मीडिया का नंगा सच राज्यसभा में सरेआम सुना दिया गया, सबको देखना-सुनना चाहिए ये वीडियो

वैसे तो नरेश अग्रवाल भी खुद दूध के धुले नहीं हैं लेकिन वो राज्यसभा में कई बार अक्सर तीखी और सच्ची बातें कह जाते हैं, जिसके चलते ढेर सारे लोग उन्हें तमाम दबावों के बावजूद अक्सर सच बोल जाने वाला नेता करार देते हैं. राज्यसभा के हालिया सेशन में नरेश ने आजकल की मीडिया का नंगा सच सार्वजनिक कर दिया. इसे हर मीडियाकर्मी को तो देखना-सुनना चाहिए ही, देश के सारे नागरिकों तक भी पहुंचाना चाहिए ताकि आधुनिक पत्रकारिता और आजकल के पत्रकारों को सही-सही वर्णन सब तक पहुंच सके. वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें :

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महाराष्ट्र के चार मीडिया कर्मियों का बकाया न देने पर भास्कर समूह के खिलाफ आरसी जारी

अपने कर्मियों का हक मारने के कारण दैनिक भास्कर को झटके पर झटका लग रहा है. भास्कर अखबार की प्रबंधन कंपनी डीबी कॉर्प द्वारा संचालित मराठी अखबार दैनिक दिव्य मराठी के अकोला एडिशन से खबर आ रही है कि यहां के ४ मीडिया कर्मियों के आवेदन पर भास्कर के खिलाफ आरसी जारी हुई है. इन मीडियाकर्मियों के पक्ष में सहायक कामगार आयुक्त अकोला श्री विजयकांत पानबुड़े ने रिकवरी सार्टिफिकेट आदेश जिलाधिकारी अकोला को दिया है।

मीडियाकर्मियों ने मजीठिया वेज बोर्ड के पैरामीटर के अनुरूप बकाया न दिए जाने की शिकायत की थी. साथ ही अपना पूरा बकाया क्लेम किया था. दिव्य मराठी (मराठी) अखबार महाराष्ट्र  के इन  चारों मीडियाकर्मियों के नाम हैं दीपक वसंतराव मोहिते, राजू रमेश बोरकुटे, संतोष मलन्ना पुटलागार और रोशन अम्बादास पवार। रोशन अम्बादास डीटीपी इंचार्ज हैं. बाकी तीनों पेजमेकर हैं. इनमें से पेज मेकर  दीपक वसंतराव मोहिते ने कुल रिकवरी राशि १३ लाख ३५ हजार २५२ रुपये का क्लेम किया है. पेजमेकर राजू रमेश बोरकुटे की रिकवरी राशि १२ लाख ६६ हजार २७५ रुपये है. पेजमेकर संतोष मलन्ना पुटलागार की रिकवरी राशि ११ लाख ९८ हजार ५६५ रुपये है. डीटीपी इंचार्ज रोशन अम्बादास पवार ने ६ लाख १७ हजार ३०८ रुपये का अपना बकाया मांगा है. 

इसके लिए सहायक कामगार आयुक्त ने १८ अगस्त २०१७ को एक आर्डर डी बी कॉर्प प्रबंधन को भेजा था। इस आर्डर की एक-एक कापी दैनिक भास्कर के चेयरमैन रमेशचंद्र अग्रवाल, पूरा पता प्लाट नंबर ६, द्वारिका सदन, प्रेस काम्प्लेक्स, मध्य प्रदेश नगर भोपाल (मध्य प्रदेश), प्रबंध निदेशक सुधीर अग्रवाल (पता उपरोक्त), निशिकांत तायड़े स्टेट हेड, दैनिक दिव्य मराठी, डीबी कोर्प लिमिटेड जिला अकोला को भी प्रेषित किया गया।

इस नोटिस के बाद भी डीबी कॉर्प कंपनी ने इन चारों मीडियाकर्मियों  को उनका बकाया नहीं दिया ।  उसके बाद १२ दिसंबर  २०१७ को मा. सहायक कामगार आयुक्त अकोला श्री विजयकांत पानबुड़े ने अपने विभाग से जिलाधिकारी अकोला को एक वसूली लेटर जारी कर कलेक्टर को भू राजस्व की भांति वसूली करके  बकायेदारों को देने का निर्देश दिया है।
इन सभी कर्मचारियों ने अपने एडवोकेट के जरिये हाईकोर्ट में कैविएट भी लगा दिया है जिससे कंपनी प्रबंधन को स्टे आसानी से नहीं मिल सके।

रिकवरी सर्टिफिकेट जारी होने से डीबी कार्प प्रबंधन में हड़कंप का माहौल है। ये सभी साथी हिम्मत नहीं हारे और लेबर विभाग, हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट तक अपने अधिकार के लिये लड़ाई लड़ते रहे। इन कर्मचारियों ने डी बी कार्प के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़ी है। आपको बता दें कि गुजरात के अहमदाबाद से भी डी बी कार्प के दैनिक दिव्य भास्कर अखबार से १०६ लोगों के पक्ष में रिकवरी सार्टिफिकेट जारी किया गया है। इससे कंपनी प्रबंधन में हड़कंप का माहौल है।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
९३२२४११३३५

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भास्कर को झटका, १०६ मीडियाकर्मियों के पक्ष में रिकवरी सर्टिफिकेट जारी

गुजरात के अहमदाबाद से एक बड़ी खबर आ रही है। यहां दैनिक भास्कर की प्रबंधन कंपनी डी बी कार्प के गुजराती अखबार दिव्य भास्कर के १०६ कर्मचारियों के समर्थन में लेबर विभाग ने रिकवरी सर्टिफिकेट जारी किया है। ये कर्मचारी अहमदाबाद के अलावा उत्तर गुजरात के भी हैं। इन कर्मचारियों ने डी बी कार्प के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़ी। गुजराती अखबार दिव्य भास्कर के जयेश लीला भाई प्रजापति और चंद्रकांत आशीष कुमार कड़िया के मुताबिक डीबी कार्प कंपनी से जैसे ही मजीठिया वेज बोर्ड की मांग की, कंपनी ने उन्हें और कुल १०६ लोगों को धीरे धीरे करके टर्मिनेट कर दिया।

ये सभी १०६ साथी हिम्मत नहीं हारे और लेबर विभाग, हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट तक अपने अधिकार के लिये लड़ाई लड़ते रहे। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर वे वापस लेबर विभाग आये जहां लेबर विभाग ने इन सभी कर्मचारियों के पक्ष को गंभीरता से लिया और १०६ लोगों के लिए रिकवरी सर्टिफिकेट जारी कर दिया। इन कर्मचारियों की तरफ से हाईकोर्ट में उनका पक्ष रखा एडवोकेट अमरीश पटेल ने जबकि सुप्रीमकोर्ट में उनका पक्ष रखा सीनियर एडवोकेट कोलिन गोंसाल्विस ने। इन  कर्मचारियों में उत्तर गुजरात के ३२ लोगों ने भी क्लेम लगाया था। इन सभी कर्मचारियों ने अपने एडवोकेट के जरिये हाईकोर्ट में कैविएट भी लगा दिया है जिससे कंपनी प्रबंधन को स्टे आसानी से नहीं मिल सके। इतनी भारी संख्या में रिकवरी सर्टिफिकेट जारी होने से डीबी कार्प प्रबंधन में हड़कंप का माहौल है। इन कर्मचारियों ने दस से तीस लाख रुपये प्रति कर्मचारी का क्लेम लगाया है।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
९३२२४११३३५

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राजस्थान पत्रिका को झटका, हाईकोर्ट ने रद्द किया महिला पत्रकार का ​टर्मिनेशन आर्डर

महिला मीडियाकर्मी की होगी बहाली…  राजस्थान उच्च न्यायालय ने राजस्थान पत्रिका अखबार की एक महिला पत्रकार की सेवामुक्ति को गलत मानते हुए उसे बहाल करने का आदेश दिया है। मामला आठ वर्ष पुराना है। सम्पादकीय विभाग में आर्टिस्ट के पद पर काम करने वालीं कुमकुम शर्मा ने जब आर्टिस्ट की तरह ही काम लेने की बात कही तो उन्हें समाचार पत्र की समीक्षा में लगा दिया गया। विरोध करने पर उन्हें आरोप पत्र थमा दिया गया और अंदरूनी जांच की खानापूर्ति कर वर्ष 2009 में टर्मिनेट कर दिया।

कुमकुम ने एडवोकेट ऋषभचन्द जैन के माध्यम से श्रम अदालत में वाद दायर किया। लम्बी सुनवाई के बाद अदालत ने प्रबन्धन के पक्ष में फैसला दिया। जैन साहब ने इसे राजस्थान उच्च न्यायालय में चुनौती दी। उच्च न्यायालय ने माना कि प्रार्थी से वह काम नहीं करवाया जा सकता, जिसके लिए वह प्रशिक्षित नहीं हो। ऐसे किसी काम में कोताही के लिए उसे दण्डित भी नहीं किया जा सकता। इस मामले में प्रार्थी से ऐसा ही काम लिया जा रहा था, जिसके लिए कि उसकी नियुक्ति नहीं की गई थी। यह प्रार्थी को प्रताड़ित करने की श्रेणी में आता है। उच्च न्यायालय ने प्रार्थी का टर्मिनेशन आदेश रद्द कर दिया है। एडवोकेट जैन साहब ही राजस्थान पत्रिका ओर भास्कर कर्मचारियों का मजीठिया से संबंधित केस लड़ रहे हैं।

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मजीठिया वेज बोर्ड मामला : सुप्रीम कोर्ट ने अखबार मालिकों को राहत देने से किया इनकार, देखें ऑर्डर की कापी

जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले में माननीय सुप्रीम कोर्ट अखबार मालिकों के खिलाफ सख्त होता जा रहा है। जी हां, सुप्रीम कोर्ट ने अखबार मालिकों के लिए दो सख्त आदेश दिए हैं… पहला तो यह कि उन्हें अपने कर्मचारियों को जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ देना ही पड़ेगा, भले ही उनका अखबार घाटे में हो। दूसरा, अखबार मालिकों को उन कर्मचारियों को भी मजीठिया वेज बोर्ड के मुताबिक लाभ देना पड़ेगा, जो ठेके पर हैं। सुप्रीम कोर्ट के रुख से यह भी स्पष्ट हो चुका है कि जिन मीडियाकर्मियों को मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ चाहिए, उन्हें क्लेम लगाना ही होगा।

आपको बता दें कि मीडियाकर्मियों ने माननीय सुप्रीम कोर्ट का ध्यान जब इस ओर दिलाया कि लेबर कोर्ट में जाने पर बहुत टाइम लगेगा और वहां इस तरह के मामले में कई-कई साल लग जाते हैं, तब माननीय सु्प्रीम कोर्ट ने उन्हें एक और राहत दी। यह राहत थी लेबर कोर्ट को टाइम बाउंड करने की। सुप्रीम कोर्ट ने लेबर कोर्ट को स्पष्ट आदेश दे दिया कि वह 17 (2) से जुड़े सभी मामलों को वरीयता के आधार पर 6 माह में पूरा करे। इसके बाद कुछ मीडियाकर्मी फिर सुप्रीम कोर्ट की शरण में पहुंच गए और वहां गुहार लगाई कि मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार, अपना बकाया मांगने पर संस्थान उन्हें नौकरी से निकाल दे रहा है!

