुपए के नोट ही थे, जिसे विक्रेता लेने को तैयार नहीं हुए। मंडी का भी यह पूरा कारोबार नकद ही चलता है और जो व्यापारी अपना माल बेचकर दोपहर 2-3 बजे तक फ्री हो पाता था वह आज सुबह 8-9 बजे ही घर वापस आ गया और हजारों-लाखों किलो सब्जी, फल और अन्य सामग्री मंडी में पड़े-पड़े ही सड़ जाएगी। इस निर्णय से तमाम किसानों को भी बड़ा नुकसान हुआ है, क्योंकि उनकी उपज के दाम भी नकद ही मिलते हैं और कई किसानों के पास तो अपनी फसल को बेचने के बाद बड़ी नकद राशि पड़ी है। अब उन्हें बैंकों में जमा कराने पर कई तरह के जवाब देना पड़ेंगे।

लेखक राजेश ज्वेल से संपर्क jwellrajesh66@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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हे जेम्सबॉण्ड… तुम गुटखा बेचने लायक ही हो!

वैसे तो शीत युद्ध की समाप्ति के बाद ही तुम्हें घर बैठ जाना था… दुनिया में अब एक ही चौधरी व्हाइट हाउस वाले बचे हैं और दूसरे चौधरी के लिए कबड्डी जारी है। आज तुम्हारे रचियता स्वर्ग में बैठे इयान फ्लेमिंग का सीना अवश्य 56 इंच का हो गया होगा कि उनका जेम्सबॉण्ड भारत की धरा पर गुटखा बेच रहा है… हम भारतवासियों ने ही गुटखे का आविष्कार किया और  इसकी पिचकारी से कोई सड़क या बिल्डिंग का कोना बिना चित्रकारी से अछूता न रहा… गुटखा खाने में भारतवंशियों की कोई जोड़ ही नहीं है और मौका आए तो इसकी तलब लगने पर कोई अम्बानी किसी ठेला चलाने वाले  रामलाल से भी गुटखा मांगकर खा सकता है… ये गुटखा ही है, जिसने विविधताओं से भरे देश को एकजुट करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी है…

हे जेम्सबॉण्ड, तुम्हारी पिछली फिल्म के प्रदर्शन के वक्त हमारे भारतीय सोशल मीडिया के पुरोधाओं ने तुम्हें संस्कारी बनाने और बताने के प्रयासों में भी कोई कसर नहीं छोड़ी थी… धोती पहनाकर माथे पर चंदन का टीका भी लगा दिया था… जब से देश में संस्कारी और भक्तों की भीड़ बढ़ी है, तब से हे जेम्सबॉण्ड, तुम्हें लुच्चाई करने की इजाजत कैसे दी जा सकती है… वो जमाने बीत गए जब तुम सुरा-सुंदरियों से घिरे नजर आते थे और हैरतअंगेज गेजेट्स का इस्तेमाल करते हुए अपनी एस्टिन मॉर्टिन कार में दांतों तले ऊंगलियां दबाने वाले करतब दिखाते  रहे… बीती फिल्मों में तो जेम्सबॉण्ड को रियलस्टीक बनाने के भी कम प्रयास नहीं किए गए और अभी सर्जिकल स्ट्राइक के बाद हमारे डोभाल साहब के कारनामे भी फुर्सतिया चैनलों ने तुम्हारी स्टाइल में ही पेश किए…

आज के जेम्सबॉण्ड डेनियल क्रैग को तो रियलस्टीक बताने के चक्कर में कई बार पिटवा भी दिया गया… जेम्सबॉण्ड के रूप में अब डेनियल की पारी भी खत्म होने को है और उनके लिए भी हमारे देश में काम की कमी नहीं रहेगी। कल से क्रैग साहब भी किसी पतंजलि बीयर का विज्ञापन करते नजर आ सकते हैं… बहरहाल, आज तो अपनी तबियत पान बहार बेचते पीयर्स ब्रासनन को देखकर गद्गद् हो गई… 200 साल तक साले अंग्रेजों ने हमारे देश पर राज किया, तो क्या आज हम उनके ब्रिटिश 007 जासूस जेम्सबॉण्ड से गुटखा तक नहीं बिकवा सकते… हे जेम्सबॉण्ड, तुम निश्चिंत रहो… पर्दे पर काम मिलना बंद होने के बाद हमारे देश में तुम्हारे लिए बहुत अवसर मौजूद हैं… अभी तो तुम्हें कच्छे-बनियान भी बेचना है..! बाबा भी जीन्स-टी शर्ट बनाने जा रहे हैं, उसके लिए भी बॉण्ड गल्र्स की जरूरत पड़ेगी ही..! हे जेम्सबॉण्डों, भारत की धरा पर बारातियों की तरह तुम्हारा स्वागत है…                  

एक ब्राण्डप्रेमी

राजेश ज्वेल

jwellrajesh66@gmail.com

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व्यापमं पर खुल गई दावों की पोलपट्टी… ये है हकीकत

मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान सहित उनकी पूरी पार्टी भाजपा लगातार ये दावे करती रही है कि व्यापमं कोई बहुत बड़ा महाघोटाला नहीं है और इसकी जांच खुद उन्होंने ही शुरू करवाई। मुख्यमंत्री तो खुद को व्हिसल ब्लोअर भी बताते रहे हैं और पहले सीबीआई जांच से बचते रहे और जब देखा कि सुप्रीम कोर्ट अब इस मामले को सीबीआई को सौंपने जा रहा है तब आनन-फानन में सीबीआई जांच करवाने का अनुरोध-पत्र सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत कर दिया। सीबीआई ने हालांकि व्यापमं घोटाले की जांच शुरू कर दी है और सुप्रीम कोर्ट तो व्यापमं से अधिक बड़ा और गंभीर घोटाला डीमेट को बता रहा है और इसकी भी सीबीआई जांच होगी। इधर नगरीय निकायों के चुनाव में भाजपा को एक बार फिर जोरदार सफलता मिली, जिसे व्यापमं घोटाले की क्लीन चिट के रूप में भी जमकर प्रचारित किया जा रहा है।