इस पर सुप्रीम कोर्ट के विद्वान न्यायाधीश रंजन गोगोई ने मीडियाकर्मियों के दर्द को एक बार फिर समझा और आदेश दिया कि जिन लोगों का भी मजीठिया मांगने के चलते ट्रांसफर या टर्मिनेशन हो रहा है, ऐसे मामलों का भी निचली अदालत 6 माह में निस्तारण करे। इससे अखबार मालिकों ने मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार, बकाया मांगने वालों के ट्रांसफर / टर्मिनेशन की गति जहां धीमी कर दी, वहीं सुप्रीम कोर्ट द्वारा मीडियाकर्मियों का दर्द समझे जाने का असर यह हुआ कि अब निचली अदालतें भी नए ट्रांसफर / टर्मिनेशन के मामलों में मीडियाकर्मियों को फौरन राहत दे रही हैं।

यहां बताना यह भी आवश्यक है कि पिछले दिनों मुंबई में ‘दैनिक भास्कर’ की प्रबंधन कंपनी डी बी कॉर्प लि. के प्रिंसिपल करेस्पॉन्डेंट धर्मेन्द्र प्रताप सिंह, रिसेप्शनिस्ट लतिका चव्हाण और आलिया शेख के पक्ष में लेबर डिपार्टमेंट ने रिकवरी सर्टिफिकेट (आरसी) जारी किया था… कलेक्टर द्वारा वसूली की कार्यवाही भी तेजी से शुरू हो गई थी। हालांकि डी बी कॉर्प लि. ने इस पर बॉम्बे हाई कोर्ट पहुंच कर आरसी पर रोक लगाने की मांग की, मगर हाई कोर्ट ने उनकी एक न सुनी और साफ शब्दों में कह दिया कि कर्मचारियों की जो बकाया धनराशि है, पहले उसका 50 फीसदी हिस्सा कोर्ट में जमा किया जाए।

यह बात अलग है कि हाई कोर्ट के आदेश के बाद डी बी कॉर्प लि. ने माननीय सु्प्रीम कोर्ट में पहुंच कर विद्वान न्यायाधीश रंजन गोगोई से गुहार लगाई कि हुजूर, हाई कोर्ट का पैसा जमा कराने का आदेश गलत है और इस पर तत्काल रोक लगाई जाए। लेकिन वहां इनका दांव उल्टा पड़ गया। गोगोई साहब और जस्टिस नवीन सिन्हा  का नया आदेश एक बार फिर मीडियाकर्मियों के पक्ष में ब्रह्मास्त्र बन गया है। असल में डी बी कॉर्प लि. को राहत देने से इनकार करते हुए उन्होंने ऑर्डर दिया कि हमें नहीं लगता कि हाई कोर्ट के निर्णय पर हमें दखल देना चाहिए। स्वाभाविक है कि इसके बाद मरता, क्या न करता? सो, जानकारी मिल रही है कि डी बी कॉर्प लि. प्रबंधन ने बॉम्बे हाई कोर्ट में तीनों कर्मचारियों की आधी-आधी बकाया राशि जमा करवा दी है। इससे साफ हो गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने यहां अखबार मालिकों के आने का रास्ता लगभग बंद कर दिया है। अब कोई भी मीडियाकर्मी अगर क्लेम लगाता है तो उसका निस्तारण भी जल्द होगा।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट
एनयूजे मजीठिया सेल समन्वयक
9322411335

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हिन्दुस्तान प्रबन्धन को डीएलसी की कड़ी चेतावनी, कहा- हठधर्मी का रास्ता छोड़ें

बरेली से खबर आ रही है कि मजिठिया को लेकर उत्पीड़न के मामले की सुनवाई के दौरान उपश्रमायुक्त बरेली ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि हिन्दुस्तान का प्रबन्धन हठधर्मी का रास्ता छोड़े। यदि कोई ये समझता है कि वह सर्वोपरि है तो ऐसे लोग जान लें, सुप्रीम कोर्ट से बढ़कर कोई नहीं है। ना मैं और ना अखबार मालिक। लिहाजा आपसी समझौते से शिकायतकर्ता कर्मचारियों से मसला निपटा लें, नहीं तो अगली तिथि पर मजबूरन उनको विधि सम्मत कड़ा निर्णय लेना पड़ेगा।

उपश्रमायुक्त ने मामले में प्रतिवादी संपादक मनीष मिश्रा, यूनिट हेड योगेंद्र सिंह की ओर से आये हिन्दुस्तान बरेली यूनिट के एच आर हेड सत्येंद्र अवस्थी को साफ-साफ कहा कि उनका संदेश वे उच्च प्रबन्धन तक पहुँचा दें। शिकायतकर्ताओं को मजिठिया के मुताबिक उनके सभी ड्यूज तत्काल अदा कर दें। इससे बचने के लिए शिकायतकर्ताओं को नोटिस देना, धमकाना, कथित जांच बैठाना, कार्रवाई करना सुप्रीम कोर्ट की अवमानना है।ये सब कुछ वह नहीं होने देंगे।

अंतिम नोटिस के बावजूद हिन्दुस्तान के एचआर डायरेक्टर राकेश सिंह गौतम अपना पक्ष रखने को ना तो स्वयं आये और ना ही उनका कोई प्रतिनिधि। शिकायतकर्ता मनोज शर्मा, राजेश्वर विश्वकर्मा, निर्मल कांत शुक्ला ने उप श्रमायुक्त को अवगत कराया कि एचआर डायरेक्टर राकेश सिंह गौतम बेहद शातिर है। संपादक और जीएम भी उनके समक्ष आने से मुंह छिपा रहे हैं, क्योंकि इनके पास किसी भी बात का कोई जवाब है ही नहीं। सत्येन्द्र अवस्थी पर कोई अधिकार नहीं हैं। सत्येन्द्र सिर्फ मैसेंजर की भूमिका में हैं। उप श्रमायुक्त ने अंतिम मौका देते हुए सुनवाई की अगली तिथि 30 नवम्बर मुकर्रर की है।

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पत्रकारों ने चलाया अभियान- मजीठिया नहीं तो भाजपा को वोट नहीं

कांग्रेस औऱ सपा के समर्थन में खड़े हुए कलम के सिपाही… लखनऊ। उत्तर प्रदेश के निकाय चुनाव में इस बार पत्रकारों की नाराजगी भाजपा के लिए भारी पड़ सकती है। पत्रकारों के मजीठिया वेज बोर्ड के मामले में सुप्रीम कोर्ट के 6 माह के टाइम बाउंड फैसला आने के बाद भी उत्तर प्रदेश का श्रम विभाग और श्रम न्यायालय पत्रकारों के प्रति सौतेला व्यवहार कर रहा है। अपनी जायज मांगों को पूरा न होता देख पत्रकारों ने भाजपा सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।

वर्तमान में उत्तर प्रदेश में करीब 50 हजार पत्रकार मजीठिया वेज बोर्ड की मांग कर रहे हैं। जिनमे क़रीब 5 हजार पत्रकार मजीठिया वेज बोर्ड की मांग के चलते प्रिंट मीडिया से निकाले जा चुके हैं। और उनमें से ज्यादातर पत्रकार अब इलेट्रॉनिक मीडिया की ओर रुख कर चुके है।

कैसे हो रहा विरोध
उत्तर प्रदेश के पत्रकारों ने ‘ भाजपा हराओ, मजीठिया पाओ’ नामक व्हाट्सएप ग्रुप तैयार किया है। लगातार 24 घंटे सक्रिय होकर इस ग्रुप में भाजपा हराने की रणनीति तैयार की जा रही है। इस ग्रुप में दैनिक जागरण, अमर उजाला, हिन्दुतान, टाइम्स ऑफ इंडिया, हिन्दुस्तान और हिन्दुतान टाइम्स समेत कई बड़े अखबार के  पत्रकार सदस्य हैं।

क्या है मामला
प्रिंट मीडिया में देश भर के पत्रकारों को मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वर्ष 2011 से वेतन मिलना था। देश भर के पत्रकार अपना वाजिब मेहनताना मांगते रहे लेकिन कंपनी मालिकों का दिल आज तक नहीं पसीजा। इसमें श्रम विभाग भी पूरी तरह अखबार मालिकों के साथ खड़ा दिखा। जिस पत्रकार ने मजीठिया वेज बोर्ड की मांग की उसे या तो नौकरी से निकल दिया गया या फिर इतना परेशान किया गया कि वह स्वतः नौकरी छोड़ने को मजबूर हो गया। उत्तर प्रदेश के करीब 50 हजार पत्रकारों ने अब अपनी मजीठिया वेज बोर्ड की मांग को लेकर भाजपा के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।

वरिष्ठ पत्रकारों ने सराहा
लखनऊ समेत पूरे प्रदेश भर के पत्रकारों ने पत्रकारों की इस पहल की सराहना की है। पत्रकारों के संगठन यूपी प्रेस क्लब, जर्नलिस्ट एसोसिएशन, उपजा, मानवाधिकार प्रेस संगठन,  मजीठिया समिति आदि सभी ने एक सुर में भाजपा के इस सौतेले व्यवहार की निंदा की है।

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मजीठिया मांगने पर भाजपा विधायक ने रिपोर्टर को अखबार के दफ्तर में घुसने से रोका, मामला पहुंचा पुलिस स्टेशन

मुंबई : खुद को उत्तर भारतीयों का रहनुमा समझने वाले भाजपा विधायक और हमारा महानगर अखबार के मालिक आरएन सिंह के अखबार में उत्तर भारतीय कर्मचारियों का सबसे ज्यादा शोषण किया जा रहा है। इस अखबार के सीनियर रिपोर्टर (क्राइम) केके मिश्रा को विधायक के पालतू गार्ड हमारा महानगर के दफ्तर में पिछले कुछ दिनों से नहीं घुसने दे रहे हैं।

कृष्णकांत सभापति मिश्रा उर्फ केके मिश्रा की गलती सिर्फ इतनी है कि उन्होंने विधायक जी से माननीय सुप्रीमकोर्ट के आदेशानुसार मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार अपने वेतन वृद्धि की मांग कर ली। हमारा महानगर अखबार के मालिक और भाजपा विधायक आर एन सिंह को ये बात नागवार गुजरी। उन्होंने अपनी निजी सुरक्षा कंपनी के गार्डों को हिदायत दे दिया कि केके मिश्रा को किसी भी तरह ऑफिस में घुसने मत दो।

उल्लेखनीय है कि केके मिश्रा पहले भी इस अखबार में काम कर चुके हैं और उसके बाद इस्तीफा देकर दूसरे अखबार में चले गए थे। मगर 2015  में अखबार मालिक आरएन सिंह ने फोन कर केके मिश्रा को वापस बुलाया और भरोसा दिया था कि अच्छा भुगतान किया जाएगा। मगर हुआ उल्टा। फिलहाल केके मिश्रा को विधायक जी के आदेश पर ऑफिस में नहीं आने दिया जा रहा है। के के मिश्रा ने  9 नवंबर 2017 को पुलिस स्टेशन और कामगार विभाग में विधायक जी के खिलाफ शिकायत दी है। केके मिश्रा के इस कदम से हमारा महानगर प्रबंधन में हड़कम्प का माहौल है।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आर टी आई एक्सपर्ट
9322411335

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मजीठिया वेजबोर्ड मांगने पर हुए ट्रांस्फर / टर्मिनेशन के मामले भी छह माह में निपटाने होंगे : सुप्रीम कोर्ट

रविंद्र अग्रवाल की रिपोर्ट

अखबार कर्मियों को दिवाली के बाद छठ का तोहफा, पंकज कुमार की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया उत्साहजनक आदेश…

अखबार मालिकों के सताए अखबार कर्मियों को सुप्रीम कोर्ट से एक और बड़ी राहत भरी खबर मिली है। माननीय सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस गोगोई और जस्टिस सिन्हा की बैंच ने आज मजीठिया वेजबोर्ड मांगने पर की गई टर्मिनेशन और ट्रांस्फर के मामलों को भी छह माह में निपटाने के आदेश जारी किए हैं। आज दैनिक जागरण गया के कर्मचारी पंकज की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अखबार मालिकों के खिलाफ लगाई गई अवमानना याचिाकाओं पर 19 जून को दिए गए आने निर्णय के पैरा नंबर 28 में बर्खास्तगी और तबादलों को लेकर दिए गए निर्देशों को भी वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट की धारा 17(2) के तहत रेफर किए गए रिकवरी के मामलों में 13 अक्तूबर को दिए गए टाइम बाउंड के आर्डर के साथ अटैच करते हुए इन मामलों की सुनवाई भी छह माह के भीतर ही पूरी करने के निर्देश जारी किए हैं।

ज्ञात रहे कि गया के मजीठिया क्रांतिकारी पंकज कुमार मजीठिया वेजबोर्ड मांगने के चलते तबादले का शिकार हुए थे और उन्होंने पटना उच्च न्यायालय के कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश रह चुके सेवानिवृत्त जस्टिस नागेंद्र राय के सहयोग से दैनिक जागरण की इस तनाशाही के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। हालांकि इस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए कार्यवाही करने से पल्ला झाड़ लिया था कि ट्रांस्फर व टर्मिनेशन के मामलों को अनुच्छेद 32 के तहत इतने उच्च स्तर की रिट याचिका में उठाना उचित नहीं है, क्योंकि ये मामले कर्मचारी की सेवा शर्तों से जुड़े होते हैं और इन्हें उचित प्राधिकारी के समक्ष ही उठाया जाना उचित रहेगा।

19 जून की जजमेंट के पैरा 28 का अनुवाद इस प्रकार से है-

“28. जहां तक कि तबादलों/ बर्खास्तगी के मामलों में हस्तक्षेप की मांग करने वाली रिट याचिकाओं के रूप में, जैसा कि मामला हो सकता है, से संबंध है, ऐसा लगता है कि ये संबंधित रिट याचिकाकर्ताओं की सेवा शर्तों से संबंधित है। संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत इस न्यायालय के अत्याधिक विशेषाधिकार रिट क्षेत्राधिकार का इस्तेमाल इस तरह के सवाल के अधिनिर्णय के लिए करना न केवल अनुचित होगा परंतु ऐसे सवालों को अधिनियम के तहत या कानूनसंगत प्रावधानों(औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 इत्यादि), जैसा कि मामला हो सकता है, के तहत उपयुक्त प्राधिकारी के समक्ष समाधान के लिए छोड़ दिया जाना चाहिए।”

उधर, माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा पहले 13 अक्तूबर, 2017 को 17(2) के तहत मजीठिया वेजबोर्ड के रिकवरी केे मामलों की सुनवाई को श्रम न्यायालयों में रेफ्रेंस प्राप्त होने के छह माह के भीतर प्राथमिकता के तौर पर निपटाने के आदेशों के बाद आज यानि 27 अक्तूबर को अवमानना याचिकाओं पर दिए गए निर्णय के पैरा 28 में उदृत्त ट्रांस्फर और टर्मिनेशन के मामलों को भी इन्हीं आदेशों से जोड़ कर छह माह में ही निपटाने के आदेश जारी करके अखबार मालिकों की लेटलतीफी की रणनीति से परेशान मजीठिया क्रांतिकारियों का उत्साह दोगुना कर दिया है। उनकी पिछले छह वर्षों से चली आ रही यह जंग अब निर्णयक दौर में है।

आज के इस निर्णय के लिए पंकज कुमार को इस मुकाम तक पहुंचने में निशुल्क मदद करने वाले पूर्व जस्टिस एवं अधिवक्ता नागेंद्र राय जी और उनकी टीम बधाई और आभार की पात्र है। उनकी टीम के सह अधिवक्ता मदन तिवारी और शशि शेखर ने पंकज कुमार को काफी हौसला दिया था। पंकज कुमार ने इस निर्णय के बाद खुशी जाहिर करते हुए बताया कि वे अपने अधिवक्ता पूर्व जस्टिस नागेंद्र राय के आभारी हैं, जिन्होंने उन्हें बिना किसी फीस के इस मुकाम तक पहुंचने में मदद की। वहीं उनके सह अधिवक्ताओं ने हमेशा उनकी हौसला अफजाई की और दिलासा देते रहे कि यकीन रखें जीत हमेशा सत्य की ही होती है।

उधर, 13 अक्तूबर के निर्णय के लिए मुख्य अवमानना याचिका संख्या 411/2014 के अविषेक राजा और उनके वरिष्ठ अधिवक्ता कोलिन गोंज़ाल्विस  भी  उतने ही बधाई और आभार के पात्र हैं, जिन्होंने 19 जून और 13 अक्तूबर के निर्णयों में अहम भूमिका निभाई थी।

रविंद्र अग्रवाल

वरिष्ठ संवाददाता

धर्मशाला, हिमाचल प्रदेश

संपर्क : 9816103265

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छह माह में मजीठिया मामले निपटाने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश की लिखित कापी देखें

जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले में माननीय सुप्रीमकोर्ट ने आज २४ अक्टुबर २०१७ को एक आदेश जारी कर देश भर की लेबर कोर्ट और इंडस्ट्ीयल कोर्ट को निर्देश दिया है कि १७(२) के मामलों का निस्तारण प्रार्थमिकता के आधार पर ६ माह के अंदर करें। माननीय सुप्रीमकोर्ट ने आज जारी अपने आदेश में उन मामलों पर कोई समय सीमा निर्धारित नहीं की जो लेबर विभाग में चल रहे हैं।  माननीय सुप्रीमकोर्ट के आज जारी आदेश का उन मीडियाकर्मियों ने स्वागत किया है जिनका मामला लेबरकोर्ट या इंडस्ट्रीयल कोर्ट में १७(२) के तहत चल रहा था। लेकिन उन लोगो को थोड़ी परेशानी होगी जिनका १७(१) का मामला लेबर विभाग में चल रहा है।

आज आये माननीय सुप्रीमकोर्ट के आदेश का एडवोकेट उमेश शर्मा ने स्वागत किया है और कहा है कि ये आर्डर बहुत ही अच्छा है। उन्होंने कहा है कि इसमें सुप्रीमकोर्ट को १७ (१) को भी कवर करना चाहिये था। उन्होंने कहा है कि माननीय सुप्रीमकोर्ट के आज आये आर्डर से मीडियाकर्मियों की लड़ाई आसान हो गयी है मगर मीडियाकर्मियों को चाहिये कि अपनी लड़ाई अब होश में लड़ें। सबसे पहले कागजों पर अपनी कंपनी का क्लासिफिकेशन करें। आप जिस पद पर काम कर रहे हैं और आपका पोस्ट तथा ड्यूटी चार्ट जरूर अच्छी तरह से रखें।

उमेश शर्मा ने कहा है कि कर्मचारी अपनी ओर से लेबरकोर्ट या लेबर विभाग या इंडस्ट्रीयल कोर्ट में डेट ना लें। क्लेम करने वाले मीडियाकर्मी कागजातों से ही लड़ाई जीत सकते हैं, इसलिये ज्यादा से ज्यादा कागजाती द्स्तावेज अपने पास रखें। एडवोकेट उमेश शर्मा ने यह भी कहा है कि जिन लोगों ने १७(१) का क्लेम लगाया है, उन्हें इस आर्डर से निराश होने की जरूरत नहीं है। वे अपना मामला जल्द से जल्द १७(२) के तहत लेबर कोर्ट में ले जायें, जहां से उनकी जीत तय है।

सुप्रीम कोर्ट के माननीय न्यायाधीश रंजन गोगोई और न्यायाधीश नवीन सिन्हा की खंडपीठ ने वेजबोर्ड के तहत वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट की धारा 17(2) के मामलों को निपटाने के लिए देश भर के लेबर कोर्टों/ट्रिब्यूनलों को श्रम विभाग द्वारा रेफरेंस करके भेजे गए रिकवरी के मामलों को छह माह के भीतर प्राथमिकता से निपटाने के आदेश जारी किए हैं। आज सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर यह आदेश अपलोड होते ही मजीठिया की लड़ाई लड़ रहे अखबार कर्मियों में खुशी की लहर दौड़ गई। ज्ञात रहे कि हजारों अखबार कर्मी सात फरवरी 2014 को दिए गए सुप्रीम कार्ट के आदेशों के तहत मजीठिया वेजबोर्ड के तहत एरियर व वेतनमान की जंग लड़ रहे हैं। इनमें से सैकड़ों कर्मी अपनी नौकरी तक खो चुके हैं।

सुप्रीमकोर्ट का आर्डर ये है :

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
९३२२४११३३५

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मांगा था मजीठिया का हक, इसलिए नहीं छापा निधन का समाचार

जिनके साथ 25 साल गुजारा उनका भी मर गया जमीर, नहीं शामिल हुए अंतिम यात्रा में, यह है सहारा परिवार का सच…  वाराणसी : सहारा समूह के हुक्मरान सुब्रत राय सहारा एक तरफ जहां सहारा को एक कंपनी नहीं बल्कि परिवार मानने का दंभ भरते हैं, वहीं इसी सहारा समूह के पत्रकार रह चुके जयप्रकाश श्रीवास्तव के निधन की एक लाईन की खबर इसलिये राष्ट्रीय सहारा अखबार में नहीं लगायी गयी क्योंकि जयप्रकाश ने अखबार प्रबंधन से जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार अपना बकाया मांग लिया था।

राष्ट्रीय सहारा के वरिष्ठ पत्रकार श्री जयप्रकाश श्रीवास्तव का सोमवार को वाराणसी के सिंह मेडिकल एण्ड रिसर्च सेंटर, मलदहिया में निधन हो गया। ६४ वर्षीय श्री जयप्रकाश श्रीवास्तव मधुमेह एवं हृदय रोग से पीड़ित थे। उनके निधन पर समाचार पत्र कर्मचारी यूनियन के अजय मुखर्जी सहित कई पत्रकारों ने शोक जताया है।  स्व॰ जयप्रकाश श्रीवास्तव लम्बे समय से पत्रकारिता से जुड़े रहे।  वे अपने पीछे पत्नी, तीन पुत्रियां और एक पुत्र छोड़ गये हैं।  उनके निधन पर देश भर के मजीठिया क्रांतिकारियों ने शोक जताया है और साफ कहा है कि इस क्रांतिकारी का बलिदान र्ब्यथ नहीं जाने दिया जायेगा।