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मुख्यमंत्री से लेकर पूरी भाजपा और यहां तक कि नई दिल्ली में बैठे बड़े मंत्री व नेता भी कह रहे हैं कि व्यापमं घोटाले का कोई असर जनता में नहीं पड़ा और एक बार फिर भाजपा को शानदार सफलता मिली। यह बात अगर सच मान भी ली जाए तो इसका मतलब यह कतई नहीं निकलता कि व्यापमं और डीमेट घोटाला हुआ ही नहीं। ये तो कांग्रेस का नकारा और निकम्मापन है जो वह आज तक इस घोटाले को जन-जन तक नहीं पहुंचा सकी और ना ही तथ्यात्मक तरीके से अपनी बात रख पाई। वो तो नई दिल्ली के टीवी पत्रकार की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत के बाद नई दिल्ली के तमाम न्यूज चैनलों ने 4 दिन तक हल्ला मचाया, जिसके चलते सुप्रीम कोर्ट भी अलर्ट हुआ और संसद तक इस घोटाले की गूंज रही। मध्यप्रदेश की कांग्रेस तो और भी ढीली है, जिसने कभी भी ऐसे मुद्दों को दमदारी से नहीं उठाया।

यह बात भी सच है कि मध्यप्रदेश सरकार का व्यापमं के साथ-साथ अन्य घोटालों के मामले में मीडिया मैनेजमेंट भी बेहतर रहा है और एक बार फिर प्रदेश का मीडिया व्यापमं महाघोटाले को बहुत कम कवरेज दे रहा है, मगर अखबार दैनिक भास्कर ने 20 अगस्त को मध्यप्रदेश के लोकायुक्त और एसआईटी प्रमुख का जो साक्षात्कार प्रकाशित किया, उसे पढऩे के बाद तो मुख्यमंत्री से लेकर पूरी भाजपा की पोलपट्टी बखूबी उजागर हो जाती है, जिसमें इन दोनों शख्सियतों ने व्यापमं को ऐसा भयावह भ्रष्टाचार बताया जो उन्होंने अपने जीवन में कभी नहीं देखा और ना सुना। मध्यप्रदेश के लोकायुक्त जस्टीस पी.पी. नावलेकर सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश हैं और उनकी बात कम महत्वपूर्ण नहीं रखती। उन्होंने स्पष्ट कहा कि मैंने अपने जीवन में कई केस देखे, लेकिन कभी व्यापमं जैसा मामला सामने नहीं आया। सबसे बड़ा अफसोस तो यह है कि मेहनत करने वाले बच्चों का हक मारा गया, उनके सपने टूटे और कभी ऐसी कल्पना भी नहीं की थी कि कोई घोटाला इतना व्यापक हो सकता है। जो हुआ वह बिल्कुल कल्पना से परे है और अब सीबीआई से उम्मीद है कि घोटाले की पूरी परतें खुले और पूरा सच उजागर हो।

इसी मामले पर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के आदेश पर व्यापमं घोटाले की जांच कर रही एसटीएफ पर निगरानी के लिए एसआईटी का गठन किया गया था। इसके प्रमुख जस्टिस चन्द्रेस भूषण बनाए गए, जो सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल तो रहे, वहीं हाईकोर्ट जज रहते हुए सेवानिवृत्त हुए। उन्होंने साक्षात्कार में कहा कि अपने जीवन में सैंकड़ों केस देखे, लेकिन व्यापमं जैसा व्यापक केस कभी सामने नहीं आया। यह कल्पना से परे है और अब पूरी सच्चाई सीबीआई जांच से सामने आने की उम्मीद है। संभवत: अन्य राज्यों में भी ऐसे घोटाले होंगे और मैं मध्यप्रदेश सरकार को इस बात का क्रेडिट देना चाहूंगा कि उसने इसे सामने लाने की कोशिश की, भले ही आधी-अधूरी कोशिश हो। श्री भूषण ने यह भी सच्चाई स्वीकार की कि एसटीएफ जांच में भी कमी रही, जो वे अभी नहीं बता सकते… अब सवाल यह है कि मध्यप्रदेश की दो प्रमुख जांच एजेंसियों के सर्वोच्च जब यह मान रहे हैं कि व्यापमं घोटाला वाकई अत्यधिक व्यापक है, जो उनकी कल्पना से भी परे रहा और इसकी अभी तक सही जांच नहीं हो सकी और सीबीआई से उम्मीद कर रहे हैं। ऐसे में मुख्यमंत्री और उनकी पार्टी के सारे दावे इस साक्षात्कार से ही झूठे साबित हो जाते हैं, जो बार-बार ये कहते रहे हैं कि व्यापमं इतना बड़ा घोटाला नहीं है और एसटीएफ उसकी सही जांच कर रहा था। कांग्रेस हालांकि लोकायुक्त और एसआईटी प्रमुख की कही गई बातों के आधार पर भाजपा के दावों की पोल खोल सकती है, मगर दिक्कत यह है कि कांग्रेस इन बातों और तथ्यों से अनभिज्ञ रही होगी या किसी मैनेजमेंट के चलते बोल नहीं पा रही है।

लेखक राजेश ज्वेल पत्रकार और राजनीतिक समीक्षक हैं. उनसे सम्पर्क 098270-20830 या jwellrajesh@yahoo.co.in के जरिए किया जा सकता है.

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