जयप्रकाश श्रीवास्तव का कसूर बस इतना था कि उन्होंने मजीठिया के लिए श्रम न्यायालय में केस कर रखा था। नतीजा रहा कि उनके निधन का समाचार तक नहीं छापा गया। यह कड़वी हकीकत है,  सच कहने की हिम्मत का नारा देने वाले राष्ट्रीय सहारा अखबार का। इस अखबार की वाराणसी यूनिट में जयप्रकाश श्रीवास्तव लगभग 25 वर्ष रिपोर्टर रहने के बाद एक वर्ष पहले रिटायर हो गये थे। सोमवार की शाम हार्ट अटैक के चलते उनका निधन हो गया। उनके निधन की जानकारी मिलते ही राष्ट्रीय सहारा में शोक सभा की तैयारी शुरू हुई। फोटो ग्राफर ने जयप्रकाश की फाइल फोटो कम्प्यूटर में खोज कर निकाला ताकि वह उनके निधन के समाचार के साथ प्रकाशित हो सके।

निधन का समाचार एक रिपोर्टर ने कम्पोज करना शुरू ही किया कि ऊपर से मौखिक निर्देश आ गया। बताया गया कि जय प्रकाश ने मजीठिया का हक पाने के लिए लेबर कोर्ट में संस्थान के खिलाफ मुकदमा कर रखा है इसलिए उनके निधन का समाचार राष्ट्रीय सहारा में नहीं छपेगा। यह सूचना मिलते रिपोर्टर ने खबर और फोटोग्राफर ने कम्प्यूटर से जयप्रकाश की फोटो डिलीट कर दी। इतना ही नही, इशारों में एक दूसरे को कुछ ऐसे संकेत हुए कि राष्ट्रीय सहारा के पत्रकार साथी न तो संवेदना व्यक्त करने के लिए जयप्रकाश के घर गये और न ही उनकी अंतिम यात्रा में शामिल हुए। केवल एक स्टाफर और चार-पाच स्ट्रिंगर ही उनके घर गए।

जयप्रकाश ने लगभग 25 साल राष्ट्रीय सहारा में सेवा की। वह ब्यूरो के स्टाफ थे। उनके साथ ही सहारा में नौकरी शुरू करने वाले लगभग डेढ दर्ज़न कर्मचारी आज भी सहारा की वाराणसी यूनिट में है जिनके साथ जयप्रकाश के घरेलू रिश्ते रहे लेकिन ऐसे लोगों ने भी नौकरी जाने के भय में अपना जमीर गिरवी रख दिया। वे भी संवेदना व्यक्त करने के लिए जयप्रकाश के घर जाने की हिम्मत नहीं जुटा सके। सहारा को परिवार बताने वाले सुब्रत राय के इस संस्थान की ओर से एक माला तक नसीब हो सकी जय प्रकाश को।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
९३२२४११३३५

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बिहार के श्रम संसाधन मंत्री बोले- मजीठिया वेज बोर्ड की अनुशंसा एवं सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का होगा अनुपालन

गया से वरिष्ठ पत्रकारपंकज कुमार की रिपोर्ट >


बिहार के श्रम संसाधन मंत्री विजय कुमार सिन्हा ने बताया कि पूरे राज्य का 80 प्रतिशत बाल मजदूर अकेले गया जिला में है। श्रम मंत्री ने कहा कि बिहार को बाल मजदूर से मुक्त कराने के लिए राज्य सरकार प्रतिबद्ध है। श्रम मंत्री का दावा है कि राज्य सरकार जस्टिस मजीठिया आयोग की अनुशंसा के आलोक में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को क्रियान्वित कराने के लिए हर जरूरी कदम उठाएगी। मंत्री श्री सिन्हा गया में इस संवाददाता से बात कर रहे थे।

उन्होंने कहा कि सरकार इस बात को लेकर काफी गंभीर है कि न्यूनतम मजदूरी से कोई वंचित न रहे। चाहे वह कोई मीडियाकर्मी ही क्यों न हों। मंत्री श्री सिन्हा ने आगे बताया कि तीन नवंबर को विभाग के सभी वरीय अधिकारियों के साथ समीक्षा बैठक कर श्रम कानून का अक्षरशः अनुपालन सुनिश्चित कराने के लिए निर्णय लिया जाएगा। इसके पूर्व मंत्री ने भाजपा प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य अनिल स्वामी के साथ विष्णुपद मंदिर और मां मंगला गौरी मन्दिर जाकर पूजा अर्चना की। मंत्री श्री सिन्हा ने विभागीय अधिकारियों के साथ समीक्षा बैठक की। डॉ. अपर्णा, विजय कुमार ‌जुबैर अहमद, डॉ. पराशर सहित कई अधिकारी समीक्षा बैठक में उपस्थित थे। भाजपा जिलाध्यक्ष धनराज शर्मा एवं पार्टी के कार्यकर्ताओं ने मंत्री श्री सिन्हा का स्वागत किया।

उधर, शुक्रवार को दैनिक जागरण के गया यूनिट के कर्मियों को श्रम कानून के तहत ईपीएफ, ईएसआई सुविधा, सर्विस बुक एवं अन्य सुविधा न दिए जाने के आरोप की जांच करने मगध प्रमंडल के उप श्रमायुक्त डॉ. अपर्णा के नेतृत्व में विभागीय टीम गयी थी। लेकिन जांच टीम के समक्ष कर्मियों को दी जाने वाली सुविधाओं के सम्बन्ध में कोई कागजात उपलब्ध नहीं कराया गया ताकि स्पष्ट हो सके कि कितने कर्मचारी कार्यरत हैं, उनमें कितने का ईपीएफ नम्बर है, कितने कर्मियों को ईएसआई सुविधा प्राप्त है, सर्विस बुक कितनों को कम्पनी ने दे रखा है। मंत्री विजय कुमार सिन्हा से जब पूछा गया कि दैनिक जागरण के गया यूनिट के कितने कर्मचारी को ईपीएफ, ईएसआई सुविधा प्राप्त है, तो मंत्री श्री सिन्हा ने कहा कि वे इस सम्बन्ध में श्रम आयुक्त से बात कर जबाव दे पाएंगे।

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दैनिक जागरण को लगा झटका, रामजी के तबादले पर श्रम विभाग ने लगाई रोक

कानपुर। “स्वघोषित चैम्पियन” दैनिक जागरण के मालिकान को ताजा झटका कानपुर श्रम विभाग से मिला है। सहायक श्रम आयुक्त आरपी तिवारी ने मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों के अनुरूप वेतन एवं बकाये की मांग करने वाले दैनिक जागरण कानपुर में कार्यरत कर्मचारी रामजी मिश्रा के सिलीगुड़ी स्थानांतरण पर फिलहाल रोक लगा दी है। श्री तिवारी द्वारा जारी आदेश में दैनिक जागरण प्रबंधन की ओर से रामजी मिश्रा का कानपुर कार्यालय से सिलिगुड़ी किए गए तबादले को अनुचित एवं अवैधानिक करार दिया गया है।

गौरतलब है कि रामजी मिश्रा ने कानपुर श्रम विभाग में दिनांक 18 जुलाई 2017 को रिकवरी का क्लेम फाइल किया था। इससे झुब्ध होकर दैनिक जागरण के प्रबंधक ने दिनांक 24 जुलाई 2017 को रामजी का तबादला सिलीगुड़ी कर दिया था। इसके बाद रामजी ने तबादला निरस्त किए जाने की गुहार कानपुर श्रम विभाग में लगाई थी। बतातें चलें कि 19 जून 2017 को आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद से देश के नंबर वन अखबार के मालिक सकते में आ गए थे।

कोर्ट के रुख और भविष्य की अड़चनों को सतही तौर पर ध्यान में रखते हुए मलिकान ने “कमजोर पेड़ों” को काटने की “सुपारी” प्रबंधक अजय सिंह को दे दी थी। इसके बाद अजय सिंह ने बेहद शातिराना अंदाज में उत्पीड़न करने के बाद 23 लोगों का तबादला कर दिया था। ये फैसला इन्हीं 23 कर्मचारियों में शामिल रामजी मिश्रा के मामले में आया है।

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नवभारत अखबार के 47 कर्मचारियों ने लगा दिया मजीठिया वेज बोर्ड का क्लेम

महाराष्ट्र के प्रमुख हिंदी दैनिक नवभारत में माननीय सुप्रीमकोर्ट के 13 अक्टूबर यानि आज के आदेश का असर दिखने लगा है। यहां आज दिनांक 13 अक्टूबर को बांबे यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट संलग्न महाराष्ट्र मीडिया एंप्लाइज यूनियन से जुड़े नवभारत हिंदी दैनिक के 47 कर्मचारियों ने सामूहिक रुप से ठाणे लेबर कमिश्नर कार्यालय में मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार बकाये का क्लेम फाइल किया।

इसी बीच खबर आयी कि माननीय सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि छह माह के अंदर श्रम विभाग और श्रम न्यायालय में मजीठिया वेज बोर्ड से संबंधित सभी मामलों का निपटारा किया जाए। सुप्रीम कोर्ट के ताजे आदेश की खबर और ठाणे लेबर कमिश्नर कार्यालय में क्लेम फाइल की खबर मिलते ही नवभारत कर्मियों ने खुशी का इजहार किया और वहीं प्रबंधन की सांस फूलने लगी है।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
9322411335

मूल खबर…

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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश- ‘मजीठिया वेज बोर्ड के सभी प्रकरण 6 महीने के भीतर निपटाएं’

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को मजीठिया वेज बोर्ड मामले में अहम फैसला सुनाते हुए देश के सभी राज्यों के श्रम विभाग एवं श्रम अदालतों को निर्देश दिया कि वे अखबार कर्मचारियों के मजीठिया संबंधी बकाये सहित सभी मामलों को छह महीने के अंदर निपटाएं। सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति रंजन गोगोई एवं नवीन सिन्हा की पीठ ने ये निर्देश अभिषेक राजा बनाम संजय गुप्ता / दैनिक जागरण (केस नंबर 187/2017) मामले की सुनवाई करते हुए दिए।

गौरतलब है कि मजीठिया के अवमानना मामले में 19 जून 2017 के फैसले में इस बात का जिक्र नहीं था जिसे लेकर अभिषेक राजा ने सुप्रीम कोर्ट से इस पर स्पष्टीकरण की गुहार लगाई थी। हालांकि स्पष्टीकरण की याचिका जुलाई में ही दायर कर दी गई थी मगर इस पर फैसला आज आया जिससे मीडियाकर्मियों में एक बार फिर खुशी की लहर है।

आप सभी मीडियाकर्मियों से अपील है कि अपना बकाया हासिल करने के लिेए श्रम विभाग में क्लेम जरूर डालें अन्यथा आप इससे वंचित रह सकते हैं। अब अखबार मालिक किसी भी तरह से आनाकानी नहीं कर सकेंगे और मामले को लंबा नहीं खींच सकेंगे। अगर वे ऐसा करते हैं तो इस बार निश्चित रूप से विलफुल डिफेमेशन के दोषी करार दिए जाएंगे।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
मुंबई
संपर्क : 9322411335 , shashikantsingh2@gmail.com

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एचटी मैनेजमेंट ने फिर कोई जवाब देने से इन्कार किया

हाईकोर्ट में रिट फाइल करने की आड़ में अगली तारीख ले ली…सीनियर वकील संजय कुमार सिंह मैनेजमेंट की ओर से पहुंचे डीएलसी कोर्ट… मामला मजीठिया वेज बोर्ड के कार्यान्वयन और ग्रेच्यूटी भुगतान में हुए फ्रॉड का है… पटना से खबर है कि मजीठिया मामले एवं उससे जुड़े ग्रेच्यूटी के सवाल पर डीएलसी पटना के यहां सुनवाई हुई और फिर हाईकोर्ट की आड़ लेकर मैनेजमेंट ने अगली तारीख ले ली।

पिछली बार भी यही हुआ था। मैनेजमेंट के एडवोकेट ने कहा कि हम इस सुनवाई के खिलाफ हाईकोर्ट गये हैं और अगली तारीख को कोई न कोई आदेश के साथ आएंगे, अन्यथा अगली तारीख को जवाब फाइल करेंगे। मगर इस बार भी फिर पुराना आलाप। इस बार मैनेजमेंट की ओर से सीनियर वकील संजय कुमार सिंह हाजिर हुए। अभी तक इस मामले में आरोपी शोभना भरतिया की ओर से कोई वकालतनामा दाखिल नहीं हुआ जबकि पिछली बार उन्हें स्पष्ट हिदायत दी गई थी। 

वर्कर्स की ओर से शिकायतकर्ता दिनेश कुमार सिंह ने कहा कि हाईकोर्ट जब तक कोई आदेश पारित नहीं करता  या सुनवाई के लिए रिट एक्सेप्ट नहीं हो जाती, तब तक डीएलसी के यहां चल रही सुनवाई प्रक्रिया बाधित नहीं हो सकती है। मैनेजमेंट फिर न्याय प्रक्रिया को डिले करने की अपनी योजना में कामयाब हुआ और मामला अगली तारीख 11 नवम्बर तक के लिए टल गया।

पटना से दिनेश सिंह की रिपोर्ट. संपर्क : dksinghhh@gmail.com

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हिंदुस्तान का पक्ष रखने डीएलसी के पास गए एचआर मैनेजर की हुई जमकर फजीहत

बरेली में बुधवार को उपश्रमायुक्त के समक्ष कर्मचारियों के उत्पीड़न के मामले में हिन्दुस्तान प्रबन्धन की ओर से पेश हुए एचआर प्रभारी सत्येंद्र अवस्थी को भारी फजीहत का सामना करना पड़ा। उनको प्रबन्धन का पक्ष रखे बगैर बैरंग लौटना पड़ा। डीएलसी ने ताकीद किया कि उनको (सतेंद्र अवस्थी) तब तक नहीं सुना जाएगा जब तक वह प्रतिवादियों की ओर से उनका पक्ष रखने का अधिकार पत्र लेकर नहीं आएंगे।

दरअसल मजिठिया क्रांतिकारी मनोज शर्मा, राजेश्वर विश्वकर्मा, निर्मल कांत शुक्ला ने उपश्रमायुक्त से शिकायत की कि हिन्दुस्तान प्रबन्धन मजिठिया वेज बोर्ड के अनुसार वेतन-भत्तों व एरियर का उनके निर्णय व आदेश के क्रम में लाखों का भुगतान न करके उनका उत्पीड़न करने पर उतारू है। विधि विरुद्ध डोमेस्टिक जांच बैठा दी ताकि दबाव बनाया जा सके। मनमानी कार्रवाई व धमकियां दी जा रही हैं। ना तो वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट और ना ही माननीय सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का अनुपालन किया जा रहा है। निर्मल कांत शुक्ला ने शिकायत में यह भी कहा कि हिन्दुस्तान प्रबन्धन तथाकथित डोमेस्टिक जांच के बहाने अपने परिसर में बुलाकर उनकी हत्या करना चाह रहा है।

उपश्रमायुक्त बरेली ने मामले को गंभीरता से लेते हुए हिंदुस्तान बरेली को नोटिस जारी किया और 4 अक्टूबर को अपना पक्ष अभिलेखीय साक्ष्य सहित प्रस्तुत करने का आदेश दिया। बुधवार को जब उपश्रमायुक्त कार्यालय में प्रबन्धन की ओर से एचआर प्रभारी सतेंद्र अवस्थी ने अपनी मौजूदगी की बात कही तो शिकायतकर्ता मनोज शर्मा, राजेश्वर विश्वकर्मा, निर्मल कांत शुक्ला ने उपश्रमायुक्त से कहा कि ये व्यक्ति एचटी मीडिया का नहीं है।

क्या इनके पास प्रतिवादिगणों की ओर से उनका पक्ष रखने का कोई अधिकारपत्र है? यदि नहीं तो फिर इनको सुनने का कोई मतलब नहीं क्योंकि ये सिर्फ संस्थान में चाय-पानी का बंदोबस्त करते हैं और डाक डिस्पैचर की भूमिका में रहते हैं। इनके अधिकारी बाद में ऊपरी अदालत में जाकर ये कहते है कि हमको तो सुना ही नहीं गया।कंपनी खुद सतेंद्र अवस्थी की ओर से रखे गए पक्ष को अपना पक्ष होने से मुकर जाती है। शिकायतकर्ता मनोज शर्मा ने ये भी कहा कि सतेंद्र अवस्थी ऑफ रोल कर्मचारी हैं। इनका एचटी से कोई मतलब नहीं। ना ही ये प्रबन्धन का हिस्सा हैं।

मनोज शर्मा, राजेश्वर विश्वकर्मा, निर्मल कांत शुक्ला की आपत्ति को उपश्रमायुक्त ने स्वीकार कर हिंदुस्तान प्रबंधन की ओर से आये सतेंद्र अवस्थी को नहीं सुना। फजीहत होती देख सतेंद्र अवस्थी खुद ही चुपचाप डीएलसी कार्यालय से खिसक लिए। अब उपश्रमायुक्त ने हिंदुस्तान के एचआर डायरेक्टर राकेश सिंह गौतम, बरेली यूनिट के जीएम योगेंद्र सिंह, बरेली के स्थानीय संपादक मनीष मिश्र को नोटिस जारी कर 16 अक्टूबर को तलब किया है।

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नवभारत अखबार के निदेशक के खिलाफ ड्राइवर ने दर्ज कराया केस

महाराष्ट्र के नई मुम्बई से एक बड़ी खबर आ रही है। यहां नवभारत अखबार के निदेशक के खिलाफ उन्हीं के ड्राइवर ने मुकदमा दर्ज करा दिया है। सूत्रों के मुताबिक महाराष्ट्र मीडिया एंप्लाइज यूनियन नवभारत इकाई सदस्यों ने विजयादशमी के दिन गेट मीटिंग की थी। इस मीटिंग में रमाकांत भी शामिल हुए थे जो नवभारत अखबार के निदेशक डीवी शर्मा के ड्राइवर हैं। आरोप है कि निदेशक डीवी शर्मा ने गाली देते हुए रमाकांत को कंपनी से निकाल दिया।

रमाकांत ने दिनांक 3 अक्टूबर को शाम 4:00 बजे सानपाड़ा पुलिस स्टेशन में शर्मा के खिलाफ मामला दर्ज कराया। इसके बाद पुलिस अधिकारी काकड़े ने शर्मा को फोन कर बुलाया तो शर्मा ने शाम 7:00 बजे आने की बात कही लेकिन वे पुलिस स्टेशन नहीं पहुंचे। शर्मा ने नवभारत के एक और कर्मचारी संतोष जायसवाल को भी गाली देते हुए कंपनी से निकाल देने की धमकी दी है। इसके बाद संतोष जायसवाल ने भी सानपाड़ा पुलिस स्टेशन में मामला दर्ज कराया।

ये दोनों कर्मचारी मजीठिया की मांग को लेकर और नौकरी स्थाई करने की मांग को लेकर यूनियन से जुड़े हुए हैं। शर्मा को इन दोनों का यूनियन से जुड़ना नागवार गुजरा। शर्मा ने दोनों को बुलाकर यूनियन से बाहर निकलने की बात की। ऐसा करने से इनकार करने पर निदेशक ने दलित विरोधी गालियों का इस्तेमाल किया और कंपनी से निकालने की धमकी दी। रमाकांत ड्राइवर को कल बाहर निकाल भी दिया गया। शर्मा की इस कार्यवाही से आहत ड्राइवर रमाकांत ने सानपाड़ा पुलिस स्टेशन में मामला दर्ज कराया है। पुलिस फिलहाल पूरे मामले की छानबीन कर रही है।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
9322411335

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‘हिंदुस्तान’ अखबार से छह करोड़ रुपये वसूलने के लिए आरसी जारी

मजीठिया प्रकरण में ‘हिंदुस्तान’ की सबसे बड़ी हार… लखनऊ से बड़ी ख़बर है। मजीठिया वेतनमान प्रकरण में दैनिक समाचार पत्र हिंदुस्तान की अब तक की सबसे बड़ी हार हुई है। कम्पनी का झूठ भी सामने आ गया है। यह भी सामने आया है कि मजीठिया वेज बोर्ड देने से बचने के लिए कम्पनी ने तरह तरह के षड्यंत्र किए। लखनऊ के श्रम विभाग ने हिंदुस्तान के 16 पत्रकारों व कर्मचारियों को करीब 6 करोड़ रुपए का भुगतान करने का आदेश दिया है। लखनऊ के एडिशनल कमिशनर बी.जे. सिंह व सक्षम अधिकारी डॉ. एम॰के॰ पाण्डेय ने 6 मार्च को हिंदुस्तान के खिलाफ आरसी जारी कर दी और पैसा वसूलने के लिए जिलाधिकारी को अधिकृत कर दिया है। श्रम अधिकारी ने जिलाधिकारी को भेजी रिकवरी-आरसी की धनराशि हिंदुस्तान से वसूल कर श्रम विभाग को देने को कहा है।

डीएम की अब यह ज़िम्मेदारी होगी की वह हिंदुस्तान से पैसा वसूल के श्रम विभाग को दें और फिर श्रम विभाग यह राशि मुकदमा करने वाले 16 कर्मचारियों को देगा। श्रम विभाग के इस आदेश से यह भी साबित हो गया है कि हिंदुस्तान मजीठिया वेज बोर्ड के मुताबिक वेतनमान नहीं दे रहा है। जबकि हिंदुस्तान प्रबंधन ने श्रम विभाग को यह लिखित जानकारी दी थी कि कम्पनी मजीठिया वेजबोर्ड के मुताबिक वेतन दे रही है। इसी आधार पर श्रम विभाग ने सुप्रीम कोर्ट में यह गलत हलफ़नामा लगा दिया कि हिंदुस्तान मजीठिया के अनुसार वेतनमान दे रहा है। अब इस प्रकरण में गलत हलफ़नामा देने पर कम्पनी के खिलाफ धोखाधड़ी का मुकदमा भी चल सकता है। खुद श्रम विभाग ने यह लिखकर दिया है कि हिंदुस्तान मजीठिया वेजबोर्ड के अनुसार वेतनमान नहीं दे रहा और ना ही विभाग को कागज उपलब्ध करा रहा है।

गौरतलब है कि सितम्बर 2016 को हिंदुस्तान व हिंदुस्तान टाइम्स के पत्रकारों व गैर पत्रकारों ने प्रमुख सचिव श्रम के यहाँ शिकायत कर कहा था कि प्रबंधन मजीठिया वेतनमान के अनुसार वेतन नहीं दे रहा है। इसके बाद प्रबंधन उत्पीड़न पर उतर आया। आठ पत्रकारों को नौकरी से निकाल दिया गया। इसके बाद श्रम विभाग में सभी पत्रकारों ने नौकरी से निकाले जाने और नवम्बर 2011 से 2016 के बीच मजीठिया वेतनमान का डिफ़्रेन्स दिए जाने का वाद दायर किया। बर्ख़ास्तगी का केस अभी विभाग में लम्बित है जबकि 6 मार्च को श्रम विभाग ने पत्रकारों के पक्ष को सही मानते हुए कम्पनी के ख़िलाफ़ फ़ैसला दिया। रिकवरी केस फ़ाइल करने में कुल 16 कर्मचारी शामिल थे। इन सभी को श्रम विभाग ने उनके वेतन के हिसाब से 10 लाख रुपए से 60 लाख रुपए तक भुगतान करने आदेश दिया है।

श्रम विभाग ने डीएम को जारी आरसी में कहा है कि यदि कम्पनी इस राशि का भुगतान तत्काल नहीं करती है तो कम्पनी की सम्पत्ति कुर्क कर राशि का भुगतान कराया जाए। हिंदुस्तान प्रबंध तंत्र का झूठ इसी से समझा जा सकता है कि चार महीने की सुनवाई के बावजूद हिंदुस्तान प्रबंध तंत्र अपनी ओर से एक भी लिखित जवाब दाखिल नहीं कर पाया।
कर्मचारियों ने मुकदमे में साक्ष्यों के साथ यह तर्क दिया की हिंदुस्तान एक नम्बर की कम्पनी है। प्रबंधन ने इसके ख़िलाफ़ कोई तर्क नहीं दिया जिससे यह साबित हुआ की कम्पनी एक नम्बर की है और मजीठिया अनुसार वेतन नहीं दिया जा रहा था।

कर्मचारियों के वक़ील शरद पाण्डेय ने श्रम विभाग में अपने तर्कों से साबित किया कि हिंदुस्तान ने अब तक मजीठिया वेतनमान नहीं दिया है और पूर्व में जो भी पत्र दिए वह झूठे थे। अनुभवी वकील शरद पाण्डेय ने कम्पनी के नामी-गिरामी वकीलों की फौज को अपने तर्कों से अनुत्तरित कर दिया। यह भी पता चला है कि हिंदुस्तान प्रबंधन ने पूर्व में भी जालसाजी करते हुए कोर्ट में इतने झूठे कागजात लगाए हैं कि आगे कोई भी वकील इनका केस लड़ने को तैयार नहीं हो रहा है। जिन 16 लोगों ने श्रम विभाग में वाद दायर किया था उनमें संजीव त्रिपाठी, प्रवीण पाण्डेय, संदीप त्रिपाठी, आलोक उपाध्याय, प्रसेनजीत रस्तोग, हैदर, लोकेश त्रिपाठी, आशीष दीप, हिमांशु रावत, एलपी पंत, जितेंद्र नागरकोटी, आरडी रावत, बीडी अग्रवाल, सोमेश नयन, रामचंदर, पंकज वर्मा शामिल है।

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सोशल नेटवर्किंग जिताएगी ‘मजीठिया’ की जंग

जुटाना होगा जनाधार : हम देख ही रहे हैं कि मजीठिया के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट, लेबर कमिश्नर ऑफिस, लेबर कोर्ट और सरकार का रवैया क्या है। कितने अफ़सोस की बात है कि जिन लोगों ने लंबी कानूनी लड़ाई लड़कर रिकवरी चालान इश्यू कराने तक की जीत हासिल की,उनमें से भी अधिकतर लोगों के खाते में पैसा नहीं पहुंचा है। बीयूजे सहित देश की कई संस्थाएं- संगठन हर स्तर पर संघर्षरत हैं ही, पर हमें मीडिया हाउसेस के खिलाफ़ अपनी जंग जीतने के लिए एक नई रणनीति भी अपनानी होगी। इस रणनीति के जनक यशवंत सिंह हैं, जिन्होंने ‘भड़ास 4 मीडिया’ लांच कर पत्रकारों को पूरे पत्रकारिता-जगत से जोड़ा।

मजीठिया-क्रांति में पत्रकारों को शामिल करने के मामले में इस वेबसाइट का योगदान अवर्णनीय है। लेकिन हमें इस क्रांति में आम जनता को भी शामिल करना चाहिए। इतिहास गवाह है कि अब तक सारी क्रांतियां जनाधार के बल पर ही सफल हुई हैं। ‘तीन तलाक ’ का मुद्दा और उस पर आया ऐतिहासिक फ़ैसला इसका नवीनतम उदाहरण है। अब ज़रूरत है कि हम महसाणा आयोग, वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट , मजीठिया वेज बोर्ड की सिफ़ारिशों और उस पर न्यायपालिका व कार्यपालिका का रवैया तथा मीडिया हाउसेस की मनमानी को इतना प्रचारित करें कि यह गली- नुक्कड़ और चाय- पान की दुकानों तक पर चर्चा व बहस का मुद्दा बन जाए।

ज़ाहिर है कि इसमें अखबार और टीवी हमारा साथ नहीं देगा। लेकिन सोशल मीडिया आज इतना सशक्त माध्यम बन चुका है, जिसके सामने अख़बार और टीवी भी कमज़ोर है। देखिए न, अख़बार और टीवी मोदी- कीर्तन किए जा रहे हैं, इसके बावजूद सोशल मीडिया ने मोदी-सरकार के ख़िलाफ एक तबका तैयार कर दिया है। हम इस सबसे ज़्यादा ताक़तवर माध्यम का उपयोग मजीठिया पर जनाधार जुटाने के लिए बख़ूबी कर सकते हैं। बीयूजे की आम सभा में मेरे इस विचार का सभी ने खुले दिल से स्वागत किया था और इंदर जैन, जे.सी पांडे सहित कार्यकारिणी के सदस्यों ने इसकी रूपरेखा तैयार करने की ज़िम्मेदारी मुझे सौंपी थी। वह ड्राफ्ट प्रस्तुत है, जिसमें करेक्शन और एडीशन की ज़िम्मेदारी हम सभी की है-

1. हम सभी प्रिंट मीडियाकर्मी फ़ेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सऐप, इंस्टाग्राम, टंबलर, वीचैट आदि ज्यादा से ज्यादा सोशल नेटवर्किंग साइट्स से जुड़ें और उन पर अपनी सक्रियता बढ़ाएं। अपने ‘ कॉन्टैक्ट्स/ फ़्रेड्स’ को ‘भड़ास 4 मीडिया’ पढ़वाने के लिए अप्रत्यक्ष रूप से प्रेरित करें। 

2. हर बेवसाइट की अपनी अलग तरह की रीच और अप्रोच है। उसके स्वरूप को समझें, उसी के अनुसार सामग्री पोस्ट करें। जैसे कि आप फेसबुक पर पूरा आर्टिकल और ढेर सारे फ़ोटो पोस्ट कर सकते हैं, मगर इंस्टाग्राम मुख्य रूप से तस्वीरें पोस्ट करने के लिए है।

3. सबसे अहम् बात कि हमारी पोस्ट कैसी हो। अगर हम सीधे-सीधे मजीठिया का ज़िक्र करेंगे तो आम जनता क्या, हमारे – आपके घरवाले भी नहीं पढ़ना चाहेंगे। ज़रूरी होगा कि पोस्ट में निजी जीवन की घटनाओं- अनुभवों या सार्वजनिक चर्चाओं से मजीठिया को इंडायरेकटली जोड़ें, ताकि वह रूखी ख़बर की जगह इमोशनल , इंटरेस्टिंग, रीडेबल आइटम बन पड़े और लोग पढ़ने- ध्यान देने पर मज़बूर हो जाएं। संबंधित फ़ोटो सोने पर सुहागा का काम करेंगे । मैंने जल्दबाजी में इस तरह का पहला प्रयास अपने फ़ेसबुक अकाउंट Anil Rahi पर एक अलग पेज Anil Rahi : To The Point क्रिएट करके किया है। अगर ठीक लगे तो आप भी ऐसा कुछ करें, वर्ना सुझाव दें।

4. अपने अकाउंट में कांटैक्ट्स,फ्रेंड्स, फॉलोअर्स की संख्या बढ़ाएं। इसके लिए फ्रेंड रिक्वेस्ट स्वीकार करने के साथ – साथ खुद भी रिक्वेस्ट भेजने में संकोच न करें। जब बड़े- बड़े स्टार हमें रिक्वेस्ट भेज सकते हैं, फॉलो कर सकते हैं तो हमें कैसा संकोच !

5. फैमिली ग्रुप, फ्रेंड्स ग्रुप के अलावा भी तरह- तरह के ग्रुप से जुड़कर उनमें मजीठिया की चर्चा अप्रत्यक्ष रूप से करें।

6. प्रॉपर्टी, बिजनेस, फिटनेस, डेटिंग, रिलीजन आदि हर किस्म की कम्यूनिटी से भी जुड़ें और घुमा- फिराकर मजीठिया की बात करें।

7. पत्रकारों- गैरपत्रकारों की महसाणा- मजीठिया वाली पोस्ट पर लाइक, कमेंट, री-ट्वीट करने में कंजूसी न करें।

8. कानून की सीमा में रहते हुए मीडिया हाउसेस, लेबर कमिश्नर ऑफिस के अधिकारियों, कोर्ट्स के जजों- वकीलों के सहयोग , असहयोग, लापरवाही, पक्षपात आदि की चर्चा उनके नाम के उल्लेख के साथ करें।

9. जो लोग अखबारों में कार्यरत हैं, वे बगावती पोस्टिंग करके नौकरी न खोएं, जितने महीनों की सैलरी विदड्रॉ कर सकते हैं, करें। लेकिन मजीठिया संबंधी पोस्ट को लाइक, शेयर, री-ट्वीट वगैरह करने का साहस और सक्रियता ज़रूर रखें। ध्यान रहे कि आप डर कर मैनेजमेंट के तलवे भी चाटेंगे, तब भी आपकी नौकरी सुरक्षित नहीं है।  

10. हम में से कुछ लोग टीवी, रेडियो, स्कूल- कॉलेज के कार्यक्रमों आदि में आमंत्रित किए जाते हैं। वहां भी घुमा-फिरा कर मजीठिया और महसाणा का ज़िक्र करें। कुछ उसी तरह, जैसे कि नेताजी पुल का उद्घाटन करने आते हैं, मगर पुल से ज़्यादा अपनी और अपनी राजनीतिक पार्टी की उप्लब्धियां गिना जाते हैं। ख़ासकर मास मीडिया के स्टूडेंट्स से जुड़ने- जोड़ने का प्रयास करें।

11. पत्रकारों की छोटी- बड़ी ऐसी दर्जनों- सैकड़ों संस्थाएं हैं, जिनके ज़्यादातर सदस्य वर्किंग जर्नलिस्ट तो नहीं हैं, लेकिन जर्नलिस्ट वाला माइंडसेट रखते हैं। हम उन संस्थाओं को जोड़कर बीयूजे जैसे संगठन को और मज़बूत करें या फिर उनकी बेवसाइट्स, कम्युनिटीज़, ग्रुप्स से जुड़कर मजीठिया पर उनका समर्थन और सहयोग प्राप्त करें।

12. वर्तमान सरकार को सपोर्ट करने वाली राजनीतिक पार्टियों से तो अपना दुखड़ा रोएं ही, विपक्ष की पार्टियों, प्रभावी लोगों को अपने पक्ष में खड़ा करें। इसके लिए लैपटॉप को किनारे रखकर खुद भी आना- जाना पड़ सकता है।

13. आजकल हर मशहूर मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर, गुरद्वारों की अपनी बेवसाइट, पोर्टल, कम्युनिटी है। हमें उनके प्रमुख पुजारी, मुल्ला- मौलवी, पोप, गुरु साहब आदि से जुड़कर उनका समर्थन और सहयोग हासिल करना चाहिए। श्रद्धालु इनके प्रवचन को ऊपरवाले के फ़रमान की तरह ग्रहण करते हैं और हमारा 90 फ़ीसदी देश आस्तिक व श्रद्धालु है। इसके लिए नेटवर्किंग के अलावा पर्सनल विज़िट की भी ज़रूरत होगी। शुरुआत यूं भी हो सकती है कि हम लोग आते- जाते किसी मंदिर, मस्जिद गुरद्वारे में जाएं और पुजारी, पोप, मौलवी को इस हद तक कनविंस करें कि वे वहां पहुंचने वाले लोगों को मजीठिया के मुद्दे से परिचित कराएं, उन्हें हमारे पक्ष में खड़ा करें। इनकी बातों का असर बड़े- बड़े नेताओं और फिल्म स्टारों के आव्हान से भी ज्यादा होगा।

14. सक्रिय राजनीति से अलग और सरकारों के प्रभाव से  मुक्त अण्णा हज़ारे, बाबा रामदेव, श्री श्री रवि शंकर  जैसी हस्तियों को अपने पक्ष में लाने का प्रयास किया जाए। इसके लिए नेटवर्किंग के साथ फ़ोन कॉल और मेल- मुलाक़ात की भी ज़रूरत पड़ सकती है।

जनाधार जुटाने के ऐसे कई अन्य तरीके भी खोजे जा सकते हैं। मगर एक बात तय है। अगर हम सब पूरे हफ्ते में 22-24 घंटे भी मजीठिया के मुद्दे पर सोशल नेटवर्किंग को दें तो इस क्रांति की हवा के मंद झोखे देखते ही देखते आंधी- तूफ़ान बनकर देश को अपनी गिरफ़्त में ले लेंगे और ढीठ- बेगैरत मीडिया हाउसेस को वेतन व सुविधा संबंधी सारी सिफारिशें लागू करने के लिए मज़बूर होना पड़ेगा।

अनिल राही
anilrahii@gmail.com

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मजीठिया वेज बोर्ड के लिए नई दुनिया रायपुर के मीडियाकर्मियों ने किया प्रदर्शन (देखें तस्वीरें)

दशहरा के दिन जब हर जगह असत्य पर सत्य की जीत की खुशी में महाज्ञानी और प्रकांड विद्वान रावण का पुतला जलाया जा रहा था, उसी समय रायपुर में दैनिक जागरण प्रबंधन के अखबार नयी दुनिया के कर्मचारी जागरण प्रबंधन के खिलाफ सड़क पर उतर गये और शान्तिपूर्ण तरीके से मोर्चा निकाला.. इस प्रदर्शन में शामिल कर्मियों ने फेसबुक पर लिखा है- ”नईदुनिया (जागरण ग्रुप का अखबार) रायपुर की शुरू हो गई बात…. आज रावण दहन के साथ…. जय हो मजीठिया.”

चौथा स्तंथ कहे जाने वाला मीडिया ही माननीय सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की अवहेलना कर रहा है… अखबार में कार्यरत कर्मचारियों का अधिकार है मजीठिया वेज बोर्ड. लेकिन अपना हक मांगने पर नईदुनिया (यूनिट आफ जागरण प्रकाशन लिमिटेड रायपुर, छत्तीसगढ़) के 24 कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया गया… इसके विरोध में कर्मचारियों ने रायपुर के चौक चौराहों पर पोस्टर बैनर लेकर शांतिपूर्ण मौन प्रदर्शन किया…

कर्मचारियों के साथ गाली गलौच और दुर्व्यवहार कर शांति भंग करने का काम प्रबंधन के लोग कर रहे हैं लेकिन इल्जाम कर्मचारियों पर डाल कर नौकरी से निकाल रहे हैं… यहां उल्टा चोर कोतवाल को डांटे वाली कहावत चरितार्थ हो रही है… जागरण समूह से मोर्चा लेने वाले इन मीडियाकर्मियों की हर कोई तारीफ कर रहा है…

मजीठिया वेतन की मांग करने वाले कर्मचारियों पत्रकारों का शोषण नईदुनिया जागरण प्रबंधन द्वारा रायपुर में लगातार जारी है… श्रम विभाग में बातचीत और बैठकों के दौर के बावजूद 24 कर्मचारियों का निलंबन 4 कर्मचारियों का कश्मीर हरियाणा ट्रांसफर करने के साथ-साथ उत्पीड़ित करने के कारण 26 से अधिक कर्मचारी नईदुनिया अखबार छोड़ कर जा चुके हैं। जागरण के मालिकाना हक लेने के बाद 2012 से नईदुनिया निरंतर पतन की ओर अग्रसर है… वह न केवल पाठकों का बल्कि 10 से 11 साल से काम कर रहे कर्मचारियों का भी विश्वास खो चुका है…

दशहरे के दिन रायपुर में कर्मचारियों ने 24 निकाले गए कर्मचारियों को तत्काल काम पर लेने और मजीठिया वेतन देने की मांग के साथ मौन विरोध प्रदर्शन किया… सुबह से शाम तक रायपुर के महत्वपूर्ण स्थलों में कर्मचारियों का यह प्रदर्शन प्रबंधन की दादागिरी के खिलाफ जारी रहा… संवैधानिक मजीठिया कमीशन की रिपोर्ट सुप्रीमकोर्ट द्वारा लागू किये जाने के बार-बार के आदेश के बाद भी मीडिया मालिकों के गैरकानूनी कृत्य को सरकार रोक नही पा रही है यानि सत्ता से उच्च स्तर पर साठगांठ की बू आ रही है… बहरहाल शांतिपूर्ण विरोध के संवैधानिक अधिकार का प्रयोग पत्रकार कर्मचारी कर रहे हैं..

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
9322411335

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नवभारत कर्मियों ने दशहरा पर लिया प्रबंधन रूपी रावण के दहन का संकल्प (देखें वीडियो)

नवभारत कर्मचारियों ने महाराष्ट्र मीडिया इंप्लाइज यूनियन के बैनर तले शनिवार को विजयादशमी के अवसर पर सानपाड़ा पूर्व स्थित कार्यालय के सामने गेट मीटिंग की. मीटिंग में यूनियन से जुड़े करीब 70 कर्मचारियों के अलावा मिड-डे और डीएनए के कर्मचारी भी शामिल हुए. मीटिंग में नवभारत इकाई के अध्यक्ष केशव सिंह बिष्ट और सचिव अरुण गुप्ता ने अपनी बात रखी. मीटिंग के दौरान मजीठिया मुद्दे को जोर-शोर से उठाया गया. इस दौरान सभी कर्मचारियों ने नवभारत प्रबंधन को देने के लिए एक रिमाइंडर लेटर पर भी सिग्नेचर किया.

वक्ताओं ने कर्मचारियों की एकता पर बल दिया गया और कहा कि हम सफलता तभी पाएंगे जब एक रहेंगे. नवभारत इकाई के अध्यक्ष बिष्ट जी ने कहा कि हमारे पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है क्योंकि पिछले 20 वर्षों में नवभारत प्रबंधन ने कर्मचारियों का हर स्तर पर शोषण किया है. चाहे वेतन की बात हो या काम के घंटे की या फिर समय से वेतन मिलने की. प्रबंधन ने हमेशा कर्मचारियों को तरसाकर धमकी देते हुए प्रताड़ित किया है. यह सिलसिला पिछले 20 वर्षों से चला आ रहा है. लेकिन अब कर्मचारी जागरूक हुए हैं. वहीं सचिव अरुण गुप्ता ने अध्यक्ष बिष्ट जी की बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि हमारे पास खोने के लिए कुछ नहीं है. अब सिर्फ पाना है. लेकिन पाने के लिए एकजुट रहना जरूरी है.

मीटिंग के दौरान मजीठिया के अलावा PF का मुद्दा उठा क्योंकि 1997 से 2005 तक प्रबंधन ने कुछ कर्मचारियों का एक भी पैसा PF नहीं काटा और न ही अपनी ओर से जमा किया है. इसके अलावा जब पीएफ काटना शुरू किया तो फैक्ट्री की तरह सीलिंग लगाकर काटा जा रहा है. इस संबंध में पीएफ कमिश्नर से की गई शिकायत और उस पर चल रहे काम की जानकारी दी गई.

मीटिंग के दौरान मशीनों का भी मुद्दा उठा क्योंकि प्रिंटिंग मशीन का मेंटेनेंस नहीं होने के कारण अखबार की छपाई अच्छी नहीं होती जिसका दोषारोपण प्रिंटर पर किया जाता है. दो दिन पहले प्रिंटर सागर चौहान को इसलिए नोटिस दिया गया. सागर ने प्रोडक्शन मैनेजर बंशीलाल राहत द्वारा प्रिंटिंग का मुद्दा उठाने पर मशीनों का मेंटेनेंस नहीं किए जाने की बात कही. अंत में सभी कर्मचारियों ने विजयादशमी के अवसर पर नवभारत प्रबंधन रूपी रावण का दहन करने का संकल्प लिया क्योंकि यही रावण कर्मचारियों को प्रताड़ित कर रहे हैं और समय पर वेतन तक नहीं दे रहे हैं. मजीठिया की मांग करने और मशीनों की समस्या बताने पर कर्मचारियों को नोटिस पकड़ा रहे हैं.

संबंधित वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें :

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
9322411335

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मजीठिया मामला : बीमार जागरणकर्मी के जम्मू तबादला के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में 13 अक्टूबर को सुनवाई

पंकज कुमार वर्सेज यूनियन आफ इंडिया रिट याचिका की सुनवाई जस्टिस रंजन गोगई व जस्टिस नवीन सिन्हा की बेंच करेगी… बिहार के गया जिले से जम्मू तबादला किये गए दैनिक जागरण के पत्रकार पंकज कुमार के रिट याचिका पर सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 13 अक्टूबर की टेनटेटिव तिथि निर्धारित की है. जस्टिस रंजन गोगई व जस्टिस नवीन सिन्हा की बेंच सुनवाई करेगी. बिहार के पूर्व कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश नागेन्द्र राय सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता पंकज कुमार की ओर से अदालत में पक्ष रखेंगे.

क्या है मामला : पंकज कुमार दैनिक जागरण के गया कार्यालय में बतौर सब एडिटर कम रिपोर्टर के पद पर कार्यरत हैं. पिछले साल सितम्बर में पंकज कुमार को पेसमेकर लगाया गया. पूर्व में २००४ में भी पेसमेकर लगा था. पिछले साल अक्टूबर में एक अन्य आपरेशन हुआ. बीमारी व आर्थिक परेशानी से जूझ रहे पंकज ने मजीठिया वेज बोर्ड की मांग की. इसके बाद 21 दिन की वेतन कटौती मैनेजमेंट द्वारा कर दी गयी. मैनेजमेंट ने दबाव बनाने के लिए बीमार व अस्वस्थ पत्रकार पंकज को कार्यालय आकर बायोमेट्रिक हाजिरी लगाने को बाध्य किया. पंकज कुमार लुंगी पहनकर असहनीय दर्द के बीच कार्यालय जाते रहे. उन्होंने अर्न लीव में 21 दिन की वेतन कटौती को एडजस्ट करने की गुहार लगाई लेकिन कंपनी ने कोई तवज्जो नहीं दिया. मजीठिया का भूत उतारने के लिए एक मार्च से पटना ट्रान्सफर का मौखिक आदेश दिया गया.

पंकज कुमार ने 25 मार्च को श्रम आयुक्त के यहाँ मजीठिया की मांग करते हुए आवेदन दिया. कंपनी ने बैकडेट में 20 मार्च की तिथि में जम्मू ट्रान्सफर कर दिया. एक मार्च को प्रेषित कंपनी का ट्रान्सफर आर्डर पंकज को तीन अप्रैल को मिला. कंपनी की तानाशाही के खिलाफ पंकज कुमार सुप्रीम कोर्ट की शरण में न्याय की गुहार लगाने पहुंचे और दो याचिकाएं दाखिल की. 330/2017 रिट की सुनवाई 13 अक्टूबर को संभावित है.

इस बीच पंकज कुमार के ट्रान्सफर आर्डर के खिलाफ मगध प्रमंडल के सहायक उप श्रमआयुक्त विजय कुमार का 30 अगस्त का आदेश दैनिक जागरण के मुंह पर तमाचा है. उप श्रम आयुक्त विजय कुमार ने अपने आदेश में कहा है कि बीमार व अस्वस्थ पत्रकार पंकज कुमार को गया से जम्मू तबादला मजीठिया की मांग करने के कारण किया गया है. आदेश में साफ़ है कि प्रबंधन को ट्रान्सफर करने का अधिकार है. लेकिन अधिकार को कर्मचारी की जायज मांग मांगने के कारण उपयोग करना श्रम कानून के हित में नहीं है. उप श्रम आयुक्त विजय कुमार ने अपने आर्डर में साफ़ लिखा है कि पंकज कुमार का ट्रान्सफर आर्डर सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना है. साथ ही कंपनी के खिलाफ़ इस आरोप कि पुष्टि हो गयी कि पंकज कुमार को मजीठिया वेज की अनुसंशा का कोई लाभ देने का एक भी प्रमाण सुनवाई के दौरान देने में कंपनी सफल नहीं हो सकी.

पंकज ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के आलोक में कंपनी को 32 लाख 90 हजार का डिमांड नोटिस अगस्त में भेजा. कंपनी की ओर से डिमांड नोटिस का कोई जबाव नहीं आया. इसके बाद पंकज ने श्रम सचिव से अनुरोध किया कि वे गया के कलेक्टर से दैनिक जागरण के खिलाफ रिकवरी सर्टिफिकेट जारी कराएं. पंकज कुमार की शिकायत पर जागरण कार्यालय पहुंचे जिला श्रम अधीक्षक जुबेर अहमद को मैनेजमेंट ने परिसर के अन्दर घुसने नहीं दिया. जागरण पर सर्विस बुक नहीं देने, ईपीएफ, स्वास्थ्य बीमा का लाभ न देने, गया यूनिट में मजीठिया वेज का अनुपालन न होने सहित कई आरोप हैं. बिहार के श्रम आयुक्त गोपाल मीणा पिछले दो महीने से उप श्रम आयुक्त को आरोप की जाँच कर रिपोर्ट समर्पित करने को कह रहे हैं. लेकिन श्रम आयुक्त श्री मीणा के आर्डर का अनुपालन उप श्रम आयुक्त डॉ. अपर्णा के स्तर से अभी तक नहीं किया गया है.

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
९३२२४११३३५

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‘बिजनेस स्टैंडर्ड’ अखबार ने अपने कर्मचारियों में मजीठिया वेज बोर्ड का का बकाया एरियर वितरित किया

देश के प्रमुख बिजनेस समाचार पत्र ‘बिजनेस स्टैंडर्ड’ से खबर आ रही है कि इस अखबार ने अपने कर्मचारियों को मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार बकाया लाखों रुपये का एरियर दे दिया है। कर्मचारियों को पांच से आठ लाख रुपये तक उनका बकाया एरियर देकर वेतन वृद्धि का भी काम प्रबंधन ने किया है। हालांकि ये लाखों रुपये का एरियर सिर्फ उन्हीं मीडिया कर्मियों को दिया गया है जिनका वेतन कम था।

जिनका वेतन ज्यादा था, उनको इसका लाभ नहीं मिला है। जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार माननीय सुप्रीमकोर्ट के आदेश का पालन करते हुए इस अखबार के 12 संस्करणों में कम वेतन पाने वाले मीडियाकर्मियों को पांच से आठ लाख रुपये का उनका बकाया दिया गया है। हालांकि मजीठिया के जानकार इस दिए गए एरियर को ऊंट के मुंह में जीरा बता रहे हैं।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
9322411335

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दूसरी बार भी मजीठिया सुनवाई में नहीं आया एचटी मैनेजमेंट

पटना : मजीठिया मामले में एक बार फिर हिन्दुस्तान टाइम्स मैनेजमेंट भाग खड़ा हुआ। कल 25 सितम्बर को श्रम विभाग के उप सचिव अमरेंद्र मिश्र के यहां सुनवाई आरंभ हुई। एचटी मैनेजमेंट की ओर से कोई नहीं आया। एक एडवोकेट आए मगर न तो उसके पास कंपनी की तरफ से दिया हुआ कोई वकालतनामा था और न ही कोई मांगी गई सूचना का कंपलायन्स। दूसरी बार लगातार प्रबंधन की अनुपस्थिति को उप सचिव अमरेंद्र मिश्र ने दुर्भाग्यपूर्ण बताया और कहा कि यहां कानून से बढ़कर कोई नहीं है।

राकेश गौतम खुद पहली बैठक में ही उप सचिव को सुनवाई के दौरान यह लिखित दिया है कि पटना संस्करण एक पृथक स्टेबलिशमेंट है और यह दिल्ली से अलग है। उनके इस दावे को कामगारों की ओर से अधिकृत नेता दिनेश सिंह ने चुनौती दी कि पटना जब दिल्ली से पृथक एक अलग स्टेबलिशमेंट है तो राकेश गौतम सुनवाई से बाहर निकलें। एडवोकेट भी इस मामले की आरोपी शोभना भरतिया की ओर से वकालतनामा लेकर आएं। यह पिछली बार हुआ था और पुनः दोबारा यही पूरा वाकया दुहराया गया।

उनके बयान ने मजीठिया वेज बोर्ड लागू करने में हुए घपले का भी राज खुद खोल दिया। उनके खुलासे से यह स्पष्ट हुआ कि एचटी पटना जो अपने रेवेन्यू के चलते आरंभ से ही ग्रुप 1A में रहा है, उसे इस बार राकेश गौतम ने नम्बर तीन में रखा और वह भी महज गिने चुने लोग तक सीमित। कुल मिलाकर पटना में एचआर हेड कोर्ट से लेकर कार्यालय तक हंसी का पात्र बने हुए हैं।

पटना से दिनेश सिंह की रिपोर्ट.

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मजीठिया मामला : प्रभात खबर के खिलाफ मिथलेश कुमार के रिव्यू पिटीशन पर सुप्रीमकोर्ट में 5 को सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट से एक बड़ी खबर आ रही है। जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड की मांग को लेकर प्रबंधन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में लड़ाई लड़ रहे प्रभात खबर के आरा (बिहार) के ब्यूरो चीफ मिथिलेश कुमार बनाम प्रभात खबर मामले में दायर रिव्यू पिटीशन पर 5 अक्टूबर को सुनवाई होगी। यह सुनवाई विद्वान न्यायाधीश रंजन गोगोई और न्यायाधीश नवीन सिन्हा द्वारा की जाएगी।

मजीठिया वेज बोर्ड के लिए प्रबंधन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में लड़ाई लड़ रहे प्रभात खबर के आरा (बिहार) के ब्यूरो चीफ मिथिलेश कुमार का प्रबंधन ने तबादला कर दिया तो मिथिलेश कुमार ने सीधे सुप्रीम कोर्ट में अपने एडवोकेट दिनेश तिवारी के जरिये गुहार लगा दी थी। इस मामले में मजीठिया वेज बोर्ड की सुनवाई कर रहे सुप्रीम कोर्ट के विद्वान न्यायाधीश रंजन गोगोई और नागेश्वर राव की खंड पीठ ने मिथिलेश कुमार के पक्ष में कदम उठाते हुये उनके ट्रांसफर पर अंतरिम रोक लगा दिया था। मगर फिर भी प्रभात खबर प्रबंधन ने उन्हें ज्वाईन नहीं कराया।

इसके बाद यह मामला ३ मई २०१७ को मिथिलेश कुमार के अधिवक्ता दिनेश तिवारी ने सुप्रीमकोर्ट में न्यायाधीश रंजन गोगोई के सामने रखा था। 19 जून 2017 को जस्टिस मजीठिया वेजबोर्ड का जो निर्णय आया उस पर मिथलेश कुमार का कहना है कि मेरे मामले पर स्पष्ट पक्ष नहीं रखा गया। इसके बाद मिथलेश कुमार ने अपने एडवोकेट दिनेश तिवारी के जरिये सुप्रीमकोर्ट मे रिव्यू पिटीशन दायर किया। इस पर 5 अक्टूबर को सुनवाई होगी। इस सुनवाई पर देश भर के मीडियाकर्मियों की नजर होगी।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
९३२२४११३३५

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